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विवेक भटनागर की तीन ग़ज़लें

विवेक भटनागर

लगभग तीन दशक से साहित्य में सक्रिय विवेक भटनागर हिंदी ग़ज़ल के प्रतिनिधि हस्ताक्षर हैं। उनकी ग़ज़लें मुख्य तौर पर आम आदमी की पीड़ा से सरोकार रखती हैं, वहीं उनके शे’रों में आध्यात्मिक स्वर भी प्रमुखता से सुनाई पड़ता है। हिंदी अकादमी दिल्ली समेत कई संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत व सम्मानित इस ग़ज़लकार की प्रस्तुत हैं तीन ग़ज़लें

1

आजकल हालात कुछ अच्छे नहीं हैं
सच के पैरोकार ही सच्चे नहीं हैं

आंकड़ों के झुनझुनों का क्या करेंगे
मत हमें बहलाओ, हम बच्चे नहीं हैं

इस नई संवेदना का रूप देखें
नाक ऊंची है मगर कंधे नहीं हैं

हम रियाया हैं मेरे जिल्लेइलाही
हम तुम्हारे ताश के पत्ते नहीं हैं

उन पे है अल्लाह की नज़रे इनायत
जो किसी अल्लाह के बंदे नहीं हैं

हैं हमारी सिरफिरी ख़्वाहिश का बोझा
फूल से बच्चों के ये बस्ते नहीं हैं

वो सफ़र भी क्या सफ़र है, जिस सफ़र में
मंज़िलें तो हैं मगर रस्ते नहीं हैं

2

कोई आए तो रोशनी लेकर
बुझती आंखों की ज़िंदगी लेकर

आसमानों पे आंकड़े मत लिख
आ ज़मीनों पे बेहतरी लेकर

अब ख़ुलूसो-वफ़ा की क्या क़ीमत
क्या करेगा ये आदमी लेकर

एक ही दिल था मेरे सीने में
जा रहा है वो अजनबी लेकर

मैं समंदर हूं, पानियों का हुजूम
फिर भी जीता हूं तिश्नगी लेकर

वस्ल के वक़्त अपनी आंखों में
बैठ जाती हो इक नदी लेकर

जी रहा है विवेक भटनागर
शे’र दर शे’र त्रासदी लेकर

3

सुख़न में हाज़िरी है और क्या
मुहब्बत आपकी है और क्या

मगर से मछलियों की दुश्मनी
सरासर ख़ुदक़ुशी है और क्या

इसी पर टांग दे नेकी-बदी
समय की अलगनी है और क्या

धुएं के साथ गहरी दोस्ती!
हवा भी बावली है और क्या

झुकी नज़रों से सबकुछ देखना
अदा-ए-दिलबरी है और क्या

अभी रफ़्तार की बातें न कर
सड़क यह अधबनी है और क्या

ज़ुबां पर बंदिशें रख दो मगर
नज़र भी बोलती है और क्या

सहाफ़त के बदलते दौर में
ख़बर अब सनसनी है और क्या

तवे पर रक़्स है इक बूंद का
हमारी ज़िंदगी है और क्या

उतरकर ख़ुद में ख़ुद को देख लूं
ये ख़्वाहिश आख़िरी है और क्या

विवेक भटनागर की चार ग़ज़लें

विवेक भटनागर

विवेक भटनागर

एक

उसके दिल में इस क़दर तनहाइयां रक्खी मिलीं
उसकी आंखों में वही परछाइयां रक्खी मिलीं

कुछ जगह रक्खी मिली दीवार अपने दरमियां
कुछ जगह पर गहरी-चौड़ी खाइयां रक्खी मिलीं

टूटता दम दफ़्तरों में मां की ममता का मिला
परवरिश करने को घर में बाइयां रक्खी मिलीं

कुछ किताबों में दबी थीं बेतरह दिलचस्पियां
टेक्स्ट बुक में तो फ़क़त जम्हाइयां रक्खी मिलीं

नाज़ था हमको जवानी पर मगर कुछ दिन हुए
रुख़ पे अपने झुर्रियां और झाइयां रक्खी मिलीं

ज़र्दियां मजदूर-मेहनतकश के थीं चेहरों पे जो
मेरी ग़ज़लों में वही रानाइयां रक्खी मिलीं

