
स्पेन के वय्यादोलिद विश्वविद्यालय में आयोजित ‘यूरोपीय हिन्दी संगोष्ठी’ की संगोष्ठी के शैक्षिक निदेशक और विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्रीश चंद्र जैसवाल की रिपोर्ट-
स्पेन : यूरोप के विभिन्न देशों में विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण की स्थिति पर विचार-विमर्श के लिये वय्यादोलिद विश्वविद्यालय, स्पेन में 15, 16 और 17 मार्च, 2012 को ‘विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण : परिदृश्य’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें भारत सहित 21 देशों के 33 विद्वान सम्मिलित हुये।
संगोष्ठी का उद्घाटन वय्यादोलिद विश्वविद्यालय के उपकुलपति, स्पेन में भारत के राजदूत, वय्यादोलिद विश्वविद्यालय की डिप्टी डीन, कासा दे ला इण्डिया के निदेशक तथा संगोष्ठी के शैक्षिक निदेशक ने दीप प्रज्ज्वलन से किया। इसके बाद भारत सरकार के विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा का संदेश पढ़ा गया। विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रोफेसर मार्कोस साक्रिस्तान ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि प्रागैतिहासिक काल से ही वय्यादोलिद शहर तथा विश्वविद्यालय पर एशिया का प्रभाव पड़ा है। इन देशों की संस्कृति के प्रभाव से इस विश्वविद्यालय में एशियाई अध्ययन की परम्परा का सूत्रपात हुआ। वर्ष 2000 में एशियन स्टडीज़ सेंटर की स्थापना हुई । इस सेंटर ने भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के सौजन्य से यह संगोष्ठी आयोजित की। भारतीय दूतावास माद्रिद और कासा दे ला इण्डिया के पूर्ण सहयोग से ही स्पेन में पहली संगोष्ठी का सफल आयोजन हुआ।
मुख्य अतिथि स्पेन के भारतीय राजदूत सुनील लाल ने अपने भाषण में हिन्दी की संपन्न परम्परा का ज़िक्र करते हुए बताया कि अन्य भारतीय भाषाओँ के सम्पर्क में आने के कारण हिन्दी स्वयं लाभान्वित हुई है तथा उसने उन्हें भी लाभान्वित किया है। भारत की 22 स्वीकृत भाषाएँ उसकी बहुभाषिकता स्थिति को द्योदित करती हैं तथा राजभाषा के माध्यम से भारत की अनेकता में एकता परिलक्षित होती है। विश्व का सबसे बड़ा प्रजातंत्र भारतवर्ष 2050 तक सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था के रूप में उभरेगा और अन्तरराष्ट्रीय कार्य बल में महत्वपूर्ण भारतीय साझेदारी के कारण हिन्दी अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित होगी।
विश्व भारती, कोलकाता, भारत के प्रोवाइस चांसलर प्रोफेसर उदय नारायण सिंह ने ‘नया शतक नई दिशा- भारतीय भाषाओँ के शिक्षण की समस्याएं और संभावनाएं’ विषय पर बीज वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक भाषा की अपनी पहचान होती है और उसके पठन-पाठन की अपनी समस्याएं होती हैं। भारतीय बहुभाषिकता के वातावरण में हिन्दी पर अन्य भाषाओं का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। अंग्रेज़ी, स्थानीय भाषाएँ और बोलियाँ हिन्दी की शब्दावली और अक्सर संरचना को भी प्रभावित करती हैं। हिन्दी के विदेशी अध्येताओं को इसका ज्ञान अवश्य देना चाहिये। उन्हें भारतीय व्यवहार की स्थिति