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वीरेनियत-2 : एक बहुविध कविता गोष्ठी

वीरेन डंगवाल की स्मृति में आयोजि‍त सालाना काव्य-जलसे का संचालन करते आशुतोष कुमार।

नई दि‍ल्‍ली : हरदिलअजीज कवि वीरेन डंगवाल की स्मृति में होने वाले जन संस्कृति मंच के सालाना काव्य-जलसे का यह दूसरा आयोजन था। 29 नवम्बर की शाम 6 बजे से ही श्रोता और कवि हैबिटेट सेंटर, दिल्ली के गुलमोहर सभागार पर जुटाने लगे थे। मनमोहन, शुभा, उज्जवल भट्टाचार्य और दिगंबर जैसे वरिष्ठों के साथ अनुपम, निखिल, सुनीता, कुंदन, आशीष जैसे युवा भी कविता-पूर्व की गहमागहमी भरी बहस में सभागार के बाहर घास के मैदान पर बतकही में मशगूल थे। ठीक 6:30 पर वीरेन डंगवाल पर बने दस्तावेजी सिनेमा का एक अंश दिखाया जाना शुरू हुआ। वीरेन डंगवाल की कवितायें उनकी जुबान से सुनना रससिक्त कर देनेवाला अनुभव तो था ही, इस वीडियो-पाठ ने होने वाले कवि सम्मलेन का एक गहरा पर्यावरण रच दिया।

वीरेन डंगवाल की कविता  के बहुतेरे रंग हैं, उनमें से कई रंग कवि-सम्मलेन में उभरे, चमके, दिपे। उनके समकालीन कवियों की काव्य-भूमि तो उनकी साझे की थी ही, युवा कवियों ने भी अपनी कविताओं की मार्फ़त इस काव्य-भूमि को आपेक्षिक विस्तार दिया।

संयोजक-संचालक आशुतोष कुमार के बुलावे पर सबसे पहले अनुज लुगुन कविता पढने आये। अनुज की कविताओं की अलहदा दुनिया हम श्रोताओं को उन इलाकों तक ले गयी जहां सचमुच रवि की पहुँच नहीं है। एक अलग आँख से दुनिया को भांपती अनुज की कविता हमारे पारंपरिक आस्वाद-बोध को चुनौती देती है।अनुज द्वारा पढी गयी ‘हमारा दुःख, उनका दुःख’ कविता एक रूपक बनकर उभरी, जो दो दुनियाओं के बीच की जगह को ठीक-ठीक पहचानती है।

रुचि भल्ला हिन्दी कविता की दुनिया में अपेक्षाकृत नया नाम हैं, वे गोष्ठी की दूसरी कवि थीं। लगभग बतकही के शिल्प में रची रुचि की कविताओं ने दिखाया कि  रोजमर्रा की जिन्दगी की नगण्य चीजें-बातें कैसे कविता बन जाती हैं। एक कविता में स्वर्णाबाई की नज़र से देखी गयी दिल्ली का रंग यों उभरा- ‘दिल्ली वही है जहां शिंदे साहब टूर पर जाता है’। शरीफे पर लिखी उनकी कविता ने वीरेन डंगवाल की ‘पपीता’ जैसी कविताओं की याद ताजा कर दी। चर्च हिन्दी कविता में कम ही आया है, रुचि ने इलाहाबाद और गोवा के चर्चों की। चर्चा के जरिये श्रोताओं को ‘चर्च के पीछे के उस पेड़’ की याद दिलाई जो कभी किसी चर्च के पीछे था ही नहीं।

तीसरे कवि थे संजीव कौशल जिनकी कविताओं में राजनीतिक रंग साफ़ दिखे। ‘सत्ता की सोहबत बिजूकों को भी नरभक्षी बना देती है’ जैसी पंक्ति इस कठिन-कठोर समय में सत्ता के चरित्र और असर का जायजा लेती है। ‘चूल्हे’ और ‘कठपुतलियाँ’ जैसी कविताओं के सहारे संजीव हमारे वक्त का विद्रूप चेहरा दिखाते हैं, पर तरीका उनका बेहद संवेदनशील था।

अगले कवि महेश वर्मा अपने गहरे संवेदना बिंबों और अपनी अनूठी दार्शनिक नज़र के कारण  सराहे गए। डिस्टोपिक यथार्थ की बारीक समझ वाले संवेदन-बिम्ब मसलन ‘तालाब में उतराती अपनी ही लाश’ श्रोताओं को गहरे परेशान कर गए।

बिहार से आए वरिष्ठ कवि अमिताभ बच्चन की कवितायें जीवन प्रसंगों से कविता बुनने की विलक्षणता से भरी हुई थीं। व्यंग्य, जिसे आचार्यों ने कविता की जान कहा है, से भरी-पूरी अमिताभ जी की कवितायें आख़िर में एक गहरी उदासी छोड़ गयीं। हमारे वक़्त की शिनाख्त करती ये कवितायें एक हल्का कथा ढाँचा रखती हैं जिससे  तादात्मीकरण में बेहद आसानी हुई।

वीरेन डंगवाल के चिर-सखा और हिंदी के अप्रतिम कवि मंगलेश डबराल की कवितायें एक दूसरी, ज़्यादा इंसानी दुनिया की तलाश की कवितायें हैं, ऐसा उन्हें सुनते हुए फिर महसूस हुआ। ‘हमारे देवता’ जैसी कविता देव-लोक को मानुष-लोक में बदलकर समाज के सांस्कृतिक द्वंद्वों को रेखांकित कर गयी। मंगलेश जी के कलम में ही वह ख़ूबी है जो ‘बेटी पलटकर पूछती है/पापा आपने कुछ कहा’ जैसी पंक्ति पूरे काव्य-वैभव के साथ श्रोताओं के  दिलों में चुभ गयी।  अपनी एक गद्य कविता के माध्यम से उन्होंने राज की मुश्किलों व उसके भविष्य की ओर  इशारा किया।

गोष्ठी के आख़िरी कवि बल्ली सिंह चीमा की गजलें हिंदी कविता के छांदस रंग को उकेरने वाली थीं। उर्दू से हिंदी में आकर गजल का  न सिर्फ़ स्वर, बल्कि सँवार भी बदल जाता है,यह महसूस किया गया। जनता से संवाद करने की भाषा और लबों-लहजा इन गजलों की ख़ासियत थी। जैसे –

“कुछ तो किरदार नए मंच पर लाए जाएं
और नाटक को सलीके से निभाया जाए।”

एक और शेर था-” मेन दुश्मन को हारने के लिए लाज़िम है/हर विरोधी को ही दुश्मन न बनाया जाए।”

तीन घंटों तक चली इस बहुविध कविता गोष्ठी में ठसाठस भरे सभागार में मौजूद श्रोताओं की सक्रिय भीगीदारी इसे और समृद्ध बना गयी।

