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परीक्षा : प्रेमपाल शर्मा

मम्मी बंटी को संस्कृत पढ़ा रही हैं- ‘जगद्गुरु शंकराचार्य।’

‘जगद्गुरु कैसे हो सकते हैं? सातवीं सदी में क्या हम अमेरिका जा सकते थे? इंग्लैंड जा सकते थे? तब तो अमेरिका की खोज भी नहीं हुई थी।’ बंटी पढ़ाई शुरू होते ही अड़ जाते हैं।

मम्मी चुप। क्या जवाब दें?

‘अच्छा, तू इधर ध्यान दे। पांच बजने वाले हैं और अभी कुछ भी नहीं हुआ।’ वे अर्थ समझाने लगीं, ‘बत्तीस की उम्र में शंकराचार्य भगवान में लीन हो गए।’

‘लीन हो गए? मतलब?’

‘यानी विलीन हो गए? मर गए।’

‘मम्मी लीन में और विलीन में क्या अंतर है ?’

‘एक ही बात है । यानी ईश्वर में समा गए।’

‘मम्मी आप भी क्या कहती हो ? समा कैसे सकता है कोई ?’

‘तपस्या करते-करते ।’

‘लो, अच्छी तपस्या की । खाना नहीं खाया होगा। फैट्स खत्म हो गई होगी । मर गए बेचारे । पागल हैं ये लोग भी । बेकार मर गए । वरना सत्तर साल जीते ।’

‘मजाल कि आगे बढ़ने दे । गाल बजवा लो, बस । ये क्यों ? वो क्यों ? चुप भी तो नहीं रह सकता । कर इसे खुद । सब बच्चे खुद करते हैं । खुद करेगा तब पता चलेगा ।’ वह चली गईं ।

वार्षिक परीक्षा शुरू होने वाली है बंटी की । वैसे बंटी की कम, मम्मी की ज्यादा ।

‘पापा, ये एग्जाम होली के दिनों में ही क्यों होते हैं ? पिछले साल भी इन्हीं दिनों थे ?’ बंटी परीक्षा से ज्यादा होली की तैयारियों में डूबे हैं । ‘इस बार जिंसी को नहीं छोड़ूगा । कह रही थी कि‍ मैं बहुत सारा रंग लेकर आऊंगी । मम्मी, मैं डालता हूं तो भों-भों करके रोने लगती है ।’

बंटी आहिस्ता-आहिस्ता पैर रखते हुए आया । ‘पापा, एक मिनट आओ।’

‘क्यों ? बोलो ।’

उसने होंठ पर अंगुली रखकर चुप रहने का इशारा किया । पापा पीछे-पीछे चल दिए । कोई रास्ता ही नहीं था । उसने खिड़की की तरफ अंगुली से इशारा किया, फुसफुसाते हुए, ‘उधर देखो ।’

पापा को कुछ दिखाई नहीं दिया । उसने खुद पापा की गर्दन ऊपर-नीचे उठाई-गिराई- ‘वो, वो !’

‘उधर है क्या ?’

‘धीरे । खिड़की के किनारों पर देखो न !’

‘क्या है, बताओ तो ?’

‘गिलहरी के बच्चे । तीन-तीन । देखों कैसे सो रहे हैं ? दिखे ?’

खिड़की के बीच अमरूद का पेड़ था । कई बार झांकने के बाद दिखाई दिए तो पापा की भी आंखें खिल गईं । ‘कैसे मजे से सो रहे हैं ! मैंने तो पहली बार देखे हैं ।’

‘गिलहरी के बच्चे ! हैं ना कितने मजेदार, पापा ! देखो उसकी पूंछ पीछे वाले के मुंह पर आ रही है ।’

तभी पापा को जोर की छींक आई ।

‘धीरे-धीरे, पापा ! लो एक तो जग भी गया । च्च-च्च ! अब ये तीनों भाग जाएंगे । आपको भी अभी आनी थी छींक, पापा !’

पापा चाहते हैं कि कहें कि कहां तक याद किया पाठ, लेकिन उसकी तन्मयता देखकर उनकी हिम्‍मत नहीं हुई ।

मम्मी इधर-उधर तलाश कर रही है बंटी को । देखो, अभी यहीं छोड़कर गई थी रसोई तक । यह लड़का तो जाने क्या चाहता है । इसका जरा भी दीदा लगता हो ? ‘बंटी ….ई….ई….’

उनकी आवाज को मील नहीं तो किलोमीटर तक तो सुना ही जा सकता है । लौट-फिरकर झल्‍लाहट फिर पापा पर, ‘अपनी किताबों में घुसे रहोगे। बताओ न कहां गया ? मुझे संस्कृत खत्म करानी है आज । इसे कुछ भी नहीं आता । तुमसे पूछकर गया था ?’

‘मुझसे पूछकर तो कोई भी नहीं जाता । तुम पूछती हो ?’

‘हां, अब पूछ रही हूं ? बताओ ? हाय राम, मैं क्या करूं ? कल क्या लिखेगा यह टेस्ट में ? इसे कुछ भी तो नहीं आता ।’

‘आ जाएगा । सुबह से तो पढ़ रहा है । दस मिनट तसल्ली नहीं रख सकतीं । बच्चा है । थोड़ी मोहलत भी दिया करो ।’

‘इसे आता होता तो मैं क्यों पीछे पड़ती । संस्कृत को भी कह रहा था कि इसे क्यों पढ़ाते हैं ? क्या होगा इससे ? बीजगणित भी क्यों ? भूगोल भी क्यों ? तो इसे घर में क्यों नहीं बिठा लेते ?’ वह रसोई में लौट गईं ।

‘मम्मी ।’ बंटी की आवाज सुनाई दी ।

‘आ गया न ।’ मम्मी रसोई से बाहर थीं । ‘आओ बेटा !’

