Tag: Hindi

शिक्षण संस्थानों में हिन्दी : घनश्याम

Ghanshyam

शिक्षण संस्‍थाओं में हिन्‍दी की दयनीय स्थिति पर लेखक-आलोचक डॉक्‍टर घनश्‍याम का आलेख। यह आलेख विशेषतौर से आंध्र प्रदेश के संदर्भ में है-

‘मानव’ एक प्रक्रिया है और मनुष्य के ‘मानव’ बनने की प्रक्रिया में भाषा ने ‘उपकरण’ का कार्य किया है। मनुष्य जैसा होता है या जैसा हो सकता है– सब भाषा में ही सम्‍भव है। मनुष्य को भाषा से अलग करके नहीं देखा जा सकता। मानव जीवन में कल्पना, अनुभूति, विचार आदि सभी भाषिक अभिव्यक्तियाँ हैं और दूसरे शब्दों में मानव जीवन ही भाषिक अभिव्यक्ति है। अर्थात् मनुष्य जो जीवन जीता है, वह भाषा में ही जीता है।

चेतना सम्पन्न होने के कारण मनुष्य न केवल अपनी परतंत्रता को पहचानता है, अपितु अपने स्वतंत्र होने का प्रयास भी करता है। यही स्वतंत्रता उसका अस्तित्व होती है, जिसे बनाये रखने के लिये मनुष्य को संघर्ष करना पड़ता है। दूसरे शब्दों में भाषा ही अस्तित्व है। इस तथ्य और सार्वभौमिक सत्य को गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे कुछेक सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से विरले चिंतक ही जानने और पहचानने में सफल हुए हैं। उन्होंने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा था– “मुझे देश की आज़ादी और भाषा की आज़ादी में से किसी एक को चुनना पड़े, तो मैं निस्संकोच भाषा की आज़ादी चुनूँगा, क्योंकि मैं फायदे में रहूँगा। देश की आज़ादी के बावजूद भाषा की गुलामी रह सकती है, लेकिन अग़र भाषा आज़ाद हुई तो देश गुलाम नहीं रह सकता।”

हम सब अच्छी तरह से जानते हैं कि देश आज़ाद हुआ है किंतु भाषा नहीं! इसी कड़वे सत्य को आंध्र प्रदेश के उच्च न्यायालय के न्यायधीश और प्रदेश के शिक्षा मंत्री रह चुके गोपालराव एकबोटे ने अपनी पुस्तक ‘ए नेशन विदाउट नेशनल लैंग्वेज’ (‘राष्ट्रभाषा विहीन राष्ट्र’) में हमारे समक्ष रखा है।

आज़ादी के बाद, भारतीय संविधान में हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया। निस्संदेह हिन्दी ने लोगों में राष्ट्रीयता की भावना जगाने तथा आज़ादी हासिल करने में बहुत बड़ी भूमिका का निर्वाह किया है। फलस्वरूप आज़ादी के नये-नये जोश में सन् 1949 से आन्ध्र प्रदेश में भी ‘हिन्दी भाषा एवं साहित्य’ का एक पर्चा, चाहे वह प्रथम भाषा के रूप में हो या द्वितीय भाषा के रूप में, पाठ्यक्रम के अनिवार्य अंग के रूप में स्वीकार कर लिया गया। किंतु उस समय ‘हिन्दी प्रचार सभाओं’ द्वारा प्रशिक्षित हिन्दी अध्यापकों की संख्या इतनी नहीं थी कि विभिन्न सरकारी तथा निजी विद्यालयों की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके। इसे ध्यान में रखते हुए आन्ध्र प्रदेश के विश्‍वविद्यालयों ने हिन्दी भाषा और साहित्य के अध्ययन-अध्यापन के लिए उच्च स्तरीय परीक्षाएँ चलाना प्रारम्भ किया। हिन्दी भाषा-प्रेमी अध्यापक, जो हिन्दी अध्ययन एवं अध्यापन को राष्ट्रीय भावना का प्रतीक मानते थे, अपने ज्ञान और योग्यता को बढ़ाने के उद्देश्य से उत्तर भारत के प्रतिष्ठित विश्‍वविद्यालयों से स्नातकोत्तर, एम.फिल और विद्या वाचस्पति/पीएच.डी की उपाधियाँ प्राप्त करने लगे। उस्मानिया विश्वविद्यालय, आन्ध्र विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय, श्री वेंकटेश्‍वर विश्‍वविद्यालय तथा दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा हैदरावाद आदि संस्थानों एवं केन्द्रों में हिन्दी का अध्ययन करनेवालों की संख्या इतनी अधिक होने लगी कि विश्‍वविद्यालयों में हिन्दी के लिये भी ‘प्रवेश परीक्षा’ की अवधारणा का सूत्रपात हुआ। आन्ध्र प्रदेश सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में कई नये विश्‍वविद्यालयों की स्थापना की। इनमें द्रविड विश्‍वविद्यालय, सातवाहन विश्‍वविद्यालय और तेलंगाना विश्‍वविद्यालय प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त हाल-हाल में अंग्रेज़ी एवं विदेशी भाषा विश्‍वविद्यालय में भी ‘हिन्दी और भारत अध्ययन’ नाम से हिन्दी विभाग की स्थापना की गई।

हिन्दी शिक्षण-प्रशिक्षण की उपरोक्त उत्साहवर्धक स्थितियाँ 20वीं शताब्दी के अंतिम दशक के प्रारम्भ तक ही रहीं। आज विद्यार्थियों में हिन्दी भाषा और उसके साहित्य-अध्ययन के प्रति कोई विशेष आकर्षण नहीं रहा। परिणामस्वरूप उनकी संस्था में क्रमशः कमी होती जा रही है।

ध्यातव्य है कि आन्ध्र प्रदेश में त्रि-भाषा-सूत्र लागू किया गया था। जिसके अंतर्गत अंग्रेज़ी अनिवार्य विषय के रूप में रखकर तेलुगु और हिन्दी को प्रथम या द्वितीय भाषा के रूप में पढ़ने की ऐच्छिक छूट दी गयी। सरकारी विद्यालयों और महाविद्यालयों में अब तक तेलुगु माध्यम ही प्रमुख रहा। किंतु अब इनमें भी धीरे-धीरे अंग्रेज़ी माध्यम की संख्या बढ़ी है। निजी विद्यालयों और महाविद्यालयों में प्रारम्भ से ही ‘कॉन्वेंट’ की अवधारणा व्याप्त रहने से इनमें शिक्षण का माध्यम अंग्रेज़ी ही रहा। हिन्दी माध्यमों के विद्यालयों और महाविद्यालयों की संख्या कभी भी दहाई के आँकडे़ तक नहीं पहुँच पायी।

केन्द्रीय विद्यालयों और डी.ए.वी. को छोड़ आन्ध्र प्रदेश के विद्यालयों में अन्य विषयों के लिये उत्तीर्णांक जहाँ 35 प्रतिशत है, वहाँ द्वितीय भाषा के उत्तीर्णांक 20 प्रतिशत ही है। यह व्यवस्था हिन्दी के लिये ही नहीं अपितु द्वितीय भाषा के रूप में तेलुगु के लिये भी घातक ही सिद्ध हुई। निजाम शासन के समय से चल रहे उर्दू माध्यम के विद्यालय भी अब धीरे-धीरे लुप्तप्रायः स्थिति में पहुँच गये हैं।

सन् 1991 के निजीकरण, उदारीकरण और वैश्‍वीकरण, सूचना प्रौद्योगिकी एवं बाज़ार के विकास ने भारत को एक बड़े बाज़ार के रूप में परिवर्तित कर दिया। निश्‍चित ही विकास के नाम पर इसका विध्वंसक प्रभाव आन्ध्र प्रदेश पर भी पड़ा।

तेलुगु देशम पार्टी के शासन काल, उसमें भी विशेषतः मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडु के शासन काल में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की स्थापनाओं ने आन्ध्र प्रदेश की शिक्षा-व्यवस्था को ही नहीं अपितु ‘हाईटेक’ संस्कृति के नाम पर चार सौ साल पुराने हैदराबाद की गंगा-जमुनी संस्कृति और यहाँ की प्रांतीय भाषाओं (तेलुगु, दक्ख़नी) को भी लगभग मृतप्रायः कर छोड़ा।

वर्तमान समय में शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन एवं राजनीति सर्वाधिक लाभप्रद क्षेत्रों में रूपांतरित हो चुके हैं। यूँ भी शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े बड़े-बड़े प्रतिष्ठान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी-न-किसी रूप में सियासी लोगों के नियंत्रण (चुंगुल) में ही हैं। फलस्वरूप आज जितने इंजीनियरिंग (अभियांत्रिकी) कॉलेज आन्ध्र प्रदेश में संचालित हैं, उतने पूरे संयुक्त राज्य अमरिका में भी नहीं हैं।

इंजीनियरिंग और चिकित्सा क्षेत्र में उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु उच्च माध्यमिक (इंटरमीडिएट) में गणित, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, वनस्पति विज्ञान और जीव विज्ञान की शिक्षा अनिवार्य है और इसमें भी अंग्रेज़ी माध्यमों का ही वर्चस्व सिद्ध हो चुका है। उच्च माध्यमिक शिक्षा के क्षेत्र में ‘श्री चैतन्या’ और ‘नालंदा’ जैसे शिक्षा समूहों ने हिन्दी ही नहीं; अपितु तेलुगु और उर्दू भाषा को भी उच्च माध्यमिक के दो वर्षों की पढ़ाई में द्वितीय भाषा के रूप में पढ़ने के विकल्प को लगभग समाप्त कर दिया है। इन भाषाओं के स्थान पर ये शिक्षा समूह संस्कृत और अरबी को अधिक वरीयता प्रदान कर रहे हैं। इसके पीछे उनका तर्क अंकों को लेकर यह है कि हिन्दी, तेलुगु और उर्दू में विद्यार्थियों को अधिक अंक प्राप्त नहीं होते और परिणामस्वरूप उनके विद्यार्थियों के अंक प्रतिशत में कम हो जाते हैं।

यह बड़ी ही दयनीय स्थिति है कि न विद्यार्थी, न उनके अभिभावक और न सरकार ही इसके दूरगामी कुप्रभाव के बारे में कोई गम्‍भीर सोच रखते हैं।

सन् 2004 में जब कांग्रेस सरकार पुनः सत्ता में आयी। तब तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वर्गीय राजशेखर रेड्डी ने उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति देने की एक महत्त्वपूर्ण योजना का क्रियान्वयन किया। निश्‍चित ही यह छात्रवृत्ति योजना उच्च शिक्षा और रोज़गार के क्षेत्र में विद्यार्थियों के लिये बहुत उपयोगी सिद्ध रही। किंतु इसका दूसरा और अधिक महत्त्वपूर्ण नकारात्मक परिणाम यह रहा कि प्रत्येक विद्यार्थी आसानी से इंजीनियरिंग की विभिन्न शाखाओं में प्रवेश पाने लगा। न महाविद्यालयों की कमी थी, न धन का ही अभाव रहा। ऐसी स्थितियों में डिग्री (स्नातक) में वाणिज्य (बी.कॉम.) को छोड़ बी.ए. (कला स्नातक) और बी.एससी (विज्ञान स्नातक) की पारम्‍परिक शिक्षा हेतु प्रवेश पाने वाले विद्यार्थियों की संख्या न्यूनतम स्तर से भी कम हो गयी है। बी.कॉम. में प्रवेश लेने वाले अधिकतर विद्यार्थी चूँकि उच्च माध्यमिक में अरबी, संस्कृत एवं फ्रेंच भाषा को द्वितीय भाषा के रूप में पढ़कर आते हैं, अतः स्नातक स्तर की शिक्षा में भी वे हिन्दी और उर्दू का चुनाव नहीं करते। तेलुगु मातृभाषा होने के नाते कुछ विद्यार्थी अब भी तेलुगु भाषा को द्वितीय भाषा के रूप में चुनते हैं, किंतु इनकी संख्या भी क्रमशः कम ही हो रही है। ऐसे में विश्‍वविद्यालयों में हिन्दी से एम.ए. (कला निष्णात) करने वाले विद्यार्थियों की संख्या कितनी हो सकती है, इसका अनुमान भी आसानी से लगाया जा सकता है। इसी का परिणाम है कि आज दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, हैदराबाद में हिन्दी विभाग की कई सीटें रिक्‍त ही रह जाती हैं। उस्मानिया विश्‍वविद्यालय के अंतर्गत आर्ट्स कॉलेज, महिला महाविद्यालय, कोठी और स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सिकंदराबाद के हिन्दी विभागों में जैसे-जैसे पूरी सीटें भर जाती हैं, जिसके पीछे छात्रवृत्ति, छात्रावास और बस पास की सुविधा जैसे अन्य कई कारण हैं। किंतु हिन्दी महाविद्यालय और विवेक वर्धिनी महाविद्यालय में एम.ए (हिन्दी) के अध्ययन केन्द्र लगभग बन्द होने की कग़ार तक आ पहुँचे हैं।

देश, भाषा और संस्कृति से जुड़े किसी भी कार्यक्रम, संगोष्ठी एवं कार्यशाला में हम एक ‘वेद वाक्य’ प्रायः कहते-सुनते हैं- ‘भाषा और संस्कृति किसी भी देश या समाज रूपी सिक्के के दो पहलू होते हैं’– तो यह भी निश्‍चित ही है कि संस्कृति भाषा में ही निहित एवं प्रतिबिंबित होती है। यही कारण है कि मुक्तिबोध ने भाषा को ‘एक जीवन परम्‍परा’ एवं ‘सामाजिक निधि’ कहा है। (एक साहित्यिक की डायरी पृ. 25-26)। आज जब कि हिन्दी ही नहीं अपितु देश की प्रातीय भाषाएँ भी तीव्र गति से काल कलवित होने के क्रम में खड़ी हैं, ऐसे में संस्कृति को बचा पाना असम्‍भव नहीं तो कम कठिन भी नहीं कहा जा सकता।

प्रति 15 अगस्त को एक दिन के लिए हम औपचारिकतावश देश प्रेम के गीत गाते-सुनते हैं। सांस्कृतिक परम्‍परा और धरोहर से जुड़े विषयों पर नेताओं के जोशीले भाषणों में जनता की कोई रुचि नहीं रही। बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करनेवाले तथाकथित स्नातक स्तरीय नौकर स्वयं को उच्च शिक्षित मानते हैं और ‘हाईटेक संस्कृति’ में जीने के आदी हो चुके हैं। प्रौद्योगिकी सूचना संसार में दिग्भ्रमित युवाओं के लिये यह दिन एक छुट्टी से अधिक कुछ और मायने नहीं रखता। इनके लिये देश, भाषा, संस्कृति, सभ्यता ‘बूल शीट’ लगती है। शेष जनता को भी ‘स्वाधीनता दिवस’ के कार्यक्रमों से कोई लगाव नहीं रहा। क्योंकि अब बड़े-बड़े राजनेताओं के असली चेहरे और उनके (कु) कर्म, समाज के सामने बेपर्दा हो चुके हैं। लगभग कुछ ऐसी ही अनिश्‍चित किंतु अनिवार्य संवैधानिक औपचारिकता कर्मरत स्थिति  ‘गण’ और ‘तंत्र’ की 26  जनवरी के दिन भी दृष्टिगोचर होती है।

‘स्वाधीनता दिवस’ और ‘गणतंत्र दिवस’ का संबंध जहाँ सम्‍पूर्ण देश से है, वहाँ ‘हिन्दी दिवस’ का संबंध (संवैधानिक विवशता) तो मात्र सरकारी संस्थानों, प्रतिष्ठानों और उपक्रमों से ही अधिक होता है। ऐसे में राजभाषा दिवस, सप्ताह, पखवाड़े आदि कार्यक्रमों का तो और अधिक विवश और औपचारिक रूप से सुसंपन्न होना स्वाभाविक ही है। इन कार्यक्रमों से जुड़े ‘गण’ और  ‘तंत्र’ को भले ही किसी-न-किसी रूप में संपन्नता हासिल हो, किन्तु भाषा के बाबत देश की आम जनता को इनसे किसी भी प्रकार के कोई लाभ की आशा करना बेमानी ही होगा।

हिन्दी शिक्षक होने के नाते मुझे भी अक्सर राजभाषा से जुड़े विभिन्न सरकारी कार्यालयों-कार्यक्रमों में किसी-न-किसी रूप में प्रतिभागी बनने का अवसर मिल ही जाता है। इन कार्यालयों-कार्यक्रमों में विद्वानों एवं अधिकारियों द्वारा औपचारिकतावश की जाने वाली हिन्दी की स्तुति-प्रशस्ति सुन मुझे हर बार बिहारीलाल के इस दोहे का स्मरण ताज़ा हो जाता है –

अजौ तरयौना ही रहयो, श्रुति सेवत इक-रंग।
नाक बास बेसरि रहयो, बसि मुकुतन के संग।।

अंग्रेज़ी भले ही बेसरी (खच्चरी) हो किन्तु वह शिक्षा-व्यवस्था रूपी नथ में मोती की तरह है, जो सरकार और शासन की नाक पर बड़े नाज़ों अदा के साथ विराज रही है। जबकि हिन्दी तरयौना (कान का भूषण) ही बनी हुई है, चाहे कितने ही वेद क्यों न सुन एवं जान लें, वह तरयौ ना (पार न लगना) ही की स्थिति में है।

नोट : यह आलेख आनंद पाटील के संपादन में प्रकाशित होने वाली प्रकाशन की महत्वपूर्ण वृहत् योजना दक्षिण और हिन्दी‘ के लिए लिखा गया है। इसके दस खण्ड होंगे। डॉ. घनश्याम इस महत्वपूर्ण योजना के लिये गठित सलाहकार समिति के सदस्यों में से एक हैं। इस योजना के अंतर्गत दक्षिण में हिन्दी के किसी भी पहलू पर आलेख आमंत्रित हैं। आलेख सम्‍पादक के मेल पते पर भी प्रेषित किये जा सकते हैं- anandpatil.hcu@gmail.com। संपादक संपर्क : +91 94860 37432

अपनी भाषा का सवाल : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

अपनी भाषा को छोड़कर विदेशी भाषा को अपनाने से रचनात्‍मकता पर पड़ रहे दुष्‍प्रभावों पर कथाकार प्रेमपाल शर्मा का आलेख-

भाषा के मसले ने व्‍यक्ति, समाज और पूरी शिक्षा व्‍यवस्‍था को चौपट कर रखा है । नवम्‍बर, 2012 में एक प्रमुख मीडिया हाउस ने नई दिल्‍ली में दो द्विवसीय ‘लीडरशिप वार्ता’ आयोजित की थी। पिछले दस सालों में इस विमर्श में कभी-कभी जाने का सूयोग मिला है । कई दृष्टियों से उसे आपसी सम्‍वाद का एक महत्‍वपूर्ण अवसर कहा जा सकता है । एक सत्र में क्रि‍केट पर बातचीत थी जिसमें कपिल देव, अजय जड़ेजा, सुरेश रैना भी शामिल थे और संयोजक की भूमिका निभा रहे थे राजद्वीप सरदेशाई । कपिल से सम्‍वाद के सिलसिले में जब कहा गया कि भारतीय क्रिकेट के अस्‍सी के दशक में की टीम में आप शायद पहले खिलाड़ी थे जो कस्‍बे से राष्‍ट्रीय टीम में शामिल हुए थे तो उन्‍होंने ‘हाँ’ में सिर हिलाया लेकिन यह जोड़ते हुए कि कस्‍बे से ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण बात है कि मैं पहला खिलाड़ी था जिसे अंग्रेजी बोलनी नहीं आती थी और मुझे कैप्‍टन बनाने का विरोध इसी आधार पर हुआ कि अंतरराष्‍ट्रीय टीमों के साथ ऐसा कैप्‍टन अंग्रेजी में कैसे बात करेगा । कपिल के स्‍वर में गुस्‍सा उभर रहा था । उन्‍होंने अपनी बात विस्‍तार से बताई कि ‘मुझे कहना पड़ा कि अंग्रेजी जानने वाला कैप्‍टन चाहिए तो ऑक्‍सफोर्ड से मंगा लीजिए। क्रिकेट खेलना जरूरी है या अंग्रेजी बोलना । कुछ लोगों को इस बात पर एतराज था कि इनका अंग्रेजी में पंजाबी लहजा झलकता है । मैंने कहा कि मैं पंजाब से हूँ तो पंजाबी ही झलकेगी, अमेरिका तो नहीं ।’ पूरा हाल उनकी ईमानदारी पर तालियाँ पीट रहा था । इस सभाग्रह में वे मध्‍य वर्गीय बुद्धिजीवी, पत्रकार, नौकरशाह, उद्योगपति थे जो भारतीय भाषाएं जानते हों या नहीं अंग्रेजी जरूर जानते हैं । तालियों की गड़गड़ाहट थमने के बाद कपिल देव फिर भाषा के मसले पर और आगे बढ़े, ‘नये खिलाड़ी टीम में बाद में शामिल होते हैं यदि तीन दिन के लिए भी अमेरिका, इंग्‍लैंड या आस्‍ट्रेलिया चले जाएं तो उनका उच्‍चारण अमेरिकन लहजे का होने लगता है ।’ उन्‍होंने लगभग बिराते हुए ऐसे खिलाडि़यों का मजाक उड़ाया और कहा कि अंग्रेजी को इतना महत्‍व देने की जरूरत नहीं है ।

यूँ कपिल देव अब उसी नफासत की अंग्रेजी बोल लेते हैं जैसे हिन्‍दुस्‍तान के दिल्‍ली, बम्‍बई, कलकत्‍ता में कुछ साल रहा कोई पत्रकार या जागरूक नागरिक। लेकिन उनके साथ अंग्रेजी के नाम पर जो हुआ उसकी टीस उनके दिमाग में आज तक जिंदा है । इसी सत्र के तुरन्‍त बाद एक सत्र सिनेमा पर था जिसमें शाहरुख खान और कैटरीना कैफ थे । इसके संयोजक थे पत्रकार वीर सिंघवी । कैटरीना ने स्‍पष्‍ट किया कि क्‍योंकि मैं इंग्‍लैंड में पली-बढ़ी इसलिए मुझे शुरू के दो-तीन साल हिन्‍दी फिल्‍मों या हिन्‍दुस्‍तान में काम करने में बड़ी दिक्‍कतें पेश आईं । मेरा सोचने का तरीका अंग्रेजी में ही था । लेकिन पिछले दस सालों में हिन्‍दी फिल्‍मों में काम करते हुए देश के अलग-अलग हिस्‍सों में जाना पड़ता है, तब मुझे लगता है कि काश ! हिन्‍दी मेरी पहली भाषा होती तो मैं और सफल अभिनेत्री बन सकती थी ।

