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गोरखपुर में बच्चों की मौत ने पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता को बेपर्दा कर दिया है : मनोज कुमार सिंह

‘दिमागी बुखार: बच्चों की मौत और विफल स्वास्थ्य तंत्र’ पर व्‍याख्‍यान देते मनोज कुमार सिंह।

नई दि‍ल्‍ली : ‘‘गोरखपुर में आक्सीजन संकट के दौरान चार दिन में 53 बच्चों की मौत ने पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता को बेपर्दा कर दिया। मौतों का सिलसिला उसके बाद भी जारी है। पूरे देश जनस्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवाओं की क्या स्थिति है, उसे इसके आईने में देखा जा सका है। कुल मिलाकर बहुत भयावह परिदृश्य है। सिर्फ बीआरडी मेडिकल कालेज में वर्ष 1978 से इस वर्ष तक 9907 बच्चों की मौत हो चुकी है। इस आंकड़े में जिला अस्पतालों, सीएचसी-पीएचसी और प्राइवेट अस्पतालों में हुई मौतें शामिल नहीं हैं। इंसेफेलाइटिस से मौतों के आंकड़े आईसवर्ग की तरह हैं। अब तो इस बीमारी का प्रसार देश के 21 राज्यों के 171 जिलों में हो चुका है। खासकर देश के 60 जिले और उत्तर प्रदेश के 20 जिले इससे बुरी तरह प्रभावित हैं।’’ 7 अक्टूबर 2017 को राजेंद्र भवन, दिल्ली में छठा कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान देते हुए चर्चित पत्रकार और जन संस्कृति मंच के महासचिव मनोज कुमार सिंह ने यह कहा। कवि-चित्रकार और टीवी के मशहूर प्रोड्यूसर कुबेर दत्त की स्मृति में हर साल एक व्याख्यान आयोजित होता है। इस बार व्याख्यान का विषय ‘दिमागी बुखार: बच्चों की मौत और विफल स्वास्थ्य तंत्र’ था।

मनोज कुमार सिंह ने कहा कि 40 वर्ष पुरानी बीमारी को अब भी अफसर, नेता और मीडिया रहस्यमय या ‘नवकी’ बीमारी बताने की कोशिश कर रहे हैं। यह दरअसल एक बड़़ा झूठ है। जिन  डॉक्टरों ने इसके निदान की कोशिश की, उन्हें अफसरों द्वारा अपमानित होना पड़ा। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. केपी कुशवाहा ने बहुत पहले ही जब इस बीमारी को अज्ञात बताए जाने पर आपत्ति जाहिर की थी, तो उनकी नहीं सुनी गई। उनका स्पष्ट तौर पर मानना था कि यह बीमारी जापानी इंसेफेलाइटिस है।

मनोज ने बताया कि इंसेफेलाइटिस को समझने के लिए हमें जापानी इंसेफेलाइटिस और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम को समझना पड़ेगा। चीन, इंडोनेशिया में भी टीकाकरण, सुअर बाड़ों के बेहतर प्रबन्धन से जापानी इंसेफेलाइटिस पर काबू कर लिया गया, लेकिन भारत में हर वर्ष सैकड़ों बच्चों की मौत के बाद भी सरकार ने न तो टीकाकरण का निर्णय लिया और न ही इसके रोकथाम के लिए जरूरी उपाय किए। जब उत्तर प्रदेश में वर्ष 2005 में जेई और एईएस से 1500 से अधिक मौतें हुई तो पहली बार इस बीमारी को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर हाय तौबा मची। उन्होंने कहा कि दिमागी बुखार किसी भी आयु के व्यक्ति को हो सकता है लेकिन 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में यह ज्यादा है। इस रोग में मृत्यु दर तथा शारीरिक व मानसिक अपंगता बहुत अधिक है।

इंसेफेलाइटिस के रोकथाम के दावे और हकीकत का जिक्र करते हुए मनोज कुमार सिंह ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग के जिम्मे इंसेफेलाइटिस के इलाज की व्यवस्था ठीक करने, टीकाकरण और इस बीमारी पर शोध का काम था तो पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय को गांवों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए इंडिया मार्का हैण्डपम्पों, नलकूपों की स्थापना तथा व्यक्तिगत शौचालयों का बड़ी संख्या में निर्माण कराना था। इसी तरह सामाजिक न्याय मंत्रालय को इस बीमारी से भीषण तौर पर विकलांग हुए बच्चों के पुनर्वास, शिक्षा व इलाज की व्यवस्था का काम था। इस योजना के पांच वर्ष गुजर गए लेकिन अभी तक इंसेफेलाइटिस से होने वाली मौतों व अपंगता को कम करने में सफलता मिलती नहीं दिख रही है। टीकाकरण में लापरवाही है, शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है, पानी का पूरा एक कारोबार विकसित हो गया है, शौचालय निर्माण के दावे निरर्थक हैं।

मनोज कुमार सिंह ने स्थापना के 45 वर्ष और गुजर जाने के बाद भी बीआरडी मेडिकल कालेज में एमबीबीएस की सीट 100 से ज्यादा न बढ़ पाने पर सवाल उठाया, जबकि इंसेफेलाइटिस के सर्वाधिक मरीज आते हैं। यहां हर वर्ष जेई एईएस के 2500 से 3000 मरीज आते हैं, लेकिन इस मेडिकल कालेज को दवाइयों, डाक्टरों, पैरा मेडिकल स्टाफ, वेंटीलेटर, आक्सीजन के लिए भी जूझना पड़ता है। इंसेफेलाइटिस की दवाओं, चिकित्सकों व पैरामेडिकल स्टाफ, उपकरणों की खरीद व मरम्मत आदि के लिए अभी तक अलग से बजट का प्रबंध नहीं किया गया है। इंसेफेलाइटिस मरीजों के इलाज में लगे चिकित्सकों, नर्स, वार्ड ब्वाय व अन्य कर्मचारियों का वेतन, मरीजों की दवाइयां तथा उनके इलाज में उपयोगी उपकरणों की मरम्मत के लिए लगभग एक वर्ष में सिर्फ 40 करोड़ की बजट की जरूरत है, पर केंद्र और राज्य की सरकार इसे देने में कंजूसी कर रही है। ये हालात बताते हैं कि मंत्रियों-अफसरों के दावों और उन्हें अमली जामा पहनाने में कितना फर्क हैं। उन्होंने तंज करते हुए कहा कि जापान ने 1958 में ही इस बीमारी पर काबू पा लिया था। जापान से बुलेट ट्रेन लाने से ज्यादा जरूरी यह था कि उसकी तरह हम इस बीमारी को रोक लगा पाते।

मनोज कुमार सिंह ने कहा कि जेई/एइएस से मरने वाले बच्चे और लोग चूंकि गरीब परिवार के हैं इसलिए इस मामले में चारों तरफ चुप्पी दिखाई देती है। डेंगू या स्वाइन फलू से दिल्ली और पूना में कुछ लोगों की मौत पर जिस तरह हंगामा मचता है, उस तरह की हलचल इंसेफेलाइटिस से हजारों बच्चों की मौत पर कभी नहीं हुई। गरीबी के कारण ये इंसेफेलाइटिस के आसान शिकार होने के साथ-साथ हमारी राजनीति के लिए भी उपेक्षा के शिकार है।

उन्होंने यह भी बताया कि चीन निर्मित वस्तुओं के बहिष्कार करने वाली राजनीति के बजाय सच यह है कि एक दशक से चीन में बना टीका ही देश के लाखों बच्चों को जापानी इंसेफेलाइटिस जैसी घातक बीमारी से बचा रहा है। सस्ता टीका मिलने के बावजूद हमारे देश की सरकार ने टीके लगाने का निर्णय लेने में काफी देर नहीं की होती तो सैकड़ों बच्चों की जान बचायी जा सकती थी। वर्ष 2013 में भारत में जेई का देशी वैक्सीन बना और इसे अक्टूबर 2013 में लांच करने की घोषणा की गई, लेकिन अभी देश की जरूरतों के मुताबिक यह वैक्सीन उत्पादित नहीं हो पा रही है।

मनोज कुमार सिंह ने कहा कि देश की सरकार सकल घेरलू उत्पाद का सिर्फ 1.01 फीसदी स्वास्थ्य पर खर्च कर रही है। बहुत से छोटे देश भी स्वास्थ्य पर भारत से ज्यादा खर्च कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवा की हालत तो और खराब है। ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी 2016 के अनुसार यूपी के सीएचसी में 3092 विशेषज्ञ डॉक्टरों सर्जन, गायनकोलाजिस्ट, फिजिशियन बालरोग विशेषज्ञ की जरूरत है, लेकिन सिर्फ 484 तैनात हैं यानी 2608 की जरूरत है। देश में भी यही हाल है। कुल विशेषज्ञ चिकित्सकों के 17 हजार से अधिक पोस्ट खाली हैं। यूपी के 773 सीएचसी में सिर्फ 112 सर्जन, 154 बाल रोग विशेषज्ञ, 115 स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ, 143 रेडियोग्राफर हैं। इस स्वास्थ्य ढांचे पर इंसेफेलाइटिस जैसी जटिल बीमारी तो क्या साधारण बीमारियों का भी मुकाबला नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि उत्‍तर प्रदेश में बच्चों की मौत सबसे अधिक है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य को सिर्फ चिकित्सा से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसका सीधा सम्बन्ध गरीबी और सामाजिक-आर्थिक कारण भी हैं। यदि गरीबी कम नहीं होगी और सभी लोगों को बेहतर रोजगार, स्वच्छ पेयजल, शौचालय उपलब्ध नहीं होगा तो देश को स्वस्थ रखना संभव नहीं हो पाएगा।

व्याख्यान के बाद गीतेश, सौरभ, आशीष मिश्र, नूतन, अखिल रंजन, इरफान और विवेक भारद्वाज के सवालों का जवाब देते हुए मनोज कुमार सिंह ने कहा कि रिसर्च के मामले में सरकारी या प्राइवेट स्तर पर सन्नाटे की स्थिति है, इसलिए कि इस बीमारी पर रिसर्च को लेकर किसी की ओर से कोई फंडिंग नहीं है। फंडिंग थी तो एचआइवी, एडस की बड़ी चर्चा होती थी, पर फंडिंग बंद होते ही लगता है कि वे बीमारी ही गायब हो गर्ईं।

मनोज कुमार सिंह ने दो टूक कहा कि इस बीमारी के निदान में सरकार की कोई रुचि नहीं है, इसलिए कि तब उसे स्वच्छ पानी, ठीक शौचालय और संविधान प्रदत्त अन्य अधिकारों को सुनिश्चित करना पड़ेगा। विडंबना यह है कि राजनीतिक पार्टियों के लोग जब विपक्ष में होते हैं, तो इसे मुद्दा बनाते हैं, पर सरकार में जाते ही इस पर पर्दा डालने लगते हैं। उन्होंने कहा कि बोलना और करना दो भिन्न बातें हैं। जब भाजपा विपक्ष में थी, तो योगी ने इस बीमारी को लेकर मौन जुलूस निकाला था, लेकिन नेशनल हाईवे पर नौ गायें कट जाने के बाद जिस तरह तीन दिन तक उन्होंने बंदी करवाई थी, वैसा बंद उन्होंने इंसेफेलाइटिस के लिए कभी नहीं करवाया। मनोज ने बताया कि अपनी जिम्मेवारी से बचने के लिए ही सरकार ने विगत 11 अगस्त को मरीजों की मदद करने वाले डॉ कफील को खलनायक बनाया। उन्होंने कहा कि बीमारी का दायरा बढ़ रहा है। शुद्ध पेयजल की समस्या बहुत गंभीर है, कम गहराई वाले हैंडपंपों के जरिए इंसेफेलाइटिस के बीमारी के संक्रमण होता है, वहीं ज्यादा गहराई वाले हैंडपंपों में आर्सेनिक और उससे होने वाले कैंसर का खतरा है। बच्चे वोटबैंक नहीं हैं, इसलिए राजनीतिक पार्टियों के लिए यह गंभीर मुद्दा नहीं है। उनके ज्यादातर अभिभावक गरीब और मजदूर हैं, भले ही रोजी-रोटी के लिए वे महानगरों में चले जाएं, पर इस इलाके से उनके पूरे परिवार का विस्थापित होकर कहीं दूसरी जगह चले जाना संभव नहीं है।

मनोज का मानना था कि सरकार पर आंदोलनात्मक दबाव बनाना जरूरी है। तत्काल तो बचाव पर ध्यान देना जरूरी है, प्रति मरीज लगभग 3000 रुपये की जरूरत है, प्राइवेट प्रैक्टिस वाले सुविधा देने को तैयार नहीं है। यह काम तो सरकार को ही करना होगा, पर मुख्यमंत्री की रुचि तो केरल में जाकर वहां के स्वास्थ्य सेवा पर टीका-टिप्पणी करने में ज्यादा है, जहां बच्चों की इस तरह की मौतें बहुत ही कम होती हैं।

मनोज ने बताया कि साहित्य में भी मदन मोहन के उपन्यास ‘जहां एक जंगल था’ और एक-दो कविताओं के अतिरिक्त इंसेफेलाइटिस की बीमारी का कोई प्रगटीकरण नहीं है।

संचालन करते हुए सुधीर सुमन ने इंसेफेलाइटिस से हुई बच्चों की मौतों में सरकार और स्वास्थ्य तंत्र की विफलताओं को ढंकने की कोशिश के विरुद्ध एक जनपक्षीय पत्रकार के बतौर मनोज कुमार सिंह के संघर्ष का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि मनोज लगातार इस बीमारी को लेकर लिखते रहे हैं, पर इस बार जिस लापरवाही और संवेदहीनता की वजह से बड़े पैमाने पर बच्चों की मौतें हुईं, जो कि एक किस्म की हत्या ही थी, उसके पीछे की वजहों और उसके लिए जिम्मेवार लोगों और उनके तंत्र का गोरखपुर न्यूज ऑनलाइन वेब पोर्टल के जरिए मनोज ने बखूबी पर्दाफाश किया। सच पर पर्दा डालने की सत्ता की कोशिशों के बरअक्स निर्भीकता के साथ उन्होंने जो संघर्ष किया, वह वैकल्पिक मीडिया में लगे लोगों के लिए अनुकरणीय है।

सवाल-जवाब के सत्र से पूर्व, चर्चित चित्रकार अशोक भौमिक ने व्याख्यानकर्ता मनोज कुमार सिंह को स्मृति-चिह्न के बतौर कुबेर दत्त द्वारा बनाई गई पेंटिंग दी। गोरखपुर में स्वास्थ्य तंत्र और सरकार की नाकामियों और संवेदनहीनता की वजह से मारे गए बच्चों की याद में जन संस्कृति मंच के कला समूह द्वारा पेंटिंग प्रदर्शनी लगाए जाने तथा उससे होने वाली आय के जरिए इंसेफेलाइटिस के निदान के लिए चलने वाले प्रयासों में मदद देने की घोषणा भी की गई।

व्याख्यान से पूर्व जसम, दिल्ली के संयोजक रामनरेश राम ने लोगों का स्वागत किया। उसके बाद प्रसिद्ध चित्रकार हरिपाल त्यागी ने कुबेर दत्त की कविताओं के नए संग्रह ‘बचा हुआ नमक लेकर’ का लोकार्पण किया। कवि-वैज्ञानिक लाल्टू द्वारा लिखी गई इस संग्रह की भूमिका का पाठ श्याम सुशील ने किया। सुधीर सुमन ने कहा कि इस संग्रह कविताओं में कुबेर दत्त की कविता के सारे रंग और अंदाज मौजूद हैं। उन्होंने कवि के इस संग्रह और अन्य संग्रहों में मौजूद बच्चों से संबंधित कविताओं का पाठ किया। कुबेर दत्त की कविताओं के हवाले से यह बात सामने आई कि नवउदारवादी अर्थव्यवस्था के असर में विकसित राजनीतिक-धार्मिक सत्ता की उन्मत्त तानाशाही बच्चों के लिए यानी मनुष्य के भविष्य के लिए भी खतरनाक है। नब्बे के दशक के शुरुआत में लिखी गई अपनी एक कविता में उन्होंने जिन सांप्रदायिक फासीवादी ताकतों की शिनाख्त की थी, वे आज हूबहू उसी रूप में हमारे सामने हैं। गोरखपुर में भी वहीं उन्मादी, नृशंस और जनता के प्रति संवेदनहीन प्रवृत्ति वाला चेहरा नजर आया।

अध्यक्षता करते हुए बनारस से आए साहित्यकार वाचस्पति ने कहा कि सरकार की जो आपराधिक लापरवाही और नेतृत्व का जो पाखंड है, उसे मनोज कुमार ने अपने व्याख्यान के जरिए स्पष्ट रूप से दिखा दिया। इस बीमारी से बचाव के लिए निरंतर संघर्ष की आवश्यकता है। उन्होंने कुबेर दत्त से जुड़े संस्मरण भी सुनाए।

आयोजन के आरंभ में मशहूर फिल्म निर्देशक कुंदन शाह और उचित इलाज के अभाव में मारे गए बच्चों को एक मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी गई।

इस मौके पर वरिष्ठ कवि राम कुमार कृषक, रमेश आजाद, वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा, जसम के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेन्द्र कुमार, रामजी राय, दूरदर्शन आर्काइव्स की पूर्व निदेशक कमलिनी दत्त, कहानीकार महेश दर्पण, दिनेश श्रीनेत, कौशल किशोर, पत्रकार पंकज श्रीवास्तव, अभिषेक श्रीवास्तव, कवि मदन कश्यप, दिगंबर, रंगकर्मी जहूर आलम, कवि शोभा सिंह, कहानीकार योगेंद्र आहूजा, आलोचक प्रणय कृष्ण, आशुतोष कुमार, राधिका मेनन, पत्रकार भाषा सिंह, अशोक चौधरी, डॉ. एसपी सिन्हा, प्रभात कुमार, राजेंद्र प्रथोली, गिरिजा पाठक, अमरनाथ तिवारी, अनुपम सिंह, मनीषा, रविप्रकाश, बृजेश यादव, इरेंद्र, मृत्युंजय, तूलिका, अवधेश, मुकुल सरल, रविदत्त शर्मा, सोमदत्त शर्मा, संजय भारद्वाज, गीतेश, सुनीता, रूचि दीक्षित, अंशुमान, कपिल शर्मा, रामनिवास सिंह, सुनील चौधरी, सुजीत कुमार, कनुप्रिया, असद शेख, नौशाद राणा, शालिनी श्रीनेत, रोहित कौशिक, माला जी, दिवस, अतुल कुमार, उद्देश्य आदि मौजूद थे।

प्रस्‍तुति‍ : सुधीर सुमन

‘दि‍मागी बुखार- बच्‍चों की मौत और वि‍फल स्‍वास्‍थ्‍य तंत्र’ पर व्‍याख्‍यान 7 को  

नई दि‍ल्‍ली : इंसेफेलाइटिस यानी दिमागी बुखार से चार दिनों के भीतर पचास से अधिक बच्चों की मौत ने इस बार पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। जनता के भीतर सबसे ज्यादा गुस्सा उत्तर प्रदेश के मंत्रियों के बयानों से भड़का। यह बीमारी क्या है? इसके कितने प्रकार हैं? देश के कौन से इलाके इससे प्रभावित हैं? विगत 40 वर्षों में इसका समाधान न हो पाने की वजहें क्या हैं? किस तरह महज एक अस्पताल में ही 40 वर्षों में इस बीमारी से 9733 मौतें हुईं? क्यों पूरा तंत्र और सरकार बच्चों की मौतों को सामान्य मौतें बताने के लिए पूरा जोर लगाए रहा? ऐसे तमाम सवालों से संबंधित है इस बार का कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान।

यह बीमारी तो महज एक बानगी है इस देश में जनस्वास्थ्य के प्रति आपराधिक लापरवाही की। ऐसी कई बीमारियों की चपेट में है इस देश की जनता।

इंसेफलाइटिस की बीमारी से हुई बच्चों की मौतों और विफल स्वास्थ्य तंत्र पर छठा कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान देंगे मनोज कुमार सिंह, जो चर्चित युवा पत्रकार रहे हैं, जमीनी रिपोर्टों के लिए मशहूर हैं। गोरखपुर से प्रतिरोध का सिनेमा अभियान शुरू करने वाले मनोज कुमार सिंह वहां की बौद्धिक-सांस्कृतिक जगत की एक महत्वपूर्ण शख्सियत हैं। जन संस्कृति मंच के हालिया राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्हें महासचिव की जिम्मेवारी दी गई है। फिलहाल वे गोरखपुर न्यूज लाइन नामक चर्चित वेबपोर्टल चला रहे हैं।

मनोज कुमार सिंह का मानना है कि इंसेफेलाइटिस से मौतों के जो आकंडे सामने आ रहे हैं, वे तो आईसवर्ग की तरह हैं। इन आंकड़ों में जिला अस्पतालों, सीएचसी-पीएचसी और प्राइवेट अस्पतालों में हुई मौतें शामिल नहीं हैं। अब तो यह बीमारी सिर्फ पूर्वांचल तक ही सीमित नहीं रह गई है। इसका प्रसार देश के 21 राज्यों के 171 जिलों में हो चुका है। इस बीमारी के दो प्रकार हैं- जापानी इंसेफलाइटिस और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम। नेशनल वेक्टर बार्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम के मुताबिक वर्ष 2010 से 2016 तक एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम से पूरे देश में 61957 लोग बीमार पड़े, जिसमें 8598 लोगों की मौत हो गई। इसी अवधि में जापानी इंसेफेलाइटिस से 8669 लोग बीमार हुए, जिनमें से 1482 की मौत हो गई। इस वर्ष अगस्त माह तक पूरे देश में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम के 5413 केस और 369 मौतों के आंकड़े आए। जापानी इंसेफेलाइटिस से इसी अवधि में 838 केस और 86 मौत के मामले सामने आए। अभी भी मौतों की सूचनाएं आ ही रही हैं।

इंसेफेलाइटिस के मुद्दे पर मनोज पिछले कई वर्षों से लगातार लिखते रहे हैं।

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौत के सवाल पर जनता के दुख-दर्द और उसके गुस्से के साथ वे अपने वेबपोर्टल के जरिए खड़े रहे, जबकि सरकार और स्वास्थ्य तंत्र के नकारेपन और आपराधिक संवेदनहीनता को ढंकने की हरसंभव कोशिश की जाती रही। आइए जनता के सच के साथ, उसकी व्यथा के साथ निर्भीकता से खड़े पत्रकार के अनुभव को हम सुनें। मौत बांटने वाले संवेदनहीन तंत्र के विरुद्ध जीवन के लिए विभिन्न स्तरों पर जारी संघर्षों में से एक संघर्ष के साझीदार बनें।

कार्यक्रम की रूपरेखा-

तारीख- 7 अक्टूबर 2017, समय- 5 बजे शाम

स्थान- राजेंद्र भवन, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, आईटीओ मेट्रो स्टेशन के पास, दिल्ली

जहाँ मौत भी एक गिनती है : संजय जोशी

इंसेफेलाईटिस यानी जापानी बुखार गोरखपुर के आसपास के इलाकों के हजारों बच्चों को लील चुका है। वर्षों से चल रही इस महामारी को रोक पाने में सरकार नाकाम है। सरकारी कार्यप्रणाली का वीभत्स नमूना यह है कि इस साल टीकाकरण इसलिए नहीं हो पाया क्‍यों‍क‍ि टीके रखे-रखे खराब हो गए। द ग्रुप, जन संस्कृति मंच और गोरखपुर फिल्म सोसायटी की टीम इस मुद्दे को बार-बार उठा रही है। हाल ही मैं टीम दोबारा प्रभावित क्षेत्र में गई। इस पर तैयार फिल्म को गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल में दिखाया जाएगा। द ग्रुप के संयोजक संजय जोशी की रिपोर्ट-
2010 के मई महीने में हम कैमरा टीम के साथ गोरखपुर के आसपास के इलाकों में जापानी बुखार से हुई मौतों की कहानी दर्ज कर रहे थे। जून बीतते-बीतते बारिश का पानी फिर से गोरखपुर के आस-पड़ोस में जमने लगा। एक बार फिर से मस्तिष्क बुखार ने रंग दिखाना शुरू कर दिया। 1978 से चली आ रही इस बीमारी से यूपी के सरकारी अस्पतालों में अब तक 12 हजार से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी है। गैरसरकारी अस्पतालों का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन सरकारी अस्पतालों की सीमित पहुंच के आधार पर कहा जा सकता है कि दिमागी बुखार से मरने वाले बच्चों की संख्या सरकारी अस्पतालों में मौतों से कई गुना अधिक होगी। हजारों बच्चों की मौत के बावजूद सरकार कोई ठोस नीति नहीं बना पायी है। सरकारी उदासीनता और लापरवाही अपनी गुणात्मक मूर्खताओं के नित नए कीर्तिमान बनाए जा रही है। सरकार 27 वर्ष बाद इंसेफेलाईटिस के एक रूप जापानी इंसेफेलाईटिस के टीकाकरण का फैसला कर पाई, लेकिन चार वर्ष तक टीकाकरण करने के बाद इस वर्ष इसलिए टीकाकरण नहीं हो सका क्योंकि टीके रखे-रखे खराब हो गए।
जून में अखबारों से खबर मिली कि जापानी बुखार से बचाव के लिए जो टीके आये थे, वे प्रशीतन (ठण्ड) की पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण खराब हो गए और इस कारण टीकों का पूरा बैच निरस्त कर दिया गया। मतलब यह कि जापानी बुखार के विषाणुओं से बचने का इस बरस कोई रास्ता न था। इसी दौरान उत्तर प्रदेश सरकार के स्वास्थ्य मंत्री  अनंत कुमार मिश्र ने भी बचकाना बयान दे डाला कि हमने ग्रामीण इलाकों और कस्बों में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों को सुविधा सम्पन्न बना दिया है इसलिए बेवजह जिला अस्पतालों में आने का कोई मतलब नहीं है। इसी आपाधापी में अगस्त का महीना  बीत गया और बुखार के विषाणुओं ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया। सितम्बर से एक बार फिर मौत की खबरें आनी शुरू हो गयीं। ये अलग बात है कि बच्चों की मौतों की रोज-रोज आने वाली खबरें अभी न्यूज रूम की टीआरपी नीति की नजर में न चढ़ने के कारण अदृष्य पेजों पर हाशिये  पर पड़ी थीं। ऐसे समय में हम भी अपनी कहानी में मौतों को दर्ज करने 8 सितम्बर की सुबह गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कालेज पहुंचे। मेडिकल कालेज के एपिडेमिक वार्ड में जगह-जगह मरीजों के परिवार वाले व्यस्त रेल प्लेटफार्म की तरह यहां-वहां ठुंसे पड़े थे। कैमरामेन पंकज ने वार्ड का मुआयना किया और ट्राईपोड़ रख कर फ्रेम बनाने लगा। मई में इसी वार्ड में मस्तिष्क बुखार के इक्का-दुक्का मरीज थे। अब पंकज के हर फ्रेम में कई मासूम बच्चों के चेहरे कैद हो रहे थे। हर बेड पर कम से कम दो-तीन बच्चे और उनका पस्त पड़ा परिवार किसी तरह अटा पड़ा था। हर मां-बाप यही पूछ रहा था कि क्या हुआ उसके बच्चे को ? जूनियर डाक्टर जानता है कि इस बार तो टीका भी नहीं लगा है। इसलिए कमोबेश हर बच्चे को यहां से चुपचाप विदा लेनी है। वह भी बार-बार सिर्फ यही कह रहा था कि मस्तिष्क ज्वर है। इसका निदान कैसे होगा, यह किसी के मस्तिष्क में नहीं था। सारे मस्तिष्क जैसे एक क्रूर होनी को घटते हुए देखने के आदी हो चले थे। अस्पताल की दवाओं और गंदगी की बदबू की तरह बच्चों की मौतें साल दर साल घटने वाली एक रूढ़ि में तब्दील हो चुकी  थी। वार्ड में भीड़ न हो इस समझ से मैं गलियारे की बेंच पर बैठ गया। बगल में बैठी नौजवान मुस्लिम महिला ने सुबकते हुए मुझसे पेन और कागज मांगा। उस पर उसने किसी का मोबाइल नम्बर लिखा। उसका डेढ़ साल का बेटा भी मस्तिष्क बुखार से पीड़ित वार्ड में भरती था। उसके कई हफ्ते बीमारी को समझने में और अपने गाँव-कस्बे में ठोकर खाने में बीत गए।
काश ! मेरे पास कोई जादू होता और मैं माननीय स्वास्थ्य मंत्री अनंत मिश्र जी से पूछता यह बेचारी किस अस्पताल में जाए। अनंत मिश्र जैसों के बच्चे सरकारी अस्पतालों में  दाखिल नहीं होंगे और न ही उनके घर तक मच्छर पहुंच सकेंगे।
तभी एक महिला अपनी 12 साल की अचेत बिटिया मधुमिता को गोद में उठाये बदहवास गैलरी में आती दिखाई दी। कुशीनगर के बड़गाँव टोला की उर्मिला और शारदा प्रसाद की बेटी मधुमिता को 15 अगस्त से दौरे पड़ने शुरू हो गए थे। गाँव और कस्बे में इधर-उधर चक्कर काटने में ही इस परिवार के चार-पांच हजार रुपये खर्च हो गए। मधुमिता का मामा, जो पुलिस की वर्दी में था पहले उत्तेजना और हताशा में सरकार को कोसने लगा, फिर अचानक उसे अपनी वर्दी और नौकरी का खयाल आया तो लगभग बेचारगी में हमसे वीडियो रिकार्डिंग्स को डिलीट करने की मिन्नत करने लगा। मधुमिता को उसका भाई अंशु और पिता दोनों हाथों से उठाकर डाक्टर के केबिन में ले गए। बाहर रह गई उसकी माँ उर्मिला। रोते-रोते उर्मिला ने बताया कि कैसे इस बीमारी ने पूरे परिवार को सड़क पर खड़ा कर दिया है। रक्षाबंधन से शुरू हुए दौरे बंद होने का नाम नही ले रहे हैं। यह पूछने पर कि क्या उन्होंने अपनी बिटिया को टीके लगवाये थे- लाचारी से भरा न सुनने को मिला।
मै फिर उस मुस्लिम महिला के बगल में जा बैठा। अभी तक उसका फोन नहीं आया था, लेकिन वार्ड की भयावहता से वह अपने डेढ़ साल के बेटे के भविष्य का लेकर परेशान थी। इस वजह से वह रो-रोकर हलकान हुए जा रही थी। स्वास्थ्य मंत्री के दावे को चुनौती देने के लिए न्यूज एजेंसी एएनआई की टीम भी वार्ड के बीचों बीच मय ट्राईपौड और कैमरा माइकों में टीवी कंपनियों की नाम वाली तिकोननुमा लकड़ी के पट्टों के साथ तैयार थी। एजेंसी के रिपोर्टर कम कैमरामैन की दुविधा थी कि उन्हें कोई भी डाक्टर आधिकारिक वक्तव्य नहीं दे रहा था। इसके समाधान के लिए उन्होंने हमारे सहयोग के लिए आये गोरखपुर के पूर्व छात्र नेता एवं पत्रकार अशोक चौधरी को घेर लिया। अशोक चौधरी कुछ बोलते कि वार्ड के दूसरे कोने से गगन भेदती चीत्कारों ने हम सबको हिला दिया। यह वार्ड के एक कमरे के बाहर से उठी आवाजें थीं। उस समय ढाई साल के एक बच्चे की मौत की पुष्टि हुई थी। ये चीत्कारें उसी के परिवार की थीं।
बाबा राघव दास मेडिकल कालेज के एपिडेमिक वार्ड में 8 सितम्बर की दुपहर 12 बजे हर दूसरा बच्चा इसी बीमारी का शिकार था। उस वार्ड में हर परिवार अपने ऊपर मंडरा रही मौत से आशंकित था। हम वार्ड के बाहर खड़े थे। बीच बगल के गलियारे से उस नन्हे शिशु के माँ-बाप, दादी, मौसी, चाची का समवेत क्रंदन हमारे ऑडियो चैनलों में रिकॉर्ड हो रहा था। थोड़ी देर बाद उस परिवार का मुखिया, संभवत उस नन्हे शिशु का दादा घुंघराले बालों वाले प्यारे शिशु को तेजी से लेकर बाहर निकला। शिशु को देखने के बाद उस परिवार का क्रंदन वार्ड की छतों को भेदता हुआ सबके भीतर तक घुसकर बेचैन कर रहा था। जब दादा ने बच्चे को पिता को सौंपा तो तब मृत देह की झूली हुई गति से ही समझ में आया कि ये घुंघराले बाल और सलोनी सूरत जल्द ही स्मृति बन कर रह जाएंगे। बदहवास कदमों से उस परिवार ने अपने नन्हे की अंतिम यात्रा एपिडेमिक वार्ड से शुरू की। उस नन्हे शिशु का सलोना चेहरा पूरे वार्ड को गहरी खामोशी और अवसाद में डुबा चुका था। हमने भी अपना ट्राईपौड समेटा और इमरजेंसी वार्ड के पास आ गए; तभी उसी तीव्रता वाली चीखों का शोर हैडफोन के जरिये मेरे कानों तक पहुंचा। दाहिनी तरफ नजर घुमाई तो वही मुस्लिम महिला दहाड़ माकर छाती पीट रही थी, जिसने आधा घंटा पहले मुझे वार्ड के गलियार में किसी परिचित का नम्बर लिखने के लिए पेन और कागज मांगा था। हमारे फ्रेम के क्लोज अप में उसका आंसुओं से भरा चेहरा और हेडफोन पर- अरे कोई मोर बेटवा के जिया दे…का करुण आर्तनाद था।
राघव दास मेडिकल कालेज, गोरखपुर में अपनी फिल्म के लिए मौत की कहानी दर्ज करते हुए हमें सिर्फ 30 मिनट बीते थे और हम दो मौतों को देख चुके थे। अब उस आधी मौत के बारे में पता करने का हौसला मुझ में नहीं बचा था, जो कुशीनगर के बड़गाँव  से आयी उर्मिला अपनी 12 साल की लगभग विकलांग हो चुकी मधुमिता को बचाने में घरबार बेचकर कर्ज में डूबकर हासिल कर चुकी थी।
हम मेडिकल कालेज से लौट रहे हैं। गाड़ी गोरखपुर की भीड़ वाली सड़कों और बरसाती पानी के जमाव के बीच रास्ता बनाते हुए जा रही है। रेलवे स्टेषन पहुंचते एक पत्रकार दोस्त का मैसेज मिला- सिक्स डाइड टूडे इन बीआडी मेडिकल कालेज।
(जनसत्ता, 19 सितम्बर रविवारीय मैगजीन से साभार)

नवकी बीमारी ने बुझाए लाखों चिराग : संजय जोशी

स्वतंत्र फिल्मकार और गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल व जन संस्कृति मंच के फिल्म समूह द ग्रुप के संयोजक संजय जोशी पिछले दिनों इंसेफेलाइटिस यानी नवकी बीमारी की चपेट में आए पूर्वांचल के इलाके में शूटिंग के लिए गए। सरकार अस्पतालों में ही 2005 से अब तक करीब 17000 बच्चे मर चुके हैं। बीमारी की मार से पीडि़त परिवारों के दुखों को उन्होंने बड़ी शिद्दत से महसूस किया। उनके संवदेनशील मन ने व्यवस्था और काइंयापन पर कई सवाल खड़े किए-

मई 2010 के पहले सप्ताह में हम गोरखपुर और आसपास के कस्बों में वीडियो कैमरा टीम के साथ घूम रहे थे। मकसद था इंसेफेलाइटिस के मरीजों और उनके परिवारों की कहानी को दर्ज करना।
यह बीमारी जिसे अभी भी पूर्वांचल के इस इलाके में नवकी बीमारी के नाम से ही जाना जाता है, 1978 में आई। कारण था धान के खेतों में पनपा मच्छर जो कि सूअर के बाड़ों में भी पनपता था। बारिश का मौसम खत्म होते-होते सितंबर से गोरखपुर और आसपास के शहरों में एक अजीब बदहवासी छा जाती है। प्राय: रोज किसी न किसी गांव और कस्बों से लोग अपने बच्चों को लेकर अस्पताल की तरफ भागते हैं। इस बीमारी के ज्यादातर शिकार बच्चे होते हैं। शुरूआत के दो दिन तक तो बीमारी का पता ही नहीं चलता फिर अचानक बुखार का तेज होना, आवाज का चले जाना और लकवा मारना किसी बुरे अंदेशे की इत्तला देता है। प्राय: अस्पताल तक आते-आते बच्चा या तो दम तोड़ देता है या फिर गंभीर रूप से जिंदगी भर के लिए विकलांग हो जाता है। सिर्फ सरकारी अस्पतालों में ही अब तक करीब 17000 बच्चे मर चुके हैं। गोरखपुर के एक पत्रकार के मुताबिक यह नुकसान 20 प्रतिशत ही है क्योंकि सरकारी अस्पताल 20 फीसदी से ज्यादा मरीजों को नहीं देख सकते। फिर तो यह समझिए कि पिछले तीस साल में अब तक तकरीबन एक लाख लोग मर चुके हैं। एक लाख लोगों के मरने के बावजूद यह बीमारी अभी भी राष्ट्रीय आपदा का दर्जा नहीं पा सकी है और न ही राष्ट्रीय चिंता का। पिछले बरस ही स्वाइन फ्लू को लेकर जिस तरह से हायतौबा मचाया गया, उससे तो यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पूर्वांचल में गरीबों के बच्चों की मौत भी काफी नहीं है। इसके बारे में गंभीरता से सोचने के लिए, जबकि स्वाइन फ्लू से मुश्किल से मरे आठ-दस लोगों के लिए सारा अमला ज्यादा चिंतित है। शायद मसला गरीब और अमीर होने का भी हैै। हमारी टीम भी इन्हीं सब सवालों की खोज में निकली थी।

होलिया में विकलांगता का अभिशाप

हमारी टैक्सी कैमरा टाइपौड और साउंड उपकरणों के से लदी गोरखपुर से 25 किलोमीटर दूर पिपराइच की तरफ जा रही थी। हमें पिपराइच से सटे दलितों की अधिसंख्या वाले होलिया गांव पहुंचना था। वर्ष 2005 में जापानी इंसेफेलाइटिस महामारी की तरह फैली। तब इस गांव से सर्वाधिक लोग बीमारी की चपेट में आए। गोरखपुर में बच्चों के डाक्टर आरएन सिंह ने अपने महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट नीप (नेशनल इंसेफेलाइटिस इरेडिक्शन प्रोग्राम) की शुरुआत इसी गांव से की थी। नीप की वजह से गांव में जापानी बुखार से संबंधित सूचना वाला एक बड़ा बोर्ड नजर आया। कैमरामैन के मुफीद फ्रेम के लिए यह बोर्ड बहुत काम का था। कैमरामैन ने गांव को दर्शाने के लिए बोर्ड के साथ धीमा पैन किया।
होलिया गांव हमारे मैग्नेटिक टैप में दर्ज हो गया। डॉ. आरएन सिंह के सहयोगी डॉ. लाल बहादुर सिंह पड़ोसी कस्बे पिपराइच से हमारी मदद के लिए आ गए थे। हम कहानी की तलाश में थे। डॉ. सिंह ने बताया कि हमने इस बीमारी से लोगों को परिचित कराने के लिए स्कूल से प्रयोग शुरू किया है। कैमरामैन, साउंड रिकार्डिस्ट और मै अब कुछ अच्छे दृश्य और साउंड एम्बीयंस मिलने की उम्मीद में उत्साहित थे। हमारी सफेद एयरकंडीशंड इंडिगो कार जल्दी ही नई लोकेशन पर पहुंच गई। स्कूल की प्रार्थना खत्म हो चली थी और बच्चे अपनी-अपनी कक्षाओं में व्यस्त थे, लेकिन महान फिल्म टोली के लिए हर चरित्र का रीटेक संभव था। डॉ. सिंह के मित्र को समस्या बताई। तुरंत ही कक्षाओं को रोककर फिर से प्रार्थना की रीटेक की तैयारी शुरू की गई। कैमरामैन ने प्रार्थना सभा के सामने टाइपौड जमाया। प्रार्थना पढऩे वाली मुख्य लड़की की कमीज में रेडियो माइक लगा दिया गया। हवा में तैरता सांउड रिकार्डिस्ट का गन माइक और बूम राड गरीब बच्चों को भविष्य में डींग हांकने का मौका दे रहे थे। प्रार्थना की सभा के बाद मास्टर जी ने बच्चों को बताया कि जापानी बुखार से कैसे बचा जाता है। जल्द ही कट-कट की आवाजें आईं। हम यह भूल गए थे कि मुख्य भाषण मास्टर जी का है। इसलिए अबकी बार रोडियो माइक मास्टर जी की कमीज में टांगा गया और फिर से प्रार्थना सभा का रीटेक हुआ। कुछ बच्चे प्रार्थना की लाइनों से इतर बूम राड में लगे माइक की गति को अपनी आंखों से पकडऩे को बेचैन थे। प्रार्थना के गीतों और राष्ट्रगान की औपचारिकता के बाद मास्टर जी ने स्वच्छता की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें अपने बड़े-बूढों को शौच खुले में नहीं, बल्कि शौचालय में करना चाहिए के बारे में समझाना चाहिए। मास्टर जी शायद यह जानते थे कि बिना शौचालय हुए भी भाषण में तो यह कहा ही जा सकता है कि शौच, शौचालयों में करना चाहिए। नीप ने तो सिर्फ शौचालय में ही शौच करना चाहिए, बताने का जिम्मा लिया है। अब गांव में किसी के पास शौचालय बनाने की सामथ्र्य नहीं है तो वह क्या करें! होलिया में जापानी बुखार का टीकाकरण हुआ है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक टीकाकरण इस बुखार से बचाव का एकमात्र उपाय है। यह भी कि टीका कम से कम तीन नहीं तो दो बार तो जरूर लगना चाहिए। होलिया में 2005 के बाद दूसरे गांवों की तरह एक ही बार टीका लगा है। लेकिन हमारी फिल्म के दृश्य में होलिया के मास्टर साहब के यह पूछने पर कि किसे-किसे टीका लगा है, सभी बच्चे हाथ ऊपर खड़ा कर देते हैं। आडियो चैनल में यह भी दर्ज होता है। यह एक आडियो विजुअल सत्य है, जिसे हमने दर्ज कर लिया और शायद अपनी सुविधानुसार इसे इसी तरह इस्तेमाल भी कर लेंगे। और यदि हम नहीं करेंगे तो कोई और टीम कर ही लेगी।
प्रार्थना सभा के दृश्य के बाद हमें वापस गांव में आना था। अपनी फिल्म को अब विभिन्न केस स्टडी के माध्यम से आगे बढ़ाना था। फिल्म टीम डॉ. सिंह के मार्ग निर्देशन में होलिया गांव के ठाकुर टो्ला में रामसमुझ सिंह का मकान खोज रही थी। रामसमुझ अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनकी पत्नी कुसुम देवी और बेटा मनोज घर चलाते हैं। 2005 के वक्त रामसमुझ की बेटी संजू 13 वर्ष की थी। बीमारी ने संजू की आवाज छीन ली और दिमाग भी। कैमरामैन ने फ्रेम बनाया। फ्रेम में सबसे बाएं बैठी संजू पूरी बातचीत में बुत बनी रही। यह पूछने पर कि आगे चलकर क्या बनना चाहती है तो उसका आवाज खींचकर डा-क्-ट-र कहना बीमारी के विद्रूप चेहरे को बखूबी समझा रहा था। विद्ररूपताएं सिर्फ संजू की विकलांगता से ही नहीं उपजी थीं। थोथी संवेदनओं ने भी कुछ कम इजाफा नहीं किया था। पड़ोस के किसी सम्पन्न जमींदार ने संजू की पढ़ाई-लिखाई और शादी ब्याह का जिम्मा भी लिया था। इस बात को कई लोगों ने कैमरे पर दर्ज हो जाने की नीयत से सुनाया। किसी विकलांग बच्चे पर इतना कुछ करने की मंशा सिर्फ  ढोंग नहीं तो क्या था।
संजू के बनिस्पत पासवान टोला की गीता और ओम प्रकाश का बेटा शैलेश जीवन के ज्यादा करीब थे। शैलेश 2005 में बीमारी के समय चार वर्ष का था। इस बीमारी ने उसकी आवाज को छीन लिया है और हाथ-पैर भी सामान्य नहीं रह पाए हैं। नाम पूछने पर बहुत मुश्किल से वह समय लगाकर खींचकर शै…ले…ष  बोलता है। गनीमत है कि उसका दिमाग एकदम दुरूस्त है। जब हम पासवान टोला पहुंचे तब शैलेष हम उम्र बच्चों के साथ बागीचे में खेलने गया था। शैलेष की मां गीता पासवान घर चलाती हैं और उनके पति होलिया से 25 किलोमीटर दूर गोरखपुर में चाय का ठेला लगाकर घर का खर्च जुगाड़ता है। ठाकुर टोले की कुसुम देवी की तरह उनके पास बेटे की बीमारी से लडऩे के लिए जमीन का सहारा भी नहीं हैं। पासवान टोले की सभी परिवारों के पास जमीन बीघे में न होकर क_े में है। कैमरा मैन ने शैलेष के आने के इंतजार में माहौल दर्ज करने के लिए महिलाओं के समूह को अपने फ्रेम में समेटना शुरू किया। 1930 में इसी होलिया गांव से बमुश्किल 45 किमी दूरी पर सरदार नगर में मशहूर चित्रकार अमृता शेरगिल तीन औरतों को अपने कैनवास में उतार रही थीं। पासवान टोले की ये औरतें अमृता शेरगिल की तीन औरतों जैसी ही मजबूत दिख रही थीं। किसी के पति सूरत तो किसी के पति मुंबई कमाने गए हैं। जिस आंगन में बैठकर हम उनसे बातचीत कर रहे थे वह पुरुषों की परछाई से मुक्त था। बातचीत शैलेष की बीमारी और उससे लडऩे के किस्सों तक ही महदूर थीं। जो इस दौरान हमारे मैग्नेटिक टेप में दर्ज न हो सका, वह था पासवान टोले की औरतों का अकेलापन। शैलेष के आने के बाद माहौल थोड़ा अलग हुआ। शैलेष की विकलांगता उसकी आंखों से दिखती शरारत पर भारी नहीं पड़ रही थी। हमारे अनुरोध पर शैलेष एक बार फिर बागीचे में अपने दोस्तों के साथ खेलने चला गया। कबड्डी की धमाचौकड़ी में शैलेष को छोड़कर हम होलिया गांव से बाहर निकल रहे थे।

सेमरी महेशपुर- जहां पांच घरों में छह मौते हुईं

गोरखपुर से कुशीनगर जाते हुए सड़कों पर विकास का नया मॉडल पसरा पड़ा है। कुशीनगर जहां महात्मा बुद्ध ने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था, में एक बहुराष्ट्रीय संस्था बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मदद से मैत्रेय प्रोजेक्ट स्थापति करने जा रही है। इस प्रोजेक्ट में कुशीनगर के आस-पास के किसानों को उजाड़ा जाएगा। बुद्ध की 500 फीट उंची प्रतिमा उजाड़े गए किसानों के खेत में खड़ी होगी। आत्मिक शांति और ऐशोआराम के लिए दुनियाभर के बौद्ध मतावलंबी कुशीनगर पधारेंगे। इसी कारण गोरखपुर से कुशीनगर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग को चौड़ा कर फोर लेन का बनाया जा रहा है। सुकरौली इसी राजमार्ग पर एक उंघता हुआ कस्बा है, जिसकी नींद विकास के इस मॉडल ने तोड़ दी है। सुकरौली से एक रास्ता सेमरी महेशपुर जाता है। होलिया में हम विकलांग बच्चों और उनके परिजनों से मिले थे। सेमरी में हमें जापानी बुखार से हुई मौतों वाले घरों में जाना था। पहला घर जवाहिर और दुर्गावती का था। उनका दस बरस का बेटा तारकेश्वर 2005 में नवकी बीमारी की भेंट चढ़ गया। उसके जाने से दुर्गावती की दुनिया ही उजड़ गई। मायूसी से उसे याद करते हुए कहती है- अभी होता तो गबरू जवान होता। कैमरामैन ने एडिटिंग की सुविधा के लिए दुर्गावती को दुबारा से अपनी चाय की दुकान पर बैठा लिया है। जब अंगीठी जलाने का उपक्रम चल रहा है और दुर्गावती के प्रोफाइल वाले शाट दर्ज किए जा रहे हैं। फ्रेम में दुकान की अंगीठी में लगी आग से मनमाफिक वार्म टोन मिल रही थी। दुर्गावती के दिल में लगी आग को बुझाने का तरीका हमारे कैमरे में नहीं था। दुर्गावती के घर के पास ही मुश्किल से 50 मीटर की दूरी पर तारकेश्वर का दोस्त जितेंद्र रहता था। 13 बरस का जितेंद्र, उदयभान और सावित्री की आंखों का तारा था। 2005 की बरसात में उसे यह बुखार आया और फिर दो-तीन दिन बाद उसने असर दिखाना शुरू किया। जैसे-तैसे करके यादव दंपति उसे सुकरौली ले गए, लेकिन तब तक सब कुछ पलट गया था। 2005 की महामारी के भेंट जितेंद्र भी चढ़ा। दुर्गावती के घर से निकलते ही हमें याद आया कि तारकेश्वर की कोई तस्वीर हमारी बातचीत के दौरान नहीं उतारी गई। इसलिए जितेंद्र के घर बातचीत पूरी होते-होते हमने उसकी तस्वीर मांग ली। तस्वीर मांगना जैसे पुराने जख्मों को फिर से हरा करना था। पहली बार हमें पता चला कि फिल्म के लिए जरूरी होते हुए भी मृत बच्चे की तस्वीर रखने का चलन ग्रामीणों में नहीं है। उनका कहना सही था कि इससे पुरानी यादें धूमिल पड़ती हैं। इसलिए बच्चों की स्मृति पूरी तरह से नष्ट करना ही अपने दुख को कम करने का एक आसान उपाय है। लालचियों की तरह हम तस्वीर की जुगत में लगे रहे। गुमसुम सावित्री ने मन मारकर कहीं कोने में दुबकी अपने दुलारे जितेंद्र की एक पासपोर्ट साइज की तस्वीर हमें दे दी। एडिटिंग के समय किसी भावनात्मक उभार की उम्मीद के साथ वह तस्वीर मेरे पर्स का एक जरूरी हिस्सा बन गई।
जवान बेटे की मौत वाले घर से कैसे विदा लेते हैं, यह किसी फिल्म स्कूल में सिखाया नहीं जाता। जितनी तेजी और उत्साह से हम यादव दंपति के आंगन में घुसे थे, उतने ही चुपचाप वहां से विदा हो लिए। अब मौत के उत्सव को और देर बनाए रखना किसी के बस में नहीं था। उस आंगन में सिर्फ सावित्री का शून्य में टंगा चेहरा और उदयभान की अपने बेटे की आत्मा को खोजती आंखें हमारा पीछा कर रही थीं। टैक शाट की तरह इसे दर्ज करने की कूव्वत न हमारे लेंस में थी और न मैग्नेटिक टेप में।
गुड्डू शर्मा का घर खोजने समय रास्ते में गांव के प्रधान रामाश्रय सिंह मिल गए। रामाश्रय 2005 से सेमरी महेशपुर के प्रधान हैं। पहली बार उनकी पत्नी ग्राम प्रधान बनी थीं और अपनी पत्नी के कार्यकाल को भी वह अपना ही समझकर गिनते हैं। पहले कैमरा, बूम राड और हैडफोन से अक्रांत टीवी क्रू को देखकर सरकारी भाषा में बतियाते रहे। थोड़ी देर बाद मान की बातें बताने लगे। उन्होंने ईमानदारी से स्वीकारा कि कैसे ऊपर से नीचे तक विकास के लिए आए रुपए का बंटवारा होता है। यह कहने को मजबूर हुए कि महामारी से लडऩे की सभी तैयारियां हवा में हैं। शरमाते और हंसते हुए स्वीकारा कि वह भी विकास की गति से मालामाल हो रहे हैं।
गुड्डू शर्मा तीसेक की उम्र के हैं और मजदूरी कर परिवार चलाते हैं। बिना पलस्तर की दीवारें उनकी आंशिक बेरोजगारी को सहज ही व्यक्त कर रही थी। वर्ष 2005 में उनकी और पत्नी सुनीता की गोद में तीन साल का खूबसूरत बेटा सत्यम था। नवकी बीमारी ने यहां भी कहर बरपाया और सत्यम बचाया न जा सका। हमारे अनुरोध करने पर एक ग्रुप फोटो मिल गया, जिसमें सत्यम अपने चचेरे भाई-बहनों के साथ हाथ में गुलदस्ता लिए हुए है। घने काले घुंघराले वालों बाला सत्यम ऐसा लग रहा था कि मानो तुरंत ही तस्वीर से बाहर निकलकर हमारे साथ खेलने लगेगा।
मा-बाप के हाथ से छिटककर तस्वीर अब उनके दूसरे बेटे सियम के हाथ में आ गई। अब सियम फिर से हमें तस्वीर में दिख रहे भाई-बहनों के बारे में बता रहा था। फ्रेम से परे सत्यम की मां सुनीता किसी तरह अपने आंसुओं को रोके थी। एकदम अंधेरे में सत्यम की बुआ अपने बिछुड़ गए भतीजे की याद में खो गई थी। मौत की याद में सब कुछ शांत था। हमारा कैमरा अपने पैन से सब कुछ को धीमे-धीमे मैग्नेटिक टेप में दर्ज कर रहा था। गुड्डू-सुनीता के पांच बरस के दूसरे बेटे सियम को भी गुजर गए भाई की तरह टीका नहीं लगा है। मै अचानक इस आशंका से घिर गया कि क्या इस परिवार का दूसरा गुलदस्ता भी टूट जाएगा? यह पूछने का साहस मेरे पास नहीं था क्योंकि फिल्म टीम टीका न लगने के कारण हुई मौतों की यादों को बखूबी दर्ज कर सकती हैं लेकिन हमारे बूम राड से कोई टीका नहीं लगाया जा सकता।
सियम के काले घुंघराले बालों और शोख चेहरे की याद के साथ हम रामजी गुप्ता के आम के पेड़ के नीचे जमा हो रहे थे। इसी पेड़ के नीचे से 5 सितंबर, 2005 को उनकी प्यारी पोती ज्योति की आखिरी यात्रा निकली। लकड़ी के तख्ते पर ज्योति की दादी रामरती और मां बादामी बैठे थे, हमारे सवालों के जवाब के लिए। मां का आडियो लेवल काफी नीचा था। जैसे ही ज्योति के बारे में रामरती ने बताना शुरू किया बादामी ने हस्तक्षेप कर अपनी बेटी की यादों को रखना शुरू कर दिया। बेटी की याद ने उसके आडियो लेवल को दुरूस्त कर दिया था। वही सब कुछ ज्योति के साथ हुआ जो दूसरे बच्चों के साथ हुआ। एक दिन अच्छी-भली स्कूल से लौटी ज्योति ने पेट दर्द की शिकायत की। फिर बुखार और दूसरे लक्षण। गोरखपुर के महंगे प्राइवेट नर्सिंग होम में इलाज कराने के बाद जो हाथ में आया, वह था डेथ सर्टिफिकेट। हम पता नहीं क्यों इसी डेथ सर्टिफिकेट को तस्वीरें भी विभिन्न कोणों से कैद करते रहे। शायद कहानी को और ज्यादा प्रमाणिक बनाने के लिए या यूं ही सब कुछ दर्ज कर लेने की नीयत से। सभी लोगों की तरह यहां के लोग भी अब किसी पर दोष मढऩे के लिए तैयार नहीं थे। जवाब वही कि जब जान ही नहीं बची तो हायतौबा करने से क्या? बातों-बातों में पता चला कि ज्योति की स्मृति शादी के एक वीडियो कैसेट में मौजूद है। जल्दी ही किसी को भेजा गया, उस वीडियो कैसेट की खोज में। इस बीच समय काटने की गरज से गुप्ता परिवार ने दही-चूड़ा के नाश्ते का अनुरोध किया। सुबह से धूप में घूम रहा कैमरा टीम ने सहज ही इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। रामजी गुप्ता के दालान में कैमरा टीम दही-चूड़ा जीम रही थी। दही गांव के शुद्ध घी को औंटाकर जमाई गई थी और चूड़ा स्थानीय चावल से ही तैयार किया गया था। दही-चूड़ा के बड़े ग्रास के साथ ज्योति की स्मृति हम सबको मृत्यु भोज का आस्वाद करा रही थी और शायद इसी वजह से खूब औंटाए गए दूध का दही मीठा न होकर कसैला प्रतीत हो रहा था।
इस कसैले मृत्यु भोज को अभी और कसीला होना था भल्लन के घर पर। सेमरी महेशपुर से एक किलोमीटर दूर पश्चिम पर स्थिति अति दलित डोम लोगों का बरवा टोला है। 45 वर्ष के भल्लन और 40 की बरफी आठ बच्चों के जनक हैं। 2005 से पहले तक भुल्लन सुअर भी पालते थे। सुअर पालन न सिर्फ  उनके लिए नकदी का इंतजाम करता, बल्कि परिवार को पौष्टिक भोजन भी उपलब्ध कराता। 2005 का जापानी बुखार सुअरबाड़े को लील गया। इस तो भल्लन और बरफी किसी तरह बर्दाश्त कर गए, लेकिन छह महीने के छोटू और तीन बरस की सोनी की याद को भुलाना बहुत मुश्किल था। पतली नीली प्लास्टिक शीट से बने टैंट में किसी तरह का गुजर-बसर कर रहे भल्लन परिवार के लिए अपने बच्चों को नवकी बीमारी से बचा पाना बहुत मुश्किल था। वे भी दूसरे लोगों की तरह नजदीकी अस्पताल की ओर दौड़े, लेकिन सबसे छोटे छोटू और सात भाइयों की चंपा सोनी को वे न बचा सके। बिना छत वाले घर की जिस चौखट पर बैठकर वे टेलीविजन इंटरव्यू दे रहे थे, जिसमें उनका एक लड़का पूरी तरह से नेमा दिख रहा है, देखकर कोई पूछ ही सकता है कि रत्नगर्भा बरफी अपने बचे हुए छह रत्नों को कैसे बचा पाएगी? हमारी विवशता थी कि अशिक्षित भल्लन परिवार ने अपनी नासमझी में हमें सरकारी नुमाइंदा समझ लिया था। वे बार-बच्चों की मृत्यु का मुआवजा न मिलने की शिकायत करते रहे। हमने भल्लन और बरफी को झूठा दिलासा देकर वहां से विदा ली। वे शायद यह समझ रहे थे कि हमारी रिकार्डिंग से उन्हें मुआवजा मिल जाएगा, जबकि सचाई यह थी कि पैसे की कमी के कारण उनके बच्चे सरकारी अस्पताल की चौखट तक पहुंचकर दर्ज न हुए थे। इसलिए मर कर भी वे सरकारी दस्तावेजों में मरे नहीं थे।

हमारी रिकार्डिंग से क्या किसी परिवार का भला होगा? क्या सरकार ऐसी चुप्प और गमगीन बातचीत से उद्वेलित हो पाएगी जिसमें मौत का हाहाकार नहीं बल्कि सिर्फ यादें और सूनापन हैं? पता नही। कैमरे के पैन और उसमें सब कुछ समेट लेने का कौशल, बूम राड और गन माइक का सटीकपन और दुखद स्मृतियों की पुनरावृत्तियां कुछ और बदल सकेंगी तो निश्चय ही बरफी जैसे तमाम रत्नगर्भाओं के रत्न पूर्वांचल के काम आ सकेंगे।

(समकालीन जनमत, जून,  2010 से साभार)