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सशस्त्र होली युद्ध : कमल जोशी

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कोटद्वार तब कस्बे का रूप ले चुका था, पर इसके दिल में गाँव ही धड़क रहा था । मेरी तरह की एक पूरी पीढ़ी पैदा तो कोटद्वार में हुई थी, पर घर का माहौल उस पीढी से संचालित होता था, जो पहाड़ी गांवों से यहाँ आई थी। गांव की इस पीढी़ ने अपनी गाँव की परम्परा और विरासत को अभी छोड़ा नहीं था, पर कस्बे की मानसिकता हम पर हावी हो रही थी। पुरानी पीढी़ को परम्परा को ज़िंदा रखने की जिम्मेदारी थी, पर हम जो यहीं पैदा हुए और पले बढे़ थे। एक अलग मानसिकता में जी रहे थे। हमें विपरीत माहौल में, जहां हम अपेक्षाकृत संसाधनविहीन परिवारों से थे, संसाधन वालों से टक्कर लेनी थी, न केवल जीना था वरन ‘इज्ज़त’ से और आत्म सम्मान से जीना था| संघर्ष वही पुराना और शास्वत था- वर्ग संघर्ष ! ‘हेव्स और हेव नोट’ के बीच का! और अपना सम्मान जुटाने के लिए ‘जुगाड़’ ही हमारा अस्त्र था|

मेरी होली की यादें 1964 से 1968 तक का फ़्लैशबेक है। परिवार अपनी होली गाँव की यादों के साथ गीत गाकर, मीठे स्वालीं (भरी पूरी) बनाकर और होलिका दहन के गीतों के साथ मनाता| मारवाड़ी व्यापारिक लोग अब होलिका दहन की परंपरा अपने हिसाब से मनाते। महिलायें राजस्थानी गीत  गातीं और गोबर के बने विशेष उपलों की माला से होलिका दहन स्थल पर पूजा करतीं। घरों में उनके गुजिया और नमक पारे बनते।

हम बच्चे होली अपने जुगाड़ तंत्र से मनाते। हमारी होली परम्पराओं की कम और वर्ग संघर्ष का नज़ारा थी। साफ़-साफ़ दो वर्ग थे। एक व्यापारी वर्ग के परिवार के बच्चे और कुछ नौकरी पेशा वाले माँ-बाप के बच्चे। ये बच्चे संसाधन युक्त थे। हमारी टक्कर दरअसल ऐसे ही परिवार के बच्चों से होती थी। इनके पास अब कुछ था, बाज़ार का खरीदा हुआ, और हमारे पास था केवल जुगाड़!

होली खेलने के लिए इनके अभिभावक खर्च कर सकते थे और हमें अपना मजा जुगाड़ से पैदा करना होता!

इस तरह होली हमारे लिए सिर्फ एक त्यौहार नहीं था- ये एक उल्लास, कर्मठता, रणनीति और जुगाड़ का समय होता था। आज की तरह बाजार में चायनीज़ टॉय पिचकारी और खुशबू वाले रंग नहीं थे। कैसा माहौल था और क्यों हम रणनीति में उलझते थे, आगे वृतांत में यह खुलासा होगा।

हमारी यानी मेरी और मेरे षड्यंत्रकारी साथियों की उम्र ही होगी यही कोई 12-13 साल। हम बच्चे भी थे और बड़े भी। हम उस परिवार से थे, जहां ये समझा जाता बच्चे को पैसा देने का मतलब उसे बिगाड़ना है! हमें यानी अनिल को और मुझे साल में तीन बार ही खर्चे के लिए पैसे मिलते थे। एक दशहरे के रावण फूंकने के मेले के लिए, जिसमें हम लाल सेलिफेन की पन्नी के बने चश्मे और एक गुब्बारे लगी पिपरी खरीदते। यह बात अलग थी कि‍ घर आते-आते चश्मे टूट जाते और पिपरी की आवाज ख़त्‍म हो जाती। और यदि आवाज कामयाब रही तो पों पों से परेशान घरवाले पिपरी छीन लेते। पर हम हिम्मतवाले अगले साल फिर यही दोहराते। पैसे मिलने का दूसरा मौक़ा होता था, गिंदी के मेले का, जो मवाकोट में होता। यहां नारंगी रंग से सरोबार जलेबी की चाह पिपरी पर भारी पड़ती और पूरे दो आने की ज़लेबी खा जाते। हां, एकाध टुकड़ा साथ आए दोस्त को दे देते, जो अपनी रकम फूटे हुए चश्मे पर गंवा चुका होता। तीसरा मौका खर्च मिलने का होता था- होली। इससे रंग ख़रीदने की जुगत होती थी। पिताजी गीले रंगों के खिलाफ थे। वे गुलाल खरीदकर लाते और हम से कहते कि‍ इसी से होली खेलो। अब आप ही सोचिए कि‍ उस उम्र में क्या सिर्फ सूखी होली खेली जा सकती है? हम मां के पीछे पड़ जाते, रोते, ज़मीन पर पैर घिसटते़। इतने पराक्रम करने के बाद मां हम दोनो भाइयों को चार आने देतीं, इस हिदायत के साथ कि ‘फालतू में मत खर्च करना !’

बाजारी सिंथेटिक रंग उस वक्त जर्मनी से इम्पोर्ट होते थे- महंगे होते। इन रंगों के आने से पहले नारंगी रंग के टेसू के फूलों से ही होली खेलने का प्रचलन था। पहाड़ से लगे मैदानी इलाके के गांवों के ज्यादातर लोग इन्ही फूलों का रंग बनाने के लिए प्रयोग करते थे। मां के दिए इतने कम पैसों में कितना बाजारी रंग आ पाता?

हमारे कस्‍बे के ही व्यापारिक परिवारों और ऊंची आर्थिक स्थिति वाले परिवारों के बच्चे भी होते थे। ये खुलकर बाजारी रंग का इस्तेमाल करते। महंगे बाजारी रंग को हम विशेष दोस्त पर लगाने के लिए बचाते थे और बाकी गीले रंग के लिए हम एडवेंचर ट्रिप पर जाते। कोटद्वार से 12 किलोमीटर दूर, नजीबाबाद जाने वाली सड़क पर टेसू के फूल के पेड़ थे। टेसू माने पलाश या ढाक। फ़रवरी मार्च में इस पर फूलों का उबाल आता है। उबाल ही कहूंगा, क्योंकि‍ उस वक्त इस पर पत्ते नहीं दिखाते, बल्कि ये फूलों की रजाई ओढ़ लेता है।

होली हमारे लिए महंगी पिचकारी और रंग से लैस विरोधियों पर दबदबा बनाने का संघर्ष होती। हम ‘आर्थिक संकुचन’ की वजह से रंग खरीद नहीं खरीद सकते थे। विकल्प के तौर पर हम टेसू के फूलों से रंग बनाने की रणनीति पर काम करते। पर इस पर भी पेंच था। हमारे घरवाले हमें उतनी दूर जाने की इज़ाज़त नहीं देते थे। इसलिए हमें उन्हें बिना बताए टेसू के फूल जमा करने जाना होता था।

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हमारी चुनौती यह होती कि उतनी दूर से टेसू के फूलों को लाया कैसे जाए, वह भी बिना घर वालों के पता चले। इसके लि‍ए ज़रूरी था कि‍ आने-जाने के लिए साइकिल हो। हमारी गैंग के कुछ सदस्य साइकिल-धारी होते थे। वे अचानक महत्वपूर्ण हो जाते। अब हम उनकी चमचागिरी करते और वह भी तात्कालिक महत्व का फायदा उठाते हुए नखरे दिखाते और हमसे उस दौरान होमवर्क से लेकर पहले बैटिंग करने की शर्तें रखते। हम मन ही मन बाद में देख लेने का संकल्प करते हुए उनकी हर बात मानने को मजबूर रहते। कुछ ऐसे दोस्त भी निकल आते जो वैसे तो अपने दम पर बाज़ार से रंग लाकर होली खेल सकते थे, पर हमारे एडवेंचर की बाते सुन हमारे साथ रोमांच के अनुभव के लिए अपनी साइकिल ऑफर कर देते। इन दोस्तों के बावजूद ज्यादा साइकिल की जरूरत होती तो किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश होती, जिसके पास साइकिल हो और दूसरे हमारे गिडगिड़ाने का उस पर प्रभाव हो सकने की गुंजाइश हो। ऐसे लोगों को आईडेंटीफाई कर किन्ही दो-तीन पर ‘जीरो-इन’ किया जाता। उतने ही समूह बना कर उनके पीछे पड़ जाते कि‍ हमें एक दिन के लिए साइकिल उधार दे दो। हम विनीत दिखने की, भीषण आज्ञाकारी होने के और अच्छे बच्चे होने के तमाम सबूत उन्हें देते| चाहे हमारे माता-पिता दयाशील हों ना हों, एकाध सज्जन ऐसे दयावान मिल ही जाते थे कि जो हमें साइकिल देने पर राज़ी होते। पर इस शर्त भी होती कि वह टेस्ट लेंगे कि हमें साइकिल चलानी आती भी है कि‍ नहीं। हम अपने बीच के सबसे कुशल साइकिल चालक का चुनाव कर परीक्षा में पेल देते। वह बेचारा भी कई बार परीक्षक की पैनी निगाहों से घबरा जाता और साइकिल ठीक से चला नहीं पाता, फेल हो जाता तो उस व्यक्ति से साइकिल मिलना कठिन हो जाता। फिर हमें दूसरे ऐसे व्यक्ति को खोजना पड़ता, जिसकी मान मनुव्वल कर साइकिल मिल सकती हो। साइकिलों की व्यवस्था होने के बाद तय होता कि‍ कब टेसू के फूल जमा करने चलना है!

