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सरकारी शिक्षा का भस्मासुर :  महेश पुनेठा

महेश पुनेठा

शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 आने के बाद देश भर से लगातार सरकारी स्कूलों के बंद होने की खबर आ रही हैं। महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड सहित देश के विभिन्न राज्यों में अब तक हजारों सरकारी स्कूल बंद किए जा चुके हैं। सरकारी स्कूलों में प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या साल दर साल घटती जा रही है। सरकारी स्कूलों के प्रति विश्‍वास लगातार कम होता जा रहा है। यही सिलसिला जारी रहा तो आने वाले पांच-सात सालों के भीतर सरकारी प्राथमिक स्कूलों की संख्या अँगुलियों में गिने जाने लायक रह जाएगी।

इसके पीछे सबसे बड़ा और तात्कालिक कारण है- शिक्षा अधिकार अधिनियम-09 के अंतर्गत 25 प्रतिशत वंचित वर्ग के बच्चों को निजी विद्यालयों में प्रवेश देने सम्बन्धी प्रावधान है। इसने सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में जनता के रहे-सहे विश्वास को भी ख़त्म करने का काम किया है। यह प्रावधान सरकारी शिक्षा के लिए भस्मासुर बन चुका है। उल्लेखनीय है कि इस क़ानून के अंतर्गत व्यवस्था है कि प्रत्येक निजी विद्यालय अपनी कुल छात्र संख्या के 25 प्रतिशत वंचित वर्ग के बच्चों को प्रवेश देगा, जिनका शुल्क राज्य सरकार द्वारा उस विद्यालय के खाते में जमा कर दिया जाएगा। ऐसा नहीं है कि इससे पहले अभिभावकों में निजी स्कूलों के प्रति आकर्षण नहीं था। पिछले लम्बे समय से निजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना स्टेटस सिम्बल बन चुका है। लेकिन उक्‍त प्रावधान का सबसे बड़ा सन्देश यह जा रहा है कि सरकारी स्कूलों से अच्छी शिक्षा निजी स्कूलों में दी जा रही है इसलिए सरकार भी बच्चों को वहां भेजने को प्रोत्साहित कर रही है। इस प्रकार पहले से कमतर शिक्षा का आरोप झेल रहे सरकारी स्कूलों में स्वयं सरकार ने कमतरी की मुहर लगा दी है। जब सरकार स्वयं यह स्वीकार कर रही हो तो भला कोई क्यों अपने बच्चों को कमतर स्कूलों में डालना चाहेगा और जब सरकार निजी स्कूल में पढ़ाने का खर्चा देने को तैयार हो तो फिर भला कोई क्यों अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में डालेगा। सरकार ने बहुत चालाकी से शिक्षा के निजीकरण का रास्ता प्रशस्त कर दिया है। बहुत जल्दी ही सरकार गरीब बच्चों को वाउचर थमाकर सार्वजनिक शिक्षा की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएगी। वह दिन दूर नहीं जब दूर-दराज के गांवों में ऐसे निजी स्कूल खुल जाएंगे, जहाँ 75 प्रतिशत बच्चों से भारी-भरकम शुल्क वसूल किया जाएगा और 25 प्रतिशत बच्चों का सरकार से वाउचर प्राप्त किया जाएगा। निजी स्कूलों की पाँचों अंगुलियाँ घी में होंगी। इसका सबसे अधिक बुरा प्रभाव वंचित/दलित वर्ग के बच्चों पर पड़ना है, क्योंकि वर्तमान में सरकारी स्कूलों में सबसे अधिक बच्चे इसी वर्ग के पढ़ रहे हैं। आज जहाँ इसके शत-प्रतिशत बच्चे निशुल्क शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, वहां सरकारी स्कूल बंद होने के बाद केवल 25 प्रतिशत ही निशुल्क शिक्षा प्राप्त कर पाएंगे। उनके साथ भी भेदभाव होने की आशंका अलग से रहेगी। जैसा कि जो बच्चे अभी सरकारी खर्चे से निजी स्कूलों में जा रहे हैं, उनके बारे में समय-समय पर भेदभाव की ख़बरें सुनने को मिलती रहती हैं। बताया जाता है कि बहुत सारे निजी स्कूलों ने उनकी एक अलग कैटेगरी बना दी है। एक आशंका और है- वंचित/दलित वर्ग के बच्चों का शिक्षण शुल्क तो सरकार देगी, लेकिन निजी स्कूलों द्वारा शिक्षण शुल्क के अलावा आए दिन लिए जाने वाले शुल्कों का क्या होगा? ये ऐसे शुल्क हैं, जिन्होंने मध्यवर्ग के नाक पर ही दम किया है, गरीब वर्ग इनको कैसे वहन करेगा? जहाँ तक शिक्षा का सवाल है, सच कहा जाए तो निजी स्कूलों में भी भाषा-गणित और विज्ञान जैसे विषयों को मात्र रटाया जा रहा है। सच्चे अर्थों में जिसे शिक्षा कहा जाता है, जो एक संवेदनशील, विवेकवान और जिम्मेदार नागरिक बनाती है, उससे निजी स्कूल कोसों दूर हैं। बावजूद इसके उन्हें ही मानक माना जा रहा है।

कैसी विडंबना है कि एक ओर वाउचर देकर बच्चों को निजी स्‍कूलों में भेजने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है तथा दूसरी ओर सरकारी स्कूल के शिक्षकों से पूछा जा रहा है कि उनके स्कूलों में छात्र संख्या कम क्यों हो रही है ? प्रकारांतर से उन्हें  इस बात के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। जबकि हकीकत यह है कि शिक्षक से सारे काम खूब करवा जा रहे हैं और उसके मूल काम से उसको दूर किया जा रहा है। गलत सरकारी नीतियों ने सरकारी स्कूलों और शिक्षकों के प्रति इतना अधिक अविश्‍वास पैदा कर दिया है कि जिन सरकारी स्कूलों में बहुत अच्छी पढा़ई भी हो रही है, वहां भी आज अभिभावक अपने बच्चों को भेजने के लिए तैयार नहीं हैं। उक्त प्रावधान के आने से पहले तक गरीब परिवार के बच्चे तो सरकारी स्कूलों में आते थे, लेकिन अब उन्हें भी निंजी स्कूलों में बच्चे पढ़ाने के झूठे गौरव में डुबाया जा रहा है। होना यह चाहिए था कि सरकार निजी स्‍कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को भी सरकारी स्कूलों में आने के लिए प्रोत्साहित करती। उन कमियों को दूर किया जाता, जिनके चलते सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में कमी आ रही है, लेकिन हो उसका उल्टा रहा है।

वरिष्ठ शिक्षाविद योगेश बहुगुणा का यह कहना सही है कि  सरकारी स्कूलों की जो दुर्दशा है, उन्हें देखकर तो गरीब से गरीब आदमी भी वहां अपने बच्चों को भर्ती नहीं करना चाहेगा। अपवादस्वरूप कुछ अच्छे स्कूल हो सकते हैं। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस दुर्दशा के मूल कारणों को दूर करने के ईमानदार प्रयास अभी तक नहीं किए गए। सुधार के नाम पर जड़ का इलाज करने के बजाय उसके तनों को काटने-छांटने और सींचने की नौटंकी ही अधिक की जाती रही है। शिक्षा अधिनियम-2009 में कुछ अच्छे प्रावधान भी हैं। जैसे- हर स्कूल में पूर्ण प्रशिक्षित शिक्षक, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, खेल का मैदान, पर्याप्त कक्षा-कक्ष आदि, लेकिन आठ साल गुजरने को हैं इनकी ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया। आज भी कमोबेश वही स्थित है जो इस अधिनियम के आने से पहले थी। छात्र-शिक्षक मानक के आधार और शिक्षकों को गैर शिक्षण कार्यों से मुक्त करने की मांग हमेशा से की जाती रही है, पर इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है।

आश्चर्य होता है कि‍ सरकारी शिक्षा को ख़त्म करने की इतनी गहरी चाल चली गयी है, लेकिन कहीं से कोई विरोध की आवाज नहीं सुनाई दे रही है। औरों की तो छोडिये शिक्षक संगठन भी इस पर चुप्पी साधे हुए हैं। उनके अधिवेशनों में भी इस पर कोई खास चर्चा नहीं होती है। और यदि कोई शिक्षक इस पर बात करता है, तो उसे अजीब सी नज़रों से देखा जाता है। कह दिया जाता है कि‍ यह हमेशा ऐसी ही नकारात्मक बात करता है। वरिष्ठ शिक्षाविद अनिल सदगोपाल के नेतृत्व में ‘अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार मंच’ इस मुद्दे पर लगातार मुखर विरोध करता रहा है। इस बारे में अनिल सदगोपाल ने खूब लिखा भी है लेकिन बहुसंख्यक लोग उसे अनसुना करते रहे हैं। यह स्थिति बहुत चिंताजनक है। इसे देखकर तो लगता है कि आज अगर सरकार एक झटके में सार्वजनिक शिक्षा के निजीकरण की घोषणा भी कर दे तो कहीं कोई ख़ास हलचल नहीं होने वाली है। इस स्थिति के लिए देशी-विदेशी बाजारवादी शक्तियां पिछले पच्चीस वर्षों से वातावरण बनाने में लगी हुई हैं क्योंकि शिक्षा आज मुनाफे का सबसे बड़ा क्षेत्र है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सार्वजनिक शिक्षा के निजीकरण से न केवल गरीब वर्ग के बच्चों की शिक्षा पर संकट आएगा, बल्कि स्थायी रोजगार का एक बड़ा क्षेत्र भी समाप्त हो जाएगा।

शि‍क्षा और मनोविज्ञान की भी गहरी समझ रखते थे मुक्तिबोध : महेश चंद्र पुनेठा

मुक्तिबोध

मुक्तिबोध

ज्ञान को लेकर बहुत भ्रम हैं। सामान्यतः सूचना, जानकारी या तथ्यों को ही ज्ञान मान लिया जाता है। इनको याद कर लेना ज्ञानी हो जाना माना जाता है। इस अवधारणा के अनुसार एक ज्ञान प्रदानकर्ता है तो दूसरा प्राप्‍तकर्ता, जिसे पाओले फ्रेरे ‘बैंकिंग प्रणाली’कहते हैं। इसमें शि‍क्षक जमाकर्ता और विद्यार्थी का मस्तिष्‍क बैंक की भूमिका में होता है। शि‍क्षक बच्चे के मस्तिष्‍क रूपी बैंक में सूचना-जानकारी या तथ्य रूपी धन को लगातार जमा करता जाता है। वह इस बात की परवाह नहीं करता है कि उसे लेने के लिए बच्चा तैयार है या नहीं। शि‍क्षक द्वारा कही बात ही अंतिम मानी जाती है। दरअसल, यह ज्ञान की बहुत पुरानी अवधारणा है। यह तब की है, जब शि‍क्षा की मौखिक परंपरा हुआ करती थी। सूचना, जानकारी या तथ्यों को रखने का रटने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता था। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक इनके हस्तांतरण का यही एकमात्र उपाय हुआ करता था। जो जितनी अधिक सूचना, जानकारी या तथ्यों को याद रख पाता था, वह उतना ही अधिक ज्ञानी माना जाता था। ज्ञान का यह सीमित और आधा अधूरा अर्थ है। वस्तुतः जो लिया या दिया जाता है, वह ज्ञान न होकर केवल सूचना या जानकारी है।

ज्ञान कभी दिया नहीं जा सकता है। ज्ञान का तो निर्माण या सृजन होता है। इसलिए आप दूसरों को सूचना या जानकारी तो दे सकते हैं, ज्ञान नहीं। ज्ञान के साथ बोध का गहरा संबंध है। ज्ञान निर्माण की एक पूरी प्रक्रिया है, जो अवलोकन, प्रयोग-परीक्षण, विश्‍लेषण से होती हुई निष्‍कर्ष तक पहुंचती है। ज्ञान द्वंद्व और संश्‍लेषण से उत्पन्न होता है। अनुभवों और तर्कों की उसमें विशेष भूमिका रहती है। यह माना जाता है कि मनुष्‍य की सारी अवधारणाएं उसके अपने अनुभवों के आधार पर बनती हैं। शि‍क्षा में ज्ञान की यह अवधारणा ‘रचनात्मकतावाद’के नाम से जानी जाती है, जो अपेक्षाकृत नई मानी जाती है। भारतीय शि‍क्षा में इस अवधारणा की गूंज बीसवीं सदी के अंतिम दशक से सुनाई देना प्रारम्भ होती है। लेकिन मुक्तिबोध ज्ञान को लेकर इस तरह की बातें पांचवें दशक में लिखे अपने निबंधों में कहने लगे थे। ज्ञान, बोध, सृजनशीलता, सीखने जैसी अवधारणाओं को लेकर उनके निबंधों में बहुत सारी बातें मिलती हैं। मुक्तिबोध ज्ञान और जानकारी के बीच के इस अंतर को स्पष्‍ट करते हैं। भले ही उनकी यह बात सीखने की प्रक्रिया के संदर्भ में नहीं, बल्कि रचना-प्रक्रिया के संदर्भ में आती है। लेकिन सीखने की प्रक्रिया के संदर्भ में भी वह सटीक बैठती है। मुक्तिबोध ज्ञान के विकास के बारे में कहते हैं- ‘‘बुद्धि स्वयं अनुभूत विशि‍ष्‍टों का सामान्यीकरण करती हुई हमें जो ज्ञान प्रस्तुत करती है, उस ज्ञान में निबद्ध ‘स्व’से ऊपर उठने, अपने से तटस्थ रहने, जो है उसे अनुमान के आधार पर और भी विस्तृत करने की होती है।…ज्ञान व्यवस्था…जीवनानुभवों और तर्कसंगत निष्‍कर्षों और परिणामों के आधार पर होती है।…तर्कसंगत (और अनुभव सिद्ध) निष्‍कर्षों तथा परिणामों के आधार पर, हम अपनी ज्ञान-व्यवस्था तथा उस ज्ञान-व्यवस्था के आधार पर अपनी भाव-व्यवस्था विकसित करते।…बोध और ज्ञान द्वारा ही ये अनुभव परिमार्जित होते हैं यानी पूर्व-प्राप्त ज्ञान द्वारा मूल्यांकित और विश्‍लेषि‍त होकर, प्रांजल होकर, अंतःकरण में व्याख्यात होकर, व्यवस्था-बद्ध होते जाते हैं।’’  वह पुराने ज्ञान में नवीन ज्ञान को जोड़कर सिंद्धांत व्यवस्था का विकास करने की बात करते हैं। यहीं पर द्वंद्व और संश्‍लेषण की प्रक्रिया चलती है। उनके लिए ज्ञान का अर्थ केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों का बोध नहीं, वरन् उत्थानशील और ह्रासशील शक्तियों का बोध भी है।…ज्ञान भी एक तरह का अनुभव है, या तो वह हमारा अनुभव है या दूसरों का। इसलिए वे ज्ञान को काल सापेक्ष और स्थिति सापेक्ष मानते हैं। उसे जीवन में उतारने की बात कहते हैं- ‘‘ज्ञान-रूपी दांत जिंदगी-रूपी नाशपाती में गड़ना चाहिए, जिससे कि संपूर्ण आत्मा जीवन का रसास्वादन कर सके।’’

आज सबसे बड़ी दिक्कत शि‍क्षा की यही है कि वह न संवेदना को ज्ञान में बदल पा रही है और न ज्ञान से संवेदना पैदा कर पा रही है। फलस्वरूप आज की शि‍क्षा एक सफल व्यक्ति तो तैयार कर ले रही है, लेकिन सार्थक व्यक्ति नहीं अर्थात ऐसा व्यक्ति जो अपने समाज के प्रति जिम्मेदार और हाशि‍ए पर पड़े लोगों के प्रति संवेदनशील हो, जिसके लिए शि‍क्षित होना धनोपार्जन करने में सक्षम होना न होकर समाज की बेहतरी के लिए सोचना हो। ऐसे में यह महत्वपूर्ण बात है कि मुक्तिबोध ज्ञान को संवेदना के साथ जोड़कर देखते हैं। ‘चांद का मुंह टेड़ा है’कविता की ये पंक्तियां इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं- ‘ज्वलंत अनुभव ऐसे/ऐसे कि विद्युत धाराएं झकझोर/ज्ञान को वेदन-रूप में लहराएं/ज्ञान की पीड़ा/रुधिर प्रवाहों की गतियों में परिणित होकर/अंतःकरण को व्याकुल कर दे।’इसलिए वह यह आवश्‍यकता महसूस करते हैं कि संवेदनात्मक उद्देश्‍य, अपनी पूर्ति की दिशा में सक्रिय रहते हुए, मनुष्‍य के बाल्यकाल से ही उस जीवन-ज्ञान का विकास करे, जो संवेदनात्मक उद्देश्‍यों की पूर्ति करे। संवेदनात्मक उद्देश्‍यों से उनका आशय स्व से ऊपर उठना, खुद की घेरेबंदी तोड़कर कल्पना-सज्जित सहानुभूति के द्वारा अन्य के मर्म में प्रवेश करना है। दूसरे के मर्म में प्रवेश कर पाना तभी संभव है, जब शि‍क्षा दिमाग के साथ-साथ दिल से भी जुड़ी हो, वह बच्चे की संवेदना का विस्तार करे। इसी कारण ज्ञानात्मक-संवेदना और संवेदनात्मक-ज्ञान की अवधारणा उनकी रचना-प्रक्रिया और आलोचना की आधार रही।

मुक्तिबोध अनुभव को, सीखने और रचना के लिए बहुत जरूरी मानते हैं। कोई भी रचना ‘अनुभव-रक्त ताल’में डूबकर ही ज्ञान में बदलती है। देखिए ‘भूरी-भूरी खाक धूल’कविता की ये पंक्तियां- नीला पौधा/यह आत्मज/रक्त-सिंचिता हृदय धरित्री का/आत्मा के कोमल आलबाल में/यह जवान हो रहा/कि अनुभव-रक्त ताल में डूबे उसके पदतल/जड़ें ज्ञान-संविधा की पीतीं।’वह अनुभव को पकाने की बात करते हैं । देखा जाए तो शि‍क्षा एक तरह से अनुभवों को पकाने का ही काम तो करती है। मुक्तिबोध लिखते हैं ,‘‘वास्तविक जीवन जीते समय, संवेदनात्मक अनुभव करना और साथ ही ठीक उसी अनुभव के कल्पना चित्र प्रेक्षित करना- ये दोनों कार्य एक साथ नहीं हो सकते। उसके लिए मुझे घर जाकर अपने में विलीन होना पड़ेगा।’’ वह सिद्धांत की नजर से दुनिया को देखने की अपेक्षा अनुभव की कसौटी पर सिद्धांत को कसने तथा विचारों को आचारों में परिणित करने के हिमायती रहे। यही है ज्ञान निर्माण या सृजन की प्रक्रिया। ‘ज्ञान अनुभव से ही शुरू होता है। ज्ञान के सिद्धांत का भौतिक रूप यही है।  जब व्यक्ति अनुभवों से सीखना छोड़ देता है, उसमें जड़वाद आ जाता है। कितनी महत्वपूर्ण बात कही है उन्होंने, आज तमाम शि‍क्षाविद् इसी बात को तो कह रहे हैं, ‘‘यह सही है कि प्रयोगों में गलती हो सकती है। भूलें हो सकती हैं। किंतु उसके बिना चारा नहीं है। यह भी सही है कि कुछ लोग अपने प्रयोगों से इतने मोहबद्ध होते हैं कि उसमें हुई भूलों से इंकार करके उन्हीं भूलों को जारी रखना चाहते हैं। वे अपनी भूलों से सीखना नहीं चाहते हैं। अतः वह जड़वादी हो जाते हैं।’’ पर इसका अर्थ यह नहीं समझा जाना चाहिए कि मुक्तिबोध प्रयोग और अनुसंधान के नाम पर अब तक मानव जाति को प्राप्त ज्ञान का अर्थात सिद्धांतों से इंकार करते हों। उनका स्पष्‍ट मानना था, ‘‘इसका अर्थ यह कि बदली हुई परिस्थिति में परिवर्तित यथार्थ के नए रूपों का, उनके पूरे अंतःसंबंधों के साथ अनुशीलन किया जाए, उनको हृदयगंम किया जाए।’’  आज इसे ही सीखने का सही तरीका माना जा रहा है। वास्तविक अर्थों में सीखना इसी तरह होता है। यही सीखना स्थाई होता है। सीखने का मतलब कुछ जानकारियों को रट लेना नहीं है। सीखना तो व्यवहार में परिवर्तन का नाम है। ऐसा परिवर्तन जो चेतना को अधिकाधिक यथार्थ संगत बना दे,  जिसके के लिए मुक्तिबोध अतिशय संवेदनशील, जिज्ञासु तथा आत्म-निरपेक्ष मन की आवश्‍यकता पर बल देते हैं। वह अनुभवों से सीखने की ही नहीं, बल्कि अनुभव-सत्य को जन तक पहुंचाने की बात भी कहते हैं- ‘तब हम भी अपने अनुभव/सारांशों को उन तक पहुंचाते हैं जिसमें/जिस पहुंचाने के द्वारा हम, सब साथी मिल/दंडक वन में से लंका का पथ खोज निकाल सकें।’(‘भूरी-भूरी खाक धूल’)। देखा जाय तो यही शि‍क्षा का असली उद्देश्‍य भी है। यदि शि‍क्षित होने पर हम जनहित में कुछ कर नहीं पाए तो उसकी क्या सार्थकता है?

