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कमल जोशी- एक यायावर का अचानक चले जाना : ज़हूर आलम  

कमल जोशी

हमेशा चलते रहना ही उसने अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया था। उसने कभी विराम नहीं लिया और 3 जुलाई को बिना किसी को बताए वह सबसे लम्बी अनजान और एक अनंत यात्रा पर निकल गया। बचपन में ही लग गई एक्यूट  अस्थमा की भयंकर बीमारी से लड़ते हुए उसने पहाड़ का चप्पा-चप्पा छान मारा था, चाहे वो रूपकुण्ड और नन्दा राजजात की कठिन यात्रा हो या लद्दाख और छोटा कैलाश की अनंत ऊँचाइयों को पार करना। कम आक्सीजन के कारण जहां बड़े‎-बड़े‎ चौड़े सीने वाले महारथियों की भी साँस फूल जाती थी, वहां दृढ निश्चयी जिद्दी दमे का मरीज कमल उन ऊँचाइयों और दुर्गम पहाड़ों को हँसते–हँसते पार कर लेता था,  क्योंकि प्रकृति और पर्वत की ऊँचाइयों से उसे अगाध प्रेम था और इनके साथ हो रहे दुर्व्यवहार के प्रति गहरी चिन्ता थी।

उत्तराखण्ड के पहाड़-गाँव-लोगों की स्थिति को जानने समझने के लिए 1974 , 1984 , 1994 , 2004  व 2014 में डा० शेखर पाठक के नेतृत्व में पहाड़ संस्था की ओर से आयोजित ‘अस्कोट-आराकोट अभियान’ की लम्बी यात्राओं का वह अगुवा साथी रहा। उत्तराखण्ड के सभी राजनीतिक, समाजिक और सांस्कृतिक आन्दोलनों/अभियानों में उसने बढ़-चढ़‎ कर अपनी महत्वपूर्ण‎ हिस्सेदारी निभाई।
कमल जोशी अपनी धुन का पक्का और बहुत जिद्दी इंसान था। बचपन में ही उसे एक्यूट अस्थमा का जानलेवा रोग लग गया था।  दुनिया भर के इलाजों के बावजूद डाक्टरों ने जवाब दे दिया था कि वह बहुत दिन नहीं बचेगा, पर उसने जिद पकड़‎ ली कि वह जियेगा ! …और बिमारी से लड़ते हुए उसने 63 साल की एक भरपूर जिंदगी बिना किसी रोक-टोक के आजादी के साथ बिल्कुल अपनी तरह से जी ! वह कहीं रुका नहीं। बस चलता रहा। वह कहता भी था, “चलना ही मेरी खुराक है और जिन्दगी भी। जिस दिन रुक गया, समझ लो…।’’

वह सबसे बेलौस तरीके से और खुलकर मिलता था। आप-जनाब वाली ‍औपचारि‍कता उसे बिल्कुल पसन्द नहीं थी। इसीलिए नये-अंजान लोगों से भी वह पलभर में ही घुल-मिल जाता था और उनका दोस्त बन जाता था। इसीलिए उस पारदर्शी दोस्त के मित्रों/जानकारों की इतनी लम्बी फेहरिस्त है कि गिनना मुश्किल होगा। बेबाकी का यह आलम था कि वह किसी के दबाव में कभी नही आता था- चाहे वह कोई भी तुर्रमखाँ हो। उसे खुले दिमाग‎ के लोग ही पसंद थे। बकौल हरजीत-
जो तबीयत हरी नही करते
उनसे हम दोस्ती नही करते

केमिस्ट्री में एमएससी करने के बाद रिसर्च करने के लिए वह कुमाऊँ‎ विश्वविद्यालय नैनीताल आया था। तीन साल गहन शोध करने के बाद जब थीसिस लिखी‎ जा रही थी, अन्तिम चेप्टर मे किसी बात पर गाईड से उसके विचार नही मिले और उसने एक झटके में रिसर्च को तिलांजलि दे दी और फोटोग्राफी, पत्रकारिता, कविता, चित्रकला, सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यों और यायावरी में अपना जीवन झोंक दिया। फिर कभी पीछे मुड़कर  नहीं देखा।
बेबाक पत्रकारिता, लेखन और फोटोग्राफी में उसकी नजर का और सोच का कोई जवाब नहीं था। कमल एक बहुत ही उच्चकोटि का लाजवाब फोटोग्राफर था। यह उसकी नजर का कमाल था कि उसके अधिकांश फ्रेम और कम्पोजीशन पेंटिंग जैसे लगते थे।  दिल्ली में एक बार वह मुझे मशहूर फोटोग्राफर रघु राय के स्टूडियो में ले गया था। कमल और रघुराय के बड़े‎ बेतकल्लुफ ताल्लुकात थे। कमल और उसकी फोटोग्राफी के प्रति रघु राय का सम्मान देख मैं दंग था।

अस्सी के दशक में नैनीताल आने के बाद युगमंच, पहाड़, नैनीताल समाचार और उत्तरा पत्रिका से उसने अपना गहरा नाता जोड़ लिया था। जसम और युगमंच परिवार का वह स्थायी‎ सदस्य बन गया था। नाटकों, नुक्कड नाटक समारोह, कवि सम्मेलन‎, होली महोत्सव, फिल्म फेस्टिवल आदि में नैनीताल से बाहर चले जाने के बावजूद वह हमेशा अपनी उपस्थिति और भागीदारी निभाता रहा। डा. शेखर पाठक के सम्पादन में ‘ पहाड़’ और डा. उमा भट्ट के सम्पादन में निकलने वाली महत्वपूर्ण पत्रिका ‘ उत्तरा’ में उसका सहयोग अतुलनीय था।

देहरादून से संजय कोठियाल के सम्पादन में निकलने वाली मासिक पत्रिका ‘युगवाणी’ में उसकी भूमि‍का बहुत महत्वपूर्ण थी। मुख्य पन्ने पर उसके द्वारा खींची एक बोलती हुई तस्वीर और उसी पर कमल का आलेख युगवाणी को नई ऊँचाइयां प्रदान कर रहे थे। अब उसके जाने के बाद युगवाणी का मुख्य पन्ना सूना हो जाएगा- जिसका पाठक महीने भर इंतजार करते थे, जिसमें पहाड़ की किसी जुझारू महिला, ढाबे वाले या किसी मासूम पहाड़ी‎ बालक-बालिका की तस्वीर और उसी से जुड़ी पहाड़ के पहाड़ से जीवन, कठोर परिश्रम और जीवन्तता बाल सुलभता पर एक विचारोत्तेजक स्टोरी होती थी। वह अपनी यात्राओं के पड़ा‎वों से उन सच्ची स्टोरियों को उठाकर कागज पर बेहतरीन लेखन शैली में उतार देता था।
वह अपने समाज के लिए प्रेम से सराबोर बहुआयामी प्रतिभा थी। जिन्दगी का अनूठा चितेरा और बेहतरीन इंसान था। उसकी बेबाक हँसीं हमेशा कानों में गूंजती रहेगी।

पिछले साल वह मेरे व मुन्नी के साथ हमारा गाइड बन कर उत्तरकाशी से हरसिल और गंगोत्री तक गया था। इस साल यमनोत्री की यात्रा का प्रोग्राम था, पर कमल वादा तोड़‎कर किसी और यात्रा पर चला गया !

सोबन ब्वौडा! असली आज़ादी तो तूने दिलाई : कमल जोशी

कमल जोशी

कमल जोशी जी से 20 जून को कोटद्वार में उनके घर पर मुलाकात हुई थी। मेरे आग्रह पर उन्‍होंने ‘लेखक मंच’ के लि‍ए छह रचनाएं दे दी थीं। अन्‍य रचनाएं देने का वादा कि‍या था। उनमें में से एक ‘रंगीली की खि‍चड़ी’ 26 जून को प्रकाशि‍त कर दी थी। अब पढ़ि‍ए उनकी एक और रचना-

हिमालय खूबसूरत दिख रहा था।

उखड़ती साँसों के बावजूद मैंने ट्राय-पोड लगाया, कैमरा सेट किया और फोटो खींचने लगा। हिमालय मनमोहक अदाएं दिखा रहा था। एक सुन्दर फोटो भी ट्रैकिंग की सारी थकान मिटा देती है। इन्हीं दृश्यों के लिए भी तो मैं यात्राएं करता हूँ।

मैं खतलिंग ग्लेशियर के इलाके में था। कल सुबह ही अपनी बाइक पर आया था। अपनी आदत और जिद के अनुरूप रेहा पिछली सीट पर कब्जा जमाये थी। चंबा से बूढ़ा केदार का रास्ता इतना खूबसूरत था कि जो रास्ता चार घंटे में कट जाना चाहिए था, उस पर ही हमने सारा दिन लगा दिया था। ज्यादा समय तो टिहरी डैम के नीचे दबे हुए टिहरी के यादों के बारे में बात करने में ही कट गया। कितनी बार टिहरी आया था और जिन सड़कों पर चला था, फटफटिया दौड़ाई थी, आज वो सब पानी के नीचे दबी थीं, जाने कैसी होंगी वे सड़कें अब? पानी के साथ आई गाद में दब गयी होंगी! …पर यादें हैं, जो हमेशा तैरती ही रहती हैं!

घनसाली के बाद घुमावदार रास्ता। दोनों तरफ कभी चीड़ की तो कभी मिलीजुली प्रजाति के पेड़। हवा में ठंडी खुनक और साथ में करेले के साथ नीम वाली तर्ज पर कवि हृदया रेहा। हर पचास कदम पर बाइक रोकने को कहती। रास्ते को महसूस करती, पेड़ों से बतियाती रेहा। किसी शहर में पले-बढ़े को इस रूप में देखना मुझ जैसे पहाड़ी को भला ही लगता है, और असमंजस भी होता है कि‍ हम पहाड़ी ही क्यों पहाड़ का इतना असम्मान करते है। शायद पहाड़ में रहने के दुःख और कठिनाइयां हमें इसकी सुन्दरता को अनदेखा करने को मजबूर कर देती हैं।

रेहा के साथ एक पंगा और है। वह जहां कहीं भी सड़क के किनारे के ढाबे में किसी औरत को काम करता देखती है, तो बिना रुके नहीं रहती। चाय पीनी तो लाजिमी है ही (मैं अपने प्रिय फैन-बिस्कुट का भक्षण भी करता हूँ), उस महिला से बात कर उसकी जिन्दगी और परिस्थितियों में झांकने की भी कोशिश करती है। कई बार मुझे दुभाषिये का काम भी करना होता है। ऐसे ही चमियाला से पहले एक ढाबे पर एक महिला चाय बना रही थी। रेहा ने मेरा कन्धा दबाया। मैने इशारा समझा और ढाबे पर बाइक रोक दी। चाय की जरूरत तो मुझे भी थी। उतरते ही चाय का ‘आर्डर’दे दिया गया। मेरी कमजोरी को देखते हुए रेहा ने महिला से पूछा, ‘‘क्‍या फैन भी हैं?’’ महिला ने ‘हाँ’ कहा तो रेहा ने फैन लेकर मुझे पकड़ाए और ताकीद दी, ‘‘तुम अपना मुंह फैन खाने में व्यस्त रखना, मैं जरा बात भी करती हूँ।’’ मैं निरीह बकरे की तरह फैन चबाने में व्यस्त हो गया। रेहा महिला के साथ बातें करने लगी। पता चला कि ढाबा मालकिन महिला का नाम सावित्री है और यह ढाबा उसके पति ने खोला था। पर ढाबा खोलते ही पति के यार दोस्तों ने यहां कब्जा जमा लिया।

‘‘ग्राहक कम आते थे और साथ के लुंड ज्यादा…मवासी तो घाम लगनी ही थी।’’ दुखी सावित्री ने बताया, ‘‘दारूड़ी भी गया था।’’

सावित्री ने पति को समझाया, दोनों बच्चों की जिम्मेदारी के बारे में बताया, ‘‘पर दारूड़ी किसी की सुनता है क्या?’’ ये सवाल उसने रेहा से ही कर डाला।

‘‘क्‍यों, अब कहाँ है पति।’’ रेहा ने जिज्ञासावश पूछा।

‘‘अरे कहाँ,  हमें नरक में छोड़ कर खुद भाग्याँन हो गया।’’ बिना भाव बदले सावित्री बोली, ‘‘ कर्जा ऊपर से छोड़ गया। मैं तो घर पर ही रहती थी।’’ उसने जोड़ा। फिर बताया कि जब कर्जा के तकाजे वाले आये और उन्हें लगता कि‍ अब कर्जा वापस नहीं मिलेगा, तो वे उसके पति को ही गाली देने लगते। पति तो पति ही था, सावित्री की नजर में। उसके लिए गाली कैसे सहती। इसलिए उसने तय किया कि‍ वह खुद ढाबा चला कर कर्जा उतार देगी। और उसने ऐसा किया भी। उसकी कर्मठता से विभोर रेहा ने उसे गले लगा लिया। मैं सिर्फ ‘शाबास भुली’का ही गंग्याट कर पाया।

रात को हम बूढ़ाकेदार ही रुके। यहाँ मेरे परिचित बिहारी भाई का आश्रम भी है, पर रात को उनको परेशान करना उचित नहीं समझा, तो एक छोटे से होटल में रहे।

सुबह चिड़ियों की चहचाहट से नीद खुली। बाइक को बुढा़केदार में ही छोड़ दिया गया। हम अगुंडा होते हुए  महासर ताल के रास्ते लगे। हमारा कोई निश्चित जगह जाने का कार्यक्रम नहीं था। उत्तराखंड, अरे नहीं तब उत्तराँचल, बने एक साल हुआ था यानी ये वृतांत 2001 का है।

मैं उत्तराखंड के बारे में लोगों की राय जानने को उत्सुक था इसलिए घूम रहा था। जब मैं नयी टिहरी में था तो रेहा का पता चला कि‍ मैं नयी टिहरी में हूँ, तो वह बिना बताये चंबा आ गई- इस फरियाद कम धमकी ज्यादा के साथ कि वह घूमना चाहती है। फिर क्या था, हम सतत आवाराओं की तरह निकल पड़े थे।

हम महासर के ऊपर एक धार में पहुंचे थे कि‍ मुझे हिमालय दिखाई दिया। मैंने ट्राइ-पौड तान दिया- फोटो के लिए। पिट्ठू लिए हुए रेहा भी पीछे से आकर पसर गई। फोटो खींचने की जल्दी इसलिए थी कि कहीं कोहरा खूबसूरत हिमालय को ढक न दे।

मैंने फोटो लीं, लाजिमी था कि रेहा के कुछ पोज उस ब्रेक ग्राउंड में भी लूं क्योंकि‍ खाने का सामान उसी के पिट्ठू में था। अगर यह न करता तो ये भी हो सकता था कि रेहा खुंदक में मुझे खाने के लिए कुछ ना दे या कम दे।

पेट में कुछ जाने के बाद आसपास देखा। लगभग आधे किलोमीटर की दूरी पर एक व्यक्ति बैठा था। आसपास गायें थीं। वह यहाँ इस छोटे से मैदान में पशु चराने ही आया था। वह भी हमें देख रहा था। हमारा रात को यहीं रहने का इरादा था क्योंकि‍ पास ही छोटा पानी का नाला भी था और कुछ दूरी पर छाने भी। रात काटने के लिए सुरक्षित जगह थी। उस व्यक्ति के अलावा और कोई आसपास नहीं था। मैं उससे ही जगह की जानकारी लेने गया। नजदीक पहुँच कर जैसे ही मैं उसको अभिवादन करता, उसने कहा, ‘‘गुड मोर्निंग।’’  मैं अचकचा गया। इस तरह के अंग्रेजी अभिवादन की आशा मुझे नहीं थी। वह एक बुजुर्ग थे और छोटी सी छड़ी लेकर एक पत्थर पर बैठे थे। वह लगभग बहत्तर-पिछत्‍तर साल के थे। मैंने भी ‘गुड मार्निंग’ कह कर उनको जवाब दिया और बिस्कुट का पैकेट खोल कर उनकी और बढा़या। पहले तो उन्होंने मना किया, पर रेहा न जाने कब पीछ-पीछे आ गई थी।  उसने कहा कि‍ ले लीजिये ना ताऊ जी। तो उन्होंने एक बिस्कुट ले लिया। उन्होंने हमें बैठने को कहा तो हम पास के ही पत्थर में बैठ गये। मैंने देखा कि‍ वहां पर एक पुरानी ब्रिटिश टाइम की गरम डांगरी रखी है। संयोग से उस पर जो मोनोग्राम था, उस पर रॉयल आर्मी जैसा कुछ लिखा था, जो बहुत ध्यान से पढ़ने पर ही पता चल रहा था। मैंने पूछा कि‍ यह डांगरी आपके पास कहाँ से आई तो वह मुस्कराए और बोले कि‍ यह मेरी ही है। मैंने उनसे पूछा कि‍ वह ब्रिटिश फौज में थे, क्या। उन्होंने हामी भरी और कहा, ‘‘मैंने  वर्ल्ड वार भी लड़ा है। यह तब की ही है।’’

