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एक आतंकवादी की मौत और अमेरिकी साम्राज्यवाद के मंसूबे : सुधीर सुमन

अमेरिका द्वारा आसोमा को मारने के लिए की गई कार्रवाई के पीछे की सच्‍चाई को उजागर करता और अमेरिका के नापाक इरादे से भारत के राजनीतिज्ञों को आगाह करता वरिष्‍ठ लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन का लेख-

ओसामा मारा गया और भारत में एसएमएस वीर सक्रिय हो उठे। मुझे भी इस तरह के एसएमएस मिले, जिनका आशय था कि मुझे आनंदित होना चाहिए। समझ में नहीं आया कि इसमें इतना ज्यादा आनंदित होने की क्या बात है! ओसामा तो वैसे भी कुछ वर्षों से कमजोर पड़ चुका था, और जिसने बनाया उसने मिटा दिया, इसमें मुझे क्यों खुश होना चाहिए? वैसे मारने वाला भी अमेरिका था और घटना का गवाह भी वही और वही उसे समुद्र में दफनाने वाला भी। आज दुनिया यह जानना चाहती है कि ऐसी हड़बड़ी उसे क्यों थी? इसे लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं और कई तरह की थ्योरी सामने आ रही हैं, लेकिन मेरे लिए तो बड़ा सवाल यह है कि हमें चिंतित क्यों नहीं होना चाहिए कि अमेरिका एकदम पड़ोस में डेरा डाल चुका है और आतंकवादियों को मिटाने के नाम पर वहां अपनी जड़ें और मजबूत करता जा रहा है।

चलिए, मान लिया कि ओसामा के मास्टर माइंड की वजह से ही अमेरिकी चौधराहट को कायम रखने वाला एक केंद्र- वर्ल्ड ट्रेड सेंटर ढह गया था, जिसमें महान अमेरिका के तीन हजार नागरिक मारे गए थे और उसने गुनाहगार को उसके कुकृत्य की वाजिब सजा दे दी। लेकिन मारे गए अमेरिकी नागरिकों के प्रति संवेदना की आड़ लेकर अमेरिकी न्याय के पक्ष में खड़ा कैसे हुआ जा सकता है? जबकि उसके खुद के अन्याय की लंबी फेहरिश्त हमारे सामने है और आज भी उसके द्वारा अन्याय का सिलसिला जारी है। सच तो यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चुनाव से पहले एक उपलब्धि हासिल करने के लिए ही सारे अंतरराष्ट्रीय कायदे-कानून का उल्लंघन करते हुए ओसामा की हत्या की है। ओसामा के हाथ निर्दोषों के खून से सने हुए थे, इसमें कोई शक नहीं है, लेकिन अमेरिकी नेवी सील ने जिस तरह एक लाइसेंसी आपराधिक गिरोह की तरह ओसामा की क्रूरतापूर्ण तरीके से हत्या की है, उससे हम भारतीय लोगों को आह्लादित क्यों होना चाहिए? अमेरिकी साम्राज्यवाद के प्रबल विरोधी विचारक नोम चोम्स्की ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि ‘‘यह अधिक से अधिक साफ होते जाने से कि यह एक योजनाबद्ध अभियान था, अंतरराष्ट्रीय कानूनों के सबसे बुनियादी नियमों के उल्लंघन का मामला भी उतना ही गहराता जा रहा है।…. जिन समाजों में कानून को लेकर थोड़ा भी सम्मान होता है, वहां संदिग्धों को पकड़कर उन्हें निष्पक्ष सुनवाई के लिए पेश किया जाता है। मैं ‘संदिग्ध’ शब्द पर जोर दे रहा हूं।’’ जिस अमेरिका की खुफियागिरी का इतना गौरव-गान हो रहा है, उस अमेरिका से पूछा जाना चाहिए कि जब तालिबान कह रहे थे कि सबूत दो कि ओसामा अफगानिस्तान में है, तब उसने सबूत क्यों नहीं दिए? नोम चोम्स्की तो अमेरिका के इस दावे पर ही संदेह करते हैं कि 9/11 की योजना अलकायदा ने अफगानिस्तान में बैठकर बनाई थी। सच्‍चाई जो भी हो, लेकिन चोम्स्की ने ओसामा की मौत और मौत के बाद की परिस्थितियों का जो आकलन किया है, वह गौर करने लायक है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘मीडिया में वाशिंगटन के गुस्से के बारे में भी बहुत चर्चा हो रही है कि पाकिस्तान ने बिन लादेन को उसे नहीं सौंपा, जबकि पक्के तौर पर फौज और सुरक्षा बलों के कुछ अधिकारी एबटाबाद में उसकी मौजूदगी से वाकिफ थे। पाकिस्तान के गुस्से के बारे में बहुत कम कहा जा रहा है कि अमेरिका ने एक राजनीतिक हत्या के लिए उनकी जमीन में हस्तक्षेप किया। पाकिस्तान में अमेरिका-विरोधी गुस्सा पहले से बहुत है, और इस घटना से वह और बढ़ेगा। जैसा अंदाजा लगाया जा सकता है, लाश को समुद्र में फेंक देने के फैसले ने मुसलिम जगत में गुस्से और संदेह को ही भड़काया है।

हम खुद से यह पूछ सकते हैं कि तब हमारी प्रतिक्रिया क्या होती, जब कोई इराकी कमांडो जॉर्ज डब्ल्यू बुश के घर में घुसकर उसकी हत्या कर देता और उसकी लाश अटलांटिक में बहा देता। यह तो निर्विवाद है कि बुश के अपराध बिन लादेन के अपराधों से बहुत अधिक हैं और वह ‘संदिग्ध’ नहीं हैं, बल्कि निर्विवाद रूप से उसने ‘फैसले’ लिये।’’

दरअसल आज अमेरिका के खिलाफ दुनिया में जो नफरत है वह उसके किसी भी दुश्मन को छुपाने का आधार बन सकती है, यह उसे क्यों समझ में नहीं आता? जिस तरह के बदले की कार्रवाई को अमेरिका न्याय की जीत बता रहा है, यही तर्क ओसामा द्वारा किए गए बदले की कार्रवाइयों पर क्यों नहीं लागू हो सकता, आखिर उसे भी ऊर्जा तो अमेरिका द्वारा मुस्लिम देशों में मचाई जा रही तबाही के कारण ही मिल रही थी? बेशक ओसामा साम्राज्यवाद-विरोध की राजनीति करने वाला कोई राजनेता नहीं था, वह एक जुनूनी और कट्टर मुसलमान था, जेहादी था, लेकिन ओसामा के प्रति जन-समर्थन का आधार क्या सिर्फ इस्लामिक कट्टरपंथ था, क्या महज सांप्रदायिक कट्टरता की वजह से ही लोग उसका समर्थन करते थे। इस सवाल की ओर आमतौर पर आज अमेरिका के प्रायोजित शौर्य में डूबे लोग ध्यान नहीं देना चाहते? ओसामा इस्लाम के विजय की ध्वजा फैलाने निकला कोई मध्ययुगीन शहंशाह तो नहीं था। वह तो कई हुकूमतों के बीच चक्कर लगा रहा था, कुछ दिनों के लिए भी अपनी स्थाई हुकूमत तो उसकी भूगोल के किसी हिस्से में नहीं बन पाई थी। वह बुश या ओबामा की तरह किसी राष्ट्र का प्रतिनिधि भी नहीं था। उसकी ताकत के उभार से लेकर पतन तक कोई ऐसा राष्ट्र सामने नहीं आया, जिसने उसे अपना प्रतिनिधि चेहरा बनाया हो। दरअसल ओसामा बिन लादेन और अलकायदा अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप के खिलाफ इस्लामी जगत में हुई जबर्दस्त प्रतिक्रिया के दौर में अमेरिका की सोवियत-विरोधी रणनीति के खतरनाक बाईप्रोडक्ट थे। आज के दौर का जो आतंकवाद है वह प्रायः अमेरिकी रणनीति की सीधी प्रतिक्रिया है, अमेरिका इस पर लगाम नहीं लगा सकता, इसे खत्म नहीं कर सकता, भले ही ओसामा खत्म हो गया हो। कुछ लोग ओसामा के अंत की तुलना हिटलर के अंत और फासीवाद के पराजय से कर रहे हैं। सिर्फ 1 मई को होने वाली मौत की घोषणाओं के कारण की जा रही ये तुलनाएं निराधार हैं। हिटलर का अंत द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत का स्पष्ट संकेत था और दुनिया में फासीवाद के ऐतिहासिक पराजय का भी। लेकिन ओसामा की हत्या न तो आतंकवाद का अंत है और न ही अमेरिकी साम्राज्यवाद का। जाहिर है इराक, अफगानिस्तान, लिबिया और पाकिस्तान में जो कुछ भी अमेरिका कर रहा है, उससे आतंकवाद पैदा होगा, मिटेगा नहीं। ओसामा की हत्या के चंद रोज बाद ही हाल में सत्ताविरोधी लोकतांत्रिक आंदोलन के लिए चर्चित काहिरा में मुस्लिम-ईसाई दंगों की खबरें आई हैं। जाहिर है इससे अमेरिकी रणनीतिकारों को तो हर्ष ही होगा।

