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अपनी भाषा का सवाल : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

अपनी भाषा को छोड़कर विदेशी भाषा को अपनाने से रचनात्‍मकता पर पड़ रहे दुष्‍प्रभावों पर कथाकार प्रेमपाल शर्मा का आलेख-

भाषा के मसले ने व्‍यक्ति, समाज और पूरी शिक्षा व्‍यवस्‍था को चौपट कर रखा है । नवम्‍बर, 2012 में एक प्रमुख मीडिया हाउस ने नई दिल्‍ली में दो द्विवसीय ‘लीडरशिप वार्ता’ आयोजित की थी। पिछले दस सालों में इस विमर्श में कभी-कभी जाने का सूयोग मिला है । कई दृष्टियों से उसे आपसी सम्‍वाद का एक महत्‍वपूर्ण अवसर कहा जा सकता है । एक सत्र में क्रि‍केट पर बातचीत थी जिसमें कपिल देव, अजय जड़ेजा, सुरेश रैना भी शामिल थे और संयोजक की भूमिका निभा रहे थे राजद्वीप सरदेशाई । कपिल से सम्‍वाद के सिलसिले में जब कहा गया कि भारतीय क्रिकेट के अस्‍सी के दशक में की टीम में आप शायद पहले खिलाड़ी थे जो कस्‍बे से राष्‍ट्रीय टीम में शामिल हुए थे तो उन्‍होंने ‘हाँ’ में सिर हिलाया लेकिन यह जोड़ते हुए कि कस्‍बे से ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण बात है कि मैं पहला खिलाड़ी था जिसे अंग्रेजी बोलनी नहीं आती थी और मुझे कैप्‍टन बनाने का विरोध इसी आधार पर हुआ कि अंतरराष्‍ट्रीय टीमों के साथ ऐसा कैप्‍टन अंग्रेजी में कैसे बात करेगा । कपिल के स्‍वर में गुस्‍सा उभर रहा था । उन्‍होंने अपनी बात विस्‍तार से बताई कि ‘मुझे कहना पड़ा कि अंग्रेजी जानने वाला कैप्‍टन चाहिए तो ऑक्‍सफोर्ड से मंगा लीजिए। क्रिकेट खेलना जरूरी है या अंग्रेजी बोलना । कुछ लोगों को इस बात पर एतराज था कि इनका अंग्रेजी में पंजाबी लहजा झलकता है । मैंने कहा कि मैं पंजाब से हूँ तो पंजाबी ही झलकेगी, अमेरिका तो नहीं ।’ पूरा हाल उनकी ईमानदारी पर तालियाँ पीट रहा था । इस सभाग्रह में वे मध्‍य वर्गीय बुद्धिजीवी, पत्रकार, नौकरशाह, उद्योगपति थे जो भारतीय भाषाएं जानते हों या नहीं अंग्रेजी जरूर जानते हैं । तालियों की गड़गड़ाहट थमने के बाद कपिल देव फिर भाषा के मसले पर और आगे बढ़े, ‘नये खिलाड़ी टीम में बाद में शामिल होते हैं यदि तीन दिन के लिए भी अमेरिका, इंग्‍लैंड या आस्‍ट्रेलिया चले जाएं तो उनका उच्‍चारण अमेरिकन लहजे का होने लगता है ।’ उन्‍होंने लगभग बिराते हुए ऐसे खिलाडि़यों का मजाक उड़ाया और कहा कि अंग्रेजी को इतना महत्‍व देने की जरूरत नहीं है ।

यूँ कपिल देव अब उसी नफासत की अंग्रेजी बोल लेते हैं जैसे हिन्‍दुस्‍तान के दिल्‍ली, बम्‍बई, कलकत्‍ता में कुछ साल रहा कोई पत्रकार या जागरूक नागरिक। लेकिन उनके साथ अंग्रेजी के नाम पर जो हुआ उसकी टीस उनके दिमाग में आज तक जिंदा है । इसी सत्र के तुरन्‍त बाद एक सत्र सिनेमा पर था जिसमें शाहरुख खान और कैटरीना कैफ थे । इसके संयोजक थे पत्रकार वीर सिंघवी । कैटरीना ने स्‍पष्‍ट किया कि क्‍योंकि मैं इंग्‍लैंड में पली-बढ़ी इसलिए मुझे शुरू के दो-तीन साल हिन्‍दी फिल्‍मों या हिन्‍दुस्‍तान में काम करने में बड़ी दिक्‍कतें पेश आईं । मेरा सोचने का तरीका अंग्रेजी में ही था । लेकिन पिछले दस सालों में हिन्‍दी फिल्‍मों में काम करते हुए देश के अलग-अलग हिस्‍सों में जाना पड़ता है, तब मुझे लगता है कि काश ! हिन्‍दी मेरी पहली भाषा होती तो मैं और सफल अभिनेत्री बन सकती थी ।

ये दो उदाहरण संभवत: पर्याप्‍त हैं इस बात को रेखाँकित करने के लिये कि अपनी भाषा का क्‍या महत्‍व है- वह चाहे हिन्‍दी हो, पंजाबी हो या कोई दूसरी भारतीय भाषा । आप जानते हैं कि भारतीय मानस के क्रिकेट और फिल्‍में कितनी करीब हैं । हिन्‍दी के प्रचार-प्रसार में जितना योगदान हिन्‍दी फिल्‍मों ने दिया है उतना भारत सरकार के सारे विभाग मिलकर भी नहीं कर सकते । मलेशिया, इंडोनेशिया, श्रीलंका जैसे देश हों या रूस, पाकिस्‍तान और अन्‍य देश । हिन्‍दी फिल्‍मों के दीवाने फिल्‍मों की बदौलत हिन्‍दी सीख रहे हैं । लेकिन अपने देश में इसके ठीक उलटा हो रहा है । बम्‍बई फिल्‍मों के एक निर्देशक अनुराग कश्‍यप ने पिछले दिनों एक इंटरव्‍यू में कहा कि ऐसे लोग बम्‍बई की फिल्‍मी दुनिया में कम-से-कम होते जा रहे हैं जो देवनागरी हिन्‍दी में लिखे सम्‍वाद पढ़ते हों । अमिताभ बच्‍चन, धर्मेन्‍द्र, नसीरुद्दीन, ओम पुरी जैसे अपवादों को छोड़ दें तो सभी अभिनेता और अभिनेत्रियों को सम्‍वाद अंग्रेजी, रोमन में लिख कर देने पड़ते हैं । उन्‍होंने उसी साक्षात्‍कार में यह भी कहा कि अच्‍छी हिन्‍दी के प्रयोग करने वालों की बम्‍बई में हँसी और उड़ाई जाती है । मौजूदा भारत में भाषा का प्रश्‍न इन जटिलताओं से गुजर रहा है और इसका अंजाम है चारों तरफ अंग्रेजी पढ़ने, सीखने की ऐसी होड़ कि न तो सही सीखाने वाले उपलब्‍ध हैं और न सीखने वाले ।

एक और प्रसंग- पिछले हफ्ते मोदीनगर में रह रहे मेरे एक करीबी का फोन आया कि उनके बेटे को इंजीनियरिंग पाठयक्रम में अंग्रेजी न जानने की वजह से बहुत परेशानी हो रही है । बच्‍चे से बातचीत करने पर पता लगा कि वह धीरे-धीरे निराशा की तरफ बढ़ रहा है । उसका कहना था कि मुझे गणित या इंजीनियरी या और किसी विषय को अंग्रेजी में लिखने में कोई परेशानी नहीं है । परेशानी है तो कुछ सामाजिक विषय जैसे- पर्यावरण, मानविकी के विषयों में उत्‍तर लिखने में । यहाँ गौर करने लायक बात यह है कि मोदीनगर मेरठ के नजदीक उस क्षेत्र में है जिसे खड़ी बोली का गढ़ माना जा सकता है । सिर्फ केन्‍द्र की ही भाषा हिन्‍दी नहीं, उत्‍तर प्रदेश, बिहार आदि राज्‍यों की भी भाषा हिन्‍दी है और सीधे शब्‍दों में यहाँ की जनता एक प्रतिशत भी अंग्रेजी नहीं जानती होगी। प्राचार्य से लेकर अध्‍यापक भी सभी हिन्‍दी भाषी हैं तो छात्र भी शतप्रतिशत आसपास के हिन्‍दी भाषा राज्‍यों के । उत्‍तर प्रदेश के इंजीनियरिंग कॉलेजों का स्‍तर अभी ऐसा नहीं उठा है, जहाँ दक्षिण भारतीय पढ़ने के लिए आएं । विदेशों छात्रों की तो बात ही छोडि़ए । तो फिर गुलामी की कौन सी परछाइयाँ हैं जिसकी सजा ये शिक्षक खुद भी भुगत रहे हैं और बच्‍चों को भी मजबूर कर रहे हैं । आखिर भाषा के अत्‍याचार से होने वाली आत्‍महत्‍याओं की घटनाओं तक से हम क्‍यों सबक नहीं ले रहे । न जाने कितने मामलों में हमारे बुद्धिजीवी, पत्रकार संविधान की दुहाई देते हैं । यहाँ तो संविधान में भी वही भाषा है जो इन राज्‍यों की । तो फिर कोई अपनी भाषा के लिए आंदोलन क्‍यों नहीं खड़ा हो रहा । लगता है हिन्‍दी पट्टी के ये राज्‍य यदि सफल हैं तो सिर्फ राजनीतिक सत्‍ता हथियाने, हड़पने के खेल में । सामाजिक परिवर्तन या उसकी किसी परेशानी से इनका दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं । हिन्‍दी लेखक एक परजीवी की तरह इन के पीछ-पीछे चलता है।

हाल ही में आस्‍ट्रेलिया के प्रधानमंत्री जुलिया हिलार्ड ने घोषणा की है कि आस्‍ट्रेलिया हिन्‍दी और चीनी भाषाओं को पढ़ने-पढ़ाने के विशेष इंतजाम करेगा । कारण आस्‍ट्रेलियाई सरकार का मानना है कि 2025 तक लगभग एक तिहाई आबादी इन भाषाओं को बोलने वालों की होगी । समाज और शिक्षा के सम्‍बन्‍ध ऐसी ही दूरदर्शिता से हल होते हैं । अंग्रेजी सीखने के प्रति कोई एतराज नहीं है । एतराज है जब उसको शिक्षा में इस रूप में लादा जाये कि बच्‍चों की रचनात्‍मकता ही खत्‍म हो जाये और वे अवसाद में जाने लगें । जब कपिल देव जैसे खिलाड़ी भी भाषा के दबाव में अवसाद के करीब पहुँचा दिये गये हों तो आम आदमी की तकलीफ की कल्‍पना कर सकते हैं । ऐसी खबरों की कोई कमी नहीं है जहां अच्‍छे पढ़े-लिखे स्‍नातकोतर माँ-बाप इसलिये अंग्रेजी सीख रहे हैं कि अंग्रेजी न जानने की वजह से निजी स्‍कूल उनके बच्‍चों को दाखिला नहीं दे रहे । इस प्रक्रिया में वे हीन भावना का शिकार हो रहे हैं । याद रखिये अभी भले ही भाषा का ये प्रश्‍न अन्‍दर ही अन्‍दर लोगों को परेशान कर रहा हो, लेकिन यदि ये मुद्दे कल सामूहिक गुस्‍से  का रूप लेकर हिंसा में तब्‍दील हो जायें तो कोई आश्‍चर्य नहीं । याद रखिये भाषा के मसलों ने दुनिया के कई देशों पाकिस्‍तान, बांग्‍लादेश को अलग-अलग किया है ।

सुनते हैं कि विकासशील समाज अध्‍ययन पीठ (सी.एस.डी.एस) जो अपनी स्‍थापना के 50 वर्ष 2013 के शुरू में पूरा कर रहा है उसकी भावी योजनाओं में हिन्‍दी और अन्‍य भारतीय भाषाओं में समाज विज्ञान, योजनाओं की परियोजनायें भी शामिल हैं । काश ! ऐसा हो जाए । और जितना जल्‍दी हो उतना ही अच्‍छा । भारतीय भाषाओं के लिये नहीं भारतीय लोकतंत्र के लिए भी यह बहुत बड़ी उपलब्धि‍ होगी ।

हिन्‍दी : दिल्‍ली की खिड़की से : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

अंग्रेजी को लेकर हमारी कुंठि‍त मानसि‍कता और हमारे दोगलेपन पर सुप्रसि‍द्ध लेखक और चिंतक प्रेमपाल शर्मा का आलेख-  

सितम्‍बर आ गया यानी कि कुछ के लिये हिन्‍दी के लिये जार-जार रोने का तो कुछ के लिये उसकी महानता गान का । शेष 99.99 प्रति‍शत इस सबसे बेखबर, निरपेक्ष, उदासीन या अपनी ही दुनिया में मस्‍त, व्‍यस्‍त या पस्‍त। हर कर्म को एक कर्मकांड या रीति में बदलने का पेटैंट दुनिया में इसी देश के नाम है । धर्म हो, विचार हो या शिक्षा हमें यथास्थिति को बस ढोए जाना है ।

दिल्‍ली उस हिन्‍दी क्षेत्र का हिस्‍सा है जो संविधान में स्‍वीकृत हिन्‍दी का केन्‍द्र बिन्‍दू है । यू.पी., हरियाणा से घिरा । ठेठ खड़ी बोली की खाट पर पसरा ठाट । पिछले दिनों से चुनाव के वक्‍त अथवा भोजपुरी, मैथिली के समर्थन में संख्‍या का दावा करते बिहार के लोग भी दिल्‍ली की आधी आबादी अपनी बताते हैं । जाहिर है इसमें देश के प्रसिद्ध साहित्‍यकार, प्राध्‍यापक, नौकरशाह, राजनीतिज्ञ सभी शामिल हैं । केवल शामिल ही नहीं उनकी ‘क्रीमी लेयर’ दिल्‍ली में रहती है । इन सब के बीच आइये दिल्‍ली में हिन्‍दी की स्थिति का जायजा लेते हैं ।

दिल्‍ली की एक हाउसिंग सोसायटी का अनुभव । आप दिल्‍ली स्थित किसी हाउसिंग सोसाइटी अथवा सरकारी, गैर-सरकारी दफ्तर, बैंक कहीं भी जाइये- प्रवेश रजिस्‍टर में शायद ही कोई हिन्‍दी में नाम-पता दर्ज करता हो । और उतना ही दुखद पक्ष यह है कि इन चौकीदारों में शायद ही कोई अंग्रेजी जानता हो । इन सोसायटियों में किसी सूचना के आदान-प्रदान के लिये जो भी नोटिस निकलता है वह अंग्रेजी में होता है। चाहे दरवाजे के अन्‍दर अनधिकृत कारों के प्रवेश का मामला हो अथवा सड़क पर पानी न फेंकने का या ऊपर से कूडा़ न गिराने का । यानि कि वे सब छोटे-मोटे आदेश, दिशा-निर्देश भी जो जिन कामवालियों, ड्राइवरों या मजदूर वर्ग के लिये संबोधित होते हैं । मयूर विहार में ऐसी ही एक सोसायटी के  चौकीदार से जब भी पूछा, इसमें क्‍या लिखा है तो उसका हर बार जवाब यही होता है, ‘हमें नहीं पता । हमें तो हिन्‍दी आती है । ये तो अंग्रेजी में है । हमें तो सिर्फ बाँटने का आदेश है ।’ जिस मैनेजर को नौकरी पर रखा हुआ है वो भी बेचारा हिन्‍दी ही जानता है । उसे अंग्रेजी आती तो ऐसी किसी सोसायटी की मैनेजरी करता ही क्‍यों । उसने विवशता में बताया कि हमारे सैक्रेटरी, प्रेसीडेंट अंग्रेजी में बनवाते हैं । कई साल तक इन प्रेसीडेंट की मनुहार, ललकार देशभक्ति आजमाने के बाद जो बात समझ में आई उसे हिन्‍दी या देश की भाषा संस्‍कृति के लिये शर्मनाक ही कहा जा सकता है । इन सोसायटी के ज्‍यादातर पदाधिकारी सेवानिवृत्‍त सरकारी बाबू होते हैं । जाहिर है सेवा के दौरान अनेकों विभागों को अपनी कार्यशैली सुस्‍ती, लालफीताशाही की बदौलत बरबाद कर चुके ये घिसे हुए बाबू भाषा समेत इन सभी बीमारियों को अपने घर और आसपास की सोसायटी में ला रहे हैं । ये बकर-बकर तो हिन्‍दी में ही करते हैं बस लिख नहीं सकते । क्‍योंकि जिस सरकारी ढाँचे में इन्‍होंने तीस-पैंतीस साल बिताए वहाँ ये अंग्रेजी ठीक करने उर्फ सुधारने की मश्‍क्‍कत में लगे रहे । अंग्रेजी तो इन्‍हें उतनी ही आई जितनी इनकी क्‍लर्की की संभावनाएं थीं हिन्‍दी जरूर भूल गये । हिन्‍दी न आने पर सरकारी तर्ज पर दंभ भी आ गया । करेला और नीम चढ़ा । इनमें भोजपुरी, मैथिली समेत वे सभी सूरमा भी शामिल हैं जो इन भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने को आतुर हैं । इसमें अन्‍ना के समर्थक भी हैं और विरोधी  भी ।

अब अचानक इन्‍हें कोई चार-छह लाइन हिन्‍दी में लिखने को कहे तो बेचारे हीं हीं से आगे नहीं बढ़ पाते । लिखेंगे तो खुद ही शर्मसार होंगे । यों सही तो उनकी अंग्रेजी भी नहीं होती लेकिन गलत अंग्रेजी में भी रौब, रुतबे और गालियों का अपना मजा है । एक मित्र का अनुभव सही है कि दिल्‍ली के किसी भी मॉल में नौकरी कर रहे नौजवानों से आप हिन्‍दी में चार-छह वाक्‍य भी नहीं लिखवा सकते । आने वाले दिनों में शायद पढ़ना भी ।

सोसायटी के इन प्रेसीडेंट, सैक्रेटरी की यह स्थिति तो तब है जब इनमें से ज्‍यादातर हिन्‍दी माध्‍यम या सरकारी स्‍कूलों में पढ़े हैं । बाबुओं की ऐसी सोसायटी से अच्‍छा अनुभव पड़ोस में छोटे व्‍यापारियों की सोसायटी ‘सदर अपार्टमेंट्स’ का है जिसमें हर नोटिस हिन्‍दी में हाथ से लिखा हुआ होता है । आज जनरल बॉडी की मीटिंग हुई शाम तक हिन्‍दी में उसका ब्‍योरा सभी के घर । जबकि हमारी अंग्रेजीदॉ सोसायटी के ब्‍योरे जिन्‍हें ये ‘मिनट्स और मीटिंग’ कहते हैं दो-चार महीने बाद ही सामने आते हैं । कई बाबुओं, सदस्‍यों, सैक्रेटरी, प्रेसीडेंट द्वारा अंग्रेजी में काट-पीट, सुधार के बाद । पैसा भी ज्‍यादा बरबाद, और कोई पढ़ता भी नहीं ।