मैंने उनसे उनके फौजी जीवन के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि‍ वह आजाद हिन्द फौज में भी थे। अब दिलचस्पी बढ़नी स्वाभाविक थी। वह तो जिंदा इतिहास थे। रेहा ने स्वाभावानुसार डायरी निकाली और वृद्ध जी से नाम पूछा। उन्होंने अपना नाम सोबन सिंह बताया। उनसे बातें शुरू हुईं। कहानी दिलचस्प थी। उन्हीं के शब्दों में…

‘‘मैं जब चौदह साल का था, तो देश (मैदान) के बारे में बहुत सुना था। पौड़ी जिले के एक फौजी थे। वह जब छुट्टियों में आये तो अपनी बहन के घर हमारे गाँव आये। उनकी चमक-दमक देखकर हम बहुत प्रभावित हुए। तय कर लिया कि‍ फौज में भर्ती होंगे। पर टिहरी में तो भरती होती नहीं थी। हमें पता चला कि‍ लैंसडाउन में फौज की भरती हो रही है। मैं और मेरे दो दोस्त घर से बिना बताये लैंसडाउन के लिए भाग गए। रात को जिस गाँव में जाते और कहते कि‍ फौज में भर्ती होने जा रहे हैं तो लोग खाना खिला देते। सोने-ओढ़ने को दे देते। तब जमाना दूसरा था, पराया बच्चा भी अपना होता था। तीन दिन में लैंसडाउन पहुंचे। डर तो रहे थे।’’ सोबन सिंह जी ने बताया। लैंसडाउन पहुँचने पर वे लोग सीधे फौज के एक संतरी के पास पहुंचे और उसे सीधे सल्यूट किया। जब उसने पूछा तो उन्होंने बताया कि‍ हम फौज में भर्ती होने टिहरी से आए हैं। उसने कहा कि‍ परसों सुबह बटालियन ग्राउंड में आना। मैं सबसे छोटा था तो उसने मुझ से मेरी उम्र पूछी। मैंने बताया कि‍ चौदह साल है। वह संतरी बोला, ‘‘तुम्हारी उम्र छोटी है। तुम भर्ती नहीं हो सकते।’’ मैं बहुत दुखी हो गया। मेरी आँखों में आंसू आ गए कि अब घर किस मुंह से जाऊँगा। डर भी रहा था। मेरी हालत देखकर संतरी को दया आ गई।

शायद संतरी को पहले किसी ने इतनी इज्जत से सेल्यूट किसी ने नही किया था इसलिए वह प्रभावित हो गया था। वह बोला, ‘‘ तू पहाड़ी हिसाब से थोड़ा लंबा है। जब तेरी उम्र पूंछे तो अपनी उम्र सोलह साल बताना।’’

गुरुमंत्र पाकर सोबन सिंह खुश हो गए। उनको बीच का एक दिन काटना मुश्किल हो गया। पैसे नही थे, खाना कहाँ से खाएं और फौज की भर्ती की परीक्षा देनी थी। वह उदास बैठे थे। तभी एक काला कोट पहने व्यक्ति उधर से गुजरा। ‘‘हमें पता नहीं था कि‍ काला कोट वकील पहनते हैं और हम कचहरी के रास्ते पर हैं। उसने हमें देखा। शायद हमारे चेहरे पर भूख साफ दिखाई दे रही थी। उसने पूछा कि‍ कौन हो, क्यों बैठे हो। पहले तो हम घबराए कि‍ यह क्यों पूछ रहा है, पर बाद में उन्हें बताया कि‍ फौज में भरती होने आए है।’’

‘‘ भाग कर आए हो।’’ जब उन्होंने पूछा तो हमें काटो तो खून नहीं। हमारे साथ का एक रोने लगा। वह डर से रो रहा था या भूख से पता नहीं। यह मैंने सोबन सिंह जी से नही पूछा।

उन्होंने उसे रोते हुए देखकर पूछा कि‍ पैसे-वैसे हैं तुम्हारे पास! तो इन लोगों ने मना कर दिया।

‘‘जब उन्होंने पूछा कि‍ रात को खाना खाया कि‍ नहीं, तो हम चुप रहे।’’

काले कोट वाले व्यक्ति ने उनसे पूछा, ‘‘क्या भूखे पेट फौज में भर्ती होओगे?’’ फिर उन्होंने जेब से एक रुपिया निकाला और उन्हें दिया और ‘सि‍र्फ खाना खाना’ कहकर चला गए। काले कोट वाला वह वकील इन लोगों को देवदूत सा लगा!

‘‘हम तो उनका नाम भी नहीं पूछ पाए।’’ उस वक्त एक रुपया बहुत होता था। आज के 100 रुपयों से ज्यादा। हमने दो दिन उसी में काटे और तीसरे दिन भर्ती के लिये पहुंचे। उन दिनों आज की तरह कठिन नहीं था, भर्ती होना। अंग्रेजों को तो लड़ने के लिए भेड़-बकरी चाहिए थी। हमारी उम्र, लंबाई-चौड़ाई लि‍खी। मैदान में दौडा़या और वजन उठवाया। फिर एक डॉक्टर ने आला लगाकर कुछ देखा। बस उस समय ही डर लगा। और हम भर्ती हो गए।’’सोबन सिंह जी ने बताया।

‘‘लैंसडाउन में हमारी ट्रेनिंग हुई, नौ महीने के लिए और फिर हमें बरेली भेजा गया। दो महीने बाद ही हमें मलाया (मलेशिया) जापानियों से लड़ने भेज दिया। बम-गोले गिरते थे। पैंट में ही हग-मूत देते थे। बच्चे ही तो थे हम। बाद में हमें जापानियों ने पकड़ लिया। कैदी हो गया। ये सन (उन्नीस सौ) चवालीस  की बात होगी। कैद में हम दिन भर ड्रिल करते थे। जापानी हमसे ज्यादती भी करते थे।

‘‘एक दिन एक हिन्दुस्तानी हवालदार हमारे पास आया कि‍ क्या हम कैद से छूटना चाहते हैं? हमने कहा कि‍ क्या उसके पास भागने का कोई प्लान है। उसने कहा कि‍ भागना नहीं है। अपने देश के लिए लड़ना है। हमने कहा कि‍ वह तो हम कर ही रहे थे। तब उसने कहा कि‍ तुम देश के लिए नहीं, अंग्रेजों के लिए लड़ रहे थे। हमारी समझ में कुछ नहीं आया।’’ सोबन सिंह जी ने बताया।

‘‘एक दिन हमारी बड़ी परेड यानी सब कैदी हिन्दुस्तानी सिपाहियों को एक साथ मैदान में लाया गया। पता चला कि‍ कोई सुभाष बोस भाषण देंगे। हमने सोचा कि‍ जापानी अफसरों के होते हुए कोई हिन्दुस्तानी भाषण देगा- इसका मतलब है कि‍ वह कोई बड़ा आदमी होगा। भाषण में सुभाष बोस ने कहा कि‍ भारतवासी गुलाम हैं।  हमें गुलामी की जंजीर तोड़नी होगी। मेरी समझ में नहीं आया कि‍ गुलाम क्या होता है?. उन्होंने कहा कि‍ हमें देश को आजाद कराने के लिए अंग्रेजों से लड़ना होगा। आजाद हिन्द फौज में भर्ती होना होगा।’’

‘‘बाद में पंजाबी हवालदार ने हमें गुलामी का मतलब समझाया। हमारी आंखें खुली कि‍ हम अब तक विदेशियों के लिए अपनी जान देने पर उतारू थे। हम आजाद हिन्द फौज में आ गए। रंगून, बर्मा में हमने अंग्रेजी फौज के खिलाफ लड़ा। हार गए और हमारे ऑफिसर ढिल्लों को अंग्रेजों ने जेल में डाल दिया था। जंगलों में भटकते रहे। इस डर से कि‍ पकडे़ जायेंगे, तो सजा होगी। हम गांवों में आ गये और सारे कागज फाड़ डाले कि‍ कहीं पकडे़ न जाएँ। देश जब आजाद हुआ, तो हमने समझा कि‍ हमें फौज वापस ले लेगी, पर पता चला की फौजी नियमों से हम बागी थे। कोई पेंशन नहीं। ‘‘हमने और हमारे साथियों ने कई बार सरकार को लिखा कि‍ हम अंग्रेजों के हिसाब से तो बागी थे, पर अपने हिन्दुस्तान के लिए ही तो लडे़ ही थे। हमारी सुध लो। पर कहीं से कोई जवाब नहीं।’’  इसके बाद सोबन सिंह चुप हो गए।

मैंने सोबन सिंह को ध्यान से देखा। यह भी एक स्वतन्त्रता सेनानी था। देश के लिए लड़ा। गोलियों का सामना किया था। यह यहाँ अपनी भेड-बकरियों के साथ जिंदगी बिताने के लिए अभिशप्त है। कुछ स्वतन्त्रता सेनानियों को ताम्र पत्र मिले, पेंशन मिली, उनके बच्चों को और बच्चों के बच्चों को भी रियायत मिली, नौकरी मिली! इस सेनानी का, जीवन के आखिरी मुकाम पर खडे़ सोबन सिंह का सहारा सिर्फ एक बांस की डंडी है….! यह भी तो स्वतन्त्रता सेनानी ही है। मैंने ध्यान दिया कि‍ बातों-बातों में रेहा ने कब सोबन सिंह का हाथ पकड़ लिया है और उसे सहला कर सांत्वना दे रही है। मुझे पता ही नहीं चला। सोबन सिंह उसे प्यार से देख रहे थे।

सोबन सिंह ने मेरी और देखा और कहा, ‘‘उत्‍तरांचल बन गया है। क्या हमारी भी कुछ पूछ होगी!’’ तब मैं कोई जवाब नहीं दे पाया था! सोबन सिंह जी से मिलने के सोलह साल बाद आज यह कह सकने कि‍ स्थिति में हूँ कि उत्तराखंड तो सिर्फ नेताओं और ठेकेदारों के लिए बना है ताऊ जी, आपको पूछने की फुर्सत किसी को नहीं.!

मुझे भी चुप देख कर सोबन सिंह जी ने हिमालय के तरफ देख कर कहा, ‘‘कोहरा साफ हो गया है।हिमालय की फोटो खींचो।’’

मैंने हिमालय की तरफ देखा- मुझे वो बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा था। सोबन ब्वौडा की बात सुनने के बाद मैं खुद को कोहरे से निकाल नहीं पा रहा था।

रंगीली के होटल की खिचड़ी : कमल जोशी

कर्मठ रंगीली।

हालत कुछ-कुछ डिप्रेशन जैसे थे। भारी उदासी घेरे थी। कुछ दिन पहले ही तबियत खराब हुई थी और उससे जल्दी उबर नहीं पा रहा था। पहले भी तबियत खराब होती थी, परन्तु हफ्ते भर में ही खुद को फिट समझने लगता था। इस बार डेढ़ महीना हो गया था। शरीर दुरुस्त नहीं लग रहा था। एक डर सा मन में बैठ गया था कि क्या अब बुढ़ापा आ ही गया। सफेद दाढ़ी और कुल जमा बासठ साल तो शीशा देखते ही चिल्लाने लगते कि‍ भाई तुम बुढ़ापे में कदम रख चुके,  लेकि‍न वह गाना है ना- ‘दिल है के मानता नहीं..,’ की तर्ज पर दिमाग भी अभी तक स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि‍ असलियत तो असलियत है…कब तक सींग कटा कर बछड़ों में शामिल हुआ जा सकता है?

पर आवारागर्दी अजीब लत होती है। इसीलिए डिप्रेशन की सी अनुभूति हो रही थी की- सुख भरे दिन गए रे भैया !

पर जैसा मैंने ऊपर लिखा ही है- ‘दिल है के मानता नही’- मैंने जिंक्स तोड़ने का मन बनाया और तय कर लिया कि चमोली जिले की ओर निकला जाए, जहां इस चाचा का भतीजा मधु है, जो जरूरत पड़ने पर देखभाल कर सकता है- बिना मुंह बनाए।

महीना अक्‍टूबर का था। सुबह हवा में खुनक थी। बादलों के दो बच्चे आसमान में धमा चौकड़ी करने की तर्ज में डराने लगे, पर मैं डरा नहीं और लगभग 6:30 पर फटफटिया स्टार्ट कर चल पड़ा। मूड अभी भारी ही था और मन अन्यमयस्क।

दस बजे के आसपास बुवाखाल पहुंचा, हिमालय भी दिखा, पर मन खिला नहीं। एक होटल में थोड़ा नाश्ता किया और पौड़ी होते हुए श्रीनगर की उतार पार की। श्रीनगर पार करते हुए कई परिचित चेहरे भी दिखे, पर मैंने बाइक रोकी नहीं। और मेरे हेलमेट की वजह से वे मुझे पहचान भी नहीं पाए। सर्र से श्रीनगर भी पार हो गया।

मुझे खाना खाने के लिए घोलतीर पहुँचना था, जहां मधु से मुझे मिलना था। वह दो बजे तक पहुँचने वाला था। इसलिए मेरे पास काफी समय था। मैं अब आराम से धीरे-धीरे फटफटिया चलाने लगा। थोड़ा आगे बढ़ा था कि‍ मुझे दो बच्चे सड़क के किनारे दिखे। दोनों भाई की तरह लग रहे थे। एक की उम्र दस ग्यारह साल और दूसरे की छह-सात साल। मैं आराम से बाइक चला रहा था। बच्चे मुझे देखते रहे। बाइक के बहुत करीब पहुँचने पर अचानक छोटे वाले ने मुझे रुकने के लि‍ए हाथ दिया। मुझे एकदम ब्रेक लगाने पड़े। तब भी थोड़ा आगे निकल गया। मैंने पीछे मुड़ कर उनकी ओर देखा। बच्चों को शायद आशा नहीं थी कि‍ मैं फटफटिया रोक दूंगा। वे सकपका से गए। मैंने पूछा, ‘‘क्या है?’’  बड़े बच्चे ने छोटे की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘‘इसने हाथ दिया।’’

अब मैंने छोटे बच्चे की तरफ प्रश्‍नवाचक दृष्टि से देखा। वह चुप ही रहा। मैंने अपने चहरे के भाव दुरुस्त किए और हंसते हुए पूछा, ‘‘क्यों हाथ दिया बताओ!’’ अब शायद बच्चों को लगा कि‍ बताने में कोई खतरा नहीं है, तो बड़े वाला बोला, ‘‘हमें आगे जाना है। रुद्रप्रयाग तक।’’ वे लिफ्ट मांग रहे थे। मेरे बैठो बोलने की देर थी कि‍ छोटा बच्चा इस गति से पिछली सीट पर चढ़ गया कि‍ एक बारगी तो मैं डिसबैलेंस ही हो गया था। दोनों बच्चे पिछली सीट पर जम गए। छोटे वाले बच्चे ने मुझे बन्दर के बच्चे की तरह कस कर पकड़ लिया। फटफटिया चलने से पहले मैंने उनसे पूछा, ‘‘ठीक से बैठे हो ना..गिरना मत।’’ तो उन्होंने ‘हाँ’ कहा और छोटे ने तो मेरी जैकेट इतनी कस कर पकड़ ली कि‍ उसकी अंगुलि‍यां मुझे चुभने लगीं।

