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पन्‍द्रह छोटी-छोटी कवितायें : जवाहर लाल गोयल

प्रसि‍द्ध लेखक-चित्रकार जवाहर गोयल की छोटी कवि‍तायें -

1-

घर में रहते हुये

दिन डूबने पर लगता

काश घर में होते

2-

कुछ पढा़ नहीं जाता पर

हाथ अपने से बढ़ता

लगता पढ रहे होते

3-

झरती गिरी थीं पत्तियाँ

धूल में बिखरती रहीं

यह अलग सच था

पेड़ हरा होता रहा

4-

तेज हवा में नबी घास

बिछ गयी जमीन पर

बारिश थमते ही तनी खडी

फिर झूम के लहरा रही

5-

केवल मेरा

यह गूंजन करता भौंरा

सारे दिन मौन कुतरता

6-

शाम में

आता याद

अंधेरे का इतिहास

7-

पत्तों पर गिरते पत्ते

धूल माटी डंठल

धरती की गहरी साँस

धीमे से उड़ती राख

8-

होता प्रतिदिन सबके साथ

पर कितना अकस्मात

कितना नूतन कितना विराट

कोई भी पहला अनुभव स्मृत

9-

पत्तों से पत्तों पर गिरती

बारिश की आवाज

रात में ढोल मजीरों का उल्लास

10-

सूखी कडी़ मिट्टी

खोदने पर

नीचे नर्म मिलती

11-

जंगल में घुस

बढ़ता दिन खुलता

सब कुछ पीछे कर

पेड़ों को ले आता निकट

12-

पाने का मन याने लालच

होने का मन याने सत्ता

नाद याने उन्मुक्त गूँजती रिक्तता

13-

यह मैं हूँ।

कहाँ?

यहाँ कुछ भी नही!

केवल तुम्हें पाता मैं।

14-

अनुभव नहीं

ज्ञान नही

केवल क्षितिज सी मुस्कान

घंटी के स्वर

कम्पन्न

थमता मन

थिरता समय

15-

शब्द जमा हों और बहें

ढलान पर धारा में पारदर्शी

निथरते सूखते दाग छोड़ते

सोखे जाते विलीन होते

वत्सल धरा बनते

 

