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अंग्रेजी बनाम देशी पुस्तक : शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

आज के युग में इंटरनेट सूचना प्रसार का सबसे बड़ा, लोकप्रिय और सशक्‍त माध्यम है। वर्तमान युग में इंटरनेट पर किसी भी सूचना को आसानी से प्राप्त करने के अवसर सुलभ हैं। नेट पर पुस्तकें, पत्रिकाएँ और समाचार-पत्र भी आसानी से पढ़े जा सकते हैं। माना जाता है कि नेट की वजह से आज पुस्तकों के पाठकों की संख्या कम हो गयी है, लेकिन यह देखा गया है कि प्रायः प्रिंट माध्यम के पाठक और इंटरनेट के पाठक अलग-अलग होते हैं। जो लोग पुस्तक खरीद कर पढ़ने में रुचि रखते हैं, उन्हें इंटरनेट पर उपलब्ध मूल्यरहित सामग्री भी अच्छी नहीं लगती और वे पुस्तक खरीदकर ही पढ़ते हैं। साथ ही लोग पुस्तकें इस लिये भी खरीदते हैं, क्योंकि पुस्तकों का घर और पुस्तकालय में संकलन किया जा सकता है और जब चाहे उन्‍हें पढ़ा जा सकता है। पुस्तकों के प्रति लोगों की रुचि घटने का एक बड़ा कारण पुस्तकों का मूल्य है। इस महंगाई के दौर में किताब खरीदना पाठकों की जेब पर भारी पड़ रहा है। स्तरीय साहित्य अगर कम कीमत पर उपलब्ध हो तो पाठक इसे छोड़ना नहीं चाहते। वे श्रेष्ठ साहित्य को पढ़ने का लोभ संवरण नहीं कर पाते। इसका उदहारण गत वर्ष प्रगति मैदान में आयोजित पुस्तक मेले में देखने को मिला। नौ दिवसीय इस मेले के अंतिम दिन शनिवार को कई प्रकाशकों ने किताबों पर भारी छूट दे दी थी, जिसके कारण खूब बिक्री हुई। कुछ स्टालों पर तो पुस्तकों की खरीद पर कपड़ों की सेल की तर्ज पर छूट दी गई। कहीं 20 व 50 रुपये में किताबों का बंडल था तो कहीं 100 रुपये में चार किताबों का ऑफर। ऐसे स्टाल पर ग्राहकों की भारी भीड़ लगी थी। रीडर्स लाउंज में बैठकर लोग किताबें पढ़ रहे थे। जाहिर है कि पुस्तकों के पाठक आज भी हैं, बशर्ते उचित मूल्य पर पुस्तकें उपलब्ध कराई जा सकें।

भारत में प्रिंट मीडिया उद्योग लगातार विकास के पथ पर अग्रसर है और पिछले वित्त वर्ष की तुलना में चालू वित्त वर्ष में इसमें  6.25  प्रतिशत की बढ़ोतरी इस बात का पुख्ता सबूत है। देश में पंजीकृत समाचारपत्रों की कुल संख्या 82 हजार 237 है। प्रेस की स्थिति के संबंध में जारी  55वीं वार्षिक रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि भारत में प्रिंट मीडिया दिनोंदिन तरक्की कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार समाचारपत्रों के प्रकाशन के मामले में हिन्दी सभी भाषाओं पर भारी है। समाचारपत्रों के पंजीयक की ओर से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में पेश की गई रिपोर्ट में बताया गया है कि चालू वित्त वर्ष में प्रकाशित हो रहे हिन्दी समाचारपत्रों की संख्या 7,910 है। एक हजार 406  समाचारपत्रों के प्रकाशन के साथ अंग्रेजी दूसरे स्थान पर और  938  समाचारपत्रों के साथ उर्दू तीसरे स्थान पर है। गुजराती के 761, तेलुगु के 603, मराठी के 521, बांग्ला के 472, तमिल के 272, ओडिया 245, कन्नड़ के 200 और मलयालम के 192  समाचारपत्र प्रकाशित हो रहे हैं।

प्रसार संख्या के मामले में भी हिन्दी के अखबार अव्वल हैं। हिन्दी अखबारों की कुल प्रसार संख्या 15 करोड़ 54 लाख 94  हजार 770 है, जबकि अंग्रेजी के समाचारपत्रों की कुल प्रसार संख्या दो करोड़ 16 लाख 39 हजार 230 प्रतियाँ हैं।

वहीं इंडियन रीडरशिप सर्वे का डाटा रिलीज हुआ है। उसके अनुसार हिन्‍दी अखबार दैनिक जागरण लगातार पहले स्थान पर है। इसकी कुल पाठक संख्या 5.45 करोड़ बतायी गयी है। दैनिक भास्कर 3.19 करोड़ पाठकों के साथ देश का दूसरा सबसे बड़ा अखबार बना हुआ है। तीसरे नंबर पर हिन्दी का ही एक अखबार है- अमर उजाला। इसके पाठकों की संख्या 2.87 करोड़ बतायी गयी है। चौथे नंबर पर भी हिन्दी का एक और अखबार दैनिक हिन्दुस्तान है। आईआरएस के आँकड़े बताते हैं कि इसकी कुल पाठक संख्या 2.67 करोड़ पहुँच गयी है। पाँचवे स्थान पर मराठी दैनिक लोकमत काबिज है। इसके पाठकों की संख्या 2.06 करोड़ है। छठे नंबर पर तमिल अखबार डेली थंथी के पाठकों की संख्या 2.04 करोड़ पर पहुँच गयी है। सातवें नंबर भी एक तमिल दैनिक दिनकरण है। इसके पाठकों की संख्या ताजा सर्वे के अनुसार 1.68 करोड़ है। आठवें स्थान पर पश्‍चि‍म बंगाल का बांग्ला दैनिक आनंद बाजार पत्रिका है। इसके पाठकों की संख्या 1.55 करोड़ है। नौंवे स्थान पर हिन्दी अखबार राजस्थान पत्रिका है। इसके कुल 1.4 करोड़ पाठक हैं। 1.39 करोड़ पाठकों के साथ तेलुगु दैनिक इनाडु दसवें नंबर पर है।

भारत के शीर्ष दस अखबारों में अंग्रेजी का एक भी अखबार शामिल नहीं है। अंग्रेजी के सबसे बड़े अखबार ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के पाठकों की संख्या 1.33 करोड़ है, जबकि दूसरे नंबर के अंग्रेजी के सबसे बड़े अखबार हिन्दुस्तान टाइम्स के पाठकों की संख्या 63.4 लाख है। हिन्दू तीसरे नंबर पर है और उसके पाठकों की संख्या 53.73 लाख है। 28.18 लाख पाठकों के साथ द टेलीग्राफ चौथे नंबर पर है। 27.68 लाख पाठकों के साथ डेक्कन क्रानिकल पाँचवे नंबर पर है। छठे नंबर पर टाइम्स समूह का व्यावसायिक अखबार द इकोनामिक टाइम्स है। उसके कुल पाठकों की संख्या 19.17 लाख है। मुंबई से निकलनेवाला टैबलाइड मिड-डे सातवें नंबर पर है। इसके पाठकों की संख्या 15.83 लाख है। आठवें नंबर पर द न्यू इंडियन एक्सप्रेस है जिसके पाठकों की संख्या 15.66 लाख है। मुंबई मिरर के पाठकों की संख्या 15.57 लाख है और वह नौवें नंबर पर है, जबकि दसवें नंबर पर डीएनए है और उसके पाठकों की कुल संख्या 14.89 लाख है।

साहित्यिक मेलों, आयोजनों में हिन्‍दी का स्पेस बढ़ रहा है और लेखन में विविधता भी बढ़ रही है। भारतीय भाषाओं के बीच हिन्दी का विशेष महत्व है। इसके लेखक भी खासी बड़ी संख्या में हैं। हिन्दी भाषा में प्रकाशन भी बहुत होता है। इसके प्रकाशकों की संख्या भी अच्छी खासी है। हिन्दी में पत्रिकाएँ बड़ी तादाद में निकलती हैं। इस दृष्टि से अन्य भाषाओं की तुलना में हिन्दी एक बहुप्रचलित भाषा है।

कहते हैं कि कबीर और तुलसी आज भी लोकप्रिय हैं, लेकिन आज कितने लोग तुलसीदास को काव्य-प्रेम के कारण पढ़ते हैं। भक्ति भावना के अन्तर्गत धार्मिक आन्दोलनों के अंग के रूप में इन्हें अधिक प्रसार मिला। बाद में स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी तथा दिनकर को लोकप्रियता मिली। प्रगतिशील आन्दोलन ने नागार्जुन, शील आदि को कुछ जनप्रियता दी,  लेकिन कुल मिलाकर कविता-प्रेम के कारण कविता पढ़ने-सुनने वाले हमेशा कम ही रहे। इसलिए आज भी यदि कविता के प्रति प्रेम कम है, तो कोई अनहोनी बात नहीं है। अक्सर सुनने को आता है कि कविता के पाठक नहीं रहे और कविता का भविष्य खतरे में है। लोग मान कर चलते हैं कि पहले का युग कविता के लायक था, आज का युग विरोधी है। सच तो यह है कि पिछले पाँच सौ वर्षों से स्वयं अंग्रेजी में कविता को लेकर क्षमायाचना का भाव रहा है। दो सौ साल पहले शेली को कहना पड़ा कि कवि दुनिया के मान्यताविहीन विधायक हैं, और वे आज भी हैं। हिन्दी में खड़ी बोली का इतिहास महज सौ साल का है। एक समय था जब निराला, पंत और प्रसाद की पुस्तकें भी बहुत कम छपती और बिकती थीं। कवि सम्मेलनों की परम्परा ने अवश्य कविता को साधारण लोगों से जोड़ा पर वह भी धीरे-धीरे फूहड़ हो गई।  बहरहाल इस विषय में कवियों को गंभीरता से सोचना होगा कि ऐसा क्यों हैं? आज कविता पाठकों के मन पर प्रभाव छोड़ पाने में अक्षम क्यों हो गई है?  कहीं उनमें ही तो कोई कमी नहीं है?

निश्‍चि‍त रूप से हिन्‍दी में साहित्य के पाठक कम हुए हैं। यह बात हिन्‍दी के तमाम प्रकाशक भी मानते हैं कि कविता-कहानी-उपन्यास के पाठक कम हुए हैं। आलोचना के पाठक तो पहले ही कम थे। हिन्‍दी के कई शीर्ष प्रकाशकों ने तो साहित्य छापना ही कम कर दिया है । साहित्येत्तर विषयों की किताबें धड़ाधड़ बिक रही है। कहीं आज का हिन्‍दी का लेखक-कवि  मध्यवर्ग का वह प्राणीभर तो नहीं, जिसे जनता और जनसामान्य से कोई लेना-देना नहीं इसलिए वह जन सामान्य से कोई तादात्म्य ही नहीं बिठा पा रहा है। वह ग्लोबलाइज हो गया है। व्यक्तिगत लाभ-हानि की बात भर सोच पा रहा है। उसका सोच द्विस्तरीय है। ऐसे में साहित्य के कम पढ़े जाने का रोना-धोना छोड़ उसे वस्तुगत आत्मविश्‍लेषण अवश्य करना होगा।

अनवर सुहैल की कवि‍ताएं

अनवर सुहैल

09 अक्टूबर 1964 को जन्‍में अनवर सुहैल के दो उपन्यास, तीन कथा संग्रह और दो कविता संग्रह प्रकाशि‍त हो चुके हैं। वह ‘संकेत’ का संपादन कर रहे हैं। अनवर सुहैल की कवि‍ताएं-

सबूत

कर रहा हूँ इकट्ठा
वो सारे सबूत
वो सारे आँकडे

जो सरासर झूठे हैं
और
जिन्‍हें बडी खूबसूरती से
तुमने सच का जामा पहनाया है
कितना बडा़ छलावा है
मेरे भोलेभाले मासूम जन
आसानी जाते हैं झाँसे में

जादूगरों
हाथ की सफाई के माहिर लोगों
तुम्हारा तिलस्म है ऐसा
कि सम्मोहित से लोग
कर लेते यकीन
अपने मौजूदा हालात के लिए
खुद को मान लेते कुसूरवार
खुद को भाग्यहीन……”

 उसने अपनी बात कही तो

उसने अपनी बात कही तो
भड़क उठे शोले
गरज उठी बंदूकें
चमचमाने लगीं तलवारें
निकलने लगी गालियाँ…

चारों तरफ उठने लगा शोर
पहचानो…पहचानो
कौन हैं ये
क्या उसे नही मालूम
हमारी दया पर टिका है उसका वजूद
बता दो संभल जाए वरना
च्यूंटी की तरह मसल दिया जायेगा उसे…

वो सहम गया
वो संभल गया
वो बदल गया
जान गया कि
उसका पाला सांगठनिक अपराधियों से है….