लेकिन बंटी कहीं नजर नहीं आया । ‘आ जा, आ जा तू ! तेरी धुनाई न की तो मेरा नाम नहीं है ।’ वह फिर वापस लौट गईं ।

बंटी दीवान के नीचे जमीन पर चिपके थे । इतनी पतली जगह में जहां कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था । ‘हमें कोई नहीं ढूंढ सकता और हमने आपकी सारी बातें सुन लीं । पापा से कैसी लड़ाई की आपने ।’

उसकी आंखें पुस्तक पर गड़ी हैं । कुछ लिख रहा है कॉपी में, एक विश्वास के साथ । ‘पापा, वो छोटा-सा कुत्ता था न, वह मर गया ।’ एक पल उसने सिर उठाया और अपने काम में लग गया ? ‘बेचारा गाय की मौत मरा ।’

अब पापा के चौंकने की बारी थी । कुत्ते की मौत तो सुना है, गाय की मौत क्या होती है ? ‘कैसे ?’

‘वैसे ही मरा जैसे गाय मरती है ।’ लंबी-लंबी सांसें ले लेकर । बंटी सांस खींच-खींचकर बताने लगा ।

‘तुमने कहां देखी गाय मरती ?’

‘बहुत सारी । हमारे स्कूल के पीछे जो मैदान है, उसमें उनके मुंह से बड़े झाग निकलते थे । मैं और नारायण रोज देखते थे । पता नहीं वहां कौन-सी चीजें खाकर वे मर जाती थीं । वैटरनरी डॉक्टर भी आते थे। तब भी । वहां तितली भी मरी मिलती थी । अच्‍छा यह बताओ, यह किस चीज का निशान है ?’ उसने कॉपी के अंतिम पन्ने पर छोटा-सा पंजा बना दिया ।

पापा समझे नहीं । पढ़ाई करते-करते अचानक यह कुत्ता, गाय, तितली, निशान कहां से आ गए ?

‘मोर का ! बारिश में मोर के निशान ऐसे ही होते हैं । बहुत मोर भी होते थे स्कूल के पीछे की तरफ ।’

‘बंटी, क्यों गप्पे हांक रहे हो ? कितना काम हुआ है ? मैं आज तुझे खेलने नहीं जाने दूंगी चाहे कुछ भी हो जाए । पापा भी गप्पा मारने को पहुंच गए ।’

पापा-बंटी दोनों धम्म से सीधे होकर बैठ गए ।

‘पापा, मुझे सब फोन पर बहनजी कहते हैं ।’ वह मुस्करा भी रहा था और खुदबदा भी रहा था । ‘बताओ न क्यों ?’

पापा समझे नहीं, ‘बताओ न, क्या हुआ ?’

‘मैंने अभी फोन उठाया तो उधर से आवाज आई- बहनजी नमस्कार । मिश्राजी हैं ? सब ऐसा ही कहते हैं।’

‘तो बहनजी बनने में क्या परेशानी है ?’

बिट्टू ने भी उसका प्रश्न सुन लिया था । ‘पहले मुझसे भी बहनजी कहते थे, फिर मैंने अपनी आवाज मोटी की । अब कोई नहीं कहता ।’

‘हूं ।’ बंटी ने अपनी चिरपरिचित बोली में आवाज निकाली, ‘कैसे ?’

बिट्टू ऐसे किसी उत्तर के लिए तैयार नहीं था । भाग लिया । ‘मैं भी अगले साल टीनेज हो जाऊंगा । तब मुझे कोई बहनजी नहीं कहेगा ।’

‘अब पढ़ेगा भी ! टीनेज हो जाएगा, पर पढ़ना-लिखना आए या न आए ।’ मम्मी की डांट थी ।

‘आपको और कुछ आता है डांटने के सिवाय । जब देखो तब हर समय डांटती रहती हैं ।’

अगली सुबह इतिहास-भूगोल की परीक्षा थी । मां इतिहास में कमजोर है, इसलिए मेरे पास छोड़ गई । हम दोनों को गरियाते हुए- ‘लो, लो इसका टेस्ट । बहुत बड़े इतिहासकार बनते हो ।’ गुस्से, खिसियाहट का लावा जब बहता है तो न तो वह हमारे उत्तर का इंतजार करता है और न हम उत्तर देने की हिम्‍मत करते हैं। बंटी को यह बात पता है । उसके चेहरे से साफ है कि उस पर इसका कोई असर नहीं है । उसे यकीन है कि पापा पर भी नहीं है ।

वह मेरे पास बैठा इतिहास के प्रश्नों के जवाब लिख रहा है । मेरी कई चेतावनियों के बावजूद वह पहले प्रश्न की दूसरी लाइन पर ही खड़ा है ।

‘पापा, टीकू ताऊजी हमारे घर क्यों नहीं आते ?’ उसकी आंखें मेरी आंखों में घुस रही हैं । ‘मैंने तो उन्हें कभी बोलते भी नहीं देखा । बताओ न  ? क्यों नहीं आते ? ’

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम उर्फ गदर की विफलता के कारणों में से उसे यह प्रश्न उठा है उत्तर लिखते-लिखते ।

‘फिर बताऊंगा ।’

‘पहले बताओ । आप कभी भी नहीं बताते । ऐसे ही कहते रहते हो, फिर बताऊंगा ! फिर बताऊंगा !’

‘नहीं । इतिहास के पेपर के बाद पक्का ।’ पापा के पास आते ही उसे सबसे पहले मानो यह रटंत पढ़ाई भूलती है । बंटी की भूगोल की किताबें नहीं मिल रही हैं । ऐसा पहली बार नहीं हो रहा । मासिक टेस्ट हो या छमाही, किसी न किसी विषय की किताब तो गायब हो ही जाती है तब तक ।

काफी देर से कोई आवाज नहीं सुनी तो मम्मी भी बेचैन होने लगती हैं। बंटी और इतनी एकाग्रता से पढ़ रहे हों ?