ये दो उदाहरण संभवत: पर्याप्‍त हैं इस बात को रेखाँकित करने के लिये कि अपनी भाषा का क्‍या महत्‍व है- वह चाहे हिन्‍दी हो, पंजाबी हो या कोई दूसरी भारतीय भाषा । आप जानते हैं कि भारतीय मानस के क्रिकेट और फिल्‍में कितनी करीब हैं । हिन्‍दी के प्रचार-प्रसार में जितना योगदान हिन्‍दी फिल्‍मों ने दिया है उतना भारत सरकार के सारे विभाग मिलकर भी नहीं कर सकते । मलेशिया, इंडोनेशिया, श्रीलंका जैसे देश हों या रूस, पाकिस्‍तान और अन्‍य देश । हिन्‍दी फिल्‍मों के दीवाने फिल्‍मों की बदौलत हिन्‍दी सीख रहे हैं । लेकिन अपने देश में इसके ठीक उलटा हो रहा है । बम्‍बई फिल्‍मों के एक निर्देशक अनुराग कश्‍यप ने पिछले दिनों एक इंटरव्‍यू में कहा कि ऐसे लोग बम्‍बई की फिल्‍मी दुनिया में कम-से-कम होते जा रहे हैं जो देवनागरी हिन्‍दी में लिखे सम्‍वाद पढ़ते हों । अमिताभ बच्‍चन, धर्मेन्‍द्र, नसीरुद्दीन, ओम पुरी जैसे अपवादों को छोड़ दें तो सभी अभिनेता और अभिनेत्रियों को सम्‍वाद अंग्रेजी, रोमन में लिख कर देने पड़ते हैं । उन्‍होंने उसी साक्षात्‍कार में यह भी कहा कि अच्‍छी हिन्‍दी के प्रयोग करने वालों की बम्‍बई में हँसी और उड़ाई जाती है । मौजूदा भारत में भाषा का प्रश्‍न इन जटिलताओं से गुजर रहा है और इसका अंजाम है चारों तरफ अंग्रेजी पढ़ने, सीखने की ऐसी होड़ कि न तो सही सीखाने वाले उपलब्‍ध हैं और न सीखने वाले ।

एक और प्रसंग- पिछले हफ्ते मोदीनगर में रह रहे मेरे एक करीबी का फोन आया कि उनके बेटे को इंजीनियरिंग पाठयक्रम में अंग्रेजी न जानने की वजह से बहुत परेशानी हो रही है । बच्‍चे से बातचीत करने पर पता लगा कि वह धीरे-धीरे निराशा की तरफ बढ़ रहा है । उसका कहना था कि मुझे गणित या इंजीनियरी या और किसी विषय को अंग्रेजी में लिखने में कोई परेशानी नहीं है । परेशानी है तो कुछ सामाजिक विषय जैसे- पर्यावरण, मानविकी के विषयों में उत्‍तर लिखने में । यहाँ गौर करने लायक बात यह है कि मोदीनगर मेरठ के नजदीक उस क्षेत्र में है जिसे खड़ी बोली का गढ़ माना जा सकता है । सिर्फ केन्‍द्र की ही भाषा हिन्‍दी नहीं, उत्‍तर प्रदेश, बिहार आदि राज्‍यों की भी भाषा हिन्‍दी है और सीधे शब्‍दों में यहाँ की जनता एक प्रतिशत भी अंग्रेजी नहीं जानती होगी। प्राचार्य से लेकर अध्‍यापक भी सभी हिन्‍दी भाषी हैं तो छात्र भी शतप्रतिशत आसपास के हिन्‍दी भाषा राज्‍यों के । उत्‍तर प्रदेश के इंजीनियरिंग कॉलेजों का स्‍तर अभी ऐसा नहीं उठा है, जहाँ दक्षिण भारतीय पढ़ने के लिए आएं । विदेशों छात्रों की तो बात ही छोडि़ए । तो फिर गुलामी की कौन सी परछाइयाँ हैं जिसकी सजा ये शिक्षक खुद भी भुगत रहे हैं और बच्‍चों को भी मजबूर कर रहे हैं । आखिर भाषा के अत्‍याचार से होने वाली आत्‍महत्‍याओं की घटनाओं तक से हम क्‍यों सबक नहीं ले रहे । न जाने कितने मामलों में हमारे बुद्धिजीवी, पत्रकार संविधान की दुहाई देते हैं । यहाँ तो संविधान में भी वही भाषा है जो इन राज्‍यों की । तो फिर कोई अपनी भाषा के लिए आंदोलन क्‍यों नहीं खड़ा हो रहा । लगता है हिन्‍दी पट्टी के ये राज्‍य यदि सफल हैं तो सिर्फ राजनीतिक सत्‍ता हथियाने, हड़पने के खेल में । सामाजिक परिवर्तन या उसकी किसी परेशानी से इनका दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं । हिन्‍दी लेखक एक परजीवी की तरह इन के पीछ-पीछे चलता है।

हाल ही में आस्‍ट्रेलिया के प्रधानमंत्री जुलिया हिलार्ड ने घोषणा की है कि आस्‍ट्रेलिया हिन्‍दी और चीनी भाषाओं को पढ़ने-पढ़ाने के विशेष इंतजाम करेगा । कारण आस्‍ट्रेलियाई सरकार का मानना है कि 2025 तक लगभग एक तिहाई आबादी इन भाषाओं को बोलने वालों की होगी । समाज और शिक्षा के सम्‍बन्‍ध ऐसी ही दूरदर्शिता से हल होते हैं । अंग्रेजी सीखने के प्रति कोई एतराज नहीं है । एतराज है जब उसको शिक्षा में इस रूप में लादा जाये कि बच्‍चों की रचनात्‍मकता ही खत्‍म हो जाये और वे अवसाद में जाने लगें । जब कपिल देव जैसे खिलाड़ी भी भाषा के दबाव में अवसाद के करीब पहुँचा दिये गये हों तो आम आदमी की तकलीफ की कल्‍पना कर सकते हैं । ऐसी खबरों की कोई कमी नहीं है जहां अच्‍छे पढ़े-लिखे स्‍नातकोतर माँ-बाप इसलिये अंग्रेजी सीख रहे हैं कि अंग्रेजी न जानने की वजह से निजी स्‍कूल उनके बच्‍चों को दाखिला नहीं दे रहे । इस प्रक्रिया में वे हीन भावना का शिकार हो रहे हैं । याद रखिये अभी भले ही भाषा का ये प्रश्‍न अन्‍दर ही अन्‍दर लोगों को परेशान कर रहा हो, लेकिन यदि ये मुद्दे कल सामूहिक गुस्‍से  का रूप लेकर हिंसा में तब्‍दील हो जायें तो कोई आश्‍चर्य नहीं । याद रखिये भाषा के मसलों ने दुनिया के कई देशों पाकिस्‍तान, बांग्‍लादेश को अलग-अलग किया है ।

सुनते हैं कि विकासशील समाज अध्‍ययन पीठ (सी.एस.डी.एस) जो अपनी स्‍थापना के 50 वर्ष 2013 के शुरू में पूरा कर रहा है उसकी भावी योजनाओं में हिन्‍दी और अन्‍य भारतीय भाषाओं में समाज विज्ञान, योजनाओं की परियोजनायें भी शामिल हैं । काश ! ऐसा हो जाए । और जितना जल्‍दी हो उतना ही अच्‍छा । भारतीय भाषाओं के लिये नहीं भारतीय लोकतंत्र के लिए भी यह बहुत बड़ी उपलब्धि‍ होगी ।

दफ़्तर के बाहर बनाम बाज़ार में बहार : डॉ. घनश्याम शर्मा

वरि‍ष्‍ठ आलोचक डॉ. घनश्याम शर्मा द्वारा युवा लेखक और आलोचक आनंद पाटील की पुस्‍तक ‘हिन्दी : विविध आयाम’ की समीक्षा-

आनंद पाटील की पहली पुस्तक ‘संस्कृति बनाम अपसंस्कृतीकरण’ सन् 2010 में प्रकाशित हुई। इसकी भूमिका में आनंद जब यह लिख रहे थे, ‘यह बाज़ारवाद भक्तिकालीन ‘मायावाद’ से कुछ ज़्यादा भिन्न है। हाँ, वहाँ नारी को माया माना गया जो कि अनुचित था और है। लेकिन तत्कालीन ‘मायावाद’ में ‘सम्पत्ति असबाब’ भी तो उल्लिखित है। आज यही सम्पत्ति और असबाब ‘उपभोक्तावादी मायावाद’ की पैरवी करते हैं। यह मसला मात्र ‘मानवीयता’ का नहीं, बल्कि भाषा, सभ्यता, संस्कृति और समाज के तमाम अंगों और उपांगों का है– जो आज मरणांतक स्थिति से गुज़र रहे हैं।’ शायद तभी से ‘हिन्दी : विविध आयाम’ (2012) की भूमिका ‘पूर्वोक्ति– बदलाहट की बयार और भाषाई अस्मिता’ की कुछ-कुछ रूपरेखा बनना प्रारम्भ हो गयी होगी।

चूँकि आनंद पाटील पहले नागालैण्ड विश्‍वविद्यालय (लुमामी) और फिर तमिलनाडु केन्द्रीय विश्‍वविद्यालय (तिरुवारूर) में हिन्दी अधिकारी के पद पर नियुक्त होने से पूर्व कुछ महाविद्यालयों में भाषा-साहित्य के अध्ययन-अध्यापन के अतिरिक्त ‘ई-टीवी’ में आलेखक एवं कार्यक्रम सहायक, ‘डेली हिन्दी मिलाप’ और ‘स्वतंत्र वार्ता’ दैनिक समाचार पत्रों में अनुवादक-सह-उप-संपादक, ‘मीडिया मर्चेन्ट्स’ में सहयोगी जनसंपर्क अधिकारी, ग़ैर-सरकारी संगठन ‘कॉज़ एन इफैक्ट’ के वृत्तचित्रों के लिये अनुवाद समन्वयक और ‘गूगल इंडिया’ (बंगलुरु) के लिए हिन्दी भाषाविद् समीक्षक के रूप में कार्य किया था। इसलिये निश्‍चि‍त ही समय-समय पर हिन्दी भाषा के अतीत, वर्तमान और भविष्य से जुड़े कई सवाल एवं संदेह उनके मन-मस्तिष्क में उठते रहे होंगे। भाषा एवं राष्ट्र के प्रति जागरूक प्रत्येक व्यक्ति यह जानता है कि ‘भाषा अस्तित्व है।’ किन्तु अक़्सर तथाकथित साहित्य एवं भाषा चिंतक यह भूल जाते हैं कि अपना अस्तित्व अपनी ही भाषा से और अपनी ही भाषा में स्थापित एवं मूल्यांकित होता है। इसी दृष्टि से मुक्तिबोध ने भाषा को एक जीवन परम्‍परा और सामाजिक निधि (‘एक साहित्यिक की डायरी’, पृ. 25-26) कहा है।

भूमण्डलीकरण, उपभोक्तावाद, बाज़ारीकरण और सूचना प्रौद्योगिकी के विश्‍वव्यापी वेब (विषैला, विध्वंसक वातावरण) में लगभग समुचा देश ऐसा उलझा कि पाश्‍चात्य जीवन-शैली में जीने वालों को ही ‘सभ्य नागरिक’ माना जाने लगा। ऐसे में भारतीय संस्कृति, सभ्यता, परम्‍परा, दर्शन एवं भाषा इत्यादि को इन्हीं तथाकथित सभ्य नागरिकों द्वारा या तो ‘आउटडेटेड’ कहकर नज़रंदाज़ कर दिया जाता है या फिर ‘इनसे’ जुड़े और प्रतिबद्ध लोगों को ‘गँवार’ (गाँव में रहने वाले, जो तथाकथित सभ्य समाज की दृष्टि में पिछड़े) मानकर हीन दृष्टि से देखा जाता है। ऐसे में अपने और भाषा के अतीत को देखने, वर्तमान को समझने और भविष्य को लिखने के लिए हिन्दी (‘हिन्दी हैं हम, वतन है – हिन्दोस्ताँ’ के अर्थ में) की स्मृतियों, वास्तविकताओं और आकांक्षाओं को पूरी शिद्दत के साथ खंगालने की सख़्त आवश्यकता है।

‘हिन्दी : विविध आयाम’ की बारह पृष्ठों की भूमिका ‘पूर्वोक्ति– बदलाहट की बयार और भाषाई अस्मिता’ में हिन्दी की स्थिति एवं गति (दशा एवं दिशा) को रेखांकित करती हुई आनंद पाटील की हिन्दी भाषा को लेकर उनकी गहरी आशा, चिंता और आकांक्षा पूरी संवेदना के साथ अभिव्यक्त हुई है। हिन्दी भाषा की ‘पूछ और पहुँच’ जो अंग्रेज़ी पूँछ से ढकी और लपटी हुई ही नहीं अपितु जकड़ी हुई भी है, का विस्तार जानने और समझने के लिए कई वरिष्ठ विद्वानों की चिंता और चिंतन के साथ-साथ कुछेक नवोदित प्रतिभाओं के विचार भी पुस्तक में संकलित एवं प्रस्तुत किये गये हैं, जो हिन्दी भाषा के अस्तित्व से जुड़े सवालों, संदेहों और संभावनाओं से गुज़रते हुये उसके अस्तित्व पर लगातार जमती हुई धूल को रोकने, झड़काने और पुनः सँवारने की अनिवार्यता को रेखांकित करते हैं।

संकलित पुस्तक में भूमिका के बाद मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविता ‘अंधेरे में’ की कुछ काव्य-पंक्तियाँ उद्धृत की गयी हैं। काव्यांश की अंतिम पंक्ति ‘मर गया देश अरे, जीवित रह गये तुम’ पर ग़ौर फरमाएँ तो यह कहना अत्युक्तिपूर्ण न होगा कि निश्‍चि‍त ही भाषा के दृष्टिकोण से यह देश लगभग मर ही गया है। गणेशशंकर विद्यार्थी ने कहा था– “मुझे देश की आज़ादी और भाषा की आज़ादी में किसी एक को चुनना पड़े, तो मैं निस्संकोच भाषा की आज़ादी चुनूँगा, क्योंकि मैं फायदे में रहूँगा। देश की आज़ादी के बावजूद भाषा की गुलामी रह सकती है, लेकिन अगर भाषा आज़ाद हुई तो देश ग़ुलाम नहीं रह सकता।” अंग्रेज़ चले गये लेकिन अंग्रेज़ी नहीं। विचारों की ग़ुलामी सबसे बड़ी ग़ुलामी होती है। आज हमने तथाकथित ‘सभ्य’ होने के अति उत्साह में ‘स्व’ की चेतना गँवाकर ‘ऑनलाइन’ ग़ुलामी सहर्ष स्वीकार कर ली है।

समीक्ष्य पुस्तक में कुल 45 आलेख हैं। इनके अतिरिक्त कवि शम्भु बादल और घनश्याम की कुछ कविताएँ भी शायद हिन्दी भाषा के एक आयाम के रूप में संकलित की गयी हैं।

आरम्भ सकारात्मक हो तो ‘अंत भला’ होने की अधिक संभावना रहती है। इसी कारण आनंद की संपादन कुशलता ने सुरेश पंडित के लेख ‘समय में असरदार हस्तक्षेप करता हिन्दी लेखन’ को सबसे पहले रखा है। इस लेख की अंतिम पंक्तियों को इसके सार और हिन्दी भाषा के सकारात्मक आयाम के रूप में देख सकते हैं। सुरेश पंडित ने लिखा है– ‘हिन्दी लेखन समाज के सच को लगातार सामने लाने के लिए व्यग्र है, बल्कि कुछ क्षेत्रों में तो इतना ज़ोरदार काम हुआ है कि उनकी प्रशंसा किये बिना नहीं रहा जा सकता।’

प्रोफेसर सुवास कुमार ने अपने लेख ‘उच्च अध्ययन (पाठ्यक्रम) में हिन्दी साहित्य’ में ‘उच्चतर पाठ्यक्रमों के स्वरूप में बदलाव के लिये बहस की अच्छी गुंजाइश है’ कहते हैं। रोज़गार की दृष्टि से हिन्दी साहित्य का पाठ्यक्रम जीवन की वास्तविकताओं से कटा हुआ मानने वालों को वे यह कहना चाहते हैं– ‘चाहे मनुष्य का जीवन कितना ही परिवर्तित क्यों न होता जाये, साहित्य और कला मनुष्य के जीवन से कट नहीं सकते– सदा ही उनकी ज़रूरत बनी रहेगी क्योंकि इनका संबंध मनुष्यता के सारतत्व से है।’ प्रो. सुवास कुमार जैसे विचार कई वरिष्ठ हिन्दी प्राध्यापकों और आचार्यों के भी हैं, जिन सबका लगभग यह मानना है कि डॉक्टरी और इंजीनियरी जैसे कई विशुद्ध उपयोगितावादी विषय भी सबको रोज़गार की गारंटी नहीं दे सकते। प्रोफेसर सुवास कुमार के लेख में उनकी चिंता एवं चिंतन साहित्य एवं कला के अध्ययन की आवश्यकता पर अधिक है न कि भाषा पर। और किसी भी भाषा के प्रति जुड़ाव-लगाव की भावना न हो तो उस भाषा के साहित्य से प्रेम नहीं हो सकता। और बिना प्रेम (जूनून की हद तक) का कर्म पीड़ाजनक ही होता है। यही कारण है कि प्राचीन विद्वान और चिंतकों ने ‘उपयोगी ही सुंदर’ (प्लेटो) माना और कहा है। और अति भावुकता में हम सब अक़्सर यह भूल जाते हैं कि ‘भूखे भजन न होई गोपाला।’ और यह भी एक सच्चाई है कि मुझ जैसे ‘कई भाषा और साहित्य प्रेमियों की संतानें’ भाषा और साहित्य को छोड़ किसी अन्य ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों में पढ़ती हैं और बहुतेरे कार्यरत भी हैं। इसके अतिरिक्त एक और सच्चाई यह भी है कि भाषा-साहित्य की सेवा-सृजन, भाषा-साहित्य के वेतनभोगी व्यक्तियों से ज़्यादा औरों ने की और कर रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य और कटु सत्य यह है कि आज ‘रोज़गार’ का उपाधियों से उतना संबंध नहीं रहा, जितना आवेदक की ‘अन्य अर्हताओं’ से है। यह बात प्रो. सुवास कुमार ही नहीं अपितु हम सब जानते हैं और विशेषकर वे सब ज़्यादा अच्छी तरह जानते हैं, जो विश्वविद्यालयों से जुड़े हुए हैं या जुड़ना चाहते हैं। ख़ैर, यहाँ मुझे अनायास ही अपनी निरक्षर किंतु शिक्षित माँ की एक बात याद हो आयी, जो कहा करती थी कि ‘बूढ़ा आदमी अक़्सर धार्मिक हो जाता है।’

प्रो. राजेन्द्र कुमार ने अपने लेख ‘हिन्दी : विविध रूप, विविध समस्याएँ’ में ‘हिन्दी दिवस’ पर व्यंग्य करते हुए लिखा है– “अपना देश शायद दुनिया का अकेला देश है, जहाँ भाषा के नाम पर भी ‘दिवस’ मनाए जाते हैं… सच तो यह है कि हिन्दी के नाम पर होने वाले वार्षिक कर्मकांड हिन्दी के प्रति सम्मान-भाव जगाने के काम कम आते हैं, हिन्दी को मज़ाक का विषय बनाने के ज़्यादा।… हिन्दी तो हमारे यहाँ किसी गाँव की उस स्त्री की तरह है, जिसे ‘भौजी’ कहकर उससे मज़ाक करने का अधिकार कोई भी सहजतया पा जाता है।” आगे वह अंग्रेज़ी और हिन्दी के द्वंद्व की सच्चाई बतलाते हुए लिखते हैं– “अंग्रेज़ी का आत्यंतिक विरोध कई बार हिन्दी-प्रेम कम, अंग्रेज़ी में अपनी गति की सीमाओं को छिपाने का उपक्रम ज़्यादा होता है… पर आज तो संकट यह है कि हमारे बहुत-से हिन्दी प्रेमियों को कायदे से न अंग्रेज़ी आती है, न हिन्दी। तर्क कुछ यह ध्वनित होता है कि अंग्रेज़ी क्या सीखना, वह तो पराई भाषा है, हिन्दी भी क्या सीखना वह तो है ही अपनी भाषा।” हिन्दी के व्यापक प्रचार-प्रसार और प्रयोगधर्मी बनने-बनाने के संदर्भ में वे लेख के अंत में लिखते हैं– “हिन्दी को केवल साहित्य प्रधान भाषा ही नहीं बने रहने देना है, बल्कि विभिन्न ज्ञानात्मक अनुशासनों का माध्यम बनकर वह सामने आये, इस दिशा में हमें सार्थक प्रयास करने हैं।”

जी. पी. मिश्र का लेख ‘औपनिवेशिक शिकंज़े में सिसकती हिन्दी’ कुछ तेज़, तिक्‍त और तिखे तेवर लिये हुये अभिव्यक्त हुआ है। यह निश्‍चि‍त ही उनकी अपनी और मौलिक संवेदनात्मक तड़प भी है। इस लेख में उन्‍होंने प्रेमचंद (‘सोजे वतन’), रामप्रसाद बिस्मिल, भगत सिंह जैसे भाषा प्रेमि‍यों और देशभक्तों का ज़िक्र किया है। वह लिखते हैं– “जब किसी दुश्मन से बैर निभाना हो, तो कुछ और करने की बजाय उसकी अगली पीढ़ी के बच्चों को अपसंस्कृति और अविवेक के गड्डे में झौंक दें। दुश्मन अपने अंदरूनी अंतर्विरोधों से खुद पिट जायेगा।” यहाँ आगे उन्होंने लार्ड मैकाले को भी उद्धृत किया है, जिससे हम सब परिचित हैं। मिश्र जी के भावात्मक अंगारे की अभिव्यक्ति बकौल डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल के माध्यम से इस प्रकार अभिव्यक्त हुई है– “यदि हमें बचना है, अपनी भाषा व मनुष्यता को विनाश से बचाना है, तो व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन के लिये जटिल संग्राम में उतरना होगा। केवल बहसों से काम नहीं चलेगा। देश को एक क्रांति की ज़रूरत है, जो हिंसक भी हो सकती है।” एक अन्य स्थान पर वह हिन्दी साहित्य जगत के परिवेश में व्याप्त गुटबाजी और विषाक्त वातावरण के विषय में सटीक लिखते हैं– “विभिन्न संस्थानों के शीर्ष पर बैठे मठाधीशों ने हिन्दी के साहित्यिक मैदान को एक अखाड़ा बना दिया है… वैचारिक मठों और गढ़ों से रूपवाद, संरचनावाद, अभिव्यक्तिवाद और अब ‘लेखक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ जैसे ऊपर से अत्यंत आकर्षक लगने वाले नारे की लगातार वक़ालत की जा रही है। इसका उद्देश्य लेखक को सामाजिक, राजनीतिक, विचारधारात्मक प्रतिबद्धता से दूर करना है।” निश्‍चि‍त ही यह लेख ‘वह तोड़ता पत्थर’ है।

डॉ. आत्माराम ने अपने लेख ‘हिन्दी का बाज़ार और बाज़ार की हिन्दी’ में व्यावसायिक दृष्टि से संपन्न होती हुई हिन्दी की चर्चा की है। वह लिखते हैं– “भारत में विज्ञापन का बाज़ार हिन्दीमय हो रहा है, हिन्दी के विज्ञापनों से सजे होर्डिंग अब चेन्नै एवं कोच्ची जैसे सुदूर दक्षिण के शहरों में भी नज़र आ रहे हैं। इंटरनेट पर भी हिन्दी का विस्तार हो रहा है।” किंतु साथ ही साथ उनकी यह चिंता भी व्यक्त हुई है– “हिन्दी का बाज़ार भी बहुत बड़ा है, परंतु बाज़ार की हिन्दी का स्वरूप दिन-ब-दिन अंग्रेज़ीमय होता जा रहा है।” बाज़ार के विशेषज्ञ ही नहीं अपितु आम आदमी भी ‘बाज़ार के समीकरण’ और ‘समीकरणों का बाज़ार’ बहुत हद तक जानता है। बाज़ार के बाज़ीगरों ने वस्तुओं और सेवाओं को ही नहीं अपितु कला, साहित्य और भाषा के माध्यम से सभ्यता, संस्कृति, परम्‍परा, दर्शन और आस्था तक को बेचने-ख़रीदने के क्रम में इन सबको वस्तु में तब्दील करके रख दिया है।

