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जनसंघर्षों की आवाज बन चुकी हैं गोरख की कविताएं

गोरख पांडेय

गोरख पांडेय

स्मृति दिवस पर क्रान्‍तिकारी कवि की रचनाओं पर लेखकों-संस्कृतिकर्मियों ने की चर्चा- 

जन संस्कृति मंच के पहले राष्ट्रीय महासचिव क्रान्‍तिकारी कवि गोरख पांडेय की याद में उनके स्मृति दिवस 29 जनवरी 2013 को चारु भवन सभागार (शकरपुर, दिल्ली) में कार्यक्रम आयोजित किया गया। जसम की गीत नाट्य इकाई ‘संगवारी’ द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में गोरख की समग्र रचनाओं का सम्‍पादन कर रहे युवा आलोचक गोपाल प्रधान ने कहा कि गोरख हिन्‍दी के ऐसे कवि हैं जिनकी कविताओं में अन्याय और गैरबराबरी के खिलाफ दर्शन और विचार पानी की तरह समाया हुआ है। उनके जेहन  में दिन-रात दार्शनिक प्रश्‍न और समय की चिंताएं चलती रहती थीं। कविता युग की नब्ज धरो/आदमखोरों की निगाह में खंजर सी उतरो- ऐसी कविता बहुत कम कवियों ने लिखी हैं। शासकवर्ग के प्रति ऐसी प्रचंड नफरत और शोषित-उत्पीडि़त वर्ग के प्रति ऐसी सम्‍वेदनशीलता बहुत कम कवियों में मिलती है। वह कहते थे कि जनता को रोटी के साथ ही आला दर्जे की संस्कृति भी चाहिए, क्योंकि संस्कृति का निर्माण भी जनता ने ही किया है। और उसके द्वारा निर्मित हर चीज की तरह उसे संस्कृति से भी वंचित किया गया है। पोपुलर कल्चर के नाम पर परोसी जाने वाली घटिया चीजों के विपरीत उन्होंने जनता की संस्कृति की बेहतरीन उपलब्धियों को लोकप्रिय तरीके से जनता तक पहुँचाया। अभी भी उनके कवि के असली महत्व को ठीक से पहचाना नहीं जा सकता है। संस्कृतिकर्मियों की जिम्मेवारियों के सन्‍दर्भ में भी गोरख से अभी बहुत कुछ सीखना होगा।

पत्रकार और कवि चंद्रभूषण ने कहा कि गोरख उन गिने-चुने लोगों में से हैं, जिन्हें एक मिथक के समान दर्जा मिल गया है। अपने दौर के हिन्‍दी साहित्य के वह चरम बिन्‍दु हैं। व्यक्ति और आंदोलन- दोनों को सम्‍बोधित करने की दृष्टि से उनकी कविताएं अद्भुत हैं। वह अलगावों में पड़े हुए लोगों को जोड़ते हैं। अपने पहले संग्रह ‘जागते रहो सोने वालों’ में उन्होंने लोकगीत का खंड ज्योति जी को समर्पित किया है और आधुनिक कविताओं का खंड बुआ को, इसके पीछे भी वही नजरिया काम करता प्रतीत होता है। गोरख ने गहरी तन्हाई की कविता भी लिखी। चंद्रभूषण ने कहा कि गोरख बार-बार नये रूप में हमारे सामने आयेंगे और उनकी कविताओं की नई-नई व्याख्याएं होंगी।

फिल्मकार संजय जोशी ने कहा कि गोरख की कविताएं लोगों को उद्वेलित करती हैं। जल्द ही गोरख की आवाज में उनकी कविताओं की दुर्लभ रिकार्डिंग जारी की जाएगी।

गोरख की अस्वस्थता के दौरान उनके साथ रहने वाले और राजनीतिक कार्यों के सिलसिले में उनके सम्‍पर्क में रहने वाले भाकपा-माले के दिल्ली राज्य कमेटी सदस्य अमरनाथ तिवारी ने कहा कि वह तो जीवन में शामिल हैं। गोरख ने जिस बारीक तरीके से गरीबों और मजदूरों के जीवन को अपनी कविताओं में रखा है, लगता है जैसे वह जी रहे हैं उन चीजों को। वह मजदूर बस्तियों में जाकर भी अपनी कविताएं सुनाते थे। वह अपनी रचनाओं में सिर्फ सवाल ही नहीं उठाते थे, बल्कि हल भी सुझाते थे। गोरख जैसे कवि की आज भी जरूरत है, जनता ऐसे कवियों को पसंद करती है, जो उसकी बातों को कहे। उन्होंने बताया कि यह गोरख के विचारों का ही उन पर प्रभाव था कि उन्होंने अपनी विधवा बहन का विवाह करवाया, जिसके लिए समाज उस वक्त तैयार नहीं होता था।

वरिष्ठ माले नेता सुबोध सिन्हा ने याद किया कि किस तरह बोकारो में अपने एक सप्ताह के प्रवास के दौरान गोरख ने अपनी एक कविता को मजदूरों को लगातार तीन दिन सुनाया और उनकी प्रतिक्रियाओं और सुझावों के अनुसार उसे संशोधित करते हुए अंतिम रूप दिया।

