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कान्‍ति‍ कुमार जैन पर केन्‍द्रि‍त ‘राग भोपाली’ अंक का लोकार्पण

सागर : प्रगति‍शील लेखक संघ सागर इकाई की पत्रि‍का ‘राग भोपाली’ के प्रोफेसर कान्‍ति‍ कुमार जैन पर केन्‍द्रि‍त अंक का लोकार्पण 9 सि‍तम्‍बर, 2012 को उनके 80वें जन्‍मदि‍न के अवसर पर कटरा नमक मण्‍डी में आयोजि‍त गोष्‍ठी में कि‍या गया। इस अंक में प्रोफसर जैन के व्‍यक्‍ति‍त्‍व और कृति‍त्‍व पर प्रकाश डाला गया है। पत्रि‍का के सहयोगी सम्‍पादक गोवि‍न्‍द सिंह असि‍वाल, प्रोफेसर कान्‍ति‍ कुमार जैन, उनकी पत्‍नी साधना जैन और महेन्‍द्र पुसकेले ने इस पत्रि‍का का लोकार्पण कि‍या।

इस अवसर पर गोवि‍न्‍द सिंह असि‍वाल ने कहा कि‍ जो लेखक प्रगति‍शील वि‍चारों को अपने लेखन में प्रति‍पादन कर रहे हैं, वे भी हमारे उतने ही हैं, जि‍तने प्रगति‍शील लेखक संघ के सदस्‍य। कान्‍ति‍कुमार जैन हमारे संघ के सदस्‍य तो नहीं हैं, लेकि‍न मार्क्‍सवाद के प्रति‍ उनकी प्रति‍बद्धता असंदि‍ग्‍ध है। उन्‍होंने मार्क्‍सवाद का व्‍यापक अध्‍ययन कि‍या है और वह मुक्‍ति‍बोध व परसाई के अभि‍न्‍न मि‍त्र रहे हैं। हि‍न्‍दी वि‍भाग के अध्‍यक्ष होते हुए उन्‍होंने अपने पाठ्यक्रम में मुक्‍ति‍बोध और परसाई को तो स्‍थान दि‍या ही, नजीर अकबराबादी जैसे कवि‍ को भी पाठ्यक्रम में शामि‍ल कि‍या। यहाँ यह भी उल्‍लेखनीय है कि‍ कथाकार और सम्‍पादक भीमसेन त्‍यागी ने जब ‘भारतीय लेखक’ के परसाई पर केन्‍द्रि‍त अंक नि‍कालने की योजना बनाई तो कान्‍ति‍ कुमार जैन उसमें अति‍थि‍ सम्‍पादक थे। उन्‍होंने परसाई के बाल साहि‍त्‍य और कवि‍ताओं की खोज करके ‘भारतीय लेखक’ के परसाई अंक को ‘परसाई की खोज’ बना दि‍या।

महेन्‍द्र पुसकेले ने कहा कि‍ डॉक्‍टर नामवर सिंह ने अपने गुरु आचार्य हजारी प्रसाद द्वि‍वेदी पर केन्‍द्रि‍त ग्रंथ ‘दूसरी परम्‍परा की खोज’ लि‍खकर अपने गुरु का ऋण चुकाया, उसी प्रकार असि‍वाल ने ‘राग भोपाली’ का यह अंक कान्‍ति‍ कुमार जैन पर केन्‍द्रि‍त कर उनका ऋण अदा करने का प्रयत्‍न कि‍या है। इस अवसर पर साधना जैन ने फैज अहमद फैज की नज्‍मों का सस्‍वर पाठ कि‍या। उनकी बेटी गोपा ओर मोना ने भी अपने पि‍ता के लेखन और व्‍यक्‍ति‍त्‍व पर प्रकाश डाला। सात्‍वि‍क जैन ने अपने नाना के सम्‍बन्‍ध में कई रोचक संस्‍मरण सुनाये। गोष्‍ठी की अध्‍यक्षता प्रगति‍शील लेखक संघ सागर इकाई के अध्‍यक्ष टीकाराम त्रि‍पाठी ने की।

इस अवसर पर डॉक्‍टर मनीष चन्‍द्र झा, वृन्‍दावन राय सरल, राम आसरे पाण्‍डेय, मनोज श्रीवास्‍तव, दीपा भट्ट, उषा पुसकेले, दि‍नेश साहू आदि‍ उपस्‍थि‍त थे।

अलसाई दुपहरी में दबे पाँव : शशांक दुबे

चर्चित संस्‍मरणकार कान्‍ति‍कुमार जैन की पुस्‍तक ‘बैकुंठपुर का बचपन’ पर लेखक-पत्रकार शशांक दुबे की समीक्षा-