समूची मानव सभ्यता प्राचीन काल से अब तक यह कहती आयी है– कभी काव्योक्‍ति के रूप में– ‘न मानुषात श्रेष्ठतम् हि किञ्चित’ (वेद व्यास), ‘सबार उपरे मानुषेर सत्तो तबार उपरे नाई’ (चण्डीदास) और कभी दार्शनिक सत्य का प्रतिपादन करने के लिए– ‘मनुष्य सारी वस्तुओं का माप है’ (प्रोटेगोरस)। किंतु आज यह सर्वसिद्ध हो चुका है कि बाज़ार से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं, बाज़ार से ऊपर कोई नहीं और बाज़ार सारी वस्तुओं का माप है।

इसी तथ्य और सत्य को डॉ. राजीव कुमार रावत ने अपने लेख ‘वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक युग में हिन्दी की प्रासंगिकता’ में बहुत स्पष्ट लिखा है– “हिन्दी को वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक युग में कम्प्यूटर, विज्ञान, चिकित्सा आदि क्षेत्रों की ओर से कोई चुनौती नहीं है। विश्‍व बाज़ार की मजबूरी है हिन्दी। अमरिका, रूस, चीन आदि बड़े-बड़े देशों के बाज़ार भारत में आने को उत्सुक हैं और हिन्दी के महत्व को समझकर अपना रहे हैं।”

राजभाषा और उसके क्रियान्वयन के संदर्भ में हिन्दी सरकारी कार्यालयों में ‘धर्म की भाषा’ के रूप में संविधान की धाराओं के तहत धार्मिक कर्म करती नज़र आ रही है। यहाँ राष्ट्रभाषा और राजभाषा हिन्दी की स्थिति एवं गति पर विष्णु नागर का यह कटाक्ष दृष्टव्य है– “मैं हिन्दी जगत के तमाम धुरंधरों से शत-प्रतिशत सहमत हूँ कि आज़ादी के पिछले साठ सालों में हिन्दी ने वाकई उल्लेखनीय प्रगति की है। इतनी ज़्याद प्रगति की है कि वह राष्ट्रभाषा से राजभाषा बनकर रह गई है और अब हिंग्रेज़ी के नये अवतार में जनता के सामने पेश है। इसलिए उसे अब देश से निकालकर संयुक्त राष्ट्र में प्रतिष्ठित करने की तैयारी हो रही है।” (आउटलुक, स्वाधीनता विशेषांक, 20 अगस्त, 2007)

गौरीनाथ ने अपने लेख ‘जन-समाज बचे तभी तो भाषा बचेगी’ में गाँधीजी की ही तरह मातृभाषाओं के महत्व की वक़ालत करते हुए लिखा है- “राष्ट्रभाषा हिन्दी के लिए जो हमारी चिंताएँ हैं, वैसी चिंताएँ मातृभाषा के लिये क्यों नहीं है? जब मातृभाषा ही नहीं बचेगी, तो हम राष्ट्रभाषा का सम्मान करने के लायक रहेंगे क्या?… मेरे ख़याल से हिन्दी के प्रति हमारी जो यह दृष्टि है, यह सही नहीं है! हम जब तक मातृभाषा और उस भाषा-भाषी जन और समाज के हित में नहीं सोचेंगे, तब तक हम सही अर्थ में हिन्दी के हित में भी नहीं सोच सकते।” उनकी यह चिंता जायज़ है, क्योंकि हिन्दी के नाम पर प्रतिवर्ष लाखों-करोड़ों रुपये लुटाए जा रहे हैं और उसी की चिंता में दिन-रात दुबले हुए जा रहे हैं।

समीक्ष्य पुस्तक के विषय में वरिष्ठ कवि, आलोचक, चिंतक विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी के विचार पिछले फ्लैप (ज़िल्द) पर प्रकाशित हुए हैं। उन्होंने लिखा है– “सृष्टि में हर मनुष्य किसी न किसी भाषा में जन्म लेता है। उसी मातृभाषा में वह एक परम्‍परा और संस्कृति भी प्राप्त करता है, क्योंकि कोई भी परम्‍परा और संस्कृति भाषा में ही सुरक्षित होती है।… भाषा मनुष्य की सबसे मूल्यवान सम्‍पदा है। भारत जैसे बहुभाषी, बहुसंस्कृतियों वाले देश की सभी मातृभाषाएँ मूल्यवान है।… यह विडम्‍बना ही है कि अंग्रेज़ी सारी मातृभाषाओं की छाती पर चढ़ी हुई है।” उन्होंने समीक्ष्य पुस्तक को प्रमाणित करते हुए लिखा है- “एक तटस्थ और संवेदनशील दृष्टि से हिन्दी भाषा की अपरिहार्य स्वीकृति के लिये यह पुस्तक पठनीय और विचारणीय है।”

ब़हरहाल, समीक्ष्य पुस्तक में भूमिका, अनुक्रम, कविताएँ और लेखक सम्‍पर्क छोड़ कुल 341 पृष्ठों में देश के कुछ राज्यों में हिन्दी भाषा और साहित्य के विभिन्न रूप-स्वरूप और आयामों से संबंधित कुल 45 लेख संकलित हैं, जो ‘आधा खाली’ अथवा ‘आधा भरा गिलास’ वाले दृष्टिकोण से अभिव्यक्‍त हुये हैं। किंतु एक दृष्टि ऐसी भी तो हो सकती है, जो गिलास (विषय– हिन्दी : विविध आयाम) की ऊँचाई, चौड़ाई और गहराई को देख और दिखा सके, तो दूसरी ऐसी कि ‘आधा खाली’ (आयाम विशेष लेख) की अच्छाइयाँ (विशेषताएँ/महत्व) और ‘आधा भरा’ (लेख) की कमियाँ (सीमाएँ/समस्याएँ) समझ-समझा सके। ‘आधा खाली’ और ‘आधा भरा’ एक समग्र वाद-विवाद की माँग रखता है, जिसका निश्‍चि‍त पहला, सर्वसम्मत और निष्पक्ष निष्कर्ष यह निकलता ही है कि ‘गिलास’ (विषय) महत्वपूर्ण है। ग़ौरतलब है कि गिलास पारदर्शी अथवा अपारदर्शी भी हो सकता है। शेष सम्‍वाद के लिये आनंद पाटील की यह पुस्तक शोध के नये द्वार ही नहीं खोलती अपितु ऐसे किसी भी शोध के लिये मील का पत्थर सिद्ध हो सकती है। शेष शमशेर के शब्दों में– ‘बात बोलेगी, भेद खोलेगी, बात ही’!

समीक्ष्य पुस्तक
‘हिन्दी : विविध आयाम’ (2012)
सं. आनंद पाटील
तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य : 600 रुपये

हि‍न्‍दी को राजभाषा के रूप में लादना सबको खलता है

तिरुवारूर : हिन्दी को सम्‍पर्क भाषा, आम अवाम की ज़रूरतों की भाषा के रूप में स्वीकार किया जा रहा है लेकिन राजभाषा के रूप में आज भी विरोध हो रहा है, कारण कि ‘राजभाषा’ कहते ही ‘राज चलाने की भाषा’ के रूप में उसे ग्रहण किया जाता है। वहीं केन्द्र में भी हिन्दी अनुवाद के बूते पर चलती है, जिसमें उसकी क्लिष्टता के कारण वह आम अवाम की समझ में नहीं आती है। वास्तविकता यह है कि वह अपनी प्रयोजमूलकता से कोसों मिल दूर होती है। मंत्रियों से लेकर सरकारी अधिकारियों तक अंग्रेज़ी में काम करते हैं और मंचों से, टीवी चैनलों पर बोलते हुए भी अंग्रेज़ी का प्रयोग करते हैं। ऐसे में हिन्दी को राजभाषा के रूप में लादना यथोचित नहीं जान पड़ता। इस बात तमिलनाडु केन्द्रीय विश्‍वविद्यालय, तिरुवारूर में 26-28 जुलाई, 2012 को ‘दक्षिण भारत में हिन्दी’ विषय पर आयोजि‍त त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में उभरकर आयी। प्रकाश जैन, डॉ. घनश्याम, डॉ. चिट्टी अन्नपूर्णा ने इस बात पर सिलसिलेवार प्रकाश डाला। हिन्दी अनुवाद के ज़रिए, संचार माध्यमों के ज़रिए, साहित्य और तुलनात्मक अध्ययन के ज़रिए, व्यवसाय के ज़रिए बाज़ार में छा गयी है और एक विश्‍व पटल पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कर चुकी है। ऐसे में उसके वैश्‍वि‍क रूप से कोई इन्कार नहीं करता, लेकिन राजभाषा के रूप में लादना सबको खलता है।

संगोष्‍ठी के अंतर्गत ‘राजभाषा कार्यान्वयन में सूचना प्रौद्योगिकी का अनुप्रयोग’ विषय पर राजभाषा कार्यशाला, ‘हिन्दी क्लब’ का उद्घाटन एवं संगोष्ठी संयोजक एवं निदेशक आनंद पाटील द्वारा संपादित (तमिलनाडु केन्द्रीय विश्‍वविद्यालय की पहली पुस्तक) ‘हिन्दी : विविध आयाम’ का लोकार्पण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस विश्‍वविद्यालय में राष्ट्रीय स्तर की यह प्रथम संगोष्ठी थी और रेखांकित करने की बात है कि यह हिन्दी की संगोष्ठी थी।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केरल के प्रसिद्ध कवि, लेखक, आलोचक एवं महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के प्रति कुलपति प्रो. ए. अरविंदाक्षन तथा अध्यक्ष विश्‍वविद्यालय के कुलपति प्रो. बी. पी. संजय थे।

कार्यक्रम की शुरुआत 26 जुलाई को ‘हिन्दी क्लब’ के उद्घाटन समारोह में दीप प्रज्ज्वलन से हुई। इस अवसर पर मुख्य अतिथि डॉ. घनश्याम शर्मा, अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, बाबू जगजीवन राम महाविद्यालय (उस्मानिया विश्‍वविद्यालय) हैदराबाद थे। बीज व्याख्यान गुरुकुल विद्यापीठ, इब्राहिमपट्टणम् के डॉ. प्रेमचन्द्र ने दि‍या। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्‍वविद्यालय के कुलपति प्रो. बी. पी. संजय ने की।

डॉ. घनश्याम ने कहा कि “विश्‍वविद्यालय प्रणाली में ‘हिन्दी क्लब’ पूर्णतः नवीन संकल्पना है। इस क्लब की स्थापना के पीछे जो उद्देश्य है, वह बहुत ही उम्दा है। इस क्लब के ज़रिए हिन्दी को लोकप्रिय बनाने का काम किया जाएगा। विद्यार्थी, अधिकारी, संकाय सभी एक प्लेटफार्म पर एकत्रित होंगे और हिन्दी के कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे तथा हिन्दी सीखने, समझने, समझाने का काम करेंगे। यह इज़ी लर्निंग मेथड़ वाला मार्ग है।” डॉ. प्रेमचन्द्र ने शैक्षिक क्षेत्र में क्लब जैसी संकल्पना की आवश्यकता पर प्रकाश डाला तथा संयोजक की दूरदर्शिता को सराहा। वहीं इस बात की ओर भी इंगित किया गया कि इसे हिन्दी के ‘संघ’ के रूप में ग्रहण न किया जाए।

प्रो. बी. पी. संजय ने हिन्दी क्लब को एक बेहतर ज़रिया मानते हुए, इसकी स्थापना को स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि “हिन्दी क्लब के ज़रिए विद्यार्थियों में सक्रियता बढ़ायी जा सकती है। हिन्दी को लेकर उनके मन में जो भय है, उसे निकाल बाहर किया जा सकता है। एक बेहतर साधन के रूप में इस क्लब को देखने की आवश्यकता है।”

इस अवसर पर कम्प्यूटर एनिमेटेड विज्ञान कथा आधारित फ़िल्म ‘वॉल-ई’ (अकादमिक पुरस्कार विजेता फ़िल्म) का प्रदर्शन कि‍या गया। इसके बाद लघु चर्चा और डॉ. अनिल पतंग द्वारा लिखित नाटक ‘दिल ही तो है’ (निर्देशन : आनंद पाटील) का मंचन कि‍या गया।

27 जुलाई को ‘दक्षिण भारत में हिन्दी’ राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में प्रो. ए. अरविंदाक्षन ने कहा कि “विश्‍वविद्यालय में हिन्दी विभाग नहीं है, केवल हिन्दी अनुभाग है और उसमें भी केवल एक ही अधिकारी है, जो राजभाषा से संबंधित कामकाज देखता है। बावजूद इसके हिन्दी का इतना भव्य आयोजन किया गया है और बहुत ही व्यापक विषय पर चर्चा करने के लिए अनेकानेक विद्वानों को आमंत्रित किया गया है। प्रायः हममें यही बात प्रचलित है कि तमिल लोग हिन्दी बोलना नहीं जानते अथवा बोलना पसंद नहीं करते। जबकि सत्य तो यह है कि काफ़ी तमिल भाषी कर्मचारी, विद्यार्थी हिन्दी बोल रहे हैं।” इसके लिए उन्होंने आनंद पाटील की पहल को सराहा। उन्होंने अपने उद्घाटन भाषण में दक्षिण में हिन्दी की स्थिति एवं गति, दशा एवं दिशा पर विस्तार से बात की।

प्रो. बी. पी. संजय ने संगोष्ठी को ‘इंटलेक्च्युअल ओपननेस’ कहा। उन्होंने स्पष्ट किया कि सामाजिक विकास के लिए एक-दो पीढ़ियों को बलिदान करना होगा। उन्होंने आगे कहा कि हम सभी भाषाओं का प्रसार करने में विश्‍वास रखते हैं और उनका आदर करते हैं। उन्होंने आमंत्रित विद्वानों से उम्मीद की कि इस विशद विषय के अलग-अलग पहलुओं पर सार्थक चर्चा करेंगे और विश्‍वविद्यालय को सुझाव देंगे कि आगे किस तरह के कदम उठाये जाने चाहिए।

प्रो. अरविंदाक्षन, प्रो. बी. पी. संजय तथा वी. के. श्रीधर ने तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित आनंद पाटील की पुस्तक ‘हिन्दी : विविध आयाम’ का लोकार्पण किया।

इस त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में अन्य अतिथि वक्ताओं के रूप में प्रो. कृष्ण कुमार सिंह, साहित्य विभाग, महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा; प्रो. ए. भवानी, अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, मनोम्ननियन सुंदरनार विश्‍वविद्यालय, तिरुनेलवेली; डॉ. सी. अन्नपूर्णा, अध्यक्ष, अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ, महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा; डॉ. एम. श्यामराव, हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्‍वविद्यालय, हैदराबाद; डॉ. चिट्टी अन्नपूर्णा, अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, मद्रास विश्‍वविद्यालय, चेन्नै; प्रकाश जैन, महाप्रबंधक, डेली हिन्दी मिलाप, हैदराबाद; डॉ. जयशंकर बाबू, हिन्दी विभाग, पांडिचेरी विश्‍वविद्यालय, पांडिचेरी; डॉ. आत्माराम, हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्‍वविद्यालय, हैदराबाद; डॉ. चंदू खंदारे, हिन्दी विभाग, गाँधीग्राम ग्रामीण विश्‍वविद्यालय, गांधीग्राम; एम. संजीवी कानी, सहायक प्रबंधक (राजभाषा), भारतीय रिज़र्व बैंक, बैंगलुरु; विनायक काले, शोधार्थी, हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्‍वविद्यालय, हैदराबाद; अनीता पाटील, शोधार्थी, हिन्दी विभाग, उस्मानिया विश्‍वविद्यालय, हैदराबाद ने ‘दक्षिण भारत में हिन्दी’ के विविध पहलुओं पर अपने शोध पत्र/व्याख्यान प्रस्तुत किये।

‘राजभाषा कार्यान्वयन में सूचना प्रौद्योगिकी का अनुप्रयोग’ विषय पर आयोजित राजभाषा कार्यशाला में प्रतिभागियों के रूप में राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय, बांदरसिंदरी के हिन्दी अधिकारी प्रतीश कुमार दास तथा हि‍न्‍दुस्‍तान पेट्रोलियम कार्पोरेशन लिमिटेड, चेन्नई के हिन्दी अधिकारी बशीर उपस्थित थे।

कुलपति प्रो. बी.पी. संजय ने मुख्य अतिथि प्रो. ए. अरविंदाक्षन को उनकी हिन्दी सेवा के लिए मान पत्र एवं स्मृति चिह्न देकर तथा अन्य अतिथियों को प्रमाणपत्र एवं स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया।

तीन दिन के इस कार्यक्रम का सत्र संचालन विश्‍वविद्यालय के विभिन्न विभागों में अध्ययनरत एकीकृत स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के विद्यार्थी यथा–यालिनी, विजय बाबू, राम कृपाल कुमार, अभिषेक कुमार, सिव पवित्रा, स्वाति ने किया।

ए. आर. वेंकटकृष्णन, उप कुलसचिव (अकादमिक); एम. पी. बालामुरुगन, उप कुलसचिव (स्थापना एवं प्रशासन); डॉ. वी. मधुरिमा, भौतिकी विभाग; डॉ. वी. पी. रमेश, गणित विभाग; डॉ. के. वी. रघुपति, अंग्रेज़ी विभाग ने संगोष्ठी के अलग-अलग सत्रों में आभार प्रकट किया।

 

हिन्‍दी एक भाषा संसार : उदय नारायण सिंह

स्‍पेन के वय्यादोलिद विश्‍वविद्यालय में आयोजि‍त ‘यूरोपीय हि‍न्‍दी संगोष्‍ठी’ की संगोष्ठी के शैक्षिक निदेशक और विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसर श्रीश चंद्र जैसवाल की रि‍पोर्ट-

स्‍पेन : यूरोप के विभिन्न देशों में विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण की स्‍थि‍ति‍ पर वि‍चार-वि‍मर्श के लि‍ये वय्यादोलिद विश्‍वविद्यालय, स्‍पेन में 15, 16 और 17 मार्च, 2012 को ‘विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण : परिदृश्य’ वि‍षय पर संगोष्‍ठी का आयोजन कि‍या गया। इसमें भारत सहित 21 देशों के 33 विद्वान सम्मिलित हुये।

संगोष्ठी का उद्घाटन वय्यादोलिद विश्‍वविद्यालय के उपकुलपति, स्पेन में भारत के राजदूत, वय्यादोलिद विश्‍वविद्यालय की डिप्टी डीन, कासा दे ला इण्‍डि‍या के निदेशक तथा संगोष्ठी के शैक्षिक निदेशक ने दीप प्रज्ज्वलन से किया। इसके बाद भारत सरकार के विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा का संदेश पढ़ा गया। विश्‍वविद्यालय के उपकुलपति प्रोफेसर मार्कोस साक्रिस्तान ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि प्रागैतिहासिक काल से ही वय्यादोलिद शहर तथा विश्‍वविद्यालय पर एशिया का प्रभाव पड़ा है। इन देशों की संस्कृति के प्रभाव से इस विश्‍वविद्यालय में एशियाई अध्ययन की परम्परा का सूत्रपात हुआ। वर्ष 2000 में एशियन स्टडीज़ सेंटर की स्थापना हुई । इस सेंटर ने भारत सरकार के विदेश  मंत्रालय के सौजन्य से यह संगोष्ठी आयोजित की। भारतीय दूतावास माद्रिद और कासा दे ला इण्‍डि‍या के पूर्ण सहयोग से ही स्पेन में  पहली संगोष्ठी का सफल आयोजन हुआ।

मुख्‍य अति‍थि‍ स्पेन के भारतीय राजदूत सुनील लाल ने अपने भाषण में हिन्‍दी की संपन्न परम्‍परा का ज़िक्र करते हुए बताया कि अन्य भारतीय भाषाओँ के सम्‍पर्क में आने के कारण हिन्‍दी स्वयं लाभान्वित हुई है तथा उसने उन्हें भी लाभान्वित किया है। भारत की 22 स्वीकृत भाषाएँ उसकी बहुभाषिकता स्थिति को द्योदित करती हैं  तथा राजभाषा के माध्यम से भारत की अनेकता में एकता परिलक्षित होती है। विश्‍व का सबसे  बड़ा प्रजातंत्र भारतवर्ष 2050 तक सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था के रूप में उभरेगा और अन्तरराष्ट्रीय कार्य बल में महत्वपूर्ण भारतीय साझेदारी के कारण हिन्‍दी अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित होगी।

विश्‍व भारती, कोलकाता, भारत के प्रोवाइस चांसलर प्रोफेसर उदय नारायण सिंह ने ‘नया शतक नई दिशा- भारतीय भाषाओँ के शिक्षण की समस्याएं और संभावनाएं’ विषय पर बीज वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक भाषा की अपनी पहचान होती है और उसके पठन-पाठन की अपनी समस्याएं होती हैं। भारतीय बहुभाषिकता के वातावरण में हिन्‍दी पर अन्य भाषाओं का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। अंग्रेज़ी, स्थानीय भाषाएँ और  बोलियाँ हिन्‍दी की शब्दावली और अक्सर संरचना को भी प्रभावित करती हैं। हिन्‍दी के विदेशी अध्येताओं को इसका ज्ञान अवश्य देना चाहिये। उन्हें भारतीय व्यवहार की स्थिति से अवगत कराना आवश्यक है। हिन्‍दी एक ओर मानक हिन्‍दी है, जो साहित्य में प्रयोग होती है तो दूसरी ओर बोलचाल की मिश्र हिन्‍दी है, जिसका प्रयोग आम जनता करती है और उसे टेलिविज़न पर भी देखा जा सकता है। ऐसी स्थिति में यह समझना आवश्यक है कि हिन्‍दी एक भाषा संसार का नाम है, सीमित क्षेत्र का वाचिक संप्रेक्षण माध्यम मात्र नहीं। हिन्‍दी भाषा शिक्षण के क्षेत्र में सम्प्रति हमारे समक्ष  अनेक प्रकार की चुनौतियाँ हैं, जिसके लिये हमें कुछ अनोखे और असाधारण ढंग से सोचने-विचारने की आवश्यकता है।

प्रोफेसर श्रीश चंद्र जैसवाल

संगोष्ठी के शैक्षिक निदेशक, वय्यादोलिद विश्‍वविद्यालय के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर श्रीश चंद्र जैसवाल ने संगोष्ठी के आयोजकों की ओर से भारत सरकार के विदेश मंत्री का उनकी शुभकामनाओं के लि‍ये आभार व्यक्त कि‍या। उन्‍होंने वय्यादोलिद विश्‍वविद्यालय के रैक्टर प्रोफेसर मार्कोस साक्रिस्तान, वाइस रैक्टर प्रोफेसर लुईस सांतोस, एशियन स्टडीज़ सेंटर के प्रोफेसर ऑस्कर रामोस्त, कासा दे ला इण्‍डि‍या के निदेशक डॉक्‍टर गियर्मो आदि‍ को सहयोग के लि‍ये धन्‍यवाद दि‍या। उन्होंने पूर्व भारतीय राजदूत सुजाता मेहता तथा  नये राजदूत सुनील लाल, काउंसलर बिराजा प्रसाद, सांस्कृतिक सचिव पोलोमी त्रिपाठी तथा काउंसलर पिल्लै को आभार व्यक्त कि‍या। अंत में प्रोफेसर जैसवाल ने संगोष्ठी में 21 देशों से आये हुए सभी गणमान्य प्रतिभागियों का हार्दिक धन्यवाद किया।