से अवगत कराना आवश्यक है। हिन्दी एक ओर मानक हिन्दी है, जो साहित्य में प्रयोग होती है तो दूसरी ओर बोलचाल की मिश्र हिन्दी है, जिसका प्रयोग आम जनता करती है और उसे टेलिविज़न पर भी देखा जा सकता है। ऐसी स्थिति में यह समझना आवश्यक है कि हिन्दी एक भाषा संसार का नाम है, सीमित क्षेत्र का वाचिक संप्रेक्षण माध्यम मात्र नहीं। हिन्दी भाषा शिक्षण के क्षेत्र में सम्प्रति हमारे समक्ष अनेक प्रकार की चुनौतियाँ हैं, जिसके लिये हमें कुछ अनोखे और असाधारण ढंग से सोचने-विचारने की आवश्यकता है।

प्रोफेसर श्रीश चंद्र जैसवाल
संगोष्ठी के शैक्षिक निदेशक, वय्यादोलिद विश्वविद्यालय के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर श्रीश चंद्र जैसवाल ने संगोष्ठी के आयोजकों की ओर से भारत सरकार के विदेश मंत्री का उनकी शुभकामनाओं के लिये आभार व्यक्त किया। उन्होंने वय्यादोलिद विश्वविद्यालय के रैक्टर प्रोफेसर मार्कोस साक्रिस्तान, वाइस रैक्टर प्रोफेसर लुईस सांतोस, एशियन स्टडीज़ सेंटर के प्रोफेसर ऑस्कर रामोस्त, कासा दे ला इण्डिया के निदेशक डॉक्टर गियर्मो आदि को सहयोग के लिये धन्यवाद दिया। उन्होंने पूर्व भारतीय राजदूत सुजाता मेहता तथा नये राजदूत सुनील लाल, काउंसलर बिराजा प्रसाद, सांस्कृतिक सचिव पोलोमी त्रिपाठी तथा काउंसलर पिल्लै को आभार व्यक्त किया। अंत में प्रोफेसर जैसवाल ने संगोष्ठी में 21 देशों से आये हुए सभी गणमान्य प्रतिभागियों का हार्दिक धन्यवाद किया।
संगोष्ठी के प्रथम शैक्षिक सत्र ‘पश्चिमी तथा मध्य यूरोप में हिन्दी शिक्षण : वर्तमान परिदृश्य’ की अध्यक्षता टेक्सस विश्वविद्यालय, ऑस्टिन, अमेरिका के प्रोफसेर हर्मन वैन ऑलफ़ेन ने की। इस सत्र में छह आलेख पढ़े गये।
लिस्बन विश्वविद्यालय, पुर्तगाल के प्रोफेसर अफज़ाल अहमद ने पुर्तगाल में हिन्दी शिक्षण का इतिहास बताते हुये आग्रह किया कि विद्यार्थियों को हिन्दी के ज्ञान के साथ-साथ भारत की विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्टता का ज्ञान भी कराया जाना चाहिये।
विएना विश्वविद्यालय, ऑस्ट्रिया की वरिष्ठ लेक्चरर अलका ऐत्रय चुडाल ने विएना में हिन्दी शिक्षण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य सामने रखा तथा वर्तमान पाठ्यक्रम की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वहाँ के विद्यार्थी योग, शास्त्रीय संगीत और भारतीय नृत्य से आकर्षित होकर बारीकी से उन्हें समझने के लिए हिन्दी पढ़ते हैं।
रोम विश्वविद्यालय, इटली की अलेस्सान्द्रा कोंसोलारो ने इटली में हिन्दी शिक्षण की जानकारी देते हुए इस तथ्य पर बल दिया कि विद्यार्थियों को हिन्दी के माध्यम से भारतीय संस्कृति में प्रवेश मिल जाता है। उन्होंने बताया कि इटली के व्यापारिक निगमों में हिन्दी का ज्ञान रखने वाले विद्यार्थियों को रोज़गार के अवसर भी मिल रहे हैं।
यॉर्क विश्वविद्यालय, इंग्लैंड के ऑनरेरी फ़ैलो महेंद्र किशोर वर्मा ने मानक हिन्दी या प्रामाणिक हिन्दी पर अपने आलेख में पाठ्य सामग्री चयन और पाठ्य सामग्री की रचना के विषय से सम्बन्धित बिन्दुओं पर प्रकाश डाला। उनके अनुसार भारत में हिन्दी के बदलते स्वरूप को ध्यान में रखते हुए मानक हिन्दी तथा प्रामाणिक हिन्दी के महत्व की व्याख्या की जानी चाहिये।
