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कभी धूमिल नहीं होगी कुँवर नारायण की स्मृति 

कुँवर नारायण

नई दि‍ल्‍ली : मुक्तिबोध ने उन्हें पसंद किया और उनके दूसरे कविता-संग्रह ‘परिवेश : हम-तुम’ की समीक्षा करते हुए लिखा था कि वह ‘अंतरात्मा की पीड़ित विवेक-चेतना और जीवन की आलोचना’ के कवि हैं।

इससे पहले मुक्तिबोध मस्तिष्काघात के चलते अपने अंतिम समय में दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में लगभग एक महीने तक कोमा में रहे थे।

उसके बाद आसन्न साहित्यिक इतिहास में शायद दूसरी बार उतनी दुखद और भयावह घटना घटी है कि उस समय के मुक्तिबोध के प्रिय युवा कवि और इन दिनों हिंदी के शीर्ष कवियों में अग्रगण्य श्री कुँवर नारायण का 15 नवम्‍बर 2017 को  दिल्ली के एक अस्पताल में मस्तिष्काघात के चलते लम्बे समय तक कोमा में रहने के बाद देहावसान हो गया।

स्तब्ध कर देनेवाली इस मुश्किल घड़ी में हम उनके उत्कृष्ट रचनात्मक और वैचारिक अवदान को समकालीन सन्दर्भों में बेहद प्रासंगिक और मूल्यवान् मानते हुए उनके प्रति हार्दिक श्रद्धांजलि व्यक्त करते हैं और यह संकल्प कि शोक की इस वेला में हम उनकी जीवन-संगिनी श्रीमती भारती नारायण और उनके बेटे अपूर्व नारायण जी के साथ हैं।

हमारा समय बेशक कठिन है, जो कुँवर नारायण की विदाई से और कठिन ही हुआ है। लेकिन जब तक मनुष्यता रहेगी, कविता भी रहेगी और उसमें कुँवर जी के समुज्ज्वल हस्ताक्षर से हमें उसी तरह रौशनी मिलती रहेगी, जैसे कि उन्होंने स्वयं मनुष्यता में यह अविचलित आस्था व्यक्त की थी-

”कहीं कुछ भूल हो
कहीं कुछ चूक हो कुल लेनी देनी में
तो कभी भी इस तरफ़ आते जाते
अपना हिसाब कर लेना साफ़
ग़लती को कर देना मुआफ़
विश्वास बनाये रखना
कभी बंद नहीं होंगे दुनिया में
ईमान के ख़ाते।”

( ‘जन संस्कृति मंच’ की राष्ट्रीय परिषद की ओर से पंकज चतुर्वेदी द्वारा जारी)

दसवां गोरखपुर फ़िल्म फेस्टिवल 21 से

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नई दिल्ली : दसवां गोरखपुर फिल्मी फेस्टिवल गोकुल अतिथि भवन , सिविललाइंस,, गोरखपुर में 21 से 23 मार्च तक आयोजित किया जाएगा। यह फिल्मक समारोह जन चित्रकार चित्तप्रसाद, का. गोविन्द पानसरे और अविजित रॉय की याद को समर्पित है।

पहला दिन
शनिवार मार्च 21 , 2015

उदघाटन सत्र
शाम4से 5.30

शाम 5.30 से5.45
चायपान

शाम 5.45 से 7.15
नया भारतीय दस्तावेजी सिनेमा

श्रम और विस्थापन पर केन्द्रित दस्तावेजी फिल्म ‘श्रमजीवी एक्सप्रेस’ का प्रीमियर प्रदर्शन
70 मिनट / हिंदी, अंग्रेजी सब टाइटल्स के साथ / रंगीन
फ़िल्म के निर्देशक तरुण भारतीय के साथ बातचीत

शाम 7.15से 9
नया भारतीय सिनेमा
मराठी फ़ीचर फ़िल्म फैनड्री का प्रदर्शन
104 मिनट/ मराठी, अंग्रेजी सब टाइटल्स के साथ / रंगीन/ 2013 / निर्देशक: नागराज मंजुले

दूसरा दिन
रविवार 22 मार्च 2015

बच्चों का समय
सुबह 10 से 12

सिनेमा – सिनेमा
प्रोफ़ेसर बीरेंन दास शर्मा द्वारा सिनेमा की कहानी बताती एक विशेष प्रस्तुति
60 मिनट / दृश्यों और ध्वनियों के साथ

सुबह 11 से 11.45
संजय मट्टू के साथ कहानी –किस्से

दुपहर12 से 2

नया भारतीय सिनेमा
भोजपुरी फीचर फ़िल्म : नया पता
95 मिनट/ भोजपुरीऔर हिंदी ,अंग्रेजी सब टाइटल्स के साथ/ रंगीन/ 2014

फिल्म के निर्देशक पवन श्रीवास्तव और अभिनेता अभिषेक शर्मा के साथ दर्शकों की बातचीत

दुपहर 2 से 2.30
लंच ब्रेक

दुपहर 2.30 से 3.45

छतीसगढ़ मुक्ति मोर्चा द्वारा स्थापित शहीद अस्पताल का बयान करती दस्तावेजी फिल्म पहली आवाज़ का प्रदर्शन
52 मिनट / हिंदी/ रंगीन/ 2014
फ़िल्म के निर्देशक अजय टी जी के साथ बातचीत

दुपहर3.45 से 4

ब्रेक

दुपहर4से शाम5.15

पैनलचर्चा: मीडिया और सिनेमा में लोकतंत्र और सेंसरशिप
इसपैनलचर्चा मेंसंजय काक , नकुल सिंह साहनी, तरुणभारतीय, अजय टी जी , बिक्रमजित गुप्ता, पवनकुमारश्रीवास्तव और पंकज श्रीवास्तव भाग लेंगे .
संचालन: मनोज सिंह

शाम5.15 से 5.30
ब्रेक

शाम5.30 से 6.30

प्रगतिशीललेखकों के आन्दोलन पर समन हबीब और संजय मट्टू की पाठ्य –प्रस्तुति ‘आसमां हिलता है जब गाते हैं हम’
50मिनट / हिन्दुस्तानी और अंग्रेजी साथ में तस्वीरें और संगीत
संगीत संकलन : अमित मिश्र

समन हबीब और संजय मटू के साथ बातचीत

शाम6.30 से 8.30

नयाभारतीय सिनेमा
बांग्ला फीचर फ़िल्म अचल
93 मिनट / बांगला, अंगरेजी सब टाईटल्स के साथ / 2012/ निर्देशक: बिक्रमजितगुप्ता
निर्देशक बिक्रमजित गुप्ता के साथ बातचीत

तीसरा दिन
सोमवार, 23मार्च 2015

सुबह 10.30 से 11.45 बजे

क्लासिक दस्तावेज़ी सिनेमा
राज –समाज, जनस्वास्थ्य, वर्ग और जेंडरकी पड़ताल करती दस्तावेजी फिल्म ‘समथिंग लाइक अ वार ’का प्रदर्शन
52 मिनट / हिंदी, अंग्रेजी सब टाइटल्स के साथ / रंगीन/ 1991/ निर्देशक: दीपा धनराज

फ़िल्मके बाद फेस्टिवल टीम का दर्शकों के साथ संवाद

सुबह 11.45 से दुपहर1.45

नया भारतीय दस्तावेजी सिनेमा

विभाजन के बाद केपंजाब की दलित और सूफी रिश्तों की पड़ताल करती अजय भारद्वाज की दस्तावेजी फ़िल्म ‘मिलांगे बाबे रतन ते मेले ते’
95 मिनट / पंजाबी, हिंदी, उर्दू, अंगरेजी सब टाइटल्स के साथ / रंगीन/ 2012/ निर्देशक: अजय भारद्वाज

फ़िल्म के बाद फेस्टिवल टीम का दर्शकों के साथ संवाद

लंच
दुपहर1.45 से 2.15

दुपहर2.15 से3.15 बजे तक

पड़ोस का सिनेमा : नेपाल के सिनेमाई और सांस्कृतिक परिद्रश्य पर एक प्रस्तुति

काठमांडू के मार्किस्मलर्निंग सेंटर के संयोजक बिक्कील स्थापित द्वारा नेपाली सिनेमा और सांस्कृतिक परिद्रश्य पर दस्तावेजी फिल्म और फ़ीचर फिल्मों के चुने हुए अंशों की प्रस्तुति

दुपहर3.15 से 4

नया भारतीय सिनेमा

मध्यवर्गीय भारतीय समाज की पड़ताल करती लघु फ़ीचर फ़िल्म हमारे घर
31 मिनट / हिंदी, अंग्रेजी सब टाइटल्स के साथ / 2014/ निर्देशक: किसलय

शाम4 से 4.30
चायपान

शाम 4.30 से 5.15

नया भारतीय दस्तावेजी सिनेमा
पंजाबी दस्तावेज़ी फ़िल्म सेवा
27 मिनट / पंजाबी, हिदी , अंग्रेजीसब टाइटल्स के साथ/ 2013/ निर्देशक: दलजीत अमी
फ़िल्म के निर्देशक दलजीत अमी के साथ बातचीत

