पिछले दिनों किन्नरों को कोसते हुए आसाराम बापू ने बयान दिया था। उनका लक्ष्य सागर की मेयर कमला बुआ थीं। संतजी के बयान को लेकर असली और नकली किन्नरों की पहचान करता चर्चित संस्मरणकार का आलेख-
कुछ दिनों पहले उज्जैन में आसाराम बापू ने किन्नर विषयक बयान क्या दिया कि राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में भूचाल आ गया, जिन लोगों ने संत श्रेष्ठ को टी.वी. पर किन्नरों की खास अदा में ताली बजा-बजाकर, अंगुलियां नचा-नचाकर, दीदे मटका-मटाकर किन्नरों को सराहते हुए देखा, उनके तो मानो जीते-जी ही स्वर्ग मिल गया। श्वेत, हिम धवल दाढ़ी, भौंहों तक के बाल सफेद, परदनिया और कुर्ता भी झकाझक सफेद। जब वे नाच-नाचकर, लहरिया लेते हुए किन्नरों को कोस रहे थे तो संयोग से टी.वी. पर यह नयन महोत्सव देखने का सौभाग्य मुझे भी मिला। टीवी पर संत आसाराम किसी भी किन्नर से ज्यादा किन्नर लग रह थे। किन्नरों के प्रति उनकी घृणा छिपाये नहीं छिप रही थी। लगता था कि इस धराधाम पर सबसे गर्हित प्राणी कोई है तो वह किन्नर ही है। इतनी घृणा संतों को शोभा नहीं देती, पर घृणा का मूल कारण मुझे दूसरे दिन समाचार पत्रों में पढऩे को मिला।
अहमदाबाद हो या भोपाल, सागर हो या उज्जैन, सबने संतजी की किन्नर विरोधी टिप्पणी की शल्य चिकित्सा की। बापूजी का लक्ष्य सागर की कमला बुआ थी। सागर के बुआ समर्थकों ने कहा कि यह सारा मामला व्यापार का है। आसाराम बापू को लगा कि अभी तक उन्हें देखने और सुनने के लिए जो भीड़ उमड़ती थी, वह अब कमला बुआ को देखने और सुनने के लिए उमड़ेगी। कमला बुआ सागर की मेयर चुनी गई थीं। उन्होंने कांग्रेस और भाजपा प्रत्याशियों को गहरी शिकस्त दी थी।
भारतीय जनता मौका पडऩे पर असली और नकली का ऐसा भेद करती है कि बड़े-बड़े व्याख्याकार गच्चा खा जाएं। जनता मानती है कि जब हमें किन्नरों में से किसी एक का चुनाव करना है तो असली का ही चुनाव क्यों न किया जाए, सो उसने असली का चुनाव किया। बापू को लगा कि बुआ प्रतिष्ठा और लोकप्रियता में उनसे आगे निकल गईं। इसलिए बुआ को लंगड़ी मारना उन्हें जरूरी लगा। उन्होंने उज्जैन में अपने बयान द्वारा कमला बुआ को लंगड़ी मारी थी, पर यह दांव उल्टा पड़ा। अपनी लंगड़ी से वे स्वयं धराशाही हो गए।
मुझे उस नेता के इस विश्लेषण पर कि सारा मामला व्यापार का है, गंभीरता से विचार करने की जरूरत लगी। मैंने मंथन किया और मंथन का परिणाम निकला- ध्त। इस ध्त को प्राप्त करने में मेरे भाषा विज्ञानी मन ने बड़ा काम किया।