आज शि‍क्षण में पीयर लर्निंग पर बहुत बल दिया जा रहा है। एन.सी.एफ.2005 में कहा गया है कि सहभागितापूर्ण सीखना और अध्यापन, पढ़ाई, भावनाएं एवं अनुभव को कक्षा में एक निश्‍चि‍त और महत्वपूर्ण जगह मिलनी चाहिए। सहभागिता एक सशक्त रणनीति है। यह माना गया है कि समूह में या अपने साथियों से सीखना अधिक अच्छी तरह से होता है। उक्त दस्तावेज इसके पीछे यह तर्क देता है कि जब बच्चे और शि‍क्षक अपने व्यक्तिगत या सामूहिक अनुभव बांटते हैं, उन पर चर्चा करते हैं और उनमें परखे जाने का भय नहीं होता है, तो इससे उन्हें उन लोगों के बारे में भी जानने का अवसर मिलता जो उनके सामजिक यथार्थ का हिस्सा नहीं होते। इससे वे विभिन्नताओं से डरने के बजाय उन्हें समझ पाते हैं। कुछ इसी तरह की बात मुक्तिबोध अपने एक निबंध ‘समीक्षा की समस्याएं’ में लिखते हैं- ‘‘जहां तक वास्तविक ज्ञान का प्रश्‍न है- वह ज्ञान स्पर्धात्मक प्रयासों से नहीं, सहकार्यात्मक प्रयासों से प्राप्त और विकसित हो सकता है।’’  यह अच्छी बात है कि मुक्तिबोध प्रतियोगिता या प्रतिस्पर्धा को नकारते हैं। हो भी क्यों न! यह एक पूंजीवादी मूल्य है और मुक्तिबोध समाजवादी समाज के समर्थक रहे। प्रतिस्पर्धा से कभी भी एक समतामूलक या सहकारी समाज नहीं बन सकता है। सबको साथ लेकर आगे बढ़ने की प्रवृत्ति ही एक सुंदर समाज का निर्माण कर सकती है।

सीखने के लिए स्वतंत्रता और भयमुक्त वातावरण का होना बहुत जरूरी है। दबाव या भय में कुछ भी सीखना संभव नहीं है। स्वतंत्रता बच्चे को चिंतन और उसे सृजन के लिए प्रेरित करती है। बच्चे में सृजनशीलता के विकास के लिए स्वतंत्रता का होना पहली शर्त है। कुछ इसी तरह की बात मुक्तिबोध भी कहते हैं- ‘‘व्यक्ति-स्वातंत्र्य कला के लिए, दर्शन के लिए, विज्ञान के लिए अत्यधिक आवश्‍यक और मूलभूत है। कोई भी सृजनशील प्रक्रिया उसके बिना गतिमान नहीं हो सकती।’’ मुक्तिबोध व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक हैं। उनका मानना है कि भले ही यह एक आदर्श है फिर भी मानव की गरिमा और मानवोचित जीवन प्रदान करने के लिए बहुत जरूरी है। यह जनता के जीवन और उसकी मानवोचित आकाक्षांओं से सीधे-सीधे जुड़ा़ है। कोई भी सृजनशील प्रक्रिया उसके बिना आगे नहीं बढ़ सकती है। यह सच भी है। हम अपने चारों ओर अतीत से लेकर वर्तमान तक दृष्‍टि‍पात करें तो पाते हैं कि दुनिया में जितने भी बड़े सृजन हुए हैं, वे सभी किसी न किसी स्वातंत्र-व्यक्तित्व की देन हैं। इन व्यक्तित्वों को यदि सृजन की आजादी नहीं मिली होती तो इतनी बड़ी उपलब्धि उनके खातों में नहीं होती। हर सृजन के मूल में स्वतंत्रता ही है। मुक्तिबोध इस बात को बहुत गहराई से समझते हैं।

इस प्रकार ज्ञान की बदली अवधारणा और बाल मनोविज्ञान की दृष्‍टि‍ से विश्‍लेषण करें तो हम पाते हैं कि मुक्तिबोध का चिंतन बहुत तर्कसंगत और प्रगतिशील है। इसमें शि‍क्षा और मनोविज्ञान को लेकर उनकी गहरी समझ परिलक्षित होती है। एक लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक सोच से लैस समाज बनाने की दिशा में उनका यह चिंतन बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। आज जब ज्ञान को एक खास तरह के खांचे में फिट करने और तैयार माल की तरह हस्तांतरित करने की कोशि‍श हो रही है, तो मुक्तिबोध के ये विचार अधिक प्रासंगिक हो उठते हैं।

आपकी आत्मा में किसी कला के लिए स्थान नहीं है, तो आप अपाहिज हैं : जीवन सिंह

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डॉ. जीवन सिंह

डॉ. जीवन सिंह हिंदी के प्रतिष्ठित, प्रतिबद्ध और ईमानदार आलोचक हैं। अलवर राजस्थान में रहते हैं। अब तक आलोचना की तीन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। लोकधर्मी कविता के लिए जाने-जानी वाली पत्रिका ‘कृति ओर’ में वह निरंतर लिखते रहे। अलीबख्शी ख्याल और मेवाती लोक संस्कृति पर गहरी पैठ रखते हैं। अपने गांव जुरहरा (भरतपुर) की रामलीला में पिछले पैंतालीस वर्षों से जुड़ाव और रावण का अभिनय करते रहे हैं। 1968 से 2004 तक राजस्थान के विभिन्न राजकीय कॉलेजों में अध्यापन करते रहे। प्रस्तुत है उनसे फेसबुक के माध्यम से महेश चंद्र पुनेठा  की हुई लंबी बातचीत के कुछ अंश-

हमारे समाज में पढने की संस्कृति का जबरदस्त अभाव है। पढ़ना केवल परीक्षा पास करने के लिए जरूरी माना जाता है। पाठ्यपुस्तकों से इतर पढ़ना एक फालतू काम माना जाता है। इसके लिए बच्चों को हमेशा रोका जाता है। नयी पीढ़ी में पढ़ने की आदत विकसित करना किसी चुनौती से कम नहीं है। आपको पढ़ने की संस्कृति के अभाव के पीछे कौन से कारण नजर आते हैं? आप विदेशों में भी रहे हैं क्या वहां भी पढ़ने की संस्कृति की स्थिति भारतीय समाजों की तरह ही है?

मैंने न पढ़ने और अपने घरों में किताब न रखने की बात इसलिए कही है कि हम पहले उस समाज को जान सकें जिसमें हम छंद-रचित कविता के लोकप्रिय होने की बात अक्सर करते रहते हैं। जहां कविता को पढ़ाने वाले अध्यापक तक अपने घरों में पुस्तक रखने से परहेज करते हों, वहां कौन है जो कविताओं से प्रेम कर रहा है, कुछ पता तो चले। दरअसल, हम मिथकों में जीने के अभ्यासी हो चुके हैं, वास्तविकता में कम। जो वास्तविकता को कुछ बदले हुए रूप में लाने का प्रयास करता है, उस पर धावा बोल देते हैं। जब मिथक टूटता है तभी वास्तविकता प्रकट होती है।

हमारा हिन्दी समाज इकसार समाज नहीं है, दूसरे भी नहीं हैं। एक बहुत बड़ा निम्न मेहनतकश वर्ग तो रोजी-रोटी के संकट से ही मुक्त नहीं हो पाता। वह अपने जीवन के भावात्मक पहलुओं को अपने लोकसाहित्य (मौखिक साहित्य) में ही पाकर संतुष्ट हो लेता है। अब रहा मध्यवर्ग, इस वर्ग में ही पढ़ने-लिखने वाला वर्ग निकलता है, वह भी उंगलियों पर गिना जा सकता है। हमारे यहां एक कविता संग्रह की ज्यादा से ज्यादा पांच सौ प्रतियां रोते-धोते छपती हैं। इसी से पता चल जाता है कि हमारा समाज कितना साहित्य प्रेमी है?  लगभग पचास करोड़ हिन्दी भाषी होंगे, उसमें कितने लाख या करोड़ साहित्य प्रेमी हैं। जरा हिसाब लगाकर देखें तो सब कुछ पता चल जायगा। एक-दो लाख ज्यादा से ज्यादा होंगे। किताबों की खरीद से अन्दाज लगाएं तो यह संख्या हजारों में सिमट जाएगी। मध्यवर्ग में कोई आसपास आपको नजंर आता है, जो अपने बच्चों को इंजीनियर या डॉक्टर के अलावा कुछ बनाना चाहता है। कितने लोग हैं जो अपने बच्चों को मन से अध्यापक बनाना चाहते हैं और उसमें भी साहित्य का और वह भी हिन्दी का। हिन्दी आज कहीं प्राथमिकता में ही नहीं है। हमारा मन पूरी तरह से धन का गुलाम बन रहा है, जो साहित्य-संस्कृति सिर्फ धनार्जन को मानता है। सब कुछ को मैनेज करता है। तकनीक और प्रबंधन ने हमारे दिमागों को आक्रांत सा कर लिया है और यह पिछले पच्चीस वर्षों में बहुत तेजी से हुआ है। जब पूंजी ही जीवन का ध्येय बन जाती है तो अन्य सब कुछ उसके सामने गौण हो जाता है। पूंजी अपने लिए अलग एक नई सभ्यता और संस्कृति विकसित करती जाती है और अपने प्रभाव में दूसरे वर्गों को भी लेती जाती है।

जहां तक विदेशों की बात है, पढ़ने-लिखने की संस्कृति में वे पहले से हमसे आगे हैं। वहां उन्होंने अपने लिए सारे प्रबंध एक तार्किक प्रक्रिया के तहत लगातार किए हैं। वहां पढ़ना-लिखना न होता तो आज ज्ञान-विज्ञान और नई से नई तकनीक का विकास कैसे होता? विश्व संचार क्रांति कौन करता? उन्होंने अपने शिक्षा-प्रबंधन पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया है। हमारे यहां शिक्षा नहीं,  मानव-संसाधन का प्रबंधन चलता है। ऐसे में पढ़ने की सहज संस्कृति का विकास कैसे संभव है। हमारे राजनेता जो सारी बातों के नियंता हैं, वे क्या इन सवालों पर गंभीर हैं। जिन्दगी जीने का एक सामान्य नैतिक बोध और मानवीय आकांक्षाएं जब तक हमारी प्राथमिकताओं में नहीं आएंगी, तब तक जो चल रहा है वही चलता रहेगा। इसके लिए हर स्तर पर, खासकर प्राथमिक, माध्यमिक स्कूली स्तर पर बहुत बड़े अभियान और नवजागरण की आवश्यकता है, जो शिक्षा को पारम्परिक तौर पर नहीं वरन आधुनिक सेक्युलर पद्धति पर आगे ले जाए। हमको अपनी शिक्षा को महंगे तरीकों से नहीं, बहुत सस्ते और सादगी से पूर्ण तरीकों से आगे बढ़ाने की जरूरत है। हमारा गरीब समाज तभी शिक्षित हो सकेगा।

आप के पोते आस्ट्रेलिया में पढ़ते हैं। आपने उनके साथ समय भी व्यतीत किया है। क्या आप बता सकते हैं कि वहां पाठ्यपुस्तक के अलावा बच्चे अन्य पुस्तकें भी पढ़ते हैं? स्कूल या शिक्षक उन्हें इस बात के लिए कितना प्रोत्साहित करते हैं? वहां पर स्कूलों में पुस्तकालयों की स्थिति कैसी है?

पहली बात तो यह है कि वहां के बच्चों के मन पर शिक्षा का वैसा प्रतियोगी दबाव नहीं होता,  जैसा हमारे यहां बच्चों के दिमाग पर रहता है। वहां बच्चों के पढ़ना शुरू करने की आयु 6 साल है। इससे पहले खेलने के सिवाय और कुछ नहीं करता। हमारे यहां शिक्षा लेते हुए बच्चे शायद ही सहज रह पाते हों। दूसरी बात यह है कि स्कूल भी बच्चों के प्रति सहज सहानुभूति पूर्ण व्यवहार रखते हैं। मैं जब वहां था, तब अपने पौत्र को एक प्ले स्कूल में ले जाता था क्योंकि वह 6 साल का नहीं हुआ था। हम दोनों रेल से 15 किलोमीटर दूर एक प्ले स्कूल में जाते थे, जहां मैं चार घण्टे तक पास में स्थित एक पब्लिक लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ता था। उस लाइब्रेरी में सप्ताह में दो बार छोटे बच्चों को उनकी अध्यापिकाएं अपने साथ लेकर आती थीं। उनसे सामूहिक तौर पर छोटी-छोटी कविताएं भी बुलवाती रहती थीं। उनकी विशेषता इस बात में है कि वे.बच्चों को हमेशा हास्य-विनोद के वातावरण में रखते हैं। जगह-जगह बच्चों के खेलने-कूदने के पार्क हैं। उन पार्कों में पुस्तकालय भी हैं। स्कूल भी अपने बच्चों को उनमें सभी तरह के खेल खिलाने ले जाते हैं। कहने का मतलब यह है कि शिक्षा मन के ऊपर न बोझ है न ही उसका प्रतियोगी आतंक है और न ही वहां डॉक्टर,  इंजीनियर बनाने की होड है। वहां सुनियोजित और बेहद तार्किक ढंग से सभी तरह के जरूरी प्रबंधन किए जाने की परम्परा है। बच्चे बड़ों से और अपने परिवार से भी बहुत कुछ सीखते हैं, इसलिए बूढ़े-बूढे़ लोग भी वहां पुस्तकालय में जाकर कुछ न कुछ पढ़ते रहते हैं। हमने पढ़ने की जगह केवल स्कूल को ही बना रखा है, जबकि बच्चे का पहला विद्यालय उसका अपना घर होता है। घर से ही वह पढ़ना सीखता है। मुक्तिबोध का एक निबंध है- मुझे मेरी मां ने प्रेमचंद का भक्त बनाया। हमारे यहां कुछ समय पहले तक स्त्री शिक्षा पर कितना बल था, हम अच्छी तरह से जानते हैं।

मैं फिर कहूंगा कि हमारे यहां कितने लोग अपने घरों में निजी पुस्तकालय बनाते हैं और किताबें खरीद कर पढ़ते हैं। घर में किताबें होंगी और मां-बाप भी कुछ न कुछ पढ़ते दिखेंगे तो बच्चा भी पढ़े बिना नहीं रह सकेगा। केवल स्कूल के भरोसे पुस्तकें पढ़ने का संस्कार डालना मुश्किल है। गनीमत है कि वहां पर वह अपना कोर्स ही पूरा और अच्छी तरह से पढ़ ले। स्कूलों में तो पुस्तकालय वहां हैं ही, खेलना भी है। इसके अलावा सार्वजनिक पुस्तकालय भी जरूरत के अनुसार खूब हैं।

वहां घरों में किताबों का क्या स्थान है? क्या वहां निजी पुस्तकालय दिखाई दिए? आप अमरीका भी कुछ समय रहे वहां पर क्या स्थिति है?

वहां के वासियों के घर देखने का कोई बड़ा अवसर तो मुझे नहीं मिला, किन्तु लाइब्रेरी से पुस्तकें इश्यू कराते और लौटाते देखा। जगह-जगह पुस्तकालय देखे, जिनका रखरखाव और अद्यतन सुविधाएं देखकर एक तरह की तसल्ली मिलती है और इच्छा भी होती है कि काश, हमारे यहाँ भी ऐसा हो। वैसे हमारे यहां ही अक्सर सुनने में आता है कि हमारी तुलना में बंगाली समाज अधिक पुस्तक प्रेमी व कला प्रेमी समाज है। अमरीका में पुस्तक स्टोर(माल) होते हैं जहां से यदि आपको पुस्तक पसंद न आए तो उसे पढ़कर निर्धारित अवधि में लौटा सकते हैं। मैं यहां सोवियत संघ का उदाहरण रखना चाहता हूं जिस व्यवस्था ने अपने देश में ही नहीं वरन हमारे जैसे देशों में भी एक पुस्तक प्रेमी समाज बना दिया था। सस्ती और सुन्दर पुस्तकों की एक नई संस्कृति विकसित करने की उन्होंने लगातार कोशिश की थी। इसलिए यह व्यवस्था का सवाल भी है कि आप कैसा समाज बनाना चाहते हैं। अभी तो हमारी व्यवस्था का लक्ष्य है कि एक बड़े पूंजी प्रेमी समाज का निर्माण करना, जो बहुत तेजी से किया जा रहा है। यह समाज की जिम्मेदारी भी है कि वह विभिन्न स्तरों पर स्वयं भी प्रयत्न करे कि उसे कैसा समाज बनना है और किस दिशा में जाना है। सब कुछ सरकारों के भरोसे नहीं छोड़ देना चाहिए। सरकारें तो वही करेंगी, जो उनको करना है।

जिन देशों के आपने उदहारण दिए हैं, क्या वहां यह सरकारी प्रयासों से हुआ है या व्यक्तिगत प्रयासों से? आपने सस्ती और सुन्दर पुस्तकों की एक नई संस्कृति विकसित करने के सन्दर्भ में सोवियत संघ का उदाहरण दिया , इस बारे में कुछ और विस्तार से बताइए।

दरअसल, जितने भी सामाजिक कार्य हैं, उनको केवल सरकार पर नहीं छोड़ा जा सकता। समाज और सरकार दोनों की पारस्परिक सहयोग से ही इनमें सफलता हासिल की जा सकती है। यदि कोई पुस्तक पढ़ना चाहता है तो कौन सी ऐसी सरकार है, जो उसे पढ़ने से रोकने आती है। स्कूलों,  शिक्षकों को पुस्तक संस्कृति की शुरुआत करने में सबसे बड़ी और प्राथमिक भूमिका अदा करनी होगी,  क्योंकि सबसे ज्यादा पुस्तकों से वास्ता उन्हीं का पड़ता है। जिस समाज में शिक्षक स्वयं कोर्स के अलावा और कुछ पढ़ने और जानने की इच्छा शायद ही रखते हों, उस समाज में पुस्तक संस्कृति का विकास कर पाना बहुत मुश्किल है। एक ही तरह के प्रयास करने से सामाजिक और सामूहिक स्तर पर कुछ नहीं होता। व्यक्ति और समाज दोनों स्तरों पर काम करने से ही बदलाव आते हैं। इस मामले में विकसित देशों का वातावरण हमारे यहां के वातावरण से बहुत अलग है। ब्रिटेन के औपनिवेशिक शासन से मुक्ति पा लेने के बावजूद हमारे समाज की प्रकृति, परिस्थिति और जरूरतों के अनुसार बड़े और बुनियादी बदलाव करने के बजाय उन्हीं के द्वारा स्थापित व्यवस्था को अपना लिया। उसमें इतना सा बुनियादी बदलाव भी न कर पाए कि यहां पठन-पाठन की संस्कृति अपनी भाषाओं में विकसित हो। बच्चा भाषाओं को अपने परिवेश और वातावरण से सीखता है और उसी में बिना किसी दबाव के सहजता तथा आनंद भाव से अपनी विभिन्न प्रवृत्तियों का विकास करता है। अंग्रेजी दो सौ साल बाद भी हमारे अपने घर-परिवारों के वातावरण की भाषा कहां बन पाई है। उसे अर्जित करने के लिए अतिरिक्त अस्वाभाविक प्रयास करना पड़ता है। जबकि हम अपनी भाषाओं को मां के दूध के साथ सीख लेते हैं। इस वजह से भी बच्चे पढ़ने के प्रति अनमना और उदासीनता का भाव रखते हैं।

अपनी भाषा में लिखी किताब को पढ़ने की स्वप्रेरणा विकसित होने की संभावनाएं ज्यादा रहती हैं। सोवियत संघ का ध्येय था कि पूरी दुनिया में पूंजी बाजार की गलाकाटू प्रतिस्पर्धा खत्म हो और यह दुनिया सभी के रहने लायक एक सुखद शान्तिपूर्ण दुनिया हो। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए शिक्षा से बेहतर कोई दूसरा माध्यम नहीं है। इसलिए अपने देश के अलावा मित्र देशों की भाषाओं में भी उन्होंने एक सस्ती, उन्नत और सुन्दर पुस्तक संस्कृति को सर्वत्र विकसित किया। उनके द्वारा मुद्रित पुस्तकें सस्ती ही नहीं,  दिखने में भी बहुत आकर्षक होती थीं। उनको देखते ही खरीदने का मन हो जाता था। बाल साहित्य भी बहुत सस्ता और आकर्षक होता था। वे जगह-जगह पुस्तक प्रदर्शनी भी लगाते थे। इससे सामाजिक स्तर पर वातावरण बनता था। हर साल प्रदर्शनी का इंतजार रहता था। पूंजीवादी व्यवस्था में पढ़ना ही इतना मंहगा और प्रतियोगिता से बोझिल बना दिया जाता है कि इस वातावरण में सिर्फ धन कमाने वाली पढ़ाई करने के अलावा कोई कुछ सोच ही नहीं पाता।

सस्ता और अच्छा साहित्य पहुंचाने के लिए हमारे यहां सरकारी या व्यक्तिगत स्तर पर अब तक किस तरह के प्रयास आपको दिखाई दिए?

