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एक अपूर्व पहल के 75 वर्ष

कहानीकार योगेंद्र आहूजा

गाजियाबाद : जन संस्कृति मंच की नवगठित गाजियाबाद इकाई और जनसत्ता सहकारी आवास समिति की ओर से वसुंधरा में कहानीकार और पहल पत्रिका के संपादक ज्ञानरंजन पर केंद्रित एक कार्यक्रम हुआ। इस 21 नवंबर को ज्ञानरंजन अपनी उम्र के 75 साल पूरा कर रहे हैं।
20 नवम्बर को जनसत्ता सहकारी आवास समिति के लान में आयोजित जसम, गाजियाबाद के इस पहले आयोजन का संचालन युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने किया तथा अध्यक्षता आलोचक अर्चना वर्मा ने की। आयोजन स्थल को ‘पहल’ पत्रिका के कवर की इनलार्ज छायाप्रतियों और अशोक भौमिक की पेंटिंग की छायाप्रतियों से सजाया गया था।
इरफान द्वारा ज्ञानरंजन की चर्चित कहानी ‘पिता’ के पाठ से आयोजन की शुरुआत हुई। जिसमें दो पीढि़यों के बीच जीवन मूल्यों के टकराव को बखूबी दर्शाया गया है। आज जब उपभोक्तावाद ने पूरे मध्यवर्ग की जिंदगी को सुविधाओं के साथ-साथ भीषण रूप से बेचैन, असंतुष्ट और ईष्र्यालु बना दिया है, तब इस कहानी को सुनते हुए कई बार ऐसा लग रहा था कि पिता के व्यवहार और उसके औचित्य या अनौचित्य के बारे में नए सिरे से सोचना चाहिए। कहानी में पिता सुविधाओं और महंगी चीजों से खुद को अलग रखता है, बाजार से लाई महंगी चीजों, मिठाई और फल तक नहीं लेता, उसके बेटे उसे अहंकारी और ढोंगी   समझते हैं। उन्हें वह किसी बुलंद दरवाजे की तरह लगता है, जिससे टकराकर वे खुद को पिद्दी-सा हुआ जाता महसूस कर रहे हैं।
कवि-कथाकार संजय कुंदन ने भी ज्ञानरंजन की पुस्तक ‘कबाड़खाना’ के कुछ अंशों का पाठ किया। ‘हमारे बच्चों का भविष्य जनतांत्रिक घोडों के हाथों में कैद है’ शीर्षक टिप्पणी में ज्ञानरंजन ने बचपन की स्मृतियों से गुजरते हुए आज के बच्चों की दशा पर कई मार्मिक सवाल उठाए हैं, जिसे संजय कुंदन ने पढ़कर सुनाया। जीवन के आमफहम संदर्भों में साम्राज्यवादी बाजार और उसके मनोवैज्ञानिक हमलों के प्रति सोचने-विचारने की भी एक कोशिश उनके लेखन में नजर आई।
‘ज्ञानरंजन की कहानियां और समकालीन कहानी’ विषय पर बोलते हुए कहानीकार योगेंद्र आहूजा ने कहा कि जिस तरह व्यक्तियों का जीवन और उसके संकट होते हैं, उसी तरह कहानी के साथ भी होता है। आज साठ और सत्तर के दशक जैसा कुछ नहीं है, न राजनीति और न कहानी। लेकिन 40 साल पहले लिखी ज्ञानरंजन की कहानियां उसी तरह विचलित और परेशान करती हैं, जैसी पहली बार प्रकाशित होने के बाद किया होगा। ये कहानियां वक्त के साथ ठंडी, निर्जीव, निरावेग या कालातीत नहीं हुई हैं। वे सतत समकालीन हैं। उनके बाद की तीन पीढि़यों ने उन्हें अपने समकालीन पाया है। इहलौकिक आंख से विराट जीवन और मनुष्य के मन की गहराई को देखने वाली कहानियां हैं ये। ज्ञानरंजन की कहानियां कवितोन्मुख हैं, पर कविता में बदलने से इनकार करती हैं। हंसी के कई प्रसंग हैं उनकी कहानियों में, पर वह चैप्लिन सरीखी हंसी नहीं है, बल्कि वह ऐसी हंसी है, जो धीरे-धीरे एक उदासी और फिर दर्द में बदलती जाती है।