दो

शबे ग़म इस क़दर ठहरी हुई है
क़रीब आकर सहर ठहरी हुई है

जहां से हम चले मंज़िल की जानिब
वहीं पर रहगुज़र ठहरी हुई है

छलक कर आंख से पाकीज़गी की
चमक रुख़सार पर ठहरी हुई है

बताती है सही दो बार टाइम
घड़ी चारों पहर ठहरी हुई है

टहल कर रेत में लौटा समंदर
किनारे पर लहर ठहरी हुई है

करे किससे शिकायत पत्थरों की
ये डाली बेसमर ठहरी हुई है

किसी दिन भी बदल सकता है मंज़र
बहुत दिन से नज़र ठहरी हुई है

तीन

हां, तो मैं कह रहा था कि आते रहा करो
रिश्ता वही है, जिसको निभाते रहा करो

अपनी मुहब्बतों को लुटाते रहा करो
बदले में दुगना प्यार कमाते रहा करो

उठता है कोई, उसको गिराने को हैं बहुत
गिरते हुओं को यार उठाते रहा करो

या तो बढ़ाओ ज्ञान सुनो सबकी गुफ़्तगू
या कितना ज्ञान है ये बताते रहा करो

होकर बड़े वो नींद की गोली न खाएंगे
बच्चों को लोरी गा के सुलाते रहा करो

नन्हे दियो! तुम्हीं से उजालों की रौनकें
जल-जल के तीरगी को बुझाते रहा करो

तुमको तो मोक्ष चाहिए, दुनिया की क्या पड़ी
गंगा में सारे पाप बहाते रहा करो

हैं ये क़लम उठाने की शर्तें विवेक जी
जागे रहो, सभी को जगाते रहा करो

चार

कुछ लोग दिखावे की फ़क़त शान रखे हैं
तलवार रखें या न रखें, म्यान रखे हैं

गीता ये रखे हैं, तो वो कुरआन रखे हैं
हम घर में मगर मीर का दीवान रखे हैं

बाज़ार है ये, नींद के मारे हैं खरीदार
व्यापारी यहां ख़्वाब की दूकान रखे हैं

जब ज़िंदगी नुकसानो नफ़े पे नहीं चलती
सुख-दुख के लिए लोग क्यों मीज़ान रखे हैं

ग़ुरबत को धरम मान के कुछ लोग तो अक्सर
नवरात्र के व्रत, रोज़ए रमज़ान रखे हैं

जो हक़ हैं ग़रीबों के उन्हें भीख समझकर
देते हैं अगर, उनपे वो एहसान रखे हैं

पत्थर वो चलाते हुए टुक सोच तो लेता
पुरखों ने इन्हीं संग में भगवान रखे हैं

रमेश तैलंग की गजलें

रमेश तैलंग

02 जून 1946 को टीकमगढ़, मध्‍य प्रदेश में जन्‍में रमेश तैलंग ने प्रचूर मात्रा में बाल साहि‍त्‍य लि‍खने के अलावा कई महत्‍वपूर्ण गजलें भी हिंदी साहि‍त्‍य को दी हैं। उनकी कुछ गजलें-

 1.

जब कुछ नहीं बना तो हमने इतना कर दिया..

खाली हथेली पर दुआ का सिक्का धर दिया।

 

कब तक निभाते दुश्मनी हम वक्त से हर दिन

इस बार जब मिला वो तो बाँहों में भर लिया।

 

उस गाँव के बाशिंदों में अजीब रस्म है,

बच्ची के जन्म लेते ही गाते हैं मर्सिया।

 

बदली हुकूमतें मगर न किस्मतें बदलीं,

मुश्किलजदा लोगों को सबने दर बदर किया।

 

मुद्दा कोई हो, उसपे बोलना तो बहुत दूर,

संजीदा हो के सोचना भी बंद कर दिया।

 

2.

दुःख दर्द की मिठास को खारा नहीं बना.