अब होली से तीन-चार दिन पहले का कोई दिन फूल जमा करने के लिए चुन लिया जाता। घर से थैले या पुराने मेजपोश जमा कर किसी एक के घर में रख दि‍ए जाते। इस काम के लिए जगदीश का घर था। उसके पिता नहीं थे। माँ अकेली थीं। उसे घर से होली खेलने के लिए कुछ मिलता नहीं था। सबसे बड़ी बात, उसकी माँ शुरू में तो जंगल जाकर फूल इकठ्ठा करने की मना ही करती थीं। पर जब जगदीश, बिना बाप का इकलौता पुत्र दहाड़ मार-मार कर रोने लगता, तो माँ का दिल पिघल जाता। वह न केवल उसे हमारे साथ जाने की आज्ञा दे देतीं, बल्कि हमारे षड्यंत्र में शामिल भी हो जातीं। यहाँ तक की एक्सपिडिशन–दिवस पर हमारे लिए दस-बारह रोटी भी बना देतीं। एक्सपिडिशन के लिए ऐसा दिन चुना जाता, जो इतवार न हो, क्योंकि इतवार को घर वालों को दिन का हिसाब देना होता। इसलिए स्कूल लगने वाला दिन चुना जाता। साल के इस वक्त स्कूल दिन का हो जाता था यानी सुबह 10 से शाम 5 बजे तक का। एग्जाम नज़दीक होते इसलिए एक्स्ट्रा क्लास का बहाना कर हम 8 बजे ही जगदीश के घर जमा हो जाते और चल पड़ते एक साइकिल पर दो-तीन के हिसाब से अपने थैले लेकर। नजीबाबाद की तरफ जाते हुए ढाल होता। तेज़ी से चले जाते। पता ही नहीं चलता की कब बारह किलोमीटर पूरे हुए। पलक झपकते ही 12 किलोमीटर तय हो जाते और लगता कि‍  सामने सड़क के किनारे के टेसू के पेड़ हमारा ही इंतज़ार कर रहे हैं। साइकिल किनारे खड़ी कर दी जाती। कमज़ोर दिल वाले तो नीचे झड़े हुए फूलों को जमा करने लगते और हम एड्विन्चारिस्ट पेड़ों पर चढ़ कर फूलों भरी टहनी तोड़ कर नीचे गिराते। सारे फूलों को इकट्ठा कर थैलों में और मेजपोश में बांधने का काम नीचे रहने वाले सदस्यों का होता। अब जाने का वक्त होता, तो एक बड़ी समस्या हो जाती। हम में से कुछ अति जोश में पेड़ पर ज्याद ऊपर चढ़ जाते पर वापस उतर नहीं पाते, क्योंकि‍ वापस उतारते वक्त नीचे देखना होता है। नीचे देखते तो पता लगता कि‍ हम कितने ऊपर आ गए हैं! यह सोचते ही पैर कांपने लगते कि पैर फिसला तो कितनी चोट लगेगी। हिम्मत टूटने लगती। अब सारा समूह उन्हें किसी तरह सुरक्षित उतारने में लग जाता। कुछ ऊपर चढ़ कर उसे बताते हुए उतरते कि वह कहाँ पर पैर रखे, कहाँ से टहनी को पकड़े। बाकी सदस्य नीचे से ही निर्देश देते। ये निर्देश उतरने वाले को ज्यादा कन्फ्यूज़ कर देते। कुल जमा बात यह होती कि‍ जितना समय फूल तोड़ने में खर्च होता, उससे डेढ़ गुना पेड़ पर चढ़े महारथियों को उतरने में लगता।

अब तू-तू मैं-मैं का समय होता। बात यह थी कि‍ आते वक्त तो ढाल था। कोई भी आराम से साइकिल चला लेता। वापस आते वक्त काम की थकान तो होती, साथ-साथ चढा़ई भी, ऊपर से डबलिंग यानी दो-दो एक साइकिल पर। फूलों का बोझ अतिरिक्त। जहां आते वक्त सब कहते साइकिल मैं चलाऊंगा-साइकिल मैं चलाऊंगा। जाते वक्त हाल उल्‍टे हो जाते। अब कहते कि‍ साइकिल तू चला–साइकिल तू चला। खैर थोड़ी कहासुनी के बाद मामला सेटल होता कि‍ बारी-बारी से सब चलाएंगे। इस वक्त सबसे सुखी अपने को वह समझते जिन्हें साइकिल चलानी नहीं आती। पर उन्हें खुश कैसे रखा जा सकता था, जब सब दुखी हों? इसलिए उनसे कहा जाता कि‍ तुम साइकिल पर धक्का लगाओ। अब उनकी हंसी गायब हो जाती और वह रस्तेभर साइकिल को धक्का देते आते। वापसी में बस एक सुकून था। रास्ते में गन्ने के क्रशर थे, वहाँ पेराई होती थी। वहां की शर्त एक होती थी की जितने चाहे गन्ने खा लो, पर ले जाने की इज़ाज़त नहीं थी। वहां पर रुक कर गन्ने खाए जाते और एनर्जी रिस्टोर की जाती। गन्ने खाने में हमें समय का ध्यान ही नहीं रहता। कितनी भी जल्दी करते, पर घर पहुँचने में देर हो जाती। अब देर शाम को घर पहुंचते। जिन के घरवाले भले मानस होते वे सिर्फ डांट खाते, हमारे नसीब ये भलमनसाहत नहीं थी इसलिए मार पड़ती। पर हमें और दिनों की अपेक्षा दर्द कम होता था क्योंकि हम टेसू के फूल जो ले आए थे। अगले दि‍न टेसू का रंग बनाने की कल्पना में देर तक नींद नहीं आती और जब आती तो थके शरीर को इतनी नींद आती कि सुबह हमें उठाने के लिए घर वालों को खूब मशक्कत करनी पड़ती|

अब बारी थी, रंग पकाने की। टेसू के फूलों से रंग नि‍कालने के लिए उन्हें पानी में उबालना पड़ता है। अब इतने सारे यानी बोराभर कर जमा किए गए फूलों को उबालने के लिए बर्तन भी बड़ा चाहिए। वह कहाँ से आए। गांव की तरह पंचायत घर के बर्तन तो इस कस्‍बे में होते नहीं थे। हमारी नज़र में एक ही बर्तन रहता था- हज्ज़न मियां का टब। पास के धोबी का बड़ा टब। हज्ज़न चच्चा हमारे शहर के धोबी थे। उनका नाम हज्ज़न मियां क्यों पड़ा, यह भी कथा थी। उन्हें हज जाने की बड़ी तमन्ना थी। पर गरीब आदमी हज जाने का खर्चा कैसे जुटाए ! वे अपने हज जाने की हसरत की और हज की कहानियाँ हर एक को सुनाते थे। शायद इसलिए ही उनका नाम हज्ज़न मियां पड़ गया। अब हमारा सारा गैंग हज्ज़न चच्चा के चक्कर काटने लगता, “चच्चा- एक दिन के लिए हमें टब दे दो।” हम जानते थे कि‍ हम तीन-चार दिन तक टब लौटा नही सकते। पर एक दिन के लिए मांगने पर टब मिल सकता था। और सच बात तो यह भी थी कि‍ हज्ज़न चच्चा भी जानते थे कि‍ अगर ये लोंडे-मोंडे  रंग बनाने के लिए टब ले गए, तो जल्दी वापस मिलेगा नहीं। वह हमारे अनुनय-विनय पर ‘कत्तई नही’ ही जवाब देते। हम सुबह से हज्ज़न चच्चा ‘प्रेसवाले’ के पास आकर बारी-बारी से अनुनय-विनय करते पर हमें ‘कत्तई नहीं’ से ज्यादा जवाब सुनने को नहीं मिलता। वे कहते, “पिछली बार भी दिया था। तुमने उसे काला कर वापस किया। मेरे धोये हुए कपड़े खराब हो गए। मैं दो दिन तक टब धोता रहा।”

हम भगवान से लेकर माँ तक की कसम खाकर उनसे कहते, “चच्चा, इस बार मोसे (धुवें) से काला नहीं करेंगे और धो कर देंगे।” पर हमारी बात सुनकर वह फिर ‘कत्तई नहीं’ कहते और अपने काम में लग जाते। हम हज्ज़न चच्चा की मस्जिद से लगी दुकान पर उन्हें घेर कर बैठ जाते— उदास| दिन के खाने का समय हो जाता। हम भूखे प्यासे बैठे रहते। घर से बार-बार खाना खाने आने के संदेशे आने लगते। पर हम टस से मस नहीं होते| हज्ज़न चच्चा परेशान होने लगते। चहरे का भाव बदले बिना बार-बार कनखियों से हमारी और देखते। बच्चे बिना खाना खाए भूखे प्यासे बैठे हैं। बाहर से कठोर दिखने वाले हज्ज़न चच्चा को यह सहना मुश्किल हो जाता। वह जब इस तरह देखते तो हम समझ जाते कि‍ अब हम जंग जीतने वाले हैं। हम अपना मुंह और लम्बा लटका लेते, पेट पकड़ने लगते मानो भूख से दम निकल रहा हो। अब इससे आगे हज्ज़न चच्चा सह नहीं सकते थे। दो-चार गालियाँ देते और टब देने की हामी भर देते, इस ताकीद के साथ कि‍ ‘हरामियों, टब जैसा साफ़ दिया जा रहा है, वैसे ही साफ़ वापस करना होग!’ हम सब समवेत स्वर में ‘बिलकुल’ कहते और हज्ज़न चच्चा बिना दांत वाली मुस्कराहट के साथ हमें टब दे देते। वह जानते थे कि‍ हमारी ‘बिलकुल’ में बिलकुल भी इमानदारी नहीं है और उन्हें टब कालिख से भरा हुआ मिलेगा। पर बच्चे तो उनके लिए फ़रिश्ते थे।

अब रंग बनाने की कारसाजी शुरू होती! जगदीश के घर की छत पर ही चूल्हा बनता। मोहल्ले में और कोई अपनी छत ख़राब क्यों करने देता भला। फिर जगदीश की माँ की शरण में जाया जाता। जगदीश की माँ को भी सफाई कर देने का भरोसा दिया जाता और पत्थर-ईंट जमा कर टब के लिए चूल्हा बना दिया जाता। लकड़ी की विशेष परेशानी नहीं थी। सभी घरों में लकड़ी के चूल्हों का इस्तेमाल होता था। सभी अपने अपने घर से लकड़ी चुरा-चुराकर जगदीश के घर की छत पर जमा कर देते थे। उत्साह में हम इतनी लकड़ी जमा कर देते थे कि‍ रंग बनाने के बाद भी इतनी बच जाती कि जगदीश  की माँ को महीने भर तक लकड़ी के लिए जंगल जाने की ज़रूरत नही रहती।

तय होता कि‍ छोटी होली यानी होलिका दहन वाले दिन से एक दिन पहले रंग ‘पकाया’ जाएगा। हम सभी जगदीश के यहाँ जमा हो जाते। छत पर भट्टी लगती, टब चढ़ाया जाता। उसमे टेसू के फूल और पानी भर दिया जाता। इसके बाद भट्टी सुलगाने का काम शुरू होता। हमने कभी भट्टी सुलगाई होती, तो सुलगती ना! इस काम का अनुभव किसी को नहीं था। जब जगदीश की माँ आधे घंटे तक हमें इस तरह परेशान देखतीं तो वह हंसती हुई आतीं और लकड़ी ठीक से बैठा कर आग सुलगातीं। रंग पकने लगता।

