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साहित्य अपने समय की स्थितियों का प्रतिबिंब: मैनेजर पांडेय

चूरू में आयोजि‍त कार्यक्रम में वि‍चार व्‍यक्‍त करते मैनेजर पांडेय।

चूरू : प्रयास संस्थान की ओर से शनिवार 30 सितंबर को शहर के सूचना केंद्र में हुए पुरस्कार समारोह में जोधपुर की लेखिका पद्मजा शर्मा को उनकी पुस्तक ‘हंसो ना तारा’ के लिए इक्यावन हजार रुपये का घासीराम वर्मा साहित्य पुरस्कार एवं गांव सेवा, सवाई माधोपुर के लेखक गंगा सहाय मीणा को उनकी पुस्तक ‘आदिवासी साहित्य की भूमिका’ के लिए ग्यारह हजार रुपये का रूकमणी वर्मा युवा साहित्यकार पुरस्कार प्रदान किया गया। इस दौरान ‘भय नाहीं खेद नाहीं’ पुस्तक के लिए नई दिल्ली की दीप्ता भोग व पूर्वा भारद्वाज को संयुक्त रूप से पचास हजार रुपये का विशेष घासीराम वर्मा सम्मान प्रदान किया गया।

देश के प्रख्यात गणितज्ञ डॉ घासीराम वर्मा की अध्यक्षता में हुए समारोह को संबोधित करते हुए नामचीन आलोचक मैनेजर पांडेय ने कहा कि कवि किसी अर्थशास्त्री और इतिहासकार पर निर्भर नहीं रहता, वह अपने समय को जैसा देखता है, वैसा ही लिखता है। इसलिए साहित्य अपने समय की स्थितियों का प्रतिबिंब होता है। पांडेय ने कहा कि मातृभाषा ने ही तुलसी, सूर, मीरा और विद्यापति को महाकवि बनाया। इसलिए मातृभाषाओं के लिए संकट के इस समय में हमें मातृभाषाओं में सृजन करना चाहिए। बेहतर बात है कि राजस्थान में असंख्य लेखक हैं जो हिंदी के साथ-साथ मातृभाषा राजस्थानी में लिख रहे हैं। उन्होंने विजयदान देथा का स्मरण करते हुए कहा कि भाषा को जानना अपने अस्तित्व को जानना है। उन्होंने कहा कि आज के समय में जबकि दूसरे लोग अपनी सुख-सुविधाओं के लिए लड़ रहे हैं, आदिवासी अपने अस्तित्व के लिए, अपने जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने ‘ग्रीन हंट’ का उदाहरण देते हुए कहा कि ब्रिटिश भारत में आदिवासियों के साथ जैसा व्यवहार होता था, वैसा ही आजाद भारत में उनके साथ बर्ताव किया जा रहा है। पंडिता रमाबाई को याद करने एक पुराने संघर्ष को याद करना है और यह स्त्री को यह याद दिलाना है कि वह किसी भी संघर्ष में अकेली नहीं है। उन्होंने कहा कि साहस के साथ अपनी बात कहने से आलोचना में जान आती है। उन्होंने कहा कि मनुष्य एक भाषिक प्राणी है और भाषा से ही परिवार व समाज की रचना होती है।

मुख्य वक्ता नारीवादी चिंतक शीबा असलम फहमी ने कहा कि कानून ने स्त्री को बराबरी का अधिकार दिया है, लेकिन समाज अपने अंदर से इसे स्वीकार नहीं कर पा रहा है। हम कितनी भी तरक्की कर जाएं, लेकिन यदि उपेक्षितों और वंचितों को बराबरी का अधिकार नहीं दे पाएं और यह तरक्की चंद लोगों तक ही सीमित रहती है तो इसका कोई अर्थ नहीं है। उन्होंने कहा कि हमारे भीतर बलात्कार के अपराधी के प्रति जो घृणा का भाव रहता है, वहीं घरेलू हिंसा जैसे अपराधों के लिए भी होना चाहिए। शरीर के साथ होने वाले अपराध को तो हम देखते हैं लेकिन मन के साथ होने वाले अपराध को हम नजरअंदाज कर देते हैं। औरत को औरत बनाए रखने के लिए जो किया जाता है, वह अपने आप में भयावह है। हमें अपने घर में एक मजबूत बेटी तैयार करनी चाहिए और उसे संपत्ति का अधिकार आगे बढ़कर देना चाहिए।

