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दिनकर कुमार की कवितायें

दिनकर कुमार

दिनकर कुमार

5 अक्टूबर, 1967, बिहार के दरभंगा जिले के एक छोटे से गांव ब्रहमपुरा में जन्मे दिनकर कुमार के तीन कविता संग्रह, दो उपन्यास, दो जीवनियाँ एवं असमिया से पैंतालीस पुस्तकों का अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। वह दैनिक सेंटिनल (गुवाहाटी) के सम्पा दक है। उनकी कुछ कवितायें-  

सारा देश रियल इस्टेट

सारा देश रियल इस्टेट
मानचित्र पर क्यों रहें
धान के लहलहाते हुए खेत
कल-कल बहती हुई नदियाँ
ताल-तलैया, झील-पोखर
हरियाली का जीवन

सारा देश रियल इस्टेट
उन्हें उजाडऩे की आदत है
वे उजाडक़र दम लेंगे
फसल की जगह फ्लैट उगाएंगे
एक्सप्रेस वे बनाएंगे
रिसॉर्ट और फन सिटी बसाएंगे

सारा देश रियल इस्टेट
कैसी माटी किसकी माटी
कैसी धरती कैसी माता
कैसा देश किसका तंत्र
भूमाफिया का देश
बिल्डर का तंत्र
बाकी प्रजा रहे दीन-हीन
उनके अधीन उनके अधीन।

इस विज्ञापन जगत में तुम कहां हो मनुष्य

इस विज्ञापन जगत में तुम कहाँ हो मनुष्य
कहाँ है अभाव में थरथराती हुई तुम्हारी गृहस्थी
जीवन से जूझते हुए कलेजे से निकलने वाली आहें
कहाँ हैं रक्तपान करने वाली व्यवस्था का चेहरा

अगर है तो केवल है सिक्कों की खनखनाहट
अघाई हुई श्रेणी की ऐय्याशियों की सजावट
झूठी घोषणाओं को ढकने के लिए अमूर्त चित्राँकन
कोढिय़ों और भिखारियों की पृष्ठभूमि में पर्यावरण का रेखाँकन
एलसीडी स्क्रीन पर झिलमिलाती हुई वस्तुएं
किस्त में कारें किस्त में फ्लैटें किस्त में
उपलब्ध हैं समस्त महंगे सपने सौदागर बन गए हैं बहेलिए
कदम-कदम पर बिछाए गए हैं जाल
चाहे तो इसे हादसा कहो या कहो खुदकुशी
तुम्हारी अहमियत कुछ भी नहीं मरोगे तो मुक्ति मिले या न मिले
आँकड़े में शामिल जरूर हो जाओगे

इस विज्ञापन जगत में तुम कहां हो मनुष्य
हिंसक पशुओं को देख रहा हूँ गुर्राते हुए रेंगते हुए
गिड़गिड़ाते हुए यह कैसी क्षुधा है जिसकी भट्ठी में
समाती जा रही है जीवन और प्रकृति की समस्त सहज भावनाएं
नष्ट होती जा रही है सहजता-सम्वे दना
पसरता जा रहा है अपरिचय का ठंडापन
इस विज्ञापन जगत में तुम कहाँ हो मनुष्य ।

मुझे मत उछालो

मुझे मत उछालो सराहना के झूले पर
कहीं हो न जाए मुझे झूठा गुमान
कहीं बिगड़ न जाए मेरा संतुलन
कहीं मैं मुग्ध न हो जाऊँ अपने आप पर

अगर दे सकते हो तो दो थोड़ा सा अपनापन
मेरे थके हुए वजूद को थोड़ी सी छाया
मेरे नम सपनों को थोड़ी सी धूप
उदासी की घडिय़ों में दो मीठे बोल

मुझे मत उछालो सराहना के झूले पर
कहीं मैं भूल न जाऊँ अपनी राह
कहीं मैं भ्रमित होकर पड़ाव को ही न मान लूँ मंजिल
कहीं ओझल न हो जाएं मेरे आदर्श

मुझे मत उछालो सराहना के झूल पर।

आवारा पूँजी के उत्सव में

आवारा पूँजी के उत्सव में दबकर रह जाती है
कमजोर नागिरकों की सिसकी
असहाय कंठ की फरियादें
वंचित आबादी की अर्जी

आवारा पूँजी के पोषक मंद मंद मुस्काते हैं
कुछ अंग्रेजी में बुदबुदाते हैं
शेयर बाजार का चित्र दिखाकर आबादी को धमकाते हैं
कहते हैं छोड़ो जल-जमीन
नदियाँ छोड़ो जनपद छोड़ो
झोपड़पट्टी से निकलो बाहर
बसने दो शॉपिंग माल यहाँ
रियल इस्टेट का स्वर्ग यहाँ
यह कैसी भावुक बातें हैं
अपनी जमीन है माँ जैसी

आवारा पूँजी के साये में
कितना बौना है लोकतंत्र
कितना निरीह है जनमानस

आवारा पूँजी के साये में
पलते-बढ़ते अपराधीगण
अलग-अलग चेहरे उनके
अलग-अलग हैं किरदारें
बंधक उनकी है मातृभूमि
उनके कब्जे में संसाधन

कैसे कहें आजाद हैं हम?