लिखने-पढ़ने के शौकीन किसी सम्‍वेदनशील पाठक के सिर पर यदि एक पिस्तौल तानकर उससे यह सवाल किया जाये कि साठ के दशक में हिन्‍दी साहित्य का जो शामियाना किसी अमीर की शादी में लगने वाले टैंट की तरह सुदूर फैला हुआ दिखाई देता था, सतर के दशक में उसके घटकर आधे हो जाने, आठवें दशक में एक चौथाई रह जाने और नब्बे के दशक में उसकी हैसियत ‘जंगल की सैर’ में लगाये जानेवाले ‘दस बाय दस’ के टैंट की तरह रह जाने और कहानी, कविता, उपन्यास, आलोचना की परखचियाँ उड़ जाने के बाद भी जिन लोगों ने छपे हुये अक्षरों की ताकत को छोटा नहीं होने दिया उनमे से कोई तीन नाम तत्काल बताओ तो दूसरा और तीसरा नाम लेते वक़्त भले ही उसे पल भर सोचना पड़े, लेकिन ‘कान्‍ति‍ कुमार’ के रूप में पहला नाम लेने में वह कतई देर नहीं लगायेगा। दरअसल ‘काव्यम् शास्त्रम् रसिकम्’ की तथाकथित चौथे दशक की अवधारणाओं के हैंग-ओवर में लिप्त आलोचक भले ही संस्मरण, यात्रा-वर्त्‍तांत, व्यंग्‍य और सिनेमा को साहित्य के हाशिए पर खड़ी विधा मानकर नाक-भौं सिकोड़ते रहे हों, हिन्‍दी साहित्य का गोवर्धन इन्हीं विधाओं के लेखकों ने ही थामा है और लघु-पत्रिकाओं के संसार में अपनी सक्रिय उपस्थिति से पाठकों को सदैव खुशदम करते रहे हैं। आज हर पाठक अपने हाथ आई लघु पत्रि‍का की अनुक्रमणिका पर निगाह मारते वक़्त बाईं और कहीं संस्मरण और दाईं और कहीं कान्‍ति‍ कुमार का नाम देखना चाहता है।

‘लौट कर आना नहीं होगा’, ‘जो कहूँगा सच कहूँगा’, और ‘अब तो बात फ़ैल गयी’ के रूप में रोचक, चित्‍ताकर्षक और ज़र्रा-ज़र्रा पठनीय संस्मरणों की त्रयी लिखने वाले ‘संस्मरण किंग’ कान्‍ति‍ कुमार एक बार फिर अपनी उसी धार और उसी तेवर के साथ ‘बैकुंठपुर में बचपन’ के जरिये उपस्थित हुए हैं। फर्क है तो बस इतना कि जहाँ अब तक वह हमें रामेश्‍वर शुक्ल अंचल, आचार्य रजनीश, शिव मंगल सिंह सुमन, हरिशंकर परसाई, शरद जोशी जैसे नामवरों के बहुविध आयामों से परिचित कराते रहे हैं, इस बार उन्होंने अपने संस्मरणों के केन्‍द्र में समाज के उस तबके को रखा है, जिसकी समाज में उपस्थिति तो है, लेकिन पूरी खामोशी के साथ। यह वह वर्ग है जहाँ केवल हारी-बिमारी में ही फल खाये जाते हैं, जहाँ केवल त्योहार के दिन ही जुआ खेला जाता हैं, जहाँ शादी-ब्याह में कपडे़ खराब होने की परवाह किये बगैर पीठ पर हल्दी के छापे मारे जाते हैं और जहाँ मेहमान के लिये घर में लाई गई मिठाई का पैकेट मेहमान के रवाना होने से पहले कूडे़दान के हवाले कर दिया जाता है। ये वे  लोग हैं, जिनमें न तो किसी बडी़ आकांक्षा की घोडी़ कुलाँचे मार रही है, न किसी बडे़ आक्रोश की चिंगारी खदबदा रही है। चालीस और पचास के दशक के भारतीय कस्बाई मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग के जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं को सूक्ष्मता से बयाँ करते इन संस्‍मरणों में तत्कालीन समय और समाज पूरी सघनता से मौजूद है। इन्हें रचते हुए कान्‍ति‍जी ने कभी तालाब के किनारे खडे़ होकर ढेला मारा है तो कभी कमीज उतार कर खुद तालाब में उतरे हैं। इन्हें पढ़ते हुए आम आदमी के जीवन की स्वाभाविक उठापठक को देख कभी पाठक के मुँह से ‘अरे, ये तो अपने जैसे ही हैं’ निकलता है तो कभी किसी का पतन देख यह बात निकलती है-