अब हमारा काम होता भाग सिंग हलवाई के कारीगर को घेरना। रंग फेंकने के लिए पिचकारी भी चाहिए होती है। व्यापारी वर्ग के परिवार के बच्चों के पास तो बाज़ार से खरीदी पीतल की बेहतरीन पिचकारी होती। महँगी पिचकारी खरीदने के लिए हमारे माँ-बाप साफ़ मना कर देते कि‍ एक दिन के खेलने के लिए पिचकारी खरीदना फ़िज़ूलखर्ची है। बात सही भी थी। जब घर में दूसरी ज्यादा प्राथमिकताएं हों, तो पिचकारी पर खर्च वास्‍तव में फ़िज़ूलखर्ची ही था। यहाँ पर भाग सिंग हलवाई के मिठाई बनाने वाले कारीगर की एक्सपर्टाइज की ज़रूरत होती। मिठाई कारीगर नत्था भाई बांस की पिचकारी बनाना जानता था। शाम को जब मिठाई बनाई जानी बंद होती, तो हम उसके पीछे पड़ जाते। वह भी अपनी कला दिखाने को बेताब रहता, पर चाहता था कि‍ हम उसकी कुछ खुशामद करें ही। हम तो खुशामद करने को उतारू रहते। जब वह ‘हाँ’ कहता, तो अगला काम होता बांस की व्यवस्था करना। पिचकारी बनाने के लिए बांस की ज़रूरत होती। हम कुछ मोटे-मोटे बांस आम के बाग़ वाले मुस्लिम मालियों से माँगते। उन्हें तब कुंजड़ा कहा जाता था। उनके पास मोटे बांस होते। उनका इस्तेमाल वह अपनी बहंगी बनाने के लिए करते थे। उनके पास इस्तेमाल के बाद मोटे बांस के टुकड़े बचे होते। उन्हें वे सम्‍भाल देते थे। वे जानते थे कि‍ होली के पास बच्चे बांस माँगने आएंगे। वह इन बांसों का सौदा करते। बांस देने से पहले वह हमसे कसम खिलवाते कि‍ इस बार गर्मियों में जब आम लगेंगे, तो हम उनके बगीचों में आम चोरने (चुराने) नही आएंगे। हमारा हाल तो यह होता कि‍ उनके कुछ कहने से पहले ही हम कसम खाकर बताते कि‍ इस साल तो क्या, हम तो पिछले साल भी आम चुराने नहीं आए थे। हमारे ज्यादा कलाकार साथी तो उनसे मुखबरी की डील तक कर लेते। बच्चों की स्मृति बहुत कम होती है। गर्मी आते-आते हमारी स्मृति सूख जाती और आम चुराने का मौलिक अधिकार का जज्बा हमारी रगों में दौड़ने लगता।

बांस मिलने के बाद शाम को नत्था भाई की पिचकारी वर्कशॉप लगाती। वह बांस को गाँठ के पास से आरी से काटता और गाँठ के दूसरी तरफ के हिस्से को अगली गाँठ के समीप इस तरह एक खोखला बांस का सिलिंडर बन जाता। इन बांस के टुकड़ों को रात को छिपाकर भट्टी के पर रख देता। सुबह जब भट्टी सुलगती, तो वह भट्टी में एक मोटा सुवां लाल करने को रख देता और काम के बीच जब भी फुर्सत मिलाती बांस के सिलिंडर के गाँठ वाली मुंह की तरफ से ‘औप्तिमाम मार’ के लिए  गरम सुवें से छेद कर देता। हम भट्टी के बाहर से भीतर झांकते और नत्था भाई हमें देख कर वापस भागने को कहता कि‍ कहीं मालिक को यह पता न चले कि‍ काम के वक्त वह बच्चों की पिचकारी के लिए बांस पर छेद कर रहा है।

शाम को नत्था भाई छेद किए बांस लेकर आता। अब पिचकारी के लिए पिस्टन बनते। बांस की पतली डंडी के ऊपर कपडे की पट्टियाँ लपेट कर गुंडा सा बना लिया जाता। उसे खोखले बांस के सिलिंडर के अन्दर कस कर जाने लायक बनाया जाता। जिसे पीछे खींचने से बाल्टी से रंग पिचकारी में भर जाता और पुनः दबाने से वह फुहार की तरह बाहर निकालता। यह हमारी पिचकारी होती। छोटी होली को इस पिचकारी का ट्रायल होता, ‘ओप्तिमम मार’ के लिए बार-बार छेद का व्यास ठीक किया जाता। पिस्टन पर कपड़ा लपेटा जाता। जगदीश के घर की छत हमारा ‘एम्युनिशन स्टोर’ होता।

होली का दिन हमारा डी-डे होता। प्रभुत्व के संघर्ष का, जुगाड़ी वर्सेज संसाधन वालों का। लगभग आठ-नौ बजे हमें होली खेलने की इजाज़त मिलती। हमारा दल अपने ‘हथियारों’  और ‘अम्न्युनेशन’ के साथ गली के एक ओर तैनात होता। दूसरी ओर वह जिनके पास बाज़ार से ख़रीदे रंग और पिचकारी होती। लोकल वर्सेज़ ग्लोबल मार्किट की सीधी लड़ाई। पहले विरोधी पक्ष मार करता। लम्बी दूरी तक मार करने वाली पीतल की पिचकारी के रंगों से हम बिना हथियार उठाए ही रंगीन हो जाते। हमारी पिचकारियां आधी दूरी तक भी मार नहीं कर पातीं! उन्हें पिचकारी की रेंज तक लाने के लिए हमें रंगों की बौछारों में ही आगे बढ़ कर उन पर रंग डालना होता। हममे से कई हताहत हो जाते। हमारी हिम्मत भी काम नहीं आती, क्योंकि‍ बाजारी रंग तेज़ होते और हमारा टेसू का रंग उनके सामने फीका होता। बीच-बीच में हमारी पिचकारी के पिस्टन के कपडे़ की पट्टी खुल जाती और पिचकारी बेकार हो जाती। हमारी नाकामी पर विरोधी हमें चिढा़ते। हम तरबतर हो जाते, निराश होकर पीछे लौटते। अब हम दूसरी रणनीति का सहारा लेते। उस वक्त तक न तो हमें शिवाजी के छापामार युद्ध शैली का पता था और न ही चे-गुएरा के गुर्रिल्ला रणनीति का। बस अनुभव ने हमें ज्ञानी बना दिया था। हम कुछ जो कमजोर किस्‍म के थे, वे पिचकारी थामे मोर्चा सम्हाले रहते और हमारे बीच के कुछ मुस्टंडे साथी छतों से कूद, छिपकर गली के उस छोर पर पहुंच जाते क्योंकि‍ विरोधी दल का ध्यान तो हम पर रहता। वे उस ओर पहुँच कर उनके रंगों की बाल्टी छीनने लगते। अपनी रंगों की बाल्टी बचने के चक्कर में अब वे लोग पिचकारी नीचे रख कर बाल्टी बचाने लगते, तो हम पैदल सिपाही दौड़ कर आगे बढ़ते और उनकी पिचकारिया फेंक देते। सशस्त्र होली युद्ध अब पिचकारी के बजाय हाथों से लड़ा जाने लगता। रंग की बाल्टियों की छीना-झपटी में दोनों पक्ष तरबतर होते। इस बार विरोधी पक्ष अपने ही पक्के रंगों से पुँता होता, जो हमारी मुस्टंडा-ब्रिगेड का कारनामा होता। अब जब दोनों दल बराबर रंगों से पुत गए और रंग भी बह गए, तो अब क्या गिला शिकवा। दोनों दल आपस में मिलकर हँसने लगते। छीना झपटी में चोट फटाक भी लग जाती, तो उसका सामूहिक इलाज होता! इलाज में आँख में फूंक मारने से लेकर मलाशने और मुंह धोना तक शामिल था। अब सबके घरों में जाकर नमकीन खाते और जिन घरों में गुजिया बनी होतीं, वहाँ पहले पहुंचते।

अंत में दो-तीन बातें बतानी ज़रूरी हैं। हमारी होली यहीं पर ख़त्म नहीं होती। रंगों से पुते जब हम घर पहुंचते तो जो बर्तन हम घर से मांग कर रंग रखने के लिए ले गए थे, उन पर गुर्रिल्ला युद्ध के समय पिल पड़ जाते थे। अब जब हम अपने पिल पड़े बर्तनों को घर लाते, तो हमें यह अंदेशा हो जाता था कि‍ जितने पिल बर्तन पर पड़े हैं, उतने थप्पड़ तो पड़ने ही हैं| हम पहले से ही रोने लगते और एक-दूसरे का नाम बताने लगते। बिना पिटे ही हमारा विलाप कई बार हमें मार से बचा भी लेता था। यह भी नित्य होली कर्म था। इसके अलावा रंग छुड़ाने के लिए नहलाते वक्त जो हमारी घिसाई होती, वह अलग। माँ साबुन घिसती, बीच-बीच में पट-पट मारती भी रहतीं। हमारा क्रंदन पांचवें और सातवें सुर पर रहता। कोई ध्यान नहीं देता क्योंकि‍ लगभग हर घर से इस तरह की आवाजें आती  रहतीं|

अंत में एक यादगार के तौर पर हज्ज़न चच्चा की याद। यह भी हमारी होली का हिस्सा ही था।

हज्ज़न चच्चा का टब लौटाना भी हमारे लिए समस्या होती, क्योंकि‍ फिर वह काला हो गया होता। हम सब टब लेकर ऐसे मोड़ पर खड़े हो जाते, जहां से हम तो हज्ज़न मियां को देख सकें, पर वह हमें नहीं। वह अपनी दुकान से इधर-उधर जाते ही रहते थे। उस वक्त भी जाते थे (आज मुझे यह भी लगता है कि‍ हज्ज़न चच्चा जानते थे कि‍ हम उनका टब लौटाने के लिए छुप कर बैठे हैं। वह यह भी जानते थे कि‍ टब काला ही होगा। वह जानबूझकर अपनी दुकान से चले जाते थे कि‍ हम टब रख सकें और इज्ज़त से भाग सकें !) हम दौड़ कर उनकी दुकान में काला टब रख कर चम्पत हो जाते। थोड़ी  देर में हमें हज्ज़न चच्चा की ऊंची आवाज सुनाई देती.. ‘‘हरामियो, फिर काला कर दिया टब! अगली बार नहीं दूंगा।’’

हम सब हंसने लगते|

कुमाऊँनी होली के तीन गीत

होली के अवसर पर कुमाऊँनी होली में प्रचलि‍त तीन गीत-

हो मुबारक मंजरी फूलों भरी

हो मुबारक मंजरी‍ फूलों भरी।
ऐसी होरी खेलें जनाब अली।।

बारादरी में रंग बनो है,
हसन बाग मची होरी।
ऐसी होरी खेलें जनाब अली।।

जुग-जुग जीवैं मि‍त्र हमारे
बरस-बरस खेलें होरी।
ऐसी होरी खेलें जनाब अली।।
नोट: ‘जुग जुग जीवैं’ में परि‍वार और होलि‍यारों को नाम लेकर आशीष
दी जाती है।

झनकारो, झनकारो, झनकारो

झनकारो, झनकारो, झनकारो,
गोरी  प्यारो  लगौ  त्यौरौ  झनकारो ।

तुम हो बृज की सुन्दर गोरी,
मैं मथुरा का मतवारो।
गोरी प्यारो लगौ त्यौरौ झनकारो।।

चोली-चादर सब रंग भीजे
फागुन ऐसो मतवारो।
गोरी प्यरो लागौ त्यौरौ झनकारो।।

सब सखि‍याँ मि‍ल खेल रही हैं
दि‍लबर को हैं दि‍ल न्यौरो।
गोरी प्यारो लागौ त्यौरौ झनकारो।।