मैं उनसे बात करते हुए बाइक चलना चाहता था, पर हेलमेट की वजह से उनके जवाब मुझे सुनाई नहीं दे रहे थे। मैंने बाइक रोकी,  हेलमेट उतारा कर हैंडल में लटका दिया। ऐसा करना नहीं चाहिए था, पर मैंने तय किया कि‍ हेलमेट उतार कर बाइक बहुत धीरे चलाऊंगा। तभी छोटे वाले ने मेरा हेलमेट माँगा और पहन लिया। हमारी गपशप शुरू हुई। पता चला कि‍ उनके नाम दीवान सिंह और हयात सिंह हैं। जहां वे खड़े थे, वहीं ऊपर उनका गाँव है। वे रुद्रप्रयाग अपने चाचा की लड़की के नामकरण पर जा रहे हैं और गाडी़ का इंतजार कर रहे थे।

‘‘तुम्हें अकेले कैसे भेज दिया माँ-बाप ने।’’ मैंने पूछा, तो दीवान,  जो बड़ा था,  ने मुझे बताया कि‍ माँ तो कई दिन से चाची के साथ ही है। पिता शाम को आएंगे। बच्चों ने पहले जाकर भूली को देखने की जिद की तो उन्हें किराया देकर सड़क पर भेज दिया। वे पहले भी इस तरह अकेले चाचा के घर जा चुके हैं। बच्चों को पारिवारिक ज्ञान भी था। बताया कि‍ उनकी बड़ी बहन अब काफी ‘बड़ी’  हो गई है। अब उसके लिए लड़का ढूंढ़ा जा रहा है। मेरी समझ में नहीं आया कि‍ इन बच्चों की शादी लायक बड़ी बहन कैसे हो सकती है। मैंने पूछा कि‍ बहन काफी बड़ी है, क्या?  तो छोटा बोला, ‘‘भोत बड़ी है। हमको मारती भी है।’’ उसके चेहरे पर पिटने का बहुत रोष रहा होगा, जो मैं देख नहीं पाया। बात आगे बढ़ाने के लिए मैंने पूछा कि‍ कहीं कोई लड़का देखा है। बड़ा बड़े ही प्रौढ़ अंदाज में बोला, ‘‘हाँ, देख रहे हैं। बात चल रही है!’’ उसकी बात पूरी ही हुई थी कि‍ छोटा वाला बोला, ‘‘बस दारू पीने वाला नहीं होना चाहिए!’’  इतने छोटे बच्चे के मु्ंह से यह बात सुनकर मैं अचम्भित रह गया। मैंने उससे ही पूछा, ‘‘क्यों दारू पीने से क्या होता है।’’ तो वह बोला, ‘‘दारूडी लोग ठीक नहीं होते। हमारे स्कूल में मास्टर दारूडी है। पढाता नहीं….मारता है!’’ फिर कुछ देर रुककर बोला, ‘‘नाक में दम कर रखा है, माचेत ने।’’  मैंने बाइक रोक कर गर्दन घुमाकर उसकी नाक देखने की कोशिश की। हेलमेट के भीतर से नाक ही नहीं दिखाई दे रही थी, दम कहाँ से दिखता। मैंने उससे कहा, ‘‘तुम्हारी नाक में तो दम दिखाई नहीं दे रहा।’’ वह पहले चौंका। फिर मेरे व्यंग्‍य को समझकर दोनों भाई हंसने लगे। मैंने उनसे पूछा कि‍ क्या सभी मास्टर ऐसे होते हैं, तो बड़े वाला बोला कि‍ नहीं ज्यादातर मास्टर तो अच्छे हैं। बस वह ही खराब हैं- ‘‘कभी स्कूल आते हैं कभी नहीं, पढा़ते भी नहीं। कुछ पूछो तो चिढ़ जाते हैं, पीटता भौत है।’’ अब मैं समझा कि‍ छोटे ने क्यों तय किया कि वह जीजा के रूप में किसी दारू पीने वाले को स्वीकार नहीं कर सकता।

रुद्रप्रयाग से पहले कुछ दुकानों के पास दीवान बोला, ‘‘बस…बस… हमें यहीं उतार दो!’’ मैंने बाइक में ब्रेक लगाए। फटफटिया रुकते ही दोनों बच्चे उतर गए। मैं कुछ कहता उससे पहले ही छोटा वाला बोला, ‘‘हमसे किराये के पैसे लोगे तुम!’’  मैंने उसके भोलेपन पर फिदा होते हुए कहा, ‘‘वैसे तो लेता, पर तुम दोनों अब दोस्त हो गए हो इसलिए नहीं लूंगा।’’ फिर दोस्ती को मजबूत करने के लिए मैं भी बाइक से उतरा और पास की दुकान से तीन बिस्कुट लिए। दो उन दोनों को दिए और एक खुद खाने के लिए सड़क के किनारे के पैरापिट पर बैठ गया। वे दोनों बच्चे भी वहीं बैठकर बिस्कुट खाने लगे। बड़े वाले ने मेरा नाम पूछा तो मैंने अपना नाम बताया। दीवान बोला कि हमारे साथ चलो, आज घर में पूरी-पकौड़ी बनी होंगी, खाकर जाना। मैने मना किया तो छोटा बोला, ‘‘चलो, चाचा जी कुछ नहीं कहेंगे।’’ उन्‍हें लगा कि शायद मैं हिचकिचा रहा हूं। उसने फिर पूछा कि‍ कहाँ जा रहे हो। मैंने बताया कि‍ आवारागर्दी करने। छोटे को शायद अवारागर्दी का मतलब समझ नहीं आया, पर बड़ा बोला, ‘‘झूठ।’’  मैंने कहा, ‘‘हां, सच में।’’ तो वह बोला, ‘‘बुड्ढे़ भी कभी आवारागर्दी करते हैं।’’ मैं उन्हें क्या बताता कि‍ मैं तो बिगड़ा हुआ बुड्ढा़ हूँ!

बिस्कुट हम लोगों ने निपटा लिए थे। विदा होने की बारी थी। मैंने कहा कि‍ मैं चलता हूँ और अपनी मोटरसाइकिल पर बैठ गया। एक झिझक के बाद छोटा वाला हयात सिंह आया और मेरी ओर हाथ बढ़ा कर हाथ मिलाने लगा। मैंने भी गर्मजोशी से उससे हाथ मिलाया। तभी बड़ा वाला भी दौड़कर आया और मुझसे हाथ मिलाने लगा। उनकी इस अदा से मुझे भरोसा हो गया कि‍ उन्होंने मुझे अपना पक्का दोस्त मान लिया है। जोर की ‘बाय’ के साथ मैं आगे बढ़ गया। अब मैं मोटरसाइकिल चलाते हुए मुस्करा रहा था और बेसुरे राग में गुनगुना भी रहा था। मुझे महसूस हुआ कि मैं बहुत खुश हूँ। डिप्रेशन गायब हो चुका था।

दो बजे के आसपास मैं घोलतीर पहुंचा। वहां भतीजा मधु और बहू इंतजार कर रहे थे। मेरी पसंद का पहाड़ी खाना और चटनी बनी थी। खाना खाकर, तृप्त होकर मैंने इजाजत ली और उखीमठ के लिए रवाना हो गया। रात उखीमठ से आगे उनियाना में गुजारी। दो सौ रुपये में खाने के साथ साफ-सुथरा कमरा मिल गया था। आज मैं मद्महेश्वर पहुँचना चाहता था। बाहर साफ धूप थी। बाइक से ही रांसी पहुंचा और एक होटल में नाश्ता किया। होटल क्या था दुकांन थी,  जहां सामान के साथ-साथ दुकानदार नाश्ता भी बना रहा था। नाश्ता करने के बाद मैंने उससे कहा की मैं मद्महेश्वर जा रहा हूँ। दो दिन तक मोटरसाइकिल खड़ी करनी है। कहाँ करूं? वह बोला कि‍ दुकान की साइड में चिपका कर खड़ी कर दो। कोई नहीं छेड़ेगा। उसके आश्वासन पर शत-प्रतिशत यकीन कर लिया, क्योंकि‍ वह किसी भी एंगल से नेता मार्का नहीं लग रहा था। मैंने मोटरसाइकिल उसके निदेशित स्थान पर खड़ी की, कवर लगाया और रांसी से गोंडार की ओर पैदल चल पडा़। कुछ दूर तक तो निर्माणाधीन मोटर रोड कटी हुई थी। उसके बाद खच्चर रास्ता था। जंगल धीरे-धीरे मदगंगा नदी की घाटी में उतरने लगा। पेड़ों से घिरा कैंचीदार रास्ता गोंडार की और जा रहा था। मैंने सोचा था कि‍ गोंडार तक का सात किलोमीटर का रास्ता मैं खाने के समय तक तय कर लूंगा। उसके बाद बचे हुए नौ किलोमीटर में से चौथे-पांचवे किलोमीटर पर किसी चट्टी पर रात काटूंगा और अगले दि‍न मद्महेश्वर चला जाऊंगा। गोंडार पहुंचने तक थक गया था। पहले ही ढाबे में पिट्ठू उतारा, अन्दर कोई नहीं था। मैं निराश बाहर निकल ही रहा था, तो देखा कि‍ एक औरत पीठ में लकड़ी लिए अन्दर आ रही है। उसने मुझे देखते हुए कहा, ‘‘टूरिस्ट?’’ मैंने मुंडी हिला कर ‘हाँ’ कहा तो वह बोली, ‘‘चाय पीनी है क्या?’’ मैंने सहमति में सर हिलाया। उसने तुरंत कमर पर धोती लपेटी और चूल्हे पर फूंक मार कर दबी आग को सुलगाया। उस पर पानी की केतली, जिस में पहले से ही पानी गुनगुना था, चढ़ा दी। मैंने पूछा कि‍ खाने के लि‍ए है कुछ तो वह बोली, ‘‘मैगी बना दूं क्या?’’ मैंने मना किया और बिस्कुट के बारे में पूछा। उसने ‘हाँ हैं’ कहा और एक बक्से से बिस्कुट निकाले। बिस्कुट लोकल बने थे और शायद कुछ पुराने ही थे। मैंने ध्यान से बिस्कुट देखे। कहीं भी फंगस नहीं लगी थी। मैंने उनको खाने का रिस्क ले ही लिया। महिला कुछ जल्दी में थी। मुझे चाय और दो अतिरिक्त बिस्कुट थमाते हुए बोली, ‘‘मुझे डंगरों के पास जाना है। चाय पीकर गिलास बाहर रख देना और पंद्रा रुपये चूल्हे के पास रख देना।’’ मैंने मजाक में कहा, ‘‘अगर बिना रखे चला गया तो?’’ वह हंसते हुए बोली, ‘‘किस्मत थ्वोड़ी लिजाला तुम!’’(किस्मत थोडे़ ही ले जाओगे तुम)। वह जाने को हुई तो मैंने उसे रोका और पन्द्रह रुपये दे दिए। उसने पैसे कमर में खोंसे और तेजी से चली गई। आगे के दो-तीन ढाबों में देखा कि‍ महिलाएं अपने पतियों के साथ होटल चलाने में हाथ बंटा रही थीं।

मैं आगे बढ़ गया, पैदल रास्ते में। मेरे आगे दो तीर्थयात्री जो पहाड़ के ही थे, चल रहे थे। पति-पत्‍नी प्रेम से बात शुरू करते, वह बहस में बदल जाती,  फिर लड़ते और गुस्से से चुप हो जाते। थोड़ी देर में फिर बात शुरू करते, फिर-फिर लड़ते और फिर से चुप हो जाते। उनकी बातों में मेरा रास्ता कटने लगा। अचानक मुझे भूख महसूस हुई, तो याद आया कि‍ गोंडार में खाना तो खाया ही नहीं। बिस्कुटों ने मेरी भूख मार दी थी। अब चढा़ई में भूख लगने लगी थी।

कुछ लोग मद्महेश्वर से वापस आ रहे थे। उन लोगों से पूछा तो बताया कि आगे तीन किलोमीटर खाना मिल सकता है। इसी आस में आगे बढ़ा।

अचानक जाने कहाँ से बादल आ गए। मौसम एक दम घिर गया। बादल गरजने लगे थे। मैं तेजी से आगे बढ़ने लगा। तीर्थयात्री अनुभवी महिला बोली, ‘‘बरिस आती है अब!’’ बादलों को मानो उसके कहने का ही इंतजार था! तेज बारिश पड़ने लगी। भाग्य से हमें 50 मीटर की दूरी पर टिन का बना शेल्टर दिखाई दिया। मैं और वह दम्पति दौड़ कर उसमें शरण लेने चले गए। वहां और लोग भी शरण लिए थे। अचानक ओले भी पड़ने लगे। बड़े-बड़े ओले! इतने बड़े ओले मैंने कभी देखे नहीं थे। मैं यह सोच ही रहा था कि‍ अगर हमें यह शेल्टर ना मिला होता तो सर फूटना तय था, तभी दो लोग पहुंचे। वे दौड़ कर आए। एक ने सि‍र पकड़ा हुआ था। शेल्टर में पहुँच कर जैसे ही उसने सि‍र से हाथ हटाया, पानी के साथ सि‍र से खून चहरे पर पहुँच गया। उसे यह चोट ओले से ही लगी थी। मेरे पास बेंड-ऐड थी। मैंने उसे लगाने के लि‍ए बेंड-ऐड दी, पर वह ठीक से चिपकी नहीं। तब तौलिये से उसका से सि‍र बांधा गया।

चारों तरफ ओलों से सफेद हो गया था। बारिश-ओले जिस तेजी से आए, उसी तेजी से बंद भी हो गए। आसमान साफ होने लगा। हम आगे बढे़। थोड़ा चलने के बाद हम उस जगह पहुंचे चट्टी में, जहां खाना मिल सकता था। वहां ताला लगा था। वहां एक लड़का था। उसने बताया कि‍ चट्टीवाला एक घंटे में आएगा। अभी वह बकरी चराने गया है। दम्पति वहीं सुस्ताने लगे। उनके पास कुछ चना चबेना था। उसे निकाल कर खाने लगे।

मेरी समझ में नहीं आया कि‍ मैं क्या करूं। मैंने लड़के से और जानकारी चाही, तो उसने बताया कि‍ आधा किलोमीटर आगे मोखम्बा जगह है। वहाँ खाने को मिल सकता है। अब घंटे भर यहां रुकना बेकार था। मैं मोखम्बा की ओर बढ़ चला।

मेरा लोअर कीचड से लथपथ हो गया था। जूते भी गीले हो गए थे। चलना दुश्‍वार हो रहा था। आधा घंटा चलने के बाद एक पत्थरों का बना छाना जैसा दिखा। मैं समझ गया कि‍ यह ही मोखम्बा है। खाना मिलने की संभावना ने चाल बढ़ा दी और मैं दस मिनट में ही उस छाने के दरवाजे पर था। दरवाजे से झांक कर देखा कि‍ एक लगभग तीस-पैंतीस साल की औरत बैठी कुछ काम कर रही थी। मैंने उससे पूछा, ‘‘खाना मिलेगा?’’ उसने आश्‍चर्य से कहा,  ‘‘इस वक्त?’’  मैंने कहा, ‘‘हाँ,  भूख लगी है।’’ उसने कहा कि‍ खिचड़ी बना सकती हूँ। मैंने जवाब दिया, ‘‘चलेगी, बनाओ।’’ फिर मैं बाहर बैठ गया। लगभग बीस- पच्चीस मिनट बाद उसने कहा, ‘‘अन्दर आ जाओ। खिचड़ी बन गयी है।’’

मैं अन्दर गया। थाली में गरम-गरम खिचड़ी थी। उसमें खूब सारा घी भी था। घी की खुशबू ने भूख और बढ़ा दी। मैं खिचड़ी पर टूट पड़ा। जब कुछ खिचड़ी पेट में पहुँच गई, तो उस महिला से बात करने का ख्याल आया। उसका नाम रंगीली था। पहाड़ के हिसाब से यह कुछ अटपटा,  कम प्रचलित नाम था।