ओसामा की हत्या के बाद मुझे एक दूसरा एसएमएस मिला, जिसमें ग्रेट ओबामा की शान में कशीदे काढ़े गए हैं और यह कल्पना की गई है कि अमेरिका एक दिन पाकिस्तान समेत सारे मुस्लिम राष्ट्रों को ध्वस्त कर देगा। उसमें एक बात और कही गई है कि जिस तरह दुनिया में बुश और ओबामा हैं, उस तरह भारत में नरेंद्र मोदी हैं। भारत में मोदी मिजाज वाले ये तथाकथित राष्ट्रभक्त अब पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादी शिविरों को अमेरिकी स्टाइल में ध्वस्त करने की हुंकार भरने लगे हैं? पर वे यह क्यों भूल जाते हैं कि अमेरिका ने बाहर से पाकिस्तानी राष्ट्र पर अचानक हमला नहीं कर दिया है, बल्कि वह तो वहां पाकिस्तानी सरकार की मर्जी से मौजूद है। प्रचार तो यही है कि अमेरिका पाकिस्तानी सरकार के साथ मिलकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में साझेदारी निभा रहा है। और लगता है कि भारत भी इसी तरह की घनिष्ठ साझेदारी के लिए लालायित है, क्योंकि कुख्यात एफबीआई और सीआईए के साथ इसकी नजदीकियां कुछ ज्यादा ही बढ़ती जा रही हैं। इसकी शुरुआत एक दशक पहले एनडीए के शासनकाल में ही हो चुकी थी, जिसकी प्रक्रिया यूपीए के शासनकाल में जोर-शोर से जारी है। इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि निकट भविष्य में कुछ आतंकवादी घटनाएं भारत में घटें और अमेरिका यहां भी तारणहार बनकर आ जाए। तब किस तरह का आतंकवाद-विरोधी अभियान चलेगा, पाकिस्तान में हो रहे हमलों को देखते हुए इसकी कल्पना की जा सकती है। जो मारे जाएंगे वे आतंकवादी ही होंगे, इसकी भी कोई गारंटी नहीं होगी। वैसे भी भारत में पिछले दो दशकों में हुई आतंकवादी घटनाओं की गहरी तहकीकात प्रायः नहीं की गई है। अमेरिका की तर्ज पर भारत में भी पूरे मुस्लिम समुदाय को आतंकवाद के लिए संदेह के घेरे में डाला गया, सैकड़ों बेगुनाह नौजवान फर्जी मुकदमों में फंसाए गए और उन्हें यातनाएं दी गईं, लेकिन उन पर न्यायालय में कोई आरोप साबित नहीं किया जा सका, जिससे सरकारों की भद्द भी पिटी। आखिर जिस देश में करीब तीन हजार लोगों की हत्या के लिए जिम्मेवार नरेंद्र मोदी ठाठ से मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं, वहां किस तरह इस्लाम की आड़ में आतंक फैलाने वालों पर पूरी तरह रोक लगाई जा सकती है? क्या यह सच नहीं है कि आजादी के बाद जितने दंगे और सांप्रदायिक कत्लेआम हुए हैं, उसमें मुसलमानों को ज्यादा जानमाल का नुकसान उठाना पड़ा है? ऐसे में अगर कुछ मुसलमान प्रतिक्रिया में आतंकवाद के रास्ते पर चल निकल पड़ते हैं, तो क्या इसके लिए सिर्फ इस्लाम धर्म के बारे में प्रचारित कट्टरता और पाकिस्तान को ही दोषी ठहराया जाए?

इतने वर्षों से भारतीय सरकारें चिल्लाती रही हैं कि पाकिस्तान में आतंकवादियों के प्रशिक्षण कैंप चलते हैं और वही आतंकवादियों को धन देता है, तो ऐसे में महत्वपूर्ण सवाल तो यह है कि खुद पाकिस्तान के पास धन और हथियार कहां से आते हैं ? जहां से धन आता है, उसका विरोध क्यों नहीं किया जाता? और यदि पाकिस्तान आतंकवाद का पनाहगाह है तो आतंकवादी पाकिस्तान में भी कत्लेआम क्यों मचाए रहते हैं? विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने लादेन की हत्या को ‘ऐतिहासिक’ और ‘मील का पत्थर’ बताते हुए कहा कि पिछले कुछ सालों में हजारों निर्दोष पुरुष, महिलाएं और बच्चे इन आतंकवादी गुटों के हाथों मारे गए। विदेश मंत्री का कहना है कि वे अमेरिका पर दबाव डालेंगे। क्या शेखचिल्ली का सपना है! अगर आतंकवाद को बढ़ावा देने में पाकिस्तान का हाथ है और उसके सिर पर अमेरिका का हाथ है, तो अमेरिका से भारत अपनी यारी तोड़ता क्यों नहीं, क्यों अमेरिका के चारण बनने के लिए हमारे नेता भी बेकरार हैं?

इससे भी बड़ा सवाल यह है कि अगर निर्दोष पुरुष, महिलाएं और बच्चों की हत्या करने वालों का विरोध ही भारत का मकसद है, तो उसकी उंगली सबसे पहले अमेरिका पर क्यों नहीं उठती? आखिर पाकिस्तान से हमारे देश को ज्यादा खतरा है या अमेरिका से? आतंकवादी क्या हमारे लिए उन अमेरिकापरस्त नीतियों को लागू करने वाले शासकवर्ग से भी ज्यादा खतरनाक हैं जिनकी वजह से लाखों किसानों ने आत्महत्या कर ली है? क्या कुछ सिरफिरे आतंकवादियों द्वारा मारे गए लोगों के प्रति संवेदित होना ही काफी है, या उससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि भारत में प्राकृतिक संपदा और जीविका के संसाधनों को अमेरिकी और अन्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले कर देने का जो खतरनाक खेल चल रहा है, उसका तीखा विरोध किया जाए? क्या अब भीषण लूट और भ्रष्टाचार के खिलाफ उभर रहे जनता के प्रतिरोध का मुकाबला यहां की सरकारें आतंकवाद-विरोधी अभियानों के जरिए करेंगी? छत्तीसगढ़ में तो इसका रंग-रूप हम देख ही रहे हैं। क्या हमारे शासकवर्ग का जो निरंतर अमेरिकीकरण हो रहा है, वह खतरनाक नहीं है?