अब के फागुन में अर्ज करत हूँ
दि‍ल को कर दे मतवारो।
गोरी  प्यारो  लागौ त्यौरौ झनकारो।।

होरी कैसे खेलूँ री मैं

बि‍रज में होरी कैसे खेलूँ री मैं साँवि‍रया के संग

कोरे-कोरे मटक मगाये
ता पर घोला रंग।
भर पि‍चकारी सन्मुख मारी
अँगि‍या हो गई तंग-
बि‍रज में होली कैसे खेलू री में साँवरि‍या के संग।।

अबीर उड़ता गुलाल उड़ता
उड़ते सातो रंग।
भर पि‍चकारी सन्मुख मारी
अँगि‍या हो गई तंग-
बि‍रज में होली कैसे खेलू री में साँवरि‍या के संग।।

लहँगा तेरा घूम-घुमैला अँगि‍या तेरी तंग।
खसम तुम्हा रे बडे़ नि‍खट्टू
चलो हमारे संग-
बि‍रज में होली कैसे खेलू री में साँवरि‍या के संग।।

(जनकवि‍ गि‍रीश ति‍वाड़ी ‘गि‍र्दा’ द्वारा सम्पादि‍त पुस्तक ‘रंग डारि‍ दि‍यौ अलबेलि‍न में’ से साभार)

 

कुमाऊँनी होली परम्परा और सामाजिक प्रतिबद्वता : अतुल शर्मा

कुमाऊँनी कवि‍ गौरीदत पांडे ‘गौर्दा’ के होली गीतों में सामाजि‍क और राजनीति‍क चेतना को रेखांकि‍त करता जनकवि‍ अतुल शर्मा का आलेख-

बात छठे दशक की रही होगी, देहरादून में दीवान सिंह कुमैया से रोज मुलाकात होती थी। वह होली से पहले ही होली गायन बैठकी और खडी़ होली की तंरग में रहते थे। वह एक प्रख्यात फोटोग्राफर थे। होली पर सफेद कुर्ता-पैजामा और टोपी, हाथ में हुडकी लिये पूरे माहौल को होलीमय बनाते थे। वक्‍त बीता और अस्सी के दशक में नैनीताल जाना हुआ। वहाँ न जाने कितने दीवान सिंह कुमैया खडी़ और बैठकी होली में झूमते नजर आये। शास्‍त्रीय गायन पर आधारित विशिष्ट गायन शैली से मन झूम उठा।

यहाँ मुझे एक अलग अनभूति हुई। वह यह थी कि होली गायन परपरम्परा की लोकप्रियता के आधार पर समसामयिक सन्‍दर्भों में भी प्रयोग करने का अद्भुत कार्य हुआ। यह एक सार्थक प्रयास कहा जा सकता है। इस सन्‍दर्भ में होली गायन का यह पहलू बिलकुल नया और सार्थक प्रतीत होता है।

स्वतन्‍त्रता आन्दोलन में गौरीदत पांडे ‘गौर्दा’ (अगस्त 1872-अक्टूबर 1939) कुमाऊँनी कविता के सर्वोच्च शिखर पर रहे। उन्होंने लिखा- तू खेल गाँधी मेरा लाल होली होली है/गोद लि भारत मात पुकारे/लाल भयो क्या हाल/को त्वेकाणी दिनरात/संतॅूछ को छ महा चडांल/आँखन तेरी आँसू तहाड़ा मुखधार छन राल।

यानि मेरे लाल गाँधी तू होली खेल। गोद लेकर भारत माँ पुकारती है। लाल ये क्या हाल हो गया। कौन महाचडांल है जो तुम्हें दिनरात सता रहा है।

अर्थ यह कि होली गायन परम्परा सामयिक सन्‍दर्भों में कभी कटी नहीं। उसने अपना दायित्व कभी नहीं छोड़ा। यही जनमानस की लोकप्रियता को सही दिशा में जोड़ना भी रहा। इस सन्‍दर्भ में एक और उदाहरण जरूरी होगा जिसमें कहा गया कि मन के चैन बिना होली कैसे खेलें। सारे देश में अशान्ति मची हुई है। ऐसा स्वराज्य है आज के दिन। गौर्दा ने इसे इस तरह कहा है- होली कसीकै खेलनूँ मन चैन बिना। एक अन्य जगह उन्होंने लिखा है- होली कैसे खेलें मन में लाज आती है मेरे शरीर पर फटा चीथड़ा भी नहीं है- होली कसिकै खेलनॅू मन लाज बड़ी/मेरा आंड.न न्हाति फाटी भिदड़ी।

होली गायन परम्परा में इसी सन्‍दर्भ को ध्यान में रखते हुये कहा जा सकता है कि कुमाऊँ में होली का यह रूप होली गायन परम्परा से नये आयाम जोड़ने की पहल करता है। गौर्दा ने लिखा है- होली खेलूँ खसम का हाड़ खाणों न पेट भरी।

होली में व्यंग्‍य विनोद पर गौर्दा ने खूब कलम चलायी- आज बणूछू मैं सबन भड़वा देवता सू धूप नये चार हूणी पूर्वा।

ऐसे बहुत से उदाहरण हैं। एक जगह वह कहते हैं कि कौवे इस वर्ष काँव काँव करके खूब घुघत उड़ा ले अगले साल से खाने को नहीं पायेगा । उन्होंने घुघतिया त्यौहार का भी जिक्र किया है- आलि बेर उड़ाले काले काले/आघिला साल बटि खाण नी पाले।

हिन्दी कविताओं में उन्होंने होली को केन्द्र मानकर खूब लिखा है। मैं इसे होली गायन की सार्थक परम्परा मानता हूँ। चारु चन्द्र पांडे की पुस्तक ‘छोड़ो गुलामी’ किताब से ये सन्‍दर्भ लिये गये हैं। यह स्थापित हो गया कि होली गायन परम्परा में समसामयिक विषयों को भी गहराई और प्रतिबद्वता के साथ जिया गया है- होली अजब खिदाई मोहन अवतार कन्हाई/सूत कातकर चरखे से मोहन कदर चीर पहनाई/विदेशी माल गुलाल उड़ायो/स्वदेशी रंग बनाई/गोर सब नाच नचाई/रंग बिरंगी पिचकारी मारी/नौकरशाही भगाई/स्वतन्त्रता की गारी सुनाई/स्वराज्य पताका उड़ाई/जी हजूरों को भांग पिलाई।

यहीं पर गौर्दा ने लिखा- बनो स्वराज्य के रसीलै रसिया/रंगीले रसिया हो छबिले रसिया/सबको मुबारक हो ये होली/कृष्ण भवन के रसीलै रसिया/घर-घर मैम्बर बनो मतवाले/गावो बजाओ रसीलै रसिया।

लोक धुनों पर आधारित होली खम्माच, होली झपताल, दादरा, होली काफी, होली कुमैंया, दादरा भैरवी आदि प्रचलित हैं। इसमें- गाँधी के भगत बनो गाँधी के। इसी तरह- होली खेलो स्वराज्य ऋतु आवत है/दिन भारत के खोटे जावत है। और साथ ही साथ- भारत माता को शीश नवाके/ हिलमिल खेलो प्रियवर होली/यही एक उत्सव है जातियता का बनाओ सगुन आज प्रेम रंग होली।

यह वैशिष्टया है कि इसी लोक धुन और छन्दों में होली गायन निबध है। ये कुमाऊँनी होली की चौंका देने वाली तंरग है। यह कल्पना की जा सकती है। जब गुलामी के दिन रहे होंगे तो होली गायन परम्परा में अपने मूल स्वरूप के रहते हुए भी अपने सच्चे आचरण का निर्वहन किया होगा।

गौर्दा के कुछ उदाहरण और हैं- बाट दो गुलामी से नाम सजनवा/ स्वदेशी मे नाम लिखवा दो सजनवा।

इसी के साथ एक उदाहरण और- मनाओ आज आनन्‍द बधाई/शुभ घड़ी शुभ दिन शुभ मूर्हूत शुभ खबर ये आई। कृष्ण भवन से गाँधी महात्मा आज ही मुक्ति पायी/गाओ बजाओ मगन मन, मंगल धूम स्वराज्य मनाई।

यह लोकधुन और यह समा देखते ही बनता होगा जब राधाकृष्ण के शास्त्रीय गायन की विशिष्ट शैली की बैठकी और खड़ी होली की झूमा देने वाली तंरग में जन-जागरण का पुट भी उभरा होगा। इसी सन्‍दर्भ में- बिना स्वराज्य के पावै/मजा क्या यार होली में/स्वतन्त्रता बिना सभी फीका/मेरे दिलदार होली में।

इसी में आगे है- ये कुर्ते जांघिया पहने/गले में ताँख ही डाले/बेड़ी की है सुन पड़ती/मधुर झनकार होली में।

उदाहरण की श्रृंखला बहुत लम्बी है लेकिन लोक गायन की दृष्टि से यह परम्परागत छंद उल्लेखनीय है- कृष्ण कन्हैया स्वाधीन कर/होली खेलें भारत लाल सुन्दर साँवरिया/काहै को देर लगावत मोहन/करदे तुरन्त निहाल साँवरिया।

इसी में एक स्थान पर- होली में झोली कांधे पड़ी है लागी विभूत रूपाल सुन्दर साँवरिया/शाम पिया इस गोरी की अब/गाल करो दो लाल सुन्दर साँवरिया।

होली काफी में एक बेहतरीन उदाहरण है- स्वागत है ऋतुराज तिहारो/ बसन्त करो बस अन्‍त दमन का/जस हेमन्त पछाड़ो।

होली खमाज में भी इसी तरह का उदाहरण मिलता है। साथ में होली कुमैंया में भी- मच रही रंग बिरंगी होली भारत में/अन्न बिना सब लोग दुखी हैं/कांधे पड़ी सबकी झोली/दीन दुखिन को कौड़ी नहीं है गार्डन पार्टी अनमोली/घर- घर फूट करावत फिरती भगत विदेशिन की टोली।

इसी में एक उदाहरण है- लाल पगड़िया बागेश्वर जा/डर पर जा होली/ आओ मिलकर सब खेले फगुआ/रंग दे सब इनकी चोली।

दादरा भैरवी के साथ दादरा में वह लिखते हैं- छोड़ो तुम भी गुलामी किताब रंगीलो हो बलमा/ देश सेवा के लिये चरखा चलाऊँ मैं/अपनी सोई हुई किस्मत को जगाऊँ मैं भी/मौहे चरखा मंगादो सिताब रंगीले हो बलमा।

