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अब वे वासर बीत गये : कांतिकुमार जैन

कांतिकुमार जैन

कांतिकुमार जैन

साठ के बाद जीवन आम आदमी ही नहीं, रचनाकारों के लि‍ये भी चिंता का वि‍षय है। लेकि‍न क्‍या इस जीवन में कोई आनंद नहीं रह जाता या रचनात्‍मकता नहीं रह जाती। क्‍या आदर्श स्‍थि‍ति‍ होनी चाहि‍ए। चर्चित संस्‍मरणकार कांति‍कुमार जैन का आलेख-

साठ  पार का जीवन हिन्‍दी साहित्य के प्रारम्‍भ से ही कवियों की चिंता और चिन्‍तन का एक प्रमुख विषय रहा है। उद्दाम वासना के सिद्ध वाक् कवि विद्यापति को साठ पार के जीवन को स्वीकार करने में बड़ी कठिनाई हुई थी- ‘माधव, हम परिनाम’। इस निराशा का कारण था कि अब उन्हें ‘सुत मित रमनि समाज’ सब ‘तापत सैकत वारिबिन्दु सम’ लगने लगे थे। जैसे तप्त बालुका राशि पर पानी की बूंद गिरे और छन्न हो जाये,  वैसे ही बुढ़ापे में न सुत काम आते हैं, न मित्र। रमणियाँ बाबा कहने लगती हैं- मैं क्या करूँ राम, मुझे बुढ्ढा मिल गया जैसा मनोभाव। कबीर जैसा कवि को भी साठ के पार पहुँचकर यह अनुभूति हुई थी कि इस संसार में रहने का अब कोई अर्थ नहीं है। यह बिराना देश है और इस काँटे की बाड़ी में रहने का जो भी उद्यम करेगा, उसे उलछ प्रलछ कर ही रहना होगा। पर साठ के पार जीवन को लेकर सबसे मार्मिक बातें सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने कही हैं। ‘पद्मावत’ के उपसंहार कांड में उसने बड़ी वेदना से लिखा- अब बूढ़ी आयु हो गई है। दृष्टि  मंद हो गई है और नेत्रों में पानी ढलने लगा है। दाँतों के गिरने से गाल पिचक गये हैं, अब मेरे बोल किसी को नहीं सुहाते। विचारने की शक्ति चली गई, गर्व चला जाता है, शीश धुनी हुई रुई के समान हो गया है। कानों से ऊँचा सुनाई पडऩे लगा है। केशों में रहने वाले भौरों की श्यामता चली गई है। शरीर जीते जी मरे के समान हो गया है। जब तक यौवन है तभी तक जीवन है। फिर पराये वश हो जाना- यही मृत्यु है। साठ पार के जीवन को जायसी स्वीकार नहीं कर पाते-

विधि जो सीस डुलावे, सीसे धुनै तेहि रीस
बूढ़े-आढ़े होहु तुम, केहि यहि कीन्ह असीस।

‘बूढ़े आढ़े’ अर्थात् वृद्ध और प्रतिष्ठित वरिष्ठ नागरिकों को शासन की ओर से सुविधाएँ तो अब दी जाने लगी हैं, उन्हें सम्मानीय भी माना जाने लगा है पर ‘निराला’ तो बुढ़ापे में नितांत अकेलेपन का अनुभव करते थे-

मैं अकेला
देखता हूँ आ रही मेरे दिवस की सांध्य बेला।

मैथिलीशरण गुप्त जी ने बड़े दु:ख से लिखा :

अब वे वासर बीत गये
मन तो भरा भरा है लेकिन तन के सब रस रीत गये
चमक छोड़ चौमासे बीते, कंवल छोड़कर शीत गये
लेकर मधु की ऊष्मा सारी, मेरे मन के पीत गये
अब तो केवल गूँज बची है जीवन के सब गीत गये
इस राम जाने जीवन में, हम हारे या जीत गये

चलाचली की बेला के यही दु:ख हैं। अब आप न मुंगौड़े खा सकते हैं, न इमरिती। दही बड़े खाने से कफ भड़क उठता है और खाँसते-खाँसते पसलियाँ दु:खने लगती हैं। बुखार चढ़ा रहता है सो अलग। मृत्यु भय के कारण रात भर नींद नहीं आती। गालिब के मन पर मौत छाई रहती थी। उसके शेरों में मौत का जिक्र बारबार आता है। शायद जीवन भर के अभाव, तंगदस्ती। दु:ख ही शायद गालिब के जीवन की कथा रही हो-

कैदे हयात बंद गम असल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी गम से निजात पायें क्यों?

बुंदेली कवि ईसुरी को मृत्यु से भय नहीं लगता था उन्होंने कहा-

आ गये मरबे के दिन मोरे
चल जात जे जी रे
अब तो देह अगन वा रई ना, हात पाँव सब सीरे
डारन लगे रात हैं नइया, पात होत जब पीरे

पर ये सारे कवि इस बात से दु:खी है कि ‘आछे दिन पाछे गये, हरि सो किया न हेत। अब पछताये होत का जब चिडिय़ा चुग गई खेत।’ जीवन की व्यर्थता का बोध। दूसरा दु:ख इस बात का है कि अब पुलिस का प्रियतमा नहीं आती।

‘अज्ञेय’ ने अपने एक हाइकू में लम्‍बे जीवन की अनुभूतियों का सार-संक्षेप प्रस्तुत करते हुए लिखा है-

झरना
झरता पत्ता हरी डाल पर
अटक गया।

विद्वानों ने इसका जो भी अर्थ किया हो, मेरी दृष्टि  में साठ पार के जीवन का अर्थ है झरना अवश्यभावी है। ‘धरा को प्रमान यहै तुलसी जो फरासो झरा, जो जरा सो बुताना’। हरसिंगार झरते हैं झर-झर- जो जीवित है वह झरेगा ही पर झरते हुए व्यक्ति को नाना मोह घेरे रहते हैं : बैंक बैलेंस कितना है, मेरे बाद मेरी चल अचल संपत्ति का क्या होगा, मेरी पुस्तकों की रायल्टी किसे मिलेगी, वह मिलेगी भी या नहीं? फिर मेरी जो तमाम अप्रकाशित रचनाएं पड़ी हुई हैं वे क्या यों ही नष्ट हो जायेंगी। साहित्यकार की सबसे बड़ी पीड़ा होती है उसकी कृतियों का अप्रकाशित रह जाना। मेरे मित्र प्रमोद वर्मा का ‘समग्र’ उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुआ है। मुक्तिबोध जी का पहिला संग्रह तब छपा जब वे दिवंगत हो चुके थे। अशोक वाजपेयी ने अपने स्तंभ ‘कभी कभार’ में अपने बाल सखा रमेश दत्त दुबे की रचनाओं के महत्व का आकलन करते हुए लिखा था कि‍ किसी अच्छे प्रकाशक को रमेश दत्त दुबे की कृतियाँ प्राप्त कर उन्हें प्रकाशित करने में रुचि लेना चाहिए ताकि आंचलिक आधुनिकता का विरल रूप सामने आ सके। हिन्‍दी में एक नहीं, अनेक ऐसे साहित्यकार हैं जिनकी रचनाएं उनके जीवन काल में प्रकाशित नहीं हो पातीं। हमें ऐसा कोई तंत्र विकसित करना चाहिए कि लेखक की महत्वपूर्ण रचनाएं पाठकों के सामने उसके जीवन काल में ही सामने आ सकें और लेखक को अपने लिखे हुए को प्रकाशित देखने और उससे सार्थकता की अनुभूति हो सके।

हिन्‍दी कवियों ने साठ पार के जीवन के आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक और शारीरिक पक्षों का उल्लेख तो किया है पर आर्थिक पक्ष की ओर किसी का ध्यान नहीं गया। कारण- प्रारम्‍भ से ही हमारे कवियों ने दैन्य को/विपन्नता को महिमा मंडित किया है और माँग के खाने और मसीत में सोने को बुरा नहीं माना है। कुछ ऐसे भी हैं जो सत्ता में भागीदारी करते रहे हैं। मीर, चंदबरदाई की तरह, खुसरो की तरह, केशवदास की तरह या अब्दुर रहीम खान की तरह, ये सब जीवन की सुविधाओं का सुख भोगते रहे हैं। साहित्य का इतिहास हमें बताता है कि सत्ता के सुख के लिये हमारे कवियों का दरबार से जुडऩा आम रहा है। सत्ता की सत्ता, साहित्य का माने जाने का सुख अलग। केशव और तुलसी केवल मध्यकाल के सत्य नहीं हैं, हमारे आधुनिक काल के भी सत्य हैं। अज्ञेय और मुक्तिबोध, अशोक वाजपेयी और राजकमल चौधरी जैसे युग्म हमारी परम्‍परा का अनिवार्य हिस्सा हैं। हिन्‍दी में निराला जैसा होल टाइम साहित्यकार बिरला ही होगा। आधुनिक काल के अधिकांश हिन्‍दी साहित्यकारों के लिये साहित्य पार्टटाइम धंधा है। साठ पार के जीवन की कोई योजना उनके पास नहीं होती है। इधर नौकरीपेशा साहित्यकारों को पेंशन, भविष्य निधि आदि के कारण वृद्धावस्था के लिये सुरक्षा प्राप्त है। अन्यथा आज से बीस-पच्चीस वर्ष पहिले आपको मुक्तिबोध, परसाई या शरद जोशी जैसा साठोत्तरी जीवन जीना पड़ता। अब तो अकादमियों की पीठों की अध्यक्षता, प्रकाशन गृह का परामर्श जैसे दायित्व साहित्यकारों को चिंतामुक्त रखते हैं पर अधिकांश तो इतने सौभाग्यशाली नहीं होते। हिन्‍दी का साहित्यकार जब दुर्घटनाग्रस्त होता है या अस्वस्थ तो सरकार से वित्तिीय सहायता माँगने का रिवाज है। उन साहित्यकारों के प्रकाशक, उन साहित्यकारों के संरक्षक संघ या मंच कभी-कभी ही उनकी सुध लेते देखे जाते हैं। अब सरकार साहित्यकार की वित्तीय सहायता करेगी तो वह साहित्यकार के विचारों का रंग भी देखेगी और आपातकाल में उसका स्टैंड भी। हिन्‍दी के हमारे साहित्यकार इसी में गदगद हो जाते हैं कि शीला जी, त्रिलोचन जी के निवास पर पहुँचकर उनकी खोजखबर ले आती हैं या मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री किसी दुर्घटनाग्रस्त कवि की कोई कविता पाठ्यक्रम में सम्मिलित किये जाने की घोषणा कर देते हैं। साहित्यकारों को उचित रायल्टी मिले, पुरस्कारों में पक्षपात न हो, पीठों पर नियुक्तियों में भाई भतीजावाद या रंगदारी न चले, इसकी ओर किसी का ध्यान नहीं है। विज्ञान और तकनीक की प्रगति के कारण साठ पार के जीवन की समस्याओं का समाधान अब उतना कठिन नहीं रहा बशर्ते वित्त का अभाव न हो। यह तभी सम्‍भव है जब साहित्यकार के लिए समाज में सम्मान ही नहीं, उसकी चिंता भी हो उसके वार्धक्य की निश्चिंतता के लिये हमारे समाज और हमारे सत्ताशीर्षों में चिंता का अभी कोई सुनिश्चित संकेत नहीं है।

यहाँ अपने प्राध्यापकीय जीवन के एक अनुभव का उल्लेख करना मुझे वाँछनीय लगता है। सूरदास का पद ‘मधुवन तुम कत रहत हरे’ की व्याख्या करते हुए मैं कवि के अंधत्व के विभिन्न पक्षों की चर्चा करता। कहता कि सूर जन्मान्ध नहीं हो सकते, यदि होते तो उन्हें हरे रंग का ज्ञान नहीं होता। जिसने जीवन में कभी रंगों का वैविध्य देखा ही नहीं, उसे क्या पता कि मधुवन हरा है या पीला। उसे तो यह भी संज्ञान नहीं हो सकता कि नीले और काले में क्या भेद होता है। बिहारी यदि जन्मान्ध होते तो वे ‘सोहत ओढ़े पीतपट स्याम सलोने गात’ जैसी पंक्ति नहीं लिख सकते थे। ‘नीलांबर परिधान हरित पट पर सुंदर है’ जैसा कुछ लिखने के लिये मैथिलीशरण गुप्त की आँखें सजग होनी ही चाहिए। जन्मान्ध के लिये इन्द्रधनुष की कल्पना करना सम्‍भव नहीं है। मैं अपने छात्रों से यह भी पूछता कि उन्हें,  भगवान न करे, यदि कभी अपनी पाँच ज्ञानेन्द्रियों में से किसी एक को अक्षुण्ण रखने का चुनाव करना हो तो वे किसे सुरक्षित रखना चाहेंगे? घ्राणेन्द्रिय की रक्षा किसी की भी प्राथमिकता नहीं थी। घ्राण न भी तो उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। घ्राण विलासिता की इन्द्रिय है, जीवन के लिए घ्राण का उपयोग बहुत ही सीमित है। साहित्य में घ्राणेन्द्रिय के संवेदन का उल्लेख सबसे कम है। स्वाद जिह्वा का एक मात्र कार्य नहीं है। मनुष्य ने विकास क्रम में जिह्वा को स्वाद लेने की तुलना में ध्वनियों का उच्चारण करने जैसा अधिक सामाजिक और उपयोगी कार्य सौंप दिया है। जिह्वा के अभाव में हम गूंगे हो जायेंगे और हमारी सामाजिकता का बहुलांश समाप्त हो जायेगा। उस समय तक साहित्य में वाचिक परम्‍परा का महत्व स्थापित नहीं हुआ था। अन्यथा मैं कहता कि जिह्वा के बिना न रजनीश संभव हैं, न नामवर। विद्यार्थी सहमत होते कि विवशता में वे अपनी घ्राणेन्द्रिय का और फिर स्वादेन्द्रिय को परित्याग करने का प्रस्तुत हो जायेंगे। स्पर्श का क्या किया जाये? स्पर्श के लिये हमें दूसरे के निकट आना पड़ता है। रिमोट में हम स्पर्श से संवेदित नहीं हो सकते। श्रृंगार का अधिकांश संबंध स्पर्श से ही है। यदि व्यक्ति के पास स्पर्शेंद्रिय न होती तो रीति काल की कविता भी नहीं होती। रीतिकाल काव्य ही क्यों, नई कविता भी स्पर्श संवेदन के अभाव में असंभव होती। साहित्यकार का काम घ्राण, स्वाद और स्पर्श के बिना चल जायेगा पर श्रवण और दृष्टि  के बिना? इन दोनों में से किसी एक का चुनाव करने के लिये साहित्यकार को बहुत सोचना पड़ेगा। विद्यार्थियों को भी इनमें से किसी एक के पक्ष में मत देने में कठिनाई होती। साठ के पार पहुँचे साहित्यकार को कालदेवता श्रवण और दृष्टि  की पुर्जियों में से किसी एक को उठाने का अवसर दे तो साहित्यकार मन ही मन मनायेगा कि हे भगवान आँखों को बचा लो। पर दूसरे ही क्षण वह कानों को बचाने की गुहार लगाने लगेगा। बधिरता मुझे असामाजिक बना देगी, कवि सम्मेलनों, मुशायरों, संगीत गोष्ठियों से मुझे वंचित होना पड़ेगा। मैं चलचित्र या टी.वी. देखूँगा तो न मैं वार्तालाप समझूँगा, न संगीत का आनंद उठा पाऊँगा। मेरा दूरभाष पर बात करना भी असम्‍भव हो जायेगा। बगल में बैठा हुआ मित्र चिल्ला रहा है और आप कान में श्रवण यंत्र लगाये उसका मुँह ताक रहे हैं। लोकगीत, लोकवाद्य सभी निरर्थक। न के.एल. सहगल, न रफी, न लता, न आशा कोई आपको आनंदित कर पाने में समर्थ नहीं होगा। पक्षियों की टीट्विट भी निरर्थक। सो कान तो रहने ही चाहिए। तो क्या आप आँखों की तुलना में कानों का पक्ष लेंगे? मैं आँखें बंद कर लेता- सब कुछ पुंछ जात, कक्षा अस्तित्व हीन हो जाती। फिर आँखें खोल, कान बंद करता, कक्षा है, छात्रों के चेहरे हैं, छात्राओं की रंगबिरंगी साडिय़ाँ हैं, श्याम पट है। है, विश्‍व है। नहीं, मैं अपनी आँखें नहीं दूँगा। आँखों के बिना विश्‍व की अधिकांश श्री, सुषमा निरर्थक हो जायेगी। छात्र मेरे निष्कर्षों से सहमत होते, उनकी आँखें बड़ी हो जातीं जैसे वे अपनी दृष्टि बचाने के लिए कटिबद्ध हो कोई भी मूल्य चुकाने को तैयार हैं। पर मुझे लगा कि इतने गम्‍भीर निर्णय के लिये विद्वानों की पंचायत बुलानी चाहिए। मैंने एक संगोष्ठी का आयोजन किया। मनोविज्ञानवेत्ता, कवि, चित्रकार, संगीताचार्य, चिकित्सक, स्त्री, पुरुष आमंत्रित थे। सबका निष्कर्ष था कि साठ के पार की वय में सब कुछ चला जाये, आँखें भर न जायें। ‘कागा सब तन खाइयो, चुन चुन खाइयो माँस, दुई नैना मत खाइयो, पीऊ मिलन की आस’ का मर्म समझ में आया। यह भी समझ में आया कि देवदास यदि अंधा हो गया होता तो वह पारो को देख नहीं पाता, इससे बड़ा संताप और क्या होता। इस संगोष्ठी में एक इतिहासवेत्ता भी उपस्थित थे। बोले कि महाभारत का मूल कारण धृतराष्ट्र का अंधत्व था। यदि राजा अंधा न होता, गूंगा या बहरा होता तो भारत का इतिहास कुछ और ही होता। करेले पर नीम चढ़ा यह कि,  गाँधारी ने भी स्वेच्छा से अंधत्व का वरण किया, कम से कम दोनों में से एक के पास तो दृष्टि  होनी ही चाहिए थी। राजा यदि अंधा हो तो देश चौपट हो ही जायेगा। गूंगा, बहरा व्यक्ति नहीं। एक अंधे राजा ने पूरे देश को, उसके पूरे इतिहास को विकृत कर दिया। मैंने बहुत पहिले जैनेन्द्र कुमार की एक कहानी पढ़ी थी- ‘जान्हवी’। जान्हवी एक वियोगिनी का नाम है जो अपने प्रियतम से मिलने की आशा अंत तक नहीं छोड़ती। जब देखा तब वह गुनगुनाया करती है:

कागा, सब तन खाइयो, चुन चुन खइयो माँस
दो नैना मत खाइयो, पिया मिलन की आस।

साठ के पार पहुँचकर मैं जान्हवी की तरह इस दोहे को ज्यों का त्यों दुहराऊँगा तो नहीं, उसमें थोड़ा सा परिवर्तन करके यह जरूर कहूँगा-

कागा, सब तन खाइयो, चुन चुन खइयो माँस
दो नैना मत खाइयो, पुस्तक पढऩ की आस

पढऩा मुझसे अभी भी अच्छा लगता है- क्लासिकी साहित्य भी और नया लिखा जाने वाला भी। मैंने कुछ दिनों पहिले ही अपने बेसंभाल होते जो रहे पुस्तकालय की छंटनी की है। जो पुस्तकें मैं पढ़ चुका हूँ और जिन्हें दुबारा पढऩे की न तो रुचि है, न ही समय, उन्हें अलग करो। उन्हें भी अलग करो जिन्हें पढऩे का समय अब नहीं निकाला जा सकेगा। समय की सीमा है, आँखों की ज्योति की भी। पर पढऩा तो है ही। समय काटने के लिये भी और समाज तथा मानव स्वभाव को समझने के लिये भी। समय के साथ रहने के लिये भी। इतनी सारी पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं, उन्हें भी देखना जरूरी है। सबको भले न पढ़ पाऊँ, उन्हें उलटना-पुलटना तो चाहिए ही। फिर हिन्‍दी में इतनी सारी पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं और आपको पास आ भी रही हैं। सभी तो कूड़ा नहीं हैं। उनमें काफी कुछ नया, विचारोत्तेजक, मौलिक होता है कि आउट ऑफ डेट न होने के लिये उन्हें पढऩा चाहिए। अपने समय, समाज और प्रगति को जानने-समझने के लिये उनसे दूर रहना किसी भी प्रकार उचित नहीं। इसके लिये समय भी चाहिए और आँखें भी। समय का नियोजन आप कर सकते हैं, आँखों की ज्योति का भी। डॉक्‍टर भले ही कहें कि‍ ज्‍यादा पढ़ना आपके लि‍ये उचि‍त नहीं है, पर कितना पढऩा उचित है यह तो आपको तय करना होगा। हर तीस-पैंतीस दिन बाद ढेर पत्रिकाएं आपके पास आती हैं, डाकिया आपको जानने लगा है। इन पत्रिकाओं को मैं तीन कोटियों में बाँटता हूँ। पहिली वे जिनका नाम देखा और रद्दी के ढेर में पटक दिया। इन्हें पढऩे क्या, उलटने-पुलटने का समय भी अब मेरे पास नहीं है। अध्यात्म की, धर्म की, पत्रिकाएं मुझे व्यर्थ लगती हैं। कोई नई बात नहीं, कोई नहीं बहस नहीं। दूसरी कोटि उन पत्रिकाओं की है जिन्हें उलट कर एक सरसरी निगाह डालने से यह पता चल जाता है कि हिन्‍दी में इन दिनों क्या लिखा जा रहा है, नई पीढ़ी क्या सोचती है, उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं, वे हम बूढ़े लोगों से कितनी भिन्न है। यदि कोई रचना प्रथम दृष्टया अच्छी लगी तो प्रथम बैठक में ही उसे पढ़ भी लिया। हिन्‍दी में इन दिनों कोई विश्वसनीय पाक्षिक मुझे नहीं दिखता। सब अपने-अपने मित्रों, गुट के, क्षेत्र के, संघ के, मंच के लेखकों का जैकारा करने में व्यस्त हैं। समीक्षकों की बात का भरोसा कर लेखकों को पढ़ो तो लगता है कि आप जिसे गाय का बछड़ा समझ रहे थे वह कुत्ते का पिल्ला निकला। कुछ लोगों को तो नामावली गिनाना ही अपने समीक्षक होने के कर्तव्य की इतिश्री लगती है। इसलिए हिन्‍दी में इन दिनों स्वर्ग देखने के लिये स्वयं ही मरना पड़ता है। अधिकांश समीक्षक पेड़ तो गिना देते हैं पर वन की श्री सुषमा देखनी हो तो धंसो उनमें डर नहीं है। चिड्डों की तरह यहाँ-वहाँ फुदकने वाले समीक्षकों ने हिन्‍दी समीक्षा को बेहद अविश्वसनीय और अप्रमाणिक बना दिया है। इस तरह का साहित्य छापने वाले पत्रिकाओं को मैं भी अलग डाल देता हूँ। जो आठ-दस पत्रिकाएं बचती हैं,  वहीं पढ़ी जाती हैं। कभी किसी पुस्तक की चर्चा हुई तो उसे भी पढऩा होता है समीक्षार्थ न आये, भेंट स्वरूप न आये, मानार्थ न आये तो खरीद कर यदि समीक्षार्थ कोई पुस्तक मेरे पास आई है और लगा है कि उस पर लिखना चाहिए तो उसे पढ़ता हूँ तब लिखता हूँ। यदि लिखने का मन नहीं हुआ तो पुस्तक सधन्यवाद वापिस। कुछ लेखक इसका बुरा भी मानते हैं और संबंध खराब कर लेते हैं। अब साठ के पार पहुँचकर मैं आपकी दिलजोई करूँ या अपनी शक्ति, समय और आँखों की ज्योति देखूँ। साठ के पार पहुँचकर नये साहित्यिक मित्र भी बनते हैं और कुछ पुराने परिचितों से संबंध बिगड़ जाते हैं। साठ के पार पहुँचे समीक्षक को अपने दायित्व का निर्वाह विवेक पूर्वक ही करना चाहिए, अचूक अवसरवादिता आपको धीरे-धीरे अविश्वसनीय और गैर भरोसेमंद बना देती है।