घेंट विश्वविद्यालय, बेल्जियम के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर रमेश चन्द्र शर्मा ने आग्रह किया कि हमें यूरोप के विश्वविद्यालयों में हिन्दी का एक सामाजिक वातावरण तैयार करना चाहिये, जिसमें एक ओर हिन्दी का भाषा वैज्ञानिक आधार हो, दूसरी ओर उसका एक सामाजिक आधार हो। उन्होंने एक ऐसे पाठ्यक्रम की आवश्यकता व्यक्त की, जो शब्द और संस्कृति दोनों का ज्ञान दे सके।
कासा एशिया, माद्रिद, स्पेन की हिन्दी प्राध्यापिका शेफ़ाली वर्मा ने स्पेन में हिन्दी के अध्येताओं के समक्ष आनेवाली व्यावहारिक कठिनाइयाँ रखीं और उनके समाधान के लिये आग्रह किया I
‘भाषा प्रौद्योगिकी और हिन्दी शिक्षण में उसका अनुप्रयोग’ विषय पर आधारित दूसरे शैक्षिक सत्र की अध्यक्षता केन्द्रीय हिन्दी शिक्षण मंडल, आगरा, भारत के उपाध्यक्ष प्रोफेसर अशोक चक्रधर ने की। इस सत्र के प्रारम्भ में श्रीश जैसवाल ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अध्ययन-अध्यापन तथा उसे विश्व भाषा के रूप में स्थापित करने के लिये कम्प्यूटर के अनुप्रयोग पर बल दिया।
अशोक चक्रधर ने कहा कि हिन्दी के प्रगामी प्रयोग के लिये भारत सरकार और विभिन्न संस्थानों को ही उत्तरदायी न माना जाये, वरन व्यक्तिगत स्तर पर इसके लिये प्रयास किये जायें। अपनी रोचक और प्रभावी पावर पौइन्ट प्रस्तुति के माध्यम से उन्होंने कंप्यूटर पर उपलब्ध आधुनिकतम अनुप्रयोग दिखाये, जो हिन्दी शिक्षण के लिए नितांत उपयोगी हैं। हिन्दी के मानकीकरण के सम्बन्ध में सभी के प्रयासों का स्वागत करते हुये उन्होंने कहा कि हमें अशुद्धियों को छोड़कर प्रबुद्धि पर ध्यान देना चाहिये।
तेलेविव विश्वविद्यालय, इजरायल में हिन्दी प्राध्यापक गेनादी श्लोम्पर ने हिन्दी पाठ्य सामग्री निर्माण में टेलिविज़न व रेडियो आदि के महत्व पर प्रकाश डाला। टी.वी. समाचार के आधार पर हिन्दी शिक्षण सामग्री तैयार करते हुये उन्होंने चुनाव, सामाजिक आंदोलन, अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्ध, खेलकूद आदि विषयक समाचारों को तथा भाषा की रोचकता और सुग्राह्यता को महत्व दिया।
एमेरेटस, टेक्सस विश्वविद्यालय, ऑस्टिन, अमेरिका के प्रोफेसर हर्मन वैन ऑल्फेन ने अमेरिका में हिन्दी शिक्षण सम्बन्धी इतिहास का परिचय देते हुये कहा कि भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों की संख्या में वृद्धि होने के कारण 1985 के बाद वहाँ हिन्दी शिक्षण का तेज़ी से प्रसार हुआ। उन्होंने पिछले पचास वर्षों में हिन्दी भाषा शिक्षण में प्रौद्योगिकी के प्रयोग का वर्णन करते हुये आधुनिक युग में उसकी उपयोगिता और नवीनतम विकासों के अनुप्रयोग पर बल दिया।
केम्ब्रिज विश्वविद्यालय, इंग्लैंड में हिन्दी प्राध्यापक ऐश्वर्य कुमार ने बताया कि यूरोपीय आर्थिक मंदी हिन्दी के पठन-पठान पर प्रभाव डाल रही है। हिन्दी के प्रति खुद हिन्दी भाषियों या भारतीयों की सोच मौजूदा स्थिति की जिम्मेदार है। इस मानसिकता को बदलना होगा।