वह जो फेसबुक का साथी है

वह जो फेसबुक का साथी है
किसी मशीन की तरह
या किसी बहुरुपिए की तरह
वह अपनी कुंठाएं उड़ेलता है
जब वह बिलकुल अकेला होता है
कुछ भद्दी गालियाँ देते हुए कल्पना करता है
कि इस तरह बदल जाएगा समूचा तंत्र

वह जो फेसबुक का साथी है
बनावटी है उसकी भावनाएं
वह जब करुणा की बातें करता है
उसके सीने में सुलगती रहती है घृणा
वह जब प्रेम दर्शाना चाहता है
जाहिर हो जाती है उसकी आत्मदया

वह जो फेसबुक का साथी है
देखते ही देखते वह नजर आने लगता है
बेजान बिजूका की तरह
उसकी आकृतियाँ गड्डमड्ड होने लगती हैं
वह बुद्धि विलास को ही समझता है क्रांति
वह मदिरापान करने के बाद
दार्शनिक बन जाता है
जीवन में पिट जाने पर कायर बन जाता है
वह उतना ही खोखला है
जितना कोई बेजान डिब्बा हो सकता है
वह उतना ही संवेदनशून्य है
जितना कोई यंत्र हो सकता है।

एक दिन बचेगा

एक दिन बचेगा समाज का मलाईदार वर्ग ही शहर के इस मुख्य इलाके में
बाकी सारे कमजोर लोगों को
दूर-दराज की बस्तियों में जाकर
बिल्लियों के डर से बिलों में दुबके चूहों की तरह
जीने की आदत डालनी होगी

वे कहते हैं विकास के लिए इतना त्याग
तो करना ही पड़ता है
ऐसे नहीं हासिल हो जाता महानगर का दर्जा
ऐसे ही नहीं बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपनी तिजौरी
खोलकर राजकोष की रक्षा करती हैं
ऐसे ही नहीं भूमाफिया से लेकर राजनेता तक
जी-जान से तैयार करते हैं अपना गिरोह

एक दिन बचेगा डार्विन के सिद्धांत वाला ताकतवर वर्ग ही
समस्त सुविधाओं पर काबिज होकर
उसकी सेवा करने के लिए भले ही
गुलामों की प्रजाति रहेगी मलीन बस्तियों में
दया की मोहताज बनकर
मतदाता सूची में दर्ज नाम बनकर।

बाजार सबको नचाता है

बाजार सबको नचाता है अपने इशारे पर
कहता है निरर्थक है भावना-संवेदना
असली चीज है खनखनाता हुआ सिक्का
इसे हासिल करने के लिए बेच दो
जो कुछ भी है तुम्हारे पास बेचने लायक
अगर बेचेने लायक कुछ भी नहीं है
तो बाजार कहता है तुम्हें भूमंडलीकरण के सवेरे में
जीवित रहने का कोई हक नहीं है

बाजार सबको नचाता है अपने इशारे पर
इसीलिए तो खोखले हो रहे हैं मानवीय रिश्ते
बढ़ती जा रही है गणिकाओं की तादाद
बढ़ते जा रहे हैं संवेदनशून्य चेहरे
यंत्र की तरह दौड़ती-भागती भीड़
बाजार के इशारे पर जीना
बाजार के इशारे पर मरना।

वे जो हमें नायक की तरह नजर आते हैं

वे जो हमें नायक की तरह नजर आते हैं
असल में वे प्रेशर कुकर की सीटी की
भूमिका निभा रहे होते हैं
हमें लगता है कि वे हमारे हितों की चिंता में
आमरण अनशन कर रहे हैं
डिजाइनर पोशाक में सज-धजकर
असंख्य टीवी कैमरों के सामने आग उगल रहे हैं
बदरंग तस्वीर को पूरी तरह
बदल देने का दावा कर रहे हैं

वे जो हमें नायक की तरह नजर आते हैं
असल में वे हमारे असंतोष की आग पर
बर्फ रखने की भूमिका निभा रहे होते हैं
वे हमारा ध्यान अनर्गल प्रलापों की तरफ
केंद्रित करना चाहते हैं
ताकि हम पूछ न सकें कोई असुविधाजनक सवाल
ताकि हमें अंधेरे में रखकर
वे लोग हमारे जीवन के साथ खिड़वाड़ करने की
साजिशों को अंजाम देते रहें

वो जो हमें नायक की तरह नजर आते हैं
असल में वे खलनायकों की मदद करने में जुटे रहते हैं।

दुनिया की सबसे हसीन औरत

दुनिया की सबसे हसीन औरत
गरीबी की रेखा पर चढक़र
मुस्कराती है
ठंडे चूल्हे की तरह सर्द है
उसके होंठ
असमय ही वृद्धा बन जाने वाली
बच्ची से मिलती है
उसकी आँखें

दुनिया की सबसे हसीन औरत
हमें बताएगी
भूख लगने पर रोटी नहीं मिले
तो केक खा लेना
प्यास लगने पर
शुद्ध पेयजल नहीं मिले
तो कोल्ड ड्रिंक्स पी लेना