पुरस्कार से अभिभूत साहित्यकार पद्मजा शर्मा, दीप्ता भोग, पूर्वा भारद्वाज और गंगा सहाय मीणा ने अपनी सृजन प्रक्रिया, संघर्ष और अनुभवों को साझा किया। भंवर सिंह सामौर ने अतिथियों का स्वागत किया। प्रयास संस्थान के अध्यक्ष दुलाराम सहारण ने आभार उद्बोधन में आयोजकीय पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। संचालन कमल शर्मा ने किया।

इस दौरान मालचंद तिवाड़ी, नरेंद्र सैनी, रियाजत खान, रामेश्वर प्रजापति रामसरा, मीनाक्षी मीणा, दलीप सरावग, रघुनाथ खेमका आदि‍ साहि‍त्‍य प्रेमी मौजूद थे।

पल्लव को डॉ. घासीराम वर्मा साहित्य पुरस्कार

समारोह को संबोधि‍त करते वरिष्ठ साहित्यकार काशीनाथ सिंह।

समारोह को संबोधि‍त करते वरिष्ठ साहित्यकार काशीनाथ सिंह।

चूरू : हिंदी के बहुचर्चित वरिष्ठ साहित्यकार काशीनाथ सिंह ने कहा कि राजनीति में जो हो रहा है, दुर्भाग्य से वैसा ही कुछ साहित्य में भी हो रहा है और आज आलोचना में रचना की बजाय रचनाकार को ध्यान में रखा जाता है, पल्लव इस मायने में सबसे भिन्न हैं कि उनकी नजर हमेशा रचना पर ही रहती है। काशीनाथ सिंह 6 अक्‍टूबर 2013 को प्रयास संस्थान की ओर से शहर के सूचना केंद्र में आयोजित डॉ. घासीराम वर्मा साहित्य पुरस्कार समारोह में पल्लव को सम्मानित करने के बाद बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि पल्लव आलोचना के लिए अधिकांशतः अच्छी, लेकिन उपेक्षित रचना को चुनते हैं और व्यक्तिगत संबंध के निर्वाह के नाम पर किसी को भी अनावश्यक रियायत नहीं देते हुए पक्षपातरहित दृष्टि से रचनाओं को देखते हैं, वास्तव में आलोचना यही है। उन्होंने कहा कि वह जमाना गया, जब किसी एक दिग्गज आलोचक के कहने मात्रा से साहित्य की प्रमाणिकता तय हो जाती थी, आज प्रत्येक व्यक्ति व आलोचक अपने नजरिए से सोचता है और चीजों का मूल्य तय करता है, पल्लव उसी लोकतांत्रिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने प्रयास संस्थान की साहित्यिक गतिविधियों की सराहना करते हुए कहा कि इस पुरस्कार के कारण देशभर के लोग चूरू को जानने लगे हैं, लेकिन पुरस्कार देते समय यह प्रयास रहना चाहिए कि इसमें युवाओं को तरजीह दी जाए, क्योंकि साहित्य का भविष्य युवाओं के हाथ में है। उन्होंने डॉ. घासीराम वर्मा की सराहना करते हुए कहा कि मूलतः गणित के व्यक्ति हैं, लेकिन हर तरह के गणित से दूर रहकर अपने समाज और जनता को प्रेम करते हैं।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता नई दिल्ली के प्रख्यात साहित्यकार डॉ. आशुतोष मोहन ने कहा कि साहित्य जगत में आज आलोचना की त्रासदी यह है कि पाठक आलोचना से कृति की ओर से बढ़ना चाहता है, जबकि उसे कृति से आलोचना की ओर जाना चाहिए। दूसरी बात यह कि आलोचना रचनाओं की कमी बताए तो लेखक को अखरता है और आलोचक के साथ बड़ी मुश्किलें पेश आती है। इसके बावजूद पल्लव ने अपनी आलोचना में सैद्धांतिक साहस को बनाए रखा है और इसी में उनकी आलोचना की प्रासंगिकता है। उन्होंने पल्लव में निहित संभावनाओं को जाहिर करते हुए कहा कि वे सटीक आलोचना की कोशिश करते रहें और महान आलोचक बनने की बजाय अच्छा आलोचक बनने की दिशा में काम करें।