प्रेम कविता

उसने मुझसे कहा
ये क्या लिखते रहते हो
गरीबी के बारे में
अभावों, असुविधाओं,
तन और मन पर लगे घावों के बारे में
रईसों, सुविधा-भोगियों के खिलाफ
उगलते रहते हो ज़हर
निश-दिन, चारों पहर
तुम्हे अपने आस-पास
क्या सिर्फ दिखलाई देता है
अन्याय, अत्याचार
आतंक, भ्रष्टाचार!!
और कभी विषय बदलते भी हो
तो अपनी भूमिगत कोयला खदान के दर्द का
उड़ेल देते हो
कविताओं में
कहानियों में
क्या तुम मेरे लिए
सिर्फ मेरे लिए
नहीं लिख सकते प्रेम-कवितायें…

मैं तुम्हे कैसे बताऊँ प्रिये
कि  बेशक मैं लिख सकता हूँ
कवितायें सावन के फुहारों की
रिमझिम बौछारों की
उत्सव-त्योहारों की कवितायें
कोमल, सांगीतिक छंद-बद्ध कवितायें
लेकिन तुम मेरी कविताओं को
गौर से देखो तो सही
उसमे तुम कितनी ख़ूबसूरती से छिपी हुई हो
जिन पंक्तियों में
विपरीत परिस्थितियों में भी
जीने की चाह लिए खडा़ दि‍खता हूँ
उसमें  तुम्ही तो मेरी प्रेरणा हो…
तुम्ही तो मेरा संबल हो…..

सिर झुकाना नहीं आता

क्या करें,
इतनी मुश्किलें हैं फिर भी
उसकी महफ़िल में जाकर मुझको
गिडगिडाना नहीं भाता…..
वो जो चापलूसों से घिरे रहता है
वो जो नित नए रंग-रूप धरता है
वो जो सिर्फ हुक्म दिया करता है
वो जो यातनाएँ दे के हँसता है
मैंने चुन ली हैं सजा की राहें
क्योंकि मुझको हर इक चौखट पे
सर झुकाना नहीं आता…
उसके दरबार में रौनक रहती
उसके चारों तरफ सिपाही हैं
हर कोई उसकी इक नज़र का मुरीद
उसके नज़दीक पहुँचने के लिए
हर तरफ होड मची रहती है
और हम दूर दूर रहते हैं
लोगों को आगाह किया करते हैं
क्या करें,
इतनी ठोकरें खाकर भी मुझको
दुनियादारी निभाना नहीं आता……

दुःख सहने के आदी

उनके जीवन में है दुःख ही दुःख
और हम बड़ी आसानी से कह देते
उनको दुःख सहने की आदत है
वे सुनते अभाव का महा-आख्यान
वे गाते अपूरित आकांक्षाओं के गान
चुपचाप सहते जाते जुल्मो-सितम

और हम बड़ी आसानी से कह देते
अपने जीवन से ये कितने संतुष्ट हैं
वे नही जानते कि उनकी बेहतरी लिए
उनकी शिक्षा, स्वास्थ और उन्नति के लिए
कितने चिंतित हैं हम और
सरकारी,  गैर-सरकारी संगठन
दुनिया भर में हो रहा है अध्ययन
की जा रही हैं पार-देशीय यात्राएं
हो रहे हैं सेमीनार, संगोष्ठिया…

वे नही जान पायेंगे कि उन्हें
मुख्यधारा में लाने के लिए
तथाकथित तौर पर सभ्य बनाने के लिए
कर चुके हजम हम
कितने बिलियन डालर
और एक डालर की कीमत
आज साठ  रुपये  है!

इत्ते सारे

इत्ते सारे लोग यहाँ हैं
इत्ती सारी बातें हैं
इत्ते सारे हँसी-ठहाके
इत्ती सारी घातें हैं

बहुतों के दिल चोर छुपे हैं
साँप कई हैं अस्तीनों में
दाँत कई है तेज-नुकीले
बड़े-बड़े नाखून हैं इनके
अक्सर ऐसे लोग अकारण
आपस में ही, इक-दूजे को
गरियाते हैं..लतियाते हैं

इनके बीच हमें रहना है
इनकी बात हमें सुनना है
और इन्हीं से बच रहना है

जो थोड़ें हैं सीधे-सादे
गुप-चुप, गम-सुम
तन्हा-तन्हा से जीते हैं
दुनियादारी से बचते हैं
औ’ अक्सर ये ही पिटते हैं
कायरता को, दुर्बलता को
किस्मत का चक्कर कहते हैं
ऐसे लोगों का रहना क्या
ऐसे लोगों का जीना क्या

रेखा चमोली की कवि‍तायें

8 नवम्‍बर, 1979 को कर्णप्रयाग, उत्‍तराखंड में जन्‍मी रेखा चमोली को हाल ही में ‘सूत्र सम्मान-2012’ दि‍ये जाने की घोषणा हुई है। उनकी कुछ कवि‍तायें-

अस्‍तित्‍व

दुनिया भर की स्‍त्रि‍यों
तुम जरूर करना प्रेम
पर ऐसा नहीं कि
जिससे प्रेम करना उसी में
ढूंढ़ने लगना
आकाश, मिट्टी, हवा, पानी, ताप

तुम अपनी जमीन पर रोपना
मनचाहे पौधे
अपने आकाश में भर लेना
क्षमता भर उड़ान
मन के सारे ओने-कोने
भर लेना ताजी हवा से
भीगना जी भर के
अहसासों की बारिश में
आवश्यकता भर ऊर्जा को
समेट लेना अपनी बाहों में

अपने मनुष्य होने की संभावनाओं को
बनाए रखना
बचाए रखना खुद को
दुनिया के सौन्दर्य व शक्‍ति‍ में
वृद्धि‍ के लिये
दुनिया के अस्‍ति‍त्‍व को
बचाए रखने के लिये।

उडा़न

एक स्त्री कभी नहीं बनाती बारूद बंदूक
कभी नहीं रंगना चाहती
अपनी हथेलियाँ खून से
एक स्त्री जो उपजती है जातिविहीन
अपनी हथेली पर दहकता सूरज लिये
रोशनी से जगमगा देती है कण-कण
जिसकी हर लडा़ई में
सबसे बडी़ दुश्मन बना दी जाती है
उसकी अपनी ही देह

एक स्त्री जो करना जानती है तो प्रेम
देना जानती है तो अपनापन
बोना जानती है तो जीवन
भरना जानती है तो सूनापन
बिछ-बिछ जाने में महसूस करती है बड़प्पन
और बदले में चाहती है थोडी़ सी उडा़न

एक स्त्री सहती है
बहती है
लड़ती है
बस उड़ नहीं पाती
फिर भी नहीं छोड़ती पंख फड़फडा़ना
अपनी सारी शक्‍ति‍ पंखों पर केन्‍द्रि‍त कर
एक स्त्री तैयार हो रही है उडा़न के लिये।

नदी उदास है

आजकल वह
एक उदास नदी बनी हुई है
वैसे ही जैसे कभी
ककड़ी बनी
अपने पिता के खेत में लगी थी
जिसे देखकर हर राह चलते के मुँह में
पानी आ जाता था

अपनी ही उमंग में
नाचती कूदती फिरती यहाँ वहाँ
अचानक वह बांध बन गयी

कभी पेड़ बनकर
उन बादलों का इन्तजार करती रह गयी
जो पिछली बार बरसने से पहले
फिर-फिर आने का वादा कर गये थे

ऐसे समय में जबकि
सबकुछ मिल जाता है डिब्बाबन्द
एक नदी का उदास होना
बहुत बड़ी बात नहीं समझी जाती ।

छुट्टी

सुबह से देख रहा हूँ उसे
बिना किसी हड़बडी़ के
जुट गयी है रोजमर्रा के कामों में
मैं तो तभी समझ गया था
जब सुबह चाय देते समय
जल्दी-जल्दी कंधा हिलाने की जगह
उसने
बडे़ प्यार से कंबल हटाया था
बच्चों को भी सुनने को मिला
एक प्यारा गीत
नाश्ता भी था
सबकी पसंद का
नौ बजते-बजते नहीं सुनार्इ दी
उसकी स्कूटी की आवाज

देख रहा हूँ
उसने ढूंढ़ निकाले हैं
घर भर के गन्दे कपडे़ धोने को
बिस्तरे सुखाने डाले हैं छत पर
दालों, मसालों को धूप दिखाने बाहर रखा है

जानता हूँ
आज शाम
घर लौटने पर
घर दिखेगा ज्यादा साफ, सजा-सँवरा
बिस्तर नर्म-गर्म धुली चादर के साथ
बच्चे नहाए हुए
परदे बदले हुए
चाय के साथ मिलेगा कुछ खास खाने को
बस नहीं बदली होगी तो
उसके मुस्कराते चेहरे पर
छिपी थकान
जिसने उसे अपना स्थाई साथी बना लिया है

जानता हूँ
सोने से पहले
बेहद धीमी आवाज में कहेगी वह
अपनी पीठ पर
मूव लगाने को
आज वह छुट्टी पर जो थी।

मैं कभी गंगा नहीं बनूँगी

तुम चाहते हो
मैं बनूँ
गंगा की तरह पवित्र
तुम जब चाहे तब
डाल जाओ उसमें
कूडा़-करकट मल अवशिष्ट
धो डालो
अपने
कथित-अकथित पाप
जहाँ चाहे बना बांध
रोक लो
मेरे प्रवाह को
पर मैं
कभी गंगा नहीं बनूँगी
मैं बहती रहूँगी
किसी अनाम नदी की तरह
नहीं करने दूँगी तुम्हें
अपने जीवन में
अनावश्यक हस्तक्षेप
तुम्हारे कथित-अकथित पापों की
नहीं बनूँगी भागीदार
नहीं बनाने दूँगी तुम्हें बांध
अपनी धाराप्रवाह हँसी पर
मैं कभी गंगा नहीं बनूँगी
चाहे कोई मुझे कभी न पूजे।

नींद चोर

बहुत थक जाने के बाद
गहरी नींद में सोया है
एक आदमी
अपनी सारी कुंठाएं
शंकाएं
अपनी कमजोरियों पर
कोई बात न सुनने की जिद के साथ
अपने को संतुष्ट कर लेने की तमाम कोशिशों के बाद
थक कर चूर
सो गया है एक आदमी
अपने बिल्कुल बगल में सोर्इ
औरत की नींद को चुराता हुआ।

