





स्वतंत्र फिल्मकार और गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल व जन संस्कृति मंच के फिल्म समूह द ग्रुप के संयोजक संजय जोशी पिछले दिनों इंसेफेलाइटिस यानी नवकी बीमारी की चपेट में आए पूर्वांचल के इलाके में शूटिंग के लिए गए। सरकार अस्पतालों में ही 2005 से अब तक करीब 17000 बच्चे मर चुके हैं। बीमारी की मार से पीडि़त परिवारों के दुखों को उन्होंने बड़ी शिद्दत से महसूस किया। उनके संवदेनशील मन ने व्यवस्था और काइंयापन पर कई सवाल खड़े किए-
मई 2010 के पहले सप्ताह में हम गोरखपुर और आसपास के कस्बों में वीडियो कैमरा टीम के साथ घूम रहे थे। मकसद था इंसेफेलाइटिस के मरीजों और उनके परिवारों की कहानी को दर्ज करना।
यह बीमारी जिसे अभी भी पूर्वांचल के इस इलाके में नवकी बीमारी के नाम से ही जाना जाता है, 1978 में आई। कारण था धान के खेतों में पनपा मच्छर जो कि सूअर के बाड़ों में भी पनपता था। बारिश का मौसम खत्म होते-होते सितंबर से गोरखपुर और आसपास के शहरों में एक अजीब बदहवासी छा जाती है। प्राय: रोज किसी न किसी गांव और कस्बों से लोग अपने बच्चों को लेकर अस्पताल की तरफ भागते हैं। इस बीमारी के ज्यादातर शिकार बच्चे होते हैं। शुरूआत के दो दिन तक तो बीमारी का पता ही नहीं चलता फिर अचानक बुखार का तेज होना, आवाज का चले जाना और लकवा मारना किसी बुरे अंदेशे की इत्तला देता है। प्राय: अस्पताल तक आते-आते बच्चा या तो दम तोड़ देता है या फिर गंभीर रूप से जिंदगी भर के लिए विकलांग हो जाता है। सिर्फ सरकारी अस्पतालों में ही अब तक करीब 17000 बच्चे मर चुके हैं। गोरखपुर के एक पत्रकार के मुताबिक यह नुकसान 20 प्रतिशत ही है क्योंकि सरकारी अस्पताल 20 फीसदी से ज्यादा मरीजों को नहीं देख सकते। फिर तो यह समझिए कि पिछले तीस साल में अब तक तकरीबन एक लाख लोग मर चुके हैं। एक लाख लोगों के मरने के बावजूद यह बीमारी अभी भी राष्ट्रीय आपदा का दर्जा नहीं पा सकी है और न ही राष्ट्रीय चिंता का। पिछले बरस ही स्वाइन फ्लू को लेकर जिस तरह से हायतौबा मचाया गया, उससे तो यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पूर्वांचल में गरीबों के बच्चों की मौत भी काफी नहीं है। इसके बारे में गंभीरता से सोचने के लिए, जबकि स्वाइन फ्लू से मुश्किल से मरे आठ-दस लोगों के लिए सारा अमला ज्यादा चिंतित है। शायद मसला गरीब और अमीर होने का भी हैै। हमारी टीम भी इन्हीं सब सवालों की खोज में निकली थी।
हमारी टैक्सी कैमरा टाइपौड और साउंड उपकरणों के से लदी गोरखपुर से 25 किलोमीटर दूर पिपराइच की तरफ जा रही थी। हमें पिपराइच से सटे दलितों की अधिसंख्या वाले होलिया गांव पहुंचना था। वर्ष 2005 में जापानी इंसेफेलाइटिस महामारी की तरह फैली। तब इस गांव से सर्वाधिक लोग बीमारी की चपेट में आए। गोरखपुर में बच्चों के डाक्टर आरएन सिंह ने अपने महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट नीप (नेशनल इंसेफेलाइटिस इरेडिक्शन प्रोग्राम) की शुरुआत इसी गांव से की थी। नीप की वजह से गांव में जापानी बुखार से संबंधित सूचना वाला एक बड़ा बोर्ड नजर आया। कैमरामैन के मुफीद फ्रेम के लिए यह बोर्ड बहुत काम का था। कैमरामैन ने गांव को दर्शाने के लिए बोर्ड के साथ धीमा पैन किया।