ऐसे तो न देखो के बहक जाएं कहीं हम,
आखिर तो इक इंसान हैं फरिश्ता तो नहीं हम।

कान्‍ति‍ कुमार के संस्मरणों में जिस प्रकार बचपन की शैतानियाँ हैं, मस्तियाँ हैं, अलसाई दुपहरी में किये जाने वाले प्रयोग और रात के सन्नाटे के रोमांच हैं, साँप को सीता की लट मानकर उनसे छेड़छाड़ की हिम्मत है और चूहों को बिल से खेंच निकालने की निरपेक्षता है, उन्हें वही किशोर हासिल कर सकता है, जो ‘राजा बेटा’ की तरह नहा-धोकर स्कूल पहुँचकर फिर वहाँ से सीधे घर वापस न आए और घर पहुँचकर तुरन्त पट्टेदार पायजामा पहनकर पहले ‘होम वर्क’ और फिर ‘होम के वर्क’ (मसलन बडे़ भाई साहब के कपड़ों की इस्त्री करना या पिताजी के हुक्के में तम्‍बाकू भरना या माँ के चूल्हे के लिये लकडियों की दो फाँक करना जैसे काम) में न जुट जाये। जीवन के तिलस्मी खजाने को कोई ‘रामपुर का लक्ष्मण’ नहीं खोज सकता। इसके लिये तो एक घुमंतू, मनमौजी, अपने परिवेश के प्रति कुछ ज्यादा ही उत्सुक किशोर का जिगर चाहिये।

गाँव के संस्मरण पढ़ते वक्‍त पाठकों को सबसे बडा़ खतरा इस बात का रहता है कि कहीं लेखक के शरीर में यकायक फणीश्‍वरनाथ रेणु की आत्मा न समा जाये। दरअसल होता यूँ है कि लोकप्रिय भाषा में बिल्कुल न समझे जाने वाले या कोई दूसरा ही अर्थ बतानेवाले इन शब्दों से हमारे लेखक कई बार इतने प्रभावित हो जाते हैं कि कई-कई शब्द या वाक्य या मौका लगा तो पूरे के पूरे पैरे पेल देते हैं। ऐसा करते वक्‍त उनका हाथ आँचलिक शब्दकोश पर, सिर आलोचक के कदमों पर और निगाह अकादमी के पुरस्कार पर होती है। लेकिन कान्‍ति‍ कुमार जी का इस प्रकार के अबूझमाड़ में कतई विश्‍वास नहीं है। अव्वल तो वे आँचलिक शब्दों का प्रयोग बहुत विवक से करते हैं, बिल्कुल खीर में चावल की तरह, चावल में कंकर की तरह नहीं। दूसरे, हर ऐसे शब्द को आम बोलचाल की भाषा में व्याख्यातीत भी करते चलते हैं। मसलन किताब में एक अध्याय है- ‘चरकट्टा’, जिसे पढ़कर प्रभाष जोशी का ‘दारूकुट्टा’ याद आ जाता है (हालाँकि प्रभाषजी ने अपने लेखों में ‘घुन्ना’, ‘भेरू’, ‘लड्डूगुरु’, ‘ढेके दिखाना’ जैसे कई मालवी शब्दों का सटीक प्रयोग किया है, लेकिन दिल्ली के भाई लोगों को यह शब्द मन-कर्म और वचन से अपनेवाला लगा। इसलिये न सिर्फ यह शब्द पॉपुलर हुआ, बल्कि प्रभाषजी ‘दारूकुट्टाफेम’ भी हो गये। बावजूद इसके कि उन्होंने कभी दारू छुई तक नहीं।)। बहरहाल वह इस शब्द को खोलकर बताते हैं कि चरकट्टा यानी चारा काटने वाला। इसी चरकट्टे के बारे में वह आगे लिखते हैं, ‘वह घोडे़ को खरहरा करता। खरहरा यानी लोहे की कंघी’। इस किस्म के बारीक विश्‍लेषणों का लाभ यह होता है कि पाठक स्मृतियों के रोचक संसार में डुबकी लगाकर निकलते-निकलते कच्ची माटी से सने देसज शब्दों की पोटली भी उठाए लिये चलता है, जो आगे चलकर उसे भाषाई दृष्टि से समृद्ध करते हैं। बरसों पहले राज कपूर की फिल्म ‘श्री चार सौ बीस’ में ‘प्यार हुआ इकरार हुआ है, प्यार से फिर क्यूँ डरता है दिल’ गीत लिखते हुए गीतकार शैलेन्‍द्र ने ‘रातें दसों दिशाओं से कहेगी अपनी कहानियाँ’ पंक्‍ति‍ लिखी थी। तो संगीतकार शंकर (जयकिशन) ने कहा था कि दिशायें तो चार होती हैं, दस कहाँ से आ गईं। तब शैलेन्द्र ने चार लोकप्रिय, चार पैंतालीस डिग्री पर स्थित, एक आकाश और एक पाताल मिलाकर दस दिशायें बताई थीं। शंकर सहमत तो हो गये, लेकिन उन्होंने टिप्पणी की कि मैं तो समझ गया मगर श्रोता कैसे समझेंगे ? शैलेन्द्र का जवाब था, ‘हमारा काम सिर्फ श्रोताओं का मनोरंजन करना नहीं है, उनकी रुचियों का परिष्कार करना भी है।’ कान्‍ति‍जी भी पाठक को आह्लादित करने के साथ-साथ उनके ज्ञान का संवर्धन करते चलते हैं।