प्रस्‍तुति‍ : मृत्युंजय
संयोजक, कविता समूह, जन संस्कृति मंच

प्रख्यात अम्बेडकरवादी आलोचक तेज सिंह को श्रद्धांजलि

नई दिल्ली : हिंदी के प्रख्यात आलोचक और अंबेडकरवादी साहित्य के मूर्धन्य प्रवक्ता तथा ‘अपेक्षा’ त्रैमासिक पत्रिका के संपादक तेज सिंह का 15 जुलाई 2014 को शाम लगभग 3 बजे हृदय गति रुक जाने के कारण नि‍धन हो गया। तेज सिंह का जन्म दिल्ली के घोंडली में 13 जुलाई 1946 में हुआ था। उन्होने हिन्दी साहित्य को अपनी तमाम आलोचनात्मक कृतियों से समृद्ध किया। उनकी कृतियों में नागार्जुन का कथा-साहित्य (1993,  आलोचना),  राष्ट्रीय आन्दोलन और हिन्दी उपन्यास (2000,  आलोचना),  आज का दलित साहित्य (2000,  आलोचना),  उत्तरशती की हिन्दी कहानी (2006, आलोचना), दलित समाज और संस्कृति (2007), अम्बेडकरवादी साहित्य का समाजशास्त्र(2009, आलोचना), अम्बेडकरवादी साहित्य की अवधारणा (2010,  आलोचना),  अम्बेडकरवादी साहित्य ही क्यों? (2011), डॉ. अम्बेडकर और धम्म-दीक्षा (2011), अम्बेडकरवाद और मार्क्सवाद का द्वंद्वात्मक सम्बन्ध (2011),  प्रतिरोध की बहुजन संस्कृति(2011),  अम्बेडकरवादी विचारधारा : इतिहास और दर्शन (2012) आदि ने अस्मिता विमर्श के पृथकतावादी और शुद्धतावादी भावधारा के विपरीत दलित आंदोलन को एक नया और गतिमान वैज्ञानिक आवेग दिया। कृतियों के शीर्षक ही अपने आप में इस बात की ताईद करते हैं कि उनकी गति समाजशास्त्रीय आलोचना के साथ-साथ साहित्य के विचारधारात्मक और दार्शनिक पक्ष तक अपना विस्तार पाती थी। उन्होंने आज का समय (2002, दलित कवियों की कविताओं का संकलन),  उग्र की ज़ब्तशुदा कहानियाँ (2004), सबद बिबेकी कबीर (2004), अम्बेडकरवादी विचारधारा और समाज (2009),  प्रेमचंद की रंगभूमि : एक विवाद- एक संवाद (2008),  अम्बेडकरवादी कहानी:रचना और सृष्टि (2009), अम्बेडकरवादी स्त्री चिंतन (2010) आदि पुस्तकों का संपादन भी किया। वे दलित लेखक संघ के अध्यक्ष भी रहे।

हिंदी के दलित विमर्श मे चली तमाम बहसों मे सीधे शामिल होकर और उनको गति देकर उन्होंने समाज को एक प्रगतिशील मानवीय दिशा मे सोचने को प्रेरित किया। अस्मितावाद के खतरों को भाँपते हुए ही दलित साहित्य को उन्होंने अंबेडकरवादी साहित्य के बतौर प्रस्तावित किया था। तेज सिंह ऐसे लेखक थे, जिनका संघर्ष भारतीय समाज के तथाकथित उच्च जातियों मे व्याप्त ब्राह्मणवाद से तो था ही, साथ ही दलित जातियों में भी व्याप्त ब्राह्मणवादी विचारों और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ भी वे लगातार संघर्ष कर रहे थे। उन्होंने कथा आलोचना को अंबेडकरवादी दृष्टि से समृद्ध कर अपना महत्वपूर्ण योगदान किया।

समाज में व्याप्त जातिवाद, सामंतवाद, ब्राह्मणवाद और लैंगिक पूर्वाग्रह के खिलाफ संघर्ष का हमारा संकल्प ही हमारे प्रिय आलोचक के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि हो सकती है। तेज सिंह को जन संस्कृति मंच की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि।

(जसम की ओर से रामनरेश राम द्वारा जारी)  

मधुकर सिंह को जसम की श्रद्धांजलि

नई दि‍ल्‍ली : प्रगतिशील जनवादी धारा के मशहूर कथाकार मधुकर सिंह 15 जुलाई को अपराह्न पौने चार बजे हमारे बीच नहीं रहे। आरा जिले के धरहरा गाँव स्थित अपने निवासस्थान पर उन्होंने अंतिम साँसें लीं। विगत पांच-छह वर्षों से मधुकर सिंह अस्वस्थ थे, उन पर पैरालाइसिस का आघात हुआ था। लेकिन अस्वस्थता की स्थिति में भी उन्होंने आखिरी सांस तक लेखन कार्य जारी रखा। सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक बदलाव के लिए संघर्षरत लोगों के लिए वे हमेशा प्रेरणास्रोत रहेंगे।

मधुकर सिंह फणीश्वरनाथ रेणु के बाद हिंदी के उन गिने-चुने साहित्यकारों में से थे, जिन्होंने आजीवन न केवल ग्रामीण समाज को केंद्र बनाकर लिखा, बल्कि वहां चल रहे राजनीतिक-सामाजिक बदलाव के संघर्षों को भी शिद्दत के साथ दर्ज किया। उन्होंने भोजपुर के क्रांतिकारी किसान आंदोलन को स्वाधीनता आंदोलन की निरंतरता में देखा और अपनी रचनाओं में इसे चिह्नित किया कि जब 1947 के बाद भी सामाजिक विषमता और उत्पीड़न खत्म नहीं हुआ और शासकवर्ग का दमनकारी चरित्र नहीं बदला, तो फिर से आजादी की एक नई लड़ाई भोजपुर में शुरू हुई। नक्सलबाड़ी विद्रोह ने उसे आवेग प्रदान किया। मधुकर सिंह के साहित्य का बहुलांश भोजपुर के मेहनतकश किसानों, खेत मजदूरों, भूमिहीनों, मेहनतकश औरतों और गरीब, दलित-वंचितों के क्रांतिकारी आंदोलन की आंच से रचा गया। सामंती-वर्णवादी-पितृसत्तात्मक व्यवस्था से मुक्ति के लिहाज से मधुकर सिंह की रचनाएं बेहद महत्व रखती हैं। स्त्री की मुक्ति के सवाल को मधुकर सिंह ने दलित मुक्ति से अभिन्न रूप से जोड़कर देखा। दलितों, स्त्रियों, अल्पसंख्यकों की सामाजिक मुक्ति का संघर्ष इनके कथा साहित्य में जमीन के आंदोलन से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ रहा है। सामंती-पूंजीवादी व्यवस्था के सबसे निचले स्तर पर मौजूद मेहनतकशों की सामाजिक-आर्थिक मुक्ति वर्ग-समन्वय के किसी रास्ते से संभव नहीं है, मधुकर सिंह की कहानियां बार-बार इस समझ को सामने लाती हैं।