प्रेम

चट्टानों पर उग आती है घास
किसी टहनी का
पेड़ से कटकर
दूर मिट्टी में फिर से
फलना फूलना
प्रेम ही तो है
प्रेम में पलटती हैं ऋतुएं।

धनिया के फूल

मेरे सामने की क्यारी में
खिल रहे हैं
धनिया के फूल
सफेद, हल्का नीला,मिला जुला सा रंग
नाजुक पंखुडि़यां, कोमल खुशबूदार पत्‍ति‍याँ
चाहो तो पत्‍ति‍यों को डाल सकते हो
दाल, सब्जी में
या बना सकते हो लजीज चटनी
ये छोटे-छोटे धनिया के फूल
नहीं करते कुछ खास आकर्षित
गुलाब या गेंदे की तरह
नहीं चढ़ते किसी देवी-देवता के
चरणों में
किसी नवयुवती ने नहीं किया
कभी इनका श्रृंगार
पर ये नन्हे-नन्हें फूल
जब बदल जाएंगे
छोट-छोटी हरी दानियों में
तो खुद ही बता देंगे
अपना महत्व
कि इनके बिना संभव नहीं है
जायकेदार, स्वादिष्ट भोजन।

प्रबन्धन

पुराने किस्से कहानियों में सुना था
ठगों के गाँव के बारे में
ठगी बहुत बुरा काम होता था
धीरे-धीरे अन्य चीजों की तरह
ठगी का भी विकास हुआ
अब ये काम लुकछिप कर नहीं बल्‍कि‍
खुलेआम प्रचार प्रसार करके
सिखाया जाने लगा
ठगों के गाँव अब किस्से कहानियों में नहीं
शानों शौकत से
भव्य भवनों में आ बसे हैं
जहाँ से निकलते हैं
लबालब आत्मविश्‍वास से भरे
छोटे-बडे ठग
जो जितने ज्यादा लोगों को ठग लेता है
उतना ही बडा प्रबन्धक कहलाता है।

पढे़-लिखे समझदार लोग

सीधे सीधे न नहीं कहते
न ही उंगली दिखाकर दरवाजे की ओर इशारा करते हैं
वे तो बस चुप्पी साध लेते हैं
आपके आते ही व्यस्त होने का दिखावा करने लग जाते हैं
आपके लायक कोई काम नहीं होता उनके पास
चुप्पी समझदारी है हमेशा
आप पर कोई आरोप नहीं लगा सकता ऐसा वैसा कहने का
ज्यादा पूछने पर आप कह सकते हैं
मैंने क्या कहा?
ये चुप्पी की संस्कृति जानलेवा है।

संतोष अलेक्स की कवितायें

युवा मलयालम कवि संतोष अलेक्स का जन्म 1971  में केरल के तिरूवल्ला में हुआ। उनकी कविताओं का हिंदी, अंग्रेजी, तेलुगु एवं ओडिया भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। इन कविताओं का अनुवाद स्‍वयं कवि द्वारा किया गया है-

सीमा

चावल की खेती करने
जगह ढूंढते-ढूंढते
सीमा पर पहुँचा
इस पार व उस पार
एक ही सूर्य-चाँद
बारिश
हवा
तूफान
बाडा जानता है नफरत के बीज बोनेवाले को
शतरंज के मोहरे-सा
घोडा़, हाथी, रथ
सिपाही आगे बढ़ने लगे
राजा की मृत्यु नहीं होती
हारे या जीते
वह राजा ही है
बस,
सीमा पर अंतिम मौत
मेरी हो!

दूरी

हाथ दुखने पर
मैंने
आँख व आँसू के बीच की दूरी को नापा
फिर
पर व फड़फड़ाहट
पृथ्वी व मरूद्वीप
धुँआ व आग
वस्तु व परछाई
लहर व समुंदर के बीच की दूरी
को नापा
लेकिन
हाथ व दर्द की दूरी को
नाप न सका!

सीधा

पहाडी पर स्थित
पेड़ की टहनी पर खडे़ होकर
उसने सम्‍बोधित किया
सच बतलाने के लिए प्रेरित करनेवाले
रावुण्णी मास्टर
कठिनाइयों से जूझने का साहस दिलानेवाली
बहन
मिलकर बांटने को उत्साहित
भाई
दया भरी माँ
इस दुनिया में मुझे
सीधे खड़ा रहना है

गले में डाले फंदे के संग
नीचे की ओर कूदकर
वह सीधा ही खड़ा रहा !

सुबह

सुबह ने आकर मुझे चुम्बित किया तो
मैं उठकर बरामदे में पहुंचा
आराम कुर्सी में बैठ कर
बीती रात को रचे षड्यंत्रों को याद करने  की काशिश की
इस बीच गाय ने रंभाया
और सारे षड्यंत्र उसमें विलीन हो गए
जिसे पुन: याद नहीं कर सका

प्रेम गीत

हमारे
प्यार से
सहपाठी ईर्ष्‍या करते थे

आम प्रेमियों की तरह
हमने
कुछ नहीं किया

इसलिए
आज भी हम
प्यार करते हैं
उसका अपना परिवार है
मेरा अपना

भला

यीशु और सुकरात
भले लोग थे

फिर भी
मारे गए

मुझे भला नहीं
बनना

गर्मियां

गर्मियों का मतलब
शहर से गांव लौटना होता है

वहां जाने-अनजाने संबंधियों के संग
खेतों में अहातों में खेलता फिरा
तालाब में डुबकियां लगाईं
जामुन और इमलियों के पेडों पर चढ़ा
इस तरह बीत गए कितने ही दिन
पर रिश्तों की कीमत जानी जब
शहर लौटने का समय हो चुका था

 

 

कविता को मिले नए स्वर

नई दिल्ली : कवि और कविता से कविताप्रेमी हिंदी समाज का सीधा संपर्क-संवाद बढ़े इस उद्देश्य से इंडिया हैबिटैट सेंटर में 15 जुलाई, 2011 की शाम को ‘कवि के साथ’ का आयोजन किया गया। इसमें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित हिंदी के वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण ने अपने नए कविता संग्रह ‘हाशिये के बाहर’ से कुछ कविताएं सुनाईं। युवा कवि अरुण देव ने ‘रक्‍त बीज’, ‘सरयू में काँप रही थी अयोध्या की परछाईं’, ‘लालटेन’, ‘लय का भीगा कंठ’, ‘छल’, ‘शास्त्रार्थ’ आदि तथा अनुज लुगुन ने ‘ग्लोब’, ‘महुवाई गंध’, ‘अनायास’ आदि कविताएं सुनाईं। कार्यक्रम के आरंभ में ‘आज का समय और हिंदी कविता’ विषय पर आलोचक आशुतोष कुमार ने संक्षिप्त टिप्पणी की। उन्होंने कविता के तेवर में आ रहे बदलाव को रेखांकित किया।
कार्यक्रम का एक सत्र कवियों के साथ सीधे संवाद का था, लेकिन श्रोताओं के अनुरोध पर इसमें भी काव्य पाठ किया गया।
कार्यक्रम की परिकल्पना करने वाले सत्यानंद निरुपम ने बताया कि इंडिया हैबिटेट सेंटर की योजना ‘कवि के साथ’ को हर दो माह में आयोजित करने की है। इसमें पुराने, युवा और नए कवि एक मंच पर काव्य  पाठ करेंगे। कविताओं के पाठ के साथ उन पर चर्चा की जाएगी। उन्होंने कहा कि इस बार कवियों से सीधे संवाद के सत्र को श्रोताओं के अनुरोध पर स्थगित कर दिया गया था, लेकिन आने वाले कार्यक्रमों में इस अनिवार्य किया जाएगा।

अरुण देव की कुछ कविताएं-

रक्त बीज

जैसे कोई अभिशप्त मंत्र जुड़ गया हो मेरे नाभिनाल से
हर पल अभिषेक करता हुआ मेरी आत्मा का
मेरी हर कोशिका से प्रतिध्वनित है उसका ही नाद
उसकी थरथराहट की लपट से जल रहीं हैं मेरी आँखें

इस धरा के सारे फल मेरे लिए
काट लूँ धरती की सारी लकड़ी
निकाल लूँ एक ही बार में सारा कोयला
और भर दूँ धुएं से दसों दिशाओं को

मेरी थाली भरी है
कहीं टहनी पर लटके किसी घोसलें के अजन्मे शिशु के स्वाद से
अब चुभता नहीं किसी लुप्तप्राय मछली का कोई कांटा
मेरे समय को

मेरी इच्छा के जहरीले नागों की फुत्कार से
नीला पड़ गया है आकाश
जहां दम तोड़ कर गिरती है
पक्षिओं की कोई-न-कोई प्रजाति रोज

गुनगुनाता हूँ मोहक क्रूरता के छंद
झूमता हूँ निर्मम सौंदर्य के सामूहिक नृत्य में
भर दी है मैंने सभ्यता की वह नदी शोर और चमक से
जो कभी नदी की ही तरह निर्मल थी
अब तो वहाँ भाषा का फूला हुआ शव है
किसी संस्कृति के बासी फूल

नमालूम आवाज में रो रहा है कोई वाद्ययंत्र

मेरे रक्त बीज हर जगह एक जैसे
एक ही तरह बोलते हुए
खाते और गाते और एक ही तरह सोचते हुए
देखो उनकी आँखों में देखो मेरा अमरत्व।

 

सरयू में काँप रही थी अयोध्या की परछाईं

अयोध्या के पास फैज़ से आबाद इस नगर की एक गली में
तब रहती थीं कुछ खुदमुख्तार औरतें
अदब और तहजीब की किसी पुरानी दरी पर बैठीं
स्त्री-पुरूष के आकर्षण के फीके उत्सव में मटमैली होती हुईं
रोज-ब-रोज

उस गली पर और उन जैसी तमाम गलिओं पर
जो हर नगर में सितारों की तरह सजती थीं
और चमकती थीं ख्वाबों में कभी
बीसवीं शताब्दी का कुहासा कुछ इस तरह उतरा
कि टूट कर बिखर गये उमराव जान के घुंघरू
बुझ चले कजरी, ठुमरी दादरा के रौशन चराग
जहां से अब रह-रह आती
बेगम अख्तर की उदास कर देने वाली आवाज़

यह वह समय था जब
दिग्विजय के लिए निकले रथ के उड़ते धूल से
ढक गए थे राम
दसो दिशाओं से रह-रह उठता विषम हूहू
और बाज़ार के लिए सब कुछ हो गया था कारोबार

बाज़ार के रास्ते में आ रही थी यह गली

दोपहर की चिलचिलाती धूप में
उस दिन कुछ लोग आ खड़े हुए
सरयू में काँप रही थी अयोध्या की परछाई
हिल रही थीं सारी पुरानी इमारतें

बेनूर खिड़किओं पर लटके उदास परदों के पीछे
सिर जोड़े खड़ी थीं स्त्रियां
अवांछित, अपमानित और असहाय

ये स्त्रियां अपनी- अपनी मिथिला में
कभी देखती थीं अपने राम के सपने
किसी विद्यापति ने इनके लिए भी लिखी थीं पदावलियां
जिसे जब-तब ये आज भी गुनगुनाने बैठ जाती हैं

उन्हें खदेड़ने के लिए देखते-देखते निकल आए बनैले सींग
छुपे दांत और पुराने नाख़ून

उन पर गिरने लगे अपशब्द के पत्थर
हालांकि उनका होना ही अब एक गाली थी
गुम चोट के तो कितने निशान थे वहां

जयघोष में कौन सुनता यह आर्तनाद
शोर में यह चीख

यह अलग तरह की क्रूरता थी
देह से तो वे कब की बेदखल थीं
उन्हें तो दिशाएं तक न पहचानतीं थीं

