
एक जमाने में नौकरी व कला साधना के बीच नौकरी को चुनने वाले जवाहर गोयल पिछले चालीस वर्षों से कला का अनवरत अभ्यास करते आ रहे हैं। इस दौरान चित्र बनाना, गल्प और कविताएं लिखना उनकी फितरत में शामिल रहा। 36 साल सरकारी नौकरी करने के बाद वह सेवानिवृत्त हो गए हैं। करीब डेढ़ साल से प्लाज्मा सेल ल्यूकीमिया से पीडित हैं। दो बार स्टेम सेल टांसप्लांट हो चुका है। इस इलाज के दौरान मुंबई/कोलकाता में अपना समय बीताते हुए उन्होंने ये कविताएं लिखी हैं। वह मानते हैं कि कविताएं लिखकर और चित्र बनाकर अपनी मानसिकता को स्वस्थ रख पाए-
आओ, जल में जल की छाया देखो
आओ, जल में जल की छाया देखो
बिन काया यह माया देखो
सुनो ताप के तले सतह को
देखो धरती के खुले वक्ष को
फैले अक्ष का अट्टहास सुनो
निर्जन पेड़ों में चट्टानों को गिनो
जल में अपनी छाया निरखो
लहराते पत्थर हिलती काया को छू लो
सुन्न दोपहरी पेड़ों की माया देखो
आओ, जल में जल की छाया देखो।
यह मेरा शरीर है
यह मेरा शरीर है
गेहूं के दाने की तरह
छिलका उजला दाना भारी
जल में डूबा करता अंकुरण की तैयारी
अंकुरित हो हरा जवारा हो जाता है
दाना हो या शरीर, खाली हो जाता है
जवारे में रस है, जीवन का संचरण है
शरीर बस निमित्त है गेहूं के दाने की तरह
परिधियां
शून्य:
शून्य विस्तृत अपरिमित।
ध्वनि:
ध्वनि शून्य की धरा।
शब्द:
शब्द शून्य की धरा का विस्तार।
शब्द धरा का अंकुरण।
शब्द धरा का विस्तारता संसार।
अर्थ:
आनन्द की लयकार।
वास्तविक संसार।
लय का ताल।
भ्रम:
शब्द में अर्थ होता है एकाकार।
जिजिविषा
एक आग्रह कुछ करते जाने का
कराता जाता है ढेर सारे काम
ये काम तब नियम बनकर बांध लेते
नियमबद्ध हम करते जाते तमाम काम।
एक आग्रह कुछ समझ पाने का
कराता है काम हरदम सोचते रहने का
सोचा हुआ जब समझ में आता है
इस बात का सुख दे जाता है कि वह पूरा हुआ।
इनका न कोई आदि है न अन्त
तब भी एक भ्रम बना रहता
इनका स्वयं में असल कुछ होने का।
एक चित्र में भूलवश खोजते हैं हम
आकारों के अर्थ, लकीरों के तर्क
उसके आकाश की शुरुआतें
धब्बों में घटनाओं की वजहें
और सैरे (लैंड स्केप) में ब्योरावार जगहें।
क्यों नहीं आग्रहविहीन हो पाते हैं
मुक्त बहते स्याह या आकार वह
जो आकस्मिक हुआ उतना ही
जितना वह उभरकर हुआ
पूर्ण कोरी कल्पना का खरा
जिसका न अर्थ न आदि न अन्त।
कुछ खोना भी कुछ पाना है
बीमारी का अतीत हो न हो
आने वाला कल सदा होता है।
बीता समय याद हो न हो
आने वाला समय बरबस
आज पर हावी रहता है।
समय का मौन साहस सा लगता है
जिसमें मृत्यु भी खो जाती है।
पहाड़ों पर लगातार बारिश धुंध हो जाती है
कविता की तरह पास आती है
गोद में सिर रख बेटी की तरह सो जाती है।
जब जीत-हार का झूठापन ढह जाता है
कुछ खोना भी कुछ पाना बन जाता है
अनुभव का ताप चके पर सान चढ़ा जाता है।
धूप भरी बारिश में भीगते हम
आने वाले दुखों को अनुमान
दु:ख नहीं निराशा देता है।
अक्सर वे दु:ख जो आशंकित होते हैं
आते कभी नहीं हैं, पर
उनका बोझा बढ़ता ही जाता है।
पुराने कर्ज की तरह यह
कभी भी चुकता नहीं है।
देर से जब यह समझ में आता है
दु:ख ही देता है देर हो जाने का।
धूप भरी बारिश में भीगते हम
तब सिर्फ चकित रह जाते हैं।
अस्तित्व
विचार और वास्तविकता के मध्य
हमारा शरीर होता है।
भय और साहस के मध्य
हमारी समझ होती है।
अनुभूति और अनुभव के मध्य
हमारी संवेदना होती है।
संवेदना और सरोकार के मध्य
हमारे प्रयास होते हैं।
प्रयास और साकारता के मध्य
हमारा निश्चय होता है।
अव्यक्त ओर व्यक्त के मध्य
हमारा निमित्त होता है।
होने और न होने के मध्य
हमारा शून्य होता है।
छायाएं हमें अपनी ओर खींचती हैं
छायाएं हमें अपनी ओर खींचती हैं
तमतमाती धूप की तरह दूर नहीं करतीं
छायाएं बढ़ कर आपस में घुलमिल जाती हैं
संध्या में गांवों को, पेड़ों को, पहाड़ को
खींचकर दूर टिमटिमाती लौ तक ले जाती हैं
ध्वनियों की तरह स्वयं पास आकर छूती हैं
छायाएं सूर्य की तरह अस्थियों में जाकर
हमें स्नान नहीं करा सकतीं, पर
गोल गुम्बद के व्योम की तरह
आत्मा को इस तरह समो लेती हैं कि
वह भी छाया की तरह सब में घुलमिल जाती हैं।
हम जानते नहीं हैं, क्योंकि जानना चाहते नहीं हैं
क्या तुम सच्चे और झूठे देवता में फर्क कर पाते हो ?
