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खबरों के आगे खिंचता नेपथ्य : प्रभु जोशी

पिछले दिनों इन्‍दौर में हिन्दी के हिंग्लिशीकरण के विरोध में प्रतीकात्‍मक ढंग से प्रमुख समाचार पत्रों की होली जलायी गई। इस पर समाचार पत्रों के रुख और हिंग्लिशीकरण के प्रति सचेत करता वरिष्‍ठ लेखक और पत्रकार प्रभु जोशी का आलेख-

दुनिया भर में, ‘विश्व के सबसे बड़े जनतंत्र‘ की तरह ख्यात भारत ने, जब एक ‘नव-स्वतंत्र राष्ट्र‘ की तरह, विश्व-‘राजनीति में जन्म लिया, तब निश्चय ही न केवल ‘पराजित‘ बल्कि, लगभग हकाल कर बाहर कर दी गयी ‘औपनिवेशिक-सत्ता‘ के कर्णधारों की आँखें, इसकी ‘असफलता‘ को देखने के लिए बहुत आतुर थीं। चर्चिल की बौखलाहटों को व्यक्त करती हुई, तब की कई उक्तियाँ इतिहास के सफों पर आज भी दर्ज हैं। अलबत्ता, उनकी ‘अपशगुनी उम्मीदों‘ के बार-खिलाफ, जब-जब इस ‘महादेश‘ में संसदीय चुनाव हुए, तब-तब इस बात की पुष्टि काफी दृढ़ता के साथ हुई कि बावजूद ‘सदियों की पराधीनता‘ के, भारतीय-जनमानस में एक अदम्य ‘लोकतांत्रिक-आस्था‘ है, जो केवल उसके सोच भर में स्पंदित नहीं है, बल्कि, उसकी तमाम संस्थाओं में, वह लगभग ‘दहाड़ती‘ हुई उपस्थित है। कहने की जरूरत नहीं कि उसके ‘चौथे खंभे‘ में तो ‘नृसिंह‘ की-सी शक्ति है, जो सत्ता के पेट को चीर सकती है। आपातकाल में तो उसने यह पूरी शिद्दत से प्रमाणित कर दिया था कि न केवल ‘लिख कर‘ बल्कि इसके विपरीत ‘न लिखकर‘ भी वह अपनी आवाज को इस तरह बुलन्द कर सकती है, जो हजारों-हजार लिखे गए लफ्जों से कहीं ज्यादा प्रखर प्रतिरोध का रूप रख सकती है। सम्पादकीय की जगह खाली छोड़ने से ‘मौन की तीखी अनुगूँज‘ राष्ट्रव्यापी बन गयी थी।

बहरहाल, इन्दौर नगर में पिछले दिनों ‘गाँधी-प्रतिमा स्थल‘ पर कतिपय बुद्धिजीवियों ने देश भर के कोई बीस-बाइस हिन्दी समाचार पत्रों की एक-एक प्रति जुटाकर, तमाम अखबारों के द्वारा ‘अकारण‘ ही तेजी से किये जा रहे हिन्दी के हिंग्लिशीकरण बनाम ‘क्रिओलीकरण’ के जरिए, जिस ‘बखड़ैली भाषा‘ को जन्म देने में लगे है, उसके प्रति हिन्दी भाषाभाषी पाठकों की पीड़ा और प्रतिकार को प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त करने के लिए, उनकी होली जलायी। निश्चय ही प्रतिकार की इस ‘प्रतीकात्मकता‘ से जो लोग असहमत थे, वे इसमें शामिल नहीं हुए। उनके पास अपने तर्क और अपनी स्पष्ट मान्यताएँ थीं, जबकि अखबारों की ‘होली‘ जलाने वालों के पास अपनी सिद्धान्तिकी थी। दोनों के पक्ष-विपक्ष में एक गंभीर विमर्श भी बन सकता था।