मधुकर सिंह

मधुकर सिंह

2 जनवरी 1934 को बंगाल प्रांत के मिदनापुर में जन्मे मधुकर सिंह ने जीवन के आठ दशक का ज्यादातर समय बिहार के भोजपुर जिला मुख्यालय आरा से सटे अपने गांव धरहरा में गुजारा। सोनभद्र की राधा, सबसे बड़ा छल, सीताराम नमस्कार, जंगली सुअर, मनबोध बाबू, उत्तरगाथा, बदनाम, बेमतलब जिंदगियां, अग्‍नि‍ देवी, धर्मपुर की बहू, अर्जुन जिंदा है, सहदेव राम का इस्तीफा, मेरे गांव के लोग, कथा कहो कुंती माई, समकाल, बाजत अनहद ढोल, बेनीमाधो तिवारी की पतोह, जगदीश कभी नहीं मरते समेत उन्नीस उपन्यास और पूरा सन्नाटा, भाई का जख्म, अगनु कापड़, पहला पाठ, असाढ़ का पहला दिन, हरिजन सेवक, पहली मुक्ति, माइकल जैक्सन की टोपी, पाठशाला समेत उनके ग्यारह कहानी संग्रह और प्रतिनिधि कहानियों के कुछ संग्रह भी प्रकाशित हैं। लाखो, सुबह के लिए, बाबू जी का पासबुक, कुतुब बाजार आदि उनके चर्चित नाटक हैं। ‘रुक जा बदरा’ नामक उनका एक गीत संग्रह भी प्रकाशित है। उनकी कई कहानियों के नाट्य मंचन भी हुए हैं। वे जन नाट्य संस्था युवानीति के संस्थापकों में से थे। मधुकर सिंह ने कुछ कहानी संकलनों का संपादन भी किया। बच्चों के लिए भी दर्जनों उपन्यास और कहानियां उन्होंने लिखी। उनकी रचनाओं के तमिल, मलयालम, कन्नड़, तेलुगु, मराठी, पंजाबी, उडि़या, बांग्ला, चीनी, जापानी, रूसी और अंग्रेजी में अनुवाद हो चुके हैं। उन्होंने ‘इस बार’ पत्रिका के अतिरिक्त कुछ पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया। हमेशा प्रगतिशील-जनवादी साहित्यिक-सांस्कृतिक आंदोलन से जुड़े रहे कथाकार मधुकर सिंह जन संस्कृति मंच की स्थापना के समय से ही इसके साथ थे। उन्होंने जसम के राष्ट्रीय परिषद और कार्यकारिणी के सदस्य बतौर अपनी जिम्मेवारियां निभाईं और लंबे समय तक राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे। सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, फणीश्वरनाथ रेण पुरस्कार, कर्पूरी ठाकुर पुरस्कार समेत उन्हें कई सम्मान और पुरस्कार मिले। पिछले ही साल आरा में उन्हें जन संस्कृति सम्मान से सम्मानित किया गया था और उनके साहित्यिक योगदान का मूल्यांकन किया गया था।

जन संस्कृति मंच जनता के संघर्षों के हमसफर, साथी और अपने अत्यंत प्रिय लेखक मधुकर सिंह को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है.

(जसम के केन्द्रीय कार्यकारिणी की ओर से सुधीर सुमन द्वारा जारी)

परमानंद श्रीवास्तव को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि

परमानंद श्रीवास्तव

परमानंद श्रीवास्तव

नई दि‍ल्‍ली : सुप्रसिद्ध आलोचक परमानंद श्रीवास्तव ( 1935-2013) का 5 नवम्बर 2013 को गोरखपुर में 78 वर्ष की आयु में निधन हो गया। आधी सदी से भी ज़्यादा के अपने रचनात्मक जीवन में उन्होंने आलोचना की एक दर्जन पुस्तकें लिखीं। ‘नयी कविता का परिप्रेक्ष्य’(1965), ‘हिन्दी कहानी की रचना प्रक्रिया’ (1965), ‘कवि-कर्म और काव्य-भाषा’ (1975), ‘उपन्यास का यथार्थ और रचनात्मक भाषा’ (1976), ‘जैनेन्द्र के उपन्यास’ (1976), ‘समकालीन कविता का व्याकरण’ (1980), ’समकालीन कविता का यथार्थ’ (1988). ‘शब्द और मनुष्य’ (1988), ‘उपन्यास का पुनर्जन्म’(1995), ‘कविता का यथार्थ’(1999), ‘कविता का उत्तर जीवन’ (2005), ‘दूसरा सौंदर्यशास्त्र क्यों?’(2005) उनकी आलोचना संबंधी पुस्तकें हैं। उनके छः कविता संग्रह हैं- ‘उजली हँसी के छोर पर’( 1960), ‘अगली शताब्दी के बारे में’ (1981), ‘चौथा शब्द’ (1993),‘एक अनायक का वृत्तांत’ (2004), ‘प्रतिनिधि कवितायें’(2008) और  ‘इस बार सपने में ‘(2008)। ‘मेरे साक्षात्कार’ शीर्षक से उनके साक्षात्कारों की पुस्तक 2005 में प्रकाशित हुई। उनके दो निबंध संग्रह ‘अँधेरे कुँए से आवाज़’ और ‘सन्नाटे में बारिश’ क्रमशः 2005 और 2008 में प्रकाशित हुए। उन्होंने पाब्लो नेरुदा की 70 कविताओं का अनुवाद किया और साहित्य अकादमी से निराला और जायसी पर उनके दो मोनोग्राफ प्रकाशित हुए। साहित्य अकादमी से ही ‘समकालीन हिन्दी कविता’ और ‘समकालीन हिन्दी आलोचना’ के संचयन उनके सम्पादन में क्रमशः 1990 और 1998 में निकले। काफी समय तक वे ‘आलोचना’ पत्रिका से जुड़े रहे, पहले नामवर सिंह के सम्पादक रहते हुए- उनके साथ सह-सम्पादक के रूप में, फिर सम्पादक के बतौर और इस दरम्यान दोनों आलोचकों ने इस पत्रिका को रचना और विचार की एक समर्थ और अग्रणी पत्रिका के रूप में निखार दिया।

परमानंदजी कविता के मर्मज्ञ आलोचक ही नहीं थे, बल्कि कहना चाहिए कि उन्होंने कविता के जीवन को आखिरी हद तक जा कर देखने का मिजाज़ विकसित किया था, कविता के जीवन को ही नहीं उसके उत्तर-जीवन को, उसके पुनर्जन्म को भी। वे कविता ही नहीं, बल्कि समूचे सृजन की उत्तर-जीविता को एक ऐसे समय में रेखांकित कर रहे थे, जब इतिहास, कर्ता, कला, साहित्य और सृजन सबके अंत की घोषणाएँ हो रही थीं। भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस परिघटना के कुछ अन्य आयाम भी थे। ‘कविता का उत्तर-जीवन’ शीर्षक पुस्तक के पूर्वकथन में वे लिखते हैं- ‘देखते-देखते कविता को सस्तेपन की ओर,  भद्दी तुकबंदियों की ओर और अश्लील मनोरंजन तक सीमित रखने का जो दुश्चक्र साम्प्रदायिक ताकतों के एजेंडे पर है,  उसे देखते हुए भी कहा जा सकता है कि कविता की जीवनी शक्ति असंदिग्ध है। यही समय है कि ग़ालिब, मीर, दादू, कबीर भी हमारे समकालीन हो सकते हैं।’

कविता के श्रेष्ठ आलोचक और भी रहे और हैं, लेकिन कविता को एक असमाप्त जीवंत-प्रक्रिया के रूप में देखना समझना और उससे डूब कर प्यार करना परमानंद जी का अपना निराला रास्ता था। उन्‍होंने कविता के अर्थ, कविता में बहते समय, कविता और समाज के रिश्ते, कविता और पाठक के बीच संवाद पर लगातार विचार किया और उसे जीवनानुभूति और जीवन-ज्ञान के एक समानांतर संसार की तरह समझा। काव्यभाषा पर उनकी गहरी पकड़ थी, लेकिन नयी कविता के संस्कार में दीक्षित आलोचकों की तरह उन्होंने उसे एकमात्र या सर्वोपरि निकष नहीं बनाया। भक्ति-काल से लेकर बिलकुल अभी तक की कविता पर उन्होंने लिखा। हिन्दी कविता में जितने कवियों पर उन्होंने लिखा, शायद अन्य किसी आलोचक ने नहीं और जिन पर उन्होंने लिखा उनमें समकालीन कविता के नव्यतम हस्ताक्षर तक शामिल हैं। उपन्यास और कहानी पर लिखते हुए भी वे बराबर नव्यतम पीढी़ के रचना संसार से रिश्ता जोड़े रहे। स्त्री जीवन पर केन्द्रित और खुद स्त्रियों द्वारा लिखे साहित्य को उन्होंने ख़ास तौर पर रेखांकित किया और स्त्री रचनाशीलता की अपनी अलग शख्सियत को महत्त्व दिया। अनामिका, गगन गिल, सविता सिंह, नीलेश रघुवंशी, अनीता वर्मा, कात्यायनी या तेजी ग्रोवर, इन कवयित्रियों के काव्यस्वर में समवेत क्या है और इनकी विशिष्टताएं क्या हैं, उन्हें लक्षित करना उन्होंने ज़रूरी समझा। परमानंद जी ने आधुनिक भारतीय कविता के बुनियादी सेक्युलर चरित्र का बारम्बार रेखांकन करते हुए मराठी, बांग्ला, मलयालम, उडिया, असमिया, पंजाबी, कन्नड़ आदि भाषाओं की समकालीन रचनाशीलता को भी सामने रखा।