रात के परिश्रम से श्रीहीन श्लथ देह की झुकी आत्माएं
रह-रह देखती अयोध्या की ओर

वे तमतमाए चहरे
रात की पीली रौशनी में कितनी चाह से देखते थे उन्हें

इन्ही स्त्रिओं ने न जाने कितनी बार
मुक्त किया था उन्हें उनकी ही अंधी वासना से

अब यह स्त्री-पुरूष का आदिम खेल न रहा
कि स्त्री अपने आकर्षण से संतुलित कर ले पुरूष की शक्ति

बगल में बह रहे सरयू ने देखी
सदिओं बाद फिर एक वनवास

इनके जनक थे
बदकिस्मती से रावण भी थे सबके

पर इनके लिए कोई युद्ध नहीं लड़ा गया
राज-नीति के बाहर अगर कही होते राम तो क्या करते।

लालटेन

अभी भी वह बची है
इसी धरती पर

अँधेरे के पास विनम्र बैठी
बतिया रही हो धीरे-धीरे

सयंम की आग में जैसे कोई युवा भिक्षुणी

कांच के पीछे उसकी लौ मुस्काती
बाहर हँसता रहता उसका प्रकाश
जरूरत भर की नैतिकता से बंधा

ओस की बूंदों में जैसे चमक रहा हो
नक्षत्रों से झरता आलोक

अक्सर अँधेरे को अँधेरे के बाहर कहा गया
अँधेरे का सम्मान कोई लालटेन से सीखे
अगर मंद न कर दिया जाए उसे थोड़ी देर में
वह ढक लेती खुद को अपनी ही राख से

सिर्फ चाहने भर से वह रौशन न होती
थोड़ी तैयारी है उसकी
शाम से ही संवरती
भौंए तराशी जातीं
धुल-पुछ कर साफ होना होता है
कि तन में मन भी चमके

और जब तक दोनों में एका न हो
उजाला हँसता नहीं
कुछ घुटता है और चिनक जाता है कहीं
भभक कर बुझ जाती है लौ

वह अलंकार नहीं थी कभी भी
न अहंकार, न ऐठ, न अति
कि चुकानी पड़े कीमत और फिर जाए मति।
उसे तो रहना ही है।

 

लय का भीगा कंठ

कह रहा था मैं कुछ
ठीक उसी तरह जैसे बांसुरी के इक छोर पर कहती है हवा
और जो देर तक गूंजता रहता है
मन की बावड़ी में
जिसकी सीढ़ी पर बैठे-बैठे
भीग जाती हैं आँखें

यह किसका रुदन है
कौन सी भाषा में हिचकियाँ बुदबुदाती हैं अपने पश्चाताप

न जाने क्या कहा हवा ने
और क्या तो सुना बाँस के उस खोखले टुकड़े ने
जहां कब से बैठा था वह सघन दुःख

जो इस धरती का है
किसी दरवेश, फकीर, संत का है
कि प्रेम रत जोड़ो के सामूहिक वध पर
विलाप करते उस क्रौंच का है
जो रो रहा है तबसे
जब अर्थ तक पहुचने के लिए
शब्दों के पुल तक न थे
और तभी से भीगा है
लय का कंठ

और जिसे कहने की कोशिश  में रूँध जाता है मेरा गला।

 

छल

अगर मैं कहता हूँ किसी स्त्री से
तुम सुंदर हो

क्या वह पलट कर कहेगी
बहुत हो चुका तुम्हारा यह छल
तुम्हारी नज़र मेरी देह पर है
सिर्फ देह नहीं हूँ मैं

अगर मैंने कहा होता
तुम मुझे अच्छी लगती हो
तो शायद वह समझती कि उसे अच्छी बनी रहने के लिए
बने रहना होगा मेरे अनुकूल
और यह तो अच्छी होने की अच्छी-खासी सज़ा है

मित्र अगर कहूँ
तो वह घनिष्ठता कहाँ
जो एक स्त्री-पुरूष के शुरूआती आकर्षण में होती है
दायित्वविहीन इस संज्ञा से जब चाहूँ जा सकता हूँ बाहर
और यह हिंसा अंततः किसी स्त्री पर ही गिरेगी

सोचा की कह दूँ कि मुझे तुमसे प्यार है
पर कई बार यह इतना सहज नहीं रहता
बाज़ार और जीवन-शैली से जुडकर इसके मानक मुश्किल हो गए हैं
और अब यह सहजीवन की तैयारी जैसा लगता है
जो अंततः एक घेराबंदी ही होगी किसी स्त्री के लिए

अगर सीधे कहूँ
कि तुम्हरा आकर्षण मुझे
स्त्री-पुरूष के सबसे स्वाभाविक रिश्ते की ओर ले जा रहा है…
तो इसे निर्लज्जता समझा जायेगा
और वह कहेगी
इस तरह के रिश्ते का अन्त एक स्त्री के लिए पुरूष की तरह नही होता…

भाषा से परे
मेरी देह की पुकार को तुम्हारी देह तो समझती है
भाषा में तुम करती हो इंकार

 

शास्त्रार्थ

लाओत्सु के दरवाजे पर
कृतज्ञता से भरे हुए कन्फूशियस की पदचापें थीं
लाओत्सु को यह सुगंध दूर से ही मिलने लगी थी
कहा जाता है लाओत्सु अस्सी वर्ष का गूढ़ अनुभव
और सम्मोहक करुणा लेकर पैदा हुए थे
तो कन्फूशियस ने सीधे चलते हुए
पा ली थी सहजता
यह ईसा के 600 वर्ष पूर्व की पृथ्वी थी
जब किसी दार्शनिक से मिलने
उतना ही महान दार्शनिक चला आता था

शाम घिर आयी थी
दोनों बैठे रहे एक-दूसरे के सम्मुख
बाहर हरी दूब पर हंस रहा था चन्द्रमा
अंदर दिये की लौ में निर्वाण की शीतलता थी

इस शास्त्रार्थ में शब्दों के जाल नहीं थे
जिसमे अक्सर फँस जाता था सत्य
न विजय की इच्छा थी
न पराजय का डर
सत्य की समझ का कोई अकेला भाष्य भी
किसी के पास नहीं था
एक विनम्र मौन से भर गया था वह कक्ष
जहाँ वे बैठे रहे
ऐसे ही देर रात तक नि:शब्द

सत्य झर रहा था
पतझर में जैसे पीले पत्ते बेआवाज।

 

अनुज लुगुन की कुछ कविताएं-

ग्लोब

मेरे हाथ में कलम थी
और सामने विश्व का मानचित्र
मैं उसमें महान दार्शनिकों
और लेखकों की पंक्तियाँ ढूँढ़ने लगा
जिसे मैं गा सकूँ
लेकिन मुझे दिखायी दी
क्रूर शासकों द्वारा खींची गई लकीरें
उस पार के इंसानी ख़ून से
इस पार की लकीर, और
इस पार के इंसानी  ख़ून से
उस पार की लकीर।

मानचित्र की तमाम टेढ़ी-मेंढ़ी
रेखाओं को मिलाकर भी
मैं ढूंढ नही पाया
एक आदमी का चेहरा उभरने वाली रेखा
मेरी गर्दन ग्लोब की तरह ही झुक गई
और मैं रोने लगा।

तमाम सुनी-सुनाई, बताई
तर्कों को दरकिनार करते हुए
आज मैंने जाना
ग्लोब झुकी हुई क्यों है।

 

महुवाई गंध

(कामगरों एंव मजदूरों की ओर से उनकी पत्नियों के नाम भेजा गया प्रेम-संदेश )

ओ मेरी सुरमई पत्नी!
तुम्हारे बालों से झरते है महुए।

तुम्हारे बालों की महुवाई गंध
मुझे ले आती है
अपने गाँव में, और
शहर के धुल-गर्दों के बीच
मेरे बदन से पसीने का टपटपाना
तुम्हे ले जाता है
महुए के छांव में
ओ मेरी सुरमई पत्नी !
तुम्हारी सखियॉं तुमसे झगड़ती हैं कि
महुवाई गंध महुए में है।

मुझे तुम्हारे बालों में
आती है महुवाई गंध
और तुम्हें
मेरे पसीनों में
ओ मेरी महुवाई पत्नी !
सखियों का बुरा न मानना
वे सब जानती हैं कि
महुवाई गंध हमारे प्रेम में है।

 

अनायास

अनायास ही लिख देता हूँ
तुम्हारा नाम
शिलापट पर अंकित शब्दों-सा
हृदय में टंकित
संगीत के मधुर सुरों-सा
अनायास ही गुनगुना देता हूँ
तुम्हारा नाम ।

अनायास ही मेघों-सी
उमड़ आती हँ स्मृतियाँ
टपकने लगती हैं बून्दें
ठहरा हुआ मैं
अनायास ही नदी बन जाता हूँ
और तटों पर झुकी
कँटीली डालियों को भी चूम लेता हूँ
रास्ते के चट्टानों से मुस्कुरा लेता हूँ।

शब्दों के हेर -फेर से
कुछ भी लिखा जा सकता है
कोई भी कुछ भी बना सकता है
मगर तुम्हारे दो शब्दों से
निकलते हैं मिट्टी के अर्थ
अंकुरित हो उठते हैं सूखे बीज
और अनायास ही स्मरण हो आता है
लोकगीत के प्रेमियों का किस्सा ।
अनायास ही स्मरण हो उठता है
लोकगीत के प्रेमियों का किस्सा
किसी राजा के दरबार का कारीगर
जिसका हुनर ताज तो बना सकता है
लेकिन फफोले पड़े उसके हाथ
अंधेरे में ही पत्नी की लटों को तराशते हैं
अनायास ही स्मरण हो आता है
उस कारीगर का चेहरा
जिस पर लिखी होती हैं सैकड़ों कविताएँ
जिसके शब्द, भाव और अर्थ
आँखों में छुपे होते हैं
जिसके लिए उसकी पत्नी आँचल पसार देती है
कीमती हैं उसके लिए
उसके आँसू
उसके हाथों बनाए ताज से
मोतियों की तरह
अनायास ही उन्हे
वह चुन लेती है।

अनायास ही स्मरण हो उठते हैं
सैकड़ों हुनरमन्द हाथ
जिनकी हथेलियों पर कुछ नहीं लिखा होता है
प्रियतमा के नाम के सिवाय।
अनायास ही उमड़ आते हो तुम
तुम्हारा नाम
जिससे निकलते हैं मिट्टी के अर्थ
जिससे सुलगती है चूल्हे की आग
तवे पर इठलाती है रोटी
जिससे अनायास ही बदल जाते हैं मौसम ।

अनायास ही लिख देता हूँ
तुम्हारा नाम
अनायास ही गुनगुना देता हूँ
संगीत के सुरों-सा
सब कुछ अनायास
जैसे अपनी धुरी पर नाचती है पृथ्वी
और उससे होते
रात और दिन
दिन और रात
अनायास
सब कुछ….