शाम 5.15से रात 8
नयाभारतीय दस्तावेजी सिनेमा

नकुल सिंह साहनी की दस्तावेजी फ़िल्म ‘ मुज्ज़फरनगर बाकी है’ के बहाने भारतीय राजनीति, साम्प्रदायिकता और नए अर्थतंत्र की पड़ताल
136 मिनट / हिदी अंग्रेजी सब टाइटल्स के साथ / रंगीन/ 2015
फ़िल्मके निर्देशक नकुल सिंह साहनी के साथ बातचीत

शाम 8 से रात 8.30
समापन समारोह के बहाने प्रतिरोध का सिनेमा अभियान के दसवें वर्ष में प्रवेश करने पर चर्चा

प्रतिरोध का सिनेमा अभियान के दसवें वर्ष में प्रवेश करने के बहाने सिनेमा और समाज पर खुली बातचीत और दसवें गोरखपुरफ़िल्म फेस्टिवल का समापन समारोह।

वाम सांस्कृतिक आंदोलन के योद्धा थे जितेंद्र रघुवंशी : जसम

jitender raghuvanshi

आगरा : अभी लोगों के शरीर से होली का रंग छूट भी नहीं पाया था कि देश के तमाम तरक्कीपसंद संस्कृतिप्रेमियों का कॉमरेड जितेंद्र रघुवंशी से  हमेशा के लिए साथ छूट गया। 63 वर्ष की उम्र में 7 मार्च की सुबह ही उनका स्वाइन फ्लू के कारण दिल्ली  स्थित सफदरजंग अस्पताल में निधन हो गया। पिछले साल ही जून माह में आगरा विश्वविद्यालय के के.एम.इन्स्टीट्यूट के विदेशी भाषा विभाग प्रमुख के पद से 30 साल की सेवा के उपरांत उन्होंने अवकाश प्राप्त किया था। अभी वे लिखने-पढ़ने और हिन्दी क्षेत्र में सांस्कृतिक आंदोलन के विकास को लेकर कई योजनाओं पर काम कर रहे थे। उनके निधन की खबर से देश भर के साहित्य-कला प्रेमी लोकतान्त्रिक जमात को जबर्दस्त आघात लगा है। वे अपने पीछे पत्नी, पुत्री और दो बेटों का भरा-पूरा परिवार छोडकर हमेशा के लिए हमसे विदा हो गए।

13 सितंबर 1951 को आगरा में पैदा हुए जितेंद्र रघुवंशी की शिक्षा-दीक्षा आगरा में ही हुई। यहीं के. एम. इंस्टीट्यूट से हिन्दी से परास्नातक की उपाधि हासिल करने के बाद उन्होंने अनुवाद और रूसी भाषा में डिप्लोमा भी किया। बाद में लेनिनग्राद विश्वविद्यालय (सेंट पीटर्सबर्ग) से रूसी भाषा में एम.ए. किया। उन्होंने तुलनात्मक साहित्य में पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की थी। पिता राजेन्द्र रघुवंशी और माँ अरुणा रघुवंशी के सानिध्य में प्रगतिशील साहित्य संस्कृति के साथ बचपन से ही उनका संपर्क हो गया था। पिता राजेन्द्र रघुवंशी इप्टा आंदोलन के सूत्रधारों में से एक थे। कॉमरेड जितेंद्र रघुवंशी आजीवन भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे। थियेटर को उन्होंने अपने सांस्कृतिक कर्म के बतौर स्वीकार किया। 1968 से इप्टा के नाटकों में अभिनय, लेखन, निर्देशन आदि के क्षेत्र में वे सक्रिय हुए। एम.एस. सथ्यू द्वारा निर्देशित देश विभाजन पर आधारित बेहद महत्त्वपूर्ण फिल्म ‘गरम हवा’ में उन्होंने अभिनय किया। राजेन्द्र यादव के ‘सारा आकाश’ पर बनी फिल्म के निर्माण में सहयोग दिया। ग्लैमर की दुनिया  में वे  बहुत आसानी से जा सकते थे, पर उसके बजाय उन्होंने अपनी प्रतिबद्धता हिन्दी क्षेत्र में सांस्कृतिक आंदोलन के निर्माण के प्रति जाहिर की। अभी वे भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तरप्रदेश के अध्यक्ष थे।

जितेंद्र जी का मुख्य कार्यक्षेत्र भले ही नाटक और थियेटर रहा हो, पर मूलतः वे एक कहानीकार थे। आजादी आंदोलन के प्रमुख कम्युनिस्ट कार्यकर्ता राम सिंह के जीवन पर आधारित उनकी एक कहानी काफी चर्चित हुई थी। इसके अलावा ‘लाल सूरज’, ‘लाल टेलीफोन’ जैसी कहानियों के शीर्षक इस बात के गवाह हैं कि वे लाल रंग को चहुँओर फैलते देखना चाहते थे। उनके द्वारा लिखे कुछ प्रमुख नाटक ‘बिजुके’, ‘जागते रहो’ और ‘टोकियो का बाजार’ है। अभी मृत्यु से कुछ दिन पूर्व आकाशवाणी आगरा से उनकी एक कहानी का प्रसारण किया गया था और आगरा महोत्सव के दौरान 23 फरवरी को प्रेमचंद की कहानियों पर आधारित नाट्यप्रस्तुति ‘रंग सरोवर’ का मंचन हुआ था। इससे यह आसानी से समझा जा सकता है कि मृत्यु के ठीक पहले तक वे किस तरह प्रतिबद्ध और सक्रिय थे। आगरा में किसी भी प्रगतिशील सांस्कृतिक आयोजन की संकल्पना उनको शामिल किए बगैर नामुमकिन थी। वे युवाओं के लिए एक सच्चे रहनुमा थे। 2012 में आगरा में हुए रामविलास शर्मा जन्मशती आयोजन समिति के सलाहकार के रूप में उनके अनुभव का लाभ इस शहर को प्राप्त हुआ। हर साल होने वाले आगरा महोत्सव के सांस्कृतिक समिति के वे स्थाई सदस्य थे। इसके अलावा शहीद भगत सिंह स्मारक समिति,  नागरी प्रचारिणी सभा,  आगरा,  बज़्मे नजीर,  यादगारे आगरा, प्रगतिशील लेखक संघ आदि से भी उनका जुड़ाव रहा। आगरा में वे हर साल वसंत के महीने में नजीर मेले का आयोजन कराते थे और हर गर्मी में बच्चों के लिए करीब एक माह की नाट्यकार्यशाला नियमित तौर पर कराते थे। 1990 के बाद देश के भीतर सांप्रदायिक राजनीति के उभार के दिनों में उनके भीतर का कुशल संगठनकर्ता अपने पूरे तेज के साथ निखर कर सामने आया। इप्टा द्वारा इसी दौर में कबीर यात्रा, वामिक जौनपुरी सांस्कृतिक यात्रा, आगरा से दिल्ली तक नजीर सद्भावना यात्रा, लखनऊ से अयोध्या तक जन-जागरण यात्रा आदि का आयोजन किया गया। उनका वैचारिक निर्देशन और उनकी सांस्कृतिक दृष्टि ही इस पूरी योजना के केंद्र में थी।

वे लेखक संगठनों की स्वायत्तता, विचारधारात्मक प्रतिबद्धता और सांस्कृतिक संगठनों की जरूरत और भूमिका को नया आयाम देने वाले चिंतक भी थे। लेखकों की आपेक्षिक स्वायत्तता के हामी होने के बावजूद वे यह मानते थे कि ‘‘अब यह तो उसे (लेखक को ) ही तय करना है कि वह नितांत व्यक्तिगत स्वतन्त्रता चाहता है या सामाजिक स्वतन्त्रता। सामाजिक स्वतन्त्रता की जंग सामूहिक रूप से ही लड़ी जा सकती है। सामूहिकता के लिए संगठन अनिवार्य है। अब संगठन का न्यूनतम अनुशासन तो मानना ही होगा। ऐसे लेखक तो हैं और रहेंगे, जिन्हें एक समय के बाद लगता है कि उनका आकार संगठन से बड़ा है। वे अपनी ‘स्वतन्त्रता’ का उपयोग करें, लेकिन अपने अतीत को न गरियाएँ।’’ वैचारिक भिन्नता का सम्मान करते हुए भी सांस्कृतिक कार्यवाहियों के लिए एकता का रास्ता तलाश लेने वाले ऐसे कुशल संगठनकर्ता की आकस्मिक मृत्यु से हिन्दी क्षेत्र में वाम सांस्कृतिक आंदोलन को ऐसी क्षति हुई है जिसकी भरपाई निकट भविष्य में संभव नहीं दिखती। वे आखिरी दम तक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी सांस्कृतिक योद्धा रहे। विचारधारात्मक दृढ़ता और समाजवादी-धर्मनिरपेक्ष भारत का स्वप्न देखते हुए वामपंथी सांस्कृतिक आंदोलन के लिए जो जमीन छोडकर कॉ. जितेंद्र रघुवंशी चले गए हैं, उस पर नए दौर में नई फसल की तैयारी ही उनके प्रति एक सच्ची श्रद्धांजलि होगी। जन संस्कृति मंच एक सच्चे कम्युनिस्ट, क्रांतिकारी संगठनकर्ता और सांस्कृतिक आंदोलन के मजबूत योद्धा को क्रांतिकारी सलाम पेश करता है।

(जन संस्कृति मंच की ओर से राष्ट्रीय सहसचिव प्रेमशंकर द्वारा जारी)