कवि श्याम सुशील ने गोरख की रचना ‘आशा का गीत’ से प्रेरित अपनी कविता और उनकी चर्चित कविता ‘बुआ के लिये’ का पाठ किया।

संस्कृतिकर्मी गिरजा पाठक ने कहा कि आठ-नौ साल की उम्र से उन्होंने गाना शुरू किया, तो गोरख के गीतों से उन्होंने शुरुआत की। नैनीताल में जनकवि गिर्दा भी गोरख के गीतों को गाते थे। कविता-पोस्टरों में भी गोरख की काव्य-पंक्तियाँ केंद्र में रहती थीं। गिरजा ने कहा कि बाद में राजनीतिक कार्य के सिलसले में वह जिन राज्यों में भी गए, वहाँ गोरख के गीतों को आंदोलनकारियों की जुबान पर पाया। जसम के राष्ट्रीय पार्षद कपिल शर्मा ने कहा कि उन्होंने संस्कृतिकर्म की शुरुआत गोरख के गीतों से की। कोई गीत इतने सारे अर्थ समेटे हुए हो सकता है, यह गोरख के गीतों से ही मालूम हुआ। संस्कृतिकर्मी मित्ररंजन ने कहा कि आज जो जल, जंगल, जमीन के लिए लड़ाइयाँ चल रही हैं, उसके लिए भी गोरख की कविताएं बेहद प्रासंगिक हैं। उन्होंने उनकी कविता ‘स्वर्ग से विदाई’ का पाठ किया। कपिल शर्मा और असलम ने गोरख के गीतों और गजलों को गाकर सुनाया तथा नितिन ने उनकी कविता ‘बंद खिड़कियों से टकराकर’ का पाठ किया। संचालन करते हुए समकालीन जनमत के सम्‍पादक सुधीर सुमन ने कहा कि दिल्ली में हमने गोरख को खोया था, उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि यहाँ जनसांस्कृतिक आंदोलन को ताकतवर तरीके से आगे बढ़ाया जाए। सत्ता और कारपोरेट पूँजी आज जिस तरह साहित्य-संस्कृति को भी निगल लेने का प्रयास कर रही है और उसे अपना वैचारिक सहयोगी बना रही है, उसके बरअक्स जनता के सांस्कृतिक आंदोलन को विकसित करना वक्त की जरूरत है।

आयोजन में युवा आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी, प्रकाश चौधरी, पत्रकार शिवदास, प्रेम सिंह गहलावत, कलाकार विजय, प्रकाशक आलोक शर्मा, नसीम शाह, डिम्पल, ऋतुपर्णा विस्वास, रिजवान आलम, शहनवाज आलम, सोना बाबू, सैयद मजाहिर, श्योदान प्रजापत, मुस्तकिम, प्रकाश आदि मौजूद थे।

1945 में उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में जन्मे गोरख पांडेय ने अपनी कविताओं और गीतों के जरिए हिन्‍दी साहित्य में विशेष पहचान बनाई। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्‍दी के वह इकलौते कवि हैं, जिनकी रचनाएं सच्चे अर्थों में लोकगीत की तरह पूरे उत्तर भारत में प्रचलित हुईं और जल्द ही अन्य भाषा-भाषी प्रांतों में भी जनांदोलनों में उनके गीत सुनाई देने लगे। यह सिलसिला आज भी जारी है। दिल्ली गैंगरेप कांड के खिलाफ भड़के आंदोलन के दौरान इंडिया गेट और जंतर मंतर से लेकर पटना, इलाहाबाद, गोरखपुर सरीखे कई शहरों में होने वाले प्रदर्शनों में भी गोरख के गीत सुनाई पड़े।

29 जनवरी को बिहार के समस्तीपुर और मधुबनी तथा गोरख पांडेय के गृहजिला देवरिया (उत्तर प्रदेश) में भी उनकी स्मृति में आयोजन हुए। अभी दरभंगा, आरा, पटना, पूर्णिया आदि शहरों में भी आयोजन होने हैं।

प्रस्‍तुति :सुधीर सुमन

समय का पहिया चले रे साथी समय का पहिया चले

 

क्रांतिकारी जनकवि गोरख पांडेय की याद में बिहार के पाँच जिलों में आयोजि‍त कार्यक्रमों की लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन की रि‍पोर्ट-