हमारे देश में पिता को बापू कहते हैं। पिता की बहन को बुआ या फुआ कहा जाता है। कई लोग बुआ को फूफी या फूफू भी कहते हैं। ये सारे शब्द संस्कृत के पितृ स्वषा के तद्भव रूप हैं। बुआ यानी बापू की बहन। बापू का बुआ की खिल्ली उड़ाना भारतीय पारिवारिक संबंधों में कोई नई बात नहीं है। अब सागर में बुआ सत्ता में आ गई, सागर की मेयर हो गईं तो बापू को अखरना ही था। सागर में बापू का बड़ा भारी आश्रम है। बात संबंधों की नहीं, सत्ता की है। सत्तासीन बुआ बापू को आंख की किरकिरी लगीं। उन्होंने किरकिरी दूर करने के लिए हथेली का सहारा लिया, अंगुलियों को मटकाया, आगे घूमे, पीछे मुड़े। बुआ जैसी करती थीं, वह सब किया।
ताली बजाना किन्नरों की खास अदा है। ताली बजाता किन्नर समाज में उपहास का पात्र माना जाता है। बापू को लगा कि सागर की जनता ने कमला बुआ को जिताकर यथास्थिति को बदलने की जुर्रत की है। बापू यथास्थितिवादी हंै। समाज बदल गया तो उन जैसे बापुओं को कोई नहीं पूछेगा, इसलिए कमला बुआ जैसे व्यक्तियों पर प्रहार करो।
ताली बजा-बजाकर किन्नर समाज संतति जन्म पर, विवाह के मौके पर, दस्टौन पर, मुंडन पर घर-घर जाकर अपनी जीविका वसूलता है। लोग खुशी-खुशी देते भी हैं। वे जानते हैं कि किन्नरों को यदि उन्होंने इनक नेग नहीं दिया तो ये किसी भी सीमा तक जा सकते हैं और गृहस्थ की थुड़ी-थुड़ी कर सकते हैं।
सागर में ही कोई चार-पांच साल पहले एक किन्नर ने विद्यापुरम के एक शुचितावादी प्रोफेसर की बड़ी थुड़ी-थुड़ीकर दी थी। प्रोफेसर साहब स्थानीय थे, किन्नरों को स्थानीय नामों से पुकारना उन्हें अच्छा लगता। किन्नरों को वे शापग्रस्त मानते थे और स्वयं को पुल्लिंग होने के कारण विश्व का सर्वश्रेष्ठ प्राणी। वे किन्नरों को किन्नर नहीं कहते थे। ठेठ बुंदेली में कभी हीजड़ा कहते, कभी खसुआ। हीज़ फारसी शब्द है, इसी को और अवज्ञामूलक बनाना हो तो उसमें एड़ा प्रत्यय लगाकर हीजड़ा बनाया जाता है। दुखड़ा, मुखड़ा, टुकड़ा के वजन पर।
अकबर इलाहाबादी ने हीज़ शब्द का प्रयोग बड़े ही शायराना अंदाज में किया है। न हीयों में, न शीयों में। उनका संकेत अंग्रेजी के ‘हीÓ और ‘शीÓ से है। बोलचाल में ऐसे लोगों का परिचय देते हुए कहते हैं उठ बैठ, खड़ी हो जा। पशुओं को खस्सी बनाकर उन्हें अधिक कार्यक्षम बनया जाता है और वे प्रजनन के अयोग्य हो जाते हैं। प्रोफेसर साहब ने घर आए किन्नर को खस्सू कह दिया। कह ही नहीं दिया, उसे गाली भी दी और धक्का भी दिया।
आचार्यजी को पौत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी। किन्नर टोली ने जनाना अस्पताल से यह सूचना प्राप्त की थी और अपने कुल की परंपरा के अनुसार अपना कर वसूलने विद्यापुरम आए थे। यहां कर तो मिला नहीं, मिला अपमान, मिले अपशब्द। किन्नर ने कहीं सुना था- सबसे कठिन जाति अपमान सो अपनी बिरादरी का ऐसा अपमान देखकर उसने गिरते-गिरते पुल्लिंग को अपनी जद में लिया और वे निरावृत्त हो धरणी पर धड़ाम से गिरे। यह लीला यहां संपन्न नहीं हुई। पंडितानी चिल्लाई- देखियो-देखियो, पंडितजी को का तो हो गऔ। पंडितजी को कुछ नहीं हुआ था। वे केवल बेपर्द हो गए