मार्केज को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि

ESPAÑA GARCÍA MÁRQUEZ

नई दि‍ल्‍ली : 18 अप्रैल 2014 को लातिन अमरीका के अद्भुत किस्सागो गैब्रियल गार्सिया मार्केज ने 87 साल की उम्र में हमसे विदा ली। उनका कथा संसार लातिन अमरीका के देशों के पिछड़े माने जाने वाले समाजों की जिंदगी की समझ के साथ ही इस समाज के दुख-दर्द, हिंसा, असमानता, आवेग और गतिशीलता से पूरी दुनिया को बावस्ता कराता है।

6 मार्च 1927 को कोलम्बिया के छोटे से शहर आर्काटका में जन्मे गैब्रियल खोसे द ला कन्कर्डिया गार्सिया मार्केज का यह शहर 20वीं सदी की शुरुआत में दुनिया के नक्शे पर भीषण औपनिवेशिक लूट के नाते दिखा। यही शहर और उसके अनुभव बाद में मार्केज के रचना संसार के बीज बने। ‘क्रानिकल्स ऑफ ए डेथ फोरटोल्ड’, ‘लव इन द टाइम ऑफ कॉलरा’, ‘ऑटम ऑफ द पैट्रियार्क’, ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ आदि मार्केज के नामी गिरामी उपन्यास हैं। वास्तविक घटनाओं को मिथकों के साथ जबर्दस्त ढंग से गूँथ देने की उनकी क्षमता ने उन्हें विश्वस्तर पर ऐसा उपन्यासकार बना दिया जिसके विरोधियों को भी उसका सम्मान करना पड़ता था।

1982 में उनको साहित्य के नोबल सम्मान से नवाजा गया। सम्मान समारोह के मौके को उन्होंने साम्राज्यवाद-विरोध के मंच के रूप में बदल दिया। इस मौके पर बोलते हुए उन्होने न सिर्फ लातिन अमेरिकी जमीन पर अंग्रेजी उपनिवेशवाद की क्रूरताओं का जिक्र किया, बल्कि अमरीका और यूरोप के कॉर्पोरेट घरानों द्वारा इस इलाके में की जा रही लूट और भयानक दमन को भी बेनकाब किया। उन्होने साफ-साफ कहा कि उनकी कहानियाँ गायब हुए लोगों, मौतों और राज्य प्रायोजित नरसंहारों के बारे में हैं जो कॉर्पोरेट हितों के लिए रचे जाते हैं।

मार्केज को याद करते हुए श्रद्धांजलियों में पीली तितलियों, लाल चींटियों, चार साल ग्यारह हफ्ते दो दिन चली बारिश आदि मिथकीय कथातत्त्वों का जिक्र तो काफी हो रहा है, पर उनकी इस शैली के पीछे की असलियत पर निगाह अपेक्षाकृत कम ही टिकती है। मार्केज के सामने एक पूरी ढहा दी गई सभ्यता थी, जिसे उन्होंने भोगा और महसूस किया था। मार्केज के नाना गृहयुद्धों में भाग ले चुके थे और नानी जीवन की ‘असंभव’ किस्म की कहानियाँ सुनाया करती थीं। शायद इतिहास की अकादमिक व्याख्या की जड़ता से अलग पूरी हकीकत बताने की छटपटाहट ही मार्केज को उस शिल्प तक ले गई जिसे पश्चिमी अकादमिक जन ‘जादुई यथार्थवाद’ कहते हैं। इतिहास की वर्तमान धारणा से पहले अन्य किस्म की अवधारणाएं विभिन्न समाजों में रही आई हैं। मार्केज ने इन धारणाओं को भी अपने बयान के लिए चुना।

लातिन अमरीका की जमीन 20वीं सदी में समाजवाद के नए प्रयोगों के लिए जानी गई। फिदेल कास्त्रो इस आंदोलन के प्रतीक पुरुष बने। ठीक ऐसे ही लातिन अमरीकी देशों की जमीन से पुराने यथार्थवाद को बदलने-विकसित करने वाले ढेरों रचनाकार पैदा हुए, जिनकी अगुवाई मार्केज ने की। संयोग से ज्यादा ही है कि फिदेल, मार्केज के उपन्यासों के पहले कुछ पाठकों में शुमार हैं। दोनों ही वामपंथ की लड़ाइयों को अलग-अलग मोर्चों पर विकसित करने वाले योद्धा हैं। मार्केज की प्रतिबद्धताएं हमेशा ही वामपंथ के साथ रहीं। वेनेजुएला, निकारागुआ और क्यूबा के वाम आंदोलनों के साथ उनके गहन रिश्ते थे। अनायास नहीं कि उनकी रचनाशीलता के अमरीकी प्रसंशक उनके वामपंथी होने को कभी पचा नहीं पाये।

हम तीसरी दुनिया के लोग औपनिवेशिक विरासत के चक्के तले पिसने को बखूबी समझते हैं, पश्चिमी आधुनिकता के साथ ही अलग तरह का देशज इतिहास-बोध हमें भी हासिल है, ऐसे में मार्केज अपनों से ज्यादा अपने लगते हैं। एक पूरी सभ्यता का बनना और उसका नष्ट होना हमारे अपने देश-काल में भी धीरे-धीरे घटित होता जा रहा है। हम भी मिथकों के औजार से यथार्थ को और बेहतर तरीके से और संपूर्णता में देख सकते हैं।

आज जब हमारे देश में अमरीकी तर्ज पर ही स्मृतिहीनता और फर्जी इतिहासबोध लादा जा रहा है, तब मार्केज के उपन्यास ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ के आखिर हिस्से के एक वर्णन की याद बेहद प्रासंगिक है। भारी वर्षा के बाद कत्ल कर दिये गए 3000 हड़ताली मजदूरों की स्मृति लोगों के दिमाग से धुल-पुंछ जाती है। अकेले खोसे आर्कादियों सेगुंदो इस बात को याद है और वह लोगों से इस बावत बात करता है पर लोग भूल चुके हैं।

ऐसी स्मृतिहीनता को दर्ज करना और स्मृतिहीन बनाने वाली ताकतों, व्यवस्थाओं, कॉर्पोरेटों के खिलाफ प्रतिरोध रचना ही मार्केज को सही श्रद्धांजलि होगी !

जन संस्कृति मंच दुनिया की जनता के इस दुलारे कथाकार को सलाम करता है।

हमेशा प्रासंगिक रहेंगे अमरकांत : जसम

अमरकांत

अमरकांत

नई दि‍ल्‍ली : कल 17 फरवरी को सुबह 9:30 बजे हिंदी के महान कथाकार अमरकांत ने जिंदगी की अंतिम सांसें लीं। वे 88 साल के थे। एफ-6, पंचपुष्प अपार्टमेंट, अशोक नगर, इलाहाबाद स्थित उनके आवास पर शोक व्यक्त करने वाले साहित्यकारों और आम नागरिकों का तांता लगा रहा। आज दोपहर बाद उन्हें अंतिम विदाई दी गई।

अमरकांत अपनी सादगी, सहजता और आत्मीय-स्नेहिल व्यवहार के लिए हमेशा याद आएंगे। अभावों, बीमारियों और उपेक्षाओं के बावजूद उनके व्यक्तित्व की सरलता हमेशा बनी रही और उन्होंने अपने आत्मसम्मान से कभी समझौता नहीं किया।

अमरकांत स्वांतत्र्योत्तर भारत के जटिल यथार्थ और बहुविध द्वंद्वों से घिरे समाज के जीवन व्यापार और उसमें निर्मित हो रहे किरदारों को अत्यंत सहजता से पेश करने वाले कथाकार रहे हैं। प्रेमचंद की सामाजिक यथार्थवादी कथा-परंपरा को उन्होंने आगे बढ़ाया और नई कहानी आंदोलन के दौर में भी वे उन्हीं साहित्यिक मूल्यों के साथ रहे। जो लोग प्रेमचंद से छुटकारा पाने को ही हिंदी कहानी की अग्रगति और नएपन की पहचान बता रहे थे, अमरकांत उनके साथ नहीं थे। जीवन जगत से ली गई नवीन उपमाएं, जनपदीय मुहावरे, खरी चलती हुई जुबान, कथन-भंगिमा, गहन सामाजिक संवेदनशीलता और गहरी मनोवैज्ञानिक समझ उनकी रचनाओं की खासियत रही है। उनकी रचनाओं की सीधी सपाट बुनावट के भीतर गहरे अर्थसंदर्भ, समाज और देश की दशा-दिशा और उसके भविष्य के अत्यंत यथार्थपरक मूल्यांकन और संकेत मिलते हैं। इसके साथ-साथ समाज और दुनिया को आगे ले जानेवाली बातों और भाव-संरचनाओं का गहरा विवेक भी उनकी रचनाओं में घुलामिला नजर आता है।