बंटी का चेहरा उतरा हुआ है ।  ‘मम्मी किताब नहीं मिल रही ।’

‘अच्छा, तो तू उसी की खुसर-पुसर में लगा हुआ था ! मैं कहूं कि आज तो बड़े ध्यान से पढ़ रहा है । बंटी, हर बार तुम ऐसा ही करते हो । भइया की किताब तो कभी नहीं खोती । किताब नहीं मिली तो आज तेरी हत्या कर दूंगी ! ढूंढ़ ।’ मम्मी की आवाज में तैरते चाकू की समझ है बंटी में । तुरंत दौड़कर ढूंढ़ने लग गया। डबल बेड के नीचे, सोफे की गद्दियों के नीचे, पुरानी पत्रिकाओं के पीछे । यह सभी उसकी किताबों की जगहें हैं । चप्पे-चप्पे पर । जानकर भी रखता है, अनजाने में भी । उसे जब पता चलेगा कि पापा ने इतिहास के टेस्ट के लिए कहा था तो उस दिन इतिहास की किताब रहेगी, लेकिन अगले दिन नहीं । इतिहास के टेस्ट का मुहूर्त ढलते ही इतिहास की किताब मिल जाएगी, लेकिन भूगोल की गायब । नहीं खोता तो माचिस के ढक्कन, पुराने सेल, चाक, स्टिकर, डब्‍ल्‍यूडब्‍ल्‍यूओ के कार्ड, चॉकलेट के रैपर्स, सचिन तेंदुलकर का चित्र, पिल्लों के गले में बांधी जाने वाली घंटियां ।

‘बंटी, तुम पानी की टंकी की तरफ से मत जाया करो । उधर एक कुत्ता रहता है कटखना । उसने रामचंद्रन की बेटी को काट लिया है ।’

‘कैसे रंग का है, मम्‍मी ?’ बंटी तुरंत दौड़कर आ गया ।

‘काले मुंह का । लाल-सा ।’

‘वो तो मेरा सिताबी है । एक ही आवाज में मेरे पास आ जाता है । उसे तो मैं और एडवर्ड सबसे ज्यादा ब्रेड खिलाते हैं ।’ मां-बेटे दोनों भूल चुके हैं किताब, टेस्ट, चेतावनी ।

‘मैं कहता हूं, तुम नहीं जाओगे उधर । काट लिया तो चौदह इंजेक्शन लगेंगे इतने बड़े-बड़े, पेट में, समझे!’

बंटी पर कोई असर नहीं । उसे अपने दोस्त पर यकीन है ।  ‘मम्मी, वो तो अभी ज्यादा बड़ा नहीं हुआ । कल ऐनी और उसकी फ्रेंड खेल रही थीं, मम्मी ! बड़ा मजा आया । मैंने बुलाया । टीलू टीलू टीलू ! और ऐनी की ओर इशारा कर दिया । बस ऐनी के पीछे पड़ गया । ऐनी भागते-भागते अपने घर में घुस गई ।’ बंटी का चेहरा सुबह के सूर्य-सा खिल उठता है ऐसी हरकतों के विवरण बताते वक्त ।

मम्मी को शादी में जाना है । मम्मी के तनाव मम्मी के किसिम के ही हैं । पहले इस पक्ष में सोचती रहीं कि साथ ही ले जाती हूं बंटी को । कुछ खा-पी भी लेगा । मस्‍ती कर लेगा तो कल पढ़ाई भी करा लूंगी ।  ‘लेकिन, लेकर तभी जाऊंगी, जब तुम ये, ये काम कर लोगे ।

बंटी चुप रहा । जैसे कोई वास्ता ही न हो इस बात से ।

‘सुना कि नहीं ? जब तक टेस्ट नहीं होंगे तब तक नहीं ले जाऊंगी । और लिखित में लूंगी ।’

उसने ऐन वक्‍त पर मना कर दिया ।  ‘मैं नहीं जाता । कौन जाए बोर होने के लिए ।’ पापा ने भी समझाया पर नहीं माना ।  ‘मैं पढ़ता रहूंगा ।’ यह और जोड़ दिया ।

अब आप क्या करेंगे ? मम्मी की सारी योजनाएं धरी की धरी रह गईं । वह जाने की तैयारी कर रही हैं । बालों को धो रही हैं, पोंछ रही हैं और बीच-बीच में बंटी को आकर देख जाती हैं– पढ़ रहा है या नहीं ? ऐसे छोड़ते वक्त उनकी चिंता और चार गुना ज्यादा हो जाती है । बंटी को जन्म-भर को काफी उपदेश, हिदायतें देंगी । बंटी पूरी तन्‍मयता से मेज पर बैठे हैं । उस्‍ताद की तरह । उसे पता है, इधर मम्मी बाहर, उधर वह । छह बज गए और मम्मी अभी तक नहीं गईं । बंटी उठे और मम्‍मी के सामने थे । ‘मम्मी, क्या कर रही हो ? कैसी बदबू आ रही है ?’

मम्‍मी क्‍या जवाब दें बच्‍चे की प्रतिक्रिया का ।

‘मम्मी, हमारी अंग्रेजी वाली मैम के पास आप चले जाओ तो बदबू के मारे नाक फट जाए । जाने कितने तरह का इत्र लगाकर आती हैं । एक दिन उन्‍होंने मुझे कहा कि मेरी मेज की ड्रार से किताब ले आओ । मम्मी, सुनो तो । उसमें इतनी चीजें थीं – फेयर एंड लवली, पाउडर, लिपस्टिक, जाने क्या-क्या । मम्मी, ये स्कूल में क्यों रखती हैं ये सारी चीजें ?’

गाल रगड़ती मम्मी का मानो दम सूखता जा रहा है ।  ‘अब तू मुझे तैयार भी होने देगा ? तूने काम कर लिया ?’

‘अभी करता हूं न । मैंने आपको बता दिया न । मम्मी ! क्यों लगाती हैं वे इतनी चीजें ?’

‘तुझे अच्‍छी नहीं लगतीं ?’