गौर्दा ने यह समझा दिया है कि समस्यायें त्यौहारों पर उठती हैं पर लोग अपना दायित्व भी निभाते हैं। अगर ऐसा न होता तो सामाजिक रूप से प्रतिबद होली गायन परम्परा के प्रति एक ऐतिहासिक दृष्टि का अध्याय न जुड़ता।

होली भी सो होली है/अब क्या होली है।

इसी के साथ परम्परागत शैलियों में होली धमार में वह लिखते हैं- सूनी से जरिया प्रिया बिना मोरी/का संग खेलूँ सखी भी मैं होली/होली रसिया में भी इसी प्रकार की खनक दिखाई देती है।

गौर्दा के माध्यम से होली गायन परम्परा का यह रूप सामने आना इसलिये भी आवश्यक था क्योंकि जब तब आस-पास की स्थितियाँ-परिस्थितियाँ हमारे लोक परम्परा का हिस्सा नहीं बनेगी तब तक उल्लास और उत्साह का वातावरण कैसे बनेगा। शुद्ध होली गायन परम्परा की विशिष्टता अद्वितीय है और समय- समय पर लोक गायकों ने सम-सामयिक स्थितियों को भी इसमें जोड़ा है। यह कुमाऊँ के साथ-साथ पूरे देश की भी परम्परा रही है।

 

होली के रंग कवि‍ताओं के संग

रंगों के त्‍यौहार होली पर भवानी प्रसाद मिश्र, कन्हैया लाल मत्त, घमंडी लाल अग्रवाल, प्रकाश मनु, योगेन्द्र दत्त शर्मा, गोपीचंद श्रीनागर, नागेश पाण्डेय ‘संजय’, देवेन्द्र कुमार और रमेश तैलंग की कवि‍ताएं-
 

फागुन की खुशियाँ मनाएं : भवानी प्रसाद मिश्र

 
चलो, फागुन की खुशियाँ मनाएं!
आज पीले हैं सरसों के खेत, लो;
आज किरणें हैं कंचन समेट, लो;
आज कोयल बहन हो गई बावली
उसकी कुहू में अपनी लड़ी गीत की हम मिलाएं।
 
आज अपनी तरह फूल हंसकर जगे,
आज आमों में भोंरों के गुच्छे लगे,
आज भोरों के दल हो गए बावले
उनकी गुनगुन में अपनी लड़ी गीत की हम मिलाएं।
आज नाची किरण, आज डोली हवा!
आज फूलों के कानों में बोली हवा
उसका सन्देश फूलों से पूछें, चलो
और कुहू करें गुनगुनाएं।
चलो, फागुन की खुशियाँ मनाएं
 
 

रंगों का धूम-धड़क्का : प्रकाश मनु

 
फिर रंगों का धूम-धड़क्का, होली आई रे,
बोलीं काकी, बोले कक्का—होली आई रे!
मौसम की यह मस्त ठिठोली, होली आई रे,
निकल पड़ी बच्चों की टोली, होली आई रे!
 
लाल, हरे गुब्बारों जैसी शक्लें तो देखो—
लंगूरों ने धूम मचाई, होली आई रे!
मस्ती से हम झूम रहे हैं, होली आई रे,
गली-गली में घूम रहे हैं, होली आई रे!
 
छूट न जाए कोई भाई, होली आई रे,
कह दो सबसे—होली आई, होली आई रे!
मत बैठो जी, घर के अंदर, होली आई रे,
रंग-अबीर उड़ाओ भर-भर, होली आई रे!
 
जी भरकर गुलाल बरसाओ, होली आई रे,
इंद्रधनुष भू पर लहराओ, होली आई रे!!
फिर गुझियों पर डालो डाका, होली आई रे,
हँसतीं काकी, हँसते काका—होली आई रे!
 
 

हाथी दादा की होली: प्रकाश मनु

 
जंगल में भी मस्ती लाया
होली का त्योहार,
हाथी दादा लेकर आए
थोड़ा रंग उधार।
 
रंग घोल पानी में बोले—
वाह, हुई यह बात,
पिचकारी की जगह सूँड़ तो
अपनी है सौगात!
 
भरी बालटी लिए झूमते
जंगल आए घूम,
जिस-जिस पर बौछार पड़ी
वह उठा खुशी में झूम!
 
झूम-झूमकर सबने ऐसे
प्यारे गाने गाए,
दादा बोले—ऐसी होली
तो हर दिन ही आए!
 
 

जमा रंग का मेला : कन्हैया लाल मत्त

 
जंगल का कानून तोड़कर जमा रंग का मेला!
भंग चढ़ा कर लगा झूमने बब्‍बर शेर अलबेला!
 
गीदड़ जी ने टाक लगाकर एक कुमकुमा मारा!
हाथी जी ने पिचकारी से छोड़ दिया फब्बारा!
 
गदर्भ जी ने ग़ज़ल सुनाई कौवे ने कब्बाली!
ढपली लेकर भालो नाचा, बजी जोर की ताली!
 
खेला फाग लोमड़ी जी ने, भर गुलाल की झोली!
मस्तों की महफ़िल दो दिन तक, रही मनाती होली!
 
 

होली का त्यौहार : घमंडी लाल अग्रवाल

 
आया हँसता रंग-रंगीला होली का त्यौहार!
रंग-बिरंगी पोशाकें अब मुखड़े बे-पहचान,
भरा हुआ उन्माद हृदय में अधरों पर मुस्कान,
मस्त महीना फागुन वाला लुटा रहा है प्यार!
 
डफली ने धुन छेड़ी प्यारी, भरें कुलांचें ढोल,
मायूसी का हुआ आज तो सचमुच बिस्तर गोल,
भेदभाव का नाम मिटा दें, महक उठे संसार!
आया हँसता रंग-रंगीला होली का त्यौहार!
 
 

सतरंगी बौछारें लेकर : योगेन्द्र दत्त शर्मा

 
सतरंगी बौछारें लेकर
इन्द्रधनुष की धरें लेकर
मस्ती की हमजोली आई,
रंग जमाती होली आई!
 
पिचकारी हो या गुब्बारा,
सबसे छूट रहा फुब्बारा,
आसमान में चित्र खींचती
कैसी आज रंगोली आई!
 
टेसू और गुलाब लगाये,
मस्त-मलंगों के दल आये
नई तरंगों पर लहराती,
उनके संग ठिठोली आई!
रंग जमाती होली आई!
 
 

होली के दो शिशुगीत : गोपीचंद श्रीनागर

 
कोयल ने गाया
गाया रे गाना!
होली में भैया
भाभी संग आना!
……………
मैना ने छेड़ी
छेड़ी शहनाई!
होली भी खेली
खिलाई मिठाई!
 
 

जब आएगी होली : नागेश पाण्डेय ‘संजय’

 
नन्ही-मुन्नी तिन्नी बिटिया,
दादीजी से बोली-
“खूब रंग खेलूंगी जमकर,
जब आएगी होली!
 
मम्मी जी से गुझिया लूंगी,
खाऊंगी मैं दादी!
उसमें से तुमको भी दूँगी,
मैं आधी की आधी!”
 
 

होली के  दिन: देवेन्द्र कुमार

 
होली के दिन बेरंग पानी
ना भाई ना!
 
जंगल घिस कर हरा निकालें
आसमान का नीला डालें
धूसर, पीला और मटमैला
धरती का हर रंग मिला लें
 
अब गन्दा पानी नहलाएं
फिर होगी सतरंगी होली!
हाँ भाई हाँ!
 
काली, पीली, भर भर डाली
मिर्च सभी ने मन भर खाली
मुंह जलता है पानी गायब
मां, अब सब कुछ शरबत कर दे
मटके सारे नदियाँ भर दे
 
जो आये मीठा हो जाए
तब होगी खटमिट्ठी  होली!
हाँ भाई हाँ!
 
 

होली का गीत : रमेश तैलंग

 
मुखडे़ ने रँगे हों तो
होली कि‍स काम की ?
रंगों के बि‍ना है, भैया !
होली बस नाम की।
 
चाहे हो अबीर भैया,
चाहे वो गुलाल हो,
मजा है तभी जब भैया,
मुखड़ा ये लाल हो,
 
बंदरों के बि‍ना कैसी
जय सि‍या-राम की ?
 
रंग चढ़े टेसू का या
कि‍सी और फूल का,
माथे लगे टीका लेकि‍न
गलि‍यों की धूल का,
 
धूल के बि‍ना ना मने
होली घनश्‍याम की।
 
 
 
 

खबरों के आगे खिंचता नेपथ्य : प्रभु जोशी

पिछले दिनों इन्‍दौर में हिन्दी के हिंग्लिशीकरण के विरोध में प्रतीकात्‍मक ढंग से प्रमुख समाचार पत्रों की होली जलायी गई। इस पर समाचार पत्रों के रुख और हिंग्लिशीकरण के प्रति सचेत करता वरिष्‍ठ लेखक और पत्रकार प्रभु जोशी का आलेख-

दुनिया भर में, ‘विश्व के सबसे बड़े जनतंत्र‘ की तरह ख्यात भारत ने, जब एक ‘नव-स्वतंत्र राष्ट्र‘ की तरह, विश्व-‘राजनीति में जन्म लिया, तब निश्चय ही न केवल ‘पराजित‘ बल्कि, लगभग हकाल कर बाहर कर दी गयी ‘औपनिवेशिक-सत्ता‘ के कर्णधारों की आँखें, इसकी ‘असफलता‘ को देखने के लिए बहुत आतुर थीं। चर्चिल की बौखलाहटों को व्यक्त करती हुई, तब की कई उक्तियाँ इतिहास के सफों पर आज भी दर्ज हैं। अलबत्ता, उनकी ‘अपशगुनी उम्मीदों‘ के बार-खिलाफ, जब-जब इस ‘महादेश‘ में संसदीय चुनाव हुए, तब-तब इस बात की पुष्टि काफी दृढ़ता के साथ हुई कि बावजूद ‘सदियों की पराधीनता‘ के, भारतीय-जनमानस में एक अदम्य ‘लोकतांत्रिक-आस्था‘ है, जो केवल उसके सोच भर में स्पंदित नहीं है, बल्कि, उसकी तमाम संस्थाओं में, वह लगभग ‘दहाड़ती‘ हुई उपस्थित है। कहने की जरूरत नहीं कि उसके ‘चौथे खंभे‘ में तो ‘नृसिंह‘ की-सी शक्ति है, जो सत्ता के पेट को चीर सकती है। आपातकाल में तो उसने यह पूरी शिद्दत से प्रमाणित कर दिया था कि न केवल ‘लिख कर‘ बल्कि इसके विपरीत ‘न लिखकर‘ भी वह अपनी आवाज को इस तरह बुलन्द कर सकती है, जो हजारों-हजार लिखे गए लफ्जों से कहीं ज्यादा प्रखर प्रतिरोध का रूप रख सकती है। सम्पादकीय की जगह खाली छोड़ने से ‘मौन की तीखी अनुगूँज‘ राष्ट्रव्यापी बन गयी थी।