‘जिंदगी और जोंक’, ‘देश के लोग’, ‘मौत का नगर’, ‘मित्र मिलन और अन्य कहानियां’, ‘दुख-सुख कथा’, ‘कुहासा’, ‘एक धनी व्यक्ति का बयान’, ‘कलाप्रेमी’, जांच और बच्चे’ अमरकांत के प्रमुख कहानी संग्रह हैं। अगर उनकी सारी कहानियों को छोड़ भी दिया जाए, तो सिर्फ ‘दोपहर का भोजन’, ‘डिप्टी कलक्टरी’, ‘जिंदगी और जोंक’ और ‘हत्यारे’ जैसी कहानियां ही उन्हें दुनिया के किसी भी महान कथाकार के समकक्ष खडा़ करने में समर्थ हैं। अमरकांत ने ‘सूखा पत्ता’, ‘आकाश पक्षी’, ‘विदा की रात’, ‘लहरें’, ‘कंटीली राह के फूल’, ‘सुन्नर पांडे की पतोहू’, ‘काले उजले दिन’, ‘बीच की दीवार’, ‘ग्राम सेविका’, ‘इन्हीं हथियारों से’ इत्यादि उपन्यासों की भी रचना की।

आलोचक रविभूषण ने ठीक ही लिखा है कि ‘जिंदगी और जोंक’ का रजुआ ‘कफन’ के घीसू-माधो का सगा-संबंधी दिखाई पड़ता है। रजुआ की जिंदगी पशु की है। स्वतंत्र भारत का वह पात्र भारत की स्वतंत्रता पर प्रश्न-चिह्न है।’ रजुआ, मुनरी, मूस, सकलदीप बाबू, ‘इन्हीं हथियारों से’ की बाल-वेश्या ढेला, सुन्नर पांडे की पतोह, बऊरईया कोदो खानेवाला गदहा जैसे अनगिनत अविस्मरणीय और विश्वसनीय किरदारों के जरिए अमरकांत ने हमारे समाज की हजारहा विडंबनाओं को जिस तरह मूर्त किया है, वह हिंदी कथा-साहित्य की बेमिसाल उपलब्धि है। खासकर भारतीय मध्यवर्ग और निम्नमध्यवर्ग की खामियों और खूबियों को उन्होंने बड़े ही विश्वसनीय तरीके से अपनी रचनाओं में दर्ज किया है। यही वह वर्ग है जो प्रशासनतंत्र, नौकरशाही और शासकवर्गीय राजनीति की अगली कतार में रहता रहा है, इसकी संवेदनहीनता, मक्कारी, अवसरवाद और मूल्यहीनता किसी जनविरोधी व्यवस्था के लिए किस कदर मददगार हो सकती है, साठ के दशक में लिखी गई अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ में इसके बड़े स्पष्ट संकेत देती है। अभी दिसंबर 2013 में ही जनसंस्कृति मंच, कथा समूह के पहले कथामंच आयोजन में इस कहानी पर काफी विस्तार से चर्चा हुई थी। आज जिस तरह एक हत्यारे का देश में भावी प्रधानमंत्री के तौर पर गुणगान चल रहा है और उसे मध्यवर्ग का नायक बनाया जा रहा है, उसके संदर्भ से देखें तो यह कहानी मानो ऐसे हत्यारों के निर्माण की प्रक्रिया की शिनाख्त करती है। गौर करने की बात यह है कि अमरकांत इस चिंतित करने वाले यथार्थ के समक्ष वैचारिक-सैद्धांतिक रूप से समर्पण करने वाले लेखक नहीं हैं। विचार और व्यवहार दोनों स्तरों पर उनका जीवन एक प्रतिबद्ध प्रगतिशील लेखक का जीवन था। 1942 के आंदोलन की पृष्ठभूमि पर लिखे गए उनके उपन्यास ‘इन्हीं हथियारों से’ का एक अदना-सा पात्र कहता है- ‘बड़ी-बड़ी बातें, बड़े-बड़े सिद्धांत सिर्फ व्यवहार से ही सार्थक और सहज हो सकते हैं, जिसके बिना जीवन से ही रस खींचकर गढ़े हुए सिद्धांत जीवन से अलग होकर बौने और नाकाम हो जाते हैं।’ अमरकांत का जीवन और रचनाकर्म खुद इसकी तस्दीक करता है।

मानव मुक्ति के संघर्षों के प्रति अमरकांत की आस्था कभी कम नहीं हुई। ‘इन्ही हथियारों से’ का ही एक पात्र सुरंजन शास्त्री अपने भाषण में कहता है- ‘आप इसे आजादी की आंधी कहिए, गांधी की आंधी कहिए, बुढ़िया आंधी काहिए, महा आंधी काहिए, मनुष्य के इतिहास की यह सुपरिचित आंधी है। हाँ, यह प्राचीनतम आँधी है। मानव इतिहास में यह अक्सर आई है। जहां गुलामी है, जहां जुल्म है, अन्याय है, तानाशाही है, वहां बार-बार  है। मुक्ति की आँधी है यह। यह कभी फ्रांस में आयी, कभी रूस में। अन्य देशों में भी वह आ चुकी है। 1857 में भी हमारे देश में आयी थी…आगे बढिए़, आजादी की महा-आँधी आने का गंगा हुलसकर स्वागत कर रही है, तरंगित हो रही है और चिरैय्या ढोल बजा रही है, क्योंकि यह गुलामी को मिटाकर आजाद, शोषणहीन समाज बनाने का संकल्प लेकर आ रही है।’ उपन्यास में तो ये पंक्तियाँ एक खास सन्दर्भ में हैं, लेकिन अमरकांत के कथाकार ने सारी उत्तरवादी और अन्तवादी घोषणाओं के तुमुल में इतिहास की मुक्ति की आँधियों में यकीन कभी नहीं खोया।

चर्चा, आयोजन, प्रायोजन से दूर रहे अमरकांत को बीमारी, पत्रकार जीवन की अनिश्चितताएं, पैसे की तंगी और उनके रचनाकार की साहित्य-प्रतिष्ठान द्वारा उपेक्षा तोड़ न सकी। 16 की उम्र में पढ़ाई छोड़ 1942 के ‘भारत छोडो आन्दोलन’ में कूद पड़ने वाले अमरकांत ने संघर्ष की राह कभी छोड़ी ही नहीं।

अमरकांत जी का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के भगमलपुर नामक गांव में 01 जुलाई 1925 को हुआ था। भारत छोड़ो आंदोलन समाप्त होने के बाद उन्होंने बलिया से इंटर किया और बीए के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय आ गए। उन्होंने आगरा से लेखन और पत्रकारिता के अपने सफर की शुरुआत की थी। इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली ‘मनोरमा’ के संपादन से वे लंबे समय तक जुड़े रहे। ‘सैनिक’ और ‘माया’ में भी उन्होंने कार्य किया। लगभग चालीस वर्षों तक कई पत्रिकाओं में लेखन-संपादन करने के पश्चात कई वर्षों से स्वतंत्र रूप से लेखन और ‘बहाव’ नामक अपनी पत्रिका का संपादन कर रहे थे। ‘कुछ यादें और बातें’ और ‘दोस्ती’ नाम से उनकी संस्मरणों की भी दो पुस्तके प्रकाशित हैं। अमरकांत हिंदी के उन गिने-चुने कथाकारों में से हैं, जिन्होंने बच्चों के लिए भी साहित्य की रचना की। ऐसी पुस्तकों में ‘दो हिम्मती बच्चे’, ‘बानर सेना’, ‘नेउर भाई’, ‘खूंटा में दाल है’, ‘सुग्गी चाची का गांव’, ‘झगरू लाल का फैसला’, ‘बाबू का फैसला’, ‘एक स्त्री का सफर’ आदि प्रमुख हैं।

‘इन्हीं हथियारों से’ उपन्यास के लिए अमरकांत जी को 2007 में साहित्य अकादमी और समग्र लेखन के लिए 2009 में ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। व्यास सम्मान, पहल सम्मान, जन संस्कृति सम्मान, यशपाल पुरस्कार, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार समेत कई पुरस्कार और सम्मान उन्हें मिले। उनके छोटे बेटे अरविंद और बहू रीता की बहुत बड़ी भूमिका रही कि उन्होंने अपनी स्वतंत्र जिंदगी छोड़कर हिंदी समाज के इतने अप्रतिम कथाकार को हमारे बीच लंबे समय तक भौतिक रूप से बनाए और बचाए रखा। अमरकांत जी अपने साहित्य और साहित्य व विचार के प्रति अपनी गहरी प्रतिबद्धता के कारण हमारे लिए हमेशा प्रासंगिक रहेंगे। उन्हें जन संस्कृति मंच की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि।

चि‍त्र : संजय जोशी

(जन संस्कृति मंच की ओर से सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव द्वारा जारी)

युवा रंग निर्देशक प्रवीण कुमार गुंजन पर पुलिसिया हमले की निंदा

नई दिल्ली: जन संस्कृति मंच देश के प्रतिभावान युवा रंग निर्देशक प्रवीण कुमार गुंजन की बिहार के बेगुसराय में नगर थाना प्रभारी द्वारा बर्बर पिटाई की कठोरतम शब्दों में निंदा करता है और दोषी पुलिस अधिकारी की बर्खास्तगी की माँग करता है तथा इस बर्बर पुलिसिया हमले के खिलाफ आंदोलनरत बेगूसराय के संस्कृतिकर्मियों के प्रति अपनी एकजुटता का इजहार करता है। एनएसडी से पासआउट प्रवीण कुमार गुंजन ने निर्देशन की शुरुआत ‘अंधा युग’ से की थी। उसके बाद उन्होंने मुक्तिबोध की कहानी ‘समझौता’ पर आधारित नाटक का निर्देशन किया, जो बेहद चर्चित रहा। उन्होंने शेक्सपियर के मशहूर नाटक ‘मैकबेथ’ का भी निर्देशन किया। प्रवीण द्वारा नाटकों का चुनाव और बेगुसराय जैसी जगह को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाना भी अपने आप में महत्वपूर्ण है। भारत के राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित संगीत नाटक कला अकादमी का बिस्मिल्ला खाँ युवा पुरस्कार और बिहार सरकार का भिखारी ठाकुर युवा रंग सम्मान पा चुके इस युवा रंग निर्देशक के ऊपर पुलिस अगर बेवजह इस तरह बर्बर कार्रवाई का दुस्साहस कर सकती है, तो कल्पना की जा सकती है कि इस देश की आम जनता और आम संस्कृतिकर्मियों के साथ उसका किस तरह का रवैया रहता होगा।