कुछ परिवारों में अब भी ऐसी परम्‍परा है जिसके अंतर्गत घर का मुखिया या ऊँची आवाज वाला सदस्य कोई अच्‍छा साहित्‍य पढ़कर सुनाता है और पूरा परिवार उसका लुत्फ लेता है। बेशक प्रतिशत के लिहाज से ऐसे घरों की संख्या काफी छोटी या यूँ कहें कि लगभग नगण्य होगी, लेकिन फिर भी हर शहर मे ऐसे कुछ घर तो होंगे ही। आमतौर पर ऐसे घरों में संस्‍मरण सुनाते वक्‍त वाचक को इस बात का खुटका (भय) समानांतर रूप से सताता रहता है कि अभी कहीं कोई औरत बेपर्दा होगी, अभी कहीं कोई दुःखी आत्मा ेेे के सफिक्स या प्रिफिक्स के साथ आधे अपशब्द कहेगी, अभी कहीं ढक्कन खुलेगा, अभी कहीं गिलास ढुलेगा, यह डर वैसा ही है जैसा मुश्किल दौरों में भारतीय टीम को बैटिंग करते देख लगता है, अब गये-तब गये-सब गये। ‘बैकुंठपुर में बचपन’ पढ़ते वक्‍त ऐसा कोई भय नहीं सताता। सस्वर रचना पाठ करते समय कहीं भी आवाज मंद करने की, कुछ शब्द या पंक्‍ति‍याँ काटने की जेहमत उठाने की कोई जरूरत नहीं। हो भी कैसे ? आखिर आम आदमी के ये संस्मरण आम आदमी की भाषा में आम आदमी के लिये ही तो लिखे गये हैं। इसलिये इन्हें खुलकर पढा़ जा सकता है। सिर्फ पढा़ ही नहीं, गुना भी जा सकता है और आने वाले कल के लिये सहेज कर भी रखा जा सकता है, क्योंकि ये संस्मरण हमें समाज के अमिताभ बच्चन या सचिन तेंदुलकर जैसे ‘सुपर हीरोज’ की स्थूलताओं से नहीं, बल्कि बैंडमास्टर और मुश्किल खाँ जैसे ‘अनसंग हीरोज’ की सूक्ष्मताओं से परिचित कराते हैं।

पुस्‍तक : बैकुंठपुर में बचपन, पृष्‍ठ : 224
प्रकाशक: सामयि‍क बुक्‍स, 3320-21, जटवाड़ा दरि‍यागंज,
एन.एस. मार्ग, नई दि‍ल्‍ली- 110002

गौरैया का पुनर्वास : कान्तिकुमार जैन

सुबह-सुबह धूप में फुदकती-चहकती गौरैया अब अमूमन दिखाई नहीं पड़ती। यह नन्‍ही-सी चिड़िया दुर्लभ होती जा रही है। गौरैया को लेकर चर्चित संस्‍मरणकार कांतिकुमार जैन का संस्‍मरण-