होलिया गांव हमारे मैग्नेटिक टैप में दर्ज हो गया। डॉ. आरएन सिंह के सहयोगी डॉ. लाल बहादुर सिंह पड़ोसी कस्बे पिपराइच से हमारी मदद के लिए आ गए थे। हम कहानी की तलाश में थे। डॉ. सिंह ने बताया कि हमने इस बीमारी से लोगों को परिचित कराने के लिए स्कूल से प्रयोग शुरू किया है। कैमरामैन, साउंड रिकार्डिस्ट और मै अब कुछ अच्छे दृश्य और साउंड एम्बीयंस मिलने की उम्मीद में उत्साहित थे। हमारी सफेद एयरकंडीशंड इंडिगो कार जल्दी ही नई लोकेशन पर पहुंच गई। स्कूल की प्रार्थना खत्म हो चली थी और बच्चे अपनी-अपनी कक्षाओं में व्यस्त थे, लेकिन महान फिल्म टोली के लिए हर चरित्र का रीटेक संभव था। डॉ. सिंह के मित्र को समस्या बताई। तुरंत ही कक्षाओं को रोककर फिर से प्रार्थना की रीटेक की तैयारी शुरू की गई। कैमरामैन ने प्रार्थना सभा के सामने टाइपौड जमाया। प्रार्थना पढऩे वाली मुख्य लड़की की कमीज में रेडियो माइक लगा दिया गया। हवा में तैरता सांउड रिकार्डिस्ट का गन माइक और बूम राड गरीब बच्चों को भविष्य में डींग हांकने का मौका दे रहे थे। प्रार्थना की सभा के बाद मास्टर जी ने बच्चों को बताया कि जापानी बुखार से कैसे बचा जाता है। जल्द ही कट-कट की आवाजें आईं। हम यह भूल गए थे कि मुख्य भाषण मास्टर जी का है। इसलिए अबकी बार रोडियो माइक मास्टर जी की कमीज में टांगा गया और फिर से प्रार्थना सभा का रीटेक हुआ। कुछ बच्चे प्रार्थना की लाइनों से इतर बूम राड में लगे माइक की गति को अपनी आंखों से पकडऩे को बेचैन थे। प्रार्थना के गीतों और राष्ट्रगान की औपचारिकता के बाद मास्टर जी ने स्वच्छता की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें अपने बड़े-बूढों को शौच खुले में नहीं, बल्कि शौचालय में करना चाहिए के बारे में समझाना चाहिए। मास्टर जी शायद यह जानते थे कि बिना शौचालय हुए भी भाषण में तो यह कहा ही जा सकता है कि शौच, शौचालयों में करना चाहिए। नीप ने तो सिर्फ शौचालय में ही शौच करना चाहिए, बताने का जिम्मा लिया है। अब गांव में किसी के पास शौचालय बनाने की सामथ्र्य नहीं है तो वह क्या करें! होलिया में जापानी बुखार का टीकाकरण हुआ है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक टीकाकरण इस बुखार से बचाव का एकमात्र उपाय है। यह भी कि टीका कम से कम तीन नहीं तो दो बार तो जरूर लगना चाहिए। होलिया में 2005 के बाद दूसरे गांवों की तरह एक ही बार टीका लगा है। लेकिन हमारी फिल्म के दृश्य में होलिया के मास्टर साहब के यह पूछने पर कि किसे-किसे टीका लगा है, सभी बच्चे हाथ ऊपर खड़ा कर देते हैं। आडियो चैनल में यह भी दर्ज होता है। यह एक आडियो विजुअल सत्य है, जिसे हमने दर्ज कर लिया और शायद अपनी सुविधानुसार इसे इसी तरह इस्तेमाल भी कर लेंगे। और यदि हम नहीं करेंगे तो कोई और टीम कर ही लेगी।