दुनिया की सबसे हसीन औरत
हमारी नींद की गुफा में
समा जाती है
हमारे सबसे हसीन सपनों को
बटोरती है
और गायब हो जाती है।

परिचय

हवा ने बीज से नहीं पूछा था
उसकी जाति के बारे में
उसके प्रांत के बारे में
उसकी मातृभाषा के बारे में
और हवा
बीज को उड़ाकर ले आई थी

बीज मिट्टी के साथ
घुल-मिल गया था और
एक फूल के पौधे के रूप में
अंकुरित हुआ था

हवा की तरह चिडिय़ा भी
बीज से नहीं पूछती
निर्धारित प्रपत्र के प्रश्न
हवा की तरह चिडिय़ा भी
बीज से नहीं माँगती
सच्चे-झूठे प्रमाण-पत्र

और मनुष्य जड़ की तलाश में
उन्मादित हो जाता है
अतीत के मुर्दाघर में भटकता है
हवा की तरह
चिडिय़ा की तरह
और मिट्टी की तरह
सहज नहीं रह जाता

खून के लाल रंग को भूलकर
पीले और नीले
काले और भूरे रंग के भ्रम में
पंचतंत्र का शेर बन जाता है
मेमने पर पानी गंदा करने का
आरोप लगाता है
मेमने की सफाई सुनकर
उसके पूर्वज को दोषी बताता है
और मेमने को दंडित करता है।

स्कूल में गोलीबारी

वीडियो गेम की काल्पनिक दुनिया में
वे रचते थे असली नजर आने वाले किरदारों को
माउस की क्लिक के सहारे वे नष्ट करते थे
अपने ही किरदारों को
उन्हें खून बहते हुए देखकर
तनिक भी डर नहीं लगता था

डर उन्हें लगता था अंधेरे से
अकेलेपन से रिश्तों के खोखलेपन से
माता-पिता के असंभव सपनों पर सवार होकर
वे जिस सफर पर निकले थे
वह सफर किसी मंजिल पर नहीं पहुँचता था

पैसे के क्रूर परिवेश ने पैदा होने के बाद ही
धुन की तरह नष्ट करना शुरू कर दिया था
उनके भीतर की सम्वेशदनशीलता को
उन्होंने प्रतिशोध का पाठ सीखा था
परिवार से समाज से देश और दुनिया से
इसीलिए उन्होंने वीडियो गेम की काल्पनिक दुनिया की तरह
असली जीवन में भी जब अपने ही सहपाठी को
गोली मारी तो वे तनिक भी डरे नहीं।

जिंदा रहते हैं सपने

विद्रोह को कुचल दिया जाता है
लेकिन जिंदा रहते हैं सपने
सपनों का कोई मुख्यालय नहीं
न ही छिपने के लिए बंकर
न ही भागने के लिए कोई गुप्त मार्ग

जब अन्याय फहराता है जीत का पताका
वंचित के सीने में बीज की तरह
अंकुरित होता है सुलगता हुआ सपना
जब अन्याय विद्रोह की छाती पर पैर रखकर
घोषणा करता है कि अब
खत्म हो गई हैं सारी चुनौतियाँ
खामोश हो गए हैं प्रतिवादी स्वर
उसी समय किसी बच्चे की मुट्ठी तन जाती है
आंखों में विद्रोह समा जाता है

विद्रोह को कुचल दिया जाता है
लाशें बिछा दी जाती हैं खेतों में खलिहानों में
नदी और सागर को लाल कर दिया जाता है
विद्रोहियों के रक्त से
नए सिरे से जन्म लेता है विद्रोही
प्राचीन सपने को कलेजे से लगाकर
आदेश या अध्यादेश मानने से
वह इंकार कर देता है।

(‘बोधि प्रकाशन’ एफ-77, करतारपुरा औद्योगिक क्षेत्र, बाईस गोदाम, जयपुर, मोबाइल : +91 98290 18087 से प्रकाशित कविता संग्रह ‘लोग मेरे लोग’ से साभार, मूल्‍य : 60 रुपये)

खामोश हो गई लोहित किनारे की आवाज : दिनकर कुमार

भूपेन हजारिका ( 8 सितंबर 1926-5 नवम्बर 2011)

दादा साहब फाल्के पुरस्‍कार से सम्मानित असम के लोक गायक भूपेन हजारिका पर सुप्रसिद्ध लेखक, कवि, अनुवादक और गुवाहाटी से प्रकाशित हिन्‍दी दैनिक ‘सेन्टिनल’ के संपादक दिनकर कुमार का आलेख-