संगोष्ठी के प्रथम शैक्षिक सत्र ‘पश्‍चि‍मी तथा मध्य यूरोप में हिन्दी शिक्षण : वर्तमान परिदृश्य’ की अध्यक्षता टेक्सस विश्‍वविद्यालय, ऑस्टिन, अमेरिका के प्रोफसेर हर्मन वैन ऑलफ़ेन ने की। इस सत्र में छह आलेख पढ़े गये।

लिस्बन विश्‍वविद्यालय, पुर्तगाल के प्रोफेसर अफज़ाल अहमद ने पुर्तगाल में हिन्दी शिक्षण का इतिहास बताते हुये आग्रह किया कि विद्यार्थियों को हिन्दी के ज्ञान के साथ-साथ भारत की विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्टता का ज्ञान भी कराया जाना चाहिये।

विएना विश्‍वविद्यालय, ऑस्ट्रिया  की वरि‍ष्‍ठ लेक्‍चरर अलका ऐत्रय चुडाल ने विएना में हिन्दी शिक्षण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य सामने रखा तथा वर्तमान पाठ्यक्रम की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वहाँ के विद्यार्थी योग, शास्त्रीय संगीत और भारतीय नृत्य से आकर्षित होकर बारीकी से उन्हें समझने के लिए हिन्दी पढ़ते हैं।

रोम विश्‍वविद्यालय, इटली की  अलेस्सान्द्रा कोंसोलारो ने इटली में हिन्दी शिक्षण की जानकारी देते हुए इस तथ्य पर बल दिया कि विद्यार्थियों को हिन्दी के माध्यम से भारतीय संस्कृति में प्रवेश मिल जाता है। उन्होंने बताया कि इटली के व्यापारिक निगमों में हिन्दी का ज्ञान रखने वाले विद्यार्थियों को रोज़गार के अवसर भी मिल रहे हैं।

यॉर्क विश्‍वविद्यालय, इंग्‍लैंड के ऑनरेरी फ़ैलो महेंद्र किशोर वर्मा ने मानक हिन्दी या प्रामाणिक हिन्दी पर अपने आलेख में पाठ्य सामग्री चयन और पाठ्य सामग्री की रचना के विषय से सम्‍बन्‍धि‍त बिन्‍दुओं पर प्रकाश डाला। उनके अनुसार भारत में हिन्दी के बदलते स्वरूप को ध्यान में रखते हुए मानक हिन्दी तथा प्रामाणिक हिन्दी के महत्व की व्याख्या की जानी चाहिये।

घेंट विश्‍वविद्यालय, बेल्जियम के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर रमेश चन्द्र शर्मा ने आग्रह किया कि हमें यूरोप के विश्‍वविद्यालयों में हिन्दी का एक सामाजिक वातावरण तैयार करना चाहिये, जिसमें एक ओर हिन्दी का भाषा वैज्ञानिक आधार हो, दूसरी ओर उसका एक सामाजिक आधार हो। उन्होंने एक ऐसे पाठ्यक्रम की आवश्यकता व्यक्त की, जो शब्द और संस्कृति दोनों का ज्ञान दे सके।

कासा एशि‍या, माद्रिद, स्‍पेन की हि‍न्दी प्राध्‍यापि‍का शेफ़ाली वर्मा ने स्पेन में  हिन्‍दी के अध्येताओं के समक्ष आनेवाली व्यावहारिक कठिनाइयाँ रखीं और उनके समाधान के लिये आग्रह किया I
‘भाषा प्रौद्योगिकी और हिन्‍दी शिक्षण में उसका अनुप्रयोग’ विषय पर आधारित दूसरे शैक्षिक सत्र की अध्यक्षता केन्द्रीय हिन्‍दी शिक्षण मंडल, आगरा, भारत के उपाध्यक्ष  प्रोफेसर अशोक चक्रधर ने की। इस सत्र के प्रारम्‍भ में श्रीश जैसवाल ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अध्ययन-अध्यापन तथा उसे विश्‍व भाषा के रूप में स्थापित करने के लिये कम्प्यूटर के अनुप्रयोग पर बल दिया।

अशोक चक्रधर ने कहा कि हिन्दी के प्रगामी प्रयोग के लिये भारत सरकार और विभिन्न संस्थानों को ही उत्तरदायी न माना जाये, वरन व्यक्तिगत स्तर पर इसके लिये प्रयास किये जायें। अपनी रोचक और प्रभावी पावर पौइन्ट प्रस्तुति के माध्यम से उन्होंने कंप्यूटर पर उपलब्ध आधुनिकतम अनुप्रयोग दिखाये, जो हिन्दी शिक्षण के लिए नितांत उपयोगी हैं। हिन्दी के मानकीकरण के सम्‍बन्‍ध में सभी के प्रयासों का स्वागत करते हुये उन्होंने कहा कि हमें अशुद्धियों को छोड़कर प्रबुद्धि पर ध्यान  देना चाहिये।

तेलेविव विश्‍वविद्यालय, इजरायल में हि‍न्‍दी प्राध्‍यापक गेनादी श्‍लोम्‍पर ने हिन्दी पाठ्य सामग्री निर्माण में टेलिविज़न व रेडियो आदि के महत्व पर प्रकाश डाला। टी.वी. समाचार के आधार पर हिन्दी शिक्षण सामग्री तैयार करते हुये उन्होंने चुनाव, सामाजिक आंदोलन, अन्तरराष्ट्रीय सम्‍बन्‍ध, खेलकूद आदि विषयक समाचारों को तथा भाषा की रोचकता और सुग्राह्यता को महत्व दिया।

एमेरेटस, टेक्सस विश्वविद्यालय, ऑस्टिन, अमेरिका के प्रोफेसर हर्मन वैन ऑल्फेन ने अमेरिका में हिन्दी शिक्षण सम्‍बन्‍धी इतिहास का परिचय देते हुये कहा कि भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों की संख्या में वृद्धि होने के कारण 1985 के बाद वहाँ हिन्दी शिक्षण का तेज़ी से प्रसार हुआ। उन्होंने पिछले पचास वर्षों में हिन्दी भाषा शिक्षण में प्रौद्योगिकी के प्रयोग का वर्णन करते हुये आधुनिक युग में उसकी उपयोगिता और नवीनतम विकासों के अनुप्रयोग पर बल दिया।

केम्ब्रिज विश्‍वविद्यालय, इंग्लैंड में हि‍न्‍दी प्राध्‍यापक ऐश्‍वर्य कुमार ने बताया कि यूरोपीय आर्थिक मंदी हिन्दी के पठन-पठान पर प्रभाव डाल रही है। हिन्दी के प्रति खुद हिन्दी भाषियों या भारतीयों की सोच मौजूदा स्थिति की जिम्मेदार है। इस मानसिकता को बदलना होगा।

लंदन, इंग्‍लैंड नि‍वासी चर्चित लेखि‍का कविता वाचक्नवी ने भाषा प्रकार्यों के अधुनातन सन्दर्भ और हिन्दी विषय पर अपनी प्रस्तुति दी। उन्होंने वैश्‍वीकरण के सकारात्मक पक्षों के ऊपर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि हिन्दी विश्‍व में दूसरी सबसे बड़ी भाषा है, किन्तु इंटरनेट आदि माध्यमों के प्रयोग में अन्य भाषाभाषियों से काफ़ी पीछे है। उन्होंने हिन्दी भाषा समाज के लिये उपलब्ध सॉफ्टवेयर की विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि तकनीकी दृष्टि से हिन्दी को कंप्यूटर की चुनौती व प्रयोक्ता– सापेक्ष होने की यात्रा में बहुत आगे जाना अभी शेष है।

तृतीय शैक्षिक सत्र ‘शेष यूरोप में हिन्दी शिक्षण : वर्तमान परिदृश्य’ पर केन्‍द्रि‍त था। इस सत्र की अध्‍यक्षता पश्‍चि‍म व पूर्व यूरोपीय विश्‍वविद्यालय, नैदरलैंड के प्रोफेसर मोहन कान्त गौतम ने की।
इस सत्र के पहले वक्तव्य में  स्लोवेनिया विश्‍वविद्यालय, स्‍लोवोनि‍या के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर अरुण प्रकाश मिश्र ने अपने विश्‍वविद्यालय में  हिन्दी अध्यापन की विस्तृत जानकारी देते हुये बताया कि वहाँ के विद्यार्थियों को व्याकरण आदि विषयों के  साथ-साथ भारतीय संस्कृति का भी ज्ञान दिया जाता है। शीघ्र ही वहाँ भारतीय अध्ययन प्रकोष्ठ को वैधानिक मान्यता मिलेगी और उसके साथ ही हिन्दी शिक्षण में तीव्र गति से प्रगति होगी।

ज़ाग्रेब विश्‍वविद्यालय, क्रोएशिया में हि‍न्‍दी प्राध्‍यापक बिल्जाना ज्रनिक ने अपने विश्‍वविद्यालय में हिन्दी शिक्षण और हिन्‍दी विभाग की अन्य गतिविधियों पर प्रकाश डालते हुए अपने विद्यार्थियों की भाषा अधिगम सम्बन्धी समस्याएँ सामने रखीं तथा यह भी बताया कि वह कैसे उनका निदान करती हैं I

वारसा विश्‍वविद्यालय, पौलेण्ड के प्रोफेसर वादानूता स्तासिक ने विश्‍वविद्यालय में हिन्दी के नियमित अध्ययन-अध्यापन की चर्चा करते हुये बताया कि अब तक 90 विद्यार्थियों को हिन्दी एम.ए. की डिग्री मिल चुकी है। उन्होंने कहा कि हिन्दी हमारा भरण-पोषण करते हुए भूमंडलीकृत दुनिया में अपनी पहचान को भी स्थापित करने में सहायता देती है।

उप्साला विश्‍वविद्यालय, स्वीडन के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर हैंज़ वर्नर वेसलर ने विश्‍वविद्यालय में हिन्दी व संस्कृत के इतिहास का उल्लेख करते हुये कहा कि वहाँ हिन्दी शिक्षण की महत्वपूर्ण भूमिका है। वहाँ के विद्यार्थियों में हिन्‍दी मीडिया में अधिक दिलचस्पी है ।

मॉस्को विश्‍वविद्यालय, रूस में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर इंदिरा गाज़िएवा ने रूसी सरकारी मानविकी विश्‍वविद्यालय में हिन्दी शिक्षण का चित्र उपस्थित करते हुये अध्यापन में आने वाली कठिनाइयों का ज़िक्र किया।

मॉस्को स्टेट विश्‍वविद्यालय, रूस  में एसोसि़एट प्रोफ़ेसर ल्युदमि‍ला खोख्लोवा ने बताया कि साम्यवादी काल में विद्यार्थियों को हिन्दी के माध्यम से पार्टी साहित्य पढ़ाया जाता था, लेकिन रूस के पुनर्गठन के बाद हिन्दी शिक्षण पद्धति बदल गयी। विद्यार्थियों की भारतीय संस्कृति, धर्म में बहुत जिज्ञासा है और उनके अनुसार उनके विश्‍वविद्यालय में हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल है।

बुखारेस्‍ट विश्‍वविद्यालय, रूमानि‍या की लेक्‍चरर सबीना पोपर्लान ने बताया के वहाँ भारतीय दर्शन और चिंतन के अध्ययन की एक परम्‍परा रही है। उनके विश्‍वविद्यालय में भारतीय संस्कृति पर कई किताबें लिखी गई हैं। ज़्यादातर शोध कार्य भाषा विज्ञान से सम्‍बन्‍धि‍त होता है।

एल्ते विश्‍वविद्यालय, बुडापेस्ट, हंगरी की विज़िटिंग प्रोफ़ेसर विजया सती ने कहा कि हंगरी में तीन वर्षों का इंडोलॉजी अध्ययन कराया जाता है I यहाँ का मूल उद्देश्य सम्‍वाद है, जिसके माध्यम से संस्कृति और हिन्दी की जानकारी भी दी जाती है, भारतीय संस्कृति से जुड़े उपादानों का परिचय भी दिया जाता है। हिन्दी को रोज़गारपरक बनाने की कोशिश की जाती है।

मोहन कान्त गौतम ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि हिन्दी के विकास की प्रक्रियाओं को हमें देखना है।  हम इस क्षेत्र में आगे बढ़ते हुये मीडिया का उपयोग कर सकते हैं। हिन्दी को रोज़गारपरक बनाने की कोशिश होनी चाहिये। इससे हमारे यूरोपीय विद्यार्थी हिन्दी का प्रयोग अपने रोज़गार के लिये कर सकते हैं। हिन्‍दी भाषा का व्यावहारिक रूप अपनाना अधिक उपयुक्त है।

संगोष्ठी का चतुर्थ शैक्षिक सत्र ‘हिन्दी शिक्षण तथा पाठ्यक्रम सम्‍बन्‍धी समस्याएं तथा समाधान’ महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा, भारत के वाइस चांसलर विभूति नारायण राय की अध्यक्षता में संपन्न हुआ I

सत्र के प्रारम्‍भ में वर्धा विश्‍वविद्यालय के नि‍देशक जगन्नाथन वी.आर. ने हिन्दी की दो प्रमुख समस्याओं– संदर्भानुसार उपयुक्त पाठ्यक्रमों व सन्दर्भ ग्रंथों की कमी और भाषा व भाषा शिक्षण दोनों ही क्षेत्रों में मानकीकरण के अभाव को सामने रखा। उन्होंने लचीले, समस्तरीय और गुणता वाले पाठ्यक्रम के निर्माण पर बल दिया, जिसे अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जा सके और जो घटत्व के सिद्धांत का पालन करे। इस प्रकार सभी शैक्षिक संस्थाएं मानकीकरण के मंच पर एकत्र होकर देश-विदेश के विद्वानों द्वारा निर्मित पाठ्य सामग्री का लाभ ले सकेंगी।

जवाहर लाल नेहरू वि‍श्‍ववि‍द्यालय, भारत के प्रोफेसर वैश्ना नारंग ने विदेशी भाषा के शिक्षण और  भाषा को दूसरी भाषा के रूप में पढ़ाने के पक्षों के भेद उभारने का प्रयास किया। उन्होंने यूरोपीय सन्दर्भों में हिन्दी भाषा अध्ययन–अध्यापन प्रक्रिया के आधार पर हुये विदेशी भाषा अधिगम के अंतर्गत संज्ञान प्रक्रिया को स्पष्ट किया।

वारसा विश्‍वविद्यालय, पोलैंड के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर कैलाश नारायण तिवारी ने हिन्दी भाषा और साहित्य पढ़ाने के लिए विभिन्न विश्‍वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों की विभिन्नता को समाप्त करते हुये एक उच्च स्तरीय मानक पाठ्यक्रम के निर्माण की बात कही, जिसमें उन्होंने भारतीय तथा विदेशी विद्वानों के पूर्ण सहयोग पर बल दिया ।

प्रोफेसर नवीन चन्द्र लोहानी

लूसान विश्‍वविद्यालय, स्विट्ज़रलैंड के नवीन चन्द्र लोहानी  ने ‘हिन्दी साहित्य शिक्षण के लिये आलोचना मानदंडों की मुश्किलों’ पर चर्चा करते हुए बताया कि हिन्दी साहित्य को समझने के मानदंड संस्कृत, काव्य शास्त्र, पाणिनि व्याकरण तथा विश्‍व के आलोचनाशास्त्रों से प्राप्त वैचारिकी द्वारा मिले हैं।
सोफ़िया विश्‍वविद्यालय, बल्‍गारि‍या के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर नारायण राजू वी.एस.एस. सिरीवुरी ने हिन्दी शिक्षण में भारतीय सांस्कृतिक एवं सामाजिक सन्दर्भ का महत्व स्थापित किया।

लिस्बन विश्‍वविद्यालय, पुर्तगाल में लेक्‍चरर शिवकुमार सिंह ने पुर्तगाल में विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण व्यवस्था से सम्‍बधि‍त चुनौतियों को प्रस्तुत किया। उन्होंने हिन्दी सीखने की प्रेरणा और शिक्षण पद्धतियों का ज़िक्र करते हुये सांस्कृतिक सन्दर्भों के महत्व को दर्शाया तथा यूरोप की स्थानीय भाषाओं में हिन्दी शिक्षण संसाधन तैयार करने पर बल दिया।

हैम्बर्ग विश्‍वविद्यालय, जर्मनी की तात्याना ओरन्स्कया ने हिन्दी शिक्षण के सम्‍बन्‍ध में विश्‍व हिन्दी दिवस के महत्व के बारे में विचार रखते हुए उसकी सकारात्मक भूमिका को स्वीकार किया तथा बताया कि यूरोपीय विश्‍वविद्यालयों में हिन्दी शिक्षण की समस्या के मूल में भारत की गृहभाषा- राजनीति ही नहीं, बल्कि अन्तरराष्ट्रीय आर्थिक और राजनीतिक तथ्य भी हैं।

कासा एशिया, बार्सीलोना, स्पेन  में हिन्दी प्राध्यापक दीप्ति गुलानी ने स्पेन में हिन्दी भाषा अध्ययन की अपेक्षाओं और कठिनाइयों पर प्रकाश डाला। उन्होंने हिन्दी शिक्षण की व्यावहारिक समस्याओं का उल्लेख किया और बताया कि स्पेन में हिन्दी के प्रति दिलचस्पी बढ़ रही है।

इस सत्र के अंतिम वक्‍ता प्रोफेसर मोहन कान्त गौतम ने यूरोप में हिन्दी अध्ययन की विस्तृत  समस्याएं और उनके समाधान पर अपनी प्रस्तुति दी। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यूरोपियन संसद यूरोप में प्रचलित सभी भाषाओं को मान्यता प्रदान करेगी और हिन्दी भाषा तथा इसका विशाल साहित्य यूरोप की सभ्यता को और अधिक संपन्न करेगा।

संगोष्ठी के समापन सत्र की अध्यक्षता प्रोफेसर उदय नारायण सिंह ने की। इस सत्र में चारों शैक्षिक सत्रों की रिपोर्ट क्रमशः विजया सती, शिव कुमार सिंह. रमेश शर्मा तथा ऐश्‍वर्य कुमार ने प्रस्तुत की। इसके बाद संगोष्ठी में उठे सभी मुद्दों पर व्यापक चर्चा हुई और अंत में संगोष्ठी की ओर से की जाने वाली संस्तुतियों पर विचार-विमर्श हुआ। गम्‍भीर चिंतन और पारस्परिक विचार विनिमय के बाद सर्वसम्मति से विदेश मंत्रालय  के समक्ष निम्नलिखित संस्तुतियों को रखने का निर्णय हुआ–
1. आठवें विश्‍व हिन्दी सम्मेलन, न्यूयॉर्क  की प्रमुख संस्तुति–‘अन्तरराष्ट्रीय मानक हिन्दी पाठ्यक्रम’ की परियोजना को क्रियान्वित किया जाये और उसमें हिन्दी के सामाजिक और सांस्कृतिक सन्दर्भों का समावेश किया जाये।
2. विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण में संलग्न भारतीय एवं भारतेतर प्राध्यापकों को भाषा शिक्षण प्रविधि, साहित्य शिक्षण प्रविधि, हिन्दी व्याकरण, हिन्दी का सामाजिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ आदि विषयों में प्रशिक्षित किया जाये।
3. यूरोप में इस प्रकार की शैक्षिक संगोष्ठियाँ विदेश मंत्रालय के सहयोग से हर दो वर्ष में  नियमित रूप से आयोजित की जाएँ। वर्ष 2014 की यूरोपीय हिन्दी संगोष्ठी वारसा  विश्‍वविद्यालय में आयोजित करने का प्रस्ताव है।
4. पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत एक 24 घंटे का हिन्दी भाषा चैनल प्रारम्भ किया जाये, जिसमें हिन्दी की सभी प्रयुक्तियाँ उपलब्ध हों तथा वेब पर हिन्दी की विशाल सामग्री को एक स्थान पर हिन्दी अध्येताओं को उपलब्ध कराया जाये।
5. अंग्रेज़ी से इतर विदेशी भाषाओं को दृष्टि में रखकर मल्टीमीडिया सहित हिन्दी शिक्षण सामग्री का निर्माण किया जाये।
6. विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण के लिए स्नातकोत्तर स्तर का पाठ्यक्रम विकसित किया जाये।
7. भारतीय संस्कृत संबंध परिषद द्वारा विभिन्न विदेशी विश्‍वविद्यालयों में हिन्दी पीठों की संख्या में वृद्धि की जाये।
8. हिन्दी साहित्य एवं हिन्दी शिक्षण की उपयोगी पुस्तकें तथा मल्टी मीडिया सामग्री उन सभी विश्‍वविद्यालयों को विदेश मंत्रालय द्वारा उपलब्ध कराई जायें, जहाँ हिन्दी अध्ययन अध्यापन  की सुविधाएँ हैं।
9. अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्‍वविद्यालय के डायनमिक पोर्टल पर वर्चुअल क्लास रूम की व्यवस्था की जाये, जिसके माध्यम से विदेशों में अध्ययनरत हिन्दी विद्यार्थियों को  हिन्दी साहित्य तथा हिन्दी भाषा के विद्वानों के विभिन्न विषयों पर व्याख्यान उपलब्ध कराये जायें।
10. विश्‍व में विदेशी भाषा के रूप में हिन्‍दी शिक्षण से सम्‍बन्‍धि‍त इन सभी संस्तुतियों के क्रियान्वयन के लिए विदेश मंत्रालय के अतिरिक्त भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, अन्तरराष्ट्रीय हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा और विश्‍व हिन्‍दी सचिवालय, मॉरिशस उत्तरदायित्व लें  तथा प्रभावी परियोजनायें बनायें।

समापन समारोह की अध्यक्ष एशियन स्टडीज़ की प्रोफेसर ब्लांका ने संगोष्ठी के सफल आयोजन पर बधाई दी। मुख्य अतिथि के रूप में विश्‍व हिन्दी सचिवालय, मॉरिशस की महासचिव पूनम जुनेजा ने संगोष्ठी की सार्थकता को रेखांकित किया। उन्होंने आश्‍वासन दिया कि विश्‍व हिन्‍दी सचिवालय संगोष्ठी द्वारा की गई संस्तुतियों पर अपेक्षित कार्रवाई करेगा। विशिष्ट अतिथि महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के उपकुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि संगोष्ठी द्वारा पारित सभी संस्तुतियों को क्रियान्वित करने का उत्तरदायित्व उनका विश्‍वविद्यालय लेता है। संगोष्ठी का समापन कासा दे ला इण्‍डि‍या के निदेशक डॉक्‍टर गियार्मो रोड्रगेज़ के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ।

संगोष्ठी के पहले दिन चिंतन और वि‍चार मंथन के बाद शाम को कासा दे ला इण्‍डि‍या के सभागार में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें स्पेन के जिप्सी समुदाय के पारम्‍परिक नृत्य फ़्लेमेंको  को उसके भारतीय स्रोत से जोड़ने का प्रयास किया गया। इसके साथ ही भरतनाट्यम, कत्थक, हंस वीणा, तबला और मृदंगम एवं फ़्लेमेंको नृत्य और गायन का अन्तरराष्ट्रीय कलाकारों ने अद्भुत समागम किया। स्पेन की प्रसिद्ध भरतनाट्यम विशेषज्ञ मोनिका देला फुएंते ने हरिवंश राय बच्चन की कविता ‘इस पार प्रिये तुम हो मधु है’ पर किया गया मोहक नृत्य दर्शनीय था।

अंग्रेजि‍यत का अंजाम : प्रेमपाल शर्मा

पूरी शि‍क्षा व्‍यवस्था पर अंग्रेजी हावी हो गई है।  इससे प्रति‍भा का तो नुकसान हो ही रहा है, साथ ही कई बार बच्‍चे डि‍प्रेशन का शि‍कार होकर आत्‍मवि‍श्‍वास खो बैठते हैं। चि‍न्‍ताजनक बात यह है कि‍ लेखक, छात्र, नेता, संगठन आदि‍ इस मुद्दे पर चुप्‍पी साधे हैं। वरि‍ष्‍ठ लेखक प्रेमपाल शर्मा का आलेख-

अपनी भाषा को छोड़ अंग्रेजी में पढ़ाई करने से होने वाली दो घटनायें दिल्‍ली में स्थित दो केन्‍द्रीय विश्‍वविद्यालयों की । पहली घटना- दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में प्रोफेसर प्रेम सिंह ने बताई । बिहार से आये उस मेधावी नौजवान ने दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में हिन्‍दी ऑनर्स में दाखिला ले लिया । लेकिन उसका रुझान, रुचि दर्शन शास्‍त्र में थी । हिन्‍दी में ठीक-ठाक करने के बावजूद भी वह ज्‍यादातर समय दर्शन-शास्‍त्र की किताबें पढ़ने में व्‍यस्‍त और मस्‍त रहता । अगले साल उसने दर्शन शास्‍त्र की प्रवेश परीक्षा दी और दाखिला मिल गया । लेकिन जैसा कि दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के ज्‍यादातर विषयों को अंग्रेजी में पढ़ाने की शुरुआत हो चुकी है उसे लगा कि दर्शन शास्‍त्र तो ठीक है लेकिन अंग्रेजी में तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा । कोशिश की लेकिन असफल रहा । वैसे भी क्‍या भाषा या स्‍नातक स्‍तर पर ऐसे विषयों में आप रातों-रात अंग्रेजी माध्‍यम में उतने अधिकार से नहीं लिख सकते जितना कि अपनी भाषा में । नतीजतन दर्शन शास्‍त्र अधूरा छोड़ना पड़ा । बिहार, उत्‍तर प्रदेश से आये हुये ऐसे हजारों छात्र हैं जो दिल्‍ली पढ़ने तो आये लेकिन भाषा के माध्‍यम में और रुचि के विषय की टकराहट ने उन्‍हें कहीं का नहीं छोड़ा। काश ! इस विद्यार्थी को अपनी रुचि के विषय को अपने देश की भाषा में पढ़ने-लिखने की आजादी मिल पाती ?