उनके जीवन में सादगी और खुलापन तो था ही, साम्प्रदायिकता और जन-विरोधी शासकीय नीतियों के खिलाफ एक नागरिक के बतौर वे लगातार मुखर रहे। पूर्वी उत्तर-प्रदेश के नाभि-केंद्र गोरखपुर में रहते हुए सेक्युलर और प्रगतिशील बौद्धिक दायरे के निर्माण में कई दशकों से उनकी एक प्रमुख भूमिका रही और यह कार्य आसान कतई न था। वाद- विवाद, सहमति-असहमति को उन्होंने कभी भी व्यक्तिगत नहीं माना और हरदम उसे वैचारिक दायरे की ही चीज़ समझा। उन्होंने लिखा है, ‘कविता शब्दों में या शब्दों से लिखी ज़रूर जाती है पर साथ ही अपने बाहर या आसपास वह जगह भी छोड़ती चलती है जिसे पाठक अपनी कल्पना और समय के अनुरूप भर सकता है।’ परमानंद श्रीवास्तव की आलोचना के बारे में भी बहुत हद तक यही बात कही जा सकती है।

परमानंद जी का जाना साहित्य की दुनिया में एक बड़े खालीपन की तरह लगता है। नयी रचनाशीलता को इस खालीपन को भरने की चुनौती और दायित्व को उठाना होगा।

(सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सह-सचिव, जन संस्कृति मंच की ओर से जारी)   

दमन विरोध दिवस 26 को

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नई दि‍ल्‍ली : 26 जून 2013 को देश पर कांग्रेस द्वारा आपातकाल थोपने की 38वीं बरसी है। बुद्धि‍जीवियों, विपक्षी नेताओं समेत तमाम आम लोगों को जेल में ठूँसने के जरिये इंदिरा सरकार ने विरोध के हर स्वर को कुचल देने की कोशिश की थी। आपातकाल के बाद के पहले आम चुनाव में आजादी के बाद पहली बार कांग्रेस को हार का मुँह देखना पड़ा था। और यह भी सच है कि तब से घोषित रूप से आपातकाल नहीं लगाया गया, लेकिन थोड़ा करीब से देखने पर पता चलता है कि भारतीय लोकतंत्र अघोषित तौर पर लगातार आपातकाल की चपेट में है। पूरा देश छोटे-छोटे आपातकालों से भरा पड़ा है।

अभिव्यक्ति की आजादी और विरोध की आवाजों पर हमले इसी अघोषित आपातकाल की अभिव्यक्तियां हैं। ‘कबीर कला मंच’ की शीतल साठे व उनके साथियों की गिरफ्तारी, बिनायक सेन व सीमा आजाद जैसे कार्यकर्ताओं पर राजद्रोह के मुकदमे, फर्जी आरोपों में जीतन मरांडी जैसे संस्कृतिकर्मी को सजा,  बंगलुरु की गैलरी में युवा चित्राकार अनिरुद्ध  साईंनाथ की पेंटिंग प्रदर्शनी पर रोक,  कश्मीर पर बनी डॉक्यूमेंटरी फि‍ल्मों; जैसे- संजय काक की ‘जश्ने आजादी को’ कैंपसों में दिखाने पर हिंदुत्ववादी गुंडों के आदेश से रोक,  बाल ठाकरे की मौत पर शिव सैनिकों द्वारा थोपे गए बंद की फेसबुक पर आलोचना करने वाली दो लड़कियों की गिरफ्तारी,  नोएडा और मानेसर समेत पूरे देश में मजदूरों पर हमले आदि क्या आपातकाल की याद दिलाने वाली घटनायें नहीं हैं? संस्कृतिकर्मियों का दमन और उनके एक हिस्से को पालतू बनाने की प्रवृत्‍ति‍याँ आपातकाल में थीं और आज भी देखी जा सकती हैं।

आपातकाल के दौरान हर विरोध की आवाज को देशद्रोही बताने का सरकारी चलन था, आज यह और भी बढ़ गया है। पुलिस नृशंस तरीके से अल्पसंख्यकों की गिरफ्तारी और हत्या करती है और इसका विरोध करने वालों को देशद्रोही करार दे दिया जाता है। परमाणु संयंत्र के जरिये गरीबों की रोजी-रोटी छीनने और उन्हें विकिरण के भयावह खतरे में डालने का विरोध करने वाले कुडनकुलम के आम गरीबों और कार्यकर्ताओं को भी देशद्रोही करार दिया जाता है। मारुति फैक्ट्री के कामगारों का सिर्फ पुलिस दमन ही नहीं होता, उन्हें झूठे मुकदमों में भी फंसाया जाता है। नोएडा में मजदूरों को झूठे मुकदमों में फँसाकर कई महीने जेल में रखा गया। उड़ीसा में पॉस्को विरोध आंदोलन हो या उत्तराखंड का कोकाकोला विरोधी आंदोलन,  कैंपसों में छात्रों के आंदोलन हों या खेत मजदूरों और ग्रामीण गरीबों के आंदोलन, हर जगह राज्य दमन का एक ही ढर्रा कायम है।

इन दिनों पूँजी जितने गहरे संकट से गुजर रही है, उससे उबरने के लिए उसे और भी ज्यादा दमनकारी राज्य की जरूरत है। कॉरपोरेट घरानों और कॉरपोरेट मीडिया द्वारा नरेन्द्र मोदी को अगले प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित करना इसी जरूरत का परिणाम है। अब घोषित आपातकाल की जरूरत शासकों को नहीं रही, उन्होंने हजारों नये रास्ते ईजाद कर लिए हैं। लेकिन इस राज्य दमन और अघोषित आपातकाल के बावजूद प्रतिरोध आंदोलनों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। देश का शायद ही कोई कोना हो जिसने पिछले कुछ वर्षों में जबर्दस्त जन उभार न देखे हों। आइए इस 26 जून को आपातकाल को याद करते हुए इसे दमन विरोधी दिवस के रूप में रेखाँकित करें।

(अशोक भौमिक द्वारा जन संस्कृति मंच, दिल्ली के लिए जारी)

