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खेल में खेल : अनुराग

राष्ट्रमंडल खेलों में हो रहे भ्रष्टाचार को लेकर मैं हर भारतीय की तरह चिंतित था। मैं गुमसुम बैठा देश के कर्णधारों के गिरते स्तर के बारे में सोच रहा था। चौधरी साहब आ गए। मेरे कंधे को हिलाया तो भ्रष्टाचार की दुनिया से बाहर निकल आया।
वह मुस्काराए, ”बरखुद्दार क्या सोच रहे हो?”
मैं मुस्काराया, ”राजनेता असली खिलाड़ी हैं। वे खेलों में भी खेल कर रहे हैं। उन्हें न मैदान की जरूरत है और न ही प्रैक्टिस की। जन्मजात खिलाड़ी हैं।”
चौधरी साहब ने जोरदार ठहाका लगाया, ”तुम में यही कमी है कि अपने दिमाग से नहीं सोचते। जो पढ़-सुन लेते हो, उसी पर खून सुखाने लगते हो। राष्ट्रमंडल खेलों ने तो नेताओं-अफसरों की आत्मा को जगा दिया है। इसी का नतीजा है कि उनमें ईमानदारी बढ़ी है।”
मैंने रोष में कहा, ”बाजार में 20 से 40 हजार रुपये में मिलने वाली ट्रेडमिल को करीब 10 लाख रुपये के किराए पर लिया गया है, और वह भी मात्र 45 दिनों के लिए। 460 रुपये में मिलनेवाला साबुन का डिस्पेंसर 3397 रुपये में, 75 रुपये का प्लग प्वाइंट 1219 रुपये में, 111 रुपये का डस्टबिन 1167 रुपये में, 1800 रुपये का पेडेस्टल फैन 4412 रुपये में किराए पर लिया गया है। यह तो नमूने भर हैं। नियुक्तियों से लेकर हर किसी में घोटाला रहा है और आपको ईमानदारी दिखाई दे रही है?”
वह दृढ़ता से बोले, ”बिल्कुल। हमारे देश में सब काम कागजों में करने का रिवाज है। कागजों में तालाब बनते हैं, उनके लिए पैसा लिया जाता है। फिर उन्हें भरने के लिए पैसा लिया जाता है। हवा में फसलें उगाई जाती हैं और कट जाती है। पशुओं का चारा नेताओं-अफसरों के पेट में चला जाता है, वे कोलतार पी जाते हैं और डकार भी नहीं लेते। विकास की योजाएं कागजों में बनती हैं और खुशहाली आ जाती है। अब तुम ही बताओ, राष्ट्रमंडल खेलों में कहां भ्रष्टाचार हो रहा है। सामान खरीदा तो गया है, किराए पर भी लिया गया है। ऐसा तो नहीं हुआ कि लिया ही नहीं गया हो? नियुक्तियां भी वास्तव में हुई हैं। छोटी दुकान में जो चीज दो रुपये में मिलती है, वही बड़ी दुकान में चार की मिलती है। राष्टï्रमंडल खेल देश की प्रतिष्ठा से जुड़ा सवाल है। और गिल साहब, सही कह रहे हैं कि बारात दरवाजे पर आ गई है। जिन लोगों ने बहन-बेटी की शादी की है, वे अच्छी तरह से जानते हैं कि कितनी ही कांट-छांट करो, लेकिन बजट बढ़ ही जाता है। और जब बारात दरवाजे पर आ जाती है तो पैसे का मुंह नहीं देखा जाता, बल्कि इज्जत बचाई जाती है। इसलिए इन सबको को न देखो, न सुना और न कहो। नेताओं-अफसरों की नियत पर शक मत करो। बस खेलों की कामयाबी की सोचो।”
मेरा रोष कम नहीं हुआ, ”लेकिन यदि सारा काम समय पर पूरा हो जाता तो कम पैसे में ही सारा काम हो जाता।”
चौधरी साहब ने कहा, ”हम किसी को शाम छह बजे मिलने का समय देते हैं तो साढ़े छह बजे तक पहुंचते हैं कि वह टाइम से नहीं आएगा। दूसरा भी सोचता है कि वह टाइम से नहीं आएगा और साढ़े छह बजे तक पहुंचता है। समय की पाबंदी तो हमारे संस्कार में ही नहीं है। काम को लेट करना तो हमारी आदत है। पेपरों की तैयारी हम पूरे साल नहीं करते, बल्कि ऐन टाइम पर कुंजी और नोट्स से रट्टा लगाकर पास होते हैं। इसलिए खेलों की तैयारी की लेटलतीफी में किसी का कोई दोष नहीं है। देखते रहो खेल शुरू होने से पहले सब काम खत्म हो जाएगा।”
मैं तो चौधरी साहब से सहमत हो गया हूं। और आप…।