हबीब का घर : जवाहर गोयल

प्रसिद्ध लेखक जवाहर गोयल की कहानी-

हम सबको उस दिन भी क्रिकेट खेलना था। क्योंकि वह छुटटी का दिन था। फिर हबीब मियां का फरमान था कि स्कूल टीम को रोज अभ्यास करना जरूरी है। लेकिन कप्तान के कहने के बावजूद हम लोगों ने मैदान देर से पहुचना तय किया था। हबीब को हमने पहले ही बता दिया था कि सुबह हम सभी उनके घर सेवैंया खाने आएंगे। फिर वहीं से खेलने के लिए स्कूल पहुंचेंगे। उस दिन ईद थी।
हबीब का घर जिस इलाके में था,  उसकी सड़कें कच्ची थीं। सड़क की गिट्टियां उखड़ी रहने से साइकिल पंचर होने का भय हमेशा रहता था। तंग गलियों में उन कच्चे-पक्के मकानों के बीच में हबीब का घर था। उस गली के ज्यादातर मकानों के दरवाजे-खिड़कियों में बोरे का फट्टा पुरानी चादर या रंगीन प्लास्टिक, आड़ के लिए पर्दों के बतौर टंगे रहते थे। वहां कौन क्या पेशा करता है,  समझना आसान नहीं था। शहर छोटा था। सभी एक-दूसरे को पहचानते थे। कोई भी एक-दूसरे के लिए पूरा अजनबी नहीं था। उस गली में दूसरे मकानों की बनिस्‍बत हबीब का मकान अपेक्षाय: संपन्न लगता था। एक वही पूरा सीमेंट का बना पक्का मकान था। मय छत और सीमेंट के खप्परों वाले छप्पर के, खिड़कियां काठ की थीँ। बनने के बाद उन पर कभी रंग नहीं हुआ था। इस कारण खिड़कियों का काठ पुराना और काला-सा हो गया था। पर बुरा नहीं लगता था। खिड़कियां शायद कभी खुली ही नहीं या फिर हमने उन्हें कभी खुला नहीं देखा।
इसी तरह दरवाजे के निचले हिस्से का काठ भी काफी कुछ गल चुका था। दरवाजा तब भी मजबूत था। उघारे काठ का ऊपरी हिस्सा, खासकर कब्जों के पास का पूरा भाग, पूरी तरह दुरुस्त था। भले ही धूसर काला-सा लगता था। शहर में ऐसे बहुत ही कम घर थे जिनमें बिजली की घंटी लगी हो। मेरे किसी भी मित्र के घर बिजली की घंटी नहीं लगी थी। दरअसल घरों के दरवाजे दिन में बंद नहीं किए जाते थे। जब सब सोने को हाते तब ही दरवाजों को बंद किया जाता। हम लोग तो सड़क से ही दोस्‍त को आवाज लगाते हुए, घर में सीधा भीतर तक चले जाते। जिससे मिलना चाहते थे, उसे खोजकर या फिर वहां जो भी मिला उससे बतियाकर लौट जाते थे। किंतु हबीब के घर बिजली की घंटी लगी थी। बाहर के दरवाजे की चौखट पर ऊपर की ओर बिजली की घंटी का काले प्लास्टिक का गोल बटन धूप में साफ चमकता था। इसे दबाने पर जोरों से किर्र को आवाज गूजंती..। उस गली के शांत,  मंद मिजाज में वह आवाज चारों ओर ऐसी गूंजती कि हम लोग थोड़ा सहम-सा जाते, कि आवाज सुनकर कोई नाराज न हो जाए। लेकिन जल्दी से कोई उत्तर भी नहीं मिलता था। थोड़ी देर के बाद ऊपर छत की तरफ से या फिर भीतर वाले कमरे से कोई खटका सुनाई देता या किसी हरकत की आवाज होती। ‘कौन’ या ‘आया’ की आवाज नहीं आती। थोड़ी देर के बाद दरवाजा खुलता। कई बार जब दरवाजा खुलता तो उसे खोलनेवाला आड़ में होता और दिखाई नहीं देता। या फिर दरवाजा खोलने के बाद, आड़ से हटकर भीतर चला गया होता, बिन कुछ कहे। दरवाजे के पीछे लोहे की एक सांकल थी। लकड़ी का एक खटका भी था। पहले सांकत खोली जाती। सांकल के झूलने से कड़-कड़ की आवाज होती। जब खटका झटकाया जाता तब लकड़ी के घिसने की आवाज के साथ दरवाजा एक खड़ी दरार में खुल जाता। बाहर धूप होने के बावजूद दरवाजे की खुली दरार के भीतर अंधेरा दिखाई देता। तब हम लोग दरवाजा ठेलकर, सड़क पर पड़े उस बड़े चौकोर पत्थर पर पैर रखकर भीतर घुस जाते, जो सीढ़ी का काम देता था। ये सारी बातें इतनी भिन्न पर सहज थीं कि कभी मन में यह उत्सुकता नहीं हुई कि दरवाजे के गल गए निचले हिस्से से हम भीतर झांककर देखते कि दरवाजा किसने खोला था।
यदि दरवाजा इफ्तिकार भाई या एजाज साब ने खोला होता तो ये दरवाजा खोलने पर अवश्य कहते ‘हबीब चला गया’ या ‘बैठो, आता है।’ इफ्तिकार भाई हबीब से तीन साल बड़े थे। वे ही हबीब के पहले स्कूल की क्रिकेट टीम के कप्तान थे। वे तब स्कूल की टीम में आरंभिक गेंदबाज और आरंभिक बल्लेबाज दोनों ही थे। वे ही स्कूल टीम के एकमात्र ऐसे खिलाड़ी थे जो सफेद पतलून,  सफेद कमीज व सफेद चमड़े के जूते पहनते थे। उनके पास क्रिकेट के बड़े खिलाडिय़ों के समान, क्रिकेट की एक गोल सफेद टोपी भी थी। जो मैंने पहली बार उन्ही को पहने देखी थी। उनकी पतलून में, दायीं जेब के सामने का हिस्सा, गेंद के लगातार घिसे जाने के कारण हमेशा लाल दाग लिए होता था। उन दिनों हम लोग मैदान में जाकर क्रिकेट खेलने की हिम्मत नहीं कर पाते थे। स्‍कूल के लाल बजरीवाले रास्ते पर ही मैंटिंग बिछाकर खेलते थे। दरवाजा खोलने पर इफ्तिकार भाई ओठों को एक ओर तिरछा खींचकर मुस्कुराते कहते, ‘कैसे हो’ या चौंकते ‘अरे आप।’ मुझे सुनकर बहुत अटपटा लगता। उनका लहजा नफासत लिए काफी संतुलित और नपा-तुला होता। तब तक मैंने अपने लिए ‘आप’ का संबोधन किसी और से नहीं सुना था। तुम और तू से ही सारा काम पूरा हो जाता था। तब मेरी उम्र ही क्या थी। मुझे उनका आप, उनके घर में पहले कमरे के उस पर्दे की तरह लगता, जो भीतर जाने  वाले दरवाजे पर लटका,  बाकी घर को अदृश्य करता था। वह नीली छींट का पुराना सूती परदा था। लगभग जमीन को छूता हुआ। परदा लकड़ी के गोल डंडे पर कसकर इस तरह लगा था कि उसे बिल्कुल भी सरकाया नहीं जा सकता था। हबीब के घर का यह पहला कमरा एकदम खाली था।
उसे कमरे में सादे काठ की एक पुराने बेंच के अलावा और कुछ भी नहीं था। यहां घुसने पर हम लोग पैर हिलाते उस बेंच पर बैठ जाते और हबीब के बाहर निकलने की प्रतीक्षा करते। खाली कमरे की दो दीवालों में दो खिड़कियां भी थीं। उनके लोहे के काले सींखचे अपनी खास मौजूदगी बताते लगते। ये दोनों ही खिड़कियां सदा से बंद थीं। इनका सादा काठ पुरानेपन के कारण काली-सी लकीरों से पट गया था। पहले कमरे का दरवाजा खुलते ही खाली कमरे में वह बेंच सामने दिखती। उस बेंच के पीछे की दीवार पर एक आलमारी बनी हुई थी। आलमारी के पल्ले लकड़ी के बने थे। उनमें कांच भी लगा था। आलमारी सदा खाली रहती आई। उसकी ताकों पर अखबार भी नहीं बिछाया गया। वह भी खड़ी दरार में अधखुली-सी रही।