दूसरी घटना जामिया मिलिया वि‍श्‍वविद्यालय की बतायी जाती है । यह भी दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय की तरह केन्‍द्रीय विद्यालय है जहाँ केन्‍द्रीय सरकार द्वारा करोडों रुपये शिक्षा के लिए दिये जाते हैं । हिन्‍दी में एम.ए., एम.फिल. किये हुए एक छात्र ने इस विश्‍वविद्यालय में ‘अमन और विवाद’ (Peace and Conflict) के पाठ्यक्रम में दाखिला ले लिया । बहुत खुशी की बात है कि जामिया मिलिया, महात्‍मा गांधी विश्‍वविद्यालय, वर्धा और अन्‍य विश्‍वविद्यालयों में पिछले दिनों अहिंसा, स्‍त्री, अमन और विवाद, आदिवासी, दलित विमर्श जैसे एक-से-एक नये और प्रगतिशील विषयों में अध्‍ययन-अध्‍यापन शुरू हुए हैं । भारतीय शिक्षा में यह लगभग क्रांतिकारी कदम है । हाशिये पर छूटे हुये और जी रहे लोगों के ऊपर जब तक अध्‍ययन-अध्‍यापन नहीं होता, उनकी समस्‍याओं को एक पूर्णता में नहीं समझा जा सकता । वैश्‍वीकरण का कुछ और फायदा हुआ हो या न हुआ हो कम-से-कम पश्चिम के असर में शिक्षा को बन्‍द सन्‍दूक से बाहर पारम्‍परिक पुरातनपंथी विषयों को पीछे छोड़ते हुए एक खुला आकाश तो मिला । लेकिन अपनी भाषा को बाहर धकियाते हुए विदेशी भाषा के आतंक ने यहाँ बंजर बना दिया है । किस्‍सा यह कि जो छात्र इन विषयों में विवाद खत्‍म करने और शान्‍ति‍ के अध्‍ययन के लिए आया था उसे जब सिर्फ अंग्रेजी में उत्‍तर देने को विवश किया गया तो वह सब चौकड़ी भूल गया । विश्‍वविद्यालय से बार-बार अनुरोध, विनय करने के बावजूद भी उसे हिन्‍दी में उत्‍तर देने की छूट नहीं दी गई। नतीजतन वह फेल हो गया।

सभी विश्‍वविद्यालयों को विशेषकर केन्‍द्रीय विश्‍वविद्यालयों को करोड़ों रुपयों का अनुदान देश के हर नागरिक और बच्‍चे को शिक्षा मुहैया कराने के लिए होता है और हमारे संविधान में भी न केवल हिन्‍दी, बल्कि सारी भारतीय भाषाओं को प्रोत्‍साहित करने की बात कही गई है । ये विश्‍वविद्यालय हिन्‍दी पट्टी के सबसे बड़े महानगर दिल्‍ली में स्थित हैं, जहाँ हिन्‍दी जानने वाले शत-प्रतिशत होंगे। इसके बावजूद दिल्‍ली स्थित विश्‍वविद्यालयों में ऐसा रोज हो रहा है । विश्‍वविद्यालयों के भाषा माध्‍यम की निगरानी के लिए क्‍यों कोई निगरानी समिति या संसदीय समिति नहीं है ? आजादी के बाद कई शिक्षा सम्‍बन्‍धी आयोगों ने न केवल प्राथमिक शिक्षा, बल्कि स्‍नातकोत्‍तर शिक्षा को भी अपनी भाषा में देने की वकालत की है । डॉक्‍टर कोठारी स्‍वयं दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय से जुड़े रहे हैं । क्‍या दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय का फर्ज नहीं बनता कि वह अपने एक शिक्षाविद् के सपनों के अनुकूल हिन्‍दी क्षेत्र के उन गरीबों को उनकी अपनी भाषा में शिक्षा मुहैया कराने के लिए कुछ कदम उठाये ? मजबूरन अंग्रेजी सीखने की इस यातना में कई बार आत्‍महत्‍या या डिप्रेशन में चले जाने की भी खबरें आती रहती हैं । इस प्रक्रिया में इन बच्‍चों का आत्‍मविश्‍वास निरंतर टूटता जाता है । क्‍या सही शिक्षा का नाम बच्‍चों में आत्‍मविश्‍वास जगाना है या सदा के लिए उसे खत्‍म करना है ?

यह केवल कॉलेज के स्‍तर पर ही नहीं हो रहा अब तो इसकी शुरुआत प्राथमिक स्‍कूल में भी हो रही  है । पिछले दिनों की खबर है कि एम.सी.डी. ने खुद सौ स्‍कूल ऐसे चुने हैं, जहाँ पहली क्‍लास से ही अंग्रेजी माध्‍यम से पढ़ाया जाएगा । निश्चित रूप से अफरा-तफरी का यह कदम निजी अंग्रेजी स्‍कूलों की तरफ भागती, बढ़ती भीड़ को बचाने का है, लेकिन क्‍या सरकार और समाज शिक्षा के बुनियादी प्रयोजनों को भूलते हुए एक सामूहिक आत्‍मघात की तरफ नहीं बढ़ रहे ? यह प्रक्रिया दिल्‍ली और देश के दूसरे राज्‍यों में भी निरंतर बढ़ रही है । सरकारी स्‍कूलों में जाने वाले विशेषकर इन गरीबों के बच्‍चों को वहाँ अंग्रेजी पढ़ाएगा कौन ? क्‍या प्राइमरी या माध्‍यमिक स्‍कूलों में जो शिक्षक पढ़ाते हैं उनकी अंग्रेजी इतनी अच्‍छी है जो बच्‍चों को भी पढ़ा सकें ? तो क्‍या हम अमेरिका, इंग्‍लैंड के बेरोजगार, शिक्षकों के लिए अंग्रेजी पढ़ाने की सड़के तैयार कर रहे हैं ? विश्‍वविद्यालयों से लेकर प्राथमिक स्‍तर तक एक पूरा बाजार जैसे अंग्रेजी के लिए तैयार किया जा रहा है । हाल ही में खुदरा व्‍यापार में विदेशी दुकानों, माल खुलने का इतना विरोध हुआ कि सरकार को अपने कदम वापस लेने पड़े । फिर शिक्षा, संस्‍कृति में अंग्रेजी का हर स्‍तर पर इतना स्‍वागत क्‍यों ? यदि एफ.डी.आई. देश के दुकानदारों को कहीं का नहीं छोड़ेगी तो क्‍या अंग्रेजी सामान्‍य जन के लिये भला करेगी ?

नेताओं की छोड़ी हुई कुर्सियों को ताकते दिल्‍ली में बैठे कई नये संगठन, बुद्धिजीवी रोज ऐसे मुदृदों को उठाए जंतर-मंतर पर बैठे रहते हैं जिससे कि उनकी राजनीति चमकती रहे । जड़ों पर जाइये दोस्‍तों । मनु स्‍मृति जैसे ग्रंथ मनुष्‍य-मनुष्‍य में भेद करके जाति और धर्म को स्‍थापित करते हैं, वैसे ही हिन्‍दुस्‍तान जैसे मुल्‍क में अंग्रेजी करेगी । मनु स्‍मृति की गलती तो सुधार की तरफ है मगर अफसोस कुछ दलित अंग्रेजी की मनु स्‍मृति में समाधान ढूँढ रहे हैं ।

इससे मिलती-जुलती एक और खबर पर गौर कीजिये । लखनऊ मेडिकल कॉलेज में लगभग पचास डॉक्‍टर ऐसे हैं जो पिछले पंद्रह वर्षों से परीक्षा में बार-बार बैठने के बावजूद भी एम.बी.बी.एस. की परीक्षा उत्‍तीर्ण नहीं कर पा रहे हैं । कोचिंग की सुविधा और विशेष रियायत देने के बावजूद भी जातीय विद्वेष के आरोप से बचने के लिए विश्‍वविद्यालय ने दूसरे मेडिकल कॉलेजों के परीक्षक नियुक्‍त किये लेकिन ये विद्यार्थी फिर भी डॉक्‍टरी का पाठ्यक्रम पूरा नहीं कर पा रहे । हार कर लखनऊ विश्‍वविद्यालय ने मेडिकल कांउसिल इंडिया को लिखा है कि क्‍यों न एक विशेष रियायत के तहत इन विद्यार्थियों को उत्‍तीर्ण घोषित किया जाये । समाज के इन गरीबों, दलितों के लिए एक सहानुभूति की जरूरत है । निश्चित रूप से ये उतने मेधावी नहीं रहे होंगे लेकिन उससे ज्‍यादा यदि समस्‍या की जड़ में जाएं तो अंग्रेजी माध्‍यम और अंग्रेजी भाषा की किताबें रही होंगी । काश ! इन विद्यार्थियों को अपनी भाषा में लिखने, पढ़ने की आजादी या क्‍लास में प्रश्‍न पूछने की आजादी उपलब्‍ध रहे तो ये न केवल उत्‍तीर्ण होंगे शायद अपने पाठ्यक्रमों में कई गुना बेहतर कर सकते  हैं । अनेकों शिक्षाविद्, वैज्ञानिकों ने और शीर्ष पर पहुँचे हुए इंजीनियरों और डॉक्‍टरों ने यह आत्‍म स्‍वीकरोक्ति की है कि अंग्रेजी में न बोल पाने के कारण वे कैसे अपनी क्‍लास में प्रश्‍न नहीं पूछ पाते थे । तीस वर्षों में सिविल सर्विसेज में कोठारी आयोग की अनुशंसाओं के अनुकूल अपनी भाषाओं में उत्‍तर देने की सुविधा के बाद पिछले तीस वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि केन्‍द्रीय सेवाओं में आरक्षित वर्ग से चुने हुए पचास प्रतिशत से ज्‍यादा ने अपनी भाषा का माध्‍यम चुना है । क्‍योंकि जिन गरीब परिवार और क्षेत्रों से वे आते हैं वहाँ अंग्रेजी के बजाये अपनी भाषा पर उनका अधिकर कई गुना होता है । हिन्‍दी के एक वरिष्‍ठ कविजन ‘जनसत्‍ता’ के पृष्‍ठों पर वर्षों से विदेशों में किताबों, पुस्‍तकालयों, लेखकों, कवियों उनकी भाषा आदि के बारे सुनाते आ रहे हैं। कई दोस्‍तों के कान भी पक गये उनका विदेशी वृतांत सुनते-सुनते । काश कभी-कभार सरकार की भाषा नीति पर भी उन्‍होंने दिल्‍ली या देश के लेखकों को लामबन्‍द करने की कोशिश की होती ?  कहीं अन्‍दर की बात यह तो नहीं कि कविता से आगे हिन्‍दी को वह भी शिक्षा और विमर्श से दूर रखना चाहते हों । वरना दिल्‍ली के स्‍कूलों से हिन्‍दी गायब हो जाये और सबसे ज्‍यादा तादाद में रहने वाले दिल्‍ली का लेखक समुदाय ऐसे चुप बना रहे । दुष्‍यंत कुमार की एक गजल का अर्थ तो वे जानते ही होंगे ‘मौत की संभावनायें सामने हैं और नदियों के किनारे घर बने हैं ।’ हिन्‍दी लेखक तो बेचारा ऐसी लचीली मिट्टी का लौदा है जिसकी अपनी कोई मूर्ति ही नहीं बन पाई । वह वही बोलता है, वही रूप धारण करता है जो उसकी राजनीतिक पार्टी इशारा करे। मुद्दा आरक्षण का हो या अन्‍ना का, या भाषा का, वह बारात में सबसे पीछे चलने वाला प्राणी बन चुका है, प्रेमचंद की बुझी लालटेन थामे ।

आश्‍चर्य की बात यह भी है कि बिहार, यू.पी. से विस्‍थापित ये अधिकांश छात्र जो अंग्रेजि‍यत का शि‍कार हैं वे लामबंद होकर आगे क्‍यों नहीं आ रहे हैं ? कदम-कदम पर जातिगत क्षेत्रीय अस्मिता, विभेद के खिलाफ हुँकार भरने वालों का खोलता खून क्‍यों ठंडा पड़ा हुआ है ? विशेषकर आरक्षण के मसले पर बार-बार ईंट से ईंट बजाने वाला यूपी, बिहार का सवर्ण और दलित कहाँ सोया हुआ है ?

हाशिये पर सदियों से डाले गये आदिवासी, दलित, गरीबों की अस्मिता और हक की लड़ाई तो कुछ समूह उठा रहे हैं लेकिन अपनी भाषा के जिस बुनियादी हक और आजादी पर दुनिया के हर नागरिक का हक है वहाँ चुप्‍पी क्‍यों ? क्‍या अपनी भाषा के बिना किसी भी आजादी का कोई अर्थ है ?

भाषा का भविष्य : प्रेमपाल शर्मा

हिन्‍दी से किस तरह आनी वाली पीढ़ी दूर होती जा रही है, इस पर वरिष्‍ठ लेखक प्रेमपाल शर्मा का आलेख-

बच्चों की मेज पर पड़ी आधी-अधूरी डायरियाँ उलट-पुलट रहा हूँ । वैसे तो किसी की डायरी बिना अनुमति के नहीं पढ़नी चाहिए, लेकिन सिर्फ इसलिए देख रहा हूँ कि सफाई के चक्‍कर में कोई महत्वपूर्ण चीज न इधर-उधर हो जाए। एक भी शब्द हिन्‍दी का नहीं ? न नाम, न उसमें दर्ज पते। ई-मेल का तो सवाल ही नहीं उठता अभी अपनी भाषाओं में । सूक्तियाँ भी अंग्रेजी में और भविष्य की योजनाओं के खाके भी । कुछ पन्ने तो स्पष्ट रूप से अंग्रेजी के शब्दकोश को बढ़ाने के लिए ही हैं। माना इनकी कलम विदेशी पार्कर, मित्‍सुबिशी की हैं, लेकिन उनकी स्याही से क्‍या सिर्फ अंग्रेजी निकलती है ? क्‍या इस पीढ़ी को कभी अपनी भाषा में कुछ लिखने की जरूरत नहीं पड़ती है? वरना दो-चार साल की डायरियाँ,  नोटबुक में गलती से भी तो कोई हिन्‍दी का शब्द लिखा होता।

मैं दावे से कह सकता हूँ कि न हमें इतनी अंग्रेजी आती है और न घर में अंग्रेजी पढ़ने, बोलने के प्रति कोई अतिरिक्‍त उत्साह या आतंक है। घर के पूरे हिन्‍दी परिवेश में इन बच्चों ने भी कम से कम आठवीं तक सैकड़ों कहानी, कार्टून की किताबें, पत्रिकायें हिन्‍दी की पढ़़ी हैं और अभी भी वे उन्‍हें सम्‍भाल कर रखना चाहते हैं। दबे मन में शायद अपनी अगली पीढ़ी की खातिर। नेशनल बुक ट्रस्ट, एकलव्य आदि प्रकशनों की हिन्‍दी में प्रकाशित शायद ही बच्चों की कोई किताब ऐसी हो जो इन्‍होंने न पढ़ी हो । फिर भी डायरी से अपनी भाषा गायब!

आइए ! अब उनकी किताबों का मुआयना करते हैं। ग्यारहवीं में विज्ञान के विद्यार्थी होते ही अंग्रेजी का एकछत्र राज्य । केन्‍द्रीय विद्यालय में पढ़ने के बावजूद दिल्ली जैसे महानगरों के स्कूलों में गणित, भौतिकी और रसायन विज्ञान की किताबें और पढ़ाई सिर्फ अंग्रेजी में होती है । विकल्प न पढ़ने का, न पढ़ाने का । आईआईटी, मेडिकल की प्रवेश परीक्षा की किताबें, कुंजियाँ जिनके संस्करण पाँच-पाँच लाख के छपते हैं, सब अंग्रेजी में । कोचिंग क्‍लास अंग्रेजी में और अंग्रेजी में ही इंजीनियरिंग आदि की पढ़ाई । कहाँ जरूरत पड़ेगी हिन्‍दी में कुछ लिखने की ? ये बच्चे कभी-कभार अपने गाँव भी जाते रहते तो भी अपनी भाषा परिवेश का कुछ संस्कार बचाते। यहाँ से आगे तो केवल कैट, जीआरई या जी-मैट देकर देश-विदेश के प्रबंधन संस्थानों में जाना है और इसीलिए किताबों की अलमारी भरी पड़ी है ऑक्‍सफोर्ड, कैम्ब्रिज के कई तरह के शब्‍दकोशों से। इस पीढ़ी के पास हिन्‍दी का शब्दकोश मिलने पर कोई पुरस्कार मिलना चाहिए । जब ख्वाबों में अमेरिका, आस्ट्रेलिया या कार्पोरेट दुनिया है तो चेतन भगत से लेकर जे.के. रोलिंग, एलकैमिस्ट और अंग्रेजी पत्रिकायें पहले ही यहाँ पहुँच गए हैं ।

ग्यारहवीं के बाद स्कूल, कॉलेज की शिक्षा ने उनकी अंग्रेजी ठीक की हो या नहीं, हिन्‍दी को जड़ से उखाड़ फेंका है । सरकारी और निजी दोनों स्तरों पर । वे अब न हिन्‍दी पत्रिका ‘चकमक’ या ‘हँस’ की तरफ देखते, न हिन्‍दी अखबार को। शायद न समय है न जरूरत क्‍योंकि जहाँ नौकरियाँ हैं, वहाँ हिन्‍दी तो कतई नहीं है । इसलिए कुछ और अंग्रेजीदाँ  मध्यम-वर्ग के बच्चे मिडिल या उससे पहले प्रायमरी से ही अपनी भाषा से सप्रयास दूर किए जा रहे हैं । कोठारी आयोग द्वारा केन्‍द्र सरकार में लाई गई भारतीय भाषाओं की भी उल्टी गिनती शुरू हो गई है ।

किताबों के बीच मुझे बचपन की स्मृतियाँ घेर रही हैं । पाँचवी-छठी में पढ़ते हुए घर के किसी कोने में एक किताब मिली। शुरू के कुछ पन्ने फटे हुऐ थे। अन्‍दर एक-दो जगह पिताजी का नाम लिखा था- कृष्ण कुमार। उनका हस्त लेख अभी तक मेरे दिमाग में गुदा हुआ है। इतिहास की उस किताब को मैं न जाने क्‍यों बार-बार पढ़ता था। पिताजी बहुत मेधावी, परिश्रमी थे, लेकिन किसानी-शहरी मजदूरी के पुल पर साइकिल से आते-जाते और इतनी बड़ी गृहस्थी के बोझ में ज्यादा नहीं पढ़ पाए । पता नहीं उसी किताब का असर था कि विज्ञान, साहित्य की लम्बी यात्रा के बीच इतिहास अभी भी मेरा प्रिय विषय है । भाषा, साहित्य की यही विरासत होती है और यही संस्कार अगली पीढियों तक जाते हैं । इस पीढ़ी के पास विरासत में छोड़ने के लिए विदेशी चीजों के अलावा कुछ बचेगा भी ?