गोरख पांडेय की स्मृति‍ में आयोजि‍त कार्यक्रम में काव्य पाठ करते जनकवि‍ भोला।

हर साल आरा में हमलोग जसम के प्रथम महासचिव क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय की याद में नुक्कड़ काव्य-गोष्ठी का आयोजन करते रहे हैं। इस बार यह आयोजन आरा से पंद्रह-बीस किमी दूर पवना बाजार में आयोजित था। चलते वक्त मुझे जनकवि भोला जी मिल गए। मधुमेह के कारण वह बेहद कमजोर हो गए हैं, पर जब उन्हें मालूम हुआ कि वहाँ जाने के लिए साधन का इंतजाम है  तो वह भी तैयार हो गये। पिछले तीस साल से देख रहा हूँ। भोला जी एक छोटी सी गुमटी में पान बेचते रहे हैं और कवितायें लिखते और सुनाते रहते हैं। कई पतली-पतली पुस्तिकायें भी उन्होंने छपवाईं, जिन्हें वह ‘भोला का गोला’ कहते हैं। शहर से जब हम निकले तो वह सरस्वती पूजा के माहौल में डूबा हुआ था। पूजा भी क्या है, भौंड़े किस्म के नाच-गाने हैं और बिना किसी साधना के कूल्हे मटकाना है। भोजपुरी के बल्गर गीत हैं, ऐसे गीत कि रीतिकाल के कवि भी शर्म से पानी-पानी हो जाएं, उस पर तेज म्यूजिक है, एक-दूसरे से टकराते हुए, मानो एक आवाज दूसरे का गला दबा देने को आतुर हो। लगभग 100-100 मीटर पर एक जैसी सरस्वती की मूर्तियाँ हैं, कहीं-कहीं अगल-बगल तो कहीं आमने-सामने। जैसे कोई प्रतिस्पर्धा है, कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता, न कहीं कोई साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी है, न कोई कलाकार, न कोई भक्त, कंज्यूमर किशोर हैं सतही मौज-मस्ती, मनोरंजन और सनसनी की चाह में मटकते-भटकते। कहीं कोई भक्ति गीत है भी तो उसके तर्ज और संगीत से भक्ति का कोई तुक तक नहीं जुड़ता प्रतीत होता। ऐसा लगता है कि सरस्वती अब ज्ञान की देवी नहीं हैं, बल्कि सतही आनंद और मनोरंजन की देवी होके रह गई हैं। 28 जनवरी से ही पूरा शहर शोर में डूबा हुआ है। भोला जी बिगड़ते हैं, अपनी माँ के लिए एक दिन भी नहीं जागेंगे और मिट्टी की मूर्ति के लिये रात-रात भर जागे हुए हैं। कल एक रिक्शावाला भी बिगड़ रहा था कि जिनको पढ़ने-लिखने से कुछ नहीं लेना-देना, वही जबरन चंदा वसूल कर मूर्तियाँ रखते हैं और मौज-मस्ती करते हैं, सब लंपट हैं।

साथी सुनील चौधरी के यहाँ जुटना था हमें। युवानीति से जुड़े रंगकर्मियों का इंतजार था। सारे रंगकर्मी हाईस्कूल और कॉलेज के छात्र हैं। किराये की जीप आती है और हम आरा शहर से पवना बाजार के लिए चल पड़ते हैं। शहर से बाहर निकलने के बाद शोर से थोड़ी राहत मिलती है। लेकिन कुछ ही देर बाद ड्राइवर ने होली का गीत बजा दिया। बाद में मेरी निगाह विंडस्क्रीन की ओर गई तो देखा कि ड्राइवर की बगल में ऊपर एक स्क्रीन है, जिसमें गानों का विजुअल भी चल रहा है। बेहद अश्लील और भद्दे हाव-भाव के साथ डांस का फिल्मांकन था। शब्द तो उससे भी अधिक अश्लील, द्विअर्थी भी नहीं, सीधे एकर्थी। स्त्री मानो सिर्फ और सिर्फ भोग की वस्तु हो। एक स्त्री की पूजा करने वाले किशोर-नौजवान भी इसी तरह के गीत बजा रहे हैं। जैसे किसी नशे में डूबो दिया गया हो सबको। बिहार सरकार की कृपा से हर जगह मिलती शराब की भी इस माहौल को बनाने में अपनी भूमिका है।

पवना पहुँचते ही एक कामरेड की दूकान पर हमें रसगुल्ले और नमकीन का नाश्ता कराया गया। एक अच्छी चाय भी मिली। उसके बाद कार्यक्रम शुरू हुआ। आसपास के सारे मजदूर-किसान, छोटे दुकानदार जमा हो गये। उनकी शक्ल और वेशभूषा ही सरकारों के विकास के दावों की पोल खोल रही थी। लेकिन वक्त का पहिया जिसे विपरीत दिशा में घुमाने की कोशिश हो रही है, उसे आगे वही बढ़ा सकते हैं, इस यकीन के साथ ही हम उनसे संबोधित थे। संचालक अरविंद अनुराग की खुद की जिंदगी भी उनसे अलग कहाँ है! बार-बार महानगरों से लौटे हैं, कहीं कोई ढंग का रोजगार नहीं मिला। निजी स्कूलों में पढ़ाया। परचुन की छोटी दूकान खोली। कुछ दिन होम्योपैथी से लोगों का इलाज भी किया। इस जद्दोजहद के बीच साहित्य-विचार का अध्ययन और लेखन उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। राजू रंजन के नेतृत्व में युवानीति के कलाकारों द्वारा गोरख पांडेय के गीत ‘समय का पहिया चले’ से कार्यक्रम की शुरुआत हुई। उसके बाद मुझे यह बताने के लिए बुलाया गया कि गोरख कौन हैं? मैंने कहा कि शायद मेरे बताने की जरूरत नहीं है कि गोरख कौन हैं, उनके गीत ही यह बता देने के लिए काफी हैं कि वे कौन हैं। मैं भोजपुरी के उनके कुछ गीतों का नाम लेता हूँ और देखता हूँ कि लोगों के चेहरे पर चमक आ जाती है। ‘कानून’ कविता के हवाले से उन्हें बताता हूँ कि किस तरह उनके श्रम से फल को अलग किया जा रहा है। ‘डर’ कविता का जिक्र करते हुए कहता हूँ कि अभी भी तमाम दमनकारी साधनों के बावजूद शासकवर्ग आपके गुस्से और नफरत से डरता है। फिर ‘सुतल रहली सपन एक देखली’ गीत सुनाते हुए बैरी पैसे के राज को मिटाने की जरूरत पर बोलता हूँ। यह पैसे का ही तो राज है जिसने संस्कृति के क्षेत्र में भी जनता को उसकी निर्माणकारी भूमिका के बजाए महज विवेकहीन उपभोक्ता की स्थिति में धकेलने का काम किया है। गाँव-गाँव एक नया सांस्कृतिक जागरण आये और उस तकनीक को भी अपना माध्यम बनाये जिसके जरिए तमाम किस्म की अपसंस्कृति का प्रचार किया जा रहा है। जानता हूँ यह बहुत मेहनत का काम है। जहाँ रोजी-रोटी जुटाना ही बेहद श्रमसाध्य होता जा रहा है, वहाँ संस्कृति की लड़ाई तो और भी कठिन है। लेकिन जनता की जिंदगी का जो संघर्ष है, उसकी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भी तो जरूरी है। वे कब तक अपनी सृजनात्मक ऊर्जा भूलकर उपभोक्ता की तरह पूँजी की लंपट संस्कृति का जहर निगलते रहेंगे। गोरख पांडेय के गीतों को वे भूले नहीं है, यह एक बड़ी उम्मीद है। इस उम्मीद के साथ एक नई शुरुआत की संभावना जगती है।