खामोशी को ज़ुबान दे, नारा नहीं बना।

 

जिसने जमीन से लिया है खाद औ’ पानी

उस ख्वाब को फ़लक का सितारा नहीं बना।

 

वो बेज़ुबाँ है पर तेरी जागीर तो नहीं,

उसको, शिकार के लिए, चारा नहीं बना।

 

घुटने ही टेक दे जो सियासत के सामने,

अपने अदब को इतना बिचारा नहीं बना।

 

जज़्बात कोई खेल दिखाने का फ़न नहीं

जज़्बात को जादू का पिटारा नहीं बना।

 

इंसान की फितरत तो है शबनम की तरह ही,

अब उसको, जुल्म कर के, अंगारा नहीं बना।

 

3.

एक किताब पड़ी थी अलमारी में कई महीने से

मुद्दत बाद मिली तो रोई लिपट-लिपट कर सीने से।

 

कहा सुबकते हुए- ‘निर्दयी अब आए हो मिलने को

जब गाढ़े संबंधों के आवरण हो गए झीने से

 

और जरा देखो, कैसे बेनूर हो गए ये अक्षर

कभी चमकते थे जो अंगूठी में जड़े नगीने से

 

और याद है? जब आँखें भारी होते ही यहाँ-वहाँ

सो जाते तुम मुझे सिरहाने रखकर बडे करीने से

 

किस मुँह से अब अपना ये सर्वस्व सौंप दूँ फिर तुमको

धूल धूसरित देह पड़ी है लथपथ आज पसीने से।

 

4.

हो सके तो ज़िन्दगी को शायरी कर दे खुदा!

शायरी में ज़िन्दगी के रंग सब भर दे खुदा!

 

और कुछ चाहे भले ही दे, न दे, मर्ज़ी  तेरी

ज़िन्दगी  को जीने लायक तो मुकद्दर दे खुदा!

 

क्या करेंगे सिर्फ़ दीवारें, या छत लेकर यहाँ,

देना है तो एक मुकम्मल छोटा-सा घर दे खुदा!

 

दिल के हिस्से में छलकता एक दरिया डाल दे,

फिर समूचे जिस्म को चाहे तो संग कर दे खुदा!

 

चैन दिन का, रात की नींदें उड़ा कर ले गया,

खौफ की आँखों में भी थोड़ा-सा डर भर दे खुदा!

 

सर कलम करने को बैठे हैं यहाँ आमादा जो,

उनका बस एक बार ही सजदे में सर कर दे खुदा!

 

5.

उड़ने का हुनर आया जब हमें गुमां न था

हिस्से में परिंदों के कोई आसमां न था।

 

ऐसा नहीं कि ख्वाहिशें नहीं थी हमारी,

पर उनका सरपरस्त कोई मेहरबां न था।

 

एक ख्वाब क़त्ल करके, एक ख्वाब बचाते,

अपने जिगर में ऐसा बड़ा सूरमा न था।

 

तन्हा सफर में इसलिए तन्हा ही रह गए

थे रास्ते बहुत से, मगर कारवाँ न था।

 

परदेस गए बच्चे तो वहीं के हो गए

इस देस में हुनर तो था पर कद्रदाँ न था।

 

6.

यादों के खज़ाने में कितने लोग भरे हैं

बिछुड़े हैं जब से हर घड़ी बेचैन करे हैं।

 

तस्वीरों के अंदर भी वे जिंदा-से लगे हैं

और हम हैं कि उनके बिना जिंदा भी मरे हैं।

 

इस झूठे भरम में कि वे कल लौट आएं फिर

सीने पे कब से सब्र का एक बोझ धरे हैं।

 

एक ओर सियाही है तो एक ओर रोशनी,

अपने ही साये से ज्यों हर वक्त डरे हैं।

 

थमता नहीं सैलाब, आँधियों में मोह की

तर आस्तीं है, आँसुओं के मोती झरे हैं।

दो ग़ज़लें : प्राण शर्मा

ब्रिटेन में बसे भारतीय मूल के हिन्‍दी लेखक प्राण शर्मा की दो गजलें-

1.