विशिष्ट अतिथि युवा साहित्यकार पुखराज जांगिड़ ने कहा कि साहित्य में आलोचना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे रचनाओं को देखने की एक दृष्टि मिलती है। एक आलोचक के रूप में पल्लव हमें बताते हैं कि कहानी एक रचना के रूप में किस प्रकार चीजों को देख रही है और पहचान भी रही है। उन्होंने कहा कि आज चीजों को देखने का नजरिया बदल रहा है और पल्लव इस बदलाव की मुखर अभिव्यक्ति करते हैं। उन्होंने कहा कि शरतचंद्र के ‘देवदास’ में अब देवदास की बजाय पारो को कथा का नायक समझा जाने लगा है और स्त्री को बर्बाद करके उससे प्रेम का दंभ भरने वाले पुरुष को चुनौती दी जाने लगी है। उन्होंने कहा कि भूमंडलीकरण में गुम होते जीवन की कथाओं को पल्लव ने अपनी आलोचना का विषय बनाया है, यह उनकी आलोचना का अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है।

सम्मानित साहित्यकार पल्लव ने विनम्रता से पुरस्कार को स्वीकार करते हुए कहा कि उन्हें सुखद आश्चर्य हो रहा है कि रचनाकारों के इस संसार में आलोचना पुरस्कृत हो रही है। उन्होंने कहा कि देश में सहिष्णुता के लिए खतरा बनने वाले तत्वों के खिलाफ हमें एकजुट होकर लोकतंत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का निर्वाह करना चाहिए। युवा लेखन और आलोचना की परम्परा को अधिक सशक्त किए जाने की जरूरत है। अपनी जड़ों के लिए चिंतित शिक्षक डॉ. घासीराम वर्मा और अपने प्रिय साहित्यकार काशीनाथ सिंह के हाथों सम्मानित होकर उन्हें बेहद प्रसन्नता हो रही है।

समारोह की अध्यक्षता करते हुए ख्यातनाम गणितज्ञ डॉ. घासीराम वर्मा ने कहा कि समाज में सदियों से स्त्री को उपेक्षित रखा गया है, अब वह आगे आ रही है, तो पुरुष को यह बात अखर रही है। उन्होंने कहा कि साहित्य में भी स्त्री के बारे में गलत बातें लिखी गई हैं, जिससे समाज में गलत संदेश गया है, लेकिन आज स्थितियों में बदलाव आने लगा है। कार्यक्रम के आरंभ में चित्तौड़गढ के युवा आलोचक पल्लव को उनकी ‘पुस्तक कहानी का लोकतंत्र’ के लिए छठे डॉ. घासीराम वर्मा पुरस्कार के रूप में पांच हजार रुपए, शॉल, श्रीफल व प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। प्रयास के संरक्षक भंवर सिंह सामौर ने अतिथियों का स्वागत किया। युवा साहित्यकार कुमार अजय ने सम्मानित साहित्यकार का परिचय प्रस्तुत किया। वयोवृद्ध साहित्यकार बैजनाथ पंवार ने आभार जताया। प्रयास के अध्यक्ष दुलाराम सहारण व उम्मेद गोठवाल ने अतिथियों को स्मृति चिह्न भेंट किए। संचालन कमल शर्मा ने किया।