यदि दरवाजा एजाज साब ने खोला होता तो हम अतिरिक्त अदब के साथ उन्हें नमस्‍ते कहा करते। एजाज साब,  इफ्तिकार भाई से काफी बड़े थे। वे सदा ही बहुत गंभीर दिखाई देते। अब सोचाता हूं तो ऐसा लगता है कि वह गंभीरता से अधिक उदासी थी। उस उम्र में तो उदासी शब्द का अर्थ भी पूरी तरह समझ में नहीं आता था। एजाज साब क्या करते हैं,  यह हम लोगों को मालूम नहीं था। ऐसा कम ही हुआ कि दरवाजा उन्हें खोलना पड़ा हो। या तो वे घर के भीतर ही रह आते होंगे या फिर घर या शहर के बाहर। सुना था कि बहुत साल पहले जब वे स्कूल के छात्र थे तब हमारे स्कूल की क्रिकेट टीम के कप्तान थे। बल्ले लाने के लिए एक बार जब हम लोग हबीब के घर गए, तब बल्ला देते हुए उन्होंने बल्ला पकडऩे के हमारे ढंग को जांचा था और समझाया था कि उंगलियों की पकड़ व हथेलियों का फासला कैसा होना चाहिए। शायद उसी वजह से,  उसके बाद मेरा डिफेंस पक्का हो गया और पांच फीट से भी नाटा होने के बावजूद मुझे स्‍कूल की टीम में पक्की जगह मिल गई। तब मेरे लेटकट और लेग ग्लांस पक्के हो गए थे।
हबीब के घर,  उस कमरे का पलस्‍तर पानी से भगकर कई जगह पर फूल गया था जिसे ठक-ठकाने पर पोली आवाज आती थी। पानी जरूर खिड़कियों से भीतर आता होगा। छत काठ की मोटी बल्लियों पर, बिना टूट-फूट के दुरुस्‍त फैली थी। कमरे की दीवार दो-तीन जगह रेत-सीमेंट के गारे से सुधारी गई थी। जिसमें वहां बडे़-बडे़ पुराने गाढ़े रंग के धब्‍बे पड़ गए थे। उन पर कभी पुताई नहीं हुई। घर में भी शायद पुताई कभी नहीं हुई। उस गली के मकानों में पुताई तभी होती जब कोई दीवार तोड़कर नया कुछ बनाया जाता। यहां के कच्ची मिट्टी के बने घरों में छुई या गोबार से लिपाई जरूर हो जाती थी- खासकर तीज-त्‍योहार आने पर। उस गली से गुजरने पर अक्‍सर लहुसन के तेज बघार की महक आती जो उसके मिजाज की हिस्सा थी।
हम जब बाहर के कमरे में बैठे हबीब का इंतजार करते होते, तब भी घर के भीतर किसी के बातचीत करने की आवाज कभी नहीं आती थी। हां, हबीब जब बल्ला लिए बाहर आता, तब उसका चेहरा खिला और मुस्कुराता हुआ होता। लगभग हमेशा ही वह कप्तानी आवाज में ‘चलो’ कहता,  और बाहर निकलकर सड़क पर खड़ा हो जाता। हम उसके बाद ही उसके घर के बाहर निकलते। फिर यह दरवाजा बंद हो जाता और सांकल लगने की आवाज आती।
हबीब इतना ऊंचा और दुबला था कि आश्चर्य होता, उसमें इतना दम खम कहां से आता था। उसे हर तरह की गेंदबाजी में महारत थी। खासकर उसकी स्पिन हवा में उछाल के साथ इतनी अचूक और कारगर होती थी कि हम सभी को विश्वास था कि आने वाले सालों में वह टेस्ट नहीं तो रणजी के मैच में तो जरूर खेलेगा। स्कूल की टीम का प्रमुख बल्लेबाज भी वही था। उसके रहते हमारी टीम दूसरी टीम से हार भी सकती है, सोचा नहीं जा सकता था। हबीब के लिए क्रिकेट से बढ़कर और कुछ भी नहीं था। पढ़ाई के बारे में हम लोगों में बातचीत कम ही होती। कापी-किताबों का लेन-देन भी नहीं करते थे। कभी-कभार साथ में सिनेमा देखने जरूर चले जाते थे। खासकर उस टाकीज में जो नई मस्जिद के पास थी। जहां टाकीज के बगल से कतार में लोहे की जाली बनाने वालों की दुकानें थीं, जिनमें लोहे की वैल्डिंग का काम होता रहता, जिसकी चिंगारियों का उचटना-चटखना देखते मन नहीं थकता था। इन्हीं दुकानों के बीच में कुछ खुली-सी खपरैली चाय की दुकानें भी थीं। जिनमें अक्सर लुंगी-बनियान पहने कुछ लोग बैठे चाय पीते रहते या अखबार पढ़ते होते। रेडियों में उर्दू खबरें सुनते रहते। ये होटल चौड़ी नाली के ऊपर बांस का रपटा बिछाकर, उस पर बेंच रखकर बनाए गए थे। इनके खंभों पर काबा का चित्र या किसी पीर-फकरी वाले कैलेंडर लगे होते थे। हबीब वहां चाय नहीं पीता था।
हबीब में गजब का आत्मविश्वास था। वह बहुत कम बोलता था। अपनी तरफ से बातों की शुरुआत भी कम ही करता था। उसके घर ईद के दिन हमें कांसे के बड़े से साफ कटोरेभर सेवैंया खाने को मिलती। गाढ़ा दूध ऊपर तक भरा होता। हमारे घर सेवैंया बनती नहीं थीं,  क्योंकि बनने पर वह केंचुआनुमा दिखती थी। हम लोग शाकाहारी थे। संस्कार इतने पक्के थे कि फुआ अक्सर झिड़कतीं- ‘मलेच्छ मत हो जाओ’, ‘मांस खाने वालों के घर मत खाया करो।’ चमकता,  दूध सेवैंयाभरा कटोरा कभी खराब नहीं लगा। न ही कोई हिचक हुई। न शाकाहारीपने पर ही कोई खरोंच आई।
उसके घर के बाहर वाले कमरे की उसी अकेली बेंच पर बिठलाकर हम सबको वहां सेवैंया खिलाई जातीं। उसके घर के भीतरी हिस्से में हम कभी नहीं गए, न ही झांका। न कभी हबीब की अम्मीजान को देखा। न ही कभी उनकी आवाज सुनी। हबीब का घर भीतर से एक अनजाने रहस्‍य की तरह हमारे लिए अबूझा रहा। उसके घर के बारे में हम सब कुछ भी नहीं जाते थे,  सिवाय इस बात के कि थोड़ा अलग तरह का होते हुए भी उसका घर,  हम सबके घरों सा एक घर था। कभी ऐसा नहीं लगा कि वे अभाव मे टूटते हैं। न ही कभी उस घर में संपन्नता का ही कोई सबूत दिया। सिवाय इसके कि हबीब मियां जब घर के बाहर निकलकर आते तब उनका चेहरा खिला हुआ व ताजा होता। उनके कपड़े साफ सुथरे रहते जिन्‍हें वे खुद ही धोते और इस्त्री करके पहनते थे। उनकी साइकिल भी साफ-सुथरी और दुरुस्त होती थी। सीट पर रेक्सीन का काला कवर।