रंगीली मोखम्‍बा चट्टी पर होटल चलाती है। गोंडार की रहने वाली है, जहां उसकी थोड़ी खेती है। पति का देहावसान चार-पांच साल पहले हो गया। रंगीली ने जमाने के हालत देखते हुए साथ रहने के लिए अपनी माँ को बुला लिया। माँ आज गोंडार वापस गई हुई थी। रंगीली की एक बेटी है। रंगीली तो अनपढ़ है और उसके वैधव्य ने उसे शिक्षा के महत्व को जता दिया है। इसलिए रंगीली को बेटी के भविष्य की चिंता है। 12वीं पढ़ने के बाद बेटी आगे पढ़ना चाहती थी। इसलिए उसे गुप्तकाशी कॉलेज में भेज दिया। बेटी के भविष्य की खतिर उसने बेटी को पढ़ने भेज तो दिया, पर अब साल का चालीस-पचास हजार का खर्चा भारी पड़ रहा है। इसीलिए उसने इस सुनसान जगह, जहां उसका पहले सिर्फ गाय पालने का ग्रीष्मकालीन छाना था, वहां यात्रियों के लिए खाने की व्यवस्था शुरू की। जब एकाध बार थके यात्रियों ने रात रुकने की व्यवस्था के बारे में पूछा तो उसने तथाकथित ढाबे में अपनी मेहनत से एक और कमरा चिन दिया, दो बिस्तर भी रख दिए। अब अगर कोई रहना चाहे तो किराया देकर रात भी काट सकता है। जंगल में वह अकेली अपनी माँ के साथ रहती है इस छाने में, जो अब होटल भी कहलाता है।

रंगीली ने पांच-छह गाय और कुछ बकरियां पाली हैं। उसने जंगल में क्यारियां बनायी हैं, जिनमें वह आलू और अन्य उपज बोती है। दूध सिर्फ एक गाय देती है, बाकि जानवर उसकी क्यारियों के लिए खाद पैदा करते हैं। सर्दियों में अपने गाँव में रहती है, गोंडार के खेतों को जोतती है। बेटी की पढ़ाई के खर्चे को पूरा करने के लिए बकरियों को बेचती है। होटल अतिरिक्त आय है।

पेट भर चुका था। कपड़े गीले थे। इसलिए तय किया कि रात रंगीली के होटल में ही गुजारी जाए। रंगीली को रात के खाने के लिया कहा और यह भी बताया कि रात को उसके होटल में ही रहूंगा। मुझे रंगीली की हिम्मत और कर्मठता ने बहुत प्रेरणा दी थी।

गीले कपडे़ बदल कर मैं बाहर आया। ठण्ड बढ़ गई थी। सि‍र में मैंने गमछा बांध लिया। कल सुबह कोटद्वार से बहुत डिप्रेश चला था। मैं इस वक्‍त अन्दर से बहुत खुश था। कल दो दोस्त दीवान और हयात मिले थे और आज अब ये कर्मठ भुली रंगीली।

सुविधा के द्वीप  :   प्रेमपाल शर्मा

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दो बजते ही स्कूल से छूटे बच्चों की चहचहाहट से मन ऐसे प्रसन्न हो उठता है, जैसे- शाम को घर लौटती चिड़ि‍यों का चहकते हुए, शोर करते झुंड को देखना। दोनों ही खुद भी खिलखिलाते हैं और दुनिया को भी। मैं बात कर रहा हूं, सोसाइटी के एकदम बगल में बने सरकारी स्कूल की। चिल्लागांव का स्कूल। लगभग तीन हजार बच्चे पॉश कॉलोनियों के बीचों बीच। लेकिन इसमें इन सोसाइटियों का एक भी बच्चा पढ़ने नहीं जाता। बीस वर्ष के इतिहास को भी टटोलें तो भी नहीं। प्राचार्य ने खुद बताया था- ‘बीस-तीस हजार की आबादी वाली सोसाइटियों का एक भी बच्चा, कभी भी इस सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ा।‘ असमानता के ऐेसे द्वीप हर शहर में बढ़ रहे हैं। उनके लिए अलग और आभिजात्य बेहद महंगे स्कूल हैं। इनमें कई स्कूल किसी कंस्ट्रक्शन कंपनी या बिल्डर के हैं। दरअसल, ऐसे सभी निजी स्कूल ऐसे ही मालिकों के हैं। पुराने धंधों की बदौलत एक नया धंधा स्कूल का, जो अब पुराने सारे धंधों से ज्यादा चमकार लिए है।

खैर, मेरे अंदर सरकारी स्कूल से छूटे बच्चों की खिलखिलाहट हिलोरे ले रही है। पूरी सड़क भरी हुई। बच्चे-बच्चियों दोनों। पैदल चलता अद्भुत रेला। कुछ बस स्टैंड की तरफ बढ़ रहे हैं, तो कुछ चिल्लागांव की तरफ। जब से मेट्रो ट्रेन आई है, पास के अशोक नगर, नोएडा तक के बच्चे इस सरकारी स्कूल में लगातार बढ़ रहे हैं। जमुना के खादर में बसे यू.पी, बिहार के मजदूरों का एक मात्र सहारा भी है, यह सरकारी स्कूल। जिस स्कूल को यहां आसपास की संभ्रांत कॉलोनियों के बाशिंदे गंदा और बेकार मानते हैं, चिल्ला गांव, खादर के बच्चों के लिए इस स्कूल का प्रांगण बहुत महत्त्व रखता है। केवल स्कूल ही तो है, जहां वे खेल पाते हैं। चीजों की कीमत वे जानते हैं, जिन्हें मिली न हो। भूख हो या नींद या जीवन की दूसरी सुविधाएं। अभाव ही सौन्दर्य भरता है।

कभी-कभी इन हजारों बच्चों की खिलखिलाहट को नजदीक से सुनने का मन करता है। सरकारी स्कूल के न गेट पर एक भी कार, न स्कूटर। न स्कूली बस। और तो और नन्हें-मुन्ने बच्चों तक को लेने आने वाले भी नहीं। कौन आएगा? मां किसी अमीर के घर काम कर रही होगी और पिता कहीं मजदूरी कर रहे होगा। इन्हें उम्मीद भी नहीं। इन के पैरों ने चलना खुद सीखा है। इसके बरक्स तीन सौ मीटर के फासले पर ही एक निजी स्कूल है। उसे उसके अंग्रेजी नाम ए.एस.एन. से ही सभी जानते हैं, आदर्श शिक्षा निकेतन के नाम से नहीं। स्कूल प्रबंधन भी नहीं चाहता कि‍ हिन्दी नाम से पहचाने जाना। हिन्दी नाम से स्कूल का शेयर भाव नीचे आ जाएगा। फिर धंधा कैसे चमकेगा? बड़ी-बड़ी फीस, किताबों, ड्रेस, स्कूल बस के अलग पैसे और फिर रुतबा। इसी रुतबे का खामियाजा पड़ोस की सार्वजनिक सड़क को भुगतना पड़ता है। सुबह स्कल खुलते और बंद होते दोनों वक्त ए.एस.एन. की विशाल पीली-पीली बसें आड़ी-तिरछी प्रवेश करती, लौटती, गुर्राती, कंडक्‍टर के हाथों से पिटती-थपती, जो कोहराम मचाती हैं, उससे वहां के पॉश बाशिंदे अपने-अपने ड्राइंगरूम में बैठे कुढ़ते हैं, लेकिन चुप रहते हैं। कारण या तो उनके बच्‍चों पर इस स्‍कूल ने उपकार किया है अथवा निकट भविष्य में उन्हें दाखिले के लिए भीख मांगनी पड़ सकती है। इन अपार्टमेंटों में प्रसिद्ध पत्रकार, बुद्धिजीवी, लेखक और फिल्मकार भी हैं, जो अपने स्वार्थ और सुविधा के लिए किसी की भी र्इंट से र्इंट बजा देंगे। लेकिन इन स्कूलों की इतनी ऊंची फीस, शोर और शोषण के खिलाफ कभी मुंह नहीं खोल सकते। पड़ोस की सड़कें और फुटपाथ इन स्कूलों से त्रस्त हैं। किनारे बैठे सब्जी-ठेले वालों को भी स्कूल में होने वाले सत्संग के दिन भगा दिया जाता है! कोई है पूछने वाला कि स्‍कूल-मदरसों में सत्‍संग, कीर्तन का क्या काम?

जहां सरकारी स्कूल के गेट पर एक भी कार, स्कूटर नहीं था, इन निजी स्कूलों के गेट पर सैकडों कारें लगी होती हैं। यहां बच्चे कम, कारें ज्यादा दिख रही हैं। इसीलिए बच्चों की चहचहाट के बजाये कार के हार्न की आवाजें। दो बजे से पहले ही इनके अभिभावक अपनी बड़ी-बड़ी कारें ए.सी. चालू कर के ऐसे सटा कर लगाते हैं कि उनके चुन्नू मुन्नू और वयस्क बच्चे भी स्‍कूल के दरवाजे से निकलते ही उसमें आ कूदें। इन कार और बसों ने थोड़ी देर के लिए पूरी सड़क रोक दी है। केवल यहां नहीं पूरे शहर में। एक-एक बच्चे को कभी-कभी लेने वाले दो-दो। बावजूद इसके इन मोटे-मोटे बच्चों के चेहरों पर उदासी, थकान क्यों पसरी हुई है? सरकारी स्कूल के बच्चे इन्हीं कारों के बीच बचबचाकर रास्ता तलाशते गुजर रहे हैं और मुस्करा भी रहे हैं।  वाकई सड़क अमीरों की, स्कूल और देश भी। गरीबों का तो बस संविधान है, जिसकी प्रस्तावना में समाजवाद, समानता जैसे कुछ शब्द लिखे हुए हैं। पता नहीं यह सपना कब पूरा होगा!

फोटो : कमल जोशी

सशस्त्र होली युद्ध : कमल जोशी

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कोटद्वार तब कस्बे का रूप ले चुका था, पर इसके दिल में गाँव ही धड़क रहा था । मेरी तरह की एक पूरी पीढ़ी पैदा तो कोटद्वार में हुई थी, पर घर का माहौल उस पीढी से संचालित होता था, जो पहाड़ी गांवों से यहाँ आई थी। गांव की इस पीढी़ ने अपनी गाँव की परम्परा और विरासत को अभी छोड़ा नहीं था, पर कस्बे की मानसिकता हम पर हावी हो रही थी। पुरानी पीढी़ को परम्परा को ज़िंदा रखने की जिम्मेदारी थी, पर हम जो यहीं पैदा हुए और पले बढे़ थे। एक अलग मानसिकता में जी रहे थे। हमें विपरीत माहौल में, जहां हम अपेक्षाकृत संसाधनविहीन परिवारों से थे, संसाधन वालों से टक्कर लेनी थी, न केवल जीना था वरन ‘इज्ज़त’ से और आत्म सम्मान से जीना था| संघर्ष वही पुराना और शास्वत था- वर्ग संघर्ष ! ‘हेव्स और हेव नोट’ के बीच का! और अपना सम्मान जुटाने के लिए ‘जुगाड़’ ही हमारा अस्त्र था|

मेरी होली की यादें 1964 से 1968 तक का फ़्लैशबेक है। परिवार अपनी होली गाँव की यादों के साथ गीत गाकर, मीठे स्वालीं (भरी पूरी) बनाकर और होलिका दहन के गीतों के साथ मनाता| मारवाड़ी व्यापारिक लोग अब होलिका दहन की परंपरा अपने हिसाब से मनाते। महिलायें राजस्थानी गीत  गातीं और गोबर के बने विशेष उपलों की माला से होलिका दहन स्थल पर पूजा करतीं। घरों में उनके गुजिया और नमक पारे बनते।

हम बच्चे होली अपने जुगाड़ तंत्र से मनाते। हमारी होली परम्पराओं की कम और वर्ग संघर्ष का नज़ारा थी। साफ़-साफ़ दो वर्ग थे। एक व्यापारी वर्ग के परिवार के बच्चे और कुछ नौकरी पेशा वाले माँ-बाप के बच्चे। ये बच्चे संसाधन युक्त थे। हमारी टक्कर दरअसल ऐसे ही परिवार के बच्चों से होती थी। इनके पास अब कुछ था, बाज़ार का खरीदा हुआ, और हमारे पास था केवल जुगाड़!

होली खेलने के लिए इनके अभिभावक खर्च कर सकते थे और हमें अपना मजा जुगाड़ से पैदा करना होता!

इस तरह होली हमारे लिए सिर्फ एक त्यौहार नहीं था- ये एक उल्लास, कर्मठता, रणनीति और जुगाड़ का समय होता था। आज की तरह बाजार में चायनीज़ टॉय पिचकारी और खुशबू वाले रंग नहीं थे। कैसा माहौल था और क्यों हम रणनीति में उलझते थे, आगे वृतांत में यह खुलासा होगा।

हमारी यानी मेरी और मेरे षड्यंत्रकारी साथियों की उम्र ही होगी यही कोई 12-13 साल। हम बच्चे भी थे और बड़े भी। हम उस परिवार से थे, जहां ये समझा जाता बच्चे को पैसा देने का मतलब उसे बिगाड़ना है! हमें यानी अनिल को और मुझे साल में तीन बार ही खर्चे के लिए पैसे मिलते थे। एक दशहरे के रावण फूंकने के मेले के लिए, जिसमें हम लाल सेलिफेन की पन्नी के बने चश्मे और एक गुब्बारे लगी पिपरी खरीदते। यह बात अलग थी कि‍ घर आते-आते चश्मे टूट जाते और पिपरी की आवाज ख़त्‍म हो जाती। और यदि आवाज कामयाब रही तो पों पों से परेशान घरवाले पिपरी छीन लेते। पर हम हिम्मतवाले अगले साल फिर यही दोहराते। पैसे मिलने का दूसरा मौक़ा होता था, गिंदी के मेले का, जो मवाकोट में होता। यहां नारंगी रंग से सरोबार जलेबी की चाह पिपरी पर भारी पड़ती और पूरे दो आने की ज़लेबी खा जाते। हां, एकाध टुकड़ा साथ आए दोस्त को दे देते, जो अपनी रकम फूटे हुए चश्मे पर गंवा चुका होता। तीसरा मौका खर्च मिलने का होता था- होली। इससे रंग ख़रीदने की जुगत होती थी। पिताजी गीले रंगों के खिलाफ थे। वे गुलाल खरीदकर लाते और हम से कहते कि‍ इसी से होली खेलो। अब आप ही सोचिए कि‍ उस उम्र में क्या सिर्फ सूखी होली खेली जा सकती है? हम मां के पीछे पड़ जाते, रोते, ज़मीन पर पैर घिसटते़। इतने पराक्रम करने के बाद मां हम दोनो भाइयों को चार आने देतीं, इस हिदायत के साथ कि ‘फालतू में मत खर्च करना !’

बाजारी सिंथेटिक रंग उस वक्त जर्मनी से इम्पोर्ट होते थे- महंगे होते। इन रंगों के आने से पहले नारंगी रंग के टेसू के फूलों से ही होली खेलने का प्रचलन था। पहाड़ से लगे मैदानी इलाके के गांवों के ज्यादातर लोग इन्ही फूलों का रंग बनाने के लिए प्रयोग करते थे। मां के दिए इतने कम पैसों में कितना बाजारी रंग आ पाता?

