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अनवर सुहैल की कवि‍तायें

वरि‍ष्‍ठ कवि‍ और ‘संकेत’ के सम्‍पादक अनवर सुहैल की कवि‍तायें-

वनडे क्रिकेट और बच्चे

पदयात्रियों, मोटर-गाड़ियों से बेपरवाह
बीच सड़क पर
क्रिकेट खेलते बच्चे
डरा नहीं करते
पिता-चाचा या दादा की घुड़कियों से

भुनभुनाएं बुजुर्ग
चिड़चिड़ाएं अध्यापक
तो क्या करें बच्चे
पाकिस्तान के विरुद्ध
खेली गई पारियों को
देखते हैं वे ही लोग
सारा काम छोड़
आँखें फोड़
उत्तेजना के साथ
जैसे सीमा पर चल रहा हो युद्ध…

नहीं सोचते बच्चे
सिगरेट, ठंडा और मदिरा के निर्माता
क्यों बना करते
भारत-पाक क्रिकेट श्रृंखला के प्रायोजक
क्रिकेट सितारों की जादुई प्रसिद्धि से अभिभूत
बच्चों को तो सीखना है
सचिन जैसे ‘स्ट्रोक्स’
या कपिल जैसी आक्रामकता!

क्रिकेट खेलते बच्चे
नहीं बनना चाहते
अध्यापक, गणितज्ञ, वैज्ञानिक, संगीतज्ञ
इंजीनियर, डॉक्टर
और साहित्यकार तो एकदम नहीं
वे रातों-रात
होना चाहते मशहूर
मात्र एक अदद शतकीय पारी
दिला सकती
प्रतिष्ठा, पद, पैसा असीमित

क्रिकेट खेलते बच्चे
जल्द ही सीख जाते
व्यक्तिगत स्कोर का महत्व
जीतने के लिए
चालाकियों की अनिवार्यता
प्रायोजकों, सटोरियों के इच्छानुसार
खेल का प्रदर्शन….

अब्बा

कौन कहता है
वह टूट गए हैं
ज़रा देखिए ध्यान से
बढ़ती उम्र के कारण
वह कुछ झुके ज़रूर हैं
झुकता है जैसे कोई फलदार पेड़
झुकती जैसे फूलों भरी डालियाँ

अब्बा पर्याय हैं
आँगन के उस पीपल का
जो जाने कब से
खड़ा है अकेला
निहारता
सिद्धबाबा पहाड़ी पर बने मन्‍दि‍र को
बदलते मौसम
धूप-छाँह के खेल
दिन-रात की कारीगरी में लिप्त प्रकृति
डिगा नहीं पाई
अब्बा का मन

अवकाश प्राप्ति के बाद भी
अब्बा हैं वही अध्यापक
जिसे समाज को शि‍क्षित करने का
महती-उत्तरदायित्व मिला है
इसीलिए शायद अब भी
वह चाहते सिखाना
अनुभवों के सिलेबस से
व्यवहारिक ज्ञान की वर्णमाला

जने क्यों अक्सर अब्बा
दाहिने हाथ की तर्जनी
हिलाते रहते आजकल
लगता है किसी
पेचीदा सवाल को
मन ही मन करते हैं हल

अक्सर याद करते आजकल अब्बा
वे दिन
जब उनकी बेंत की डर से
पाठशाला नहीं आना चाहते थे छात्र
और मार खाकर जो पढ़ गये
वे सब आगे बढ़ गये।
मिल जाते आज भी
ऐसे विद्यार्थी
झुककर करते प्रणाम
गुरु-दक्षिणा स्वरूप
सादर प्रस्तुत करते पान
चौ़ड़ा हो जाता
अब्बा का सीना
कहते, एक शि‍क्षक
जीवन में यही तो कमाता है।

वो भी एक ज़माना था
जब अब्बा की परछाईं से भी
डरते थे हम
भागते थे कोसों दूर
उनके थप्पड़ खाकर
कई बार मूत दिया करते थे
पेंट में हम
शायद अम्मी भी डरती थीं उनसे
आज हमारे बच्चे
हमारे कपार पे चढ़कर
पूरी करवा लेते अपनी
जायज़-नाजायज़ मांग
तब हम कहाँ सीधे
अब्बा से मांग पाते थे
कुछ भी
अम्मी के ज़रिए पहुँचती थीं बातें तब
अब्बा के पास

मुझे अपने अब्बा पर है गर्व
क्योंकि दोस्तों के बूढ़े बाप
मिलने पर
खा जाते दिमाग
अपने युवा बेटे-बहू की शि‍कायतों का
कच्चा चिट्ठा खोल, कर देते हलकान
बताते कि उनके बच्चे
निकले सब बेईमान…

जबकि नहीं करते अब्बा
किसी राहगीर को परेशान
नहीं सुनाते किसी को
बेटे-बहू की नाफ़रमानियों की
कचड़ा दास्तान

जबकि वे चाहें तो
क्या उनके पास
नहीं हैं उपलब्ध
कई आख्यान…???