देश को आजादी मिलने के बाद पुस्तकें पढ़ने और जीवन को ज्ञान सम्पन्न करने का एक जज्बा लोगों में मौजूद रहा। मैं अपने एक छोटे से गांव का उदाहरण आपको बतलाता हूं। आजादी मिलने के दिनों में दो-तीन हजार की आबादी से ज्यादा गांव की आबादी नहीं होगी, लेकिन तब भी गांव का अपना एक पुस्तकालय और वाचनालय- सुधारिणी समिति के नाम से चलता था। इसमें हंस, माधुरी जैसी उस समय की पत्रिकाएं तक मंगाई जाती थीं। उस पुस्तकालय में अधिकांश किताबें स्वाधीनता के भाव को जगाने वाली थीं। हमारा गांव तत्कालीन भरतपुर रियासत का आखिरी गांव था, जो इस समय के हरियाणा और उस समय के पंजाब की सीमा से लगता था। उस समय की स्वाधीनता आंदोलन के सेनानी स्वाधीनता पाने के लिए पठन-पाठन को जरूरी मानते थे कि ज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं है। इसी उद्देश्य से छोटे-छोटे गांवों में भी पुस्तकालय खोले गए थे। आजादी का भाव पैदा करने में इन पुस्तकालयों की बहुत बड़ी भूमिका रही है। उस समय लालटेन की रोशनी में लोग इनमें रात्रि को भी पढ़ने जाते थे। तब यह सब एक बड़े आंदोलन के तहत हुआ है। ऐसे ही हमारे पास के कस्बों कामां, डीग, कुम्हेर आदि में पुस्तकालय और वाचनालय खुले हुए थे। डीग में हिंदी साहित्य समिति और उसका एक बड़ा पुस्तकालय था, जो आज भी मौजूद है किन्तु पहले जैसा जज्बा अब नहीं है। भरतपुर में एक जमाने में वहां की हिंदी साहित्य समिति एकमात्र ज्ञान चर्चा और पठन-पाठन का सबसे बड़ा केन्द्र थी। इसके एक सम्मेलन में शायद 1930 में रवींद्रनाथ टैगोर आए थे। वह वातावरण व माहौल ही अलग होता है, जो लोगों में बड़े स्तर पर ज्ञान की भूख जगाता है। आज का युवा पहले से कम पढा़कू नहीं है। वह खूब पढ़ता है। पढ़ने में रात-दिन एक कर अपनी जी-जान लगा रहा है, किन्तु अब उसके अध्ययन का उद्देश्य अच्छे से अच्छा व्यवसाय हासिल कर थोड़े समय में अधिकतम पूंजी हासिल करना हो गया है। अब वह समाज परिवर्तन की जगह बाजार में अपनी जगह बनाने के लिए खूब पढ़ता है। प्रयोजन बदल जाने से पुस्तकों की दिशा और उपयोगिता दोनों बदल जाती हैं।

यदि सर्वेक्षण किया जाए तो आज पहले से बहुत ज्यादा बड़ा पुस्तकों का बाजार है और शिक्षा पाने के प्रति भी लोगों में जागरूकता आई है। लोग अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए बहुत तेजी से गांवों को छोडकर शहरों में आकर बस रहे हैं। गांव बहुत तेजी से वीरान जैसे हो रहे हैं। जो किसी वजह से गांव में ही रहने को मजबूर हैं, वे ही अब गांवों में रह रहे हैं। गांव छोड़ने के पीछे उनका उद्देश्य बच्चों को अच्छी और ऊंचे स्तर की शिक्षा, खासकर अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में दिलवाने का है। यह अलग बात है कि उस शिक्षा का गहरा रिश्ता सिर्फ बाजार से है।

सस्ता और सुरुचिपूर्ण साहित्य आज के माहौल के अनुकूल ही नहीं है। हर कोई अपने बच्चों को डॉक्टर,  इंजीनियर बनाने की होड में लगा हुआ है। पुस्तकें खूब हैं और उनको पढ़ने वाले भी। प्राइवेट स्कूलों में बहुत ऊंची फीस होने पर भी उनमें जगह खाली नहीं हैं। सरकारी संस्थानों पर से विश्वास स्वयं सरकारों ने ही उठा दिया है। वे सब कुछ को प्राइवेट हाथों में सौंप देने के लिए व्यग्र हो उठी हैं। अब तो केवल निजी प्रयास ही रह गए हैं।

आजादी मिलने के शुरूआती दिनों में पुस्तकें पढ़ने और जीवन को ज्ञान सम्पन्न करने का जो जज्बा था, उसके कम होने के पीछे आप मुख्य रूप से क्या कारण देखते हैं? एन.बी.टी. जैसे सरकारी प्रकाशन आज भी चल रहे हैं जो सस्ता और सुरुचिपूर्ण साहित्य प्रकाशित करने, उसको लोगों तक पहुंचाने और पढ़ने के लिए कुछ-कुछ कार्यक्रम करते रहते है। इसको आप किस रूप में देखते हैं?

मुख्य कारण है आजादी के बाद बदला हुआ माहौल और स्वाधीनता मिल जाने के बाद यह मान लिया जाना कि स्वाधीनता मिल जाने से अब सब कुछ अपने आप हो जाएगा। जबकि स्वाधीनता कभी एक दिन में नहीं आती, यह एक सतत प्रक्रिया है। आज जब आजादी मिले सत्तर साल होने को जा रहे हैं, तब भी हमारा समाज कितने ही तरह के सामाजिक-आर्थिक बंधनों से मुक्त नहीं हुआ है। इसलिए जहां-जहां भी दलित, स्त्री, आदिवासी और गरीबी,  गैरबराबरी जैसे अनेक मुद्दे हैं, उनका समाधान लगातार आंदोलन से ही संभव हो सकता है। जिस समाज में अनेक तरह के वर्ग होते हैं, उसमें आजादी का उपभोग व्यावहारिक तौर पर केवल उच्च वर्ग ही करता है। आजादी मिल जाने के बाद इन मुद्दों को लेकर संघर्ष तो अवश्य हुए, किंतु आजादी के समय का आन्दोलन जैसा जज्बा खत्म होता चला गया। इससे यहां के लोग सत्ता की हिस्सेदारी करने जैसी नयी प्रवृत्तियों में ज्यादा उलझ गये। मध्य वर्ग ऊंची नौकरी पाने, नए नौकरशाह आदि बनने की हिस्सेदारी करने में लग गया। यही वजह रही कि पुराने पुस्तकालयों की आवश्यकता की बात पुरानी पड़ने लगी। एनबीटी जैसा संस्थान इतने बड़े देश की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। दूसरे आम जन में रोजगारी साहित्य पढ़ने-पढ़ाने का भाव पहले से काफी बढ़ा है। पढ़ना-लिखना पहले से बढ़ा है, लेकिन नीचे का एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी अपनी रोजी-रोटी के मसले से उबर नहीं पाया है। मध्यवर्ग व्यावसायिकता और सिर्फ बाजार की शिक्षा लेने तक सीमित होकर रहने की स्थिति में सिमट गया है। पुस्तक छापने और बेचने के कुछ-कुछ कार्यक्रम केवल नौकरी पूरी करना और एक तरह की रस्म अदायगी जैसे बनकर रह गए हैं। वे कुछ पढ़ने वाले लोगों की पूर्ति कर देते हैं। गीताप्रेस द्वारा जैसे धार्मिक साहित्य के बेहद सस्ते साहित्य प्रकाशन का अभियान चलाया गया। कुछ इसी तर्ज पर अन्य विषयों पर पुस्तक प्रकाशन के अभियान चलें और एक माहौल बने तो इन स्थितियों में बदलाव संभव है।

मध्यप्रदेश की शैक्षिक संस्था एकलव्य द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों को आप किस रूप में देखते हैं? क्या इस तरह के प्रयास राजस्थान में भी कोई संस्था कर रही है?

एकलव्य ने इस दिशा में बहुत बड़ा और प्रशंसनीय काम किया है जिसका सर्वत्र स्वागत हुआ है, किन्तु लगभग पचास करोड़ हिन्दी आबादी के लिए इस तरह के सौ कार्य भी पर्याप्त नहीं हैं। वास्तविकता यह है कि आज भी बहुत बड़ी आबादी शिक्षा से महरूम है। सच तो यह है कि समाज को बदलना है तो शिक्षा के सम्पूर्ण ढांचे में बुनियादी बदलाव जरूरी है जिससे वह अभावग्रस्त वर्ग के अनुकूल बन सके। कुल मिलाकर बात यह है कि हमारे यहां महौल अभी सच्ची शिक्षा के अनुकूल नहीं है। शिक्षा सरकार की प्राथमिकताओं में ही नहीं है। जबकि हिन्दुस्तान में हर बात सरकार के भरोसे छोड़ दिए जाने का रिवाज सा बन चुका है। सरकारें ऐसी शिक्षा क्यों देना चाहेंगी, जो समाज में उनका प्रतिरोध खड़ाकर एक और बड़ा एवं उदार जनतांत्रिक विकल्प खड़ा करने में मददगार हो। मुझे मालूम नहीं कि छुटपुट प्रयासों को छोड़कर राजस्थान में इस दिशा में कोई उल्लेखनीय कार्य हो रहा है। मेरी जानकारी में नहीं है। संभव है कोई गैर सरकारी संगठन इस क्षेत्र में काम कर रहा हो।

हमारे कवि मित्र राजेश उत्साही जो लम्बे समय तक बाल पत्रिका चकमकके संपादक और एकलव्य संस्था से जुड़े रहे, पिछले दिनों एक बातचीत में कहा कि बाजार ने एक भ्रम बनाया है कि हिंदी की किताबें बिकती नहीं हैं। जहां प्रयास हुए हैं, वहां यह भ्रम टूटा भी है। होशंगाबाद के एक मित्र हैं अशोक जमनानी। वे अब तक सात-आठ उपन्यास लिख चुके हैं। उन्होंने पहले किसी व्यावसायिक प्रकाशक को दिए थे। बाद में खुद जोखिम उठाकर छपवाए और खुद ही गांव-गांव जाकर बेचे। उनके उपन्यासों के छह से अधिक संस्करण निकल चुके हैं। यह एक उदाहरण भर है। एकलव्य द्वारा प्रकाशित किताबों में से कुछ की अब तक पचास हजार से ज्यादा प्रतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। हां, यह बात अलग है कि उनमें से अधिकांश सरकारी या थोक खरीद में जाती हैं। यह भी एक उदाहरण है। महाराष्ट्र  में बालसाहित्य में काम करने वाले लोग गांव-गांव जाकर अपनी किताबें बेचते रहे हैं। मुझे लगता है वर्तमान समय पढ़ने की आदत को टीवी जैसे माध्यम से बहुत कड़ी टक्कर मिल रही है। चाहे वह समाचार हो, या विचार। सब कुछ तो टीवी से आ रहा है। फिर भी यह कहना ठीक नहीं है कि पढ़ने की संस्कृति नहीं है। आप इस पर क्या टिप्पणी करेंगे? क्या बाजारू उपन्यासों या पत्रिकाओं का बड़ी संख्या में पढ़ा जाना इस बात का प्रमाण नहीं है कि अभाव पढ़ने की संस्कृति का नहीं, बल्कि किसी और बात का है?

जिस देश की आबादी एक अरब तीस करोड़ के आसपास हो उसमें इतना तो अवश्य होगा ही कि दो चार या दस पांच करोड़ लोग ठीक-ठाक ढंग से पढ़-लिख रहे हों। सवाल जब सौ-पचास करोड़ का आता है तो हिन्दी में आज किसी भी अच्छी किताब का एक-दो करोड़ का संस्करण होना चाहिए, लेकिन अभी तो यह लाखों तक भी नहीं पहुंची हैं। पढ़ना तो पहले से ज्यादा हुआ ही है। पुस्तकें भी पहले से ज्यादा प्रकाशित हो रही हैं और मुनाफा बटोरने वालों के पक्ष में जा रही हैं। पुस्तकों के व्यवसायी करोडों तभी कमा सकते हैं, जब पुस्तकें प्रकाशित करें इसलिए पुस्तकें तो छप रही हैं, किन्तु उनके अनुसार पाठक नहीं हैं। निसंदेह मुनाफाखोर प्रकाशक इस विभ्रम को फैलाता है किन्तु इसमें कुछ सचाई भी है। मैं तो इस धारणा की जांच अपने मोहल्ले के लोगों के बीच से करता हूं, जिसमें मेरे साथी पढ़े-लिखे समझे जाने वाले लोग अक्सर यह सवाल करते हैं कि आजकल आप क्या काम कर रहे हैं? मैं जब जवाब में कहता हूं कि मैं तो पढ़ता-लिखता हूं तो वे फिर पूछते हैं कि आप यह बतलाइए कि सेवानिवृत होने के बाद क्या काम करते हैं? पढ़ना-लिखना हमारे यहां काम करने की कोटि में नहीं आता। काम की परिभाषा में सिर्फ उसे ही काम कहा जाता है जिससे आपको धन की प्राप्ति होती है। यह है हमारे समाज का सामूहिक शैक्षिक मनोविज्ञान। हमारे आसपास अडोस-पडोस में रहने वाले सभी पढ़े-लिखे और खाते-पीते लोग हैं किन्तु लगभग सभी का दृष्टिकोण यही है कि सिर्फ और हमेशा धन कमाना ही काम करना होता है। वैसे तो आजादी मिलने के बाद से ही समाज का सामूहिक दृष्टिकोण कुछ इसी तरह का बना, किंतु जब से नवउदारवादी अर्थव्यवस्था का तेजी से प्रचलन हुआ है और एक नव धनाढ्य वर्ग पैदा हुआ है, तब से तो धन ही जीवन का एकमात्र प्रतिमान बना दिया गया है कि धन में ही विकास है और धन में ही गति है। अन्यत्र सभी जगह दुर्गति है। ऐसे माहौल में अपवाद स्वरूप ही एक समुदाय विशेष पुस्तक संस्कृति की लड़ाई लड़ता है। वह हमारे देश में भी चल रही है, उसको व्यापक जीवन स्तरों और जरूरत के अनुसार फैलाने की आवश्यकता है। हिन्दी जाति की तुलना में बंगाली और मराठी जातियां हमसे पहले से आगे रही हैं,  उनमें जातीय एकता का भाव सदा से ज्यादा रहा है। इस मामले में हिन्दी का कभी कोइ एक केन्द्र नहीं रहा। वह प्रशासनिक और राजनीतिक तौर पर बहुत बड़े और गहरे विभाजन का शिकार रही है। संस्कृति सभी तरह की होती है। पचास करोड़ आबादी में यदि पचास लाख लोग भी पढ़ने-दिखने लग जाएं तो यह संख्या बहुत बड़ी लगती है, किन्तु जब पचास करोड़ के सामने पचास लाख को रखते हैं, तब वास्तविकता मालूम पड़ती है।

बाजारू बातें हर युग में रही हैं। बाजारू साहित्य भी और उस सामान्य अभिरुचि का साहित्य और उसी तरह की पत्र-पत्रिकाएं भी। कई बार इसी में से रास्ता निकलता है। लेकिन इसके लिए समाज में लगाव की भावना होनी चाहिए, जबकि पूंजीवादी व्यवस्था का पहला ही पड़ाव होता है अलगाव और अजनबीपन। पूंजी जोड़ने के साथ-साथ तेजी से बांटने का काम भी करती है, जिससे सामूहिक भावना का क्षरण होता जाता है। जबकि कोई भी संस्कृति सामूहिकता के बिना संभव नहीं है।

बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने में परिवार की क्या भूमिका है? कैसे यह आदत विकसित की जा सकती है?