सो 60 क्या 78 पार के बाद भी साहित्य मेरी प्राथमिकताओं में है- अपनी समस्त शारीरिक, मानसिक और भौमिक सीमाओं के बावजूद। गालिब ने कहा था कि ‘छुटती नहीं है काफिर मुँह से लगी हुई’ पढऩे की आदत मुझसे भी नहीं छूट पा रही है। मुझे अपने स्वास्थ्य सामर्थ्‍य और समय सीमा के प्रबंधन के बिना साहित्य से सानिध्य बनाये रखने की बात सोचना विवेकहीनता लगती है। ‘साठ के पार जीवन और साहित्य के बीच जो नियंत्रण रेखा खींच दी गई है, उसका उल्लंघन कई प्रकार की समस्याओं को जन्म दे सकता है और यह उम्र समस्याओं से बचने की है, उन्हें भड़काने की नहीं।

वास्तविकता यह है साठ पार का जीवन रोमानी वास्तविकता नहीं है यह ठोस आलावकारी और काफी हद तक कटु वास्तविकता है। जरा जर्जर शरीर, आधियों व्याधियों से शक्तिहीन जीवन, वित्तीय संकट, पारिवारिक विषमताएं, समसामयिक साहित्यकारों की ईर्ष्‍या- साठोत्तरी साहित्यकार इनमें से किसी को संभालने की जुगत नहीं कर पाता। वह डॉक्टरों के चक्कर लगाये कि साहित्य रचना करे, अपने मोतियाबिन्‍द का ऑपरेशन कराये कि साहित्य के पढऩे का साहस संचित करे, बहू-बेटियों और उनके परिवारों के लोभ-लालच से स्वयं को सुरक्षित रखने के उपाय खोजे कि अपना लिखना-पढऩा जारी रखे। हर साहित्यकार चतुर सुजान हो और अपने वृद्धावस्था का यह आकस्मिक दुर्घटना का पूर्व प्रबंधन कर ही सके, यह कम ही देखा जाता है। कभी-कभी साहित्यकार के साठ पार के जीवन की विषमताओं के लिये स्वयं वही उत्तरदायी होता है। जो साहित्यकार जीवन भर नियमित रूप से पाव भर छालिये से अपनी आँतों को नष्ट  करेगा, जिसका दिन रसरंजन से भी प्रारम्‍भ होगा और उसी से समाप्त, जो भूख को शांत करने के लिए कड़क चाय पीने को बाध्य होगा, उसका साठोत्तर जीवन कैसा होगा- इसके अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं। साहित्यकार सम्‍वेदनशील प्राणी होता है इसमें संदेह नहीं पर वह शरीरधारी होता है- शरीर विज्ञान के सभी नियम उस पर लागू होते हैं- यह भी उतना ही सच है जितना उसका रचियता होना। हमारे देश में साहित्यकार को लेकर जो मिथ प्रचलित हैं, उनसे भी मुक्त होने की आवश्यकता है। साहित्यकार सदैव असंतुलित, असंयमित स्वैराचारी जीवन ही जिये, यह आवश्यक नहीं है।

रचनात्मकता का संबंध हार्मोंस से है। जब शरीर के हार्मोंस क्षीण होने लगें तब रचनात्मकता में कमी आने लगती है। कल्पना अब कुलाँचे नहीं भरती, शब्दों में गूँज नहीं बचती। एक अभ्यास, पुनरावृत्ति, निष्प्राण दुहराव। इसीलिये कुछ विचारक मानते हैं कि साठ पार के व्यक्ति की रचनात्मकता को तिलांजलि दे देनी चाहिए। कई साहित्यकार ऐसा करते भी हैं। महादेवी जी ने वार्धक्य में गीत लिखने छोड़ दिये थे, वे ऋचाओं का अनुवाद करने लगी थीं। हमारे अपने दौर में राजेन्द्र यादव ने वयोवृद्धि में कहानी या उपन्यास छोड़कर विमर्श के खेत में बीज बोने शुरू किये, वास्तव में विधा बदल देने से कला की थकान मिटती है पर यह विधान्तरण स्वस्फूर्त होना चाहिए। रचनाकार को जब लगे कि वह न कोई नया प्रयोग कर पा रहा है, न ही उसमें नई संवेदना के अंकुर फूट रहे हैं तो उसे कलम कूची छोड़कर श्रोताओं या दर्शक दीर्घा में आकर बैठने लगना चाहिए, पर कुछ तालिबान किस्म के विचारक फतवा करने के उत्साह में लता मंगेशकर या मकबूल फिदा हुसैन के गायन या चित्रण पर ही पाबंदी लगा देना चाहते हैं। वे भूल जाते हैं कि विश्व के महान साहित्य में साठ पार के साहित्यकारों का योग कुछ कम नहीं है। यही बात रचना के अन्य क्षेत्रों की भी है। इसके विपरीत प्रसिद्ध कथाकार दूधनाथ सिंह साठोत्तर कलाकारों के प्रति ज्यादा संवेदनशील एवं उदार हैं। वे मानते हैं कि जब हमारा माध्यम हमसे सध गया है, हम अनुभव पक्व हो गये हैं, भावी पढिय़ों के लिये हमारे पास देने के लिए मूल्यवान सम्‍पदा है तब उठ जाना कला के लिये बड़ी दुर्घटना है- अपूरणीय क्षति। वे कहते हैं कि मूत्यु को ऐसे कलाकारों से ग्रेस में कुछ वर्षों का जीवन-दान देना ही चाहिए। निश्चिंत होकर, एकाग्रभाव से अपना सर्वोत्तम दिये बिना हम तुम्हें लेने नहीं आयेंगे। मुझे दूधनाथ सिंह की बात मूल्यवान और सार्थक लगती है। कल्पना कीजिए,  रवीन्द्रनाथ ठाकुर दस वर्ष और जीते, गालिब को मृत्यु ने पंद्रह वर्षों का अवकाश और दिया होता या तुलसी को ‘विनय पत्रिका’ लिखने के बाद कुछ समय और मिला होता। कुछ लोग साठ पार होने पर सठिया जाते हैं किंतु कुछ लोगों पर उम्र का प्रभाव नहीं पड़ता। क्या साठ, क्या सत्तर जो लोग साठ के होने के पहिले ही सठिया जाते हैं, उनका आप क्या करेंगे? साहित्यकार के लिये उम्र का बंधन नहीं होता है। हाँ, कोई बंधन होता है रचनात्मकता का। कविता यौवन की विधा है। प्रौढ़ावस्था में उपन्यास या कहानी लिखनी चाहिए और वार्धक्य में आत्मकथा सिंहावलोकन। विश्व साहित्य में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है जहाँ यौवन में कवियों ने अपना सर्वोत्तम प्रदान किया है। पर ऐसे उदाहरण विरल ही हैं जहाँ 25-30 वर्ष का साहित्यकार ‘गोदान’ लिखे या ‘मैला आंचल’। संस्मरण या आत्मकथा जैसी विधाएं एक तटस्थता, एक वैराग्यभाव की अपेक्षा रखती हैं, वैसे बेईमानी की हिसाब किताब की, आत्मश्लाधा की कोई उम्र नहीं होती। रचनात्मकता, नवनवोन्मेषशीलता किसी उम्र का मुँह नहीं देखती। साहित्यकार को तब तक वृद्ध नहीं माना जाना चाहिए जब तक उसकी रचनाओं में नवीनता का, ताजगी का ताप शेष है।

हिन्‍दी में पुरस्कारों के लिये जो मारामारी है वह प्रतिष्ठा और मान्यता के लिये तो है ही, वित्तीय सुरक्षा कवच प्राप्त करने के लिये भी है। लखटिया पुरस्कार मिल गया तो हारी बीमारी में काम आयेगा, बेटियों की शादी आसानी से हो जायेगी, बेटे-बहू को लगेगा कि गैया अभी भी दूध दे सकती है। पुरस्कार प्राप्त साहित्यकार फेड आउट नहीं होता। पुरस्कार किस संस्था का है, उसके निर्णायक कौन हैं, उनकी विचारधारा क्या है, महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है कागज का वह टुकड़ा जिसे चैक या ड्राफ्ट कहते हैं। हमारी मनीषा हर काम को वित्तीय साधनों के दोहन में परिवर्तित करने में इतनी कुशल है कि बिना भ्रष्टाचार के हम किसी भी चीज की कल्पना ही नहीं कर पाते। झूठा मेडिकल सर्टिफिकेट लेना हो, रेलवे में आरक्षण करवाना हो, पी.एच.डी. प्राप्त करनी हो, संगोष्ठी करनी हो, मकान खरीदना हो- सब में जितना लेनदेन मेज के ऊपर होता है, उससे कम मेज के नीचे नहीं। साहित्यकार इससे मुक्त होगा, यह सोचना खामख्याली है। जो साहित्यकार यह सब मैनेज नहीं कर सकता वह ‘निराला’ जैसा, मुक्तिबोध जैसा जीवन जीने के लिए बाध्य है। मैं हिन्‍दी के अनेक साहित्यकारों को जानता हूँ जो मंच से गुलशन नंदा को गालियाँ देते हैं पर मन ही मन मनाते हैं हाय;  हम गुलशन नंदा क्यों न हुए? लेखक जिंदगी भर लिखने, छपने और बिकने के बाद भी अपना बुढ़ापा अपने घर में निश्चित होकर नहीं काट सकता। साठ पार के साहित्यकार को हमारा समाज और हमारी सरकारें निश्चिंत होकर लिखने की सुविधा नहीं देती। मध्यप्रदेश शासन ने विभिन्न विश्वविद्यालयों में मुक्तिबोध पीठ, निराला पीठ, प्रेमचंद पीठ जैसी बहुत सम्मानीय और उपयोगी शुरुआत की थी पर उनका जो हश्र हुआ, वह किसी से छिपा नहीं है। राजनीति हमारे साहित्यिक और सांस्कृतिक जीवन पर इस कदर हावी है कि हम किसी भी पद-पुरस्कार-मंच को निष्कलुष रहने ही नहीं देते। आप कितना भी अच्छा कुआँ खरीदिये, उसमें भाँग डालने के सौ-सौ जतन हमें आते हैं। सारा दोष सरकारों का, समाज का ही हो, ऐसा नहीं है। हमारे साहित्यकार भी साठ पार की अपनी दुर्व्‍यवस्‍था के लिये कम जिम्मेदार नहीं हैं। साहित्य रचना को लेकर हमारे मन में कुछ ऐसी रोमानी कल्पनाएं बनी हुई हैं कि साहित्यकार संतुलित जीवन जी ही नहीं पाता। प्रतिभा प्राय: असंतुलित होती है पर वृद्धावस्था का ब्लू प्रिंट तैयार करने का रिवाज हमारे यहाँ नहीं है। साहित्यकार की संपन्नता, उसकी निश्चिंतता सम्माननीय होनी चाहिए। उसे उपेक्षणीय एकाकी, रुग्ण बनाने से बचाने के जितने उपाय हम कर सकें, हमें करने चाहिए। लता मंगेशकर, खुशवंत सिंह यदि साठ पार के बाद भी सक्रिय और ऊर्जा संपन्न हैं तो इसीलिए कि वे स्वस्थ भी हैं और आर्थिक रूप से सुरक्षित भी। हिन्‍दी के विष्णु प्रभाकर भी हमें याद आते हैं। एक प्रकार से विगत को अभ्यागत करने की विधा है। यह विधा मुझसे सध गई, संस्मरण मेरे लिये सुविधा की विधा है। दूसरों के लिये है या नहीं, मैं नहीं कह सकता। कुछ लोगों का आरोप है कि अपने संस्मरणों में क्रुयेल हो गया हूँ। मैं इससे इंकार नहीं करूँगा। शल्य चिकित्सक यदि दया, माया, ममता दिखाने लगे तो वह शल्यक्रिया नहीं कर सकता। हमारे समाज में कथनी और करनी में इतना अंतराल है कि दोनों को अलग-अलग करने के लिये निर्ममता आवश्यक है। फिर मेरे कुछ समीक्षकों ने मुझ पर अपने संस्मरणों में ‘छौंक’ लगाने का आरोप भी लगाया है। जिन संस्मृतों को जो श्रद्धेय, पूज्य प्रात: स्मरणीय मानते हैं उन पर अंगुली उठाया जाना वे सहन नहीं कर पाते। फिर रचनात्मकता थोड़े बहुत छौंक की अपेक्षा करती ही है। छौंक यानी लंतरानी मैंने किसी बदनीयती से समाविष्ट की हो, ऐसा नहीं है। किसी व्यक्ति की जो छवि लोक में प्रचलित है, वह भी मेरी दृष्टि में रही है इसलिए रसाल अथवा रजनीश, सुमन अथवा अंचल जैसे व्यक्तियों के सत्य प्रसंग भी उनके श्रद्धालुओं को छौंक जैसे लगते हैं। मैं छौंक से बच सकता था फलत: विवादों से भी पर विवादों से बचने के लिये हर किसी की प्रशंसा करना, उसके केवल उज्ज्वल पक्षों की ही निशानदेही करना मुझे गलत लगता है। निर्ब्‍याज सत्य, संपूर्ण निष्पक्षता संभव नहीं है। प्रारंभ में मैंने भी कामना की कि कोई पुरस्कार, कोई सम्मान मुझे मिले पर हिन्‍दी में पुरस्कारों की, सम्मानों की जो हालत है वह प्राय: सम्मानित हो, पुरस्कृत को उठापटक, जोड़तोड़ के घेरे में खींच लेती है। मैंने अब सम्मान या पुरस्‍कार की कामना से मुक्ति पा ली है। इन दिनों टी.वी. चैनलों पर एक विज्ञापन आ रहा है- रूपा फ्रंटलाइन पहिनी है तो सामने आ जाओ। यानी महत्व फ्रंटलाइन अंडरवियर का है, उसके पहिनने वाले का नहीं। इन दिनों सभी समीक्षक, पुरस्कार समितियों के सभी सम्मानित सदस्य, चयन समितियों के सभी विशेषज्ञ प्रत्याशी की योग्यता या क्षमता का मूल्याँकन नहीं करते, नहीं करना चाहते, वे विचारधारा, संगठनबद्धता या संघ की सदस्यता के आधार पर निर्णय करते हैं। राजनीति में यह होता है, साहित्य में भी यही होने लगा है। जिस दौर में कृति की तुलना में कृतिकार का अंतर्वस्त्र महत्वपूर्ण हो, उस दौर में साहित्य की गुणवत्ता नहीं, साहित्यकार की जोड़-तोड़ की क्षमता ज्यादा प्रभावशाली हो हाती है।

कान्तिकुमार जैन को भवभूति अलंकरण सम्‍मान

कान्तिकुमार जैन

नई दिल्‍ली : हिन्दी के वरिष्ठ लेखक तथा सागर विश्‍वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर कान्तिकुमार जैन को वर्ष 2012 के लिये प्रतिष्ठित स्व. मायाराम सुरजन स्मृति भवभूति अलंकरण से सम्मानित किये जाने का निर्णय लिया गया है।

मध्‍य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के महामंत्री प्रोफेसर विजय कुमार अग्रवाल ने इस आशय की जानकारी देते हुए बताया कि पुरस्कार के लिये गठित निर्णायकों वरिष्ठ आलोचक प्रोफेसर नामवर सिंह, वरिष्ठ कथाकार स्वयं प्रकाश तथा वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने सर्वसम्मत से प्रोफेसर कान्तिकुमार जैन को उनकी रचनाधर्मिता एवं हिन्दी साहित्य को अपनी रचनाओं से समृद्ध करने तथा संस्मरण विधा को जीवनतता प्रदान करने के लिये पुरस्कृत करने का निर्णय लिया। प्रोफेसर जैन की रचनाओं में छत्तीसगढ़ी बोली व्याकरण और कोश, भारतेन्दु पूर्व हिन्दी गद्य, कबीरदास, इक्कीसवीं शताब्दी की हिन्दी, छायावाद की मैदानी और पहाड़ी शैलियाँ, शिवकुमार श्रीवास्तव: शब्द और कर्म की सार्थकता, सैयद अमीर अली ‘मीर’,  लौटकर आना नहीं होगा, तुम्हारा परसाई, जो कहूँगा सच कहूँगा, बैकुंठपुर में बचपन, महागुरु मुक्तिबोध: जुम्मा टैंक की सीढिय़ों पर, पप्पू खवास का कुनबा, लौट जाती है उधर को भी नजर आदि प्रमुख हैं। उन्होंने बुन्देलखण्ड की संस्कृति पर केन्द्रित ‘ईसुरी’ नामक शोध पत्रिका का सम्पादन किया है। डॉक्‍टर जैन ने ‘भारतीय लेखक’ के परसाई अंक का ‘परसाई की खोज’ के नाम से अतिथि सम्पादन किया है।

9 सितम्बर 1932 देवरीकलाँ सागर में जन्मे कान्तिकुमार जैन ने सागर विश्‍वविद्यालय में 1992 तक अपनी सेवाएं प्रदान कीं। साथ ही उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी पीठ, मुक्तिबोध पीठ, बुन्देली शोध पीठ के अध्यक्ष पद को भी सुशोभित किया हैं। ‘छत्तीसगढ़ की जनपदीय शब्दावली’ पर उनका विशेष कार्य हुआ है। वह अपनी बात को मजबूती से कहने के लिए प्रसिद्ध हैं।

क्रिकेट के जन्म की लोककथा : कांतिकुमार जैन

सभी का मानना है कि‍ क्रि‍केट का जन्‍म इंग्‍लैंड में हुआ, लेकि‍न यह सच नहीं है। इस खेल का जन्‍म छत्तीसगढ़, भारत में हुआ और वह भी त्रेता युग में। इसके जन्‍मदाता हैं राम जी और लखनजी। यकीन नहीं हो रहा है तो पढ़ि‍ए चर्चित संस्‍मरणकार कान्‍ति‍कुमार जैन का संस्‍मरण-

उस समय मुझे यह पता नहीं था कि जिसे सारी दुनिया क्रिकेट के नाम से जानती है, वह हम बैकुंठपुर के लड़कों का पसंदीदा खेल रामरस है। ओडगी जैसे पास के गांवों में रामरस को गढ़ागोंद भी कहते थे, पर सिविल लाइंस में रहने वाले हम लोगों को रामरस नाम ही पसंद था। रामरस यानी वह खेल, जिसे खेलने में राम को रस आता था। अब आप यह मत पूछिएगा कि राम कौन ? अरे राम- राजा राम, अयोध्या के युवराज, त्रेता युग के मर्यादा पुरुषोत्तम दशरथनंदन राम। मुझे राम और राम रस के संबंधों का पता नहीं था। वह तो अचानक ही खरबत की झील के किनारे मुझे जगह-जगह पर पत्थर के रंगबिरंगे गोल टुकड़े मिले- टुकड़े क्या-बिल्कुल क्रिकेट की गेंद जैसे आकार वाले ललछौंहे रंग के पत्थर। खरबत झील से लगा हुआ पहाड़ है। बैकुंठपुर से कोई सात मील यानी लगभग चार कोस दूर। इतवार की सुबह हमने तय किया कि आज खरबत चला जाए, वहीं नहांएगे, तैरंगे और झरबेरी खाएंगे। हम लोगों ने यानी मैंने और जीतू ने, जीतू मेरा बालसखा था। मेरे हरवाहे का लड़का- हम उम्र, हम रुचि। साइकिल थी नहीं तो हम लोग पैदल ही खरबत नहाने निकले। रास्ता सीधा था। छायादार। पास के गांव यानी नगर के तिगड्डे से बिना मुड़े सीधे सामने चले चलो। खरबत की झील आ जाएगी। सामने पहाड़, हराभरा जंगल। खरबत की झील का जल इतना पारदर्शी और निर्मल था कि चेहरा देख लो। हम लोगों ने निर्मल जल में सिर डुबोया ही था कि टकटकी बंध गई। जल में यह किसका प्रतिबिंब है ? आईने में अपने चेहरे का प्रतिबिंब तो रोज ही देखते थे, पर वह चेहरा इतना सुंदर और मनोहारी होग, यह कभी लगा ही नहीं। वह तो अच्छा हुआ कि उस समय तक मैंने नारसीसस की कथा नहीं पढ़ी थी अन्यथा मैं अपना प्रतिबिंब छूने के लिए नीचे झुकता और कुमुदिनी बनकर खरबत झील में अब तक डूबा होता। झील में कुमुदिनी के फूलों की कमी नहीं थी- कुमुदिनी को वहां के लोग कुईं कहते अर्थात् मुझसे पहले भी मेरी वय के लड़के वहां पहुंचे थे, उन्होंने जल में अपना प्रतिबिंब निहारा था और इस प्रतिबिंब को छूने या चूमने के लिए नीचे झुके थे और गुड़प- उनकी वहां जल समाधि हो गई होगी और कालांतर में वहां कुईं का फूल उग आया होगा।

कभी-कभी अज्ञान भी कितना लाभदायी होता है। असल में कुईं के फूलों की तुलना में खरबत की झील और खरबत पहाड़ के बीच के मैदान में ललछौहें रंग के जो गोल-गोल पत्थर पड़े थे, उनमें हम लोगों का मन ज्यादा अटका हुआ था। समझ में नहीं आया कि इतने सारे पत्थर, वह भी एक ही रंग के सारे मैदान में क्यों बिखरे हैं। एक पत्थर उठाया, देखा वह मृदशैल का था- रंध्रिल, हल्का, स्पर्श-मधुर। इतनें में वहां से एक बुड्ढा गुजरा। मैंने उसे बुड्ढा नहीं कहा। कहा- सयान, एक गोठ ला तो बता। सयान कहने से वह बुड्ढा खुश हो गया, उसे लगा कि हम उसे सम्मान प्रदान कर रहे हैं। वह रुका- बोला, नगर के छौंड़ा हौं का?