रहके अकेला इस दुनिया में करना सब कुछ हासिल प्यारे
मैं  ही जानू  कितना ज़्यादा  होता  है ये  मुश्किल प्यारे

प्यारे-प्यारे,  न्यारे-न्यारे  खेल-तमाशे सब के सब हैं
आ कि ज़रा तुझको दिखलाऊँ दिल वालों की महफ़िल प्यारे

मोह नहीं जीवन का तुझको, मान लिया है मैंने लेकिन
दरिया में हर डूबने वाला चिल्लाता है साहिल प्यारे

कुछ तो चलो तुझको अनजानी राहों की पहचान हुई है
कैसा रंज, निराशा कैसी पा न सका जो मंजिल प्यारे

सबकी बातें सुनने वाले अपने दिल की बात कभी सुन
तेरी खैर मनाने वाला तेरा अपना है दिल  प्यारे

कुछ तो कर महसूस खुशी को कुछ तो कर महसूस तसल्ली
कुछ तो आये मुँह पर रौनक कुछ तो हो दिल झिलमिल प्यारे

तेरे-मेरे रिश्ते-नाते ‘प्राण’  भला क्यों सारे टूटें
माना, तू मेरे नाकाबिल,  मैं तेरे नाकाबिल प्यारे

2.

दोस्ती  यूँ  भी तेरी  हम  तो निभायेंगे
मानोगे जब तक नहीं तुझको मनायेंगे

सुनते हैं,  बह जाती है सब मैल नफ़रत की
प्यार की गंगा में हम खुल कर नहायेंगे

कुछ भलाई जागी है हम में भी ए यारो
पंछियों को हम भी अब दाने खिलायेंगे

क्या हुआ जो बारिशों में ढह गयी यारो
राम  ने  चाहा  कुटी  फिर  से  बनायेंगे

हम फ़क़ीरों का ठिकाना हर जगह ही है
शहर से निकले तो जंगल ही बसायेंगे

आप  जीवन  में  हमारे  आके  तो देखें
आपको दिल में कभी सर पर बिठायेंगे

एक से रहते नहीं दिन ‘प्राण’  जीवन के
आज रोते हैं अगर कल मुस्करायेंगे

विवेक भटनागर की तीन गजलें

एक

यह नहीं देखा कि कंधों पर खड़ा है
लोग यह समझे कि वो सबसे बड़ा है

पुण्य के आकाश की सीमा नहीं है
पाप जल्दी भरने वाला इक घड़ा है

भूख क्यों हर रोज लगती है, न जाने
इस गरीबी का ये मुश्किल आँकड़ा है

देवता को हम भला क्यों पूजते हैं
पूजिए, मजदूर का ये फावड़ा है

साँप मिलते हैं विषैले उस जगह पर
जिस जगह पर भी किसी का धन गड़ा है

यह वही है जो कि कंधों पर खड़ा था
भीड़ के पैरों तले कुचला पड़ा है।

दो

अपना खुद से सामना है
इसलिए मन अनमना है

सब तनावों की यही जड़
खुद का खुद से भागना है

इसको भी तुम जीत मानो
खुद से कैसा हारना है

अपनी नजरों में गिरा जो
उसको फिर क्या मारना है

डूब जाने को सतह तक
लोग कहते साधना है।

तीन

वो आशियानों में घर रखेंगे
कि आसमानों के पर रखेंगे?

तुम्हारे कदमों के नीचे काँटे
तुम्हारे कदमों पे सर रखेंगे

तुम्हारा साया दगा करेगा
जो रास्ते में शजर रखेंगे

कि तुम भी शायद मुकर ही जाओ
हम आँखें अश्कों से तर रखेंगे

इधर है सोफा उधर है टीवी
ईमानदारी किधर रखेंगे?

तुम अपने पैरों को बाँध रक्खो
तुम्हारे आगे सफर रखेंगे

जो खुद ही खबरों की सुर्खियां हैं
वो क्या हमारी खबर रखेंगे।

प्राण शर्मा की तीन ग़ज़लें

ग़ज़लकार, कहानीकार और समीक्षक प्राण शर्मा का जन्म वजीराबाद (पाकिस्तान)  में 13 जून 1937 को हुआ। प्राथमिक शिक्षा दिल्ली में हुई और पंजाब विश्वविद्यालय से एम. ए., बी.एड. किया। वह 1965 से यू.के. में प्रवास कर रहे हैं। उनकी दो पुस्‍तकें ‘ग़ज़ल कहता हूँ’ व ‘सुराही’ (मुक्तक-संग्रह) प्रकाशित हो चुकी हैं। इसके अलावा ‘अभिव्यक्ति’ में प्रकाशित ‘उर्दू ग़ज़ल बनाम हिन्‍दी ग़ज़ल’ और ‘साहित्य शिल्पी’ पर ‘ग़ज़ल: शिल्प और संरचना’ के 10 महत्‍वपूर्ण लेख हैं। उनकी तीन गज़लें-

1.