बंटी चुप । क्या जवाब दे ?

‘तेरी बहू लगाया करेगी, तो….’

‘मुझे सबसे अच्छी सविता सिंह मैडम लगती हैं । उनसे बिलकुल बास नहीं आती ।’

पढ़ने को छोड़कर उसे सारी बातें अच्छी लगती हैं ।

‘मम्‍मी, हमारी क्‍लास में एक लड़की है । वह भी 15 मार्च को पैदा हुई थी । मैं भी ।’

अगले दिन पूछ रहा था । ‘मैं 12 बजे पैदा हुआ था न ? वो साढ़े बारह बजे हुई  थी ।’

‘तू सवा बारह बजे हुआ था ।’

‘हूं ! तब भी मैं 15 मिनट बड़ा तो हुआ ही न ।’

इस हिसाब में उससे कोई गड़बड़ नहीं होती । गड़बड़ होती है तो स्कूल की किताबों के गणित से । ‘पापा, ये बीजगणित क्यों पढ़ते हैं ? क्या होता है इससे ?’ बंटी प्रसन्नचित्‍त मूड में था । शायद पापा भी ।

‘बेटा, हर चीज काम की होती है । कुछ आज, कुछ आगे कभी ।’

‘कैसे ?’

‘जैसे जो आप लाभ-हानि परसेंट के सवाल करते हो, उससे आपको बाजार में तुरंत समझ में आ जाता है कि कितना कमीशन मिलेगा ? कौन-सी चीज सस्ती है, महंगी है । बैंक में ब्याज-दर आदि । तुरंत फायदा हुआ न ? बीजगणित तब काम आएगा, जब बड़ी-बड़ी गणनाएं करोगे, जैसे पृथ्वी से चांद की दूरी, ध्वनि का वेग, आइंस्टाइन का फार्मूला…..’

बंटी की समझ में सिर्फ पहली बात ही आई है, दूसरी नहीं । चुपचाप काम में लग गया । इसलिए भी कि इससे ज्यादा प्रश्‍नों पर पापा-मम्मी चीखकर, डांटकर चुप करा देते हैं । थोड़ी देर बाद उसने फिर चुप्पी तोड़ी, ‘और पापा, किसी को यह सब नहीं पता करना हो तो उसके क्या काम आएगा यह सब ?’

पापा के पास कोई जवाब नहीं है । ‘अब तुम पहले अपना होमवर्क पूरा करो ।’

बीजगणित में फेक्‍टर्स की एक्‍सरसाइज थी । पहले प्रश्‍न पर ही अटका पड़ा है ।

‘जब तुम्हें आता नहीं तो पूछते क्यों नहीं ? बोलो, हमारी परीक्षा है या तुम्‍हारी ?’ तड़ातड़ कई चांटे पड़ गए पापा के ।

बाल पकड़कर बंटी को झिंझोड़ डाला ।  ‘खबरदार ! जो यहां से हिला भी, जब तक ये सवाल पूरे नहीं हो जाते । चकर-चकर प्रश्न करने के लिए अक्‍ल कहां से आ जाती है ? जो सांस भी निकाली तो हड्डी तोड़ दूंगा ।’

पापा छत पर टहल रहे हैं- अपराधबोध में डूबे । क्यों मारा ? क्या मारने से पढ़ाई बेहतर होगी ? और इतनी दुष्टता से !  कहीं आंख पर चोट लग जाती तो ? वह जल्दी रोता नहीं है । लेकिन आज कितना बिलख-बिलखकर रोया था ।

‘मैथ्स, मैथ्स, मैथ्स ! क्या मैं मर जाऊं ? शाम को पांच बजे से आठ बजे तक मैं पढ़ता हूं कि नहीं ? बैडमिंटन नहीं जाना, नहीं गया । कंप्यूटर मत जाओ, वहां नहीं जाता । क्या दुनिया के सारे बच्चे एक जैसे होते हैं? आपको भी तो कुछ नहीं आता होगा ? मारो ! मारो ! मेरी गरदन क्यों नहीं काट लेते !’

बार-बार उसका चेहरा आंखों में उतर रहा है- आंसुओं से लथपथ । डरा हुआ-सा । जल्दी उठकर पढ़ने में लगा है । अलार्म लगाकर सोया था । सुबह के भुकभुके में बरामदे से बंटी की आवाज आई, ‘पापा ! देखो चांद।’

पापा अभी भी उसकी परीक्षा के बारे में सोच रहे थे उठकर उसके पास पहुंचे ।

‘इधर देखो, इधर पापा ! कितना बड़ा है । पेड़ों के बीच । सीनरी ऐसी ही होती है । मैं भी बनाऊंगा ऐसी । एग्जाम के बाद ।’

कोई नहीं कह सकता कि रात को बंटी की पिटाई हुई है और आज उसकी परीक्षा है ।

बस्ते का बोझ या अंग्रेजी का : प्रेमपाल शर्मा

Baste Ka bojh

बच्चों की परीक्षाएं नजदीक हैं और उनमें बढ़ता तनाव भी। यह वाकई ‘बस्ते का बोझ’ है या इसके दूसरे कारण हैं जैसे अंग्रेजी माध्यम, परीक्षा प्रणाली सहित पूरी क्रूर शिक्षा व्यवस्था और डार्विन के शब्‍दों में कहा जाए तो योग्यतम का जीवित रहने की कश-म-कश उर्फ अंतिम चुनाव। यह चाहे आई.आई.टी., मेडिकल, लॉ, प्रबंधन के अच्छे कॉलेजों में प्रवेश हो या फिर नौकरियां। अकेले कोटा शहर में पिछले एक वर्ष में दो दर्जन से अधिक आत्महत्याओं ने इस बहस को फिर जिंदा कर दिया है कि पढ़ाई का बोझ कैसे कम किया जाए, जिससे हमारी मासूम पीढ़ी ऐसा कोई आत्मघाती कदम न उठाए। वाकई दशको से लगातार रिश्‍ते घाव की तरह बहस जारी है। इधर, दिल्ली सरकार ने शिक्षा में सुघार के लिए कुछ कदम उठाए हैं तो केन्द्र सरकार ने पूर्व केबिनट सचिव टी.एस.आर. सुब्रामणयम की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया है जो शिक्षा के सभी पहलुओं पर विचार करेगी।