शकीला की छठवीं बेटी

‘लेबर-रूम’ के बाहर
खिन्न हैं आयाएं
नर्सें ख़ामोश
आज की ‘बोहनी’ बेकार हुई
‘ओ गॉड, ये ठीक नहीं हुआ!’
शकीला इस बार भी
पुत्र की आस में
नौ माह तक
ढोती रही एक ‘कन्या-भ्रूण’
उसके शौहर ने क्या समझ रखा है
शकीला की कोख को एक प्रयोगशाला
जिसमें प्रतिवर्ष किया जाता प्रयोग
एक ‘चांस’
कि शायद इस बार
कुलदीपक हो उत्पन्न
कि शायद इस बार
मिल जाये ज़िल्लत से छुटकारा
सच ही तो है
कि बेटियों की माँ होना
दुर्भाग्य का पर्याय है

‘जल्दी सफाई का काम पूरा करा!’
सिस्टर थॉमस इसी तरह है चिड़चिड़ाती
जिस दिन कोई ‘कन्या’ संसार में आती
कुछ पूछने पर बिगड़ जाती
‘क्या ज़रूरत है किसी टीका-वीका की
जी जायेगा बच्चा
लड़की जात जो ठहरी।’

शकीला की मनोदशा देख
आयाएं हैं उदास
लगता है
रक्ताल्पता की शि‍कार
पतली-दुबली शकीला
पागल हो जायेगी
लगातार छठवीं बार
प्रसव-पीड़ा सहकर
पुत्र-रत्न से वंचित माँ का दुख
क्या समझ पायेगा कोई कवि!

बगल मे पड़ी
नवजात कन्या रोने लगी
शकीला के ममता नहीं उमड़ती
शकीला उसे दूध नहीं पिलाती
बूढ़ी सास माथे पर हाथ धरे
टिकी बिस्तर के पैताने
हर बार की तरह इस बार भी
जिसकी भविष्यवाणी ग़लत साबित हुई
जबकि तमाम लक्षणों के मुताबिक
बहू ने जनना था पोता
वह नाराज़ है ख़्वाज़ा ग़रीब नवाज़ से भी
जिन्होंने पूरी न की मनौती
शकीला आँखें बंद किये
लेटी चुपचाप मुर्दा सी

तभी आ गई नज़मा
शकीला की बड़ी बेटी
उसने झट उठा लिया गोद में
नवजात कन्या-शि‍शु
लगी पुचकारने उसे
रोती बच्ची उसकी गोद में आकर
लाड़-दुलार पाकर
चुप हुई
जैसे उसने पा लिया हो ‘मुहाफ़िज़’ कोई।

मुसलमान

उससे फिर
नहीं पूछता कोई
तुम किस प्रदेश या जिले के निवासी
जब जान जाते बहुसंख्यक
कि उसका नाम है सुलेमान
वह है एक मुसलमान
इसके अलावा
उसकी नहीं हो सकती
और कोई पहचान
समझ गये श्रीमान!

दुख की उम्र

रसूल हमज़ातो न कहा
दुख की उम्र
होती एक बरस
फिर आदमी भूल जाता
बेहद अपनों को
बीते सपनों को
मुझे लगता
अन्य तमाम चीज़ों के साथ
दुख की औसत आयु भी
हुई है कम
बिछड़ों की याद में
मनाते नहीं अब लोग ग़म
बमुश्‍कि‍ल तमाम
किया जाता याद
ज्यादा से ज्यादा
एक सप्ताह!

ग्रंथालयों में महाकवि

कवि बतियाता है
सिर्फ मित्र-कवि से
चंद कूट संकेतों के ज़रिए
जिस तरह
एक किसान, दूसरे किसान से
एक महिला, दूसरी महिला से
एक चिड़िया, दूसरी चिड़िया से

कवि
किसान के पास नहीं जाता
जबकि किसान चाहता गुनगुनाना
उसके गीत
हल-बैलों की लय-ताल-चाल में।

कवि
जाता नहीं श्रमिक के पास
जबकि श्रमिक चाहता उच्चारना
मशीनों की खटर-पटर में
शब्द-लय पेवस्त करना।

कवि
बैठता आजकल
धन्ना-सेठ प्रकाशकों के संग
आलोचकों-सम्पादकों के चूमता क़दम
सत्ता के गलियारे
बांधे हाथ
खीसें निपोरे
खेलता इक खेल
स्वाभिमान, प्रतिभा और अस्तित्व को
लगा दाँव पर

कवि
जीवित रहना चाहता
ग्रंथालयों की सीलन भरी उबासियों में
इतिहास पुरुष बनने का स्वप्न
हर लेता उसकी उम्र भर का चैनो-सुकून

कवि
अपने भोथरे शब्दों को
तिकड़म से
कराता सिद्ध-प्राणवान
जोड़-तोड़ से
बन जाता
इस सदी का महाकवि!