हमारे कस्‍बे के ही व्यापारिक परिवारों और ऊंची आर्थिक स्थिति वाले परिवारों के बच्चे भी होते थे। ये खुलकर बाजारी रंग का इस्तेमाल करते। महंगे बाजारी रंग को हम विशेष दोस्त पर लगाने के लिए बचाते थे और बाकी गीले रंग के लिए हम एडवेंचर ट्रिप पर जाते। कोटद्वार से 12 किलोमीटर दूर, नजीबाबाद जाने वाली सड़क पर टेसू के फूल के पेड़ थे। टेसू माने पलाश या ढाक। फ़रवरी मार्च में इस पर फूलों का उबाल आता है। उबाल ही कहूंगा, क्योंकि‍ उस वक्त इस पर पत्ते नहीं दिखाते, बल्कि ये फूलों की रजाई ओढ़ लेता है।

होली हमारे लिए महंगी पिचकारी और रंग से लैस विरोधियों पर दबदबा बनाने का संघर्ष होती। हम ‘आर्थिक संकुचन’ की वजह से रंग खरीद नहीं खरीद सकते थे। विकल्प के तौर पर हम टेसू के फूलों से रंग बनाने की रणनीति पर काम करते। पर इस पर भी पेंच था। हमारे घरवाले हमें उतनी दूर जाने की इज़ाज़त नहीं देते थे। इसलिए हमें उन्हें बिना बताए टेसू के फूल जमा करने जाना होता था।

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हमारी चुनौती यह होती कि उतनी दूर से टेसू के फूलों को लाया कैसे जाए, वह भी बिना घर वालों के पता चले। इसके लि‍ए ज़रूरी था कि‍ आने-जाने के लिए साइकिल हो। हमारी गैंग के कुछ सदस्य साइकिल-धारी होते थे। वे अचानक महत्वपूर्ण हो जाते। अब हम उनकी चमचागिरी करते और वह भी तात्कालिक महत्व का फायदा उठाते हुए नखरे दिखाते और हमसे उस दौरान होमवर्क से लेकर पहले बैटिंग करने की शर्तें रखते। हम मन ही मन बाद में देख लेने का संकल्प करते हुए उनकी हर बात मानने को मजबूर रहते। कुछ ऐसे दोस्त भी निकल आते जो वैसे तो अपने दम पर बाज़ार से रंग लाकर होली खेल सकते थे, पर हमारे एडवेंचर की बाते सुन हमारे साथ रोमांच के अनुभव के लिए अपनी साइकिल ऑफर कर देते। इन दोस्तों के बावजूद ज्यादा साइकिल की जरूरत होती तो किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश होती, जिसके पास साइकिल हो और दूसरे हमारे गिडगिड़ाने का उस पर प्रभाव हो सकने की गुंजाइश हो। ऐसे लोगों को आईडेंटीफाई कर किन्ही दो-तीन पर ‘जीरो-इन’ किया जाता। उतने ही समूह बना कर उनके पीछे पड़ जाते कि‍ हमें एक दिन के लिए साइकिल उधार दे दो। हम विनीत दिखने की, भीषण आज्ञाकारी होने के और अच्छे बच्चे होने के तमाम सबूत उन्हें देते| चाहे हमारे माता-पिता दयाशील हों ना हों, एकाध सज्जन ऐसे दयावान मिल ही जाते थे कि जो हमें साइकिल देने पर राज़ी होते। पर इस शर्त भी होती कि वह टेस्ट लेंगे कि हमें साइकिल चलानी आती भी है कि‍ नहीं। हम अपने बीच के सबसे कुशल साइकिल चालक का चुनाव कर परीक्षा में पेल देते। वह बेचारा भी कई बार परीक्षक की पैनी निगाहों से घबरा जाता और साइकिल ठीक से चला नहीं पाता, फेल हो जाता तो उस व्यक्ति से साइकिल मिलना कठिन हो जाता। फिर हमें दूसरे ऐसे व्यक्ति को खोजना पड़ता, जिसकी मान मनुव्वल कर साइकिल मिल सकती हो। साइकिलों की व्यवस्था होने के बाद तय होता कि‍ कब टेसू के फूल जमा करने चलना है!

अब होली से तीन-चार दिन पहले का कोई दिन फूल जमा करने के लिए चुन लिया जाता। घर से थैले या पुराने मेजपोश जमा कर किसी एक के घर में रख दि‍ए जाते। इस काम के लिए जगदीश का घर था। उसके पिता नहीं थे। माँ अकेली थीं। उसे घर से होली खेलने के लिए कुछ मिलता नहीं था। सबसे बड़ी बात, उसकी माँ शुरू में तो जंगल जाकर फूल इकठ्ठा करने की मना ही करती थीं। पर जब जगदीश, बिना बाप का इकलौता पुत्र दहाड़ मार-मार कर रोने लगता, तो माँ का दिल पिघल जाता। वह न केवल उसे हमारे साथ जाने की आज्ञा दे देतीं, बल्कि हमारे षड्यंत्र में शामिल भी हो जातीं। यहाँ तक की एक्सपिडिशन–दिवस पर हमारे लिए दस-बारह रोटी भी बना देतीं। एक्सपिडिशन के लिए ऐसा दिन चुना जाता, जो इतवार न हो, क्योंकि इतवार को घर वालों को दिन का हिसाब देना होता। इसलिए स्कूल लगने वाला दिन चुना जाता। साल के इस वक्त स्कूल दिन का हो जाता था यानी सुबह 10 से शाम 5 बजे तक का। एग्जाम नज़दीक होते इसलिए एक्स्ट्रा क्लास का बहाना कर हम 8 बजे ही जगदीश के घर जमा हो जाते और चल पड़ते एक साइकिल पर दो-तीन के हिसाब से अपने थैले लेकर। नजीबाबाद की तरफ जाते हुए ढाल होता। तेज़ी से चले जाते। पता ही नहीं चलता की कब बारह किलोमीटर पूरे हुए। पलक झपकते ही 12 किलोमीटर तय हो जाते और लगता कि‍  सामने सड़क के किनारे के टेसू के पेड़ हमारा ही इंतज़ार कर रहे हैं। साइकिल किनारे खड़ी कर दी जाती। कमज़ोर दिल वाले तो नीचे झड़े हुए फूलों को जमा करने लगते और हम एड्विन्चारिस्ट पेड़ों पर चढ़ कर फूलों भरी टहनी तोड़ कर नीचे गिराते। सारे फूलों को इकट्ठा कर थैलों में और मेजपोश में बांधने का काम नीचे रहने वाले सदस्यों का होता। अब जाने का वक्त होता, तो एक बड़ी समस्या हो जाती। हम में से कुछ अति जोश में पेड़ पर ज्याद ऊपर चढ़ जाते पर वापस उतर नहीं पाते, क्योंकि‍ वापस उतारते वक्त नीचे देखना होता है। नीचे देखते तो पता लगता कि‍ हम कितने ऊपर आ गए हैं! यह सोचते ही पैर कांपने लगते कि पैर फिसला तो कितनी चोट लगेगी। हिम्मत टूटने लगती। अब सारा समूह उन्हें किसी तरह सुरक्षित उतारने में लग जाता। कुछ ऊपर चढ़ कर उसे बताते हुए उतरते कि वह कहाँ पर पैर रखे, कहाँ से टहनी को पकड़े। बाकी सदस्य नीचे से ही निर्देश देते। ये निर्देश उतरने वाले को ज्यादा कन्फ्यूज़ कर देते। कुल जमा बात यह होती कि‍ जितना समय फूल तोड़ने में खर्च होता, उससे डेढ़ गुना पेड़ पर चढ़े महारथियों को उतरने में लगता।

अब तू-तू मैं-मैं का समय होता। बात यह थी कि‍ आते वक्त तो ढाल था। कोई भी आराम से साइकिल चला लेता। वापस आते वक्त काम की थकान तो होती, साथ-साथ चढा़ई भी, ऊपर से डबलिंग यानी दो-दो एक साइकिल पर। फूलों का बोझ अतिरिक्त। जहां आते वक्त सब कहते साइकिल मैं चलाऊंगा-साइकिल मैं चलाऊंगा। जाते वक्त हाल उल्‍टे हो जाते। अब कहते कि‍ साइकिल तू चला–साइकिल तू चला। खैर थोड़ी कहासुनी के बाद मामला सेटल होता कि‍ बारी-बारी से सब चलाएंगे। इस वक्त सबसे सुखी अपने को वह समझते जिन्हें साइकिल चलानी नहीं आती। पर उन्हें खुश कैसे रखा जा सकता था, जब सब दुखी हों? इसलिए उनसे कहा जाता कि‍ तुम साइकिल पर धक्का लगाओ। अब उनकी हंसी गायब हो जाती और वह रस्तेभर साइकिल को धक्का देते आते। वापसी में बस एक सुकून था। रास्ते में गन्ने के क्रशर थे, वहाँ पेराई होती थी। वहां की शर्त एक होती थी की जितने चाहे गन्ने खा लो, पर ले जाने की इज़ाज़त नहीं थी। वहां पर रुक कर गन्ने खाए जाते और एनर्जी रिस्टोर की जाती। गन्ने खाने में हमें समय का ध्यान ही नहीं रहता। कितनी भी जल्दी करते, पर घर पहुँचने में देर हो जाती। अब देर शाम को घर पहुंचते। जिन के घरवाले भले मानस होते वे सिर्फ डांट खाते, हमारे नसीब ये भलमनसाहत नहीं थी इसलिए मार पड़ती। पर हमें और दिनों की अपेक्षा दर्द कम होता था क्योंकि हम टेसू के फूल जो ले आए थे। अगले दि‍न टेसू का रंग बनाने की कल्पना में देर तक नींद नहीं आती और जब आती तो थके शरीर को इतनी नींद आती कि सुबह हमें उठाने के लिए घर वालों को खूब मशक्कत करनी पड़ती|

अब बारी थी, रंग पकाने की। टेसू के फूलों से रंग नि‍कालने के लिए उन्हें पानी में उबालना पड़ता है। अब इतने सारे यानी बोराभर कर जमा किए गए फूलों को उबालने के लिए बर्तन भी बड़ा चाहिए। वह कहाँ से आए। गांव की तरह पंचायत घर के बर्तन तो इस कस्‍बे में होते नहीं थे। हमारी नज़र में एक ही बर्तन रहता था- हज्ज़न मियां का टब। पास के धोबी का बड़ा टब। हज्ज़न चच्चा हमारे शहर के धोबी थे। उनका नाम हज्ज़न मियां क्यों पड़ा, यह भी कथा थी। उन्हें हज जाने की बड़ी तमन्ना थी। पर गरीब आदमी हज जाने का खर्चा कैसे जुटाए ! वे अपने हज जाने की हसरत की और हज की कहानियाँ हर एक को सुनाते थे। शायद इसलिए ही उनका नाम हज्ज़न मियां पड़ गया। अब हमारा सारा गैंग हज्ज़न चच्चा के चक्कर काटने लगता, “चच्चा- एक दिन के लिए हमें टब दे दो।” हम जानते थे कि‍ हम तीन-चार दिन तक टब लौटा नही सकते। पर एक दिन के लिए मांगने पर टब मिल सकता था। और सच बात तो यह भी थी कि‍ हज्ज़न चच्चा भी जानते थे कि‍ अगर ये लोंडे-मोंडे  रंग बनाने के लिए टब ले गए, तो जल्दी वापस मिलेगा नहीं। वह हमारे अनुनय-विनय पर ‘कत्तई नही’ ही जवाब देते। हम सुबह से हज्ज़न चच्चा ‘प्रेसवाले’ के पास आकर बारी-बारी से अनुनय-विनय करते पर हमें ‘कत्तई नहीं’ से ज्यादा जवाब सुनने को नहीं मिलता। वे कहते, “पिछली बार भी दिया था। तुमने उसे काला कर वापस किया। मेरे धोये हुए कपड़े खराब हो गए। मैं दो दिन तक टब धोता रहा।”

हम भगवान से लेकर माँ तक की कसम खाकर उनसे कहते, “चच्चा, इस बार मोसे (धुवें) से काला नहीं करेंगे और धो कर देंगे।” पर हमारी बात सुनकर वह फिर ‘कत्तई नहीं’ कहते और अपने काम में लग जाते। हम हज्ज़न चच्चा की मस्जिद से लगी दुकान पर उन्हें घेर कर बैठ जाते— उदास| दिन के खाने का समय हो जाता। हम भूखे प्यासे बैठे रहते। घर से बार-बार खाना खाने आने के संदेशे आने लगते। पर हम टस से मस नहीं होते| हज्ज़न चच्चा परेशान होने लगते। चहरे का भाव बदले बिना बार-बार कनखियों से हमारी और देखते। बच्चे बिना खाना खाए भूखे प्यासे बैठे हैं। बाहर से कठोर दिखने वाले हज्ज़न चच्चा को यह सहना मुश्किल हो जाता। वह जब इस तरह देखते तो हम समझ जाते कि‍ अब हम जंग जीतने वाले हैं। हम अपना मुंह और लम्बा लटका लेते, पेट पकड़ने लगते मानो भूख से दम निकल रहा हो। अब इससे आगे हज्ज़न चच्चा सह नहीं सकते थे। दो-चार गालियाँ देते और टब देने की हामी भर देते, इस ताकीद के साथ कि‍ ‘हरामियों, टब जैसा साफ़ दिया जा रहा है, वैसे ही साफ़ वापस करना होग!’ हम सब समवेत स्वर में ‘बिलकुल’ कहते और हज्ज़न चच्चा बिना दांत वाली मुस्कराहट के साथ हमें टब दे देते। वह जानते थे कि‍ हमारी ‘बिलकुल’ में बिलकुल भी इमानदारी नहीं है और उन्हें टब कालिख से भरा हुआ मिलेगा। पर बच्चे तो उनके लिए फ़रिश्ते थे।

अब रंग बनाने की कारसाजी शुरू होती! जगदीश के घर की छत पर ही चूल्हा बनता। मोहल्ले में और कोई अपनी छत ख़राब क्यों करने देता भला। फिर जगदीश की माँ की शरण में जाया जाता। जगदीश की माँ को भी सफाई कर देने का भरोसा दिया जाता और पत्थर-ईंट जमा कर टब के लिए चूल्हा बना दिया जाता। लकड़ी की विशेष परेशानी नहीं थी। सभी घरों में लकड़ी के चूल्हों का इस्तेमाल होता था। सभी अपने अपने घर से लकड़ी चुरा-चुराकर जगदीश के घर की छत पर जमा कर देते थे। उत्साह में हम इतनी लकड़ी जमा कर देते थे कि‍ रंग बनाने के बाद भी इतनी बच जाती कि जगदीश  की माँ को महीने भर तक लकड़ी के लिए जंगल जाने की ज़रूरत नही रहती।

तय होता कि‍ छोटी होली यानी होलिका दहन वाले दिन से एक दिन पहले रंग ‘पकाया’ जाएगा। हम सभी जगदीश के यहाँ जमा हो जाते। छत पर भट्टी लगती, टब चढ़ाया जाता। उसमे टेसू के फूल और पानी भर दिया जाता। इसके बाद भट्टी सुलगाने का काम शुरू होता। हमने कभी भट्टी सुलगाई होती, तो सुलगती ना! इस काम का अनुभव किसी को नहीं था। जब जगदीश की माँ आधे घंटे तक हमें इस तरह परेशान देखतीं तो वह हंसती हुई आतीं और लकड़ी ठीक से बैठा कर आग सुलगातीं। रंग पकने लगता।