लंदन, इंग्लैंड निवासी चर्चित लेखिका कविता वाचक्नवी ने भाषा प्रकार्यों के अधुनातन सन्दर्भ और हिन्दी विषय पर अपनी प्रस्तुति दी। उन्होंने वैश्वीकरण के सकारात्मक पक्षों के ऊपर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि हिन्दी विश्व में दूसरी सबसे बड़ी भाषा है, किन्तु इंटरनेट आदि माध्यमों के प्रयोग में अन्य भाषाभाषियों से काफ़ी पीछे है। उन्होंने हिन्दी भाषा समाज के लिये उपलब्ध सॉफ्टवेयर की विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि तकनीकी दृष्टि से हिन्दी को कंप्यूटर की चुनौती व प्रयोक्ता– सापेक्ष होने की यात्रा में बहुत आगे जाना अभी शेष है।
तृतीय शैक्षिक सत्र ‘शेष यूरोप में हिन्दी शिक्षण : वर्तमान परिदृश्य’ पर केन्द्रित था। इस सत्र की अध्यक्षता पश्चिम व पूर्व यूरोपीय विश्वविद्यालय, नैदरलैंड के प्रोफेसर मोहन कान्त गौतम ने की।
इस सत्र के पहले वक्तव्य में स्लोवेनिया विश्वविद्यालय, स्लोवोनिया के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर अरुण प्रकाश मिश्र ने अपने विश्वविद्यालय में हिन्दी अध्यापन की विस्तृत जानकारी देते हुये बताया कि वहाँ के विद्यार्थियों को व्याकरण आदि विषयों के साथ-साथ भारतीय संस्कृति का भी ज्ञान दिया जाता है। शीघ्र ही वहाँ भारतीय अध्ययन प्रकोष्ठ को वैधानिक मान्यता मिलेगी और उसके साथ ही हिन्दी शिक्षण में तीव्र गति से प्रगति होगी।
ज़ाग्रेब विश्वविद्यालय, क्रोएशिया में हिन्दी प्राध्यापक बिल्जाना ज्रनिक ने अपने विश्वविद्यालय में हिन्दी शिक्षण और हिन्दी विभाग की अन्य गतिविधियों पर प्रकाश डालते हुए अपने विद्यार्थियों की भाषा अधिगम सम्बन्धी समस्याएँ सामने रखीं तथा यह भी बताया कि वह कैसे उनका निदान करती हैं I
वारसा विश्वविद्यालय, पौलेण्ड के प्रोफेसर वादानूता स्तासिक ने विश्वविद्यालय में हिन्दी के नियमित अध्ययन-अध्यापन की चर्चा करते हुये बताया कि अब तक 90 विद्यार्थियों को हिन्दी एम.ए. की डिग्री मिल चुकी है। उन्होंने कहा कि हिन्दी हमारा भरण-पोषण करते हुए भूमंडलीकृत दुनिया में अपनी पहचान को भी स्थापित करने में सहायता देती है।
उप्साला विश्वविद्यालय, स्वीडन के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर हैंज़ वर्नर वेसलर ने विश्वविद्यालय में हिन्दी व संस्कृत के इतिहास का उल्लेख करते हुये कहा कि वहाँ हिन्दी शिक्षण की महत्वपूर्ण भूमिका है। वहाँ के विद्यार्थियों में हिन्दी मीडिया में अधिक दिलचस्पी है ।
मॉस्को विश्वविद्यालय, रूस में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर इंदिरा गाज़िएवा ने रूसी सरकारी मानविकी विश्वविद्यालय में हिन्दी शिक्षण का चित्र उपस्थित करते हुये अध्यापन में आने वाली कठिनाइयों का ज़िक्र किया।
मॉस्को स्टेट विश्वविद्यालय, रूस में एसोसि़एट प्रोफ़ेसर ल्युदमिला खोख्लोवा ने बताया कि साम्यवादी काल में विद्यार्थियों को हिन्दी के माध्यम से पार्टी साहित्य पढ़ाया जाता था, लेकिन रूस के पुनर्गठन के बाद हिन्दी शिक्षण पद्धति बदल गयी। विद्यार्थियों की भारतीय संस्कृति, धर्म में बहुत जिज्ञासा है और उनके अनुसार उनके विश्वविद्यालय में हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल है।