बहरहाल, इन्दौर नगर में पिछले दिनों ‘गाँधी-प्रतिमा स्थल‘ पर कतिपय बुद्धिजीवियों ने देश भर के कोई बीस-बाइस हिन्दी समाचार पत्रों की एक-एक प्रति जुटाकर, तमाम अखबारों के द्वारा ‘अकारण‘ ही तेजी से किये जा रहे हिन्दी के हिंग्लिशीकरण बनाम ‘क्रिओलीकरण’ के जरिए, जिस ‘बखड़ैली भाषा‘ को जन्म देने में लगे है, उसके प्रति हिन्दी भाषाभाषी पाठकों की पीड़ा और प्रतिकार को प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त करने के लिए, उनकी होली जलायी। निश्चय ही प्रतिकार की इस ‘प्रतीकात्मकता‘ से जो लोग असहमत थे, वे इसमें शामिल नहीं हुए। उनके पास अपने तर्क और अपनी स्पष्ट मान्यताएँ थीं, जबकि अखबारों की ‘होली‘ जलाने वालों के पास अपनी सिद्धान्तिकी थी। दोनों के पक्ष-विपक्ष में एक गंभीर विमर्श भी बन सकता था।

बहरहाल, घटना छोटी-सी और निर्विघ्न सी थी, लेकिन भारतीय पत्रकारिता के विगत तिरेसठ साल के इतिहास में पहली बार घट रही थी। लेकिन देश के किसी भी हिन्दी अखबार ने ( हालांकि, जनसत्ता ने खबर तो नहीं, लेकिन, राजकिशोर के लेख में इस खबर को यथावत और विस्तार से दिया है।) यह खबर प्रकाशित नहीं की। इण्टरनेट के ब्लागों और ‘फेस बुक‘ पर अवश्य इस पर बहस के लिए अवकाश (स्पेस) निकला, लेकिन, आरंभ में उसका रूप जिस तरह की गंभीरता लिए हुए शुरू हुआ था, दूसरे दिन वह ‘भर्त्सना‘ और ‘भड़ास‘ की शक्ल अख्तियार कर चुका था। उसमें मनोरंजन और मसखरी भी शामिल हो चुकी थी। अतः पूरी बात विचार के दायरे से ही लगभग बाहर हो गयी। यहाँ यह बात गौर करने लायक है कि कदाचित् सम्पूर्ण हिन्दी समाचार-पत्रों ने, इस कार्यवाही को अपनी सत्ता के प्रति एक ‘बदअखलाक चुनौती‘ की तरह लिया है। हो सकता है समाचार-पत्र, चूंकि वे समय और समाज में विचार के लिए वाजिब जगह बनाने की जिम्मेदारी अपने ही हिस्से में समझते हैं, अतः वे इस कार्यवाही के खिलाफ निस्संदेह ठोस बौद्धिक-असहमति रखते हैं। लेकिन प्रश्न उठता है कि जो समाचार पत्र, वर्ष के तीन सौ पैंसठ दिन, ’समय और समाज’ की खाल खींच कर उसमें नैतिकता का नमक डालने पर तत्पर रहता है, क्या वह तिरेसठ वर्ष के अपने जीवनकाल में मात्र एक दिन किसी एक शहर में अपने पाठक की असहमति और उसका प्रतीकात्मक प्रदर्शन तक बरदाश्त नहीं कर सकता? जबकि, वह इस महाकाय जनतंत्र की रक्षा का एक सर्वाधिक शक्तिशाली कवच है? क्या समूचा समाचार-जगत ’विचार’ के स्तर पर, व्यक्ति की सी स्वभावगत ’एकरूपता’ रखता है ? जबकि, वह व्यक्ति नहीं संस्था है। मुझे यहाँ याद आता है कि नेहरू के विषय में कहा जाता रहा है कि उनका अहम् काफी अदम्य था और वे अमूमन अपनी असहमति की अवमानना पर तिक्त हो जाते थे। एक प्रसंग मुझे याद आ रहा है। ’टाइम्स ऑफ इण्डिया’ के तब के ख्यात सम्पादक मुलगांवकर प्रधानमंत्री आवास पर स्वल्पाहार हेतु आमंत्रित थे और जिस सुबह वे आमंत्रित थे, ठीक उसी दिन उन्होंने नेहरू तथा ’नेहरू-सरकार’ के विरूद्ध अपने अखबार में बहुत तीखी सम्पादकीय टिप्पणी छाप दी। लगभग आठ बजे प्रधानमंत्री-आवास से दूरभाष पर सूचना दी गयी कि किन्हीं अपरिहार्य कारणों से पूर्व में स्वल्पाहार के समय प्रधानमंत्री के साथ निर्धारित भेंट निरस्त की जा रही है। यह सूचना पाते ही श्री मुलगांवकर ने नेहरू को फोन किया कि ठीक है कि आज का सम्पादकीय आपके तथा आपकी सरकार के खिलाफ है, लेकिन इसका हमारे नाश्ते से क्या लेना-देना है ?

बहरहाल, नेहरू ऐसे थे कि सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर रहते हुए भी ठिठक कर बुद्धिजीवियों द्वारा की गई अपनी आलोचना सुन सकते थे। कदाचित् उनके इसी जनतांत्रिक धैर्य को ध्यान में रखकर दुनिया भर की प्रेस उन्हें ’डेमोक्रेटिक प्रॉफेट’ के विशेषण से सम्बोधित भी करती थी।

बहरहाल, इन्दौर नगर में भारतीय समाचार पत्रों को उनकी भाषागत नीति को केन्द्र में रखकर उसके प्रतिरोध में होली जलाने वाली कार्यवाही को लेकर इतना आहत और क्रोधित नहीं होना चाहिए कि उनके द्वारा अकारण किये जा रहे क्रिओलीकरण के खिलाफ शुद्ध गाँधीवादी प्रतिकार की खबर को वे अपने पृष्ठों पर तिल भर भी जगह न दें। यह काम निश्चय ही सम्पादक का नहीं हो सकता। तो क्या हमारे समाचार-पत्रों में एक किस्म की ‘कॉरपोरेट सेंसरशिप‘ अघोषित रूप से आरंभ है ? जबकि, ठीक उसी दिन ‘दैनिक भास्कर‘ ने क्रिओलीकरण के विरूद्ध लिखी गयी मेरी तीखी टिप्पणी ससम्मान और प्रमुखता से छापी और ‘नईदुनिया‘ ने इसके दो दिन पूर्व ही ‘भाषा के खिलाफ हो रही साजिश को समझो‘ शीर्षक से हिन्दी के ‘क्रिओलीकरण‘ के खतरे की तरफ पाठकों नहीं, सम्पूर्ण हिन्दी भाषा-भाषियों को सचेत करने वाली उस टिप्पणी को एक ऐसी सम्पादकीय टीप के साथ प्रकाशित किया, जो ‘जन-आह्वान‘ के स्वर में थी। यह तथ्य दोनों ही अखबारों के ‘खुलेपन‘ और ‘जनतांत्रिक उदारता‘ के स्पष्ट प्रमाण हैं। तो अब प्रश्न यह उठता है कि क्या उनकी यह ‘उदारता‘ इतनी ज्वलनशील है कि प्रदर्शन की आँच की खबर से भस्म हो सकती है ? हाँ, राजनीतिक सत्ताएँ विचारको खतरा मानती हैं और उससे डरती भी हैं, लेकिन अखबर की ताकत तो विचारही है। विचारतो उसके लगभग प्राण हैं ? फिर चाहे वे सहमतिके रूप में हों, या असहमतिके रूप में। मैं मानता हूँ कि आज हमारा समाज जितना ‘सूचना-सम्पन्न‘ हुआ है, उसके पीछे प्रमुख रूप से ‘लिखे-छपे शब्द‘ की बहुत बड़ी भूमिका है, ‘बोले गये‘ शब्द वाले माध्यम की तो प्राथमिकताएँ और प्रतिबद्धताएँ केवल मनोरंजन ही है। अतः मुझे उस माध्यम से कुछ नहीं कहना। वह अभी तक परिपक्व ही नहीं हो पाया है। अधिकांश का ‘समाचार-विवेक‘ तो सांध्यकालीनों की सनसनी के समांतर ही है। वे ‘सचाई‘ के साथ फ्लर्ट (!) करते हैं। उनका ‘रिमोट‘ सच के किसी दूसरे ‘सनसनाते संस्करण‘ को बदलने का उपकरण है। लेकिन सुबह के दैनिक अखबार यह मानते हैं कि वह मालिकों का कम पाठकों का ज्यादा हैं। इसीलिए, यदि पाठकों का एक छोटा-समूह ‘संवादपरक प्रतिरोध‘ की संभावना के पूरी तरह निशेष हो जाने के बाद, यदि निहायत ही गाँधीवादी तरीके से अपना विरोध होली जलाकर प्रकट कर रहा है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि समाचार-पत्रों में हो आयी उसकी आस्था का पूर्णतः से लोप हो गया है। गाँधीजी ने, जब विदेशी वस्त्रों की होली जलायी थी तो वे ‘वस्त्रोत्पादन‘ के विरूद्ध कतई नहीं थे। ना ही वस्त्र धारण करने के काम से उनकी आस्था उठ गयी थी। वे तो प्रतीकात्मक रूप से एक अचूक सूचना दे रहे थे कि हमें ‘औपनिवेशिक विचार‘ का विरोध करना है, जो वस्तुओं में शामिल है।

अंत में इन दिनों जिस ‘शक्ति-त्रयी‘ की बात की जा रही है, उसमें ‘सूचना‘ भी राज्य सत्ता के समानान्तर मानी जा रही है। ‘सूचना‘ का निर्माण और वितरण करने वाली दुनिया की चार पांच संस्थाओं को ‘सत्ता‘ का सर्वोपरि रूप माना जा रहा है, क्योंकि वे ही ‘विश्वमत‘ गढ़ती या बनाती हैं। उनमें किसी भी मुल्क या उसकी सरकार को ध्वस्त करने की भी अथाह कुव्वत है, लेकिन वे अपने मुल्क के ‘प्रतिरोध की आवाजों‘ की अनसुनी नहीं करती वर्ना, नोम चॉमस्की जैसे लोगों के विचारों की आहटें शेष संसार को सुनाई ही नहीं देती।

मुझे ब्रिटिश प्रधानमंत्री चेम्बर लेन के आक्सफर्ड विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में दिये गये भाषण की याद आती है। उन्होंने कहा था, ‘आक्सफर्ड‘ ने हमें जब-जब जैसा-जैसा करने को कहा हमने हमेशा ही ठीक वैसा-वैसा किया; लेकिन जब आक्सफर्ड को हमने अपने जैसा करने को कहा, उसने वैसा कभी नहीं किया और एक ब्रिटिशर की तरह मुझे इन दोनों बातों पर अपार गर्व है।