बहरहाल, घटना छोटी-सी और निर्विघ्न सी थी, लेकिन भारतीय पत्रकारिता के विगत तिरेसठ साल के इतिहास में पहली बार घट रही थी। लेकिन देश के किसी भी हिन्दी अखबार ने ( हालांकि, जनसत्ता ने खबर तो नहीं, लेकिन, राजकिशोर के लेख में इस खबर को यथावत और विस्तार से दिया है।) यह खबर प्रकाशित नहीं की। इण्टरनेट के ब्लागों और ‘फेस बुक‘ पर अवश्य इस पर बहस के लिए अवकाश (स्पेस) निकला, लेकिन, आरंभ में उसका रूप जिस तरह की गंभीरता लिए हुए शुरू हुआ था, दूसरे दिन वह ‘भर्त्सना‘ और ‘भड़ास‘ की शक्ल अख्तियार कर चुका था। उसमें मनोरंजन और मसखरी भी शामिल हो चुकी थी। अतः पूरी बात विचार के दायरे से ही लगभग बाहर हो गयी। यहाँ यह बात गौर करने लायक है कि कदाचित् सम्पूर्ण हिन्दी समाचार-पत्रों ने, इस कार्यवाही को अपनी सत्ता के प्रति एक ‘बदअखलाक चुनौती‘ की तरह लिया है। हो सकता है समाचार-पत्र, चूंकि वे समय और समाज में विचार के लिए वाजिब जगह बनाने की जिम्मेदारी अपने ही हिस्से में समझते हैं, अतः वे इस कार्यवाही के खिलाफ निस्संदेह ठोस बौद्धिक-असहमति रखते हैं। लेकिन प्रश्न उठता है कि जो समाचार पत्र, वर्ष के तीन सौ पैंसठ दिन, ’समय और समाज’ की खाल खींच कर उसमें नैतिकता का नमक डालने पर तत्पर रहता है, क्या वह तिरेसठ वर्ष के अपने जीवनकाल में मात्र एक दिन किसी एक शहर में अपने पाठक की असहमति और उसका प्रतीकात्मक प्रदर्शन तक बरदाश्त नहीं कर सकता? जबकि, वह इस महाकाय जनतंत्र की रक्षा का एक सर्वाधिक शक्तिशाली कवच है? क्या समूचा समाचार-जगत ’विचार’ के स्तर पर, व्यक्ति की सी स्वभावगत ’एकरूपता’ रखता है ? जबकि, वह व्यक्ति नहीं संस्था है। मुझे यहाँ याद आता है कि नेहरू के विषय में कहा जाता रहा है कि उनका अहम् काफी अदम्य था और वे अमूमन अपनी असहमति की अवमानना पर तिक्त हो जाते थे। एक प्रसंग मुझे याद आ रहा है। ’टाइम्स ऑफ इण्डिया’ के तब के ख्यात सम्पादक मुलगांवकर प्रधानमंत्री आवास पर स्वल्पाहार हेतु आमंत्रित थे और जिस सुबह वे आमंत्रित थे, ठीक उसी दिन उन्होंने नेहरू तथा ’नेहरू-सरकार’ के विरूद्ध अपने अखबार में बहुत तीखी सम्पादकीय टिप्पणी छाप दी। लगभग आठ बजे प्रधानमंत्री-आवास से दूरभाष पर सूचना दी गयी कि किन्हीं अपरिहार्य कारणों से पूर्व में स्वल्पाहार के समय प्रधानमंत्री के साथ निर्धारित भेंट निरस्त की जा रही है। यह सूचना पाते ही श्री मुलगांवकर ने नेहरू को फोन किया कि ठीक है कि आज का सम्पादकीय आपके तथा आपकी सरकार के खिलाफ है, लेकिन इसका हमारे नाश्ते से क्या लेना-देना है ?

बहरहाल, नेहरू ऐसे थे कि सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर रहते हुए भी ठिठक कर बुद्धिजीवियों द्वारा की गई अपनी आलोचना सुन सकते थे। कदाचित् उनके इसी जनतांत्रिक धैर्य को ध्यान में रखकर दुनिया भर की प्रेस उन्हें ’डेमोक्रेटिक प्रॉफेट’ के विशेषण से सम्बोधित भी करती थी।

बहरहाल, इन्दौर नगर में भारतीय समाचार पत्रों को उनकी भाषागत नीति को केन्द्र में रखकर उसके प्रतिरोध में होली जलाने वाली कार्यवाही को लेकर इतना आहत और क्रोधित नहीं होना चाहिए कि उनके द्वारा अकारण किये जा रहे क्रिओलीकरण के खिलाफ शुद्ध गाँधीवादी प्रतिकार की खबर को वे अपने पृष्ठों पर तिल भर भी जगह न दें। यह काम निश्चय ही सम्पादक का नहीं हो सकता। तो क्या हमारे समाचार-पत्रों में एक किस्म की ‘कॉरपोरेट सेंसरशिप‘ अघोषित रूप से आरंभ है ? जबकि, ठीक उसी दिन ‘दैनिक भास्कर‘ ने क्रिओलीकरण के विरूद्ध लिखी गयी मेरी तीखी टिप्पणी ससम्मान और प्रमुखता से छापी और ‘नईदुनिया‘ ने इसके दो दिन पूर्व ही ‘भाषा के खिलाफ हो रही साजिश को समझो‘ शीर्षक से हिन्दी के ‘क्रिओलीकरण‘ के खतरे की तरफ पाठकों नहीं, सम्पूर्ण हिन्दी भाषा-भाषियों को सचेत करने वाली उस टिप्पणी को एक ऐसी सम्पादकीय टीप के साथ प्रकाशित किया, जो ‘जन-आह्वान‘ के स्वर में थी। यह तथ्य दोनों ही अखबारों के ‘खुलेपन‘ और ‘जनतांत्रिक उदारता‘ के स्पष्ट प्रमाण हैं। तो अब प्रश्न यह उठता है कि क्या उनकी यह ‘उदारता‘ इतनी ज्वलनशील है कि प्रदर्शन की आँच की खबर से भस्म हो सकती है ? हाँ, राजनीतिक सत्ताएँ विचारको खतरा मानती हैं और उससे डरती भी हैं, लेकिन अखबर की ताकत तो विचारही है। विचारतो उसके लगभग प्राण हैं ? फिर चाहे वे सहमतिके रूप में हों, या असहमतिके रूप में। मैं मानता हूँ कि आज हमारा समाज जितना ‘सूचना-सम्पन्न‘ हुआ है, उसके पीछे प्रमुख रूप से ‘लिखे-छपे शब्द‘ की बहुत बड़ी भूमिका है, ‘बोले गये‘ शब्द वाले माध्यम की तो प्राथमिकताएँ और प्रतिबद्धताएँ केवल मनोरंजन ही है। अतः मुझे उस माध्यम से कुछ नहीं कहना। वह अभी तक परिपक्व ही नहीं हो पाया है। अधिकांश का ‘समाचार-विवेक‘ तो सांध्यकालीनों की सनसनी के समांतर ही है। वे ‘सचाई‘ के साथ फ्लर्ट (!) करते हैं। उनका ‘रिमोट‘ सच के किसी दूसरे ‘सनसनाते संस्करण‘ को बदलने का उपकरण है। लेकिन सुबह के दैनिक अखबार यह मानते हैं कि वह मालिकों का कम पाठकों का ज्यादा हैं। इसीलिए, यदि पाठकों का एक छोटा-समूह ‘संवादपरक प्रतिरोध‘ की संभावना के पूरी तरह निशेष हो जाने के बाद, यदि निहायत ही गाँधीवादी तरीके से अपना विरोध होली जलाकर प्रकट कर रहा है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि समाचार-पत्रों में हो आयी उसकी आस्था का पूर्णतः से लोप हो गया है। गाँधीजी ने, जब विदेशी वस्त्रों की होली जलायी थी तो वे ‘वस्त्रोत्पादन‘ के विरूद्ध कतई नहीं थे। ना ही वस्त्र धारण करने के काम से उनकी आस्था उठ गयी थी। वे तो प्रतीकात्मक रूप से एक अचूक सूचना दे रहे थे कि हमें ‘औपनिवेशिक विचार‘ का विरोध करना है, जो वस्तुओं में शामिल है।