बुखारेस्ट विश्वविद्यालय, रूमानिया की लेक्चरर सबीना पोपर्लान ने बताया के वहाँ भारतीय दर्शन और चिंतन के अध्ययन की एक परम्परा रही है। उनके विश्वविद्यालय में भारतीय संस्कृति पर कई किताबें लिखी गई हैं। ज़्यादातर शोध कार्य भाषा विज्ञान से सम्बन्धित होता है।
एल्ते विश्वविद्यालय, बुडापेस्ट, हंगरी की विज़िटिंग प्रोफ़ेसर विजया सती ने कहा कि हंगरी में तीन वर्षों का इंडोलॉजी अध्ययन कराया जाता है I यहाँ का मूल उद्देश्य सम्वाद है, जिसके माध्यम से संस्कृति और हिन्दी की जानकारी भी दी जाती है, भारतीय संस्कृति से जुड़े उपादानों का परिचय भी दिया जाता है। हिन्दी को रोज़गारपरक बनाने की कोशिश की जाती है।
मोहन कान्त गौतम ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि हिन्दी के विकास की प्रक्रियाओं को हमें देखना है। हम इस क्षेत्र में आगे बढ़ते हुये मीडिया का उपयोग कर सकते हैं। हिन्दी को रोज़गारपरक बनाने की कोशिश होनी चाहिये। इससे हमारे यूरोपीय विद्यार्थी हिन्दी का प्रयोग अपने रोज़गार के लिये कर सकते हैं। हिन्दी भाषा का व्यावहारिक रूप अपनाना अधिक उपयुक्त है।
संगोष्ठी का चतुर्थ शैक्षिक सत्र ‘हिन्दी शिक्षण तथा पाठ्यक्रम सम्बन्धी समस्याएं तथा समाधान’ महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा, भारत के वाइस चांसलर विभूति नारायण राय की अध्यक्षता में संपन्न हुआ I
सत्र के प्रारम्भ में वर्धा विश्वविद्यालय के निदेशक जगन्नाथन वी.आर. ने हिन्दी की दो प्रमुख समस्याओं– संदर्भानुसार उपयुक्त पाठ्यक्रमों व सन्दर्भ ग्रंथों की कमी और भाषा व भाषा शिक्षण दोनों ही क्षेत्रों में मानकीकरण के अभाव को सामने रखा। उन्होंने लचीले, समस्तरीय और गुणता वाले पाठ्यक्रम के निर्माण पर बल दिया, जिसे अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जा सके और जो घटत्व के सिद्धांत का पालन करे। इस प्रकार सभी शैक्षिक संस्थाएं मानकीकरण के मंच पर एकत्र होकर देश-विदेश के विद्वानों द्वारा निर्मित पाठ्य सामग्री का लाभ ले सकेंगी।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, भारत के प्रोफेसर वैश्ना नारंग ने विदेशी भाषा के शिक्षण और भाषा को दूसरी भाषा के रूप में पढ़ाने के पक्षों के भेद उभारने का प्रयास किया। उन्होंने यूरोपीय सन्दर्भों में हिन्दी भाषा अध्ययन–अध्यापन प्रक्रिया के आधार पर हुये विदेशी भाषा अधिगम के अंतर्गत संज्ञान प्रक्रिया को स्पष्ट किया।
वारसा विश्वविद्यालय, पोलैंड के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर कैलाश नारायण तिवारी ने हिन्दी भाषा और साहित्य पढ़ाने के लिए विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों की विभिन्नता को समाप्त करते हुये एक उच्च स्तरीय मानक पाठ्यक्रम के निर्माण की बात कही, जिसमें उन्होंने भारतीय तथा विदेशी विद्वानों के पूर्ण सहयोग पर बल दिया ।

प्रोफेसर नवीन चन्द्र लोहानी
लूसान विश्वविद्यालय, स्विट्ज़रलैंड के नवीन चन्द्र लोहानी ने ‘हिन्दी साहित्य शिक्षण के लिये आलोचना मानदंडों की मुश्किलों’ पर चर्चा करते हुए बताया कि हिन्दी साहित्य को समझने के मानदंड संस्कृत, काव्य शास्त्र, पाणिनि व्याकरण तथा विश्व के आलोचनाशास्त्रों से प्राप्त वैचारिकी द्वारा मिले हैं।