स्कूल की पढ़ाई के बाद हबीब से मिलना नहीं हो सका। मैं शहर के बाहर पढऩे चला गया था और उसने उसी शहर के एकमात्र कॉलेज में दाखिला ले लिया। कई सालों बाद की बात है, एक बार जब शहर लौटा तब बस स्‍टैंड में ही कारदार भाई से मुलाकात हो गई। बड़ी अजीब-सी मुलाकात थी वह। जिस बस में मैं अपने शहर लौट रहा था, उसका एक चक्‍का रास्ते में पंचर हो गया था। बस सीधी वर्कशाप के टिन के शेड में जाकर लगी थी। बस से उतरकर टहलने लगा तो देखा कि जो मिस्त्री बस में जैक लगा रहा था, वह कोई और नहीं भाई अब्दुल कारदार ही थे। कारदार भाई हम लोगों से काफी बड़े थे। उम्र में तो इफ्तिकार भाई से भी अधिक के थे। शहर में एक मशहूर खिलाड़ी रह चुके थे। एक जमाने में हाकी टीम के गोलकीपर थे, फुटबाल टीम के फुलबैक थे और क्रिकेट टीम में विकेटकीपर और धुआंधार बल्‍लेबाज थे। राज्‍य की टीम में भी खेल चुके थे। मैंने बचपन में उनके कई मैच देखे थे। एक बार तो हाकी के फाइनल मैच में अपनी हारती टीम को बचाने के लिए उन्होंने एक अजीब काम किया। मैच के आखिरी पांच मिनट बचे थे। उनके टीम को एक गोल से पिछड़ रही थी। वे गोलकीपर थे। उन्होंने पैड उतारकर, लगभग जुनून में तेजी से दौड़कर आगे आकर, सेंटर फारवर्ड की भूमिका निभाई। पांच मिनट में उन्होंने दो गोल दागे। हजारों दर्शक स्तब्ध रह गए। हारती टीम को जिताकर वे लौटे। शहर में उन्हें कंधे पर उठाकर जुलूस निकला। उसके बाद जब कीनिया के साथ भारत के हाकी टेस्ट मैच देखे, तब मुझे लगा कि कारदार भाई, भारत के गोलकीपर शंकर लक्ष्मण से कम नहीं हैं।
वर्कशाप में बस के पंचर को सुधारते हुए  कारदार भाई ने मुझे उस दिन बताया था कि हबीब मियां दो सौ मील दूर, सतपुड़ा के जंगलों के बीच, किसी कागज बनाने वाली फैक्टरी में स्टोरकीपर हैं। शादी कर ली है और बच्‍चे भी हैं। उसके बाद बस स्टैंड से घर जाते हुए जब हबीब के घर के सामने से गुजरा, तब लगा कि वह गली पहले से अधिक संकरी हो गई है। सड़क व मकानात पहले से अधिक कमजोर हो गए थे। हबीब के घर का पलस्तर बुरी तरह झड़ चुका था। दरवाजे और खिड़कियां सदा की तरह बंद थीं। लगता था जैसे अब वहां कोई नहीं रहता हो। उसी यात्रा के दौरान,  अपने एक मित्र से वह बात पता लगी जिससे हबीब के घर का रहस्‍य कुछ-कुछ समझ में आने लगा।
आज इस बैसाखी दुपहरी में जाने क्‍यों हबीब मियां इस कदर यादों में आ रहे हैं? अपने शहर से हजारों मील दूर और अपने बचपने से अनेकों वर्षों बाद, इस कदर हबीब के यादों में उमड़ने का रहस्‍य क्‍या हो सकता है? मैं हबीब के घर के रहस्य को छोड़,  उनकी इस याद के रहस्य को समझने में उलझता चला गया।
दरअसल एक वारदात हुई थी। अखबारों से रोजाना यह ज्ञान तेजी से बढ़ रहा था कि हमारी जात क्या है और दूसरे की जात क्या है। हमारा धर्म क्या है और दूसरों का धर्म क्या है। इसी सब में मेरा मन कुछ उचाट रहने लगा था। इसी दौरान तमाम हादसों के बीच रोज सुबह आफिस जाते हुए, मेरी गाड़ी के हमसफर साथी बहुत उत्तेजित रहने लगे थे। मेरे ये साथी खुले मिजाज और खुली जबान के आदमी थे। सरकारी कंपनी में काम करते थे। उन्हें बराबर यह ध्यान रहता कि वे एक बड़े पद पर हैं। दर्जे के हिसाब से वे देश की चुनिंदा एक प्रतिशत जनसंख्या में गिने जाते। उन दिनों सुर्खियों में दंगों की खबरें थीं। सरकार के कमजोर पैर डगमगा रहे थे। गाड़ी में बैठते ही थोड़े से समय में वे अपने आप ढेर से बयान दे देते। उनकी भाषा बेबाक और बेलाग थी। साफ और आम गालियों से सज्जित थी। स्‍वभाव खरा और हरा था। वे ऐसा समझते थे कि अपनी बात कह देने से निजी कर्तव्‍य पूरे हो जाते हैं। मन में जो आता बेहिचक कह डालते। गाड़ी संकरी गली से गुजरती और सामने अगर उघारा खेलता बच्‍चा बीच सड़क में होता तो बुरी तरह चिड़चिड़ा जाते थे। उन दिनों उनके मन में यह विश्वास पक्का-सा हो गया था कि लोगों को एक बार में ही पूरा सबक सिखा देना चाहिए। उनकी बातें सुनते हुए जल्दी ही मैं ऊंधने लगता। क्योंकि मौन रहकर ही उन्हें नकारा जा सकता था। बातचीत मे उनसे उलझना उनके विलास को बढ़ावा देना था।
इसी ऊंघ के रास्ते से मुझमें हबीब की याद ने प्रवेश किया था। यह उनके चेहरे की याद नहीं थी। याद थी हबीब के घर के उस सूने कमरे की,  जो सीधा मुझे हबीब के हृदय की धड़कने सुना रहा था। हबीब के घर का वह कमरा इस तरह से खाली था। उसमें केवल एक उघारी बेंच पड़ी रहती थी। उसी तरह खाली और उघारी थी खुली आलमारी। पुराने काठ की काली पड़ गई खिड़कियां । लोहे के काले सींखचे। गल गए काठ के दरवाजे। याद आई उस उदासी की जो एजाज साब की गंभीरता में थी। उस सन्नाटे की जो घर के हर चप्‍पे में था, हर आदमी में था। याद आई हबीब की अम्मीजान की जिन्‍हें हम बच्चों ने कभी नहीं देखा। लेकिन जिनकी मौजूदगी दरवाजे की आड़ में, छींट वाले सूती परदे के पीछे और बंद खिड़कियों के मौन में हमेशा देखते रहे,  जानते रहे। क्यों नहीं मिल पाए उनकी अम्मीजान से हम? जब वे इतनी अच्छी सेवैंया बना भर-भर कटोरे खिलाती थीं,  तो अपने हाथों से क्यों नहीं दुलारा इमें उन्होंने ? क्या सिर्फ इसी शर्म से कि हबीब ने कभी अपने पिता को नहीं देखा था। पिता भी ऐसे जो हबीब के जन्म के बाद ही, हरा-भरा परिवार छोड़ कर पाकिस्‍तान चले गए। वहीं बस गए। दूसरा निकाह कर लिया। चार बच्चे कर लिए। वे फिर कभी लौटकर नहीं आए। कुछ सालों तक पैसा जरूर घर भेजा। पर बाद में तो खत आना भी बंद हो गए। याद आई हबीब की सटीक गेंदबाजी की स्पिन और करारे करीनेदार शाट्स, उस सन्नाटे को तोड़ते हुए जो उनके घर की डसे हुए था।
अचानक मेरी ऊंघ में एक ख्याल या सवाल कौंधा। मैं विस्मय से गाड़ी में बैठे साथी का चेहरा ताकने लगा। उस समय वे स्वयं से कहते हुए एक पूरी कौम को बर्खास्त कर रहे थे। ‘क्या हुआ, ऐसे क्यों,  ताक रहे हो?’ उन्‍होंने पूछा। मैं चुप रहा। मन में उठा सवाल उनसे पूछ नहीं पाया। क्‍योंकि मुझे साफ दिख गया था कि वक्‍त आने पर हबीब के पिता की तरह, वे भी कोई काम कर सकते हैं। मैं उन्‍हें ताकता रह गया।