अंत में इन दिनों जिस ‘शक्ति-त्रयी‘ की बात की जा रही है, उसमें ‘सूचना‘ भी राज्य सत्ता के समानान्तर मानी जा रही है। ‘सूचना‘ का निर्माण और वितरण करने वाली दुनिया की चार पांच संस्थाओं को ‘सत्ता‘ का सर्वोपरि रूप माना जा रहा है, क्योंकि वे ही ‘विश्वमत‘ गढ़ती या बनाती हैं। उनमें किसी भी मुल्क या उसकी सरकार को ध्वस्त करने की भी अथाह कुव्वत है, लेकिन वे अपने मुल्क के ‘प्रतिरोध की आवाजों‘ की अनसुनी नहीं करती वर्ना, नोम चॉमस्की जैसे लोगों के विचारों की आहटें शेष संसार को सुनाई ही नहीं देती।

मुझे ब्रिटिश प्रधानमंत्री चेम्बर लेन के आक्सफर्ड विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में दिये गये भाषण की याद आती है। उन्होंने कहा था, ‘आक्सफर्ड‘ ने हमें जब-जब जैसा-जैसा करने को कहा हमने हमेशा ही ठीक वैसा-वैसा किया; लेकिन जब आक्सफर्ड को हमने अपने जैसा करने को कहा, उसने वैसा कभी नहीं किया और एक ब्रिटिशर की तरह मुझे इन दोनों बातों पर अपार गर्व है।

कुल मिलाकर चेम्बर लेन ने यही कहना चाहा हम ब्रिटिशर्स विचार के स्तर पर इतने उदार हैं। हम अपनी प्रखरतम आलोचना का सम्मान करते हैं, लेकिन, हमें अपने मुल्क की बुद्धिजीवी बिरादरी पर भी गर्व है, जो असहमतियों को व्यक्त करने में भीरू नहीं है। किसी भी देश और समाज में भीरूता का वर्चस्व बौद्धिकों में व्याप्त होने लगे, तब शायद यह मान लेना चाहिए कि वह फिर से पराधीन होने के लिए तैयार हैं।

अंत में कुल जमा मकसद यही है कि लोहिया की विचारधारा में गहन आस्था रखने वाले श्री अनिल त्रिवेदी, तपन भट्टाचार्य और जीवनसिंह ठाकुर ने भारतीय भाषाओं के आमतौर पर तथा हिन्दी के क्रिओलीकरण (हिंग्लिशीकरण) को लेकर खासतौर पर एक शांत और नितान्त निर्विघ्न प्रदर्शन किया तो वस्तुतः वे निश्चय ही इसके दूरगामी खतरों की तरफ पूरे देश और समाज को चेतन करना चाहते हैं। वे ठीक ही कह रहे हैं ‘भाषा का प्रश्न‘ महज भाषा भर का नहीं होता, वह समूचे समाज को सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक व्यवस्था का भी अनिवार्य अंग होता है। क्या हमें यह नहीं दिखाई दे रहा कि अमेरिका और ब्रिटेन ‘ज्ञान समाज‘ के नाम पर, मात्र अपने सांस्कृतिक उद्योग की जड़ें गहरी करने में लगे हैं। ‘कल्चरल इकोनॉमी‘ उनकी अर्थव्यवस्था का तीसरा घटक है, जो अँग्रेजी सीखने-सिखाने के नाम पर अरबों डॉलर की पूंजी कमाना चाहते हैं। हिन्दी, यदि संसार की दूसरी सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा की चुनौतीपूर्ण सीमा लांघने को है, तब उसे एक धीमी मौत मारने के लिए उसका क्रिओलीकरण क्यों किया जा रहा है ? अभी षड्यंत्र की यह पहली अवस्था है, ‘स्मूथ डिस्लोकेशन ऑव वक्युब्लरि‘। अर्थात हिन्दी के शब्दों का चुपचाप अँग्रेजी के शब्दों द्वारा विस्थापन इसे सर्वग्रासी हो जाने दिया गया तो अंत में आखिरी प्रहार की अवस्था आ जाएगी और वह होगा, देवनागरी लिपि को बदलकर उसके स्थान पर रोमनलिपि को चला देना। यहाँ यह याद दिलाना जरूरी है कि 5 जुलाई 1928 को ‘यंग इंडियामें जब गाँधीजी ने लिखा कि अँग्रेजी साम्राज्यवादी भाषा है और इसे हम हटा कर रहेंगे’, तब गोरी हुकूमत अँग्रेजी के प्रसार प्रचार पर छह हजार पाऊण्ड खर्च करती थी (तब भी यह राशि बहुत ज्यादा थी)। गाँधीजी की इस घोषणा को सुनते ही उन्होंने लगे हाथ अँग्रेजी के प्रचार-प्रसार का बजट बढ़ा दिया। 1938 में बजट की राशि थी तीन लाख छियासी हजार पाऊण्ड। यदि अखबारों की होली जलाकर प्रकट किये गये इस विरोध के बाद हिन्दी के समाचार पत्रों मे भाषा के ‘क्रिओलीकरण‘ की गति तेज हो जाये तो यह स्पष्ट सूचना जायेगी कि भाषा संबंधी नीतियों के पीछे अँग्रेजी की ‘नवसाम्राज्यवादी‘ शक्तियाँ दृढ़ता के साथ काम कर रही हैं।

