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साहित्य अपने समय की स्थितियों का प्रतिबिंब: मैनेजर पांडेय

चूरू में आयोजि‍त कार्यक्रम में वि‍चार व्‍यक्‍त करते मैनेजर पांडेय।

चूरू : प्रयास संस्थान की ओर से शनिवार 30 सितंबर को शहर के सूचना केंद्र में हुए पुरस्कार समारोह में जोधपुर की लेखिका पद्मजा शर्मा को उनकी पुस्तक ‘हंसो ना तारा’ के लिए इक्यावन हजार रुपये का घासीराम वर्मा साहित्य पुरस्कार एवं गांव सेवा, सवाई माधोपुर के लेखक गंगा सहाय मीणा को उनकी पुस्तक ‘आदिवासी साहित्य की भूमिका’ के लिए ग्यारह हजार रुपये का रूकमणी वर्मा युवा साहित्यकार पुरस्कार प्रदान किया गया। इस दौरान ‘भय नाहीं खेद नाहीं’ पुस्तक के लिए नई दिल्ली की दीप्ता भोग व पूर्वा भारद्वाज को संयुक्त रूप से पचास हजार रुपये का विशेष घासीराम वर्मा सम्मान प्रदान किया गया।

देश के प्रख्यात गणितज्ञ डॉ घासीराम वर्मा की अध्यक्षता में हुए समारोह को संबोधित करते हुए नामचीन आलोचक मैनेजर पांडेय ने कहा कि कवि किसी अर्थशास्त्री और इतिहासकार पर निर्भर नहीं रहता, वह अपने समय को जैसा देखता है, वैसा ही लिखता है। इसलिए साहित्य अपने समय की स्थितियों का प्रतिबिंब होता है। पांडेय ने कहा कि मातृभाषा ने ही तुलसी, सूर, मीरा और विद्यापति को महाकवि बनाया। इसलिए मातृभाषाओं के लिए संकट के इस समय में हमें मातृभाषाओं में सृजन करना चाहिए। बेहतर बात है कि राजस्थान में असंख्य लेखक हैं जो हिंदी के साथ-साथ मातृभाषा राजस्थानी में लिख रहे हैं। उन्होंने विजयदान देथा का स्मरण करते हुए कहा कि भाषा को जानना अपने अस्तित्व को जानना है। उन्होंने कहा कि आज के समय में जबकि दूसरे लोग अपनी सुख-सुविधाओं के लिए लड़ रहे हैं, आदिवासी अपने अस्तित्व के लिए, अपने जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने ‘ग्रीन हंट’ का उदाहरण देते हुए कहा कि ब्रिटिश भारत में आदिवासियों के साथ जैसा व्यवहार होता था, वैसा ही आजाद भारत में उनके साथ बर्ताव किया जा रहा है। पंडिता रमाबाई को याद करने एक पुराने संघर्ष को याद करना है और यह स्त्री को यह याद दिलाना है कि वह किसी भी संघर्ष में अकेली नहीं है। उन्होंने कहा कि साहस के साथ अपनी बात कहने से आलोचना में जान आती है। उन्होंने कहा कि मनुष्य एक भाषिक प्राणी है और भाषा से ही परिवार व समाज की रचना होती है।

मुख्य वक्ता नारीवादी चिंतक शीबा असलम फहमी ने कहा कि कानून ने स्त्री को बराबरी का अधिकार दिया है, लेकिन समाज अपने अंदर से इसे स्वीकार नहीं कर पा रहा है। हम कितनी भी तरक्की कर जाएं, लेकिन यदि उपेक्षितों और वंचितों को बराबरी का अधिकार नहीं दे पाएं और यह तरक्की चंद लोगों तक ही सीमित रहती है तो इसका कोई अर्थ नहीं है। उन्होंने कहा कि हमारे भीतर बलात्कार के अपराधी के प्रति जो घृणा का भाव रहता है, वहीं घरेलू हिंसा जैसे अपराधों के लिए भी होना चाहिए। शरीर के साथ होने वाले अपराध को तो हम देखते हैं लेकिन मन के साथ होने वाले अपराध को हम नजरअंदाज कर देते हैं। औरत को औरत बनाए रखने के लिए जो किया जाता है, वह अपने आप में भयावह है। हमें अपने घर में एक मजबूत बेटी तैयार करनी चाहिए और उसे संपत्ति का अधिकार आगे बढ़कर देना चाहिए।

पुरस्कार से अभिभूत साहित्यकार पद्मजा शर्मा, दीप्ता भोग, पूर्वा भारद्वाज और गंगा सहाय मीणा ने अपनी सृजन प्रक्रिया, संघर्ष और अनुभवों को साझा किया। भंवर सिंह सामौर ने अतिथियों का स्वागत किया। प्रयास संस्थान के अध्यक्ष दुलाराम सहारण ने आभार उद्बोधन में आयोजकीय पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। संचालन कमल शर्मा ने किया।