इस देश की शासकवर्गीय पार्टियां ही नहीं, आमतौर पर भारतीय उपमहाद्वीप की मीडिया भी तुरंत भूल गई कि ओसामा की हत्या के ठीक एक दिन पहले नाटो ने लिबिया में हमला करके गद्दाफी के सबसे छोटे बेटे सैफ अल अरब और तीन पोतों को मार डाला, जबकि गद्दाफी ने नाटो से बातचीत की पेशकश की थी। इस पर नाटो कमांडर का कहना था कि नाटो ने गद्दाफी के परिवार को नहीं, बल्कि सैन्य ठिकाने को निशाना बनाते हुए हमला किया था। यह एक अपवाद घटना नहीं है, जितना अकेले वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में लोग मारे गए उससे कहीं अधिक बेगुनाह नागरिक अमेरिकी सेना द्वारा हाल के वर्षों में इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में मारे जा चुके हैं? आखिर इसकी सजा अमेरिका को क्यों नहीं मिलनी चाहिए?

ओसामा ऑपरेशन के बाद भारत में 26/11 के मास्टर माइंड लोगों के खिलाफ सीधी कार्रवाई की मांग उठने लगी है। और हद है कि भारतीय सेना और एयरफोर्स के चीफ ने इस तरह के गैरजिम्मेदार बयान दिए हैं कि भारत भी इसी तरह का ऑपरेशन पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादियों के खिलाफ कर सकता है। इस तरह से युद्धोन्माद बढ़ेगा, जो पाकिस्तान को पता नहीं कितना नुकसान पहुंचाएगा, पर अमेरिका को जरूर फायदा दिलाएगा। जबकि भारत को इस वक्त चाहिए कि जो व्यवहार अमेरिका ने पाकिस्तान में किया है, उसके आलोक में वह अमेरिका के साथ अपने संबंधों की समीक्षा करे। बेशक भारत पाकिस्तान से आतंकवादियों के प्रत्यर्पण की मांग करे, लेकिन खाली खबर बनाने के लिए उन्हें आतंकवादियों की बड़ी लिस्ट देने के बजाए, कुछ आतंकवादियों के बारे में ठोस सबूत दे। कुछ खुफियागिरी की काबलियत तो हमारी सरकारें भी दिखाएं। ओसामा ऑपरेशन के पहले रेमंड डेविस के मामले में भी पाकिस्तान की संप्रभुता और आजादी का माखौल उसके साझेदार अमेरिका ने खुलकर उड़ाया। दो बेगुनाह पाकिस्तानी नागरिकों की दिनदहाड़े हत्या करने वाले इस सीआईए एजेंट को पाकिस्तान में कोई दंड नहीं मिला। ओबामा ने बाकायदा पाकिस्तान पर दबाव डाला और कहा कि वह अमेरिकी राजनयिक था, इसलिए उस पर स्थानीय कानून के अनुसार मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। अब तो अमेरिका के सारे सहयोगियों और उसके साथ गलबहियां होने को आतुर भारत को सावधान हो जाना चाहिए। आतंकवाद और साम्राज्यवाद एक समान खतरे हैं पाकिस्तान और भारत के लिए। इसका सामना इन देशों को खुद मिलकर करना होगा। अमेरिका को दक्षिण एशिया से बाहर खदेड़ना बेहद जरूरी है, वर्ना उसकी बर्बरता का अखाड़ा यह इलाका बनेगा और मध्यपूर्व की तरह हमें भी भीषण तबाही झेलनी पड़ेगी।

अमेरिकी सेना किसी आतंक-वातंक को मिटाने और स्वतंत्रता व लोकतंत्र की रक्षा के लिए बनी ही नहीं है, बल्कि अमेरिकी पूंजी के विस्तार और दुनिया के संसाधनों की लूट को ध्यान में रखकर ही उसका इस्तेमाल किया जाता है, आखिर इस सच से आंखों को कैसे मूंदा जा सकता है? जिन खतरों का प्रचार करके उसने इराक पर हमला किया और सद्दाम हुसैन की हत्या की, वे प्रचार तो सही साबित नहीं हुए। कोई रासायनिक हथियार तो नहीं मिला। बल्कि दुनिया के अधिकांश लोग यह अच्छी तरह जानते हैं कि खाड़ी में अमेरिकी आतंक का मकसद क्या है? क्या महज तेल पर अपने वर्चस्व के लिए ही उसने मध्यपूर्व में सीधे सैनिक हमलों और प्रतिबंधों के जरिए लाखों लोगों की हत्या नहीं की है? जब तक अमेरिकी साम्राज्यवाद है, क्या हम दुनिया में अमन की उम्मीद कर सकते हैं? ओसामा जैसों से लाख गुना खतरनाक है अमेरिकी साम्राज्यवाद, जिसके कारनामों की विस्तार से चर्चा करती और अमेरिकी नागरिकों की मौतों के प्रति संवेदित लोगों को संबोधित करती एम्मानुएल ओर्तीज की लंबी कविता- ‘एक मिनट का मौन’ के साथ मैं इस लेख को समाप्त करना चाहता हूं। यह कविता 9/11 की घटना के बाद लिखी गई थी। कवि असद जैदी ने इसका अनुवाद किया है-

एक मिनट का मौन

इससे पहले कि मैं यह कविता पढ़ना शुरू करूं
मेरी गुजारिश है कि हम सब एक मिनट का मौन रखें
ग्यारह सितंबर को वल्र्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन में मरे लोगों की याद में
और फिर एक मिनट का मौन उन सबके लिए जिन्हें प्रतिशोध में
सताया गया, कैद किया गया
जो लापता हो गए जिन्हें यातनाएं दी गईं
जिनके साथ बलात्कार हुए एक मिनट का मौन
अफगानिस्तान के मजलूमों और अमेरिकी मजलूमों के लिए
और अगर आप इजाजत दें तो
एक पूरे दिन का मौन
हजारों फिलस्तीनियों के लिए जिन्हें उनके वतन पर दशकों से काबिज
इस्राइली फौजों ने अमरीकी सरपस्ती में मार डाला
छह महीने का मौन उन पंद्रह लाख इराकियों के लिए, उन इराकी बच्चों के लिए,
जिन्हें मार डाला ग्यारह साल लंबी घेराबंदी, भूख और अमरीकी बमबारी ने

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूं
दो महीने का मौन दक्षिण अफ्रीका के अश्वेतों के लिए जिन्हें नस्लवादी शासन ने
अपने ही मुल्क में अजनबी बना दिया।
नौ महीने का मौन
हिरोशिमा और नागासाकी के मृतकों के लिए, जहां मौत बरसी
चमड़ी, जमीन, फौलाद और कंक्रीट की हर पर्त को उधेड़ती हुई,
जहां बचे रह गए लोग इस तरह चलते फिरते रहे जैसे कि जिंदा हों।
एक साल का मौन वियतनाम के लाखों मुर्दों के लिए….
कि वियतनाम किसी जंग का नहीं, एक मुल्क का नाम है…..
एक साल का मौन कंबोडिया और लाओस के मृतकों के लिए जो
एक गुप्त युद्ध का शिकार थे…. और जरा धीरे बोलिए,
हम नहीं चाहते कि उन्हें यह पता चले कि वे मर चुके हैं।
दो महीने का मौन
कोलंबिया के दीर्घकालीन मृतकों के लिए जिनके नाम
उनकी लाशों की तरह जमा होते रहे
फिर गुम हो गए  और जबान से उतर गए।