समाज के एक और पक्ष पर भी नजर डालते हैं । दिल्ली के 100 वर्ष पूरा होने पर साहित्य कला परिषद के सौजन्‍य से सोसाइटी में गजल कार्यक्रम रखा गया था। गजल, गीत हिन्‍दी के, लेकिन सूचना हर बात की सिर्फ अंग्रेजी में दी जाती । सूचना पर हस्ताक्षर करने वाले हिन्‍दी भाषी विद्वान हैं तो इतना तो समझते ही हैं कि हिन्‍दी गजल सुनने जो आएगा, वह कम से कम इतनी हिन्‍दी जानता होगा। लेकिन सूचना भी अंग्रेजी में ही होगी और रजिस्टर के नाम पते जैसे काम भी । सरकार से लेकर समाज के इन पहरुओं की चिन्‍ता में जितना दर्द अंग्रेजी के लिए रहता है, उतना अपनी किसी भाषा के लिए नहीं । हर स्तर पर मुखौटे असली चेहरों की जगह ले चुके हैं ।

कुछ दिन पहले दफ्तर में धर्म पुस्तक ‘गीता’ की जरूरत पड़ गई । इस्कॉन की बदौलत सरकारी दफ्तरों में गीता खूब पाई जाती है । काश, उसका कर्म सिद्धान्‍त भी कुछ असर करता तो ये बाबू दफ्तर इतनी देर से न आते । खैर, गीता तो मिल गई लेकिन अंग्रेजी में थी । मैंने पूछा, ‘‘क्‍या, अब कृष्ण, अर्जुन भी अंग्रेजी बोलने लगे हैं?’’ उनसे तुरन्‍त जवाब नहीं बना। भक्ति भाव जवाबों के लिए गुंजाईश ही नहीं छोड़ता । अंग्रेजी की गीता का सन्‍देश साफ है- अंग्रेजी भी ठीक हो जाएगी और परलोक भी! सरकारी दफ्तरों में अकल से ज्यादा महिमा अंग्रेजी की है।

जिस पीढ़ी की डायरी में एक भी शब्द अपनी भाषा का न हो, उनके दिमाग में कोई हिन्‍दी लेखक कैसे और कब पैर पसार सकता है ? लेकिन क्‍या इसका दोष सिर्फ बच्चों का है या उस साँचे का जिसमें इन बच्चों को पाला जा रहा है। अफसोस यह है कि इन मुददों पर रोशनी डालने वाली लालटेनों के शीशे या तो काले पड़ गए हैं या इनका तेल खत्म हो गया है ।

सरलता के सहारे हत्या की हिकमत : प्रभु जोशी

प्रभु जोशी

पि‍छले दि‍नों गृह मंत्रालय ने राजभाषा-हिन्दी को ‘आमजन  की भाषा’ बनाने का फरमान जारी कर दिया। इसके पीछे छि‍पे एजेंडे की पड़ताल करता वरि‍ष्‍ठ लेखक-पत्रकार प्रभु जोशी का आलेख-

भारत-सरकार का ‘गृह-मंत्रालय’, जिसको पता नहीं अतीत में जाने क्या सोच कर देश में ‘राष्ट्रभाषा’ के व्यापक प्रचार-प्रसार का जिम्मा सौंप दिया गया था, पिछले दिनों एकाएक नींद से जागा और जाग कर उसने देश के साथ, आजादी के बाद का सबसे ‘क्रूरतम’ मजाक किया कि उसने राजभाषा-हिन्दी को ‘आमजन  की भाषा’ बनाने का फरमान जारी कर दिया। यह इसलिए कि वह ‘कठिन’ और ‘अबोधगम्य’ है। पिछली लगभग आधी सदी से जो शब्द परिचित चले आ रहे थे, पता नहीं किस ‘इलहाम’ के चलते वे तमाम शब्द अचानक ‘अबोधगम्य’ व ‘कठिन’ हो उठे। उसने अपनी तरफ से काफी चतुराई-भरा परिपत्र  जारी करते हुए, समस्या-समाधान के लिये गालिबन सलाह दी जा रही हो कि हिन्दी में ‘उर्दू-फारसी-तुर्की’ के शब्दों का सहारा लिया जाये और साथ ही साथ आवश्यकता अनुसार ‘अंग्रेजी’ के शब्दों को भी शामिल किया जाये। अंग्रेजी को सबसे पीछे, उर्दू-फारसी की आड़ में खड़ा कर दिया गया। लेकिन मूलतः यह मंसूबा, साफ-साफ दिखायी दे रहा था कि देश के ‘खास-आदमी’ की दृष्टि से ‘आम-आदमी’ के लिए भाषा की छल-योजित ‘पुनर्रचना’ की जा रही है। इससे उनके भाषा-विवेक की वर्गीय पहचान तो प्रकट हो ही रही है, बल्कि यह भी पता चल रहा है  ‘वित्त-बुध्दि’ की सरकार, ‘सांस्कृतिक-समझ’ के स्तर पर कितनी कंगली है।

परिपत्र में बताया गया है कि मंत्रालय की ‘केन्द्रीय हिन्दी समिति’ की प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में सम्पन्न होने वाली बैठक के बाद यह निर्णय किया गया। छोटे पर्दे की खबरों में कभी भी हिन्दी में बोलते नहीं दिखायी देने वाले प्रधानमंत्री की हिन्दी बैठक की सिर्फ कल्पना भर की जा सकती है  कि वह कैसी होती होगी। बहरहाल, इसमें देश की ‘राजभाषा’ को सरल सुगम बनाये जाने के लिए कोई निश्चित ‘प्रतिमान’ तो नहीं बनाया गया है कि ‘सरल’ बनाते समय अंग्रेजी शब्दों का प्रतिशत क्या होगा, कौन-सा शब्द ‘कठिन’ माना जायेगा और उसे प्रयोग से हमेंशा के लिये ही खदेड़ कर बाहर कर दिया जायेगा ? क्या किसी शब्द को अब ‘प्रचलन’ में लाने की कोशिश की जायेगी ? या कि हिन्दी के समाचार-पत्रों के कार्यालयों में जारी नीति की तर्ज पर हरेक का अपना मनमानापन ही उसका आधार होगा ? क्योंकि भाषा के रूप के अनुकरण के लिये तो अखबार को ही रखा गया है। उल्लेख चाहे पत्रिका कर दिया गया हो। लेकिन बतौर ‘प्रतिमानीकरण’ के लिए ‘सरल’ और ‘कठिन’ शब्दों की पहचान करते हुए ‘समिति’ ने पता नहीं देश के किस स्थान से प्रकाशित होने वाली कौन-सी पत्रिकाओं से उदाहरण दिया, वह निश्चय ही स्पष्ट रूप से बताता है कि उसकी दृष्टि में भोजन की जगह ‘लंच’, क्षेत्र की जगह ‘एरिया’, महाविद्यालय के बजाय ‘कॉलेज’, वर्षा-जल के बजाय ‘रेन-वॉटर’, नियमित की जगह ‘रेगुलर’, श्रेष्ठतम पाँच के स्थान पर ‘बेस्ट फाइव’, आवेदन की जगह ‘अप्लाई’, छात्रों के बजाय ‘स्टूडेण्ट्स’, उच्च शिक्षा के बजाय ‘हायर-एजुकेशन’ आदि-आदि का प्रयोग भाषा के सरलीकरण में सहयोगी होगा। आप यह पढ़ कर स्वयं स्पष्ट कर लें कि हिन्दी के शब्दों की तुलना में जो शब्द अंग्रेजी के बताये गये हैं, वे ‘सरल’ हैं और आमजन को आसानी से समझ में आ जायेंगे।

उनका यह भी कहना है कि इससे भाषा में ‘प्रवाह’ बना रहेगा। अब आप बखूबी अंदाजा लगा सकते हैं कि यह प्रवाह अंततः भाषा को किस दिशा में ले जायेगा। परिपत्र में बहुत बुद्धिमानी के साथ यह ‘सत्य’ भी उद्घाटित किया गया, जो हिन्दी के साहित्यकारों की  अभी तक की समझ में भी इजाफा करेगा कि ‘साहित्यिक भाषा के इस्तेमाल से उस भाषा-विशेष की ओर से आम-आदमी का रूझान कम हो जाता है और उसके प्रति ‘मानसिक-विरोध’ बढ़ता है।’  खैर यह नेक सलाह हिन्दी के साहित्यकार जानें, जो अभी तो पिछले बीस बरसों से, इसी झंझट से ही बाहर नहीं आ पा रहे हैं कि किसकी कविता को ‘प्रगतिशील’ बतायें और किसकी को ‘प्रतिक्रियावादी’ ?

बहरहाल, इस ऐतिहासिक परिपत्र में भाषा की ‘कठिनता’ की समस्या का समाधान खोजते हुए, पहले काफी बड़ी ‘चिन्तन-मनन’ से भरी भूमिका भी बांधी गयी और ‘उर्दू-फारसी-तुर्की’ के शब्दों के प्रयोग की बात कुछ ऐसे सदाशयी अंदाज में पूरे भोलेपन के साथ कही गयी है कि जैसे वे कोई नयी बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि यहाँ वे बस ‘गांधी-नेहरू’ वाली ‘बोलचाल’ की भाषा की बात को ही विनम्रता के साथ फिर से दोहरा रहे हैं।

लेकिन, मित्रो, हकीकत यह है कि ‘उर्दू-फारसी-तुर्की’ के शब्दों के शामिल किये जाने की बात से तो सिर्फ ‘बहाना’ बाहर आ रहा है, जबकि बुनियादी रूप से उनका मंसूबा सिर्फ ‘अंग्रेजी’ के शब्दों को शामिल करने का ही है। क्योंकि,  उन्होंने परिपत्र में जो अनुकरणीय उदाहरण दिया है, उनकी असली इच्छा ‘राजभाषा’ को उसी ‘रूप’ की ओर हाँकने की ही है, जिसको उन्होंने ‘प्रत्यक्ष विदेशी निवेश’ पाते ही ‘धन्धों में धुत्त’ हो चुके अखबारों से ही उठा कर उसे उदाहरण के रूप में रखा है। और पिछले वर्षों से हिन्दी के अखबारों के महानगरीय संस्करणों में यह ‘भाषा-रूप पाठकीय’ इच्छा के विरूद्ध चलाया जा रहा है।  लेकिन पूरे परिपत्र में वे कहीं भी साफ-साफ ‘हिंग्लिश’ नहीं कहना नहीं चाहते। जबकि वे हिन्दी को ‘हिंग्लिश’ में बदलने का स्पष्ट संकल्प ले चुके हैं और ऐसा करना उनके लिये इसलिए भी जरूरी है कि उनकी यह विवशता है। चूंकि भारत में ‘विदेश से हासिल होने वाली आवारा पूँजी’ की यह अघोषित शर्त है। यहाँ यह याद रखा जाना जरूरी है कि यह पूँजी, केवल पूँजी की तरह नहीं आती है, वरन, वह सांस्कृतिक माल के लिये जगह बनाती हुई आती है।

कहने की जरूरत नहीं कि परिपत्र को पढ़ते ही अंग्रेजी के अखबारों ने उनके इस नेक इरादे को इसीलिए ही तुरन्त पढ़ लिया और उनकी बाँछें खिल गयीं। उन्होंने इस परिपत्र के स्वागत के उत्साह में प्रथम-पृष्ठ की खबर बनाते हुए कहा कि सरकार ने ‘देर आयद दुरूस्त आयद’ की तरह खुद को आखिरकार ‘अमेण्ड’ किया और देश के विकास के पक्ष में ‘हिंग्लिश’ के लिए रास्ता खोल ही दिया है। अंग्रजी अखबारों की सुर्खियां बनीं- ‘ हिंग्लिश गेन्स रेस्पेक्टैबिलिटी’। ‘हिंग्लिश गेन्स ग्राउण्ड इन इण्डिया’। ‘हिंग्लिश विल बी द ऑफिशियल लैंग्विज ऑव इण्डिया’। इन शीर्षकों में वस्तुतः अंग्रेजी-विजय की ही प्रतिध्वनियाँ हैं।

बहरहाल, यह सच अब किसी से भी छिपा नहीं रह गया है कि ‘बहुराष्ट्रीय-निगमों’ की ‘सांस्कृतिक-अर्थनीति’ के दलालों द्वारा भारत में ‘भूमण्डलीकरण’ के शुरू होते ही लगातार इस बात की वकालत की जाती रही है कि भारत में ‘अंग्रेजी’ किसी भी तरह देश की प्रथम-भाषा का ‘वैध’ स्थान प्राप्त कर ले। इसके लिए उन्होंने ‘विश्व हिन्दी सम्मेलन’ की तर्ज पर उससे भी कहीं ज्यादा धूम-धड़ाके वाला एक आयोजन, जो ‘माइका’ द्वारा प्रायोजित था, मुम्बई में किया, जिसमें गिरहबान पकड़ कर भारतीयों को बताया जाता रहा कि ‘भारत का भविष्य हिन्दी नहीं, हिंग्लिश में है’ और इससे नाक-भौंह सिकोड़ने की जरूरत नहीं, क्योंकि इसमें भी शेक्सपीयर पैदा हो जायेगा, और तीस वषों बाद यह ‘दुनिया की सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा’ होगी। यह बात वे किसे बता रहे हैं ? कौन नहीं जानता कि संख्या के आधार के कारण भारतीय, जो भी भाषा बोलने लगेंगे वह दुनिया की सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा अपने आप ही कह लायेगी। दूसरी बात यह कि जो अंग्रेजी दूसरा शेक्सपीयर पैदा नहीं कर पायी, वह ‘हिंग्लिश’ पैदा कर देगी ? फिर क्या भविष्य का एक काल्पनिक शेक्सपीयर भारत में पैदा हो जाये,  इसके लालच में उस भाषा को मार दें, जिसने वह यात्रा मात्र चौसठ वर्षों में पूरी कर ली, जिसे पूरी करने में अंग्रेजी को पाँच सौ वर्ष लगे ?

बहरहाल पेंगुइन प्रकाशन ने इस पूरे प्रायोजित अभियान पर केन्द्रित बड़ी-सी लगभग दो-सौ पृष्ठों की एक पुस्तक भी छापी है, ताकि भारत के उन काले अंग्रेजों को तर्कों के वे तमाम धारदार अस्त्र मिल जायें, जिनका वे जरूरत पड़ने पर अचूक इस्तेमाल जहाँ-तहाँ बहस-मुबाहिसों में कर सकें, क्योंकि निश्चय ही आगे-पीछे ‘गोबरपट्टी बनाम काऊबेल्ट’ के लद्धड़ लोग एक दिन ‘राष्ट्रभाषा’ के नाम पर एकजुट हो कर हो हल्ला मचायेंगे, तब सार्वजनिक-मंचों और छोटे पर्दे पर भाषा को लेकर होने वाली मुठभेड़ों में उन्हें विजयी बनाने में ये तर्क ही इमदाद करेंगे। लेकिन  इस परिपत्र के प्रकाशन के बाद हिन्दी-पट्टी में कहीं कोई चूं-चपड़ तक नहीं हुई, इस बात पर भी खुल कर प्रसन्नता प्रकट की गयी।

दूसरी ओर ‘धंधे में धुत्त’ हिन्दी के सामान्य से अखबारों ने आमतौर पर तथा उन अखबारों ने, जिन्होंने उदारीकरण के बाद ‘प्रत्यक्ष विदेशी निवेश’ पर अपना साम्राज्य खड़ा किया है, उन्होंने खासतौर पर, ठीक ऐसी ‘छुपाये न छुपने वाली’ खुशी के साथ परिपत्र की अगुवाई की जैसे भारत और अमेरिका के बीच परमाणु सौदा सुलट गया है। बड़े-बड़े और लम्बे सम्पादकीय रगड़ते हुए उन्होंने अपने पाठकों को बताया कि जो काम इस सरकार ने कर दिखाया, वह उसकी शक्तिशाली राजनीतिक इच्छा का प्रमाण है। यह एक बहुप्रतीक्षित और अनिवार्य कदम था। हालाँकि  उन्होंने भी इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखा कि उनकी टिप्पणी में भूले से भी कहीं ‘हिंग्लिश’ शब्द ना आ जाये। उन्हें चिन्ता भी थी कि सामान्य पाठक को इस परिपत्र  के अप्रकट आशय की भनक भी न लगे।

लेकिन, भाषा की ‘ऐतिहासिक-सामाजिक-सांस्कृतिक’ और ‘आर्थिक’ भूमिका के परिप्रेक्ष्य को अपेक्षित गहराई से समझने वाले दूरदृष्टा लोग, इस परिपत्र को किसी सरकारी कार्यालय के कारिन्दे द्वारा गाहे-ब-गाहे जारी कर दिया जाने वाला रस्मी ‘कागद’ नहीं, बल्कि भारतीय-भाषाओं के क्षेत्र में परमाणु सौदे से भी ज्यादा उलटफेर करने वाला ‘अस्त्र’ मान रहे हैं। तीन-सौ वर्षों के गुलामी के दौर में भारतीय भाषाओं का जितना नुकसान अंग्रेजों ने नहीं किया, उससे ज्यादा बड़ा नुकसान भारत-सरकार का गृह-मंत्रालय, इस परिपत्र  के जरिये करने वाला है। क्योंकि वे जानते हैं कि यह हिन्दी ही नहीं, अन्य भारतीय भाषाओं को भी जल्दी ही विघटित कर देगा। क्योंकि उन राज्यों की वे क्षेत्रीय भाषायें, संविधान की आठवीं अनुसूची वाली भाषायें हैं। निश्चय ही वहाँ भी यह फरमान तमिल को ‘तमलिश’ बांग्ला को ‘बांग्लिश’  बनाने का काम करेगा । वैसे इन भाषाओं के अखबार भी ये काम शुरू कर ही चुके हैं। यहाँ यह याद रखा जाना चाहिए कि दक्षिण की भाषायें अपनी वैकल्पिक-शब्दावली की तलाश में उर्दू-फारसी-तुर्की की तरफ नहीं जातीं। चूंकि वे अपना रक्त-सम्‍बन्‍ध संस्कृत से ही बनाती आयी हैं, अतः वे संस्कृत की तरफ जाती हैं। लेकिन इनके बोलने वालों के भीतर छुपे अंग्रेजी के दलालों की फौज- दलीलें देने के लिए आगे आयेगी कि जब भारत-सरकार द्वारा हिन्दी को हिंग्लिश बनाया जा रहा है, तब तमिल को ‘तमिलिश’ बनाने का अविलम्ब रास्ता खोल दिया जाना चाहिये, ताकि उसका भी आम-आदमी के हित में सरलीकरण हो सके। दरअसल हिन्दी के संस्कृतनिष्ठ-रूप का आग्रह तो दक्षिण ही सबसे ज्यादा करता रहा आया है।

कुल मिलाकर, इस महाद्वीप की सारी की सारी भाषाओं के निर्विघ्न विसर्जन का एकमात्र हथियार बनने वाला सिद्ध होगा, यह परिपत्र। एक से अनेक को निपटाने का कारगर हथियार। प्रकारान्तर से यही वही औपनिवेशिक विचार का एक किस्म का अप्रकट ‘डिवाइन-इण्टरवेंशन’ है, जिसके चलते कहा गया था कि ‘प्रोलिफरेशन ऑव लैंग्विज इज पेनल्टी ऑन ह्यूमेनिटी’। भाषा-बहुलता मानवता पर दण्ड है। अतः सभी भाषायें खत्म हों और केवल एक ‘पवित्र-भाषा’ अंग्रेजी ही बची रहे। हिन्दुस्तान अपनी भाषा की बहुलता के कारण वैसे ही पाप की काफी बड़ी गठरी अपने सिर पर उठाये चला आ रहा है। बहरहाल, भाषा सम्बन्धी ऐसी ‘पवित्र वैचारिकी’ भारत-सरकार के गृह-मंत्रालय के प्रति स्वयं को निश्चय ही बहुत कृतज्ञ अनुभव कर रही होगी।

कहना न होगा कि हिन्दी की भलाई करने का मुखौटा लगा कर सत्ता में बैठे ये लोग, निश्चय ही काफी पढ़े-लिखे हैं और बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि भाषायें कैसे मरती हैं और उन्हें क्यों और किस के फायदे के लिए मारा जाता है ? बीसवीं सदी में अफ्रीकी महाद्वीप की तमाम भाषाओं का खात्मा करके उसकी जगह अंग्रेजी को स्थापित करने की रणनीति क्या थी ? यह सब इनको बखूबी पता है और वही ‘कुचाल’ उन्होंने यहाँ चली और वे अब सफलता के करीब हैं।

जी हाँ, वह रणनीति थी ‘स्ट्रेटजी ऑव लैंग्विज-शिफ्ट’। इसके तहत सबसे पहले चरण में शुरू किया जाये- ‘डिस्लोकेशन ऑव वक्युब्लरि’। अर्थात स्थानीय भाषा के प्रचलित शब्दों को वर्चस्ववादी अंग्रेजी भाषा के शब्दों से ‘विस्थापित’ किया जाये। ध्यान रखें कि ‘डिस्लोकेशन शुड बी क्वाइट स्मूथ’। अन्यथा उस भाषा के लोगों में विरोध पैदा होना शुरू हो सकता है। अतः यह काम धीरे-धीरे हो। इसको कहा जाता है- ‘काण्टा-ग्रेजुअलिज्म’। शब्दों का ‘विस्थापन’ करते हुए,  इसका प्रतिशत सत्तर और तीस का कर दिया जाये। यानी सत्तर प्रतिशत शब्द अंग्रेजी के हो जायें तथा तीस प्रतिशत स्थानीय भाषा के रह जायें। एक सावधानी यह भी रखी जाये कि इसके लिये सिर्फ एक ही पीढ़ी को अपने एजेण्डे का हिस्सा बनायें। जब उस समाज की परम्परागत-सांस्कृतिक शब्दावली जिससे उसकी भावना जुड़ी हो, और यदि उसे ‘डिस्लाकेट’ या कहें अपदस्थ करने पर उस समाज में इस नीति के प्रति कोई प्रतिरोध नहीं उठे तो मान लीजिए कि ‘दे आर रेडी फॉर लैंग्विज-शिफ्ट’। इसके बाद ‘वॉल्टेण्टअरली दे विल गिव्ह-अप देअर लैंग्विजेज’।

बस, इसी निर्णायक समय में उसकी मूल-लिपि को हटाकर  उसकी जगह ‘रोमन-लिपि’ कर दीजिए। ‘दिस विल वी द फाइनल असाल्ट ऑन लैंग्विज’। यानी भाषा की अंतिम कपाल क्रिया। हालॉकि  इन दिनों विज्ञापन व्यवसाय व मीडिया और इसी के साथ उन समाजों और राष्ट्रों की सरकारों पर ‘विश्व-व्यापार संघ’, ‘अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष’ जैसे वित्तीय संस्थानों से दबाव डाला जाता है कि ‘रोल ऑफ योर गव्हर्मेण्ट आर्गेनाइजेशंस शुड बी इनक्रीज्ड इन प्रमोशन ऑफ इंग्लिश लैंग्विज’।

कहने की जरूरत नहीं कि इनके साथ हमारा प्रिण्ट और इलेक्टॉनिक मीडिया गठजोड़ करता हुआ, यह बताता भी आ रहा है कि देवनागरी को छोड़कर रोमन-लिपि अपना ली जाय। लोगों ने अपनाना भी शुरू कर दी है। यह अंग्रेजी के उस गुण की याद दिला रहा है, जिसके बारे में शायद बर्नार्ड शॉ ने कहा था कि ‘अंग्रेजों की सबसे बड़ी विशेषता ही यह है कि वह आपको इस बात के लिए राजी कर सकते हैं कि आपके हित में आपका मरना जरूरी है।’

बहरहाल, विश्व-बैंक द्वारा ‘सर्वशिक्षा-अभियान’ के नाम पर डालर में दिये गये ऋण का ही दबाव है, जो अपने निहितार्थ में ‘एजुकेशन फॉर आल’ नहीं,  -इंग्लिश फॉर ऑल’ का ही एजेण्डा है। इसी लिये बेचारे गरीब देशभक्त सैम पित्रोदा कहते आ रहे हैं कि ‘पहली कक्षा से ही अंग्रेजी की पढ़ाई शुरू कर दी जाये’। चूँकि इससे उनके लैंग्विज-शिफ्ट वाले एजेण्डे में आसानियाँ बढ़ जायेंगी।

यह भारत-सरकार का वही नया पैंतरा है, और जो भाषा की राजनीति जानते हैं वह बतायेंगे कि यह वही ‘लिंग्विसिज्म’ है, जिसके तहत भाषा को ‘फ्रेश-लिंग्विस्टिक’ लाइफ देने के नाम पर उसे भीतर से बदला जाता है। पूरी बीसवीं शताब्दी में इन्होंने अफ्रीकी महाद्वीप की भाषाओं को इसी तरह खत्म किया। वहाँ भी शुरूआत एफ.एम. रेडियो के जरिये वहाँ के संगीत और मनोरंजन में घुसकर की गई थी। उन्होंने वहाँ पहले फ्राँस की तर्ज पर रेडियो के जरिये भाषा-ग्राम अर्थात लैंग्विज-विलेज बनाये, जिसमें स्थानीय भाषाओं में अंग्रेजी के ‘मिक्स’ से भाषा-रूप बनाया और वहाँ की युवा-पीढ़ी को उसका दीवाना बना दिया। ये अफ्रीकी भाषाओं की पुनर्रचना का अभियान था। जी हाँ, रि-लिंग्विफिकेशन, जिसकी शुरूआत हमारे यहाँ भी एफ.एम. रेडियो में अपनायी गयी प्रसारण-नीति से शुरु की गई। यह ‘आनन्द द्वारा दमन’ की सिद्धान्तिकी कही जाती है।