दरअसल वर्ष 1992 में जब से प्रोफेसर यशपाल समिति ने अपनी रिर्पोट में ‘बस्ते का बोझ’ की बात उठाई तब से हर मंच पर हर आदमी को मानों इस मसले पर बोलने का अधिकार मिल गया है। यही वह दौर है जब शिक्षा का जो निजीकरण 1980 के मध्य में शुरू हुआ था उसे गुणवत्ता, आदि के नाम पर बहुत तेजी से बढ़ाया गया। हजारों नुक्स निकाले गए सरकारी स्कूलों में, पाठ्यक्रम में, परीक्षा प्रणाली में और देखते-देखते हर खाली जगह निजी स्कूलों के हवाले होती गयी। कुछ जनसंख्या का दबाव, कुछ ग्लोवलाइजेशन की हवा और शेष सरकारी वित्तीय कारण जिन्हें गिनाते हुए सरकारी स्कूलों से पैर सिकोड़ने का नजरिया कि जहां आजादी के शुरू के दशकों में समान शिक्षा नब्बे प्रतिशत बच्चों को उपलब्ध थी, अब धीरे-धीरे घटकर पचास प्रतिशत के आसपास हो चुकी है। भला हो ग्रामीण भारत का जिसकी बदौलत समानता का यह आंकड़ा कुछ तो तसल्ली देता है। वरना महानगर, शहर, कस्बों का खाता-पीता वर्ग पूरी तरह निजी शिक्षा की तरफ मुड़ गया है। सविधान में समानता, समाजवाद की दुहाई देने वाली हर रंग की सरकार और उसकी संसद का मौन नागरिकों की इस बुनियादी जरूरत पर चिंताजनक है।

आखिर हम आयोग या समितियॉं बनाते क्यों हैं? क्यों देश की जनता को झांसा दिया जाता है? दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में बने शिक्षा-आयोग वर्ष 1964-66 की सिर्फ दो महत्वपूर्ण सिफारिशों को दोहराना यहां पर्याप्त रहेगा। पहली-सभी के लिये समान शिक्षा हो और दूसरी-न केवल स्कूली शिक्षा बल्कि उच्च शिक्षा भी भारतीय भाषओं के माध्यम से दी जाए। यानी कि रोग के लक्षण कोठारी जैसे शिक्षाविद, वैज्ञानिक, प्रशासक ने साठ के दशक में ही बहुत अच्छी तरह पहचान लिए थे, संसद ने विचार भी किया लेकिन पतनाला वहीं गिरा। देखा जाए तो ‘बस्ते का बोझ’ बढ़ने की शुरुआत भी तभी होती है। निजी स्कूलों को मुनाफे के लिए पहले अपना व्यवसाय, धंधा देखते हैं, बाद में कुछ और। और धंधे के लिए सबसे मुफीद लगी अंग्रेजी। केवल विषय के रूप में ही नहीं नब्बे के इस दशक में पहले उसे छठी की बजाय प्राइमरी कक्षाओं से पढ़ाने की बात आगे बढ़ी और फिर 21वीं सदी शुरू होते-होते प्राइमरी में भी एक विषय के बजाय अंग्रेजी ने माध्यम भाषा की जगह ले ली। अंग्रेजी का मोह सैम पित्रोदा और उसके बांकुरों ने ज्ञान आयोग, जैसे मोहक नारो में लपेटकर ऐसा प्रचारित किया कि सरकारी स्कूल बंजर होते गए। दिल्ली जैसे शहर में भी सरकार और नौकरशाह इस भाषा में बात करने लगे कि सरकारी स्कूलों के बंद करने से इतने अरब-खरब मिल जाएंगे और अध्यापकों की तनख्वाह और दूसरे खर्च कम होंगे सो अलग। गलती पूरी तरह उनकी भी नहीं थी। सरकारी नीतियों ने सरकारी स्कूल, उसके अध्यापकों की हालत ही ऐसा कर दी कि जनसंख्या के इतने दबाव के बावजूद वहॉं बच्चों ने आना बंद कर दिया। आज भी 99 प्रतिशत बच्चे गरीब, मजदूर समुदायों के ही इन स्कूलों में पढ़ते हैं।

हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने समान शिक्षा के पक्ष में जो निर्णय दिया है, क्या उसे दिल्ली सरकार को भी नहीं मानना चाहिए? याद दिला दें कि इस निर्णय के अनुसार सभी सरकारी अधिकारी, कर्मचारी और प्रशासन से जुड़े हर नागरिक को अपने बच्‍चे सरकारी स्कूल में पढ़ाना अनिवार्य बनाया जाए। अभी तक तो इस मुद्दे पर चौतरफा चुप्पी है। संसद तो चलती ही बंद होने के लिए है।

