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देवेन्द्र कुमार की कुछ बाल कविताएं

19 अक्टूबर, 1940 को दिल्लीं में जन्में  कवि देवेन्द्र कुमार 27 वर्षों  तक प्रतिष्ठित बाल पत्रिका ‘नंदन’ के  साथ जुड़े रहे। बाल कहानियों और कविताओं की कई पुस्‍तकें प्रकाशित। उनकी कुछ बाल कविताएं-

आइसक्रीम

आइसक्रीम-आइसक्रीम
ठंडम-ठंडम आइसक्रीम

धत तेरी गरमी तो देखो
पिघल गई लो आइसक्रीम

अब क्या  होगा कैसे होगा
पिघल गई लो आइसक्रीम

बर्फ मंगाओ इसे जमाओ
जम जाए तो मिलकर खाओ

मेरी मानो तो कहता हूँ
झटपट खाओ, खाते जाओ

जैसी भी है, अच्छी ही है
आइसक्रीम-आइसक्रीम

ठंडम-ठंडम आइसक्रीम
पिघलम-पिघलम आइसक्रीम।

फूल महकते हैं

पापाजी जब हँसते हैं
मम्मी खुश हो जाती हैं
मौसम रंग बदलता है

दोनों मुझे बुलाते हैं
ढेरों प्यार जताते हैं
जो मांगो मिलता है

मम्मीं सुंदर दिखती हैं
पापा अच्छे लगते हैं
घर में फूल महकते हैं।

हँसने का स्कूल

पहले सीखो खिल-खिल खिलना
बढ़कर गले सभी से मिलना
सारे यहीं खिलेंगे फूल
यह है हँसने का स्कूल

जल्दी  आकर नाम लिखाओ
पहले हँसकर जरा दिखाओ
बच्चे जाते रोना भूल
यह है हँसने का स्कूल

झगड़ा-झंझट और उदासी
इसको तो हम देंगे फांसी
हँसी-खुशी से झूलम झूल
यह है हँसने का स्कूल।

चूहा किताबें पढ़ता है

पढ़ते-पढ़ते खाता है
जाने किसे सुनाता है
हर पुस्तक पर चढ़ता है
चूहा किताबें पढ़ता है

अभी भगाया झट फिर आया
इसने शब्दकोश है खाया
ज्ञान इसी से बढ़ता है
चूहा किताबें पढ़ता है

बार-बार पिंजरा लगवाया
फिर भी चुंगल में न आया
मेरा पारा चढ़ता है
चूहा किताबें पढ़ता है।

दादी का मौसम

गरमी को पानी से धोएं
बारिश को हम खूब सुखाएं
जाडे़ को फिर सेंक धूप
में दादी को हम रोज खिलाएं

कैसा भी मौसम आ जाए
उनको सदा शिकायत रहती
इससे तो अच्छा यह होगा
उनका मौसम नया बनाएं

कम दिखता है, दांत नहीं हैं
पैरों से भी नहीं चल पातीं
बैठी-बैठी कहती रहतीं
ना जाने कब राम उठाए

शुभ-शुभ बोलो प्यारी दादी
दर्द भूलकर हँस दो थोड़ा
आंख मूंदकर लेटो अब तुम
बच्चे मीठी लोरी गाएं।

गड़बड़झाला

आसमान को हरा बना दें
धरती नीली पेड़ बैंगनी
गाड़ी नीचे ऊपर लाला
फिर क्या होगा- गड़बड़झाला

दादा मांगें दांत हमारे
रखगुल्ले हों खूब करारे
चाबी अंदर बाहर ताला
फिर क्या होगा- गड़बड़झाला

दूध गिरे बादल से भाई
तालाबों में पड़ी मलाई
मक्खी बुनती मकड़ी जाला
फिर क्या‍ होगा- गड़बड़झाला।

मीठी अम्मा

ताक धिना धिन
ताल मिलाओ
हँसते जाओ
गोरे गोरे
थाल कटोरे
लो चमकाओ

चकला बेलन
मिलकर बेलें
फूल फुलकिया
अम्मा मेरी
खूब फुलाओ

भैया आओ
मीठी-मीठी
अम्मा को भी
पास बुलाओ
प्यारी अम्मा
सबने खाया
अब तो खाओ।

सड़कों की महारानी

सुनो कहानी रानी की
सड़कों की महारानी की

झाड़ू लेकर आती है
कूड़ा मार भगाती है
सड़कें चम चम हो जाएं
वह प्यारी है नानी की

धूल पुती है गालों पर
जाले उलझे बालों पर
फिर भी हँसती रहती है
बात बड़ी हैरानी की

आओ उसके दोस्त बनें
अच्छी-अच्छी बात सुनें
बस कूड़ा ने फैलाएं
शर्त यही महारानी की।

दिल्ली के रिक्शा वाले

ये बंगाल बिहार उड़ीसा
उधर हिमाचल मध्य प्रदेश
दूर-दूर से चलकर आए
ये दिल्ली के रिक्शावाले