अब हमारा काम होता भाग सिंग हलवाई के कारीगर को घेरना। रंग फेंकने के लिए पिचकारी भी चाहिए होती है। व्यापारी वर्ग के परिवार के बच्चों के पास तो बाज़ार से खरीदी पीतल की बेहतरीन पिचकारी होती। महँगी पिचकारी खरीदने के लिए हमारे माँ-बाप साफ़ मना कर देते कि‍ एक दिन के खेलने के लिए पिचकारी खरीदना फ़िज़ूलखर्ची है। बात सही भी थी। जब घर में दूसरी ज्यादा प्राथमिकताएं हों, तो पिचकारी पर खर्च वास्‍तव में फ़िज़ूलखर्ची ही था। यहाँ पर भाग सिंग हलवाई के मिठाई बनाने वाले कारीगर की एक्सपर्टाइज की ज़रूरत होती। मिठाई कारीगर नत्था भाई बांस की पिचकारी बनाना जानता था। शाम को जब मिठाई बनाई जानी बंद होती, तो हम उसके पीछे पड़ जाते। वह भी अपनी कला दिखाने को बेताब रहता, पर चाहता था कि‍ हम उसकी कुछ खुशामद करें ही। हम तो खुशामद करने को उतारू रहते। जब वह ‘हाँ’ कहता, तो अगला काम होता बांस की व्यवस्था करना। पिचकारी बनाने के लिए बांस की ज़रूरत होती। हम कुछ मोटे-मोटे बांस आम के बाग़ वाले मुस्लिम मालियों से माँगते। उन्हें तब कुंजड़ा कहा जाता था। उनके पास मोटे बांस होते। उनका इस्तेमाल वह अपनी बहंगी बनाने के लिए करते थे। उनके पास इस्तेमाल के बाद मोटे बांस के टुकड़े बचे होते। उन्हें वे सम्‍भाल देते थे। वे जानते थे कि‍ होली के पास बच्चे बांस माँगने आएंगे। वह इन बांसों का सौदा करते। बांस देने से पहले वह हमसे कसम खिलवाते कि‍ इस बार गर्मियों में जब आम लगेंगे, तो हम उनके बगीचों में आम चोरने (चुराने) नही आएंगे। हमारा हाल तो यह होता कि‍ उनके कुछ कहने से पहले ही हम कसम खाकर बताते कि‍ इस साल तो क्या, हम तो पिछले साल भी आम चुराने नहीं आए थे। हमारे ज्यादा कलाकार साथी तो उनसे मुखबरी की डील तक कर लेते। बच्चों की स्मृति बहुत कम होती है। गर्मी आते-आते हमारी स्मृति सूख जाती और आम चुराने का मौलिक अधिकार का जज्बा हमारी रगों में दौड़ने लगता।

बांस मिलने के बाद शाम को नत्था भाई की पिचकारी वर्कशॉप लगाती। वह बांस को गाँठ के पास से आरी से काटता और गाँठ के दूसरी तरफ के हिस्से को अगली गाँठ के समीप इस तरह एक खोखला बांस का सिलिंडर बन जाता। इन बांस के टुकड़ों को रात को छिपाकर भट्टी के पर रख देता। सुबह जब भट्टी सुलगती, तो वह भट्टी में एक मोटा सुवां लाल करने को रख देता और काम के बीच जब भी फुर्सत मिलाती बांस के सिलिंडर के गाँठ वाली मुंह की तरफ से ‘औप्तिमाम मार’ के लिए  गरम सुवें से छेद कर देता। हम भट्टी के बाहर से भीतर झांकते और नत्था भाई हमें देख कर वापस भागने को कहता कि‍ कहीं मालिक को यह पता न चले कि‍ काम के वक्त वह बच्चों की पिचकारी के लिए बांस पर छेद कर रहा है।

शाम को नत्था भाई छेद किए बांस लेकर आता। अब पिचकारी के लिए पिस्टन बनते। बांस की पतली डंडी के ऊपर कपडे की पट्टियाँ लपेट कर गुंडा सा बना लिया जाता। उसे खोखले बांस के सिलिंडर के अन्दर कस कर जाने लायक बनाया जाता। जिसे पीछे खींचने से बाल्टी से रंग पिचकारी में भर जाता और पुनः दबाने से वह फुहार की तरह बाहर निकालता। यह हमारी पिचकारी होती। छोटी होली को इस पिचकारी का ट्रायल होता, ‘ओप्तिमम मार’ के लिए बार-बार छेद का व्यास ठीक किया जाता। पिस्टन पर कपड़ा लपेटा जाता। जगदीश के घर की छत हमारा ‘एम्युनिशन स्टोर’ होता।

होली का दिन हमारा डी-डे होता। प्रभुत्व के संघर्ष का, जुगाड़ी वर्सेज संसाधन वालों का। लगभग आठ-नौ बजे हमें होली खेलने की इजाज़त मिलती। हमारा दल अपने ‘हथियारों’  और ‘अम्न्युनेशन’ के साथ गली के एक ओर तैनात होता। दूसरी ओर वह जिनके पास बाज़ार से ख़रीदे रंग और पिचकारी होती। लोकल वर्सेज़ ग्लोबल मार्किट की सीधी लड़ाई। पहले विरोधी पक्ष मार करता। लम्बी दूरी तक मार करने वाली पीतल की पिचकारी के रंगों से हम बिना हथियार उठाए ही रंगीन हो जाते। हमारी पिचकारियां आधी दूरी तक भी मार नहीं कर पातीं! उन्हें पिचकारी की रेंज तक लाने के लिए हमें रंगों की बौछारों में ही आगे बढ़ कर उन पर रंग डालना होता। हममे से कई हताहत हो जाते। हमारी हिम्मत भी काम नहीं आती, क्योंकि‍ बाजारी रंग तेज़ होते और हमारा टेसू का रंग उनके सामने फीका होता। बीच-बीच में हमारी पिचकारी के पिस्टन के कपडे़ की पट्टी खुल जाती और पिचकारी बेकार हो जाती। हमारी नाकामी पर विरोधी हमें चिढा़ते। हम तरबतर हो जाते, निराश होकर पीछे लौटते। अब हम दूसरी रणनीति का सहारा लेते। उस वक्त तक न तो हमें शिवाजी के छापामार युद्ध शैली का पता था और न ही चे-गुएरा के गुर्रिल्ला रणनीति का। बस अनुभव ने हमें ज्ञानी बना दिया था। हम कुछ जो कमजोर किस्‍म के थे, वे पिचकारी थामे मोर्चा सम्हाले रहते और हमारे बीच के कुछ मुस्टंडे साथी छतों से कूद, छिपकर गली के उस छोर पर पहुंच जाते क्योंकि‍ विरोधी दल का ध्यान तो हम पर रहता। वे उस ओर पहुँच कर उनके रंगों की बाल्टी छीनने लगते। अपनी रंगों की बाल्टी बचने के चक्कर में अब वे लोग पिचकारी नीचे रख कर बाल्टी बचाने लगते, तो हम पैदल सिपाही दौड़ कर आगे बढ़ते और उनकी पिचकारिया फेंक देते। सशस्त्र होली युद्ध अब पिचकारी के बजाय हाथों से लड़ा जाने लगता। रंग की बाल्टियों की छीना-झपटी में दोनों पक्ष तरबतर होते। इस बार विरोधी पक्ष अपने ही पक्के रंगों से पुँता होता, जो हमारी मुस्टंडा-ब्रिगेड का कारनामा होता। अब जब दोनों दल बराबर रंगों से पुत गए और रंग भी बह गए, तो अब क्या गिला शिकवा। दोनों दल आपस में मिलकर हँसने लगते। छीना झपटी में चोट फटाक भी लग जाती, तो उसका सामूहिक इलाज होता! इलाज में आँख में फूंक मारने से लेकर मलाशने और मुंह धोना तक शामिल था। अब सबके घरों में जाकर नमकीन खाते और जिन घरों में गुजिया बनी होतीं, वहाँ पहले पहुंचते।

अंत में दो-तीन बातें बतानी ज़रूरी हैं। हमारी होली यहीं पर ख़त्म नहीं होती। रंगों से पुते जब हम घर पहुंचते तो जो बर्तन हम घर से मांग कर रंग रखने के लिए ले गए थे, उन पर गुर्रिल्ला युद्ध के समय पिल पड़ जाते थे। अब जब हम अपने पिल पड़े बर्तनों को घर लाते, तो हमें यह अंदेशा हो जाता था कि‍ जितने पिल बर्तन पर पड़े हैं, उतने थप्पड़ तो पड़ने ही हैं| हम पहले से ही रोने लगते और एक-दूसरे का नाम बताने लगते। बिना पिटे ही हमारा विलाप कई बार हमें मार से बचा भी लेता था। यह भी नित्य होली कर्म था। इसके अलावा रंग छुड़ाने के लिए नहलाते वक्त जो हमारी घिसाई होती, वह अलग। माँ साबुन घिसती, बीच-बीच में पट-पट मारती भी रहतीं। हमारा क्रंदन पांचवें और सातवें सुर पर रहता। कोई ध्यान नहीं देता क्योंकि‍ लगभग हर घर से इस तरह की आवाजें आती  रहतीं|

अंत में एक यादगार के तौर पर हज्ज़न चच्चा की याद। यह भी हमारी होली का हिस्सा ही था।

हज्ज़न चच्चा का टब लौटाना भी हमारे लिए समस्या होती, क्योंकि‍ फिर वह काला हो गया होता। हम सब टब लेकर ऐसे मोड़ पर खड़े हो जाते, जहां से हम तो हज्ज़न मियां को देख सकें, पर वह हमें नहीं। वह अपनी दुकान से इधर-उधर जाते ही रहते थे। उस वक्त भी जाते थे (आज मुझे यह भी लगता है कि‍ हज्ज़न चच्चा जानते थे कि‍ हम उनका टब लौटाने के लिए छुप कर बैठे हैं। वह यह भी जानते थे कि‍ टब काला ही होगा। वह जानबूझकर अपनी दुकान से चले जाते थे कि‍ हम टब रख सकें और इज्ज़त से भाग सकें !) हम दौड़ कर उनकी दुकान में काला टब रख कर चम्पत हो जाते। थोड़ी  देर में हमें हज्ज़न चच्चा की ऊंची आवाज सुनाई देती.. ‘‘हरामियो, फिर काला कर दिया टब! अगली बार नहीं दूंगा।’’

हम सब हंसने लगते|

अन्नपूर्णा टिकुली : कमल जोशी

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उसकी आँखें गहरी भूरी थी, चमकील। और जब वो एकटक देखती थी मानो सम्मोहन कर रही हों….! स्वाभाविक था कि मुझ जैसा कमजोर प्राणी उसके सम्मोहन में फंस जाए! मैं भी हिम्मत कर उसे एकटक देखता रहा फिर मैंने नजरें झुका लीं! उसके सम्मोहन का ताब ज्यादा नहीं सह सकता था। थोड़ा साथ चले। उसकी चाल में ठसक थी। मानो वो जानती हो की साथ चलने वाला ये नराधम उस पर फिदा है। मैंने नाम पूछा ! वो चुप रही पर उसके साथी ने बताय, ‘‘ टिकुली!’’

नाम अजीब था पर उसके अनुरूप था। ‘‘इसके माथे पर टिका है जन्मजात, इसलिए इसे टिकुली नाम दिया।’’ एक्सप्लेनेश की जरूरत नहीं थी। मैं सहमत हो गय। पर टिकुली से आँख नहीं चुरा पाया।

बात शुरू की जाए।

अपने अभियान में हम बधियाकोट पहुंचे थे। कर्मी गाँव की सभा से हमारे साथ मोइन भी हो लिया था। हमने नोटिस किया की जब हम पहाड़ के हाल और अपनी यात्रा के बारे में बातचीत कर रहे थे, तो एक युवक चुपचाप आकर हमारे बीच आकर बैठ गया था। वह गाँव ही नहीं,  आसपास का रहने वाला भी नहीं लग रहा था। सभा के बाद हमनें उसका परिचय चाहा तो उसने अपना नाम मोईन बताय। वह रायबरेली के आसपास का रहने वाला है। पिता शायद किसी सरकारी नौकरी में हैं। उससे बातें हुई तो वो बोला उसने गांवों को जानने के हमारे अभियान के बारे में अखबारों में पढ़ा और उत्तराखंड के गांवों के बारे में समझ बढाने के लिए अभियान में शामिल होना चाहता है। वह किसी विदेशी बैंक में कार्य कर रहा था, पर वहाँ का वातावरण तथा ‘थकी’  हुई लाइफ स्टाइल उसे पसंद नहीं आई। अब उसने आईएएस की परीक्षा दी है और अपने कार्य क्षेत्र चॉइस के रूप में उत्तराखंड लिखा है। अपने कार्य क्षेत्र के रूप में जिस क्षेत्र का चुनाव उसने किया है, उसके गांवों के बारे में जानने के लिए ही हमारे अभियान में शामिल होना चाहता है। उसकी बात सुन कर अच्छा लगा। पर हमारा भी एक संकट था। अभियान के बारे में सुनकर इतने लोग शामिल हो गए थे कि‍ रहना और खाना मैनेज करना मुश्किल हो रहा था। इसीलिए तय हुआ था कि अभियान दल को दो हिस्सों में बाँट लिया जाए, जिससे जिस किसी भी गाँव में अभियान दल जाए, वहाँ के निवासियों को उनके खाने व रहने की व्यवस्था करने में ज्यादा परेशानी ना हो। ये ही हमारी यात्रा का नियम था। जिस गाँव में जाए, वहाँ के निवासियों से संवाद करें और उन्हें यात्रा का आशय बताएं। गाँव के बारे में जानकारी लें। गाँव वाले क्या कहते है, क्या उनकी समझ है, इस पर चर्चा करें। तब ही गाँव वाले हमें स्वीकारेंगे और हमारे खाने और रहने में भागीदारी करेंगे। इससे न केवल हमारी समझदारी बढेगी, बल्कि गाँव वाले भी हमें आम पर्यटक या सरकारी कर्मचारी नहीं समझेंगे और ज्यादा खुल कर चर्चा करेंगे। मोईन को सम्मालित करना ही था। एक भावी प्रशासनिक अधिकारी अगर गांवों का  फर्स्ट हैण्ड अनुभव लेना चाहता था, तो उसे हम मना नहीं कर सकते थे। हमने दल को विभाजित किया। पुराने लोग मुख्य अभियान पथ की और चले तथा दूसरे दल को सोंग गाँव के रास्ते से भेजा गया। इस निर्देश के साथ कि‍ वे लोग हमें तीन दिन बाद मुख्य मार्ग पर मिलें। मोईन हमारे दल के साथ रहा क्योंकि‍ वह हम पुराने लोगों से बातचीत करना चाहता था।

कर्मी से बधियाकोट का रास्ता खतरनाक था। पिंडर नदी ने आपदा के समय पुल ही नहीं, सड़क भी बहा दी थी। इन सड़कों की सुध लेनेवाला कोई नहीं था। पिंडर पर एक लकड़ी के लठ्ठों से बना पुल था- हिलता हुआ.. मानो नदी के बहाव में झूम रहा हो। पिट्ठू लेकर पार करने में हवा खराब हुई। हमें तो एक बार ही पार करना था। स्कूली बच्चे भी दिन में दो बार इस पुल से गुजरते होंगे। मां-बाप का दिल तो हलक तक आ ही जाता होगा बच्चों को इसे पार करता देख कर।

बधियाकोट में हमारे आने की खबर थी। पंचायत घर में हमारे रहने की व्यवस्था थी। बधियाकोट में भी लोगों से मुलाकात और चर्चा हुई। कहने को तो भराड़ी से, जो पिंडारी ग्लेशियर ट्रैक का मुख्य पडाव है, बदियाकोट के समीप तक सड़क है, पर उसकी इतनी हालत खराब है की गाड़ियां चल नहीं सकतीं। इलिए बरसात के आने से पहले बधियाकोट के दुकानदार चार माह का सामान जमा कर लेते हैं। और ये सिर्फ सक्षम दूकानदार ही कर सकते हैं। भराड़ी से बधियाकोट सामान खच्चरों में लाया जाता है और एक क्विंटल लाने के लिए 800 रुपया भाडा है।  ‘‘सामान सस्ता नहीं मिलता,’’ एक चिंतित वृद्ध ने कह, ‘‘जाने सड़क कब बनेगी।’’ सड़क की उपयोगिता उसके लिए सिर्फ यात्रा के लिए ही नहीं थी, बल्कि महंगाई के समय में जीवन-यात्रा चलाने के लिए भी थी।

बधियाकोट के अधिकाँश स्वस्थ्य पुरुष ‘यारसा गम्बू’ याने कीड़ा जड़ी की खोज में शम्भू बुग्ग्याल की और गए हुए थे। यारसा गम्बू की कितनी कीमत है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि कई दुकानदार भी दुकानें बंद कर यारसा गम्बू को ढूंढ़ रहे थे।