बेगूसराय से मिली सूचना के अनुसार प्रवीण कुमार गुंजन सोमवार की रात रिहर्सल के बाद रेलवे स्टेशन के पास स्थित चाय की दुकान के पास अपनी बाइक लगाकर साथी रंगकर्मियों के साथ चाय पी रहे थे। चाय पीने के बाद वे लौटने ही वाले थे, तभी थाना प्रभारी अपने गश्ती दल के साथ पहुँचे और उनकी बाइक पर तीन सवारी होने का इल्जाम लगाया। उन्होंने कहा कि बाइक जब चल ही नहीं रही है, तो तीन सवारी कैसे हो गई? गुंजन की खूबसूरत दाढ़ी, उनकी कैजुअल ड्रेस और उनके साथ कुछ रंगकर्मी युवकों का होना और पुलिसिया आतंक के आगे उनका न दबना, इतना काफी था बिहार पुलिस के लिए। थाना प्रभारी ने उन पर अपराधी होने का आरोप लगाया और उन्हें पीटना शुरू कर दिया। गुंजन ने उससे यह भी कहा कि वह अपने एसपी और जिलाधिकारी से फोन करके बात कर ले, लेकिन उसने एक नहीं सुनी और उनकी पिटाई जारी रखी।

मंगलवार 8 अक्टूबर को जब  फैक्ट्स, जसम, आशीर्वाद रंगमंडल, नवतरंग से जुड़े रंगकर्मियों समेत बेगूसराय के तमाम साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों ने इसका प्रतिवाद किया, तो जिला प्रशासन ने थाना प्रभारी को लाइन हाजिर किया। हालाँकि यह भी सूचना मिल रही है कि पुलिस अपने बचाव में प्रवीण और उनके साथियों पर फर्जी मुकदमा दर्ज करने की तैयारी कर रही है। हम इस तरह की संभावित साजिश का पुरजोर वि‍रोध करते हैं और बिहार सरकार से यह माँग करते है कि वह तत्काल थाना प्रभारी की बर्खास्तगी की कार्रवाई करे, ताकि पुलिसकर्मियों को यह सबक मिले कि अगर वे बेगुनाहों पर जुल्म करेंगे, तो उनके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई हो सकती है।

प्रवीण कुमार गुंजन की बर्बर पिटाई ने एक बार फिर से पुलिस राज के खिलाफ मजबूत जन प्रतिवाद की जरूरत को सामने लाया है। उन पर किए गए हमले का सही जवाब यही होगा कि देश और बिहार के संस्कृतिकर्मी सख्त पुलिस राज की वकालत करने वाली और पुलिसिया बर्बरता को शह देने वाली राजनीतिक शक्तियों, सरकारों और विचारों का भी हरसंभव और हर मौके पर अपनी कलाओं के जरिए विरोध करें। देश में बढ़ते निरंकुश पुलिसिया राज के खिलाफ सांस्कृतिक प्रतिवाद वक्त की जरूरत है।

(सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी)

जीवन का रीटेक हैं शेखर जोशी की कविताएं : प्रो. राजेन्द्र कुमार

संगोष्ठी‍ में आशुतोष कुमार, शेखर जोशी और राजेन्द्र कुमार।

संगोष्ठी‍ में आशुतोष कुमार, शेखर जोशी और राजेन्द्र कुमार।


इलाहाबाद : इलाहाबाद के साहित्यिक बिरादरी के सबसे खास पुरनिये शेखर जोशी पर जन संस्कृति मंच (कविता समूह) और परिवेश द्वारा बहुत दिन बाद इलाहाबाद वापस आने पर 20 जुलाई 2013 को संगोष्ठी का आयोजन किया गया। पर ‘नई कहानी के चर्चित कहानीकार शेखर जोशी के बजाय चर्चा के केन्द्र में था शेखर जोशी का कवि रूप जो उनके कहानीकार रूप में विकास का एक हद तक साक्षी भी था’। यह बात उनके प्रथम कविता संग्रह ‘न रोको उन्हे शुभा’ की चर्चा पर प्रायः सभी वक्ताओं द्वारा संज्ञान में ली गई। संग्रह की भूमिका कवि वीरेन डंगवाल द्वारा लिखी गई है और लेखक द्वारा उसका समर्पण कवि हरीशचन्द्र पांडेय के लिए किया गया है। अस्सी पार शेखर जी को अपने बीच पाकर जहाँ शहर का साहित्यिक समाज गदद था वहीं इलाहाबाद के छूटने का दर्द कई बार शेखर जी की आँखों से बाहर आने को आतुर दिखा।

संगोष्ठी में प्रथम वक्ता के रूप में शहर इलाहाबाद के मशहूर कवि हरीशचन्द्र पांडेय को सुनना बेहद महत्त्वपूर्ण रहा। अपने सधे हुए वक्तव्य में उन्होंडने रेखाँकित किया कि शेखर जोशी की कविता में सिर्फ पहाड़ का सौन्दर्य ही नहीं, श्रम का सौन्दर्य भी शामिल है। यथार्थ की जटिलताओं से टकराती उनकी कविताओं में कलात्मक सन्धान के साथ कथ्य भी है। वस्तुतः वह जिस यथार्थ के अनुभव से रूबरू होते हैं, उसकी जटिलताएं कविता में संकेत के रूप में सामने आती हैं और कहानियों में इन्हें विस्तार मिलता है। वह अगर कविता भी लिखते तो उतने ही बड़े कवि होते है जितने बड़े कहानीकार हैं। दिल्ली से आए जन संस्कृति मंच, कविता समूह के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. आशुतोष कुमार ने शेखर जोशी को श्रम के सौन्दर्य के साथ-साथ श्रम की विडंबना के कवि के रूप में याद किया और कहा कि उनकी कविताओं में कई ऐसे सूत्र मिलाते हैं जिनसे नई कहानी के संघर्ष को भी समझा जा सकता है।

इस अवसर पर बोलते हुए शेखर जोशी ने कविता के सौन्दर्य के बजाए इनकी रचना प्रक्रिया को खोलना महत्त्वपूर्ण समझा। कई कविताओं के पाठ और इनके लिखे जाने की स्थितियों पर प्रकाश डाला। उनका कहना था कि विचलित करने वाली स्थितियों में बनने वाले रचनात्मक दबाव से ही यह कविताएं लिखी जा सकी है। इनका समय करीब 55 से 60 साल के लम्बे अंतराल में फैला हुआ है। मैं नही जानता कि इन कविताओं के पसन्द किए जाने के पीछे इनकी गुणवत्ता है या मेरे प्रति प्यार, लेकिन इनके सृजन के लिए मेरा परिवेश ही मुझे जब-तब प्रेरित करता रहा है। इस अवसर पर उन्होंने सिख विरोधी दंगों के समय लिखी गई लम्बी कविता ‘अखबार की सुर्खियों में चला गया करतार’ के साथ- साथ ‘पाखी के लिए’, ‘अस्पतल डायरी’, आदि कई कविताएं सुनाकर श्रोताओं को अभिभूत कर दिया।

अध्यक्षीय संबोधन में वरिष्ठ आलोचक राजेन्द्र कुमार ने कहा कि शेखर जी की कविता में परिवेश और उसकी स्मृति-विस्मृति को फिर से जी लेने की इच्छा व्यक्त हुई है। उनकी कविता जीवन का रीटेक है। गोष्ठी के आखिर में दोनो वक्ताओं ने अपनी पसन्द की दो- दो कविताएं सुनाई। शुरुआत में वरिष्ठ कवि शिवकुटी लाल वर्मा, शायर ख्वाज़ा जावेद अख्तर और महान स्त्रीवादी चिंतक शर्मिला रेगे को श्रद्धांजलि दी गई। संयोजन दुर्गाप्रसाद सिंह ने किया जबकि संचालन रामायण राम ने किया। कार्यक्रम में जसम के महासचिव प्रणय कृष्ण, रामजी राय, जी.पी. मिश्र, कहानीकार अनिता गोपेश, नीलम शंकर, कवि संतोष चतुर्वेदी, विवेक निराला, अरुण आदित्य, प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव अविनाश मिश्र सहित बड़ी संख्या में छात्र नौजवान शामिल थे।