संचालक अरविंद अनुराग समेत सुनील कुमार, सुधीर जी, मंगल प्रताप, रमाकांत जी, मिथिलेश मिश्रा जैसे स्थानीय कवियों की कविताओं को सुनते हुए भी उम्मीद बंधती है। वरिष्ठ कवि रमाकांत जी अपनी कविता में हल जोतते किसान की कठिन जिंदगी के प्रति संवेदित हैं, तो सुधीर एक शहीद की बेवा की चिंता करते हैं। धर्म के नाम हो रहे पाखंड पर सुधीर और मिथिलेश मिश्रा दोनों प्रहार करते हैं। मिथिलेश भी निजी स्कूलों में पढ़ाते रहे हैं। वे कहते हैं- ‘जय सरस्वती मइया, जय लक्ष्मी मइया, जय दुर्गा मइया/मूर्ति रखवइया, चंदा कटवइया, लफुअन के मुर्गा खिवइया, रंडी नचवइया..।’ अरविंद अनुराग राजनीति में उभरे नए सामंती-अपराधी किस्म के तत्वों पर व्यंग्य करते हैं। मंगल प्रताप ‘स्वाधीनता’ कविता सुनाते हैं और सुनाने से पहले अपनी तकलीफ शेयर करते हैं कि आज सब लोग अंदर से गुलाम हैं। अंदर से लोग कुछ हैं और बाहर से कुछ, समझ में नहीं आता कि आदमी को हो क्या गया है। दरअसल इस प्रश्नाकुलता और इस तरह की बेचैनी से कारणों की तलाश शुरू होती है। स्थानीय कवि सुनील एक गीत सुनाते हैं। जसम के राष्ट्रीय पार्षद कवि-आलोचक सुमन कुमार सिंह भी गीत के मूड में हैं और मौका देखकर भोजपुरी-हिंदी के चार गीत सुना देते हैं। मेरी जान बख्सें हुजूर, लिखूँ हुक्काम के खत और केहू जाने न जाने मरम रात के आदि गीतों में यह अभिव्यक्त हुआ कि आज किसान न ठीक से किसान रह गया है और न ही मजदूर, हुक्काम अपने सुशासन के प्रचार में यात्रायें कर रहे हैं, पर किसान नहीं चाहता कि वे गाँव आएँ, उसे शासकवर्ग पर कोई भरोसा नहीं रह गया है। राजदेव करथ हमेशा की तरह संकल्प और जोश से भरे हुए कहते हैं- एक कदम न रुकेंगे/तेरे जुल्मो सितम को मिटाएँगे। सुनील चौधरी गोरख का व्यंग्य गीत ‘समाजवाद का गीत’ सुनाते हुए उसकी व्याख्या भी करते जाते हैं कि कैसे सिर्फ नाम लेने से समाजवाद नहीं आ जाता, बल्कि उसकी आड़ में लूटतंत्र कायम रहता है। जनकवि भोला जब अपना गीत सुनाने को खड़े हुए तो मानो गरीब की पीड़ा साकार हो उठी। उन्होंने सुनाया-

कवन हउवे देवी-देवता, कौन ह मलिकवा
बतावे केहु हो, आज पूछता गरीबवा
बढ़वा में डूबनी, सुखड़वा में सुखइनी
जड़वा के रतिया कलप के हम बितइनी
करी केकरा पर भरोसा, पूछी हम तरीकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा
जाति धरम के हम कुछहूँ न जननी
साथी करम के करनवा बतवनी
ना रोजी, ना रोटी, न रहे के मकनवा
बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा
माटी, पत्थर, धातु और कागज पर देखनी
दिहनी बहुते कुछुवो न पवनी
इ लोरवा, इ लहूवा से बूझल पियसवा
बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा।