इस दौरान मालचंद तिवाड़ी, नरेंद्र सैनी, रियाजत खान, रामेश्वर प्रजापति रामसरा, मीनाक्षी मीणा, दलीप सरावग, रघुनाथ खेमका आदि‍ साहि‍त्‍य प्रेमी मौजूद थे।

आज के दौर में लोकतंत्र की चुनौती ही आलोचना की चुनौती है : राजेंद्र कुमार

इलाहाबाद : वरिष्ठ आलोचक प्रोफेसर मैनेजर पांडेय के जीवन के 71 वर्ष पूरे होने के अवसर पर 23 सितम्बर को ‘जन संस्कृति मंच’ की ओर से इलाहाबाद में ‘आलोचना की चुनौतियाँ’ विषय पर प्रोफेसर राजेंद्र कुमार की अध्यक्षता में संगोष्ठी का आयोजन किया गया। राजेंद्र कुमार ने कहा कि आज के समय में जो चुनौतियाँ लोकतंत्र के समक्ष हैं, वही आलोचना की भी चुनौतियाँ हैं। उन्होंने बताया कि साहित्य में आलोचना विधा का आगमन गद्य के उद्भव के साथ होता है। पश्‍चि‍म में यह पूँजीवादी लोकतंत्र के साथ जन्म लेती है। आज भारत में यह लोकतंत्र भी चुनौतियों का सामना कर रहा है। इसका संकट और इसकी चुनौती आज की आलोचना की भी चुनौती है। उन्होंने कहा कि आज की आलोचना को एक समझ और तमीज विकसित करनी चाहिए जो यह पहचान सके कि साहित्य में विचारधारा को गैर-जरूरी बताने वाले खुद किस विचारधारा को स्वीकार्य बनाना चाहते हैं। उत्तर आधुनिकता, जो ‘सब-कुछ’ को ‘पाठ’ बनाती है, वह अपने आप में खुद एक विचार का आरोपण है। प्रतिरोध की चेतना की पहचान ही आलोचना को महत्वपूर्ण बनाती है। आलोचना का काम रचनाकार को छोटा या बड़ा सिद्ध करना नहीं है।

इतिहासकार और सामाजिक कार्यकर्ता लाल बहादुर वर्मा ने कहा कि आज आलोचना की चुनौती यह है कि साहित्य को साहित्य, और समाज को समाज बनाए रखने में मदद करे क्योंकि आज पूँजीवाद इसी को खत्म कर देना चाहता है। उन्होंने कहा कि आलोचना के लिए जन-सरोकार होना जरूरी है। आलोचना एक उपकरण भी है, जिसे चलाना मालूम होना चाहिए। आज आलोचना को साहित्य के लिए मशाल होना चाहिए। वह साहित्य और जन के बीच पुल है।

आलोचक और कथाकार दूधनाथ सिंह ने कहा कि विचारधारा और साहित्य-रचना का जो तनाव है वह आलोचना में होना चाहिए, उसे नज़र-अंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। सामाजिक शक्तियों के जो संघर्ष हैं, साहित्य उन्हें प्रतिबिम्बित करे।

रविभूषण (राँची) ने कहा कि आलोचना जीवन और समय-समाज सापेक्ष होनी चाहिए। आज के संकट के समय में आलोचना को राजनीतिक प्रश्‍नों से भी जूझना होगा।

आलोचक गोपाल प्रधान (दिल्ली) ने आलोचना के वर्तमान पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आज क्षणिक किस्म के परिवर्तनों का उत्सवीकरण हो रहा है और आलोचना के भीतर से इतिहासबोध को विलिपित किया जा रहा है। जब कि हिन्‍दी आलोचना अपने प्रारम्भ से ही सिर्फ साहित्य-आलोचना नहीं रही बल्कि उसने व्यापक सामाजिक सरोकार रखते हुए समाज और देश की आलोचना की। इतिहासबोध उसमें एक जरूरी तत्व रहा है। उन्होंने कहा कि देश का शासक-वर्ग इतना देशद्रोही शायद ही कभी रहा हो, जितना कि आज का शासक-वर्ग है। उसके भीतर के भय का आलम यह है कि वह कार्टून भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। उन्होंने अत्याधुनिक तकनीकी के साथ अत्यंत पिछड़ी हुई सामाजिक चेतना के मेलजोल के खिलाफ आलोचनात्मक संघर्ष चलाने की आवश्यकता बताई।