हम लोग बैकुंठपुर के लड़के थे, बैकुंठपुर रियासत की राजधानी थी, उसे सभी कोरियावासी नगर ही कहते थे। उसने- सयाने, अनुभवी पुरुष ने हमें बताया कि खरबत पहाड़ पर गेरू की खदाने हैं। जोर की हवा चलती है तो वहां के पत्थर लुढ़कते हुए नीचे आते हैं गेरू से लिपटे हुए। इतने जोर की आंधी और शिखर से तल तक आने में इतनी रगड़ होती है कि पत्थरों के सारे कोने घिस जाते हैं और पत्‍थर बिल्कुल गोल बटिया बन जाते हैं। वह बैठकर वहीं चोंगी सुलगाने लगा। सरई के पत्ते की चोंगी में उसने माखुर भरी, टेंट से चकमक पत्थर निकाला, बीच में सेमल की रुई अटकाई और पत्थरों को रगड़ा ही थी कि भक्क से आग जल गई- दो चार सुट्टे लिए ही होंगे कि उसकी कुंडलिनी जाग्रत हो गई। अब उसके लिए न काल की बाधा थी, न स्थान की। काहे का कलयुग, काहे का द्वापर। मैंने जीतू से कहा कि यार, नहाएंगे बाद में, पहले इन गोल-गोल गेदों को बीनो और झोले में भर लो- जितनी आ जाएं। कान्ति भैया, अपन इन टुकड़ों का करेंगे क्या? मैं बोला- करेंगे क्या, इन पर साड़ी की किनारी लपेटेंगे, चकमकी मिट्टी का पोता फेरेंगे और रामरस खेलेंगे। रामरस सुनना था कि छत्तीसगढ़ का वह सयाना चैतन्य हुआ, उसने अपनी चोंगी से इतने जोर का सुट्टा लिया कि लौ तीन बीता ऊपर उठ गई। शायद वह त्रेता युग में पहुंच गया था। वह राम-लक्ष्मण को रामरस खेलते देख रहा था। इतने में एक सारस आया, वह हम लोगों से थोड़ी दूर पर एक टांग के बल खड़ा हो गया, उद्ग्रीव। बैठक वैसे ही जैसे कोई दर्शक क्रिकेट मैच में खिलाड़ी को बैटिंग करते देख रहा हो। ध्यानावस्थित, तदगतेन मनसा।

हम लोग लोग उस सयाने के पास बैठ गए। वह सयाना सचमुच सयाना था, सज्ञान, सुजान। हमें लगा कि वह सदैव से सयान था,  न कभी वह बालक रहा था, न तरुण,  जैसा वह त्रेता में था, वैसे ही आज भी है। वह चोंगी का एक कश लेता, सरई के पत्ते की मोटी बीड़ी से लौ उठता और एक युग पार कर लेता। तीसरे कश में तो वह जैसे राम के युग में ही पहुंच गया। कहने लगा कि राम, सीता और लखन भैया वनवास मिलने पर चित्रकूट से सीधे खरबत आए। सीधे अर्थात् चांगभखार के रास्ते से, जनकपुर, भरतपुर होते हुए। खरबत की झील देखकर सीता दे ने जिद पकड़ ली- बस, कुछ दिन यहीं रहूंगी। कहा रहोगी, न यहां कंदरा, न गुफा। न मठ, न मढ़ी। लखन भैया ने कोई बहस नहीं की। अपनी धनुही उठाई, कांधे पर तूणीर टांगा और खरबत पहाड़ी की टोह लेने निकल गए। जिन खोजा तिन पाइयां। बड़के भैया और भाभी वहां झील तीरे चुपचाप बैठे थे। राम कह रहे थे- थोड़ा आगे चलो, सरगुजा में एक बोंगरा है। लंबी खुली गुफा। वह स्थल भी बड़ा सुरम्य है। वहां के निवासी भी बड़े अतिथिवत्सल हैं, पर सीताजी रट लगाए बैठी थीं- खरबत, खरबत। लक्ष्मण ने लौटकर अग्रज को बताया कि यहां से कोसेक की दूरी पर तीन गुफाएं प्रशस्त हैं, स्वच्छ हैं, जलादि की सारी सुविधाएं हैं। हम लोग चातुर्मास यहीं बिता सकते हैं। तो ठीक है, भाभी को ले जाओ, दिखाओ, उन्हें पसंद आती है तो हम लोग चार महीने यहीं रहेंगे। गुफाओं को देखकर सीताजी प्रसन्न हो गईं। उन्हें अपने मायके मिथिला की याद आई।

ऐसी ही हरतिमा, ऐसा ही प्रकाश, ऐसा ही मलय समीर। लखन भैया, तुम इस गुफा में रहना, यहां मेरा रंधाघर होगा। सीताजी वहां की रसोई को रसोई न कहकर स्त्रियों की तरह रंधागृह कहतीं- रंधनगृह। यह गुफा थोड़ी बड़ी है- इसमें हम दोनों रहेंगे। राम ने भी गुफाओं को देखकर सीताजी के मत की पुष्टि की। चतुर पतियों की तरह। चलो, यहां सीता का मन लगा रहेगा। खरबत में राम परिवार के चार माह बड़े आराम से कटे। विहान स्नान-ध्यान में कटता, प्रात: जनसंपर्क के लिए नियत था। स्त्रियां भी आतीं, पुरुष भी। मध्याह्न में दोनों भाई आखेट के लिए निकल जाते। यही समय फल-फूल, कंदमूल के संचय का होता। आखेट से लौटने के बाद वे क्या करें ? एक सांझ लखनलाल ने दादा से कहा- दादा, शाम को हम लोग कोई खेल खेलें। क्या खेल खेलें ? लक्ष्मण बड़े चपल, बड़े कौतुक प्रिय, बड़े उत्साही। बोले- खरबत पहाड़ के नीचे जगह-जगह गोल-गोल पत्थर पड़े हुए हैं- ललछौंहे रंग के, बिलकुल कंदुक इव। मैं कल भाभी से उनकी सब्जी काटने का पहसुल मांग लूंगा और उससे महुआ की छाल छील लाऊंगा। महुआ की छाल यों ही लसदार होती है। खूब कसकर पाषाण कंदुक पर लपेटेंगे तो एक आवेष्टन बन जाएगा। उससे चोट नहीं लगेगी।

दूसरे दिन लखन सचमुच मधूक वृक्ष का वल्कल ले आए। ललछौंहे पाषाण खंड पर मधूक वल्कल का वह एक आवेष्टन ऐसे चिपका कि गेंद पर परिधान का अंतर ही मिट गया। राम को एक उपाय सूझा। उन्हें याद आई कि सीता के पास एक पुरानी साड़ी है। उसकी किनारी बड़ी सुंदर है- चमकीली। गोटेदार। यदि उस किनारी को मधूक आवेष्टन पर लपेट दिया जाए तो गेंद के आघात का कोई दुष्प्रभाव नहीं होगा। लखनलाल को अब कंदुक क्रीड़ा की कल्पना साकार होती हुई लगी। लखन पास के ही एक गर्त से चकमिकी मिट्टी उठा लाए। चकमिकी यानी चकमक वाली। बैकुंठपुर में नदी-नालों की सतह पर जो चकमिकी मिट्टी दिखाई पड़ती है, वह और कुछ नहीं, अभ्रक है।

लखन की लाई हुई अभ्रक में गेंद को लिथड़ाया जा रहा है। सीता देखकर हँस रही हैं- अरे, ये काम तुम लोगों के नहीं हैं, तुम लेोग तो तीर-धनुष चलाओ। वह सरई के पत्तों की चुरकी में झील से थोड़ा-सा जल भर लाई हैं। अभ्रक पर उन्होंने जल सिंचन किया है। थोड़ा-सा जल अपनी हथेलियों में लेकर गोंद को भी आर्द्र किया है। अरे, गेंद तो अब चमकने लगी है। अब अंधेरा भी होए तो गेंद गुमेगी नहीं, दिखती रहेगी। खेल के नियम तय किए जा रहे हैं। राम ने सीता खपडिय़ों को लेकर तरी ऊपर जमा लिया है- खपड़ी यानी खपरे के टुकड़े, तरी ऊपर यानी नीचे-ऊपर। राम ने उन सात खपडिय़ों की सुरक्षा का भार स्वत: स्वीकार किया है यानी बल्लेबाजी। लखनजी को गेंद ऐसे फेंकनी थी कि सात खपडिय़ों वाला स्तूप ढह जाए। राम जी सावधान-सतखपड़ी के सामने ऐसी वीर मुद्रा में खड़े होते कि लखनजी को लक्ष्य पर आघात का मौका ही नहीं मिलता। इधर लखनजी ने गेंद फेंकी, उधर रामजी ने उस गेंद को ऐसे ठोका कि कभी सामने खड़े आंवले के तने से टकराती, कभी दाएं फैली खरबत पहाड़ी की तलहटी से। कभी-कभी तो रामजी अपना बल्ला ऐसे घुमाते कि गेंद खरबत झील का विस्तार पारकर उस पार। अब लखनजी गेंद के संधान में लगे हैं। दिन डूब जाता, सूर्यदेव अस्त हो जाते। दोनों भाई गुफा में वापस लौटते। क्लांत भाभी देवर से मजाक करती- आज फिर दिनबुडिय़ा। दिनबुडिय़ा यानी दिन डूब गया है और तुम दांव दिए जा रहे हो। लखन कहते- भाभी, भैया ने बहुत दौड़ाया। बल्ला ऐसे घुमते हैं कि जैसे उनके बल्ले में चुंबक लगा हो, गेंद कैसे भी फेंको, भैया, उसे धुन ही देते हैं। दो-एक दिन तो ऐसे ही चला, फिर सीताजी ने मध्यस्थता की। उन्हें देवर पर दया आई- कल से तुम दोनों बारी-बारी से कंदुक बाजी और बल्लेबाजी करोगे। मैं तुम दोनों भाइयों का खेल देखूंगी। कोई नियम विरुद्ध नहीं होना चाहिए।

रामजी को मर्यादा का बड़ा ध्यान रहता है। ये मर्यादा पुरुषोत्तम यों ही तो नहीं कहलाते। फिर सीताजी जैसे निर्णायक। खेल में वे कोई पक्षपात नहीं करतीं। गोरे देवर, श्याम उन्हें के ज्येष्ठ हैं। फिर दर्शक दीर्घा में सारस भी तो हैं- एक टांग पर खड़े क्रीड़ा का आनंद उठाते हुए। निर्णय देने में जरा-सी चूक हुई कि सारस वृंद क्रीं-क्रीं करने लगता है। रामरस की ऐसी धूम मची कि खरबत के आदिवासी युवा तो वहां समेकित होने ही लगे, बैकुंठपुर, नगर, ओडग़ी के तरुण भी खेल देखने के लिए एकत्र हो रहे हैं। चतुर्दिक रामरस का उन्माद छाया हुआ है। राम के परिवार में आनंद ही आनंद है। लोक से जुडऩे का संयोग अलग से। रामजी ने देखा कि आसपास के गांवों के युवा भी इस खेल में सम्मिलित होना चाहते हैं। उन्होंने सीताजी से परामर्श किया, लखनभाई से भी पूछा। सब खेल को व्यापक आधार देने के पक्ष में हैं। अगले दिन से अभ्यास पर्व मनाए जाने की घोषणा हुई। बल्ले सब अपने-अपने लाएंगे। शाखाएं चुनी जा रही हैं, टंगिया से डगालें काटी जा रही हैं, हंसिया से उन्हें छीला जा रहा है। ऊपर का भाग पतला-मूठवाला। हाथ से पकडऩे में आसानी हो। नीचे का भाग चौड़ा, समतल। बल्ला तैयार हो गया तो उसे मंदी आंच पर तपाया जा रहा है। सामने से कितनी भी तेज गेंद आए, बल्लेबाज का बल्ला उसे ऐसे ठोके कि सीमा के पार। राम नवमी के दिन राम और लखन के दल में विशेष प्रतिस्पर्धा होगी। गांव के सयाने आमंत्रित हैं- खरबत के ही नहीं, आसपास के गांवों के भी। नगर के, ओड़गी के। निर्णय निष्पक्ष होना चाहिए। एक चत्वर बनाया गया। धर्माधिकारी उस चत्वर पर बैठेंगे, वाद-विवाद होने पर पंचाट का निर्णय सर्वमान्य होगा। रामरस मर्यादा का खेल है, भद्रजनों का। रामरस से मर्यादा के जो नियम निर्धारित हुए थे, वे आज भी न्यूनाधिक परिर्वतन के साथ अक्षुण्ण रूप से प्रचलित हैं। अब लोग उसे रामरस नहीं कहते, क्रिकेट कहते हैं, पर नाम में क्या धरा है- आज जब कोई कहता है ‘ये तो क्रिकेट नहीं है’ तो भैया, हमारी तो छाती चौड़ी हो जाती है। बैकुंठपुर में क्रिकेट के पूर्वज रामरस का बचपन बीती। छत्तीसगढ़ में क्रि‍केट का पहला मैच खेला गया।

वह सयाना त्रेता युग की पूर्व स्मृतियों में खो गया। उसकी चोंगी की लौ धीरे-धीरे मंदी पड़ रही थी। उसने उस ओर देखा जिस ओर सारस खड़े थे। वह जनता था कि सारस रामरस के ऐसे दर्शक हैं, जिन्हें न भूख प्यास व्यापती है, न प्यास। वे रात-दि‍न रामरस में ऐसे डूबे रहते हैं कि खेलनेवाले थक जाएं, पर उन्हें कोई क्लांति नहीं होती। सीताजी की रसोई तैयार थी- आईं। दोनों भाइयों को ब्यालू की सूचना दी। सभी सयानमन से कहा दादाजी- आप भी ब्यालू हमारे साथ ही करें। धर्मरक्षक लोगों से भी आग्रह किया कि ब्यालू के बाद ही जाइएगा। हम लोगों को लगा कि हम भी तेता युग में हैं। सीताजी ने, लखनलाल ने दादा राम ने भी रोका, पर हम लोग रुके नहीं। घर में बोलकर नहीं आए थे, कौन विश्‍वास करेगा। पिताजी को पता चलेगा तो सौ सवालों का जवाब देना पड़ेगा। हम लोगों ने कहा- दीदी, हम लोग बराबर आते रहेंगे। हम लोगों को भी रामरस में रस आने लगा है। रामरस में कौन अभागा है, जिसे आनंद न आए?

(सामयि‍क बुक्‍स से प्रकाशि‍त पुस्‍तक बैकुंठपुर में बचपन से साभार)

भाषा कभी लॉक नहीं होती : कान्ति कुमार जैन

भाषा में आ रहे बदलाव और उसके कारणों पर चर्चित संस्‍मरणकार कांति‍कुमार जैन का आलेख-

कुछ दिनों पहिले रायपुर के मेरे एक मित्र ने मुझे अपने छोटे बेटे के विवाह का निमंत्रण पत्र भेजा। उस निमंत्रण पत्र में नीचे उनके आठ वर्षीय नाती का आग्रह था- चच्चू की शादी लॉक हो गयी है, उसमें जरूर आना। मैं समझ गया कि‍ यह आठ वर्षीय नाती अमिताभ बच्चन का लोकप्रिय शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ देखता होगा। जिसमें अमिताभ हाट सीट पर बैठे हुए प्रतिभागी का उत्तर सुनकर कहते हैं-कांफीडेंट, फाइनल, लॉक करने लायक है ओर प्रतिभागी के हां कहने पर कम्प्यूटर को आदेश देते हैं- कम्प्यूटर जी, कृपया बी को लॉक कर दें। उस नन्हे-मुन्ने की समझ में आया होगा कि लॉक करने का अर्थ होता है- पक्का करना, निश्‍चय करना। अतः जब उसके चच्चू की शादी पक्की हो गयी तो नये मुहावरे में वह लॉक हो गयी। लॉक करना हिन्दी के किसी शब्दकोश में नहीं है। हो भी नहीं सकता। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ की उम्र अभी कुछ साल ही हुई है और हमारे शब्दकोश जीवित भाषा से सौ नहीं तो 85 साल पीछे तो चल ही रहे हैं। चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की प्रसिद्ध कहानी ‘उसने कहा था’ मैं लहना सिंह ने मगरे में मिली उस लड़की से पूछा था, ‘तेरी कुड़माई हो गई।’ यही 1915 की बात है। 1915 से लेकर आज तक महाविद्यालयों और विश्‍वविद्यालयों में पढ़ने वाले लाखों विद्यार्थियों ने पढ़ा होगा,  तेरी कुड़माई हो गयी। यह शब्द हिन्दी का नहीं है, पर हिन्दी पढ़ने जाने वालों की पिछली सात-आठ पीढ़ियां इस शब्द से परिचित हैं। तेरी कुड़माई हो गयी अर्थात तेरी मंगनी हो गई, पर हिन्दी के किसी कोश में यह शब्द नहीं मिलता। हिन्दी के कोशकार ने कुड़माई को हिन्दी शब्द मानने की उदारता या व्यवहारिकता नहीं बतायी, पर जीवित भाषाएं कोशकारों का अनुशासन नहीं मानतीं। वे जनता के साथ चलती हैं। कुड़माई का अर्थ टटोलने के लिये जब मैंने हिन्दी के शब्दकोश उलटे तो लगे हाथ मैंने बिंदास, ढिशुंग-ढिशुंग, धांसु शब्द भी खोजे। पर ये शब्द भी हिन्दी शब्द कोशों में नहीं हैं। फिक्सिंग, एड्स जैसे शब्दों की हिन्दी शब्द कोशों में तलाश करना बेकार ही है। जब हिन्दी के कोशकार पंजाबी कुड़माई की मंगनी हिन्दी के मुंडे से नहीं करवा पाये तो हिन्दी में लॉक करने की उम्मीद करना बेकार ही है। लॉक करना अब के. बी.सी. का अपना मुहावरा नहीं है, वह अमिताभ बच्चन की कथन-भंगिमा की विशिष्टता भी नहीं है, वह सारे हिन्दी क्षेत्र में और हिन्दी क्षेत्र के बाहर भी,  पक्का करने, सुनिश्‍चि‍त करने का पर्याय बन गया है। जो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ नहीं देखता, वह भी लॉक करने का अर्थ जानता है।

भाषा को जब कबीर ने सैकड़ों साल पहिले ‘बहता नीर’ कहा था तो वे मानों कहना चाहते थे कि भाषा का कोई अंतिम रूप नहीं होता, भाषा को लेकर कोई यह दावा नहीं कर सकता- बस इतना ही,  इससे आगे नहीं। भाषा मिथक नहीं मानती। जीवन सदैव आगे बढ़ता चलता है। भाषा भी उसके साथ,  उसके पीछे कदम मिलाकर बढ़ती जाती है। यदि ऐसा न होता तो बुद्ध ने प्राकृत को न अपनाया होता। खुसरों ने पंडित प्यासा क्यों,  गधा उदासा क्यों जैसी पंक्तियाँ न लिखी होती। गांधी जी ने हिन्दुस्तानी का नारा न दिया होता और अमिताभ ने बड़ी आसानी से पूछा होता पक्का,  वह लॉक कर दे क्यों कहता। नवीनता लाने के लिए,  सामने वालों को अपनी बात समझाने के लिए,  जनता के दिलों में अपने कहे को उतारने के लिए वह कहता है- लॉक कर दें। यह बात हमारे कोशकार नहीं जानते हैं। लेकि‍न रायपुर के मेरे उस मित्र का आठ साल का नाती जो मुझे अपने चच्चू की शादी पक्की हो जाने पर उसके विवाह में आने की मनुहार कर रहा है, जानता है।

भाषा के बदलने के बहुत सारे कारक गिनाये गये हैं। युद्ध,  क्रांति, यात्रा,  धर्म,  सेना, आक्रमण,  नयी खोजें, दूरदर्शन आदि‍। दूरदर्शन इन सबमें सबसे नया और काफी प्रभावशाली कारक है। दूरदर्शन पर आने वाले विज्ञापनों से, दिखाये जाने वाले चैनलों से, गानों से भाषा घर बैठे बदल रही है। उसकी पैंठ घर-घर तक है। सब लोगों तक है। वह नये युग का कबूतर है। वह कब आपके कानों में ईलू ईलू फूँक जायेगा, पता नहीं। भाषा अब आपके अचेतन पर प्रभाव डालती है, वह कक्षा में नहीं, बेडरूम में आपको अपने तेवर दिखाती है। वह गाँवों, कस्बों, शहरों में एक साथ पहुँचती है। वह पढ़े-लिखे और गैर पढ़े-लिखे सबको आकृष्ट करती है। आज जो भूमण्डलीकरण हो रहा है। उसका सबसे बड़ा सेल्समैन दूरदर्शन है। दूरदर्शन की कृपा से, भूमण्डलीकरण के चलते एक नयी हिन्दी विकसित हो रही है, जिसे हम हिंग्लिश कह सकते हैं। कोका कोला हो जाय, लेट अस एंज्वाय। भौरा बगियन में गाईंग को हर दूरदर्शक समझता है,  समझता है और एंज्वाय कराता है और कापी करता है। इसे हम केवल मनोरंजन या विज्ञापन की भाषा कहकर नहीं टाल सकते। यदि हम हिन्दी के लोकप्रिय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के नाम ही देखें तो हम इंडिया टूडे, सांध्य टाइम्स जैसे नाम दि‍खेंगे। यह नहीं कि इनके हिन्दी पर्याय नहीं हैं या नहीं हो सकते, पर तब उनकी अपील कम हो जायेगी। वे हिन्दी क्षेत्र के बाहर नहीं समझे जा सकेंगे। भाषा इन दिनों हिन्दी का प्रचार करने के लिए नहीं,  व्यापार का प्रचार करने के काम में लायी जा रही है । जो माल सबसे ज्यादा बिकेगा, हम उसके व्यापारी हैं। वह माल जिस भाषा में बिकेगा, वह हमारे काम की भाषा है। भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया में वे सारी भाषाएँ मिट जानेवाली हैं जो व्यापार, वाणिज्य के लिये उपयोगी नहीं रह गयी हैं। आर्थीकरण की प्रक्रिया ने गदबा जैसी भाषा को खतम कर दिया। उपभोक्तावादी भूमण्डलीकरण को संस्कृति हमारी बोलियों को लील जायेगी।

भूमण्डलीकरण का खतरा तो हिन्दी के सामने है ही, हिंदी इन दिनों एक नयी समस्या से जूझ रही है। हिन्दी का पत्रकार,  हिन्दी का अध्यापक,  हिन्दी का लेखक अब दूर-दूर तक फैले हुए हिन्दी क्षेत्रों से आता है। उसके लिए पंक्ति से बिछुड़ों की जगह डार से बिछुड़ा ज्यादा अपनी अभिव्यक्ति है,  झूमना की जगह ‘झीमना’ उसे ज्यादा अपना लगता है। ‘परांदा मेरा लाल है’ कहकर उसे ज्यादा संतोष होता है। ये लेखक अपने साथ अपनी-अपनी बोलियों के शब्द और अभिव्यक्तियां ला रहे हैं। हाथी या जंगली सूअर के बाहरी दांतों के लिए परिनिष्ठित हिन्दी में कोई शब्द नहीं है, पर बोलियों में है- खिरसा। चलते-चलते बैठ जाने वाले पशु के लिए गरियार शब्द है- ‘मरे बैल गरियार, मर्रे वह अड़ियल टटटू’। उबला हुआ अनाज बोलियों में कोहरी कहलाता है। जिसे अंग्रेजी में एम्प्टी स्टमक कहते है, वह बुंदेली में निन्ने मौ (निरन्न मुंह)। जो बिना गुरू का है वह निगुरा कहलाता है। आज भी प्रायवेट परीक्षा में बैठने वालों को नियमित छात्र की तुलना में हीन माना जाता। अनियमित छात्र की तुलना में निगुरा शब्द स्वीकार करने में क्या संकोच है।