( कौन है देवी-देवता और कौन है मालिक
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
बाढ़ में डूबे, सुखाड़ में सुखाए
जाड़ों की रातें कलप के बिताए
करें किस पर भरोसा, पूछें हम तरीका
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
जाति-धरम को हमने कुछ नहीं जाना
साथी कर्म के कारणों को बताए
न रोजी है, न रोटी और न रहने का मकान
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
मिट्टी, पत्थर, धातु और कागज पर देखे
उसे दिए बहुत, पर कुछ भी नहीं पाए
आँसू और खून से अपनी प्यास बुझाए
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।)

अध्यक्षीय वक्तव्य में जितेंद्र कुमार ने गरीबों के प्रति शासकवर्ग की उपेक्षा के तथ्यों से जनता को अवगत कराया। उन्होंने बताया कि कारपोरेट कंपनियाँ और उनके इशारे पर चलने वाली सरकारें इस देश में किसान-मजदूरों को तबाह करने में लगी हुई हैं। प्रधानमंत्री ने खेतिहर मजदूरों के लिए तय न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी मनरेगा में देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया कि अगर ऐसा नहीं किया गया तो सरकार पर 1072 करोड़ का भार आ जाएगा, जबकि कारपोरेट को 4500 करोड़ छूट देने में उन्हें जरा भी हिचक नहीं हुई। उन्होंने नीतीश बाबू के सुशासन में फैलते भ्रष्टाचार की भी चर्चा की। स्कूलों में फर्जी नामांकनों के जरिए जनता के खजाने की लूट का जिक्र किया और सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री आखिर किनके प्रतिनिधि हैं। जितेंद्र कुमार ने कारपारेट की मदद से जयपुर लिटेररी फेस्टिवल किए जाने और उसमें अंग्रेजी को महत्व दिये जाने की वजहों से से भी अवगत कराया और कहा कि किसान का बेटा राहुल गांधी से भी अच्छी अंग्रेजी या सोनिया गांधी से भी अच्छी इटैलियन बोले, यह कौन नहीं चाहेगा, लेकिन अपनी भाषाओं की कीमत पर अगर वह ऐसा करेगा तो वह अपने ही समाज और लोगों के साथ नहीं रह पाएगा। उन्होंने कहा कि सरकारों को बेरोजगारी दूर करने की कोई चिंता नहीं है, बल्कि 30-40 साल पहले जो पद सृजित किए गए थे, उन्हें भी लगातार खत्म किया जा रहा है। शिक्षकों की संख्या लगातार कम होती जा रही है, ऐसे में मजदूर-किसानों के बेटे कहाँ से अच्छी शिक्षा पा सकेंगे। खुद सरकारी आंकड़े के अनुसार देश की 72प्रतिशत जनता 20 रुपये से कम दैनिक आय पर जीवन गुजारने को विवश है और सरकार आधार प्रमाण पत्र बनाने में लगी हुई है और उसमें भी कमाई के लिए मार हो रही है। उन्होंने यह बताया कि आधार प्रमाण बनाने के लिए योजना आयोग और चिंदबरम के बीच क्यों टकराव हुआ और किस तरह दोनों के बीच बंदरबांट हो गई कि आधा-आधा कार्ड दोनों बनाएँगे। उन्होंने सरकारों के लूट और झूठ के तथ्यों का खुलासा करते हुए कहा कि जो लोग समग्र विकास और सच्चा समाजवाद चाहते हैं उनके संघर्षों में गोरख के गीत आज भी बेहद मददगार हैं। गोरख पांडेय के गीतों में गरीबों और भूमिहीन मेहनतकश किसानों के सपनों को अभिव्यक्ति मिलती है, उनकी लड़ाइयों के लिए वे एक मजबूत औजार की तरह हैं।

कार्यक्रम में नाटक प्रस्तुत करते कलाकार।

इस मौके पर युवानीति के रतन देवा, चैतन्य कुमार, कुमद पटेल, सूर्याप्रकाश, अमित मेहता, राजेश कुमार, साहेब, मु. फिरोज खान एवं राजू रंजन ने ग्रामीण दर्शकों की भारी मौजूदगी के बीच अपने नवीनतम नाटक ‘नौकर’ की प्रस्तुति की, जिसका दर्शकों ने काफी लुफ्त लिया। हास्य-व्यंग्य से भरा यह नाटक गरीबों को शिक्षित बनाने का संदेश देता लगा। भ्रष्टाचार, मुफ्तखोरी, महंगाई, बेरोजगारी की स्थिति को लेकर इसमें कटाक्ष भी किया गया है। नाटक में जब नौकर यह कहता है कि बताइए, क्या गरीबी और महंगाई के लिए हम दोषी हैं, तो लोग वाह, वाह कर उठे, क्योंकि यह तो उन्हीं के मन की बात थी। नौकर ने जब मुखिया के आदमी से इंदिरा आवास योजना के तहत घर के लिए आग्रह किया, तो उसने कहा कि वह गरीबों के लिए नहीं है, बल्कि मुखिया के आदमियों के लिए है और उनके लिए है जो पहले से ही सुविधा-संपन्न हैं, इस कटाक्ष से भी दर्शक बहुत खुश हुए। रमता जी के गीत ‘हमनी देशवा के नया रचवइया हईं जा/ हमनी साथी हईं आपस में भइया हईं जा’ के युवानीति के कलाकारों द्वारा गायन से कार्यक्रम का समापन हुआ।