पंकज चतुर्वेदी (कानपुर) का कहना था कि आलोचना अगर रचना में मुग्ध हो जाएगी तो वह रचना को ठीक से देख नहीं पाएगी। आलोचक को रचना की संशक्ति के साथ उससे दूरी भी बनाए रखनी होगी तभी वह रचना के महत्व को रेखांकित कर पाएगी। तमाम आलोचक दूरी बनाते हैं लेकिन संशक्ति गायब है। आलोचना को रचना से, उसके रचना कर्म से संबोधित होना होगा। आज के आलोचक पारिभाषिक शब्दावलियों के गुलाम हैं। पूरी आलोचना इन्हीं बीस-पच्‍चीस शब्दों से काम चलाती है। पारिभाषिक शब्दों की यह गुलामी रचना और आलोचना के बीच एक परदे का काम करती है। आलोचना को नये शब्द ईजाद करने होंगे। उन्होंने रचना और आलोचना में विचारधारा की आबद्धता को गैर ज़रूरी  बताते हुए कहा कि जनता के प्रति सम्बद्धता जरूरी है लेकिन विचारधारा से आबद्धता जरूरी नहीं।

प्रोफेसर चंद्रा सदायत (दिल्ली) ने कहा कि आज के दौर के अस्मितावादी विमर्श आलोचना का ही हिस्सा हैं। इसे और व्यापक बनाने के लिए अन्य भाषाओं के (अस्मितावादी विमर्शों के) अनुवाद को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए या फिर आलोचना को कम से कम उनका संदर्भ तो लेना ही चाहिए।

प्रज्ञा पाठक (मेरठ) ने कहा कि स्त्री के जीवन और साहित्य को अलग कर के देखने से उसके साहित्य का सही मूल्याँकन नहीं हो पाएगा। तमाम लेखिकाएँ भी इसमें भ्रमित होती हैं। आलोचना में अभी भी स्त्री-रचना पर बात करने में पुरुषवादी सोच का दबाव काम करता है। स्त्रियाँ भी स्त्री-विमर्श या रचना पर बात करते समय इसी प्रभाव को ग्रहण कर लेती हैं। स्वतंत्र और व्यक्तित्ववान स्त्री आज भी आलोचना के लिए चुनौती है।

अपने जन्मदिन के मौके पर, संगोष्ठी को संबोधित करते हुए प्रो‌फेसर मैनेजर पांडेय ने कहा कि विचारधारा के बिना आलोचना और साहित्य दिशाहीन होता है। आलोचना में पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग ईमानदारी से होना चाहिए क्योंकि पारिभाषिक शब्द विचार की लम्बी प्रक्रिया से उपजते हैं। उन्होंने कहा कि साहित्य की सामाजिकता की खोज और सार्थकता की पहचान करना ही आलोचना की सबसे बड़ी चुनौती है। इस अवसर पर राहुल सिंह (बिहार), रामाज्ञा राय (बनारस) आदि वक्ताओं ने भी विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छात्र, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं संस्कृतिकर्मी उपस्थित रहे। संगोष्ठी का संचालन जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ने किया। इससे पहले कॉ. जिया उल हक ने प्रो. मैनेजर पांडेय को उनके जन्मदिन के उपलक्ष्य में शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया।

इस मौके पर प्रो. मैनेजर पांडेय के आलोचना कर्म पर केंद्रित दो पुस्तकों का लोकार्पण भी हुआ। इनमें से पहली पुस्तक ‘मैनेजर पांडेय का आलोचनात्मक संघर्ष’ युवा आलोचक तथा जसम के महासचिव प्रणय कृष्ण द्वारा लिखित तथा जसम के सांस्कृतिक संकुल द्वारा प्रकाशित है। दूसरी पुस्तक ‘आलोचना की चुनौतियाँ’ का सम्पादन दीपक त्यागी और राजेश्वर चतुर्वेदी ने किया है जिसमें पाण्डेय जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर अनेक लेख संकलित हैं ।

अमेरिकी साम्राज्यवाद का विरोध जरूरी है: मैनेजर पांडेय

दिल्ली: ‘अपने समय में रामविलास शर्मा ने जिस तरह ब्रिटिश साम्राज्यवाद का सुसंगत विरोध किया, उसी तरह आज अमेरिकी साम्राज्यवाद का विरोध बेहद जरूरी है।’ जन संस्कृति मंच द्वारा 22 जुलाई 2012 को साहित्य अकादमी सभागार में दो सत्रों में आयोजित प्रख्यात मार्क्‍सवादी आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा के जन्मशती आयोजन में बीज वक्तव्य देते हुए प्रोफेसर मैनेजर पांडेय ने यह कहा। उन्‍होंने कहा कि रामविलास शर्मा की आलोचनात्मक चेतना का विकास स्वाधीनता आंदोलन के साथ हुआ। 1857 का महासंग्राम, प्रेमचंद-निराला-रामचंद्र शुक्ल की आकांक्षाओं, प्रगतिशील आंदोलन और मार्क्‍सवादी विचारधारा- वे बुनियादी स्रोत हैं, जिनसे उनकी आलोचनात्मक दृष्टि निर्मित हुई थी। उनकी नवजागरण की धारणा बुनियादी तौर पर साम्राज्यवाद-विरोधी धारणा है। उन्होंने आजीवन इस साम्राज्यवादी प्रचार का विरोध किया कि अंग्रेज भारत का विकास करने आये थे या उनकी कोई प्रगतिशील भूमिका थी।