आलोचक गोपाल प्रधान ने कहा कि जब ज्ञानरंजन की उम्र साठ के आसपास थी, तब उनकी उनसे मुलाकात हुई और तब उनकी उम्र उनसे आधी थी। मगर आधी उम्र के फर्क को उन्होंने कभी महसूस नहीं होने दिया। परिवार नाम की संस्था के इर्द-गिर्द जो एक परिवेश बनता है, जहां उम्रदराज लोग सम्मान का पात्र बन जाते हैं, वैसा ज्ञानरंजन के साथ नहीं था। सम्मान के बजाए उन्हें बहस और विवाद छेड़ने में ज्यादा रुचि रहती थी। गोपाल प्रधान ने बताया कि हम दोनों की राजनीति में फर्क था, कि उन्होंने पहल के कविता विशेषांक में गोरख पांडेय की गैरमौजूदगी पर सवाल भी उठाया था, लेकिन इसके बावजूद ज्ञानरंजन ने उनकी डायरी को पहल में छापा। उन्होंने यह भी कहा कि ज्ञानरंजन के बारे में लोगों की यह भी धारणा थी कि वे किसी के मातहत काम नहीं कर सकते थे। उन्होंने हमेशा नई प्रवृत्तियों का स्वागत किया, और पहल को सिर्फ साहित्य का पत्रिका बनने नहीं दिया।
कवि मदन कश्यप ने कहा कि प्रलेस का पुनर्गठन और पहल की शुरुआत लगभग साथ-साथ हुई। दोनों के प्रति हमलोगों का आलोचनात्मक रिश्ता रहा। इमरजेंसी के बाद प्रगतिशील लेखक संघ के भीतर जो प्रगतिशील धारा थी, उसे उन्होंने  आखिरी दिनों तक बचाए रखा। मदन कश्यप ने कहा कि विचारधारा और पार्टी के साथ होने में फर्क होता है। सोवियत संघ के विघटन के बाद पहल की और भी ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका रही। पिछले पंद्रह-बीस साल में भारतीय संदर्भ में माक्र्सवादी विचारधारा और वैश्विक स्तर पर जो भी नई चीजें आईं, सबको पहल में जगह मिली। छोटे छोटे शहरों में लेखकों को पहल ने तैयार किया। उसका कोई विकल्प नहीं था। वे एक संगठन में रहते हुए भी संगठन से बढ़के थे। सांगठनिक संकीर्णता के बजाए उन्होंने पहल को वैचारिक संघर्ष की ओर उन्मुख किया।
आशुतोष कुमार का कहना था कि पहल में हर तरह के जनवादी विचारों को मंच मिला।
कवि वीरेन डंगवाल ने बताया कि किस तरह जिन दिनों ज्ञानरंजन की ‘पिता’ कहानी का बड़ा शोर था, उन्हीं दिनों नैनीताल के माहौल पर लिखी उनकी कहानी छपी तो जबलपुर से ज्ञानरंजन ने उन्हें खत लिखा, तारीफ भी की और कहानी की खामियां भी गिनाईं। वीरेन डंगवाल ने बताया कि उनकी ज्यादातर कविताएं पहल में ही छपीं। ज्ञानरंजन कविताएं बहुत पढ़ते हैं और उनके गद्य में भी कविता की झांई है। वीरेन डंगवाल ने यह भी कहा कि नागार्जुन के बाद वे दूसरे ऐसी व्यक्ति हैं, जिनकी व्याप्ति अधिक है।
पत्रकार-कहानीकार प्रियदर्शन ने कहा कि वे पहल के पाठक और विक्रेता रहे और आज भी उन्हें पहल की वैचारिक उष्मा की जरूरत महसूस होती है।
अर्चना वर्मा ने एक समय हिंदी कहानी में जो तीन तिलंगे जिस तरह छाये हुए थे, उसमें सेंध लगाने वालों में ज्ञानरंजन थे। संबंधों को तिलांजलि देने वाली उन कहानियों पर तब उचित-अनुचित की बहसें होती थीं और नई पीढ़ी का होने के कारण खुद अर्चना वर्मा तोड़-फोड़ करने वाली उस पीढ़ी के ज्यादा करीब अपने को पाती थीं। उन्होंने कहा कि ज्ञानरंजन के सरोकार तय थे, लेकिन उसके निर्धारण के बावजूद वे जिंदगी का कोई कोना नहीं छोड़ना चाहते थे।
धन्यवाद ज्ञापन जनसत्ता सहकारी समिति के अध्यक्ष मनोज मिश्र ने किया। इस मौके पर कहानीकार अल्पना मिश्र, कहानीकार अशोक गुप्त, कवि रामकुमार कृषक, कवि हीरालाल नागर, कवि संजय चतुर्वेदी , पत्रकार बिरादरी के राजेश वर्मा, अनिल दुबे, पार्थिव कुमार, अरुण त्रिपाठी, रवींद्र त्रिपाठी, पंकज श्रीवास्तव, प्रेम भारद्वाज , सुधीर सुमन, विनोद वर्मा, आलोक  श्रीवास्तव , अनुपम, चित्रकार हरिपाल त्यागी, कवि विमल कुमार, कवि रंजीत वर्मा, युवा चित्रकार अनुपम राय , आलोचक संजीव कुमार और विभास वर्मा , कवि श्याम सुशील, कवियत्री ऋतुपर्णा मुद्राराक्षस, उमा गुप्ता, उदयशंकर,  अम्बेदकर कालेज, दिल्ली और जामिया मिलिया विश्विदालय, दिल्ली  के बहुत सारे छात्र- छात्राएं  और जनसत्ता हाऊसिंग सोसाइटी के लोंग भी मौजूद थे।