भाषा के ‘क्रियोलीकरण‘ के खिलाफ भड़की चिनगारी

 

इन्दौर। भूमंडलीकरण के सबसे बड़े हथियार ‘अंग्रेजी के नवसाम्राज्यवाद‘ का स्वागत जितने अधिक उत्साह से हमारे प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने किया, उसके पहले तमाम भारतीय भाषाओं, जिन्हें अंग्रेज नॉन-स्टेडंर्ड और वर्नाकुलर लैंग्विज कह के निरादृत करते थे-उनको नष्ट करने की खामोशी से की गई साजिश का नाम है- भाषा का ‘क्रियोलीकरण‘। इसके अंतर्गत हिंदी में ‘शामिल शब्दावली‘ की आड़ में अंग्रेजी के शब्दों की धीरे-धीरे इतनी तादाद बढ़ाई जा रही थी कि वह हिंदी न रह कर ‘हिंग्लिश‘ होने लगी। इसे स्थानीय भाषा में ‘भाषा का बखड़ैला‘ रूप कहा जाएगा। भाषा में शब्द का अनुपात अंग्रेजी का साठ तथा हिंदी का प्रतिशत चालीस का हो गया। किसी भी भाषा का अस्तित्व उसके ‘बोले गए रूप’ नहीं, ’छपित रूप’ से होता है। उस ‘रूप‘ को नष्ट कर देने से भाषा की ‘विचार शक्ति‘ खत्म हो जाती है- वह केवल रोजमर्रा के सामान्य बोलचाल की सामान्य कामकाजी भाषा बनकर अंत में खत्म हो जाती है।
सर्वग्रासी होते जाने वाली इस साजिश के विरूद्ध देश में 14 सितंबर, 2010 को हिंदी दिवस के अवसर पर सबसे पहले विरोध का श्रीगणेश किया इंदौर के बुद्धिजीवियों ने। चर्चित बुद्धिजीवी और समाजवादी चिंतक अनिल त्रिवेदी और आदिवासी बहुल क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता और कवि तपन भट्टाचार्य ने प्रतिनिधि बुद्धिजीवियों के साथ देशभर के हिंदी के करीब बीस-बाइस दैनिक समाचार पत्रों की, इंदौर के महात्मा गांधी प्रतिमा स्थल पर होली जलाई। इसमें प्रभु जोशी, जीवन सिंह ठाकुर, प्रकाश कांत, कृष्णकान्त निलोसे, शशिकांत गुप्ते, विश्वनाथ कदम, ईश्वरी रावल, श्रीमती जनक पलटा मिगिलिगन सहित लगभग पचास लोग शामिल हुए। उन्होंने नारे लगाए- ‘भाषा का क्रियोलीकरण, बंद करो बंद करो।‘ कुछ देर बाद गांधी प्रतिमा के आसपास जुटी भीड़ भी विरोध में शामिल हो गई।
सबसे पहले अनिल त्रिवेदी ने गांधी प्रतिमा को प्रणाम किया और कहा कि गांधी ने प्रतीकात्मक रूप से जिस तरह विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर एक सूचना दी थी, उस तरह हमने देश भर के हिंदी भाषा-भाषियों के साथ ही साथ समाचार-पत्रों के संचालकों, संपादकों तथा पत्रकारों को यह स्मृति दिलाई कि जिस भाषा का देश की आजादी की लड़ाई में अस्त्र की तरह इस्तेमाल करते हुए उसका विकास किया था, वही पत्रकारिता आज उस भाषा का ‘क्रियोलीकरण‘ कर रही है। अतः इसे अविलंब रोका जाए। उन्होंने अपना लिखित वक्तव्य पढ़ा- ‘आज हिंदी दिवस के अवसर पर हम इंदौर नगर के बुद्धिजीवी गांधी प्रतिमा के समक्ष देश भर के लगभग सभी हिंदी अखबारों की एक-एक प्रति जुटाकर उनकी होली जलाने के लिए एकत्र हुए हैं। हम सब जानते हैं कि जब निवेदन के रूप में किए जाते रहे संवादात्मक-प्रतिरोध असफल हो जाते हैं, तब विकल्प के रूप में एकमात्र यही रास्ता बचता है, जो हमें गांधीजी से विरासत में मिला है।
आज हिंदी के अखबारों की प्रतियों को जलाकर प्रतीकात्मक रूप से हम भारतीय समाचार-पत्रों, उनके संचालकों, पत्रकारों, संपादकों के साथ ही पूरे देश के हिंदी भाषा भाषियों को इस बात की स्मृति दिलाना चाहते हैं कि आज हम हिंदी का जो विकास देख रहे हैं, उसको बनाने और बढ़ाने में सबसे बड़ी और ऐतिहासिक भूमिका आजादी की लड़ाई में हथियार की तरह काम करने वाले हिंदी के समाचार-पत्रों ने ही निभाई थी, लेकिन दुर्भाग्यवश वही समाचार-पत्र जगत आज विकास के इतने चे सोपान पर चढ़ चुकी हिंदी को अंग्रेजी के नव साम्राज्यवाद को नष्ट करने पर उतारू हो चुका है। नतीजतन, स्थिति यह है कि पिछली एक शताब्दी में ब्रिटिश साम्राज्य ने हिंदी को जितनी क्षति नहीं पहंुचाई थी, आज उससे दस गुनी क्षति मात्र दस साल में हिंदी को हिंदी के समाचार पत्रों ने पहुंचा दी है।