प्रस्तुति‍ : प्रेम शंकर, राष्ट्रीय सचिव, जन संस्कृति मंच

सत्ता के दबाए सच को सामने ला रही हैं डाक्यूमेंटरी फि‍ल्में :बीजू टोप्पो

सलेमपुर में आयोजि‍त फिल्म फेस्टिवल को संबोधि‍त करते फिल्मकार बीजू टोप्पो।

सलेमपुर में आयोजि‍त फिल्म फेस्टिवल को संबोधि‍त करते फिल्मकार बीजू टोप्पो।

सलेमपुर (देवरिया) : बरहजिया ट्रेन की याद दिलाने वाली डाक्यूमेंटरी ‘गाडी़ लोहरदगा मेल’ के प्रदर्शन के साथ जून 23, 2013  को पहला सलेमपुर फिल्म फेस्टिवल शुरू हुआ। बापू महाविद्यालय के नवनिर्मित सभागार में आयोजित दो दिवसीय इस फिल्म फेस्टिवल का उद्घाटन राँची से आए फिल्मकार बीजू टोप्पो ने किया। जन संस्कृति मंच की देवरिया इकाई और लोकतरंग फाउंडेशन ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित फिल्म फेस्टिवल के पहले दिन दो डाक्यूमेंटरी, एक वीडियो म्यूजिक और एक फीचर फिल्म का प्रदर्शन किया गया। सबसे पहले वीडियो म्यूजिक ‘गाँव छोड़ब नाहीं’ दिखाई गई। यह वीडियो म्यूजिक विकास के नाम पर किए जा रहे जबरन विस्थापन के खिलाफ आदिवासियों, मजदूरों के संघर्ष को सलाम करती है। इसमें आदिवासी, मजदूर और किसान संकल्प लेते हैं कि वे जल, जंगल, जमीन से बेदखल किए जाने के खिलाफ अपने संघर्ष को जारी रखेंगे और किसी भी कीमत पर अपने गाँव, नदी, जंगल, जमीन को कार्पोरेट लूट का हिस्सा नहीं बनने देंगे। इसके बाद राँची से लोहरदगा के बीच मीटर गेज पर चलने वाली पैसेन्जर ट्रेन पर बनी डाक्यूमेंटरी ‘गाड़ी लोहरदगा मेल’ दिखाई गई। नौ दशक से अधिक समय तक राँची और लोहरदगा के बीच गाँवों के ग्रामीणों के लिए लाइफ लाइन यह ट्रेन 2003 में बंद हो गई थी। इस ट्रेन में फिल्मकार मेघनाथ, बीजू टोप्पो के साथ संस्कृति कर्मियों ने यात्रा की। ट्रेन में यात्रा कर रहे संस्कृति कर्मी इस ट्रेन के महत्व और ग्रामीणों से रिश्ते को अपने गीतों में व्यक्त करते हैं। फिल्म के निर्माण के बारे में बीजू टोप्पो ने बताया कि इस डाक्यूमेंटरी को तीन दिन की शूटिंग में बनाया था। डाक्यमेंटरी ‘प्रतिरोध’ में झारखंड के राँची के निकट नगड़ी गाँव में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट और विधि विश्वविद्यालय के लिए 277 एकड़ उपजाऊ कृषि जमीन हड़पने की कोशिश के खिलाफ किसानों, आदिवासियों के संघर्ष के दास्तान को बयाँ किया गया है। इस जमीन को वर्ष 1957 में अधिग्रहीत करने की कोशिश हुई थी जिसे किसानों ने अपने संघर्ष से विफल कर दिया था। इस फिल्म का भी निर्माण बीजू टोप्पो और मेघनाथ ने किया है। इस डाक्यूमेंटरी के बाद दर्शकों ने फिल्मकार बीजू टोप्पो से बातचीत भी की।

पहले दिन की आखिरी फिल्म के रूप में वर्ष 1990 में बनी तपन सिन्हा की फीचर फिल्म ‘एक डॉक्टर की मौत’ दिखाई गई। यह फिल्म कुष्ठ रोग के इलाज की दवा विकसित कर रहे एक डॉक्टर की कहानी है जिसे साथी डॉक्टरों और नौकरशाही के उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है। उसकी खोज को दबा दिया जाता है और इसी रोग की दवा के अविष्कार का श्रेय दो अमरीकी वैज्ञानिकों को मिल जाता है। इस सदमे से डॉक्टर उबर नहीं पाता और वह अंत में विदेश जाकर काम करने के अनुरोध को स्वीकार कर लेता है। सरकारी तंत्र की पोल खोलती यह फिल्म पंकज कपूर के यादगार अभिनय के लिए आज भी याद की जाती है।

फेस्टिवल का उद्घाटन करते हुए राँची से आए फिल्मकार बीजू टोप्पो ने कहा कि आज झारखंड,  उड़ीसा, छत्तीसगढ सहित कई राज्यों में जल, जंगल, जमीन की कार्पोरेट लूट हो रही है। सरकार इस लूट में बराबर की साझीदार है। इसके खिलाफ आदिवासियों, किसानों के संघर्ष को मुख्य धारा का मीडिया, सिनेमा जगह देने को तैयार नहीं है। इस स्थिति में डाक्यूमेंटरी फिल्मकार सीमित साधनों में उत्पीडि़तों की आवाज और जमीनी सच को डाक्यूमेंटरी सिनेमा के जरिए देने की कोशिश कर रहे हैं। इस तरह के फिल्म फेस्टिवल सत्ता और कार्पोरेट द्वारा दबा दिए गए सच को दिखाने का महत्वपूर्ण मंच बन रहे हैं।
जन संस्कृति मंच के फिल्म समूह द ग्रुप के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी ने कहा कि प्रतिरोध का सिनेमा की सबसे बडी ताकत जन सहयोग से इसका आयोजित होना है। जनता का सिनेमा, जनता के ही सहयोग से बन सकता है और उसको दिखाया जा सकता है। जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय पार्षद अशोक चौधरी ने कहा कि‍ जिस देश ने ब्रिटिश साम्राज्यवादियों को बेमिसाल संघर्ष के जरिए खदेड़ दिया था, उस देश की जनता को बताया जा रहा है कि अमरीकी संस्कृति ही हमारी उद्धारक है। प्रतिरोध का सिनेमा लूट की संस्कृति, रंगीन चमकती हुई दुनिया और इसके कारोबारियों के खिलाफ संघर्षशील जनता का मंच है। डाक्यूमेंटरी सिनेमा के निर्माण, उसको दिखाने के प्रयासों व दर्शकों के रिस्पांस पर रिसर्च कर रहीं मोनाश यूनिवर्सिटी आस्टेलिया की  श्‍वेता किशोर ने कहा कि डाक्यूमेंटरी सिनेमा का छोटे कस्बों में दिखाने का काम बहुत महत्वपूर्ण है और मेरे लिए सलेमपुर जैसे स्थान पर फिल्म फेस्टिवल का आयोजन देखना एक विशिष्ट अनुभव है। उन्होंने कहा कि जब हम सिनेमा हाल मे फिल्म देखने जाते हैं तो ग्राहक होते हैं लेकिन इस तरह के आयोजनों में दर्शक एक साझीदार के रूप में आते हैं।

जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय सचिव मनोज कुमार सिंह ने प्रतिरोध के सिनेमा की यात्रा का विस्तार से जिक्र करते हुए कहा कि सलेमपुर फिल्म फेस्टिवल से हम प्रतिरोध के सिनेमा के तीसरे चरण में प्रवेश कर रहे हैं। इसके बाद सलेमपुर जैसे छोटे-छोटे कस्बों में इस तरह के आयोजनों का सिलसिला शुरू होगा। धन्यवाद ज्ञापन उद्भव मिश्र ने किया। उद्घाटन सत्र का संचलान लोक तरंग फाउंडेशन ट्रस्ट के अध्यक्ष मिनहाज सोहग्रवी ने किया। उद्घाटन सत्र में उत्तराखंड मे बाढ, भूस्लखन से हुई त्रासदी में मारे गए लोगों को एक मिनट मौन रखकर श्रद्धाजंलि दी गई।