भूपेन हजारिका ऐसे लोकगायक थे, जिनके गीत पूर्वोत्तर भारत की आम जनता की धमनियों में रक्त के साथ घुले हुए हैं। यही वजह है कि जब 5 नवंबर, 2011 को मुंबई के एक अस्पताल में उनका निधन 85 वर्ष की आयु में हो गया, तो असम सहित पूर्वोत्तर राज्‍यों का जनजीवन स्तब्ध हो गया। 7 नवंबर, 2011 को उनके शव को मुंबई से लाकर गुवाहाटी के ऐतिहासिक जजेज फील्ड में सार्वजनिक दर्शनार्थ रखा गया। तकरीबन सात लाख लोग 7 से लेकर 9 नवंबर की सुबह तक फूल और असमिया गमछा लेकर अपने प्रिय ‘भूपेन दा’ को श्रद्धा-सुमन अर्पित करने के लिए आते रहे। आम असमिया लोगों ने अपने घरों के सामने दिए जलाकर शोक मनाया। ऐसा अभूतपूर्व जनसैलाब असम के इतिहास में किसी भी हस्ती के देहांत के बाद उमड़ते हुए नहीं देखा गया था। 9 नवंबर, 2011 को गुवाहाटी विश्वविद्यालय परिसर में जब राजकीय सम्मान के साथ उनकी अंत्येष्टि की गई तो लाखों लोग उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए पहुँच गए। भूपेन हजारिका ऐसे ‘गण शिल्पी’ थे, जिन्होंने लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाई थी और जो देश और दुनिया के लिए असम की पहचान बन गए थे।

भूपेन हजारिका का जन्म 8 सितंबर, 1926 को असम के सदिया में हुआ था। उनके पिता नीलकांत हजारिका शिक्षक थे और उनका अक्सर तबादला होता रहता था। यही वजह थी कि बालक भूपेन को असम के अलग-अलग हिस्सों में रहने का मौका मिला। 1942 में गुवाहाटी में इंटर की पढ़ाई पूरी करने के बाद भूपेन ने बी.ए. और एम.ए. की पढ़ाई बनारस विश्वविद्यालय से पूरी की थी। इसके बाद भूपेन न्यूयार्क चले गए थे, जहाँ पाँच वर्षों तक रहते हुए उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय से जनसंचार विषय में डाक्टरेट की डिग्री हासिल की थी।

बहुआयामी प्रतिभा के धनी भूपेन हजारिका कवि, गीतकार, संगीतकार, गायक, अभिनेता, पत्रकार, लेखक, अध्यापक और फिल्मकार थे। सात वर्ष की उम्र से लेकर जीवन के अंतिम समय तक उन्होंने पूर्वोत्तर भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक विकास में योगदान किया। सात वर्ष की उम्र में उन्होंने असम के महान वैष्णव संत शंकरदेव के बारे में एक गीत की रचना की थी और स्वयं ही उसकी धुन तैयार कर गाया भी था।

बचपन में भूपेन हजारिका असम के सांस्कृतिक जगत के दो महान व्यक्ति ज्‍योतिप्रसाद और विष्णुप्रसाद राभा के सम्‍पर्क में आए। असमिया की दूसरी फिल्म ‘इंद्रमालती’ के निर्देशक ज्‍योतिप्रसाद ने उनसे गाने गवाए। उस समय उनकी उम्र महज तेरह साल की थी। हाई स्कूल में पढ़ते समय भूपेन गीतों की रचना कर गाने लगे थे। इस दौरान उन्होंने अपने पिता के लिखे गीतों को भी गाया था। 1948 में असमिया फिल्म ‘सिराज’ के लिए उन्होंने दो गीत गाए और अभिनय भी किया।

युवावस्था में भूपेन जहाँ स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े, वहीं उन्होंने सर्वहारा वर्ग की पीड़ा को महसूस करते हुए कई अमर गीतों की रचना की। 1948 में जब गुवाहाटी में आकाशवाणी केन्‍द्र की स्थापना हुई तो भूपेन को जन-जन तक अपने गीतों को पहुँचाने का अवसर मिला। उन्होंने सामाजिक समरसता, मानवता और भाईचारे जैसे विषयों पर गीतों की रचना की। उन्होंने संगीत को समाज परिवर्तन का हथियार मान लिया था। उनके गुरु विष्णु राभा मार्क्‍सवादी क्रान्तिकारी थे। उनसे प्रभावित होकर भूपेन ने हारमोनियम उठा लिया और जनता के बीच समानता और साम्यवाद के गीत गाने लगे। भूपेन के गीतों में मानवीय संवेदनाओं का गहरा प्रभाव था। वह प्रेम और हृदय परिवर्तन के जरिये समाज परिवर्तन का संदेश दे रहे थे।

1949 में अमेरिका जाने पर भूपेन के दृष्टिकोण का विस्तार हुआ। वहाँ उनका परिचय जनगायक पॉल रॉबसन से हुआ। अमेरिका में ही उन्होंने एक डॉक्टर की पुत्री प्रियम पटेल से विवाह किया। मगर यह विवाह सफल साबित नहीं हुआ और दोनों का विच्‍छेद हो गया। दाम्‍पत्‍य जीवन की संक्षिप्त अवधि में तेज हजारिका नामक पुत्र का जन्म हुआ।

1953 में भूपेन अमेरिका से असम लौटे। वह अपने साथ कई तकनीक और शैली भी लेकर आए थे। जिनकी मदद से उन्होंने यादगार गीतों की रचना की और असम के मनोरंजन जगत के सम्राट बन गए। गीतों की रचना के साथ-साथ उन्होंने कई फिल्मों का निर्देशन भी किया और कई फिल्मों के लिए संगीत भी दिया। इस दौरान वह गुवाहाटी विश्वविद्यालय में अध्यापन भी करते रहे।

भूपेन को अपने बौद्धिक एवं कलात्मक विकास के लिए असम का दायरा सीमित नजर आने लगा और वह 1957 में भारत की सांस्कृतिक राजधानी कोलकाता में रहने के लिए चले गए, जहाँ उन्होंने कम समय के भीतर ही अपने गीतों का बांग्ला अनुवाद गाते हुए अपार लोकप्रियता हासिल कर ली। उनके गीतों में मानवता और प्रेम का संदेह समाज के हर वर्ग के श्रोता को अपनी तरफ आकर्षित करता था। कोलकाता में रहते हुए भूपेन असमिया और बांग्ला फिल्मों के लिए संगीतकार की भूमिका निभाते रहे। इसी दौरान उनके माता, पिता और भाई जयंत का निधन हुआ। पत्नी एकमात्र पुत्र को लेकर हमेशा के लिए उनका साथ छोड़कर चली गई। चीनी हमले में मार्क्‍सवाद के प्रति उनकी आस्था को प्रभावित किया। व्यक्तिगत त्रासदियों के बावजूद इस अवधि में भूपेन पूर्वोत्तर भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय जनगायक बन चुके थे।

कोलकाता में रहते समय ही भूपेन के जीवन में कल्पना लाजमी आई। दोनों ने विवाह किए बगैर ‘लिव इन रिलेशनशिप’ कायम रखा। कल्पना लाजमी ने हिंदी फिल्म ‘रूदाली’ बनाकर भूपेन का परिचय हिन्‍दी भाषी जगत से करवाया। ‘दिल हूम हूम करे’ गाना देश-विदेश में लोकप्रिय हो गया। इस तरह भूपेन ने कई हिन्‍दी फिल्मों में संगीत देते हुए अपने मूल असमिया गीतों का हिन्‍दी अनुवाद प्रस्तुत किया। उनके संगीत की ख्याति दुनिया भर में फैल गई।

भूपेन ने अपने गीतों की नई शब्दावली विकसित की। तत्सम शब्दों का प्रयोग करते हुए उन्होंने अनूठे विषयों पर गीतों की रचना की। उनके गीतों में छह दशकों के असम के जीवन की धड़कन सुनी जा सकती है। उन्होंने लोक संगीत का प्रयोग कर ऐसी अमर रचनाएं प्रस्तुत कीं, जिन्हें असम की कई पीढिय़ाँ गुनगुनाती रही हैं।

यही वजह है कि जब लम्‍बी बीमारी के बाद उनका देहांत हुआ तो असम के अखबारों ने निधन के समाचार का शीर्षक लगाया- ‘असमिया जाति के कलेजे के टुकड़े भूपेन हजारिका नहीं रहे।‘ स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने कहा- ‘दूसरा भूपेन हजारिका पैदा नहीं हो सकता।’

मेरा आत्मसंघर्ष : मणिकुंतला भट्टाचार्य

असमिया की चर्चित लेखिका के सृजनात्मक सफर की दास्तां…

कौन जानता है कि आनंद की तुलना में विषाद क्यों गहरा स्थायित्व प्राप्त करता है! खुद नहीं जानती, कब विषादग्रस्तता ने सीने में जगह बना ली थी। दोनों हाथों में शिशु बनकर लटकती फिरी थी शून्यता और निराशा। हजारों लोगों के बीच रहते हुए भी, साधारण जीवन गुजारती हुई भी, चुपके से समाती गई थी एकाकीपन के व्यूह में।
मेरे बंधु, पथ प्रदर्शक पिता ने मेरी हालत को शायद समझ लिया था। अनगिनत किताबें लाकर उन्होंने मेरे लिए ग्रंथशैया बना दी। वहीं सिर रखकर स्वप्न विभोर हुई थी, मेरे भीतर अंतहीन लहरें पैदा होने लगी थीं। आलोडि़त हृदय के साथ मैंने कलम थाम ली थी और 1981 से ही मैं एकाग्र होकर कविताएं लिखने लगी थी। जहां भी भेजती थी, प्रकाशित हो जाती थीं। दिनोंदिन पाठकों की तादाद बढऩे लगी और साथ ही लोग मेरी सराहना भी करने लगे। मगर आश्चर्य की बात थी कि तारीफों की तरफ मैं गौर नहीं कर पा रही थी। मैं ऐसी किसी खास भावना को उजागर करने की कोशिश कर रही थी, जो इस विशाल जगत और महाशून्य के बीच असंतुलन में एक अद़भुत स्थायित्व प्राप्त कर सके। मगर क्या थी वह भावना? गद्य-पद्य या दर्शन का विश्लेषण?
खुद ही रचे गए एकाकीपन के भीतर गुमसुम-सी रहने लगी। दिनोंदिन वह अव्यक्त यंत्रणा इस कदर बढ़ती गई कि कि उसका बोझ उठाते हुए मैं बार-बार कातर होने लगी। असहाय होने लगी। दिन के बाद दिन विषादग्रस्तता में डूबी रहने लगी।
1987 में पिताजी ने मुझे व्यक्तिगत संपत्ति की तरह किसी एक युवक के साथ ब्याह दिया। हां, कन्या संप्रदान के जरिए उन्होंने पिता के दायित्व का पालन किया और एक अचल संपत्ति की तरह, आर्य नारी की परंपरा के अनुसार पिता की छांव छोड़कर स्वामी के पास चली आई।… मानों जीवन ही बदल गया! पिता की बनाई ग्रंथशैया से उत्पन्न हुई भिन्न अनुभूतियों की जगह अब भौतिकवाद खड़ा हो गया था। पता ही नहीं चला कि कुछ भी किए बगैर किस तरह बारह साल गुजर गए। एक युग। आज के युग में किसी नारी की चाही गई हर चीज मुझे मिली, मगर सीने में कायम रही वही प्राचीन विषादग्रस्तता। मानों वह मेरी आजन्म सहचर हो। दोनों हाथों में शिशु बनकर लटक रही शून्यता और निराशा मानों अब मेरे कंधों पर सवार हो गईं! कुछ समझ नहीं पा रही थी। अद़भुत यंत्रणा!
मगर सारे दरवाजे बंद होने पर भी बाहर निकलने का कोई रास्ता निकल ही आता है। अनजाने में ही मैंने एक दिन कलम उठा ली और उस लंबी निस्तब्धता को तोड़ती हुई प्रवाहित हुई एक मायामय कविता। मनुष्य की कविता। यह 1991 के दिसंबर महीने के आखिरी हफ्ते की बात है। उस समय एक लोकप्रिय अखबार को कविता भेजी और वह प्रकाशित भी हो गई। उसके बाद फिर एक… उसके बाद फिर… और एक अन्य कविता। गुजरे हुए खामोश युग में कौन क्या रच रहा है, किधर जा रही है साहित्य की धारा, कुछ खबर नहीं थी मुझे। इस बार कुछ कविताएं पढ़कर ही एक-एक कर कई सराहना करने वाले लोग करीब आते गए। तीव्रता के साथ मैंने अध्ययन शुरू किया। कलम थामते ही स्वत: स्फूर्तता के साथ सिर्फ कविता ही नहीं रची जाती थीं, बल्कि गद्य भी निकलने लगा था।
धीरे-धीरे महसूस हुआ कि लिखते रहने से कई तरह से मेरे सीने का भार हल्का होता जाता है। हां, विषादग्रस्तता की भी जो भाषा होती है, जिसे अब तक बेवजह ढोते रहने के बारे में सोचती रही थी, वही अब विभिन्न रंग, सुर और भंगिमा के साथ मुझे सुख और आराम प्रदान करने में जुट गई थी।… आत्ममग्नता के साथ लिखने में मैं जुट गई। पूजा-अर्चना की तरह, ध्यान की तरह आश्चर्यजनक थी यह निमग्नता। अभिभूत हो उठी। भीतर से समझ गई कि जीवन के जिस महान और श्रेष्ठï चिंतन को व्यक्त करना चाहती हूं, उसके करीब जाने की यह महज सीढ़ी ही है, और कुछ नहीं। इसीलिए लोगों की प्रशंसा या अपने सुखानुभव को लेकर संतुष्ट या गौरवांवित होने की कोई जरूरत नहीं है। मैं कहानी भी लिखने लगी। हर रविवार दो-तीन अखबारों में लगातार कविताएं छप रही थीं, साथ ही कहानियां भी छपने लगीं। कोई भेद-भाव किए बिना या पत्र-पत्रिका के स्तर को अहमियत दिए बिना रचना मांगने आए किसी भी व्यक्ति को मैंने निराश नहीं किया। तेजी से मेरी रचनाएं प्रकाशित होने लगीं। इस तरह कलम रखने की फुरसत मेरे पास नहीं रह गई। याद है कि दो महीने के भीतर मैंने ग्यारह कहानियां लिखीं। इसके साथ ही समानांतर रूप से दो पत्रिकाओं और एक पत्र में स्तंभ लिखने की व्यस्तता भी बनी रही। जो भी लिखती, मन लगाकर लिखती। हृदय खोलकर, प्राण उड़ेलकर लिखती। मगर विषादग्रस्तता? वह मानों कभी साथ नहीं छोड़ेगी। मेरे बिलकुल अपने, सिर पर छतरी की तरह छांव देने वाले पिताजी का देहांत हो गया। मेरे हाथ की मुट़ठी में हाथ रखकर चले गए वे।… तड़पती रही मैं… और निरंतर कलम की व्यस्तता ने मुझे महान अनुभव से सराबोर कर दिया। इन रचनाओं के जरिए ही मानों मैं श्मशान के भस्म के बीच से ले आई हूं पिता को हाथ थामकर…। एक वास्तविक जीवन की समस्त प्राप्ति और समृद्धि के साथ इस अनुभव की कोई तुलना नहीं हो सकती। घटती गई सीने के भीतर जमी हुई यातना… कलम चलती रही।
मैंने जीवन का पहला उपन्यास ‘अरुंधती’ लिखा। क्या यह उपन्यास ही था? खुद ही जानती हूं कि किस तरह खुद को ‘अरुंधती’ के किरदार के साथ उजागर किया है मैंने। उसी समय, 2002 में मेरी पहली पुस्तक ‘प्रस्तर कन्या’ (कथा संकलन) प्रकाशित हुई। एक दैनिक पत्र के साप्ताहिक परिशिष्टï में ‘अरुंधतीÓ के प्रकाशन के साथ ही पाठक समाज में आलोडऩ आ गया। पत्र, फोन के अलावा उपन्यास की नायिका को देखने के लिए लोग मेरे घर आने लगे। नायिका को एक नया जीवन प्रदान करने का प्रस्ताव देने वालों में हाई स्कूल के छात्र भी शामिल थे। फिर वह उपन्यास दैनिक सेंटिनल में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुआ। असमिया पाठकों की तरह हिंदी पाठकों ने भी उपन्यास को अपनाया। फिलहाल इस उपन्यास का अंगे्रजी अनुवाद हो रहा है और इस पर फिल्म बनाने का भी विचार है।
‘अरुंधतीÓ की लोकप्रियता देखकर एक और पत्र के संपादक ने नया उपन्यास लिखने के लिए मुझ पर दबाव डाला। इस तरह एड्स की पृठभूमि में मैंने द्वितीय उपन्यास ‘स्वप्न संभव’ की रचना की। मगर दो अध्याय छापने के बाद प्रकाशन रोक दिया गया। आश्चर्यजनक रूप से इसके पीछे था संपादक की तरफ से मुझे दिया गया अशोभनीय प्रस्ताव। मनुष्य का ऐसा निर्लज्ज रूप देखकर मैं स्तब्ध रह गई। किंकत्र्तव्यविमूढ़ हो गई। क्रोधित होने की जगह उदास हो गई और एक दिन विनम्रता के साथ मैंने अप्रकाशित पांडुलिपि वापस मांग ली। उसी दौरान, 2004 में ‘प्रस्तर कन्या’ को असम का प्रसिद्ध साहित्यिक पुरस्कार ‘मुनीन बरकटकी पुरस्कार’ प्रदान किया गया। इसके साथ ही ‘स्वप्न संभव’ को भी छापने के लिए प्रकाशक तैयार हो गए और वह ‘संध्या’ के नाम से प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास को आकाशवाणी, गुवाहाटी ने भी धारावाहिक रूप से प्रसारित किया। इसके चार संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं और इस पर फिल्म बन रही है।
इसके बाद ठहर जाने का कोई सवाल ही नहीं था। कलम चल रही है। धीरे-धीरे मैं महसूस करने लगी कि कुछ चित्रण करते समय मैं असाधारण रूप से निर्भीक हो उठती हूं, सहज-सरल अथावा सीधे-सीधे लिख देती हूं मानव जीवन की रहस्यमयता के बारे में। एक परिपूर्ण परिवार की एक साधारण गृहिणी होकर भी लिखते समय कैसे इस तरह निर्भीक हो जाती हूं? मेरे अपने लिए यह एक चमत्कारिक अनुभव है। कोई दुविधा-संकोच नहीं, लज्जाबोध नहीं। मातृभाषा के निर्वाचित-उपयुक्त-सौजन्यमूलक शब्दों से वे वर्णन इतने जीवंत हो उठते हैं कि पाठक उनमें अपनी गोपनीयता ढूंढऩे लगते हैं। मैं समझ गई कि कोई भी ऐसे वर्णन को ऊपर-ऊपर से पढ़ नहीं सकता या उसकी अनदेखी नहीं कर सकता। मुक्त रचना और पोर्नोग्राफी के बीच की सीमा रेखा को भी अच्छी तरह पहचानती हूं। इसमें कुछ पाठक नाराज भी हुए हैं। वे मुझे शालीनता का पाठ पढ़ाने लगे और विनम्रता के साथ सिर झुकाए मैं सब कुछ सुनती रही। बहस नहीं करती, असंतुष्ट भी नहीं होती, सिर्फ सुनती रहती हूं। रोकती भी नहीं। मगर उस पाठ को ग्रहण नहीं कर पाती। ग्रहण कर भी नहीं सकती। मैं मनुष्य के बारे में लिखती हूं। मनुष्य में ही प्रकृति, ईश्वर, धर्म और त्रिलोक को ढूंढती हूं। मूलरूप से मनुष्य दो प्रकार के होते हैं- प्रेममय और दुर्बल। मुझे लगता है कि मनुष्य हमेशा प्रेम का आधार रहा है। प्रेम ही सबकुछ नियंत्रित करता है। जिसे व्यभिचार कहते हैं, जिसे हिंसा-द्वेष कहते हैं, वह है दुर्बल को खुद ही दमित न की जाने वाली रिपुजात प्रक्रिया। वैसी दुर्बल श्रेणी को पहले दया और फिर क्षमा का पात्र ही मानती हूं मैं। शायद इसीलिए समालोचक मेरी कहानी में जब विलेन को ढूंढते हैं, वैसे पात्र की कमजोरियों को भी मैं तर्क के साथ प्रस्तुत करती हूं। मैं खुद ही अपने साथ बार-बार बहस करती हूं और सशक्त तर्क के पक्ष में कलम चलाती हूं। किसी का पाठदान नहीं मानती। मानव जीवन के रहस्यमय खंडचित्रों के अंकन की प्रक्रिया से जुड़ती चली गई। बिलकुल स्वत:स्फूर्त रूप से वे सब बातें कलम से प्रवाहित होती हैं। श्मशान से उठकर आए पिता आजकल एक रोशनी बन गए हैं। स्वामी के चेहरे की तरफ देखती हूं, उत्साह और साहस पाती हूं। शायद लोगों की शालीनता की सीख मेरे कान में समा नहीं पाती, उसका वह अहम कारण हो सकते हैं।
मगर दो तरीके से इसके नतीजे सामने आए। एक वर्ग ने मेरी भर्त्‍सना की कि बेबाक लेखन से मैं बाजार में छा जाना चाहती हूं। दूसरी तरफ कुछ अवसर की खोज करने वाले पुरुष सामने आए। जिन्हें मैं ‘दुर्बल मनुष्य’ मानती हूं। बेहिचक वे लोग अपनी इच्छा मेरे सामने व्यक्त करने लगे, मगर सामने तो है पिता की रोशनी और स्वामी की सबल उपस्थिति। इसीलिए उन पुरुषों के आचरण को मैंने लेखन के कच्चे माल के रूप में ग्रहण किया। मेज के करीब बैठकर ही देखती रही आदमी के भीतर के आदमी को। भौतिकवादी जीवन की प्राप्ति के एकाकीपन से टूटे हुए पुरुषों को।… कलम के साथ रिश्ता गहरा होता गया। नहीं लिखने से सीने में जमने लगती है विषादग्रस्तता। सबके साथ ऐसा ही होता है क्या? इसके साथ-साथ एक अदृश्य प्रतिबद्धता भी खींचती रही मुझे। प्रत्येक कहानी के जरिए कोई संदेश देने की कोशिश करती हूं। मेहनत करती हूं। जुटी रहती हूं लगातार… जुटी रहती हूं। 2004 में दूरदर्शन धारावाहिक ‘गेटवे’ की कहानी लिखने का काम मुझे सौंपा गया। तथ्य बटोरने के लिए घूमते समय मेेरे विचारों की चकरी भी घूमने लगी। अपनी प्रेममय पृथ्वी के नेपथ्य में बर्बर घटनाओं ने मुझे अवाक कर दिया। मेरे कोमल कवित्व को मानों इस्पाती पोशाक पहना दी गई। इस तरह लेखन में यथार्थ बढ़ता गया। 2005 में पुस्तकाकार रूप में ‘अरुंधती’ का प्रकाशन हुआ, उसी वर्ष कविता संकलन ‘मणिकुंतलार कविताÓ भी प्रकाशित हुआ। वर्ष 2006 में असम की ग्रामीण पृष्ठभूमि पर ‘बरदोवानी’ नामक उपन्यास प्रकाशित हुआ। वैष्णव संत श्रीमंत शंकरदेव की जन्मभूमि बरदोवा से संबंधित पृष्ठभूमि पर इस उपन्यास को लिखना मेरे लिए एक चुनौती थी। पिता व स्वामी के कर्मजीवन में होते रहे तबादलों के चलते मेरा जीवन नगर केंद्रित रहा है। ग्रामीण परिवेश को महसूस करना आसान काम नहीं था। पाठकों की सराहना से लगता है कि मैं इस कोशिश में सफल हुई हूं। इसके बाद समकालिता विषय पर ‘मुक्ति’ नामक उपन्यास प्रकाशित हुआ। डायन प्रथा को केंद्र में रखकर मैंने ‘शामियाना’ नामक उपन्यास लिखा। इसी दौरान एक बाल उपन्यास ‘शांत पापूहंतर कथारे’ प्रकाशित हुआ। इसके आधार पर दूरदर्शन धारावाहिक का निर्माण हो रहा है।
एक मासिक पत्रिका में धारावाहिक उपन्यास ‘दस्तखत’ लिख रही हूं। असम के मोबाइल थियेटर की पृष्ठïभूमि पर एक उपन्यास ‘मई डेस्डिमोना होषो खोजो’ लिख रही हूं। यह भी प्रकाशित  होनेवाला है। ‘मां, मेकले साहब आस बाढैशाकर पिता’, ‘गेटवे’ उपन्यास भी प्रकाशित होने वाले हैं। एक और उपन्यास तथा एक बाल उपन्यास पर काम भी चल रहा है। संभवत: इसी वर्ष ये भी प्रकाशित हो जाएंगे।… ठिठकी नहीं हूं मैं। अगर बेबाक लेखन से समाज का नुकसान ही कर रही हूं तो क्यों मेरी रचनाओं के आधार पर दूरदर्शन-आकाशवाणी के कार्यक्रम बनाए जाते हैं? क्यों लेखकों की अग्रज पीढ़ी उम्मीद भरी नजरों से मुझे देखती है, जागरूक वर्ग गौर करता है और नए लेखक सराहना करते हैं?
जरूर ये सब संकेत करते हैं पिता द्वारा रोशन की गई राह की तरफ। इसीलिए मैं आगे बढ़ती हूं सांप्रतिक समय से कुछ आगे अधिक परिश्रम के साथ। गहरी एकाग्रता के साथ लिखती हूं मैं, हृदय खोलकर लिखती हूं- ईश्वर के साथ एकाकार होने की प्रार्थना की तरह…। 
                                                                                (अनुवाद : दिनकर कुमार, वरिष्ठ पत्रकार)