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूं।
एक घंटे का मौन एल सल्वादोर के लिए
एक दोपहर भर का मौन निकारागुआ के लिए
दो दिन का मौन ग्वातेमालावासियों के लिए
जिन्हें अपनी जिंदगी में चैन की एक घड़ी नसीब नहीं हुई।
45 सेकेंड का मौन आकतिआल, चिआपास में मरे 45 लोगों के लिए,
और पच्चीस साल का मौन उन करोड़ों गुलाम अफ्रीकियों के लिए
जिनकी कब्रें समुंदर में हैं इतनी गहरी कि जितनी ऊंची कोई गगनचुंबी इमारत भी न होगी।
उनकी पहचान के लिए कोई डीएनए टेस्ट नहीं होगा, दंत चिकित्सा के रिकार्ड नहीं खोले जाएंगे।
उन अश्वेतों के लिए जिनकी लाशें गूलर के पेड़ों से झूलती थीं
दक्षिण, उत्तर, पूर्व और पश्चिम
एक सदी का मौन
यहीं इसी अमरीका महाद्वीप के करोड़ों मूल बाशिंदों के लिए
जिनकी जमीनें और जिंदगियां उनसे छीन ली गईं
पिक्चर पोस्टकार्ड से मनोरम खित्तों में…..
जैसे पाइन रिज वूंडेड नी, सैंड क्रीक, फालन टिंबर्स, या ट्रेल ऑफ टियर्स।
अब ये नाम हमारी चेतना के फ्रिजों पर चिपकी चुंबकीय काव्य-पंक्तियां भर हैं।
तो आप को चाहिए खामोशी का एक लम्हा
जबकि हम बेआवाज हैं
हमारे मुंहों से खींच ली गई हैं जबानें
हमारी आंखें सी दी गई हैं
खामोशी का एक लम्हा
जबकि सारे कवि दफनाए जा चुके हैं
मिट्टी हो चुके हैं सारे ढोल।

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूं
आप चाहते हैं एक लम्हे का मौन
आपको गम है कि यह दुनिया अब शायद पहले जैसी नहीं रह जाएगी
इधर हम सब चाहते हैं कि यह पहले जैसी हर्गिज न रहे।
कम से कम वैसी जैसी यह अब तक चली आई है।
क्योंकि यह कविता 9/11 के बारे में नहीं है
यह 9/10 के बारे में है
यह 9/9 के बारे में है
9/8 और 9/7 के बारे में है
यह कविता 1492 के बारे में है।
यह कविता उन चीजों के बारे में है जो ऐसी कविता का कारण बनती हैं
और अगर यह कविता 9/11 के बारे में है, तो फिर:
यह सितंबर 9, 1973 के चीले देश के बारे में है,
यह सितंबर 12, 1977 दक्षिण अफ्रीका और स्टीवेन बीको के बारे में है,
यह 13 सितंबर 1971 और एटिका जेल, न्यूयार्क में बंद हमारे भाइयों के बारे में है।
यह कविता सोमालिया, सितंबर 14, 1992 के बारे में है।
यह कविता हर उस तारीख के बारे में है जो धुल-पुंछ रही है और मिट जाया करती है
यह कविता उन 110 कहानियों के बारे में है जो कभी कही नहीं गईं,
110 कहानियां इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में जिनका कोई जिक्र नही पाया जाता,
जिनके लिए सीएनएन, बीबीसी, न्यूयार्क टाइम्स और न्यूजवीक में कोई गुंजाइश नहीं निकलती।
यह कविता इसी कार्यक्रम में रुकावट डालने के लिए है।

आपको फिर भी अपने मृतकों की याद में एक लम्हे का मौन चाहिए?
हम आपको दे सकते हैं जीवन भर का खालीपन:
बिना निशान की कब्रें
हमेशा के लिए खो चुकी भाषाएं
जड़ों से उखड़े हुए दरख्त, जड़ों से उखड़े हुए इतिहास
अनाम बच्चों के चेहरों से झांकती मुर्दा टकटकी
इस कविता को शुरू करने से पहले हम हमेशा के लिए खामोश हो सकते हैं
या इतना कि हम धूल से ढंक जाएं
फिर भी आप चाहेंगे कि
हमारी ओर से कुछ और मौन

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो रोक दो तेल के पंप
बंद कर दो इंजन और टेलिविजन
डूबा दो समुद्र सैर वाले जहाज
फोड़ दो अपने स्टॉक मार्केट
बुझा दो ये तमाम रंगीन बत्तियां
डिलीट कर दो सारे इंस्टेंट मैसेज
उतार दो पटरियों से अपनी रेलें और लाइट रेल ट्रांजिट।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन, तो टैको बैल की खिड़की पर्र ईंट मारो,
और वहां के मजदूरों का खोया हुआ वेतन वापस दो। ध्वस्त कर दो तमाम शराब की दुकानें,
सारे के सारे टाउन हाउस, व्हाइट हाउस, जेल हाउस, पेंटहाउस और प्ले बॉय।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो रहो मौन ‘सुपर बॉल’ इतवार के दिन
फोर्थ ऑफ जुलाई के रोज
डेटन की विराट 13 घंटे वाली सेल के दिन
या अगली दफे जब कमरे में हमारे हसीं लोग जमा हों

और आपका गोरा अपराधबोध आपको सताने लगे।
अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो अभी है वह लम्हा
इस कविता के शुरू होने से पहले।
(11 सितंबर, 2002)

जाहिर है कि 9/11 की घटना के लिए अमेरिका द्वारा दोषी करार दिए गए ओसामा की हत्या के बाद भी अमेरिका से यारी बढ़ाने की बजाए उसकी शैतानियत की लंबी फेहरिश्त के मद्देनजर उसके वास्तविक मंसूबों पर निगाह रखना ज्यादा जरूरी है। आतंकवाद की सचाइयों और साम्राज्यवाद के साथ उसके रिश्ते के आधार को जानना-समझना भी जरूरी है, जैसा कि फिल्मकार माइकल मूर ने अपनी बेहद लोकप्रिय डाक्यूमेंट्री फैरेनहाइट 9/11 में इसका खुलासा किया था कि किस तरह बुश और ओसामा के खानदान के बीच तेल के धंधे में साझीदारी थी। और उनके बीच टकराव में इस धंधे की भी बड़ी भूमिका रही। एक बाद तो तय है कि ओसामा जैसों का आतंकवाद दुनिया से साम्राज्यवाद का नाश नहीं कर सकता और अमेरिकी साम्राज्यवाद जब तक रहेगा तब तक आतंकवाद खत्म नहीं हो सकता।

कश्मीर को बनाया जा रहा है, प्रेत-प्रश्‍न : प्रभु जोशी

कश्‍मीर की संवदेशनशीलता को समाने रख वहां से सेना को हटाए जाने का वि‍रोध कर रहे हैं वरि‍ष्‍ठ पत्रकार और लेखक प्रभु जोशी-

अब हमें यह स्वीकारने में कोई शर्म नहीं अनुभव होना चाहिए कि भारत एक निहायत ही कमजोर बौद्धिक आधार वाला बावला समाज है, जिसे इन दिनों ‘उदारीकरण’ के उन्माद ने ऐसे गुब्बारे में बदल दिया है, जिसकी हवा किसी भी दिन आसानी से निकाली जा सकती है। बस इतना भर मान लेना चाहिए कि चूंकि अमेरिका उसे एक बड़े बाजार के रूप में देख रहा है, इसलिए उसका ‘फुगावा’, हाथी के उन दांतों की तरह बाहर दिख रहा है, जिनसे खाने का काम लेना असंभव है।