उसके बाद स्थानीय आयोजको ने स्वादिष्ट लिट्टियों का भोज कराया। लौटते वक्त अंधेरा हो चुका था। इस बार ड्राइवर का वीडियो बंद था। युवानीति के कलाकार गाए जा रहे थे- महंगइया ए भइया बढ़ल जाता, अइसन गांव बना दे जहवां अत्याचार ना रहे/ जहां सपनों में जालिम जमींदार ना रहे, साथिया रात सपने में आके तूने मुझको बहुत है सताया। कोई जगजीत सिंह की गायी हुई गजल को गा रहा है तो उसके बाद कोई मुक्तिबोध को गा रहा है- ऐ मेरे आदर्शवादी मन, ऐ मेरे सिद्धांतवादी मन, अब तक क्या किया, जीवन क्या जीया…। हमारी समवेत आवाजें रात के सन्नाटे को चीर रही हैं। शहर पहुँचते ही फिर से शोरगुल से सामना होता है। भोला जी को उनके घर पहुँचाता हूँ। जीवन भर वे किराये के घर में रहे हैं। बताते हैं कि छोटा बेटा बैनर वगैरह लिखने का काम करने लगा है, जिससे घर का किराया दे पाना संभव हो पा रहा है। दर्जनों मूर्तियों और बल्गर गानों और तेज म्यूजिक से होते हुए वापस कमरे पर लौटता हूँ।

दरभंगा से समकालीन चुनौती के संपादक सुरेंद्र प्रसाद सुमन का फोन आता है, उत्साह और बढ़ जाता है। दरभंगा, मधुबनी, बेगूसराय और समस्तीपुर में भी आज गोरख की याद में आयोजन हुए हैं। दरभंगा में लोहिया-चरण सिंह कॉलेज में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता पृथ्वीचद्र यादव और रामअवतार यादव ने की और मुख्य वक्तव्य खुद सुरेंद्र प्रसाद सुमन ने दिया। नवल किशोर सिंह, विनोद विनीत, डॉ. गजेंद्र प्रसाद यादव, प्रो. अवधेश कुमार, उमाशंकर यादव और आइसा नेता संतोष कुमार ने भी अपने विचार रखे।

मधुबनी जिले के चकदह में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. चंद्रमोहन झा ने की तथा संचालन कल्याण भारती ने किया। गोरख पांडेय के साथ जेएनयू में रह चुके प्रो. मुनेश्वर यादव ने उनसे जुड़ी यादों को साझा किया। यहाँ जनसंस्कृति के प्रति गोरख की अवधारणा पर विचार-विमर्श हुआ। प्रभात खबर के ब्यूरो चीफ अमिताभ झा ने भी अपने विचार व्यक्त किए। नवगठित टीम के संयोजक अशोक कुमार पासवान के नेतृत्व में कलाकारों ने गोरख पांडेय, अदम गोंडवी, सफदर हाशमी के जनगीतों का गायन किया। धन्यवाद ज्ञापन कामरेड जटाधर झा ने किया।

समस्तीपुर में गोरख पांडेय स्मृति समारोह में वरिष्ठ कवि और आलोचक डा. सुरेद्र प्रसाद, रामचंद्र राय आरसी, वंदना सिन्हा, इनौस नेता सुरेद्र प्रसाद सिंह, आइसा नेता मिथिलेश कुमार, खेमस नेता उमेश कुमार और उपेंद्र राय तथा माले के जिला सचिव जितेंद्र कुमार ने अपने विचार व्यक्त किए। गीतों और नाटकों की प्रस्तुति भी हुईं।

बेगूसराय में जसम की नाट्य संस्था ‘रंगनायक’ ने नाटक ‘छियो राम’ की प्रस्तुति की और गोरख की याद में कवि गोष्ठी आयोजित हुई, जिसकी अध्यक्षता मैथिली कथाकार प्रदीप बिहारी ने की। संचालन दीपक सिन्हा ने किया। इस मौके पर मनोज कुमार, विजय कृष्ण, दीनाथ सौमित्र, कुँवर कन्हैया, अभिजीत, प्रदीप बिहारी ने अपनी कविताओं का पाठ किया। धन्यवाद ज्ञापन अरविंद कुमार सिन्हा ने किया।