जवाहर गोयल की अन्‍य रचनाएं

-छंटते बादल खि‍लती धूप : जवाहर गोयल

-जवाहर गोयल की कुछ कवि‍ताएं

छंटते बादल खि‍लती धूप : जवाहर गोयल

लेखक-चि‍त्रकार जवाहर गोयल करीब डेढ़ साल से प्लाज्मा सेल ल्यूकीमि‍या से पीडि‍त हैं। उनका दो बार स्टेम सेल ट्रांसप्लांट हो चुका है। इलाज के दौरान उनका कई कैंसर पीड़ि‍तों से मि‍लना हुआ। इन अनुभवों के आधार पर लि‍खा उनका यह आलेख कैंसर को लेकर सामाजि‍क दृष्टिकोण में बदलाव की मांग करता है-
कैंसर एक ऐसा शब्द है जिसका उच्चारण करने में सभी एक बार ठिठकते हैं, क्योंकि यह एक ऐसी बीमारी है जो आम धारणा में लाइलाज है। बिना अग्रिम सूचना दिए शरीर में फैलती जाती है। जब तक कोई आसार शरीर में दिखने आरंभ होते हैं, बहुत फैल चुकी होती है, लगभग अंतिम दौर तक। जल्दी ही जान ले लेती है। कैंसर का जानलेवा होना ही वह शाप है कि लोग इसका नाम लेने में झिझकते हैं। यहां तक कि जब कोई सामाजिक बुराई लाइलाज हो जाती है तो उसे मुहावरे में कैंसर हो जाना कहते हैं।
क्या कैंसर सचमुच लाइलाज है ? कैंसर है क्या ? यह किसे, कब और क्यों होता है ? कैसे पहचाना जाता है ? कितना कष्टदायी होता है ? इसका इलाज कैसे किया जाता है ? कितना लंबा चलता है ? क्या सचमुच बहुत खर्चीला होता है ? क्या इसे रोका जा सकता है ? रोगी कब तक जी सकता है ? किस-किस तरह के वैकल्पिक इलाज उपलब्ध हैं ? आदि ऐसे असंख्य सवाल हैं जो अक्सर दिमाग में तब आते हैं, जब स्वयं अथवा अपने किसी परिचित को कैंसर हो जाता है। जब उनकी संघर्ष गाथा सुनने लगते हैं। इलाज से जुड़ी बातें गाहे बगाहें हवा में तैरनी लगती हैं। भले ही बिगड़े हुए रूप में होती हैं।
कैंसर के एक रोगी को इससे बहुत अधिक झेलना होता है। उसे जो सबसे पहले घेरकर डसता है, वह है भय। इसका बिना किसी चेतावनी के अकस्मात होना। इसके लिए किसी की भी पूर्व तैयारी नहीं होती, न ही सही अर्थ में संभव है। यह ऐसे ही हुआ कि क्या आप अब जल्दी से मर जाने के लिए तैयार हैं। अब आप जीवन के जितने भी विविध पहलू हैं- व्यक्तिगत, सामाजिक या पारिवारिक उनके समस्त दायरों में इस मृत्यु का अर्थ टटोलिये। किंतु याद रखें कि अखबार से मृत्यु की खबर हमें वह नहीं जताती जो जब हम स्वयं खतरे में पड़ते हैं, तब जानते हैं। पड़ोस की दुर्घटना इससे अधिक वास्तविक लगती है, तब भी उतनी कभी नहीं, जब हम स्वयं उसके शिकार होते हैं। यहां तक कि मृत्यु की कल्पना करना, उस पर कविता लिखना, सागर के किनारे से दूर लहरों को देखने के समान होता है, सचमुच में सागर में डूबते-उतराते लहरों से जूझने के संघर्ष से बहुत भिन्न।
किसी ने कहा है कि यदि आप सुबह उठकर जीवन के अंतिम दिन के समान उसे अच्छी तरह बिता सकते हैं तो आप सुखी हैं। कैंसर की चिकित्सा के दौरान यह चुनौती रोगी के मन को लगातार ठेलती रहती है। उलझाती रहती है। जीवन और मृत्यु से जुड़े प्रश्न बार-बार मन में आते हैं। लोग अपनी-अपनी तरह से उसका समाधान खोजते हैं। पर कोई भी हल आखिरी नहीं होता। अक्सर आप वापिस उन्हीं प्रश्नों के सामने अपने को खड़ा पाते हैं- पुन: हल खोजते हुए, पुन: अपनी शक्ति बटोरते हुए, पुन: अपना पुननिर्माण करते हुए। संभवत: अपने परिष्कार का यह सिलसिला सदैव रहता है। फर्क केवल इतना है कि कैंसर सरीखी बीमारी में आपकी मानसिक चेतना कई गुणा अधिक एकाग्र हो जाती है। तब अपने ही स्वभाव की कई बातें स्वत: थोथी लगने लगती हैं, अपने कई काम व्यर्थ लगने लगते हैं। जिसे पहले आप स्वयं या आमतौर पर सभी सफलता या सार्थकता का प्रमाण मानते रहे, उसे अब बेकार के प्रयोजन सोचने लगते हैं। आपसी संबंधों की वह सारी व्यावहारिकताएं, जो दरअसल आपसी उपयोगिता के अर्थ में ही पलती-पुसती रहती हैं, ढकोसला लगने लगती हैं। सूझ-बूझ वाले सभ्य समाज के शालीन रीति-रिवाज कितने सतही और बाहरी होते हैं, दिखने लगता है। इनमें सच्ची आत्मीयता का कितना अभाव होता है तथा सौजन्य का दस्तूर कितना ऊपरी तौर पर निबाहने का प्रयास मात्र है, समझ में आने लगता है। ताज्जुब तो यह है कि‍ यह भी नहीं सोचा जाता कि जिसके प्रति हम अपनी पीड़ा या संवेदना जताना चाह रहे हैं, सचमुच वह कर रहे हैं या उसका कष्ट बढ़ा रहे हैं। उस पर हम अपना भार लाद रहे हैं, उस पर अपना मानसिक कूड़ा डाल रहे हैं। रोगी के घर में रिश्तेदारों और परिचितों की भीड़ उसका नुकसान ही करती है। सीधे-सीधे और परोक्ष रूप में भी। ज्यादातर लोग कैंसर के रोगी को यह आभास दे जाते हैं कि वे उसके अंतिम दर्शनों को आए हैं। अक्सर उसे वह दया या सहानुभूति का पात्र बना देते हैं। कोई विरला व्यक्ति ऐसा होता है जो रोगी की स्थिति में स्वयं को रखकर देखता हो। जब ऐसा होता है, तब उसका मौन भी साथ देने में सहायक होता है।
दुर्भाग्य तो इस बात का है कि लोग आसानी से यह मान लेते हैं, हर कोई जुगाड़ लगा मतलब सिद्ध करने की जल्दी में है और ऐसा करना ही वाजिब है। इस सोच में उष्ण आत्मीयता का अभाव, ऊपरी व्यवहार, सतही संवेदनाएं या दिखावे का बोलबाला खुद-ब-खुद होने लगता है। अक्सर ये लोग अपनी विकृतियों से परिचित नहीं होते या यों कहें कि जान-बूझकर ऐसा नहीं करते, बल्कि उनकी जीवन-शैली उनसे ऐसा करवाती है। कैंसर के रोगी को आपसी संबंधों में विकार, उनके रेशे स्पष्ट नजर आते हैं। जब आप कगार पर खड़े होते हैं तो एक तरह से बहुत कुछ आसान हो जाता है। यह दौर कितना विचित्र है कि जो संवेदनशील हैं, वे भी संपर्क करने से कई बार कतरा जाते हैं, यह सोचकर कि- ‘क्या बात करेंगे।’ मेरे ऐसे अनेक परिचित हैं, जिनकी मुझसे संबंधित चिंताएं मुझ तक पहुंचती रहीं- अन्य परिचितों के माध्यम से। किंतु वे स्वयं लंबे अर्से तक मुझसे सीधा संपर्क नहीं कर सके। उन्हें मैंने स्वयं फोन करके कहा- ‘कैसे हो ?’- बोलने से ही तो बात हो जाती है। आप अपने बारे में कुछ बतिया सकते थे। मन में इस डर को लेकर बैठे रहना कि- ‘कैंसर का मारा है, अब मरा, तब मरा’-  मान बैठना ठीक नहीं है। रोगी के साथ जब दूसरों का व्यवहार सामान्य से अलग होने लगता है, तब वह दुनिया से कटने लगता है। इससे उसके मन पर बोझा बढ़ता ही है। अक्सर ऐसी छोटी-छोटी अनके बातें उसका मनोबल क्षीण करती हैं।
जो खुल्लम-खुल्ला दिखावा करते हैं, महज औपचारिकता निभाते हैं- संवेदनहीन हैं, झूठा व्यवहार करते हैं। किंतु जो रोगी के भले की सोचते हैं, वे सचेत हो सकते हैं।
पिछले एक वर्ष के दौरान मुझे अपनी बीमारी ‘प्लास्मा सेल ल्यूकीमिया’ का इलाज करवाते हुए अनेक रोगियों से मिलने, बात करने, उनकी समस्याओं और कहानियों को सुनने का मौका मिला। इन सब में एक बात एकदम साफ थी कि कैंसर से संबंधित समस्याएं, प्रांत और आर्थिक स्तर भिन्न होने के बावजूद लगभग एक-सी होती हैं।

मैं ही क्यों?

हर कोई कठिनाइयों से बचना चाहता है, किंतु संकट में पड़ जाने पर एक विचार अक्सर चमगादड़ की तरह मन में चक्कर काटने लगता है कि मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ ? मुझसे क्या गलती हो गई ? क्या सारी मुसीबतें मेरे ही भाग्य में हैं ? मेरा जीवन कभी आसान नहीं रहा ! आदि। इन्हें हम नेगेटिव विचार या मन कमजोर करने वाली बातें कहकर टाल नहीं सकते। कतई नहीं।
लेकिन ठंडे दिमाग से इन प्रश्नों  के उत्तर खोजें तो पाएंगे कि ऐसा क्या है जीवन में जिसे चुनने का हमको हक मिला ? हमारा जीवन किस प्रांत, शहर में हो, हमने नहीं चुना। माँ-बाप, भाई-बहिन हमने नहीं चुने, देश, भाषा, धर्म आदि भी जन्म के संयोग से पाया। संभवत: इस सबकी कभी शिकायत भी नहीं की। इसे संयोग जानकर स्वीकार कर लिया। स्कूल, कॉलिज डिग्री, नौकरी, पेशा आदि को चुनने में भी परिस्थितियों का जोर अधिक रहा। पल भर में हमारे संसार को उलट-पुलट कर देने वाली सारी घटनाएं/दुर्घटनाएं इसी तरह होती हैं।
कैंसर पर सदियों से काम हो रहा है। हाल के सालों में इलाज की संभावनाओं में तेजी से प्रगति हुई है, किंतु इसके होने के कारण को अभी तक विज्ञान पकड़ नहीं सका है। तब फिर हम इसे जीवन के अन्य संयोगों की तरह स्वीकार क्यों नहीं कर पाते ? सामान्य रहते हुए आगे का क्यों नहीं सोचते ? ठीक ही कहा गया है- सारी कठिनाइयाँ मनुष्य को माँजने के लिए होती हैं। सफाई करते हुए जिन बर्तनों को अधिक रगड़ा जाता है, वे ज्यादा चमक उठते हैं।

बीमार कौन है?