प्रार्थना सभा के दृश्य के बाद हमें वापस गांव में आना था। अपनी फिल्म को अब विभिन्न केस स्टडी के माध्यम से आगे बढ़ाना था। फिल्म टीम डॉ. सिंह के मार्ग निर्देशन में होलिया गांव के ठाकुर टो्ला में रामसमुझ सिंह का मकान खोज रही थी। रामसमुझ अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनकी पत्नी कुसुम देवी और बेटा मनोज घर चलाते हैं। 2005 के वक्त रामसमुझ की बेटी संजू 13 वर्ष की थी। बीमारी ने संजू की आवाज छीन ली और दिमाग भी। कैमरामैन ने फ्रेम बनाया। फ्रेम में सबसे बाएं बैठी संजू पूरी बातचीत में बुत बनी रही। यह पूछने पर कि आगे चलकर क्या बनना चाहती है तो उसका आवाज खींचकर डा-क्-ट-र कहना बीमारी के विद्रूप चेहरे को बखूबी समझा रहा था। विद्ररूपताएं सिर्फ संजू की विकलांगता से ही नहीं उपजी थीं। थोथी संवेदनओं ने भी कुछ कम इजाफा नहीं किया था। पड़ोस के किसी सम्पन्न जमींदार ने संजू की पढ़ाई-लिखाई और शादी ब्याह का जिम्मा भी लिया था। इस बात को कई लोगों ने कैमरे पर दर्ज हो जाने की नीयत से सुनाया। किसी विकलांग बच्चे पर इतना कुछ करने की मंशा सिर्फ ढोंग नहीं तो क्या था।
संजू के बनिस्पत पासवान टोला की गीता और ओम प्रकाश का बेटा शैलेश जीवन के ज्यादा करीब थे। शैलेश 2005 में बीमारी के समय चार वर्ष का था। इस बीमारी ने उसकी आवाज को छीन लिया है और हाथ-पैर भी सामान्य नहीं रह पाए हैं। नाम पूछने पर बहुत मुश्किल से वह समय लगाकर खींचकर शै…ले…ष बोलता है। गनीमत है कि उसका दिमाग एकदम दुरूस्त है। जब हम पासवान टोला पहुंचे तब शैलेष हम उम्र बच्चों के साथ बागीचे में खेलने गया था। शैलेष की मां गीता पासवान घर चलाती हैं और उनके पति होलिया से 25 किलोमीटर दूर गोरखपुर में चाय का ठेला लगाकर घर का खर्च जुगाड़ता है। ठाकुर टोले की कुसुम देवी की तरह उनके पास बेटे की बीमारी से लडऩे के लिए जमीन का सहारा भी नहीं हैं। पासवान टोले की सभी परिवारों के पास जमीन बीघे में न होकर क_े में है। कैमरा मैन ने शैलेष के आने के इंतजार में माहौल दर्ज करने के लिए महिलाओं के समूह को अपने फ्रेम में समेटना शुरू किया। 1930 में इसी होलिया गांव से बमुश्किल 45 किमी दूरी पर सरदार नगर में मशहूर चित्रकार अमृता शेरगिल तीन औरतों को अपने कैनवास में उतार रही थीं। पासवान टोले की ये औरतें अमृता शेरगिल की तीन औरतों जैसी ही मजबूत दिख रही थीं। किसी के पति सूरत तो किसी के पति मुंबई कमाने गए हैं। जिस आंगन में बैठकर हम उनसे बातचीत कर रहे थे वह पुरुषों की परछाई से मुक्त था। बातचीत शैलेष की बीमारी और उससे लडऩे के किस्सों तक ही महदूर थीं। जो इस दौरान हमारे मैग्नेटिक टेप में दर्ज न हो सका, वह था पासवान टोले की औरतों का अकेलापन। शैलेष के आने के बाद माहौल थोड़ा अलग हुआ। शैलेष की विकलांगता उसकी आंखों से दिखती शरारत पर भारी नहीं पड़ रही थी। हमारे अनुरोध पर शैलेष एक बार फिर बागीचे में अपने दोस्तों के साथ खेलने चला गया। कबड्डी की धमाचौकड़ी में शैलेष को छोड़कर हम होलिया गांव से बाहर निकल रहे थे।
गोरखपुर से कुशीनगर जाते हुए सड़कों पर विकास का नया मॉडल पसरा पड़ा है। कुशीनगर जहां महात्मा बुद्ध ने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था, में एक बहुराष्ट्रीय संस्था बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मदद से मैत्रेय प्रोजेक्ट स्थापति करने जा रही है। इस प्रोजेक्ट में कुशीनगर के आस-पास के किसानों को उजाड़ा जाएगा। बुद्ध की 500 फीट उंची प्रतिमा उजाड़े गए किसानों के खेत में खड़ी होगी। आत्मिक शांति और ऐशोआराम के लिए दुनियाभर के बौद्ध मतावलंबी कुशीनगर पधारेंगे। इसी कारण गोरखपुर से कुशीनगर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग को चौड़ा कर फोर लेन का बनाया जा रहा है। सुकरौली इसी राजमार्ग पर एक उंघता हुआ कस्बा है, जिसकी नींद विकास के इस मॉडल ने तोड़ दी है। सुकरौली से एक रास्ता सेमरी महेशपुर जाता है। होलिया में हम विकलांग बच्चों और उनके परिजनों से मिले थे। सेमरी में हमें जापानी बुखार से हुई मौतों वाले घरों में जाना था। पहला घर जवाहिर और दुर्गावती का था। उनका दस बरस का बेटा तारकेश्वर 2005 में नवकी बीमारी की भेंट चढ़ गया। उसके जाने से दुर्गावती की दुनिया ही उजड़ गई। मायूसी से उसे याद करते हुए कहती है- अभी होता तो गबरू जवान होता। कैमरामैन ने एडिटिंग की सुविधा के लिए दुर्गावती को दुबारा से अपनी चाय की दुकान पर बैठा लिया है। जब अंगीठी जलाने का उपक्रम चल रहा है और दुर्गावती के प्रोफाइल वाले शाट दर्ज किए जा रहे हैं। फ्रेम में दुकान की अंगीठी में लगी आग से मनमाफिक वार्म टोन मिल रही थी। दुर्गावती के दिल में लगी आग को बुझाने का तरीका हमारे कैमरे में नहीं था। दुर्गावती के घर के पास ही मुश्किल से 50 मीटर की दूरी पर तारकेश्वर का दोस्त जितेंद्र रहता था। 13 बरस का जितेंद्र, उदयभान और सावित्री की आंखों का तारा था। 2005 की बरसात में उसे यह बुखार आया और फिर दो-तीन दिन बाद उसने असर दिखाना शुरू किया। जैसे-तैसे करके यादव दंपति उसे सुकरौली ले गए, लेकिन तब तक सब कुछ पलट गया था। 2005 की महामारी के भेंट जितेंद्र भी चढ़ा। दुर्गावती के घर से निकलते ही हमें याद आया कि तारकेश्वर की कोई तस्वीर हमारी बातचीत के दौरान नहीं उतारी गई। इसलिए जितेंद्र के घर बातचीत पूरी होते-होते हमने उसकी तस्वीर मांग ली। तस्वीर मांगना जैसे पुराने जख्मों को फिर से हरा करना था। पहली बार हमें पता चला कि फिल्म के लिए जरूरी होते हुए भी मृत बच्चे की तस्वीर रखने का चलन ग्रामीणों में नहीं है। उनका कहना सही था कि इससे पुरानी यादें धूमिल पड़ती हैं। इसलिए बच्चों की स्मृति पूरी तरह से नष्ट करना ही अपने दुख को कम करने का एक आसान उपाय है। लालचियों की तरह हम तस्वीर की जुगत में लगे रहे। गुमसुम सावित्री ने मन मारकर कहीं कोने में दुबकी अपने दुलारे जितेंद्र की एक पासपोर्ट साइज की तस्वीर हमें दे दी। एडिटिंग के समय किसी भावनात्मक उभार की उम्मीद के साथ वह तस्वीर मेरे पर्स का एक जरूरी हिस्सा बन गई।
जवान बेटे की मौत वाले घर से कैसे विदा लेते हैं, यह किसी फिल्म स्कूल में सिखाया नहीं जाता। जितनी तेजी और उत्साह से हम यादव दंपति के आंगन में घुसे थे, उतने ही चुपचाप वहां से विदा हो लिए। अब मौत के उत्सव को और देर बनाए रखना किसी के बस में नहीं था। उस आंगन में सिर्फ सावित्री का शून्य में टंगा चेहरा और उदयभान की अपने बेटे की आत्मा को खोजती आंखें हमारा पीछा कर रही थीं। टैक शाट की तरह इसे दर्ज करने की कूव्वत न हमारे लेंस में थी और न मैग्नेटिक टेप में।
गुड्डू शर्मा का घर खोजने समय रास्ते में गांव के प्रधान रामाश्रय सिंह मिल गए। रामाश्रय 2005 से सेमरी महेशपुर के प्रधान हैं। पहली बार उनकी पत्नी ग्राम प्रधान बनी थीं और अपनी पत्नी के कार्यकाल को भी वह अपना ही समझकर गिनते हैं। पहले कैमरा, बूम राड और हैडफोन से अक्रांत टीवी क्रू को देखकर सरकारी भाषा में बतियाते रहे। थोड़ी देर बाद मान की बातें बताने लगे। उन्होंने ईमानदारी से स्वीकारा कि कैसे ऊपर से नीचे तक विकास के लिए आए रुपए का बंटवारा होता है। यह कहने को मजबूर हुए कि महामारी से लडऩे की सभी तैयारियां हवा में हैं। शरमाते और हंसते हुए स्वीकारा कि वह भी विकास की गति से मालामाल हो रहे हैं।
गुड्डू शर्मा तीसेक की उम्र के हैं और मजदूरी कर परिवार चलाते हैं। बिना पलस्तर की दीवारें उनकी आंशिक बेरोजगारी को सहज ही व्यक्त कर रही थी। वर्ष 2005 में उनकी और पत्नी सुनीता की गोद में तीन साल का खूबसूरत बेटा सत्यम था। नवकी बीमारी ने यहां भी कहर बरपाया और सत्यम बचाया न जा सका। हमारे अनुरोध करने पर एक ग्रुप फोटो मिल गया, जिसमें सत्यम अपने चचेरे भाई-बहनों के साथ हाथ में गुलदस्ता लिए हुए है। घने काले घुंघराले वालों बाला सत्यम ऐसा लग रहा था कि मानो तुरंत ही तस्वीर से बाहर निकलकर हमारे साथ खेलने लगेगा।
मा-बाप के हाथ से छिटककर तस्वीर अब उनके दूसरे बेटे सियम के हाथ में आ गई। अब सियम फिर से हमें तस्वीर में दिख रहे भाई-बहनों के बारे में बता रहा था। फ्रेम से परे सत्यम की मां सुनीता किसी तरह अपने आंसुओं को रोके थी। एकदम अंधेरे में सत्यम की बुआ अपने बिछुड़ गए भतीजे की याद में खो गई थी। मौत की याद में सब कुछ शांत था। हमारा कैमरा अपने पैन से सब कुछ को धीमे-धीमे मैग्नेटिक टेप में दर्ज कर रहा था। गुड्डू-सुनीता के पांच बरस के दूसरे बेटे सियम को भी गुजर गए भाई की तरह टीका नहीं लगा है। मै अचानक इस आशंका से घिर गया कि क्या इस परिवार का दूसरा गुलदस्ता भी टूट जाएगा? यह पूछने का साहस मेरे पास नहीं था क्योंकि फिल्म टीम टीका न लगने के कारण हुई मौतों की यादों को बखूबी दर्ज कर सकती हैं लेकिन हमारे बूम राड से कोई टीका नहीं लगाया जा सकता।
सियम के काले घुंघराले बालों और शोख चेहरे की याद के साथ हम रामजी गुप्ता के आम के पेड़ के नीचे जमा हो रहे थे। इसी पेड़ के नीचे से 5 सितंबर, 2005 को उनकी प्यारी पोती ज्योति की आखिरी यात्रा निकली। लकड़ी के तख्ते पर ज्योति की दादी रामरती और मां बादामी बैठे थे, हमारे सवालों के जवाब के लिए। मां का आडियो लेवल काफी नीचा था। जैसे ही ज्योति के बारे में रामरती ने बताना शुरू किया बादामी ने हस्तक्षेप कर अपनी बेटी की यादों को रखना शुरू कर दिया। बेटी की याद ने उसके आडियो लेवल को दुरूस्त कर दिया था। वही सब कुछ ज्योति के साथ हुआ जो दूसरे बच्चों के साथ हुआ। एक दिन अच्छी-भली स्कूल से लौटी ज्योति ने पेट दर्द की शिकायत की। फिर बुखार और दूसरे लक्षण। गोरखपुर के महंगे प्राइवेट नर्सिंग होम में इलाज कराने के बाद जो हाथ में आया, वह था डेथ सर्टिफिकेट। हम पता नहीं क्यों इसी डेथ सर्टिफिकेट को तस्वीरें भी विभिन्न कोणों से कैद करते रहे। शायद कहानी को और ज्यादा प्रमाणिक बनाने के लिए या यूं ही सब कुछ दर्ज कर लेने की नीयत से। सभी लोगों की तरह यहां के लोग भी अब किसी पर दोष मढऩे के लिए तैयार नहीं थे। जवाब वही कि जब जान ही नहीं बची तो हायतौबा करने से क्या? बातों-बातों में पता चला कि ज्योति की स्मृति शादी के एक वीडियो कैसेट में मौजूद है। जल्दी ही किसी को भेजा गया, उस वीडियो कैसेट की खोज में। इस बीच समय काटने की गरज से गुप्ता परिवार ने दही-चूड़ा के नाश्ते का अनुरोध किया। सुबह से धूप में घूम रहा कैमरा टीम ने सहज ही इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। रामजी गुप्ता के दालान में कैमरा टीम दही-चूड़ा जीम रही थी। दही गांव के शुद्ध घी को औंटाकर जमाई गई थी और चूड़ा स्थानीय चावल से ही तैयार किया गया था। दही-चूड़ा के बड़े ग्रास के साथ ज्योति की स्मृति हम सबको मृत्यु भोज का आस्वाद करा रही थी और शायद इसी वजह से खूब औंटाए गए दूध का दही मीठा न होकर कसैला प्रतीत हो रहा था।
इस कसैले मृत्यु भोज को अभी और कसीला होना था भल्लन के घर पर। सेमरी महेशपुर से एक किलोमीटर दूर पश्चिम पर स्थिति अति दलित डोम लोगों का बरवा टोला है। 45 वर्ष के भल्लन और 40 की बरफी आठ बच्चों के जनक हैं। 2005 से पहले तक भुल्लन सुअर भी पालते थे। सुअर पालन न सिर्फ उनके लिए नकदी का इंतजाम करता, बल्कि परिवार को पौष्टिक भोजन भी उपलब्ध कराता। 2005 का जापानी बुखार सुअरबाड़े को लील गया। इस तो भल्लन और बरफी किसी तरह बर्दाश्त कर गए, लेकिन छह महीने के छोटू और तीन बरस की सोनी की याद को भुलाना बहुत मुश्किल था। पतली नीली प्लास्टिक शीट से बने टैंट में किसी तरह का गुजर-बसर कर रहे भल्लन परिवार के लिए अपने बच्चों को नवकी बीमारी से बचा पाना बहुत मुश्किल था। वे भी दूसरे लोगों की तरह नजदीकी अस्पताल की ओर दौड़े, लेकिन सबसे छोटे छोटू और सात भाइयों की चंपा सोनी को वे न बचा सके। बिना छत वाले घर की जिस चौखट पर बैठकर वे टेलीविजन इंटरव्यू दे रहे थे, जिसमें उनका एक लड़का पूरी तरह से नेमा दिख रहा है, देखकर कोई पूछ ही सकता है कि रत्नगर्भा बरफी अपने बचे हुए छह रत्नों को कैसे बचा पाएगी? हमारी विवशता थी कि अशिक्षित भल्लन परिवार ने अपनी नासमझी में हमें सरकारी नुमाइंदा समझ लिया था। वे बार-बच्चों की मृत्यु का मुआवजा न मिलने की शिकायत करते रहे। हमने भल्लन और बरफी को झूठा दिलासा देकर वहां से विदा ली। वे शायद यह समझ रहे थे कि हमारी रिकार्डिंग से उन्हें मुआवजा मिल जाएगा, जबकि सचाई यह थी कि पैसे की कमी के कारण उनके बच्चे सरकारी अस्पताल की चौखट तक पहुंचकर दर्ज न हुए थे। इसलिए मर कर भी वे सरकारी दस्तावेजों में मरे नहीं थे।
हमारी रिकार्डिंग से क्या किसी परिवार का भला होगा? क्या सरकार ऐसी चुप्प और गमगीन बातचीत से उद्वेलित हो पाएगी जिसमें मौत का हाहाकार नहीं बल्कि सिर्फ यादें और सूनापन हैं? पता नही। कैमरे के पैन और उसमें सब कुछ समेट लेने का कौशल, बूम राड और गन माइक का सटीकपन और दुखद स्मृतियों की पुनरावृत्तियां कुछ और बदल सकेंगी तो निश्चय ही बरफी जैसे तमाम रत्नगर्भाओं के रत्न पूर्वांचल के काम आ सकेंगे।
(समकालीन जनमत, जून, 2010 से साभार)
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