कुल मिलाकर चेम्बर लेन ने यही कहना चाहा हम ब्रिटिशर्स विचार के स्तर पर इतने उदार हैं। हम अपनी प्रखरतम आलोचना का सम्मान करते हैं, लेकिन, हमें अपने मुल्क की बुद्धिजीवी बिरादरी पर भी गर्व है, जो असहमतियों को व्यक्त करने में भीरू नहीं है। किसी भी देश और समाज में भीरूता का वर्चस्व बौद्धिकों में व्याप्त होने लगे, तब शायद यह मान लेना चाहिए कि वह फिर से पराधीन होने के लिए तैयार हैं।

अंत में कुल जमा मकसद यही है कि लोहिया की विचारधारा में गहन आस्था रखने वाले श्री अनिल त्रिवेदी, तपन भट्टाचार्य और जीवनसिंह ठाकुर ने भारतीय भाषाओं के आमतौर पर तथा हिन्दी के क्रिओलीकरण (हिंग्लिशीकरण) को लेकर खासतौर पर एक शांत और नितान्त निर्विघ्न प्रदर्शन किया तो वस्तुतः वे निश्चय ही इसके दूरगामी खतरों की तरफ पूरे देश और समाज को चेतन करना चाहते हैं। वे ठीक ही कह रहे हैं ‘भाषा का प्रश्न‘ महज भाषा भर का नहीं होता, वह समूचे समाज को सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक व्यवस्था का भी अनिवार्य अंग होता है। क्या हमें यह नहीं दिखाई दे रहा कि अमेरिका और ब्रिटेन ‘ज्ञान समाज‘ के नाम पर, मात्र अपने सांस्कृतिक उद्योग की जड़ें गहरी करने में लगे हैं। ‘कल्चरल इकोनॉमी‘ उनकी अर्थव्यवस्था का तीसरा घटक है, जो अँग्रेजी सीखने-सिखाने के नाम पर अरबों डॉलर की पूंजी कमाना चाहते हैं। हिन्दी, यदि संसार की दूसरी सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा की चुनौतीपूर्ण सीमा लांघने को है, तब उसे एक धीमी मौत मारने के लिए उसका क्रिओलीकरण क्यों किया जा रहा है ? अभी षड्यंत्र की यह पहली अवस्था है, ‘स्मूथ डिस्लोकेशन ऑव वक्युब्लरि‘। अर्थात हिन्दी के शब्दों का चुपचाप अँग्रेजी के शब्दों द्वारा विस्थापन इसे सर्वग्रासी हो जाने दिया गया तो अंत में आखिरी प्रहार की अवस्था आ जाएगी और वह होगा, देवनागरी लिपि को बदलकर उसके स्थान पर रोमनलिपि को चला देना। यहाँ यह याद दिलाना जरूरी है कि 5 जुलाई 1928 को ‘यंग इंडियामें जब गाँधीजी ने लिखा कि अँग्रेजी साम्राज्यवादी भाषा है और इसे हम हटा कर रहेंगे’, तब गोरी हुकूमत अँग्रेजी के प्रसार प्रचार पर छह हजार पाऊण्ड खर्च करती थी (तब भी यह राशि बहुत ज्यादा थी)। गाँधीजी की इस घोषणा को सुनते ही उन्होंने लगे हाथ अँग्रेजी के प्रचार-प्रसार का बजट बढ़ा दिया। 1938 में बजट की राशि थी तीन लाख छियासी हजार पाऊण्ड। यदि अखबारों की होली जलाकर प्रकट किये गये इस विरोध के बाद हिन्दी के समाचार पत्रों मे भाषा के ‘क्रिओलीकरण‘ की गति तेज हो जाये तो यह स्पष्ट सूचना जायेगी कि भाषा संबंधी नीतियों के पीछे अँग्रेजी की ‘नवसाम्राज्यवादी‘ शक्तियाँ दृढ़ता के साथ काम कर रही हैं।

भाषा के ‘क्रियोलीकरण‘ के खिलाफ भड़की चिनगारी

 

इन्दौर। भूमंडलीकरण के सबसे बड़े हथियार ‘अंग्रेजी के नवसाम्राज्यवाद‘ का स्वागत जितने अधिक उत्साह से हमारे प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने किया, उसके पहले तमाम भारतीय भाषाओं, जिन्हें अंग्रेज नॉन-स्टेडंर्ड और वर्नाकुलर लैंग्विज कह के निरादृत करते थे-उनको नष्ट करने की खामोशी से की गई साजिश का नाम है- भाषा का ‘क्रियोलीकरण‘। इसके अंतर्गत हिंदी में ‘शामिल शब्दावली‘ की आड़ में अंग्रेजी के शब्दों की धीरे-धीरे इतनी तादाद बढ़ाई जा रही थी कि वह हिंदी न रह कर ‘हिंग्लिश‘ होने लगी। इसे स्थानीय भाषा में ‘भाषा का बखड़ैला‘ रूप कहा जाएगा। भाषा में शब्द का अनुपात अंग्रेजी का साठ तथा हिंदी का प्रतिशत चालीस का हो गया। किसी भी भाषा का अस्तित्व उसके ‘बोले गए रूप’ नहीं, ’छपित रूप’ से होता है। उस ‘रूप‘ को नष्ट कर देने से भाषा की ‘विचार शक्ति‘ खत्म हो जाती है- वह केवल रोजमर्रा के सामान्य बोलचाल की सामान्य कामकाजी भाषा बनकर अंत में खत्म हो जाती है।
सर्वग्रासी होते जाने वाली इस साजिश के विरूद्ध देश में 14 सितंबर, 2010 को हिंदी दिवस के अवसर पर सबसे पहले विरोध का श्रीगणेश किया इंदौर के बुद्धिजीवियों ने। चर्चित बुद्धिजीवी और समाजवादी चिंतक अनिल त्रिवेदी और आदिवासी बहुल क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता और कवि तपन भट्टाचार्य ने प्रतिनिधि बुद्धिजीवियों के साथ देशभर के हिंदी के करीब बीस-बाइस दैनिक समाचार पत्रों की, इंदौर के महात्मा गांधी प्रतिमा स्थल पर होली जलाई। इसमें प्रभु जोशी, जीवन सिंह ठाकुर, प्रकाश कांत, कृष्णकान्त निलोसे, शशिकांत गुप्ते, विश्वनाथ कदम, ईश्वरी रावल, श्रीमती जनक पलटा मिगिलिगन सहित लगभग पचास लोग शामिल हुए। उन्होंने नारे लगाए- ‘भाषा का क्रियोलीकरण, बंद करो बंद करो।‘ कुछ देर बाद गांधी प्रतिमा के आसपास जुटी भीड़ भी विरोध में शामिल हो गई।
सबसे पहले अनिल त्रिवेदी ने गांधी प्रतिमा को प्रणाम किया और कहा कि गांधी ने प्रतीकात्मक रूप से जिस तरह विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर एक सूचना दी थी, उस तरह हमने देश भर के हिंदी भाषा-भाषियों के साथ ही साथ समाचार-पत्रों के संचालकों, संपादकों तथा पत्रकारों को यह स्मृति दिलाई कि जिस भाषा का देश की आजादी की लड़ाई में अस्त्र की तरह इस्तेमाल करते हुए उसका विकास किया था, वही पत्रकारिता आज उस भाषा का ‘क्रियोलीकरण‘ कर रही है। अतः इसे अविलंब रोका जाए। उन्होंने अपना लिखित वक्तव्य पढ़ा- ‘आज हिंदी दिवस के अवसर पर हम इंदौर नगर के बुद्धिजीवी गांधी प्रतिमा के समक्ष देश भर के लगभग सभी हिंदी अखबारों की एक-एक प्रति जुटाकर उनकी होली जलाने के लिए एकत्र हुए हैं। हम सब जानते हैं कि जब निवेदन के रूप में किए जाते रहे संवादात्मक-प्रतिरोध असफल हो जाते हैं, तब विकल्प के रूप में एकमात्र यही रास्ता बचता है, जो हमें गांधीजी से विरासत में मिला है।
आज हिंदी के अखबारों की प्रतियों को जलाकर प्रतीकात्मक रूप से हम भारतीय समाचार-पत्रों, उनके संचालकों, पत्रकारों, संपादकों के साथ ही पूरे देश के हिंदी भाषा भाषियों को इस बात की स्मृति दिलाना चाहते हैं कि आज हम हिंदी का जो विकास देख रहे हैं, उसको बनाने और बढ़ाने में सबसे बड़ी और ऐतिहासिक भूमिका आजादी की लड़ाई में हथियार की तरह काम करने वाले हिंदी के समाचार-पत्रों ने ही निभाई थी, लेकिन दुर्भाग्यवश वही समाचार-पत्र जगत आज विकास के इतने चे सोपान पर चढ़ चुकी हिंदी को अंग्रेजी के नव साम्राज्यवाद को नष्ट करने पर उतारू हो चुका है। नतीजतन, स्थिति यह है कि पिछली एक शताब्दी में ब्रिटिश साम्राज्य ने हिंदी को जितनी क्षति नहीं पहंुचाई थी, आज उससे दस गुनी क्षति मात्र दस साल में हिंदी को हिंदी के समाचार पत्रों ने पहुंचा दी है।
यहां हम यह ऐतिहासिक तथा भाषा-वैज्ञानिक तथ्य याद दिलाना चाहते हैं कि दुनिया भर में भाषाओं के विकास का मुख्य आधार भाषा के बोले गए नहीं, बल्कि लिखित-रूप होता है। लिखित रूप ही किसी भाषा को अक्षुण्ण रखता है। लेकिन, आज हिंदी को सबसे बड़ा धोखा उसके लिखित-छपित शब्द की जगह से ही मिल रहा है। चीन की मंदारिन भाषा के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी-अधिक बोली जाने वाली हिंदी भाषा को बहुत सूक्ष्म और धूर्तयुक्ति से नष्ट किया जा रहा है, जिसे कहा जाता है, भाषा का ‘क्रियोलीकरण‘। आज का हमारा यह प्रतीकात्मक-प्रतिरोध हिंदी के अखबारों द्वारा चलाए जा रहे उसी खतरनाक ‘क्रिओलीकरण‘ की प्रक्रिया के विरूद्ध है।
‘क्रियोलीकरण‘ एक ऐसी युक्ति है, जिसके जरिए धीरे-धीरे खामोशी से भाषा को ऐसे खत्म किया जाता है कि उसके बोलने वाले को पता लगता ही नहीं कि यह सामान्य और सहज प्रक्रिया नहीं, बल्कि सुनियोजित षड्यंत्र है। जिसके पीछे अंग्रेजी भाषा का साम्राज्यवादी एजेंडा है।
‘क्रियोलीकरण‘ की प्रक्रिया का पहला चरण होता है, जिसे वे कहते हैं स्मूथ डिसलोकेशन आफ वक्युब्लरि अर्थात् मूल भाषा के शब्दों का धीरे-धीरे अंग्रेजी के शब्दों से विस्थापन। इस अवस्था को अखबारों ने अपनी सर्वग्रासी सीमा तक पहुंचा दी है। उदाहरण के लिए यह क्रिओलीकरण ठीक उस समय किया जा रहा है, जब हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की सीमित भाषाओं की सूची में शामिल करने के प्रयास बहुत तेज हो गए हैं। हिंदी के दैनंदिन शब्दों को बहुत तेजी से हटाकर उनके स्थान पर अंग्रेजी के शब्द लाए जा रहे हैं। मसलन, छात्र-छात्राओं की जगह स्टूडेंट्स/माता-पिता की जगह पेरेंट्स/अध्यापक की जगह टीचर्स/विश्वविद्यालय की जगह यूनिवर्सिटी/परीक्षा की जगह एक्जाम/अवसर की जगह अपार्चुनिटी/प्रवेश की जगह इंट्रेंस/संस्थान की जगह इंस्टीट्यूशन/चौराहे की जगह स्क्वायर/रविवार-सोमवार की जगह संडे-मंडे/भारत की जगह इंडिया। इसके साथ ही साथ पूरे के पूरे वाक्यांश भी हिंदी की बजाए अंग्रेजी के छपना/जैसे आऊट ऑफ रीच/बियांड एप्रोच/मॉरली लोडेड/कमिंग जनरेशन/डिसीजन मेकिंग/रिजल्ट ओरियंटेड प्रोग्राम आदि। वे कहते हैं, धीरे-धीरे स्थिति यह कर दो कि अंग्रेजी के शब्द 70 प्रतिशत तथा मूल भाषा के शब्द मात्र 30 प्रतिशत रह जाएं। और इसके चलते हिंदी का जो रूप बन रहा है, उसका एक स्थानीय अखबार में छपी खबर से दे रहे हैं।
इंग्लिश के लर्निंग बाय फन प्रोग्राम को स्टेट गव्हमेण्ट स्कूल लेवल पर इंट्रोड्यूस करे, इसके लिए चीफ मिनिस्टर ने डिस्ट्रिक्ट एज्युकेशन आफिसर्स की एक अर्जेंट मीटिंग ली, जिसकी डिटेल्ड रिपोर्ट प्रिंसिपल सेक्रेटरी जारी करेंगे।
इसके बाद वे दूसरा और अंतिम चरण बताते हैं- फाइनल असालट ऑन लैंग्विज। अर्थात् भाषा के पूरी तरह खात्मे के लिए ‘अंतिम हल्ला‘। और वह अंतिम प्रहार यह कि उसे भाषा की मूल लिपि को बदल कर रोमन कर दो। भाषा समाप्त। और कहने की जरूरत नहीं कि बहुत जल्दी अखबारों को साम्राज्यवादी सलाहकार की फौज समझाने वाली है कि हिंदी को देवनागरी के बजाए रोमन में छापना शुरू कर दीजिए। बीसवीं शताब्दी में सारी अफ्रीकी भाषाओं को अंग्रेजी की सम्राज्यवादी योजना के तहत इसी तरह खत्म किया गया और अब बारी भारतीय भाषाओं की है। इसलिए ‘हिंदी-हिंग्लिश‘, ‘बांग्ला-बांग्लिश‘, ‘तमिल-तमिलिश‘ की जा रही है। यह प्रतिरोध हिंदी के साथ ही तमाम भारतीय भाषाओं के ‘क्रिओलीकरण‘ के विरूद्ध है, जिसमें, गुजराती, मराठी, कन्नड़, उड़िया, असममिया आदि सभी भाषाएं शामिल हैं।
बहुत मुमकिन है कि देशभर के हिंदी भाषा-भाषियों के भीतर अपनी भाषा का बचाने की एक सामूहिक चेतना के जागृत होने के खतरे का अनुमान लगा कर अखबार जगत हिंदी के ‘क्रियोलीकरण‘ की प्रक्रिया एकदम तेज कर दें क्योंकि, जब 5 जुलाई, 1928 को यंग इंडिया में जब गाँधी ने ये लिखा था कि अंग्रेजी उपनिवेश की भाषा है और इसे हम हराकर रहेंगे, तब गोरी
हुकुमत अंग्रेजी के प्रचार-प्रसार पर तबके छह हजार पाउंड खर्च करती थी-वह राशि 1938 तक 3,86,000 पाउंड कर दी गई थी। बहरहाल, अंग्रेजी का जो ‘नया साम्राज्यवाद अमेरिका और इंग्लैण्ड की रणनीति के चलते बढ़ रहा है-उसमें हमारे यहां हाथ बंटाने के लिए देश का प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों मीडिया एकजुट हो गए हैं-हम उनकी इस खतरनाक मुहिम के विरोध का संकल्प लेते हैं।’