गरीबों और अपवंचितों का स्‍वर : शेफालिका

नागार्जुन, धूमिल जैसे जनकवियों की परम्‍परा के कवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ के पहले कविता संग्रह ‘नयी खेती’ पर शोध छात्रा और युवा लेखिका शेफालिका की समीक्षा-

रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ नए अंदाज नए तेवर के कवि हैं । ‘नयी खेती’ इनका पहला काव्य संग्रह है। यह बात बहुत अद्भुत है कि आज के समय में जहाँ कुछ ऐसे भी लिखनेवाले हैं, जिन्हें लिखने कि बेचैनी से पहले छप जाने की टीस सताती रहती है, नाक में दम किये रहतीं, वहीं विद्रोही छपने-छपवाने और लिखने-लिखवाने की कुश्ती से बेफिक्र हैं। विद्रोही ने कविता का बस पाठ किया, जगह-जगह- ढाबा, कैंटीन, जन-आन्दोलन, सड़कों पर कवितायें बस कहते रहे। जवाहर लाल नेहरू विश्‍वविद्यालय (जेएनयू) के विद्यार्थियों ने बड़ी मशक्कत के बाद उन्हें छपने-छपवाने और कविताओं को जमा करने के लिए तैयार किया। दरअसल विद्रोही पर बात करना न केवल उनकी कविता पर बात करना है,  बल्कि उन कविताओं पर बात करना है जो कविता के मायने को सार्थक बनाती हैं। न छपकर भी जिस तरीके से जेएनयू में तीन दशकों तक हरेक पीढ़ी के दिमाग में कुछ पंक्तियों को टंकित कर दिया है, वे किसी भी ‘इरेजर’ या ‘बैकस्पेस से मिटनेवाली नहीं हैं। न छपकर भी बी.बी.सी. से लेकर स्वतंत्र डॉक्यूमेंट्री और विदेशों में भी सुने जाने वाला यह इंसान विरोध दर्ज करने की मिसाल है।

इस पुस्तक में कविताओं के साथ बिरहा गीत, गजलें और नज्म भी हैं। बिरहा गीत अवधी में हैं। इसके अलावा सभी हिंदी में हैं।

इस पुस्तक की पहली कविता ‘जन-गण-मन’  में कवि भारतीय व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। कवि इस कविता में मौत की बात करता है और वह मौत इस चरमराई हुई व्यवस्था, झूठे वादों-दावों की है- ‘मैं भी मरूँगा/और भारत भाग्य विधाता भी मरेगा/मरना तो जन-गण-मन अधिनायक को भी पड़ेगा’। कवि अपनी मृत्यु की बात भी करता है, मगर वह पतझर में नहीं बसंत में मरना चाहता है। जब हर तरफ हरियाली हो, सबका पेट भरा हो, भूख से किसी की मौत न हो रही हो- ‘फिर मैं मरूं- आराम से, उधर चलकर बसंत ऋतु में/जब दानों में दूध और आमों में बौर आ जाता है।’ बसंत ऋतु की यह चाह उनकी सकारात्मकता को सामने लाता है।

इस संग्रह की बड़ी ख़ासियत इसकी गेयता है। आम इस्तेमाल, बोलचाल के शब्द हैं। अधिकांश कवितायेँ राजनीतिक हैं। एक कविता है ‘नूर मियां!’ कविता में दादी की आँखों का, नूर मियां के सुरमे का तो बखान है ही, साथ ही साथ भारत-पाकिस्तान के विभाजन के ऊपर भी संकेत है- ‘क्यों चले गए पाकिस्तान, नूर मियां?/कहते हैं कि नूर मियां के कोई था नहीं/तब क्या हम कोई नहीं होते थे नूर मियां के?/नूर मियां क्यों चले गए पाकिस्तान?/बिना हमको बताये ?।’ ‘नूर मियां!’ और ‘नानी’ दम भर में पढ़ी जाने वाली कवितायें हैं। लगता है, कवि अपने बचपन की कहानी सुना रहा है । इसी कहानी के माध्यम से वह राजनीतिक सवाल सामने रखता है।

‘धोबन का पता’,  ‘कन्हई कहार’, ‘भुखाली हलवाहशीर्षक कवितायें साधारण और आम-सी लग सकती हैं, लेकिन ‘धोबन का पता’  की जड़ें राजा रघु और उनकी प्रजाओं तक है, वहीं ‘भुखाली हलवाह’ वर्तमान व्यवस्था में फंसा हुआ है। जहाँ पूंजीवादी व्यवस्था उसे सबकुछ से महरूम रखती है और अर्द्धसामंती व्यवस्था उसे जी हुजूरी से मुक्त नहीं होने देती। कविता की चंद पक्तियां- ‘बिना सुरती के सबेरे कुछ होता ही नहीं/नहीं होता सुरती खाने के बाद भी/क्योंकि सबेरे कुछ होने के लिए/सोने के पहले भी कुछ होना चाहिए।’

संग्रह की कविताओं में वर्तमान व्यवस्था के प्रति विद्रोह, पुरानी बातों की चीर-फाड़, अमरीकी साम्राज्यवाद के खिलाफ गुस्सा, पूंजीवादी और सामंती ताकतों के खिलाफ आवाज है। लंबी कविताओं में एक अन्य कविता है- ‘कथा देश की…’। तमाम तरह के दंगों से लेकर हिंसा के व्यापारियों की बात की गयी है। दंगों के सरताज अमरीका की दादागिरी विश्वभर में फैली हुई है। भारतीय लोकतंत्र के आका भी उसके इशारे पर देश को झोंकने को तैयार बैठे हैं। राजनेता की सलाह होती है कि हम तो बुत बने ही हैं तुम भी कठपुतली हो जाओ ताकि खेल और आसान हो जाए। हमारे देश के लम्‍पट राजनीतिक/जनता को झांसा दे रहे हैं कि/बगावत मत करो/हिंदुस्तान सुरक्षा परिषद का सदस्य बनने वाला है/जनता कहती है/ भाड़ में जाये सुरक्षा परिषद! हम अपनी सुरक्षा खुद कर लेंगे। यह कविता कई परतों के साथ पूरी होती है।

विद्रोही की लंबी कविता पढ़ते हुए मैंने पाया कि ये कविताएं समग्रता में तो कई बातों को, सवालों को सामने लाती ही हैं, साथ ही इन कविताओं को अलग-अलग भागों को स्वतंत्र रूप से पढ़ने पर भी पूरी कविता ही लगती हैं। ‘नई खेती’ का कवि नई दुनिया रचने की बात करता है। नयापन लिए हुए यह कवि कई स्तरों पर नवीनता लिए है। ‘नई दुनिया’ कविता में कवि कहता है- ‘एक दुनिया हमको गढ़ लेने दो/जहां आदमी-आदमी की तरह/रह सके, कह सके, सुन सके, सह सके।’ क्रांति के लिए आगे बढ़ने को कवि प्रेरित करता है। कई छोटी कविताओं में कबीर के तेवर मिलते हैं। कबीर ने जैसे दो टूक बात कही थी वैसा ही भाव यहां भी है- तुम्हारे मान लेने से/पत्थर भगवान हो जाता है/लेकिन तुम्हारे मान लेने से/पत्थर पैसा नहीं हो जाता।’ कवि नये समाज की बात करता है- ‘उनका मानना है कि बगैर हाथ-पैर हिलाए-डुलाए न तो सामाजिक बदलाव संभव है ना ही क्रांति। व्यवस्था इतनी सड़ चुकी है कि उसको बदलना जोखिम जैसा है। राहें पथरीली उबड़-खाबड़ और टेढ़ी है। अब तो टेढ़ी राहे हैं कि टांगे टूट जाएंगी,/ये मां की पोसी टागें हैं भला कब काम आएगीं।’ इंकलाब का आकांक्षी कवि विद्रोही वामपंथी राजनीति में अपनी आस्था रखता है। इंकलाब के लिए खून का होना जरूरी है। खून होने भर से भी बात बनने वाली नहीं है। अनहोनी, भ्रष्टाचार, साम्राज्यवादी ताकतों, फिरकापरस्त नीतियों, जन विरोधी नीतियों के खिलाफ खून खौलना भी जरूरी है- ‘खून मर जाए तो इंकलाब ही न हो/इंकलाब न हो तो खून मर जाएगा।’ ‘अंधकार में’ कविता के माध्यम से कवि पंचायत बिठाना चाहता है। जिन बातों पर पंचायत बैठनी है वे हैं- गरीबों के तन पर वस्त्र और पेट में अनाज क्यों नहीं है, गरीबों की लाशों को गिद्ध नालियों में क्यों फेंक रहा है? दरोगा की बीबी का हार खोने पर बेवाओं के गहने को क्यों बटोरा जा रहा है? काजल, टिकुली, सिंदूर लगाना प्रश्नवाचक क्यों बन गया गरीबों के लिए?

विद्रोही के इस संग्रह में जहां रूढि़यों का सीधा-सीधा नकार है, क्रांति का आह्वान है, नये समाज की संकल्पना है, वहीं कवि चीजों को लेकर साफ और सुलझी समझ रखता है। तर्क देता है, जोश से भरता है, नई पौधों को, कुछ न करने की स्थिति में दुत्कारता है, मानदण्डों को पलटना चाहता है। वह ‘जन प्रतिरोध’ कविता में कहता है- ‘बड़ा भयंकर बदला चुकाती है ये जनता’।

‘औरतें’ इस संग्रह की जबरदस्त कविता है । कुएं में कूदकर जान देनेवाली और चिता में जलकर जान देनेवाले बयान के लिये वह पुलिस और पुरोहित दोनों को जिम्मेवार मानती हैं। कुएं में कूदकर जान देनेवाली और चिता में जलकर मरने के बयान के पीछे कवि पुलिस और पुरोहित दोनों को जिम्मेदार मानता है। औरतों की दशा के लिए जिम्मेदार मर्द ही होते हैं- ‘औरतें रोती जाती हैं/मरद मारते जाते हैं/औरतें और जोर से रोती हैं/मरद और जोर से मारते हैं/औरतें खूब जोर से रोती हैं/मरद इतने जोर से मारते हैं कि/वे मर जाती हैं।’ औरतों को मारने-पीटने, यातना देने का पुराना इतिहास रहा है। औरतों की मौत का शिनाख्त करते हुए विद्रोही मोहनजोदड़ो के तालाब की आखिरी सीढ़ी से वहां तक जाता है, जहां तक औरतों की जली लाश और इंसानों की हडि्डयां बिखरी पड़ी हैं। इतिहास के पन्नों को पलटते हुए वह बयान देते हैं कि- ‘इतिहास में वह पहली औरत कौन थी/जिसे सबसे पहले जलाया गया/मैं नहीं जानता/लेकिन जो भी रही होगी/ मेरी माँ रही होगी।’

हिन्दी कविता के साथ-साथ भोजपुरी और अवधी के लोकगीत में भी हक़ हुकूक मांगते हैं- ‘जनी जनिहा मनइया जगीर मांगात/ई कलिजुगहा मजूर पूरी शीर मांगात/बीड़ी-पान मांगात/सिगरेट मांगात/कॉफी-चाय मांगात/ कप-प्लेट मांगात/नमकीन मांगात/आमलेट मांगात/कि पसिनवा के बाबू आपन रेट मांगात।’ पसीने का रेट मांगता यह कवि नई खेती कर नई फसल उगाने का ठान चुका है और कहता है- ‘अगर जमीन पर भगवान जम सकता है/तो आसमान में धान भी जम सकता है/और अब तो/दोनों में एक होकर रहेगा/या तो ज़मीन से भगवान उखड़ेगा/ या आसमान में धान जमेगा।’

कविता संग्रह में एक बेचैनी है कुछ कर गुजरने की,  कुछ नया न होने की। व्यवस्था के प्रति कड़वाहट है, खीझ है और धिक्कार है। कवि की पूरी लड़ई हक और हुकूक की लड़ाई है, मनुष्य के मनुष्य होने की लड़ाई है। मनुष्य को उसके हक दिलाने की कोशिश है। विद्रोही कहते हैं कि ‘लोग हक छोड़ दें पर मैं क्यूं हक छोड़ दूं।’

गजल और नज्म संग्रह का अंतिम पड़ाव है। इनमें भी कवि का वही स्वर है जो कविताओं और गीतो में है। यहां भी वही तड़प,  बेचैनी,  कुछ कर गुजरने की तमन्ना,  कुछ ठोस न कर पाने की छटपटाहट है। ‘तोड़ पाऊंगा किसी दिन क्या मैं जंजीरें गुलामी/रोक पाऊंगा किसी दिन क्या मैं जंजीरें गुलामी।’

पिछले कई वर्षों या एक दशक की कविता को उठाकर यदि निष्पक्ष भाव से उसका मूल्यांकन किया जाए और अकेले विद्रोही की कविता को सामने रखा जाए तो पाठकों में बेचैनी, पछतावा, इच्छा और सामने कई सारे सवाल होंगे। बेचैनी कि  इनकी और कविता कहां है,  चलो उसको ढूँढ़ निकाले,  पछतावा कि कहां था यह कवि जिसे हम ढूँढ़ नहीं पा रहे थे, जिसका पाठ नहीं कर पा रहे थे पहले,  और सवाल और इच्छा यह जानने की क्या नागार्जुन, धूमिल, मुक्तिबोध जैसी जन की कविताएं अभी लिखी जाती हैं ?