शमशाद बेगम की शख्सियत के साथ कोई मिक्सिंग संभव नहीं

शमशाद बेगम

शमशाद बेगम

नई दिल्ली: मंगलवार 23 अप्रैल को मशहूर पार्श्‍वगायिका शमशाद बेगम हमारे बीच नहीं रहीं। चालीस और पचास के दशक के फिल्मों की लोकप्रिय गायिका शमशाद बेगम की आवाज में गाए गए कई गीत बाद के दौर में भी लोकप्रिय रहे। वह जीवित थीं इसका कोई खास ख्याल बाजार और फिल्म उद्योग को नहीं रहा, पर उनकी खनकदार आवाज में गाए गए कई मशहूर गानों को नब्बे के बाद गीत-संगीत के रिमिक्स के बाजार द्वारा खूब इस्तेमाल किया गया। चुलबुले, तीक्ष्ण और वजनदार आवाज वाले उन गानों के साथ जिस तरह के उत्तेजक दृश्यों को मिक्स किया गया, उससे उन गानों में मौजूद पवित्रता, नैसर्गिकता और अबोध अल्हड़पन का मानो एक तरह से विनाश तो हुआ, लेकिन यह भी साबित हुआ कि चालीस-पचास के दशक में उन्होंने लयकारी और शोखी का जो अंदाज रचा था, उसके सामने नए जमाने का संगीत कितना फीका लगता है। फिर भी बाजार उन गानों को गाने वाली शख्सियत को अपने साथ मिक्स नहीं कर सका। उस व्यक्तित्व के साथ कोई रिमिक्सिंग संभव नहीं था। वह शोहरत की पागल दौड़ और खुद को सुर्खियों में रखने की होड़ से मुक्त थीं। कई दशक पहले उन्होंने फिल्म और संगीत उद्योग से खुद को अलग कर लिया था।

शमशाद बेगम का जन्म पंजाब के अमृतसर में 14 अप्रैल 1919 को हुआ था। एक परंपरागत मुस्लिम परिवार में जन्मी मियां हुसैन बख्श और गुलाम फातिमा की आठ संतानों मे से एक शमशाद को बचपन से ही गाने का शौक था। ग्रामोफोन पर बजने वाले गानों की वह नकल करती थीं। मोहर्रम के मर्सिये भी याद करके सुनाती थीं। बचपन से ही वह मशहूर गायक के.एल. सहगल की प्रशंसक थीं और बताती थीं कि उनकी फिल्म ‘देवदास’ उन्होंने 14 बार देखी। उनके गाने के शौक को उनके चाचा ने काफी प्रोत्साहित किया। 13 साल की उम्र में जीनोफोन कंपनी ने उनकी आवाज में एक पंजाबी गाना रिकार्ड किया, जो बेहद मकबूल हुआ। उसी कंपनी से मशहूर संगीतकार गुलाम हैदर भी जुड़े हुए थे, जो शब्दों के शुद्ध उच्चारण की उनकी क्षमता के प्रशंसक हो गए। 1937 में उन्हें लाहौर रेडियो स्टेशन में गाने का मौका मिला, फिर उन्होंने पेशावर रेडियो और दिल्ली रेडियो स्टेशन के लिए भी गाने गाए। कहते हैं कि रेडियो पर उनकी आवाज को सुनकर ही कई संगीत निर्देशकों ने उन्हें अपनी फिल्मों के लिए गवाने की पेशकश की। 1939 में बैरिस्टर गणपतलाल बट्टो के साथ उनका विवाह हुआ और उसके बाद 1940 में फिल्मों के लिए गाने का सिलसिला शुरू हुआ। 1940 में उन्होंने पंजाबी फिल्म ‘यमला जट’ के लिए पहली बार गाया। इसके बाद पंजाबी फिल्म ‘चौधरी’ में उन्हें गाने का मौका मिला। दोनों फिल्मों के गाने बेहद मकबूल हुए। उनकी आवाज के प्रशंसक संगीतकार गुलाम हैदर ने ‘खजांची’(1941) और ‘खानदान’ (1942) में उनसे गवाया। फिर उन्हीं के साथ 1944 में वह मुंबई चली आईं और अगले दो दशक से अधिक समय तक वह हिन्‍दी सिनेमा की ऐसी गायिका बनी रहीं, जिनकी खनकदार आवाज का जादू सब पर तारी रहा। गुलाम हैदर, सी. रामचंद्र, खेमचंद्र प्रकाश, राम गांगुली, एस.डी. वर्मन, नौशाद और ओ.पी. नय्यर सरीखे अपने दौर के सारे प्रतिभावान संगीतकारों के लिए उन्होंने गाने गाए। नौशाद और ओ.पी.नय्यर ने उनकी आवाज की खासियत को सर्वाधिक समझा, इसलिए कि शमशाद बेगम की आवाज में जो एक देशज खनक थी, लोकगायिकी और लोकस्वर का जो अंदाज था, मिट्टी का खुरदुरापन और उसकी जो महक थी, वह लोकधुनों के पारखी इन संगीतकारों के संगीत में और भी निखर गई। हालांकि यह शमशाद बेगम की ही आवाज थी, जिसे सी. रामचंद्र ने ‘आना मेरी जान संडे के संडे’ जैसे पाश्चात्य शैली वाले गानों में जबर्दस्त तरीके से उपयोग किया। यह कम ही लोगों को पता है कि शास्त्रीय संगीत की उन्होंने बाकायदा शिक्षा ली थी। वह सारंगी के उस्ताद हुसैन बख्शवाले साहेब की शागिर्द थीं। बचपन के दिन भुला न देना ( दीदार ), दूर कोई गाए (बैजू बावरा), छोड़ बाबुल का घर, होली आई रे कन्हाई, ओ गाडी वाले गाडी धीरे हाँक रे (मदर इंडिया),  मेरे पिया गए रंगून (पतंगा), मिलते ही आंखें दिल हुआ दीवाना किसी का (बाबुल), सैया दिल में आना रे (बहार), धरती को आकाश पुकारे, मोहन की मुरलिया बाजे (मेला), तेरी महफिल में किस्मत आजमा कर (मुगल-ए-आजम), लेके पहला पहला प्यार, कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना (सी.आई.डी), कभी आर कभी पार (आर पार), कजरा मुहब्बत वाला(किस्मत) जैसे सदाबहार गाने शमशाद बेगम की याद को हमेशा जिंदा रखेंगे। शमशाद बेगम ने कभी अपना म्यूजिकल ग्रुप ‘द क्राउन थिएट्रिकल कंपनी ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट’ भी बनाया था जिसके जरिए उन्होंने पूरे देश में प्रस्तुतियां दी थीं।

भारत सरकार को बहुत देर से उनकी याद आई। जब पद्मभूषण जैसे पुरस्कारों की साख खत्म हो चुकी थी और इसके लिए जोड़तोड़ और सत्ता से नजदीकी एक खुला पैमाना बन चुका था, तब 2009 में उन्हें ‘पद्मभूषण’ दिया गया। शमशाद बेगम जिन्होंने हिंदी-उर्दू के अलावा पंजाबी, बंगाली और अन्य भारतीय भाषाओं में 500 से ज्यादा गाने गाए, जो हमेशा अपना फोटो खिंचवाने से बचती रहीं, उनकी आवाज ही उनकी पहचान है, वही विश्वसनीय है और विश्वसनीय है श्रोताओं की पसंद, सरकारी सम्मान और रिमिक्सिंग का उपभोक्ता समाज उसके सामने कोई महत्व नहीं रखता। शमशाद बेगम के एक प्रशंसक चंद्रकांत मोहन लाल ने उन पर ‘खनकती आवाज शमशाद बेगम‘ नाम की एक किताब लिखी है।

1955 में अपने खाबिंद गनपतलाल बट्टो के निधन के बाद से शमशाद बेगम अपनी बेटी ऊषा रात्रा के साथ रहती थीं। दामाद लेफ्टिनेन्ट कर्नल वाई. रात्रा जहां रहे वे वहीं रहीं और रिटायरमेंट के बाद जब वे स्थायी तौर पर मुम्बई में रहने आ गए तो शमशाद जी भी फिर से मुंबई आ गईं। 1998 में एक गलतफहमी से उनके निधन की खबर आ गई थी। लेकिन इस बार उन्होंने हमेशा के लिए अपने चाहने वालों को अलविदा कह दिया। जन संस्कृति मंच की ओर से शमशाद बेगम को हार्दिक श्रद्धांजलि!

सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी

जनसंघर्षों की आवाज बन चुकी हैं गोरख की कविताएं

गोरख पांडेय

गोरख पांडेय

स्मृति दिवस पर क्रान्‍तिकारी कवि की रचनाओं पर लेखकों-संस्कृतिकर्मियों ने की चर्चा- 

जन संस्कृति मंच के पहले राष्ट्रीय महासचिव क्रान्‍तिकारी कवि गोरख पांडेय की याद में उनके स्मृति दिवस 29 जनवरी 2013 को चारु भवन सभागार (शकरपुर, दिल्ली) में कार्यक्रम आयोजित किया गया। जसम की गीत नाट्य इकाई ‘संगवारी’ द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में गोरख की समग्र रचनाओं का सम्‍पादन कर रहे युवा आलोचक गोपाल प्रधान ने कहा कि गोरख हिन्‍दी के ऐसे कवि हैं जिनकी कविताओं में अन्याय और गैरबराबरी के खिलाफ दर्शन और विचार पानी की तरह समाया हुआ है। उनके जेहन  में दिन-रात दार्शनिक प्रश्‍न और समय की चिंताएं चलती रहती थीं। कविता युग की नब्ज धरो/आदमखोरों की निगाह में खंजर सी उतरो- ऐसी कविता बहुत कम कवियों ने लिखी हैं। शासकवर्ग के प्रति ऐसी प्रचंड नफरत और शोषित-उत्पीडि़त वर्ग के प्रति ऐसी सम्‍वेदनशीलता बहुत कम कवियों में मिलती है। वह कहते थे कि जनता को रोटी के साथ ही आला दर्जे की संस्कृति भी चाहिए, क्योंकि संस्कृति का निर्माण भी जनता ने ही किया है। और उसके द्वारा निर्मित हर चीज की तरह उसे संस्कृति से भी वंचित किया गया है। पोपुलर कल्चर के नाम पर परोसी जाने वाली घटिया चीजों के विपरीत उन्होंने जनता की संस्कृति की बेहतरीन उपलब्धियों को लोकप्रिय तरीके से जनता तक पहुँचाया। अभी भी उनके कवि के असली महत्व को ठीक से पहचाना नहीं जा सकता है। संस्कृतिकर्मियों की जिम्मेवारियों के सन्‍दर्भ में भी गोरख से अभी बहुत कुछ सीखना होगा।

पत्रकार और कवि चंद्रभूषण ने कहा कि गोरख उन गिने-चुने लोगों में से हैं, जिन्हें एक मिथक के समान दर्जा मिल गया है। अपने दौर के हिन्‍दी साहित्य के वह चरम बिन्‍दु हैं। व्यक्ति और आंदोलन- दोनों को सम्‍बोधित करने की दृष्टि से उनकी कविताएं अद्भुत हैं। वह अलगावों में पड़े हुए लोगों को जोड़ते हैं। अपने पहले संग्रह ‘जागते रहो सोने वालों’ में उन्होंने लोकगीत का खंड ज्योति जी को समर्पित किया है और आधुनिक कविताओं का खंड बुआ को, इसके पीछे भी वही नजरिया काम करता प्रतीत होता है। गोरख ने गहरी तन्हाई की कविता भी लिखी। चंद्रभूषण ने कहा कि गोरख बार-बार नये रूप में हमारे सामने आयेंगे और उनकी कविताओं की नई-नई व्याख्याएं होंगी।

फिल्मकार संजय जोशी ने कहा कि गोरख की कविताएं लोगों को उद्वेलित करती हैं। जल्द ही गोरख की आवाज में उनकी कविताओं की दुर्लभ रिकार्डिंग जारी की जाएगी।

गोरख की अस्वस्थता के दौरान उनके साथ रहने वाले और राजनीतिक कार्यों के सिलसिले में उनके सम्‍पर्क में रहने वाले भाकपा-माले के दिल्ली राज्य कमेटी सदस्य अमरनाथ तिवारी ने कहा कि वह तो जीवन में शामिल हैं। गोरख ने जिस बारीक तरीके से गरीबों और मजदूरों के जीवन को अपनी कविताओं में रखा है, लगता है जैसे वह जी रहे हैं उन चीजों को। वह मजदूर बस्तियों में जाकर भी अपनी कविताएं सुनाते थे। वह अपनी रचनाओं में सिर्फ सवाल ही नहीं उठाते थे, बल्कि हल भी सुझाते थे। गोरख जैसे कवि की आज भी जरूरत है, जनता ऐसे कवियों को पसंद करती है, जो उसकी बातों को कहे। उन्होंने बताया कि यह गोरख के विचारों का ही उन पर प्रभाव था कि उन्होंने अपनी विधवा बहन का विवाह करवाया, जिसके लिए समाज उस वक्त तैयार नहीं होता था।

वरिष्ठ माले नेता सुबोध सिन्हा ने याद किया कि किस तरह बोकारो में अपने एक सप्ताह के प्रवास के दौरान गोरख ने अपनी एक कविता को मजदूरों को लगातार तीन दिन सुनाया और उनकी प्रतिक्रियाओं और सुझावों के अनुसार उसे संशोधित करते हुए अंतिम रूप दिया।

कवि श्याम सुशील ने गोरख की रचना ‘आशा का गीत’ से प्रेरित अपनी कविता और उनकी चर्चित कविता ‘बुआ के लिये’ का पाठ किया।

संस्कृतिकर्मी गिरजा पाठक ने कहा कि आठ-नौ साल की उम्र से उन्होंने गाना शुरू किया, तो गोरख के गीतों से उन्होंने शुरुआत की। नैनीताल में जनकवि गिर्दा भी गोरख के गीतों को गाते थे। कविता-पोस्टरों में भी गोरख की काव्य-पंक्तियाँ केंद्र में रहती थीं। गिरजा ने कहा कि बाद में राजनीतिक कार्य के सिलसले में वह जिन राज्यों में भी गए, वहाँ गोरख के गीतों को आंदोलनकारियों की जुबान पर पाया। जसम के राष्ट्रीय पार्षद कपिल शर्मा ने कहा कि उन्होंने संस्कृतिकर्म की शुरुआत गोरख के गीतों से की। कोई गीत इतने सारे अर्थ समेटे हुए हो सकता है, यह गोरख के गीतों से ही मालूम हुआ। संस्कृतिकर्मी मित्ररंजन ने कहा कि आज जो जल, जंगल, जमीन के लिए लड़ाइयाँ चल रही हैं, उसके लिए भी गोरख की कविताएं बेहद प्रासंगिक हैं। उन्होंने उनकी कविता ‘स्वर्ग से विदाई’ का पाठ किया। कपिल शर्मा और असलम ने गोरख के गीतों और गजलों को गाकर सुनाया तथा नितिन ने उनकी कविता ‘बंद खिड़कियों से टकराकर’ का पाठ किया। संचालन करते हुए समकालीन जनमत के सम्‍पादक सुधीर सुमन ने कहा कि दिल्ली में हमने गोरख को खोया था, उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि यहाँ जनसांस्कृतिक आंदोलन को ताकतवर तरीके से आगे बढ़ाया जाए। सत्ता और कारपोरेट पूँजी आज जिस तरह साहित्य-संस्कृति को भी निगल लेने का प्रयास कर रही है और उसे अपना वैचारिक सहयोगी बना रही है, उसके बरअक्स जनता के सांस्कृतिक आंदोलन को विकसित करना वक्त की जरूरत है।