कुछ नया करके दिखाने को मचलता रहता है
मेरा ऐसा दोस्त है जो घर बदलता रहता है

धुन का पक्का कुछ न कुछ तो होता है वो साहिबो
मीठे फल के जैसा जिसका भाग्य फलता रहता है

पहले  जैसा तो  कभी  रहता  नहीं  वो  दोस्तो
धीरे-धीरे  आदमी  का  मन बदलता रहता है

किसलिए ए दोस्त अपने दिल को हम छोटा करें
ज़िन्दगी में घाटे का व्यापार  चलता  रहता है

ये  ज़रूरी  तो नहीं  औरों  की खुशियाँ देख  कर
हर बशर ही द्वेष की ज्वाला में जलता रहता है

ज़लज़ले या आधियाँ, तूफ़ान या बरबादियाँ
कुछ न कुछ संसार में ए दोस्त चलता रहता है

`प्राण`कोई क्या करेगा उसकी नीयत पर यक़ीन
रंग गिरगिट की तरह वो तो बदलता रहता है

2.

उड़ते  हैं  हज़ारों  आकाश में पंछी
ऊँची नहीं होती परवाज़ हरिक की

होना था असर कुछ इस शहर भी उसका
माना कि अँधेरी उस शहर चली थी

इक  डूबता  बच्चा कैसे  वो बचाता
इन्सान था लेकिन हिम्मत की कमी थी

इक शोर सुना तो डर कर सभी भागे
कुछ मेघ थे गरजे बस बात थी इतनी

सूखी सी जो होती जल जाती वो पल में
कैसे भला जलती गीली कोई लकड़ी

दुनिया को समझना अपने नहीं बस में
दुनिया  तो  है  प्यारे  अनबूझ  पहेली

पुरज़ोर  हवा  में  गिरना ही था उसको
ए ‘प्राण’ घरों  की दीवारें थी  कच्ची

3.

चेहरों पर हों कुछ उजाले सोचता हूँ
लोग हों खुशियों के पाले सोचता हूँ

तन के काले हों भले ही दुःख नहीं है
लोग मत हों मन के काले सोचता हूँ

हो भले ही धर्म और मजहब की बातें
पर  बहें  मत खूं  के नाले सोचता हूँ

वक़्त था जब दर खुले रहते थे सबके
अब  तो  हैं तालों  पे ताले सोचता हूँ

ढूँढ  लेता  मैं  कहीं  उसका ठिकाना
पाँव  में  पड़ते  न  छाले सोचता हूँ

सावनी ऋतु है, चपल पुरवाइयाँ हैं
क्यों  न  छायें मेघ काले सोचता हूँ

‘प्राण’ दुःख आये भले ही ज़िन्दगी में
उम्र  भर  डेरा  न  डाले  सोचता  हूँ

रंजन जै़दी की दो गज़लें

रंजन ज़ैदी

सीतापुर, उत्तर प्रदेश में जन्में  रंजन जैदी के पाँच कहानी संग्रह, तीन उपन्यास और एक काव्य  संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इनके अलावा असंख्य लेख, साक्षात्कार, टिप्पणियाँ रेडियो आद‍ि विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। रंजन जैदी की दो गज़लें-

फिर कोई ख्वाब

खेल गुड़ियों का हकीकत में बदल जायेगा,
फिर कोई ख्वाब ग़मे-ज़ीस्त में ढल जायेगा।
बन्दन मुट्ठी से निकल आये जो सूरज बाहर,
मोम का शह्र है, हर सिम्त पिघल जायेगा।
देखते-देखते सब उड़ गईं चिड़िया यां  से,
अब मेरा घर भी कड़ी धूप में जल जायेगा।
एक मिट्टी के प्याले की तरह उम्र कटी,
धूप  की  तरह  रहा  वक़्त निकल जायेगा।
घर  की  दीवारें भी बोसीदः कफ़न ओढ़े हैं,
अबकी तूफाँ मेरे ख़्वाबों को निगल जायेगा।
हमने मायूस कमंदों से न जोड़े रिश्ते,
हिज्र की रात का ये चाँद है, ढल जायेगा।