पुण्‍यति‍थि‍ पर गोरख पांडेय की उत्‍प्रेरक यादें साझा कीं

देवरि‍या : गोरख स्मृति संकल्प और जसम, उत्तर प्रदेश का पांचवा राज्य सम्मेलन 29-30 जनवरी, 2011 को कवि गोरख पांडेय के गांव में संपन्न हुआ। गोरख के गुजरने के 21 साल बाद जब पिछले बरस लोग देवरिया जनपद के इस ‘पंडित का मुंडेरा’ गांव में जुटे थे,  तब करीब 65 लोगों ने गोरख से जुड़ी यादों को साझा किया था। इस बार भी वे उत्प्रेरक यादें थीं। उनके सहपाठी अमरनाथ द्विवेदी ने संस्कृत विश्वविद्यालय में छात्रसंघ के अध्यक्ष और बीचयू में एक आंदोलनकारी छात्र के बतौर उनकी भूमिका को याद किया। उन्होंने बताया कि गोरख अंग्रेजी के वर्चस्व के विरोधी थे, लेकिन हिंदी के कट्टरतावाद और शुद्धतावाद के पक्षधर नहीं थे। बीचयू में संघी कुलपति के खिलाफ उन्होंने छात्रों के आंदोलन का नेतृत्व किया, जिसके कारण उन्हें विश्वविद्यालय प्रशासन की यातना भी झेलनी पड़ी। साम्राज्यवादी-सामंती शोषण के खिलाफ संघर्ष के लिए उन्होंने नक्सलवादी आंदोलन का रास्ता चुना और उसके पक्ष में लिखा। जहां भी जिस परिवार के संपर्क में वह रहे उसे उस आंदोलन से जोड़ने की कोशिश की। भर्राई हुई आवाज में राजेंद्र मिश्र ने उनकी अंतिम यात्रा में उमड़े छात्र-नौजवानों, रचनाकारों और बुद्धिजीवियों के जनसैलाब को फख्र से याद करते हुए कहा कि मजदूरों और गरीबों की तकलीफ से वह बहुत दुखी रहते थे। फसल कटाई के समय वह हमेशा उनसे कहते कि पहले वह अपनी जरूरत भर हिस्सा घर ले जाएं,  उसके बाद ही खेत के मालिक को दें। पारसनाथ जी के अनुसार वह कहते थे कि अन्याय और शोषण के राज का तख्ता बदल देना है और सचमुच उनमें तख्ता बदल देने की ताकत थी। गोरख की बहन बादामी देवी ने बड़े प्यार से उन्हें याद किया। उन्हें सुनते हुए ऐसा लगा जैसे गोरख की बुआ भी वैसी ही रही होंगी, जिन पर उन्होंने अपनी एक मशहूर कविता लिखी थी।

जसम महासचिव प्रणय कृष्ण ने कहा कि जिस संगठन को गोरख ने बनाया था, उसकी तरफ से उनकी कविता और विचार की दुनिया को याद करते हुए खुद को नई उर्जा से लैस करने हमलोग उनके गांव आए हैं। गोरख ने मेहनतकश जनता के संघर्ष और उनकी संस्कृति को उन्हीं की बोली और धुनों में पिरोकर वापस उन तक पहुंचाया था। उन्होंने सत्ता की संस्कृति के प्रतिपक्ष में जनसंस्कृति को खड़ा किया था, आज उसे ताकतवर बनाना ही सांस्कृतिक आंदोलन का प्रमुख कार्यभार है। इसके बाद ‘जनभाषा और जनसंस्कृति की चुनौतियां’  विषय पर जो संगोष्ठी हुई वह भी इसी फिक्र से बावस्ता थी। आलोचक गोपाल प्रधान ने कहा कि हर चीज की तरह संस्कृति का निर्माण भी मेहनतकश जनता करती है, लेकिन बाद में सत्ता उस पर कब्जा करने की कोशिश करती है। भोजपुरी और अन्य जनभाषाओं का बाजारू इस्तेमाल इसलिए संभव हुआ है कि किसान आंदोलन कमजोर हुआ है। समकालीन भोजपुरी साहित्य के संपादक अरुणेश नीरन ने कहा कि जन और अभिजन के बीच हमेशा संघर्ष होता है, जन के पास एक भाषा होती है जिसकी शक्ति को अभिजन कभी स्वीकार नहीं करता, क्योंकि उसे स्वीकार करने का मतलब है उस जन की शक्ति को भी स्वीकार करना। कवि प्रकाश उदय का मानना था कि सत्ता की संस्कृति के विपरीत जनता की संस्कृति हमेशा जनभाषा में ही अभिव्यक्त होगी। कवि बलभद्र की मुख्य चिंता भोजपुरी की रचनाशीलता को रेखांकित किए जाने और भोजपुरी पर पड़ते बाजारवादी प्रभाव को लेकर थी। प्रो. राजेंद्र कुमार ने कहा कि जीवित संस्कृतियां सिर्फ यह सवाल नहीं करतीं कि हम कहां थे, बल्कि वे सवाल उठाती हैं कि हम कहां हैं। आज अर्जन की होड़ है, सर्जन के लिए स्पेस कम होता जा रहा है। सत्ता की संस्कृति हर चीज की अपनी जरूरत और हितों के अनुसार अनुकूलित करती है, जबकि संस्कृति की सत्ता जनता को मुक्त करना चाहती है। प्रेमशीला शुक्ल ने जनभाषा के जन से कटने पर फिक्र जाहिर की। रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ ने कहा कि हिंदी और उससे जुड़ी जनभाषाओं के बीच कोई टकराव नहीं है, बल्कि दोनों का विकास हो रहा है। हमें गौर इस बात पर करना चाहिए कि उनमें कहा क्या जा रहा है।