यहां हम यह ऐतिहासिक तथा भाषा-वैज्ञानिक तथ्य याद दिलाना चाहते हैं कि दुनिया भर में भाषाओं के विकास का मुख्य आधार भाषा के बोले गए नहीं, बल्कि लिखित-रूप होता है। लिखित रूप ही किसी भाषा को अक्षुण्ण रखता है। लेकिन, आज हिंदी को सबसे बड़ा धोखा उसके लिखित-छपित शब्द की जगह से ही मिल रहा है। चीन की मंदारिन भाषा के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी-अधिक बोली जाने वाली हिंदी भाषा को बहुत सूक्ष्म और धूर्तयुक्ति से नष्ट किया जा रहा है, जिसे कहा जाता है, भाषा का ‘क्रियोलीकरण‘। आज का हमारा यह प्रतीकात्मक-प्रतिरोध हिंदी के अखबारों द्वारा चलाए जा रहे उसी खतरनाक ‘क्रिओलीकरण‘ की प्रक्रिया के विरूद्ध है।
‘क्रियोलीकरण‘ एक ऐसी युक्ति है, जिसके जरिए धीरे-धीरे खामोशी से भाषा को ऐसे खत्म किया जाता है कि उसके बोलने वाले को पता लगता ही नहीं कि यह सामान्य और सहज प्रक्रिया नहीं, बल्कि सुनियोजित षड्यंत्र है। जिसके पीछे अंग्रेजी भाषा का साम्राज्यवादी एजेंडा है।
‘क्रियोलीकरण‘ की प्रक्रिया का पहला चरण होता है, जिसे वे कहते हैं स्मूथ डिसलोकेशन आफ वक्युब्लरि अर्थात् मूल भाषा के शब्दों का धीरे-धीरे अंग्रेजी के शब्दों से विस्थापन। इस अवस्था को अखबारों ने अपनी सर्वग्रासी सीमा तक पहुंचा दी है। उदाहरण के लिए यह क्रिओलीकरण ठीक उस समय किया जा रहा है, जब हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की सीमित भाषाओं की सूची में शामिल करने के प्रयास बहुत तेज हो गए हैं। हिंदी के दैनंदिन शब्दों को बहुत तेजी से हटाकर उनके स्थान पर अंग्रेजी के शब्द लाए जा रहे हैं। मसलन, छात्र-छात्राओं की जगह स्टूडेंट्स/माता-पिता की जगह पेरेंट्स/अध्यापक की जगह टीचर्स/विश्वविद्यालय की जगह यूनिवर्सिटी/परीक्षा की जगह एक्जाम/अवसर की जगह अपार्चुनिटी/प्रवेश की जगह इंट्रेंस/संस्थान की जगह इंस्टीट्यूशन/चौराहे की जगह स्क्वायर/रविवार-सोमवार की जगह संडे-मंडे/भारत की जगह इंडिया। इसके साथ ही साथ पूरे के पूरे वाक्यांश भी हिंदी की बजाए अंग्रेजी के छपना/जैसे आऊट ऑफ रीच/बियांड एप्रोच/मॉरली लोडेड/कमिंग जनरेशन/डिसीजन मेकिंग/रिजल्ट ओरियंटेड प्रोग्राम आदि। वे कहते हैं, धीरे-धीरे स्थिति यह कर दो कि अंग्रेजी के शब्द 70 प्रतिशत तथा मूल भाषा के शब्द मात्र 30 प्रतिशत रह जाएं। और इसके चलते हिंदी का जो रूप बन रहा है, उसका एक स्थानीय अखबार में छपी खबर से दे रहे हैं।
इंग्लिश के लर्निंग बाय फन प्रोग्राम को स्टेट गव्हमेण्ट स्कूल लेवल पर इंट्रोड्यूस करे, इसके लिए चीफ मिनिस्टर ने डिस्ट्रिक्ट एज्युकेशन आफिसर्स की एक अर्जेंट मीटिंग ली, जिसकी डिटेल्ड रिपोर्ट प्रिंसिपल सेक्रेटरी जारी करेंगे।
इसके बाद वे दूसरा और अंतिम चरण बताते हैं- फाइनल असालट ऑन लैंग्विज। अर्थात् भाषा के पूरी तरह खात्मे के लिए ‘अंतिम हल्ला‘। और वह अंतिम प्रहार यह कि उसे भाषा की मूल लिपि को बदल कर रोमन कर दो। भाषा समाप्त। और कहने की जरूरत नहीं कि बहुत जल्दी अखबारों को साम्राज्यवादी सलाहकार की फौज समझाने वाली है कि हिंदी को देवनागरी के बजाए रोमन में छापना शुरू कर दीजिए। बीसवीं शताब्दी में सारी अफ्रीकी भाषाओं को अंग्रेजी की सम्राज्यवादी योजना के तहत इसी तरह खत्म किया गया और अब बारी भारतीय भाषाओं की है। इसलिए ‘हिंदी-हिंग्लिश‘, ‘बांग्ला-बांग्लिश‘, ‘तमिल-तमिलिश‘ की जा रही है। यह प्रतिरोध हिंदी के साथ ही तमाम भारतीय भाषाओं के ‘क्रिओलीकरण‘ के विरूद्ध है, जिसमें, गुजराती, मराठी, कन्नड़, उड़िया, असममिया आदि सभी भाषाएं शामिल हैं।
बहुत मुमकिन है कि देशभर के हिंदी भाषा-भाषियों के भीतर अपनी भाषा का बचाने की एक सामूहिक चेतना के जागृत होने के खतरे का अनुमान लगा कर अखबार जगत हिंदी के ‘क्रियोलीकरण‘ की प्रक्रिया एकदम तेज कर दें क्योंकि, जब 5 जुलाई, 1928 को यंग इंडिया में जब गाँधी ने ये लिखा था कि अंग्रेजी उपनिवेश की भाषा है और इसे हम हराकर रहेंगे, तब गोरी
हुकुमत अंग्रेजी के प्रचार-प्रसार पर तबके छह हजार पाउंड खर्च करती थी-वह राशि 1938 तक 3,86,000 पाउंड कर दी गई थी। बहरहाल, अंग्रेजी का जो ‘नया साम्राज्यवाद अमेरिका और इंग्लैण्ड की रणनीति के चलते बढ़ रहा है-उसमें हमारे यहां हाथ बंटाने के लिए देश का प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों मीडिया एकजुट हो गए हैं-हम उनकी इस खतरनाक मुहिम के विरोध का संकल्प लेते हैं।’