बुलंदी

तुमको गर चाहिए बुलंदी तो,
सायबां को तलाश मत करना/
जिस सितारे को ढूँढते हैं लोग,
उस सितारे की तरह तुम बनना/
इन खलाओं में और सूरज हैं,
और सूरज में भी समंदर हैं/
तुम परिंदे हो आसमां में उड़ो,
बादलों पर यकीन मत करना/
धूप जिस्म को जलाती है,
रूह को जिलाती है/
धूप इक सियासत है,
इससे बेहतर है फासले रखना।
हमारी बेरुखी, उसकी मुहब्बत का ये आलम था,
नशेमन फूँक कर उसने मुझे कंगन दिखाए थे।
मेरे बिस्तर की हर सिलवट में लहरें थीं समंदर की,
कई तूफाँ थे पोशीदाः मगर तकिये छुपाये थे।
ये सच है इक ज़माने से मैं उसके साथ रहता था,
मगर ये भी हकीकत है के हम दोनों पराये थे।
दिए हैं ज़ख्म कुछ इतने के भरपाई नहीं मुमकिन,
मेरे ज़ख्मों ने मेरी सोच के मंज़र बदल डाले।

जाने कहां गया : मीना पाण्‍डे

युवा लेखि‍का और सृजन से की संपादक मीना पाण्डे की गजल-
दूर तक ये शुष्क मरूस्थल दहक रहा,
कलरव वो कोकिलों का जाने कहां चला गया!
मजहब से तौलते हैं इंसानियत सभी,
हम एक हैं विश्वास जाने कहां गया!
मुर्दा है खौफ़ से मासूम निगाहें,
हंसता हुआ जहां वो जाने कहां गया!
खुलेआम कत्ल हो रही इंसानियत यहां,
सारे जहां से अच्छा दंगों में खो गया!
हम हिन्दु-मुसलमान में बंटते चले गये,
अनेकता में एकता नारा ही रह गया!
संभले ना ’गर’ हम अभी तो कल ये कहेंगे,
भारत मेरा महान वो जाने कहां गया!

संजय ग्रोवर की चार गजलें

युवा गजलकार संजय ग्रोवर की चार गजलें-

1

पद सुरक्षा धन प्रतिष्‍ठा हर तरह गढ़ते रहे
और फिर बोले कि हम तो उम्र भर लड़ते रहे
काग़ज़ों की कोठरी में कैद कर डाला वजूद
फिर किसी अखबार में तारीफे-खुद पढ़ते रहे
मंच पर जिन रास्तों के थे मुखालिफ उम्र भर
मंच के पीछे से वो ही सीढ़ियां चढ़ते रहे
नाम पर बदलाव के इतना इज़ाफा कर दिया
रोज़ तस्वीरें बदल कर चौखटे जड़ते रहे
इन अंधेरों में भी होगी प्यार की नन्हीं सी लौ
बस इसी उम्मीद में मेरे क़दम बढ़ते रहे

2.

कोई भी तयशुदा क़िस्सा नहीं हूं
किस्सी साजिश का मैं हिस्सा नहीं हूं
किसी की छाप अब मुझपर नहीं है
मैं ज़्यादा दिन कहीं रुकता नहीं हूं
तुम्हारी और मेरी दोस्ती क्या
मुसीबत में, मैं ख़ुद अपना नहीं हूं
मुझे मत ढूंढना बाज़ार में तुम
किसी दुकान पर बिकता नहीं हूं
मैं ज़िन्दा हूं मुसलसल यूं न देखो
किसी दीवार पर लटका नहीं हूं
मुझे देकर न कुछ तुम पा सकोगे
मैं खोटा हूं मगर सिक्का नहीं हूं
तुम्हे क्यूं अपने जैसा मैं बनाऊँ
यक़ीनन जब मैं ख़ुद तुमसा नहीं हूं
लतीफ़ा भी चलेगा गर नया हो
मैं हर इक बात पर हंसता नहीं हूं
ज़मीं मुझको भी अपना मानती है
कि मैं आकाश से टपका नहीं हूं

3.