आयोजन की शुरुआत जबरीमल्ल पारख और सत्यकाम द्वारा इग्नू की ओर से रामविलास शर्मा के व्यक्तित्व, रचनाकर्म और विचारधारा पर बनाई गई फिल्म ‘अडिग यही विश्‍वास’ के प्रदर्शन से हुई। फिल्म रामविलास जी के सुपुत्र विजयमोहन शर्मा के सौजन्य से दिखाई गई।

इस अवसर पर रामविलास शर्मा के छोटे भाई रामशरण शर्मा जी ने हिरावल संस्था के कलाकारों द्वारा निर्मित प्रसाद, निराला, फैज, मुक्तिबोध, शमशेर, नागार्जुन, वीरेन डंगवाल, दिनेश कुमार शुक्ल की कविताओं पर आधारित ऑडियो सीडी ‘जाग मेरे मन मछंदर’ का लोकार्पण किया।

‘साम्राज्यवाद-विरोधी आलोचक रामविलास शर्मा’ विषयक पहले सत्र में राँची, झारखंड से आये आलोचक प्रो. रविभूषण ने कहा कि जिन सवालों और समस्याओं को लेकर रामविलास जी ने वैचारिक संघर्ष किया, वे चाहते थे कि उन्हें याद करने के बजाय उन सवालों और समस्याओं पर विचार किया जाये। उन्होंने जो इतिहास लेखन और विवेचन किया, वह इतिहास निर्माण के लिये किया। भारत में सामंतवाद किस तरह साम्राज्यवाद का मुख्य आधार बना रहा है, इस पर उनकी पैनी निगाह थी। साम्राज्यवाद से संप्रदायवादी शक्तियों और सामंती अवशेषों के संबंध को उन्होंने बार-बार चिह्नित किया।

आलोचक मुरली मनोहर प्रसाद ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद की क्रूरताओं और उसके खिलाफ भारतीय जनता के संघर्ष का विस्तार से जिक्र करते हुए कहा कि साम्राज्यवाद-विरोधी और सामंतवाद-विरोधी संघर्ष के लिहाज से रामविलास शर्मा के लेखन की प्रासंगिकता आज भी है। आक्रामक वित्तीय पूँजीवाद के खिलाफ देश के मजदूरों-किसानों में जो बेचैनी है, जिस व्यापक संघर्ष की सम्‍भावना है, उसमें रामविलास के विचार सहयोगी होंगे।

पहले सत्र की अध्यक्षता करते हुए इलाहाबाद से आए प्रो. राजेन्‍द्र कुमार ने कहा कि रामविलास जी का लेखन साम्राज्यवाद के खिलाफ एक प्रकार का सांस्कृतिक अभियान है। नवजागरण की मूल प्रतिज्ञा के रूप में साम्राज्यवाद-विरोध का जिक्र उन्होंने बार-बार किया। साम्राज्यवाद जिस देश में जाता है वहाँ भाषा, धर्म, जाति, संप्रदाय और क्षेत्र के आधार जनता को बांटता है, रामविलास जी हमेशा इस साम्राज्यवादी साजिश का विरोध करते रहे।

‘हिन्‍दी आलोचना में साम्राज्यवाद विरोध का समकालीन सन्‍दर्भ’ विषयक दूसरे सत्र में बनारस से आये प्रो. अवधेश प्रधान ने 1857 के संघर्ष को लेकर होने वाली वैचारिक बहसों का जिक्र करते हुए कहा कि उस वक्त साम्राज्यवाद ने भारत में जिस तबाही को अंजाम दिया, उससे सवर्ण और दलित दोनों समुदाय बर्बाद हुए। उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में दलितों की भूमिका को सामने लाने की जरूरत पर बल दिया और कहा कि साम्राज्यवाद से दलितों की कभी भी मुक्ति सम्‍भव नहीं है। जिस तरह आधुनिकता के तर्क पर अंग्रेजी राज का समर्थन किया गया था, उसी तरह विकास के नाम पर आज अमेरिकी राज का समर्थन किया जा रहा है। आज स्वाधीनता संग्राम की महान उपलब्धियों को खारिज करने की कोशिश की जा रही है, जिसका जोरदार विरोध किया जाना चाहिए। रामविलास जी से इसकी हमें प्रेरणा मिलती है।