संगोष्ठी के अध्यक्ष और सांस्कृतिक-राजनीतिक आंदोलन में गोरख के अभिन्न साथी रामजी राय ने कहा कि गोरख उन्हें हमेशा जीवित लगते हैं, वे स्मृति नहीं हैं उनके लिए। जनभाषा में लिखना एक सचेतन चुनाव था। उन्होंने न केवल जनता की भाषा और धुनों को क्रांतिकारी राजनीति की ऊर्जा से लैस कर उन तक पहुंचाया, बल्कि खड़ी बोली की कविताओं को भी लोकप्रचलित धुनों में ढाला, ‘पैसे का गीत’ इसका उदाहरण है। अपने पूर्ववर्ती कवियों और शायरों की पंक्तियों को भी गोरख ने बदले हुए समकालीन वैचारिक अर्थसंदर्भों के साथ पेश किया। रामजी राय ने कहा कि जनभाषाएं हिंदी की ताकत हैं और बकौल त्रिलोचन हिंदी की कविता उनकी कविता है जिनकी सांसों को आराम न था। सत्ता के पाखंड और झूठ का निर्भीकता के साथ पर्दाफाश करने के कारण ही गोरख की कविता जनता के बीच बेहद लोकप्रिय हुई। ‘समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आई’ संविधान में समाजवाद का शब्द जोड़कर जनता को भ्रमित करने की शासकवर्गीय चालाकी का ही तो पर्दाफाश करती है जिसकी लोकप्रियता ने भाषाओं की सीमाओं को भी तोड़ दिया था, कई भाषाओं में इस गीत का अनुवाद हुआ। रामजी राय ने गोरख की कविता ‘बुआ के नाम’ का जिक्र करते हुए कहा कि मां पर तो हिंदी में बहुत-सी कविताएं लिखी गई हैं, पर यह कविता इस मायने में उनसे भिन्न है कि इसमें बुआ को मां से भी बड़ी कहा गया है। संगोष्ठी का संचालन आलोचक आशुतोष कुमार ने किया।

सांस्कृतिक सत्र में हिरावल (बिहार) के संतोष झा, समता राय, डी.पी. सोनी, राजन और रूनझुन तथा स्थानीय गायन टीम के जितेंद्र प्रजापति और उनके साथियों ने गोरख के गीतों का गायन किया। संकल्प (बलिया) के आशीष त्रिवेदी, समीर खान, शैलेंद्र मिश्र, कृष्ण कुमार मिट्ठू, ओमप्रकाश और अतुल कुमार राय ने गोरख पांडेय, अदम गोंडवी, उदय प्रकाश, विमल कुमार और धर्मवीर भारती की कविताओं पर आधारित एक प्रभावशाली नाट्य प्रस्तुति की। आशीष मिश्र ने भिखारी ठाकुर के मशहूर नाटक विदेशिया के गीत भी सुनाए। इस दौरान लोकधुनों का जादुई असर से लोग मंत्रमुग्ध हो गए। इस अवसर पर एक काव्यगोष्ठी भी हुई, जिसमें अष्टभुजा शुक्ल, कमल किशोर श्रमिक, रमाशंकर यादव विद्रोही, राजेंद्र कुमार, कौशल किशोर, रामजी राय, प्रभा दीक्षित, चंद्रेश्‍वर, भगवान स्वरूप कटियार, डॉ. चतुरानन ओझा, सच्चिदानंद, मन्नू राय, सरोज कुमार पांडेय ने रचनाओं का पाठ किया। संचालन सुधीर सुमन ने किया।

सम्मेलन में प्रतिनिधियों ने मनोज सिंह को जसम, उ.प्र. के राज्य सचिव और प्रो. राजेद्र कुमार को अध्यक्ष के रूप में चुनाव किया। इस अवसर पर एक स्मारिका भी प्रकाशित की गई है, जिसमें गोरख की डायरी से प्राप्त कुछ अप्रकाशित कविताएं, जनसंस्कृति की अवधारणा पर उनका लेख और उनके जीवन और रचनाकर्म से संबंधित शमशेर बहादुर सिंह, महेश्‍वर और आशुतोष के लेख और साक्षात्कार हैं।

इस बीच 29 जनवरी को बिहार के आरा और समस्तीपुर में भी गोरख की स्मृति में आयोजन हुए। आरा में काव्यगोष्ठी की अध्यक्षता कथाकार नीरज सिंह, आलोचक रवींद्रनाथ राय और जसम के राज्य अध्यक्ष रामनिहाल गुंजन ने की तथा संचालन राकेश दिवाकर ने किया। इनके अतिरिक्त सुमन कुमार सिंह, ओमप्रकाश मिश्र, सुनील श्रीवास्तव,  के.डी. सिंह, कृष्ण कुमार निर्मोही, भोला जी, अरुण शीतांश, संतोष श्रेयांस, जगतनंदन सहाय, अविनाश आदि ने अपनी कविताओं का पाठ किया तथा युवानीति के कलाकारों ने गोरख के गीत सुनाए। समस्तीपुर में डॉ. सुरेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में गोरख की याद में आयोजित संकल्प संगोष्ठी में रामचंद्र राय ‘आरसी’, डॉ. खुर्शीद खैर, डॉ. मोईनुद्दीन अंसारी, डॉ. एहतेशामुद्दीन, डा. सीताराम यादव और डॉ. सुरेंद्र प्रसाद सुमन ने विचार रखे।

प्रस्तुति : सुधीर सुमन