दूसरा दिन
सलेमपुर फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन पूर्वांचल के त्रासदी इंसेफेलाइटिस पर गोरखुपर फिल्म सोसाइटी द्वारा बनायी गई डाक्यूमेंटरी ‘खामोशी’ तथा चर्चित शायर तश्ना आलमी द्वारा लखनऊ फिल्म सोसाइटी द्वारा बनायी गई डाक्यूमेंटरी ‘अतश’ का प्रदर्शन किया गया। इसके अलावा विश्व सिनेमा से सलेमपुर के लोगों से परिचय कराने के उद्देश्य से मशहूर इरानी फिल्मकार माजिद मजीदी की ‘चिल्ड्रेन आफ हैवेन’ तथा कई लघु फिल्में दिखाई गईं। फेस्टिवल के समापन के मौके पर जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवकुमार मिश्र के निधन पर एक मिनट मौन रखकर श्रद्धाजंलि दी गई। फेस्टिवल को चार सत्रों में बांटा गया था। पहले सत्र में लघु और एनिमेशन फिल्मों के तहत नार्मन मैक्लारेन की ‘नेबर’ और ‘चेयरी टेल’ दिखाई गई। ‘नेबर’ युद्ध विरोधी फिल्म है और यह हमें पड़ोसियों से प्रेम करने का संदेश देती है। इसमें एक खिले फूल को पाने के लिए दो पड़ोसियों के बीच लड़ते हुए मर जाने के रूपक का इस्तेमाल करते हुए बताया गया है कि कैसे झूठे दंभ और ईर्ष्‍या में हम अपने अंदर के मानवीय संवेदनाओं को मार देते हैं और एक हिंसक मनुष्य में तब्दील हो जाते हैं। ‘चेयरी टेल’ किताब पढ़ते एक व्यक्ति के कुर्सी पर बैठने की कोशिशों के जरिए सत्ता सम्बन्धों की बेहद खूबसूरत तरीके से दिखाती है। फ्राँस के फिल्मकार अलबर्ट लेमोरेसी की शार्ट फिल्म ‘रेड बैलून’ दर्शकों को खूब पंसद आई। यह फिल्म एक छोटे बच्चे की लाल गुब्बारे से दोस्ती की कहानी है। स्कूल जाते वक्त बच्चे को एक लाल गुब्बारा मिल जाता है जिसे वह हमेशा अपने पास रखता है। घर और स्कूल के लोग इस लाल गुब्बारे को बच्चे से दूर करने की कोशिश करते हैं लेकिन वह हमेशा वापस आ जाता है। लाल गुब्बारे से ईर्ष्‍या रखने वाले बच्चे एक दिन लाल गुब्बारे को पकड़कर फोड़ देते हैं। इससे दुखी बच्चे को हजारों की संख्या में आए गुब्बारे अपने साथ उड़ाते हुए पेरिस की सैर कराते हैं। दूसरे सत्र में इरान  के प्रसिद्ध फिल्मकार माजिद मजीदी की ‘चिल्डेन आफ हैवेन’ को दर्शकों ने उमस भरी गर्मी के बीच बड़ी तल्लीनता से देखा। यह फिल्म एक गरीब परिवार के दो बच्चों अली व जेहरा की कहानी है जो एक जोड़ी जूते को ही बारी-बारी पहन कर स्कूल जाते हैं। अली अपनी बहन के लिए एक जोड़ी जूते पाने के इरादे से दौड़ प्रति‍योगि‍ता में भाग लेता है। वह इतनी तेज दौड़ता है उसके प्रथम स्थान मिलता है। उसे बड़ी-सी ट्राफी दी जाती है और लोग उसे कंधों पर बिठकार खुशी मनाते  हैं, लेकिन अली रो रहा है क्योंकि वह प्रति‍योगि‍ता में तीसरे स्थान के बजाय फर्स्‍ट आ गया। वह तीसरे स्थान पर आता तो उसे इनाम में एक जोड़ी जूते मिलते जो वह अपनी बहन को देता।

सलेमपुर में आयोजि‍त फिल्म फेस्टिवल के दौरान पत्र-पत्रि‍का खरीदते लोग।

सलेमपुर में आयोजि‍त फिल्म फेस्टिवल के दौरान पत्र-पत्रि‍का खरीदते लोग।

फेस्टिवल का तीसरा सत्र पूर्वांचल की फिल्मों के नाम रहा। इस सत्र में चार फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। फेस्टिवल के आयोजन से जुड़े सलेमपुर के आशीष सिंह और बलदाउ विश्वकर्मा की भोजपुरी फिल्म ‘तोहरी खातिर’ शराब से बर्बाद होते परिवारों की कहानी है तो ‘सावधान’ एचआईवी/एड्स के प्रति जागरूक करने वाली म्यूजिक वीडियो है। शायर तश्ना आलमी पर बनी डाक्यूमेंटरी ‘अतश’ का प्रदर्शन खास आकर्षण था। लखनऊ के बशीरतपुर के तंग गली में रहने वाला यह शायर अपनी रचनाओं से गरीबी, जातीय भेदभाव, बेरोजगारी और समाज की विद्रूपताओं पर करारा प्रहार करता है। उनकी शायरी गाँवों से शहर की ओर भागते ग्रामीणों के दर्द को आवाज देती है। तश्ना आलमी सलेमपुर के एक गाँव शामपुर के मूल निवासी हैं। अपने जवार के शायर को सिनेमा के पर्दे पर देख दर्शक रोमांचित थे। इस डाक्यूमेंटरी का निर्माण लखनऊ फिल्म सोसाइटी की ओर से युवा फिल्मकार अवनीश सिंह ने किया है। इस मौके पर शायर तश्ना आलमी मौजूद थे। इसके बाद इंसेफेलाइटिस की त्रासदी पर बनी डाक्यूमेंटरी ‘खामोशी’ दिखाई गई। गोरखपुर और कुशीनगर जिले में इंसेफेलाइटिस से मरे और विकलांग हुए बच्चों के जरिए रोग की भयावहता, स्वास्थ्य तंत्र की नाकामी को हमारे सामने रखती हुई यह फिल्म सवाल उठाती है कि इस त्रासदी पर हमारा राजनीतिक तंत्र इसलिए खामोश है क्योंकि इस बीमारी के शिकार बच्चे गरीबों के लाल हैं। इस डाक्यूमेंटरी के प्रदर्शन के बाद दर्शकों ने इसके निदेशक संजय जोशी और मनोज कुमार सिंह से बात भी की। सभी सत्रों का संचालन करते हुए फिल्मों का परिचय संजय जोशी ने दिया। जन संस्कृति मंच की देवरिया इकाई और लोक तरंग फाउंडेशन ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में बापू महाविद्यालय के सभागार में आयोजित इस फेस्टिवल का समपान सांस्कृतिक कार्यक्रमों और कवि सम्मेलन के साथ हुआ। सांस्कृतिक कार्यक्रम में लघु नाटक के मंचन के साथ-साथ लोक नृत्य और लोक गीत भी प्रस्तुत किए गइ। जसम की देवरिया इकाई के संयोजक उदभव मिश्र और लोकतरंग फाउंडेशन ट्रस्ट के अध्यक्ष मिनहाज सोहाग्रवी ने फेस्टिवल को सफल बनाने के लिए सलेमपुर के लोगों को बधाई दी।

प्रस्‍तुति‍- मनोज सिंह, चि‍त्र- श्‍वेता कि‍शोर

बिना स्वतंत्रता और समानता के लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं: मैनेजर पांडेय

jan sanskriti manch

नई दिल्ली: आपातकाल की 38 वीं बरसी को जन संस्कृति मंच ने 26 जून 2013 को दमन विरोधी दिवस के बतौर मनाया। जंतर-मंतर पर आयोजित कार्यक्रम में कहा गया कि आज भले ही घोषित आपातकाल न हो, लेकिन इस देश में अघोषित आपातकाल चल रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी और विरोध की आवाजों पर हमले इसी अघोषित आपातकाल की अभिव्यक्तियाँ हैं। ‘कबीर कला मंच’ की शीतल साठे और उनके साथियों की गिरफ्तारी, विनायक सेन व सीमा आजाद जैसे कार्यकर्ताओं पर राजद्रोह के मुकदमे, फर्जी आरोपों पर जीतन मरांडी जैसे संस्कृतिकर्मी को सजा, बंगलुरू की गैलरी में युवा चित्रकार अनिरुद्ध साईनाथ की पेंटिंग प्रदर्शनी पर रोक, कश्मीर पर बनी डाक्यूमेंट्री फिल्मों को कैम्पसों में दिखाने पर हिंदुत्ववादी गुंडों के आदेश से रोक, बाल ठाकरे की मौत पर शिवसैनिकों द्वारा थोप गए बंद की फेसबुक पर आलोचना करने वाली दो लड़कियों  की गिरफ्तारी, नोएडा एवं मानेसर समेत पूरे देश में मजदूरों पर हमले आदि आपातकाल की याद दिलाने वाली ही घटनाएं हैं।

इस मौके पर जसम के अध्यक्ष प्रोफेसर मैनेजर पांडेय ने कहा कि इमरजेंसी को भारत के लोकतंत्र के इतिहास के सबसे काले दिन के तौर पर याद करना जरूरी है। समानता और स्वतंत्रता के बगैर लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं हो सकता। सिर्फ चुनाव होना लोकतंत्र की पहचान नहीं हो सकता।

जलेस के महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने इमरजेंसी के दौरान अपनी गिरफ्तारी और यातनाओं के बारे में बताते हुए कहा कि कांग्रेस ने कभी भी आपातकालीन दमन के लिए राष्ट्रीय क्षमा नहीं माँगी है। कांग्रेस और भाजपा शासकवर्ग की ये दोनों पार्टियां इस देश की जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन कर रही हैं, इन पर विश्वास नहीं करना चाहिए। दमन के खिलाफ प्रतिरोध के आंदोलन को आगे बढ़ाना चाहिए।

प्रलेस के महासचिव अली जावेद ने कहा कि शासकवर्गीय पार्टियों में तानाशाही आम प्रवृत्ति है, जिसके खिलाफ जनता के प्रतिरोध को संगठित करना जरूरी है।

भाकपा-माले की पोलित ब्यूरो सदस्य कविता कृष्णन ने कहा कि इमरजेंसी का विरोध करने वाली शासकवर्गीय पार्टियों के नाटक को समझना भी जरूरी है। तानाशाहों का साथ देने वाली पार्टियाँ जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों की हिफाजत नहीं कर सकतीं और न ही जनता को दमन से मुक्ति दिला सकती हैं, यह बार-बार साबित हुआ है।