दरअसल, हकीकत यह है कि चीन की भाषा मंदारिन के बाद दुनिया की सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा हिन्दी से डरी हुई, अपनी ‘अखण्ड-उपनिवेश’ बनाने वाली अंग्रेजी ने ब्रिटिश कौंसिल के अमेरिकी मूल के जोशुआ फिशमेन की बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए, उदारीकरण के शुरू किये जाने के बस कुछ ही समय पहले एक ‘सिद्धान्तिकी’ तैयार की थी, जो ढाई-दशक से गुप्त थी, लेकिन इण्टरनेटी युग में वह सामने आ गयी। इसका ही नाम था रि-लिंग्विफिकेशन अर्थात ‘भाषा की पुनर्रचना’।

अंग्रेज शुरू से भारतीय भाषाओं को पूर्ण भाषा न मानकर उन्हें ‘वर्नाकुलर’ कहा करते थे। वे अपने बारे में कहा करते थे, ‘वी आर अ नेशन विथ लैंग्विज, व्हेयर एज दे आर ट्राइब्स विद डॉयलेक्ट्स’। फिर हिन्दी को तो तब खड़ी ‘बोली’ ही कहा जा रहा था। लेकिन दुर्भाग्यवश एक गुजराती-भाषी मोहनदास करमचंद गांधी ने इसे अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ाई में देश भर में ‘प्रतिरोध’ की सर्वाधिक शक्तिशाली भाषा बना दिया और नतीजतन एक ‘जन-इच्छा’ पैदा हो गयी कि इसे हम ‘राष्ट्रभाषा’ बनायें और कह सकें, ‘वी आर अ नेशन विद लैंग्विज’। लेकिन औपनिवेशिक दासता से दबे दिमागों के कारण यह ‘राष्ट्रभाषा’ के बजाय केवल ‘राजभाषा’ बन कर ही रह गयी। गांधी जी के ठीक उलट, नेहरू का रूझान शुरू से ही अंग्रेजी की तरफ ही था। चौदह अगस्त की रात में, जब वह बी.बी.सी. के सम्वाददाता को कह रहे थे कि ‘संसार को कह दो कि गांधी अंग्रेजी भूल गया है’ तो यह एक भाषा-समर की घोषणा थी, जबकि नेहरू एक नव-स्वतन्त्र राष्ट्र की संसद में अंग्रेजी में भाषण दे रहे थे। लेकिन गांधी ने हिन्दी को ‘राष्ट्रभाषा’ बनाने की बात कर के उसे भारतीय-राजनीति का हमेशा के लिये सालते रहने वाला कांटा बना दिया।

बहरहाल, चौंसठ वर्षों से सालते रहने वाले उस पुराने कांटे को अब निकाला जा सका है।

बहरहाल यह चमत्कार सा ही है कि अभी पाँच साल पहले तक हिन्दी में जो शब्द चिर-परिचित थे, अचानक ‘अबोधगम्य’ और ‘कठिन’ हो गये। एक और दिलचस्प बात यह कि हममें ‘राजभाषा’ के अधिकारियों की भर्त्‍सना की बड़ी पुरानी लत है और उसमें हम बहुत आनन्द लेते हैं,  जबकि हकीकतन वह सरकारी केन्द्रीय कार्यालयों का सर्वाधिक लतियाता जाता रहने वाला नौकर होता है। उसको ज्यादातर दफ्तरों में जनसम्पर्क के काम में जोत कर रखा जाता है। कार्यालय प्रमुख की कुर्सी पर बैठा अधिकारी उसे सिर्फ हिन्दी पखवाड़े में पूछता है और जब ‘संसदीय राजभाषा समिति’, जो दशकों से खानापूर्ति के लिए आती रही है, के सामने बलि का बकरा बना दिया जाता है। यह परिपत्र भी उन्हीं के सिर पर ठीकरा फोड़ते हुए बता रहा है कि हिन्दी के जो शब्द कठिन हैं, इनकी ही अकर्मण्यता और कारस्तानी के कारण है। और जबकि  इतने वर्षों में कभी पारिभाषिक शब्दावली का मानकीकरण सरकार द्वारा खुद ही नहीं किया गयात्र हर बार बजट का रोना रोया जाता रहा। जबकि अंग्रेजी के लिये सरकार के खजाने की थैली हमेशा खुली रही है।

कहने की जरूरत नहीं कि यह इस तथाकथित भारत-सरकार (जबकि गव्हर्मेण्ट ऑफ इण्डिया सरल शब्द है) का इस आधी शताब्दी का सबसे बड़ा दोगलापन है, जो देश के एक अरब बीस करोड़ लोगों को अंग्रेजी सिखाने की महा-खर्चीली योजना का संकल्प लेती है, लेकिन साठ साल में वह देश को मुश्किल से हिन्दी के हजार-डेढ़ हजार पारिभाषिक-शब्द नहीं सिखा पायी ? और अब उसे उन्हें सरल बनाने के लिए अंग्रेजी के सामने धक्का देना पड़ा है।

दरअसल, सरल-सरल का खेल खेलती हुई वह किसे मूर्ख बनाने की कोशिश कर रही है ? वह ‘राजभाषा’ के नाम पर देश के साथ सबसे बड़ा छल कर रही थी।

यह बहुत नग्न-सच्‍चाई है कि यह देश, अपने ‘कल्याणकारी राज्य’ की गरदन कभी का मरोड़ चुका है और कार्पोरेटी संस्कृति के सोच को अपना अभीष्ट मानने वाले अरबों के आर्थिक घोटालों से घिरे सत्ता के कर्णधारों को केवल ‘घटती-बढ़ती दर’ के अलावा कुछ नहीं दिखता। ‘भाषा’ और ‘भूगोल’ दोनों उनकी चिन्‍ता के दायरे से बाहर हैं। निश्चय ही इस अभियान में हमारा पूरा मीडिया भी शामिल है, जिसने ‘नव-उपनिवेशवादी’ मंसूबों के इशारों पर सुनियोजित ढंग से ‘यूथ-कल्चर’ का राष्ट्रव्यापी मिथ खड़ा किया और अंग्रेजी और ‘पश्चिम के सांस्कृतिक-उद्योग’ में ही उन्हें उनका भविष्य बताने में जुट गया। यह मीडिया द्वारा अपनाई गई दृष्टि उसी ‘रॉयल चार्टर’ की नीति का कार्यान्वयन है, जो कहता है, ‘दे शुड नॉट रिजेक्ट अवर लैंग्विज एण्ड कल्चर इन फेवर ऑफ देअर ट्रेडिशनल वैल्यूज। देअर स्ट्रांग एडहरेन्स टू मदर टंग हैज टू बी रप्चर्ड’। इसलिए उनमें एक ‘अविवेकवाद’ पैदा किया गया ताकि वे भारतीय भाषाओं को विदा करने में देश की तरक्की के सपने देखने लगें।

कहना न होगा कि ‘लैंग्विजेज शुड बी किल्ड विथ काइण्डनेस’ की रणनीति का यह प्रतिफल है, परिपत्र। इसे हिन्दी के ताबूत में आखिरी कील समझा जाना चाहिए और इसकी चौतरफा तीखी आलोचना और भर्त्‍सना तक की जाना चाहिए और कहा जाना चाहिए कि वे इसे अविलम्ब वापस लें। क्योंकि सरकार की नीति का खोट खुलकर सामने आ चुका है। परिपत्र इस का प्रमाण-पत्र है। अंग्रेजी अखबार जिसे पढ़ कर साफ-साफ बता रहे हैं, वहीं हिन्दी के अखबार उसे छुपा रहे हैं। वास्तव में, ऐसा करते हुए वे आग के आगे पर्दा खींच रहे हैं। यह निश्चय ही राष्ट्र के साथ पत्रकारिता का सबसे बड़ा धोखा कहा जायेगा। हम इस लांछन के साथ इस संसार से बिदा नहीं होना चाहेंगे कि ‘प्रतिरोध की सर्वाधिक चिंतनशीलभाषा’ का एक सांस्कृतिक-रूप से अपढ़ सत्ता ने हमारे सामने गला घोंटा और हम चुपचाप तमाशबीनों की तरह देखते रहे और कोई प्रतिरोध नहीं किया। जबकि  इस परिपत्र के सहारे तमाम भारतीय भाषाओं की पीठ में नश्तर उतार दिया जाना है। यह ‘सरलता के सहारे’ चुपचाप तमाम भारतीय भाषाओं की हत्या के लिए की जा रही जघन्य हिकमत है। ऐसे में हमारी चुप्पी हमें भी हत्यारों की फेहरिस्त में शामिल लोगों के साथ खड़ा कर देगी।

भाषा मनुष्य का सामाजिक-सांस्कृतिक आविष्कार है। ‘सम्प्रेषण’ के साथ ही ‘संस्कृतीकरण’ के मार्ग को इसी ने प्रशस्त किया। वह चिन्तन प्रक्रिया का हिस्सा भी है। जिस राष्ट्र के पास अपनी कोई भाषा नहीं, वह सांस्कृतिक रूप से अनाथ ही होगा। ‘अपनी भाषा में ही अपना भविष्य’ खोजने वाले चीन और जापान, जिनकी भाषायें ढाई हजार चिन्हों की चित्रात्मक लिपि वाली हैं और उसी में उन्होंने बीसवीं शताब्दी का सारा ज्ञान-विज्ञान विकसित कि‍या और आज वे सभी क्षेत्रों में लगभग निर्विवाद रूप से अपराजेय हैं। कन्नड़ सीख कर चपरासी की भी नौकरी नहीं मिल सकती का तर्क देकर भाषा को खत्म करने के लिए लोग हिन्दी के भी बारे में यही बात बोलते हुए उसके संहार के सरंजाम जुटा रहे हैं, जबकि हिन्दी में यदि हम अपने पड़ोसियों से ही व्यापार-व्यवसाय शुरू करने लगे तो हिन्दी अच्छी खासी कमाने वाली भाषा बन सकती है। ‘भाषा का अर्थशास्त्र’ खंगालकर यह बताया जा सकता है कि जब मनोरंजन के कारोबार’ में वह कमा रही है तो वह दूसरे क्षेत्रों में भी उतनी ही कमाऊ सिद्ध हो सकती है। लेकिन,  दुर्भाग्य यह कि हमने पूरे भारतीय समाज को कभी भी अंग्रेजी के औपनिवेशक शिकंजे से मुक्त होने ही नहीं दिया या हमें हमारी सत्ताओं ने नहीं होने दिया। नेहरू ने अपनी असावधानी के क्षणों में,  जो बात राष्ट्र-संघ के राजनय जॉन ग्रालब्रेथ के सामने लगभग पश्चात के स्वर में कही थी कि ‘आयम द लास्ट इंग्लिश प्राइम मिनिस्टर टू रूल इण्डिया’। पर उन्हें कहाँ मालूम था कि ‘नेहरू, तो फिर भी गाँव-गाँव धूल धक्कड़ खाकर घूमते हुए हिन्दी में ही बोलते-बतियाते प्रधानमंत्री थे’, लेकिन अब देश के पास बाकायदा अंग्रेज तो नहीं,  पर अंग्रेजी-प्राइममिनिस्टर तो है ही, जो संसद और अपनी पत्रकार वार्ताओं में भूल से भी हिन्दी शब्द नहीं बोलता। उसके पास हिन्दी लाल किले की सीढि़यों पर अपने रेडिमेड रूप में आती है। उसकी दृष्टि में वहाँ हिन्दी-भाषा, देश का गौरव नहीं,  राजनीति का रौरव है। और वे इस देश को वर्नाकुलर भाषाओं के नर्क से निकालना चाहते हैं।

अन्त में,  मैं सारे ही देशवासियों से कहना चाहता हूँ कि ये मसला केवल हिन्दी भाषा-भाषियों का नहीं है, बल्कि ‘सम्पूर्ण भारतीय-भाषाओं’ का है। क्योंकि बकौल राहुल देव के हमें ये अच्छी तरह से ये जान लेना चाहिये कि ‘हमारा भविष्य हमारी भाषाओं में ही है’। इसलिये इस नीति का खुल कर विरोध करें। और राजभाषा-विभाग को अपनी असहमति प्रकट करते हुए ई-पत्र लिखें। क्योंकि अफ्रीका में वह ‘किलर-लैंग्विज’ की तरह पहचानी जा चुकी है। उसके मुँह से खून की बू आ रही है। वे अंग्रेजी को पिंजरे से बाहर निकाल कर, कुछ इस तरह खुला छोड़ना चाहते हैं कि वह हिन्दी ही नहीं, तमाम भारतीय भाषाओं के शब्द-शब्द नोंच खायें।

दुनिया नाक रगड़ कर हिंदी के पास आएगी : अरविंद कुमार

पेंगुइन वाले कोश के विमोचन पर बोलते अरविंद कुमार

ऐसे सौभाग्यशाली लोग बहुत ही कम होते हैं जिन्हें अपने सपने साकार करने में पूरे परिवार का निरंतर सहयोग मिले। विशेषकर ऐसे जोख़िमभरे सपने जिस में स्वप्नद्रष्टा को अपनी अच्छी भली नौकरी छोड़नी हो, अनुदान तो दूर की बात है, कहीं से कैसी भी आर्थिक सहायता न मिलने वाली हो, जिनका पूरा होना भी अनिश्चित हो। इतना ही नहीं, जिसके रास्ते में एक के बाद एक भारी से भारी अड़चन आती रहे, फिर भी किसी का मनोबल न टूटे, ऐसी मिसालें दुनिया में कुछ कम ही हैं। अरविंद कुमार ऐसे ही सौभाग्यशाली व्यक्ति हैं। प्रस्तुत हैं उनसे अनुराग की बातचीत के कुछ अंश-

आपको शलाका सम्‍मान प्रदान किया गया। आपकी क्‍या प्रतिक्रिया है?

कभी सपने में भी कल्पना नहीं थी कि मेरे साथ ऐसा कुछ होगा। ग़ालिब के शब्दों में इतना ही कह सकता हूं– बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा। हिंदी अकादेमी के उपाध्यक्ष श्री अशोक चक्रधर और उनके चयन मंडल ने मुझे इस योग्‍य समझा—चमत्कृत हूं और बहुत प्रसन्न।

आपको यह नहीं लगता कि भाषा के क्षेत्र में जितना काम किया है, उस हिसाब से आपको समुचित मान-सम्‍मान नहीं मिला ?

काम करने वाले का काम है काम करना, मान-सम्मान करने वाले का काम है मान-सम्मान करना। उनके बारे में मियाँ ग़ालिब के ही अल्फ़ाज़ हैं– चाहिए अच्छों को जितना चाहिए, वे अगर चाहें तो फिर क्या चाहिए। इसका संदर्भ तो बिल्कुल दूसरा है, पर सम्मान देने वालों पर भी चस्पाँ होता है।

जब पंद्रह साल की उमर में बालश्रमिक के रूप में छापेख़ाने में दाख़िल हुआ, तभी से मेरे लिए काम, अपने आप में सम्‍पूर्ण आत्मसम्मान रहा है। कभी किसी से कोई गिला नहीं किया। सन् 45 में ही मैं करोलबाग़, दिल्ली के कांग्रेस सेवादल और आज़ादी के दीवाने एक उग्र दल ‘लालक़िला ग्रुप’ का सदस्य बन गया था। सन् 47 में देश आज़ाद हुआ तो मुझ जैसे कुछ दोस्तों ने देशभक्ति की एक परिभाषा गढ़ी। वह यह कि हर काम मेहनत से करना, ईमानदारी से करना ही 47 के बाद देशभक्ति का पैमाना है। मैं अभी तक उस पर क़ायम हूँ—हर नारेबाज़ी से दूर, जितना कर सकता हूँ, करता हूँ। दूसरों की बात दूसरे जानें।

समांतर कोश’, ‘द पेंगुइन इंग्लिश हिंदी/हिंदी इंग्लिश थिसारस एंड डिक्‍शनरीऔर अब अरविंद लैक्सिकन। क्‍या इन सबके लिए आपको किसी संस्‍थान या सरकार से आर्थिक सहायता या अन्‍य तरह की मदद मिली ? आपने इसके लिए कभी कोशिश की ? इसे लेकर आपको किस तरह के अनुभव हुए।

शुरू में, यानी 1973-74 में कई जगह कोशिश की। किसी-न-किसी बहाने टाल दिया गया। हिंदी के किसी काम के लिए कुछ माँगना सब से बड़ी ज़लालत है। अगर कोई कुछ देता भी है तो पहले सारे काम का श्रेय लेना चाहता है, फिर किसी-न-किसी बहाने टालता रहता है। सहायता के पीछे भागते-भागते न जाने कितना समय निकल जाता। मैंने सोचा, चलो समुद्र में कूद पड़ते हैं, जो होगा देखा जाएगा। एक सहारा बिल्कुल अपना था। दिल्ली के मॉडल टाउन में अपना मकान था। रहन-सहन सादा था। मुंबई में ‘माधुरी’ के संपादन काल की थोड़ी-बहुत बचत थी। सोचा था कि दो साल में थिसारस बनाने का काम पूरा हो जाएगा।

पर ऐसा हुआ नहीं। कहावत है सिर मुँडाते ही ओले पड़े। मुझ पर ओले नहीं पड़े, बारिश पड़ी। 1978 की 21 मई को दिल्ली पहुँचे थे। कुछ ही महीने बीते थे। 4 सितंबर को यमुना की मैनमेड भारी बाढ़ ने हमारे घर को सात फ़ुट तक ग़र्क़ कर दिया। मुंबई का जो भी थोड़ा-बहुत अच्छा सामान था, यमुना में बह गया। घर माँ-बाप और भाई और उसकी पत्नी के लिए छोटा था। बस, यही हमारा तारनहारा बना। ‘समांतर कोश’ का काम हम कार्डोँ पर कर रहे थे। मकान में ऊपर ज़ीने के रास्ते में छः फ़ुट ऊँची, गरमी में आँवे जैसी तपती मियानी थी। वहीं कार्ड जमाए थे। यमुना मैया वहाँ तक नहीं गईं। हमारा भविष्य बच गया। वहीं पूरा टब्बर पाँच दिन टंगा रहा। चारों ओर पानी था। हम बिना किसी ख़र्चे के वैनिस में रहने का मज़ा उठाते रहे। चारों तरफ़ कामचलाऊ किश्तियाँ चलती देखते रहे।

मेरा विश्वास है कि ‘समांतर कोश’ ने अपने होने का संकल्प कर लिया था। वह अपने को तो बचाता रहा, और इसके लिए हर क़दम पर मेरी रक्षा करता रहा।

हिंदी की व्यापारिकता और हिंदी के नाम पर सरकारी तंत्रोँ की कृपणता कई बार दयनीय लगती है। स्वयं हिंदी वाले इसमें आगे बढ़ कर हिस्सा लेते हैं, और हिंदीवालों के शोषण में सहभागी बनते हैं। एक कारण यह है कि हम हिंदी वाले अपना अवमूल्यन आप करते हैँ। हिंदी को इंग्लिश से हीनतर समझने की आदत हमें पड़ गई है। अपने 65 साल के प्रिंटमीडिया और अब कंप्यूटर पर काम के बल पर मैँ कह सकता हूँ कि हम अंगरेजी वालोँ से कहीँ आगे और बढ़ कर हैं।

जब ‘समांतर कोश’ प्रकाशित हुआ तो DOE नाम की एक सरकारी संस्था की ओर से मुझे फ़ोन मिला। फ़ोन पर ही उसे इंटरनेट पर डालने की अनुमति तत्काल चाहते थे। मैंने पछा, ‘बीस-पच्चीस साल के तनदेही के बदले मुझे क्या मिलेगा।’ जवाब मिला, ‘कुछ नहीं। आप यह कोश जनहित में सरकार को दे दीजिए!’ मैँ हक्का बक्का रह गया। फिर एक पल बाद मैंने हिंदी के उन लाभभोक्ता से पूछा कि ‘क्या आप महान जनहित वाली नौकरी अवैतनिक कर रहे हैं। चलिए नहीं, तो भी क्या आप भविष्य में पगार लेना बंद कर देंगे। यदि हाँ तो मैं जनहित के लिए यह कोश सरकार को देने के लिए तत्पर हूँ।’ उधर से फ़ोन काट दिया गया।

इसी प्रकार अब मेरे ई-कोश के लिए मेरी बेटी ने उस विभाग से संपर्क किया। अब भी वही उत्तर था ‘अरविंद लैक्सिकन आप हमें जनहित में दे दीजिए…’

अरविंद कुमार का परिवार– ऊपर बाएं पुत्र सुमीत कुमार, बेटी मीता लाल, दामाद अतुल बिहारी लाल। नीचे बीच में अरविंद कुमार और कुसुम कुमार, बाएँ धेवती तन्वी, दाहिने धेवता अक्षय

जो काम कोई संस्था नहीँ कर सकी, आप ने कर दिखाया। कैसे इतना बड़ा काम कर सके ?

किसी संस्था ने यह काम नहीं किया तो कारण यह था कि किसी संस्था ने ऐसा करने का विचार नहीं किया। भारत सरकार ने कोश निर्माण के लिए कई संस्थाएँ बनाई थीं। जहाँ तक मुझे पता है, किसी के पास ऐसा कार्यक्रम नहीं था। अगर कोई संस्था इसमें लगती तो जो होता वह मैंने जापान में देखा है। 1997 में मुझे वहाँ की भाषा संस्था के निमंत्रण पर विश्‍व में थिसारसों की विशाल गोष्ठी में जाना पड़ा। उस संस्था ने 200 लोगों के स्टाफ़ के साथ लगभग बीस साल में जो थिसारस बनाया था, वह समांतर कोश के सामने पिद्दी-सा था। मेरे पास उनका थिसारस है। शायद अब दस-बारह साल में वह कुछ बड़ा हो गया हो।

आपकी दिनचर्या क्‍या है?

आज जब डाटा का काम एक तरह से पूरा हो चुका है, उसमेँ एक-एक अभिव्यक्ति संस्करणानुसार क्रमांकित हो चुकी, तो भी काम को पूरी तरह पूरा नहीं माना जा सकता। मूल डाटा में शब्दकोशोँ जैसी परिभाषाएँ नहीँ थीँ। आख़िर हम तो थिसारस बना रहे थे, न कि शब्दार्थ कोश। पर अब मुझे लगा कि सभी मुखशब्दों या शीर्षशब्दोँ की हिंदी और इंग्लिश परिभाषाएँ जोड़ दी जाएँ तो ‘अरविंद लैक्सिकन’ और भी उपयोगी हो जाएगा। यह काम अब धीरे-धीरे चल रहा है। लगभग 15 प्रतिशत काम हो गया है। शेष भी कालांतर में हो जाएगा। ऑनलाइन संस्करण का सबसे बड़ा लाभ ही यह है कि इसकी सामग्री जब चाहे परिष्कृत होकर सभी उपभोक्ताओँ को मिल जाती है।

आज भी अकसर मैं सुबह सबेरे पाँच बजे उठ जाता हूँ। आचमन आदि से निवृत्त होकर कंप्यूटर के सामने आ बैठता हूँ। बीच-बीच मेँ नहाने के लिए, नाश्ते के लिए, खाने के लिए ब्रेक लेता रहता हूँ। इससे काम की ऊब से आराम मिल जाता है।

शाम के समय, सात बजते-बजते टीवी के सामने जा बैठता हूँ, तथाकथित सस्ते सोप आपेरा यानी सीरियल सपत्नीक देखता हूँ। इसी बीच शाम का खाना भी हो जाता है।

और हाँ, जब से हमारे इलाक़े में बहुत सारे मल्टीप्लैक्स सिनेमा खुल गए हैँ, तो जब भी मन करता है फ़िल्म देख आते हैं। हर तरह की, अच्छी हो या बुरी– इससे कोई मतलब नहीँ होता। घर से निकलने का बहाना भर होता है। जब तब कोई रंगमंचीय नाटक। या कोई साहित्यिक गोष्ठी- यह बहुत ही कम।

थिसारस की रचना प्रक्रिया क्‍या है। मसलन आप शब्‍दों को कहां-कहां से और कैसे ढूंढते हैं। उनसे जुडे़ शब्‍दों को कैसे ढूंढते हैं। शब्‍दों के बीच के संबंध को ध्‍यान में रखकर उन्‍हें कैसे क्रम देते हैं ?