दूसरे सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि रामविलास शर्मा की पूरी जिंदगी खुली किताब है। उनको पढ़कर ही नहीं, उन्हें देखकर भी लोग मार्क्‍सवादी हुए हैं। उनकी आलोचना या उनकी सीमाओं की चर्चा जरूर करनी चाहिए, पर इसके लिये उन्होंने जो लिखा है, उसे गंभीरता से पढ़कर ही ऐसा करना चाहिए। रामविलास शर्मा हिन्‍दी साहित्य के स्वर को साम्राज्यवाद-विरोधी बनाने वाले अग्रगण्य लेखक हैं। उन्होंने साम्राज्यवाद-विरोध को हिन्‍दी कविता का सौंदर्यबोध बना दिया।

वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल और युवा आलोचक अमिताभ राय, कवितेंद्र इंदु, शहबाज और बजरंग बिहारी तिवारी ने रामविलास शर्मा की आलोचनात्मक दृष्टि और सौंदर्यबोध को लेकर कुछ विचारोत्तेजक सवाल भी किये और खासकर दलित और स्त्री संबंधी उनकी धारणाओं को लेकर विमर्श किया।

संचालन युवा आलोचक गोपाल प्रधान ने किया। आयोजन में हरिसुमन बिष्ट, प्रेमपाल शर्मा, हरिपाल त्यागी, अशोक भौमिक, वीरेंद्र कुमार बरनवाल, आनंद प्रधान, प्रणय कृष्ण, आशुतोष कुमार, अली जावेद, अजेय कुमार, प्रेमशंकर, देवेंद्र चौबे, राधेश्याम मंगोलपुरी, अच्युतानंद मिश्र, सवि सावरकर, योगेंद्र आहूजा, कुमार मुकुल, एके अरुण, संतोष झा, समता राय, उदय शंकर, श्याम शर्मा, श्याम सुशील, संजय जोशी, भाषा सिंह जैसे साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों के अतिरिक्त दिल्ली विश्‍वविद्यालय, जवाहर लाल नेहरू विश्‍वविद्यालय और जामिया मिलिया विश्‍वविद्यालय के छात्र बड़ी संख्या में इस आयोजन में मौजूद थे। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए जसम के महासचिव प्रणय कृष्ण ने सूचना दी कि जसम की ओर से आगरा, गोरखपुर, दरभंगा समेत देश के कई शहरों में रामविलास जी पर केंद्रित कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

सुधीर सुमन द्वारा जारी

उपेन्द्र कुमार की कवितायें मन और बुद्धि को छूती हैं : मैनेजर पांडेय

काव्य पाठ करते उपेन्द्र कुमार। साथ में मैनेजर पांडेय।

नई दि‍ल्‍ली : कवि उपेन्द्र कुमार की कविता की बनावट और उनके विषयों में विविधता है। अपनी सहजता और संवेदनशीलता से वह केवल मन को ही नहीं, बुद्धि को भी छूती हैं। प्रसिद्ध आलोचक मैनेजर पांडेय ने यह विचार 15 जून 2012 को इंडियन सोसायटी ऑफ ऑथर्स के मासिक कार्यक्रम ‘मैं कौन हूँ’ में उपेन्द्र कुमार की कविताओं पर टिप्पणी करते व्यक्‍त किये। वह इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुए इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे। उन्होंने कहा कि उपेन्द्र कुमार की कविता में ग्रामीण जीवन की झलक और व्यंग्य की धार उसे और तीखा कर देती है। उनकी कविताओं पर नागार्जुन और भवानी प्रसाद मिश्र, दोनों के प्रभावों को महसूस किया जा सकता है।

इससे पहले कवि और व्यंग्यकार उपेन्द्र कुमार ने अपनी लेखन यात्रा पर चर्चा करते हुआ कहा की मैं अपने लेखन में भोजपुरी समाज को पुनर्जीवि‍त करना चाहता हूँ। इस समाज की दीनता, करुणा और पौरुष की समझ ने मेरी कवि दृष्टि को निरंतर विकसित और समृद्ध किया है। अपने प्रारंभि‍‍क कविता लेखन, कविताओं की वापसी और अपने पहले कविता संग्रह ‘बूढ़ी जड़ों का नवजात जंगल’ के लिये अज्ञेय, अमृता प्रीतम और भवानी प्रसाद मिश्र से दो शब्द लिखवाने के मर्मस्पर्शी संस्मरण सुनाते हुए उन्होंने अपनी कविताओं ‘सत्तू’, राजनीतिक व्यंग्य की कवितायें ‘खेल’, ‘संसद’, ‘पूछ मत लेना’, ‘बांकेलाल’ आदि सुनाईं। श्रोताओं के अनुरोध पर अंत में कुछ छोटी-छोटी कई प्रेम कवितायें भी प्रस्तुत कीं।