मॉल और निजी कार्पोरेट क्षेत्र में काम करने वाली पीढ़ी का इसमें इतना दोष नहीं क्‍योंकि उन्‍हें हिन्‍दी माध्‍यम में पढ़ने-पढ़ाने की सुविधा तक उपलब्‍ध दिल्‍ली में नहीं हो पा रही । उस दिल्‍ली में जहाँ लोकतंत्र का सर्वोच्‍च सिहांसन है । जिसके जांबाज दिन-रात ‘समावेशी’ शब्‍द का इस्‍तेमाल करते नहीं थकते । दिल्‍ली स्थित यहाँ के सभी विश्‍वविद्यालय हिन्‍दी के अपमान के गुनहगार हैं । आपको याद होगा कि‍ पिछले वर्ष बिहार से दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में आकर पढ़ रहे बड़ी संख्‍या में विद्यार्थी इतिहास विषय में फेल हो गये थे । सिर्फ इसलिये कि उन्‍हें हिन्‍दी माध्‍यम में लिखने और पढ़ने की सुविधा ही नहीं मिली थी । यही हाल इस वर्ष राजनीति शास्‍त्र पढ़ रहे छात्रों का हुआ है । पचास प्रतिशत से अधिक या तो फेल हुए हैं या बहुत कम नंबर आये हैं । किसी वक्‍त अस्‍सी के दशक तक कैम्‍पस के स्‍नातकोत्‍तर विषयों में भी हिन्‍दी माध्‍यम की सुविधा उपलब्‍ध थी । आज दिल्‍ली भर में फैले लगभग अस्‍सी प्रतिशत कॉलेजों में अंग्रेजी में पढ़ाई की जा रही है । जामिया और जे.एन.यू. की कहानी भी इससे अलग नहीं है ।

जाने-माने शिक्षाविद्, वैज्ञानिक और भाषाविद् डॉक्‍टर दौलत सिंह कोठारी ने शिक्षा आयोग के अध्‍यक्ष (1964-1966) के रूप में अपनी सिफारिशों में पुरजोर से भारतीय  भाषाओं में उच्‍च शिक्षा देने की बात कही थी । संसद में विचार-विमर्श भी हुआ और उनकी सिफारिशों को तरजीह देते हुए भारतीय प्रशासनिक सेवा समेत केन्‍द्रीय सेवा में भी अपनी भाषा को माध्‍यम के रूप में वर्ष 1979 से संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में चुनने की छूट दी गई । डॉक्‍टर दौलत सिंह कोठारी ने जब कोठारी समिति (1974-1976) के अध्‍यक्ष के नाते जो रिपोर्ट प्रस्‍तुत की उसमें वर्ष 1974 में दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में अर्थशास्‍त्र, इतिहास, भूगोल हिन्‍दी माध्‍यम में पढ़ाए जाने के आंकड़े दिये हैं (समिति की सिफारिश 1.34 पृष्‍ठ 21) । उनकी दलील थी कि ये नौजवान भी उतने ही प्रतिभाशाली हैं जितने कि अंग्रेजी वाले । अपनी सिफारिशों के समर्थन में डॉक्‍टर कोठारी यहाँ तक कहते हैं कि ‘प्रशासनिक सेवाओं में आने वाला नौजवान यदि देश की भाषा नहीं जानता तो वह शासन की सेवा के लिये योग्‍य नहीं माना जा सकता । उनका यहाँ तक कहना है कि न केवल उन्‍हें देसी भाषाएं आनी चाहिए बल्कि उन्‍हें भारतीय साहित्‍य से भी परिचित होना चाहिए ।’

दिल्‍ली के बुद्धिजीवियों, प्राध्‍यापक, पत्रकारों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि 1974 से आज तक हम अपनी भाषाओं में शिक्षा देने के मामले में प्रगति कर रहे हैं या पतन की अंतिम सीमा तक पहुँच चुके हैं यानी दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में हिन्‍दी माध्‍यम से पढ़ाना लगभग शून्‍य हो गया है । हाल ही में इंडियन एक्‍सप्रेस में छपे (31 जुलाई, 2012) आँकड़े बताते हैं कि वर्ष 2011 सिविल सेवा परीक्षा में उससे पिछले वर्ष की तुलना में ग्रामीण पृष्‍ठभूमि से आए नौजवानों की संख्‍या 49 प्रतिशत से घटकर 29 प्रतिशत रह गई है । ऐसा इसलिये हुआ कि कोठारी समिति की संस्‍तुतियों के विपरीत सिविल सेवा परीक्षा के प्रथम चरण में ही अंग्रेजी की शुरुआत कर दी गई है । आँकड़े गवाह हैं कि इसका सबसे विपरीत प्रभाव गरीब पृष्‍ठभूमि के अपनी भाषाओं में पढ़ने वाले दलित, आदिवासियों पर पड़ेगा । क्‍या ये सब नीतियाँ समावेशी हैं या जन विरोधी ? भाषा के इतने महत्‍वपूर्ण मसले पर क्‍या दिल्‍ली में कोई बड़ी आवाज सुनने को मिली ? कोई रैली, धरना हुआ ? मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ के शब्‍दों को याद करके ‘यहाँ सब चुप हैं मंत्री, संतरी, नौकरशाह ——– ।’ कभी कोई आवाज सुनाई दी कि हम दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय समेत जामिया, जे.एन.यू. में हिन्‍दी माध्‍यम से पढ़ाये जाने के लिये आंदोलन करें । या दिल्‍ली सरकार को कम-से-कम दसवीं तक हिन्‍दी को अनिवार्य रूप से पढ़ाये जाने के लिये विवश करें । वरना उसके किसी कार्यक्रम में भागीदारी नहीं ।

बल्कि हो उल्‍टा रहा है । बकौल राजेन्‍द्र यादव के संपादकीय (हँस) हम मांग रहे हैं लेखकों के लिये अतिथिगृह, आराम, ठहरने की जगह । लेखक का सम्‍मान, समाज में उसकी रचनाओं के पढ़ाये जाने, उसकी भाषा में शासन-प्रशासन चलाने में है या सम्‍मान के मुकुट पहनने में ? अशोक वाजपेयी जी भाषा को बीमार या मरने से बचाने के बजाय लेखकों की बीमारी के लिये पतले हुए जा रहे हैं । क्‍या हमें सिर्फ लेखक की बीमारी ही दु:खी करती है ? ऑल इंडिया इंस्‍टीट्यूट, राम मनोहर लोहिया अस्‍पताल के बाहर बैठे हजारो गरीबों की नहीं ? यदि लेखक की भाषा, साहित्‍य बचेगा, उसे पढ़ा, पढ़ाया जाएगा तो अपनी बीमारी से मुक्ति तो लेखक को खुद-ब-खुद मिल जायेगी । क्‍या लेखकों के लिये ऐसे धर्मार्थ ट्रस्‍ट और किसी लालाओं के ट्रस्‍ट में कोई अंतर रहेगा ? लगता है जैसे इन सम्‍मानीय बुजुर्ग लेखकों ने साहित्‍य रचना न की हो कोई जंग जीती हो और अब सत्‍ता से पुरस्‍कार की अपेक्षा रखते  हैं । जब बड़े लेखक ऐसी बातें करें तो जनता क्‍यों सुनेगी ? उसे अब आपकी जुबान नहीं जीवन से प्रमाण चाहिए । हम सब हिन्‍दी के नाम पर पुरस्‍कार, पीठ, अतिथि-सत्‍कार की तलाश में हैं तो हमारी संततियाँ अंग्रेजी के देशी-विदेशी स्‍कूल, कॉलिजों की तरफ अग्रसर । सरकार द्वारा गठित ज्ञान आयोग पूरे जोर से अंग्रेजी की वकालत कर ही रहा है ।

कुछ दोस्‍त भाषा, संस्‍कृति की हर लड़ाई को ‘कार्पोटाइशन’ के चश्‍मे से देख रहे हैं । यह अति से ज्‍यादा सरलीकरण भी है, समस्‍या से बचकर भागना भी। वे कहते हैं यह सब कार्पोरेट घरानों और उनकी पूँजी का खेल है । चलो मान भी लिया लेकिन उन्‍हें जगह, रास्‍ता तो हमारी भूख और अकर्मण्‍यता ने ही दिखाया । आपकी भूख अंग्रेजी की  है । कई दलित चिंतक तो अंग्रेजी की इस भूख को पेट की भूख से भी बड़ी मानते हुए उसे देवी की तरह पूजते हैं । क्‍या अंदाज है सवर्णों के खिलाफ वैकल्पिक विमर्श का यानि कि अंग्रेजी के लिये सवर्ण, दलित, पिछड़े सभी की भूख एक समान । तो सरकार तो यह सब करने से रही । उसने दे दी आजादी निजी स्‍कूलों को । खुलेआम । वे पूँजी लगा रहे हैं अंग्रेजी पढ़ा, रटा रहे हैं और पैसा वसूल रहे हैं । सरकारी स्‍कूलों से भगदड़ शुरू होकर उनके दरवाजे पर लाइन लगी है । दुत्‍कार, फटकार के बाद भी अंग्रेजी की देहरी चाट रहे हैं। तो अफसोस क्‍यों ? कार्पोरेट पूँजी निजी अंग्रेजी स्‍कूलों में उसी मात्रा में बढ़ रही है जितनी अंग्रेजी की भूख । क्‍या विदेशी पूँजी देशी भाषा और संस्‍कृति को बढ़ावा देगी ? उनका पैसा, उनकी भाषा ।

कार्पोरेट पूँजी या अंग्रेजी बढ़ने का दूसरा कारण है हमारी अकर्मण्‍यता । एक विभाग सरकारी स्‍कूलों को दुरुस्‍त करना चाहता था यानी कि पढ़ाई में सुधार हो । एक अधिकारी ने सीधे समर्पण कर दिया । ‘कुछ नहीं हो सकता जी ! टीचर्स, कर्मचारी ऐसी पॉलिटिक्‍स में डूबे हैं कि पढ़ने-पढ़ाने की तो नौबत ही नहीं आती ।’ पॉलिटिक्‍स के लिये कार्पोरेट पूँजी तो जिम्‍मेदार नहीं है ? यह तो हमारी अपनी बीमारी है । स्‍कूल का प्रिंसीपल उत्‍तर प्रदेश, बिहार की तर्ज पर थाने के दारोगा की तरह अपनी जाति का चुना जाता है तो कभी वी.सी. अपनी पार्टी का । गनीमत है अभी स्‍कूलों में विद्यार्थी यूनियन के चुनाव नहीं पहुँचे । क्‍या इसे दिल्‍ली के एम्‍स के हश्र से नहीं समझा जा सकता ?  क्‍यों कैंसर के इलाज के लिये क्रिकेटर अमेरिका जाता है और कई पूर्व प्रधानमंत्री, मंत्री भी । और क्‍यों देश के लाखों छात्र अमेरिका, आस्‍ट्रेलिया ‘भारत छोड़ो’ आन्‍दोलन की तर्ज पर भाग रहे हैं । अधिकांश माँ-बाप की सारी कमाई को लेकर न आने की आशंका, उम्‍मीद के साथ । कार्पोरेट पूँजी तो अहसान ही कर रही है जो आपके दरवाजे पर खुद चलकर आ रही है । उसके आपकी तरफ धीमी चाल से तो आप खुद परेशान हो उठते हैं । राज्‍यों में होड़ लगी है कि मेरे यहाँ ज्‍यादा आयें । कोई अमेरिका के राष्‍ट्रपति को सीधे अपने यहाँ बुला रहा है तो कोई उसकी विदेश मंत्री से हाथ मिलाकर खुश हो रहा है । क्‍या भाषा के प्रश्‍न को इस कोण से देखना भी जरूरी नहीं है ?

मेरे और मेरे अमीर समाज के बच्‍चे इन्‍हीं अंग्रेज, कार्पोरेट स्‍कूलों में पढ़ते हैं । धीरे-धीरे उनके सपने इन्‍हीं कार्पोरेट कम्‍पनियों में सी.ई.ओ. या जो भी पद मिले बनने के हैं । अकर्मण्‍यता, जातिवाद, क्षेत्रवाद के चंगुल में फँसी सरकार की तरफ देखना तक नहीं चाहते । हारकर हम भी कहते हैं कार्पोरेट सेक्‍टर में जो भी मिले ले लो । मैं भी उन्‍हीं कार्पोरेट पूँजी द्वारा तैयार कार, गाड़ी में चलता हूँ । कपड़े, कंप्‍यूटर से लेकर मेरे आसपास की 99%  दुनिया उन्‍हीं की बनायी हुई है, सिर्फ दाल-रोटी को छोड़कर । मैं इनसे मुक्ति की बजाय इन सुविधाओं से और चिपटना चाहता हूँ ।

आजाद भारत की सरकार के सामाजिक, राजनीतिक विमर्श में धर्म, जाति, प्रांत को अलग-अलग साँचों और चालाक सुलझी भाषा में देखने की वैसी ही दृष्टि है जैसी किसी भी सत्‍ता, मुगल या अंग्रेज की रही होगी ।

और तो और हिन्‍दी लिखना शहर ही नहीं, अब गाँव भी भूलता जा रहा है । दिल्‍ली से सटे पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश के स्‍कूल, कॉलिज शिक्षा के नाम पर या तो शून्‍य हैं या नकल की  डिग्रियाँ बाँट रहे हैं । इसका प्रमाण मिलता है उनके आवेदन पत्र या पत्रों से । स्‍कूल के प्रिंसीपल या प्रबंधक या दोनों ने मिलकर उत्‍तर प्रदेश के नये मुख्‍य मंत्री को पत्र लिखा है । स्‍कूल की समस्‍याओं को उठाते हुए । है भगवान ! जब प्रधानाचार्य के हिन्‍दी के लिखे एक पन्‍ने के पत्र में इतनी गलतियाँ हो सकती हैं तो पूरे स्‍कूल के स्‍तर का अंदाजा लगाया जा सकता है । दो बातें- एक तो पत्र लिखने का न कोई रिवाज रहा, न भाषा पर अधिकार । पिछले बीस बरसों में अंग्रेजी ने इन सभी का हिन्‍दी के प्रति मोह भंग कर दिया है । मोबाइल हाथ में है । बच्‍चों को कंप्‍यूटर सिखाना चाहते हैं । पढ़ाई की कक्षाओं में यदि विद्यार्थी है तो केवल इंगलिश स्‍पीकिंग के कोचिंग सेंटर में ।

ऐसे में दिल्‍ली वासी या हिन्‍दी प्रांतों में लोग हिन्‍दी लिखना भूल जायें तो क्‍या आश्‍चर्य ।

प्रसिद्ध अफ्रीकी लेखक न्‍यूगी वा थ्‍योंगो अपने लेख ‘भाषा का साम्राज्‍यवाद’ (तीसरी दुनिया : संपादक आनंद स्‍वरूप वर्मा) में लिखते हैं कि अंग्रेजी सत्‍ता की भाषा है जिसे इन देशों में बहुत छोटा समूह ही बोलता है । देशी भाषायें यदि बची हुई हैं तो अधिसंख्‍यक गरीब, मजदूरों की वजह से ।

लेकिन भारत में न केवल अमीरों को बल्कि गरीब दलितों को भी कार्पोरेट, विदेशी पैसा भरमा रहा है ।

विज्ञापनों की चिंघाड़ती भाषा के सामने इसीलिये सितम्‍बर में हिन्‍दी का जाप करने से कुछ नहीं होने वाला। वक्‍त आ गया है जब जुबान की बजाय हम सबके जीवन में अपनी भाषाएं शामिल हों । और इसकी शुरूआत दिल्‍ली से करनी होगी जो देश की राजधानी भी है और हिन्‍दी भाषा और साहित्‍य की भी ।

हिन्‍दी एक भाषा संसार : उदय नारायण सिंह

स्‍पेन के वय्यादोलिद विश्‍वविद्यालय में आयोजि‍त ‘यूरोपीय हि‍न्‍दी संगोष्‍ठी’ की संगोष्ठी के शैक्षिक निदेशक और विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसर श्रीश चंद्र जैसवाल की रि‍पोर्ट-

स्‍पेन : यूरोप के विभिन्न देशों में विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण की स्‍थि‍ति‍ पर वि‍चार-वि‍मर्श के लि‍ये वय्यादोलिद विश्‍वविद्यालय, स्‍पेन में 15, 16 और 17 मार्च, 2012 को ‘विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण : परिदृश्य’ वि‍षय पर संगोष्‍ठी का आयोजन कि‍या गया। इसमें भारत सहित 21 देशों के 33 विद्वान सम्मिलित हुये।

संगोष्ठी का उद्घाटन वय्यादोलिद विश्‍वविद्यालय के उपकुलपति, स्पेन में भारत के राजदूत, वय्यादोलिद विश्‍वविद्यालय की डिप्टी डीन, कासा दे ला इण्‍डि‍या के निदेशक तथा संगोष्ठी के शैक्षिक निदेशक ने दीप प्रज्ज्वलन से किया। इसके बाद भारत सरकार के विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा का संदेश पढ़ा गया। विश्‍वविद्यालय के उपकुलपति प्रोफेसर मार्कोस साक्रिस्तान ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि प्रागैतिहासिक काल से ही वय्यादोलिद शहर तथा विश्‍वविद्यालय पर एशिया का प्रभाव पड़ा है। इन देशों की संस्कृति के प्रभाव से इस विश्‍वविद्यालय में एशियाई अध्ययन की परम्परा का सूत्रपात हुआ। वर्ष 2000 में एशियन स्टडीज़ सेंटर की स्थापना हुई । इस सेंटर ने भारत सरकार के विदेश  मंत्रालय के सौजन्य से यह संगोष्ठी आयोजित की। भारतीय दूतावास माद्रिद और कासा दे ला इण्‍डि‍या के पूर्ण सहयोग से ही स्पेन में  पहली संगोष्ठी का सफल आयोजन हुआ।

मुख्‍य अति‍थि‍ स्पेन के भारतीय राजदूत सुनील लाल ने अपने भाषण में हिन्‍दी की संपन्न परम्‍परा का ज़िक्र करते हुए बताया कि अन्य भारतीय भाषाओँ के सम्‍पर्क में आने के कारण हिन्‍दी स्वयं लाभान्वित हुई है तथा उसने उन्हें भी लाभान्वित किया है। भारत की 22 स्वीकृत भाषाएँ उसकी बहुभाषिकता स्थिति को द्योदित करती हैं  तथा राजभाषा के माध्यम से भारत की अनेकता में एकता परिलक्षित होती है। विश्‍व का सबसे  बड़ा प्रजातंत्र भारतवर्ष 2050 तक सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था के रूप में उभरेगा और अन्तरराष्ट्रीय कार्य बल में महत्वपूर्ण भारतीय साझेदारी के कारण हिन्‍दी अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित होगी।

विश्‍व भारती, कोलकाता, भारत के प्रोवाइस चांसलर प्रोफेसर उदय नारायण सिंह ने ‘नया शतक नई दिशा- भारतीय भाषाओँ के शिक्षण की समस्याएं और संभावनाएं’ विषय पर बीज वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक भाषा की अपनी पहचान होती है और उसके पठन-पाठन की अपनी समस्याएं होती हैं। भारतीय बहुभाषिकता के वातावरण में हिन्‍दी पर अन्य भाषाओं का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। अंग्रेज़ी, स्थानीय भाषाएँ और  बोलियाँ हिन्‍दी की शब्दावली और अक्सर संरचना को भी प्रभावित करती हैं। हिन्‍दी के विदेशी अध्येताओं को इसका ज्ञान अवश्य देना चाहिये। उन्हें भारतीय व्यवहार की स्थिति से अवगत कराना आवश्यक है। हिन्‍दी एक ओर मानक हिन्‍दी है, जो साहित्य में प्रयोग होती है तो दूसरी ओर बोलचाल की मिश्र हिन्‍दी है, जिसका प्रयोग आम जनता करती है और उसे टेलिविज़न पर भी देखा जा सकता है। ऐसी स्थिति में यह समझना आवश्यक है कि हिन्‍दी एक भाषा संसार का नाम है, सीमित क्षेत्र का वाचिक संप्रेक्षण माध्यम मात्र नहीं। हिन्‍दी भाषा शिक्षण के क्षेत्र में सम्प्रति हमारे समक्ष  अनेक प्रकार की चुनौतियाँ हैं, जिसके लिये हमें कुछ अनोखे और असाधारण ढंग से सोचने-विचारने की आवश्यकता है।