आदिवासी क्षेत्रों में काम करने वाले ख्यात समाजसेवी और कवि तपन भट्टाचार्य ने कहा-‘अंग्रेजी सुनियोजित और सुरक्षित ढंग से अपना ‘नया साम्राज्यवाद‘ खड़ा  कर रही है, जिसमें हमारा मीडिया और सत्ता भी शामिल है। याद रखिए, लार्ड मैकाले ने अंग्रेजी को भाषा से भाषा के स्तर पर चलाने की नीति बनाई, बाद में अंग्रेजी को शिक्षा समस्या बनाकर चलाया, लेकिन नहीं चल पाई। अलबत्ता, इससे उनको एक कटु अनुभव का सामना करना पड़ा कि एक मजबूत व्याकरण के आधारवाली मातृभाषा के चलते भारतीयों ने एक किताबी इंग्लिश सीखी और अव्वल दर्जे के आइ.सी.एस. हो गए; लेकिन अंग्रेजी भाषा को रोजमर्रा के जीवन में दूर तक प्रवेश नहीं दिया। बल्कि, बाहर ही रह गई। इसलिए, अब नई नीति तय की गई है, जिसमें उन्होंने भाषा-संस्कृति का गठबंधन करते हुए कहा कि अंग्रेजी को ‘स्ट्रक्चरली‘ पढ़ाया जाए, व्याकरण के जरिए नहीं। इसके लिए उन्होंने बच्चों के लिए कॉमिक्स चलाए, कार्टून फिल्में थोक के भाव में भारत के टेलिविजन चैनलों पर चलाई-और, एक मिथ्या ‘यूथ-कल्चर‘ बनाया, जिनका कुल मकसद अंग्रेजी भाषा तथा जीवन शैली को उन्माद की तरह उनसे जोड़ दें- जिसमें भाषा, भूषा और भोजन के स्तर पर वे उनके नए उपनिवेश के शिकंजे में आ जाएं और कहना न होगा कि आज के तमाम महाविद्यालयों में अध्ययन कर रही पीढ़ी को उन्होंने ‘माडर्न‘ (?) बना दिया है, जबकि वे ‘माडर्न‘ नहीं हुए, सिर्फ परम्परच्युत हुए हैं। एक ‘सामूहिक स्मृति‘ का शिकार हैं। वे अपनी-अपनी मातृभाषा को न केवल हेय समझते हैं, बल्कि उसे नष्ट करने के अभियान के जत्थों में बदल गए हैं। आज के तमाम हिंदी अखबार ‘यूथ-प्लस‘ या ‘यूथ फोरम‘ के नाम पर चार-चार चमकीले और चिकने पन्ने छाप रहे हैं-जिसमें एक-दो पृष्ठ अंग्रेजी में है और बाकी के दो पृष्ठ हिंग्लिश में, जिसमें, ‘लाइफ स्टाइल के फंडे’ सिखाए जा रहे हैं। हमें इसके साथ ही एफ.एम. रेडियो की भूमिका का भी विरोध करते हैं, जो केवल ‘क्रियोलीकृत‘ हिंदी बनाम हिंग्लिश में ही अपना प्रसारण करते हैं और पूरी की पूरी युवा पीढ़ी से उसकी भाषा छीन रहे हैं।
हिंदी के अखबारों की यह भूमिका अंग्रेजी तथा उसके जरिए सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की भारतीय समाज में स्थापना की है। हम इस स्तर पर भी भारतीय समाचार-पत्रों की दृष्टि का विरोध करते हैं कि वे अपने इस एजेंडे को अविलंब रोकें।’
इसके उपरांत हिंदी के लगभग दो दर्जन दैनिक अखबारों को जलाया गया। और सर्व सहमति से यह तय किया गया कि इन अखबारों की राख को विरोध प्रकट करने हेतु देश के माननीय सांसदों, विधायकों और समस्त समाचार पत्रों के संचालकों एवं संपादकों को भेजा जाएगा। साथ ही होली जलाने वाले कार्यक्रम के समय दिए गए वक्तव्यों को भी भेजा जाएगा।
अंत में तय किया गया कि इस विरोध की प्रक्रिया को निरंतरता देने के लिए विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के छात्रों के बीच जाकर मैदानी स्तर पर चेतना पैदा करने का काम और प्रक्रिया शुरू की जाएगी ताकि देश भर के युवा वर्ग को तथाकथित ‘यूथ कल्चर‘ के नाम पर अंग्रेजी तथा पश्चिम के सांस्कृतिक उद्योग की फूहड़ता के लिए ‘उन्माद‘ की हद तक पहुंचाने का काम स्थगित करते हुए उनके अंदर देश, राष्ट्र, समाज और परंपरा की वस्तुगत पहचान पैदा की जाए।
प्रस्तुति: शिवशंकर मालवीय