1947 में बिहार के बक्सर में जन्में उपेन्द्र कुमार का पहला कविता संग्रह 1980 में प्रकाशि‍त हुआ। तब से अब तक आपके सात कविता संग्रह और दो गज़ल संग्रह आ चुके हैं। हिन्‍दी अकादमी, दिल्ली के कृति और साहित्यकार सम्मान से सम्मानित उपेन्द्र कुमार कहानी और समीक्षा लेखन में भी सक्रिय हैं।

कार्यक्रम का संचालन सोसायटी ऑफ ऑथर्स के अध्यक्ष दिनेश मिश्र ने किया व अन्य व्यवस्थाओं का प्रबंध सचिव विवेक गौतम ने किया। कार्यक्रम में गंगाप्रसाद विमल, मदन कश्यप, वीरेन्द्र वरनवाल, भारत भारद्वाज, कमल कुमार आदि‍ उपस्थित थे।

प्रस्तुति: अजय कुमार शर्मा

वैकल्पिक माध्यम है प्रतिरोध का सिनेमा: संजय काक

सेमिनार में बोलते प्रसिद्ध फिल्मकार संजय काक।

दिल्ली: ‘सिनेमा ज्ञान का ऐसा माध्यम है, जिसके लिये दर्शकों का बहुत ज्ञानी या पढ़ा-लिखा होना आवश्यक नहीं है, बल्कि इसके जरिये कोई ज्ञान या तथ्य उन तक बड़ी सहजता से पहुँचाया जा सकता है। दृश्य माध्यमों से हमारे मन में भावनायें पैदा होती हैं, और भावनायें ही आदमी को कुछ करने के लिये प्रेरित करती हैं, खाली ज्ञान हमें कर्म के लिये प्रेरित नहीं करता। ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ प्रतिरोध की चेतना को विकसित करने का प्रयास है। यह बहुत जरूरी और बड़ा अभियान है। इसके माध्यम से आम लोगों को जगाना संभव है।’ ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अभियान के दूसरे राष्ट्रीय कन्वेंशन की अध्यक्षता करते हुए सुप्रसिद्ध आलोचक प्रोफेसर मैनेजर पांडेय ने ये बातें कहीं। उन्‍होंने संजय काक की फिल्म ‘जश्ने आजादी’ का जिक्र करते हुए कहा कि मुख्यधारा की फिल्मों और टीवी काश्मीरी जनता के वाजिब प्रतिरोधों पर पर्दा डालती हैं या उन्हें गलत ढंग से पेश करती हैं, जबकि संजय काक की फिल्म काश्मीर की वास्तविकताओं से हमें रूबरू कराती है और लोकतंत्र और राष्ट्रवाद पर नये सिरे से विचार करने को बाध्य करती है। पिछले छह वर्षों से चल रहे ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अभियान को और अधिक संगठित तरीके से संचालित करने के मकसद से 1 मार्च 2012 को गांधी शांति प्रतिष्ठान में एक दिवसीय राष्ट्रीय कन्वेंशन आयोजित किया गया। संजय जोशी को इस अभियान का राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया तथा राष्ट्रीय कमिटी बनाई गई, जिसमें विभिन्न राज्यों और शहरों के प्रतिनिधियों के अलावा कई चर्चित फिल्मकार भी शामिल हैं।

‘प्रतिरोध का सिनेमा: चुनौतियाँ और संभावनायें’ विषयक सेमिनार में प्रसिद्ध फिल्मकार संजय काक ने कहा कि जिन सचाइयों और मुद्दों के लिए मेनस्ट्रीम मीडिया में जगह नहीं है, उसे दिखाने का वैकल्पिक माध्यम है ‘प्रतिरोध का सिनेमा’। जिस तरह बिना किसी बड़ी फंडिंग के सिर्फ जनता के सहयोग के बल पर यह अभियान चल रहा है, ऐसा दूसरा उदाहरण पूरे देश और दुनिया में नजर नहीं आता।  उन्‍होंने कि कभी जो न्यू सिनेमा था, वह सरकारी फाइनांस पर टिका हुआ था, पर उसमें वितरण और दर्शकों के साथ रिश्ते पर ध्यान नहीं दिया गया, जिसके कारण वह डूब गया। मेनस्ट्रीम फिल्में और दूरदर्शन के पैसे से भी जो जनपक्षीय फिल्में किसी दौर में बनी हैं, आज उसे भी दिखाने वाले चैनल नहीं हैं। उन्होंने कहा कि मेनस्ट्रीम खत्म हो रहा है, तो अल्टरनेटिव शुरू भी हो रहा है। किसी भी मुद्दे पर देश में क्या हो रहा है, यह अगर जानना हो तो आज मेनस्ट्रीम मीडिया के बजाये डाक्यूमेंटरी फिल्में देखनी पड़ती हैं। संजय काक ने कहा कि इमरजेंसी एक लैंडमार्क है। इमरजेंसी के बाद ही भारत में डाक्यूमेंटरी फिल्मों का विकास हुआ है। दिल्ली जैसी जगह में भी अगर डाक्यूमेंटरी फिल्मों की स्क्रीनिंग में बहुत लोग जमा हो रहे हैं तो इसकी वजह यह है कि ये बहसों को खड़ा कर रही हैं। दर्शकों के अलग-अलग वर्गों के साथ फिल्मकारों का जो प्रत्यक्ष रिश्ता है, वह फिल्म मेकिंग में विविधता भी पैदा कर रहा है।