विद्रोही का रचना संसार इतना व्यापक है कि ‘सुरती’  से लेकर ‘व्हाइट हाऊस’ तक की बात करता है। वहां मोहनजोदड़ो,  बेवीलोनिया, मेसोपोटामिया की प्राचीन सभ्यता भी है।

कवि विद्रोही की यह पुस्तक ऐसे समय में हमारे बीच आई है जब सारी हदें पार हो रही हैं। घोटालेबाजों और घूसखोरों की जमात खड़ी है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं, महिलाएं आत्महत्या कर रही हैं, मारी जा रही हैं, मुश्किल से किसी संस्थान पहुंचे पिछड़े वर्ग के छात्र-छात्राएं भी आत्महत्याएं कर रहे हैं। यह संग्रह सिलसिलेवाद, भ्रष्टाचार पर तो तमाचा है ही साथ ही साथ पूरी पीढ़ी के सामने प्रश्न छोड़ता हैं कि कब तक यह सब यूं ही चलता रहेगा ?

पुस्‍तक – नयी खेती( कविता संग्रह), कवि – रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’
मूल्‍य : पेपर बैक- 60 रुपये, सजिल्‍द- 100 रुपये, पृष्‍ठ- 150
प्रकाशक: सांस्‍कृतिक संकुल, जन संस्‍कृति मंच
टी-10, पंचपुष्‍प अपार्टमेन्‍ट, अशोक नगर, इलाहाबाद- 211001, उत्‍तर प्रदेश
नोट – पुस्‍तक मंगाने के लिए के.के. पाण्‍डेय से 09415366520 पर संपर्क किया जा सकता है।

विद्रोही जी से संबंधित दो लिंक-

विद्रोही की कविताएं

हमारे विद्रोही जी : प्रणय कृष्ण

 

देवेन्द्र कुमार की कुछ बाल कविताएं

19 अक्टूबर, 1940 को दिल्लीं में जन्में  कवि देवेन्द्र कुमार 27 वर्षों  तक प्रतिष्ठित बाल पत्रिका ‘नंदन’ के  साथ जुड़े रहे। बाल कहानियों और कविताओं की कई पुस्‍तकें प्रकाशित। उनकी कुछ बाल कविताएं-

आइसक्रीम

आइसक्रीम-आइसक्रीम
ठंडम-ठंडम आइसक्रीम

धत तेरी गरमी तो देखो
पिघल गई लो आइसक्रीम

अब क्या  होगा कैसे होगा
पिघल गई लो आइसक्रीम

बर्फ मंगाओ इसे जमाओ
जम जाए तो मिलकर खाओ

मेरी मानो तो कहता हूँ
झटपट खाओ, खाते जाओ

जैसी भी है, अच्छी ही है
आइसक्रीम-आइसक्रीम

ठंडम-ठंडम आइसक्रीम
पिघलम-पिघलम आइसक्रीम।

फूल महकते हैं

पापाजी जब हँसते हैं
मम्मी खुश हो जाती हैं
मौसम रंग बदलता है

दोनों मुझे बुलाते हैं
ढेरों प्यार जताते हैं
जो मांगो मिलता है

मम्मीं सुंदर दिखती हैं
पापा अच्छे लगते हैं
घर में फूल महकते हैं।

हँसने का स्कूल

पहले सीखो खिल-खिल खिलना
बढ़कर गले सभी से मिलना
सारे यहीं खिलेंगे फूल
यह है हँसने का स्कूल

जल्दी  आकर नाम लिखाओ
पहले हँसकर जरा दिखाओ
बच्चे जाते रोना भूल
यह है हँसने का स्कूल

झगड़ा-झंझट और उदासी
इसको तो हम देंगे फांसी
हँसी-खुशी से झूलम झूल
यह है हँसने का स्कूल।

चूहा किताबें पढ़ता है

पढ़ते-पढ़ते खाता है
जाने किसे सुनाता है
हर पुस्तक पर चढ़ता है
चूहा किताबें पढ़ता है

अभी भगाया झट फिर आया
इसने शब्दकोश है खाया
ज्ञान इसी से बढ़ता है
चूहा किताबें पढ़ता है

बार-बार पिंजरा लगवाया
फिर भी चुंगल में न आया
मेरा पारा चढ़ता है
चूहा किताबें पढ़ता है।

दादी का मौसम

गरमी को पानी से धोएं
बारिश को हम खूब सुखाएं
जाडे़ को फिर सेंक धूप
में दादी को हम रोज खिलाएं

कैसा भी मौसम आ जाए
उनको सदा शिकायत रहती
इससे तो अच्छा यह होगा
उनका मौसम नया बनाएं

कम दिखता है, दांत नहीं हैं
पैरों से भी नहीं चल पातीं
बैठी-बैठी कहती रहतीं
ना जाने कब राम उठाए

शुभ-शुभ बोलो प्यारी दादी
दर्द भूलकर हँस दो थोड़ा
आंख मूंदकर लेटो अब तुम
बच्चे मीठी लोरी गाएं।

गड़बड़झाला

आसमान को हरा बना दें
धरती नीली पेड़ बैंगनी
गाड़ी नीचे ऊपर लाला
फिर क्या होगा- गड़बड़झाला

दादा मांगें दांत हमारे
रखगुल्ले हों खूब करारे
चाबी अंदर बाहर ताला
फिर क्या होगा- गड़बड़झाला

दूध गिरे बादल से भाई
तालाबों में पड़ी मलाई
मक्खी बुनती मकड़ी जाला
फिर क्या‍ होगा- गड़बड़झाला।

मीठी अम्मा

ताक धिना धिन
ताल मिलाओ
हँसते जाओ
गोरे गोरे
थाल कटोरे
लो चमकाओ

चकला बेलन
मिलकर बेलें
फूल फुलकिया
अम्मा मेरी
खूब फुलाओ

भैया आओ
मीठी-मीठी
अम्मा को भी
पास बुलाओ
प्यारी अम्मा
सबने खाया
अब तो खाओ।

सड़कों की महारानी

सुनो कहानी रानी की
सड़कों की महारानी की

झाड़ू लेकर आती है
कूड़ा मार भगाती है
सड़कें चम चम हो जाएं
वह प्यारी है नानी की

धूल पुती है गालों पर
जाले उलझे बालों पर
फिर भी हँसती रहती है
बात बड़ी हैरानी की

आओ उसके दोस्त बनें
अच्छी-अच्छी बात सुनें
बस कूड़ा ने फैलाएं
शर्त यही महारानी की।

दिल्ली के रिक्शा वाले

ये बंगाल बिहार उड़ीसा
उधर हिमाचल मध्य प्रदेश
दूर-दूर से चलकर आए
ये दिल्ली के रिक्शावाले

पहियों के संग पहिए बनकर
सारा दिन हैं पैर घुमाते
मेहनत पीते, मेहनत खाते
ये दिल्ली के रिक्शा वाले

सर्दी में भी बहे पसीना
कैसा मुश्किल जीवन जीना
सच्चे अच्छे परदेसी हैं
ये दिल्ली के रिक्शावाले

मुनिया, बाबा, अम्मा, भैया
सबको भूल चले आए हैं
न जाने कब वापस जाएं
ये दिल्ली  के रिक्शा वाले।