इसलिए बिदा करना चाहते हैं, हिंदी को हिंदी के अखबार : प्रभु जोशी

साहित्य पर अश्लील तोहमत

पिछले कुछ समय से हिंदी साहित्य में कोई वैचारिक और रचनात्मक हलचल तो नहीं हो रही है, लेकिन विवाद नए-नए उठ रहे हैं। हिंदी अकादमी, दिल्ली में उपाध्यक्ष पद पर अशोक चक्रधर की नियुक्ति, सैमसंग पुरस्कार, उपन्यास द्रोपदी को लेकर हंगामा और अब केदारनाथ सिंह द्वारा शलाका सम्मान ठुकराना। उनके अलावा पुरुषोत्तम अग्रवाल, प्रियदर्शन, रेखा जैन, पंकज सिंह, गगन गिल और विमल कुमार ने भी पुरस्कार नहीं लेने की घोषणा की है। इसके पीछे वरिष्ठ साहित्यकार कृष्ण बलदेव वैद को शलाका सम्मान नहीं दिया जाना है। दरअसल, हिंदी अकादमी की पिछली कार्यकारिणी ने वैद को वर्ष 2008-2009 के शलाका सम्मान के लिए नामित किया था। बाद में इसे रोक दिया गया। असल में साहित्य से कुछ लोगों ने वैद पर अश्लील साहित्य लिखने का आरोप लगाया था। वैसे तौर से उनके उपन्यास नासरीन और बिमल उर्फ जाएं तो जाएं कहां को लेकर आपत्ति जताई थी। हालांकि हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष अशोक चक्रधर ने यह कहा कि अकादमी ने कभी आधिकारिक तौर पर कृष्ण बलदेव वैद को शलाका सम्मान देने या नहीं देने की बात नहीं कही।
वैद का लेकर हो रहे विवाद ने एक बार फिर साहित्य में अश्लीलता के सवाल को जीवित कर दिया है। यह सवाल सदियों पुराना है। साहित्य के जन्म के साथ ही इस तरह के विवाद उठने लगे। समय-समय पर इसे लेकर खूब हो-हल्ला मचा। प्रसिद्ध कथाकार पांडेय बेचन शर्मा उग्र के साहित्य को पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी घासलेटी साहित्य मानते थे। उन्होंने इसके विरोध में व्यापक अभियान भी चलाया था और गांधीजी से भी इसकी शिकायत की थी। हालांकि गांधीजी को उग्र की रचनाएं अश्लील नहीं लगीं और उन्होंने क्लीन चिट दे दी। अश्लीलता का संबंध हमारी मानसिकता और परिवेश से है। हम जिस समाज में रह रहे हैं, जो इसके लिए अश्लील है, वह दूसरे समाज के लिए सहज हो सकता है। स्थिति इसकी उल्टी भी संभव है।
अगर लेखक की मानसिकता स्वस्थ और समाजपरक है तो उसमें अश्लीलता आ ही नहीं सकती है। ऐसा वर्णन पढ़कर पाठक उत्तेजित और यौनकांक्षी नहीं होगा, बल्कि उसके मन में घृणा और आक्त्रोश ही उत्पन्न होगा। अस्वस्थ मानसिकता का रचनाकार सेक्स और नग्न चित्रण केवल क्षणिक उत्तेजना के लिए करेगा। दूसरी ओर कुछ रचनाकार सस्ती लोकप्रियता और सनसनी फैलाने के लिए भी इस तरह का चित्रण करते हैं, लेकिन उनके लेखन को कोई स्थाई महत्व नहीं मिलता। इसके अलावा अश्लीलता समय सापेक्ष है। समय के अनुसार इसकी परिभाषा भी बदलती रही है। आज से चालीस-पचास पहले फिल्मों में जिन दृश्यों को अश्लील माना जाता है, आज उन्हें सहज मान लिया गया है।
चर्चित कथाकार भीमसेन त्यागी ने एक साक्षात्कार में कहा था कि अश्लीलता का प्रश्न उतना ही पुराना है, जितना साहित्य। वास्तव में अश्लीलता साहित्य में नहीं, बल्कि साहित्यकार की मानसिकता में होती है। अगर रचनाकार की मानसिकता स्वस्थ व समाजपरक है तो नग्न चित्रण भी अश्लील न होकर सार्थक और सही मायनों में साहित्य का उद्देश्य पूरा करने वाला हो जाता है। एलेक्जेंडर कुप्रिन का यामा-द-पिट इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। स्त्री-पुरुष का जैसा नग्न चित्रण इस उपन्यास में हुआ है, वैसा साहित्य में बहुत कम हुआ है। लेकिन इस नग्न चित्रण के बावजूद जो मानवीय संवदेना यामा-द-पिट में है, वह उसे विश्व की श्रेष्ठतम उपन्यासों की कतार में ला खड़ा करती है।
गोर्की की कहानी एक इंसान का जन्म में नग्न चित्रण है, लेकिन पाठक क्षणभर के लिए कहीं अश्लीलता अनुभव नहीं करता।
जगदम्बा प्रसाद दीक्षित की कहानी जिदंगी और गंदगी में भरपूर नग्नता होने के बाद भी लेशमात्र अश्लीलता नहीं है। निर्णायक बिंदू नग्नता नहीं, लेखक की मानसिकता है।