यहां यह नहीं भूल जाना चाहिए कि ‘रिंग-काम्बिनेशन‘ की तरह ख्यात सूचना के निर्माण, विपणन और वितरण वाली कम्पनियों द्वारा धीरे-धीरे उसे एक खोखले मुगालते में उतार दिया गया है कि वह इस भूमण्डलीकृत विश्‍व में स्वयं को सूचना-प्रौद्योगिकी का महारथी समझने लगा है, जबकि हकीकतन उसकी हैसियत स्वर्णाभूषणों की दूकानों के बाहर बैठे रहने वाले उन कारीगरों की-सी है, जो गहने चमकाने का काम करते हैं। दरअस्ल, माइक्रोसाफ्ट उत्पाद अमेरिका बनाता है और भारत उसको महज अपडेट करने की कारीगरी करता है। जहां तक चीन का सवाल है, उसके सामने इसकी हैसियत उस आत्मग्रस्त ऊंट की तरह है, जिसमें पहाड़ की तरफ देखने वाली सहज बुद्धि का अकाल पड़ गया है। उसकी सरकार भी देश की भूख और भूगोल को भूल कर भुलावे को ऐसी भोंगली में घुस गयी है, जहां से वह सिर्फ स्टाक एक्सचेंज के ग्राफ में डुंकरते साण्डे के सींगों के सहारे अर्थ-व्यवस्था में उछाल की उम्मीद करती रहती है। उसकी सफलता के सारे सूत्र ‘विकास दर’ के दरदराते नांदीपाठ में समाहित हैं। वह लगातार ‘बाजार-निर्मित आशावाद‘ के आधार पर यह प्रचारित कर रही है कि जल्दी ही आंकड़ा दस के पार हुआ कि वह मंदी की मारामारी में भी महाबली हो जायेगा, लेकिन असलियत यह कि वह बली नहीं, निर्बली है। इसका प्रमाण कश्मीर के मुद्दे पर उसकी सत्ता के कर्णधारों के वे उदगार हैं, जो सांध्यभाषा में मूलतः लीपापोती की लीला में लगे हुए हैं।

उहोंने जैसे अपनी भू-राजनीतिक समझ को ताक पर रखकर घाटी में फैलती आग के आगे पर्दा खींच दिया है- और उस पर्दे पर वह गरीब भारत के हिस्से की पूंजी को फूंकता हुआ, इण्डिया के जश्‍न, जोश और जुनून में है। उसके कानों में अभी तक एक ही धुन गूंजती रही है, जिसमें इंडिया के बुलाये जाने का खेलराग है। जबकि कूटनीति के कुरूक्षेत्र में असली खेल चीन का चल रहा है, जिसकी तरफ उसका ध्यान ही नहीं है। पिछले दिनों जब कश्मीर की राजनीति के युवराज ने लगभग हड़काऊ शैली में यह कह दिया कि कश्मीर को बार-बार भारत का अभिन्न अंग बताने के होहल्ले की जरूरत नहीं है, कश्मीर का भारत में ‘विलय‘ नहीं हुआ है, तो सत्ताधीशों द्वारा उल्टे मीडिया को कोसना शुरू हो गया कि वे उमर की सहज-सरल बात को बतंगड़ बनाये दे रहे हैं ताकि वह ‘भड़़काऊ‘ बन सके। वह तो विलय संबंधी ऐतिहासिक करार की तरफ इशारा भर कर रहे हैं। निश्‍चय ही यह समझ से परे है कि वे ऐसी भोली भाषा के आवरण में उमर की टिप्पणी के भीतर लपट बन सकने वाली चिनगारी को क्यों छुपा रहे हैं ? जबकि, उमर ‘इतिहास के प्रेत’ को फिर से जगाने की कोशिश कर रहे हैं। यह उनके दादा की आंख में जीवन भर अर्द्धमृत से दफ्न स्वप्न में पूर्ण प्राण फूंकने की दबी हुई इच्छा का सिर उठाना ही है। क्योंकि उनके दादा ने भी नेहरू से मैत्री के बावजूद सन् तिरेपन के आसपास आजाद कश्मीर का मामला उठ पड़ा था। कहने की जरूरत नहीं कि यह ऐसे ही नहीं हो गया कि उमर के दो वर्षीय शासन के दौरान ही ऐसा पहली बार हुआ कि छोटे-छोटे मासूम से दिखाई देने वाले किशारों तक के हाथों में पत्थर आ गये। उमर ने अपनी टिप्पणी में साफ लफ्जों में यह कह दिया कि कश्मीर के युवाओं द्वारा हिंस्र रास्ता चुन लेने के पीछे आर्थिक और बेरोजगारी जैसे कारण नहीं है। यह शत-प्रतिशत सही भी है कि क्योंकि कश्मीर को पैकेज के रूप में केन्द्र अपना खजाना उदारता से उलीचता रहा है। सन् 89 से अभी तक वह अस्सी हजार करोड़ रूपये दे चुका है, जिसमें से लगभग सत्तर हजार करोड़ के खर्च का राज्य के पास कोई हिसाब-किताब ही नहीं है कि वह कहां और कैसे खर्च किया गया। और सर्वदलीय प्रतिनिधि मण्डल की अनुशंसा पर प्रधानमंत्री सौ करोड़ के पैकेज की घोषणा पहले ही कर चुके हैं।

कहीं ऐसा तो नहीं कि ‘कन्ज्यूमरिज्म‘ की वकालत करने वाली हमारी इस सरकार को यह इलहाम हो चुका हो कि वह कश्मीर में शांति और साम्प्रदायिक-सौहार्द्र का इस तरह से पूंजी के बल पर सुरक्षित सौदा पटा लेगी। वह कदाचित यह भूल चुकी है कि कश्मीर अब देश का परम्परागत अर्थों में राज्य नहीं बल्कि अलगाववादियों की सुनियोजित रणनीति ने उसे एक इस्लामिक इथनोस्केप में बदल दिया है। गैर-मुस्लिम आबादी के प्रतिशत को हिंसात्मक कार्यवाही से नृशंस अलगाववादियों ने जैसे ही कम किया, उसके अंदर शत-प्रतिशत की उतावली इतनी बढ़ चुकी है कि वे कश्मीरी पण्डितों के पश्‍चात अब सिक्खों को भी कश्मीर से खदेड़ कर बाहर कर देना चाहते हैं। उन्हें पैकेज नहीं भूगोल के बंटवारे के साथ पूरी आजादी चाहिए। अब वे जर्जर हो चुके पाकिस्तान के बलबूते नहीं, चीन के पाकिस्तान पर बढ़े वरदहस्त में संभावना देख रहे हैं। क्योंकि, चीन ने पाक अधिकृत कश्मीर में करोड़ों डॉलर का निवेश किया है और उसे वह उत्तरी पाकिस्तान कहता है। हाल ही में अमेरिका ने वहां लगभग दस हजार चीनी सैनिकों की उपस्थिति के बारे में सूचना दी थी, हालांकि चीन ने इसके प्रति उत्तर में कहा कि वह वहां बाढ़ की संकटग्रस्त स्थिति में मानवीय मदद के लिए पहुचा है, लेकिन ये कूटनीतिक झूठ हैं। उसकी पूरी रूचि सामरिक आधार की वजह से है। उन्होंने पाकिस्तान और चीन के बीच आमदरफ्त के लिए कराकोरम राजमार्ग पूरा कर लिया है- स्मरण रहे यह वही इलाका है, जिसे पाकिस्तान ने जंग के जरिये हमसे हथियाया और सड़क निर्माण हेतु चीन के जिम्मे कर दिया। यह एक तरह से उस क्षेत्र का सामरिक हस्तान्तरण है।