बचपन में ही जिन पक्षियों से मेरी पहचान हो गई थी, उनमें गौरैया और कौआ प्रमुख हैं। मुझे गौरैया अच्छी लगती है। सहज, शालीन, निराभिमानी और प्रसन्न। वह कोई शोर नहीं करती, न जबरदस्ती स्वयं को आप पर लादती है। वह घरेलू पक्षी है- अहिंसक और शांतिप्रिय। दूसरों की भावनाओं का खयाल रखने वाला कौआ भी घरेलू पक्षी है, पर वह उद्घत और कर्कश है। आप उसका भरोसा नहीं कर सकते। कृष्ण नंद जब आंगन में खेल रहे हैं- माखन रोटी खाते हुए और कौए ने क्या किया ? ‘हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी।’ यह आजकल की चेन स्नैचिंग की तरह का घटिया काम था। गौरैया ऐसा नहीं करती। कौआ बोलता भी तो कैसा है- कांव, कांव कर्कश। गौरैया मृदुभाषिणी है। बहुत हुआ तो चीं-चीं करेगी। अंग्रेजी में ‘टी वी टुट टुट।’ हिन्दी के प्रकृतिप्रेमी कवि सुमित्रानंदन पंत की चिड़िया ‘टी वी टुट टुट’ बोलती है। इन दिनों लोकप्रिय नेताओं और अभिनेताओं के जो ट्विटर छपते हैं, वे यही हैं ‘टी वी टुट टुट।’ कौआ किसी के सिर पर बैठ जाए तो बड़ा अपशगुन होता है। गौरैया के साथ ऐसा नहीं होता। वह तो दो वियोगियों को मिलाने वाला पक्षी है- जायसी ने गौरैया को प्रमाण पत्र दिया है – ‘जेहि मिलावै सोई गौरवा।’ गौरैया के लिए मेरे मन में बड़ा प्यार है।
बचपन में मैंने एक कहानी पड़ी थी। एक राजा की कहानी पर मुझे अब लगता है कि उस कहानी का शीर्षक होना चाहिए था- एक गौरैया की कहानी। गौरैया ने कैसे अपनी अक्ल और लगन से एक किसान की जान बचाई थी और राजकुमारी से उसका ब्याह  करवाया था। आप भी सुनें-
एक राजा था, कहानियां सुनने का बेहद शौकीन, पर उसकी एक शर्त होती थी, कहानी ऐसी हो, जो कभी खत्म न हो। यदि कहानी खत्म हो गई तो कहानी सुनाने वाले का सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा। पर यदि कहानी ऐसी हो, जिसका कभी अंत ही न हो तो पुरस्कार भी बड़ा था। आधा राज्य और राजा की एकमात्र सुन्दर बेटी से विवाह। राज्य के और बाहर के भी अनेक प्रतिस्पर्धी आए। कोई एक रात कहानी कह पाया कोई दो रात। तीन-चार रातों तक कहानी सुनाने वाले भी आए, पर सबका अंत एक ही होता, सिर धड़ से अलग कर दिया जाता। पर आधे राज्य की और उससे बढ़कर राजकुमारी के पाणिग्रहण की संभावना इतनी आकर्षक थी कि लोग सिर हथेली पर रखे खींचे चले आते और बाजी हारकर प्राण गंवा बैठते।
राजा के राज्य में एक युवा किसान भी था। बड़ा विदग्ध, धैर्यवान, समझदार और चतुर। उसने एक रणनीति बनाई और चला आया राजा को कहानी सुनाने। लोगों ने लाख मना किया, पर वह युवक इतना आत्मविश्वास दीप्त था कि जैसे उसे पता हो इस पूरे प्रसंग का अंत क्या होगा? उसने कहानी शुरू की- एक था राजा। राजा ने टोका, तुमको कहानी की शर्त तो पता है न ! कहानी खत्म हुई कि तुम गए काम से। युवक ने राजा को शर्त के उत्तरार्ध की याद दिलाई। राजा ने हुंकारी भरी। युवक ने कहानी का सिरा पकड़ा-
एक था राजा । उसके राज्य की धरती बड़ी उर्वर थी। उसमें बहुत धान होता। राजा ने राज्य में बड़े-बड़े भंडार बनवा रखे थे। उन भंडारों में धान इकट्ठा की जाती। राज्य में सूखा पड़े, अकाल आए तो भी कोई भूखा न मरे। प्रजा तो प्रजा, उस राजा के राज्य में पशु-पक्षी भी बड़े सुखी थे। गौरैया तो जब चाहती, भंडार में आकर दाना ले जाती। एक दिन एक गौरैया आई और भंडार से एक दाना लेकर उड़ गई- फुर्र। फिर एक चिड़िया और आई और एक दाना लेकर उड़ गई- फुर्र। फिर एक चिड़िया और आई और एक दाना लेकर उड़ गई- फुर्र। राजा इस फुर्र-फुर्र से उक्ता रहा था, बोला, ‘कहानी आगे बढ़ाओ।’ भावी दामाद बोला, ‘कैसे बढ़ाएं? राजा के राज्य में न धान की कमी थी, न गौरैयाओं की।’ उसने फिर फुर्र-फुर्र शुरू  की। एक रात बीती, दूसरी बीती, तीसरी के बाद चौथी आई। अब राजा को गुस्सा आ गया, कहानी आगे बढ़ा, नहीं तो तेरी गर्दन धड़ से अलग हो जाएगी। किसान चतुर था। उसने कहा शर्त तो यही है कि जब तक कहानी खत्म न हो, तब तक आप कुछ नहीं कर सकते। उसने फिर शुरू किया- एक गौरैया आई और एक दाना लेकर उड़ गई- फुर्र। राजा को पसीना आ गया। समझ गया कि इस बार किसी चतुर आदमी से पाला पड़ा है। आखिर में हार कर राजा ने उस चतुर युवक को अपना आधा राज्य सौंप दिया और राजकुमारी के साथ उसके सात फेरे करवाए।