नागार्जुन की प्रतिबद्धता : राधेश्याम तिवारी

जनकवि‍ नागार्जुन की जनपक्षरता पर वरि‍ष्ठ कवि‍ राधेश्याम ति‍वारी का आलेख-

अपने यहां एक परम्परा है गणेश वंदना की। किसी भी काम को शुरू करने से पहले लोग गणेश की वंदना करते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है कि विरोधी भी शांत रहें, लेकिन नागार्जुन ने एक साथ इतने विरोधी पैदा कर दिए हैं कि उनपर चर्चा करते हुए यह संभव ही नहीं है कि आप सबको खुश रख सकें। नागार्जुन हिन्दी के एक ऐसे कवि हैं जो परम्परा से निकलकर प्रगतिशीलता की ओर प्रवृत्त हुए। बाबा से ऐसा इसलिए भी संभव हो सका क्योंकि वे संस्कृत के अलावा पाली, बांग्ला आदि भाषाओं से तो परिचित थे ही, मार्क्सवादी विचारधारा के भी करीब आए। नागार्जुन ने भी वंदना की है, लेकिन वह वंदना बुद्ध, मार्क्स्, फ्रायड के अलावा पिशाच और वैताल की। वे गणेश के माध्यम से अपने विरोधियों को खुश नहीं करना चाहते, इसलिए वे पिशाच को पिशाच ही कहते हैं, उसे खुश करने के लिए किसी अलंकार से अलंकृत नहीं करते-
नमस्ते स्तु पिशाचाय
वैतालाय नमो नमः।
नमो, बुद्धाय मार्क्साय
फ्रायडाय च ते नमः।
नागार्जुन की कविताओं को पढ़ते हुए आप आसानी से समझ सकते हैं कि उनकी दृष्‍टि‍ में  पिशाच  और वैताल कौन हैं। एक बार जब मैंने बाबा से इस संबंध में पूछा तो उन्होंने कहा, ‘‘पिशाच कई तरह के होते हैं। जिसके पास जैसे-तैसे बहुत धन इकट्ठा हो गया हो वह धन पिशाच  है, जो अति विनम्र होकर भी पीछे से वार करता हो वह विनम्र पिशाच है और जो ऐसी कविताएं लिखता हो जिसे पाठक तो क्या, स्वयं कवि भी न समझता हो, उसे कवि पिशाच कहेंगे।’’ गनीमत है कि उन्होंने यह नहीं कहा कि जो आलोचक ऐसी कविताओं को महान बनाने पर उतारू हैं उन्हें आलोचक पिशाच कहेंगे।
नागार्जुन मुलतः राजनीतिक चेतना के कवि हैं। जनपक्षधरता ही उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता है। जनता से उनका जुड़ा़व विश्वव्यापी है। उनकी यह विश्‍वदृष्टि ही है कि वे दुनिया के तमाम दबे-कुचले लोगों की समस्याओं पर नजरें गडा़ए रखते हैं।
कोरिया समस्या पर उनकी एक कविता है-
‘‘गली-गली में आग लगी है घर-घर बना मसान
लील रहा कोरिया मुलुक को अमरीकी शैतान
जूझ रहे किस बहादुरी से धरती के वे लाल
मुझे रात भर नींद न आती सुन सिऊल का हाल।’’
यहां याद कीजिए गालिब का वह शेर-
‘‘मौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती।’’
बाबा ने गालिब की तरह नींद न आने के कारणों को रहस्य नहीं बनाया, बल्कि साफ-साफ बता दिया कि उन्हें रातभर नींद  क्यों नहीं आती। हालांकि उन्हें सांस की भी बीमारी थी। मैंने भी उन्हें रात भर जागते हुए देखा है। जब व्यक्ति को रात में नींद नहीं आये तो वह कुछ सोचता रहता है। यह हो ही नहीं सकता कि रात में जगा व्यक्ति एक क्षण के लिए भी बिना सोचे रह जाए। एक बीमार व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के बारे में ही सोचेगा, लेकिन नागार्जुन उस स्थिति में भी अपने सांसों के बारे में न सोचकर उस सिऊल के बारे में सोचते हैं जहां की जनता अमेरिकी आतंकवाद से लोहा ले रही है। यह है बाबा की राजनीतिक प्रतिबद्धता।
वे मनुष्य को सर्वोपरि मानते हैं और राजनीतिक दलों के विचारों को भी उसी परिप्रेक्ष में देखते हैं। एक घोषित कम्युनिस्ट होकर भी जब नागार्जुन यह लिखते हैं-
‘‘आ गए अब दिन ऐश के
मार्क्स, तेरी दाढ़ी में जूं ने दिए होंगे चीनी अंडे
एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं बावन अंडे
लाल पान के गुलाम ढोएंगे हंडे
सर्वहारा क्रान्ति की गैस के !
आ गए अब तो दिन ऐश के!’’ तो इसका यही अर्थ है कि वे सत्ता के चरित्र को अलग कर नहीं देखते। वे किसी भी तरह के शोषण के विरूद्ध थे। वह चाहे धर्म के नाम पर हो या विचारधारा के नाम पर। इसमें एक बात मैं और जोड़ना चाहूंगा कि मार्क्सवाद का जितना अहित गैर मार्क्संवादियों ने किया है उससे कहीं अधिक उन लोगों ने किया है जो मार्क्सवाद के नाम पर अपनी दुकानें चला रहे हैं। ऐसे लोगों के लिए ही बाबा ने लिखा है-
‘‘दिल में चाहे जो हो/गले में अगर मार्क्‍स है अटका!/बताओ मैं कौन हूं भला?’’ शायद ऐसे ही कम्युनिस्टों के लिए मार्क्‍स ने कहा था- ‘‘मुझे मार्क्सवादियों से बचाओ।’’
नागार्जुन जनता के पक्ष में किसी भी तरह का जोखिम उठाने वाले रचनाकार हैं। वे लक्षणा और व्यंजना में बात करते-करते सीधे अभिधा में भी उतर आते हैं। वे यह मानते हैं कि यह व्यवस्था पूरी तरह भोथरा गई है। इसकी चमड़ी इतनी मोटी हो गई है कि यह लक्षणा और व्यंजना की भाषा नहीं समझती। इसीलिए वे सीधे नाम लेकर कविताएं लिखते हैं। अगर इमरजेंसी के खिलाफ लिख रहे हैं तो सीधे-सीधे नाम लेकर-
‘‘इंदिराजी-इंदिराजी क्या हुआ आपको
सत्ता के मद में भूल गई बाप को।’’
मैं ऐसे कई लेखकों को जानता हूं जो इमरजेंसी में लक्षणा और व्यंजना के इतने कायल हो गए थे कि सार्वजनिक स्थलों की बातें तो दूर, बंद कमरे में भी लक्षणा और व्यंजना में ही बातें करते थे। वही लेखक इमरजेंसी के बाद अपनी रचनाओं के भीतर छूपे विद्रोह की आग को इस तरह उजागर करने लगे मानों दुनिया के सारे क्रांतिकारी उनके पट शिष्य हों। ऐसे ही क्रांतिकारियों के लिए बाबा ने लिखा-
क्रांति तुम्हारी तुम्हें मुबारक
भ्रान्ति तुम्हारी तुम्हें मुबारक
कूट-कपट की भीतर घाती
शांति तुम्हारी तुम्हें मुबारक
अर्धशती अभियान मुबारक
अंतरिक्ष अभियान मुबारक
एक आंख का भौतिक बाद
द्वन्द्वात्मक विज्ञान मुबारक।’’
बाबा ऐसे कम्युनिस्ट नहीं थे कि विरोध में मुट्ठी भी तनी रहे और कांख का बाल भी दिखाई न दे। उनके लिए जनता पहले थी। जो जनता के साथ था, बाबा उसके साथ थे। आप याद करें इमरजेंसी का वह समय जब सीपीआई इमरजेंसी के समर्थन में थी और बाबा भी सीपीआई में ही थे, लेकिन वे जेपी के पक्ष में बिहार की सड़कों पर घूम-घूम कर कविताएं सुना रहे थे-
‘‘एक और गांधी की हत्या होगी अब क्या ?
बर्बरता के मांग चढे़गा योगी अब क्या ?
पोल खुल गई शासक दल के महामंत्र की।
जयप्रकाश पर चली लाठियां लोकतंत्र की !
देश में जब जनता दल की सरकार बनी तो बाबा की भी बांछें खिल गईं। उन्होंने उसी उत्साह में यह कविता लिखी-
‘‘शासन बदले, झंडा बदला तीस साल के बाद
नेहरू, शास्त्री और इंदिरा हमें रहेंगे याद
कोटि-कोटि मत पत्र बन गए जादूवाले वाण
मूर्छित भारत मां के तन में वापस आए प्राण
नसबंदी के जोर-जुलुम से मचा बहुत कुहराम
किया सभी ने शासन को अंतिम बार सलाम।’’
लेकिन सत्ता मिलने के बाद जिस तरह जेपी के चेलों का पतन देश ने देखा उससे जनता बुरी तरह मर्माहत हुई। जिस उम्मीद के साथ जनता दल की सरकार बनी वह उम्मीद कुछ ही समय में मटियामेट हो गई। सत्ता के लिए मंडल और कमंडल का जो खेल हुआ सो तो हुआ ही, ऐसे-ऐसे घोटाले भी सामने आये जिसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। सत्ता पर नए-नए काबिज इन समाजवादियों के पेट इतने बड़े हो गए कि उन्होंने पशुओं का चारा तक नहीं छोड़ा। परिवारवाद को गालियां देने वाले ये नेता खुद परिवारवाद के इतने कायल हो गए कि अपनी निरक्षर पत्नी तक को मुख्यमंत्री जैसे जिम्मेवार पद पर बैठाने में तनिक संकोच नहीं किया। बाबा ने जब यह सब देखा तो उन्होंने लिखा-
‘‘पूर्ण हुए तो सभी मनोरथ
बोलो जेपी, बोलो जेपी
सघे हुए चौकस कानों में
आज ढूंसली कैसे ठेपी
जोर जुल्म की मारी जनता
सुन लो कैसी चीख रही है
तुमको क्या अब सारी दुनिया
ठीक-ठाक ही दीख रही है।’’
यानी जो दल या व्यक्ति जनता से दूर होता गया बाबा भी उससे दूर होते गए। उनके लिए प्रथमतः और अन्ततः जनता ही थी। उन्हें जनता में विश्वास था। वे यह मानते थे कि जनशक्ति से बढ़कर कोई शक्ति नहीं है। अभी हाल में मिश्र की घटनाओं को देखा होगा कि किस तरह वहां के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को जनाक्रोश के कारण पद छोड़ने को मजबूर होना पड़ा और उसके बेटे गमाल मुबारक ने आत्महत्या तक की कोशिश की। इसी तरह लीबिया के तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी को भी जनाक्रोश का सामना करना पड़ रहा है। नागार्जुन की कविताएं प्रतिपक्ष की कविताएं हैं। ये कविताएं तानाशाही व्यवस्था के विरूद्ध बार-बार हस्तक्षेप करती हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी देश में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है। कहने को हम आजाद देश के नागरिक हैं और देश की सीमाओं में कहीं भी रहने को स्वतंत्रा हैं, लेकिन क्षेत्रवाद और धर्म के नाम पर महाराष्ट्र, असम और कश्मीर में जो रह-रह कर तांडव होता रहा है उसका कोई निदान आजतक नहीं निकल पाया। बाबा की कविताओं को पढ़ते हुए अक्सर ऐसा लगता है कि उन्होंने एक खोजी पत्रकार की तरह खबरे खोज-खोजकर अपनी कविताओं में दर्ज की हैं।
नागार्जुन की कविताओं को पढ़ते हुए यह भी लगता है कि सूचना के लिए अखबार और दूसरे संचार माध्यमों पर निर्भर रहना सबसे बड़ा भ्रम है। श्री उदय सहाय ने अपने एक लेख में लिखा है कि अपराध की जितनी घटनाएं घटती हैं उनमें मुश्किल से पच्चीस प्रतिशत घटनाओं को ही मीडिया उजागर कर पाता है। नागार्जुन की कविताओं में ऐसी खबरें भी दर्ज हैं जो मीडिया की नजरों से ओझल हैं या उन्हें ओझल कर दिया गया है। आजादी के बाद हमारे नेताओं ने देश में जिस चरित्र का निर्माण किया ये सारी विद्रूपताएं उसी की देन है। यह क्या कम चिन्ता का विषय है कि आज देश में एक भी ऐसा व्यक्तित्व नहीं है जो पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ सके। हिन्दूवाद के झंडावरदार ठाकरे क्या कर रहे हैं। उनको सिर्फ महाराष्ट्र और वहां के लोग ही अपने लग रहे हैं। बाबा की नजर वहां भी है। वे लिखते हैं-
बाल ठाकरे! बाल ठाकरे!!
कैसे फासिस्टी प्रभुओं की
गला रहा है दाल ठाकरे
या
कैसा शिव?
कैसी शिव सेना?
कैसे शिव के बैल
चौपाटी के सागर तटपर
नाच रहा है भस्मासुर बिगडै़ल।
यही हाल धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला कश्मीर का भी है। अब वह स्वर्ग न होकर स्वर्गवासियों की धरती बनकर रह गया है। वहां के आका ही जब विखंडनवादी बयान देते नहीं थकते तब दूसरों को क्या कहा जाए। इन लोगों पर केन्द्र का भी कोई अंकुश नहीं है। सबसे चिन्ताजनक स्थिति तो इस देश के बौद्धिक वर्ग की है। ये अपने बौद्धिकता के नशे में वही कर रहे हैं जो दुश्मन किया करते हैं। अरुंधति‍ राय का मामला आपके सामने है। अपनी तमाम अच्छाइयों के बावजूद लोकतंत्र एक मजाक बन कर गया है। नेताओं ने लोकतंत्र को भी अपनी निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। बाबा अपनी एक कविता में लिखते हैं-
‘‘तानाशाही तामझाम है/सोसलिज्म का नारा/पार्लमेंट पर चमक रहा है मारुति का ध्रुव तारा/तेरी पुलिस मिलिटरी/तेरी गोली गोले/ हिंसा की बहती गंगा में/ मां तू आंचल धो ले!
तरुणों की सौ-सौ कलेजियां/तुम पर करूं निछावर/ बना रहे दरबार रात-दिन/ मंत्र पढ़ूं मैं शाबर।’’
यहां यह ध्यान देने की बात है कि यह शाबर मंत्र क्या है। तुलसीदास ने भी रामचरितमानस में इस मंत्र का उल्लेख किया है। बाबा ने इस मंत्र को नये संदर्भ में देखा है। इसी अर्थ में उनकी ‘मंत्र’ कविता भी है। शाबर मंत्र शिव का मंत्र है, जिसका कोई अर्थ नहीं होता। बिना अर्थ के ही जाप करते जाइए। वैसे तो निकालने को कोई कहीं से कुछ भी अर्थ निकाल सकता है। जिसे आप कविता भी नहीं मानते उसमें से भी बड़े-बड़े आलोचक ऐसे-ऐसे अर्थ निकाल लेते हैं कि आप चकित रह जाएंगे। आजकल जो कुछ भी हो रहा है वह सब शाबर मंत्र की तरह ही है। अधिकांश विश्वभर में पढ़ी जाने वाली हिन्दी की कविताएं भी शाबर मंत्र का ही सहोदर हैं। ऐसे में नागार्जुन की कविताएं शुद्ध देसी लगती हैं। सही अर्थ में नागार्जुन भारतीय कवि हैं, जिनकी कविताओं का सरोकार जनता से है। चूंकि जन शब्द जनतंत्र में ही अर्थवान होता है, इसलिए हम कह सकते हैं कि आजादी के बाद जनता की समस्याओं पर सबसे अधिक लिखने वाले नागार्जुन हैं। इसीलिए सही अर्थों वे जनकवि हैं। जनतंत्र की दुर्दशा पर वे लिखते हैं-
‘‘सामंतों ने कर दिया प्रजातंत्र का होम
लाश बेचने लग गए खादी पहने डोम
खादी पहने डोम लग गए लाश बेचने
माइक गरजे, लगे जादुई ताश बेचने
इंद्रजाल की छतरी ओढ़ी श्रीमंतों ने
प्रजातंत्र का होम कर दिया सामंतों ने।’’ अतः कह सकते हैं कि नागार्जुन की कलम जनता के इशारे पर चलती है, न कि किसी राजनीतिक दल के इशारे पर। इस ईमानदार जनकवि को याद करने का अर्थ है उनके पूरे समय को याद करना।