आयोजन में युवा आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी, प्रकाश चौधरी, पत्रकार शिवदास, प्रेम सिंह गहलावत, कलाकार विजय, प्रकाशक आलोक शर्मा, नसीम शाह, डिम्पल, ऋतुपर्णा विस्वास, रिजवान आलम, शहनवाज आलम, सोना बाबू, सैयद मजाहिर, श्योदान प्रजापत, मुस्तकिम, प्रकाश आदि मौजूद थे।

1945 में उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में जन्मे गोरख पांडेय ने अपनी कविताओं और गीतों के जरिए हिन्‍दी साहित्य में विशेष पहचान बनाई। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्‍दी के वह इकलौते कवि हैं, जिनकी रचनाएं सच्चे अर्थों में लोकगीत की तरह पूरे उत्तर भारत में प्रचलित हुईं और जल्द ही अन्य भाषा-भाषी प्रांतों में भी जनांदोलनों में उनके गीत सुनाई देने लगे। यह सिलसिला आज भी जारी है। दिल्ली गैंगरेप कांड के खिलाफ भड़के आंदोलन के दौरान इंडिया गेट और जंतर मंतर से लेकर पटना, इलाहाबाद, गोरखपुर सरीखे कई शहरों में होने वाले प्रदर्शनों में भी गोरख के गीत सुनाई पड़े।

29 जनवरी को बिहार के समस्तीपुर और मधुबनी तथा गोरख पांडेय के गृहजिला देवरिया (उत्तर प्रदेश) में भी उनकी स्मृति में आयोजन हुए। अभी दरभंगा, आरा, पटना, पूर्णिया आदि शहरों में भी आयोजन होने हैं।

प्रस्‍तुति :सुधीर सुमन

असीम त्रिवेदी पर फर्जी आरोप वापस लो, रिहा करो : जन संस्कृति मंच

कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी

कारपोरेट लूट और भ्रष्टाचार में गले तक डूबे सत्ताधारी हर विरोध के स्वर का गला घोंटने पे आमादा हैं। कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को देशद्रोह के जुर्म में गिरफ्तार करना खुद में एक आपराधिक कृत्य है। संसद सहित जिन संवैधानिक प्रतीकों और संस्थाओं का उपहास करने का आरोप असीम त्रिवेदी पर लगाया गया है, उन की धज्जियाँ खुद सरकार उड़ा रही है। कोयला घोटाले पर भारत के  नियंत्रक और महालेखापरीक्षक की  रिपोर्ट को उसने खारिज कर दिया है, जबकि  यह संस्था उतनी ही   संवैधानिक  है जितनी कि संसद या  सरकार। फिर   राष्ट्रीय   चिन्ह  में शेरों की जगह भेड़िये  किसी कार्टून में दिखाना राष्ट्रीय चिन्ह का उपहास नहीं, बल्कि उन तत्वों पर करारा व्यंग्य है जिन्होंने ‘राष्ट्र’ को भेड़ियों के हवाले कर दिया है। संसदीय लोकतंत्र में हमारी कितनी ही आस्था हो, लेकिन यदि संसद खुद लोकतंत्र के प्रहसन में बदल जाये, तो कलाकार क्या उसके गुण गायेगा? रघुवीर सहाय द्वारा संसद का खींचा गया एक दृश्य देखिए-

‘सिंहासन ऊँचा है सभाध्यक्ष छोटा है

अगणित पिताओं के

एक परिवार के

मुँह बाए बैठे हैं लड़के सरकार के

लूले काने बहरे विविध प्रकार के

हल्की-सी दुर्गन्ध से भर गया है सभाकक्ष’

रघुवीर सहाय ने ही यह भी लिखा था-

‘राष्ट्रगीत में कौन खडा़ यह भारत-भाग्य-विधाता है

फटा सुथन्ना पहने जिसका गुन हरचरना गाता है’

क्या उपरोक्त पंक्तियों में महज  संसद या राष्ट्र का उपहास है? उपहास है उन धनपशुओं और उनके राजनीतिक दलालों का जिन्होंने ‘राष्ट्र’ की सभी संस्थाओं, मर्यादाओं, प्रतीकों को खोखला बना दिया है, उन्हें हड़प लिया है। राष्ट्र के वास्तविक नागरिकों (किसानों, मजदूरों, बहुजन) को ‘राष्ट्र’ के दायरे से बाहर खदेड़ दिया है। आज जिस तरह के अघोषित आपातकाल की स्थिति की ओर भारत अग्रसर है, उसका प्रतिकार सिर्फ ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ के तर्क से नहीं, बल्कि ‘विकल्प की ज़रूरत’ के तकाज़े से किया जाना भी ज़रूरी है।

जन संस्कृति मंच असीम त्रिवेदी पर लगाए सारे आरोपों और धाराओं को निरस्त करने, उनकी अविलम्ब रिहाई की मांग करता है और इसके लिए नागरिकों से आन्दोलन में उतरने की अपील करता है।

(प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी)

रामकृष्ण मणि का जसम की श्रद्धांजलि‍

इलाहाबाद : लखनऊ के सहारा अस्पताल में 25 जून को प्रोफेसर रामकृष्ण मणि त्रिपाठी का निधन हो गया। साम्प्रदायिकता और साम्राज्यवाद के खिलाफ जन-आन्दोलनों की एक सशक्त बौद्धिक आवाज़ हमारे बीच अचानक खामोश हो गयी। 23 मार्च को गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल में प्रतिरोध के सिनेमा पर उनका उद्बोधन सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनकी अंतिम उपस्थिति के बतौर लोगों की स्मृति में दर्ज रह जायेगा।