बचपन की यह कहानी मेरा पीछा नहीं छोड़ती। मैंने इस कहानी से यह सीखा कि आदमी में धैर्य हो और वह थोड़ी समझदारी से काम ले तो जीत उसी की होती है। उसके सहायक  भी भरोसे के होने चाहिए। गौरैया आदमी की सबसे अच्छी दोस्त है। वह संकट में आपका साथ देती है। चीन में वहां के नेताओं ने हरित क्रांति के फेर में एक  नारा दिया था- ‘एक गौरैया मारो और एक चवन्नी ले जाओ।’ एक चवन्नी के लालच में वहां की गौरैया की आबादी बहुत कम हो गई। फलस्वरूप खेती के दुश्मन  कृमि-कीटों की संख्या बढ़ गई। चीनी नेताओं को अपनी गलती समझ में आई। उन्होंने अपनी नीति बदली और देश में कृषि उत्पादन की वुद्घि के लिए उन्हें  गौरैयाओं का पुनर्वास करना पड़ा।
बचपन की प्यारी गौरैया का मैं कुछ भला कर सकूं, इसका मौका पिछले साल मुझे अनायास ही मिला। विगत वर्ष सितंबर-अक्टूबर की एक सुबह मैंने देखा कि मेरे घर की बैठक झड़ चुकी थी, फिर उसमें खिड़की के नीचे ये तिनके कहां से आए? पत्नी ने बताया कि ये तिनके उस घोंसले के हैं, जो गौरैया इन दिनों खिड़की की मच्छर जाली और कांच के बीच बना रही है। चिड़िया अपनी चोंच में एक तिनका दबाकर लाती और बड़ी जुगत से खिड़की की मच्छर जाली और कांच के बीच जमाती। उसका चिड़ा भी इस काम में उसकी मदद कर रहा था। मैंने कहा कि उसका घोंसला अलग करो, इससे बैठक की साफ-सफाई में दिक्कत होती है, पर पत्नी मुझसे सहमत नहीं हुई। पत्नी ने बताया कि पिछले साल चिड़िया ने़ अपना घोंसला सामने के  प्रवेश द्वार पर लगी चमेली में बनाया था, पर जब चमेली से आंगन में कचरा बढ़ने लगा तो चमेली का वितान अलग करना पड़ा था। वितान अलग हुआ तो गौरैया का घोंसला भी उजड़ गया। अब गौरैया दंपत्ति अपने आशियाने के लिए सुरक्षित स्थान की तलाश में था। लगता है उसे खिड़की के कांच और मच्छरजाली के बीच का ठिकाना सुरक्षित लगा। अब उसे उजाड़ना ठीक नहीं। घोंसला मिटेगा तो बेचारी के अंडे कहां होंगे? वह आसन्न प्रसवा है। फिर उसके चूजे कहां जाएंगे?
पत्नी गौरैया के मातृत्व को लेकर चिंतित थी। मुझे उसकी चिंता सही लगी। मुझे लगा सुरुचि और व्यवस्था के नाम पर किसी का घर-बार उजाड़ना ठीक नहीं। हमने उस साल घर की पुताई नहीं करवाई। पुतैया ने कहीं घोंसले को उखाड़ दिया तो, वहां कोई खतरा मोल नहीं लिया जा सकता।
एक दिन सबेरे हम लोग चाय पी रहे थे कि घोंसले से चीं-चीं की आवाजें आईं। गौरैया के अंडे फूट गए थे। मां प्रसन्न थी, पिताजी भी अपने पितृत्व की खुशी में फुदक-फुदककर नाच रहे थे। पत्नी ने आंगन में एक सकोरे में पानी भर दिया और मुरमुरे फैला दिए थे।
अम्माजी आतीं, चोंच में दाने समेटतीं और चूजों को दाना खिलातीं, उसे चोंच में भरकर पानी ले जाते भी हमने यह चोंचलेबाजी देखी। पर यह चोंचलेबाजी बहुत दिनों तक नहीं चली। चूजे बड़े हो गए, वे अपने पर खोलने लगे, घोंसले से बाहर उड़ने लगे, खुद दाने चुगने लगे और चोंच भी तर करने लगे। चिड़िया और चिड़े ने  उन्हें इस लायक बना दिया कि वे अपनी देखरेख स्वयं कर सकें।
एक दिन हमने देखा गौरैया का आशियाना खाली है। अब हमारी बैठक में तिनके नहीं गिरते। अब हम खिड़की के पल्ले खोलने लगे हैं। थोड़ी-सी संवेदना से हमने गौरैया की एक पीढ़ी को बचा लिया।
एक विस्थापित गौरैया का पुनर्वास कर हमें बड़ी खुशी हुई। पत्नी ने उसके बाद यह नियम ही बना लिया है कि वह रोज सबेरे आंगन में रखे सकोरे में पानी भर दे और नीचे मुरमुरे, कनक बिखेर दे। आओ गौरैया आओ, पानी पियो और दाना खाओ। आखिर तुमने एक युवा की जान बचाई और राजकुमारी से उसकी शादी करवाई थी। उस किसान का जो तुमने भला किया था, उसका प्रतिदान संभव नहीं है, पर तुम्हारे लिए हम जो भी थोड़ा-बहुत कर सकें, हमें करना चाहिए।