सोफ़िया विश्वविद्यालय, बल्गारिया के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर नारायण राजू वी.एस.एस. सिरीवुरी ने हिन्दी शिक्षण में भारतीय सांस्कृतिक एवं सामाजिक सन्दर्भ का महत्व स्थापित किया।
लिस्बन विश्वविद्यालय, पुर्तगाल में लेक्चरर शिवकुमार सिंह ने पुर्तगाल में विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण व्यवस्था से सम्बधित चुनौतियों को प्रस्तुत किया। उन्होंने हिन्दी सीखने की प्रेरणा और शिक्षण पद्धतियों का ज़िक्र करते हुये सांस्कृतिक सन्दर्भों के महत्व को दर्शाया तथा यूरोप की स्थानीय भाषाओं में हिन्दी शिक्षण संसाधन तैयार करने पर बल दिया।
हैम्बर्ग विश्वविद्यालय, जर्मनी की तात्याना ओरन्स्कया ने हिन्दी शिक्षण के सम्बन्ध में विश्व हिन्दी दिवस के महत्व के बारे में विचार रखते हुए उसकी सकारात्मक भूमिका को स्वीकार किया तथा बताया कि यूरोपीय विश्वविद्यालयों में हिन्दी शिक्षण की समस्या के मूल में भारत की गृहभाषा- राजनीति ही नहीं, बल्कि अन्तरराष्ट्रीय आर्थिक और राजनीतिक तथ्य भी हैं।
कासा एशिया, बार्सीलोना, स्पेन में हिन्दी प्राध्यापक दीप्ति गुलानी ने स्पेन में हिन्दी भाषा अध्ययन की अपेक्षाओं और कठिनाइयों पर प्रकाश डाला। उन्होंने हिन्दी शिक्षण की व्यावहारिक समस्याओं का उल्लेख किया और बताया कि स्पेन में हिन्दी के प्रति दिलचस्पी बढ़ रही है।
इस सत्र के अंतिम वक्ता प्रोफेसर मोहन कान्त गौतम ने यूरोप में हिन्दी अध्ययन की विस्तृत समस्याएं और उनके समाधान पर अपनी प्रस्तुति दी। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यूरोपियन संसद यूरोप में प्रचलित सभी भाषाओं को मान्यता प्रदान करेगी और हिन्दी भाषा तथा इसका विशाल साहित्य यूरोप की सभ्यता को और अधिक संपन्न करेगा।
संगोष्ठी के समापन सत्र की अध्यक्षता प्रोफेसर उदय नारायण सिंह ने की। इस सत्र में चारों शैक्षिक सत्रों की रिपोर्ट क्रमशः विजया सती, शिव कुमार सिंह. रमेश शर्मा तथा ऐश्वर्य कुमार ने प्रस्तुत की। इसके बाद संगोष्ठी में उठे सभी मुद्दों पर व्यापक चर्चा हुई और अंत में संगोष्ठी की ओर से की जाने वाली संस्तुतियों पर विचार-विमर्श हुआ। गम्भीर चिंतन और पारस्परिक विचार विनिमय के बाद सर्वसम्मति से विदेश मंत्रालय के समक्ष निम्नलिखित संस्तुतियों को रखने का निर्णय हुआ–
1. आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन, न्यूयॉर्क की प्रमुख संस्तुति–‘अन्तरराष्ट्रीय मानक हिन्दी पाठ्यक्रम’ की परियोजना को क्रियान्वित किया जाये और उसमें हिन्दी के सामाजिक और सांस्कृतिक सन्दर्भों का समावेश किया जाये।
2. विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण में संलग्न भारतीय एवं भारतेतर प्राध्यापकों को भाषा शिक्षण प्रविधि, साहित्य शिक्षण प्रविधि, हिन्दी व्याकरण, हिन्दी का सामाजिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ आदि विषयों में प्रशिक्षित किया जाये।
3. यूरोप में इस प्रकार की शैक्षिक संगोष्ठियाँ विदेश मंत्रालय के सहयोग से हर दो वर्ष में नियमित रूप से आयोजित की जाएँ। वर्ष 2014 की यूरोपीय हिन्दी संगोष्ठी वारसा विश्वविद्यालय में आयोजित करने का प्रस्ताव है।
4. पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत एक 24 घंटे का हिन्दी भाषा चैनल प्रारम्भ किया जाये, जिसमें हिन्दी की सभी प्रयुक्तियाँ उपलब्ध हों तथा वेब पर हिन्दी की विशाल सामग्री को एक स्थान पर हिन्दी अध्येताओं को उपलब्ध कराया जाये।
5. अंग्रेज़ी से इतर विदेशी भाषाओं को दृष्टि में रखकर मल्टीमीडिया सहित हिन्दी शिक्षण सामग्री का निर्माण किया जाये।
6. विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण के लिए स्नातकोत्तर स्तर का पाठ्यक्रम विकसित किया जाये।
7. भारतीय संस्कृत संबंध परिषद द्वारा विभिन्न विदेशी विश्वविद्यालयों में हिन्दी पीठों की संख्या में वृद्धि की जाये।
8. हिन्दी साहित्य एवं हिन्दी शिक्षण की उपयोगी पुस्तकें तथा मल्टी मीडिया सामग्री उन सभी विश्वविद्यालयों को विदेश मंत्रालय द्वारा उपलब्ध कराई जायें, जहाँ हिन्दी अध्ययन अध्यापन की सुविधाएँ हैं।
9. अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के डायनमिक पोर्टल पर वर्चुअल क्लास रूम की व्यवस्था की जाये, जिसके माध्यम से विदेशों में अध्ययनरत हिन्दी विद्यार्थियों को हिन्दी साहित्य तथा हिन्दी भाषा के विद्वानों के विभिन्न विषयों पर व्याख्यान उपलब्ध कराये जायें।
10. विश्व में विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण से सम्बन्धित इन सभी संस्तुतियों के क्रियान्वयन के लिए विदेश मंत्रालय के अतिरिक्त भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा और विश्व हिन्दी सचिवालय, मॉरिशस उत्तरदायित्व लें तथा प्रभावी परियोजनायें बनायें।
समापन समारोह की अध्यक्ष एशियन स्टडीज़ की प्रोफेसर ब्लांका ने संगोष्ठी के सफल आयोजन पर बधाई दी। मुख्य अतिथि के रूप में विश्व हिन्दी सचिवालय, मॉरिशस की महासचिव पूनम जुनेजा ने संगोष्ठी की सार्थकता को रेखांकित किया। उन्होंने आश्वासन दिया कि विश्व हिन्दी सचिवालय संगोष्ठी द्वारा की गई संस्तुतियों पर अपेक्षित कार्रवाई करेगा। विशिष्ट अतिथि महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के उपकुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि संगोष्ठी द्वारा पारित सभी संस्तुतियों को क्रियान्वित करने का उत्तरदायित्व उनका विश्वविद्यालय लेता है। संगोष्ठी का समापन कासा दे ला इण्डिया के निदेशक डॉक्टर गियार्मो रोड्रगेज़ के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ।
संगोष्ठी के पहले दिन चिंतन और विचार मंथन के बाद शाम को कासा दे ला इण्डिया के सभागार में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें स्पेन के जिप्सी समुदाय के पारम्परिक नृत्य फ़्लेमेंको को उसके भारतीय स्रोत से जोड़ने का प्रयास किया गया। इसके साथ ही भरतनाट्यम, कत्थक, हंस वीणा, तबला और मृदंगम एवं फ़्लेमेंको नृत्य और गायन का अन्तरराष्ट्रीय कलाकारों ने अद्भुत समागम किया। स्पेन की प्रसिद्ध भरतनाट्यम विशेषज्ञ मोनिका देला फुएंते ने हरिवंश राय बच्चन की कविता ‘इस पार प्रिये तुम हो मधु है’ पर किया गया मोहक नृत्य दर्शनीय था।
Recent Comments