प्रोफेसर श्रीश चंद्र जैसवाल

संगोष्ठी के शैक्षिक निदेशक, वय्यादोलिद विश्‍वविद्यालय के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर श्रीश चंद्र जैसवाल ने संगोष्ठी के आयोजकों की ओर से भारत सरकार के विदेश मंत्री का उनकी शुभकामनाओं के लि‍ये आभार व्यक्त कि‍या। उन्‍होंने वय्यादोलिद विश्‍वविद्यालय के रैक्टर प्रोफेसर मार्कोस साक्रिस्तान, वाइस रैक्टर प्रोफेसर लुईस सांतोस, एशियन स्टडीज़ सेंटर के प्रोफेसर ऑस्कर रामोस्त, कासा दे ला इण्‍डि‍या के निदेशक डॉक्‍टर गियर्मो आदि‍ को सहयोग के लि‍ये धन्‍यवाद दि‍या। उन्होंने पूर्व भारतीय राजदूत सुजाता मेहता तथा  नये राजदूत सुनील लाल, काउंसलर बिराजा प्रसाद, सांस्कृतिक सचिव पोलोमी त्रिपाठी तथा काउंसलर पिल्लै को आभार व्यक्त कि‍या। अंत में प्रोफेसर जैसवाल ने संगोष्ठी में 21 देशों से आये हुए सभी गणमान्य प्रतिभागियों का हार्दिक धन्यवाद किया।

संगोष्ठी के प्रथम शैक्षिक सत्र ‘पश्‍चि‍मी तथा मध्य यूरोप में हिन्दी शिक्षण : वर्तमान परिदृश्य’ की अध्यक्षता टेक्सस विश्‍वविद्यालय, ऑस्टिन, अमेरिका के प्रोफसेर हर्मन वैन ऑलफ़ेन ने की। इस सत्र में छह आलेख पढ़े गये।

लिस्बन विश्‍वविद्यालय, पुर्तगाल के प्रोफेसर अफज़ाल अहमद ने पुर्तगाल में हिन्दी शिक्षण का इतिहास बताते हुये आग्रह किया कि विद्यार्थियों को हिन्दी के ज्ञान के साथ-साथ भारत की विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्टता का ज्ञान भी कराया जाना चाहिये।

विएना विश्‍वविद्यालय, ऑस्ट्रिया  की वरि‍ष्‍ठ लेक्‍चरर अलका ऐत्रय चुडाल ने विएना में हिन्दी शिक्षण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य सामने रखा तथा वर्तमान पाठ्यक्रम की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वहाँ के विद्यार्थी योग, शास्त्रीय संगीत और भारतीय नृत्य से आकर्षित होकर बारीकी से उन्हें समझने के लिए हिन्दी पढ़ते हैं।

रोम विश्‍वविद्यालय, इटली की  अलेस्सान्द्रा कोंसोलारो ने इटली में हिन्दी शिक्षण की जानकारी देते हुए इस तथ्य पर बल दिया कि विद्यार्थियों को हिन्दी के माध्यम से भारतीय संस्कृति में प्रवेश मिल जाता है। उन्होंने बताया कि इटली के व्यापारिक निगमों में हिन्दी का ज्ञान रखने वाले विद्यार्थियों को रोज़गार के अवसर भी मिल रहे हैं।

यॉर्क विश्‍वविद्यालय, इंग्‍लैंड के ऑनरेरी फ़ैलो महेंद्र किशोर वर्मा ने मानक हिन्दी या प्रामाणिक हिन्दी पर अपने आलेख में पाठ्य सामग्री चयन और पाठ्य सामग्री की रचना के विषय से सम्‍बन्‍धि‍त बिन्‍दुओं पर प्रकाश डाला। उनके अनुसार भारत में हिन्दी के बदलते स्वरूप को ध्यान में रखते हुए मानक हिन्दी तथा प्रामाणिक हिन्दी के महत्व की व्याख्या की जानी चाहिये।

घेंट विश्‍वविद्यालय, बेल्जियम के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर रमेश चन्द्र शर्मा ने आग्रह किया कि हमें यूरोप के विश्‍वविद्यालयों में हिन्दी का एक सामाजिक वातावरण तैयार करना चाहिये, जिसमें एक ओर हिन्दी का भाषा वैज्ञानिक आधार हो, दूसरी ओर उसका एक सामाजिक आधार हो। उन्होंने एक ऐसे पाठ्यक्रम की आवश्यकता व्यक्त की, जो शब्द और संस्कृति दोनों का ज्ञान दे सके।

कासा एशि‍या, माद्रिद, स्‍पेन की हि‍न्दी प्राध्‍यापि‍का शेफ़ाली वर्मा ने स्पेन में  हिन्‍दी के अध्येताओं के समक्ष आनेवाली व्यावहारिक कठिनाइयाँ रखीं और उनके समाधान के लिये आग्रह किया I
‘भाषा प्रौद्योगिकी और हिन्‍दी शिक्षण में उसका अनुप्रयोग’ विषय पर आधारित दूसरे शैक्षिक सत्र की अध्यक्षता केन्द्रीय हिन्‍दी शिक्षण मंडल, आगरा, भारत के उपाध्यक्ष  प्रोफेसर अशोक चक्रधर ने की। इस सत्र के प्रारम्‍भ में श्रीश जैसवाल ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अध्ययन-अध्यापन तथा उसे विश्‍व भाषा के रूप में स्थापित करने के लिये कम्प्यूटर के अनुप्रयोग पर बल दिया।

अशोक चक्रधर ने कहा कि हिन्दी के प्रगामी प्रयोग के लिये भारत सरकार और विभिन्न संस्थानों को ही उत्तरदायी न माना जाये, वरन व्यक्तिगत स्तर पर इसके लिये प्रयास किये जायें। अपनी रोचक और प्रभावी पावर पौइन्ट प्रस्तुति के माध्यम से उन्होंने कंप्यूटर पर उपलब्ध आधुनिकतम अनुप्रयोग दिखाये, जो हिन्दी शिक्षण के लिए नितांत उपयोगी हैं। हिन्दी के मानकीकरण के सम्‍बन्‍ध में सभी के प्रयासों का स्वागत करते हुये उन्होंने कहा कि हमें अशुद्धियों को छोड़कर प्रबुद्धि पर ध्यान  देना चाहिये।

तेलेविव विश्‍वविद्यालय, इजरायल में हि‍न्‍दी प्राध्‍यापक गेनादी श्‍लोम्‍पर ने हिन्दी पाठ्य सामग्री निर्माण में टेलिविज़न व रेडियो आदि के महत्व पर प्रकाश डाला। टी.वी. समाचार के आधार पर हिन्दी शिक्षण सामग्री तैयार करते हुये उन्होंने चुनाव, सामाजिक आंदोलन, अन्तरराष्ट्रीय सम्‍बन्‍ध, खेलकूद आदि विषयक समाचारों को तथा भाषा की रोचकता और सुग्राह्यता को महत्व दिया।

एमेरेटस, टेक्सस विश्वविद्यालय, ऑस्टिन, अमेरिका के प्रोफेसर हर्मन वैन ऑल्फेन ने अमेरिका में हिन्दी शिक्षण सम्‍बन्‍धी इतिहास का परिचय देते हुये कहा कि भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों की संख्या में वृद्धि होने के कारण 1985 के बाद वहाँ हिन्दी शिक्षण का तेज़ी से प्रसार हुआ। उन्होंने पिछले पचास वर्षों में हिन्दी भाषा शिक्षण में प्रौद्योगिकी के प्रयोग का वर्णन करते हुये आधुनिक युग में उसकी उपयोगिता और नवीनतम विकासों के अनुप्रयोग पर बल दिया।

केम्ब्रिज विश्‍वविद्यालय, इंग्लैंड में हि‍न्‍दी प्राध्‍यापक ऐश्‍वर्य कुमार ने बताया कि यूरोपीय आर्थिक मंदी हिन्दी के पठन-पठान पर प्रभाव डाल रही है। हिन्दी के प्रति खुद हिन्दी भाषियों या भारतीयों की सोच मौजूदा स्थिति की जिम्मेदार है। इस मानसिकता को बदलना होगा।

लंदन, इंग्‍लैंड नि‍वासी चर्चित लेखि‍का कविता वाचक्नवी ने भाषा प्रकार्यों के अधुनातन सन्दर्भ और हिन्दी विषय पर अपनी प्रस्तुति दी। उन्होंने वैश्‍वीकरण के सकारात्मक पक्षों के ऊपर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि हिन्दी विश्‍व में दूसरी सबसे बड़ी भाषा है, किन्तु इंटरनेट आदि माध्यमों के प्रयोग में अन्य भाषाभाषियों से काफ़ी पीछे है। उन्होंने हिन्दी भाषा समाज के लिये उपलब्ध सॉफ्टवेयर की विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि तकनीकी दृष्टि से हिन्दी को कंप्यूटर की चुनौती व प्रयोक्ता– सापेक्ष होने की यात्रा में बहुत आगे जाना अभी शेष है।

तृतीय शैक्षिक सत्र ‘शेष यूरोप में हिन्दी शिक्षण : वर्तमान परिदृश्य’ पर केन्‍द्रि‍त था। इस सत्र की अध्‍यक्षता पश्‍चि‍म व पूर्व यूरोपीय विश्‍वविद्यालय, नैदरलैंड के प्रोफेसर मोहन कान्त गौतम ने की।
इस सत्र के पहले वक्तव्य में  स्लोवेनिया विश्‍वविद्यालय, स्‍लोवोनि‍या के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर अरुण प्रकाश मिश्र ने अपने विश्‍वविद्यालय में  हिन्दी अध्यापन की विस्तृत जानकारी देते हुये बताया कि वहाँ के विद्यार्थियों को व्याकरण आदि विषयों के  साथ-साथ भारतीय संस्कृति का भी ज्ञान दिया जाता है। शीघ्र ही वहाँ भारतीय अध्ययन प्रकोष्ठ को वैधानिक मान्यता मिलेगी और उसके साथ ही हिन्दी शिक्षण में तीव्र गति से प्रगति होगी।

ज़ाग्रेब विश्‍वविद्यालय, क्रोएशिया में हि‍न्‍दी प्राध्‍यापक बिल्जाना ज्रनिक ने अपने विश्‍वविद्यालय में हिन्दी शिक्षण और हिन्‍दी विभाग की अन्य गतिविधियों पर प्रकाश डालते हुए अपने विद्यार्थियों की भाषा अधिगम सम्बन्धी समस्याएँ सामने रखीं तथा यह भी बताया कि वह कैसे उनका निदान करती हैं I

वारसा विश्‍वविद्यालय, पौलेण्ड के प्रोफेसर वादानूता स्तासिक ने विश्‍वविद्यालय में हिन्दी के नियमित अध्ययन-अध्यापन की चर्चा करते हुये बताया कि अब तक 90 विद्यार्थियों को हिन्दी एम.ए. की डिग्री मिल चुकी है। उन्होंने कहा कि हिन्दी हमारा भरण-पोषण करते हुए भूमंडलीकृत दुनिया में अपनी पहचान को भी स्थापित करने में सहायता देती है।

उप्साला विश्‍वविद्यालय, स्वीडन के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर हैंज़ वर्नर वेसलर ने विश्‍वविद्यालय में हिन्दी व संस्कृत के इतिहास का उल्लेख करते हुये कहा कि वहाँ हिन्दी शिक्षण की महत्वपूर्ण भूमिका है। वहाँ के विद्यार्थियों में हिन्‍दी मीडिया में अधिक दिलचस्पी है ।

मॉस्को विश्‍वविद्यालय, रूस में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर इंदिरा गाज़िएवा ने रूसी सरकारी मानविकी विश्‍वविद्यालय में हिन्दी शिक्षण का चित्र उपस्थित करते हुये अध्यापन में आने वाली कठिनाइयों का ज़िक्र किया।

मॉस्को स्टेट विश्‍वविद्यालय, रूस  में एसोसि़एट प्रोफ़ेसर ल्युदमि‍ला खोख्लोवा ने बताया कि साम्यवादी काल में विद्यार्थियों को हिन्दी के माध्यम से पार्टी साहित्य पढ़ाया जाता था, लेकिन रूस के पुनर्गठन के बाद हिन्दी शिक्षण पद्धति बदल गयी। विद्यार्थियों की भारतीय संस्कृति, धर्म में बहुत जिज्ञासा है और उनके अनुसार उनके विश्‍वविद्यालय में हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल है।

बुखारेस्‍ट विश्‍वविद्यालय, रूमानि‍या की लेक्‍चरर सबीना पोपर्लान ने बताया के वहाँ भारतीय दर्शन और चिंतन के अध्ययन की एक परम्‍परा रही है। उनके विश्‍वविद्यालय में भारतीय संस्कृति पर कई किताबें लिखी गई हैं। ज़्यादातर शोध कार्य भाषा विज्ञान से सम्‍बन्‍धि‍त होता है।

एल्ते विश्‍वविद्यालय, बुडापेस्ट, हंगरी की विज़िटिंग प्रोफ़ेसर विजया सती ने कहा कि हंगरी में तीन वर्षों का इंडोलॉजी अध्ययन कराया जाता है I यहाँ का मूल उद्देश्य सम्‍वाद है, जिसके माध्यम से संस्कृति और हिन्दी की जानकारी भी दी जाती है, भारतीय संस्कृति से जुड़े उपादानों का परिचय भी दिया जाता है। हिन्दी को रोज़गारपरक बनाने की कोशिश की जाती है।

मोहन कान्त गौतम ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि हिन्दी के विकास की प्रक्रियाओं को हमें देखना है।  हम इस क्षेत्र में आगे बढ़ते हुये मीडिया का उपयोग कर सकते हैं। हिन्दी को रोज़गारपरक बनाने की कोशिश होनी चाहिये। इससे हमारे यूरोपीय विद्यार्थी हिन्दी का प्रयोग अपने रोज़गार के लिये कर सकते हैं। हिन्‍दी भाषा का व्यावहारिक रूप अपनाना अधिक उपयुक्त है।

संगोष्ठी का चतुर्थ शैक्षिक सत्र ‘हिन्दी शिक्षण तथा पाठ्यक्रम सम्‍बन्‍धी समस्याएं तथा समाधान’ महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा, भारत के वाइस चांसलर विभूति नारायण राय की अध्यक्षता में संपन्न हुआ I

सत्र के प्रारम्‍भ में वर्धा विश्‍वविद्यालय के नि‍देशक जगन्नाथन वी.आर. ने हिन्दी की दो प्रमुख समस्याओं– संदर्भानुसार उपयुक्त पाठ्यक्रमों व सन्दर्भ ग्रंथों की कमी और भाषा व भाषा शिक्षण दोनों ही क्षेत्रों में मानकीकरण के अभाव को सामने रखा। उन्होंने लचीले, समस्तरीय और गुणता वाले पाठ्यक्रम के निर्माण पर बल दिया, जिसे अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जा सके और जो घटत्व के सिद्धांत का पालन करे। इस प्रकार सभी शैक्षिक संस्थाएं मानकीकरण के मंच पर एकत्र होकर देश-विदेश के विद्वानों द्वारा निर्मित पाठ्य सामग्री का लाभ ले सकेंगी।

जवाहर लाल नेहरू वि‍श्‍ववि‍द्यालय, भारत के प्रोफेसर वैश्ना नारंग ने विदेशी भाषा के शिक्षण और  भाषा को दूसरी भाषा के रूप में पढ़ाने के पक्षों के भेद उभारने का प्रयास किया। उन्होंने यूरोपीय सन्दर्भों में हिन्दी भाषा अध्ययन–अध्यापन प्रक्रिया के आधार पर हुये विदेशी भाषा अधिगम के अंतर्गत संज्ञान प्रक्रिया को स्पष्ट किया।

वारसा विश्‍वविद्यालय, पोलैंड के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर कैलाश नारायण तिवारी ने हिन्दी भाषा और साहित्य पढ़ाने के लिए विभिन्न विश्‍वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों की विभिन्नता को समाप्त करते हुये एक उच्च स्तरीय मानक पाठ्यक्रम के निर्माण की बात कही, जिसमें उन्होंने भारतीय तथा विदेशी विद्वानों के पूर्ण सहयोग पर बल दिया ।

प्रोफेसर नवीन चन्द्र लोहानी

लूसान विश्‍वविद्यालय, स्विट्ज़रलैंड के नवीन चन्द्र लोहानी  ने ‘हिन्दी साहित्य शिक्षण के लिये आलोचना मानदंडों की मुश्किलों’ पर चर्चा करते हुए बताया कि हिन्दी साहित्य को समझने के मानदंड संस्कृत, काव्य शास्त्र, पाणिनि व्याकरण तथा विश्‍व के आलोचनाशास्त्रों से प्राप्त वैचारिकी द्वारा मिले हैं।
सोफ़िया विश्‍वविद्यालय, बल्‍गारि‍या के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर नारायण राजू वी.एस.एस. सिरीवुरी ने हिन्दी शिक्षण में भारतीय सांस्कृतिक एवं सामाजिक सन्दर्भ का महत्व स्थापित किया।

लिस्बन विश्‍वविद्यालय, पुर्तगाल में लेक्‍चरर शिवकुमार सिंह ने पुर्तगाल में विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण व्यवस्था से सम्‍बधि‍त चुनौतियों को प्रस्तुत किया। उन्होंने हिन्दी सीखने की प्रेरणा और शिक्षण पद्धतियों का ज़िक्र करते हुये सांस्कृतिक सन्दर्भों के महत्व को दर्शाया तथा यूरोप की स्थानीय भाषाओं में हिन्दी शिक्षण संसाधन तैयार करने पर बल दिया।

हैम्बर्ग विश्‍वविद्यालय, जर्मनी की तात्याना ओरन्स्कया ने हिन्दी शिक्षण के सम्‍बन्‍ध में विश्‍व हिन्दी दिवस के महत्व के बारे में विचार रखते हुए उसकी सकारात्मक भूमिका को स्वीकार किया तथा बताया कि यूरोपीय विश्‍वविद्यालयों में हिन्दी शिक्षण की समस्या के मूल में भारत की गृहभाषा- राजनीति ही नहीं, बल्कि अन्तरराष्ट्रीय आर्थिक और राजनीतिक तथ्य भी हैं।

कासा एशिया, बार्सीलोना, स्पेन  में हिन्दी प्राध्यापक दीप्ति गुलानी ने स्पेन में हिन्दी भाषा अध्ययन की अपेक्षाओं और कठिनाइयों पर प्रकाश डाला। उन्होंने हिन्दी शिक्षण की व्यावहारिक समस्याओं का उल्लेख किया और बताया कि स्पेन में हिन्दी के प्रति दिलचस्पी बढ़ रही है।

इस सत्र के अंतिम वक्‍ता प्रोफेसर मोहन कान्त गौतम ने यूरोप में हिन्दी अध्ययन की विस्तृत  समस्याएं और उनके समाधान पर अपनी प्रस्तुति दी। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यूरोपियन संसद यूरोप में प्रचलित सभी भाषाओं को मान्यता प्रदान करेगी और हिन्दी भाषा तथा इसका विशाल साहित्य यूरोप की सभ्यता को और अधिक संपन्न करेगा।