एक पहाड़ी मैना की मौत : कांतिकुमार जैन

विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई पहाड़ी मैना को लेकर प्रसिद्ध लेखक कांतिकुमार जैन का संस्‍मरणात्‍मक आलेख-

पहाड़ी मैना की पूरी प्रजाति के ही विलुप्ति का शिकार होने की आशंका है। पहाड़ी मैना जितना निरीह, सुकुमार और विलक्षण प्रतिभासंपन्न प्राणी विश्व में शायद ही कोई दूसरा हो। आधी बित्ते से भी छोटा परिंदा जिसे आप अपनी हथेली पर बैठा लें, में और सब कुछ तो सामान्य मैना जैसा है पर इस नन्ही-सी जान में प्रकृति से पता नहीं कैसी अनुकरण की क्षमता मिली है कि वह मानव द्वारा उच्चरित ध्वनि की हूबहू नकल कर सकती है, बिना किसी अभ्यास या प्रशिक्षण के। आप बोलिए और पहाड़ी मैना उसकी नकल करती चली जाएगी, जैसे किसी ने उसके गले में कोई टेप-रिकॉर्डर फिट कर दिया हो। यह मैना केवल छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के पहाड़ों में ही पाई जाती है, इसलिए इसे बस्तरिहा मैना भी कहते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने इसकी अनन्यता को स्वीकृति प्रदान करने के लिए इसे राज्य के पक्षी वर्ग का प्रतीक घोषित किया है। राज्य के अन्य प्रतीक चिह्न  हैं, पेड़ों में साल और पशुओं में अरना भैंसा। अरना अर्थात जंगली भैंसा। पक्षियों में तोता ही एक ऐसा जीव माना जाता है, जिसके मनुष्य की बोली की नकल करने के सैकड़ों किस्से हमारी लोक-कथाओं और महाकाव्यों में भरे पड़े हैं। जायसी के पद्मावत के हीरामन को कौन नहीं जानता ? शुक-सारिका अपने प्रेमालाप के लिए प्रसिद्ध हैं, पर शुक को सिखाना पड़ता है, पहाड़ी मैना को मनुष्य की बोली का अनुकरण करना सिखाना नहीं पड़ता है। पहले के कलारसिक अपने घरों में शुक भी पालते थे और सारिका भी।
बस्तर के जंगलों में जो सारिका या मैना पाई जाती है उसकी नकल सुनकर बड़े-बड़े ध्वनि विशेषज्ञ चकरा जाएं। भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जब बस्तर के दौरे पर आईं थीं, तब वे ओरछा और नारायणपुर भी गई थीं। यह वही क्षेत्र है जो इन दिनों नक्सलवादी उथल-पुथल के लिए समाचारों में छाया रहता है। किंवदंती है कि इंदिराजी ने नारायणपुर के विश्रामगृह में जब अपनी ही आवाज सुनी तो वे कौतूहल से भर गईं। यहां मेरी आवाज में बोलने वाला कौन है? उनके सामने पिंजरबद्ध बस्तरिका मैना प्रस्तुत की गई। इंदिराजी को विश्वास नहीं हुआ। वहां के वन अधिकारियों ने पहाड़ी मैना की मानव ध्वनि अनुकरण विलक्षणता के बारे में बतलाया। पर उन्हें विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने मैना से स्वयं बातचीत की… यह क्या? मैना उनके संवादों को ज्यों का त्यों, उसी आरोह-अवरोह और बलाघात में दुहरा रही है। इंदिराजी ने जानना चाहा कि इसे पहाड़ी मैना क्यों कहते हैं ? क्योंकि ये पहाड़ों में रहती हैं, केवल बस्तर के पहाड़ों में। क्या कोई मैदानी मैना भी होती है?