2 नवम्बर, 1929 को जन्मे प्रोफेसर त्रिपाठी आजमगढ़ जनपद के मूल निवासी थे जहां शिबली कॉलेज से इंटरमीडियट तक की शिक्षा लेने के बाद वह उच्च शिक्षा के लिये इलाहाबाद आये। इलाहाबाद में वह कम्यूनिस्ट पार्टी के भूतपूर्व महासचिव पी.सी. जोशी के सम्‍पर्क में आये और स्टूडेंट फेडरेशन की सदस्यता के रास्ते होते हुये भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य भी हो गये। राजनीति विज्ञान के मेधावी विद्यार्थी वह थे ही जिसके चलते उन्हें सन् 52-54 में इलाहाबाद विश्‍ववि‍द्यालय में अध्यापन का अवसर मिला, लेकिन उस समय सरकार की कम्यूनिस्ट-विरोधी मुहि‍म के चलते विश्‍ववि‍द्यालय में उनकी नौकरी स्थायी नहीं हो सकी। कुछ ही दिनों बाद वह सी.एम.पी. डिग्री कॉलेज में स्थायी प्रवक्ता नियुक्त हुये। 1958 में गोरखपुर विश्‍ववि‍द्यालय खुला जहाँ वह राजनीति-विज्ञान विभाग में असिस्टैंट प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हुये और सेवानिवृत्ति तक वह वहीं रहे। गोरखपुर ही उनका स्थायी आवास और बौद्धिक कर्मभूमि बना। प्रोफेसर त्रिपाठी न केवल राजनीतिक विचारों के इतिहास के अत्यंत लोकप्रिय शिक्षक थे, बल्कि छात्रों और बौद्धिकों के बीच सार्वजनिक जीवन में सकारात्मक हस्तक्षेप के रोल-मॉडल भी थे। वह यह मानते थे कि लोकतंत्र की हिफाज़त के लिये लगातार जनता के बुनियादी सवालों पर जन-आन्दोलन होते रहने चाहिये। गोरखपुर और पूर्वी उत्तर-प्रदेश के ऐसे बहुतेरे आन्दोलनों में वह प्रत्यक्ष भागीदारी भी करते थे, चाहे वह बन-टांगिया मज़दूरों के विस्थापन का सवाल हो या पूरे अंचल में साम्प्रदायिकता के उफान का विरोध करने का मसला हो। लम्बे समय से पूरे अंचल में मानवाधिकार, लोकतंत्र, भ्रष्टाचार-विरोध, साम्प्रदायिकता और साम्राज्यवाद-विरोध की कोई भी बौद्धिक पहलकदमी उनके बगैर शायद ही संपन्न होती रही हो। वह ऐसे हर आयोजन में अनिवार्य उपस्थिति रहते थे। कम्युनिस्ट पार्टी की आतंरिक बहसों के कारण पार्टी सदस्यता छोड़ देने के बाद भी लगातार वामपक्षीय विचारों और जन-आन्दोलनों के साथ रहे। गाँधी के लोक-सम्‍पर्क और जन-जागरण के भी वह कायल थे। दर्शन,  राजनीति-शास्त्र और साहित्य के गम्‍भीर अध्येता होने के साथ-साथ वह तमाम समाज-विज्ञानों की नवीनतम शोधों के प्रति जागरूक विद्वान थे। जीवन के आखिरी दिनों तक नौजवानों से उनकी दोस्ती, बहस-मुबाहिसे कभी ख़त्म नहीं हुये। एक सच्चे बौद्धिक की तरह वह खुले दिल-दिमाग के साथ ही आन्दोलनों और गोष्ठियों में शिरकत करते थे और अपनी बातें बगैर लाग-लपेट के लोगों के समक्ष रखते थे।

वर्ष 2003 में जब योगी आदित्यनाथ की साम्प्रदायिक मुहि‍म के खिलाफ लोग बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे, उन्होंने पीपुल्स फोरम जैसी संस्था के संस्थापक अध्यक्ष बनकर योगी और उनकी साम्प्रदायिक कार्रवाइयों का सार्वजनिक विरोध किया। पिछले दिनों अन्ना आन्दोलन के समर्थन में भारी जुलूस में वह ‘वाकर’ के सहारे चलते हुए शामिल हुये। ये उनकी दुर्घर्ष प्रतिबद्धता का ही प्रमाण था। लेकिन वह समर्थन भी आँख मूँद कर नहीं करते थे। अन्ना आन्दोलन का समर्थन करते हुये भी उन्होंने उसके कई तौर-तरीकों और विचार-दृष्टि की आलोचना सार्वजनिक तौर पर की।

जन संस्कृति मंच की पहल पर प्रतिरोध के सिनेमा के फेस्टिवल की जो मुहीम गोरखपुर से चलकर अब कई राज्यों तक सार्थक सिनेमा की मुहि‍म के बतौर फ़ैल चुकी है, उसके संरक्षक, प्रेरणास्रोत और मार्गदर्शक प्रोफेसर त्रिपाठी शुरू से लेकर मृत्यु-पर्यंत बने रहे। बगैर किसी स्पांसरशिप के, जनता के सहयोग के भरोसे सिनेमा के ज़रिये प्रगतिशील मूल्यों के प्रचार के वह सूत्रधार रहे। साहित्य में प्रेमचंद और सिनेमा में चार्ली चैपलिन उनके आदर्श थे। पिछले एक दशक में उन्होंने भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माले) के कई कार्यक्रमों में शिरकत की।

आज जब वह नहीं हैं  तो उनकी कमी हमें बराबर खलेगी। इस विरले जनपक्षधर बुद्धि‍जीवी को जन संस्कृति मंच का सलाम। हम उनके परिजन, छात्र और ढेरों चाहने वालों के दुःख में शरीक हैं। वह हमें सदा याद रहेंगे।

(प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी)

कथाकार अरुण प्रकाश को जसम की श्रद्धांजलि

नई दि‍ल्‍ली : हिन्‍दी के वरिष्ठ कथाकार अरुण प्रकाश का 18 जून, 2012  को दिल्ली के पटेल चेस्ट अस्पताल में लम्‍बी बीमारी के बाद निधन हो गया। बिहार के बेगूसराय में 22 फरवरी 1948 को जन्में अरुण प्रकाश अपने प्रगतिशील-जनवादी लेखन के लिये हमेशा प्रासंगिक बने रहेंगे। ‘भैया एक्सप्रेस’, ‘जल प्रांतर’, ‘मझधार किनारे’, ‘लाखों के बोल सहे’, ‘विषम राग’ और ‘स्वप्न घर’ जैसे कहानी संग्रहों के लेखक अरुण प्रकाश का उपन्यास ‘कोंपल  कथा’ और कविता संकलन ‘रात के बारे में’ भी चर्चित रहे। रोजगार के पलायन करने वाले बिहारी मजदूरों के जीवन संघर्ष पर केन्‍द्रि‍त उनकी कहानी ‘भैया एक्सप्रेस’ हो या उत्तर बिहार में बाढ़ की विभीषिका के बहाने पूरे समाज और व्यवस्था के अंतविर्रोधों और उसमें मौजूद द्वंद्वों को अभिव्यक्त करने वाली कहानी ‘जल प्रांतर’ हो, ये उनके प्रतिबद्ध लेखन की मिसाल हैं। उनकी रचनाओं में आम मेहनतकश लोगों के दुख-दर्द और समस्याओं को अभिव्यक्ति मिली।

सत्तर के तूफानी दशक में जिन नौजवान लेखकों ने साहित्य को सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन का माध्यम बनाया, अरुण प्रकाश उनमें से एक थे। बिहार में नवजनवादी सांस्कृतिक मोर्चा के गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। वह जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय परिषद में भी रहे।

अरुण प्रकाश कुछ वर्षों तक अध्यापन और पत्रकारिता से जुड़े रहने के बाद स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य करते रहे। उन्होंने अंग्रेजी से हिन्‍दी में विभिन्न विषयों की आठ पुस्तकों का अनुवाद किया। वह ‘चंद्रकांता’ सहित कई धारावाहिकों, वृत्तचित्रों एवं टेलीफिल्मों से भी जुड़े रहे।

हाल के एक दशक में उन्होंने स्वयं को कथा समीक्षा और आलोचना के लिए समर्पित कर दिया था।  अरुण प्रकाश को हिन्दी  अकादमी का साहित्यकार सम्मान, रेणु पुरस्कार, दिनकर सम्मान, सुभाष चंद्र बोस कथा सम्मान और कृष्ण प्रताप स्मृति कथा पुरस्कार से नवाजा जा चुका था।

हाल के दिनों में उन्होंने साहित्य अकादमी की पत्रिका ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ के कई अंकों का सम्‍पादन भी किया था। अरुण जी का असमय जाना हिन्दी साहित्य संसार की गहरी क्षति है। जन संस्कृति मंच की विनम्र श्रद्धांजलि!

(प्रणय कृष्ण, महासचिव जन संस्कृति मंच की ओर से जारी )