संगोष्ठी के समापन सत्र की अध्यक्षता प्रोफेसर उदय नारायण सिंह ने की। इस सत्र में चारों शैक्षिक सत्रों की रिपोर्ट क्रमशः विजया सती, शिव कुमार सिंह. रमेश शर्मा तथा ऐश्‍वर्य कुमार ने प्रस्तुत की। इसके बाद संगोष्ठी में उठे सभी मुद्दों पर व्यापक चर्चा हुई और अंत में संगोष्ठी की ओर से की जाने वाली संस्तुतियों पर विचार-विमर्श हुआ। गम्‍भीर चिंतन और पारस्परिक विचार विनिमय के बाद सर्वसम्मति से विदेश मंत्रालय  के समक्ष निम्नलिखित संस्तुतियों को रखने का निर्णय हुआ–
1. आठवें विश्‍व हिन्दी सम्मेलन, न्यूयॉर्क  की प्रमुख संस्तुति–‘अन्तरराष्ट्रीय मानक हिन्दी पाठ्यक्रम’ की परियोजना को क्रियान्वित किया जाये और उसमें हिन्दी के सामाजिक और सांस्कृतिक सन्दर्भों का समावेश किया जाये।
2. विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण में संलग्न भारतीय एवं भारतेतर प्राध्यापकों को भाषा शिक्षण प्रविधि, साहित्य शिक्षण प्रविधि, हिन्दी व्याकरण, हिन्दी का सामाजिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ आदि विषयों में प्रशिक्षित किया जाये।
3. यूरोप में इस प्रकार की शैक्षिक संगोष्ठियाँ विदेश मंत्रालय के सहयोग से हर दो वर्ष में  नियमित रूप से आयोजित की जाएँ। वर्ष 2014 की यूरोपीय हिन्दी संगोष्ठी वारसा  विश्‍वविद्यालय में आयोजित करने का प्रस्ताव है।
4. पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत एक 24 घंटे का हिन्दी भाषा चैनल प्रारम्भ किया जाये, जिसमें हिन्दी की सभी प्रयुक्तियाँ उपलब्ध हों तथा वेब पर हिन्दी की विशाल सामग्री को एक स्थान पर हिन्दी अध्येताओं को उपलब्ध कराया जाये।
5. अंग्रेज़ी से इतर विदेशी भाषाओं को दृष्टि में रखकर मल्टीमीडिया सहित हिन्दी शिक्षण सामग्री का निर्माण किया जाये।
6. विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण के लिए स्नातकोत्तर स्तर का पाठ्यक्रम विकसित किया जाये।
7. भारतीय संस्कृत संबंध परिषद द्वारा विभिन्न विदेशी विश्‍वविद्यालयों में हिन्दी पीठों की संख्या में वृद्धि की जाये।
8. हिन्दी साहित्य एवं हिन्दी शिक्षण की उपयोगी पुस्तकें तथा मल्टी मीडिया सामग्री उन सभी विश्‍वविद्यालयों को विदेश मंत्रालय द्वारा उपलब्ध कराई जायें, जहाँ हिन्दी अध्ययन अध्यापन  की सुविधाएँ हैं।
9. अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्‍वविद्यालय के डायनमिक पोर्टल पर वर्चुअल क्लास रूम की व्यवस्था की जाये, जिसके माध्यम से विदेशों में अध्ययनरत हिन्दी विद्यार्थियों को  हिन्दी साहित्य तथा हिन्दी भाषा के विद्वानों के विभिन्न विषयों पर व्याख्यान उपलब्ध कराये जायें।
10. विश्‍व में विदेशी भाषा के रूप में हिन्‍दी शिक्षण से सम्‍बन्‍धि‍त इन सभी संस्तुतियों के क्रियान्वयन के लिए विदेश मंत्रालय के अतिरिक्त भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, अन्तरराष्ट्रीय हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा और विश्‍व हिन्‍दी सचिवालय, मॉरिशस उत्तरदायित्व लें  तथा प्रभावी परियोजनायें बनायें।

समापन समारोह की अध्यक्ष एशियन स्टडीज़ की प्रोफेसर ब्लांका ने संगोष्ठी के सफल आयोजन पर बधाई दी। मुख्य अतिथि के रूप में विश्‍व हिन्दी सचिवालय, मॉरिशस की महासचिव पूनम जुनेजा ने संगोष्ठी की सार्थकता को रेखांकित किया। उन्होंने आश्‍वासन दिया कि विश्‍व हिन्‍दी सचिवालय संगोष्ठी द्वारा की गई संस्तुतियों पर अपेक्षित कार्रवाई करेगा। विशिष्ट अतिथि महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के उपकुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि संगोष्ठी द्वारा पारित सभी संस्तुतियों को क्रियान्वित करने का उत्तरदायित्व उनका विश्‍वविद्यालय लेता है। संगोष्ठी का समापन कासा दे ला इण्‍डि‍या के निदेशक डॉक्‍टर गियार्मो रोड्रगेज़ के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ।

संगोष्ठी के पहले दिन चिंतन और वि‍चार मंथन के बाद शाम को कासा दे ला इण्‍डि‍या के सभागार में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें स्पेन के जिप्सी समुदाय के पारम्‍परिक नृत्य फ़्लेमेंको  को उसके भारतीय स्रोत से जोड़ने का प्रयास किया गया। इसके साथ ही भरतनाट्यम, कत्थक, हंस वीणा, तबला और मृदंगम एवं फ़्लेमेंको नृत्य और गायन का अन्तरराष्ट्रीय कलाकारों ने अद्भुत समागम किया। स्पेन की प्रसिद्ध भरतनाट्यम विशेषज्ञ मोनिका देला फुएंते ने हरिवंश राय बच्चन की कविता ‘इस पार प्रिये तुम हो मधु है’ पर किया गया मोहक नृत्य दर्शनीय था।

भाषा कभी लॉक नहीं होती : कान्ति कुमार जैन

भाषा में आ रहे बदलाव और उसके कारणों पर चर्चित संस्‍मरणकार कांति‍कुमार जैन का आलेख-

कुछ दिनों पहिले रायपुर के मेरे एक मित्र ने मुझे अपने छोटे बेटे के विवाह का निमंत्रण पत्र भेजा। उस निमंत्रण पत्र में नीचे उनके आठ वर्षीय नाती का आग्रह था- चच्चू की शादी लॉक हो गयी है, उसमें जरूर आना। मैं समझ गया कि‍ यह आठ वर्षीय नाती अमिताभ बच्चन का लोकप्रिय शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ देखता होगा। जिसमें अमिताभ हाट सीट पर बैठे हुए प्रतिभागी का उत्तर सुनकर कहते हैं-कांफीडेंट, फाइनल, लॉक करने लायक है ओर प्रतिभागी के हां कहने पर कम्प्यूटर को आदेश देते हैं- कम्प्यूटर जी, कृपया बी को लॉक कर दें। उस नन्हे-मुन्ने की समझ में आया होगा कि लॉक करने का अर्थ होता है- पक्का करना, निश्‍चय करना। अतः जब उसके चच्चू की शादी पक्की हो गयी तो नये मुहावरे में वह लॉक हो गयी। लॉक करना हिन्दी के किसी शब्दकोश में नहीं है। हो भी नहीं सकता। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ की उम्र अभी कुछ साल ही हुई है और हमारे शब्दकोश जीवित भाषा से सौ नहीं तो 85 साल पीछे तो चल ही रहे हैं। चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की प्रसिद्ध कहानी ‘उसने कहा था’ मैं लहना सिंह ने मगरे में मिली उस लड़की से पूछा था, ‘तेरी कुड़माई हो गई।’ यही 1915 की बात है। 1915 से लेकर आज तक महाविद्यालयों और विश्‍वविद्यालयों में पढ़ने वाले लाखों विद्यार्थियों ने पढ़ा होगा,  तेरी कुड़माई हो गयी। यह शब्द हिन्दी का नहीं है, पर हिन्दी पढ़ने जाने वालों की पिछली सात-आठ पीढ़ियां इस शब्द से परिचित हैं। तेरी कुड़माई हो गयी अर्थात तेरी मंगनी हो गई, पर हिन्दी के किसी कोश में यह शब्द नहीं मिलता। हिन्दी के कोशकार ने कुड़माई को हिन्दी शब्द मानने की उदारता या व्यवहारिकता नहीं बतायी, पर जीवित भाषाएं कोशकारों का अनुशासन नहीं मानतीं। वे जनता के साथ चलती हैं। कुड़माई का अर्थ टटोलने के लिये जब मैंने हिन्दी के शब्दकोश उलटे तो लगे हाथ मैंने बिंदास, ढिशुंग-ढिशुंग, धांसु शब्द भी खोजे। पर ये शब्द भी हिन्दी शब्द कोशों में नहीं हैं। फिक्सिंग, एड्स जैसे शब्दों की हिन्दी शब्द कोशों में तलाश करना बेकार ही है। जब हिन्दी के कोशकार पंजाबी कुड़माई की मंगनी हिन्दी के मुंडे से नहीं करवा पाये तो हिन्दी में लॉक करने की उम्मीद करना बेकार ही है। लॉक करना अब के. बी.सी. का अपना मुहावरा नहीं है, वह अमिताभ बच्चन की कथन-भंगिमा की विशिष्टता भी नहीं है, वह सारे हिन्दी क्षेत्र में और हिन्दी क्षेत्र के बाहर भी,  पक्का करने, सुनिश्‍चि‍त करने का पर्याय बन गया है। जो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ नहीं देखता, वह भी लॉक करने का अर्थ जानता है।

भाषा को जब कबीर ने सैकड़ों साल पहिले ‘बहता नीर’ कहा था तो वे मानों कहना चाहते थे कि भाषा का कोई अंतिम रूप नहीं होता, भाषा को लेकर कोई यह दावा नहीं कर सकता- बस इतना ही,  इससे आगे नहीं। भाषा मिथक नहीं मानती। जीवन सदैव आगे बढ़ता चलता है। भाषा भी उसके साथ,  उसके पीछे कदम मिलाकर बढ़ती जाती है। यदि ऐसा न होता तो बुद्ध ने प्राकृत को न अपनाया होता। खुसरों ने पंडित प्यासा क्यों,  गधा उदासा क्यों जैसी पंक्तियाँ न लिखी होती। गांधी जी ने हिन्दुस्तानी का नारा न दिया होता और अमिताभ ने बड़ी आसानी से पूछा होता पक्का,  वह लॉक कर दे क्यों कहता। नवीनता लाने के लिए,  सामने वालों को अपनी बात समझाने के लिए,  जनता के दिलों में अपने कहे को उतारने के लिए वह कहता है- लॉक कर दें। यह बात हमारे कोशकार नहीं जानते हैं। लेकि‍न रायपुर के मेरे उस मित्र का आठ साल का नाती जो मुझे अपने चच्चू की शादी पक्की हो जाने पर उसके विवाह में आने की मनुहार कर रहा है, जानता है।

भाषा के बदलने के बहुत सारे कारक गिनाये गये हैं। युद्ध,  क्रांति, यात्रा,  धर्म,  सेना, आक्रमण,  नयी खोजें, दूरदर्शन आदि‍। दूरदर्शन इन सबमें सबसे नया और काफी प्रभावशाली कारक है। दूरदर्शन पर आने वाले विज्ञापनों से, दिखाये जाने वाले चैनलों से, गानों से भाषा घर बैठे बदल रही है। उसकी पैंठ घर-घर तक है। सब लोगों तक है। वह नये युग का कबूतर है। वह कब आपके कानों में ईलू ईलू फूँक जायेगा, पता नहीं। भाषा अब आपके अचेतन पर प्रभाव डालती है, वह कक्षा में नहीं, बेडरूम में आपको अपने तेवर दिखाती है। वह गाँवों, कस्बों, शहरों में एक साथ पहुँचती है। वह पढ़े-लिखे और गैर पढ़े-लिखे सबको आकृष्ट करती है। आज जो भूमण्डलीकरण हो रहा है। उसका सबसे बड़ा सेल्समैन दूरदर्शन है। दूरदर्शन की कृपा से, भूमण्डलीकरण के चलते एक नयी हिन्दी विकसित हो रही है, जिसे हम हिंग्लिश कह सकते हैं। कोका कोला हो जाय, लेट अस एंज्वाय। भौरा बगियन में गाईंग को हर दूरदर्शक समझता है,  समझता है और एंज्वाय कराता है और कापी करता है। इसे हम केवल मनोरंजन या विज्ञापन की भाषा कहकर नहीं टाल सकते। यदि हम हिन्दी के लोकप्रिय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के नाम ही देखें तो हम इंडिया टूडे, सांध्य टाइम्स जैसे नाम दि‍खेंगे। यह नहीं कि इनके हिन्दी पर्याय नहीं हैं या नहीं हो सकते, पर तब उनकी अपील कम हो जायेगी। वे हिन्दी क्षेत्र के बाहर नहीं समझे जा सकेंगे। भाषा इन दिनों हिन्दी का प्रचार करने के लिए नहीं,  व्यापार का प्रचार करने के काम में लायी जा रही है । जो माल सबसे ज्यादा बिकेगा, हम उसके व्यापारी हैं। वह माल जिस भाषा में बिकेगा, वह हमारे काम की भाषा है। भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया में वे सारी भाषाएँ मिट जानेवाली हैं जो व्यापार, वाणिज्य के लिये उपयोगी नहीं रह गयी हैं। आर्थीकरण की प्रक्रिया ने गदबा जैसी भाषा को खतम कर दिया। उपभोक्तावादी भूमण्डलीकरण को संस्कृति हमारी बोलियों को लील जायेगी।

भूमण्डलीकरण का खतरा तो हिन्दी के सामने है ही, हिंदी इन दिनों एक नयी समस्या से जूझ रही है। हिन्दी का पत्रकार,  हिन्दी का अध्यापक,  हिन्दी का लेखक अब दूर-दूर तक फैले हुए हिन्दी क्षेत्रों से आता है। उसके लिए पंक्ति से बिछुड़ों की जगह डार से बिछुड़ा ज्यादा अपनी अभिव्यक्ति है,  झूमना की जगह ‘झीमना’ उसे ज्यादा अपना लगता है। ‘परांदा मेरा लाल है’ कहकर उसे ज्यादा संतोष होता है। ये लेखक अपने साथ अपनी-अपनी बोलियों के शब्द और अभिव्यक्तियां ला रहे हैं। हाथी या जंगली सूअर के बाहरी दांतों के लिए परिनिष्ठित हिन्दी में कोई शब्द नहीं है, पर बोलियों में है- खिरसा। चलते-चलते बैठ जाने वाले पशु के लिए गरियार शब्द है- ‘मरे बैल गरियार, मर्रे वह अड़ियल टटटू’। उबला हुआ अनाज बोलियों में कोहरी कहलाता है। जिसे अंग्रेजी में एम्प्टी स्टमक कहते है, वह बुंदेली में निन्ने मौ (निरन्न मुंह)। जो बिना गुरू का है वह निगुरा कहलाता है। आज भी प्रायवेट परीक्षा में बैठने वालों को नियमित छात्र की तुलना में हीन माना जाता। अनियमित छात्र की तुलना में निगुरा शब्द स्वीकार करने में क्या संकोच है।

अंग्रेजी की लाघव प्रियता अब हिंदी ने भी स्वीकार कर ली है। आज से बीस-पच्चीस वर्ष पूर्व आधाक्षरों से मिलकर बनने वाले शब्द हिन्दी मे कम ही देखने में आते थे, पर अब तो भाजपा, विहिप, टाडा, मीसा, लिटटे्, इंका हिंदी के समाचार पत्रों में आम हैं। कभी-कभी ये संक्षिप्त अभि‍व्‍यक्तियां इतनी प्रचलित हो जाती हैं कि हम उनके पूर्ण रूप भूल जाते हैं। एल.एल.बी., डी.डी.टी., एस.टी.डी., फिपेट ही प्रचलित है, उनके पूर्ण रूप कहीं सुनने में नहीं आते।

आशुतोष रामनारायण को आप नहीं जानते होंगे, पर आशुतोष राना हमेशा से ऐसे ही नहीं थे। जब वे सागर विश्‍वविद्यालय के विवेकानंद छात्रावास में रहते थे तो बड़ी समस्या आ गयी। दो-दो आशुतोष (दोनों के पिता श्री का नाम भी एक जैसा- रामनारायण)। ऊधम की एक आशुतोष ने, दूसरा दंडित हो। छात्रावास के प्रतिपालक के रूप में मैंने तय किया कि गाडरवारा के आशुतोष को आशुतोष राना लिखा जाये- रामनारायण का संक्षेप। तब क्या पता था कि आशुतोष राना इस कदर चमकदार सितारा बनकर उभरेगा।

एक बार मुझे दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय जाना था मौखिकी के लिए। मैंने आटो वाले से कहा- जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी। वह भौचक मेरा मुंह देखता रह गया। मैंने उसे समझाया। मेरे मुंह से निकला- अरे, भाई जे.एन.यू.। वह बोला- साहब, हिंदी में ऐसा कहिए न। आप पता नहीं अंग्रेजी में क्या-क्या बोले जा रहे हैं।

सो, अब भाषा का हिन्दी होना या अंग्रेजी होना बेमानी हो गया है। भाषा वह जो अपनी बात समझा सके। भूमण्डलीकरण के उस युग में भाषा से हमारी अपेक्षा बदल गयी है। भाषा अब हमें ‘कामायनी’ लिखने के लिए नहीं चाहिए, वह माल बेचने के लिए चाहिये। गालिब के दीवान के अंदर की भाषा की तुलना में हमारे लिए वह भाषा जरूरी हो गयी है जिसमें उपभोक्ता वस्तुओं के रैपर छपते हैं। भाषा की महत्ता अब उसके सुंदर होने में नहीं रह गयी है, उसके अर्थपूर्ण होने में हो गई है। भाषा बदल रही है। नये जमाने के लिए नयी भाषा अमिताभ बच्चन द्वारा जब चार विकल्पों में से किसी एक विकल्प को लॉक करने की बात की जाती है, तब वह प्रकारान्तर से जैसे यह कह रहा है- भाषा को अंतिम रूप से लॉक मत कीजिए, वह शब्द कोशों में बंद होकर अपना दम तोड़ देती है, उसे जीवन के चौराहे पर स्वच्छंद घूमने दीजिए। बच्चे जब बाढ़ पर होते हैं तो उनके कपड़े उटुंग हो जाते हैं। जूते कसने लगते हैं। हिन्दी बाढ़ पर है, उसे उटुंग शब्द कोशों से निकालिए। उसके जूते उसकी चाल के लिए खतरा न बन जायें, इसका ध्यान रहे।

भाषाओं का परिवर्तन : बालकृष्‍ण भट्ट

भारतेंदु युग के प्रमुख निबंधकार, नाटककार और पत्रकार बालकृष्‍ण भट्ट ने हिंदी में हो रहे बदलाव को लेकर यह लेख 125 साल पहले लिखा था-

यह एक सामान्य सिद्धांत है कि किसी भाषा पर प्रभुत्व होना या उससे अच्छी तरह परिचित हो जाना तभी लोग मानते हैं जब सीखने वाला उसी भाषा में सीख सके अर्थात चित्तवृत्ति उसके मनन करने के विषयों को उसी भाषा के ढंग से ग्रहण करे। इसके मानने में किसको इनकार होगा कि हर एक भाषा के ढंग निराले ही हैं। दो भाषा व्याकरण की रीति पर कुछ मिलती भी हों, परन्तु वे चीजें जिनको महाविरे कहते हैं कभी नहीं मिल सकते और यही महाविरे ही हर भाषा की जान हैं। हिन्दी और अंगरेजी ही को लीजिए इन दो भाषाओं में थोड़ा थोड़ा कहीं कहीं व्याकरण के नियमों का तो भेद हई है। किन्तु बड़ा भारी अन्तर महाविरों की निराली चाल का है। जहाँ कहीं इन महाविरों की कोई गलती सुनने में आती है तो वह कान से चट खटकजाती है। यह लोग कदापि न समझे कि मुहाविरे अंगरेजी ही में हैं और जब उन पर आक्षेप होता है तो ‘राधा बाजार अंगरेजी’ या ‘बाबुओं की अंगरेजी’ इत्यादि शब्द तज़या निन्दा की राह से कहे जाते हैं। जब तक किसी भाषा में जान है अर्थात रोजमर्रे के काम में उसे लोग वर्तते हैं और पुष्टरीति पर उसके स्थिति बनी रहती है तब तक नये नये मुहाविरे नित्य उसमें बनते ही जायेंगे।

सृष्टि के चेतन पदार्थों का जो नियम है कि वे कभी एक सा नहीं रहते वरन दिन प्रतिदिन परिवर्तन की सान पर चढ़ते ही जाते हैं। यह नियम भाषा के सम्बन्ध में पूरी रीति पर लगता है। क्योंकि कुछ ऐसा मालूम होता कि रुधिर और अस्थि मनुष्य के शरीर से उतना निकट सम्बन्ध नहीं रखते जितना उनकी भाषा रखती है। और इसी कारण बड़े से बड़े पण्डित के आगे कोई अशुद्ध संस्कृत शब्द बोलिए तो वह इतना न खटकेगा जितना एक सामान्य से सामान्य बे मुहाविरे हिन्दी शब्द कान को चोट पहुँचावेगा। क्योंकि संस्कृत अब बोल चाल की भाषा न रह गई। विचार कर देखिये तो जो हिन्दी हम आज कल बोलते हैं वह पहले क्या थी और अब क्या है। अब फारसी उर्दू शब्द उसमें मिलते जाते हैं। क्योंकि जब आपके बड़े बड़े प्रामाणिक हिन्दी कवियों ने फारसी अरबी के शब्द ग्रहण किये तो हमारे और आपके निकाले वे सब जो हमारी भाषा के नस नस में अन्तः प्रविष्ट में हो रहे हैं क्यों कर निकाल सकते हैं। बल्कि बिरुद्धता दिखलाना वैसा ही है जैसा किसी वेगगामिनी नदी के प्रवाह को अकेले एक हाथ से रोककर उलट देने का प्रयत्न करना है। जिस तरह ये शब्द सर्वसाधारण अपनी भाषा में प्रचलित कर लेते हैं या जिस तरह के शब्द अपने नित्य के बोलचाल से लोग निकाल कर फेंक देते हैं उस पर आपको कुछ भी अधिकार नहीं है। आप मनुष्यों की भाषा तभी बदल सकते हैं जब जुलू या हबशी की रपूत का कई आदमी इन देशों में पैदा कर सकें या उससे भी बढ़कर कोई दूसरा प्राकृतिक अनर्थ जो सर्वथा प्रकृति विरुद्ध है कर सकें। क्योंकि यह कैसे संभव है कि प्रबल कालचक्र अपनी निशानी सब चीजों पर न छोड़ जाय। मुसलमानों के अत्याचार का फल जैसा हम अपनी रीति रसम सामाजिक व्यवहार अपनी और अपने यहाँ की स्त्रियों की दशा सबमें पाते हैं तब यह क्यों कर हो सकता है कि मुगलों की भाषा का असर हमारी भाषा में न हो।

सोचिये कि जिस हिन्दी को हम बोलते हैं वह कितने हजार वर्ष से घिसते-घिसते करोड़ै टक्करें खाकर और न जानिये कौन-कौन सी मुसीबतैं झेलकर न मालूम किसका किसका जमाना देखभाल आज हमारे बोलचाल के काम में आ रही है। यदि प्रकृति को भी हिन्दी ही मान लीजिये तो देखिये कि आजकल की हिन्दी से और चांद और पृथ्वीराज के समय की हिन्दी से और चांद के समय की हिन्दी से और कालिदास के समय की हिन्दी से काल का कितना अन्तर है। क्योंकि कालिदास भवभूत प्रभृति कवियों के समय में भी संस्कृत जैसी उनके नाटकों में पाई जाती है केवल विद्वानों ही की मण्डली में बोली जाती थी और वे लोग भी कवित्व शक्ति के प्रकाशक गझिन शास्त्रार्थ के बाद घर जाते रहे होंगे तो नौकरों या लड़के वालों या स्त्रियों से (या सृष्टि सृष्टुराध्या) के जाड़े की बड़े धूम धाम की संस्कृत न बोलते रहे होंगे। जैसा वेद की संस्कृत का व्याकरण व्यास वाल्मीकि तथा कालिदास आदि कवियों की संस्कृत के व्याकरण से कुछ पृथक है वैसा ही नाटक की प्राकृतों का व्याकरण चन्द आदि की प्राकृतों से बिभिन्न है अर्थात जो एक समय के विद्वानों की साधु भाषा थी वही किसी पूर्व समय के बेपढ़े लिखे लोगों की भाषा रही और इस अदल बदल में एक बात सदा ध्यान देने लायक है कि भाषा का परिवर्तन शब्दों पर इतना निर्भर नहीं जितना उसके व्याकरण सम्बन्धी विषयों पर या मुहाविरों के अदल बदल होने पर अर्थात नये शब्दों की भरती होने से कुछ डर की बात नहीं है बल्कि पढ़े लिखे लोग या सर्व साधारण उन शब्दों को अपना कर मान ले तो भाषा और भी पुष्ट हो जाएगी।

फारसी में देखिये तो यही हाल है अंगरेजी में देखिये तो यही हाल है पृथ्वी की और और भाषाओं में यही नियम पाया जाता है कि दूसरी भाषा के शब्द को बेधड़क अपना कर लेते हैं जैसा कोई किसी लड़के को गोद ले वैसा ही वह शब्द उसी भाषा का होकर रह जाता है। एक दूसरी विचित्र बात यह भी है एक भाषा का शब्द जब दूसरी भाषा में जाता है तो बहुधा अपने शुद्ध रूप में कभी नहीं रहता और जब ऐसा अशुद्ध शब्द भी दूसरी किसी भाषा में अच्छी तरह मिल जाता है तो फिर उसके शुद्ध करने का प्रयत्न भी व्यर्थ ही है क्योंकि बोलने वालों के मन या जबान पर जो एक बार चढ़ गया वह कभी नहीं निकल सकता।

भाषाओं के इतिहास में आप हिन्दी की दशा देख यह मत समझ लीजिये कि भाषा की सूरत बदलने के लिये विदेशी भाषा के साथ टक्कर खाना जरूरी बात है। ऐसा ख्याल करना भूल है कि अगर विदेशियों की भाषा के साथ यह भाषा टक्कर न खाये होती तो शुद्ध रीति पर बनी रहती। क्योंकि वेद की संस्कृति को नाटक और काव्यों की संस्कृत में किसने उतार दिया। या संस्कृत को प्राकृतों के रूप में किसी विदेशी भाषा के साथ टक्कर खाने ने बदल दिया। और फिर भाषा की बाहरी आकृति पर विदेशियों का कुछ असर पहुँच सकता है पर उसके भीतरी नियमों को तिल भर भी खसकाना किसी के सामर्थ्य में नहीं है। हमने ऊपर कहा कि भाषा भी संसार को इतर चैतन्य सृष्टि का नियम मानती है। इस तरह जैसा पीटने से गदहा घोड़ा नहीं हो सकता उसी तरह बाहर वालों का सम्पर्क भी कुछ बहुत हानिकारक नहीं हो सकता और फिर भाषा के सम्बन्ध में (हानि) शब्द का पूरा पूरा तात्पर्य तय करना बड़ा कठिन है। क्योंकि परिवर्तन के बीज तो भाषा में आप ही आप भरे हैं क्यों संस्कृत से प्राकृत हुई और प्राकृतों से वर्तमान हिन्दी। हम लोगों का केवल इतना ही कर्त्तव्य है कि देखते जायं कि क्या क्या अदल बदल हुए हैं अभेद्य दुर्ग सदृश पाणिनि के व्याकरण के आगे हिन्दी का व्‍याकरण छोटी सी फूस की झोपड़ी है। ये तो प्रगट है कि अब हमें उतने बड़े व्याकरण की आवश्यकता न रह गई एक वह समय था कि अनेक जंजालों से भरे हुए पाणिनि कात्यायन पंतजलि के सूत्र वार्तिक भाष्य में एक मात्रा का भी हेर फेर हो जाने पर एक बड़ी भारी इमारत को ढहाकर फिर से खड़ी करना था। और इसी का परिणाम यह हुआ कि हमारे यहाँ का व्याकरण ऐसा झंझट से भरा हुआ शास्त्र हो गया जैसा पृथ्वी के किसी कोने में न हुआ होगा। सच पूछिये तो दो गाड़ी के बोझ की पुस्तकें शेखर मंजूषा कैदर बड़े बड़े जगड़ जाल जो रच गये उनमें और है क्या। सिवा इसके कि कीचड़ में पाँव फिर धोओ एक बड़े यत्न और प्रयास से। एक बने बनाये सुन्दर और मनोहर महल को तोड़ फोड़ छिन्नभिन्न कर पीछे पछताय फिर उसी को बनाया है। इन्हीं विफल चेष्टाओं में व्याकरण इतना बड़ा शास्त्र हो गया जिसमें नवीन और प्राचीनों का झगड़ा पढ़ते पढ़ते उमर की उमर बीत जाती है कोरे के कोरे मूर्ख रह जाते हैं। ऐसी सरल भाषा हिन्दी में इस सब खट पट का अब कुछ काम ही न रह गया पर क्यों ऐसा हुआ यह तो आदमी तभी तै कर सकेगा जब और भी सैकड़ों हजारों (क्यों) का उत्तर दे सकेगा। जैसा क्यों मनुष्य संसार में पैदा होता है? क्यों फिर यहाँ से चला जाता है? इत्यादि इत्यादि। अब एक प्रश्‍न उसके सम्बन्ध में और उठता है कि यदि भाषा की धारा ऐसे अपरिवर्तनीय इतने जोर शोर के साथ बह रही कि उसमें चूं भी नहीं कर सकते तो किसी समय के अच्छे अच्छे लेखकों का क्या दबाव या असर उस पर होता है इस प्रश्‍न का उत्तर सहज में मिल सकता है। पुरानी हिन्दी को ही लीजिये पुराने ठेठ हिन्दी शब्दों को कोई अच्छी तरह सोच विचार कर लिखने वाला फिर से जिला कर समाज में प्रचलित कर सकता है। अपनी निज की भाषा के कामकाजी शब्दों की मर जाने या मृतक प्राय हो जाने से बचाना अच्छे लेखकों का काम है। बाहरी भाषाओं के शब्दों को अपना सा कर डालना जिससे भाषा दिन प्रतिदिन अमीर होती जाय यह भी एक बड़ा काम है। और सबसे बड़ा काम है अपने भाषा के विषयों को दूना चौगुना करते जाना अर्थात जो जो विषय भाषा में पहले कम थे उनको देना और जो विषय कभी थे ही नहीं उनको बाहर से लाय भरती करना। इस सबका असर यह होगा कि भाषा की नमन शक्ति बहुत बढ़ जायेगी अर्थात जिस तरह के विषय पहले उससे बाहर समझे जाते थे वे जल्द उसकी पहुँच के भीतर आ जायंगे। हमारे देखते ही देखते अंगरेजी मेमों ने हिन्दुस्तानी गहनों का पहनना आरंभ कर दिया जैसा सोने की चूड़ियाँ जड़ाऊ कंठे आदि। इसी तरह यदि हम अपनी मातृभाषा को अंगरे

हिंदी रुकने वाली नहीं है : अरविंद कुमार

अरविंद कुमार

हिंदी की अपरिहार्य और अनवरोध्य प्रगति के प्रति माधुरी तथा सर्वोत्तम रीडर्स जाइजेस्ट जैसी पत्रिकाओं के पूर्व संपादक तथा हिंदी के पहले शब्‍दकोश समांतर कोश के रचियता और शब्देश्वरी तथा पेंगुइन हिंदी-इंग्लिश/इंग्लिश-हिंदी थिसारस द्वारा भारत में कोशकारिता को नई दिशा देने वाले अरविंद कुमार। वह हिंदी को आधुनिक तकनीक से लैस करने के हिमायती हैँ और आजकल इंटरनेट पर पहले सुविशाल हिंदी-इंग्लिश-हिदी ई-कोश को अंतिम रूप देने में लगे हैं-

हिंदी के उग्रवादी समर्थक बेचैन हैं कि आज भी इंग्लिश का प्रयोग सरकार में और व्यवसाय मेँ लगभग सर्वव्यापी है। वे चाहते हैं कि इंग्लिश का प्रयोग बंद कर के हिंदी को सरकारी कामकाज की एकमात्र भाषा तत्काल बना दिया जाए। उनकी उतावली समझ में आती है, लेकिन यहाँ यह याद दिलाने की ज़रूरत है कि एक समय ऐसा भी था जब दक्षिण भारत के कुछ राज्य, विशेषकर तमिलनाडु, हिंदी की ऐसी उग्र माँगोँ के जवाब में भारत से अलग होकर अपना स्वतंत्र देश बनाने को तैयार थे। तब ‘हिंदी वीरों’ का कहना था कि चाहे तो तमिलनाडु अलग हो जाए, हमें हिंदी चाहिए… हर हाल, अभी, तत्काल… उस समय शीघ्र होने वाले संसद के चुनावोँ में उन्होँने नारा लगाया कि वोट केवल उस प्रत्याशी को देँ जो हिंदी को तत्काल लागू करने के पक्ष मेँ हो। सौभाग्य है कि भारत के लोग इतने नासमझ न थे और न आज हैं कि एकता भंग होने की शर्त पर हिंदी को लागू करना चाहेँ।

मैँ समझता हूँ कि पूरी राजनीतिक और भाषाई तैयारी के बिना हिंदी को सरकारी कामकाज की प्रथम भाषा बनाना लाभप्रद नहीं होगा। हिंदी पूरी तरह आने मेँ देर लग सकती है, पर प्रजातंत्र और राष्ट्रीय एकता के लिए यह देरी बरदाश्त करने लायक़ है। तब तक हमें चाहिए कि सरकारी कामकाज में हिंदी प्रचलन बढ़ाते रहें और साथ-साथ अपने आप को और हिंदी को आधुनिक तकनीक से लैस करते रहेँ।

इंग्लिश के विरोध की नीति हमेँ अपने ही लोगोँ से भी दूर कर सकती है। आम आदमी इंग्लिश सीखने पर आमादा है तो एक कारण यह है कि आज आर्थिक और सामाजिक प्रगति के लिए इंग्लिश का ज्ञान आवश्यक है। दूसरा यह कि संसार का सारा ज्ञान समेटने के लिए देश को इंग्लिश में समर्थ बने रहना होगा, वरना हम कूपमंडूक रह जाएँगे। यही कारण था कि 19वीं सदी मेँ जब मैकाले की नीति के आघार पर इंग्लिश शिक्षा का अभियान चला था, तब राजा राम मोहन राय जैसे देशभक्त और समाज सुधारक ने उस का डट कर समर्थन किया था। वह देश को दक़ियानूसी मानसिकता से उबारना चाहते थे। राममोहन राय ने कहा था, ‘एक दिन इंग्लिश पूरी तरह भारतीय बन जाएगी और हमारे बौद्धिक सामाजिक विकास का साधन।’ स्वामी विवेकानंद ने भी अमरीका में भारतीय संस्कृति का बिगुल इंग्लिश के माध्यम से ही फूँका था।

इसके माने यह नहीँ हैँ कि आज हम लोग हिंदी का महत्त्व नहीँ जानते या हिंदी की प्रगति और विकास रुक गया है या रुक जाएगा। मैं समझता हूँ कि हिंदी के विकास का राकेट नई तेज़ी से उठता रहेगा। हिंदी अब रुकने वाली नहीं है, हिंदी रुकेगी नहीं। कारण है हिंदी बोलने समझने वालोँ की भारी तादाद और उन के भीतर की उत्कट आग।

भाषा विकास क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिकों का तथ्याधारित अनुमान हिंदी प्रेमियों के लिए उत्साहप्रद है कि आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय महत्त्व की जो चंद भाषाएँ होंगी उन में हिंदी अग्रणी होगी।

संसार में 60 करोड़ से अधिक लोग हिंदी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। फ़िजी, मारीशस, गयाना, सूरीनाम की अधिकतर और नेपाल की कुछ जनता हिंदी बोलती है। अमरीकी, यूरोपीय महाद्वीप और आस्ट्रेलिया आदि देशोँ में गए हमारे तथाकथित एनआरआई कमाएँ चाहे इंग्लिश के बल पर, लेकिन उनका भारतीय संस्कृति और हिंदी के प्रति प्रेम बढ़ा ही है। कई बार तो लगता है कि वे हिंदी के सब से कट्टर समर्थक हैँ।

अकेले भारत को ही लें तो हिंदी की हालत निराशाजनक नहीं, बल्कि अच्छी है। आम आदमी के समर्थन के बल पर ही पूरे भारत में 10 शीर्ष दैनिकों में हिंदी के पाँच हैँ (दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हिंदुस्तान, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका),  तो इंग्लिश का कुल एक (टाइम्स आफ़ इंडिया) और मलयालम के दो (मलयालम मनोरमा और मातृभूमि), मराठी का एक (लोकमत), तमिल का एक (दैनिक थंती)। इसी प्रकार सब से ज़्यादा बिकने वाली पत्रिकाओँ में हिंदी की पाँच, तमिल की तीन, मलयालम की एक है, जबकि इंग्लिश की कुल एक पत्रिका है। हिंदी के टीवी मनोरंजन चैनल न केवल भारत मेँ बल्कि बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान में भी लोकप्रिय हैं और हिंदी के साथ-साथ हमारे सामाजिक चिंतन का प्रसार कर रहे हैँ।

जहाँ तक हिंदी समाचार चैनलोँ का सवाल है इंग्लिश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित न्यूज़ वीकली इकोनमिस्ट ने 14 अगस्त 2010 अंक मेँ पृष्ठ 12 पर ­‘इंटरनेशल ब्राडकास्टिंग’ पर लिखते हुए कहा है कि अमरीका और ब्रिटेन के विदेशी भाषाओँ में समाचार प्रसारित करने वाले संस्थानोँ को अपना धन सोच’समझ कर बरबाद करना चाहिए। उदाहरण के लिए भारत की अपनी भाषाओँ के न्यूज़ चैनलोँ से प्रतियोगिता करना कोई बुद्धिमानी का काम नहीं है।

हमारी ताक़त है हमारी तादाद…

यह परिणाम है हमारी जनशक्ति का। यही हिंदी का बल है। बहुत साल नहीं हुए जब हम अपनी विशाल आबादी को अभिशाप मानते थे। आज यह हमारी कर्मशक्ति मानी जाती है। भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने सही कहा है: ‘अधिक आबादी अपने आप में कोई समस्या नहीं है, समस्या है उस की ज़रूरियात को पूरा न कर पाना। अधिक आबादी का मतलब है अधिक सामान की, उत्पाद की माँग। अगर लोगों के पास क्रय क्षमता है तो हर चीज़ की माँग बढ़ती है।’ आज हमारे समृद्ध मध्य वर्ग की संख्या अमरीका की कुल आबादी जितनी है। पिछले दिनोँ के विश्वव्यापी आर्थिक संकट को भारत हँसते खेलते झेल गया तो उस का एक से बड़ा कारण यही था कि हमारे उद्योगोँ के उत्पाद मात्र निर्यात पर आधारित नहीँ हैँ। हमारी अपनी खपत उन्हें ताक़त देती है और बढ़ाती है।

इसे हिंदी भाषियोँ की और विकसित देशोँ की जनसंख्या के अनुपातोँ के साथ साथ सामाजिक रुझानोँ को देखते हुए समझना होगा। दुनिया की कुल आबादी आज लगभग चार अरब है। इसमेँ से हिंदुस्तान और चीन के पास 60 प्रतिशत लोग हैँ। कुल यूरोप की आबादी है 73-74 करोड़, उत्तर अमरीका की आबादी है 50 करोड़ के आसपास। सन 2050 तक दुनिया की आबादी 9 अरब से ऊपर हो जाने की संभावना है। इसमेँ से यूरोप और अमरीका जैसे विकसित देशों की आबादी बूढ़ी होती जा रही है। (आबादी बूढ़े होने का मतलब है किसी देश की कुल जनसंख्या मेँ बूढे लोगोँ का अनुपात अधिक हो जाना।) चुनावी नारे के तौर पर अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा कुछ भी कहें, बुढाती आबादी के कारण उन्हेँ अपने यहाँ या अपने लिए काम करने वालोँ को विवश हो कर, मजबूरन या तो बाहर वालोँ को आयात करना होगा या अपना काम विदेशों में करवाना होगा।

इस संदर्भ मेँ संसार की सब से बड़ी साफ़्टवेअर कंपनी इनफ़ोसिस के एक संस्थापक नीलकनी की राय विचारणीय है। तथ्यों के आधार पर उनका कहना है कि ‘किसी देश में युवाओँ की संख्या जितनी ज़्यादा होती है, उस देश में उतने ही अधिक काम करने वाले होते हैँ और उतने ही अधिक नए विचार पनपते हैं। तथ्य यह है कि किसी ज़माने का बूढ़ा भारत आज संसार में सबसे अधिक युवा जनसंख्या वाला देश बन गया है। इस का फ़ायदा हमें 2050 तक मिलता रहेगा। स्वयं भारत के भीतर जनसंख्या आकलन के आधार पर 2025 मेँ हिंदी पट्टी की उम्र औसतन 26 वर्ष होगी और दक्षिण की 34 साल।’

अब आप भाषा के संदर्भ में इस का मतलब लगाइए। इन जवानों में से अधिकांश हिंदी पट्टी के छोटे शहरोँ और गाँवोँ में होंगे। उन की मानसिकता मुंबई, दिल्ली, गुड़गाँव के लोगोँ से कुछ भिन्न होगी। उनके पास अपनी स्थानीय जीवन शैली और बोली होगी।

नई पहलों के चलते हमारे तीव्र विकास के जो रास्ते खुल रहे हैँ (जैसे सबके लिए शिक्षा का अभियान), उनका परिणाम होगा असली भारत को, हमारे गाँवोँ को, सशक्त कर के देश को आगे बढ़ाना। आगे बढ़ने के लिए हिंदी वालोँ के लिए सबसे बड़ी ज़रूरत है अपने को नई तकनीकी दुनिया के साँचे मेँ ढालना, सूचना प्रौद्योगिकी में समर्थ बनना।

यही है हमारी नई दिशा। कंप्यूटर और इंटरनेट ने पिछ्ले वर्षों मेँ विश्व मेँ सूचना क्रांति ला दी है। आज कोई भी भाषा कंप्यूटर तथा अन्य इलैक्ट्रोनिक उपकरणों से दूर रह कर पनप नहीं सकती। नई तकनीक में महारत किसी भी काल में देशोँ को सर्वोच्च शक्ति प्रदान करती है। इसमेँ हम पीछे हैँ भी नहीँ… भारत और हिंदी वाले इस क्षेत्र मेँ अपना सिक्का जमा चुके हैँ।

इस समय हिंदी में वैबसाइटेँ, चिट्ठे, ईमेल, चैट, खोज, ऐसऐमऐस तथा अन्य हिंदी सामग्री उपलब्ध हैं। नित नए कम्प्यूटिंग उपकरण आते जा रहे हैं। इनके बारे में जानकारी दे कर लोगों मेँ  जागरूकता पैदा करने की ज़रूरत है ताकि अधिकाधिक लोग कंप्यूटर पर हिंदी का प्रयोग करते हुए अपना, देश का, हिंदी का और समाज का विकास करें।

हमेँ यह सोच कर नहीँ चलना चाहिए कि गाँव का आदमी नई तकनीक अपनाना नहीं चाहता। ताज़ा आँकड़ोँ से यह बात सिद्ध हो जाती है। गाँवोँ मेँ रोज़गार के नए से नए अवसर खुल रहे हैँ। शहर अपना माल गाँवोँ में बेचने को उतावला है। गाँव अब ई-विलेज हो चला है। तेरह प्रतिशत लोग इंटरनेट का उपयोग खेती की नई जानकारी जानने के लिए करते हैँ। यह तथ्य है कि ‘गाँवोँ में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालोँ का आंकड़ा 54 लाख पर पहुँच जाएगा।

इसी प्रकार मोबाइल फ़ोन दूरदराज़ इलाक़ोँ के लिए वरदान हो कर आया है। उस ने कामगारोँ कारीगरोँ को दलालोँ से मुक्त कर दिया है। यह उनका चलता फिरता दफ़्तर बन गया है और शिक्षा का माध्यम। अकेले जुलाई 2010 में 1 करोड़ सत्तर लाख नए मोबाइल ग्राहक बने और देश में मोबाइलोँ की कुल संख्या चौबीस करोड़ हो गई। अब ऐसे फ़ोनोँ का इस्तेमाल कृषि काल सैंटरों से नि:शुल्‍क  जानकारी पाने के लिए, उपज के नवीनतम भाव जानने के लिए किया जाता है। यह जानकारी पाने वाले लोगोँ में हिंदी भाषी प्रमुख हैँ। उनकी सहायता के लिए अब मोबाइलों पर इंग्लिश के कुंजी पटल की ही तरह हिंदी का कुंजी पटल भी उपलब्ध हो गया है।

हिंदी वालोँ और गाँवोँ की बढ़ती क्रय शक्ति का ही फल है जो टीवी संचालक कंपनियाँ इंग्लिश कार्यक्रमोँ पर अपनी नैया खेना चाहती थीँ, वे पूरी तरह भारतीय भाषाओँ को समर्पित हैँ। आप देखेंगे कि टीवी पर हिंदी के मनोरंजन कार्यक्रमोँ के पात्र अब ग्रामीण या क़स्बाती होते जा रहे हैँ।

सरकारी कामकाज की बात करेँ तो पुणेँ में प्रख्यात सरकारी संस्थान सी-डैक कंप्यूटर पर हिंदी के उपयोग के लिए तरह तरह के उपकरण और प्रोग्राम विकसित करने मेँ रत है। अनेक सरकारी विभागोँ की निजी तकनीकी शब्दावली को समो कर उन मंत्रालयोँ के अधिकारियोँ की सहायता के लिए मशीनी अनुवाद के उपकरण तैयार हो चुके हैँ। अभी हाल सी-डैक ने ‘श्रुतलेखन’ नाम की नई विधि विकसित की है जिस के सहारे बोली गई हिंदी को लिपि में परिवर्तित करना संभव हो गया है। जो सरकारी अधिकारी देवनागरी लिखने या टाइप करने में अक्षम हैं, अब वे इसकी सहायता से अपनी टिप्पणियाँ या आदेश हिंदी में लिख सकेंगे। यही नहीं इस की सहायता से हिंदी में लिखित कंप्यूटर सामग्री तथा ऐसऐमऐस आदि को सुना भी जा सकेगा।

निस्संदेह एक संपूर्ण क्रांति हो रही है।

इधर हिंदी नई चाल में ढल रही है : कांति कुमार जैन

हर कोई हिंदी को लेकर चिंतित है। हिंदी क्षेत्र में कई विश्वविद्यालय और संस्‍थाएं हैं। इन सबके बाद भी हिंदी का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है। इन कारणों और समाधान पर चर्चित संस्‍मरणकार कांतिकुमार जैन का आलेख-

जब मैं पिछले दिनों की प्रसिद्ध फिल्म लगे रहो मुन्ना भाई देखकर लौट रहा था तो मेरे 20 वर्ष नाती ने अचानक मुझसे पूछा- नाना जी, मैंने कक्षा में गांधीवाद के बारे में तो पढ़ा था, पर यह गांधीगिरी, लगता है, कोई नई बात है। मुझे कहना पड़ा कि गांधीगिरी बिल्कुल नई बात है और देश में बढ़ती हुई मर्यादाहीनता, धृष्टता, सैद्धांतिक घपलेबाजी और वास्तविक प्रतिरोध न कर प्रतिरोध का स्वांग करने वालों को संवेदित करने जैसी चीज है। जिन शब्दों में गिरी लग जाता है, वे कुछ हीनता व्यंजक अर्थ देने लगते हैं। जैसे- बाबूगिरी, चमचागिरी, गुंडागिरी। मुझे भारतेंदु हरिश्‍़चंद के उस कथन की भी याद आई, जिसमें आज से लगभग 150 वर्ष पूर्व उन्होंने घोषित किया था कि हिन्दी नई चाल में ढली। अंग्रेज भारत में धर्म, ध्वजा और धुरी के साथ आये थे। इन तीनों का प्रभाव हिन्दी के स्वरूप पर भी पड़ा था। धर्म के प्रचार के लिए उन्होंने बाइबिल का अनुवाद किया और उसे मुद्रण यंत्रों से छपवाकर जनता के बीच वितरित किया, ध्वजा के लिए उन्होंने प्रशासन तंत्र तैयार किया और धुरी अर्थात् तराजू के लिए भारत में अंग्रेजी माल का नया बाजार विकसित किया। इन तीनों के साथ हिन्दी क्षेत्र में ढेरों अंग्रेजी शब्द आये जो आज तक प्रचलित हैं।

1947 में स्वतंत्रता के साथ ही हिन्दी पुन: नई चाल में ढली- लोकतंत्र, संविधान, विकास कार्य, शिक्षा का प्रचार-प्रसार, तकनीकी जैसे कारणों से हिन्दी व्यापक हुई, उसका शब्दकोश समृद्ध हुआ। नये-नये स्रोतों से आने वाले शब्द हिन्दी भाषी जनता की जुबान पर चढ़ गये। इन शब्दों में विदेशी शब्द थे, बोलियों के शब्द थे, गढ़े हुए शब्द थे। जनता अपनी बात कहने के लिए जिन शब्दों का प्रयोग करती है, उनकी कुंडली नहीं पूछती। बस काम चलना चाहिए। वह तो भाषा के पंडित हैं, जो शब्दों का कुलगोत्र आदि जानना चाहते हैं। जनता भाषा की संप्रेषणीयता को महत्वपूर्ण मानती है, जबकि पंडित लोग भाषा की शुद्धता को महत्व देते हैं। हिन्दी के स्वाभिमान का हल्ला मचाने वालों को आड़े हाथों लेते हुए निराला जी ने एक बड़े पते की बात कही थी- हम हिन्दी के जितने दीवाने हैं, उतने जानकार नहीं। हिन्दी के शुद्धतावादी पंडितों ने कुकुरमुत्ता नामक कविता मे प्रयुक्त नवाब, गुलाब, हरामी, खानदानी जैसे शब्दों पर एतराज जताया था। कहा था, इन शब्दों से हमारी हिन्दी भ्रष्ट होती है। इन शुद्धतावादी विचारकों का कहना है कि हिन्दी के साहित्यकारों को विदेशी शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। अब सामंत, पाटल, वर्गशंकर, कुलीन कहने से हिन्दी के स्वाभिमान की रक्षा भले ही हो जाये, किन्तु व्यंग्य की धार मौंथरी होती है और संप्रेषणीयता भी बाधित होती है। हिन्दी के ये शुद्धतावादी पोषक शहीद भगतसिंह को बलिदानी भगतसिंह कहना चाहते हैं। उनका बस चले तो वे भगतसिंह को भक्तसिंह बना दें। वे फीसदी को गलत मानते हैं, उन्हें प्रतिशत ही मान्य है। वे राशन कार्ड, कचहरी, कार, ड्राइवर, फिल्म, मेटिनी, कंप्यूटर, बैंक, टिकट जैसे शब्दों के भी विरोधी हैं। वही हिन्दी का सवाभिमान। यह झूठा स्वाभिमान हिन्दी के विकास में सबसे बड़ी बाधा है। ऐसे लोग हिन्दी को आगे नहीं बढऩे देना चाहते। वे वस्तुत: जीवन की प्रगति के ही विरोधी हैं।

एक बार पंडित शान्तिप्रिय द्विवेदी जबलपुर आये थे। पंडित भवानी प्रसाद तिवारी उन दिनों वहां के मेयर थे, स्वयं कवि, ‘गीतांजलि के अनुगायक। उन्होंने शान्तिप्रिय जी के सम्मान में एक कवि गोष्ठी का आयोजन किया। अपनी कविताएं भी सुनाईं। उनकी एक काव्य पंक्ति है- ”कैसी मुश्किल कर दी, तुमने कितनी रूप माधुरी प्राणों में भर दी।‘’ शान्तिप्रिय जी का हिन्दी प्रेम जागा, उन्होंने शिकायत की- बाकी सब तो ठीक है, यह मुश्किल शब्द विदेशी है। इसे यहां नहीं होना चाहिए। भवानी प्रसाद जी तो अतिथिवत्सल और शालीन थे, वे कुछ नहीं बोले, पर जीवन लाल वर्मा ‘विद्रोही’ जो स्वयं बहुत अच्छे कवि और व्यंग्यकार थे बिफर गये। बोले- ‘मुश्किल’ से आसान शब्द आप हिन्दी में बता दें तो मैं अपना नाम बदल दूं।‘ पंडित शान्तिप्रिय द्विवेदी जैसे विद्वान जीवन की प्रगति से ज्यादा भाषा की शुद्धता के हिमायती हैं।

जीवन जब आगे बढ़ता है तो वह अपनी आवश्यकता के अनुरूप  नये शब्द दूसरी भाषाओं से उधार लेता है,  नये शब्द गढ्ता है,  लोक की शब्द संपदा को खंगालता है और अपने को संप्रेषणीय बनाता है। मेरे एक मित्र हैं, मोबाइल रखते हैं पर मोबाइल शब्द का प्रयोग उन्हें पसंद नहीं है। मोबाइल को वे चलित वार्ता कहते हैं। जब वे आपसे आपकी चलित वार्ता का क्रमांक पूछते हैं तो आप भौंचक्के रह जाने के अलावा कुछ नहीं कर सकते। ऐसे शुद्धतावादी हर युग में हुए हैं और हास्यास्पद माने जाते रहे हैं। मध्यकाल के उस फारसीदां का किस्सा आज भी लोगों द्वारा दुहराया जाता है, जब वे अपने नौकरों से आब-आब की मांग करते रहे थे। पानी उनके सिरहाने ही रखा था। सो जब कोई दीवाना मोबाइल को अछूत समझता है या पानी से परहेज करता है तो न वह भाषा की मित्र है,  न ही अपने जीवन का। ऐसे विद्वानों को मेरे मित्र अनिल वाजपेयी ‘अनसुधरे बल’ कहते हैं। हिन्दी तो बराबर स्वयं को सुधारती चलती है, पर ये विद्वान लकीर पीटने में ही मगन रहते हैं।

हिन्दी के एक विख्यात समीक्षक को दबिश जैसे शब्दों से परहेज है। वे समझते हैं कि दबिश अंग्रेजी के फुलिश या रबिश का कोई भाईबंद है। यदि उन्होंने हिन्दी के ही दबना,  दबाना,  दाब,  दबैल जैसे शब्दों को याद कर लिया होता तो वे दबिश के प्रयोग पर आपत्ति नहीं करते। कचहरी, पुलिस, कानून व्यवस्था, थाना आदि से संपर्क में आने वाले दबिश से अपरिचित नहीं है। वस्तुत: हिन्दी के दीवाने जीवन से अपने शब्दों का चयन नहीं करते, हिन्दी के शब्द कोशों से करते हैं। हिन्दी के शब्द कोशों के सहारे हम आज के लोकतांत्रिक भारत के जीवन-राजनीतिक कर्थताओं,  सामाजिक विसंगतियों, आर्थिक उलझनों और सांस्कृतिक प्रदूषण को पूरी तरह और सही-सही समझ ही नहीं सकते। हिन्दी के शब्दकोशों में न तो सुपारी जैसा शब्द है, न अगवा, हफ्ता, फिरौती, बिंदास, ढिसुंम, घोटाला, कालगर्ल, ब्रेक जैसे शब्द। आप हर दिन समाचार पत्रों, पुस्तकों, जन संप्रेषण माध्यमों, बोलचाल में ये शब्द सुनते हैं और समझते हैं, पर इन्हें अभी तक हमारे कोशकारों ने पांक्तेय मानकर शब्दकोशों में स्थान नहीं दिया। हमारे शब्दकोश जीवन से कम से कम पचास साल पीछे हैं।

हिन्दी में समस्या नये विदेशी शब्दों को स्वीकृत करने की तो है ही, उन शब्दों को भी अंगीकार करने की है जो हिन्दी की बोलियों में प्रचलित हैं। हिन्दी के साहित्यकार विभिन्न बोली क्षेत्रों से आते हैं। वे जब हिन्दी में अपने क्षेत्रों के अनुभवों और परिवेश की कथा लिखेंगे तो वहाँ के शब्दों के बिना उनका काम नहीं चलेगा। हिन्दी सदैव से एक उदार और ग्रहणशील भाषा रही है। जब रामचन्द्र शुक्ल ने कबीर की भाषा को सधुक्कड़ी कहा तो वे हिन्दी की इसी व्यापक ग्रहणशीलता को रेखांकित कर रहे थे। साधु किसी एक स्थान पर जमकर नहीं रहता, घूमता-फिरना, नये-नये क्षेत्रों में जाना उसकी सहजवृत्ति है। इसी कारण हमारे मध्यकालीन संत कवियों में नाना बोली क्षेत्रों के शब्द मिल जाएंगे। हिन्दी कविता का अधिकांश तो हिन्दी की बोलियों में ही है। तुलसी, जायसी जैसे कवियों ने अपनी बोली के शब्दों से अपने काव्य को समृद्ध किया है। जायसी जब सैनिक के लिए पाजी, तुलसी जब सुपात्र के लिए लायक,  कबीर जब समीप के लिए नाल का प्रयोग करते हैं तो वे हिन्दी की विशाल रिक्थ सम्‍पदा का दोहन करते हैं। नये युग में भी गुलेरी ने उसने कहा था में ‘कुंड़माई’ जैसे शब्द का प्रयोग कर उसे हिन्दी पाठकों का परिचित बना दिया। कृष्ण सोबती डार से बिछुड़ी लिखकर पंजाबी ‘डार’ को जो समूह वाली है, हिन्दी का शब्द बनाने में संकोच नहीं करतीं। मैला आंचल, जिन्दगीनामा, कसप, डूब, चाक जैसे उपन्यासों की रोचकता केवल कथा को लेकर ही नहीं, उसकी भाषा की अभिव्यक्ति क्षमता को लेकर भी है।

कुछ दिनों पहिले हिन्दी के एक समीक्षक ने मैला आंचल की हिन्दी को अपभ्रष्ट कहकर उसका परिनिष्ठित हिन्दी में अनुवाद करने का सुझाव दिया था। इधर हिन्दी की बोलियों को स्वतंत्र भाषा के रूप में स्वीकृत किये जाने की मांग बढ़ रही है। यदि अवधी को हिन्दी से पृथक भाषा मान लिया जायेगा, तब क्या रामचरित मानस का हिन्दी अनुवाद करना पड़ेगा, हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यासों को भोजपुरी में रूपान्तरित करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी? नामवर सिंह तब हिन्दी के नहीं, भोजपुरी के साहित्यकार माने जाएंगे। इधर मेरे पास बुंदेली प्रेमियों के बहुत से पत्र आ रहे हैं जिनमें आग्रह किया जा रहा है कि मैं अपनी मातृभाषा के रूप में हिन्दी को नहीं,  बुंदेली को जनगणना पत्रक में दर्ज करवाऊँ। यह एक संकीर्ण विचार है। इससे हिन्दी बिखर जाएगी और हिन्दी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। एक ओर तो विभिन्न दूरदर्शन चैनलों में दिखाए जाने वाले धारावाहिकों में बींद और बींदड़ी जैसे ठेठ क्षेत्रीय शब्द लोकप्रिय हो रहे हैं,  दूसरी ओर हिन्दी की लो.ओ.सी. को और संकीर्ण बनाया जा रहा है।

राजनीति में छोटी-छोटी पार्टियां बनाकर सत्ता में भागीदारी के अवसर निकालना जबसे संभव हुआ है, तबसे हिन्दी की बोलियों के पृथक अस्तित्व की मांग करना भी लाभप्रद और सुविधाजनक हो गया है। छोटी राजनीतिक पाटियों ने हमारे लोकतंत्र को अस्थिर और सिद्धान्तविहीन बना दिया है, छोटी-छोटी बोलियों की पृथक पहिचान का आग्रह करने वाले हिन्दी के गढ़ में सेंध लगा रहे हैं। हमें उनका विरोध करना चाहिए, उनसे सावधान रहना चाहिए।

हमें हिन्दी को अद्यतन बनाने के लिए जिन बातों की ओर ध्यान देना चाहिए, उन बातों की ओर किसी का ध्यान नहीं है। हमारे विश्वविद्यालयों, हिन्दी सेवी संस्थाओं, हिन्दी के प्रतिष्ठानों के पास ऐसी कोई योजना नहीं है कि हिन्दी में आने वाले नये शब्दों का संरक्षण, अर्थ विवेचन और प्रयोग का नियमन किया जा सके। पिछड़ी का विरोधी शब्द अगड़ी हिन्दी में इन दिनों आम है, पर अगड़ी का शब्दकोशीय अर्थ अर्गला या अडंगा है। अंग्रेजी की एक अभिव्यक्ति है एफ.आर.आई. अर्थात् फर्स्ट इनफार्मेशन रिपोर्ट। हिन्दी में इसे प्रथम दृष्टया प्रतिवेदन कहते हैं या प्राथमिकी। हिन्दी शब्दकोशों में ये दोनों नहीं हैं। यह शब्द विधि व्यवस्था का, अपराध जगत का, जनसंचार माध्यमों का बहुप्रयुक्त शब्द है। दादा, धौंस, घपला, घोटाला, कबूतरबाजी, हिट जैसे लोक प्रचलित शब्द भी हमारे शब्दकोशों में नहीं हैं। दूरदर्शन देखनेवालों को घंटे-आधघंटे में ब्रेक शब्द का सामना करना पड़ता है। पर ब्रेक को अभी शब्द कोशों में ब्रेक नहीं मिला है। और तो और बाहुबली का नया अर्थ भी हमारे शब्द कोशों में दर्ज नहीं है।

अंग्रेजी में हर दस साल बाद शब्द कोशों के नये संस्करण प्रकाशित करने की परंपरा है। वैयाकरणों, समाजशास्त्रियों, मीडिया विशेषज्ञों, पत्रकारों, मनोवैज्ञानिकों का एक दल निरंतर अंग्रेजी में प्रयुक्त होने वाले नये शब्दों की टोह लेता रहता है। यही कारण है कि पंडित, आत्मा, कच्चा, झुग्गी, समोसा, दोसा, योग जैसे शब्द अंग्रेजी के शब्द कोशों की शोभा बढ़ा रहे हैं। अंग्रेजी में कोई शुद्ध अंग्रेजी की बात नहीं करता। संप्रेषणीय अंग्रेजी की, अच्छी अंग्रेजी की बात करता है। अंग्रेजी भाषा की विश्व व्यापी ग्राह्यता का यही कारण है कि वह निरंतर नये शब्दों का स्वागत करने में संकोच नहीं करती। हाल ही में आक्सफोड एडवांस्ड लर्न्स डिक्शनरी का नया संस्करण जारी हुआ है। इसमें विश्व की विभिन्न भाषाओं के करीब तीन हजार शब्द शामिल किये गये हैं। बंदोबस्त, बनिया, जंगली, गोदाम जैसे ठेठ भारतीय भाषाओं के शब्द हैं, पर वे अंग्रेजी के शब्दकोश में हैं क्योंकि अंग्रेजी भाषी उनका प्रयोग करते हैं। इन नये शब्दों में एक बड़ा रोचक शब्द है चाऊ या चाव जिसका अर्थ दिया गया है- चोर, बदमाश, अविवाहित मां। इस चाव शब्द का एक रूप चाहें भी है। सूरदास ने चाव शब्द के चबाऊ रूपान्तर का प्रयोग अपनी कविता में किया है- सूरदास बलभद्र चबाऊ जनमत ही को धूत। हिन्दी का चाव या चाईं शब्द सात समंदर पार तो संग्रहणीय माना जाता है, पर अपने घर के शब्द कोशों में नहीं।

हिन्दी क्षेत्र में इतने विश्वविद्यालय हैं, हिन्दी का प्रचार-प्रसार करने वाली इतनी संस्थाएँ हैं, क्या कोई ऐसी योजना नहीं बन सकती कि हिन्दी में प्रयुक्त होने वाले नये शब्दों को रिकार्ड किया जा सके। हम प्रत्येक दस वर्ष में जनगणना पर करोड़ों रुपये खर्च करते हैं, क्या हिन्दी की शब्द गणना पर कुछ खर्च नहीं किया जा सकता? कोई हिन्दी समाचार पत्र अपने रविवासरीय संस्करण में पाठकों से आमंत्रित कर प्रत्येक सप्ताह उसके क्षेत्र में प्रचलित हिन्दी के सौ नये शब्द भी प्रकाशित करे तो वर्ष भर में 5000 से भी अधिक शब्द समेटे जा सकते हैं। वैश्विकीकरण के साथ, नई उपभोक्ता वस्तुओं के साथ, नये मनोरंजनों के साथ, लोकतंत्र की नई-नई व्यवस्थाओं के साथ जो सैकड़ों शब्द हिन्दी में आ रहे हैं, उन्हें काल की आंधी में उड़ जाने देना गैर जिम्मेदारी भी है और लापरवाही भी है। वह हिन्दी के प्रति हमारी संवेदनविहीनता का द्योतक तो है ही। हमें आज हिन्दी के शुद्धतावादी दीवाने नहीं, हिन्दी के संवेदनशील जानकार चाहिए।

भाषा के ‘क्रियोलीकरण‘ के खिलाफ भड़की चिनगारी

 

इन्दौर। भूमंडलीकरण के सबसे बड़े हथियार ‘अंग्रेजी के नवसाम्राज्यवाद‘ का स्वागत जितने अधिक उत्साह से हमारे प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने किया, उसके पहले तमाम भारतीय भाषाओं, जिन्हें अंग्रेज नॉन-स्टेडंर्ड और वर्नाकुलर लैंग्विज कह के निरादृत करते थे-उनको नष्ट करने की खामोशी से की गई साजिश का नाम है- भाषा का ‘क्रियोलीकरण‘। इसके अंतर्गत हिंदी में ‘शामिल शब्दावली‘ की आड़ में अंग्रेजी के शब्दों की धीरे-धीरे इतनी तादाद बढ़ाई जा रही थी कि वह हिंदी न रह कर ‘हिंग्लिश‘ होने लगी। इसे स्थानीय भाषा में ‘भाषा का बखड़ैला‘ रूप कहा जाएगा। भाषा में शब्द का अनुपात अंग्रेजी का साठ तथा हिंदी का प्रतिशत चालीस का हो गया। किसी भी भाषा का अस्तित्व उसके ‘बोले गए रूप’ नहीं, ’छपित रूप’ से होता है। उस ‘रूप‘ को नष्ट कर देने से भाषा की ‘विचार शक्ति‘ खत्म हो जाती है- वह केवल रोजमर्रा के सामान्य बोलचाल की सामान्य कामकाजी भाषा बनकर अंत में खत्म हो जाती है।
सर्वग्रासी होते जाने वाली इस साजिश के विरूद्ध देश में 14 सितंबर, 2010 को हिंदी दिवस के अवसर पर सबसे पहले विरोध का श्रीगणेश किया इंदौर के बुद्धिजीवियों ने। चर्चित बुद्धिजीवी और समाजवादी चिंतक अनिल त्रिवेदी और आदिवासी बहुल क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता और कवि तपन भट्टाचार्य ने प्रतिनिधि बुद्धिजीवियों के साथ देशभर के हिंदी के करीब बीस-बाइस दैनिक समाचार पत्रों की, इंदौर के महात्मा गांधी प्रतिमा स्थल पर होली जलाई। इसमें प्रभु जोशी, जीवन सिंह ठाकुर, प्रकाश कांत, कृष्णकान्त निलोसे, शशिकांत गुप्ते, विश्वनाथ कदम, ईश्वरी रावल, श्रीमती जनक पलटा मिगिलिगन सहित लगभग पचास लोग शामिल हुए। उन्होंने नारे लगाए- ‘भाषा का क्रियोलीकरण, बंद करो बंद करो।‘ कुछ देर बाद गांधी प्रतिमा के आसपास जुटी भीड़ भी विरोध में शामिल हो गई।
सबसे पहले अनिल त्रिवेदी ने गांधी प्रतिमा को प्रणाम किया और कहा कि गांधी ने प्रतीकात्मक रूप से जिस तरह विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर एक सूचना दी थी, उस तरह हमने देश भर के हिंदी भाषा-भाषियों के साथ ही साथ समाचार-पत्रों के संचालकों, संपादकों तथा पत्रकारों को यह स्मृति दिलाई कि जिस भाषा का देश की आजादी की लड़ाई में अस्त्र की तरह इस्तेमाल करते हुए उसका विकास किया था, वही पत्रकारिता आज उस भाषा का ‘क्रियोलीकरण‘ कर रही है। अतः इसे अविलंब रोका जाए। उन्होंने अपना लिखित वक्तव्य पढ़ा- ‘आज हिंदी दिवस के अवसर पर हम इंदौर नगर के बुद्धिजीवी गांधी प्रतिमा के समक्ष देश भर के लगभग सभी हिंदी अखबारों की एक-एक प्रति जुटाकर उनकी होली जलाने के लिए एकत्र हुए हैं। हम सब जानते हैं कि जब निवेदन के रूप में किए जाते रहे संवादात्मक-प्रतिरोध असफल हो जाते हैं, तब विकल्प के रूप में एकमात्र यही रास्ता बचता है, जो हमें गांधीजी से विरासत में मिला है।
आज हिंदी के अखबारों की प्रतियों को जलाकर प्रतीकात्मक रूप से हम भारतीय समाचार-पत्रों, उनके संचालकों, पत्रकारों, संपादकों के साथ ही पूरे देश के हिंदी भाषा भाषियों को इस बात की स्मृति दिलाना चाहते हैं कि आज हम हिंदी का जो विकास देख रहे हैं, उसको बनाने और बढ़ाने में सबसे बड़ी और ऐतिहासिक भूमिका आजादी की लड़ाई में हथियार की तरह काम करने वाले हिंदी के समाचार-पत्रों ने ही निभाई थी, लेकिन दुर्भाग्यवश वही समाचार-पत्र जगत आज विकास के इतने चे सोपान पर चढ़ चुकी हिंदी को अंग्रेजी के नव साम्राज्यवाद को नष्ट करने पर उतारू हो चुका है। नतीजतन, स्थिति यह है कि पिछली एक शताब्दी में ब्रिटिश साम्राज्य ने हिंदी को जितनी क्षति नहीं पहंुचाई थी, आज उससे दस गुनी क्षति मात्र दस साल में हिंदी को हिंदी के समाचार पत्रों ने पहुंचा दी है।
यहां हम यह ऐतिहासिक तथा भाषा-वैज्ञानिक तथ्य याद दिलाना चाहते हैं कि दुनिया भर में भाषाओं के विकास का मुख्य आधार भाषा के बोले गए नहीं, बल्कि लिखित-रूप होता है। लिखित रूप ही किसी भाषा को अक्षुण्ण रखता है। लेकिन, आज हिंदी को सबसे बड़ा धोखा उसके लिखित-छपित शब्द की जगह से ही मिल रहा है। चीन की मंदारिन भाषा के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी-अधिक बोली जाने वाली हिंदी भाषा को बहुत सूक्ष्म और धूर्तयुक्ति से नष्ट किया जा रहा है, जिसे कहा जाता है, भाषा का ‘क्रियोलीकरण‘। आज का हमारा यह प्रतीकात्मक-प्रतिरोध हिंदी के अखबारों द्वारा चलाए जा रहे उसी खतरनाक ‘क्रिओलीकरण‘ की प्रक्रिया के विरूद्ध है।
‘क्रियोलीकरण‘ एक ऐसी युक्ति है, जिसके जरिए धीरे-धीरे खामोशी से भाषा को ऐसे खत्म किया जाता है कि उसके बोलने वाले को पता लगता ही नहीं कि यह सामान्य और सहज प्रक्रिया नहीं, बल्कि सुनियोजित षड्यंत्र है। जिसके पीछे अंग्रेजी भाषा का साम्राज्यवादी एजेंडा है।
‘क्रियोलीकरण‘ की प्रक्रिया का पहला चरण होता है, जिसे वे कहते हैं स्मूथ डिसलोकेशन आफ वक्युब्लरि अर्थात् मूल भाषा के शब्दों का धीरे-धीरे अंग्रेजी के शब्दों से विस्थापन। इस अवस्था को अखबारों ने अपनी सर्वग्रासी सीमा तक पहुंचा दी है। उदाहरण के लिए यह क्रिओलीकरण ठीक उस समय किया जा रहा है, जब हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की सीमित भाषाओं की सूची में शामिल करने के प्रयास बहुत तेज हो गए हैं। हिंदी के दैनंदिन शब्दों को बहुत तेजी से हटाकर उनके स्थान पर अंग्रेजी के शब्द लाए जा रहे हैं। मसलन, छात्र-छात्राओं की जगह स्टूडेंट्स/माता-पिता की जगह पेरेंट्स/अध्यापक की जगह टीचर्स/विश्वविद्यालय की जगह यूनिवर्सिटी/परीक्षा की जगह एक्जाम/अवसर की जगह अपार्चुनिटी/प्रवेश की जगह इंट्रेंस/संस्थान की जगह इंस्टीट्यूशन/चौराहे की जगह स्क्वायर/रविवार-सोमवार की जगह संडे-मंडे/भारत की जगह इंडिया। इसके साथ ही साथ पूरे के पूरे वाक्यांश भी हिंदी की बजाए अंग्रेजी के छपना/जैसे आऊट ऑफ रीच/बियांड एप्रोच/मॉरली लोडेड/कमिंग जनरेशन/डिसीजन मेकिंग/रिजल्ट ओरियंटेड प्रोग्राम आदि। वे कहते हैं, धीरे-धीरे स्थिति यह कर दो कि अंग्रेजी के शब्द 70 प्रतिशत तथा मूल भाषा के शब्द मात्र 30 प्रतिशत रह जाएं। और इसके चलते हिंदी का जो रूप बन रहा है, उसका एक स्थानीय अखबार में छपी खबर से दे रहे हैं।
इंग्लिश के लर्निंग बाय फन प्रोग्राम को स्टेट गव्हमेण्ट स्कूल लेवल पर इंट्रोड्यूस करे, इसके लिए चीफ मिनिस्टर ने डिस्ट्रिक्ट एज्युकेशन आफिसर्स की एक अर्जेंट मीटिंग ली, जिसकी डिटेल्ड रिपोर्ट प्रिंसिपल सेक्रेटरी जारी करेंगे।
इसके बाद वे दूसरा और अंतिम चरण बताते हैं- फाइनल असालट ऑन लैंग्विज। अर्थात् भाषा के पूरी तरह खात्मे के लिए ‘अंतिम हल्ला‘। और वह अंतिम प्रहार यह कि उसे भाषा की मूल लिपि को बदल कर रोमन कर दो। भाषा समाप्त। और कहने की जरूरत नहीं कि बहुत जल्दी अखबारों को साम्राज्यवादी सलाहकार की फौज समझाने वाली है कि हिंदी को देवनागरी के बजाए रोमन में छापना शुरू कर दीजिए। बीसवीं शताब्दी में सारी अफ्रीकी भाषाओं को अंग्रेजी की सम्राज्यवादी योजना के तहत इसी तरह खत्म किया गया और अब बारी भारतीय भाषाओं की है। इसलिए ‘हिंदी-हिंग्लिश‘, ‘बांग्ला-बांग्लिश‘, ‘तमिल-तमिलिश‘ की जा रही है। यह प्रतिरोध हिंदी के साथ ही तमाम भारतीय भाषाओं के ‘क्रिओलीकरण‘ के विरूद्ध है, जिसमें, गुजराती, मराठी, कन्नड़, उड़िया, असममिया आदि सभी भाषाएं शामिल हैं।
बहुत मुमकिन है कि देशभर के हिंदी भाषा-भाषियों के भीतर अपनी भाषा का बचाने की एक सामूहिक चेतना के जागृत होने के खतरे का अनुमान लगा कर अखबार जगत हिंदी के ‘क्रियोलीकरण‘ की प्रक्रिया एकदम तेज कर दें क्योंकि, जब 5 जुलाई, 1928 को यंग इंडिया में जब गाँधी ने ये लिखा था कि अंग्रेजी उपनिवेश की भाषा है और इसे हम हराकर रहेंगे, तब गोरी
हुकुमत अंग्रेजी के प्रचार-प्रसार पर तबके छह हजार पाउंड खर्च करती थी-वह राशि 1938 तक 3,86,000 पाउंड कर दी गई थी। बहरहाल, अंग्रेजी का जो ‘नया साम्राज्यवाद अमेरिका और इंग्लैण्ड की रणनीति के चलते बढ़ रहा है-उसमें हमारे यहां हाथ बंटाने के लिए देश का प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों मीडिया एकजुट हो गए हैं-हम उनकी इस खतरनाक मुहिम के विरोध का संकल्प लेते हैं।’