हां, होती है पर उसे कौंदी मैना कहते हैं। कौंदी अर्थात् गूंगी। जब मैं बस्तर के मुख्यालय जगदलपुर के महाविद्यालय में हिंदी का प्राध्यापक होकर पहुंचा तब तक पूरे बस्तर में इंदिराजी और पहाड़ी मैना के किस्से किंवदंती बन चुके थे। यहां विद्यालय का मेरा एक विद्यार्थी था प्रफुल्ल कुमार सामंतराय। प्रफुल्ल का गला बेहद मीठा था, उसकी अंग्रेजी बहुत अच्छी थी, उसे गालिब के सैकड़ों शेर कंठस्थ थे। वह विख्यात अंग्रेजी साप्ताहिक ब्लिट्ज का क्षेत्रीय संवाददाता था। वह बैलाडिला की अयस्क खदानों की रिपोर्टिंग के लिए वन्यांचल के सुदूर क्षेत्रों में जा रहा था। तब वह मुझसे मिलने आया। सर, मैं बैलाडिला से आपके लिए क्या लाऊं?
पत्नी के मुंह से बेसाख्ता निकला- माड़ी मैना।
माड़ी बस्तर की बोली में पहाड़ी को कहते हैं। बस्तर का दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र इसीलिए अबूझमाड़ कहलाता है। हफ्तेभर बाद जब प्रफुल्ल अबूझमाड़ का दौरा कर लौटा तो बांस की तीलियों से बना एक सुंदर-सा पिंजरा उसके साथ था। उस पिंजरे में एक सुकुमार पक्षी था- पहाड़ी मैना। पक्षी बड़ा निरीह-सा लगा, पर जब प्रफुल्ल ने हल्बी में उससे बात की तब उस सुकुमारी मैना ने उसको ज्यों-का-त्यों दुहरा दिया। यदि हमारी पीठ प्रफुल्ल की ओर होती तो हम समझते कि यह मैना नहीं, प्रफुल्ल ही बोल रहा है।
हमने प्रफुल्ल की बताई हुई सारी सावधानियां बरतीं, खाने के लिए चावल की कनकी, कोदों के दाने, घास के बीज। देखो, यहां शोर मत करो, यहां बस्तर की जादूकंठी मैना सो रही है। हम लोगों ने उस विलक्षण मैना का नाम भी रखा- अरण्यप्रिया, दंडकारण्य की उस अनन्य मैना का दूसरा नाम होता भी क्या ? पर उसे देखने के लिए पूरा महाविद्यालय हमारे यहां जुट आया। पर उसे देखने
के लिए पूरा महाविद्यालय हमारे यहां जुट आया। जो आता वह बरांडे में टंगे पिंजरे में झांकता, कोई सीटी बजाता, कोई हंसता। चौथे दिन मैना कुछ लस्त-सी दिखी। पांचवें दिन सबेरे हमने जब दरवाजा खोला तो पिंजरा यथावत था, मैना भी सो रही थी, पर उसकी देह निस्पंद थी- रात बड़ा कोहरा था, सर्द हवा चली थी। मैना के गले में कांटे उग आए थे और ठंड से वह प्रकृति प्रिया अकड़ गई थी। लेकिन मुझे लगा न तो वह ठंड से अकड़ी थी, न ही कोहरे से निस्पंद हुई थी। पिंजरे का बंधन उसे रास नहीं आया था। नगर का कृत्रिम जीवन उसे भारी पड़ गया था, वह वन की स्वच्छंद विहारी थी, शहर में रहना उसे रास नहीं आया, मनुष्यों के संपर्क ने उसके जीवन में जैसे विष घोल दिया हो। दंडकवन की सुरम्य प्रकृति की बाल विहारिनी की मानव निर्मित कारा में मृत्यु हमारे बस्तर प्रवास की सबसे मर्मांतक घटना थी। हम लोग उस मैना को जीवनभर नहीं भूल पाए, उसके बाद हमने किसी भी पक्षी को बंदी नहीं बनाया।
पहाड़ी मैना की प्रजाति अब विलुप्ति के कगार पर है। उसकी मानव ध्वनि की असाधारण अनुकरण क्षमता ही उसकी सबसे बड़ी शत्रु सिद्ध हुई। मुंबई, दिल्ली, पुणे, हैदराबाद जैसे महानगरों के कला रसिकों की वह इतनी बड़ी पसंद सिद्ध हुई कि दूर-दूर के व्यापारी उसे खरीदने के लिए बस्तर आने लगे और विदेशों में भी उसका निर्यात होने लगा। अबूझमाड़, बैलाडिला, ओरछा, छोटे डोंगर, बारसूर, कुटमसरे की पहाडिय़ां पहाड़ी मैना का प्राकृतिक रहवास हैं। नागर जलवायु और असंयमित आहार उसे रास नहीं आया। ध्वनि प्रदूषण उसके लिए महारोग से कम नहीं। उसके गले में कांटे उगे नहीं कि उसकी स्वर तंत्रिका नष्ट हो जाती है। पहाड़ी मैना को संरक्षण की सख्त जरूरत है।