‘बस्ते के बोझ’ की बुनियाद में शिक्षा का यही अंध, अनैतिक, अनि‍यं‍त्रि‍त  निजीकरण है। अंग्रेजी के साथ-साथ निजी स्कूलों ने मध्यवर्ग की सुरसा इच्छाओं को भापते हुए यह होड़ भी पैदा की कि हमारे यहां इतने विषय ज्यादा पढ़ाए जाते हैं। किसी ने जर्मनी, फ्रैंच के आवरण में विदेशी नौकरियों का लालच दिया तो दूसरे नुक्कड़ स्कूलों ने जापानी, चीनी का। इन देशों के दूतावासों ने अपनी-अपनी संस्कृति, भाषा के राष्‍ट्रीय एजेंडा को बढ़ाते हुए भी बड़ी भूमिका निभाई या कई आज भी निभा रहे हैं। जर्मन भाषा के पक्ष में जर्मनी की प्रमुख का हाल ही में दिल्ली दौरा और नयी सरकार के साथ तालमेल उसी की कड़ी है। केवल इतना ही नहीं जिन विषयों को पढ़ाने की बच्चे की उम्र, समझ के लिए जरूरत ही नहीं है, उनको भी बच्चे के बस्ते में ठूंस दिया गया है। दुहरा फायदा- बच्चों के अभिभावकों से और पैसा वसूल। और ऊपर से ये आतंक, लालच कि हमारा स्कूल क्यों सबसे अच्छा है। बिल्कुल फिटजी, नारायण, बंसल जैसी उन कोंचिग संस्थाओं की तर्ज पर कि यदि आप आई.आई.टी. या दूसरी राष्‍ट्रीय परीक्षाओं में सफल होना चाहते हो तो बारहवीं की बजाय नवीं कक्षा से ही इन किताबों पर जुट जाइए। उपर से कुछ और भी कराटे, एबेकस, शतरंज या मंहगे खेलों का दबाव। इसमें सबसे ज्यादा कसूरवार हैं तो यह अमीर अंग्रेजीदां वर्ग जो खुद स्कूलों में जाकर यह शिकायत करता है कि आप बच्चों को होमवर्क कम देते हैं। पड़ोस का स्कूल तो इतनी मेहनत कराता है। स्कूल प्रबंधन को और क्या चाहिए। वे दो किताबें और लगा देते हैं। अफसोस कि कई बार पूरे साल इन किताबों को खोलने की फुरसत भी बच्चो को नहीं मिलती।

इन सब चक्कियों के बीच आखिर पिसा कौन? मासूम बच्चे और बच्चियों जिनकी आत्महत्या की खबरें शिक्षा व्यवस्था की पूरी दुनिया को हिलाने के लिये पर्याप्त हैं। प्रोफेसर यशपाल के ही शब्‍दों में आई.आई.टी. आदि में न चुने जाने वाले तो पूरी उम्र हार महसूस करते ही है, जो चुने भी जाते हैं वे भी बहुत एकांकी व्यक्तित्व होते हैं।

हिन्दी पट्टी के बुद्धिजीवी, पत्रकार, प्रोफेसर यहां और भी बडे़ अपराधी के रूप में उभरते हैं। वे पुरस्कारों, अकादमियों, विश्‍वविद्यालयों, कॉलेजों के पद की राजनीति में तो दशकों से लिप्त हैं, स्कूलों-कॉलेजों में अपनी भाषा के पक्ष में वे आजतक न सामने आए न अपनी भाषा के पक्षधर उन आंदोलनों के साथ खड़े होते। क्या कभी ऐसे मुद्दों पर मेरे सवेदनशील, सहिष्णु, सेकुलर या धरम संस्कृति के ध्वज–रक्षकों ने कोई आन्दोलन किया? शायद वे ज्यादा समझदार हैं कि अंग्रेजी और इसी भारी बस्ते की बदौलत उनकी संततियां इस देश और उसकी समस्याओं से मुक्ति पाकर विदेश में चुपचाप जाकर बस सकती हैं।

अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर धीरे-धीरे सब कुछ नष्‍ट कर रही है। उत्तराखंड के हल्द्वानी और उत्तरप्रदेश के मेरठ में रहने वाले आठवीं क्लास के अमीर बच्चे कहते हैं कि‍ अंकल हिंदी लिखना बहुत मुस्किल है। यह कहते हुए उनके चेहरे पर कोई संकोच नहीं है। हो भी क्यों ? वाकई उनका कोई अपराध नहीं है। अब पहली क्लास से ही अंग्रेजी माध्यम भाषा के रूप में महानगरो के बाद इन छोटे नगरों, कस्बों तक पहुँच चुकी है।

हमारे समाज में शिक्षा की उलटवासियों भी अजीब हैं। साठ-सत्तर की उम्र छूता हुआ हर नागरिक अपने बचपन में पढ़ने के आनन्द, अपनी भाषा, आजादी पर खूब मगन होता है, लेकिन अपने आसपास इसकी रक्षा के लिए लड़ने को कतई तैयार नहीं है। क्या इन सबको पूरा व्यवस्था सहित इस अपराध से मुक्त किया जा सकता है?

याद कीजिए, जितनी वकालत ज्ञान आयोग अंग्रेजी के लिए कर रहा था, उसी रफ्तार से भारत के शीर्ष संस्थान आई.आई.टी. समेत दुनिया के नक्‍शे पर अपनी साख खोते जा रहे हैं। कारण-विदेषी भाषा में पढ़ाई, प्रशासन में हर रचनात्मकता को खत्म कर देती है। गांधी, टालस्टाय, न्यूगी से लेकर दुनिया भर के शिक्षाविद बार-बार यह कहते रहे हैं। लेकिन सिर्फ भारत में बहस को बस्ते के बहाने किसी और दिशा में मोड़ दिया है। भारतीय राजनीति का तो यह अपराध है ही।

हाल ही में दिल्ली के कुछ शिक्षकों और बच्चों से बातचीत में भी इस बात की पुष्टि हुई। जहां सरकारी स्कूल के बच्चों ने बस्ते के बोझ की शिकायत उतने मुखर शब्‍दों में नहीं की, जितनी महंगे निजी, अंग्रेजीदां स्कूल के बच्चों ने। जाहिर है निजी स्कूलों ने अपनी कमीज ज्यादा सफेद चमकाने और बताने की होड़ में सरकारी स्कूलों के मुकाबले बस्ते का बोझ बिना किसी तर्क के ज्यादा बढ़ाया है। सबसे अच्छा पक्ष लगा सरकारी स्कूलों के शिक्षकों का, एक स्वर से यह कहना कि पाठ्यक्रम कतई ज्यादा नहीं है। पूरे वर्ष में हम मजे से इसे पूरा कर सकते हैं। बशर्ते कि हमारा साठ प्रतिशत समय दूसरे फालतू कामों जैसे- मतदाता सूची सोलह तरह के वजीफे के हिसाब-किताब, जनगणना, बच्चों के बैंक में खाते खुलवाने जैसे कामों में न लगाया जाए। बस्ते के बोझ में अंग्रेजी बोलना, पढ़ने पर अतिरिक्त जोर देना इन शिक्षकों सरकारी बच्चों को भी ज्यादा तनाव में ला रहा है।