लेखक बडे़ मूल्यों के लामबंद हों : सेरा यात्री

स्त्री-पुरुष संबंधों के बारे में हर कोई जानता है। अब तो बच्चे भी इस बारे में जानने लगे हैं। यदि लेखक सेक्स का वर्णन रसलोलुप होकर करता है तो वह अश्लील है। यदि मर्यादा में रहकर वर्णन किया जाता है तो वह अश्लील नहीं है।
अश्लीलता का सबसे अधिक आरोप मंटो पर लगा है। वेश्याओं का वर्णन उनकी रचनाओं में बहुत हुआ है। लेकिन उन्होंने ऐसा वर्णन नहीं किया कि जो पाठक के मन में यौन इच्छा या यौन उन्मुक्तता पैदा करता है।
अश्लीलता अगर लेखक का उद्देश्य ही बन जाए तो गलत है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण तस्लीमा नसरीन है। उन्होंने कैसे विभिन्न पुरुषों के साथ संभोग किया, कैसे इंज्वाय किया, इसका उल्लेख उनकी रचनाओं में है। इसे वह मुक्त सेक्स कहती हैं। उन्होंने लेखन से धर्म, भ्रष्टाचार, कुपोषण आदि के विरुद्ध जो संघर्ष किया है, वह इसके नीचे दब जाता है।
लेखक जब बडे़ मूल्यों से हटकर शरीर पर अटक जाता है तो उसकी रचना में अश्लीलता आ जाती है।
मान लिया कि कृष्ण बलदेव वैद की रचनाओं में अश्लीलता है। जब उनका नाम घोषित कर दिया और उनसे स्वीकृति ले ली तो हिंदी अकादमी का नैतिक दायित्व है कि उन्हें पुरस्कार दे। हाल ही में तेलुगु के लेखक के उपन्यास द्रोपदी को लेकर साहित्य अकादमी पुरस्कार समारोह में हंगामा हुआ। उनका नाम घोषित कर किया जा चुका था इसलिए विवाद के बाद भी उन्हें पुरस्कार दिया गया।
आज समाज में बडे़ मूल्यों के लिए संघर्ष खत्म हो गया है। लेखकों को इसके लिए लिए लामबंद होना चाहिए। जन साधारण की समस्याओं के लिए लेखक एकजूट हों। किसे पुरस्कार दिया गया, किसे नहीं, ये बहुत छोटी चीजें हैं। बड़ी बात समाज में हो रहे अनाचार के विरुद्ध एकजूट होकर संघर्ष करना है।

अश्लीलता का संबंध सोच से : कांतिकुमार जैन

अश्लीलता का संबंध हमारी मानसिकता, हमारे संस्कारों से है। हम सब अभी भी विक्टोरिया युगनी प्रूडरी से बाहर नहीं निकाल पाए हैं। कहते हैं कि विक्टोरिया के समकालीन कुलीन लोग अपने ड्ाइंग रूम की मेजों को मेजपोश से ढककर रखते थे ताकि तेज की नंगी टांगें आगंतुकों की आंखों से ओझल रही जाएं। हम अभी तक इसी मानसिकता से ग्रस्त हैं। डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी ने निराला के प्रसिद्ध गीत दूर देश की वामा, आए मंद चरण अभिरामा, उतरे जल में अवसन श्यामा, अंकित उरछवि सुंदरतर हो की प्रशंसा करते हुए लिखा कि निरालाजी इस गीत में अवसन के स्थान पर नंगी कर देते तो न छंदोभंग होता, न यति टूटती पर गीत अश्लील हो जाता। अर्थात् अश्लील अवसन शब्द नहीं है। अश्लील नंगा शब्द है। अभिजनोचित, सुरुचिपूर्ण सभ्य होने का दर्प। हमें देखो, हम कितने संस्कृत हैं, तुम कितने असंस्कृत। तुम्हारें पांव पांव, हमारे पांव चरण वाली मानसिकता।
कालिदास ने मेघदूत में तन्वीश्यामा शिखरिदशना वाले प्रसिद्ध छंद में स्तन भर शब्द का इस्तेमाल किया है। इसका छत्तीसगढ़ अनुवार क्या हो? छत्तीसगढ़ में स्त्री के बडे़-बडे़ स्तनों को थन कहना आम है। दाई रे, ओकर कतेक बडे़-बडे़ थन हवै। छायावाद के वरिष्ठ कवि मुकुटधर पांडेय ने मेघदूत के अपने छत्तीसगढ़ अनुवाद में लिखा-
झुके थोरकुन थनभारा ले, कूला हर गरुवावै
तेकर कारन आलस मा वे जल्दी चले न पावै
कालिदास के स्तन भार को किसी ने अश्लील नहीं कहा था, किंतु छत्तीसगढ़ में इस अनुवाद के कारण मुकुटधर जी पर भारी आरोप लगे। देववाणी में जो अश्लील नहीं है, हिंदी में या उसकी बोलियों में अनुदित होते ही वह अपनी श्लीलता खो देता है। पाण्डेय जीने इस आरोप पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए बडे़ दुख से मुझे लिखा था, मेघदूत के छत्तीसगढ़ अनुवाद को लेकर मुझ पर छींटाकशी शुरू हो गई है। निस्संदेह मेघदूत में एकाध स्थान पर नग्नताई पाई जाती है, अभी हम नेकेड और न्यूड का अंतर नहीं समझ पाएं हैं। खैर, आलोचना महाकवि की समझी जाएगी, मैं तो मात्र आलोचक हूं।
लेखक के चर्चित लेख- अश्लीलता का हिंदी चेहरा का अंश