आदिवासी क्षेत्रों में काम करने वाले ख्यात समाजसेवी और कवि तपन भट्टाचार्य ने कहा-‘अंग्रेजी सुनियोजित और सुरक्षित ढंग से अपना ‘नया साम्राज्यवाद‘ खड़ा  कर रही है, जिसमें हमारा मीडिया और सत्ता भी शामिल है। याद रखिए, लार्ड मैकाले ने अंग्रेजी को भाषा से भाषा के स्तर पर चलाने की नीति बनाई, बाद में अंग्रेजी को शिक्षा समस्या बनाकर चलाया, लेकिन नहीं चल पाई। अलबत्ता, इससे उनको एक कटु अनुभव का सामना करना पड़ा कि एक मजबूत व्याकरण के आधारवाली मातृभाषा के चलते भारतीयों ने एक किताबी इंग्लिश सीखी और अव्वल दर्जे के आइ.सी.एस. हो गए; लेकिन अंग्रेजी भाषा को रोजमर्रा के जीवन में दूर तक प्रवेश नहीं दिया। बल्कि, बाहर ही रह गई। इसलिए, अब नई नीति तय की गई है, जिसमें उन्होंने भाषा-संस्कृति का गठबंधन करते हुए कहा कि अंग्रेजी को ‘स्ट्रक्चरली‘ पढ़ाया जाए, व्याकरण के जरिए नहीं। इसके लिए उन्होंने बच्चों के लिए कॉमिक्स चलाए, कार्टून फिल्में थोक के भाव में भारत के टेलिविजन चैनलों पर चलाई-और, एक मिथ्या ‘यूथ-कल्चर‘ बनाया, जिनका कुल मकसद अंग्रेजी भाषा तथा जीवन शैली को उन्माद की तरह उनसे जोड़ दें- जिसमें भाषा, भूषा और भोजन के स्तर पर वे उनके नए उपनिवेश के शिकंजे में आ जाएं और कहना न होगा कि आज के तमाम महाविद्यालयों में अध्ययन कर रही पीढ़ी को उन्होंने ‘माडर्न‘ (?) बना दिया है, जबकि वे ‘माडर्न‘ नहीं हुए, सिर्फ परम्परच्युत हुए हैं। एक ‘सामूहिक स्मृति‘ का शिकार हैं। वे अपनी-अपनी मातृभाषा को न केवल हेय समझते हैं, बल्कि उसे नष्ट करने के अभियान के जत्थों में बदल गए हैं। आज के तमाम हिंदी अखबार ‘यूथ-प्लस‘ या ‘यूथ फोरम‘ के नाम पर चार-चार चमकीले और चिकने पन्ने छाप रहे हैं-जिसमें एक-दो पृष्ठ अंग्रेजी में है और बाकी के दो पृष्ठ हिंग्लिश में, जिसमें, ‘लाइफ स्टाइल के फंडे’ सिखाए जा रहे हैं। हमें इसके साथ ही एफ.एम. रेडियो की भूमिका का भी विरोध करते हैं, जो केवल ‘क्रियोलीकृत‘ हिंदी बनाम हिंग्लिश में ही अपना प्रसारण करते हैं और पूरी की पूरी युवा पीढ़ी से उसकी भाषा छीन रहे हैं।
हिंदी के अखबारों की यह भूमिका अंग्रेजी तथा उसके जरिए सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की भारतीय समाज में स्थापना की है। हम इस स्तर पर भी भारतीय समाचार-पत्रों की दृष्टि का विरोध करते हैं कि वे अपने इस एजेंडे को अविलंब रोकें।’
इसके उपरांत हिंदी के लगभग दो दर्जन दैनिक अखबारों को जलाया गया। और सर्व सहमति से यह तय किया गया कि इन अखबारों की राख को विरोध प्रकट करने हेतु देश के माननीय सांसदों, विधायकों और समस्त समाचार पत्रों के संचालकों एवं संपादकों को भेजा जाएगा। साथ ही होली जलाने वाले कार्यक्रम के समय दिए गए वक्तव्यों को भी भेजा जाएगा।
अंत में तय किया गया कि इस विरोध की प्रक्रिया को निरंतरता देने के लिए विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के छात्रों के बीच जाकर मैदानी स्तर पर चेतना पैदा करने का काम और प्रक्रिया शुरू की जाएगी ताकि देश भर के युवा वर्ग को तथाकथित ‘यूथ कल्चर‘ के नाम पर अंग्रेजी तथा पश्चिम के सांस्कृतिक उद्योग की फूहड़ता के लिए ‘उन्माद‘ की हद तक पहुंचाने का काम स्थगित करते हुए उनके अंदर देश, राष्ट्र, समाज और परंपरा की वस्तुगत पहचान पैदा की जाए।
प्रस्तुति: शिवशंकर मालवीय

जनकवि नजीर अकबराबादी की होली पर कविताएं

होली

हिन्द के गुलशन में जब आती है होली की बहार।
जांफिशानी चाही कर जाती है होली की बहार।।
एक तरफ से रंग पड़ता, इक तरफ उड़ता गुलाल।
जिन्दगी की लज्जतें लाती हैं, होली की बहार।।
जाफरानी सजके चीरा आ मेरे शाकी शिताब।
मुझको तुम बिन यार तरसाती है होली की बहार।।
तू बगल में हो जो प्यारे, रंग में भीगा हुआ।
तब तो मुझको यार खुश आती है होली की बहार।।
और हो जो दूर या कुछ खफा हो हमसे मियां।
तो काफिर हो जिसे भाती है होली की बहार।।
नौ बहारों से तू होली खेलले इस दम नजीर।
फिर बरस दिन के उपर है होली की बहार।।

होली पिचकारी

हां इधर को भी ऐ गुंचादहन पिचकारी।
देखें कैसी है तेरी रंगविरंग पिचकारी।।

तेरी पिचकारी की तकदीद में ऐ गुल हर सुबह।
साथ ले निकले हैं सूरज की किरन पिचकारी।।

जिस पे हो रंग फिशां उसको बना देती है।
सर से ले पांव तलक रश्के चमन पिचकारी।।

बात कुछ बस की नहीं वर्ना तेरे हाथों में।
अभी आ बैठें यहीं बनकर  हमतंग पिचकारी।।

हो न हो दिल ही किसी आशिके शैदा का नजीर।
पहुंचा है हाथ में उसके बनकर पिचकारी।।