निजी स्कूलों की होड़ा-होड़ी दिल्ली के सरकारी स्कूलों में भी अच्छी अंग्रेजी बोलने के लिए ब्रिटेन की एक संस्था के साथ करार हुआ है। क्या कभी भारतीय भाषाओं, हिन्दी समेत के लिए भी सत्ता को कोई चिंता हुई। अफसोस कि बस्ते के बोझ में इन पहलुओं को हर सरकार नजर अंदाज कर रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि केन्द्र सरकार द्वारा गठित सुब्रामण्‍यम समिति शिक्षा में अपनी भाषाओं के पक्ष को जरूर रेखांकित करेगी। वर्ष 2014 में ‘संघ लोक सेवा आयोग’ की सिविल सेवा परीक्षा में अंग्रेजी के अतिरिक्त प्रवेश के विरोध में पूर्व केबिनेट सचिव ने खुलकर भारतीय भाषाओं की वकालत की थी।

‘बस्ते के बोझ’ को लेकर दिल्ली की नयी सरकार भी संवेदनशील लगती है। सरकारी स्कूलों को बढ़ाना, उनमें सुविधाओं को दुरस्त करना तथा शिक्षकों के पढ़ाने के अलावा दिए जाने काम को कम करने से निश्चित रूप से बेहत्तर माहौल बनेगा। अभिरुचि, क्षमता के हिसाब से कई किस्म के व्यावसायिक पाठ्यक्रम जैसे- होटल, खेल, नाटक, फ़िल्म, बढ़ईगिरी, भवन निर्माण, इलेक्‍ट्रीशियन, साहित्य की शुरुआत भी बस्ते के बोझ को अतंतः कम ही करेगी। प्रोजेक्ट, ट्यूशन आदि के बहाने निजी स्कूलों की उन अतिरिक्त, अवैज्ञानिक किताबों पर जरूर लगाम लगाने की जरूरत है। हां, पाठ्यक्रम को कम करने में भी समीक्षा में जरूर धैर्य से काम लेना होगा। सभी कक्षाओं में विषय की निरंतरता, समझ के सोपान और राष्‍ट्रीय-अन्तराष्‍ट्रीय स्तरों को भी ध्यान में रखने की जरूरत है। यह बहुत जल्दबाजी में नहीं हो सकता। पूरी पढ़ाई में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष पढ़ने के आनंद को बच्चों में जगाये रखना होना चाहिए। परीक्षा पद्धतियों में सी.बी.एस.ई. और एन.सी.ई.आर.टी. ने मिलकर कुछ अच्छे कदम उठाए हैं।

एक विकल्प हर स्कूल में ऐसे पुस्कालयों को बढ़ाना भी है जहां विविध विषयों की किताबें, सी.डी. उपलब्ध हों और बच्चे मनमर्जी वहां बैठ सकें। सारा ज्ञान बच्चे के बस्ते में ही भारतीय समाज क्यों ठूंसना चाहता है? जबकि मुहावरा सब को पता है कि मूर्खों का ही बस्ता सबसे ज्यादा भारी होता है।

क्या इसका उल्टा भी उतना ही सच नहीं है?

परीक्षाओं के घोटाले : प्रेमपाल शर्मा

prempal sharma

शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो जब देश में चल रही परीक्षाओं को लेकर कोई न कोई घोटाला सामने न आता हो। पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओपन लर्निग के कई पेपर एक के बाद एक लीक हुए। ठीक इसी वक्त मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में हुई धांधली का मामला भी सुप्रीम कोर्ट के सामने है, जिसने इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित कर लिया है। मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले के बारे में पूरा देश जानता है कि कैसे वर्षो से मेडिकल कॉलेजों की सीटें भरी जाती थीं। बेईमानी की एक से एक युक्तियां सामने आ रही हैं। कभी पर्चा लीक होता है तो कभी उत्तर पुस्तिका खाली छोड़ दी जाती है, ताकि इन्हें मनमर्जी तरीके से भरकर धांधली कराई जा सके।

दो वर्ष पहले एम्स और चंडीगढ़ की डॉक्टरी की स्नातकोत्तर परीक्षा में ब्लूटूथ और आइटी के नए औजारों के प्रयोग के मामले सामने आए थे। आखिर यह सब कब तक होता रहेगा? नई पीढ़ी की आस्था शिक्षण, शोध, मेहनत, नैतिकता जैसे शब्दों पर कैसे टिकेगी? क्या दुनिया भर में सम्मान पाने वाले भारतीय युवा परीक्षाओं में होने वाले ऐसे घोटालों के चलते अपनी प्रतिभा और मेहनत के दम पर अपेक्षित सम्मान हासिल कर पाएंगे? क्या इतने बड़े देश का युवा संसाधन इस छोटी सी समस्या के आगे असहाय हो चुका है? अब वक्त आ गया है जब केंद्र सरकार सख्त से सख्त कानून बनाकर हस्तक्षेप करे।