फरवरी के आम हड़ताल के दौरान सैकड़ों मजदूरों के साथ जेल में डाले गए एक्टू नेता श्याम किशोर ने आपबीती बताते हुए सरकार, प्रशासन और पुलिस की श्रमिक विरोधी रवैये का खुलासा किया।

छात्र संगठन आइसा से सनी और युवा संगठन इंकलाबी नौजवान सभा से असलम खान ने सभा को संबोधित किया।

कार्यक्रम की शुरुआत उत्तराखंड की आपदा में राहत की अपील के साथ हुई और मृतकों के साथ संवेदना जाहिर करते हुए तथा जलेस के अध्यक्ष शिवकुमार मिश्र को याद करते हुए एक मिनट का मौन रखा गया।

कार्यक्रम के दौरान अनुपम और अश्विनी अग्रवाल ने लाइव पेंटिंग बनाई। इसके अलावा प्रतिरोध की कविताओं के पोस्टर लगाए गए थे। लोकेश जैन, पाखी, छवि, कपिल शर्मा, उज्जयनी, विद्रोही, अंजनी ने कविताओं की प्रस्तुति की।

संचालन अवधेश ने किया। पूरे कार्यक्रम का संयोजन अशोक भौमिक ने किया था। इसमें अध्यापक रवींद्र गोयल, लेखिका नूर जहीर, दिनेश मिश्र, संस्कृतिकर्मी रेखा अवस्थी, आलोचक आशुतोष, गोपाल प्रधान, फिल्मकार इमरान, विजय, श्याम सुशील, रीतू सिन्हा, संदीपन, रवि राय, सुधीर सुमन, कनिका, रोहित कौशिक, रामनिवास आदि मौजूद थे।

(अशोक भौमिक, संयोजक, जन संस्कृति मंच, दिल्ली की ओर से जारी) 

मुक्तिबोध लोकतंत्र के अंधेरे की शिनाख्त करने वाले कवि

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नई दि‍ल्‍ली : मुक्तिबोध की मशहूर कविता के प्रकाशन के पचास वर्ष के मौके पर जन संस्कृति मंच के कविता समूह की ओर से 13 मई 2013 को गाँधी शांति प्रतिष्ठान में लोकतंत्र के ‘अंधेरे में’ आधी सदी विषयक विचार-गोष्ठी आयोजित की गई। जसम के पिछले सम्मेलन में कविता, कहानी, जनभाषा, लोककला आदि के क्षेत्र में सृजनात्मकता को आवेग देने के लिए विशेष समूह बनाए गए थे। इस आयोजन से कविता समूह की गतिविधि का सिलसिला शुरू हुआ।
आयोजन की शुरुआत रंगकर्मी राजेश चंद्र द्वारा ‘अंधेरे में’ के पाठ से हुई।

इस मौके पर चित्रकार अशोक भौमिक द्वारा ‘अंधेरे में’ के अंशों पर बनाए गए पोस्टरों को आलोचक अर्चना वर्मा ने तथा मंटो पर केंद्रित ‘समकालीन चुनौती’ के विशेषांक को लेखक प्रेमपाल शर्मा ने लोकार्पित किया।

विचारगोष्ठी की शुरुआत करते हुए प्रोफेसर मैनेजर पांडेय ने कहा कि 57 से 63 तक मुक्तिबोध की यह कविता संभावना की कविता थी, पर 2013 में वास्तविकता की कविता है। यह एक ‘समग्र’ कविता है। मुक्तिबोध की कविताओं में जिस ‘वह’ की तलाश है, दरअसल वह जिंदगी के संघर्षों से अर्जित क्राँति-चेतना है। लेनिन के मुताबिक़ कई बार ‘फैंटेसी’ असहनीय यथार्थ के खिलाफ एक बगावत भी होती है। इस कविता में फैंटेसी पूँजीवादी सभ्यता की समीक्षा करती है। यह  मध्यवर्ग के आत्मालोचन की कविता भी है। अंधेरे से लड़ने के लिए अंधेरे को समझना जरूरी होता है। यह कविता अंधेरे को समझने और समझाने वाली कविता है।

आलोचक अर्चना वर्मा ने कहा कि मौजूदा प्रचलित विमर्शों के आधार पर इस कविता को पढ़ा जाए  तो हादसों की बड़ी आशंकाएं हैं। जब यह कविता लिखी गई थी, उससे भी ज्यादा यह आज के समय की जटिलताओं और तकलीफों को प्रतिबिंबित करने वाली कविता है। ऊपर से दिखने वाली फार्मूलाबद्ध सच्चाइयों के सामने सर  झुकाने वाली ‘आधुनिक’ चेतना के बरक्स मुक्तिबोध तिलस्म और रहस्य के जरिये सतह के नीचे गाड़ दी गयी सच्चाइयों का उत्खनन करते हैं। यह यह एक आधुनिक कवि की अद्वितीय उपलब्धि है।

वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि सामाजिक बेचैनी की लहरों ने हमें दिल्ली में ला पटका था, हम कैरियर बनाने नहीं आए थे। उस दौर में हमारे लिए ‘अंधेरे में’ कविता बहुत प्रासंगिक हो उठी थी। इस कविता ने हमारी पीढ़ी की संवेदना को बदला और अकविता की खोह में जाने से रोका। हमारे लोकतंत्र का अंधेरा एक जगह कहीं घनीभूत दिखाई पड़ता है तो इस कविता में दिखाई पड़ता है। पिछले पाँच दशक की कविता का भी जैसे केंद्रीय रूपक है ‘अंधेरे में’। यह निजी संताप की नहीं, बल्कि सामूहिक यातना और कष्टों की कविता है।

चित्रकार अशोक भौमिक ने मुक्तिबोध की कविता के चित्रात्मक और बिंबात्मक पहलू पर बोलते हुए कहा कि जिस तरह गुएर्निका को समझने के लिए चित्रकला की परंपरागत कसौटियाँ अक्षम थीं, उसी तरह का मामला ‘अंधेरे में’ कविता के साथ है। उन्होंने कहा कि नक्सलबाड़ी विद्रोह और उसके दमन तथा साम्राज्यवादी हमले के खिलाफ वियतनाम के संघर्ष ने बाद की पीढि़यों को ‘अंधेरे में’ कविता को समझने के सूत्र दिए। ‘अंधेरे में’ ऐसी कविता है, जिसे सामने रखकर राजनीति और कला तथा विभिन्न कलाओं के बीच के अंतर्संबंधों को समझा जा सकता है।

‘समकालीन जनमत’ के प्रधान संपादक और आलोचक रामजी राय ने कहा कि मुक्तिबोध को पढ़ते हुए हम अंधेरे की नींव को समझ सकते हैं। पहले दिए गए शीर्षक  ‘आशंका के द्वीप अंधेरे में’ में से अपने जीवन के अंतिम समय में आशंका के द्वीप को हटाकर मुक्तिबोध ने 1964 में ही स्पष्ट संकेत दिया था कि लोकतंत्र का अंधेरा गहरा गया है। ‘अँधेरे में’ अस्मिता या म‍हज क्रांतिचेतना की जगह नए भारत की खोज और उसके लिए संघर्ष की कविता है। मुक्तिबोध क्रांति के नियतिवाद के कवि नहीं हैं, वह वर्तमान में उसकी स्थिति के आकलन के कवि हैं। वह अपनी कविता में विद्रोह की धधकती हुई ज्वालामुखियों की गड़गडाहट दर्ज करते हैं। इस देश की पुरानी हाय में से कौन आग भड़केगी, जो शोषण और दमन के ढाँचे को बदल देगी, वह इस सोच और स्वप्न के कवि हैं। सही मायने में वह कविता के होलटाइमर थे।

विचार गोष्ठी का संचालन जसम, कविता समूह के संयोजक आशुतोष कुमार ने किया। इस मौके पर कहानीकार अल्पना मिश्र, कवि मदन कश्यप, कथाकार महेश दर्पण, ज्ञानपीठ के पूर्व निदेशक दिनेश मिश्र, कवि रंजीत वर्मा, युवा आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी, वरिष्ठ कवयित्री प्रेमलता वर्मा, शीबा असलम फहमी, दिगंबर आशु, यादव शंभु, अंजू शर्मा, सुदीप्ति, स्वाति भौमिक, वंदना शर्मा, विपिन चौधरी, भाषा सिंह, मुकुल सरल, प्रभात रंजन, गिरिराज किराडू, विभास वर्मा, संजय कुंदन, चंद्रभूषण, इरफान, हिम्मत सिंह, प्रेमशंकर, अवधेश, संजय जोशी, रमेश प्रजापति, विनोद वर्णवाल, कपिल शर्मा, सत्यानंद निरुपम, श्याम सुशील, कृष्ण सिंह, बृजेश, रविप्रकाश, उदयशंकर, संदीप सिंह, रोहित कौशिक, अवधेश कुमार सिंह, ललित शर्मा, आलोक शर्मा, मनीष समेत कई जाने-माने साहित्यकार, बुद्धिजीवी, संस्कृतिकर्मी और प्रकाशक मौजूद थे। धन्यवाद ज्ञापन आलोचक गोपाल प्रधान ने किया। इस मौके पर फोनिम, लोकमित्र और द ग्रुप की ओर से किताबों, फिल्मों के सीडी और कविता पोस्टर के स्‍टॉल भी लगाए गए थे।

सुधीर सुमन राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी