
शिक्षण संस्थाओं में हिन्दी की दयनीय स्थिति पर लेखक-आलोचक डॉक्टर घनश्याम का आलेख। यह आलेख विशेषतौर से आंध्र प्रदेश के संदर्भ में है-
‘मानव’ एक प्रक्रिया है और मनुष्य के ‘मानव’ बनने की प्रक्रिया में भाषा ने ‘उपकरण’ का कार्य किया है। मनुष्य जैसा होता है या जैसा हो सकता है– सब भाषा में ही सम्भव है। मनुष्य को भाषा से अलग करके नहीं देखा जा सकता। मानव जीवन में कल्पना, अनुभूति, विचार आदि सभी भाषिक अभिव्यक्तियाँ हैं और दूसरे शब्दों में मानव जीवन ही भाषिक अभिव्यक्ति है। अर्थात् मनुष्य जो जीवन जीता है, वह भाषा में ही जीता है।
चेतना सम्पन्न होने के कारण मनुष्य न केवल अपनी परतंत्रता को पहचानता है, अपितु अपने स्वतंत्र होने का प्रयास भी करता है। यही स्वतंत्रता उसका अस्तित्व होती है, जिसे बनाये रखने के लिये मनुष्य को संघर्ष करना पड़ता है। दूसरे शब्दों में भाषा ही अस्तित्व है। इस तथ्य और सार्वभौमिक सत्य को गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे कुछेक सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से विरले चिंतक ही जानने और पहचानने में सफल हुए हैं। उन्होंने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा था– “मुझे देश की आज़ादी और भाषा की आज़ादी में से किसी एक को चुनना पड़े, तो मैं निस्संकोच भाषा की आज़ादी चुनूँगा, क्योंकि मैं फायदे में रहूँगा। देश की आज़ादी के बावजूद भाषा की गुलामी रह सकती है, लेकिन अग़र भाषा आज़ाद हुई तो देश गुलाम नहीं रह सकता।”
हम सब अच्छी तरह से जानते हैं कि देश आज़ाद हुआ है किंतु भाषा नहीं! इसी कड़वे सत्य को आंध्र प्रदेश के उच्च न्यायालय के न्यायधीश और प्रदेश के शिक्षा मंत्री रह चुके गोपालराव एकबोटे ने अपनी पुस्तक ‘ए नेशन विदाउट नेशनल लैंग्वेज’ (‘राष्ट्रभाषा विहीन राष्ट्र’) में हमारे समक्ष रखा है।
आज़ादी के बाद, भारतीय संविधान में हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया। निस्संदेह हिन्दी ने लोगों में राष्ट्रीयता की भावना जगाने तथा आज़ादी हासिल करने में बहुत बड़ी भूमिका का निर्वाह किया है। फलस्वरूप आज़ादी के नये-नये जोश में सन् 1949 से आन्ध्र प्रदेश में भी ‘हिन्दी भाषा एवं साहित्य’ का एक पर्चा, चाहे वह प्रथम भाषा के रूप में हो या द्वितीय भाषा के रूप में, पाठ्यक्रम के अनिवार्य अंग के रूप में स्वीकार कर लिया गया। किंतु उस समय ‘हिन्दी प्रचार सभाओं’ द्वारा प्रशिक्षित हिन्दी अध्यापकों की संख्या इतनी नहीं थी कि विभिन्न सरकारी तथा निजी विद्यालयों की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके। इसे ध्यान में रखते हुए आन्ध्र प्रदेश के विश्वविद्यालयों ने हिन्दी भाषा और साहित्य के अध्ययन-अध्यापन के लिए उच्च स्तरीय परीक्षाएँ चलाना प्रारम्भ किया। हिन्दी भाषा-प्रेमी अध्यापक, जो हिन्दी अध्ययन एवं अध्यापन को राष्ट्रीय भावना का प्रतीक मानते थे, अपने ज्ञान और योग्यता को बढ़ाने के उद्देश्य से उत्तर भारत के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से स्नातकोत्तर, एम.फिल और विद्या वाचस्पति/पीएच.डी की उपाधियाँ प्राप्त करने लगे। उस्मानिया विश्वविद्यालय, आन्ध्र विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय, श्री वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय तथा दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा हैदरावाद आदि संस्थानों एवं केन्द्रों में हिन्दी का अध्ययन करनेवालों की संख्या इतनी अधिक होने लगी कि विश्वविद्यालयों में हिन्दी के लिये भी ‘प्रवेश परीक्षा’ की अवधारणा का सूत्रपात हुआ। आन्ध्र प्रदेश सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में कई नये विश्वविद्यालयों की स्थापना की। इनमें द्रविड विश्वविद्यालय, सातवाहन विश्वविद्यालय और तेलंगाना विश्वविद्यालय प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त हाल-हाल में अंग्रेज़ी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय में भी ‘हिन्दी और भारत अध्ययन’ नाम से हिन्दी विभाग की स्थापना की गई।
हिन्दी शिक्षण-प्रशिक्षण की उपरोक्त उत्साहवर्धक स्थितियाँ 20वीं शताब्दी के अंतिम दशक के प्रारम्भ तक ही रहीं। आज विद्यार्थियों में हिन्दी भाषा और उसके साहित्य-अध्ययन के प्रति कोई विशेष आकर्षण नहीं रहा। परिणामस्वरूप उनकी संस्था में क्रमशः कमी होती जा रही है।
ध्यातव्य है कि आन्ध्र प्रदेश में त्रि-भाषा-सूत्र लागू किया गया था। जिसके अंतर्गत अंग्रेज़ी अनिवार्य विषय के रूप में रखकर तेलुगु और हिन्दी को प्रथम या द्वितीय भाषा के रूप में पढ़ने की ऐच्छिक छूट दी गयी। सरकारी विद्यालयों और महाविद्यालयों में अब तक तेलुगु माध्यम ही प्रमुख रहा। किंतु अब इनमें भी धीरे-धीरे अंग्रेज़ी माध्यम की संख्या बढ़ी है। निजी विद्यालयों और महाविद्यालयों में प्रारम्भ से ही ‘कॉन्वेंट’ की अवधारणा व्याप्त रहने से इनमें शिक्षण का माध्यम अंग्रेज़ी ही रहा। हिन्दी माध्यमों के विद्यालयों और महाविद्यालयों की संख्या कभी भी दहाई के आँकडे़ तक नहीं पहुँच पायी।
केन्द्रीय विद्यालयों और डी.ए.वी. को छोड़ आन्ध्र प्रदेश के विद्यालयों में अन्य विषयों के लिये उत्तीर्णांक जहाँ 35 प्रतिशत है, वहाँ द्वितीय भाषा के उत्तीर्णांक 20 प्रतिशत ही है। यह व्यवस्था हिन्दी के लिये ही नहीं अपितु द्वितीय भाषा के रूप में तेलुगु के लिये भी घातक ही सिद्ध हुई। निजाम शासन के समय से चल रहे उर्दू माध्यम के विद्यालय भी अब धीरे-धीरे लुप्तप्रायः स्थिति में पहुँच गये हैं।
सन् 1991 के निजीकरण, उदारीकरण और वैश्वीकरण, सूचना प्रौद्योगिकी एवं बाज़ार के विकास ने भारत को एक बड़े बाज़ार के रूप में परिवर्तित कर दिया। निश्चित ही विकास के नाम पर इसका विध्वंसक प्रभाव आन्ध्र प्रदेश पर भी पड़ा।
तेलुगु देशम पार्टी के शासन काल, उसमें भी विशेषतः मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडु के शासन काल में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की स्थापनाओं ने आन्ध्र प्रदेश की शिक्षा-व्यवस्था को ही नहीं अपितु ‘हाईटेक’ संस्कृति के नाम पर चार सौ साल पुराने हैदराबाद की गंगा-जमुनी संस्कृति और यहाँ की प्रांतीय भाषाओं (तेलुगु, दक्ख़नी) को भी लगभग मृतप्रायः कर छोड़ा।
वर्तमान समय में शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन एवं राजनीति सर्वाधिक लाभप्रद क्षेत्रों में रूपांतरित हो चुके हैं। यूँ भी शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े बड़े-बड़े प्रतिष्ठान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी-न-किसी रूप में सियासी लोगों के नियंत्रण (चुंगुल) में ही हैं। फलस्वरूप आज जितने इंजीनियरिंग (अभियांत्रिकी) कॉलेज आन्ध्र प्रदेश में संचालित हैं, उतने पूरे संयुक्त राज्य अमरिका में भी नहीं हैं।
इंजीनियरिंग और चिकित्सा क्षेत्र में उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु उच्च माध्यमिक (इंटरमीडिएट) में गणित, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, वनस्पति विज्ञान और जीव विज्ञान की शिक्षा अनिवार्य है और इसमें भी अंग्रेज़ी माध्यमों का ही वर्चस्व सिद्ध हो चुका है। उच्च माध्यमिक शिक्षा के क्षेत्र में ‘श्री चैतन्या’ और ‘नालंदा’ जैसे शिक्षा समूहों ने हिन्दी ही नहीं; अपितु तेलुगु और उर्दू भाषा को भी उच्च माध्यमिक के दो वर्षों की पढ़ाई में द्वितीय भाषा के रूप में पढ़ने के विकल्प को लगभग समाप्त कर दिया है। इन भाषाओं के स्थान पर ये शिक्षा समूह संस्कृत और अरबी को अधिक वरीयता प्रदान कर रहे हैं। इसके पीछे उनका तर्क अंकों को लेकर यह है कि हिन्दी, तेलुगु और उर्दू में विद्यार्थियों को अधिक अंक प्राप्त नहीं होते और परिणामस्वरूप उनके विद्यार्थियों के अंक प्रतिशत में कम हो जाते हैं।
यह बड़ी ही दयनीय स्थिति है कि न विद्यार्थी, न उनके अभिभावक और न सरकार ही इसके दूरगामी कुप्रभाव के बारे में कोई गम्भीर सोच रखते हैं।
सन् 2004 में जब कांग्रेस सरकार पुनः सत्ता में आयी। तब तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वर्गीय राजशेखर रेड्डी ने उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति देने की एक महत्त्वपूर्ण योजना का क्रियान्वयन किया। निश्चित ही यह छात्रवृत्ति योजना उच्च शिक्षा और रोज़गार के क्षेत्र में विद्यार्थियों के लिये बहुत उपयोगी सिद्ध रही। किंतु इसका दूसरा और अधिक महत्त्वपूर्ण नकारात्मक परिणाम यह रहा कि प्रत्येक विद्यार्थी आसानी से इंजीनियरिंग की विभिन्न शाखाओं में प्रवेश पाने लगा। न महाविद्यालयों की कमी थी, न धन का ही अभाव रहा। ऐसी स्थितियों में डिग्री (स्नातक) में वाणिज्य (बी.कॉम.) को छोड़ बी.ए. (कला स्नातक) और बी.एससी (विज्ञान स्नातक) की पारम्परिक शिक्षा हेतु प्रवेश पाने वाले विद्यार्थियों की संख्या न्यूनतम स्तर से भी कम हो गयी है। बी.कॉम. में प्रवेश लेने वाले अधिकतर विद्यार्थी चूँकि उच्च माध्यमिक में अरबी, संस्कृत एवं फ्रेंच भाषा को द्वितीय भाषा के रूप में पढ़कर आते हैं, अतः स्नातक स्तर की शिक्षा में भी वे हिन्दी और उर्दू का चुनाव नहीं करते। तेलुगु मातृभाषा होने के नाते कुछ विद्यार्थी अब भी तेलुगु भाषा को द्वितीय भाषा के रूप में चुनते हैं, किंतु इनकी संख्या भी क्रमशः कम ही हो रही है। ऐसे में विश्वविद्यालयों में हिन्दी से एम.ए. (कला निष्णात) करने वाले विद्यार्थियों की संख्या कितनी हो सकती है, इसका अनुमान भी आसानी से लगाया जा सकता है। इसी का परिणाम है कि आज दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, हैदराबाद में हिन्दी विभाग की कई सीटें रिक्त ही रह जाती हैं। उस्मानिया विश्वविद्यालय के अंतर्गत आर्ट्स कॉलेज, महिला महाविद्यालय, कोठी और स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सिकंदराबाद के हिन्दी विभागों में जैसे-जैसे पूरी सीटें भर जाती हैं, जिसके पीछे छात्रवृत्ति, छात्रावास और बस पास की सुविधा जैसे अन्य कई कारण हैं। किंतु हिन्दी महाविद्यालय और विवेक वर्धिनी महाविद्यालय में एम.ए (हिन्दी) के अध्ययन केन्द्र लगभग बन्द होने की कग़ार तक आ पहुँचे हैं।