बेचारे जॉर्ज फर्नांडिस ने केन्द्र में रक्षामंत्री रहते हुए एक दफा यह कह भर दिया था, जो कि शत-प्रतिशत सही भी था कि पाकिस्तान नहीं, हमारा पहले नम्बर का शत्रु तो चीन है। लेकिन, इस वक्तव्य से हंगामा मच गया। हालांकि यह एक रक्षामंत्री की कूटनीतिक दृष्टि से एक असावधान टिप्पणी थी, लेकिन वही हमरी सीमाओं का कटु सत्य भी था और है भी उसने पिछले एक दशक में अपनी कूटनीतिक हैसियत ऐसी बना ली है कि हमारे सारे पड़ोसी अर्थात् नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और म्यांमार भी पूरी तरह से चीन की छत्रछाया में जा चुके हैं। सामरिक स्तर पर आज भारत एकदम अकेला है और परिणामस्वरूप वह बार-बार कश्मीर के बारे में जबानी जमा खर्च से ज्यादा कुछ नहीं कर सकता। कश्मीर के मुद्दे पर अभी तक रूस की तरह कोई मुल्क स्पष्ट पक्षधरता के साथ नहीं है।

मुझे याद है, बीबीसी आज तक के हमारे कश्मीर को अपने प्रसारणें में भारत अधिकृत कश्मीर कहता है। एकदफा दिल्ली की एक कार्यशाला में आये बीबीसी एक प्रोड्यूसर से मैंने बीबीसी की बहु-प्रचारित तटस्थता की नीति के विरूद्ध टिप्पणी करते हुए अपनी आपत्ति दर्ज की कि जिस निष्पक्ष प्रसारण की आप बात करते हैं, मैं पूछना चाहता हूं कि फॉकलैण्ड के युद्ध के समय बीबीसी ने फॉकलैण्ड में श्रीमती मार्गट थेचर की कार्यवाही के विरोध में एक भी शब्द नहीं कहा। कश्मीर के मामले में बीबीसी हमेशा थोड़ा बहुत भू-भाग ले देकर झगड़ा निपटाने की बात करता है, लेकिन क्या आपने अभी तक फॉकलैण्ड के बारे में सोचा, जिस पर आपने अब तक अपना कब्जा नहीं छोड़ा है, जबकि वह ब्रिटेन से लगभग ढाई हजार किलोमीटर दूर है। और आप साढ़े सात सौ साल से वहां लड़़ रहे हैं ? कश्मीर के संदर्भ में जब-तब इमनेस्टी इंटरनेशनल के बहाने से भारत की भर्त्सना की जाती रही है।

बहरहाल, कश्मीर में जिस तरह की स्थिति बन चुकी है, भारत को पश्‍चि‍म के नैतिकतावाद के झांसे में आकर मुल्क को एक बार फिर विखण्डन की ओर धकेलने की सोचना भी नहीं चाहिए। एमनेस्टी इंटरनेशनल भारत को अपनी रिपोर्ट में मानवाधिकार उल्लंघन के लिए धिक्कारती रहे, लेकिन हमने उसे यह तय करने का अधिकार कतई नहीं दिया है कि वह हमारी भू-राजनीति समस्या को बढ़ा कर अधिक विराट बनाते हुए, पाकिस्तान के पक्ष में परोक्ष आधार गढ़ती रहे।

पश्‍चि‍म की प्रेस में जख्मी जहन और आंसूतोड़ भाषा में लिखे गये लेखों से जो मानवतावादी रूदन भारत की भर्त्सना में चलता है, और ये ही लोग है, जिसने भारत के अभिन्न भूभाग को ग्रीस-तुर्की, जर्मनी-चेकोस्लोवा किया, पौलेण्ड-जर्मनी, बोसनिया-सर्बिया ही नहीं, क्यूबा और अमेरिका की तरह व्याख्यायित करने की धूर्तता शुरू कर रखी है। हमें इस तरह की व्याख्याओं के दबाव में आकर भारतीय सेना को कश्मीर से हटाये जाने के बारे में स्वप्न में भी नहीं सोचना चाहिए। क्योंकि कश्मीर एक बहुत संवेदनशील राज्य नहीं बल्कि खासा विस्फोटक सीमावर्ती राज्य है, जहां से सेना के हटाने का अर्थ कश्मीर को भारत से अलग करने की पूरी गारंटी दे देना है। यहां तक कि वहां सीमित स्वायत्ता की बात करना यानी दृष्टिहीन राजनीति के द्वारा रचा जाने वाला ‘पैराडाइज लास्ट‘ ही होगा।

यह एल्विन टॉफलर द्वारा सातवें दशक के उत्तरार्द्ध में बड़े राष्ट्रों के विघटन की जो भविष्योक्ति अपनी पुस्तक ‘तीसरी लहर‘ में की गयी थी, वह सच हो जायेगी। क्योंकि, रूस में सबसे पहले आर्मेनिया में ही उथल-पुथल शुरू हुई थी। तब किसी पता था कि एक दिन महाशक्ति की तरह जाने वाला रूस मात्र दस वर्षों के भीतर सोलह टुकड़ों में विखण्डित हो जायेगा। लेकिन नब्बे के दशक में अचानक गोर्बाचोव नामक एक जनप्रिय नेता का उदय होता है और वह ‘ग्लासनोस्त‘ तथा ‘पेरोस्त्रोइका‘ जैसी उदारवादी धारणाओं को नवोन्मेष के नाम पर लागू करता है, जिसके चलते ‘आधार‘ (बेस) में परिवर्तन होता है और ‘अधिरचना‘ (सुपर स्ट्रक्चर) ढह जाती है। हमारे यहां भी परिवर्तन की शुरूआत ‘आधार’ में की गई और अभी हमारी सारी ‘अधिरचना’ की चूलें हिल चुकी हैं। एक चौतरफा बदहवासी है, भूख है, बढ़ती बेरोजगारी है, खाद्य सामग्री महंगाई है- भ्रष्टाचार की दर ऊंची है और विकास के ग्राफ की असमानता है, इसीलिए अब हमें हमारा बुन्देलखण्ड, हमारा बघेलखण्ड चाहिए। ऐसी मांगों के बीच यदि कश्मीर को स्वायत्ता देने की ओर हम बढ़ते हैं तो बहुत जल्दी भारत भी बहुवचन में बदल जायेगा।

निश्‍चय ही इसके टुकड़े रूस से कहीं ज्यादा होंगे। हम चाहेंगे कि ऐसे सोच से हमारी सरकार दूर ही रहे। क्योंकि, हम कभी नहीं चाहेंगे कि वक्त एक दिन इतिहास के सफों पर मनमोहन सिंह को पगड़ी में गोर्बाचोव कहने को मजबूर हो जाये।