प्रतिरोध के सिनेमा की अवधारणा पर बोलते हुए युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने कहा कि ‘प्रतिरोध के सिनेमा’ के दर्शक मूक नहीं हैं, बल्कि वे सक्रिय दर्शक हैं। यह अभियान एक नये दर्शक वर्ग का भी निर्माण कर रहा है। यह संवादधर्मी सिनेमा है और आज के जनता के हर प्रतिरोध की अभिव्यक्ति इसका मकसद है। कन्वेंशन का संचालन संजय जोशी ने किया और अध्यक्षता सत्यनारायण व्यास ने की।

इस मौके पर प्रोफेसर मैनेजर पांडेय और संजय काक ने कथाकार मदन मोहन के उपन्यास ‘जहां एक जंगल था’ तथा जनपथ के नागार्जुन विशेषांक का लोकार्पण भी किया।

‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अभियान के दूसरे राष्ट्रीय कन्वेंशन में उपस्‍थित श्रोतागण।

इसके पहले पूरे दिन पटना, बेगूसराय, गोरखपुर, नैनीताल, जबलपुर, इंदौर, आरा, लखनउ, भिलाई, दिल्ली, बनारस, इलाहाबाद आदि शहरों से आए प्रतिनिधियों- अशोक चौधरी, मनोज कुमार सिंह, के.के. पांडेय, संतोष झा, अंकुर, पंकज स्वामी, भगवानस्वरूप कटियार, यशार्थ, विनोद पांडेय आदि ने प्रतिरोध के सिनेमा की अवधारणा पर विचार-विमर्श किया तथा प्रतिरोध के सिनेमा को आयोजित करने के अपने अनुभवों को साझा करते हुए भविष्य की योजनाएं बनाईं। आयोजनों से संबंधित वीडियो क्लीपिंग भी दिखाई गई।

प्रस्‍तुति : सुधीर सुमन, प्रतिरोध का सिनेमा अभियान की ओर से जारी

जन लोकपाल विधेयक बनने से भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को बल मिलेगा: मैनेजर पांडेय