अंग्रेजी की लाघव प्रियता अब हिंदी ने भी स्वीकार कर ली है। आज से बीस-पच्चीस वर्ष पूर्व आधाक्षरों से मिलकर बनने वाले शब्द हिन्दी मे कम ही देखने में आते थे, पर अब तो भाजपा, विहिप, टाडा, मीसा, लिटटे्, इंका हिंदी के समाचार पत्रों में आम हैं। कभी-कभी ये संक्षिप्त अभि‍व्‍यक्तियां इतनी प्रचलित हो जाती हैं कि हम उनके पूर्ण रूप भूल जाते हैं। एल.एल.बी., डी.डी.टी., एस.टी.डी., फिपेट ही प्रचलित है, उनके पूर्ण रूप कहीं सुनने में नहीं आते।

आशुतोष रामनारायण को आप नहीं जानते होंगे, पर आशुतोष राना हमेशा से ऐसे ही नहीं थे। जब वे सागर विश्‍वविद्यालय के विवेकानंद छात्रावास में रहते थे तो बड़ी समस्या आ गयी। दो-दो आशुतोष (दोनों के पिता श्री का नाम भी एक जैसा- रामनारायण)। ऊधम की एक आशुतोष ने, दूसरा दंडित हो। छात्रावास के प्रतिपालक के रूप में मैंने तय किया कि गाडरवारा के आशुतोष को आशुतोष राना लिखा जाये- रामनारायण का संक्षेप। तब क्या पता था कि आशुतोष राना इस कदर चमकदार सितारा बनकर उभरेगा।

एक बार मुझे दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय जाना था मौखिकी के लिए। मैंने आटो वाले से कहा- जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी। वह भौचक मेरा मुंह देखता रह गया। मैंने उसे समझाया। मेरे मुंह से निकला- अरे, भाई जे.एन.यू.। वह बोला- साहब, हिंदी में ऐसा कहिए न। आप पता नहीं अंग्रेजी में क्या-क्या बोले जा रहे हैं।

सो, अब भाषा का हिन्दी होना या अंग्रेजी होना बेमानी हो गया है। भाषा वह जो अपनी बात समझा सके। भूमण्डलीकरण के उस युग में भाषा से हमारी अपेक्षा बदल गयी है। भाषा अब हमें ‘कामायनी’ लिखने के लिए नहीं चाहिए, वह माल बेचने के लिए चाहिये। गालिब के दीवान के अंदर की भाषा की तुलना में हमारे लिए वह भाषा जरूरी हो गयी है जिसमें उपभोक्ता वस्तुओं के रैपर छपते हैं। भाषा की महत्ता अब उसके सुंदर होने में नहीं रह गयी है, उसके अर्थपूर्ण होने में हो गई है। भाषा बदल रही है। नये जमाने के लिए नयी भाषा अमिताभ बच्चन द्वारा जब चार विकल्पों में से किसी एक विकल्प को लॉक करने की बात की जाती है, तब वह प्रकारान्तर से जैसे यह कह रहा है- भाषा को अंतिम रूप से लॉक मत कीजिए, वह शब्द कोशों में बंद होकर अपना दम तोड़ देती है, उसे जीवन के चौराहे पर स्वच्छंद घूमने दीजिए। बच्चे जब बाढ़ पर होते हैं तो उनके कपड़े उटुंग हो जाते हैं। जूते कसने लगते हैं। हिन्दी बाढ़ पर है, उसे उटुंग शब्द कोशों से निकालिए। उसके जूते उसकी चाल के लिए खतरा न बन जायें, इसका ध्यान रहे।

बच्चन जी का प के लिए ध : कान्‍ति‍कुमार जैन

मधुशाला के अमर गायक हरि‍वंशराय बच्‍चन को याद कर रहे हैं चर्चित संस्‍मरणकार कान्‍ति‍कुमार जैन-

पहिले तो मेरी समझ में यह आया ही नहीं कि प के लिए ध का कोई अर्थ हो सकता है। पत्र हिन्दी के प्रसिद्ध कवि, ‘मधुशाला’के गायक हरिवंशराय बच्चन का था, इसमें तो कोई शक नहीं था। पत्र के प्रारंभ में सोपान, गुलमोहर पार्क, नई दिल्ली पता बच्चन जी का ही था और अंत में अंग्रेजी के ‘गुड’जैसे हस्ताक्षर भी उन्हीं के थे, पर यह प के लिए ध क्या ? बहुत मगज पच्ची की पर प के लिए ध का रहस्य नहीं खुला तो नहीं खुला। बहुत दिमागी घोड़े दौड़ाने पर सा रे ग म प ध नी सा याद आया पर वे तो संगीत के बोल हैं, बच्चन जी के पत्र में उनकी क्या संगति? उन दिनों न मोबाइल थे, न ही दूरभाष की सहज सुविधा। क्या करूँ? चलें, जौहरी साहब के पास चलें। आदित्य प्रकाश जौहरी बच्चन जी के इलाहाबाद के दिनों के मित्र थे, तेजी जी से बच्चन जी के विवाह में आदित्य जी की बड़ी भूमिका थी- बच्चन जी और जौहरियों के परिवारों में बड़ी अंतरंगता थी। हो न हो, प के लिए ध का रहस्य जौहरी जी जरूर खोल देंगे। उमा जौहरी ग्वालियर कमला राजा कन्या महाविद्यालय की प्राचार्या थीं। उमा जी जितनी सुंदर थीं, उतनी ही शालीन और जितनी विदुषी थीं, उतनी ही व्यवहार कुशल। वह मूलतः उमा खन्ना थीं। आदित्य प्रकाश जौहरी से विवाह कर वे उमा जौहरी हो गई थीं। शायद उन्हीं जैसी किसी रूपसी को देखकर मध्यकाल के महाकवि देव ने लिखा था- रूप तो खत्रानी को। लगा कि प के लिए ध का रहस्य आदित्य जी या उमा जी में से कोई न कोई अवश्य ही सुलझा देगा। मैंने आदित्य जी को बच्चन जी का वह पत्र दिखाया- जौहरी साहब ने वह पत्र मन ही मन पढ़ा, कुछ मेरी नासमझी पर मुस्काये और पूछा- इसमें समझ में न आने वाली कौन सी बात है? ‘यह प के लिए ध क्या?

जौहरी साहब अपने पुराने यार की आदत जानते थे। जानते थे कि बच्चन जी को हर पत्र का उत्तर देने का व्यसन है। रोज जितने पत्र आते हैं, उनका उत्तर जाना ही चाहिए। पत्रों का उत्तर न देना बदतमीजी है। अब हर पत्र का विस्तृत उत्तर दिया जाये तो समय लगेगा न? इसलिए ‘पत्र के लिए धन्यवाद’हर पत्र के उत्तर में लिखा जायेगा। अन्यथा बच्चन जी की डाक उनकी मेज पर न जाने कब तक पड़ी रहेगी। इसलिए शार्टकट प के लिए ध। डाक कुछ ज्यादा हो गई तो केवल प. ध.।

उस समय तक हिन्दी में संक्षिप्तियों का प्रचलन नहीं हुआ था। लोक सभा में इस मुद्दे पर बहस हो चुकी थी कि हिन्दी में संक्षिप्तियों का रूप क्या हो? अंग्रेजी के एब्रीवियेशंस को देवनागरी में लिखा जाये या हिन्दी की प्रकृति के अनुरूप हिन्दी शब्दों के आद्याक्षरों से हिन्दी की संक्षिप्तियाँ बनाई जायें। संसद का बहुमत हिन्दी संक्षिप्तियों के लिए देवनागरी के आद्याक्षरों के पक्ष में था। जैसे प्रधानमंत्री के लिए प्रमं। पर उन दिनों के शिक्षामंत्री चाहते थे कि हिन्दी में आद्याक्षर अंग्रेजी के आद्याक्षरों के अनुरूप लिखे जायें जैसे पी.एम.। किसी तेज तर्रार सांसद ने शिक्षामंत्री महोदय की इस जिद के कारणों का खुलासा किया था- शिक्षामंत्री जी का पूरा नाम कालू लाल श्रीमाली था। अंग्रेजी के हिसाब से आद्याक्षरों में वह के.एल श्रीमाली बने रहेंगे और उनका कालूत्व ओझल रह जायेगा, पर हिन्दी में उन्हें काला श्रीमाली बनना पड़ेगा जो उतना ही बुरा होगा, जितना माता-पिता का उनको दिया हुआ नाम है।

बच्चन जी हिन्दी की संक्षिप्तियों को हिन्दी की प्रकृति के अनुरूप ही रखना चाहते थे इसलिए प के लिए ध। यह तथ्य इसलिए विशेष उल्लेखनीय है कि बच्चन जी इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक थे और कीट्स पर इंग्लैंड से ही उन्होंने पी-एच.डी. की उपाधि अर्जित की थी।

प के लिए ध की गुत्थी तो सुलझ गई थी पर बच्चन जी के नाम की गुत्थी- मेरा पीछा तबसे कर रही थी, जब मैं सातवीं में था। मैं सरस्वती के पुराने अंक पलट रहा था तो 43 या 44 में मुझे उनकी एक कविता दिखी- ‘इस पार प्रिये मधु हो, तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा? मुझे कविता का अर्थ तो समझ में नहीं आया, दस या ग्यारह साल के लड़के के लिए इस पार उस पार का रहस्य समझना यों भी कठिन ही था, पर कविता के ऊपर बच्चन जी का चित्र था- चेहरे पर सत्य साईं बाबा की शैली में केश कलाप का घटाटोप पर उससे भी ज्यादा ध्यानाकर्षक थे उनके हस्ताक्षर। वे हस्ताक्षर मुझे अंग्रेजी के ‘गुड’जैसे लगे। मुझे लगा ही नहीं कि बच्चन कवि का नाम होगा और वे कवि के हस्ताक्षर होंगे। कवियों के नाम जो अभी तक पढ़ने-सुनने में आये थे वे रसा, पूर्ण, एक भारतीय आत्मा, हरिऔध, नवीन, प्रसाद, निराला जैसे थे। बच्चन किसी कवि का नाम होगा, यह कल्पनातीत था। अपने अनाकर्षक, अकाव्यात्मक भदेस नामों को आकर्षक, काव्यात्मक, नफीस बनाने के लिए नाथूराम ‘शंकर’बन जाते थे, माखन लाला ‘एक भारतीय आत्मा’ और गुसाईं दत्त ‘सुमित्रानन्दन’। एक यह कवि हैं जो हरिवंशराय जैसे अच्छे खासे, कर्णप्रिय, बढ़िया नाम को पीछे ढकेलकर बच्चन जैसे बचकाने, घरेलू नाम को शिरोधार्य कर रहा है। बच्चन, मुन्नन, मन्नन, अच्छन भी- कहीं कवियों के नाम होते हैं? यह तो बाद में समझ में आया कि छायावाद की उदात्त शैली और विषयवस्तु को नकारने और उससे विद्रोह करने का यह कवि का अपना अंदाज था। यह विद्रोह शायद अनजाने ही घटित हुआ था। बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा में लिखा भी है- ‘‘वास्तव में बीसवीं सदी के नवजागरण के साथ हिन्दी के प्रायः सभी नवयुवक कवियों ने अपने समाज में अपने को अजनबी पाया होगा। समाज से अपने को अलग करना चाहा होगा, किसी ने नया नाम लेकर, किसी ने नया रूप बनाकर, बाल बढ़ाकर, किसी ने नया परिधान धारण कर।’’

तो यह है बच्चन जी के छतनार बढ़े हुए बालों का राज, उनके नितांत घरेलू नाम का मर्म, प. के लिए ध. लिखने का राज। हम तुम जैसे सामान्य नहीं हैं, हम सामान्य जन से विशिष्ट हैं। बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा में स्वीकार किया है कि उनके हस्ताक्षर की पद्धति मैं ही उनके काव्य का चरित्र, कवि स्वभाव की व्याख्या, कवि के संदेश की विशिष्टता छिपी है।

बच्चन जी चाहे पोस्टकार्ड लिखें, चाहे लेटर हेड पर पत्र, उनका पूरा का पूरा पत्र उनकी लिखावट के कारण भरा-भरा सा दिखाई पड़ता था। वे अपने हस्ताक्षर भी बड़े घुमावदार ढंग से, जैसे सबकुछ समेटते हुए करते। लिखते तो थे बच्चन पर वह प्रथम दृष्ट्या ‘गुड’जैसा दिखाई पड़ता था। लगता है बच्चन जी अपने प्रत्येक कविता के अंत में अपना नाम नहीं लिखते थे, गुड (good) लिखते थे। तुलसीदास जी भी तो कह गये हैं- निज कवित्त कोई लाग न नीका, सरस होय अथवा अति फीका। सुनने वाले या पढ़ने वाले मेरी कविता को नीका, गुड तो बाद में कहेंगे, अभी तो मैं ही अपनी कविता को ‘गुड’ का विशेषण दे रहा हूँ।

असल में ‘नीका’ अथवा ‘गुड’ काव्य वही होता है जो जीवन के आवर्त्त को व्यक्त करने में समर्थ हो। प्रसिद्ध सूफी शायर हाफ़िज ने अपनी प्रेयसी से कहा था कि मैंने रोजे अजल को जो इकरार नामा तेरी जुल्फ पेंचा से किया था, उसी से बंधा हूँ और निकल नहीं सकता।

बच्चन के प्रिय कवि और उनके शोध विषय कीट्स ने हफीज़ के इस कथन से अपने उस काव्य सिद्धांत के लिए बल संचित किया था कि कवि का क्षेत्र जीवन का आवर्त्त है- घेरा, वृत्त। प्रतीक रूप में प्रेयसी की की जुल्फ पेंचा। प्रेयसी की छल्‍लेदार कुतलराशि जो घूम घाम कर उसी जगह आ जाये, जहाँ से वह शुरू हुई थी।

बुंदेलखंड में एक सांप होता है दो मुँहा- कचलेंड या चकलेंड अंग्रेजी में उसे एरिक्स कहते हैं। वह अपने मुँह में अपनी पूँछ दबाये रहता है। बच्चन जी का बचपन ललितपुर में बीता था। वहाँ कचलेंड बहुत होता है। केशवदास और ईसुरी में भी कचलेंड का उल्लेख है। गालिब की एक प्रसिद्ध पंक्ति है- कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक। अर्थात् विजयी वही है जो तेरी जुल्फों को सर कर सके या कोई कितना भी जिये, प्रेयसी की जुल्फों की सर करना नामुमकिन है। वास्तव में एक लता होती है- इश्कपेंचा- गोल गोल घूमकर बढ़ने वाली, बारीक लाल लाल फूलों वाली, दूर से ही चित्त को मोहने वाली। बच्चन जी ने अपने हस्ताक्षरों का आइडिया हफीज़ के जुल्फे पेंचा से लिया था या कचलेंड से या इश्कपेंचा से पता नहीं पर उन्होंने अपनी कविता में, अपने व्यक्तित्व में, अपने दस्तखतों में, पत्र लिखने की अपनी शैली में, अपने बढ़े हुए घुंघराले बालों में, दार्शनिक का पथ नहीं अपनाया, कवि‍ का मार्ग अपनाया। दार्शनि‍क का पथ बाज का पथ होता है जो सीधा चलता है, कवि का मार्ग सर्प का मार्ग होता है- अपने आसपास को घेरता हुआ, परिवेश को अपने कुंडल में लपेटता हुआ। उनकी मधुशाला में यही सर्वकुंडल वाली शैली अपनाई गई है। सांप तो वही है पर हाला, प्याला, मधुशाला, पीनेवाला जैसे कुंडलों से वह जीवन के पता नहीं किन-किन आवर्त्‍तों को घेरता चलता है। ‘मधुशाला’ की प्रत्येक पंक्ति सर्प की काया के समान सुचिक्‍कण, मसृण और लहरदार है- आदि से अंत तक सुसंबद्ध, गतिशील, पिछला शब्द अगले शब्द को गतिशील बनाता हुआ। बच्चन जी की ‘मधुशाला’ के समान लोकप्रिय काव्य आधुनिक हिन्दी में दूसरा नहीं हुआ। प्राचीन और मध्यकालीन काव्य में आल्हाखंड और रामचरित मानस की लोकप्रियता नितांत दूसरे किस्म की है, पर आधुनिक मन को आकर्षित करने वाली, उसे प्रेरित करने वाली कविता तो ‘मधुशाला’ही थी। जिन लोगों ने बच्चन जी को मधुशाला का काव्य पाठ करते हुए सुना और देखा है, वे जानते हैं कि बच्चन जी अपने शब्दों के साथ दोनों हाथों से, दोनों हाथों की अंगुलियों से भी अपने काव्य का मर्म संप्रेषित करते थे- मैं बोला जो मेरी नाड़ी में डोला, जो मेरी रग में घूमा’बच्चन जी का ही सत्य नहीं था, उनके श्रोताओं का भी सच बन जाता था। जिन गंगा जमुनी मुशायरों में बच्चन जी होते थे, उनमें मुशायरे को लूटने का श्रेय यदि किसी कवि के खाते में जाता था तो वह बच्चन जी ही थे। मधुशाला को प्रकाशित हुए अस्सी वर्ष तो हुए ही पर मधुशाला आज भी हिन्दी भाषी युवकों का कंठहार है। आधुनिक काल में जीवन के प्रति, आमुष्मिकता के प्रति जो अनुराग है, उसके पहिले कवि बच्चन हैं। बच्चन हिन्दी के उन कवियों में हैं जो हजारों-हजारों श्रोताओं को अपनी कविता से बाँधे रह सकते थे। बच्चन जी अपने श्रोताओं या पाठकों से जितने अंतरंग थे, आधुनिक हिन्दी का दूसरा कवि नहीं है।

पहिले बच्चन जी के घटाटोपी केश कलाप वाला चित्र और गुड सरीखे दिखने वाले उनके हस्ताक्षर, फिर मधुशाला की रुबाइयाँ, फिर प के लिए ध। बच्चन जी को मैंने सुना भी बहुत था और देखा भी कम नहीं था, पर वह सब समूह में श्रोता के रूप में। मैं कहीं भी रहूं, बच्चन जी से मेरा पत्र व्यवहार निरंतर चलता रहा। वे मेरी पत्नी साधना को और मुझे नये वर्ष की अपनी मंगल कामनाएं भेजते रहे। वर्ष नव, हर्ष नव, जीवन उत्कर्ष नव।

जब मैं 1978 में सागर विश्‍वविद्यालय आया तो बुंदेली पीठ का उत्तरदायित्व भी मुझे मिला। वे बुंदेली की जिन पुस्तकों के लिए मुझे लिखते, मैं उन्हें बराबर भिजवाता। वे अपनी कविता में आल्हा का कुछ उपयोग करना चाहते थे, उन्होंने मेरे द्वारा संपादित ईसुरी पत्रिका के अंत में बुंदेली पीठ द्वारा प्रकाशित पुस्तकों की सूची में ‘आल्हा खंड’का उल्लेख पढ़ा। उनका 26 जून, 1986 का लिखा हुआ पत्र आया- आपकी पत्रिका ‘ईसुरी’प्राप्त हुई। धन्यवाद। आजकल मेरा स्वास्थ्य अच्छा नहीं है। पढ़ना संभव नहीं हो पाया। शुभकामना। बच्चन।

यह उनका अंतिम पत्र था। इसके पूर्व लगभग साल भर पहिले मुझे एक पत्र और मिला था। उस पर 30 जुलाई, 1985 का दिनांक अंकित था- ‘आपकी ओर से भेजी गई पुस्तक महाकवि जगनिक कृत लोकगाथा आल्हा मिल गई। बहुत बहुत धन्यवाद।’पर इस पत्र में मैं डॉ॰ कान्ति कुमार जैन से डॉ॰ कुन्तल कुमार जैन हो गया था। मैं समझ गया कि पैमाना अब छलकने को है, दिये का तेल खत्‍म होने को है। वे जाल समेटने की तैयारी कर रहे हैं।

बच्चन जी से मेरा व्यक्तिगत परिचय फरवरी, 69 में हुआ। बच्चन जी अपनी आत्मकथा ‘क्या भूलूं क्या याद करूँ’पूरी कर चुके थे और दूसरे भाग‘नीड़ का निर्माण फिर’की योजना बना रहे थे। इस भाग की सामग्री एकत्र करने के लिए वे ग्वालियर आये थे। अपने पुराने मित्र आदित्य प्रकाश जौहरी के अतिथि थे। उनकी पत्नी श्रीमती उमा जौहरी के.आर.जी. कॉलेज की प्राचार्या थीं- बच्चन जी के सम्मान में की गई दावत में जौहरी दम्पत्ति ने जिन लोगों को आमंत्रित किया था उनमें अटल बिहारी वाजपेयी थे, प्रसिद्ध वैज्ञानिक हक्सर साहब और उनकी पत्नी ललिता हक्सर थीं और हम दोनों थे। वाजपेयी जी ऐसी प्राइवेट पाटियों में खूब चहकते हैं- वे पीते नहीं, पर पीने वालों के बहकने-चहकने के लिए कोई अवरोध नहीं बनते थे। हक्सर दंपत्ति बेहद शालीन और गंभीर थे। बचपन जी ऐसे अवसरों पर मितभाषी रहना पसंद करते थे। जब मैं सपत्‍नीक जौहरियों के यहां पहुंचा तो कोठी के बाहर वाले ऊचे चबूतरे पर कुर्सियाँ लगी हुई थीं। उमा जी मेरी प्राचार्या थीं- उन्होंने बच्चन जी से मेरा परिचय कराया। ये कान्ति कुमार हैं, हमारे महाविद्यालय में हिन्दी के प्रोफेसर होकर आये हैं।