यशस्वी कथाकार ज्ञानरंजन पर वि‍शेष कार्यक्रम 20 को

ज्ञानरंजन

गाजि‍याबाद : यशस्वी कथाकार और सम्पादक ज्ञानरंजन 21 नवम्‍बर को 75 वर्ष के हो रहे हैं। इस मुबारक मौके की पूर्वसंध्या 20  नवंबर को उनके कृतित्व और व्यक्तित्व पर चर्चा करने के लि‍ए जन  संस्कृति मंच, गाज़ियाबाद  और जनसत्ता सहकारी  आवास समिति, वसुंधरा, गाज़ियाबाद की ओर से वि‍शेष कार्यक्रम ‘एक अपूर्व पहल के 75 वर्ष’ का आयोजन कि‍या जा रहा है। कार्यक्रम लॉन, जनसत्ता सहकारी आवास समिति, सेक्टर-9, वसुंधरा, गाज़ियाबाद में शाम 3.30 से शुरू होगा।

इस अवसर पर ज्ञानरंजन की कहानी ‘पिता’ का पाठ इरफ़ान करेंगे। उनकी किताब ‘कबाड़खाना’ के कुछ अंशों  का पाठ संजय कुंदन करेंगे। ज्ञानरंजन की कहानियाँ  और समकालीन कहानी पर योगेन्द्र आहूजा, पहल और आपातकालोत्तर सांस्कृतिक संघर्ष पर मदन कश्यप, उत्तर भारत में पोस्टर कला के विकास में ज्ञानरंजन और ‘पहल’ की भूमिका पर अशोक भौमिक, ‘पहल’ और हमारी कविता पीढी़ पर वीरेन डंगवाल तथा ज्ञानरंजन की विरासत पर मंगलेश  डबराल वि‍चार व्‍यक्‍त करेंगे। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता विश्वनाथ त्रिपाठी और संचालनक आशुतोष कुमार करेंगे। धन्यवाद ज्ञापन जनसत्‍ता आवास समि‍ति‍ के अध्‍यक्ष मनोज मिश्र देंगे।