देश, भाषा और संस्कृति से जुड़े किसी भी कार्यक्रम, संगोष्ठी एवं कार्यशाला में हम एक ‘वेद वाक्य’ प्रायः कहते-सुनते हैं- ‘भाषा और संस्कृति किसी भी देश या समाज रूपी सिक्के के दो पहलू होते हैं’– तो यह भी निश्चित ही है कि संस्कृति भाषा में ही निहित एवं प्रतिबिंबित होती है। यही कारण है कि मुक्तिबोध ने भाषा को ‘एक जीवन परम्परा’ एवं ‘सामाजिक निधि’ कहा है। (एक साहित्यिक की डायरी पृ. 25-26)। आज जब कि हिन्दी ही नहीं अपितु देश की प्रातीय भाषाएँ भी तीव्र गति से काल कलवित होने के क्रम में खड़ी हैं, ऐसे में संस्कृति को बचा पाना असम्भव नहीं तो कम कठिन भी नहीं कहा जा सकता।
प्रति 15 अगस्त को एक दिन के लिए हम औपचारिकतावश देश प्रेम के गीत गाते-सुनते हैं। सांस्कृतिक परम्परा और धरोहर से जुड़े विषयों पर नेताओं के जोशीले भाषणों में जनता की कोई रुचि नहीं रही। बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करनेवाले तथाकथित स्नातक स्तरीय नौकर स्वयं को उच्च शिक्षित मानते हैं और ‘हाईटेक संस्कृति’ में जीने के आदी हो चुके हैं। प्रौद्योगिकी सूचना संसार में दिग्भ्रमित युवाओं के लिये यह दिन एक छुट्टी से अधिक कुछ और मायने नहीं रखता। इनके लिये देश, भाषा, संस्कृति, सभ्यता ‘बूल शीट’ लगती है। शेष जनता को भी ‘स्वाधीनता दिवस’ के कार्यक्रमों से कोई लगाव नहीं रहा। क्योंकि अब बड़े-बड़े राजनेताओं के असली चेहरे और उनके (कु) कर्म, समाज के सामने बेपर्दा हो चुके हैं। लगभग कुछ ऐसी ही अनिश्चित किंतु अनिवार्य संवैधानिक औपचारिकता कर्मरत स्थिति ‘गण’ और ‘तंत्र’ की 26 जनवरी के दिन भी दृष्टिगोचर होती है।
‘स्वाधीनता दिवस’ और ‘गणतंत्र दिवस’ का संबंध जहाँ सम्पूर्ण देश से है, वहाँ ‘हिन्दी दिवस’ का संबंध (संवैधानिक विवशता) तो मात्र सरकारी संस्थानों, प्रतिष्ठानों और उपक्रमों से ही अधिक होता है। ऐसे में राजभाषा दिवस, सप्ताह, पखवाड़े आदि कार्यक्रमों का तो और अधिक विवश और औपचारिक रूप से सुसंपन्न होना स्वाभाविक ही है। इन कार्यक्रमों से जुड़े ‘गण’ और ‘तंत्र’ को भले ही किसी-न-किसी रूप में संपन्नता हासिल हो, किन्तु भाषा के बाबत देश की आम जनता को इनसे किसी भी प्रकार के कोई लाभ की आशा करना बेमानी ही होगा।
हिन्दी शिक्षक होने के नाते मुझे भी अक्सर राजभाषा से जुड़े विभिन्न सरकारी कार्यालयों-कार्यक्रमों में किसी-न-किसी रूप में प्रतिभागी बनने का अवसर मिल ही जाता है। इन कार्यालयों-कार्यक्रमों में विद्वानों एवं अधिकारियों द्वारा औपचारिकतावश की जाने वाली हिन्दी की स्तुति-प्रशस्ति सुन मुझे हर बार बिहारीलाल के इस दोहे का स्मरण ताज़ा हो जाता है –
अजौ तरयौना ही रहयो, श्रुति सेवत इक-रंग।
नाक बास बेसरि रहयो, बसि मुकुतन के संग।।
अंग्रेज़ी भले ही बेसरी (खच्चरी) हो किन्तु वह शिक्षा-व्यवस्था रूपी नथ में मोती की तरह है, जो सरकार और शासन की नाक पर बड़े नाज़ों अदा के साथ विराज रही है। जबकि हिन्दी तरयौना (कान का भूषण) ही बनी हुई है, चाहे कितने ही वेद क्यों न सुन एवं जान लें, वह तरयौ ना (पार न लगना) ही की स्थिति में है।
नोट : यह आलेख आनंद पाटील के संपादन में प्रकाशित होने वाली प्रकाशन की महत्वपूर्ण वृहत् योजना ‘दक्षिण और हिन्दी‘ के लिए लिखा गया है। इसके दस खण्ड होंगे। डॉ. घनश्याम इस महत्वपूर्ण योजना के लिये गठित सलाहकार समिति के सदस्यों में से एक हैं। इस योजना के अंतर्गत दक्षिण में हिन्दी के किसी भी पहलू पर आलेख आमंत्रित हैं। आलेख सम्पादक के मेल पते पर भी प्रेषित किये जा सकते हैं- anandpatil.hcu@gmail.com। संपादक संपर्क : +91 94860 37432














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