बच्चन जी को कुछ याद आया- अच्छा अच्छा, वही न जिन्होंने जगदलपुर बस्तर से मेरी कविता नागिन को लेकर मुझे एक पत्र लिखा था। फिर बोले- मैंने हालावाद के विकास पर लिखा माध्यम वाला इनका लेख भी पढ़ा है और अपनी फाइल में उसकी कटिंग रख छोड़ी है। यह मेरे लिए बहुत पुरसकून बात थी कि इतना बड़ा कवि मुझे जानता ही नहीं, मेरे मंतव्यों को महत्वपूर्ण भी मानता है। मैंने अपने उस लेख में हिन्दी में हालावाद का जनक बच्चन जी को नहीं, जबलपुर के केशव प्रसाद पाठक को माना था। मैंने लिखा था कि हिन्दी में हालावाद पाठक जी के फाउंटेन पेन से रिस कर आया। बच्चन जी ने इसका बुरा नहीं माना था। उन्होंने उस लेख के लिए मेरी हौसला अफजाई की। बच्चन जी खुले दिल के, कुंठाहीन प्रसन्न चित्त व्यक्ति थे। दूसरे को मान देने में और अपनों से छोटों का मान बढ़ाने में सिद्ध। बच्चन जी ने उस दिन मेरा मान बढ़ाया था। मैंने कहीं पढ़ा था कि बड़ा आदमी वह होता है जो अपने सामने बैठे छोटे से छोटे आदमी को बड़ा मानता है। बच्चन जी ने उस दिन मुझे जो मान दिया था, वह मैं भूल नहीं पाता- उनके प के लिए ध लिखना भी उनका पत्र लिखने वालों का मान बढ़ाने का ही उपक्रम था।

विधाओं की कोई एल.ओ.सी. नहीं होती : कान्तिकुमार जैन

कांतिकुमार जैन उन संस्‍मरणकारों में से जिन्‍होंने संस्‍मरण को साहि‍त्‍य की केंद्रीय वि‍धा के रुप में स्‍थापित किया। उनके संस्‍मरण खासे चर्चित और कुचर्चित भी हुए। उनसे प्रसिद्ध समीक्षक साधना अग्रवाल की बातचीत-

कान्ति जी, जहाँ तक मुझे मालूम है, छत्तीसगढ़ी बोली का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन आपने किया है- नई कविता और भारतेन्दु पूर्व हिन्दी गद्य पर भी आपका कार्य है। आलोचना की पुरानी फाइल पलटने से मुझे उसमें आपका एक लेख- ‘मुक्तिबोध मंडल के कवि’ देखने को मिला। मुक्तिबोध मंडल के कवियों ने ही आरंभ में ‘नर्मदा की सुबहकी योजना बनाई थी जिसे अज्ञेय ने न केवल झटक लिया बल्कि बहुत से पुराने कवियों को हटा दिया। ऐसा क्यों कर हुआ? कृपया इसे स्पष्ट करें।

1972 में जब मैं मप्र हिन्दी ग्रंथ अकादमी के लिए ‘नई कविता’ नामक पुस्तक लिख रहा था, तब मैंने देखा कि विवेचकों के आग्रहों, पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों के कारण नई कविता का सच्चा इतिहास नहीं लिखा जा सका है। हिन्दी में समीक्षा को ही इतिहास मान लिया जाता है। नई शोध के फलस्वरूप उपलब्ध नई जानकारी को इतिहास में समाहित करने की परंपरा हमारे विश्वविद्यालयों में नहीं है। मैंने उक्त पुस्तक में मुक्तिबोध के विवेचन के साथ जब ‘मुक्तिबोध मंडल के कवि’ का विचार सामने रखा तो डॉ. जगदीश गुप्त जैसे नई कविता के विचारकों ने प्रारंभ में अपनी असहमति प्रकट की, किन्तु बाद में वे भी मेरे तर्कों और तथ्यों से आश्‍वस्‍त हुए।

मुक्तिबोध ने ‘नर्मदा की सुबह’ की योजना बनाई थी। मुक्तिबोध के मित्र और शुजालपुर में उनके विद्यालय-सहयोगी रह चुके वीरेन्द्र कुमार जैन मानते हैं कि मालवा में ही हिन्दी की प्रयोगवादी और नई कविता का जन्म हुआ था। बाद में इस काव्यधारा में नेमिचंद जैन और भारतभूषण अग्रवाल जुड़े। वीरेन्द्र कुमार जैन ने मुक्तिबोध पर लिखे और 13 मई, 1973 के ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित अपने लंबे संस्मरण में स्पष्ट किया है कि कैसे अज्ञेय जी की संगठन क्षमता के कारण उन्हें ‘तारसप्तक’ के संपादन के लिए आमंत्रित किया गया। ठीक यही बात शमशेर जी ने भी कही है। अज्ञेय जी ने ‘तार सप्तक’ की मूल सूची से कुछ नाम निकाल दिए और कुछ नए जोड़ दिए। अज्ञेय तारसप्तक के झंडा बरदार नेता नहीं थे। मुक्तिबोध के ‘अनन्य मित्र और मुक्तिबोध मंडल के कवि’ प्रमोद वर्मा ने मुझे अपने पत्र में लिखा: ‘दूसरा तारसप्तक’ छप चुका था। मुक्तिबोध को यह देखकर हैरानी हुई कि नई कविता के नाम से प्रस्तुत छठे दशक की कविता ‘तारसप्तक’ के मूलतः वामपंथी रुझान को काट तराश कर कोरम कोर, सौंदर्यपरक कलावादी बना दी गई है। ऐसा तो छायावाद के जमाने में भी नहीं हुआ था। तो क्या यह सब उनके नव स्वाधीन देश को अंतरराष्ट्रीय पूँजीवाद की गिरफ्त में रहे चले आने के लिए ही किया जा रहा था?’

मैंने मुक्तिबोध मंडल की अपनी स्थापना का लंबा विवेचन किया जो डॉ. नामवर सिंह संपादित ‘आलोचना’ में छपा भी। इस विवेचन में जिन कवियों और विचारकों के नाम आए थे वे सब मेरे परिचित मित्र थे, श्रीकांत वर्मा, शिवकुमार श्रीवास्तव, रामकृष्ण श्रीवास्तव, जीवनलाल ‘विद्रोही’, प्रमोद वर्मा, अनिल कुमार, सतीश चौबे- सभी मुक्तिबोध के प्राचीन मित्र। परसाई और भाऊ समर्थ भी गो वे कवि नहीं थे। मुक्तिबोध ने बहुत सोच-विचार कर कवियों की सूची की अंतिम रूप दिया और उनकी कविताएँ भी एकत्र की थीं। यदि ‘नर्मदा की सुबह’ छप गई होती तो हिन्दी की स्वतंत्रता परवर्ती कविता का इतिहास कुछ दूसरा ही होता। अज्ञेय जी ने सप्तक श्रृंखला के माध्यम से मुक्तिबोध द्वारा प्रस्तावित ‘नर्मदा की सुबह’ वाली वामपंथी रुझान की कविता को हाईजैक कर लिया। सप्तकों की खानापूरी करने के लिए बाद में वे बहुत ही साधारण कवियों को ही हाईलाइट करते रहे। ‘आलोचना’ में प्रकाशित अपने लेख में मैंने विवेचित कवियों का समीक्षात्मक आकलन तो किया ही था, उनका संस्मरणात्मक आख्यान भी प्रस्तुत किया था, दोनों को ताने-बाने की तरह बुनते हुए। मेरे बाद के संस्मरणों में इसी शैली का उपयोग किया गया है। मुझे संतोष है कि यह शैली सामान्य पाठकों के साथ ही सुधी आलोचकों को भी पसंद आई। यह शैली विद्वत्ता का आतंक पैदा करने के स्थान पर हार्दिकता जगाती है।

कायदे से सागर विवि के हिन्दी विभाग के आचार्य एवं अध्यक्ष होने के नाते ही नहीं, बल्कि आप में जो आलोचनात्मक प्रतिभा है, उसे देखते हुए आपको आलोचक होना चाहिए था, क्योंकि आपके संस्मरणों में आपके आलोचक की चमक की चिंगारी जहाँ-तहाँ प्रचुरता से दिखती है, मेरे मन में जब-तब यह सवाल उठता है। कृपया अपनी स्थिति से हमें परिचित कराएँ।

एक समय था जब हिन्दी का विश्‍वविद्यालयीन अध्यापक कवि होता ही था। फिर कवि के रूप में प्रतिष्ठा न मिलने पर वह कविता का पाला छोड़कर आलोचना के क्षेत्र में सक्रिय होता था। आचार्य नगेन्द्र, डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ. नामवर सिंह जैसे अनेकानेक कवि-आलोचकों से हम परिचित हैं। हमारे यहाँ आलोचना के साथ विद्वता का फलतः गंभीरता का अनिवार्य रिश्ता माना जाता है। विद्वता आतंकित तो करती है, आकर्षित नहीं करती। हमारे विश्‍वविद्यालय विद्वत्ता का विकास तो करते हैं, संवेदना का नहीं। ज्यादा विद्वत्ता से मुझे भय लगता है। ऐसा नहीं है कि आलोचना के क्षेत्र में मैंने कुलांचे न भरी हों, पर वहाँ बहुत भीड़ थी। वहाँ कोई किसी को तब तक घास नहीं डालता जब तक उसके साथ अपना गुट या शिष्यमंडली न हो। आलोचना के क्षेत्र में मेरी स्थिति शरणार्थी की थी। हिन्दी समाज कुम्हार के उस चाक के समान है जो माँगे दिया न देय। ऐसे में मैंने संस्मरणों की राह पकड़ी, शरणार्थी से पुरुषार्थी बनने के लिए। वह भी लगभग दिवसावसान के समय। समीक्षा को मैंने संस्मरणों की मुस्कान से मिला दिया, 33, 67 के अनुपात में। यह मेरी अपनी ‘रेसेपी’ थी। मेरी यह ‘रेसेपी’ आलोचकों को पसंद आई। मेरे अच्छे संस्मरण वे माने गए, जिनमें मैंने रचनाकार या चिंतक या अध्यापक के छोटे-छोटे आत्मीय प्रसंगों के आधार पर उसके व्यापक एवं बृहत्तर रचना कर्म और जीवन मूल्यों का विश्‍लेषण किया। जैसे बच्चन के, डॉ. रामप्रसाद त्रिपाठी के, रजनीश के या ‘सुमन’ के। आप चाहें तो इन्हें संस्मरणात्मक समीक्षा कह लें या समीक्षात्मक संस्मरण। ‘तुम्हारा परसाई’ शीर्षक पुस्तक मैंने इसी शैली में लिखी है।

पाठकों को गंभीरता और आलोचना की यह फिजां पसंद आई। याद कीजिए, शायर का वह मंसूबा जिसमें वह कहता है:

क्यों न फिरदौस में दोजख को मिला दें या रब

सैर के वास्ते थोड़ी सी फिजां और सही।

मेरे संस्मरण साहित्य की सैर के शौकीनों को यही थोड़ी सी फिजां मुहैया करते हैं।

सागर विवि से अवकाश प्राप्त करने के बाद संस्मरण लिखने की बात सहसा आपके मन में कैसे उठी? यूँ जहाँ-तहाँ आपने इसका संकेत दिया है लेकिन मुझे लगता है आपके पाठक के नाते मेरे मन में इस प्रश्‍न को लेकर जो जिज्ञासा है, उसका निदान आप ही कर सकते हैं।

संस्मरण लिखने की न तो मेरी कोई तैयारी थी, न ही आकांक्षा, कोई योजना भी न थी। डॉ. कमला प्रसाद के कहने से मैं श्रीमती सुधा अमृतराय पर एक संस्मरण लिख चुका था। उसे मित्रों ने पसंद किया, भाषा विज्ञान जैसा नीरस विषय पढ़ाने वाले से ऐसी तरल भाषा और रोचक शैली की अपेक्षा किसी को नहीं थी। ऐसे में एक दिन स्थानीय महाविद्यालय के अध्यापक मित्र घर आए। वे लेखक भी हैं, समीक्षा जैसी गुरु गंभीर विधा में लिखते हैं। कमला से उन्हें एलर्जी है, पुराने सहयोगी रह चुकने कारण। उनके गुरुओं ने उन्हें बताया था कि संस्मरण हल्की-फुल्की विधा है। उनके गुरु के गुरु आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी प्रेमचंद द्वारा संपादित ‘हंस’ के आत्मकथांक/संस्मरणांक का काफी मखौल उड़ा चुके थे। उन्हें लगा कि भाषा विज्ञान और समीक्षा के पुण्य तीर्थ से संस्मरण के गटर में पतन मेरे सारे पुण्यों को नष्ट कर देगा। मेरे उद्धार की चिंता के कारण उन्होंने फरमाया-संस्मरण तो वो लिखता है जो चुक जाता है। संस्मरण तो मरे हुओं पर लिखे जाते हैं। कुछ भी लिख दो, मरा हुआ व्यक्ति न प्रतिवाद कर सकता है, न ही आपकी खबर ले सकता है। फिर संस्मरण तो आत्मश्‍लाघा की विधा है। जिसे कोई भाव नहीं देता, वह अपनी पीठ ठोकने लगता है। संस्मरण उनके लिए शेड्यूल्ड कास्ट विधा थी और संस्मरण लेखक को वे कुल की हीनी, जात कमीनी, ओछी जात बनाफर राय का सगोत्री मानते थे। उनकी चेतना पर संस्मरण का मरण काबिज था, संस्‍मृत के पक्ष में भी, मनोवैज्ञानिक और व्यक्तिपरक सोनोग्राफी की। सुमन जी, त्रिलोचनजी या प्रेमशंकर जी ने तो कम आपत्ति की, उनके अनुगतों ने ज्यादा हो-हल्ला मचाया।

जो जितना पुराना और बड़ा कांवड़िया था, उसने उतना ही ज्यादा हल्ला मचाया। यह सब तो सच है पर लिखना नहीं चाहिए। कुछ ने मेरी औकात बताई। क्या पिद्दी, क्या पिद्दी का शोरबा। कुछ ने मुझ पर ‘क्रुयेलिटी’ का आरोप लगाया। मुझे संतोष है कि सुमन जी ने अपने होशो हवास में ‘हंस’ में प्रकाशित मेरा संस्मरण पढ़ लिया था, प्रेमशंकर जी ने भी। मैं संस्मरण श्रद्धालुओं के लिए नहीं लिखता। आस्था सुदृढ़ करने के लिए जो संस्मरण पढ़ते हैं, उन्हें मेरी सलाह है कि वे ‘कल्याण’ या ‘कल्पवृक्ष’ पढ़ें। इसी बीच दो दुर्घटनाएँ और हो गईं। मेरी कूल्हे की हड्डी टूट गई, काफी अर्से तक चलना-फिरना दूभर हो गया। न पुस्तकालय जा सकते, न ही अपने अध्ययन कक्ष की अलमारियों की ऊपरी शेल्फों से किताब निकाल सकते। ईश्‍वर प्रदत्त इस चुनौती का सामना मैंने संस्मरण लिखकर किया। ईश्‍वर से तो मैं निबट लिया पर कमलेश्वर का क्या करूँ? कमलेश्‍वर को अध्यापकों की सारी प्रजाति ‘पतित’ और ‘नालायक’ लगती है। उनके लेखे ‘रचनशीलता’ही सर्वोपरि है। सो भैये, लो ‘एक पतित और नालायक प्राध्यपक’ के संस्मरण पढ़ो। जान कर संतोष हुआ कि उनको मेरे संस्मरण पठनीय ओर प्रिज्म की तरह लगे। वाहे गुरु की फतह।

सवाल यह भी है कि पहला संस्मरण लिखने-छपने के बाद पत्रिका के संपादक और पाठकों की प्रतिक्रिया का आप पर कैसा असर हुआ?

पहला संस्मरण छपा अप्रैल-अक्टूबर ‘96 की ‘वसुधा’ में। वह किंचित् लंबा था, डॉ. कमला प्रसाद ने कहा कि आपके संस्मरण ‘वसुधा’ के बहुत पन्‍ने घेरते हैं पर रोचकता के कारण पाठक उन्हें पूरा पढ़ते हैं। मैं छोटे संस्मरण लिख ही नहीं पाता। छोटे संस्मरण मुझे या तो शोक प्रस्ताव जैसे लगते हैं या चरित्र प्रमाणपत्र जैसे। ‘हंस’ में मेरे लंबे-लंबे संस्मरण छपे और पाठकों को पसंद आए। भारत भारद्वाज ने लिखा कि संस्मरणों का जो दिग्विजयी अश्‍व काफी अर्से से प्रयाग और काशी के बीच घूम रहा था, वह अब सागर में स्थायी रूप से बाँध लिया गया है। मेरे संस्मरणों पर कमला प्रसाद को और राजेन्द्र यादव को बहुत सुनना पड़ा, अश्‍लीलता को लेकर। अश्‍लीलता मेरे संस्मरणों में मेरे कारण नहीं थी, संस्मृत के अपने व्यक्तित्व के कारण थी। पर कई सुधियों को दुःशासन द्वारा भरी सभा में द्रौपदी के चीरहरण में अश्‍लीलता या अनैतिकता नहीं दिखाई पड़ी, दिखाई पड़ी वेदव्यास द्वारा महाभारत में चीरहरण का उल्लेख किए जाने पर। इन दिनों एक विज्ञापन आ रहा है दूरदर्शन पर। लड़की पूछती है- क्या खा रहे हो? लड़का कहता है- लो तुम भी खाओ। लड़की फिर कहती है- पर यह तो तंबाखू है। लड़का कहता है- जीरो परसेंट टोबेको, हंड्रेड परसेंट टेस्ट। मेरे संस्मरणों में भी अश्‍लीलता जीरो प्रतिशत ही है, स्वाद कुछ लोगों को शत-प्रतिशत मिलता है। यह उनकी अपनी स्वादेन्द्रिय का कमाल है।

संस्मरण हिन्दी में एक अरसे से लिखे जाते रहे हैं बल्कि पिछले वर्षों में काशीनाथ सिंह, दूधनाथ सिंह एवं रवीन्द्र कालिया की संस्मरण पुस्तकें भी छपीं जो वस्तुतः उनके समकालीन रचनाकारों पर केन्द्रित हैं। आपने किस तरह संस्मरण की पूरी परंपरा से अलग हटकर कबीर के कपूत बनने का साहस संजोया?

अभी कुछ दिन हुए, संस्मरणों के एक प्रेमी पाठक मुझसे मिलने आए थे। उन्होंने बातचीत के दौरान बचपन में पूछी जाने वाली एक बुझौवल सुनाई:

तीतर के इक आगे तीतर

तीतर के इक पीछे तीतर

आगे तीतर पीछे तीतर

बताओ कुल कितने तीतर

फिर इस बुझौवल का संस्मरण-पाठ भी पेश किया:

का के है आगे इक का

का के पीछे है इक का

आगे इक का, पीछे इक का

बताओ कुल कितने हैं का

यहाँ एक का काशीनाथ का है, दूसरा कालिया का, तीसरा इस नाचीज कान्तिकुमार का है। यह सब कबीर के कपूत हैं, कपूतों की वह परंपरा ‘उग्र’ और ‘अश्क’ से होती हुई कृष्णा सोबती, हरिपाल त्यागी तक पहुँचती है। मैं भी इसी परंपरा का एक पड़ाव हूँ। मैं कुछ ज्यादा ही कपूत साबित हुआ।

कुछ विद्वानों का मत है कि आपने संस्मरण विधा को हाल के दिनों में प्रकाशित अपने संस्मरणों से केन्द्रीय विधा बना दिया है। इस बारे में आपको क्या कहना है?

इस संबंध में मैं क्या कहूँ? संस्मरण विधा आज समकालीन लेखन की केन्द्रीय विधा बन गई हैं, इसमें संदेह नहीं। पर इसका सारा श्रेय मेरा ही नहीं है। काशीनाथ सिंह, रवीन्द्र कालिया, दूधनाथ सिंह के संस्मरणों से इस विधा में जो खुलापन आया था, उससे पाठकों की एक मानसिकता बन गई थी। मुझे उस मानसिकता का लाभ मिला। किसी भी संस्मरणीय के केवल कृष्णपक्ष का उद्घाटन करना लक्ष्‍य नहीं है, बल्कि उसके व्यक्तित्व की संरचना के तानों-बानों और उसके परिवेश की सन्निधि में उसकी रचनात्मकता के छोटे-बड़े प्रसंगों के माध्यम से ‘स्कैनिंग’ मेरा अभीप्सित है। अपने संस्मरणों को रोचक और पठनीय बनाने के लिए रचनात्मक कल्पना का उपयोग तो मैंने किया है पर ‘फेकता’(fake) का नहीं। मेरे संस्मरणों में अनेक प्रसंग सेंधे भरने के लिए गाल्पनिक तो हो सकते हैं पर वे पूरी तरह काल्पनिक नहीं हैं। अपने संस्मरणों में मैं स्वयं को बचाकर नहीं चलता।

मैंने कभी डायरी नहीं लिखी। स्मृति के और पुराने पत्रों के सहारे ही लिखता हूँ। एकाध संस्मरण में जहाँ भ्रमवश दूसरों से सुने तथ्यों के सहारे मुझसे घटनाओं की पूर्वापरता में गड़बड़ी हुई है, पाठकों ने मुझे पकड़ लिया है, इसका अर्थ मैंने यही लगाया कि हिन्दी में सुधी और सावधान पाठकों की कमी नहीं है। असावधानीवश हुई इन चूकों को स्वीकार करने में मुझे कोई संकोच नहीं हुआ। जैसे ‘विद्रोही’ के संदर्भ में कमलेश्‍वर ने या मुक्तिबोध के संदर्भ में ललित सुरजन ने या ‘वसुधा’ के अंतिम अंक के संबंध में भारत भारद्वाज ने मेरी त्रुटि की ओर ध्यान आकर्षित किया। मैं इनका कृतज्ञ हूँ। ये त्रुटियाँ किसी बदनीयती के कारण नहीं हुईं। संस्मृतों के संपूर्ण व्यक्तित्व या रचनाशीलता के नियामक तत्त्वों के मेरे निष्कर्षों पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। पर भूल तो भूल है।

अपने संस्मरणों पर मेरे पास हजारेक पत्र तो आए ही होंगे। टेलीफोन भी कम नहीं आए। लोग पाठकों के न होने का रोना बेवजह ही रोते हैं। अकेले रजनीश वाले संस्मरण पर ही मुझे सैकड़ों पत्र मिले और अभी तक मिल रहे हैं। देश से भी, विदेशों से भी। इन पत्रों के आधार पर मैंने एक श्रृंखला लिखने का मन बनाया है- संस्मरणों के पीछे क्या है? रजनीश के संस्मरण पर प्राप्त प्रतिक्रियाओं वाला संस्मरण तो लिखा भी जा चुका है- ‘रजनीश का दर्शन: आध्यात्मिक दाद खुजाने का मजा।’असल में संस्मरणों को संस्मृत का ही आईना नहीं होना चाहिए, उसे उसके परिवेश का भी अता-पता देना चाहिए। उसे प्रचलित जीवन मूल्यों की प्रासंगिकता की भी जाँच पड़ताल करनी चाहिए। मेरे लिए संस्मरण विशिष्ट कालखंड का सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक इतिहास है।

पिछले दिनों हिन्दी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में रसाल जी, अंचल जी और सुमन जी पर जिस तरह आपके संस्मरण छपे उससे आपके दुश्मनों की संख्या में जरूर इजाफा हुआ, लेकिन सच बात यह भी है कि आज हिन्दी की कोई भी पत्रिका आपके संस्मरण के बिना अधूरी लगती है। क्या अब आप पूर्णतः संस्मरण समर्पित हैं या और भी आपकी कोई योजना है?