जब हाथ या पैर में चोट लगती है तो आप कहते हैं- मेरा अँगूठा कट गया या मेरा पैर टूट गया। किसी दूसरी बीमारी के होने पर भी उसे हम मात्र अपनी देह का एक विकार मानते हैं। तब ऐसा नहीं मानते कि बीमारी ने हमारे पूरे अस्तित्व को निगल लिया है। लेकिन कैंसर का रोगी मृत्यु के भय से इतना विचलित हो जाता है कि उसे अपने देह की बीमारी मानने के बजाय अपने समूचे अस्तित्व को बीमार मान बैठता है। वह जानता है कि उसका अस्तित्व शरीर मात्र नहीं है। अपनी देह की सीमाओं के परे बृहत और सर्वांगीण जीवन क्षमता है उसमें, जो ज्यादातर अन्य योनि के जीव-जन्तुओं में नहीं होती है।
मैं सोचता हूं कि मुझे कैंसर है अर्थात मेरी देह बीमार है, किंतु मैं बीमार नहीं हूं। मेरा मन, मेरी चेतना, मेरा व्यक्तित्व, मेरी सोच, मेरी भावना- कुछ भी बीमार नहीं है। मेरी आत्मा तो अक्षुण्णि है। हां! मैं दूसरों का प्रतिबिंब बनकर भी नहीं रह सकता। मैं अपने को दूसरों की नजर से देखूं, यह भी गलत होगा। न तो मैं किसी की दया का पात्र हो सकता हूँ, न ही किसी की सहानुभूति का- जो कोई ‘मुझे मृत्यु के लिए नामांकित’ का बिल्ला लगाकर देखना चाहते हैं, यह उन्हीं का दोष है, उन्हीं की समस्या है, मेरी नहीं। मैं ईश्व र के समक्ष स्वयं को देख सकता हूँ। पहले की तरह अब भी अपने भीतर ईश्वर के आलोक का अनुभव कर सकता हूँ।
पानी की प्यास में तड़पते, पानी खोजते पांडव भाइयों से सरोवर के सामने यक्ष द्वारा पूछे गए पाँच प्रश्नों का महाभारत का प्रसंग सभी को याद होगा। एक प्रश्न था- आश्चर्य क्या है ? युधिष्ठिर का उत्तर था- ‘मृत्यु निश्चित होती है- जानकर भी जीवन पर्यंत सभी इससे बेखबर रहते हैं, यही आश्चर्य है।’ कोई भी दूसरे से अधिक क्षण-भंगुर नहीं होता है। जीवन को जी लेने में ही सार है, जीते हुए जीवन विहीन होने में नहीं। हम कितना लंबा जीवन जीते हैं, इसका कोई महत्व नहीं। महत्वपूर्ण है कि हम कैसा जीवन जीते हैं। यही सब कुछ है।

बीमारी क्या है?

जिस डॉक्टर ने मेरी ब्लड रिपोर्ट देखकर सबसे पहले मेरा रोग पहचाना था, उन्होंने भी ‘कैंसर’ शब्द का उपयोग किये बगैर झिझकते हुए यही कहा था कि- ‘बहुत डिस्टर्बिंग है, किंतु केमोथेरैपी से ठीक हो जाना चाहिए।’
स्टेम रोल ट्रांसप्लांट करवाने श्री लंका से ऐक्टेक (टाटा मेमोरियल सेंटर, मुंबई) आई एक महिला से जब मैंने पूछा, ‘आपको कौन सा कैंसर है ?’ तो वह लगभग घबरा गईं। अर्से से उनका इलाज चल रहा था, लेकिन वह बोलीं, ‘भाई साहब, उस बीमारी का नाम मत लीजिए। मैं इसके बारे में कुछ भी नहीं जानती। मुझे इसके नाम से घबराहट होती है। आप मेरे पति से बात कीजियेगा।’ मैंने उनसे यही कहा, ‘बहिनजी, यह बीमारी तो आपको है। इलाज आपका हो रहा है। इससे लडऩा भी आपको ही है। जब दुश्मन इतना खतरनाक है तो इसकी पूरी जानकारी के बिना आप इसे परास्त कैसे करेंगी ? ज्यादा जानकर आप, कम से कम घबराहट से तो बचेंगी। यह आपको चौंकाएगा नहीं, बल्कि इलाज में आपकी और डॉक्टर की मदद ही होगी। उनकी सलाह समझ- मान सकेंगी। अधिक सावधानी ले सकेंगी।’
सच तो यह है कि आज कैंसर की बीमारी लाइलाज नहीं रही। अधिकतर किस्म के कैंसर या तो ठीक किये जा सकते हैं या फिर उन्हें काबू में रखकर रोगी को दीर्घायु किया जा सकता है। अनुमान है कि आने वाले चार-पांच साल में सभी किस्म के कैंसर ठीक किये जा सकेंगे। इस क्षेत्र में तेजी से विकास हो रहा है। बिना जाने, अज्ञान के अंधकार में खोए रहने की बनिस्पत जानकारी बढ़ाते रहना अपने आत्मविश्वास को बढ़ाने में सहायता करता है। मानसिकता सही बनी रहती है। आप अपनी चिकित्सा में सहायक होते हैं।
जिन्हें उचित इलाज पाने की सुविधा नहीं है या जो पैसा बनाने वाले डॉक्टरों के चंगुल में फंस जाते हैं, वे भी बच सकते हैं। अपने सीमित साधनों में भी इलाज करवा सकते हैं।
ऐसे कई किस्से हैं, जहां लाइलाज मान लिए गए रोगी मजबूत और सही मानसिकता से सभी को चकित करते हुए डॉक्टरों की भविष्यवाणी को झुठलाते हुए दीर्घायु हुए और समर्थ जीवन बिता पाए।
यदि रोगी को इलाज का नक्शा न मालुम हो तो वह अपने सीमित साधनों को योजनाबद्ध तरीके से नियोजित नहीं कर पाता। न ठीक-ठाक व्यवस्था होती है, न ही मन में अपेक्षित संतुलन बन पाता है। सही मानसिकता उचित इम्यूनिटी बनाने में भी सहायक होती है। यही दीर्घायु करती है।
‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ का अर्थ भी यही है- मुझे अज्ञान के अंधकार से आलोक अर्थात ज्ञान में ले जाओ। ज्ञान ही ईश्वर है, किंतु जानकारी युक्त ज्ञान नहीं बल्कि वह जो हमें संयत, संतुलित और स्थिरचित करता है। आत्मा को आलोकित करता है।

‘क्या कैंसर हमारे पूर्वजन्म के पाप का परिणाम है?’