पूर्व सभापति रामगोपाल बहड़, जयसिंह पूनिया, हनुमान कोठारी, रियाजत अली खान, माधव शर्मा, महावीर सिंह नेहरा, खेमाराम सुंडा, सोहन सिंह दुलार, वासुदेव महर्षि, अर्चना शर्मा, नीति शर्मा, इंदिरा सिंह, जमील चौहान, देवेंद्र जोशी, राधेश्याम कटारिया, देवेंद्र जोशी, संजय कुमार आदि‍ समारोह में मौजूद थे।

प्रस्‍तुति‍ : दुलाराम सहारन, अध्यक्ष, प्रयास सेवा संस्थान, चूरू

घासीराम वर्मा साहित्य पुरस्कार पल्लव को

kahani ka loktantra.pallav

चित्तौड़गढ़ : प्रयास संस्थान, चूरू की ओर से प्रतिवर्ष दिया जाने वाला प्रतिष्ठित घासीराम वर्मा साहित्य पुरस्कार वर्ष 2013 के लिए युवा  आलोचक पल्लव को दिया जाएगा। आधार प्रकाशन, पंचकूला से वर्ष 2011 में प्रकाशित उनकी आलोचना पुस्तक ‘कहानी का लोकतंत्र’ के लिए उन्हें यह पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई है।

प्रयास संस्थान के अध्यक्ष दुलाराम सहारण ने बताया कि प्रत्येक वर्ष यह पुरस्कार राजस्थान के हिंदी लेखक की उल्लेखनीय कृति पर प्रदान किया जाता है। पल्लव हिंदी के उदीयमान रचनाकार हैं जिनकी ‘कहानी का लोकतंत्र’ के अलावा मीरा एक पुनर्मूल्यांकन’‘ लेखकों का संसार’ पुस्तकें भी खासी चर्चित रही हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज में प्राध्यापक पल्लव हिंदी साहित्यिक पत्रिका ‘बनास जन का संपादन भी कर रहे हैं। पल्लव को इससे पूर्व भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता का ‘युवा पुरस्कार’, संबोधन कांकरोली का ‘आचार्य निरजंननाथ प्रथम कृति पुरस्कार’ तथा श्री भारतेंदु समिति कोटा का ‘कथा संवाद सम्मान’ भी मिल चुके हैं। उनकी पुस्तक कहानी का लोकतंत्र को हिन्दी युवा आलोचना में एक गंभीर शुरुआत की तरह रेखांकित किया गया है और हिन्दी कथा आलोचना में इसकी विशेष चर्चा प्रकाशन के साथ से ही शुरू हो गई थी।

संस्थान के सचिव कमल शर्मा ने बताया कि पल्‍लव को प्रयास संस्थान की ओर से सितंबर में जिला मुख्यालय पर प्रस्तावित समारोह में 5100 रुपये नगद, शॉल, श्रीफल अर मानपत्र देकर पुरस्कृत किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व यह पुरस्कार अब तक 2008 में ‘सितम्बर की रात’ के लिए जोधपुर के डॉ. सत्यनारायण, 2009 में ‘कठपुतलियां’ के लिए मनीषा कुलश्रेष्ठ, 2010 में ‘जगह जैसी जगह’ के लिए हेमंत शेष, 2011 में ‘खेत तथा अन्य कहानियां’  के लिए रत्नकुमार सांभरिया तथा 2012 में ‘जिजीविषा और अन्य कहानियां ’ के लिए कमर मेवाड़ी को प्रदान किया जा चुका है।

प्रस्‍तुति‍ :डॉ. कनक जैन, संभावना संस्थान ,चित्तौड़गढ़