कहा आपने

कहा आपने
बरखा होगी, फसल उगेगी
भर-भर जायेगा खलिहान

कहा आपने
शासन यह जनता ही का
हँसी-खुशी किया मतदान

कहा आपने
स्वप्न हुये साकार
भूखा-नंगा कोई नहीं
ऊँचा-नीचा कोई नहीं
अगड़ा-पिछड़ा कोई नहीं
सब होठों पर खिला करेगी
मंद-मंद मुस्कान

कहा आपने
माना हमने
आता नहीं समझ में लेकिन
आप हमेशा भरमाते क्यों
मान हमेशा हम जाते क्यों?

बिटिया: नीरज पाल

युवा कवि‍  नीरज पाल की कवि‍ता-

एक गुड़ि‍या के कच्चे रुई के फाहे सी है बिटिया
कभी उछ्लकर कभी बिदककर आटे की चिड़ि‍या है बिटिया
नन्हे पावों की धीमी थाप है बिटिया
सर्दी में गर्म रोटी की भाप है बिटिया
बिटिया पावन गंगाजल है
बिटिया गरीब किसान का हल है
चूड़ि‍यों की खनक, पायलों की झंकार है बिटिया
झरने की मद्दम फुहार है बिटिया
कभी धूप कभी छांव कभी बरसात है बिटिया
गर्मी में पहली बारिश की सौगात है बिटिया
चिड़ि‍यों की चहचाहट कोयल की कूक है बिटिया
हो जिसमे सबका भला वो प्यारा सा झूठ है बिटिया
और किसी मुश्किल खेल में मिलने वाली जीत है बिटिया
दिल को छू जाए वो मधुर गीत है बिटिया
माँ की एक पुकार है बिटिया
मुस्काता एक त्योहार है बिटिया
सच बोलूं तो बिटिया पीड़ा की गहरी घाटी है
क्या किसी ने उसकी पीड़ा रत्ती भर भी बांटी है
अरमानों के काले जंगल उसको रोज जगाते हैं
हम, बिटिया कैसी हो, कह कर चुपचाप सो जाते हैं
हर दुःख को हंसते हंसते बिन बोले सह लेती है
पूरे घर में खुशी बिखेरे बिटिया दुःख में रह लेती है।

मां का मौन : विवेक भटनागर

युवा कवि और गजलकार विवेक भटनागर को इस कविता के लिए 1995 में हिंदी अकादमी दिल्ली ने पुरस्कृत किया था-

लीप दिया है चूल्हा अम्मा मिट्टी वाला
मांज दिया है तवा, हुआ था बेहद काला
फिर भी कहती मत जा बाहर लुक्का-छिप्पी खेल खेलने…।

बड़े सबेरे उठकर मैंने
सारे घर के कपड़े फींचे
न्हिला-धुला कर लछमिनिया को,
उलझे बाल जतन से खींचे
भूखी गइयों की नांदों में
खली डाल कर सानी की है
हुई मांजकर बरतन काली
दी हुई अंगूठी नानी की है,
लगा दिया है बटन सुई से
संजू के नेकर में काला….।
लीप दिया है चूल्हा अम्मा मिट्टी वाला….।

जब बाहर जाती तो कहती
बेटी तू मत बाहर खेल,
तू लड़की है, कामकाज कर
लड़कों के संग कैसा मेल
क्या लड़कों के साथ खेलना
कोई पाप हुआ करता है?
लड़की का क्या कद बढ़ जाना
अम्मा पाप हुआ करता है?
फिर तो अम्मा चारदिवारी
लगती है मकड़ी का जाला…।
लीप दिया है चूल्हा अम्मा मिट्टी वाला…।

लेकर कलम-बुदिक्का मैंने
पाटी में था लिखा ककहरा
पाठ याद किए थे सारे
था जीवन में उन्हें उतारा…।
पांच पास करते ही तुमने
मुझे मदरसा छुटा दिया है
घर-गृहस्थी में क्यों अम्मा,
मुझको उलझा अभी दिया है
जो कुछ पढ़ा, अभी तक उसका
इन कामों में पड़ा न पाला….।
लीप दिया है चूल्हा अम्मा मिट्टी वाला…।

हाथों को पीला करने में
इतना चिंतित क्यों रहती हो?
दहेज जुटाने की चिंता में
सारी रात जगा करती हो…।
याद करो, सन्नो दीदी को
सास-ससुर ने जला दिया था
क्या अम्मा, यह भी होता है
कोई रस्म-रिवाज यहां का…।
तुम फिर कैसे जी पाओगी
लाड़-प्यार से तुमने पाला…।

लीप दिया है चूल्हा अम्मा मिट्टी वाला
मांज दिया है तवा, हुआ था बेहद काला
फिर भी कहती मत जा बाहर लुक्का-छिप्पी खेल खेलने…।