मुजफ्फरपुर, बिहार से एक महिला कैंसर के इलाज के लिए ऐक्टेक, मुम्बई आ रही थीं। टे में साथ बैठे एक पैसेंजर ने सांत्वना देते हुए उनसे कहा- ‘बहिन जी, यह कैंसर तो आपके पूर्वजन्मों के पापों का परिणाम है। इसमें आप अब क्या कर सकती हैं ?’
वह महिला अस्पताल में मेरे बगल के बेड पर थी। बताते हुए उनकी आँखों में आँसू आ गए। मैंने कहा, ‘बहिन जी, आपने उस सज्जन से नहीं पूछा कि ऐसा कहकर वह पाप कर रहे हैं या पुण्य ? इसका क्या फल मिलेगा आपको ? क्या आप दूसरों में पाप की भावना रखने वाला स्वयं पापी नहीं हैं ?’
दरअसल यह एक अत्यंत गंभीर प्रश्न है, जो बार-बार जाने-अनजाने संकट से घिरे हर भारतीय को तंग करता है, क्योंकि पूर्वजन्म का सिद्धांत हमारे धार्मिक सोच का आधार है। इसके पहले कि हम इस प्रश्न को गंभीरता से परखें, इलाहाबाद की एक महिला का किस्सा इस प्रश्न की गहराई को अधिक स्पष्ट करेगा। वह एक कॉलिज में पढ़ाती थीं। भूतपूर्व प्रधानमंत्री के परिवार से संबंधित थीं तथा स्तन कैंसर का इलाज करवा रही थीं। बताया कि जब वह अपने गाँव गईं तो गाँव की ज्यादातर स्त्रियों ने उनके घर का बहिष्कार-सा कर दिया। उनकी बीमारी को अपशगुन माना गया था। उन्हें बहुत पीड़ा हुई। इसके बावजूद उन्होंने मुझसे कहा कि- ‘आप जो भी बोलिये भाई साहब, पाप-पुण्य तो होता है। कुछ तो है जो हम समझ नहीं पाते।’
हम इन दोनों किस्सों की बातों को अत्यंत सहानुभूति और गंभीरता से समझने की चेष्टा करें। फिलहाल पुनर्जन्म के सिद्धांत को अलग रख केवल पाप-पुण्य के सिद्धांत की जांच करें।
अगर कैंसर मेरे पूर्वजन्म के पापों का परिणाम है तो इस जन्म में न तो मैं न ही अन्य कोई इसके लिए उत्तरदायी है। तब तो लोग फल, सब्जियों और अनाज में तरह-तरह के केमिकल्स और प्रतिबंधित कीटनाशक छिड़काव का इस्तेमाल करते हैं, जिनसे कैंसर सरीखी बीमारियां होती हैं, वे सब बरी हो जाते हैं। कई तरह की हवा में दूषण बढ़ाने वाली हानि‍कारक गैस अथवा भोपाल गैस कांड, जि‍ससे शरीर की क्षति‍ होती है, जि‍म्मेदारी से बच जाते हैं। पैक्ड  फूड, फास्ट फूड या आधुनि‍क जायकेदार खाने, जि‍नसे प्रि‍जर्वेटि‍व्स व रंग व स्वाद बढ़ाने वाले नुकसानदायक तत्व जो शरीर की क्षति करते हैं, दोषमुक्त हो जाते हैं। जो स्त्रियां बच्चों को स्तन का दूध नहीं पिलातीं तथा प्राकृतिक ढंग से अपना रख-रखाव नहीं कर पातीं, वे सब अपनी लापरवाही से बरी हो जाती हैं।
इसे भी जांचे कि क्या हमें ऐसा सोचने की छूट है कि जिन लाखों यहूदियों आदि को अमानुषि‍क हिटलर ने गैस चेंबरों में क्रूरता से मार डाला, क्या वह उन्हें पूर्वजन्म के पापों की सजा दे रहा था ? आतंकवादी जब निर्दोष व निहत्थे लोगों व बच्चों की आँख मूँदकर बिना कुछ सोचे हत्या करते हैं, क्या उन्हें पूर्वजन्म के पापों की सजा दे रहे होते हैं ? बिल्कुल भी नहीं।
स्वामी विवेकानंद ने कहा था- ‘सबसे निकृष्ट मिथ्या बात जो आप अपने से कहते है, वह यह है कि हम पापी होकर जन्में हैं, हम बुराई लेकर जन्में हैं। पापी वही है, जो दूसरों में पाप की भावना रखता है। पापी और दुष्टों को दुष्टता ही दुष्टता नजर आती है। पर पुण्यात्मा को कहीं नहीं। अत: पापियों के लिए संसार नरक स्वरूप है। मध्यकोटि वाले के लिए स्वर्ग रूप है और परिपक्कषाय के लिए ब्रह्मरूप है। उन्हें ब्रह्मा ही दिखाई पड़ता है। यह समझना भ्रम है कि हम अशुद्ध है, परिमित है और बिलग हैं। आत्मा ही एक अद्वितीय सत्ता है।’
स्वामी जी ने एक अन्य जगह लिखा है- ‘वेदांत पाप को नहीं मानता, किंतु भूल होती है, यह मानता है। वेदान्त के अनुसार सबसे बड़ी भूल है स्वयं को कमजोर मानना, स्वयं को पापी मानना, स्वयं को निकृष्ट प्राणी मानना, अपने को अशक्त मानना और यह कहना कि हम लाचार हैं।’

जवाहर गोयल की कुछ कवि‍ताएं

एक जमाने में नौकरी व कला साधना के बीच नौकरी को चुनने वाले जवाहर गोयल पि‍छले चालीस वर्षों से कला का अनवरत अभ्‍यास करते आ रहे हैं। इस दौरान चि‍त्र बनाना, गल्‍प और कवि‍ताएं लि‍खना उनकी फि‍तरत में शामि‍ल रहा। 36 साल सरकारी नौकरी करने के बाद वह सेवानि‍वृत्‍त हो गए हैं। करीब डेढ़ साल से प्‍लाज्‍मा सेल ल्‍यूकीमि‍या से पीडि‍त हैं। दो बार स्‍टेम सेल टांसप्‍लांट हो चुका है। इस इलाज के दौरान मुंबई/कोलकाता में अपना समय बीताते हुए उन्‍होंने ये कवि‍ताएं लि‍खी हैं। वह मानते हैं कि‍ कवि‍ताएं लि‍खकर और चि‍त्र बनाकर अपनी मानसि‍कता को स्‍वस्‍थ रख पाए-

आओ, जल में जल की छाया देखो

आओ, जल में जल की छाया देखो

बि‍न काया यह माया देखो

सुनो ताप के तले सतह को

देखो धरती के खुले वक्ष को

फैले अक्ष का अट्टहास सुनो

नि‍र्जन पेड़ों में चट्टानों को गि‍नो

जल में अपनी छाया नि‍रखो

लहराते पत्‍थर हि‍लती काया को छू लो

सुन्‍न दोपहरी पेड़ों की माया देखो

आओ, जल में जल की छाया देखो।

यह मेरा शरीर है

यह मेरा शरीर है

गेहूं के दाने की तरह

छि‍लका उजला दाना भारी

जल में डूबा करता अंकुरण की तैयारी

अंकुरि‍त हो हरा जवारा हो जाता है

दाना हो या शरीर, खाली हो जाता है

जवारे में रस है, जीवन का संचरण है

शरीर बस नि‍मि‍त्‍त है गेहूं के दाने की तरह

परि‍धि‍यां

शून्‍य:

शून्‍य वि‍स्‍तृत अपरि‍मि‍त।

ध्‍वनि‍:

ध्‍वनि‍ शून्‍य की धरा।

शब्‍द:

शब्‍द शून्‍य की धरा का वि‍स्‍तार।

शब्‍द धरा का अंकुरण।

शब्‍द धरा का वि‍स्‍तारता संसार।

अर्थ:

आनन्‍द की लयकार।

वास्‍तवि‍क संसार।

लय का ताल।

भ्रम:

शब्‍द में अर्थ होता है एकाकार।

जि‍जि‍वि‍षा

एक आग्रह कुछ करते जाने का

कराता जाता है ढेर सारे काम

ये काम तब नि‍यम बनकर बांध लेते

नि‍यमबद्ध हम करते जाते तमाम काम।

एक आग्रह कुछ समझ पाने का

कराता है काम हरदम सोचते रहने का

सोचा हुआ जब समझ में आता है

इस बात का सुख दे जाता है कि‍ वह पूरा हुआ।

इनका न कोई आदि‍ है न अन्‍त

तब भी एक भ्रम बना रहता

इनका स्‍वयं में असल कुछ होने का।

एक चि‍त्र में भूलवश खोजते हैं हम

आकारों के अर्थ, लकीरों के तर्क

उसके आकाश की शुरुआतें

धब्‍बों में घटनाओं की वजहें

और सैरे (लैंड स्‍केप) में ब्‍योरावार जगहें।

क्‍यों नहीं आग्रहवि‍हीन हो पाते हैं

मुक्‍त बहते स्‍याह या आकार वह

जो आकस्‍मि‍क हुआ उतना ही

जि‍तना वह उभरकर हुआ

पूर्ण कोरी कल्‍पना का खरा

जिसका न अर्थ न आदि‍ न अन्‍त।

कुछ खोना भी कुछ पाना है

बीमारी का अतीत हो न हो

आने वाला कल सदा होता है।

बीता समय याद हो न हो

आने वाला समय बरबस

आज पर हावी रहता है।

समय का मौन साहस सा लगता है

जि‍समें मृत्‍यु भी खो जाती है।

पहाड़ों पर लगातार बारि‍श धुंध हो जाती है

कवि‍ता की तरह पास आती है

गोद में सि‍र रख बेटी की तरह सो जाती है।

जब जीत-हार का झूठापन ढह जाता है

कुछ खोना भी कुछ पाना बन जाता है

अनुभव का ताप चके पर सान चढ़ा जाता है।

धूप भरी बारि‍श में भीगते हम

आने वाले दुखों को अनुमान

दु:ख नहीं नि‍राशा देता है।

अक्‍सर वे दु:ख जो आशंकि‍त होते हैं

आते कभी नहीं हैं, पर

उनका बोझा बढ़ता ही जाता है।

पुराने कर्ज की तरह यह

कभी भी चुकता नहीं है।

देर से जब यह समझ में आता है

दु:ख ही देता है देर हो जाने का।

धूप भरी बारि‍श में भीगते हम

तब सि‍र्फ चकि‍त रह जाते हैं।

अस्‍ति‍त्‍व

वि‍चार और वास्‍तवि‍कता के मध्‍य

हमारा शरीर होता है।

भय और साहस के मध्‍य

हमारी समझ होती है।

अनुभूति‍ और अनुभव के मध्‍य

हमारी संवेदना होती है।

संवेदना और सरोकार के मध्‍य

हमारे प्रयास होते हैं।

प्रयास और साकारता के मध्‍य

हमारा नि‍श्‍चय होता है।

अव्‍यक्‍त ओर व्‍यक्‍त के मध्‍य

हमारा नि‍मि‍त्‍त होता है।

होने और न होने के मध्‍य

हमारा शून्‍य होता है।

छायाएं हमें अपनी ओर खींचती हैं

छायाएं हमें अपनी ओर खींचती हैं

तमतमाती धूप की तरह दूर नहीं करतीं

छायाएं बढ़ कर आपस में घुलमि‍ल जाती हैं

संध्‍या में गांवों को, पेड़ों को, पहाड़ को

खींचकर दूर टि‍मटि‍माती लौ तक ले जाती हैं

ध्‍वनि‍यों की तरह स्‍वयं पास आकर छूती हैं

छायाएं सूर्य की तरह अस्‍थि‍यों में जाकर

हमें स्‍नान नहीं करा सकतीं, पर

गोल गुम्‍बद के व्‍योम की तरह

आत्‍मा को इस तरह समो लेती हैं कि‍

वह भी छाया की तरह सब में घुलमि‍ल जाती हैं।

हम जानते नहीं हैं, क्‍योंकि‍ जानना चाहते नहीं हैं

क्‍या तुम सच्‍चे और झूठे देवता में फर्क कर पाते हो ?

क्‍या तुम घृणा के स्रोतों को जान पाते हो ?

क्‍या तुम घृणा को मानवीयता के दायरे में पाते हो ?

जो हम समझ नहीं पाते, उन्‍हें भी जान सकते हैं।

वि‍डंबना है समझ पाना भी एक अर्थ में उसको संगत बनाता है।

घाव को याद रखना भी हमें पीड़ा से बचा सकता है।

पीड़ा से गुजरते, सहने या न सहने की बनि‍स्‍पत

पीड़ा को देख पाना, उससे उबार लेता है।

देख पाना भी क्रमश: साहस बनता जाता है।

घृणा की शर्म में जीते हुए

असकी माया से मोहि‍त हों या अचंभि‍त

भागीदार दोनों हैं।

जो जानते हैं कहते नहीं हैं।

जो अनजान हैं पूछने से कतरा जाते हैं।

पूछ हुए का कोई उत्‍तर नहीं पाते हैं।

आंख-कान-मुंह बंद कर जीना

नहीं जानने के भ्रम का बचाए रखता है

हम उसे झूठ में शामि‍ल नहीं, इस झूठ को भरमाए रखता है

हम जानते नहीं हैं, क्‍योंकि‍ जानना चाहते नहीं हैं।

कुछ कि‍ए बि‍ना

पहाड़ों का नि‍र्भीक मौन

सूर्य की हथेलि‍यों से स्‍नान करता है

उज्‍जवल हरा पेड़ों को संवारता है

वि‍स्‍तीर्ण आयाम गाय की आंखों सा ताकता है

टूटी टांग लि‍ए कौआ फुदककर आगे बढ़ता है

गर्दन मोड़ता है, चोंच खोलता है,

हमें मि‍त्र भाव से देखता है।

कुछ कि‍ए बि‍ना लगातार इतना कुछ होता है

जो नि‍र्भय करता है

मन को भरता है।

भय की पीठ का नाम है साहस

भय की पीठ का नाम है साहस

जो भय को समझने से आप दि‍खता है

भय की तरह सदैव रहता है हमारे साथ।

भय ढोल बजाते आता है

नाचता है गाता है सि‍र पर चढ़ जाता है।

साहस धीरे से चुपचाप आता है।

कुछ भी नहीं कहता है

हमारे पीछे चलता रहता है।

उसकी पदचाप सुनकर ही

हम साथ हैं यह जान पाते हैं।

उसे जानने को न कुछ पूछना होता है

न मुड़कर पीछे देखना होता है

केवल सि‍र उठाकर दूर तक सामने देखते

चलना होता है एक एक कदम

हर बार, हर दम, जब तक न पहुंचे हम।

यह भी जानना अनि‍वार्य होता है

हर एक की तरह हैं हम उनके संग।

समर्थ असमर्थ, अच्‍छे बुरे, समान असमान

साहस सभी में होता है।

जो डरते हैं उनमें भी वह होता है।

बस, उन्‍हें भय की आंखों में देखने में संकोच होता है।

पि‍ता की जि‍म्‍मेदारि‍यां

पि‍ता की अनेक जि‍म्‍मेदारि‍यां में

कुछ आम हैं, कुछ अनि‍वार्य

कुछ को चुनने का है आप पर दारोमदार।

आम है कि‍, उन्‍हें हम सैर पर ले जाएं।

कब क्‍या सपने देखे हमने, उन्‍हें बताएं।

जहां पीछे मुड़कर देखना छोड़ दें वे

वहां तक उनके साथ जाएं।

अनि‍वार्य है, दुनि‍या सबकी है बताएं।

खुदा तर्क से मि‍लता नहीं, जताएं।

चाबि‍यों में तालों का ब्‍योरा छोड़ जाएं।

तब भी कुछ चुनने को छूट जाएगा

जि‍सके लि‍ए थोड़ा वक्‍त बचाएं-

सारी उमर कि‍तना बचपन बजाए रखना है, दि‍खा जाएं।

असल सदा सपनों से छोटा ही रहता है

तब भी इंसान तो सपनों से ही बनता हैं, बता जाएं।

अनगि‍न बूंदों से बनी है आत्‍मा अपनी

हर आत्‍मा में हम भी एक बूंद हैं

इस राग को गूंजते हुए गाएं

गाते-गाते उन्‍हें भी यह जता जाएं।

ठि‍ठके बि‍ना, बस हम जागे हुए रहते हैं

हम स्‍पर्श करते हैं और छुअन नहीं पाते हैं।

चबाते जाते हैं और स्‍वाद को नहीं जानते हैं।

श्‍वास को भीतर तक खींचकर छोड़ देते हैं अनजाने।

देखते हैं साफ-साफ बि‍ना कुछ पहचाने।

ढंकी बर्फ के नीचे जमीन खुरदुरी है, मालूम है।

कहीं भी कुछ छूटा हुआ नहीं है, पर वह अपना नहीं है।

सबके लि‍ए बने रहना चाहते हैं, पर कह नहीं पाते।

समय को छाया में धूप सा सरकते देखते हैं।

अंधेरे को भी दि‍न सा समीप पाते हैं।

कुछ भी चौंकाता क्‍यों नहीं है, जान नहीं पाते।

बैठे रह गए, उठकर न चलने का अफसोस करते हैं।

ठि‍ठके बि‍ना, बस हम जागे हुए रहते हैं।