पहले हमें थिसारस और शब्दकोश का अंतर समझना चाहिए।

थिसारस को हम शब्द सूची भी कह सकते हैं। बस, फ़र्क़ यह है कि इसमें शब्दों का संकलन संदर्भ क्रम से किया जाता है। यह संदर्भ क्या हो, यह तय करना बड़ी टेढ़ी खीर है। अपने अनुभव से बताता हूँ। मूर्खतावश मैंने जब दो साल मेँ हिंदी का थिसारस बना डालने की बात सोची थी, तो रोजेट के थिसारस के आधार पर। मुझे लगा था कि उसका संदर्भ क्रम तो बना बनाया है, उसी के खाँचों में हिंदी के शब्द डालने ही तो हैं। पर बाबा रे, ऐसा संभव नहीं था।

हमने हिंदी कोशोँ के ‘अ’ से शब्द खोजने शुरू किए और उन्हें रोजेट के खाँचों में डालना चाहा तो पता चला कि वहाँ उनके उपयुक्त आर्थी कोटियाँ थीं ही नहीं। वे संदर्भ, वे भाव ही वहाँ नहीं थे। भारत के लिए वह मॉडल बेकार था। हमारे पैरों तले से ज़मीन खिसक गई।

उसका थिसारस 1852 में बना था। 20वीं सदी का साठादिक दशक आते-आते उसके बृहद संस्करण बनने लगे। तब तक रोजेट का क्रम अधूरा मालूम पड़ने लगा था। मूल में कुल छः मुख्य विभाग थे। उनमें दो और जोड़े गए। खेद की बात यह है कि इन बृहद् तथाकथित अंतरराष्ट्रीय संस्करणोँ की रचना रोजेट के उत्तराधिकारियोँ से फ़्रैंचाइज़ लेकर कई प्रकाशकों द्वारा संपादक नियुक्त करवा के की गई। इन लोगों ने ऊपरी टीमटाम मात्र की। इधर-उधर किसी ऐंट्री की क्रम संख्या बदल दी गई– किसी अन्य प्रकाशक का कापीराइट ब्रेक करने भर के लिए। मूल आधार रोजेट का वही पुराना संदर्भ क्रम रहा।

रोजेट वैज्ञानिक थे, और उनका वर्गीकरण विज्ञान पर आधारित था। पर मानव मन वैज्ञानिक वर्गीकरण थोड़े ही जानता है! आम आदमी के लिए गेहूँ का संबंध अनाजों से है। विज्ञान में गेहूँ एक घास है। अतः रोजेट में गेहूँ, केला और घास एक साथ हैं। यह क्रम आम आदमी के काम का हो ही नहीँ सकता। हम स्टील या इस्पात की बात करते हैं, दिमाग़ में लोहा भी आता है। पर रोजेट में इन दोनों में कोई रिश्ता नहीं है। लोहा धातुओं में है,  इस्पात एलौय के अंतर्गत। शेर बिल्ली के साथ है,  रीछ आदि वन्य पशुओं के साथ नहीं।

जब यह आधार छिन गया, तो हमने सोचा कि कोई बात नहीं। हमारा अपना छठी सदी का सुप्रसिद्ध ‘अमर कोश’ तो है ही। उसी को मॉडल बना लेते हैं। यह विचार और भी लचर निकला। कहाँ छठी सदी का वर्णाश्रम से ग्रस्त समाज और कहाँ आज का भारत। ‘अमर कोश’ में संगीत तो नैसर्गिक गतिविधि निकली, गायक शूद्र। कैसे संबंध बैठाएँ, कैसे कहाँ जोड़ें!

आपने अभी बताया कि रोजेट का खाँचा काम नहीं आया और न ही अमर कोश का। ऐसे में आपने कौन-सा तरीका अपनाया?

हम तो एक तरह से मर ही गए थे। कहाँ दो साल में काम पूरा करने की बात सोची थी, कहाँ कामचलाऊ क्रम की तलाश में ही चौदह साल निकल गए। बस,  इतना था कि हमने शब्दों का संकलन एक दिन के लिए भी नहीं रोका। हर विषय और उसके उपविषय के कार्ड एक स्वतंत्र ट्रे में रखते गए। ट्रे हमने अपनी ज़रूरत के हिसाब से बनवाई थीं, और कार्ड भी अपने काम के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किए थे। संदर्भ क्रम बदलना होता तो ट्रेओं का क्रम बदल देते। इसे ही मैँ अपनी शब्दोँ को कोई क्रम देने की तलाश की प्रक्रिया कह सकता हूँ। यह आसान सा तरीक़ा ही हमारे काम आया।

थिसारस का विचार आपके मन में कब आया और आपको यह काम इतना महत्‍वपूर्ण क्‍यों लगा कि आपने जमी-जमाई नौकरी छोड़ दी और अपना जीवन थिसारस को समर्पित कर दिया।

मैं आपको 22-23 साल के एक लड़के से मिलवाता हूँ। इससे पहले वह ‘सरिता’ पत्रिका में उपसंपादक था। शाम के समय सांध्य कॉलेज में पढ़ रहा था। बीए में पहुँचा, और मालिक तथा संपादक विश्‍वनाथ जी ने उसकी इंग्लिश के साथ-साथ विश्‍व साहित्य में रुचि देखी तो ‘कैरेवान’ (CARAVAN) में उप संपादक बना दिया। सबसे पहला काम था- सरिता की हिंदी कहानियों का इंग्लिश अनुवाद। साथ-साथ प्रकाशनार्थ आई इंग्लिश रचनाओं को पढ़ना, लेखकों से वांछित विषयों पर लिखवाना, और छपने के लिए तैयार करना। वह ठहरा नौसिखिया! बहुत से शब्द तो वह जानता ही नहीं था। हिंदी से अनुवाद करना हो या किसी इंग्लिश शब्द को बदल कर बेहतर करना हो, तो शब्द संपदा समृद्ध चाहिए। तभी किसी ने उससे रोजेट का थिसारस ख़रीदने को कहा। वह मगन हो गया, उसका दीवाना हो गया। जब वह ‘सरिता’ में था तो इंग्लिश से हिंदी अनुवाद भी करता था। तब हिंदी शब्द नहीं मिलते थे। इसीलिए रोजेट देखते ही वह सोचने लगा कि ऐसी कोई किताब हिंदी में होनी चाहिए।

लेकिन वह जो लड़का था, जिससे मैंने आपको अभी मिलवाया, वह लड़का मैं था। मैं यह हिमाक़त सोच ही नहीं सकता था कि मैं वैसी कोई किताब बनाऊँ। मैं तो यही सोचता था, सोचता क्या था, मुझे पूरा भरोसा था कि तब (बीसवीं सदी के पचासादि दशक में) हिंदी शब्दावली बनाने के जो ताबड़तोड़ प्रयास हो रहे थे, उन्हीं में से हिंदी का थिसारस भी कभी-न-कभी निकलेगा ही। मैं तो अपने काम को बेहतर करने में लगा रहा। मेहनत कर रहा था, तो तरक्क़ी भी होती रही। लेकिन कभी इतना भी नहीं सोचा था कि मैं उस समूह की सभी पत्रिकाओं का एग्ज़क्टिव सहायक संपादक बन जाऊँगा। इस सैंस में मेरी कोई महत्वाकांक्षा कभी नहीं रही। अगर भविष्य की कोई तस्वीर मन में थी थी तो बस यही कभी-न-कभी कंपोज़िंग विभाग का फ़ोरमैन बन पाऊँगा। बस, काम करता रहा, बढ़ता गया, बढ़ता क्या गया, बढ़ाया जाता रहा।

1973 तक वह लड़का 43 साल का अधेड़ हो चुका था। ‘माधुरी’ जैसी यशस्वी और लोकप्रिय पत्रिका का प्रथम संपादक बन चुका था। लेकिन दस साल वहाँ रह कर ऊब चुका था। बार-बार वह सोचता कि क्या इसीलिए पैदा हुआ हूँ। क्या यही उस की नियति है। और तब फ़िल्मी दुनिया की चकाचौंध भरी पार्टियों से परेशान थका-हारा वह 25-26 दिसंबर की रात देर रात तक सो नहीं पा रहा था। न जाने किसने उस रात में उसे याद दिलाया–

‘बीस साल पहले जो तेरी चाहत थी, हिंदी थिसारस की, वह अभी तक अधूरी है। तुझे जो तलाश है जीवन में कुछ करने की, तो उस चाहत को पूरा कर। इच्छा तेरी थी, सपना तेरा था। बस, उसे पूरा करने में जुट जा।’

तब तक मेरे जीवन का कोई सुनिश्चित उद्देश्य नहीँ था। अगली सुबह (26 दिसंबर 1973 की सुबह) मलाबार हिल पर सैर करते करते कुसुम और मैंने मिल कर संकल्प कर लिया चाहे जो हो, हम हिंदी को थिसारस देंगे।

विवाह की स्वर्ण जयंती पर अरविंद कुमार को केक खिलातीं कुसुम कमार

आपके परिवार ने आपकी किस तरह मदद की।

उस सुबह से ही मैं और कुसुम पति-पत्नी से बढ़ कर सहकर्मी हो गए। बच्चे छोटे थे। सुमीत 13 साल का था, मीता 8 की। सबसे पहला काम था महाप्रयास के लिए अपने को तैयार करना। हर तरह के संदर्भ ग्रंथ ख़रीदे—अधिकतर हिंदी और इंग्लिश कोश थे। इंग्लिश के दसियों थिसारस भी ख़रीद डाले। यह भी पता था कि नौकरी छोड़ने के बाद जेब हल्की होगी। काफ़ी कपड़े भी बना लिए। साथ-साथ प्रोविडेंट फ़ंड बचत की दर बढ़ा दी। घर का ख़र्च कम से कम कर दिया।

19 अप्रैल, 1976 को नासिक में गोदावरी स्नान के बाद हमने किताब को पहला कार्ड बनाया। उस पर हम चारोँ के दस्तख़त हैं। सुमीत और मीता थे तो बच्चे, लेकिन उनके मन में सहभागिता की बात कहीँ अड़ी रही होगी। जैसे-जैसे वे बड़े होते गए, हमारे काम के सक्रिय भागीदार बनते गए। कोई 1988 से सुमीत ने हमारे काम के लिए कंप्यूटर की आवश्यकता पर बल देना शुरू किया। बाद में उसने कार्डों के कंप्यूटराइजेशन की प्रक्रिया सँभाली। मीता ने इंग्लिश डाटा की आधारशिला तैयार की।

समाज के लिए कोश ग्रंथों की क्या उपयोगिता है ? या कहें की जीवंत समाज के लिए शब्दकोश क्यों ज़रूरी हैं ?

शब्द मानव की महानतम उपलब्धि हैं। शब्दों ने ही ज्ञान-विज्ञान को जन्म दिया, एक पीढ़ी से दूसरी तक, एक देश से दूसरे तक पहुँचाया, मानवों में संप्रेषण सहज बनाया। यही कारण है कि भाषा के जन्म के साथ ही थिसारस (शब्द सूचियाँ) और शब्दार्थ कोश बनने लगे थे। सबसे पहले सटीक थिसारस और शब्दकोश भारत में बने। निघंटु था तो कुल 1,800 शब्दों की सूची, लेकिन तत्‍कालीन समाज ने उसके निर्माता कश्यप को प्रजापति कह कर सम्माना। और फिर महर्षि यास्क ने निघंटु की व्याख्या के रूप में संसार को सबसे पहला शब्दार्थ कोश और ऐनसाइक्लोपीडिया दिया- निरुक्त। ये दोनों अभी तक पूरे सम्मान के भागी हैं।

शब्दकोश एक आदमी से दूसरे तक पहुँचे शब्द को प्रमाणित करते हैं, ताकि ग़लतफ़हमी की गुंजाइश न रहे। थिसारस हमें अपनी बात कहने के लिए सही शब्दावली देता है। शब्दकोश और थिसारस एक दूसरे के पूरक हैं, लेकिन दो अलग तरह की चीज़ें हैं।

हिंदी का भविष्य क्या है ? वैश्‍वीकरण के दौर में क्या हिंदी सिमट कर रह जाएगी?

हिंदी को कई निराशावादी लोग एक मरती हुई ज़बान समझते और कहते फिर रहे हैं। वे उसी तरह के लोग हैं जो इस्लाम ख़तरे में, हिंदुत्व संकट में जैसे नारे लगाते रहते हैं। हिंदी में इंग्लिश शब्दों के बढ़ते चलन को देख कई बार उनकी बात सही लग सकती है, लेकिन मैं उनसे सहमत नहीं हूँ। बदलते समाज, बदलती तकनीक के साथ हिंदी का बदलना ज़रूरी है। यह बात हर भाषा पर लागू होती है। आज हिंदी वह नहीं है जो ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ के ज़माने में थी, न ही वह जो भारतेंदु जी के युग में थी। और सन् 2050 में वह नहीं होगी, जो आज है। वह हर जगह से शब्द लेगी, विचार लेगी। नए मुहावरे आएँगे। नए लोग नई शैलियाँ लाएँगे। वे लोग नई वर्तनी भी ला सकते हैं। तब हिंदी संसार में शायद सबसे अधिक प्रचलित भाषाओं में बहुत ऊपर होगी।

आप देख रहे हैं, हिंदी के समाचार पत्र प्रसार संख्या में सबसे आगे हैं, और उनकी गुणवत्ता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है। हिंदी के टीवी चैनल संसार के सर्वाधिक लोकप्रिय चैनलों में गिने जाते हैं। हमारी फ़िल्में पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय हो चुकी हैं। तो डर कैसा, डर किससे। आप यह बात समझ लीजिए कि हिंदी बोलने वाले संख्या में इतने अधिक हैं और आज हिंदी वाले संसार में एक बहुत बड़ा ग्राहक समूह हैं। उन तक माल पहुँचाने और बेचने के लिए दुनिया को नाक रगड़ कर उनके पास आना होगा। हिंदी ही क्योँ, दुनिया को भोजपुरी, ब्रजभाषा, गढ़वाली—सब के पास आना होगा।

आज विश्‍व की कई भाषाएँ मरणासन्न हैं। क्या उन्हें बचाया जा सकता है ?

जिन भाषाओं के बोलने वाले कम हैं, या कम होते जा रहे हैं, वे म्यूज़ियम पीस बन कर ही बची रह सकती हैं। यही बात शब्दों की भी है। मेरे बचपन के वे सब शब्द मर चुके हैं, जो उन चीज़ों के थे जो तब काम आती थीं, या उन रीतिरिवाज़ों के हैं जो तब चलते थे। दमड़ी, छदाम, कौड़ी, अधन्ना, इकन्नी कुछ ऐसे ही शब्द हैं। कुछ ही दिनों में चवन्नी शब्द भी भुला दिया जाएगा। यह होना अवश्यंभावी है।

अब आप की क्या योजनाएँ हैं ? हिंदी-इंग्लिश के अतिरिक्त अन्य भाषाओं के कोश भी बनाएँगे क्या ?

हमारे सपने बहुत बड़े हैं। और योजनाएँ भी बहुत बड़ी हैं। अरविंद लैक्सिकन से जो पैसा आएगा, उसका बहुत बड़ा भाग हमारे डाटा में नई भाषाएँ जोड़ने में काम आएगा। तमिल और चीनी भाषाएँ हमारी प्राथमिकता हैं।

इसके पीछे जो राष्ट्रीय और देशभक्ति से भरा विचार है, आप वह समझने की कोशिश करें। भारत की आर्थिक और राजनीतिक सामर्थ्य बढ़ रही है, बढ़ेगी। जिस तरह इंग्लिश भाषी समाजों ने दुनिया भर के देशों से उनकी भाषाओं के कोश बनाए, जैसे इंग्लिश-हिंदी-इंग्लिश या इंग्लिश-चीनी-इंग्लिश, इंग्लिश-जापानी-इंग्लिश, उसी तरह हमारे देश को करना होगा- हिंदी-इंग्लिश-हिंदी, हिंदी-चीनी-हिंदी, हिंदी-जापानी-हिंदी… । सरकार तो इस तरफ़ कुछ करती नज़र नहीं आ रही। इतनी दूरदृष्टि भी उनके पास कभी नहीं रही है। सरकार न ही करे तो ठीक ही है। इंग्लिश में भी ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस के साथ अनेक निजी प्रकाशकों ने यह काम किया।

आपने बाहरी आर्थिक सहायता की बात शुरू में ही पूछी थी। तब मेरे पास अपने को सुपात्र सिद्ध करने का कोई साधन नहीं था। क्या था मैं ? एक महत्वाकांक्षी कोशकार तो था, पर था तो कोरा फ़िल्म पत्रकार ही। लेकिन अब तो मैं अपने को सिद्ध कर चुका हूँ। फिर भी मैं जानता हूँ कि मुझे या मेरे समूह को कहीं से कैसी भी सहायता नहीं मिलेगी। शायद मुझे माँगने की कला ही नहीं आती। लेकिन अब एक हद तक मैं और मेरे साथी आत्मनिर्भर हैं। हम समर्थ हैं, हमारे पास इरादा है। हम न सिर्फ़ तमिल और चीनी शब्द सँजोएँगे, हम जापानी, अरबी, फ़्रैंच, जरमन, स्पेनी—सभी भाषाएँ समाहित करेंगे। बरसों लगेंगे, शायद पीढ़ियाँ, लेकिन जो काम शुरू होता है, या होना चाहता है वह अपना कारिंदा भी चुन लेता है और उसके कंधे पर सवार होकर उसे धकेलता रहता है। इस काम ने हमें चुन लिया है।

‘अरविंद लैक्सिकन’ में आपने रोमन लिपि को भी शामिल किया है। इसकी ख़ास वज़ह क्या है ?

रोमन लिपि शामिल करने के पीछे एक सीधी सी समझ थी। कितने लोग हैं जो हिंदी में टाइपिंग कर सकते हैं ? कितने सारे अ-हिंदी भारतीय हैं, जैसे, लदाखी, बंगाली, तमिल, कन्नड़ जो हिंदी तो समझते हैं पर पढ़ना नहीँ जानते या समझना चाहते हैं पर देवनागरी न जानने के कारण पढ़ नहीं सकते, उनके लिए किसी कोश में हिंदी शब्दों की खोज के लिए रोमन लिपि होनी चाहिए। मेरे छोटे भाई विनोद अमरीका में रहते हैं। उनका बेटा रोहित बड़ा अफ़सर है, पर हिंदी नहीं जानता। विदेशों में बसे भारतीय परिवारोँ की दूसरी पीढ़ी का यही हाल है। पर उनका भारत प्रेम या हिंदी से लगाव कम नहीं हुआ है। अगर रोमन लिपि के साथ-साथ वे लोग वही शब्द देवनागरी में लिखा देखेंगे तो हिंदी का रंगरूप उनकी समझ में आने लगेगा।

अरविंद लैक्सिकन 24 जून से उपलब्ध हो गया है। उसे http://arvindlexicon.com पर देखा जा सकता है। हो सकता है कुछ कमियाँ हों, हमारे सर्वर अभी उतने समर्थ न हों। पर हम और सर्वरों पर ख़र्च करने के संसाधन जुटा रहे हैं। मैं समझता हूँ उस साइट पर उपलब्ध अरविंद लैक्सिकन का नि:शुल्‍क संस्करण आम हिंदी भाषी परिवार की दैनिक शब्दावली की सारी आवश्यकताएं पूरी कर देगा। हिंदी और इंग्लिश के ढेर सारे पर्याय और एक भाषा से दूसरी भाषा के लिए शब्दों की तलाश यहाँ पूरी होगी। लेकिन इसके लिए साइट पर रजिस्टर कराना– अरविंद परिवार का सदस्य बनना ज़रूरी है। आवश्यक फ़ार्म या प्रपत्र साइट पर ही मिलता है।

प्रेस में बाल श्रमिक के रूप में आपने करियर की शुरूआत की। बाद में वहाँ की सभी पत्रिकाओं के प्रभारी सहायक संपादक बने। ‘माधुरी’ और ‘सर्वोत्तम’ जैसी पत्रिकाओं के प्रथम संपादक बने। आपकी सफलता का राज़ क्या है ?

तीन राज़ हैं— मेहनत, लगन, ईमानदारी।

आपका जन्‍म मेरठ में हुआ। बचपन के कुछ वर्षों को छोड़कर आप मेरठ में नहीं रहे। दुनिया भर में घूमे। क्‍या मेरठ याद आता है ?

मेरठ शहर में जन्मा और वहाँ रहा बंदा मेरठ को कभी भूल ही नहीं सकता। नौचंदी उसे हमेशा याद आती रहेगी, वहाँ की रेवड़ी गज़क़ हमेशा मुँह में लार लाती रहेगी।

एक बार टाइम्स संस्थान की कर्ताधर्ता श्रीमती रमा जैन ने मुझ से पूछा था कि आपकी क्या महत्वाकांक्षा है। मेरा जवाब था,  गुज़ारे लायक़ आमदनी और मेरठ में वास। उन्होंने कहा था कि गुज़ारे लायक़ आमदनी की बात समझ में आती है, मेरठ में रहना क्यों ? जवाब में मैंने पूछा था– आपने कभी मेरठ की चाट खाई है। वह हँस पड़ी थीं, और बोली थीं- मैं समझ गई।

आपको बताऊँ कि हम मेरठ वाले चटोरे होते हैं। सुबह नाश्ते में हलवाई की बेड़वीं के साथ जलेबी पर रखा हलवा, तीसरे पहर चाट पकौड़ी। चाट की बात यह है, कभी समोसा, कभी आलू का लच्छा, आलू का भल्ला (टिकिया, कटलेट), दही सौंठ वाली पकौड़ियाँ, गोलगप्पे (पानी पूरी) तो खाते ही हैं, वहाँ शादी-ब्याह में जो ख़ास तरह की कचौरी बनती है, वह कहीं और नहीं मिलती। बाहर हम उसके लिए तरसते रहते हैँ। यह और बात है कि अब न तो वैसा स्वास्थ्य है, न वैसा हाज़मा कि ये लज्जत पूरी तरह उठा सकें।

और एक बात। मेरठ खड़ी बोली का जन्म स्थान माना जाता है। लेकिन वहाँ की बोली वह नहीं है, जो आज की लिखत की हिंदी है। वहाँ के कुछ अजीब मुहावरे हैं। जैसे: अजी, हुआ बहुत! इस का मतलब होता है कि होने की कोई संभावना नहीं है। ऐसे कितने ही मुहावरे मैं गिनाता रह सकता हूँ। काश कोई उनका कोश बनाए।

 

रुकना मेरा काम नहीं : अनुराग