इसलिए बिदा करना चाहते हैं, हिंदी को हिंदी के अखबार : प्रभु जोशी

सवाल सिर्फ भाषा का नहीं : अनुराग

भाषा के मुद्दे पर हम 63 साल पहले जहां थे, आज भी वहीं खड़े हैं। इसका सर्वमान्य हल नहीं निकाल पाना हम सबके लिए शर्म की बात है। इसी वजह से समय-समय पर भाषा को लेकर विवाद भी उत्पन्न हुए हैं। 
रूस में बोली जाने वाली अवार भाषा के जनकवि रसूल हमजातोव ने मेरा दागिस्तान में प्रसिद्ध लोककवि अबूतालिब के साथ घटित एक रोचक किस्से का वर्णन किया है। किस्सा यों है-
अबूतालिब एक बार मास्को में थे। सड़क पर उन्हें किसी राहगीर से कुछ पूछने की आवश्यकता हुई। शायद यही कि मंडी कहां है? संयोग से कोई अंग्रेज ही उनके सामने आ गया।
अंग्रेज अबूतालिब की बात न समझ पाया और पहले तो अंग्रेजी, फ्रांसीसी, स्पेनी और शायद दूसरी भाषाओं में पूछताछ करने लगा।
 अबूतालिब ने शुरू में रूसी, फिर लाक, अवार, लेजगीन, दार्गिन और कुमीक भाषाओं में अंग्रेज को अपनी बात समझाने की कोशिश की।
आखिर एक-दूसरे को समझे बिना वे दोनों अपनी-अपनी राह चले गए। एक बहुत ही सुंस्कृत ने जो अंग्रेजी भाषा के ढाई शब्द जानता था, बाद में अबूतालिब को उपदेश देते हुए कहा, ”देखा, संस्कृति का क्या महत्व है? अगर तुम कुछ अधिक सुसंस्कृत होते तो अंग्रेज से बात कर पाते। समझे न।”
”समझ रहा हूं।” अबूतालिब ने जवाब दिया, ”मगर अंग्रेज को मुझसे अधिक सुसंस्कृत कैसे मान लिया जाए? वह भी तो उनमें से एक भी जबान नहीं जानता था, जिनमें मैंने उससे बात करने की कोशिश की।”
हमारे मन में अपनी मातृभाषा और देश की भाषाओं के लिए अबूतालिब की तरह स्वाभिमान नहीं, बल्कि कुंठा है। इसी का परिणाम है कि हम भारतीय भाषाओं और संस्कृति की बात करने वाले को दकियानूसी और पिछड़ा मानते हैं। अंग्रेजी भाषा व संस्कृति को अपनाने वालों को सम्मान की दृष्टि से देखते हुए उन्हें आधुनिक तथा प्रगतिशील होने का खिताब देते हैं। अंग्रेजी का ज्ञान नहीं होने पर अंग्रेजीदा तो हमारी उपेक्षा करते ही हैं, किंतु हम भी स्वयं को हीन व लज्जित महसूस करते हैं।
अंतर्राष्ट्रीयता का हवाला देकर ऐसा भ्रमजाल फैलाया गया कि मानो प्रत्येक भारतीय को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जाकर काम करना है। इसलिए हर किसी के लिए अंग्रेजी सिखना जरूरी है। इसी भ्रमजाल के कारण हम अपने बच्चों को महंगे से महंगे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं। इन स्कूलों में डोनेशन के नाम पर मोटी रकम भेंट चढ़ाई जाती है। यह शिक्षा पद्धति बहुत महंगी भी है। अपनी सीमित आय होने के कारण इसके लिए आर्थिक अपराधों की शरण में जाना पड़ता है। अत: अप्रत्यक्ष रूप से यह शिक्षा पद्धति भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा देती है।
अंग्रेजी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करने का सबसे बड़ा नुकसान प्रतिभा का हृास है। बच्चा जब प्राथमिक शिक्षा प्रारंभ करता है तो वह उसके बहुमुखी विकास की उम्र होती है। तब उसे विदेशी भाषा का ज्ञान प्राप्त करने के लिए बाध्य किया जाता है। इससे उसके विकास पर प्रतिकूल असर पड़ता है। वह बड़ा होकर प्रतियोगिताओं की तैयारी करता है तो अंग्रेजी फिर अड़चन पैदा करती है। प्रतियोगी को जो समय अपने विषय के गहरे अध्ययन में लगाना चाहिए, वह समय उसे अंग्रेजी के अध्ययन में लगाना पड़ता है। वह जब सरकारी या गैर सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करता है तो यहां पर भी सबसे पहले अंग्रेजी का ज्ञान होना आवश्यक है। योग्य से योग्य व्यक्ति को भी अंग्रेजी का ज्ञान न होने पर या कम होने पर अयोग्य करार दिया जाता है। ऐसे में हीन भावना आना स्वाभाविक है।
 भारत में अभी भी करीब 35 फीसदी लोग अशिक्षित हैं। देश के एक बड़े हिस्से में प्राथमिक शिक्षा की समुचित व्यवस्था तक नहीं है। और जहां व्यवस्था है भी, वहां सब रामभरोसे चल रहा है। ऐसे में अंग्रेजी की वकालत करना समझ से परे है।
असल में गुलामी के दौरान ही एक ऐसे वर्ग ने जन्म ले लिया था, जिसे देश-समाज से कुछ लेना-देना नहीं था। यह वर्ग आजादी भी नहीं चाहता था। इस वर्ग का मकसद अंग्रेजों के प्रति वफादारी साबित कर सत्ता सुख भोगना था। इसके लिए इसने खुद को अंग्रेजी रहन-सहन में ढालना शुरू कर दिया। यह वर्ग जबान भी अंग्रेजों की बोलता। अंग्रेजों से नजदीकी साबित करने के लिए भारतीयों से दूरी बनाना इसकी मजबूरी थी। इसे श्रेष्ठता का दंभ होने लगा। अन्य लोगों को यह गंवार और जाहिल समझाता। दुर्भाग्यवश आजादी के बाद सत्ता की कुंजी इसी वर्ग के हाथ में आई। यह वर्ग तो चाहता ही नहीं कि मात्र एक भाषा से उन्हें जो श्रेष्ठता मिली है, वह छीन जाए।
भाषा को लेकर प्राथमिक स्तर से ही प्रयास किए जाने की जरूरत है। दस मिन्स टेन, जिस बच्चे को यह बताना पड़ रहा हो, उसे हिंदी में काम करने की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। हमें नहीं भूलना चाहिए कि जिस भी देश ने भी तरक्की की है, अपनी मातृभाषा में ही है। यदि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान हिंदी में उपलब्ध नहीं है तो यह हिंदी की नहीं, शासक वर्ग की कमी है। हिंदी के प्रचार-प्रचार के नाम पर तमाम तरह की नौटंकी करने की बजाए, विश्व ज्ञान-विज्ञान, साहित्य हिंदी में उपलब्ध कराया जाए। एक अनुमान के अनुसार भारत में हिंदी में बोलने वाले 40 प्रतिशत से अधिक है, जबकि अंग्रेजी बोलने वाले मात्र 0.021 प्रतिशत हैं। आज हिंदी किसी प्रदेश या देश तक सीमित नहीं रही। भारत से बाहर फीजी, मारीशस, गायना, सूरीनाम, त्रिनिदाद, अरब, अमीरात, इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा आदि कई देशों में लोग इसे दैनिक व्यवहार में लाते हैं। तकनीकी विकास के चलते आज हिंदी में एसएमएस, ईमेल आदि सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। इंटरनेट पर भी हिंदी का साम्राज्य बढ़ा है।
और यदि अंग्रेजी ही राजभाषा के काबिल है तो फिर हिंदी पखवाड़ा और हिंदी सप्ताह जैसे ढोंग करने की क्या जरूरत है? क्यों मंत्रालयों और विभागों में हिंदी अधिकारी नियुक्त कर करोड़ों रुपए बर्बाद किए जा रहे हैं? क्यों हिंदी अकादेमी, हिंदी विश्वविद्यालय खोले जा रहे हैं? जो भाषा इस देश के काबिल ही नहीं है और जिसमें इस देश की कार्यपालिका,  न्याय पालिका और विधायिका काम नहीं कर सकती है, उसके प्रचार-प्रचार के लिए क्यों देश की धन, श्रम और समय नष्ट किया जा रहा है?
भाषा के मुद्दे को और टालने की बजाए, तुरंत समाधान किया जाना चाहिए। इसके लिए दृढ़ इच्छा शक्ति की जरूरत है। इसका राजनेताओं में अभाव है। इसलिए इनसे अपेक्षा करना बेकार है। जब पूरे देश में आंदोलन शुरू हुए, तभी आजादी मिल सकी। आज ऐसे ही देशव्यापी आंदोलन की जरूरत है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाषा का मसला, आजादी से कम महत्वपूर्ण नहीं है।