आदिवासी क्षेत्रों में काम करने वाले ख्यात समाजसेवी और कवि तपन भट्टाचार्य ने कहा-‘अंग्रेजी सुनियोजित और सुरक्षित ढंग से अपना ‘नया साम्राज्यवाद‘ खड़ा  कर रही है, जिसमें हमारा मीडिया और सत्ता भी शामिल है। याद रखिए, लार्ड मैकाले ने अंग्रेजी को भाषा से भाषा के स्तर पर चलाने की नीति बनाई, बाद में अंग्रेजी को शिक्षा समस्या बनाकर चलाया, लेकिन नहीं चल पाई। अलबत्ता, इससे उनको एक कटु अनुभव का सामना करना पड़ा कि एक मजबूत व्याकरण के आधारवाली मातृभाषा के चलते भारतीयों ने एक किताबी इंग्लिश सीखी और अव्वल दर्जे के आइ.सी.एस. हो गए; लेकिन अंग्रेजी भाषा को रोजमर्रा के जीवन में दूर तक प्रवेश नहीं दिया। बल्कि, बाहर ही रह गई। इसलिए, अब नई नीति तय की गई है, जिसमें उन्होंने भाषा-संस्कृति का गठबंधन करते हुए कहा कि अंग्रेजी को ‘स्ट्रक्चरली‘ पढ़ाया जाए, व्याकरण के जरिए नहीं। इसके लिए उन्होंने बच्चों के लिए कॉमिक्स चलाए, कार्टून फिल्में थोक के भाव में भारत के टेलिविजन चैनलों पर चलाई-और, एक मिथ्या ‘यूथ-कल्चर‘ बनाया, जिनका कुल मकसद अंग्रेजी भाषा तथा जीवन शैली को उन्माद की तरह उनसे जोड़ दें- जिसमें भाषा, भूषा और भोजन के स्तर पर वे उनके नए उपनिवेश के शिकंजे में आ जाएं और कहना न होगा कि आज के तमाम महाविद्यालयों में अध्ययन कर रही पीढ़ी को उन्होंने ‘माडर्न‘ (?) बना दिया है, जबकि वे ‘माडर्न‘ नहीं हुए, सिर्फ परम्परच्युत हुए हैं। एक ‘सामूहिक स्मृति‘ का शिकार हैं। वे अपनी-अपनी मातृभाषा को न केवल हेय समझते हैं, बल्कि उसे नष्ट करने के अभियान के जत्थों में बदल गए हैं। आज के तमाम हिंदी अखबार ‘यूथ-प्लस‘ या ‘यूथ फोरम‘ के नाम पर चार-चार चमकीले और चिकने पन्ने छाप रहे हैं-जिसमें एक-दो पृष्ठ अंग्रेजी में है और बाकी के दो पृष्ठ हिंग्लिश में, जिसमें, ‘लाइफ स्टाइल के फंडे’ सिखाए जा रहे हैं। हमें इसके साथ ही एफ.एम. रेडियो की भूमिका का भी विरोध करते हैं, जो केवल ‘क्रियोलीकृत‘ हिंदी बनाम हिंग्लिश में ही अपना प्रसारण करते हैं और पूरी की पूरी युवा पीढ़ी से उसकी भाषा छीन रहे हैं।
हिंदी के अखबारों की यह भूमिका अंग्रेजी तथा उसके जरिए सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की भारतीय समाज में स्थापना की है। हम इस स्तर पर भी भारतीय समाचार-पत्रों की दृष्टि का विरोध करते हैं कि वे अपने इस एजेंडे को अविलंब रोकें।’
इसके उपरांत हिंदी के लगभग दो दर्जन दैनिक अखबारों को जलाया गया। और सर्व सहमति से यह तय किया गया कि इन अखबारों की राख को विरोध प्रकट करने हेतु देश के माननीय सांसदों, विधायकों और समस्त समाचार पत्रों के संचालकों एवं संपादकों को भेजा जाएगा। साथ ही होली जलाने वाले कार्यक्रम के समय दिए गए वक्तव्यों को भी भेजा जाएगा।
अंत में तय किया गया कि इस विरोध की प्रक्रिया को निरंतरता देने के लिए विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के छात्रों के बीच जाकर मैदानी स्तर पर चेतना पैदा करने का काम और प्रक्रिया शुरू की जाएगी ताकि देश भर के युवा वर्ग को तथाकथित ‘यूथ कल्चर‘ के नाम पर अंग्रेजी तथा पश्चिम के सांस्कृतिक उद्योग की फूहड़ता के लिए ‘उन्माद‘ की हद तक पहुंचाने का काम स्थगित करते हुए उनके अंदर देश, राष्ट्र, समाज और परंपरा की वस्तुगत पहचान पैदा की जाए।
प्रस्तुति: शिवशंकर मालवीय

इसलिए बिदा करना चाहते हैं, हिंदी को हिंदी के अखबार : प्रभु जोशी

सवाल सिर्फ भाषा का नहीं : अनुराग

भाषा के मुद्दे पर हम 63 साल पहले जहां थे, आज भी वहीं खड़े हैं। इसका सर्वमान्य हल नहीं निकाल पाना हम सबके लिए शर्म की बात है। इसी वजह से समय-समय पर भाषा को लेकर विवाद भी उत्पन्न हुए हैं। 
रूस में बोली जाने वाली अवार भाषा के जनकवि रसूल हमजातोव ने मेरा दागिस्तान में प्रसिद्ध लोककवि अबूतालिब के साथ घटित एक रोचक किस्से का वर्णन किया है। किस्सा यों है-
अबूतालिब एक बार मास्को में थे। सड़क पर उन्हें किसी राहगीर से कुछ पूछने की आवश्यकता हुई। शायद यही कि मंडी कहां है? संयोग से कोई अंग्रेज ही उनके सामने आ गया।
अंग्रेज अबूतालिब की बात न समझ पाया और पहले तो अंग्रेजी, फ्रांसीसी, स्पेनी और शायद दूसरी भाषाओं में पूछताछ करने लगा।
 अबूतालिब ने शुरू में रूसी, फिर लाक, अवार, लेजगीन, दार्गिन और कुमीक भाषाओं में अंग्रेज को अपनी बात समझाने की कोशिश की।
आखिर एक-दूसरे को समझे बिना वे दोनों अपनी-अपनी राह चले गए। एक बहुत ही सुंस्कृत ने जो अंग्रेजी भाषा के ढाई शब्द जानता था, बाद में अबूतालिब को उपदेश देते हुए कहा, ”देखा, संस्कृति का क्या महत्व है? अगर तुम कुछ अधिक सुसंस्कृत होते तो अंग्रेज से बात कर पाते। समझे न।”
”समझ रहा हूं।” अबूतालिब ने जवाब दिया, ”मगर अंग्रेज को मुझसे अधिक सुसंस्कृत कैसे मान लिया जाए? वह भी तो उनमें से एक भी जबान नहीं जानता था, जिनमें मैंने उससे बात करने की कोशिश की।”
हमारे मन में अपनी मातृभाषा और देश की भाषाओं के लिए अबूतालिब की तरह स्वाभिमान नहीं, बल्कि कुंठा है। इसी का परिणाम है कि हम भारतीय भाषाओं और संस्कृति की बात करने वाले को दकियानूसी और पिछड़ा मानते हैं। अंग्रेजी भाषा व संस्कृति को अपनाने वालों को सम्मान की दृष्टि से देखते हुए उन्हें आधुनिक तथा प्रगतिशील होने का खिताब देते हैं। अंग्रेजी का ज्ञान नहीं होने पर अंग्रेजीदा तो हमारी उपेक्षा करते ही हैं, किंतु हम भी स्वयं को हीन व लज्जित महसूस करते हैं।
अंतर्राष्ट्रीयता का हवाला देकर ऐसा भ्रमजाल फैलाया गया कि मानो प्रत्येक भारतीय को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जाकर काम करना है। इसलिए हर किसी के लिए अंग्रेजी सिखना जरूरी है। इसी भ्रमजाल के कारण हम अपने बच्चों को महंगे से महंगे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं। इन स्कूलों में डोनेशन के नाम पर मोटी रकम भेंट चढ़ाई जाती है। यह शिक्षा पद्धति बहुत महंगी भी है। अपनी सीमित आय होने के कारण इसके लिए आर्थिक अपराधों की शरण में जाना पड़ता है। अत: अप्रत्यक्ष रूप से यह शिक्षा पद्धति भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा देती है।
अंग्रेजी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करने का सबसे बड़ा नुकसान प्रतिभा का हृास है। बच्चा जब प्राथमिक शिक्षा प्रारंभ करता है तो वह उसके बहुमुखी विकास की उम्र होती है। तब उसे विदेशी भाषा का ज्ञान प्राप्त करने के लिए बाध्य किया जाता है। इससे उसके विकास पर प्रतिकूल असर पड़ता है। वह बड़ा होकर प्रतियोगिताओं की तैयारी करता है तो अंग्रेजी फिर अड़चन पैदा करती है। प्रतियोगी को जो समय अपने विषय के गहरे अध्ययन में लगाना चाहिए, वह समय उसे अंग्रेजी के अध्ययन में लगाना पड़ता है। वह जब सरकारी या गैर सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करता है तो यहां पर भी सबसे पहले अंग्रेजी का ज्ञान होना आवश्यक है। योग्य से योग्य व्यक्ति को भी अंग्रेजी का ज्ञान न होने पर या कम होने पर अयोग्य करार दिया जाता है। ऐसे में हीन भावना आना स्वाभाविक है।
 भारत में अभी भी करीब 35 फीसदी लोग अशिक्षित हैं। देश के एक बड़े हिस्से में प्राथमिक शिक्षा की समुचित व्यवस्था तक नहीं है। और जहां व्यवस्था है भी, वहां सब रामभरोसे चल रहा है। ऐसे में अंग्रेजी की वकालत करना समझ से परे है।
असल में गुलामी के दौरान ही एक ऐसे वर्ग ने जन्म ले लिया था, जिसे देश-समाज से कुछ लेना-देना नहीं था। यह वर्ग आजादी भी नहीं चाहता था। इस वर्ग का मकसद अंग्रेजों के प्रति वफादारी साबित कर सत्ता सुख भोगना था। इसके लिए इसने खुद को अंग्रेजी रहन-सहन में ढालना शुरू कर दिया। यह वर्ग जबान भी अंग्रेजों की बोलता। अंग्रेजों से नजदीकी साबित करने के लिए भारतीयों से दूरी बनाना इसकी मजबूरी थी। इसे श्रेष्ठता का दंभ होने लगा। अन्य लोगों को यह गंवार और जाहिल समझाता। दुर्भाग्यवश आजादी के बाद सत्ता की कुंजी इसी वर्ग के हाथ में आई। यह वर्ग तो चाहता ही नहीं कि मात्र एक भाषा से उन्हें जो श्रेष्ठता मिली है, वह छीन जाए।
भाषा को लेकर प्राथमिक स्तर से ही प्रयास किए जाने की जरूरत है। दस मिन्स टेन, जिस बच्चे को यह बताना पड़ रहा हो, उसे हिंदी में काम करने की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। हमें नहीं भूलना चाहिए कि जिस भी देश ने भी तरक्की की है, अपनी मातृभाषा में ही है। यदि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान हिंदी में उपलब्ध नहीं है तो यह हिंदी की नहीं, शासक वर्ग की कमी है। हिंदी के प्रचार-प्रचार के नाम पर तमाम तरह की नौटंकी करने की बजाए, विश्व ज्ञान-विज्ञान, साहित्य हिंदी में उपलब्ध कराया जाए। एक अनुमान के अनुसार भारत में हिंदी में बोलने वाले 40 प्रतिशत से अधिक है, जबकि अंग्रेजी बोलने वाले मात्र 0.021 प्रतिशत हैं। आज हिंदी किसी प्रदेश या देश तक सीमित नहीं रही। भारत से बाहर फीजी, मारीशस, गायना, सूरीनाम, त्रिनिदाद, अरब, अमीरात, इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा आदि कई देशों में लोग इसे दैनिक व्यवहार में लाते हैं। तकनीकी विकास के चलते आज हिंदी में एसएमएस, ईमेल आदि सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। इंटरनेट पर भी हिंदी का साम्राज्य बढ़ा है।
और यदि अंग्रेजी ही राजभाषा के काबिल है तो फिर हिंदी पखवाड़ा और हिंदी सप्ताह जैसे ढोंग करने की क्या जरूरत है? क्यों मंत्रालयों और विभागों में हिंदी अधिकारी नियुक्त कर करोड़ों रुपए बर्बाद किए जा रहे हैं? क्यों हिंदी अकादेमी, हिंदी विश्वविद्यालय खोले जा रहे हैं? जो भाषा इस देश के काबिल ही नहीं है और जिसमें इस देश की कार्यपालिका,  न्याय पालिका और विधायिका काम नहीं कर सकती है, उसके प्रचार-प्रचार के लिए क्यों देश की धन, श्रम और समय नष्ट किया जा रहा है?
भाषा के मुद्दे को और टालने की बजाए, तुरंत समाधान किया जाना चाहिए। इसके लिए दृढ़ इच्छा शक्ति की जरूरत है। इसका राजनेताओं में अभाव है। इसलिए इनसे अपेक्षा करना बेकार है। जब पूरे देश में आंदोलन शुरू हुए, तभी आजादी मिल सकी। आज ऐसे ही देशव्यापी आंदोलन की जरूरत है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाषा का मसला, आजादी से कम महत्वपूर्ण नहीं है।

संस्थानों और कार्यालयों से बाहर निकले हिंदी : शरणकुमार लिम्बाले

हमारे देश में बहुत-सी भाषाएं हैं। और उनकी कई बोलियां हैं। हर बोली की अपनी-अपनी आंचलिक विशेषता है। इनकी लिपि भी अलग-अलग है। इससे भी हिंदी के प्रचार-प्रसार में रुकावट पैदा होती है। इसके अलावा हिंदी को राष्टरभाषा बनाने के लिए जो राजनीतिक इच्छा शक्ति होनी चाहिए, वह किसी भी पार्टी में नहीं है।
भारत में करीब डेढ़ सौ साल तक ब्रिटिश की राजसत्ता रही। यहां से गोरे ब्रिटिश चले गए, लेकिन काले रह गए। ब्रिटिश मानसिकता हमारे में बहुत ज्यादा काम करती है। जो बाबू-अधिकारी हैं, वे रहन-सहन और विचार में अभी भी अंग्रेजी को बनाए हुए हैं। अंग्रेजी बोलने से प्रतिष्ठा मिलती है। फाइव स्टार का वेटर भी अंग्रेजी बोलता है।
केवल दिल्ली में या केंद्र सरकार के कार्यालयों में रहने से हिंदी का प्रचार-प्रसार नहीं होगा। हमारा देश केवल सरकारी संस्थाओं में नहीं है। वह बहुत फैला हुआ है। हिंदी के साहित्य का प्रादेशिक भाषाओं में और प्रादेशिक भाषाओं के साहित्य का हिंदी में अनुवाद किया जाना चाहिए।
पंचवर्षीय योजना में सड़कों, पुलों, बांध आदि पर ध्यान दिया जाता है। लेेकिन देश जो सांस्कृति-सामाजिक जीवन जीता है, वह भाषा के माध्यम से जीता है। जितने जरूरी सड़क, बांध आदि हैं, उतनी ही जरूरी भाषा भी है। इसलिए पंचवर्षीय योजना में भाषा के विकास पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।
सप्ताह-पखवाड़ा से मनाने से कुछ भी नहीं होने वाला है। वास्तव में इन्हीं लोगों ने हिंदी को बंधक बना रखा है। इसके विकास के लिए इसे संस्थानों और कार्यालयों से बाहर निकलना होगा।
- मराठी के चर्चित लेखक और साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित

हिंदी राष्ट्र की अस्मिता की भाषा है : बालशौरि रेड्डी

मैंने गांधीजी से हस्ताक्षर लेकर हिंदी सीखी। उन्होंने 21 जनवरी, 1946 को दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की रजत जयंती समारोह का उद्घाटन किया था। उन्होंने कहा था कि बहुत जल्द ही देश आजाद होने जा रहा है। आजाद भारत हिंदुस्तान की  राष्ट्रभाषा हिंदी होगी। अत: में महिलाओं तथा युवाओं से अपील करता हूं कि आप लोग अभी से हिंदी सीखना आरंभ करें ताकि हिंदुस्तान का आजाद होती ही जनता की भाषा में शासन का कार्य संपन्न हो सके। गांधीजी का यह सपना आज तक हम लोग साकार नहीं कर सके।
किसी भी स्वतंत्र राष्टर का अपना संविधान, राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान और राष्ट्रभाषा होती है। किसी भी देश के लिए विदेशी भाषा कभी भी  राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती। जब टर्की आजाद हुआ तो कमलपाशा ने सभी अधिकारियों को बुलाकर कहा, ‘ हमारा देश स्वतंत्र हो गया है। हम तरक्की करना चाहते हैं। बताओ।” सभी ने सुझाव दिए। अंत में कमलपाशा ने कहा, ”आप लोग अपनी घड़ी देखो। इसी सैकेंड से टर्की की राजभाषा तुर्की है। जाओ काम करो।” ऐसे काम होता है।
1950 में संविधान में हिंदी को स्वीकृति मिली। यह बताया गया कि 15 वर्ष के बाद हिंदी अंग्रेजी का स्थान ग्रहण करेगी ओर हिंदी प्रशासनिक भाषा होगी। लेकिन 1963 में इसमें संशोधन हुआ कि जब तक हिंदीत्तर भाषा के तीन चौथाई सांसद स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक ऐसा नहीं होगा। अब तो यह विवाद का विषय बन गया है।
1965 में जब लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने, उन्होंने सोचा कि देश के विकास के लिए पंचवर्षीय योजना क्रियांवित करते हैं, लेकिन भाषा के लिए अब तक जो प्रयास हुआ नगण्य है। उन्होंने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को दिल्ली आमंत्रित किया। तीन दिन तक गहन चर्चा हुई। इसके बाद सर्वसम्मित से प्रस्ताव पारित हुआ कि सभी राज्य त्रि-भाषा सूत्र पर अमल करेंगे। इसके अनुसार पहली भाषा के रूप में मातृभाषा, दूसरी के रूप में हिंदी और तीसरी के रूप अंग्रेजी पढ़ाई जानी थी। आंध्र, केरल और कर्नाटक में इसका अनुपालन हुआ। हरियाणा में थोड़े प्रयास हुए। उत्तर प्रदेश में तेलुगु को कुछ जगह पढ़ाया गया। लेकिन इस सूत्र पर गंभीरता से काम नहीं हुआ।  
देश में रेल विभाग, वित्त विभाग, सेना आदि कई विभाग एक हैं। लेकिन शिक्षा नीति प्रदेश सरकारो के हाथ में है। वहां के शिक्षा मंत्री पाठ्यक्रम तैयार करते हैं। पूरे देश के लिए अगर एक राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनती तो सारे बच्चों को एक प्रकार की शिक्षा मिलती। लेकिन प्रत्येक प्रदेश में वहां के नेताओं के बारे में पढ़ाया जा रहा है। बच्चे सोचते हैं कि यही हमारी दुनिया है। हमारे बीच में एकात्मकता नहीं है। विघटन की प्रवृत्ति है। एक राष्टï्रीय शिक्षा नीति तुरंत बनाई जानी चाहिए। भले ही इसके लिए संविधान में संशोधन करना पड़ा।
हिंदी राष्ट की अस्मिता की भाषा है। मैं पहले भारतीय हूं, उसकेे बाद आंध्रवासी। मेरी मातृभाषा तेलुगु मुझे बहुत प्यारी है क्योंकि वह जन्मघूटी से सीखी हुई भाषा है। हिंदी से कम नहीं मानता और हिंदी के लिए मैं अपनी मातृभाषा की बलि देना भी नहीं चाहूंगा। लेकिन एक भारतीय के नाते संपूर्ण राष्ट के लिए हिंदी को प्रशासनिक और भारत भारती के रूप में अवश्य देखना चाहता हूं।
- तेलुगु के वरिष्ठ लेखक और चंदामामा के पूर्व संपादक