नई दिल्ली: जन लोकपाल विधेयक लागू करने के सवाल पर 8 अप्रैल को जन संस्कृति मंच के अध्यक्ष प्रो. मैनेजर पांडेय के नेतृत्व में लेखकों, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का समूह जंतर-मंतर पहुंचा और पिछले तीन दिन से  जारी समाज सेवी अन्ना हजारे के आंदोलन के प्रति समर्थन जताया। जन संस्कृति मंच से जुड़े कलाकार इसी तरह उत्तर प्रदेश के लखनऊ और गोरखपुर समेत कई दूसरे शहरों तथा बिहार की राजधानी पटना में इस भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में शामिल हुए। जंतर मंतर पर इस आंदोलन में शिरकत करने वालों में जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. मैनेजर पांडेय, राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कवि मंगलेश डबराल, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कवयित्री शोभा सिंह, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कवि मदन कश्यप, कवि-पत्रकार अजय सिंह, कहानीकार अल्पना मिश्र, द ग्रुप  संस्था के संयोजक फिल्मकार संजय जोशी, कवि रंजीत वर्मा, संगवारी नाट्य संस्था के संयोजक कपिल शर्मा, युवा चित्रकार अनुपम राय, रंगकर्मी सुनील सरीन, संस्कृतिकर्मी सुधीर सुमन, श्याम सुशील, मीडिया प्रोफेशनल रोहित कौशिक, संतोष प्रसाद, रामनिवास आदि प्रमुख थे। लेखक-संस्कृतिकर्मियों ने जंतर मंतर पर उपस्थित जनसमूह के बीच पर्चे भी बांटे।
प्रो. पांडेय ने कहा कि इस देश में जिस पैमाने पर बड़े-बड़े घोटाले सामने आए हैं और भ्रष्टाचार जिस कदर बढ़ा है, उससे आम जनता के भीतर भारी क्षोभ है। यह गुस्सा इसलिए भी है कि कांग्रेस-भाजपा समेत शासकवर्ग की जितनी भी राजनीतिक पार्टियां हैं, वे इस भ्रष्टाचार को संरक्षण और बढ़ावा दे रही हैं। अगर यूपीए सरकार अन्ना हजारे की मांगों को मान भी लेती है, तो भी भ्रष्टाचार के खिलाफ छिड़ी इस मुहिम को और भी आगे ले जाने की जरूरत बनी रहेगी।
उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर में होने वाले घोटाले पहले के घोटालों की तुलना में बहुत बड़े हैं, क्योंकि निजीकरण की नीतियों ने कारपोरेट घरानों के लिए संसाधनों की बेतहाशा लूट का दरवाजा खोल दिया है। देश के बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधनों- जमीन, खनिज, पानी- ही नहीं लोगों की जीविका के साधनों की भी लूट का सिलसिला बेरोक-टोक जारी है। राडिया टेपों और विकीलीक्स के खुलासों ने साफ कर दिया है कि साम्राज्यवादी ताकतें कारपोरेट हितों और नीतियों के अनुरूप काम करने वाले मंत्रियों की सीधे नियुक्ति करवाती हैं। सभी तरह के सवालों से परे रखी गयी सेना के उच्चाधिकारी न सिर्फ जमीन घोटालों में लिप्त पाये गये हैं, बल्कि रक्षा सौदों में भी बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार होने का नियमित खुलासा हो रहा है। न्यायपालिका के शीर्ष पर विराजमान न्यायधीशों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने की खबरें प्रामाणिक तौर पर उजागर हो चुकी हैं। कांग्रेस के कई नेता भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद अपने पदों पर जमे हुए हैं। केंद्र ही नहीं राज्य सरकारों में भी भ्रष्टाचार अपने चरम पर है। कर्नाटक में भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री भूमि घोटाले में संलिप्त हैं और पूरे प्रदेश की अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से जितनी अपनी अवैध अर्थव्यवस्था चलाने वाले रेड्डी बंधु सरकार के सम्मानित और प्रभावशाली मंत्री हैं। इन स्थितियों में कारपोरेट लूट और भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं को लाठी-गोली का सामना करना पड़ रहा है, उन्हें देशद्रोही बताकर जेलों में बंद किया जा रहा है, जबकि भ्रष्टाचारी खुलेआम घूम रहे हैं।
प्रो. मैनेजर पांडेय ने कहा कि ऐसे कठिन हालात में प्रभावी लोकपाल कानून बनाने के लिए शुरू हुई भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को और भी ऊंचाई पर ले जाने की जरूरत है, ताकि जनता की भावनाओं के अनुरूप भ्रष्टाचार से मुक्त देश बनाया जा सके।
जन संस्कृति मंच की मांग है-

1. सरकार द्वारा तैयार किये गये नख-दंत विहीन लोकपाल कानून के मसविदे को रद किया जाये और भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्षरत कार्यकर्ताओं की भागीदारी से एक प्रभावशाली लोकपाल कानून बनाया जाये।
2. टाटा, रिलायंस, वेदांत और दाउ जैसे भ्रष्टाचार और कानून के उल्लंघन में संलिप्त कारपोरेट घरानों को काली सूची में डाला जाये।
3. स्विटजरलैंड के बैंकों में अपनी काली कमायी जमा किये लोगों के नाम सार्वजनिक किये जायें, काले धन की एक-एक पाई को देश में वापस लाया जाये और इसका इस्तेमाल समाज कल्याण के कामों में किया जाये। हम यह भी मांग करते हैं कि तमाम अंतरराष्‍टीय कानूनों की आड़ में काले धन को विदेश ले जाने के सभी दरवाजे निर्णायक तौर पर बंद किये जायें।
4. आदर्श घोटाले व अन्य रक्षा घोटालों में लिप्त सैन्य अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाया जाये और उन्हें कड़ी सजा दी जाये।
5. कारपोरेट लूट और भ्रष्टाचार के लिए उर्वर जमीन मुहैया कराने वाली निजीकरण और व्यावसायीकरण की नीतियों को उलट दिया जाये।
6. कारपोरेट घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए उनके दबाव में लिये गये सभी सरकारी निर्णयों की समीक्षा की जाये और उन्हें उलट दिया जाये।
(जन संस्कृति मंच  राष्ट्रीय कार्यकारिणी की ओर से  सुधीर सुमन द्वारा जारी)