रात में हम में से कुछ के पेट खराब हो गए थे! कहीं गंदा पानी पी लिया था। सुबह जब निकलते वक्त उनकी हालत देखी तो ये तय हुआ की उनकी पीठ के पिट्ठू खच्चर के मार्फत अगले पडा़व था पहुंचाए जाएं। इसी बहाने हम जो बाकी थे उन्होंने तय किया की हम भी अपने पिट्ठू हलके कर लें और कुछ सामान खच्चर में लाद दें। हमें समदर गांव जाना था। खच्चर वाले की खोज हुई। पता चला की जिस गाँव हम जाने वाले हैं, उसी गाँव का खच्चर वाला वापस जाने वाला है। वह सस्ते में हमारा सामान गाँव तक पहुँचा देगा। खच्चर वाले खीम सिंह से मुलाकात हुई। उसने कहा की किराया तो 500 रुपये बनता है, पर आप लोग मेरे गाँव ही जा रहे हो तो 300 रूपये दे देना। हम तैयार हो गए। लम्बी पैदल यात्रा में एक दिन के लिए ही सामान ढोने से निजात पाने का सुख वो ही समझ सकता है, जो इस तरह की यात्राओं में गया हो।

एक खच्चर में हमारा सामान बाँधा गया। खीम सिंह के साथ एक अन्य साथी, खिलाफ सिंह भी अपने खच्चर के साथ था जिसमें गाँव के लिए असबाब बंधा था। बधियाकोट से समदर जाने के लिए विनायक की कड़ी चढ़ाई है। हम लगे बाटे। विनायक के रास्ते में ही टिकुली पर ध्यान दिया। विनायक यानी दर्रे पर पहुँच कर जीभर कर टिकुली को देखने के बाद ही उसका नाम पूछने की हिम्मत आई। खीम सिंह ने बताया की उसका नाम टिकुली है। टिकुली खुद अपना नाम बताने में शर्मा नहीं रही थी। वह दर असल मेरी भाषा में बात नहीं कर सकती थी। हमारा सामान टिकुली ही ढो रही थी। ताम्बे के रंग की इस खच्चरी के माथे पर एक सफेद रंग का प्रकृतिक जन्मजात टीका था। इसलिए उसका नाम टिकुली रखा गया था। टिकुली से मुलाकात की कहानी ये थी। और जब मैंने खिलाफ सिंह से उसके खच्चर का नाम पूछा तो उसने हंसते हुए बताया की उसके खच्चर का नाम गुड्डू है।

खीम सिंह, जिसने हमें कुछ देर गाँव वालों से बाते करते सुना था, हमसे हमारे बारे में और यात्रा के बारे में पूछने लगा। हमने बताया कि‍ हम ये यात्रा गाँव के असली हाल जानने के लिए कर रहे हैं और गाँव वालों पर ही निर्भर हैं। जब हम सब बात कर चुके तो उसने बताया की बीस साल पहले 1994 में भी वो हम लोगों से मिला था। फिर उसने आमंत्रण दिया की आप लोग स्कूल में सो जाना तथा खाने का इन्तजाम अपने घर में वह करेगा। हम उस पर बोझ नहीं बनना चाहते थे, तो उससे कहा की गाँव में मिल-जुल कर व्यवस्था कर लेंगे। पर वह जिद पर अड़ गया कि‍ खाना तो उसके घर ही होगा। हमें हामी भरनी ही पड़ी।

शम्भू गाड पार कर ही हम समदर गांव पहुंच सकते थे। शम्भू गाड पर भी लकड़ी का बेहद खतरनाक पुल था। हिलने वाला..हमने वह भी डर-डर कर पार किया। पर टिकुली और गुड्डू ने तो ऐसे पार किया जैसे- ये उनके लिए कोई बात ही न हो। टिकुली को देखा एक बार तो ऐसा लगा कि‍ मुझे डर-डरकर पुल पार करता देख हंस रही है। पर इस बात को मैंने दिल पर नहीं लिया।

समदर गाँव की शुरुआत पर ही नदी के किनारे चा-पांच घराट बने हुए हैं। और उनमें इतना पानी है कि‍ साल भर चलते रहते हैं। जब समदर में प्रवेश किया तो बिजली नहीं थी। उसी वक्त लगा कि‍ इन घराटों से बिजली बनाने की व्यवस्था हो, तो समदर में कभी बिजली का संकट न हो और दिन में बिजली से कोई कुटीर उद्योग चलाया जा सकता है। पर बड़े बांधों से कमीशन खाने वाले हमारे नीति नियंता. इतना ‘छोटा’ क्यों सोचेंगे भला!

हमने गाँव के स्कूल में डेरा डाला। गाँव के कुछ लोग मिल गए थे। बातचीत हुई। खीम सिंह ने स्वयं ही सबको बता दिया कि यात्रियों को खाना वह ही खिलाएगा। अब हमारे कहने की कोई गुंजाइश कहाँ रह गयी थी। थोड़ी देर में बच्चे आए। उनके हाथ में झाड़ू था। उन्होंने बरामदा साफकर दिया। हमने अपना सामान फैला दिया। थोड़ी देर में खिलाफ सिंह लदाफदा आया और कुछ दरियां और कम्बल हमारे लिए बिछा दिए। पर थोड़ी देर में ही मौसम गड़बड़ होने लगा। खीम सिंह ने स्कूल मास्साब की खोज की कि‍ वह हमारे लिए कमरा खोलें। पता चला कि‍ मास्साब दो दिन की छुट्टी पर हैं, इसलिए स्कूल बंद है और चाबी भी वह ले गए। खीम सिंग को चिंता हो गयी कि कहीं हम रात को बारिश से परेशान न हों। उसने पहले की तरह ही निर्णय लिया और एलान कर दिया कि छह के छह यात्री उसके घर पर रहेंगे। हम कुछ रियेक्ट कर पाते उससे पहले ही खीम सिह दरियां उठा कर अपने घर की ओर चल दिया। हम भी पालतू पशु की तरह उसके पीछे चल दिए।

खीम सिंह घर में हमारे ठहराने का सन्देश पहले ही भिजवा चुका था। हम उसके घर पहुंचे ही थे कि‍ गर्म चाय हमारे लिए हाजिर थी। उसकी पत्नी और दो लडकियां हमारे लिए इंतजाम में जुट गईं। मकान पहाड़ी स्टाइल का पत्थर का बना था। फर्श पर मिटटी की पुताई थी। जमीन पर दरी में हमने अपने स्लीपिंग बैग बिछा लिए। खीम सिंह की पत्नी ने नमस्कार किया। नाम पूछा तो उसने अपना नाम साबेत्री बताया। सावित्री ही होगा, पर गाँव में यही उच्चारण चलता है। बेटी हेमा बड़ी थी। वह खाने का इन्तजाम करने लग गई। आश्चर्य यह था कि‍ बिना पूर्व सूचना के अचानक छह लोगो के घर आने पर भी वह महिला बिलकुल सामान्य थी।  हंस-हंस कर हमसे बात कर रही थी। क्या हम शहरी लोग,  जिनके पास संसाधन हैं भी,  अचानक छह मेहमानों को अपने घर लाने की हिम्मत कर सकते हैं ? और अगर ले भी आएं तो वह बिरले ही होंगे कि‍ खाना बनाने की जिम्मेदारी वाले इस तरह खुश रहें। यही तो असली भारत है। गाँव है, जिससे मानवीयता जिंदा है।

हमने मट्ठे की मांग भी कर दी थी। बिटिया गाँव से मट्ठे का जुगाड़ करने चली गयी। रात को हरी सब्जी,  हरा नमक मिला मट्ठा और कोदे की रोटी खायी गयी। क्या स्वाद था। रात को जब हमने खीम सिंह को खच्चर के किराए के तय से ज्यादा पैसे देने चाहे तो उसने सिर्फ तीन सौ रुपये ही लिए।

साबेत्री बोली, ‘‘ये तीन सौ तो टिकुली की कमाई है। उसे तो हम ले ही रहे हैं, ज्यादा क्यों लें। मेहमानदारी तो हमारा फर्ज ठहरा।’’

इस बीच खीम सिंह के बहन जानकी भी आ गयी, जो इसी गाँव में रहती है। रात को हमने खिलाफ सिंह, साबेत्री, खीम सिंह और हेमा से पहाड़ी गीत सुने। बहन जानकी ने भी हमारे साथ गीत वगैरह गाए। जानकी दी जब हमारे बारे में सुना कि‍ हम गाँव वालों पर निर्भर हैं, तो बोली, ‘‘सुबह खाली पेट मत जाना। सुबह का नाश्ता मैं कराऊंगी।’’ हम इन लोगों की जिंदादिली पर अवाक थे और दरियादिली पर भी।

सुबह जल्दी जाना था। सुबह पांच बजे ही दरवाजे पर दस्तक हुई। दरवाजा खोला तो जानकी बहन खड़ी थी। ये बताने कि‍ नाश्ता तैयार है। वह सुबह तीन बजे ही उठ गई थी, हमारे लिए नाश्ता बनाने। उसने बेटी के साथ मिल कर आलू के गुटके और पूरी बनाई थी। हमें छक कर खिलाया और बची हुई बाँध दी रास्ते के लिए।

सुबह विदा हुए तो खीमा, उसका परिवार जानकी दी का परिवार, साबेत्री हमें विदा कर रहे थे। मैंने साबेत्री के साथ टिकुली की फोटो खींची। सच में टिकुली की कमाई से खीमा-साबेत्री के परिवार ने हमें खिलाया था। टिकुली मुझे अन्नपूर्णा जैसी लग रही थी…! मैंने उसे गले लगा लिया।

बहन, फिर आयेंगे तेरे पास : कमल जोशी

anushka.kamal joshi

कल ही फेसबुक पर नंदा जात्रा के साथी ने एक फोटो पोस्ट की, लिखा: “इस बहन को हम भूलेंगे नहीं..!” और मैंने भी जवाब दिया भूलेंगे..? क्या हम उसे भूल सकते हैं! एक बार फिर उससे मिलने चलेंगे!
इस बहन से मुलाक़ात की भी एक कहानी है।
हम रात बिताने के लिए किसी जगह की तलाश कर रहे थे। नंदकेसरी से आगे, हमें सड़क से नीचे एक छोटा सा समतल स्थान दिखा। यह रात रुकने के लिए उपयुक्त स्थान था। हमने गाडी़ रोक दी, समतल स्थान के बगल में ऊँचे स्थान पर पठालों की छत वाला मंदिर जैसा स्ट्रक्चर था। यह मैदान मंदिर की सीमा के अन्दर लग रहा था। टैंट लगाने के लिए जगह उपयुक्त तो थी पर मंदिर परिसर में अजनबियों का टेंट लगाना…? गाँव वाले ऑब्जेक्शन तो नहीं करेंगे- हम इस सवाल से झूझने लगे।
किसी स्थानीय व्यक्ति से पूछने की गरज से हम इधर-उधर नज़र दौड़ाने लगे। मेरी नज़र सड़क के ऊपर के मकान पर पडी़। मैंने साथियों से कहा की इस घर में रहने वाले लोगों से पूछा जा सकता है। तभी हमने देखा कि‍ उस घर के आँगन से भी एक लड़की हमारी और देख रही है। मैंने उससे पूछा, “भूली, क्या हम इस मैदान में रात रहने के लिए रुक सकते हैं?”
“हाँ, हाँ, रुक सकते हो, पर रहोगे कैसे..!” उसने काउंटर क्वेश्चन किया। हमने गाडी की छत की और इशारा कर उसे बताया, “हमारे पास टैंट हैं. वो लगा लेंगे।”
“लगा लो।” वह बोली, फिर जोड़ा, ”ऊपर घर पर आओ…!”
जिस अधिकार से उस लड़की ने बुलाया तो हमें जाना ही था। हम पांचों यानी मैं, रजनीश, योगेश, ललित और प्रमोद चल दिए उसके घर की ओर। जब तक हम सड़क के ऊपर उसके घर पहुंचते, तब तक उस लड़की ने बाहर आँगन में प्लास्टिक की कुर्सियां लगा दी थीं। हम उन पर पसर गए। तब मुझे याद आया की हमने उस लड़की को शिष्टाचार वाला नमस्ते नहीं की। लेकि‍न इससे पहले हम यह औपचारिकता निभाते उस लड़की ने प्रश्न किया जिसमे उत्तर भी सम्मलित था, “तो आप लोग नंदा राज जात में शामिल हो..?” हम सिर्फ हाँ ही कह सकते थे।
“मैं समझ गयी थी।” वह बोली।
“चाय पियोगे।” उसने पूछा। यात्राओं में इस तरह ऑफर का अपमान नहीं किया जाता। इसलिए पांचों कोरस की तरह बोल पड़े “हाँ..!”
“बैठो फिर, मैं चाय बनाती हूँ।” और वह अन्दर चाय बनाने चली गयी।
जब वह हमें चाय दे रही थी, तभी एक वृद्ध महिला कमरे से बाहर आई। लड़की ने कहा “ये मेरी सास हैं।” हमने उन्हें नमस्ते की और लड़की को भी अब नमस्ते कर पाए।
अपने ग्रुप में सबसे बड़ा होने के नाते ये मेरी जिम्मेदारी थी कि‍ मैं अब अपने साथियों का परिचय कराऊँ। मैंने सबके नाम बताये। लड़की ने कहा कि‍ उसका नाम अनुष्का है। वह छब्बीस-सत्ताइस साल की रही होगी, दुबली पतली। हमने उसकी सास से कहा कि‍ हम रात रहने के लिए जगह ढूँढ़ रहे हैं। मंदिर के मैदान में रुकना चाहते हैं।
“अरे, रात ही रुकना है तो हमारे घर ही रुक जाओ…!” वह लड़की बेबाकी से बोली।
“धन्यवाद, पर हम टेंट लगा कर ही रहेंगे।” हमने कहा।
“खाने का क्या करोगे..?’’ अनुष्का का अगला प्रश्‍न था। हमने उसे बताया कि‍ हमारे पास खाने की व्यवस्था है।
“लकड़ी जला कर खाना पकाओगे।” वह पूरी जानकारी लेने के लिए उतारू थी।
“नहीं, हमारे पास एक छोटा स्टोव है। उस पर बनायेंगे।” हमने कहा।
वह बोली, “पानी का क्या करोगे?’’
अब ये तो अब तक हमने सोचा ही नहीं था। हम कुछ कह पाते, अनुष्का बोल पडी, “नीचे पानी नहीं है। तुम हमारे यहाँ से पानी, बाल्टी और लोटा ले जाओ।”
अंधे को क्या चाहिए दो आँखे..! हम सबने एक साथ सहमति से मुंडी हिला दी।
रहने की व्यवस्था होने के बाद हम निस्फिक्र हो गए थे। अनुष्का और उसकी सास से बातें करने लगे। उसकी सास ने बताया कि‍ इस गाँव का नाम कांडा है। कल उनके घर के बगल से ही राज जात गुजरेगी। और आगे दो किलोमीटर दूर ल्वाणी गाँव के मंदिर में मेला भी लगेगा। अनुष्का का पति ल्वाणी गाँव में दुकान करता है और ससुर ल्वाणी के मंदिर के पुरोहित हैं। अनुष्का के दो बच्चे हैं।
मैं गाँव की इस लड़की के आधुनिक नाम अनुष्का से असमंजस में था (मुझे क्यों असमंजस होना चाहिए था, मुझे ही पता नहीं)। मैंने अनुष्का से उसके मायके के बारे में पूछा।