जंतर-मंतर पर धरना : मृत्युंजय

भ्रष्‍टाचार को लेकर राजनेताओं की पोल खोलती युवा कवि‍ मृत्युंजय की कवि‍ता-

भ्रष्टाचारी कांग्रेस की लीला की बलिहारी
लोकपाल, दिक्पालों के बस, जनता है बेचारी
नेता-अफसर सब लीलाधर, सत्ता मद में चूर
मिस्टर राहुल कुछ फरमाओ बोलो तनिक हुजूर

अन्ना बैठा है अनशन पर चश्मा हिन्दुस्तानी
संग साथ हैं जन गण मन, सो बेकल हो गयी रानी
कांग्रेस की बिल्ली को है याद आ रही नानी
एक आँख से दुनिया देखे साधो यह बौरानी

भाजपाईयों की नौटंकी, दसटंकी है चालू
कहाँ नहीं है भ्रष्टाचारी कौन नहीं घोटालू
यह ढांके तो वह खुल जाए वह ढांके तो पोल
राजनीति की चतुर चिकटई, यह दुनिया है गोल

नक्शा झाड़ रहे मंत्रीगण स्विस बैंक के बूते
टाटा, बाटा, अम्बानी के चाटो भईया जूते
धूर-मलाई चाभो, चाभो जनता के अरमान
सौ करोड़ की करो तस्करी, ऊंची भरो उड़ान

पान चबाओ, भीतर डालो मजदूरों का रक्त
नए नए बाबाओं के तुम नए नवेले भक्त
नाजायज पैसे के मारे जब अफराए पेट
चूरन फांक दलाली का फिर नया खोल दो रेट

अन्ना बाबा याद नहीं क्या यहीं कहीं सुखराम
हर्षद मेहता, तेलगी साहब सब करते विश्राम
यहीं यहीं पर शीबू सोरेन, यहीं प्रमोद महाज़न
राजा, कलमाडी, मधु कोड़ा, रामलिंगम सत्यम

लालू की यह चारागाह, यह माटी है बोफोर्स की
शशि थरूर की, मोदी की और तिकड़म-ताले-सोर्स की
अभिनन्दन हो औ वंदन हो, आरती करो शैतान की
इस माटी का तिलक लगाओ धरती यह बलिदान की

मन मोहा खूंखार सिंह ने माँगी मांगे तीन
अन्ना बाबा समझे रहना ये हैं चतुर प्रवीन
जान न देना और समझना इनकी मेहीं चाल
जन गण के संग राग जोड़ना अठहत्तरवें  साल

गांधी बाबा की समाधि पर आयोजित हो यज्ञ
समिधा नाजायज पैसा हो, होता जन सर्वज्ञ
लपटें निकलें संघर्षों की, यज्ञ धूम आन्दोलन
शुद्ध होय यह भूमि हमारी मुदित होएं जन गण मन

लोकपाल बिल से निकलेगी, होगी बहुत लड़ाई
दम लेकर औ जोड़ के कान्धा भिड़ने की रुत आई
दुश्मन है खूंखार चतुर्दिक पसरी है परछाई
आगे बढ़, तैयारी कर, है लम्बी बहुत चढ़ाई

होली के रंग कवि‍ताओं के संग

रंगों के त्‍यौहार होली पर भवानी प्रसाद मिश्र, कन्हैया लाल मत्त, घमंडी लाल अग्रवाल, प्रकाश मनु, योगेन्द्र दत्त शर्मा, गोपीचंद श्रीनागर, नागेश पाण्डेय ‘संजय’, देवेन्द्र कुमार और रमेश तैलंग की कवि‍ताएं-
 

फागुन की खुशियाँ मनाएं : भवानी प्रसाद मिश्र

 
चलो, फागुन की खुशियाँ मनाएं!
आज पीले हैं सरसों के खेत, लो;
आज किरणें हैं कंचन समेट, लो;
आज कोयल बहन हो गई बावली
उसकी कुहू में अपनी लड़ी गीत की हम मिलाएं।
 
आज अपनी तरह फूल हंसकर जगे,
आज आमों में भोंरों के गुच्छे लगे,
आज भोरों के दल हो गए बावले
उनकी गुनगुन में अपनी लड़ी गीत की हम मिलाएं।
आज नाची किरण, आज डोली हवा!
आज फूलों के कानों में बोली हवा
उसका सन्देश फूलों से पूछें, चलो
और कुहू करें गुनगुनाएं।
चलो, फागुन की खुशियाँ मनाएं
 
 

रंगों का धूम-धड़क्का : प्रकाश मनु

 
फिर रंगों का धूम-धड़क्का, होली आई रे,
बोलीं काकी, बोले कक्का—होली आई रे!
मौसम की यह मस्त ठिठोली, होली आई रे,
निकल पड़ी बच्चों की टोली, होली आई रे!
 
लाल, हरे गुब्बारों जैसी शक्लें तो देखो—
लंगूरों ने धूम मचाई, होली आई रे!
मस्ती से हम झूम रहे हैं, होली आई रे,
गली-गली में घूम रहे हैं, होली आई रे!
 
छूट न जाए कोई भाई, होली आई रे,
कह दो सबसे—होली आई, होली आई रे!
मत बैठो जी, घर के अंदर, होली आई रे,
रंग-अबीर उड़ाओ भर-भर, होली आई रे!
 
जी भरकर गुलाल बरसाओ, होली आई रे,
इंद्रधनुष भू पर लहराओ, होली आई रे!!
फिर गुझियों पर डालो डाका, होली आई रे,
हँसतीं काकी, हँसते काका—होली आई रे!
 
 

हाथी दादा की होली: प्रकाश मनु

 
जंगल में भी मस्ती लाया
होली का त्योहार,
हाथी दादा लेकर आए
थोड़ा रंग उधार।
 
रंग घोल पानी में बोले—
वाह, हुई यह बात,
पिचकारी की जगह सूँड़ तो
अपनी है सौगात!
 
भरी बालटी लिए झूमते
जंगल आए घूम,
जिस-जिस पर बौछार पड़ी
वह उठा खुशी में झूम!
 
झूम-झूमकर सबने ऐसे
प्यारे गाने गाए,
दादा बोले—ऐसी होली
तो हर दिन ही आए!
 
 

जमा रंग का मेला : कन्हैया लाल मत्त

 
जंगल का कानून तोड़कर जमा रंग का मेला!
भंग चढ़ा कर लगा झूमने बब्‍बर शेर अलबेला!
 
गीदड़ जी ने टाक लगाकर एक कुमकुमा मारा!
हाथी जी ने पिचकारी से छोड़ दिया फब्बारा!
 
गदर्भ जी ने ग़ज़ल सुनाई कौवे ने कब्बाली!
ढपली लेकर भालो नाचा, बजी जोर की ताली!
 
खेला फाग लोमड़ी जी ने, भर गुलाल की झोली!
मस्तों की महफ़िल दो दिन तक, रही मनाती होली!
 
 

होली का त्यौहार : घमंडी लाल अग्रवाल

 
आया हँसता रंग-रंगीला होली का त्यौहार!
रंग-बिरंगी पोशाकें अब मुखड़े बे-पहचान,
भरा हुआ उन्माद हृदय में अधरों पर मुस्कान,
मस्त महीना फागुन वाला लुटा रहा है प्यार!
 
डफली ने धुन छेड़ी प्यारी, भरें कुलांचें ढोल,
मायूसी का हुआ आज तो सचमुच बिस्तर गोल,
भेदभाव का नाम मिटा दें, महक उठे संसार!
आया हँसता रंग-रंगीला होली का त्यौहार!
 
 

सतरंगी बौछारें लेकर : योगेन्द्र दत्त शर्मा

 
सतरंगी बौछारें लेकर
इन्द्रधनुष की धरें लेकर
मस्ती की हमजोली आई,
रंग जमाती होली आई!
 
पिचकारी हो या गुब्बारा,
सबसे छूट रहा फुब्बारा,
आसमान में चित्र खींचती
कैसी आज रंगोली आई!
 
टेसू और गुलाब लगाये,
मस्त-मलंगों के दल आये
नई तरंगों पर लहराती,
उनके संग ठिठोली आई!
रंग जमाती होली आई!
 
 

होली के दो शिशुगीत : गोपीचंद श्रीनागर

 
कोयल ने गाया
गाया रे गाना!
होली में भैया
भाभी संग आना!
……………
मैना ने छेड़ी
छेड़ी शहनाई!
होली भी खेली
खिलाई मिठाई!
 
 

जब आएगी होली : नागेश पाण्डेय ‘संजय’

 
नन्ही-मुन्नी तिन्नी बिटिया,
दादीजी से बोली-
“खूब रंग खेलूंगी जमकर,
जब आएगी होली!
 
मम्मी जी से गुझिया लूंगी,
खाऊंगी मैं दादी!
उसमें से तुमको भी दूँगी,
मैं आधी की आधी!”
 
 

होली के  दिन: देवेन्द्र कुमार

 
होली के दिन बेरंग पानी
ना भाई ना!
 
जंगल घिस कर हरा निकालें
आसमान का नीला डालें
धूसर, पीला और मटमैला
धरती का हर रंग मिला लें
 
अब गन्दा पानी नहलाएं
फिर होगी सतरंगी होली!
हाँ भाई हाँ!
 
काली, पीली, भर भर डाली
मिर्च सभी ने मन भर खाली
मुंह जलता है पानी गायब
मां, अब सब कुछ शरबत कर दे
मटके सारे नदियाँ भर दे
 
जो आये मीठा हो जाए
तब होगी खटमिट्ठी  होली!
हाँ भाई हाँ!
 
 

होली का गीत : रमेश तैलंग

 
मुखडे़ ने रँगे हों तो
होली कि‍स काम की ?
रंगों के बि‍ना है, भैया !
होली बस नाम की।
 
चाहे हो अबीर भैया,
चाहे वो गुलाल हो,
मजा है तभी जब भैया,
मुखड़ा ये लाल हो,
 
बंदरों के बि‍ना कैसी
जय सि‍या-राम की ?
 
रंग चढ़े टेसू का या
कि‍सी और फूल का,
माथे लगे टीका लेकि‍न
गलि‍यों की धूल का,
 
धूल के बि‍ना ना मने
होली घनश्‍याम की।