सुधीर शर्मा : अपराधी के साहित्‍यकार बनने की गाथा

अपनी घुटन व अंधेरे से मुक्ति मुझे साहित्यिक रचनाओं से मिली हे। रचनाओं ने ही मुझे नई प्राणवायु और उजाला दिया है। मैंने इस बात को आत्मसात कर लिया है कि रचना जीवन के अंधकार से जूझने वाली मनुष्यता की आत्मिक शक्ति है…
यह किसी बुद्धिजीवी का वक्तव्य या किसी कहानी-उपन्यास का संवाद नहीं, बल्कि एक कैदी की कठोर जिंदगी की हकीकत है। दस साल की सजा काट चुके सुधीर शर्मा को साहित्य ने नई रोशनी दिखायी, जिसके प्रकाश में उसने अपराध की दुनिया  को छोडऩे का निश्चय कर लिया।
सुधीर शर्मा कौन है? वह कैसे अपराधी बना, उसका साहित्य से कैसे संपर्क हुआ और इस अपराध के दलदल से वह कैसे निकला, इसकी बड़ी रोमांचक, दास्तान है।
सुधीर शर्मा का जन्म 9 सितंबर, 1962 को दिल्ली में एक गरीब घर में हुआ। उसके पिता पूर्णचंद्र शर्मा एक फैक्टी में क्लर्क थे । वह ईमानदार और मेहनती इंसान थे लेकिन सख्त रवैये के कारण घर में हिटलरी कानून चलाते थे। जैसे- सुधीर गली के बच्चों के साथ नहीं खेलेगा। वह डंडे के बल पर पढ़ाने के हामी थे। मां कमला देवी चार जमात पास सीधी-सादी धार्मिक गृहिणी। इन कानूनों का पालन उन्हें भी करना पड़ता था। वह अपनी ममता का गला घोंटकर इनका पालन करतीं। कभी-कभी न करने पर उन्हें भी प्रताडि़त होना पड़ता। सुधीर को बाहरी बच्चों के साथ न खेलने देने से वह शायद उसे बुराइयों से बचाना चाहते हों, लेकिन उनकी इस सख्ती ने सुधीर के बलमन पर उल्टा प्रभाव डाला। समय के साथ-साथ वह कक्षाओं में आगे बढ़ता गया। उसकी छोटी बहन का जन्म हुआ। उस समय सुधीर की उम्र दस वर्ष थी। बहन के आने के बाद भी उसके हम उम्र दोस्तों की कमी पूरी नहीं हुई। पिताजी के हिटलरी कानून ज्यों के त्यों थे।
नौंवी में विषय चुनने की बात आई। सुधीर की ड्राइंग बहुत अच्छी थी। वह ड्राइंग लेना चाहता था। उसने पिताजी को बताया। उन्होंने एक झापड़ के साथ निर्देश दिया कि कॉमर्स लो। ड्राइंग लेकर क्या पेंटर बनना है? सुधीर पढ़ाई में अच्छा था। उसने मन मारकर कॉमर्स ली। वह किसी तरह बस पास होने का ध्यान रखता। अब पिताजी की तानाशाही के प्रति उसके मन में विद्रोह कुलबुलाने लगा। लेकिन वह खामोशी ही रहता।
हायर सैकेंडरी पास कर उसने एक सांध्य कॉलेज में दाखिला ले लिया। उसे पार्ट टाइम में कनाट प्लेस की मशहूर न्यूज एजेंसी मेें काम मिल गया। कॉलेज की आजादी और कनाट प्लेस की दुनिया ने उसे एक नई दुनिया से परिचित कराया। घर के रूढि़वादी-घुटन भरे माहौल से यह दुनिया अलग थी। कॉलेज में वह यह देखकर दंग रह गया कि लड़कों के माता-पिता उनके साथ दोस्त की तरह बात करते हैं। कनाट प्लेस की दुनिया उसे दूसरी ही लगी, जिसे वह फिल्मों में देखा करता था। वह जिस न्यूज एजेंसी में काम करता था, उसके अखबार व पत्रिकाएं सभी दूतावासों, मंत्रालयों और पंच सितारा होटलों में जाती थीं। काम करने से उसे आत्मविश्वास मिला। वह अपनी तनख्वाह घर में देता और अपना जेब खर्च एक-दो रुपये निकाल लेता।

कई संगठन फिर भी लेखकों का शोषण

पिछले दिनों सुप्रसिद्ध लेखक ज्ञानरंजन प्रगतिशील लेखक संगठन से अलग हो गए। उन्होंने जो आरोप लगाए हैं, वे बेहद गंभीर हैं। ज्ञानरंजन वर्षों से प्रगति लेखक संघ के सदस्य रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि संगठन का सांस्कृतिक पतन हो चुका है। वह यह भी कहते हैं कि जिस प्रगतिशील लेखक संघ की नींव मुंशी प्रेमचंद ने रखी, वह राजनीतिक गुटबंदी में शामिल हो गया है। उसे संपत्ति का रोग लग गया है। जब संगठन में पहले-सी विचारधारा और अनुशासन ही नहीं रहा तो यहां बने रहने का कोई मतलब नहीं है।
इसी के साथ लेखक संगठनों की प्रासंगिकता को लेकर फिर से सवाल उठने लगे हैं। इनकी नींव कब रखी गई? इन्हें बनाने का उद्देश्य क्या है? अधिकांश लेखक संगठन किसी-न-किसी राजनीतिक पार्टी से संबद्ध हैं। उन पार्टियोंं की नीतियां इन्हें किस तरह प्रभावित करती हैं? क्या किसी रचनाकर को लेखक संगठन से जुडऩा चाहिए? उसकी रचनात्मकता को संगठन किस तरह प्रभावित करते हैं? संगठन लेखकों के हितों की रक्षा करने में कितने सक्षम हैं? संगठनों की क्या भूमिका होनी चाहिए आदि मुद्दे भी अहम हैं। Read more