जब तलक अनकही, अनसुनी धूप है
दिल को ऐसा लगे गुनगुनी धूप है
बेटियों ने सहारा दिया बाप को
देखो सूरज के सर पे तनी धूप है
‘जन्मदाता ही बेटी से बेज़ार है !’
लेके सूरज को, यूं, अनमनी धूप है
दादियों नानियों सबको समझा रही
देखो ज़ेहन की कितनी ग़नी धूप है
बेईमानी के बादल हैं चारों तरफ
खबरे-ईमान सी सनसनी धूप है
जानलेवा है गरमी औ’ फुटपाथ पर-
मुफलिसों के लिए कटखनी धूप है
सर पे सूरज है और चाँद खिड़की में है
यानि जां पे मेरी आ बनी धूप है

4.

जहाज़ कागज़ी ताउम्र नहीं चलने का
संभल भी जा कि अभी वक्त है संभलने का
अगर तू भेड़चाल में ही इसकी शामिल है
ज़माना तुझसे कोई चाल नहीं चलने का
वो जो बदलाव के विरोधियों के मुखिया थे
कि ले उड़े हैं वही श्रेय युग बदलने का
वो सियासत में साफगोई के समर्थक हैं
सो उनको हक़ है सरे-आम सबको छलने का
जो उनसे हाथ मिलाते हैं जानते ही नहीं
कि वक्त आ रहा है जल्द हाथ मलने का

संजय ग्रोवर की तीन गजलें

लेखन के साथ-साथ चित्रांकन में दखल रखने वाले संजय ग्रोवर की दो पुस्तकें गजल संग्रह ‘खुदाओं के शहर में आदमी’ तथा व्यंग्य संग्रह ‘मरा हुआ लेखक सवा लाख का’ प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी तीन गजलें-

1

पागलों की इस कदर कुछ बदगु़मानी बढ़ गयी
उनके हिस्से की दवा भी हमको खानी पड़ गयी
 
उनको कांधा देने वाली भीड़ थी, भगवान था
हमको अपनी लाश आखिर खुद उठानी पड़ गयी
 
भीड़ का उनको नशा था, बोतलें करती भी क्या
तिसपे रसमों-रीतियों की सरगिरानी बढ़ गयी
 
छोटे शहरों, छोटे लोगों को मदद मिलनी तो थी
हाकिमों के रास्ते में राजधानी पड़ गयी
 
कुछ अलग लिक्खोगी तो तुम खुद अलग पड़ जाओगी
यूं ग़ज़ल को झांसा दे, आगे कहानी बढ़ गयी
 
‘वार्ड नं. छ’ को ‘टोबा टेक सिंह’ ने जब छुआ
किस कदर छोटी मिसाले-आसमानी पड़ गयी
 
दिल में फ़िर उट्ठे ख्याल ज़हन में ताज़ा सवाल
आए दिन कुछ इस तरह मुझपर जवानी चढ़ गयी
 

2

उसको मैं अच्छा लगता था
मैं इसमें क्या कर सकता था
 
एक ग़ज़ब की सिफ़त थी मुझमें
रोते-रोते हंस सकता था
 
नज़र थी उसपे जिसके लिए मैं
फ़कत गली का इक लड़का था
 
जाने क्यूं सब दाँव पे रक्खा
चाहता तो मैं बच सकता था
 
मेरा ख़ुदको सच्चा कहना
उसे बुरा भी लग सकता था
 
मेरा उसको अच्छा कहना
उसे बुरा भी लग सकता था
 
बेहद ऊँचा उड़ा वो क्यूंकि
किसी भी हद तक गिर सकता था
 
ख़ानदान और वंश के झगड़े !
मै तो केवल हंस सकता था
 

3

मोहरा, अफवाहें फैला कर            
बात करे क्या आँख मिला कर
 
औरत को माँ-बहिन कहेगा
लेकिन, थोड़ा आँख दबाकर
 
पर्वत को राई कर देगा
अपने तिल का ताड़ बना कर
 
वक़्त है उसका, यारी कर ले
यार मेरे कुछ तो समझा कर
 
ख़ुदको ही कुछ समझ न आया
जब बाहर निकला समझा कर