आपके इस प्रश्‍न के उत्तर में मैं नसीम रामपुरी का एक शेर उद्धृत करना चाहता हूँ:

हार फूलों का मेरी कब्र पर खुद टूट पड़ा

देखते रह गए मुँह फेर के जाने वाले

ऐसा तो नहीं है कि मैं अब संस्मरण छोड़कर कुछ और नहीं लिखता, पर अब जो कुछ लिखता हूँ, वह संस्मरणमय हो उठता है। ‘तुम्हारा परसाई’ मेरी नव्यतम पुस्तक है जिसे मैंने परसाई जी के जीवन, व्यक्तित्व, परिवेश और व्यंग्यशीलता का संस्मरणात्मक आख्यान कहा है। ‘तुम्हारा परसाई’ पढ़कर एक नामी-गिरामी प्रकाशक ने मुझे लिखा कि मुक्तिबोध पर भी ऐसी पुस्तक मैं क्यों नहीं लिखता? मेरा उत्तर था, ऐसी पुस्तक लिखने के जितने धैर्य और समय की आवश्यकता है, वह अब मेरे पास नहीं है। हाँ, मुक्तिबोध जी के नागपुर के दिनों पर लिखने का मन जरूर बना रहा हूँ, ‘महागुरु मुक्तिबोध: जुम्मा टैंक की सीढ़ियों पर’ नाम से। यह जीवनलाल वर्मा ‘विद्रोही’, रामकृष्ण श्रीवास्तव, श्रीकांत वर्मा, शिवकुमार श्रीवास्तव, प्रमोद वर्मा, अनिल कुमार, सतीश चौबे, भाऊ समर्थ, हरिशंकर परसाई जैसे रचनाकारों के साहित्य, संस्मरणों और पत्रों के माध्यम से नागपुर के दिनों के मुक्तिबोध के जीवन, मानसिकता और रचनाशीलता को ‘डिस्कवर’ करने की संस्मरणमय कोशिश होगी। इस कोशिश के कुछ अंश आपने ‘हंस’, ‘वसुधा’, ‘साक्षात्कार’, ‘आशय’, ‘अन्यथा’, ‘परस्पर’ जैसी पत्रिकाओं में देखे भी होंगे। मालगुड़ी डेज़ की तरह अपने बचपन के दिनों का वृत्तांत भी मैं लिख रहा हूँ ‘बैकुंठपुर में बचपन’ के नाम से। छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचल के अभावों, संघर्षों, शोषण, प्रकृति से तादात्म्य और लोक की अदम्य जिजीविषा का आख्यान। यह भी संस्मरणात्मक ही होगा। फिर संस्मरणों की मेरी नई पुस्तक भी है-‘जो कहूँगा, सच कहूँगा’ नाम से। एक तरह से ‘लौटकर आना नहीं होगा’ का दूसरा खंड। इन संस्मरणों में मेरी शिकायत मानवीय दुर्बलता से उतनी नहीं, जितनी टुच्चे स्वार्थों और संकीर्ण सोच के कारण किए जाने वाले छल, छद्म और फरेब से है। कथनी और करनी में जितनी दूरी आज दिखाई पड़ रही है, उतनी शायद कभी नहीं रही। मानवीय गरिमा का क्षरण करने वाली किसी भी चतुराई या संकीर्णता से मुझे एलर्जी है। इस एलर्जी को प्रकट करना दुश्मनों की संख्या में इजाफा करना है। मेरे दुश्मन बढ़ रहे हैं अर्थात् मेरे संस्मरण ठीक जगह पर चोट कर रहे हैं। ‘मे देअर ट्राइव इनक्रीज़’।

अभी शब्द शिखरपत्रिका में आपके नाम लिखे कुछ महत्वपूर्ण लेखकों के पत्र छपे हैं। राजेन्द्र यादव के लिखे पत्रों से ऐसा आभास होता है कि आप पर लगातार दबाव डालकर हंसके लिए उन्होंने आपसे संस्मरण लिखवाए ही नहीं बल्कि आपको जेल भिजवाने का भी पूरा प्रबंध कर दिया है। वस्तुस्थिति क्या है, यह आप ही बताएँगे।

नहीं, राजेन्द्र यादव का मुझ पर संस्मरण के लिए कोई दबाव नहीं था। संस्मरण के पात्र का चुनाव सदैव मेरा ही रहा है, उसका ढंग भी। अब 70 साल की उम्र में कोई मुझ पर दबाव डालकर कुछ लिखा लेगा, यह प्रतीति ही मुझे हास्यास्पद लगती है। राजेन्द्र यादव अच्छे संपादक हैं, वे रचनाकार की सीमाओं को और क्षमताओं को पहचानते हैं। वे साहसी भी हैं, मुझे लगता है वे जितने बद नहीं, बदनाम उससे बहुत ज्यादा हैं। शायद बदनामी मनोवैज्ञानिक रूप से उनके लिए क्षतिपूर्ति उपकरण है। बदनामी और विवाद उन्हें अपनी महत्ता सिद्ध करने के लिए अनिवार्य लगते हैं। कुछ लोग होते हैं जिन्हें चर्चा में बने रहना अच्छा लगता है। चर्चा और बदनामी उनके लिए लगभग पर्याय होते हैं। मैं आपको बताऊँ, ‘अंचल’ वाला संस्मरण तो कोई छापने को तैयार ही नहीं था। अंचल प्रगतिशील रह चुके थे, ‘लाल चूनर’वाले। अतः प्रगतिशील खेमे की पत्रिकाएँ अपने नायक का सिंदूर खुरचित रूप दिखाने को तैयार नहीं थीं। अंचल जी हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष भी रह चुके थे। अतः सम्मेलन से संबद्ध पत्रिकाओं के अपने संकोच थे। अक्षय कुमार जैन ने तो मुझे साफ लिखा कि हिन्दी के पाठक अभी ऐसी मानसिकता के नहीं हो पाए हैं कि वे आपके ऐसे संस्मरण पचा सकें। ‘वागर्थ’ (उस जमाने की), ‘वाणी’, ‘अक्षरा’ जैसी निरामिष पत्रिकाओं से मैं क्या उम्मीद करता? अन्ततः मैंने वह राजेन्द्र यादव को भेज दिया। राजेन्द्र यादव से मेरी कोई आत्मीयता नहीं थी। जीवाजी विश्‍वविद्यालय में मैंने उनका उपन्यास नहीं लगाया था। वे मुझसे रुष्ट थे। सोचा, उनको भी खंगाल लिया जाए। हफ्ते भर में उनका पत्र आया, शीघ्र छपेगा। ‘अंचल’ छपने पर बड़ा बावेला मचा। अश्‍लील, क्रुयेल, अनैतिक, चरित्रहनन, खुद बड़े पाक बने फिरते हैं टाइप। जेल पहुँचाने का इंतजाम राजेन्द्र यादव ने नहीं, मेरे मित्रों ने किया। भोपाल के मेरे एक बहुत पुराने मित्र ने जो स्वयं को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से बड़ा तो नहीं, पर उनके समकक्ष मानते हैं, अंचल जी की बेटी को कानूनी कार्यवाही के लिए उकसाया। वह स्वयं अनुभवी है, उसके पति न्यायाधीश हैं। वे कानून के जानकार हैं, समझदार। अतः उन मित्र महोदय के बहकावे में नहीं आए। हाँ, एक अखिल मुहल्ला कीर्ति के धनी कवि ने जरूर मुझ पर मानहानि जैसा कुछ करने की धमकी दी। पर वे भी टांय-टांय फिस्स से ज्यादा नहीं बढ़ पाए। सुधीर पचौरी और विष्णु खरे जैसी सुधी और नीरक्षीर विवेकी विचारकों ने अश्‍लीलता की चलनी में मेरी छानबीन की, यह भूलकर कि सूप कहे तो कहे, चलनी क्या कहे जिसमें बहत्तर छेद। हिन्दी समाज में अश्‍लीलता की कबड्डी खेलना समीक्षकों का सबसे पसंदीदा खेल है। यार लोग चाहते हैं कि मैं मित्रों के कांधे पर चढ़कर नहीं, भूतपूर्व मित्रों के कांधों पर चढ़कर अंतिम यात्रा पर निकलूँ। यहाँ हर पड़ोसी, दूसरे की खिड़की में ताक-झाँक की फिराक़ में रहता है, अपनी खिड़की में मोटे-मोटे ‘ब्लाइंड’ डालकर। अपने संस्मरणों के हर शब्द के लिए मैं स्वयं जिम्मेदार हूँ। किसी राजेन्द्र यादव के पाले में गेंद फेंकना बेईमानी भी है, अनैतिकता भी। वह कायरता तो है ही।

कहने की जरूरत नहीं कि आज हिन्दी में आपने संस्मरण विधा में नई जान फूंकी है और हर नया लेखक कान्तिकुमार जैन बनने की कोशिश में लगा है। आप इस स्थिति को किस रूप में देखते हैं।

आपके इस तरह के प्रश्‍न के उत्तर में मैं आपको एक लतीफा सुनाना चाहता हूँ- स्कूल में पढ़ने वाले और नए-नए तरुण हुए एक छात्र को उसके एक सहपाठी ने एक प्रेम प्रसंग के निपटारे के लिए द्वंद युद्ध में ललकारा। यह युद्ध तलवारों से लड़ा जाना था। ललकारित छात्र ने अपने पिताजी से कहा कि पिताजी, आप मेरे लिए एक लंबी तलवार बनवा दें जो सहपाठी की तलवार से छह इंच लंबी हो। पिताजी समझ गए। बोले- बेटे! यदि तुम्हें सामनेवाले को परास्त करना है तो छह इंच आगे बढ़कर मारो। इस तरह के युद्ध तलवार की लंबाई से नहीं, भीतर के हाँसले से लड़े जाते हैं। यदि किसी का मेरुदंड कमजोर हो तो न तलवार की लंबाई काम आती है, न पिताजी का संरक्षण। ऐसे लोगों को संस्मरण नहीं लिखने चाहिए।

मुझे लगता है कि आपके संस्मरणों के पीछे परसाई खड़े हैं आशीर्वाद की मुद्रा में, क्योंकि यह बात तो बिल्कुल साफ है कि आपके भीतर के आलोचक और परसाई के व्यंग्य की धार से आपके संस्मरण परवान चढ़े हैं। वैसे तो अपनी नई पुस्तक तुम्हारा परसाईमें विनम्रतापूर्वक यह कहकर कि तुम्हारा परसाई में मेरा क्या है, आपने अपना संकोच स्पष्ट कर दिया है फिर भी कुछ बचा रहता है परसाई से उऋण होने के लिए। इस प्रसंग में आप कुछ और जोड़ना चाहेंगे।

परसाई जी मेरे मित्र थे- आत्मीय और अंतरंग। उनका और मेरा लगभग चालीस वर्षों का साथ था। उनसे प्रेरित और प्रभावित न होना कठिन था। वे मुझसे बड़े थे, प्रतिष्ठित। फिर विचारधारा के स्तर पर भी मैं उनके बहुत निकट रहा हूँ। मुझे उनकी जो बात सबसे पसंद थी वह यह कि अपनी विचारधारा की वे अपने व्यंग्यों में घोषणा नहीं करते थे, उसे संवेदित होने देते थे। जैसे बिजली इंसुलेटेड वायर के भीतर ही भीतर दौड़ती रहती है, यहाँ से वहाँ तक। पर अंत में वह तार झटका भी देता है और प्रकाश भी। इस अर्थ में वे हिन्दी के अनेक वामपंथी लेखकों से विशिष्ट हैं। दुर्भाग्य है कि हिन्दी में संघवाद, विचारधारा और उसके संगठनों का प्राधान्य है। हर संगठन अपने आदमी की तमाम-तमाम चूकों, खामियों, विचलनों को ढाँकने-मूँदने में लगा है। ठीक राजनीतिक दलों की तरह। संप्रदायवाद, भ्रष्टाचार, छल, घोटालों, बेईमानियों का हम गुट निरपेक्ष या संगठन तटस्थ होकर विरोध नहीं करते। परसाई ऐसा करते थे। इसीलिए परसाई की मार चतुर्मुखी होती थी ओर उनका प्रभाव भी इसीलिए सब तरह के पाठकों पर था। ऐसे समय परसाई जी जैसे लेखकों को होना चाहिए। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की एक कविता है, जिसमें अपने अवसान के समय सूर्य पूछता है कि मेरे बाद पृथ्वी का अंधकार कौन दूर करेगा। मिट्टी का एक दिया सामने आया। बोला- अपनी शक्ति भर मैं करूँगा। मैं मिट्टी का वही दिया हूँ।

तुम्हारा परसाईएक विलक्षण पुस्तक है जो काशीनाथ सिंह जी की पुस्तक काशी का अस्सीकी तरह धमाके से विधाओं की वर्जनाओं को तोड़ती है। संस्मरणात्मक भी यह है लेकिन उससे ज्यादा परसाई के जीवन और लेखन का मोनोग्राफ। क्या आपको ऐसा नहीं लगता?

विधाओं का वर्गीकरण तो साहित्य शास्त्रियों ने सुविधा के लिए कर रखा है। विधाओं की चौहद्दी में बँधने से रचनाकारों की क्रियेटिविटी बाधित होती है। जैसे बहुत घिसने से बासन का मुलम्मा छूट जाता है, वैसे ही पीढ़ी दर पीढ़ी काम में आते रहने से विधाओं की दीप्ति भी फीकी पड़ जाती है। समर्थ रचनाकार प्रत्येक युग में साहित्य के परिधान में कुछ न कुछ परिवर्तन करता है। वास्तव में विधाओं की कोई एलओसी नहीं होती। विधाओं का अतिक्रमण करने से साहित्य की थकान मिटती है, साहित्यकार की भी। ‘तुम्हारा परसाई’ को मैंने जानबूझकर परसाई के जीवन, व्यक्तित्व, परिवेश और व्यंग्यशीलता का संस्मरणात्मक आख्यान कहा है। इससे परसाई जी के जीवन के और लेखन के तानों-बानों को समझने में सुविधा होती है। मुझे संतोष है कि इधर हिन्दी के बहुत से लेखक संस्मरण लिखने में रुचि ले रहे हैं। हर पत्रिका के लिए संस्मरण लगभग अनिवार्य हो गए हैं। इन संस्मरणों से हिन्दी साहित्य के वास्तविक इतिहास का कच्चा माल सामने आ रहा है। हिन्दी साहित्य के समकालीन इतिहास की दूसरी परंपरा का सामने आना कई दृष्टियों से वांछनीय है।

अंतिम सवाल, मुझे ठीक से नहीं मालूम लेकिन मैं यह जानना चाहती हूँ कि आपकी धर्मपत्नी साधना जैन का आपके लेखन में कितना सहयोग है- आपकी स्मृति को रिफ्रेश करने में या संदर्भों को दुरुस्त करने में?

साधना मेरी पत्नी हैं पढ़ी-लिखीं, साहित्यिक समझ से भरपूर। घटनाओं के पूर्वापर क्रम की और व्यक्ति द्वारा उच्चरित कथन को ज्यों का त्यों दुहरा सकने की उनमें विलक्षण प्रतिभा है। उर्दू के शेर तो उन्हें ढेरों याद हैं। अपने संस्मरण लेखन में जहाँ कहीं मैं अटकता हूँ, स्मृति का मैगनेट साफ करने में वे मेरी सहायता करती हैं। वे मेरी जीवन-संगिनी हैं फलतः संस्मरण-संगिनी भी। 1962 में मुझसे विवाह के उपरांत वे मेरे सारे मित्रों को जानती हैं और उन्हें समझती भी हैं। मैं डायरी नहीं लिखता पर यदि लिखता तो पत्नी से छिपाकर नहीं रखता। मैं हिन्दी के उन लेखकों में नहीं हूँ जो अपनी पत्नी को दर्जा तीन पर स्थान देते हैं- पहले मेरा लेखन, फिर मेरे दोस्त, फिर तू। मैं उन लेखकों में भी नहीं हूँ जो यह कहकर गौरवान्वित होते हैं, लेखन तो मेरा अपना है, मेरी पत्नी का इसमें कोई योग नहीं है। ऐसे लोग या तो मुझे सामंती पुरुषाना अहंकार से ग्रस्त लगते हैं या अपनी पत्नी को निर्बुद्धि समझते हैं। संयोग से न तो मुझमें वैसा अहंकार है, न ही साधना वैसी निर्बुद्धि हैं।

अपने संस्मरणों में अपनी पत्नी का उल्लेख करने का परिणाम यह हुआ है कि बहुत से संस्मरण लेखक अपनी पत्नी को भी क़ाबिले उल्लेख समझने लगे हैं। एक ने तो अपनी पत्नी को करवाचौथी परिधि से निकालकर साहित्य का कोई पुरस्कार भी दिलवा दिया है। गुजरात की एक धर्मपत्नी ने जिनके पति अच्छे खासे साहित्यकार हैं और जिन्होंने प्रेम विवाह किया था, बड़े दुःख से मुझे लिखा- काश! मेरे पति भी अपने संस्मरणों में उसी सम्मान और स्नेह से मेरा उल्लेख करते जैसे आप अपनी पत्नी का करते हैं। उस उमर में जब साहित्यकार पति और कुछ नहीं कर सकता, उसे इतना तो करना ही चाहिए।

(भारतीय लेखक, अक्टूबर-दिसंबर, 05  से साभार)

इधर हिंदी नई चाल में ढल रही है : कांति कुमार जैन

हर कोई हिंदी को लेकर चिंतित है। हिंदी क्षेत्र में कई विश्वविद्यालय और संस्‍थाएं हैं। इन सबके बाद भी हिंदी का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है। इन कारणों और समाधान पर चर्चित संस्‍मरणकार कांतिकुमार जैन का आलेख-

जब मैं पिछले दिनों की प्रसिद्ध फिल्म लगे रहो मुन्ना भाई देखकर लौट रहा था तो मेरे 20 वर्ष नाती ने अचानक मुझसे पूछा- नाना जी, मैंने कक्षा में गांधीवाद के बारे में तो पढ़ा था, पर यह गांधीगिरी, लगता है, कोई नई बात है। मुझे कहना पड़ा कि गांधीगिरी बिल्कुल नई बात है और देश में बढ़ती हुई मर्यादाहीनता, धृष्टता, सैद्धांतिक घपलेबाजी और वास्तविक प्रतिरोध न कर प्रतिरोध का स्वांग करने वालों को संवेदित करने जैसी चीज है। जिन शब्दों में गिरी लग जाता है, वे कुछ हीनता व्यंजक अर्थ देने लगते हैं। जैसे- बाबूगिरी, चमचागिरी, गुंडागिरी। मुझे भारतेंदु हरिश्‍़चंद के उस कथन की भी याद आई, जिसमें आज से लगभग 150 वर्ष पूर्व उन्होंने घोषित किया था कि हिन्दी नई चाल में ढली। अंग्रेज भारत में धर्म, ध्वजा और धुरी के साथ आये थे। इन तीनों का प्रभाव हिन्दी के स्वरूप पर भी पड़ा था। धर्म के प्रचार के लिए उन्होंने बाइबिल का अनुवाद किया और उसे मुद्रण यंत्रों से छपवाकर जनता के बीच वितरित किया, ध्वजा के लिए उन्होंने प्रशासन तंत्र तैयार किया और धुरी अर्थात् तराजू के लिए भारत में अंग्रेजी माल का नया बाजार विकसित किया। इन तीनों के साथ हिन्दी क्षेत्र में ढेरों अंग्रेजी शब्द आये जो आज तक प्रचलित हैं।

1947 में स्वतंत्रता के साथ ही हिन्दी पुन: नई चाल में ढली- लोकतंत्र, संविधान, विकास कार्य, शिक्षा का प्रचार-प्रसार, तकनीकी जैसे कारणों से हिन्दी व्यापक हुई, उसका शब्दकोश समृद्ध हुआ। नये-नये स्रोतों से आने वाले शब्द हिन्दी भाषी जनता की जुबान पर चढ़ गये। इन शब्दों में विदेशी शब्द थे, बोलियों के शब्द थे, गढ़े हुए शब्द थे। जनता अपनी बात कहने के लिए जिन शब्दों का प्रयोग करती है, उनकी कुंडली नहीं पूछती। बस काम चलना चाहिए। वह तो भाषा के पंडित हैं, जो शब्दों का कुलगोत्र आदि जानना चाहते हैं। जनता भाषा की संप्रेषणीयता को महत्वपूर्ण मानती है, जबकि पंडित लोग भाषा की शुद्धता को महत्व देते हैं। हिन्दी के स्वाभिमान का हल्ला मचाने वालों को आड़े हाथों लेते हुए निराला जी ने एक बड़े पते की बात कही थी- हम हिन्दी के जितने दीवाने हैं, उतने जानकार नहीं। हिन्दी के शुद्धतावादी पंडितों ने कुकुरमुत्ता नामक कविता मे प्रयुक्त नवाब, गुलाब, हरामी, खानदानी जैसे शब्दों पर एतराज जताया था। कहा था, इन शब्दों से हमारी हिन्दी भ्रष्ट होती है। इन शुद्धतावादी विचारकों का कहना है कि हिन्दी के साहित्यकारों को विदेशी शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। अब सामंत, पाटल, वर्गशंकर, कुलीन कहने से हिन्दी के स्वाभिमान की रक्षा भले ही हो जाये, किन्तु व्यंग्य की धार मौंथरी होती है और संप्रेषणीयता भी बाधित होती है। हिन्दी के ये शुद्धतावादी पोषक शहीद भगतसिंह को बलिदानी भगतसिंह कहना चाहते हैं। उनका बस चले तो वे भगतसिंह को भक्तसिंह बना दें। वे फीसदी को गलत मानते हैं, उन्हें प्रतिशत ही मान्य है। वे राशन कार्ड, कचहरी, कार, ड्राइवर, फिल्म, मेटिनी, कंप्यूटर, बैंक, टिकट जैसे शब्दों के भी विरोधी हैं। वही हिन्दी का सवाभिमान। यह झूठा स्वाभिमान हिन्दी के विकास में सबसे बड़ी बाधा है। ऐसे लोग हिन्दी को आगे नहीं बढऩे देना चाहते। वे वस्तुत: जीवन की प्रगति के ही विरोधी हैं।

एक बार पंडित शान्तिप्रिय द्विवेदी जबलपुर आये थे। पंडित भवानी प्रसाद तिवारी उन दिनों वहां के मेयर थे, स्वयं कवि, ‘गीतांजलि के अनुगायक। उन्होंने शान्तिप्रिय जी के सम्मान में एक कवि गोष्ठी का आयोजन किया। अपनी कविताएं भी सुनाईं। उनकी एक काव्य पंक्ति है- ”कैसी मुश्किल कर दी, तुमने कितनी रूप माधुरी प्राणों में भर दी।‘’ शान्तिप्रिय जी का हिन्दी प्रेम जागा, उन्होंने शिकायत की- बाकी सब तो ठीक है, यह मुश्किल शब्द विदेशी है। इसे यहां नहीं होना चाहिए। भवानी प्रसाद जी तो अतिथिवत्सल और शालीन थे, वे कुछ नहीं बोले, पर जीवन लाल वर्मा ‘विद्रोही’ जो स्वयं बहुत अच्छे कवि और व्यंग्यकार थे बिफर गये। बोले- ‘मुश्किल’ से आसान शब्द आप हिन्दी में बता दें तो मैं अपना नाम बदल दूं।‘ पंडित शान्तिप्रिय द्विवेदी जैसे विद्वान जीवन की प्रगति से ज्यादा भाषा की शुद्धता के हिमायती हैं।