थे। किन्नर राज ने इस दृश्य का व्यापारिक लाभ उठाने का विचार किया और उन्होंने भी अपनी धोती कमर से ऊपर कर ली। आंधी में उलटी हुई छतरी की तरह। पंंडितानी चिल्ला रही है, पुत्रजी किंकर्तव्यविमूढ़ खड़े हैं, पुत्रवधू सौरी से बाहर आ गई हैं और सोच रही हैं- हे धरती माता, तू फट जा, मैंन उसमें समा जाऊं। पंडितानी किन्नर बुआ से हाहा खा रही है। माई हूने अब सान्त, अपनी लीला समेटिये। यह गृहस्थों का घर है। समधियाने तक बात पहुंचेगी, हम तो कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे।
घर के सामने भीड़ लग गई थी। सब्जी वालों, कबड़ी वालों, ठेले वालों को इस बायस्कोप में बड़ा आनंद आ रहा था। ज्यों-ज्यों पंडितानी की हाहा बढ़ रही थी, न हीजी, न शीजी का रेट भी बढ़ रहा था। सौ रुपए से शुरू हुआ सेंसेक्स बढ़कर अब पांच सौ हो गया था। पंडितानी को अब न पंडितजी की सुध रह गई थी, न बेटे जी की। उन्हें कुल की कान बचाने भर की सुध थी। हम पेंशनदार लोग, बुआ तुम्हें पांच सौ रुपया दे हैं तो हमाओं को बजट बिगड़ जाते। बुआ गुस्सा थूकौ, धुतिया नीची करौ, ये लो सौ रुपैया और मौड़ा को आशीर्वाद दो। वे सौरी में गई। नवजात को उन्होंने बुआ की बढ़ी हुई हथेलियों में डाल दिया। बुआ ने बड़प्पन का परिचय दिया। जुग-जुग जिऔ राजा दशरथ के मौड़ा।
सारे मुहल्ले में यह खबर बिजली की तरह दौड़ गई। जब किन्नर टोली मेरे दरवाजे पर आई तो मैंने उन्हें दस का नोट दिया। कहा- बुआ हमरो रिटायरमेंट हो गयौ है, पंशेन अभी आई नहीं है, इतनेई में सात रखौ। सो हम लुटेरे थोड़ेई हैं। हम भी तुमाऔ दुख-सुख समझत हैं। भगवान ने तो हमारे साथ बड़ों अन्याय करौई है, अब हम अपनी रोजी रोटी कमा रयै, ऐसे में कोई हमें गाली दे हे तो हमें गुस्सा आहे कि नई। बुआ ठीक कह रही थीं। वह चलने को हुईं तो मैंने उन्हें रोका, बुआ हमारी एक बात सुने जाऔ। अगली बेर तुम चुनाव लड़ो, बीना से, कटनी से, शबनम मौसी और फलानी बुआ चुनाव जीत के भोपाल तक पहुंच गई हैं। तुमाऔ जीत बौ पक्को। हमाये वोट के लाने तुम निसाखातिर हो जाओ। बुआ के पैर थम गए। उन्होंने ताली बजाई, सपना मौसी, जूही बुआ और राधा रानी को बुलाया। कहा- देखियौ जे जैन साहब का कै रयै।
मैं नहीं कहता कि कमला बुआ के सागर के मेयर पद का चुनाव जीतने में मेरी उस दिन की प्रेरणा ही थी, पर वे चुनाव लड़ीं और जीतीं। जनता ने उन पर विश्वास प्रकट किया। सामान्य मतदाता नकली किन्नरों से इस प्रकार आजिज आ चुका है कि उसने सोचा चलो इस बार असली किन्नर को मौका देकर देखा जाए, जो सकता है असली किन्नर नकली मर्दों से बेहतर साबित हो।