संस्थानों और कार्यालयों से बाहर निकले हिंदी : शरणकुमार लिम्बाले

हमारे देश में बहुत-सी भाषाएं हैं। और उनकी कई बोलियां हैं। हर बोली की अपनी-अपनी आंचलिक विशेषता है। इनकी लिपि भी अलग-अलग है। इससे भी हिंदी के प्रचार-प्रसार में रुकावट पैदा होती है। इसके अलावा हिंदी को राष्टरभाषा बनाने के लिए जो राजनीतिक इच्छा शक्ति होनी चाहिए, वह किसी भी पार्टी में नहीं है।
भारत में करीब डेढ़ सौ साल तक ब्रिटिश की राजसत्ता रही। यहां से गोरे ब्रिटिश चले गए, लेकिन काले रह गए। ब्रिटिश मानसिकता हमारे में बहुत ज्यादा काम करती है। जो बाबू-अधिकारी हैं, वे रहन-सहन और विचार में अभी भी अंग्रेजी को बनाए हुए हैं। अंग्रेजी बोलने से प्रतिष्ठा मिलती है। फाइव स्टार का वेटर भी अंग्रेजी बोलता है।
केवल दिल्ली में या केंद्र सरकार के कार्यालयों में रहने से हिंदी का प्रचार-प्रसार नहीं होगा। हमारा देश केवल सरकारी संस्थाओं में नहीं है। वह बहुत फैला हुआ है। हिंदी के साहित्य का प्रादेशिक भाषाओं में और प्रादेशिक भाषाओं के साहित्य का हिंदी में अनुवाद किया जाना चाहिए।
पंचवर्षीय योजना में सड़कों, पुलों, बांध आदि पर ध्यान दिया जाता है। लेेकिन देश जो सांस्कृति-सामाजिक जीवन जीता है, वह भाषा के माध्यम से जीता है। जितने जरूरी सड़क, बांध आदि हैं, उतनी ही जरूरी भाषा भी है। इसलिए पंचवर्षीय योजना में भाषा के विकास पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।
सप्ताह-पखवाड़ा से मनाने से कुछ भी नहीं होने वाला है। वास्तव में इन्हीं लोगों ने हिंदी को बंधक बना रखा है। इसके विकास के लिए इसे संस्थानों और कार्यालयों से बाहर निकलना होगा।
- मराठी के चर्चित लेखक और साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित

हिंदी राष्ट्र की अस्मिता की भाषा है : बालशौरि रेड्डी

मैंने गांधीजी से हस्ताक्षर लेकर हिंदी सीखी। उन्होंने 21 जनवरी, 1946 को दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की रजत जयंती समारोह का उद्घाटन किया था। उन्होंने कहा था कि बहुत जल्द ही देश आजाद होने जा रहा है। आजाद भारत हिंदुस्तान की  राष्ट्रभाषा हिंदी होगी। अत: में महिलाओं तथा युवाओं से अपील करता हूं कि आप लोग अभी से हिंदी सीखना आरंभ करें ताकि हिंदुस्तान का आजाद होती ही जनता की भाषा में शासन का कार्य संपन्न हो सके। गांधीजी का यह सपना आज तक हम लोग साकार नहीं कर सके।
किसी भी स्वतंत्र राष्टर का अपना संविधान, राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान और राष्ट्रभाषा होती है। किसी भी देश के लिए विदेशी भाषा कभी भी  राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती। जब टर्की आजाद हुआ तो कमलपाशा ने सभी अधिकारियों को बुलाकर कहा, ‘ हमारा देश स्वतंत्र हो गया है। हम तरक्की करना चाहते हैं। बताओ।” सभी ने सुझाव दिए। अंत में कमलपाशा ने कहा, ”आप लोग अपनी घड़ी देखो। इसी सैकेंड से टर्की की राजभाषा तुर्की है। जाओ काम करो।” ऐसे काम होता है।
1950 में संविधान में हिंदी को स्वीकृति मिली। यह बताया गया कि 15 वर्ष के बाद हिंदी अंग्रेजी का स्थान ग्रहण करेगी ओर हिंदी प्रशासनिक भाषा होगी। लेकिन 1963 में इसमें संशोधन हुआ कि जब तक हिंदीत्तर भाषा के तीन चौथाई सांसद स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक ऐसा नहीं होगा। अब तो यह विवाद का विषय बन गया है।
1965 में जब लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने, उन्होंने सोचा कि देश के विकास के लिए पंचवर्षीय योजना क्रियांवित करते हैं, लेकिन भाषा के लिए अब तक जो प्रयास हुआ नगण्य है। उन्होंने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को दिल्ली आमंत्रित किया। तीन दिन तक गहन चर्चा हुई। इसके बाद सर्वसम्मित से प्रस्ताव पारित हुआ कि सभी राज्य त्रि-भाषा सूत्र पर अमल करेंगे। इसके अनुसार पहली भाषा के रूप में मातृभाषा, दूसरी के रूप में हिंदी और तीसरी के रूप अंग्रेजी पढ़ाई जानी थी। आंध्र, केरल और कर्नाटक में इसका अनुपालन हुआ। हरियाणा में थोड़े प्रयास हुए। उत्तर प्रदेश में तेलुगु को कुछ जगह पढ़ाया गया। लेकिन इस सूत्र पर गंभीरता से काम नहीं हुआ।  
देश में रेल विभाग, वित्त विभाग, सेना आदि कई विभाग एक हैं। लेकिन शिक्षा नीति प्रदेश सरकारो के हाथ में है। वहां के शिक्षा मंत्री पाठ्यक्रम तैयार करते हैं। पूरे देश के लिए अगर एक राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनती तो सारे बच्चों को एक प्रकार की शिक्षा मिलती। लेकिन प्रत्येक प्रदेश में वहां के नेताओं के बारे में पढ़ाया जा रहा है। बच्चे सोचते हैं कि यही हमारी दुनिया है। हमारे बीच में एकात्मकता नहीं है। विघटन की प्रवृत्ति है। एक राष्टï्रीय शिक्षा नीति तुरंत बनाई जानी चाहिए। भले ही इसके लिए संविधान में संशोधन करना पड़ा।
हिंदी राष्ट की अस्मिता की भाषा है। मैं पहले भारतीय हूं, उसकेे बाद आंध्रवासी। मेरी मातृभाषा तेलुगु मुझे बहुत प्यारी है क्योंकि वह जन्मघूटी से सीखी हुई भाषा है। हिंदी से कम नहीं मानता और हिंदी के लिए मैं अपनी मातृभाषा की बलि देना भी नहीं चाहूंगा। लेकिन एक भारतीय के नाते संपूर्ण राष्ट के लिए हिंदी को प्रशासनिक और भारत भारती के रूप में अवश्य देखना चाहता हूं।
- तेलुगु के वरिष्ठ लेखक और चंदामामा के पूर्व संपादक