जीवन में किसी भी बेहतर प्रवृति के विकास के लिए एक सामाजिक-सांस्कृतिक और नैतिक वातावरण होता है,   कोई भी अच्छी प्रवृति तभी सामूहिक तौर पर विकसित हो पाती है। निजी और व्यक्तिगत तौर पर या छोटे-मोटे आंचलिक स्तरों पर भी अपवाद स्वरूप कुछ प्रवृत्तियां विकसित होने की संभावनाएं खूब रहती हैं और इस तरह के काम करने वाले भिन्न रुचियों वाले लोग सभी क्षेत्रों में होते हैं और अपना काम भी करते हैं । उन क्षेत्रों में वातावरण भी बनता है किन्तु वह बड़े समर्थन के अभाव में दीर्घजीवी नहीं हो पाता। बनता है और एक बिन्दु तक पँहुचकर खत्म हो जाता है। जैसे- निजी स्तर पर कुछ खिलाड़ी ओलम्पिक में पदक ले आते हैं । इसका मतलब यह नहीं कि हमारे देश में खेलों का कोई वातावरण बना हुआ है। यहाँ निजी स्तर पर तो बहुत कुछ है । प्रतिभाएं हैं, अपार धन दौलत है। आज के अखबार में ही आया है कि दौलत के मामले में हमारा देश दुनिया के सबसे अमीर देशों में सातवें पायदान पर है, लेकिन इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि हम गरीब देशों की श्रेणी में नहीं हैं। ऐसे ही अन्य बातों में भी हैं। पुस्तकें पढ़ने वाले खूब पढ़ रहे हैं किन्तु पढ़ने-लिखने का वातावरण नहीं है। इसकी प्रमुख वजह है कि गैरबराबरी से या अन्य किसी भी तरह की विषमता से मुक्ति पाने का कोई बड़ा आन्दोलन नहीं है। जितने बड़े आकार का आन्दोलन है, उतने ही आकार का पठन-पाठन भी है।  जब से देश में दलित आन्दोलन में तेजी आई, तब से उसका अलग साहित्य भी प्रकाशित हुआ और नए पाठक भी पैदा हुए। स्त्री साहित्य के बारे में भी यह बात कही जा सकती है। दरअसल, मुक्ति आन्दोलन के बिना व्यापक स्तर पर पुस्तक आन्दोलन भी नहीं चल सकता। मुक्ति आन्दोलन से एक स्पष्ट जीवनोद्देश्य सामने आ जाता है जिसकी पूर्ति के लिए लोगों में उससे सम्बंधित साहित्य, इतिहास आदि पढ़ने की जरूरत होती है। नई सोच विकसित होती है तो नई राष्ट्रीय चेतना का निर्माण करती है।

बच्चा हमेशा अनुकरण से सीखता है। वह वही भाषा बोलता है और वैसे ही सोचता और आचरण करता है जैसे उसके परिवार के दूसरे लोग करते हैं। बच्चे को कहाँ मालूम होता है कि वह किस जाति और धर्म का है । यह उसका वातावरण ही होता है जो उसे बड़ा होने पर जाति और धर्म दोनों सिखा देता है। फिर वह स्कूल जाता है तो वहाँ भी उसके ये परिवार से प्राप्त बंधन टूटने के बजाय और ज्यादा मजबूत होते हैं। यही बात पुस्तकों के बारे में भी है। सबसे पहले हमारे देश का सामान्य युवक बेरोजगारी से जूझता है और उसके लिए जी जान एक कर देता है। माता-पिता, अभिभावक आदि भी यही चाहते हैं कि वह सिर्फ वही पढ़े, जिससे रोजगार मिले।  रोजगार मिल जाने के बाद पढ़ने-लिखने का सारा काम खत्म हो जाता है। हमारे यहाँ रोजगार पा लेना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है, जो उसे अलौकिक स्तर की संतुष्टि से भर देती है। एक कहावत भी इस बारे में है- पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नबाव। जो समाज नबाव बनने के लिए पढे़गा, वह नबाव बन जाने के बाद किसलिए पढ़े। जहाँ तक इस आदत को विकसित करने का सवाल है कि यदि घर, परिवार से लेकर स्कूल स्तर तक यदि पढ़ने पढ़ाने का वातावरण मिले तो इसको विकसित किया जा सकता है। जब परिवार वाले और शिक्षक पढ़ते हुए दिखाई देंगे तो बच्चे पर इसका प्रभाव पड़े बिना नहीं रहेगा।

इसके अलावा सार्वजनिक पुस्तकालय-वाचनालय श्रृंखला का विकास किया जाए और स्कूल स्तर पर पुस्तकें पढ़ने वालों के लिए हर साल ऐसे आयोजन हों जिनमें पाठ्येतर पुस्तकें पढ़ने वालों से उनके विचार व्यक्त कराये जाएं और उनको सार्वजनिक तौर पर सम्मानित किया जाए।

दीवार पत्रिकाओं में ऐसे पाठकों के लिए अलग से कालम हो कि वे आजकल क्या नया पढ़ रहे हैं। सुगम, सुबोध और रोचक साहित्य की आसान सुलभता निश्चित की जाए।

आपकी यह बात बिलकुल सही है कि हमारे परिवारों की भी यही धारणा बनी हुई है कि पढ़ना-लिखना सिर्फ रोजगार पाने के लिए होता है। इसके चलते केवल वही किताबें पढ़ी जाती हैं जो प्रतियोगिता परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी होती हैं। इसी तरह स्कूली शिक्षा के दौरान भी वही किताबें और पाठ पढ़े जाते हैं जो परीक्षा में अधिक अंक दिला सकें। सार रूप में कहा जाए तो हमारा पढ़ना परीक्षा केन्द्रित होता है। इस धारणा के चलते साहित्यिक किताबें बहुत कम पढ़ी जाती हैं। कहानी-कविता-उपन्यास तो मनोरंजन और समय व्यतीत करने के लिए ही पढ़े जाते हैं। स्कूली बच्चों के लिए तो ये समय बर्बाद करने वाली मानी जाती हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं या अच्छे अंक प्राप्त करने की दृष्टि से क्या साहित्यिक किताबों की कोई उपयोगिता है? आखिर विज्ञान-गणित के विद्यार्थियों के लिए साहित्यिक पुस्तकों की क्या जरूरत है?

दरअसल, हमारी मौजूदा शिक्षा प्रणाली उन अंग्रेजी शासक वर्ग की बनाई हुई है, जो हमारे ऊपर लम्बे समय तक राज करते हुए यहाँ के मानवीय श्रम और प्राकृतिक सम्पदा का दोहन एवं शोषण करके अपने देश को सम्पन्न करने के उद्देश्य से यह सब कुछ करना चाहते थे। जो उन्होंने किया भी। उनके जमाने की शिक्षा पद्धति आज भी चली आ रही है, जो अंग्रेजी शासक वर्ग ने अपने लिए एक नौकरशाही निजाम तैयार करने के लिए बनाई थी, जिसके माध्यम से वे हिन्दुस्तान पर शासन कर सकें। उनका उद्देश्य यहाँ की जनता को ज्ञान-वि‍ज्ञान सम्पन्न और वास्तविक तौर पर शिक्षित करना था ही नहीं, कि यहाँ के निवासी अपनी रूढ़ियों से लड़ते हुए एक आधुनिक समाज का निर्माण कर सकें। अफसोस की बात यह है कि आजादी मिल जाने के बाद भी हमारी सरकारों का जितना ध्यान पूँजी के प्रभुत्व वाले विकास पर रहा, उतना श्रम शक्तियों की एकजुटता और जनजागरण पर नहीं। इस काम के लिए अँग्रेजी शिक्षा पद्धति को बुनियादी तौर पर बदलने की जरूरत लोकतांत्रिक शासक वर्ग ने समझी ही नहीं। इसी का परिणाम है कि आज का युवा वर्ग एक समग्र शिक्षा प्रणाली से महरूम है। वि‍ज्ञान पढ़ने वाले युवा को साहित्य, इतिहास, दर्शन का ज्ञान नहीं और साहित्य, इतिहास आदि पढ़ने वाले को विज्ञान से दूर रखा जाता है जबकि हमारा जीवन इस तरह से ज्ञान-वि‍ज्ञान के मामले में विभाजित नहीं होता। व्यक्ति का जीवन समग्र होता है। उसे सुविधा के लिए विभाजित जब से किया गया है, तब से वैसे ही चला आ रहा है। जबकि आज वि‍ज्ञान तकनीक को जाने बिना कोई एक कदम आगे नहीं बढ़ सकता। इसी तरह से हरेक व्यक्ति का काम मानवीय भावनाओं से पड़ता है। उस इतिहास,  दर्शन से पड़ता है, जिससे हर व्यक्ति अपनी जिन्दगी में गुजरता है। यह हमारे जीवन की समग्रता ही है कि व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र के ज्ञान की जरूरत है। ज्ञान का ऐसा संकायपरक विभाजन मनुष्य और उसकी मनुष्यता को विभाजित करने जैसा काम है। यह विभाजन किसी भी समय के शासक वर्ग के लिए फायदेमंद रहता है। वि‍ज्ञान वाला साहित्य से अलग और साहित्य वाला वि‍ज्ञान से कोसों दूर। यह बहुत कृत्रिम है।

जब इस पृथ्वी पर सोवियत संघ का अस्तित्व था, तब के शिक्षा के अनेक तरह के अनुभव निकल कर आए थे, जिनका ज्ञान और जागरण की दृष्टि से आज भी महत्व जरा सा भी कम नहीं हुआ है। उस समय शिक्षा के पहले जन-कमिसार लेनिन ने लुनाचार्स्की को बनाया था। उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में विशेषज्ञता के साथ सामान्यता के रिश्तों पर विचार करते हुए बतलाया था कि शिक्षित आदमी वह है ,जिसे सबका सामान्य और संक्षिप्त ज्ञान होता है, लेकिन जिसके पास अपनी विशेषज्ञता भी होती है, जो अपने कार्य को भली भाँति जानता है और जो शेष चीजों के बारे में भी कह सकता है कि कोई भी मानवीय चीज मेरे लिए पराई नहीं है। वह आदमी, जिसे टेक्नोलॉजी, औषधि विज्ञान, कानून,  इतिहास के मूल तत्वों और निष्कर्षों का ज्ञान होता है, वास्तव में शिक्षित आदमी है। लुनाचार्स्की ने यह भी माना है कि किसी को भी अज्ञानी नहीं रहना चाहिए। सबको सभी विज्ञानों और कलाओं के मूल तत्वों का ज्ञान होना चाहिए। चाहे आप मोची हों या रसायन शास्त्र के प्रोफेसर। यदि आपकी आत्मा में किसी कला के लिए स्थान नहीं है, तो इसका मतलब है कि आप काने और बहरे की भाँति अपाहिज हैं। क्योंकि आदमी की शिक्षा वस्तुतः इसमें है कि वह सब कुछ, जिसमें मानव जाति अपने इतिहास और संस्कृति का निर्माण करती है, जो मनुष्य के लिए उपयोगी या सांत्वनाप्रद अथवा जीवन में आनंद प्रदान करने वाली कृतियों में प्रतिबिंबित होता है– यह सब कुछ प्रत्येक आदमी की पँहुच के भीतर हो, पर साथ ही उसके पास विशेषज्ञता भी हो। इस आधार पर कहा जा सकता है कि ज्ञान की दुनिया में सबको सबकी जरूरत होती है किसी एक विषय में विशेषज्ञता के साथ। ज्ञान और शिक्षा की दुनिया में कोई विभाजन नहीं होता।

प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से साहित्य किस तरह से मददगार है?

दुनिया में प्राप्त किसी भी क्षेत्र का ज्ञान सभी तरह की परीक्षाओं में कहीं न कहीं मददगार होता है। सामान्य ज्ञान के प्रश्न पत्र में भी साहित्य के बारे में कुछ न कुछ पूछा जाता है । इससे ज्यादा कुछ परीक्षाओं में यह विषय इन्टरव्यू में मदद करता है। दूसरे साहित्य पठन का असर भाषा के माध्यम से परीक्षार्थी के अभिव्यक्ति कौशल पर होता है। निबंध जैसे प्रश्न पत्र में निबंध लेखन की कला साहित्य के माध्यम से सीखी जा सकती है। साहित्य से जीवन के प्रति समग्र दृष्टिकोण का विकास होता है जो पाठक को इतिहास,  दर्शन, समाजशास्त्र आदि विषयों की जानकारी भी देता है। कुल मिलाकर बात यह है कि साहित्य पढ़ने वाला कभी नुकसान में नहीं रहता,  उसका जीवन के प्रति आत्मविश्वास बढ़ता है और वह विभिन्न चरित्रों के बीच स्वयं की स्थिति का आकलन आसानी से कर सकता है। लेकिन. आज ज्ञान क्षेत्रों में विशेषीकरण इस हद तक बढ़ गया है कि उसने व्यक्ति को समाज से अलग करके एकांगी और आत्मकेन्द्रित बना दिया है। ज्ञान के क्षेत्रों में बढ़ते विशेषीकरण ने मानव जीवन का रूप ही बिगाड़ दिया है। यह विशेषीकरण एक अच्छे भले इंसान को अपाहिज बना रहा है। इससे व्यक्ति की रचनात्मक भूमिका कमजोर होती जा रही है और वह ज्यादा से ज्यादा एय्याश तथा सामन्ती स्वभाव जैसा बनता जा रहा है। यही कारण है कि आज आसपास हमें सच्चे और सम्पूर्ण ढंग से शिक्षित लोग नहीं मिलते। शिक्षा के नाम पर आधे-अधूरे और अपाहिज लोग ज्यादा नजर आते हैं।

इसी वजह से हमारे यहाँ शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की सारी प्रणाली एकांगी एवं विशेषीकृत होने को अभिशप्त है।

प्रसिद्ध कथाकार मोपांसा ने अपने समय के अनुभव के आधार पर कभी कहा था कि आदमी हमेशा अकेला होता है और उसका सर्वोत्तम मित्र भी उसके लिए एक पहेली होता है। दरअसल, यह पहेली बनती है उस निजी पूँजी की व्यवस्था से, जो आदमी के ज्ञान को विशेषीकृत करते हुए उसे उसके सच्चे और वास्तविक जीवन से अलग करती जाती है।

प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्न भी आज विशेषीकृत ज्ञान से ज्यादा जोड़ दिए गये हैं। इससे समाज के भीतर ज्ञानात्मक विभाजन और विशेषीकरण की प्रक्रिया तेज हुई है। इस वजह से भी आज के लोग अपने आज के साहित्य से दूर होते जा रहे हैं।

साहित्य की इस महत्वपूर्ण भूमिका को आज बिलकुल नजरंदाज किया जा रहा है। पब्लिक स्कूलों में तो हाईस्कूल के बाद साहित्य और मानविकी विषय पढा़ए ही नहीं जा रहे हैं। उच्च शिक्षा में भी केवल वही विद्यार्थी इन्हें पढ़ रहे हैं, जो विज्ञान और गणित जैसे विषयों को पढ़ने में अक्षम पाते हैं। मेरा तो मानना है कि विज्ञान वर्ग के हर विद्यार्थी के लिए साहित्य पढ़ना अनिवार्य होना चाहिए। आप क्या कहेंगे?

आपका मानना सही है। साथ ही साहित्य पढ़ने वालों को भी विज्ञान का सामान्य ज्ञान उतना ही आवश्यक है, जितना विज्ञान पढ़ने वालों को साहित्य का। ज्ञान की यात्रा कभी इकतरफा नहीं होती। सामान्य ज्ञान सभी को सबका और विशेष ज्ञान किसी एक क्षेत्र का। जीवन समग्र है और विशेष भी। मानव भावनाओं की जानकारी विज्ञान से नहीं हो पाती इसलिए साहित्य की जरूरत होती है। और दुनिया गतिशील कैसे रहती है, इसकी वस्तुस्थिति का पता विज्ञान से चलता है और ऐसी अनेक तरह का अदृश्य सचाइयों का भी, जो विज्ञान के बिना संभव ही नहीं थी। ज्ञान कभी इकहरा और सपाट नहीं होता। आदमी ने अपनी हजारों सालों की जीवन यात्रा में बहुत कुछ अपने अनुभवों से जाना है और उसे ही ज्ञान में परिवर्तित किया गया है। इसका उपयोग हर कोई अपने जीवन में करता है। पब्लिक स्कूल नामधारी प्राइवेट स्कूल अपना धंधा करने के लिए हैं, समाज को शिक्षित करने के लिए नहीं। उनके यहां वही माल तैयार किया जाता है, जो बाजार में बिकता है। साहित्य और मानविकी जिस रोज बाजार में बिकने लग जाएंगी, ये स्कूल उनको पढ़ाने लगेंगे। जनशिक्षा का असली काम कभी बाजार नहीं कर सकता। यह काम तो उन स्कूलों को करना होगा, जो जनशिक्षण की भूमिका में हैं। दरअसल, हमारे देश में युवकों और अभिभावकों पर एक ही दबाव है, रोजगार हासिल करने का। साहित्य और मानविकी बाजार और रोजगार के मामले में छोटी सी भूमिका में हैं। इस वजह से ऐसा हुआ है। दूसरी बात यह भी है कि पिछले बीस-पच्चीस सालों में विज्ञान और तकनीक की भूमिका बहुत अग्रणी और जरूरी हो गई है। हमारी सारी शिक्षा व्यवस्था सीधे रोजगार पाने का जरिया है इसलिए ऐसा हुआ है। सरकारें तो वही काम करने लगती हैं जो जनता की जरूरत बन जाता है। उनको वास्तविक जन-शिक्षण से ज्यादा लेना-देना नहीं होता। वास्तविक शिक्षा बहुत अलग बात है। वह पूँजी की शिक्षा से बहुत भिन्न होती है।

यह काम समाज के जागरूक और संवेदनशील लोगों को स्वयं आगे आकर और अपना सब कुछ दाव पर लगाकर करना पडे़गा। ऐसे स्कूल चलाने पडे़गे जो समाज को सम्पूर्ण मुक्ति की ओर ले जाएं। जो रोजगार देने के साथ समाज का शिक्षण मानवता के विश्व मानदंडों के आधार पर करें। तब ही इस समस्या का कोई हल निकल सकता है। सरकारी स्कूलों से यह काम तभी किया जा सकता है, जब शिक्षकों का दृष्टिकोण समग्रता वाला हो और जीवन के प्रति उनकी दृष्टि आधुनिक एवं वैज्ञानिक हो। शिक्षा में एक अलग तरह के राष्ट्रीय अभियान से ऐसा संभव किया जा सकता है। एक अलग तरह की स्कूली शिक्षा व्यवस्था चलाकर।

पढ़ने की आदत को आंदोलन बनाने की जरूरत : महेश पुनेठा

 

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हमारे समाज में आप पढ़ने की स्थिति का अनुमान इसी बात से लगा सकते हैं कि आपके आस-पड़ोस और जानने-पहचानने वाले लोगों में से कितने लोग ऐसे हैं, जिनके घर में किताबों का एक  शेल्फ है? ऐसे लोगों के नाम लेने के लिए आपको अपनी याददाश्त पर अतिरिक्त जोर देना पड़ेगा। उसके बाद भी आपको ऐसे लोग अंगुलियों में गिने जाने लायक मिलेंगे। उनमें से भी अधिकांश ऐसे होंगे, जिनके शेल्फ में पुस्तकों के नाम पर आपको केवल पाठ्य पुस्तकें, प्रतियोगिता पुस्तकें या धार्मिक पुस्तकें ही मिलेंगी। ‘शैक्षिक दखल’ ने हिंदी समाज में पढ़ने की स्थिति का आकलन करने के लिए पिछले दिनों एक अध्ययन किया तो पाया कि एक हजार पढ़े-लिखे लोगों में से पचास लोग भी ऐसे नहीं हैं, जिनके भीतर स्वाध्याय की प्रवृत्ति हो। इसका पता इस बात से चलता है कि महानगरों और जिला मुख्यालयों को छोड़ छोटे शहरों में सार्वजनिक पुस्तकालयों का नितांत अभाव है। आधे से भी कम स्कूल हैं, जहां पुस्तकालय या वाचनालय हैं। इनमें से भी लगभग 25 प्रतिशत स्कूल ही हैं, जहां नियमित रूप से पुस्तकों का लेन-देन होता है। ये पुस्तकें भी अधिकांशतः पाठ्यक्रम से या प्रतियोगिता परीक्षाओं से जुडी हुई रहती हैं। ऐसे पुस्तकालय कम हैं, जहां से बच्चे अपनी मन-पसंद किताबें लेकर पढ़ सकें। निजी पुस्तकालयों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। पढने-लिखने की प्रवृत्ति रखने वालों में से भी केवल पचास प्रतिशत लोगों के घरों में ही निजी पुस्तकालय हैं। स्वाध्याय की प्रवृति रखने वाले अधिकांश लोग अध्ययन, अध्यापन और लेखन के क्षेत्र से ही जुड़े हैं। इससे बाहर के दो प्रतिशत लोग भी नहीं हैं।

जब न पर्याप्त संख्या में सार्वजनिक पुस्तकालय हों, न स्कूलों में पुस्तकालय और न निजी पुस्तकालय, ऐसे में भला पढ़ने की संस्कृति कैसे विकसित हो सकती है? चारों ओर नकारात्मक माहौल है। पढ़ना या तो परीक्षा पास करने या रोजगार प्राप्त करने या फिर समय व्यतीत करने तक सीमित होकर रह गया है। कुछ नया जानने-समझने और उसको बदलने, विश्‍वदृष्‍टि‍ और संवेदनशीलता को विस्तार देने के लिए पढ़ने वालों की संख्या कम ही देखी जाती है। लेखन और अध्यापन जैसे क्षेत्रों से जुड़े हुए लोगों में भी बहुत कम हैं, जो पढ़ने से संबंध रखते हैं। वे भी बिना पढ़े ही काम चला ले जाते हैं। पढ़ने के लिए किसी के पास समय न होने का बहाना है, तो किसी के पास संसाधनों के अभाव का। जबकि एक चेतनाशील समाज अर्थात ऐसा समाज जो सही-गलत का निर्णय सोच-समझ कर ले सके, बनाना है तो पढ़ने का संस्कार डालना जरूरी है। आहार-निद्रा की तरह पढ़ने को जरूरी कर्म बनाना। इसकी शुरुआत बचपन से करने की जरूरत है। बचपन में यदि पढ़ने की आदत लग गयी तो समझिए वह जीवनभर नहीं जाती। इसके लिए घर में माता-पिता को भी पढ़ने को अपनी दिनचर्या में शामिल करना होगा।

पढ़ने की आदत विकसित करने की दिशा में हिंदी समाज में कोई बहुत बड़ा आंदोलन तो नहीं दिखाई देता है, पर छोटे-छोटे कुछ प्रयास अवश्‍य जारी हैं। भले ही ये मरुद्यानों की तरह हैं। लेकिन इन प्रयासों से कुछ राह निकलती सी दिखती है। पता चलता है कि बेहतर समाज बनाने की चाह हो तो शुरुआत कहीं से भी की जा सकती है। उदाहरणस्वरूप मध्यप्रदेश के युवा कवि मोहन कुमार नागर की इस पहल को ही देखा जा सकता है। मोहन पेशे से डॉक्टर हैं, लेकिन उन्हें पढ़ने-पढ़ाने का शौक है तो उन्होंने अपने अस्पताल की गैलरी को ही वाचनालय में बदल दिया है। उनके पास जो भी पत्र-पत्रिकाएं और किताबें आती हैं, उन्हें वह अपने अस्पताल की गैलरी में रख देते हैं। जहां से वहां आने वाले जो भी चाहें किताबें उठाकर पढ़ सकते हैं। मोहन को इस बात की कसक है कि किताबें जरा कम हैं, लेकिन जब करीब सात-आठ लाख की आबादी वाले शहर में एक भी पुस्तकालय न हो और न साहित्यिक माहौल तब उनकी यह छोटी-सी पहल भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। इसी तरह गुरिया-बौंसी, बांका, बिहार में राजेश झा हैं जिन्होंने अपने पुश्तैनी घर के एक तल को पुस्तकालय में तब्दील कर दिया है। 300 पुस्तकें हैं, 27 बच्चे नियमित और कुल 50 बच्चे अनियमित रूप से उसमें शाम 5 से 8 बजे तक पढ़ाई करते हैं। ऐसे प्रयासों के लिए दृढ-संकल्प और गहरे सरोकारों की आवश्यकता होती है, जैसा हमें उत्तराखंड के सीमांत जिले बागेश्वर के शिक्षा अधिकारी आकाश सारस्वत में दिखाई देती है। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत रुचि के चलते जिले के अनेक सरकारी स्कूलों में पुस्तकालयों को काफी समृद्ध कर दिया है। इसके लिए उन्होंने क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों का सहयोग लिया। अपने क्षेत्र के विधायकों और पंचायत प्रतिनिधियों को विद्यालयों को पुस्तकालय हेतु धनराशि‍ देने के लिए प्रेरित किया। उनके प्रयासों से जनप्रतिनिधियों ने अनेक विद्यालयों को धनराशि‍ प्रदान की। उनका संकल्प है कि जिले के प्रत्येक सरकारी स्कूल में एक समृद्ध पुस्तकालय हो और नियमित रूप से उसका संचालन हो। वह स्कूल प्रशासन को भी इस बात के लिए प्रेरित करते हैं। नयी-नयी पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं से बच्चों और शिक्षकों को परिचित कराते हैं। स्वयं अच्छा साहित्य उन तक पहुंचाते हैं। यहां यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि यदि शिक्षा से जुड़े अधिकारी इस तरह पुस्तकालयों के संचालन के प्रति गंभीर हो जायें तो समाज का परिदृश्य बदलने में देर नहीं लगेगी।

साहित्य को आम पाठकों तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध लोगों ने अपने-अपने तरीके निकाले हैं। देहरादून में साहित्यकार शशि‍भूषण बडोनी रहते हैं। वह देशभर से निकलने वाली छोटी-बड़ी तमाम पत्रिकाएं अपने पढ़ने के लिए मंगाते हैं और खुद पढ़ने के बाद अपने परिचितों को दे देते हैं। न केवल आसपास के परिचितों को बल्कि दूर-दूर तक डाक द्वारा भेजते हैं। हिमाचल प्रदेश के सुंदरगांव में रहने वाले हिंदी के चर्चित कवि सुरेश सेन निशांत विभिन्न लघु पत्रिकाओं को झोले में डालकर सुधी पाठकों तक पहुंचाने का कार्य वर्षों से करते आ रहे हैं। बांदा में यही कार्य प्रमोद दीक्षित भी कर रहे हैं। शि‍क्षा में नवाचारों को आगे बढ़ाने और पढ़ने के लिए प्रेरित करने के लिए उन्होंने शि‍क्षक मित्रों के साथ मिलकर ‘शैक्षिक संवाद मंच’ का गठन किया है। प्रमोद जी देशभर से शि‍क्षा संबंधी साहित्य मंगाकर उसे वितरित करते हैं और उस पर चर्चा आयोजित करवाते हैं। गाजियाबाद के अनुराग ‘लेखक मंच प्रकाशन’ के माध्यम से सस्ती पुस्तकें प्रकाशि‍त कर इस तरह के प्रयासों को अपने तरीके से बल प्रदान कर रहे हैं। उनकी हमेशा कोशि‍श रहती है कि बच्चों के बीच कुछ ऐसी गतिविधियों का आयोजन किया जाय जिससे उनके भीतर पढ़ने-लिखने के प्रति रुचि पैदा हो। व्यक्तिगत स्तर पर और भी इस तरह के प्रयास हो रहे होंगे, जिसकी जानकारी अभी इन पंक्तियों के लेखक को नहीं है।

एकलव्य, रूम टू रीड, ए.पी.एफ. जैसे कुछ गैर सरकारी संस्थाओं की पहल कदमी को छोड़ दें तो इस दिशा में सामूहिक रूप से भी कुछ प्रयास हो रहे हैं, जिनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये किसी सरकारी या बड़ी संस्था से प्राप्त आर्थिक सहायता से न होकर कुछ लोगों या समुदाय के सहयोग से संचालित हैं। इसी तरह के प्रयास हैं जो किसी आंदोलन को जन्म दे सकते हैं। जैसे उत्तराखंड के रुद्रपुर शहर में एक साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘क्रिएटिव उत्तराखण्ड’ नाम से सक्रिय है। इस संस्था ने शहर के बीच स्थित एक सरकारी प्राथमिक स्कूल के बेकार पड़े कमरों को शहर के समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों की मदद से बेहतरीन पुस्तकालय में बदल दिया। अब स्कूल के समय पर इस स्कूल के बच्चे और शाम को शहर के अन्य लोग इसका लाभ उठा रहे हैं। इसी तरह चमोली जनपद के सुदूर चोपता क्षेत्र के युवाओं ने मिलकर कड़ाकोट शिक्षा मंच का गठन कर पुस्तकालय और गतिविधि केन्द्र स्थापित किया है। अब तक जन सहयोग से इस केन्द्र में 1500 से अधिक किताबें, दैनिक हिन्दी और अंग्रेजी अखबारों के साथ ही कम्प्यूटर और एक प्रिं‍टर है। गांव के युवाओं ने मिलकर पुस्तकालय में कम्प्यूटर और किताबों को रखने के लिये फर्नीचर तैयार किया है। इसके पीछे ग्रामीणों की सोच है कि अगर हमें अपने बच्चों को खुशहाल भविष्य देना है तो हमें अपने गांव को और बेहतर करने के लिए लगातार काम करना होगा।

यह देखने में आया है कि पढ़ने की संस्कृति के विकास के लिए पुस्तकालय का होना ही पर्याप्त नहीं है। लोग पढ़ने के लिए प्रेरित हों और पुस्तकालय से जुड़ें इसके लिए कुछ गतिविधियों का होना भी जरूरी लगता है। इस दृष्‍टि‍ से कुछ प्रयासों का उल्लेख भी यहां करना चाहेंगे। कवि मित्र अजेय से पता चला कि लिखने-पढ़ने की गतिविधियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हिमाचल के कुल्लू में तकरीबन 10 सालों से एक समूह काम कर रहा है। ग्रुप का नाम है संवाद कुल्लू। पहले नवलेखन कार्यशाला के रूप में शुरू हुए इस ग्रुप ने अब हर उम्र के साहित्य प्रेमियों के दोतरफा संवाद का रूप ग्रहण कर लिया है। लगभग हर सप्ताह सदस्य मिलते हैं। किसी तय लेखक या किताब पर चर्चा होती है। लाइब्रेरी के कान्फ्रेंस हाल में ही सब लोग चर्चा करते हैं। हर तरह की रुचि और विचारधारा वाले लोग इस में सम्मिलित होते हैं। छात्रों और युवाओं को अपनी बात कहने के लिए प्रेरित किया जाता है।

पिथौरागढ़ जिले के बेरीनाग में डॉ. डी. डी. पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला भी इस दिशा में उल्लेखनीय प्रयास कर रही है। जहां विज्ञान के साथ-साथ साहित्य और अन्य चीजों पर बच्चों के लिए बेहतर वातावरण बनाने की कोशिश की जा रही है। विज्ञान की कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं। इसके अलावा अनेक साहित्यिक गतिविधियां जैसे दीवार पत्रिका का निर्माण, बच्चों में पढ़ने की रुचियां उत्पन्न करने के लिये उनको पत्रिकाएं देना, बच्चों के बीच बाल फिल्में दिखाना आदि, संचालि‍त होती हैं। इसी तरह का पिथौरागढ़ शहर में युवाओं का एक समूह है- आरंभ स्टडी सर्किल। इस समूह से जुड़े अधिकांश युवा स्थानीय डिग्री कालेज में अध्ययनरत हैं। नयी पीढ़ी में पढ़ने-लिखने की आदत विकसित करने की दिशा में पिछले तीन सालों से महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। ये न केवल स्वयं अध्ययन करते हैं, बल्कि दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करते हैं। हर शाम घूमने के लिए निकलते हैं तो इनके हाथ में कोई न कोई नयी किताब होती है, जिसका न केवल पाठ करते हैं बल्कि किसी स्थान पर बैठ चर्चा भी करते हैं। इतना ही नहीं इनके द्वारा पढ़ने के इच्छुक लोगों को पुस्तकें उपलब्ध करवाने हेतु एक बुक क्लब बनाया गया है। समूह के साथियों के पास उपलब्ध किताबों की सूची बनाकर सार्वजनिक स्थानों पर चिपकाई गयी हैं और उसमें संपर्क नंबर दिए गए हैं। इच्छुक व्यक्ति फोन से संपर्क करते हैं और उन्हें उनके बताए स्थान पर पुस्तक उपलब्ध करवा दी जाती है। दूसरे पुस्तकालयों से पुस्तकें लेकर भी समूह से जुड़े युवा अपने मुहल्ले के बच्चों को पढ़ने को देते हैं। यह अपने तरह का एकदम नया प्रयोग है। इस समूह द्वारा स्थानीय महाविद्यालय में ‘आरंभ’ नाम से एक दीवार पत्रिका का प्रकाशन भी किया जाता है। समय-समय पर गोष्ठियां भी आयोजित की जाती हैं। पिछले दिनों कविता पोस्टर बनाकर महाविद्यालय की दीवारों पर लगाए गए। साहित्य के प्रति नयी पीढ़ी में लगाव पैदा करने का उनका यह प्रयास अनूठा है। इस तरह के प्रयासों को संगठित करने और गति देने की आवश्यकता है। देशभर में हो रहे ऐसे और प्रयासों को भी चिह्नित करने और सामने लाने की जरूरत है। केवल पढ़ने की संस्कृति के अभाव का रोना-रोने से कुछ नहीं होगा। अपने दायरे से बाहर निकल कर कुछ करने की आवश्यकता है। हमारी सरकारें इस दिशा में कुछ ठोस करेंगी, ऐसी आशा करना भोलापन होगा। हमें खुद ही पहलकदमी लेनी होगी।

पढ़ने की जब बात आती है तो एक सवाल यह भी उठता है कि क्या पढ़ा जाये? पढ़ने के लिए हमारे चारों ओर इतनी सामग्री बिखरी पड़ी है कि यह तय करना जरूरी है। यह देखा जाता है कि हम अपना बहुत सारा समय ऐसा कुछ पढ़ने में गंवा देते हैं जो न हमारे व्यक्तित्व को समृ़द्ध करता है, न सूचना-जानकारी को और न ही विश्‍वदृष्‍टि‍ को व्यापक करता है। बस हम पढ़ते ही जाते हैं। इस तरह बहुत कुछ ऐसा छूट जाता है, जो जरूरी होता है। अतः हमें चयन करने की आवश्‍यकता पड़ती है। उपलब्ध समय और जरूरत के बीच सही तालमेल स्थापित करना पड़ता है। एक शि‍क्षक के रूप में हमें क्या पढ़ना चाहिए, इस पर विस्तार से लिखने की यहां पर गुंजाइश नहीं है, क्योंकि इतना सारा है कि उसे हम एक आलेख में नहीं समेट सकते हैं। लेकिन यहां पिछले दिनों वाग्देवी प्रकाशन बीकानेर द्वारा प्रकाशि‍त वरिष्‍ठ शि‍क्षाविद् शि‍वरतन थानवी की पुस्तक ‘भारत में सुकरात’ का उल्लेख अवश्‍य करना चाहेंगे। इस पुस्तक में लेखक द्वारा उन तमाम पत्र-पत्रिकाओं, लेखों, निबंधों और पुस्तकों का उल्लेख किया है जो एक शि‍क्षक के लिए उपयोगी हैं। साथ ही उनका पढ़ा जाना क्यों जरूरी है, उन कारणों को भी रेखांकित किया गया है। यह पुस्तक बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने के तरीकों के बारे में हमें बहुत कुछ सुझाती है। इस संदर्भ में उनका मानना है कि पाठ्येतर साहित्य का पढ़ना वस्तुतः प्रतिबंध नहीं, प्रोत्साहन का विषय होना चाहिए। जो मन में आए और जब मन में आए पढ़ने की स्वतंत्रता और साधन हम देते रह सकें तो बच्चे हल्की-फुल्की रहस्य-रूमान की सामग्री पढ़ते-पढ़ते चित्रकला, फोटोग्राफी और डाक टिकट संग्रह संबंधी लेख-स्तम्भ की पुस्तकें भी पढ़ने लग सकते हैं। पढ़ने के लिए वातावरण तभी सक्रिय होगा, जब यह मानें कि‍ बिना किसी वर्जना के बच्चे पाठ्यक्रमेतर पुस्तकें पढ़ने को स्वतंत्र हैं। शि‍वरतन थानवी जगह-जगह अपने जीवन के पढ़ने से जुड़े अनुभव बताते चलते हैं, जिससे पुस्तक रोचक, आत्मीय और विश्‍वसनीय हो गई है। इस पुस्तक में संकलित आलेख- झोले में पुस्तकालय-मास्टर मोतीलाल जी, पोथी का सुख, शि‍क्षक क्या पढ़े-क्यों पढ़ें, आपके बच्चे क्या पढ़ रहे हैं?, पढ़ने की आदतें :पाठ्यक्रमेतर पुस्तकें और बच्चे, किताब कैमरा है कि आंख आदि विशेष उपयोगी हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि यह किताब न केवल उन किताबों की जानकारी देती है, जो हमें पढ़नी चाहिए बल्कि पढ़ने के लिए भी प्रेरित करती है।

‘शैक्षिक दखल’ के इस अंक में हम पढ़ने की संस्कृति की स्थिति और कारणों की एक पड़ताल कर रहे हैं। इसका उद्देष्य उन तरीकों को जानना-समझना है, जो बच्चों में स्वाध्याय की आदत विकसित करते हैं, ताकि एक शि‍क्षक या अभिभावक के रूप में हम भी उन्हें अपना सकें। यह उस दिशा में एक छोटा-सा प्रयास है। हम चाहते हैं कि यह क्रम आगे बढ़े और पढ़ने की संस्कृति के विकास के लिए एक रचनात्मक आंदोलन उठ खड़ा हो।

(शैक्षि‍क दखल, वर्ष-6, अंक-9, जनवरी 2017 से साभार)

काव्योत्सव के बहाने सार्थक पहल

दीवार पत्रिका पर स्लाइड शो प्रस्तुोत करते महेश पुनेठा।

दीवार पत्रिका पर स्लाइड शो प्रस्तुोत करते महेश पुनेठा।

गंगोलीहाट: लोकतांत्रिक साहित्य मंच की ओर से 11 व 12 जून को ब्लाक संसाधन केन्द्र गंगोलीहाट के सभागार में दो दिवसीय ‘ काव्योत्सव’ संपन्न हुआ। इसमें कविता पोस्टर प्रदर्शनी, दीवार पत्रिका पर स्लाइड शो, काव्यगोष्‍ठी, प्रकृति भ्रमण तथा नागार्जुन के कृतित्व पर विचार गोष्‍ठी का आयोजन किया गया।

पहले दिन दीवार पत्रिका पर स्लाइड शो से कार्यक्रम की शुरूआत हुई। दीवार पत्रिका के सम्बन्ध में शि‍क्षक-कवि व आलोचक  महेश चंद्र पुनेठा ने इसके उद्देश्‍यों पर प्रकाश डालते हुए, विभिन्न विद्यालयों से आए हुए बच्चों, अभिभावकों, शि‍क्षकों व उपस्थित जन समूह को उपयोगी व्याख्यान दिया। दीवार पत्रिका के माध्यम से किस प्रकार बच्चों की रचनात्मक क्षमता का विकास होता है तथा वे विषय को आसानी से समझते हुए अपनी सम्पूर्ण भागीदारी का निर्वहन करते हैं, को देशभर में चल रहे दीवार पत्रिका निर्माण व उसके प्राप्त हो रहे सकारात्मक परिणाम के माध्यम से समझाया। उन्होंने स्वयं अपने विद्यालय में इसके माध्यम से प्राप्त परिणामों को साक्ष्य सहित छात्र-छात्राओं तथा अध्यापकों के सम्मुख प्रस्तुत किया तथा शि‍क्षकों से अपील की कि वे बच्चों में रचनात्मक शक्ति का विकास करने तथा उनकी कल्पना शक्ति को पंख देने के लिए व स्थाई ज्ञान को प्राप्त करने में सहज रूप से दीवार पत्रिका का उपयोग करें। इससे जहां एक ओर बच्चे अपने समय का सदुपयोग करेंगे, वहीं दूसरी ओर उनमें सीखने और समझने की जिज्ञासा निरन्तर बढ़ेगी। उन्होंने विभिन्न उदाहरणों के माध्मम से सीखने-सिखाने में इसकी उपयोगिता का सहज चित्रण किया। बीच-बीच में बच्चों के साथ पहेली, चुटकुले, बिंब निर्माण, षीर्शक चयन से संबंधित गतिविधियां करवाई गईं। एक अच्छी दीवार पत्रिका में क्या-क्या स्तम्भ होने चाहिए तथा उन्हें कैसे तैयार किया जा सकता है आदि के संबंध में स्लाइड शो के माध्यम से बताया। बच्चों को कुछ छोटी-छोटी फिल्में भी दिखाईं। इस स्लाइड शो तथा उस पर आधारित आकर्षक प्रस्तुतीकरण के बाद विद्यालयों से आए हुए छात्र-छात्राओं से विविध विधाओं पर मौलिक लेखन करवाया गया। यद्यपि प्रारंभ में बच्चों में कुछ झिझक देखी गई, परन्तु जैसे ही उन्होंने लिखना आरंभ किया, धीरे-धीरे उनका आत्मविश्‍वास बढ़ता गया और वे सहज रूप से लिखने लगे। इस कार्यशाला में बच्चों ने लेखन की बारीकियों को समझते हुए कई विधाओं पर स्वयं अपनी रचनाएं तैयार कीं।

इस अवसर पर कार्यक्रम स्थल में सुप्रसिद्ध चित्रकार कुंवर रवीन्द्र द्वारा बनाए गए देश के प्रतिष्ठित और युवा कवियों की कविताओं की पोस्टर प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। रेनेसां और कस्तूरबा आवासीय बालिका विद्यालय के विद्यार्थियों सहित स्थानीय शि‍क्षकों, आमंत्रित कवियों और साहित्य व कला प्रेमियों ने दशाईथल में आयोजित इस प्रदर्शनी का अवलोकन किया। इन कविता पोस्टरों का अवलोकन करते हुए भी बच्चों ने कविता की बारीकियों को समझा और शायद इसी का परिणाम था कि शाम को आयोजित कवि गोष्ठी में लगभग बीस छात्र-छात्राओं ने अपनी मौलिक कविताओं का मंच पर पाठ किया। गंगोलीहाट जैसी छोटी जगहों पर इस तरह की प्रदर्शनी का आयोजन होना बड़ी बात है। इससे बच्चों में कला और साहित्य के प्रति रूझान बढ़ता है। बच्चों में चित्रों को पढ़ने की क्षमता का विकास होता है। कविता की समझ पैदा होती है। लगभग चार दर्जन पोस्टरों का प्रदर्शन किया गया, जिनमें हिंदी के प्रतिष्ठित कवियों की कविताएं थीं। जिन कवियों की कविताओं के पोस्टर लगाए गए उनमें प्रमुख थे- शील, रघुवीर सहाय, मानबहादुर सिंह, नागार्जुन, मुक्तिबोध, केदारनाथ सिंह, ओमप्रकाश बाल्मीकि, नरेश सक्सेना, केशव तिवारी, शि‍रीष कुमार मौर्य, अनुज लुगुन, नवनीत पांडे, बुद्धिलाल पाल, महेश चंद्र पुनेठा, अविनाश मिश्र, रेखा चमोली।

उल्लेखनीय है कि कुंवर रवीन्द्र अब तक लगभग अठारह हजार से अधिक चित्र और कविता पोस्टर बना चुके हैं। देश के लगभग दो सौ छोटे-बड़े शहरों में उनके चित्रों की प्रदर्शनी लग चुकी है। गत वर्ष पिथौरागढ़ में आयोजित पहले लोक विमर्श कार्यक्रम में इन चित्र और पोस्टरों की प्रदर्शनी लगी थी, जिसमें देशभर से लगभग दो दर्जन साहित्यकार उपस्थित रहे।

सायं सात बजे से ब्लाक संसाधन केन्द्र के सभागार में कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें कुमाऊंभर से आए हुए प्रतिष्ठित कवियों ने काव्य पाठ किया। साथ ही बीच-बीच में देश-विदेश के प्रतिष्ठित कवियों का काव्य पाठ उनके स्वयं के स्वर या किसी दूसरे के स्वर में प्रोजेक्टर के माध्यम से किया गया। इन कवियों में मंगलेश डबराल, नरेश सक्सेना, पाश, नाजिम हिकमत, ओमप्रकाश बाल्मीकि, अनामिका, मुक्तिबोध आदि प्रमुख थे। कवि सम्मेलन में कस्तूरबा बालिका आवासीय विद्यालय से आए लगभग दो-दर्जन छात्राओं द्वारा भी स्वरचित कविताओं का वाचन किया, जिसे काफी सराहा गया। कुमाऊंनी कवि जनार्दन उप्रेती की अध्यक्षता में आयोजित इस काव्य संगोष्ठी के मुख्य अतिथि राजकीय इण्टर कालेज दशाईथल के प्रधानाचार्य किशोर कुमार पन्त रहे। काव्‍य संगोष्‍ठी का संयोजक युवा साहित्यकार रमेश जोशी ने कि‍या।

अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों पर कवियों ने अपनी कलम की पैनी धार चलाते हुए समाज को सकारात्मक दिशा की ओर ले जाने का आह्वान किया। सम सामयिक विषयों के साथ-साथ ऐसे विषयों को इन्होंने अपनी कविताओं में स्थान दिया, जहां पर सामान्य व्यक्ति की निगाह नहीं जाती है। सभी प्रतिष्ठित कविगणों द्वारा अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में मौजूद विसंगतियों-विडंबनाओं पर करारी चोट की गई तथा एक लोकतांत्रिक और शोषणमुक्त समाज बनाने का स्वप्न पेश किया। देर रात्रि तक चले इस कवि सम्मेलन में अल्मोड़ा से आये चर्चित कुमाऊंनी कवि शंकर दत्त जोशी, युवा कवि-आलोचक  महेश पुनेठा, रमेश चन्द्र जोशी, कुमाऊंनी कवि प्रकाश चन्द्र जोशी,  विनोद उप्रेती, राजेश पन्त, डा. मोहन आर्य, आशा सौन, विक्रम नेगी, नवीन विश्‍वकर्मा, ‘बाखली’ के संपादक गिरीश पाण्डे ‘प्रतीक’ दिनेश पाण्डे, कवि-रंगकर्मी जनार्दन उप्रेती, किशोर कुमार पन्त आदि ने अपनी कविताओं का पाठ किया। इस कवि गोष्ठी में विद्या प्रसाद भट्ट, रवि पुनेठा, नवीन चन्द्र पन्त,  कमलेश पन्त,  राजेन्द्र खाती,  सुनील उप्रेती,  संदीप जोशी, हरीश पण्डा, मनोज वर्मा, श्री दिनेश पाण्डे, डा. ज्योति निवास पन्त, कुमारी रेणू साह, दीपक पन्त और पिथौरागढ़ से आए ‘आरम्भ’ समूह के युवा साथी रोहित बि‍ष्‍ट, आयुष जोशी, महेन्द्र रावत, अभि‍षेक पुनेठा सहित दो दर्जन से अधिक साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।

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दूसरे दिन की शुरूआत पाताल भुवनेश्‍वर गुफा के भ्रमण से हुई। देवदार के जंगलों के बीच अवस्थित यह गुफा लगभग डेढ़ सौ मीटर लंबी है। यह पौराणिक गुफा है, जिसका वर्णन स्कंदपुराण के मानसखंड में भी है। वहां से लौटकर  बाबा नागार्जुन के कृतित्व पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन हुआ। वक्ताओं का कहना था कि बाबा नागार्जुन जनता के कवि हैं। उनकी कविताएं सीधे जनता से संवाद करती हैं। उनके जीवन और भाषा दोनों को अपनी कविताओं का अंग बनाते हैं। क्रियाशील जीवन से कथ्य और रूप का चुनाव करते हैं। नागार्जुन जीवनभर उन्हीं के पक्ष में लिखते रहे और जनविरोधी सत्ता का प्रतिपक्ष रचते रहे। यह प्रतिपक्ष केवल कविता तक ही सीमित नहीं था, बल्कि जीवन में भी दिखता था। जनआंदोलनों में भाग लेना और जेल जाना इस बात का उदाहरण है। नागार्जुन न केवल जनता के कष्‍टों और संघर्षों को चित्रित करते हैं, बल्कि उनसे मुक्ति का रास्ता भी बताते हैं। सामूहिकता पर उनका गहरा विश्‍वास रहा। अपने लोक और जनपद से गहरे तक सपृक्त रहे। इस सबके चलते वह जनकवि कहलाए।

‘नागार्जुन का व्यक्तित्व और कृतित्व’ विषयक गोष्‍ठी की अध्यक्षता करते हुए युवा साहित्यकार रमेश जोशी ने कहा कि नागार्जुन एक ऐसे कवि थे, जो आजीवन समाज में बदलाव के लिए लिखते रहे और सत्य के पक्ष में खड़े रहे। उन्होंने अपने जीवन में जो भी कविताएं लिखीं, पहले वे उससे होकर गुजरे। उनकी समदृष्टि ही उन्हें समकालीन साहित्यकारों से पृथक बनाती है। उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों, घटित हो रहे अत्याचारों आदि पर अपनी कलम चलाई और इसके लिए जो भी दोषी हो, उसे कटघरे में खड़ा किया। चाहे वो कितना ही प्रभावशाली ही क्यों न हो। जन सामान्य की भलाई के लिए आजीवन सत्ता से उन्होंने संघर्ष किया। उन्हें समाज में वो सब दिखता था, जो कि औरों की नजरों में नहीं होता था। उन्होंने कवियों से अपील करते हुए कहा कि आज साहित्यिक क्षेत्र के लोगों को लिखने के लिए बाबा नागार्जुन को पहले पढ़ना होगा। विशेषतया कवियों को ध्यान देना होगा कि वे जिस प्रकार का साहित्य सृजन कर रहे हैं, उसे जि‍ए भी। कविता को जीना बहुत जरूरी है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तो इसका और भी महत्व हो जाता है, जबकि महत्वाकांक्षाएं चरम पर हैं। ऐसी स्थिति में कोरे आदर्शों का कोई महत्व नहीं होगा। अतः हम सभी साहित्य बिरादरी के लोगों को चाहिए कि समाज की आवश्‍यकताओं के अनुरूप लिखा जाए और उसे जिया जाना भी जरूरी है। बाबा नागार्जुन चूंकि जनकवि थे, उनके आदर्शों पर चलकर ही हम वास्तविक साहित्य साधना करते हुए समाज हित में कुछ सकते हैं।

बतौर मुख्य अतिथि पशु चिकित्सक व युवा कवि डॉ. मोहन आर्या ने नागार्जुन की चर्चित कविता ‘हरिजन गाथा’ का संदर्भ देते हुए कहा कि भले इस कविता की कुछ सीमाएं हैं, बावजूद इसके यह दलित जीवन और प्रतिरोध की एक बड़ी कविता है। उनके समकालीनों ने कभी इस तरह के वि‍षय नहीं उठाए। उन्होंने आगे कहा कि आज आवश्‍यकता है कि हम बाबा नागार्जुन को समझें। इसके लिए जरूरी है कि पहले हम उनके साहित्य का अध्ययन करें। जिन परिस्थितियों व देशकाल में उनके द्वारा लिखा गया, इसे भी ध्यान में रखना होगा। इससे पूर्व युवा कवि विक्रम नेगी ने नागार्जुन की कविता ‘बाकी बच गया अंडा’ का पाठ किया। शि‍क्षक-कवि राजेश पंत ने नागार्जुन की काव्य-प्रतिभा पर बोलते हुए उनकी ‘अकाल और उसके बाद’ तथा ‘देवदार’ कविताओं को प्रस्तुत किया। उन्होंने भी इस बात पर बल दिया कि कवियों के लिए उनका साहित्य पढ़ना ही नहीं, बल्कि उनकी परम्परा को आगे बढ़ाना भी जरूरी है। ‘आरम्भ’ समूह की ओर से अभिषेक पुनेठा, रोहित बिष्‍ट, महेंद्र रावत, आयुष जोशी ने संयुक्त रूप से नागार्जुन की प्रदीर्घ कविता ‘हरिजन गाथा’ की नाट्य प्रस्तुति दी। युवा कवि-छायाकार विनोद उप्रेती ने नागार्जुन की कविताओं का पाठ करते हुए कहा कि हमें नागार्जुन के जीवन-मूल्यों को अपने में उतारकर कविता लिखनी होगी। तभी सही अर्थों में हम उनकी परम्परा को आगे बढ़ा पाएंगे। अल्मोड़ा से आए कुमाऊंनी कवि शंकर दत्त जोशी ने नागार्जुन को समर्पित अपनी ‘आरक्षण’ कविता सुनाई। महेश चंद्र पुनेठा ने नागार्जुन के जनकवि कहलाने के कारणों पर अपना आलेख पढ़ा। उन्होंने कहा कि नागार्जुन की कविताएं जनता के यथार्थबोध को जाग्रत कर उसकी चेतना का विस्तार करते हुए जनता के मुक्ति संघर्ष को शक्ति और दिशा देती हैं। अपने समय और समाज की जनता की इच्छाओं, भावनाओं, जीवन उद्देश्‍यों और संघर्षों को अभिव्यक्त करने के कारण ही नागार्जुन की कविताएं लोकप्रिय हैं और इन्हें जनकवि होने का सम्मान प्राप्त है। उन्होंने रेखांकित किया कि नागार्जुन की लोकप्रियता का सबसे पहला कारण उनकी सहजता ही है। उनके पास जटिल से जटिल बातों को भी बड़ी सहजता से कविता में व्यक्त करने का कौशल है। दूसरा कारण उन्होंने कविता को पहले अपने जीवन में रचा फिर कागज पर। तीसरा कारण उनकी लोकपरकता रही। वह लोक और जनपद के बहुत नजदीक रहे, वहीं से कथ्य और रूप ग्रहण किया। क्रियाशील जन से ही भाषा सीखी। चौथा कारण- बाबा में सामूहिकता की भावना गहरे तक पैठी हुई थी। समूह में रहना और सामूहिक संघर्ष करना उनकी फितरत में शामिल रहा। उन्होंने जहां भी दमन-शोषण-उत्पीड़न तथा जीवन का अपमान देखा, अपनी रचना से उसका प्रतिरोध किया। पांचवा कारण- प्रकृति से उनकी निकटता है। उनकी कविताओं में प्रकृति के विविध रूप-रंग देखे जा सकते हैं। इनमें जीवन का सौंदर्य और जीवन का संघर्ष दोनों ही व्यक्त होते हैं। वरिष्‍ठ कवि-रंगकर्मी जनार्दन उप्रेती, जनकवि प्रकाश चंद्र जोशी ‘शूल’, युवा कवयित्री आशा सौन आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर ज्योति निवास पंत, दीप पंत, जोगा राम आदि साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। विचार गोष्‍ठी  का सफल संचालन युवा कवि और ‘बाखली’ के संपादक गिरीश चंद्र पाण्डेय ‘प्रतीक’ ने किया।

प्रस्तुति – रमेश चन्द्र जोशी

विषयों की नवीनता और विविधता के कवि : महेश चंद्र पुनेठा

कवि संतोष कुमार चतुर्वेदी

कवि संतोष चतुर्वेदी

समकालीन कविता में युवा कवि संतोष चतुर्वेदी का नाम एक चिर-परिचित नाम है। पिछले दो दशक से वह कविता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक उनके दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं- ‘पहली बार’ और ‘दक्खिन का भी अपना पूरब होता है’। पहले संग्रह की कविताएं जहां मध्यवर्गीय जीवन के इर्द-गिर्द बुनी गई हैं। वहीं दूसरे संग्रह के आते-आते कवि लोक के नजदीक गया है । यह उनकी कविता का विकास और कवि लोकोन्मुखीकरण है। कवि जो कुछ अनुभव करता है, उसे अपने कवित्त विवेक की कसौटी पर कसता है और सहज रूप में व्यक्त करता है। कवि ने लोक के रूप-रंग-गंध-स्वर से कविता का कथ्य और रूप गढ़ा है। लोक की भाषा को कविता की भाषा बनाया है। उन चरित्रों और घटनाओं को कविताओं की अंतर्वस्तु बनाया है, जो हमेशा से उपेक्षा के शिकार रहे हैं, जो बेनाम-बेरंग हैं, लेकिन अपने वजूद को बनाए हुए हैं। उपेक्षित वर्णों और शब्दों तक को उन्होंने नए अर्थ प्रदान किए हैं। उन शब्दों और वर्णों को जो अपने शब्दकोश या वर्णमाला की दुनिया में नहीं अटाते, उन्हें अपनी कविता में पूरे सम्मान के साथ ले आए हैं। जीवन-जगत में उपस्थित हर छोटी से छोटी चीज उनकी कविता में पूरा सम्मान पाती है। एक कविता में वह कहते हैं- ‘सुई की नोक जैसी काया भी/हो सकती है अहम।’ वह पूछते हैं- बनाया जा सकता है क्या कोई भविष्य/उपेक्षित रख कर अपना समय।’ हर एक दिशा, हर एक अक्षर, हर एक अंक, हर एक सेकंड का उनके लिए बहुत महत्व है। जीवन का ‘हाशिया’ उनके आंखों से कभी ओझल नहीं होता है। यह उनकी कविता की ताकत भी है। वह मानते हैं कि हमारे कामयाब होने में हाशिए की हमेशा से अहम् भूमिका रही है। आज मनुष्य सभ्यता की जिस मुकाम पर पहुंचा है, उसमें पांवों की भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका है, जितनी सिर की। समाज के ऊँचे तबके चाहे उनकी कितनी ही उपेक्षा करें या उनके खिलाफ षड्यंत्र करें, उनके बिना एक कदम आगे नहीं बढ़ सकते हैं- कि जब तक पाँव तभी तक जीवन/बेपाँव रुक जाता है तन/बेपाँव थम जाता है जीवन/और मन भी रूँआसा हो जाता है/बेपाँव हो कर।(दक्खिन का भी पूरब होता है) संतोष केवल दीवारों और छतों को महत्व देने वाले कवि नहीं हैं, बल्कि खिड़कियों और दरवाजों को भी बराबर महत्व देते हैं। वह जानते हैं कि इनके बिना नहीं बन सकता है कोई भी मुकम्मिल स्वर। वह इस हाशिए की ताकत को पहचानते हैं इसीलिए वह अपनी कविताओं में भीमकाय जहाज के बरक्स एक महीन सुराख और सूरज-चांद के बरक्स एक दीए को रख देते हैं।

लौकिकता पर उनका गहरा विश्वास है। संतोष की नजर में इस जमीन पर कुछ भी नहीं है अलौकिक। इसी लोक से वह अपने कविता के मतलब के खनिज-पत्थर निकाल लेते हैं और वहीं से शब्द लेते हैं। जीवन का खुरदुरापन उन्हें खूब भाता है क्योंकि उनका मानना है कि ‘टहनी पर जहाँ दिखती हैं खुरदुरी गाँठें/वहीं से फूटती हैं नयी राहें/वहीं से निकलती है नयी कईन।’ इसे वह बहुत उम्मीद से देखते हैं।

उनकी एक चर्चित कविता है- ‘मोछू नेटुआ’ जिसमें हम उनकी लोकधर्मिता को व्यापकता में देख सकते हैं। यह कविता संपधरवा पर लिखी गई है जिसमें सांप पकड़ने वालों के बहाने उन तमाम घुमक्कड़ जातियों का जो दर-बदर भटकने को मजबूर हैं, का कठिनाई भरा पूरा जीवन सामने चित्रित हो उठता है। यह अपने समय की हंसमुख दुनिया के उन तमाम उदास चेहरों की दास्तान है, जो अपनी उदासी के लिए जैसे हमेशा से अभिशप्त हैं,  जो तरह-तरह की तरकीबों से भी नहीं जुटा पा रहे हैं। दूसरे टैम का भोजन,जिनके बच्चे नहीं जान पाते बचपन का मतलब तथा जो जीवन जी नहीं, काट रहे हैं। यह एक बहुआयामी कविता है। इस कविता में पर्यावरण की लगातार हो रही क्षति, विकास के नाम पर हो रहे विस्थापन और मशीनीकरण के चलते परंपरागत पेशों पर मंडरा रहे खतरे की चिंता तो है ही, साथ ही मानवीय मूल्यों में आ रही गिरावट की चिंता भी व्यक्त हुई है। सांप पकड़ने वाले के मंत्र से कविता शुरू होती है और खत्म होती है बेजहर लोगों की तलाश और उनको बचाने की चिंता में ताकि अपने समय की एक सुखद तस्वीर बनाई जा सके। इससे कवि की संवेदना के विस्तार का पता चलता है। कविता में ऐंद्रिक बिंब बहुत तगड़े हैं। लगता है जैसे भरे गलमुच्छों वाला मोछू नेटुआ हमारे सामने उपस्थित हो गया हो। उसकी एक-एक बात और करतब को हम कविता में सुन और देख सकते हैं। पेट की खातिर वह कैसी-कैसी बाजीगरी दिखाने को विवश है, इस दर्द को मार्मिक ढंग से प्रतिबिंबित किया गया है। देखिए न मोछू नेटुआ जिस दिन कोई सांप पकड़ता है उस दिन-‘बहुत दिनों के बाद/उसका पूरा घर जी भर खाता-पीता-सोता’ है। छोटे-छोटे काम करने वालों के प्रति खाते-पीते लोगों के नजरिए और उनकी आशंकाओं को भी इस कविता में व्यंजित किया गया है। संतोष पाठक को संपधरवाओं के इतिहास से ही नहीं परिचित कराते हैं, बल्कि औपनिवेशिक शासन द्वारा तमाम घुमन्तू जातियों को अपराधी घोषित किए जाने से उनके साथ सदियों से होने वाले अमानवीय व्यवहार और इस वर्ग में पैदा हुई चेतना और आक्रोश को भी रेखांकित करते हैं। लेकिन कविता में कहीं-कहीं पर मोछू नेटुआ की बातें जबरदस्ती उसके मुंह में ठूंसी सी भी लगती हैं। इससे बचा जा सकता था। इस कविता में  कवि का इतिहासबोध और मौजूदा राजनीति के प्रति उनका गहरा आक्रोश भी दिखाई देता है। आज के नेता और अधिकारियों पर कविता में तीखी टिप्पणी हैं-दरअसल असली विषधर हैं ये समाज के/अमिट कलंक हैं ये हमारे आज के/जिन्हें बाहर नहीं निकाल पा रहा कोई तंत्र-मंत्र।’ साथ ही विकल्प की ओर भी संकेत है- ‘अब तो खोजना पड़ेगा हमीं लोगों को/इनसे निपटने के लिए/जमाने के मुताबिक कोई नया ब्रह्मास्त्र।’ यह कविता आमआदमी के पक्ष में खड़ी कविता है। संतोष की छवि एक जनपक्षधर कवि की है, उनकी यह पक्षधरता हमें ‘खाट बीनने वाले’, ‘ओलार’ आदि कविताओं में भी दिखाई देती है। उनकी कविताओं में ’रोशनी वाले मजदूर‘ हैं जिनके कांतिहीन चेहरों के पीछे/बढ़ता जा रहा है अँधेरा…/खुद अँधेरे में नहाकर/वे सिर पर ढो रहे हैं रोशनी। कूड़ा बीनने वाला बच्चा जो अपना बचपन बीन कर रख रहा है बोरे में। वह समय की नब्ज पर सही जगह हाथ रखते हैं- कैसा समय है/कि मोटे और मोटाते जा रहे हैं/…….कमजोर पतराते। इस विषमता को देखते ह ‘ओलार’ कविता में कवि बहुत तीखा प्रश्न खड़ा करता है, जो दुनिया में संतुलन स्थापित करने की जरूरत को बताता है-  ‘यह कैसा समय है भाई/कि मोटे और मोटाते-अघाते जा रहे हैं/कमजोर पतराते जा रहे हैं दिन-ब-दिन/कुछ बैठे हुए हैं पालथी मार कर/और तमाम के कंधे पिरा रहे हैं/कुछ डूबे हैं वैभव-विलास में आकंठ/जबकि तमाम लोगों के सूखते जा रहे हैं कंठ।’ कवि सचेत करता है कि यदि इस अंतर को समाप्त न किया गया तो एक दिन दुनिया ही ओलार हो जाएगी। यह नहीं भूलना चाहिए कि इक्का हो या दुनिया यदि ओलार हो जाए तो आगे बढ़ना कठिन हो जाता है।

अपने समय और समाज के प्रति सचेत एक कवि शासक-शोषक के इरादों और नीयत को अच्छी तरह पहचानता है। उनके हर कुचक्र और षड्यंत्र की खबर रखता है। उसके पीछे छुपे मंतव्यों को समझता है। पूंजी केंद्रित व्यवस्था से नाभिनालबद्ध सत्ता कैसे सामूहिकता का नष्ट करती है? कैसे हमारी संवेदनशीलता को कुंद कर देती है? कैसे हमसे हमारी पहचान छीन लेती है? ये हमें संतोष की कविताओं में दिखाई देता है। वह जानते हैं उन्हें हमारे एकजुट होने से डर लगता है इसलिए-

वे हमें इतना अकेला कर देना चाहते हैं
कि हमारे पैरों में कोई कांटा चुभे तो हम आह भी न भर पाए
कि अगर कोई हमारे हाथों को अपने हाथों में लेकर सहला
तो भी प्यार की कोई अनुभूति न जगने पाए
कहीं कोई जख्म हो तो भी हमारे चहेरे पर कोई शिकन न आए
हमारी किसी भी खुशी पर न जुट पाए
हमारा कोई सगा संबंधी नाते रिश्तेदार भाई दयाद
उन्होंने लुभावना सपना दिखाया शहर का
और जब अपना गांव गिरान खेती गिरस्थी छोड़-छाड़ कर हम गए शहर
और धीरे-धीरे कम होता चला गया हममें हमारा हम
हमारे पसीने से पुष्ट अनाजों को हमारे बखारों में जाने से रोक कर
उसे भेज दिया सस्ती कीमतों पर मंडियों में
हमारे रग-रग में रची-बसी कहानियों को
करीने से हमारी स्मृति से किया बिलग
इन्होंने नहीं छोड़ा हमारी रामलीलाओं, नौटंकियो
फाग और चैता को
रोचक अंदाज में बताते हैं वे हमें अकेलेपन के फायदे
वे कुछ भी नहीं छोड़ना चाहते हमारे पास
जिससे हम बात कर सकें और गाहे-बगाहे अपना दुखड़ा रो सकें
वे कुछ भी नहीं सुनना चाहते हैं, हमारी सलामती के बारे में
वे तो हमारी परछाई तक छीनने पर आमदा हैं
उन्हें डर है कि हम इसमें छुप कर कर सकते हैं गुरिल्ला लड़ाई

(वे हमें अकेला कर देना चाहते हैं)

’पहली बार‘ संग्रह में एक कविता है- हमारा चुनाव। इस कविता के माध्यम से संतोष हमारे जमाने के नेता और लोकतंत्र की मूलभूत विशेषताओें का काला चिट्ठा खोलते हैं। यह कविता तथाकथित लोकतंत्र में एक नेता बनने की प्रक्रिया को बताती है। पिता के जेब से चोरी से लेकर फिरौती मांगने तक का सफर कैसे अंततः किसी राजनीतिक दल का प्रत्याक्षी बनने तक पहुंचता है, इसका विवरण इस कविता में मिलता है। इस बहाने संतोष हमारी लोकतांत्रिक राजनीति का चेहरा उजागर कर देते हैं। चोरी, डकैती, वसूली, फिरौती, हत्या, बलात्कार जैसे दुर्गुण कैसे उसे न केवल एक काबिल नेता साबित कर देते हैं, बल्कि चुनाव भी जिता देते हैं- जो इन प्रतिमानों पर खरा उतरता है/उसे ही हम चुनते हैं अपना नेता/अब चाहें हम जो भी प्रलाप करें/सच तो यह है/कि उनका कोई भी कसूर नहीं था इसमें। यहां प्रश्न उठता है कि तो क्या वास्तव में इसके लिए आम जनता ही जिम्मेदार है? जैसा कि कवि मानता है। इस कविता को पढ़ते हुए मन में प्रश्न पैदा होते हैं कि क्या इस तंत्र में ऐसी परिस्थतियां हैं, जिसमें कि जनता अपने वोट का सही-सही इस्तेमाल कर सके? क्या उसे ऐसा करने दिया जाता है? क्या जनता को जाति, धर्म, क्षेत्, भाषा की संकीर्णताओें से बाहर निकलने दिया जा रहा है? क्या आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता के कोई मायने होते हैं? दरअसल इन प्रश्नों के उत्तर तलाशने की आवश्यकता है। इस यथार्थ के भीतर प्रवेश करके देखने की जरूरत है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि ऊपर से दिखाई देने वाला यथार्थ हमेशा वास्तविक यथार्थ नहीं होता है।

नौंवे दशक के बाद की भारतीय राजनीति का एक कड़वा सच सांप्रदायिकता भी है। इसने भारतीय राजनीति और समाज को गहरे तक प्रभावित किया। एक जनपक्षधर कवि इससे भला विचलित हुए बिना कैसे रह सकता है। सांप्रदायिकता की राजनीति करने वालों की चालों को कवि खूब समझता है। कवि को पता है इन ताकतों द्वारा लोगों को जोड़ने के नाम पर कैसे तोड़ने की राजनीति की जाती रही है। ’गुजरात-2002‘ कविता में कवि लिखता है- नियम,  नाटक और हकीकत में/वे इतना घालमेल कर देना चाहते हैं/कि समझ न पाए/कोई कुछ भी। अपने सुनहले अतीत की बातें करके वे लोगों को बरगलाने का प्रयास करते हैं, पर कवि अपील करता है कि- ‘अतीत में न लौट कर/अतीत से सबक लेने की आवश्यकता है।’ अच्छी बात है लोग कवि की इस बात को समझ रहे हैं और-‘जारी है एक सतत विरोध/हार न मानने वाला।’ कवि ’अयोध्या-2003‘ के माध्यम से साम्प्रदायिकता के दुष्परिणाम को बताता है अयोध्या जो-कभी रही होगी राम की राजधानी/आज बची है/जनपद से भी छोटे प्रारूप में….यह बेबाक राय थी अयोध्या के उस राम के बारे में/जो खयाल रखते थे/कदम-कदम पर मर्यादा का/लेकिन अब हर जगह उद्दंडता पसर रही है/लोगों को अब वही अयोध्या/बुरी तरह अखर रही है।’ कवि सांप्रदायिकता की इस राजनीति का प्रतिरोध कुछ इस तरह से करता है- ‘हम न उतरे उस जमीन पर/जिस पर बहुत नाज था कभी राम को।’ लेकिन हमें यह भी मानना होगा कि प्रतिरोध का यह तरीका पर्याप्त नहीं है। सांकेतिक प्रतिरोध से काम नहीं चलने वाला है। सांप्रदायिक ताकतें जिस तरह दिन-प्रतिदिन मजबूत होती जा रही हैं, संगठित और सक्रिय प्रतिरोध ही उसका एकमात्र उपाय है।

एक कविता की सबसे बड़ी भूमिका मानवीय मूल्यों के पक्ष में वातावरण तैयार करना होता है, क्योंकि यह काम कविता ही सबसे अच्छी तरह कर सकती है। एक अच्छा कवि हमेशा मानवीय मूल्यों के पक्ष में खड़ा रहता है। संतोष भी इसके अपवाद नहीं हैं। क्षीण होती आदमियत की चिंता उनके काव्य-सृजन के केंद्र में है। आदमी-आदमी के बीच कम होते ऐतबार समय में ये कविताएं ‘अंधकार के वर्चस्व से लड़ते-भिड़ते बचा लेती हैं आंख भर नींद और सुबह जैसी उम्मीद’। कवि की नजर में जो समय चल रहा है, वह भी बहुत अच्छा नहीं है और जो बीत गया, वह भी बहुत अच्छा नहीं था- इस बीतती सदी के पास/याद करने को बची है /अभी भी उदास रातें/बलात्कार से सनी लड़कियां/ठूंठ धरती पर/दुनिया का कूड़ा ढोते बच्चे/बढ़ते जा रहे हैं आगे।’ इसलिए-सदी सिर झुका कर/छुपा रही है मुँह।…..रिश्ते अब ढोए जाते हैं ….कलम की धार/नहीं हुई है कभी भी कुंद/ अन्याय के प्रतिकार में/बोल रही है अभी भी/तुम्हारे खून की हरेक बूँद। …विचारों के पंख होते हैं/मौत को चकमा दे/जो पहुँच जाते हैं/आम विचारों में। ….आदमी खुद एक जटिल समय है/जिसे परखने में हर दम/परेशान रहा समय। इन कविताओं में आज के समय का सच है जिसमें सबसे ज्यादा शोर वही करते हैं, जो कुछ करते धरते नहीं, जो सबसे अधिक नैतिकता की बातें करते हैं, वही सबसे अधिक अनैतिक हैं। इस विपर्यय को संतोष ने अपनी कविता ’जो किसी काम के नहीं होते‘ में बहुत सुंदर ढंग से व्यक्त किया है। वास्तव में आज ऐसी स्थिति पैदा हो गई है- ‘अच्छे लोग कुछ बोल नहीं पाते/निकल नहीं पाते घर से/गलत लोग सड़कों मैदानों में जाकर/अधिकारपूर्ण भाषण देते हैं/और आस-पास मजमा जुटाते हैं/जो किसी काम के नहीं होते/वे देश की सरकार चलाते हैं।’ सटीक टिप्पणी है यह आज के राजनीतिज्ञों पर। यह बात बिल्कुल सही है- ‘आज हालात यह है कि असली आवाज वाले टापते हैं/नकली आवाज वाले/भीड़ जुटाते हैं।’ ऐसे में संतोष की कविताएं प्रेम, सच्चाई, ईमानदारी, प्रतिरोध जैसे शाश्वत मानवीय मूल्यों को स्थापित करती हैं। उनकी कविताओं में कवि की दुनिया का बेहतरीन इंसान बनने की आकांक्षा व्यक्त होती है। निश्चित रूप प्रेम ही वह भाव है जो व्यक्ति को बेहतरीन इंसान बनाता है। कवि मानता है कि प्रेम ही है जिसने बचाया है दुनिया को- ‘सरसों के फूलों जैसा ताजा प्रेम/और प्रेम की गरमाहट/सर्द हवाओं और पृथ्वी की परिक्रमाओं के साथ/बचाये हुए है दुनियावी बुनियाद।’ कवि का विश्वास है कि- ‘अकेला प्रेम/कितना बदल देता है/दुनिया को।’ ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा है इतिहास। संतोष का मानना है- ‘एक-दूसरे से जूझ रहे है/जब सब/प्रतियोगी संसार में/कवि लिख रहे हैं/प्रेम कविताएं/धरती के भरोसे के लिए।’ इस प्रकार हम पाते हैं कि कवि की प्रेम में गहरी आस्था है। यह आस्था बनी भी रहनी चाहिए क्योंकि प्रेम ही है जिसके चलते तमाम विसंगति-विडंबना एवं क्र्रूरता के बावजूद इस दुनिया की सुंदरता बनी हुई है। दुनिया रहने लायक बची हुई है। यह प्रेम केवल स्त्री-पुरुष के बीच का न होकर हर प्राणी मात्र के बीच का है। संतोष अपनी एक कविता में सच्चाई के प्रति लोगों के नजरिए को व्यक्त करते हैं। कैसी त्रासदी है, सच्चाई आज चादर की तरह देखी जा रही है। दरअसल सच्चाई को इस तरह देखना बताता है कि  मानवीय मूल्य आज कैसे वस्तु की तरह हो गए हैं जिनका मनुष्य अपनी जरूरत के लिए इस्तेमाल कर काम निकलने पर परे धर देते हैं। पुराना पड़ गया है सच्चाई का मॉडल-‘धराऊ कपड़े की तरह पहन लेते हैं लोग/रिश्तेदारियों में जाते समय।’ यह मूल्यों के अवमूल्यन पर कवि की चिंता है। कवि कहता है-‘सच बोलना अब बिल्कुल मना है/जो बोलेगा वह ठिठुरेगा/सड़क के किनारे पागलों की तरह/लोग चिढाएंगे उसे/फेंकेंगे पत्थर।’ पर ऐसा केवल आज ही नहीं  सच बोलने के हमेशा से ये खतरे रहे हैं। किसी भी काल में सच बोलना सुरक्षित नहीं रहा है। पर यह भी सत्य है कि लोग फिर भी सच बोलते रहे। उसकी एवज में बड़े से बड़े खतरे उठाते रहे हैं। भले ही ऐसे लोग किसी भी काल में बहुत कम रहे हैं।

मानवीय मूल्यों को बचाने में हमारे आपसी रिश्तों की अहम् भूमिका रही है। कुछ ऐसे रिश्ते हैं जो मानवीयता की प्रतिमूर्ति माने जाते हैं। माँ भी एक ऐसा ही रिश्ता है। यह कविता का शाश्वत विषय रहा है। ’माँ ‘पर संतोष ने भी कुछ कविताएं लिखी हैं जिनमें माँ के प्रति कवि की आत्मीयता तो व्यक्त होती ही है माँ के बहाने औरत का पूरा संघर्ष और त्याग भी सामने आता है। उनके पहले संग्रह में संकलित ‘माँ’ कविता एक विधवा स्त्री के संघर्ष को बारीकी से चित्रित करती है। कविता की पहली पंक्ति ही माँ के प्रति असीम श्रद्धा से भरी हुई है-खुशगवार है मौसम/उसके पास माँ जो है।’ सचमुच दुनिया में माँ से बढ़कर कोई दूसरा रिश्ता नहीं हो सकता है। माँ परिवार के लिए रीढ़ के समान है। माँ का त्याग देखिए-आँखों में नींद की जगह/जीवन की अगली लड़ाई/लड़ने की लालिमा है/माँ के पास/माँ की साँसों से/जीवन पाती है हवा/कुछ भी नहीं रख पाती/वह अपने लिए/सबकी सलामती के लिए/रहती है वह निराहार।’ कवि बिल्कुल ठीक कहता है-‘सब कुछ संभव है/बस असंभव है माँ की कोई प्रतिलिपि/जिसके पास माँ है/वह दुनिया का सबसे खुशगवार प्राणी है।’ माँ ही है जो मकान के एक ढाँचे को घर में तब्दील करती है।उसमें आत्मीयता और सुरक्षा का संचार करती है। लेकिन विडंबना देखिए उसका ही अपना कोई घर नहीं होता है। संतोष के दूसरे संग्रह की कविता ‘माँ का घर’ में यह विडंबना व्यक्त होती है। माँ के अलावा पिता को याद करते हुए भी उनके यहां कुछ कविताएं हैं। कवि पिता को हमेशा अपने बीच महसूस करता है और रिश्तों की गरमाहट हम  उनकी कविताओं में अनुभव करते हैं। इस तरह हम कह सकते हैं की संतोष सार्वजनिक संवेदना के साथ-साथ निजी संवेदना के कवि भी हैं।

संतोष की कविताओं में हमें यत्र-तत्र प्रकृति और पर्यावरण चेतना भी दृष्टिगोचर होती है। जिस तरह लगातार अनेक जीव-जंतु और वनस्पतियों की प्रजातियां खत्म होती जा रही हैं, पृथ्वी का तापमान बढ़ता जा रहा है और जहरीली होती जा रही है दुनिया, उसे देखते हुए वह प्रश्न करते हैं-‘गायब करते-करते सारे जीवों को वनस्पतियों को/क्या कायम रख पाएगा आदमी/धरती के अपने इस ठिकाने पर खुद को सही सलामत।’ पहले संग्रह में ’बरगद‘ एक लंबी कविता है जिसमें प्रकृति के माध्यम से जीवन की हलचल दिखाने की कोशिश की गई है। कवि इस हलचल का बड़ी सूक्ष्मता से चित्रण करता है। एक पेड़ निखालिस पेड़ नहीं होता उसके चारों ओर जीवन गुंथा होता है। इसलिए एक पेड़ का कटना मात्र एक पेड़ का कटना नहीं है बल्कि जीवन का रूकना है। प्रकृति और मनुष्य का अन्योन्याश्रित संबंध इस कविता में देखा जा सकता है। इस कविता में प्रकृति और प्रौद्योगिकी  विकास के बीच के द्वंद्व को दिखाने की भी अच्छी कोशिश की गई है। कैसा विकसित तंत्र है जिसने मानव को उसकी प्रकृति और जीवन की क्रियाशीलता से बेदखल कर दिया है। यह विकसित तंत्र मानव जीवन को सरल तो कर सकता है,उसे तमाम तरह की सुविधाएं उपलब्ध भी करा सकता है लेकिन-‘इस विकसित तंत्र में/नहीं खोजा सकता है वह उपाय/जिसमें एक भरे-पूरे जीवन को/रोपा जा सके साबूत/भर दी जाए पत्तों में/टहाटह हरियाली/टाँक दी जाए उस पर सुबह की ओस।’ तकनीकी युग पर सटीक व्यंग्य है यह कविता। प्रौद्योगिकी को लेकर एक और कविता है संग्रह मंे-’सारी खूबियों के बावजूद‘। इस कविता में कवि कंप्यूटर को केंद्रित करते हुए इस ओर ध्यान खींचता है – बचपन में दुनिया का नक्शा देखकर /जितना छोटा समझे थे हम/ठीक उतना ही छोटा बना दिया है/दुनिया को इसने।लेकिन-इतनी तेज गणना करने वाला/यह मषीनी बक्सा/अपनी सारी खूबियों के बावजूद वैसे भी/कितना मोहताज रहता है/आदमी की उंगलियों का। यह कविता कहती है-प्रौद्योगिकी कितना ही उन्नति कर ले पर वह आदमी की अहमियत को समाप्त नहीं कर सकती है न ही प्रकृति को पूरी तरह अपने नियंत्रण में कर सकती है। यह बात सही भी है तमाम तकनीकी प्रगति के बावजूद-‘इस जमाने मंे भी अकाल है/बाढ़ है,भूकंप है ,ज्वार है।’ विकास, प्रोद्यौगिकी और प्रकृति के बीच संतुलन बनाकर चलना ही इस वक्त की जरूरत है। प्रकारांतर से संतोष की कविताएं इसी बात पर बल देती हैं।