जीवन जब आगे बढ़ता है तो वह अपनी आवश्यकता के अनुरूप  नये शब्द दूसरी भाषाओं से उधार लेता है,  नये शब्द गढ्ता है,  लोक की शब्द संपदा को खंगालता है और अपने को संप्रेषणीय बनाता है। मेरे एक मित्र हैं, मोबाइल रखते हैं पर मोबाइल शब्द का प्रयोग उन्हें पसंद नहीं है। मोबाइल को वे चलित वार्ता कहते हैं। जब वे आपसे आपकी चलित वार्ता का क्रमांक पूछते हैं तो आप भौंचक्के रह जाने के अलावा कुछ नहीं कर सकते। ऐसे शुद्धतावादी हर युग में हुए हैं और हास्यास्पद माने जाते रहे हैं। मध्यकाल के उस फारसीदां का किस्सा आज भी लोगों द्वारा दुहराया जाता है, जब वे अपने नौकरों से आब-आब की मांग करते रहे थे। पानी उनके सिरहाने ही रखा था। सो जब कोई दीवाना मोबाइल को अछूत समझता है या पानी से परहेज करता है तो न वह भाषा की मित्र है,  न ही अपने जीवन का। ऐसे विद्वानों को मेरे मित्र अनिल वाजपेयी ‘अनसुधरे बल’ कहते हैं। हिन्दी तो बराबर स्वयं को सुधारती चलती है, पर ये विद्वान लकीर पीटने में ही मगन रहते हैं।

हिन्दी के एक विख्यात समीक्षक को दबिश जैसे शब्दों से परहेज है। वे समझते हैं कि दबिश अंग्रेजी के फुलिश या रबिश का कोई भाईबंद है। यदि उन्होंने हिन्दी के ही दबना,  दबाना,  दाब,  दबैल जैसे शब्दों को याद कर लिया होता तो वे दबिश के प्रयोग पर आपत्ति नहीं करते। कचहरी, पुलिस, कानून व्यवस्था, थाना आदि से संपर्क में आने वाले दबिश से अपरिचित नहीं है। वस्तुत: हिन्दी के दीवाने जीवन से अपने शब्दों का चयन नहीं करते, हिन्दी के शब्द कोशों से करते हैं। हिन्दी के शब्द कोशों के सहारे हम आज के लोकतांत्रिक भारत के जीवन-राजनीतिक कर्थताओं,  सामाजिक विसंगतियों, आर्थिक उलझनों और सांस्कृतिक प्रदूषण को पूरी तरह और सही-सही समझ ही नहीं सकते। हिन्दी के शब्दकोशों में न तो सुपारी जैसा शब्द है, न अगवा, हफ्ता, फिरौती, बिंदास, ढिसुंम, घोटाला, कालगर्ल, ब्रेक जैसे शब्द। आप हर दिन समाचार पत्रों, पुस्तकों, जन संप्रेषण माध्यमों, बोलचाल में ये शब्द सुनते हैं और समझते हैं, पर इन्हें अभी तक हमारे कोशकारों ने पांक्तेय मानकर शब्दकोशों में स्थान नहीं दिया। हमारे शब्दकोश जीवन से कम से कम पचास साल पीछे हैं।

हिन्दी में समस्या नये विदेशी शब्दों को स्वीकृत करने की तो है ही, उन शब्दों को भी अंगीकार करने की है जो हिन्दी की बोलियों में प्रचलित हैं। हिन्दी के साहित्यकार विभिन्न बोली क्षेत्रों से आते हैं। वे जब हिन्दी में अपने क्षेत्रों के अनुभवों और परिवेश की कथा लिखेंगे तो वहाँ के शब्दों के बिना उनका काम नहीं चलेगा। हिन्दी सदैव से एक उदार और ग्रहणशील भाषा रही है। जब रामचन्द्र शुक्ल ने कबीर की भाषा को सधुक्कड़ी कहा तो वे हिन्दी की इसी व्यापक ग्रहणशीलता को रेखांकित कर रहे थे। साधु किसी एक स्थान पर जमकर नहीं रहता, घूमता-फिरना, नये-नये क्षेत्रों में जाना उसकी सहजवृत्ति है। इसी कारण हमारे मध्यकालीन संत कवियों में नाना बोली क्षेत्रों के शब्द मिल जाएंगे। हिन्दी कविता का अधिकांश तो हिन्दी की बोलियों में ही है। तुलसी, जायसी जैसे कवियों ने अपनी बोली के शब्दों से अपने काव्य को समृद्ध किया है। जायसी जब सैनिक के लिए पाजी, तुलसी जब सुपात्र के लिए लायक,  कबीर जब समीप के लिए नाल का प्रयोग करते हैं तो वे हिन्दी की विशाल रिक्थ सम्‍पदा का दोहन करते हैं। नये युग में भी गुलेरी ने उसने कहा था में ‘कुंड़माई’ जैसे शब्द का प्रयोग कर उसे हिन्दी पाठकों का परिचित बना दिया। कृष्ण सोबती डार से बिछुड़ी लिखकर पंजाबी ‘डार’ को जो समूह वाली है, हिन्दी का शब्द बनाने में संकोच नहीं करतीं। मैला आंचल, जिन्दगीनामा, कसप, डूब, चाक जैसे उपन्यासों की रोचकता केवल कथा को लेकर ही नहीं, उसकी भाषा की अभिव्यक्ति क्षमता को लेकर भी है।

कुछ दिनों पहिले हिन्दी के एक समीक्षक ने मैला आंचल की हिन्दी को अपभ्रष्ट कहकर उसका परिनिष्ठित हिन्दी में अनुवाद करने का सुझाव दिया था। इधर हिन्दी की बोलियों को स्वतंत्र भाषा के रूप में स्वीकृत किये जाने की मांग बढ़ रही है। यदि अवधी को हिन्दी से पृथक भाषा मान लिया जायेगा, तब क्या रामचरित मानस का हिन्दी अनुवाद करना पड़ेगा, हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यासों को भोजपुरी में रूपान्तरित करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी? नामवर सिंह तब हिन्दी के नहीं, भोजपुरी के साहित्यकार माने जाएंगे। इधर मेरे पास बुंदेली प्रेमियों के बहुत से पत्र आ रहे हैं जिनमें आग्रह किया जा रहा है कि मैं अपनी मातृभाषा के रूप में हिन्दी को नहीं,  बुंदेली को जनगणना पत्रक में दर्ज करवाऊँ। यह एक संकीर्ण विचार है। इससे हिन्दी बिखर जाएगी और हिन्दी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। एक ओर तो विभिन्न दूरदर्शन चैनलों में दिखाए जाने वाले धारावाहिकों में बींद और बींदड़ी जैसे ठेठ क्षेत्रीय शब्द लोकप्रिय हो रहे हैं,  दूसरी ओर हिन्दी की लो.ओ.सी. को और संकीर्ण बनाया जा रहा है।

राजनीति में छोटी-छोटी पार्टियां बनाकर सत्ता में भागीदारी के अवसर निकालना जबसे संभव हुआ है, तबसे हिन्दी की बोलियों के पृथक अस्तित्व की मांग करना भी लाभप्रद और सुविधाजनक हो गया है। छोटी राजनीतिक पाटियों ने हमारे लोकतंत्र को अस्थिर और सिद्धान्तविहीन बना दिया है, छोटी-छोटी बोलियों की पृथक पहिचान का आग्रह करने वाले हिन्दी के गढ़ में सेंध लगा रहे हैं। हमें उनका विरोध करना चाहिए, उनसे सावधान रहना चाहिए।

हमें हिन्दी को अद्यतन बनाने के लिए जिन बातों की ओर ध्यान देना चाहिए, उन बातों की ओर किसी का ध्यान नहीं है। हमारे विश्वविद्यालयों, हिन्दी सेवी संस्थाओं, हिन्दी के प्रतिष्ठानों के पास ऐसी कोई योजना नहीं है कि हिन्दी में आने वाले नये शब्दों का संरक्षण, अर्थ विवेचन और प्रयोग का नियमन किया जा सके। पिछड़ी का विरोधी शब्द अगड़ी हिन्दी में इन दिनों आम है, पर अगड़ी का शब्दकोशीय अर्थ अर्गला या अडंगा है। अंग्रेजी की एक अभिव्यक्ति है एफ.आर.आई. अर्थात् फर्स्ट इनफार्मेशन रिपोर्ट। हिन्दी में इसे प्रथम दृष्टया प्रतिवेदन कहते हैं या प्राथमिकी। हिन्दी शब्दकोशों में ये दोनों नहीं हैं। यह शब्द विधि व्यवस्था का, अपराध जगत का, जनसंचार माध्यमों का बहुप्रयुक्त शब्द है। दादा, धौंस, घपला, घोटाला, कबूतरबाजी, हिट जैसे लोक प्रचलित शब्द भी हमारे शब्दकोशों में नहीं हैं। दूरदर्शन देखनेवालों को घंटे-आधघंटे में ब्रेक शब्द का सामना करना पड़ता है। पर ब्रेक को अभी शब्द कोशों में ब्रेक नहीं मिला है। और तो और बाहुबली का नया अर्थ भी हमारे शब्द कोशों में दर्ज नहीं है।

अंग्रेजी में हर दस साल बाद शब्द कोशों के नये संस्करण प्रकाशित करने की परंपरा है। वैयाकरणों, समाजशास्त्रियों, मीडिया विशेषज्ञों, पत्रकारों, मनोवैज्ञानिकों का एक दल निरंतर अंग्रेजी में प्रयुक्त होने वाले नये शब्दों की टोह लेता रहता है। यही कारण है कि पंडित, आत्मा, कच्चा, झुग्गी, समोसा, दोसा, योग जैसे शब्द अंग्रेजी के शब्द कोशों की शोभा बढ़ा रहे हैं। अंग्रेजी में कोई शुद्ध अंग्रेजी की बात नहीं करता। संप्रेषणीय अंग्रेजी की, अच्छी अंग्रेजी की बात करता है। अंग्रेजी भाषा की विश्व व्यापी ग्राह्यता का यही कारण है कि वह निरंतर नये शब्दों का स्वागत करने में संकोच नहीं करती। हाल ही में आक्सफोड एडवांस्ड लर्न्स डिक्शनरी का नया संस्करण जारी हुआ है। इसमें विश्व की विभिन्न भाषाओं के करीब तीन हजार शब्द शामिल किये गये हैं। बंदोबस्त, बनिया, जंगली, गोदाम जैसे ठेठ भारतीय भाषाओं के शब्द हैं, पर वे अंग्रेजी के शब्दकोश में हैं क्योंकि अंग्रेजी भाषी उनका प्रयोग करते हैं। इन नये शब्दों में एक बड़ा रोचक शब्द है चाऊ या चाव जिसका अर्थ दिया गया है- चोर, बदमाश, अविवाहित मां। इस चाव शब्द का एक रूप चाहें भी है। सूरदास ने चाव शब्द के चबाऊ रूपान्तर का प्रयोग अपनी कविता में किया है- सूरदास बलभद्र चबाऊ जनमत ही को धूत। हिन्दी का चाव या चाईं शब्द सात समंदर पार तो संग्रहणीय माना जाता है, पर अपने घर के शब्द कोशों में नहीं।

हिन्दी क्षेत्र में इतने विश्वविद्यालय हैं, हिन्दी का प्रचार-प्रसार करने वाली इतनी संस्थाएँ हैं, क्या कोई ऐसी योजना नहीं बन सकती कि हिन्दी में प्रयुक्त होने वाले नये शब्दों को रिकार्ड किया जा सके। हम प्रत्येक दस वर्ष में जनगणना पर करोड़ों रुपये खर्च करते हैं, क्या हिन्दी की शब्द गणना पर कुछ खर्च नहीं किया जा सकता? कोई हिन्दी समाचार पत्र अपने रविवासरीय संस्करण में पाठकों से आमंत्रित कर प्रत्येक सप्ताह उसके क्षेत्र में प्रचलित हिन्दी के सौ नये शब्द भी प्रकाशित करे तो वर्ष भर में 5000 से भी अधिक शब्द समेटे जा सकते हैं। वैश्विकीकरण के साथ, नई उपभोक्ता वस्तुओं के साथ, नये मनोरंजनों के साथ, लोकतंत्र की नई-नई व्यवस्थाओं के साथ जो सैकड़ों शब्द हिन्दी में आ रहे हैं, उन्हें काल की आंधी में उड़ जाने देना गैर जिम्मेदारी भी है और लापरवाही भी है। वह हिन्दी के प्रति हमारी संवेदनविहीनता का द्योतक तो है ही। हमें आज हिन्दी के शुद्धतावादी दीवाने नहीं, हिन्दी के संवेदनशील जानकार चाहिए।

साहित्य-कला के साथ दिल्ली सरकार का खेल

कला और साहित्य के करोड़ों के बजट को राष्ट्रमंडल खेलों की भट्ठी में झोंक देने के निर्णय ने एक बार फिर दिल्ली सरकार की मनमानी और साहित्य व कला के प्रति उसके नजरिये की पोल खोल दी है। सरकार ने छह अकादमियों और कला परिषद के बजट में 15 करोड़ से ज्यादा की कटौती कर दी है।
दिल्ली सरकार को यहीं तसल्ली नहीं हुई। उसने हिंदी, पंजाबी, उर्दू, संस्कृत, सिंधी और मैथिली-भोजपुरी अकादमियों तथा कला परिषद को पत्र भेजकर तमाम कार्यक्रम स्थगित करने का निर्देश दिया है। अकादमियों को केवल 20-20 लाख दिए जाएंगे, वे भी इस शर्त के साथ कि इन्हें राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान आयोजित कार्यक्रमों में ही खर्च किया जाएगा। कार्यक्रम और आयोजन स्थल भी सरकार तय करेगी।
दिल्ली सरकार ऐसा कारनामा पहली बार नहीं कर रही है। वरिष्ठ लेखक कृष्ण बलदेव वैद को लेकर हुआ विवाद जगजाहिर है। एक कांग्रेसी नेता के कहने पर उन्हें शलाका सम्मान नहीं दिया गया। इसके विरोध में वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने भी शलाका सम्मान ठुकरा दिया। उनके अलावा छह और रचनाकारों ने हिंदी अकादमी पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया। लेखकों के विरोध के बावजूद पुरस्कार समारोह आयोजित किया गया। इसका आयोजन किसी सभागार में न कर दिल्ली सरकार के सचिवालय में किया गया। हिटलरी रुख अपनाते हुए पत्रकारों तक को एंट्री नहीं दी गई। किसी सम्मानित लेखक को एक मिनट भी बोलने का भी मौका नहीं दिया गया। इस तरह का अभूतपूर्व साहित्यिक समारोह संभवत: पहली बार हुआ। यह भी शायद पहली बार हुआ कि किसी अकादमी के मुख्य पुरस्कार सहित कई और पुरस्कार ठुकरा दिए जाने के बाद भी समारोह आयोजित किया गया हो।
दिल्ली की मुख्यमंत्री छह अकादमियों की अध्यक्ष हैं। मुख्यमंत्री होने के नाते उन्हें राजनीतिक-प्रशासनिक कार्य करने पड़ते हैं। वे सभाओं, बैठकों, उद्घाटन आदि महत्वपूर्ण कार्यों में व्यस्त रहती हैं। साहित्य-कला जैसे तुच्छ विषयों के लिए उनके पास समय कहां! ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि उन्होंने साहित्य सृजन किया हो या वह भाषाविद् हों या कला-साहित्य के क्षेत्र में उनका किसी भी रूप में कोई योगदान रहा हो। ऐसे में वह अकादमियों में सक्रिय भूमिका कैसे निभा सकती हैं? क्या एक व्यक्ति का छह अकादमियों का अध्यक्ष बनना व्यवहारिक है? यह तो एक नजीर है। कमोवेश यह स्थिति सभी राज्यों की है। फिर क्यों न अकादमियां राज्य सरकार के शिकंजे से मुक्त की जाएं। उसमें पदाधिकारी रचनाकारों हों और उन्हीं के द्वारा चुने जाएं।
डॉक्टरों की संस्था डॉक्टर चलाते हैं, उद्योगपतियों की संस्था उद्योगपति चलाते हैं। यानी संस्था जिसकी होती है, उसी से जुड़े लोग उसे संचालित करते हैं। फिर रचनाकारों और कलाकारों की संस्थाएं राजनेता क्यों चलाएंगे?
असल में सरकारें साहित्य व कला अकादमियों को अपना भोंपू बनाकर रखना चाहती हैं। उनकी मंशा रहती है कि ऐसे लेखकों-कलाकारों को सम्मानित किया जाए, जो उनकी गलत-शलत नीतियों का समर्थन करें और विरोध में एक शब्द न बोलें? चुनाव में प्रचार भी करें तो सोने-पे-सुहागा। यह तभी संभव है जब अकादमियों पर उनकी पकड़ हो।
एक वजह यह भी है कि राजनेताओं की सोच सामंती है। वह कुर्सी मिलने पर खुद को जनसेवक नहीं, राजा समझते हैं। उसी की तर्ज पर पुरस्कार व सम्मान बांटने का अधिकार अपने हाथ में रखना चाहते हैं। इससे उनके दंभ की तुष्टि होती है।
आजकल की जोड़तोड़ की सिद्धांतहीन राजनीति की उपज अधिकतर नेता रीढ़विहीन हैं। ये अंदर से खोखले, वैचारिक रूप से दिवालिया और मूल्यहीन हैं। ये इतने कमजोर हैं कि वैचारिक आलोचना भी इन्हें भयभीत कर देती है। इन्हें स्तुति गान ही अच्छा लगता है। यह तभी संभव है, जब इनके हाथ में प्रलोभन देने की ताकत हो। इसलिए राज्य सरकारों से यह अपेक्षा करना बेकार है कि वे स्वेच्छा से अकादमियों को अपने चुंगल से मुक्त कर देंगी।
रचनाकार और कलाकार निजी स्वार्थों और प्रलोभनों से ऊपर उठकर उन अकादमियों और कला परिषदों में कोई पद ग्रहण नहीं करें, जो राज्य सरकारों के अधीन हैं। इनसे मिलने वाले पुरस्कारों और सम्मानों को भी ठुकरा दें। तभी राज्य सरकारों पर दबाव बनेगा और वे इस दिशा में कदम उठाएंगी।
संस्मरणकार कांतिकुमार जैन का कहना है कि सरकारों का साहित्य व कला का एजेंडा केवल मुखौटा है ताकि कोई यह न कह सके कि सरकार कला विरोधी है। इनके लिए कला-साहित्य का प्रोत्साहन केवल रस्म अदायगी है। सरकार का मकसद केवल राजनीति करना, वोट बैंक बढ़ाना ओर यह देखना है कि पैसा कहां से कमाया जा सकता है।
आज तक प्रेमचंद का स्मारक नहीं बनाया जा सका है। सरकारी पत्रिकाओं की हालत खराब है। वे स्तरहीन हैं और उनमें पठनीय सामग्री नहीं होती।
हमारी सरकारों की प्राथमिकता में कला, साहित्य, संस्कृति नहीं है। वे खुद को कला प्रेमी, साहित्य प्रेमी साबित करने के लए आयोजन करती हैं, लेकिन भयभीत भी रहती हैं कि कोई सरकार के खिलाफ न बोल दे। इसलिए सम्मानित साहित्यकारों को बोलने का मौका भी नहीं दिया जाता। उनका सम्मान केवल विज्ञापन के लिए करती हैं।
अकादमियों को सरकारों के चुगंल से मुक्ति मिलनी चाहिए।

आसाराम बापू और कमला बुआ : कांतिकुमार जैन

पिछले दिनों किन्नरों को कोसते हुए आसाराम बापू ने बयान दिया था। उनका लक्ष्य सागर की मेयर कमला बुआ थीं। संतजी के बयान को लेकर असली और नकली किन्नरों की पहचान करता चर्चित संस्मरणकार का आलेख-