शिक्षा भले ही राज्यों की समवर्ती सूची का विषय हो, लेकिन यदि उससे पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था चौपट हो रही है तो केंद्रीय शिक्षा मंत्रलय हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकता। पिछले दिनों दसवीं, बारहवीं की बोर्ड की परीक्षाओं में बिहार, उत्तर प्रदेश की तस्वीरें आपने देखी होंगी कि कैसे पूरा तंत्र नकल और धांधली में लिप्त था। अफसोस की बात यह है कि देश के कुछ राजनेता तक वोट की खातिर शिक्षा की इन बुराइयों को बढ़ावा दे रहे हैं। हर बार मीडिया अपनी भूमिका निभाता है, पूरे षड्यंत्र पर अंगुली उठाता है, लेकिन शासन के कान पर जूं नहीं रेंगती। दंभ में डूबे लोग छाती ठोककर खुलेआम नकल का वादा करते हैं। शायद इसी के चलते पिछले दस वर्षो में भारतीय शिक्षा संस्थान दुनिया भर के विश्वविद्यालयों में पहले दो सौ संस्थानों की सूची में जगह बना पाने में नाकाम रहे हैं।

क्या परीक्षा आयोजित कराने के लिए भी विदेशी कंपनियों को लगाने की जरूरत है? क्या इंजीनियरिंग, डॉक्टरी या दूसरी परीक्षाओं में रोज-रोज बढ़ती ऐसी घटनाएं नकल और बेईमानी की इन्हीं प्रवृत्तियों का विस्तार नही हैं? जिस तरह नकल के बूते दसवीं, बारहवीं की परीक्षाएं ऐसे लोग उत्तीर्ण करते हैं, लगभग वैसे ही तौर-तरीकों को वे प्रतियोगी परीक्षाओं में भी आजमाते हैं। व्यवस्था की कमजोरी यही है कि इनमें लिप्त अपराधियों को कड़ा दंड नहीं मिलता, वरना पिछले दशकों में ऐसी घटनाओं की बाढ़ नहीं आती। बहुत दिन नहीं बीते, जब प्रबंधन के सर्वोच्च संस्थान आइआइएम में दाखिले के लिए होने वाली कैट परीक्षा में भी धांधली का मामला सामने आया था। अपराधी था, नालंदा का रंजीत सिंह डॉन। वह ऐसे ही घोटाले से डॉक्टर बना था, लेकिन बैंक, इंजीनियरिंग, डॉक्टरी समेत सभी परीक्षाओं में धांधली बिल्कुल समाजवादी अंदाज में करता था। बाद में वह पकड़ा तो गया, लेकिन यदि उसे ऐसा दंड दिया जाता जिससे पूरे देश में संदेश जाता तो ऐसे कामों को दोबारा करने की हिम्मत शायद ही कोई अन्य जुटा पाता।

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला शिक्षकों की भर्ती घोटाले के मामले में एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के साथ सजा भुगत रहे हैं, लेकिन अपराधियों में न्याय व्यवस्था ऐसा भय नहीं पैदा कर पाई कि ये फिर से ऐसी जुर्रत न करें। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने ऐसा समाज बनाया है जहां नकल, चोरी, धांधली जैसी वारदातों को अपराध ही नहीं माना जाता हो। पिछले वर्ष कुछ शब्दों की चोरी के आरोप में भारतीय मूल के प्रसिद्ध अमेरिकी पत्रकार फरीद जकारिया को अमेरिका की टाइम पत्रिका ने तुरंत तलब किया और संतुष्ट होने तक उनके सभी लेखों के प्रकाशन-प्रसारण पर प्रतिबंध लगा दिया था। दुनिया भर के प्रसिद्ध शिक्षण संस्थानों में ऐसे सॉफ्टवेयर हैं जहां शोध आदि में एक शब्द भी चोरी नहीं कर सकते हैं। एक ओर हमारे विश्वविद्यालय हैं जहां पूरे के पूरे शोध प्रबंध ही उड़ा लिए जाते हैं। पिछले दिनों उत्तर पूर्व के एक फर्जी विश्वविद्यालय द्वारा एक वर्ष में तीन सौ से ज्यादा पीएचडी डिग्री देने की खबर तो शायद दुनिया भर के शोध इतिहास में अनोखी है। और तो और दिल्ली विश्वविद्यालय के पिछले उपकुलपति भी वनस्पति शास्त्र के एक शोधपत्र के मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय के सामने सफाई दे रहे हैं।

पिछले दिनों ऐसी ही एक खबर आई कि दक्षिण भारत में एक न्यायाधीश नकल करते पकड़े गए। उस खबर को भी जनता नहीं भूली होगी जब दिल्ली में बैठे एक पुलिस अधिकारी की पत्नी ने बिना बिहार गए ही एमए की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। ऐसे मामलों पर कुछ दिन या कहिए कुछ घंटे ही शोर मचता है। क्या येन-केन डिग्री हासिल करना ही शिक्षा का मकसद रह गया है और जब शीर्ष पर बैठे कर्णधार भी उसमें लिप्त हों तो अव्यवस्था के अंधेरे की कल्पना की जा सकती है। दिल्ली के एक मंत्री की डिग्रियों का मामला भी इसी कड़ी का उदाहरण है। संघ लोक सेवा आयोग, आइआइटी जैसी एकाध परीक्षा जरूर उम्मीद जगाती हैं।

सूचना प्रौद्योगिकी का जिस तेजी से विस्तार हो रहा है और ठग जितने चुस्त-दुरुस्त हैं, व्यवस्था को भी उतनी चुस्ती से उसका मुकाबला करना होगा। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है कड़े से कड़े दंड की व्यवस्था। एक और महत्वपूर्ण पक्ष पर विचार करने की जरूरत है और वह है आखिर बार-बार इतनी परीक्षाएं क्यों? दिल्ली या दूसरे विश्वविद्यालय ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बनाते कि स्नातकोत्तर या दूसरे पाठ्यक्रमों में प्रवेश स्नातक परीक्षा के आधार पर हो और स्नातक में बारहवीं बोर्ड के आधार पर। तमिलनाडु सरकार इंजीनियरिंग में दाखिले तमिलनाडु बोर्ड की परीक्षा के आधार पर कर रही है और परिणाम बहुत अच्छे रहे हैं। ऐसा ही और जगह भी होना चाहिए।