संतोष की कविताओं में हमें चारों ओर फैले अंधकार के खिलाफ लड़ने की इच्छा और उम्मीद की किरणें दिखाई देती हैं-‘लाजिमी है अब/जहालतों से दो-दो हाथ करने/हाथों को मुट्ठी बनाने/और उसे उठाने का/घासों का आँधियों में न उड़ना/उम्मीदें हैं/अभी भी बहुत कुछ/अपने जमाने से।’ कवि आह्वाहन करता है- हमें पूरी करनी है वसीयत/अपने उन पुरखोें की/जिन्होंने रचा अपना वितान/तमाम विरोधों के बावजूद। उनका विश्वास इन पंक्तियों में झलकता है-‘तुम्हारा भोर का सपना/सच होगा सारोवीवा/जरूर एक दिन।’ ये सारी बातें मिलकर संतोष चतुर्वेदी की कविता में अपने समय और समाज का एक कोलाज बनाती हैं, जिसमें अलग-अलग कोणों से कभी चटख तो कभी धूसर रंगों में जीवन दिखाई देता है,कभी आशा तो कभी उदासी प्रकट होती है। उनके यहाँ कुछ बातें विशेष रूप से फोकस हुई हैं जैसे समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार,मूल्यों का अवमूल्यन, राजनीति का अपराधीकरण, अमानवीय होती दुनिया आदि। कवि इस बात से बहुत परेशान है कि चीजें अपने मूल स्वभाव को छोड़ रही हैं। जिसको जो काम करना चाहिए था उसे न कर वह किसी और ही कार्य-व्यापार में लगा है। सब उल्टा-पुल्टा हो रहा है। जिस आग को चूल्हे में होना था वह रिहायशी इलाकों में चहलकदमी कर रही है। जिन बच्चों को गिनती सीखनी चाहिए थी वे बंदूकें चला रहे हैं। दरअसल यह आज के दौर के हर संवेदनशील व्यक्ति की चिंता है।उसको इस बात का डर है कि-‘कहीं ऐसा न हो/कि मैं भी उसी तंत्र का हिस्सा बन जाऊँ/जिससे लड़ने का जज्बा जुटाता रहता हूँ अभी/हर पल हर छिन।’ कवि का यह डर तथा उसका यह परेशान होना बताता है कि कवि अपने समाज के प्रति कितना चिंतित है। अपने भीतर के इंसान को बचाए रखने के लिए कितना सचेत है। निश्चित रूप से एक कवि को यह प्रयास आजन्म करते रहना चाहिए क्योंकि यदि एक कवि के भीतर इंसान नहीं है तो उसकी कविता लिखने का कोई मतलब नहीं रह जाता है। कविता लिखना खुद की चौकसी करते रहना भी है। हम देखते हैं जिन कवियों ने कविता को इस रूप में बरता है वही कालजयी कविता  लिख पाए हैं।

विषयों की नवीनता और विविधता संतोष के कवि की सबसे बड़ी विशेषता है। वह कविता के लिए नए-नए विषय ढूढ़ लाते हैं। ‘दशमलव’,‘ पेनड्राइव समय’,‘ड.’,‘ओलार’, ‘अंधा मोड़’,‘विषम संख्याएं’,‘प्रश्न चिन्ह’ आदि ऐसे विषय हैं जिन पर मैंने पहली बार उनके यहां ही कविता पढ़ीं। इनमें एक ओर कुछ पेनड्राइव की तरह एकदम आधुनिक विषय हैं तो दूसरी ओर दशमलव जैसे बहुत प्राचीन विषय हैं। वह कुछ संज्ञाओं तथा क्रियाओं को भी नए अंदाज में देखते हैं। वह चाहे झुकना हो, सच्चाई हो या फिर दूरियां। दूरी किसी को भी अच्छी नहीं लगती है पर संतोष का कवि मन कुछ इस तरह से देखता है-‘दूरियों में बची रहती हैं स्मृतियां/दूरियों में बचे रहते हैं संबंध/दूरियां भर देती हैं गहरे जख्मों को/गजब की क्षमता होती है इनमें जुड़ने की/कुछ फासले बचाए रखते हैं/हमारे रिश्तों की लचक को/कुछ दूरियां और संजीदा बना देती है/प्यार को।’ इन विविध विषयों पर बात करते हुए अक्सर वह बहकते हुए नून-तेल-लकड़ी की बात पर आ जाते हैं जो एक जनपक्षधर कवि के लिए स्वाभाविक है,वह कहीं की भी और कोई भी बात करे जनता के दुःख-दर्द उसे भुलाए नहीं भूलते। कवि का इस तरह बहकना भी अच्छा लगता है लेकिन कुछ कविताओं में तो यह बहक संभल जाती है पर कुछ  में अनसंभली रह जाती है और वहां कविता बिखर जाती है।कभी-कभी अनावश्यक खिंच भी जाती हैं। ऐसी कविताएं सारतत्व तक नहीं  ले जा पाती बल्कि छाया प्रतीति बनकर रह जाती हैं। यह हर कवि के साथ होता है। आशा की जानी चाहिए काव्य विवेक की परिपक्वता के साथ-साथ यह कमजोरी भी दूर हो जाएगी।

संतोष शब्दकोशीय भाषा का नहीं क्रियाशील जीवन से शब्द चुनते हैं। शारीरिक श्रम में लगे लोगों के मुंह से निकलने वाले शब्दों को पूरे सम्मान के साथ अपनी कविता में प्रतिष्ठित करते हैं। उनकी कविता शब्दकोशीय शब्दों की मुहताज नहीं है खुद ही अपनी भाषा गढ़ लेती। इसी सामर्थ्य के चलते ‘भभकना’ जैसी क्रिया उनकी कविता की अंतर्वस्तु बन जाती है और अंधेरे के खिलाफ बिगुल बजाती हुई रोशनी को सही रास्ते में चलने को सचेत करती है। लालटेन का यह भभकना उन्हें उसका रोष लगता है जिसे वह उसकी बोली में व्यक्त करते हैं। वरिष्ठ कवि विजेन्द्र बिल्कुल सही कहते हैं कि संतोष की भाषा में अवधी तथा भोजपुरी दोनों के रंग यत्र-तत्र बिखरे हैं।….जो ऐसे कवि हैं जो अनेक बोलियों से जीवन रस-ग्रहण कर अपनी भाषा को सींचते हैं।

अच्छी बात यह है कि संतोष अपने लिखे से अभी संतुष्ट नहीं है,वह यह मानते हैं-‘कि लिखने के बाद भी लिखना है उन्हें/अभी बहुत कुछ/बिखरा हुआ-छूटा हुआ/चलता हुआ-रुका हुआ/अपना समय।’ कवि की इच्छा रही है कि-‘लिखना है सब कुछ/पोर-पोर में छिपा अंजोर/चांदनी में गुम रातें घनघोर/चहुंओर बिखरी हुई/रिश्तों की डोर/लिखना है सब छूटा-फटका/नये अनुभव से होकर आना है/बार-बार।’ आशा की जानी चाहिए कि संतोष कुमार चतुर्वेदी की नये अनुभवों से होकर आने की यह इच्छा हमेशा बने रहेगी क्योंकि अनुभव ही हैं जो कवि के कथ्य और शिल्प में नवीनता और मौलिकता लाते हैं। साथ ही यह आशा भी की जानी चाहिए कि उनके आगे की काव्य-यात्रा अधिक संष्लिष्टता, द्वंद्वात्मकता एवं सुसंगति लिये हुए होगी तथा समाज के हाशिए की आवाज अधिक व्यापकता और गहराई से स्थान पा पाएगी।

पाठ्यपुस्तकों की कैद से मुक्त होगी शिक्षा : महेश चंद्र पुनेठा

mahesh punedha

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड खुली किताब परीक्षा प्रणाली को लागू करने पर विचार कर रहा है और उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने अगले सत्र से इसे लागू करने का निर्णय ले लिया है। इस निर्णय के पीछे क्या तर्क हैं, यह कह पाना तो अभी कठिन है, लेकिन यदि एक सही समझ के साथ ऐसा होता है तो इसे एक प्रगतिशील कदम कहा जाएगा। शिक्षा प्रणाली में किसी भी सुधार की शुरुआत परीक्षा से ही हो सकती है। इससे न केवल रटने और नकल की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी, बल्कि बच्चों को परीक्षा के तनाव से मुक्ति भी मिलेगी। परीक्षा का मतलब पुस्तकीय ज्ञान का मूल्यांकन करना मात्र नहीं रह जाएगा। साथ ही बच्चों में अवलोकन, अन्वेषण, प्रयोग और विश्‍लेषण की क्षमता बढ़ेगी। बच्चा अधिक सृजनशील हो पाएगा। उसकी कल्पनाशक्ति का विकास होगा। सीखने-सिखाने की पद्धति में बदलाव आएगा, क्योंकि खुली किताब परीक्षा प्रणाली का मतलब परीक्षा में ऐसे प्रश्न पूछे जाने से है, जिसके उत्तर सीधे-सीधे पाठ्यपुस्तक में नहीं मिलते हैं। पाठ्य पुस्तक की भूमिका एक संदर्भ सामग्री की होती है। परीक्षा पुस्तक केंद्रित नहीं रह जाती है। यदि बच्चा पाठ्यपुस्तक की विषयवस्तु को अच्छी तरह समझा न हो तो वह पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देने में सफल नहीं हो सकता है। इसमें रूढ़िबद्ध अध्ययन किसी काम नहीं आ सकता है।

शिक्षा में सृजनशीलता के अवसर बढ़ाने के लिए जरूरी है कि उसे पाठ्यपुस्तकों की कैद से मुक्त किया जाए। खुली किताब परीक्षा प्रणाली का मतलब ही है कि शिक्षा को किताबी ज्ञान से बाहर निकालना और ज्ञान सृजन की दिशा में आगे बढ़ाना। जब प्रश्नों के उत्तर सीधे-सीधे पाठ्यपुस्तकों में नहीं मिलेंगे, तो बच्चा उनकी खोज अपने परिवेश में करेगा। इससे परिवेश से जुड़ाव तो होगा ही, साथ ही उसमें खोज की प्रवृत्ति का विकास भी होगा। अपने प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए उसे पुस्तकालय और प्रयोगशाला की शरण में जाना होगा। इससे उसमें अध्ययन की आदत विकसित होगी। वह अवधारणाओं को रटने की अपेक्षा समझने की कोशिश करेगा। इसमें शिक्षक और शिक्षार्थी को अधिक मेहनत करने की जरूरत पडे़गी। शिक्षण के तरीके में भी परिवर्तन देखने में आएगा। शिक्षण का मतलब सूचनाओं का स्थानांतरण मात्र नहीं रह जाएगा, बल्कि समझाने और अनुप्रयोग पर अधिक बल दिया जाएगा। परीक्षा के मायने बदल जाएंगे। परीक्षा याददाश्त क्षमता का मूल्यांकन न होकर बच्चे की तार्किक क्षमता, आलोचनात्मक विवेक, मूलभूत अवधारणाओं की स्पष्टता, परिवेश के प्रति सजगता आदि दक्षताओं और कौशलों के मूल्यांकन में बदल जाएगा। मौजूदा परीक्षा प्रणाली बच्चे की याददाश्त क्षमता का ही अधिक मूल्यांकन करती रही है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी तथ्य को याद कर लेना मात्र महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उसका विश्लेषण करते हुए अपने जीवन में अनुप्रयोग करना अधिक महत्वपूर्ण है। बच्चे सिर्फ पढ़ाई गई विषयवस्तु को दोहराएंगे ही नहीं, बल्कि वे सोचने व जो सीख रहे हैं, उसका प्रयोग करने के लिए भी उत्सुक होंगे। अपनी परिस्थिति व जरूरतों का सूक्ष्म पर्यवेक्षण कर सकेंगे। वास्तविक अर्थों में सीखना भी यही है। जीवन के सवालों का हल इसी तरह की शिक्षा से मिल सकते हैं।

लेकिन इसको लागू करने से पहले पर्याप्त तैयारी की जरूरत है। यदि आधी-अधूरी तैयारी के साथ इसे लागू किया जाएगा तो इसका भी कहीं वहीं हश्र न हो जो शिक्षा अधिनियम 2009 के अंतर्गत कक्षा आठ तक फेल न करने की नीति का हो रहा है। इस नीति के लागू करने के पीछे के मंतव्य को न समझ पाने के कारण आज सभी के द्वारा शिक्षा के स्तर में आ रही गिरावट के लिए इस नीति को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। यह नीति न पढ़ने और पढ़ाने का बहाना भी बनती जा रही है। ध्यातव्य है कि 1986 की नई शिक्षा नीति के बाद भी एक बार सपुस्तकीय परीक्षा प्रणाली को अपनाया गया था। फिर न जाने किन कारणों से एक-दो साल के भीतर ही इसे वापस ले लिया गया। यह बात बिल्कुल सही है कि खुली किताब परीक्षा प्रणाली लागू करने से पहले शिक्षण के तरीकों में आमूलचूल परिवर्तन करने की जरूरत है। जब तक पढ़ने-पढ़ाने और मूल्यांकन का तरीका नहीं बदला जाएगा, तो इसके परिणाम और अधिक घातक सिद्ध होंगे। परीक्षा के लिए शिक्षा हो चुके दौर में कहीं यह सोच हावी न हो जाए कि  परीक्षा में जब पुस्तक लेकर ही जाना है तो फिर उसे पढ़ना और पढ़ाना ही क्यों। ऐसा होने पर अब तक बच्चे जो सूचना या जानकारी ग्रहण कर पा रहे हैं, कहीं उससे भी विमुख न हो जाएं।

उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश में सन् 1972 में प्रारम्भ होशंगाबाद विज्ञान शिक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत प्रदेश के लगभग आठ सौ सरकारी विद्यालयों में तीन दशकों तक कक्षा 6 से 8 तक में विज्ञान विषय में खुली किताब परीक्षा प्रणाली का प्रयोग किया गया। इसे लागू करने से पहले उसके अनुभवों का अध्ययन करना होगा। इस बात पर ध्यान देना होगा कि इस कार्यक्रम में केवल परीक्षा प्रणाली में ही इस प्रयोग को नहीं अपनाया गया, बल्कि पढ़ने-पढ़ाने के तरीके में भी बदलाव किया गया। बच्चों के लिए नई पाठ्यपुस्तकें और शिक्षकों के लिए शिक्षक निर्देशिकाएं तैयार करवाई गईं। कक्षा के ढांचे को बदला गया। परीक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन किए गए, उसे ऐसा रूप दिया गया जो रटी हुई जानकारी को उगलवाने की बजाय अवधारणात्मक विकास का आकलन रहे। शिक्षक और समुदाय के साथ सघन प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए गए। उनकी इस मान्यता को दृष्टिगत रखना होगा कि स्कूली शिक्षा में किसी एक पक्ष के साथ छेड़छाड़ करने से परिवर्तन नहीं होगा। इसलिए इसे लागू करने से पहले इसको लेकर केवल शिक्षकों की ही नहीं, बल्कि अभिभावकों की सोच को भी बदलना होगा। अन्यथा उसी तरह के प्रश्न खड़े होंगे, जैसे होशंगाबाद विज्ञान शिक्षा कार्यक्रम के दौरान इस प्रयोग को लेकर किए गए कि यदि किताब सामने है तो परीक्षा किस बात की, परीक्षा में किताब में से जब सवाल नहीं पूछे जाएंगे तो किताब पढ़ाने या उसे साथ ले जाने का क्या फायदा हुआ,, यदि किताब परीक्षा में ले जाने की अनुमति होगी तो भला बच्चे पाठ्यपुस्तक क्यों पढ़े, आदि-आदि।

इन सवालों पर भी विचार करना होगा कि क्या हमारे स्कूल इतने साधन संपन्न हैं कि जहां बच्चे अपनी जिज्ञासाओं को शांत कर सकें और हर विषय में अपनी समझ विकसित कर सके, क्या शिक्षक इतने कुशल हैं कि बच्चों में आवश्यक समझ और कौशल विकसित कर सकें। अभी तक तो स्थिति यह है कि अधिकांश स्कूलों में न पर्याप्त शिक्षक हैं, न पुस्तकालय हैं और न ही प्रयोगशालाएं। न ऐसा माहौल जिसमें बच्चों को कुछ करने की स्वतंत्रता हो ताकि ज्ञान का सृजन कर सकें। अधिकांश विद्यालयों में तो अभी भी शिक्षण की बैकिंग प्रणाली ही चल रही है जिसमें बच्चे के मस्तिष्क में सूचना और जानकारियों को भरने का काम किया जा रहा है। सूचना तथ्य और जानकारियों को ही ज्ञान का पर्याय माना जा रहा है।

दीवार पर किताब, सोशल मीडिया में धूम

Deewar Patrika Aur Rachnatmakta

 

चंडीगढ़, 20 जुलाई (ट्रिन्यू)

उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों के शिक्षकों का एक समूह अभियान चला रहा है। इसमें बच्चों की रचनाशीलता को मंच देने की कोशिश की गयी है। यह मुहिम इन दिनों सोशल मीडिया पर छायी हुई है। ‘दीवार पत्रिका : एक अभियान’ नाम से फेसबुक समूह और ब्लॉग भी बनाया गया है। इससे जुड़े लोगों का कहना है कि यह अभियान का ही असर है कि आज प्राथमिक विद्यालयों से लेकर डिग्री कालेज की दीवारों तक में यह हस्तलिखित पत्रिका लटकी देखी जा सकती है।

उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ से प्रारम्भ हुए इस अभियान की गूंज वहां के तीन सौ से अधिक विद्यालयों सहित उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, पं.बंगाल आदि प्रदेशों के विभिन्न स्कूलों में दीवार पत्रिका निकलने लगी है।

अभियान से जुड़े महेश पुनेठा कहते हैं, ‘बच्चों में रचनात्मक विकास और भाषाई दक्षता को बढ़ावा देने के लिए ‘दीवार पत्रिका’ अपने आप में अनोखा, प्रभावशाली और बेहद कम खर्चीला है। यह एक हस्तलिखित पत्रिका है, जो दीवार पर कलैंडर की तरह लटकायी जाती है।’

उन्होंने बताया कि पिछले दिनों लेखक मंच प्रकाशन से ‘दीवार पत्रिका और रचनात्मकता’ नाम से एक किताब का प्रकाशन भी किया है। इसमें बच्चों और इससे जुड़े तमाम लोगों के अनुभव सहेजे गये हैं।

Posted On July – 20 – 2015

 

स्कूलों में दीवार पत्रिका का प्रयोग बेहद उपयोगी : प्रेमपाल शर्मा

Deewar Patrika Aur Rachnatmakta

नई दिल्‍ली : प्रगति मैदान में आयोजित विश्‍व पुस्‍तक मेले में लेखक मंच प्रकाशन से प्रकाशित महेश चन्‍द्र पुनेठा की पुस्‍तक ‘दीवार पत्रिका और रचनात्‍मकता’ का विमोचन 18 फरवरी को कथाकार प्रेमपाल शर्मा और ‘चकमक’ पत्रिका के संपादक सुशील शुक्‍ल के हाथों किया गया। प्रेमपाल शर्मा ने कहा कि स्‍कूलों में दीवार पत्रिका का यह प्रयोग बेहद उपयोगी है। इसमें खर्च नाममात्र का है और इसे सुविधानुसार कभी भी निकाला जा सकता है। यह अपनी तरह की अनूठी किताब है।

सुशील शुक्‍ल ने कहा कि इस विषय पर हिंदी में यह पहली किताब है। इस तरह के प्रयास बच्‍चों की रचनात्‍मकता सामने लाने में सहायक हैं।

पुस्‍तक के लेखक महेश पुनेठा ने कहा कि हम पाठकों की कमी की बात बार-बार करते हैं। इसके लिए बचपन से ही बच्‍चों में पढ़ने-लिखने के संस्‍कार डालने होंगे। दीवार पत्रिका के माध्‍यम से बच्‍चों में आसानी से पढ़़ने-लिखने की रुचि उत्‍पन्‍न की जा सकती है।

इस अवसर पर चित्रकार कुंवर रवींद्र, कथाकार दिनेश कनार्टक, राजीव जोशी, कवि दिनकर कुमार आदि मौजूद थे।

महेश चन्‍द्र पुनेठा ने पुस्‍तक में दीवार पत्रिका के अपने अनुभव, बच्‍चों के अनुभव तथा उनके संपादकों से बातचीत शामिल की है। साथ ही समानधर्मी शिक्षकों के अनुभव भी ।

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इस पुस्तक का मूल्य अजिल्द 80 रुपये सजिल्द 150 रुपये है।

अन्य जानकारी के लिए संपर्क करें-
लेखक मंच प्रकाशन
433, नीतिखंड-3
इंदिरापुरम-201014
गाजियाबाद
मोबाइल नंबर-9871344533
ईमेल-anuraglekhak@gmail.com