कुछ दिनों पहले उज्जैन में आसाराम बापू ने किन्नर विषयक बयान क्या दिया कि राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में भूचाल आ गया, जिन लोगों ने संत श्रेष्ठ को टी.वी. पर किन्नरों की खास अदा में ताली बजा-बजाकर, अंगुलियां नचा-नचाकर, दीदे मटका-मटाकर किन्नरों को सराहते हुए देखा, उनके तो मानो जीते-जी ही स्वर्ग मिल गया। श्वेत, हिम धवल दाढ़ी, भौंहों तक के बाल सफेद, परदनिया और कुर्ता भी झकाझक सफेद। जब वे नाच-नाचकर, लहरिया लेते हुए किन्नरों को कोस रहे थे तो संयोग से टी.वी. पर यह नयन महोत्सव देखने का सौभाग्य मुझे भी मिला। टीवी पर संत आसाराम किसी भी किन्नर से ज्यादा किन्नर लग रह थे। किन्नरों के प्रति उनकी घृणा छिपाये नहीं छिप रही थी। लगता था कि इस धराधाम पर सबसे गर्हित प्राणी कोई है तो वह किन्नर ही है। इतनी घृणा संतों को शोभा नहीं देती, पर घृणा का मूल कारण मुझे दूसरे दिन समाचार पत्रों में पढऩे को मिला।
  अहमदाबाद हो या भोपाल, सागर हो या उज्जैन, सबने संतजी की किन्नर विरोधी टिप्पणी की शल्य चिकित्सा की। बापूजी का लक्ष्य सागर की कमला बुआ थी। सागर के बुआ समर्थकों ने कहा कि यह सारा मामला व्यापार का है। आसाराम बापू को लगा कि अभी तक उन्हें देखने और सुनने के लिए जो भीड़ उमड़ती थी, वह अब कमला बुआ को देखने और सुनने के लिए उमड़ेगी। कमला बुआ सागर की मेयर चुनी गई थीं। उन्होंने कांग्रेस और भाजपा प्रत्याशियों को गहरी शिकस्त दी थी।
भारतीय जनता मौका पडऩे पर असली और नकली का ऐसा भेद करती है कि बड़े-बड़े व्याख्याकार गच्चा खा जाएं। जनता मानती है कि जब हमें किन्नरों में से किसी एक का चुनाव करना है तो असली का ही चुनाव क्यों न किया जाए, सो उसने असली का चुनाव किया। बापू को लगा कि बुआ प्रतिष्ठा और लोकप्रियता में उनसे आगे निकल गईं। इसलिए बुआ को लंगड़ी मारना उन्हें जरूरी लगा। उन्होंने उज्जैन में अपने बयान द्वारा कमला बुआ को लंगड़ी मारी थी, पर यह दांव उल्टा पड़ा। अपनी लंगड़ी से वे स्वयं धराशाही हो गए।
मुझे उस नेता के इस विश्लेषण पर कि सारा मामला व्यापार का है, गंभीरता से विचार करने की जरूरत लगी। मैंने मंथन किया और मंथन का परिणाम निकला- ध्त। इस ध्त को प्राप्त करने में मेरे भाषा विज्ञानी मन ने बड़ा काम किया।
हमारे देश में पिता को बापू कहते हैं। पिता की बहन को बुआ या फुआ कहा जाता है। कई लोग बुआ को फूफी या फूफू भी कहते हैं। ये सारे शब्द संस्कृत के पितृ स्वषा के तद्भव रूप हैं। बुआ यानी बापू की बहन। बापू का बुआ की खिल्ली उड़ाना भारतीय पारिवारिक संबंधों में कोई नई बात नहीं है। अब सागर में बुआ सत्ता में आ गई, सागर की मेयर हो गईं तो बापू को अखरना ही था। सागर में बापू का बड़ा भारी आश्रम है। बात संबंधों की नहीं, सत्ता की है। सत्तासीन बुआ बापू को आंख की किरकिरी लगीं। उन्होंने किरकिरी दूर करने के लिए हथेली का सहारा लिया, अंगुलियों को मटकाया, आगे घूमे, पीछे मुड़े। बुआ जैसी करती थीं, वह सब किया।
ताली बजाना किन्नरों की खास अदा है। ताली बजाता किन्नर समाज में उपहास का पात्र माना जाता है। बापू को लगा कि सागर की जनता ने कमला बुआ को जिताकर यथास्थिति को बदलने की जुर्रत की है। बापू यथास्थितिवादी हंै। समाज बदल गया तो उन जैसे बापुओं को कोई नहीं पूछेगा, इसलिए कमला बुआ जैसे व्यक्तियों पर प्रहार करो।
ताली बजा-बजाकर किन्नर समाज संतति जन्म पर, विवाह के मौके पर, दस्टौन पर, मुंडन पर घर-घर जाकर अपनी जीविका वसूलता है। लोग खुशी-खुशी देते भी हैं। वे जानते हैं कि किन्नरों को यदि उन्होंने इनक नेग नहीं दिया तो ये किसी भी सीमा तक जा सकते हैं और गृहस्थ की थुड़ी-थुड़ी कर सकते हैं।
सागर में ही कोई चार-पांच साल पहले एक किन्नर ने विद्यापुरम के एक शुचितावादी प्रोफेसर की बड़ी थुड़ी-थुड़ीकर दी थी। प्रोफेसर साहब स्थानीय थे, किन्नरों को स्थानीय नामों से पुकारना उन्हें अच्छा लगता। किन्नरों को वे शापग्रस्त मानते थे और स्वयं को पुल्लिंग होने के कारण विश्व का सर्वश्रेष्ठ प्राणी। वे किन्नरों को किन्नर नहीं कहते थे। ठेठ बुंदेली में कभी हीजड़ा कहते, कभी खसुआ। हीज़ फारसी शब्द है, इसी को और अवज्ञामूलक बनाना हो तो उसमें एड़ा प्रत्यय लगाकर हीजड़ा बनाया जाता है। दुखड़ा, मुखड़ा, टुकड़ा के वजन पर।
अकबर इलाहाबादी ने हीज़ शब्द का प्रयोग बड़े ही शायराना अंदाज में किया है। न हीयों में, न शीयों में। उनका संकेत अंग्रेजी के ‘हीÓ और ‘शीÓ से है। बोलचाल में ऐसे लोगों का परिचय देते हुए कहते हैं उठ बैठ, खड़ी हो जा। पशुओं को खस्सी बनाकर उन्हें अधिक कार्यक्षम बनया जाता है और वे प्रजनन के अयोग्य हो जाते हैं। प्रोफेसर साहब ने घर आए किन्नर को खस्सू कह दिया। कह ही नहीं दिया, उसे गाली भी दी और धक्का भी दिया।
आचार्यजी को पौत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी। किन्नर टोली ने जनाना अस्पताल से यह सूचना प्राप्त की थी और अपने कुल की परंपरा के अनुसार अपना कर वसूलने विद्यापुरम आए थे। यहां कर तो मिला नहीं, मिला अपमान, मिले अपशब्द। किन्नर ने कहीं सुना था- सबसे कठिन जाति अपमान सो अपनी बिरादरी का ऐसा अपमान देखकर उसने गिरते-गिरते पुल्लिंग को अपनी जद में लिया और वे निरावृत्त हो धरणी पर धड़ाम से गिरे। यह लीला यहां संपन्न नहीं हुई। पंडितानी चिल्लाई- देखियो-देखियो, पंडितजी को का तो हो गऔ। पंडितजी को कुछ नहीं हुआ था। वे केवल बेपर्द हो गए थे। किन्नर राज ने इस दृश्य का व्यापारिक लाभ उठाने का विचार किया और उन्होंने भी अपनी धोती कमर से ऊपर कर ली। आंधी में उलटी हुई छतरी की तरह। पंंडितानी चिल्ला रही है, पुत्रजी किंकर्तव्यविमूढ़ खड़े हैं, पुत्रवधू सौरी से बाहर आ गई हैं और सोच रही हैं- हे धरती माता, तू फट जा, मैंन उसमें समा जाऊं। पंडितानी किन्नर बुआ से हाहा खा रही है। माई हूने अब सान्त, अपनी लीला समेटिये। यह गृहस्थों का घर है। समधियाने तक बात पहुंचेगी, हम तो कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे।
घर के सामने भीड़ लग गई थी। सब्जी वालों, कबड़ी वालों, ठेले वालों को इस बायस्कोप में बड़ा आनंद आ रहा था। ज्यों-ज्यों पंडितानी की हाहा बढ़ रही थी, न हीजी, न शीजी का रेट भी बढ़ रहा था। सौ रुपए से शुरू हुआ सेंसेक्स बढ़कर अब पांच सौ हो गया था। पंडितानी को अब न पंडितजी की सुध रह गई थी, न बेटे जी की। उन्हें कुल की कान बचाने भर की सुध थी। हम पेंशनदार लोग, बुआ तुम्हें पांच सौ रुपया दे हैं तो हमाओं को बजट बिगड़ जाते। बुआ गुस्सा थूकौ, धुतिया नीची करौ, ये लो सौ रुपैया और मौड़ा को आशीर्वाद दो। वे सौरी में गई। नवजात को उन्होंने बुआ की बढ़ी हुई हथेलियों में डाल दिया। बुआ ने बड़प्पन का परिचय दिया। जुग-जुग जिऔ राजा दशरथ के मौड़ा।
सारे मुहल्ले में यह खबर बिजली की तरह दौड़ गई। जब किन्नर टोली मेरे दरवाजे पर आई तो मैंने उन्हें दस का नोट दिया। कहा- बुआ हमरो रिटायरमेंट हो गयौ है, पंशेन अभी आई नहीं है, इतनेई में सात रखौ। सो हम लुटेरे थोड़ेई हैं। हम भी तुमाऔ दुख-सुख समझत हैं। भगवान ने तो हमारे साथ बड़ों अन्याय करौई है, अब हम अपनी रोजी रोटी कमा रयै, ऐसे में कोई हमें गाली दे हे तो हमें गुस्सा आहे कि नई। बुआ ठीक कह रही थीं। वह चलने को हुईं तो मैंने उन्हें रोका, बुआ हमारी एक बात सुने जाऔ। अगली बेर तुम चुनाव लड़ो, बीना से, कटनी से, शबनम मौसी और फलानी बुआ चुनाव जीत के भोपाल तक पहुंच गई हैं। तुमाऔ जीत बौ पक्को। हमाये वोट के लाने तुम निसाखातिर हो जाओ। बुआ के पैर थम गए। उन्होंने ताली बजाई, सपना मौसी, जूही बुआ और राधा रानी को बुलाया। कहा- देखियौ जे जैन साहब का कै रयै।
मैं नहीं कहता कि कमला बुआ के सागर के मेयर पद का चुनाव जीतने में मेरी उस दिन की प्रेरणा ही थी, पर वे चुनाव लड़ीं और जीतीं। जनता ने उन पर विश्वास प्रकट किया। सामान्य मतदाता नकली किन्नरों से इस प्रकार आजिज आ चुका है कि उसने सोचा चलो इस बार असली किन्नर को मौका देकर देखा जाए, जो सकता है असली किन्नर नकली मर्दों से बेहतर साबित हो।
ऐसे में संत आसाराम बापू का कमला बुआ का मजाक उड़ाना जनता का मजाक उड़ाना है, संविधान का अपमान करना है और लोकतंत्र की जड़ें कमजोर करना है। बापू अपना घर संभालें, दूसरों के फटे में टांग न डालें तो ही अच्छा। उज्जैन में संत आसाराम बापू ने कमला बुआ का मखौल उड़ाकर अच्छा नहीं किया। उनका यह आचरण संतों जैसा नहीं है। कमला बुआ हमारी प्रतिनिधि हैं, वे चुनाव लड़कर और जीतकर सागर की मेयर बनी हैं। उन्हें यह गौरव हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था ने दिया है। संत को जनता के विवेक का उपहास करना शत-प्रतिशत गलत है। हमारी परंपरा में किन्नर को अबध्य माना गया है। शिखंडी का उदाहरण हमारे सामने है। फिर संत प्रवर का कमला बुआ का माखौल उड़ाना किसी भी प्रकार से संतोचित नही है।
यहां भी कमला बुआ आसाराम बापू से बाजी मार ले गईं। संत शिरोमणी ने उज्जैन में अपने हाव-भाव से, बोली बानी से कमला बुआ की जिस भद्दे ढंग से हंसी उड़ाई, उसके उत्तर में कमला बुआ अपनी पर उतर आती तो बापू को भागते रास्ता नहीं मिलता, पर कमला बुआ ने बहुत शलीन ढंंग से, अत्यंत शिष्टतापूर्वक उत्तर में कहा कि मुझे उनका आशीर्वाद चाहिए। वे हमारे वंदनीय संत हंै। संतों के मार्गदर्शन के बिना मैं सफल हो ही नहीं सकती। कमला बुआ ने जिस गरिमा और मर्यादा का परिचय दिया है, उससे उनका कद सभी की दृष्टिï में बहुत ऊंचा हो गया है।
संत आसाराम बापू ताली बजाते हुए बहुत अच्छे लगते हैं, असली किन्नर मय अपनी मूछों और दाढ़ी के। वास्तव में दैहिक किन्नरत्व उतना मालौखस्पद नहीं है, जितना मानसिक किन्नरतत्व। कमला बुआ ने थोड़े ही समय में सागर में अपनी कार्य कुशलता और निर्णय क्षमता से जो छवि अर्जित की है, वह हमें बहुत आशान्वित करती है। वे आसाराम बापू से ज्यादा संत और उनकी तुलना में ज्यादा पुरुष लगती हैं। लोकतंत्र ने उन्हें जो अवसर दिया है, उसका वे भरपूर लाभ उठाएं, अपने कार्यों से जनता की कसौटी पर खरी उतरें। वे यशस्वी हों, सफल हों, जनता को उनसे बहुत उम्मीदें हैं, वे भारतीय लोकतंत्र में तीसरा विकल्प सिद्ध हो सकती हैं।
चलते-चलते एक प्रसंग याद आया। ईरान में किसी मुल्ला ने किसी किन्नर को धक्का दे दिया। किन्नर गिर पड़ा। पर वह करे तो क्या करे। उसने लपककर मुल्लाजी की दाढ़ी का एक बाल नोंच लिया। अरे, अर,े यह क्या करते हो। कुछ नहीं, मुझे मालूम है कि जिसके पास भी आपकी दाढ़ी का मुदद्दस बाल होगा, उसे सीधे जन्नत मिलेगी। यह सुनना था कि वह मौजूद भीड़ मुल्लाजी के बाल नोंचने लगी। मुल्लाजी सारी हेकड़ी भूल गए, पर तब तक काफी देर हो गई थी।
कमला बुआ चाहतीं तो अपने प्रशंसकों, अपने भक्तों, अपनी टोली के सदस्यों को कह देतीं कि संत आसाराम बाप की मूछों और दाढ़ी के बाल जन्नत का पासपोर्ट हैं तो संतजी अपना सारा संतत्व भूल जाते, पर कमला बुआ शरीफ हैं, बेहद शालीन हैं। उन्होंने बडप्पन का परिचय दिया और संत शिरोमणी की माफ कर दिया। बुआ बड़ी साबित हुईं, बापू बौने हो गए!

साहित्य पर अश्लील तोहमत

पिछले कुछ समय से हिंदी साहित्य में कोई वैचारिक और रचनात्मक हलचल तो नहीं हो रही है, लेकिन विवाद नए-नए उठ रहे हैं। हिंदी अकादमी, दिल्ली में उपाध्यक्ष पद पर अशोक चक्रधर की नियुक्ति, सैमसंग पुरस्कार, उपन्यास द्रोपदी को लेकर हंगामा और अब केदारनाथ सिंह द्वारा शलाका सम्मान ठुकराना। उनके अलावा पुरुषोत्तम अग्रवाल, प्रियदर्शन, रेखा जैन, पंकज सिंह, गगन गिल और विमल कुमार ने भी पुरस्कार नहीं लेने की घोषणा की है। इसके पीछे वरिष्ठ साहित्यकार कृष्ण बलदेव वैद को शलाका सम्मान नहीं दिया जाना है। दरअसल, हिंदी अकादमी की पिछली कार्यकारिणी ने वैद को वर्ष 2008-2009 के शलाका सम्मान के लिए नामित किया था। बाद में इसे रोक दिया गया। असल में साहित्य से कुछ लोगों ने वैद पर अश्लील साहित्य लिखने का आरोप लगाया था। वैसे तौर से उनके उपन्यास नासरीन और बिमल उर्फ जाएं तो जाएं कहां को लेकर आपत्ति जताई थी। हालांकि हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष अशोक चक्रधर ने यह कहा कि अकादमी ने कभी आधिकारिक तौर पर कृष्ण बलदेव वैद को शलाका सम्मान देने या नहीं देने की बात नहीं कही।
वैद का लेकर हो रहे विवाद ने एक बार फिर साहित्य में अश्लीलता के सवाल को जीवित कर दिया है। यह सवाल सदियों पुराना है। साहित्य के जन्म के साथ ही इस तरह के विवाद उठने लगे। समय-समय पर इसे लेकर खूब हो-हल्ला मचा। प्रसिद्ध कथाकार पांडेय बेचन शर्मा उग्र के साहित्य को पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी घासलेटी साहित्य मानते थे। उन्होंने इसके विरोध में व्यापक अभियान भी चलाया था और गांधीजी से भी इसकी शिकायत की थी। हालांकि गांधीजी को उग्र की रचनाएं अश्लील नहीं लगीं और उन्होंने क्लीन चिट दे दी। अश्लीलता का संबंध हमारी मानसिकता और परिवेश से है। हम जिस समाज में रह रहे हैं, जो इसके लिए अश्लील है, वह दूसरे समाज के लिए सहज हो सकता है। स्थिति इसकी उल्टी भी संभव है।
अगर लेखक की मानसिकता स्वस्थ और समाजपरक है तो उसमें अश्लीलता आ ही नहीं सकती है। ऐसा वर्णन पढ़कर पाठक उत्तेजित और यौनकांक्षी नहीं होगा, बल्कि उसके मन में घृणा और आक्त्रोश ही उत्पन्न होगा। अस्वस्थ मानसिकता का रचनाकार सेक्स और नग्न चित्रण केवल क्षणिक उत्तेजना के लिए करेगा। दूसरी ओर कुछ रचनाकार सस्ती लोकप्रियता और सनसनी फैलाने के लिए भी इस तरह का चित्रण करते हैं, लेकिन उनके लेखन को कोई स्थाई महत्व नहीं मिलता। इसके अलावा अश्लीलता समय सापेक्ष है। समय के अनुसार इसकी परिभाषा भी बदलती रही है। आज से चालीस-पचास पहले फिल्मों में जिन दृश्यों को अश्लील माना जाता है, आज उन्हें सहज मान लिया गया है।
चर्चित कथाकार भीमसेन त्यागी ने एक साक्षात्कार में कहा था कि अश्लीलता का प्रश्न उतना ही पुराना है, जितना साहित्य। वास्तव में अश्लीलता साहित्य में नहीं, बल्कि साहित्यकार की मानसिकता में होती है। अगर रचनाकार की मानसिकता स्वस्थ व समाजपरक है तो नग्न चित्रण भी अश्लील न होकर सार्थक और सही मायनों में साहित्य का उद्देश्य पूरा करने वाला हो जाता है। एलेक्जेंडर कुप्रिन का यामा-द-पिट इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। स्त्री-पुरुष का जैसा नग्न चित्रण इस उपन्यास में हुआ है, वैसा साहित्य में बहुत कम हुआ है। लेकिन इस नग्न चित्रण के बावजूद जो मानवीय संवदेना यामा-द-पिट में है, वह उसे विश्व की श्रेष्ठतम उपन्यासों की कतार में ला खड़ा करती है।
गोर्की की कहानी एक इंसान का जन्म में नग्न चित्रण है, लेकिन पाठक क्षणभर के लिए कहीं अश्लीलता अनुभव नहीं करता।
जगदम्बा प्रसाद दीक्षित की कहानी जिदंगी और गंदगी में भरपूर नग्नता होने के बाद भी लेशमात्र अश्लीलता नहीं है। निर्णायक बिंदू नग्नता नहीं, लेखक की मानसिकता है।

लेखक बडे़ मूल्यों के लामबंद हों : सेरा यात्री

स्त्री-पुरुष संबंधों के बारे में हर कोई जानता है। अब तो बच्चे भी इस बारे में जानने लगे हैं। यदि लेखक सेक्स का वर्णन रसलोलुप होकर करता है तो वह अश्लील है। यदि मर्यादा में रहकर वर्णन किया जाता है तो वह अश्लील नहीं है।
अश्लीलता का सबसे अधिक आरोप मंटो पर लगा है। वेश्याओं का वर्णन उनकी रचनाओं में बहुत हुआ है। लेकिन उन्होंने ऐसा वर्णन नहीं किया कि जो पाठक के मन में यौन इच्छा या यौन उन्मुक्तता पैदा करता है।
अश्लीलता अगर लेखक का उद्देश्य ही बन जाए तो गलत है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण तस्लीमा नसरीन है। उन्होंने कैसे विभिन्न पुरुषों के साथ संभोग किया, कैसे इंज्वाय किया, इसका उल्लेख उनकी रचनाओं में है। इसे वह मुक्त सेक्स कहती हैं। उन्होंने लेखन से धर्म, भ्रष्टाचार, कुपोषण आदि के विरुद्ध जो संघर्ष किया है, वह इसके नीचे दब जाता है।
लेखक जब बडे़ मूल्यों से हटकर शरीर पर अटक जाता है तो उसकी रचना में अश्लीलता आ जाती है।
मान लिया कि कृष्ण बलदेव वैद की रचनाओं में अश्लीलता है। जब उनका नाम घोषित कर दिया और उनसे स्वीकृति ले ली तो हिंदी अकादमी का नैतिक दायित्व है कि उन्हें पुरस्कार दे। हाल ही में तेलुगु के लेखक के उपन्यास द्रोपदी को लेकर साहित्य अकादमी पुरस्कार समारोह में हंगामा हुआ। उनका नाम घोषित कर किया जा चुका था इसलिए विवाद के बाद भी उन्हें पुरस्कार दिया गया।
आज समाज में बडे़ मूल्यों के लिए संघर्ष खत्म हो गया है। लेखकों को इसके लिए लिए लामबंद होना चाहिए। जन साधारण की समस्याओं के लिए लेखक एकजूट हों। किसे पुरस्कार दिया गया, किसे नहीं, ये बहुत छोटी चीजें हैं। बड़ी बात समाज में हो रहे अनाचार के विरुद्ध एकजूट होकर संघर्ष करना है।

अश्लीलता का संबंध सोच से : कांतिकुमार जैन

अश्लीलता का संबंध हमारी मानसिकता, हमारे संस्कारों से है। हम सब अभी भी विक्टोरिया युगनी प्रूडरी से बाहर नहीं निकाल पाए हैं। कहते हैं कि विक्टोरिया के समकालीन कुलीन लोग अपने ड्ाइंग रूम की मेजों को मेजपोश से ढककर रखते थे ताकि तेज की नंगी टांगें आगंतुकों की आंखों से ओझल रही जाएं। हम अभी तक इसी मानसिकता से ग्रस्त हैं। डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी ने निराला के प्रसिद्ध गीत दूर देश की वामा, आए मंद चरण अभिरामा, उतरे जल में अवसन श्यामा, अंकित उरछवि सुंदरतर हो की प्रशंसा करते हुए लिखा कि निरालाजी इस गीत में अवसन के स्थान पर नंगी कर देते तो न छंदोभंग होता, न यति टूटती पर गीत अश्लील हो जाता। अर्थात् अश्लील अवसन शब्द नहीं है। अश्लील नंगा शब्द है। अभिजनोचित, सुरुचिपूर्ण सभ्य होने का दर्प। हमें देखो, हम कितने संस्कृत हैं, तुम कितने असंस्कृत। तुम्हारें पांव पांव, हमारे पांव चरण वाली मानसिकता।
कालिदास ने मेघदूत में तन्वीश्यामा शिखरिदशना वाले प्रसिद्ध छंद में स्तन भर शब्द का इस्तेमाल किया है। इसका छत्तीसगढ़ अनुवार क्या हो? छत्तीसगढ़ में स्त्री के बडे़-बडे़ स्तनों को थन कहना आम है। दाई रे, ओकर कतेक बडे़-बडे़ थन हवै। छायावाद के वरिष्ठ कवि मुकुटधर पांडेय ने मेघदूत के अपने छत्तीसगढ़ अनुवाद में लिखा-
झुके थोरकुन थनभारा ले, कूला हर गरुवावै
तेकर कारन आलस मा वे जल्दी चले न पावै
कालिदास के स्तन भार को किसी ने अश्लील नहीं कहा था, किंतु छत्तीसगढ़ में इस अनुवाद के कारण मुकुटधर जी पर भारी आरोप लगे। देववाणी में जो अश्लील नहीं है, हिंदी में या उसकी बोलियों में अनुदित होते ही वह अपनी श्लीलता खो देता है। पाण्डेय जीने इस आरोप पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए बडे़ दुख से मुझे लिखा था, मेघदूत के छत्तीसगढ़ अनुवाद को लेकर मुझ पर छींटाकशी शुरू हो गई है। निस्संदेह मेघदूत में एकाध स्थान पर नग्नताई पाई जाती है, अभी हम नेकेड और न्यूड का अंतर नहीं समझ पाएं हैं। खैर, आलोचना महाकवि की समझी जाएगी, मैं तो मात्र आलोचक हूं।
लेखक के चर्चित लेख- अश्लीलता का हिंदी चेहरा का अंश