ऐसे में संत आसाराम बापू का कमला बुआ का मजाक उड़ाना जनता का मजाक उड़ाना है, संविधान का अपमान करना है और लोकतंत्र की जड़ें कमजोर करना है। बापू अपना घर संभालें, दूसरों के फटे में टांग न डालें तो ही अच्छा। उज्जैन में संत आसाराम बापू ने कमला बुआ का मखौल उड़ाकर अच्छा नहीं किया। उनका यह आचरण संतों जैसा नहीं है। कमला बुआ हमारी प्रतिनिधि हैं, वे चुनाव लड़कर और जीतकर सागर की मेयर बनी हैं। उन्हें यह गौरव हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था ने दिया है। संत को जनता के विवेक का उपहास करना शत-प्रतिशत गलत है। हमारी परंपरा में किन्नर को अबध्य माना गया है। शिखंडी का उदाहरण हमारे सामने है। फिर संत प्रवर का कमला बुआ का माखौल उड़ाना किसी भी प्रकार से संतोचित नही है।
यहां भी कमला बुआ आसाराम बापू से बाजी मार ले गईं। संत शिरोमणी ने उज्जैन में अपने हाव-भाव से, बोली बानी से कमला बुआ की जिस भद्दे ढंग से हंसी उड़ाई, उसके उत्तर में कमला बुआ अपनी पर उतर आती तो बापू को भागते रास्ता नहीं मिलता, पर कमला बुआ ने बहुत शलीन ढंंग से, अत्यंत शिष्टतापूर्वक उत्तर में कहा कि मुझे उनका आशीर्वाद चाहिए। वे हमारे वंदनीय संत हंै। संतों के मार्गदर्शन के बिना मैं सफल हो ही नहीं सकती। कमला बुआ ने जिस गरिमा और मर्यादा का परिचय दिया है, उससे उनका कद सभी की दृष्टिï में बहुत ऊंचा हो गया है।
संत आसाराम बापू ताली बजाते हुए बहुत अच्छे लगते हैं, असली किन्नर मय अपनी मूछों और दाढ़ी के। वास्तव में दैहिक किन्नरत्व उतना मालौखस्पद नहीं है, जितना मानसिक किन्नरतत्व। कमला बुआ ने थोड़े ही समय में सागर में अपनी कार्य कुशलता और निर्णय क्षमता से जो छवि अर्जित की है, वह हमें बहुत आशान्वित करती है। वे आसाराम बापू से ज्यादा संत और उनकी तुलना में ज्यादा पुरुष लगती हैं। लोकतंत्र ने उन्हें जो अवसर दिया है, उसका वे भरपूर लाभ उठाएं, अपने कार्यों से जनता की कसौटी पर खरी उतरें। वे यशस्वी हों, सफल हों, जनता को उनसे बहुत उम्मीदें हैं, वे भारतीय लोकतंत्र में तीसरा विकल्प सिद्ध हो सकती हैं।
चलते-चलते एक प्रसंग याद आया। ईरान में किसी मुल्ला ने किसी किन्नर को धक्का दे दिया। किन्नर गिर पड़ा। पर वह करे तो क्या करे। उसने लपककर मुल्लाजी की दाढ़ी का एक बाल नोंच लिया। अरे, अर,े यह क्या करते हो। कुछ नहीं, मुझे मालूम है कि जिसके पास भी आपकी दाढ़ी का मुदद्दस बाल होगा, उसे सीधे जन्नत मिलेगी। यह सुनना था कि वह मौजूद भीड़ मुल्लाजी के बाल नोंचने लगी। मुल्लाजी सारी हेकड़ी भूल गए, पर तब तक काफी देर हो गई थी।
कमला बुआ चाहतीं तो अपने प्रशंसकों, अपने भक्तों, अपनी टोली के सदस्यों को कह देतीं कि संत आसाराम बाप की मूछों और दाढ़ी के बाल जन्नत का पासपोर्ट हैं तो संतजी अपना सारा संतत्व भूल जाते, पर कमला बुआ शरीफ हैं, बेहद शालीन हैं। उन्होंने बडप्पन का परिचय दिया और संत शिरोमणी की माफ कर दिया। बुआ बड़ी साबित हुईं, बापू बौने हो गए!


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