‘‘मेरा मायका हल्द्वानी में है। मैं वही पैदा हुई, पिताजी भी वहीं थे नौकरी में। अब घर भी बना लिया।” उसने जवाब दिया। यहाँ गढ़वाल के बहुत लोग हल्द्वानी के आसपास बसे हैं। उसका भाई विदेश में है। किसी होटल में नौकरी करता है। उसी के पैसे से हल्द्वानी का मकान बना। अनुष्का बी.ए. तक पढ़ी है। शादी के बाद ही गाँव देखा।
“ तो शादी के बाद हल्द्वानी जैसे शहर से इंटीरियर गाँव में आकर कैसा लगा।” अनुष्का बस मुस्करा भर दी।
उसने हमारे बारे में भी पूछा- कहाँ से आये हो, क्या करते हो। हम कुछ देर तक गपशप मारते रहे। अनुष्का और उसके परिवार के व्यवहार से एसा लगा ही नहीं कि‍ हम अजनबी हैं।
वह बीच-बीच में काम के लिए इधर-उधर भी जा रही थी। हमारी समझ में आ गया कि‍ शायद हम उसके काम करने में डिस्टर्ब कर रहे हैं। हमने इजाज़त ली और पूछा कि‍ पानी की टंकी कहाँ है?
“चाय के एकदम बाद पानी नहीं पीते।” उसने डांट कर मुझसे कहा। उसे समझ आने लगी थी कि‍ इस आदमी की दाड़ी तो सफ़ेद हो गयी, मगर अकल कम है।
मैंने कहा, “पीने के लिए नहीं, हम अपने गिलास धोना चाहते है।” सामान्य रूप में हम यात्राओं में ऐसा ही करते है। (घर में भी करना चहिये)।
“अरे, ऐसा क्यों, बहन के होते हुए तुम गिलास धोओगे?” उसने रिश्ता जोड़ते हुए टिपिकल जवाब दिया, जैसा की उसे पुरुषवादी समाज ने सिखाया था।
“भाइयों को भी तो काम करना चाहिए, बहन ने चाय पिला दी, भाई बर्तन धो सकते हैं।” मैंने कहा, तो उसने मेरे हाथ से गिलास छीना और अधिकार से बोली, “ज्यादा नाटक मत करना मेरे सामने!” अब हम चुप हो गए।
अब हम कुछ कर नहीं सकते थे। योगेश, जो हम सबसे छोटा है, उसने पानी की बाल्टी उठायी और हम अपने कैम्पिंग स्थल की ओर चले आये। हमारे जाने से पहले अनुष्का ने ताकीद दी, “देवता का स्थान है, गंदा मत करना!”
मैं उसका तात्पर्य समझ गया था, हमारा कैम्पिंग ग्राउंड मंदिर के परिसर में था। अतः उसके आसपास मल-मूत्र त्याग करना वर्जित था। उसे जवाब दिया, ‘‘हमें पता है। हम ध्यान रखेंगे।”
हम वापस लौट कर आये, थके थे। आराम किया। रात घिर आयी तो खाने का इंतज़ाम कर सो गए। उस रात मुझे दमे का अटैक पडा।
मैं सुबह जल्दी उठ गया, अँधेरे में ही। पता था कि‍ सुबह की प्राथमिकतायें अँधेरे में ही निपटा ली जाएं तो बेहतर होगा। वैसे भी दमे की वजह से सोया नहीं था।
रात को ही एक बोतल में पानी भर लिया था। उसे लिया और सड़क में दूर जा कर निपट लिया। लौटा तो साथी भी उठ गये थे। जैसे ही हम केम्पिंग साइट के ऊपर आये तो देखा अनुष्का बाहर खडी़ है। हमें देख कर उसने बुलाया। हम ऊपर गए तो बोली, “भैजी, मैंने तुम लोगों के लिए चाय बनायी है पी लो।” ऐसी बहने कहाँ मिलती हैं!
मैं तो निपट चुका था। हमारे साथी जो चाय पी रहे थे, लालायित नज़रों से शौचालय को देख रहे थे। उनमें से कुछ को बाहर निपटने की आदत नहीं थी। उनकी नज़रों को अनुष्का बहन ने भांप लिया। वो शायद भाइयों की ज़रूरत समझ गयी थी और उन्हें शर्मिन्दा नहीं करना चाहती थी। सो वह खुद ही बोल पडी, “आप लोग यहाँ ही बाथरूम का इस्तेमाल कर लो।” उसका वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था कि‍ हम में से एक शौचालय पर कब्ज़ा जमा चुका था।
निवृत होकर साथी कैम्प में आ गये। हमने अपना कच्छा-बनियान उठाया और एक किलोमीटर दूर एक रौले में नहाने चले गए। हमारा विचार आज की रात भी यहीं रहने का था और कल कैम्प समेटने वाले थे। दिन में हम ल्वाणी गाँव के मंदिर में जाना चाहते थे, जहाँ शाम को मेला होना था।
तैयार होकर हम ल्वाणी के लिए निकल पड़े। रास्ता अनुष्का के घर के आगे से ही था। जब हम वहां पहुंचे तो देखा एक सज्जन टंकी में कपडे धो रहे हैं। उन्होंने हमारे बारे में पूछा। हमने अपने बारे में बता दि‍या। उन्होंने बताया कि‍ वह पास के ही एक स्कूल के हैड मास्टर हैं। बातचीत में हमने उन्हें यह बताया कि‍ नीचे हम  ने टैंट लगाए हैं। आज रात भी यही रहेंगे। “आप लोग सुबह भी तो यहाँ आये थे, बाथरूम यूज़ कर रहे थे।” उन्‍होंने पूछा। साथियों ने हामी भरी।
“आप लोगों को यहाँ परेशानी हो रही है। आप यहाँ से 12 किलोमीटर दूर स्कूल में चले जाओ। वहाँ पानी और बाथरूम दोनों हैं।” उन्होंने सुझाव दिया।

“ हमें कोई परेशानी नहीं। यहाँ अच्छा लग रहा है।” रजनीश ने जवाब दिया।
वह फिर भी वो हमें स्कूल में जाने के लिए जोर देने लगे। इस पर मैने कहा, “सवाल परेशानी का नहीं, रात को यहाँ पास में फल्दिया गांव में राज जात आयेगी। हम उसके साथ ही हैं। पैदल ही चल रहे हैं। बस टैंट का सामान लेकर गाडी़ में आए थे।” पर वह काफी देर तक हमें समझाते रहे कि‍ हमें वहां जाना चाहिए। “फायदे में रहोगे।’’ उन्होंने जोड़ा। मेरी समझ में नहीं आया कि‍ यह व्यक्ति क्यों हमें यहां से आगे भेजने पर क्‍यों उतारू है। जब उसने अंत में कहा कि‍ ‘पानी कम पड़ जाएगा’ तो हम समझे। दरअसल हैड मास्टर साहब अनुष्का बहन के किराएदार थे। उन्हें लगा कि‍ हम नहाना-धोना भी यहीं कर रहे हैं, तो पानी ख़त्‍म हो जाएगा और उन्‍हें परेशानी होगी।  इसीलिए वह चाहते थे कि‍ हम यहाँ से दफ़ा हो जाएं। जब वे ज्यादा जिद करने लगे तो योगेश, जो हम में सबसे छोटा है, बोला, “अरे भाई, यहाँ जब हमारी अनुष्का बहन का घर है, तो हम आगे क्यों जाएं?” वह चुप हो गए। जब मैंने खुलासा किया कि‍ हम नहाने रौले में गए तो वह कुछ शांत हो गए। अब उन्हें पानी ख़त्‍म होने का डर नहीं था। हमें अनुष्का बहन के विशाल हृदय का भान हुआ। निश्‍चछ प्रेम का भी।
ल्वाणी से लौट कर हम आये तथा कैम्प में रबर शीट फैला कर सो गए। चार बजे के आसपास मैंने देखा की मैदान के दूसरे छोर से अनुष्का आ रही है। उसकी पीठ पर घास का बड़ा गठ्ठर है। वह पास आयी तो मैंने कहा, “घास लेकर आ रही है भुल्ली!!” उसने हामी भरी, गठ्ठर पैरापिट पर रखा। मैंने देखा, उसके पास दाथी नहीं है। मुझे लगा कि‍ वह कहीं छोड़ तो नहीं आयी। उससे पूछा, “तुम्हारी दाथी कहाँ है?” वह बोली, “मुझे घास काटना नहीं आता। मेरी सास काटती है और मैं उठा कर लाती हूँ। शादी से पहले हल्द्वानी शहर में रही, तो वहां घास काटने का सवाल ही नहीं था। शादी के बाद यहाँ आयी, तो अब यह करना ही पड़ता है, पशु हैं घर पर। एक-दो बार घास काटने की कोशिश की, तो हाथ ही काट लिया। मेरी सास अच्छी है। वह अब घास काट देती हैं और मैं उठा कर ले आती हूँ।” फिर उसने उंगली दिखाई, और जोड़ा, “आज भे उंगली काट ली मैंने।” उसकी उंगली से खून बह रहा था। कटी उंगली दिखाने के बाद उसने मुट्ठी बंद कर ली। मैं तुरंत बैंडऐड ले आया तथा उसकी उंगली में लगा दिया। वह हंसने लगी और कहा, ‘‘यह तो रोज होता है।”
मैंने चार-पांच बैंडऐड उसे पकड़ते हुए उससे कहा, “आज तेरे भाई हैं यहाँ, तो दवाई लगा ही ले।” उसने अपना गठ्ठर उठाया और कहा, ‘‘भैजी, चाय पीनी है तो ऊपर आ जाओ।” बार-बार उसके पास जाकर उसका काम बढा़ना अच्छा नहीं लग रहा था। इसलिए चाय पीने नहीं गया। बैठा सोचता रहा कि‍ लड़कियों की जिन्दगी भी क्या है? अपना घर भी अपना नहीं, हल्द्वानी में पढ़ी-लिखी, शहर के अन्दाज सीखे और शादी के बाद अब इस बीहड़ गांव में रह रही है! अगर लड़कों को शादी के बाद इस तरह के परिवर्तन करने पड़े तो क्या वे कर पायेंगे? मन जाने क्यों दुखी-सा हुआ।
शाम को हम नंदा राज जात की अगवानी के लिए फल्दिया गाँव गए और वहीं रास्ते के एक गांव के भंडारे में खाना खाया। सुबह उठे तो देखा सड़क पर चहल-पहल है। पता चला कि‍ गाँव वाले यात्रियों के खाने के लिए भंडारा कर रहे हैं। सडक के किनारे खम्बे गाड़ रहे है, बल्कि वे हमारे जागने का इंतज़ार कर रहे थे। जहां पर उन्हें खम्बा गाड़ना था, वहां पर हमारी गाडी़ खडी़ थी। रजनीश ने गाडी़ खिसका कर जगह बनायी। पता चला की खाने की तैयारी अनुष्का के बरामदे में हो रही है।
हमने अपने टैंट समेटे और सामान बाँध कर आठ बजे के आसपास गाडी़ में लाद दिया। एक साथी उसे आगे ले जाने वाला था और हम पैदल जात के साथ आने वाले थे।
अनुष्का से विदा लेने का वक्त आ गया था। रास्ता उसके घर की आगे से जाता था। हम सब उससे मिलने उसके घर गए, विदाई लेने। जैसे ही हम घर के बरामदे में पहुंचे तो देखा अनुष्का औरतों के साथ काम कर रही है। हमें आता देख वह खडी हुए और औरतों से हमारा परिचय कराया, ‘‘ये मेरे भाई हैं!” हम सच में गदगद हो गए। जाने क्यों मेरा सीना फूल गया। शायद इतनी काबिल और अच्छी बहन पाने पर।
हम अपने साथे कुछ बिस्कुट और चोकलेट लाये थे, अनुष्का को दिए। उसने बिस्कुट लेने से मना किया और कहा कि‍ आप को जरूरत पड़ेगी। हमने जबरदस्‍ती उसे बिस्कुट पकडा़ए। फिर हमने कहा, “हम जा रहे हैं। विदा लेने आए हैं।”
“बहन के घर से बिना खाए कैसे जाओगे?” अनुष्का ने डांटा। फिर मेरे पिठ्ठू को छीन कर उतार लिया।
‘इंतज़ार करो थोड़ी देर’ कह कर औरतें जहां काम कर रही थीं, चली गयी। वहां उसने बड़ी कडा़ई से छोटी कड़ाई में तेल निकाला। बड़ी कड़ाई में पूरी बनाने में देर लगानी थी। हमारे लिए छोटी कड़ाई में पूरी तलने लगी। एक औरत हमें चाय दे गयी। थोड़ी ही देर में अनुष्का ने हमारे सामने पूरियों का ढेर लगा दिया और साथ में चने भी। हमने जम कर पूरियां भकोसी। अनुष्का बीच-बीच में कहती रही, “पेट भर कर खाओ, पैदल चलना है चढ़ाई में।” पूरियों में अनुष्का के स्नेह का स्वाद भी था।
अब हमें जाना ही था। विदा लेते वक्त मैं उसको गले लगाने से रोक नहीं पाया। “भाइयो, आते रहना इस बहन के पास।” अनुष्का ने अनुरोध किया.. हमें प्रोमिस करनी ही थी।
पैदल रास्ते में मैं दूर तक उस मकान को देखता रहा, जहां हमारी एक बहन रहती है, जिसकी एक उंगली में पट्टी बंधी थी।

रचनाकार, रचना और पाठक का संगम

नई दि‍ल्ली : पि‍छले कई वर्षों से हर साल पुस्तक मेले में जाता हूं। वहां जाकर एक अलग ही तरह का आनंद मि‍लता है। अपनी पसंद की कि‍ताबों, कई रचनाकारों और हजारों पाठकों को देखकर मन को खुशी मि‍लती है कि‍ दूरसंचार के माध्यंमों में अभूतपूर्व वि‍कास के बाद भी कि‍ताबों के प्रति‍ लोगों का लगाव कम नहीं हुआ है। इस एक फायदा यह भी की कि‍ देश के वि‍भि‍न्न हि‍स्सों से आए मि‍त्रों से मुलाकात हो जाती है। इस बार भी कई मि‍त्रों से मि‍लना हुआ। आप भी मि‍लि‍ए-

ramji tiwari aur anurag

रामजी ति‍वारी से मुलाकात।

anurag

प्रगति मैदान में बच्‍चों के हाल में साबू से मिलकर बचपन याद आ गया।

Devendra Mewari aur anurag

विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी के साथ।

kamal joshi aur anurag

चर्चित फोटोग्राफर-लेखक कमल जोशी से मिलना सुखद रहा।

सुधीर शर्मा से मि‍लना प्रेरणादायक है।

सुधीर शर्मा से मि‍लना प्रेरणादायक है।

 

युवा अभि‍षेक पुनेठा से मि‍लकर मन आश्‍वस्‍त हुआ।

युवा अभि‍षेक पुनेठा से मि‍लकर मन आश्‍वस्‍त हुआ।

 

 

 

 

 

 

abhinav upadhyay, ashutosh aur anurag

पत्रकार अभिनव उपाध्‍याय और आशुतोष से भी गपशप हो गई।

Tomoko Kikuchi anu anurag

जापानी लेखि‍का-अनुवादक तोमोको किकुची से मिलकरअच्‍छा लगा।

ashima kumari aur anurag

युवा लेखिका आशिमा कुमारी के साथ।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

चि‍त्रकार कुॅवर रवीन्‍द्र से मि‍लना उपलब्‍धि‍ रही।

चि‍त्रकार कुॅवर रवीन्‍द्र से मि‍लना उपलब्‍धि‍ रही।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अरुणाभ सौरभ और दि‍नकर कुमार से संक्षि‍प्‍त मुलाकात ही हो पाई।

अरुणाभ सौरभ और दि‍नकर कुमार से संक्षि‍प्‍त मुलाकात ही हो पाई।

नए साल पर : कमल जोशी

kamal joshi. new year
इस बार मत सोचना
अपने और अपनों के बारे में।
सोचना कुछ
उदास आँखोंवाले भूखे बचपन के बारे में।
खाली हाथ जवानी के बारे में।
जीने, और थोड़ा और बेहतर जीने के
सपने देखनेवाली लड़की के बारे में।
दिन-भर हाड़ तुड़ाती, मेहनत करती
फिर भी भूखी रहती व पिटती औरत के बारे में।
बंधती, बिकती और लुटती नदी के बारे में।
पानी के बारे में, हवा के बारे में, जंगल के बारे में
और गौरय्या के बारे में।

और हाँ! सोचना जरूर,
इन नेताओं के बारे में,
अपने गुस्से के बारे में
अपने निश्चय के बारे में !

लि‍खो बेटी : कमल जोशी

चर्चित फोटोग्राफर और कवि‍ कमल जोशी ने एक खास कवि‍ता लि‍खी है- ‘लि‍खो बेटी’। उस पर बेहद खूबसूरत कवि‍ता पोस्‍टर बनाया है चि‍त्रकार के. रवीन्‍द्र ने-

kamal joshi.K. Ravindra Singh