क्या तुम घृणा के स्रोतों को जान पाते हो ?
क्या तुम घृणा को मानवीयता के दायरे में पाते हो ?
जो हम समझ नहीं पाते, उन्हें भी जान सकते हैं।
विडंबना है समझ पाना भी एक अर्थ में उसको संगत बनाता है।
घाव को याद रखना भी हमें पीड़ा से बचा सकता है।
पीड़ा से गुजरते, सहने या न सहने की बनिस्पत
पीड़ा को देख पाना, उससे उबार लेता है।
देख पाना भी क्रमश: साहस बनता जाता है।
घृणा की शर्म में जीते हुए
असकी माया से मोहित हों या अचंभित
भागीदार दोनों हैं।
जो जानते हैं कहते नहीं हैं।
जो अनजान हैं पूछने से कतरा जाते हैं।
पूछ हुए का कोई उत्तर नहीं पाते हैं।
आंख-कान-मुंह बंद कर जीना
नहीं जानने के भ्रम का बचाए रखता है
हम उसे झूठ में शामिल नहीं, इस झूठ को भरमाए रखता है
हम जानते नहीं हैं, क्योंकि जानना चाहते नहीं हैं।
कुछ किए बिना
पहाड़ों का निर्भीक मौन
सूर्य की हथेलियों से स्नान करता है
उज्जवल हरा पेड़ों को संवारता है
विस्तीर्ण आयाम गाय की आंखों सा ताकता है
टूटी टांग लिए कौआ फुदककर आगे बढ़ता है
गर्दन मोड़ता है, चोंच खोलता है,
हमें मित्र भाव से देखता है।
कुछ किए बिना लगातार इतना कुछ होता है
जो निर्भय करता है
मन को भरता है।
भय की पीठ का नाम है साहस
भय की पीठ का नाम है साहस
जो भय को समझने से आप दिखता है
भय की तरह सदैव रहता है हमारे साथ।
भय ढोल बजाते आता है
नाचता है गाता है सिर पर चढ़ जाता है।
साहस धीरे से चुपचाप आता है।
कुछ भी नहीं कहता है
हमारे पीछे चलता रहता है।
उसकी पदचाप सुनकर ही
हम साथ हैं यह जान पाते हैं।
उसे जानने को न कुछ पूछना होता है
न मुड़कर पीछे देखना होता है
केवल सिर उठाकर दूर तक सामने देखते
चलना होता है एक एक कदम
हर बार, हर दम, जब तक न पहुंचे हम।
यह भी जानना अनिवार्य होता है
हर एक की तरह हैं हम उनके संग।
समर्थ असमर्थ, अच्छे बुरे, समान असमान
साहस सभी में होता है।
जो डरते हैं उनमें भी वह होता है।
बस, उन्हें भय की आंखों में देखने में संकोच होता है।
पिता की जिम्मेदारियां
पिता की अनेक जिम्मेदारियां में
कुछ आम हैं, कुछ अनिवार्य
कुछ को चुनने का है आप पर दारोमदार।
आम है कि, उन्हें हम सैर पर ले जाएं।
कब क्या सपने देखे हमने, उन्हें बताएं।
जहां पीछे मुड़कर देखना छोड़ दें वे
वहां तक उनके साथ जाएं।
अनिवार्य है, दुनिया सबकी है बताएं।
खुदा तर्क से मिलता नहीं, जताएं।
चाबियों में तालों का ब्योरा छोड़ जाएं।
तब भी कुछ चुनने को छूट जाएगा
जिसके लिए थोड़ा वक्त बचाएं-
सारी उमर कितना बचपन बजाए रखना है, दिखा जाएं।
असल सदा सपनों से छोटा ही रहता है
तब भी इंसान तो सपनों से ही बनता हैं, बता जाएं।
अनगिन बूंदों से बनी है आत्मा अपनी
हर आत्मा में हम भी एक बूंद हैं
इस राग को गूंजते हुए गाएं
गाते-गाते उन्हें भी यह जता जाएं।
ठिठके बिना, बस हम जागे हुए रहते हैं
हम स्पर्श करते हैं और छुअन नहीं पाते हैं।
चबाते जाते हैं और स्वाद को नहीं जानते हैं।
श्वास को भीतर तक खींचकर छोड़ देते हैं अनजाने।
देखते हैं साफ-साफ बिना कुछ पहचाने।
ढंकी बर्फ के नीचे जमीन खुरदुरी है, मालूम है।
कहीं भी कुछ छूटा हुआ नहीं है, पर वह अपना नहीं है।
सबके लिए बने रहना चाहते हैं, पर कह नहीं पाते।
समय को छाया में धूप सा सरकते देखते हैं।
अंधेरे को भी दिन सा समीप पाते हैं।
कुछ भी चौंकाता क्यों नहीं है, जान नहीं पाते।
बैठे रह गए, उठकर न चलने का अफसोस करते हैं।
ठिठके बिना, बस हम जागे हुए रहते हैं।
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