20 नवम्बर को जनसत्ता सहकारी आवास समिति के लान में आयोजित जसम, गाजियाबाद के इस पहले आयोजन का संचालन युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने किया तथा अध्यक्षता आलोचक अर्चना वर्मा ने की। आयोजन स्थल को ‘पहल’ पत्रिका के कवर की इनलार्ज छायाप्रतियों और अशोक भौमिक की पेंटिंग की छायाप्रतियों से सजाया गया था।
इरफान द्वारा ज्ञानरंजन की चर्चित कहानी ‘पिता’ के पाठ से आयोजन की शुरुआत हुई। जिसमें दो पीढि़यों के बीच जीवन मूल्यों के टकराव को बखूबी दर्शाया गया है। आज जब उपभोक्तावाद ने पूरे मध्यवर्ग की जिंदगी को सुविधाओं के साथ-साथ भीषण रूप से बेचैन, असंतुष्ट और ईष्र्यालु बना दिया है, तब इस कहानी को सुनते हुए कई बार ऐसा लग रहा था कि पिता के व्यवहार और उसके औचित्य या अनौचित्य के बारे में नए सिरे से सोचना चाहिए। कहानी में पिता सुविधाओं और महंगी चीजों से खुद को अलग रखता है, बाजार से लाई महंगी चीजों, मिठाई और फल तक नहीं लेता, उसके बेटे उसे अहंकारी और ढोंगी समझते हैं। उन्हें वह किसी बुलंद दरवाजे की तरह लगता है, जिससे टकराकर वे खुद को पिद्दी-सा हुआ जाता महसूस कर रहे हैं।
कवि-कथाकार संजय कुंदन ने भी ज्ञानरंजन की पुस्तक ‘कबाड़खाना’ के कुछ अंशों का पाठ किया। ‘हमारे बच्चों का भविष्य जनतांत्रिक घोडों के हाथों में कैद है’ शीर्षक टिप्पणी में ज्ञानरंजन ने बचपन की स्मृतियों से गुजरते हुए आज के बच्चों की दशा पर कई मार्मिक सवाल उठाए हैं, जिसे संजय कुंदन ने पढ़कर सुनाया। जीवन के आमफहम संदर्भों में साम्राज्यवादी बाजार और उसके मनोवैज्ञानिक हमलों के प्रति सोचने-विचारने की भी एक कोशिश उनके लेखन में नजर आई।
‘ज्ञानरंजन की कहानियां और समकालीन कहानी’ विषय पर बोलते हुए कहानीकार योगेंद्र आहूजा ने कहा कि जिस तरह व्यक्तियों का जीवन और उसके संकट होते हैं, उसी तरह कहानी के साथ भी होता है। आज साठ और सत्तर के दशक जैसा कुछ नहीं है, न राजनीति और न कहानी। लेकिन 40 साल पहले लिखी ज्ञानरंजन की कहानियां उसी तरह विचलित और परेशान करती हैं, जैसी पहली बार प्रकाशित होने के बाद किया होगा। ये कहानियां वक्त के साथ ठंडी, निर्जीव, निरावेग या कालातीत नहीं हुई हैं। वे सतत समकालीन हैं। उनके बाद की तीन पीढि़यों ने उन्हें अपने समकालीन पाया है। इहलौकिक आंख से विराट जीवन और मनुष्य के मन की गहराई को देखने वाली कहानियां हैं ये। ज्ञानरंजन की कहानियां कवितोन्मुख हैं, पर कविता में बदलने से इनकार करती हैं। हंसी के कई प्रसंग हैं उनकी कहानियों में, पर वह चैप्लिन सरीखी हंसी नहीं है, बल्कि वह ऐसी हंसी है, जो धीरे-धीरे एक उदासी और फिर दर्द में बदलती जाती है।
आलोचक गोपाल प्रधान ने कहा कि जब ज्ञानरंजन की उम्र साठ के आसपास थी, तब उनकी उनसे मुलाकात हुई और तब उनकी उम्र उनसे आधी थी। मगर आधी उम्र के फर्क को उन्होंने कभी महसूस नहीं होने दिया। परिवार नाम की संस्था के इर्द-गिर्द जो एक परिवेश बनता है, जहां उम्रदराज लोग सम्मान का पात्र बन जाते हैं, वैसा ज्ञानरंजन के साथ नहीं था। सम्मान के बजाए उन्हें बहस और विवाद छेड़ने में ज्यादा रुचि रहती थी। गोपाल प्रधान ने बताया कि हम दोनों की राजनीति में फर्क था, कि उन्होंने पहल के कविता विशेषांक में गोरख पांडेय की गैरमौजूदगी पर सवाल भी उठाया था, लेकिन इसके बावजूद ज्ञानरंजन ने उनकी डायरी को पहल में छापा। उन्होंने यह भी कहा कि ज्ञानरंजन के बारे में लोगों की यह भी धारणा थी कि वे किसी के मातहत काम नहीं कर सकते थे। उन्होंने हमेशा नई प्रवृत्तियों का स्वागत किया, और पहल को सिर्फ साहित्य का पत्रिका बनने नहीं दिया।
आशुतोष कुमार का कहना था कि पहल में हर तरह के जनवादी विचारों को मंच मिला।
कवि वीरेन डंगवाल ने बताया कि किस तरह जिन दिनों ज्ञानरंजन की ‘पिता’ कहानी का बड़ा शोर था, उन्हीं दिनों नैनीताल के माहौल पर लिखी उनकी कहानी छपी तो जबलपुर से ज्ञानरंजन ने उन्हें खत लिखा, तारीफ भी की और कहानी की खामियां भी गिनाईं। वीरेन डंगवाल ने बताया कि उनकी ज्यादातर कविताएं पहल में ही छपीं। ज्ञानरंजन कविताएं बहुत पढ़ते हैं और उनके गद्य में भी कविता की झांई है। वीरेन डंगवाल ने यह भी कहा कि नागार्जुन के बाद वे दूसरे ऐसी व्यक्ति हैं, जिनकी व्याप्ति अधिक है।
पत्रकार-कहानीकार प्रियदर्शन ने कहा कि वे पहल के पाठक और विक्रेता रहे और आज भी उन्हें पहल की वैचारिक उष्मा की जरूरत महसूस होती है।
अर्चना वर्मा ने एक समय हिंदी कहानी में जो तीन तिलंगे जिस तरह छाये हुए थे, उसमें सेंध लगाने वालों में ज्ञानरंजन थे। संबंधों को तिलांजलि देने वाली उन कहानियों पर तब उचित-अनुचित की बहसें होती थीं और नई पीढ़ी का होने के कारण खुद अर्चना वर्मा तोड़-फोड़ करने वाली उस पीढ़ी के ज्यादा करीब अपने को पाती थीं। उन्होंने कहा कि ज्ञानरंजन के सरोकार तय थे, लेकिन उसके निर्धारण के बावजूद वे जिंदगी का कोई कोना नहीं छोड़ना चाहते थे।





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