पहियों के संग पहिए बनकर
सारा दिन हैं पैर घुमाते
मेहनत पीते, मेहनत खाते
ये दिल्ली के रिक्शा वाले

सर्दी में भी बहे पसीना
कैसा मुश्किल जीवन जीना
सच्चे अच्छे परदेसी हैं
ये दिल्ली के रिक्शावाले

मुनिया, बाबा, अम्मा, भैया
सबको भूल चले आए हैं
न जाने कब वापस जाएं
ये दिल्ली  के रिक्शा वाले।

होली के रंग कवि‍ताओं के संग


रंगों के त्‍यौहार होली पर भवानी प्रसाद मिश्र, कन्हैया लाल मत्त, घमंडी लाल अग्रवाल, प्रकाश मनु, योगेन्द्र दत्त शर्मा, गोपीचंद श्रीनागर, नागेश पाण्डेय ’संजय’, देवेन्द्र कुमार और रमेश तैलंग की कवि‍ताएं-

फागुन की खुशियाँ मनाएं : भवानी प्रसाद मिश्र

चलो, फागुन की खुशियाँ मनाएं!
आज पीले हैं सरसों के खेत, लो;
आज किरणें हैं कंचन समेट, लो;
आज कोयल बहन हो गई बावली
उसकी कुहू में अपनी लड़ी गीत की हम मिलाएं।
आज अपनी तरह फूल हंसकर जगे,
आज आमों में भोंरों के गुच्छे लगे,
आज भोरों के दल हो गए बावले
उनकी गुनगुन में अपनी लड़ी गीत की हम मिलाएं।
आज नाची किरण, आज डोली हवा!
आज फूलों के कानों में बोली हवा
उसका सन्देश फूलों से पूछें, चलो
और कुहू करें गुनगुनाएं।
चलो, फागुन की खुशियाँ मनाएं

रंगों का धूम-धड़क्का : प्रकाश मनु

फिर रंगों का धूम-धड़क्का, होली आई रे,
बोलीं काकी, बोले कक्का—होली आई रे!
मौसम की यह मस्त ठिठोली, होली आई रे,
निकल पड़ी बच्चों की टोली, होली आई रे!
लाल, हरे गुब्बारों जैसी शक्लें तो देखो—
लंगूरों ने धूम मचाई, होली आई रे!
मस्ती से हम झूम रहे हैं, होली आई रे,
गली-गली में घूम रहे हैं, होली आई रे!
छूट न जाए कोई भाई, होली आई रे,
कह दो सबसे—होली आई, होली आई रे!
मत बैठो जी, घर के अंदर, होली आई रे,
रंग-अबीर उड़ाओ भर-भर, होली आई रे!
जी भरकर गुलाल बरसाओ, होली आई रे,
इंद्रधनुष भू पर लहराओ, होली आई रे!!
फिर गुझियों पर डालो डाका, होली आई रे,
हँसतीं काकी, हँसते काका—होली आई रे!

हाथी दादा की होली: प्रकाश मनु

जंगल में भी मस्ती लाया
होली का त्योहार,
हाथी दादा लेकर आए
थोड़ा रंग उधार।
रंग घोल पानी में बोले—
वाह, हुई यह बात,
पिचकारी की जगह सूँड़ तो
अपनी है सौगात!
भरी बालटी लिए झूमते
जंगल आए घूम,
जिस-जिस पर बौछार पड़ी
वह उठा खुशी में झूम!
झूम-झूमकर सबने ऐसे
प्यारे गाने गाए,
दादा बोले—ऐसी होली
तो हर दिन ही आए!

जमा रंग का मेला : कन्हैया लाल मत्त

जंगल का कानून तोड़कर जमा रंग का मेला!
भंग चढ़ा कर लगा झूमने बब्‍बर शेर अलबेला!
गीदड़ जी ने टाक लगाकर एक कुमकुमा मारा!
हाथी जी ने पिचकारी से छोड़ दिया फब्बारा!
गदर्भ जी ने ग़ज़ल सुनाई कौवे ने कब्बाली!
ढपली लेकर भालो नाचा, बजी जोर की ताली!
खेला फाग लोमड़ी जी ने, भर गुलाल की झोली!
मस्तों की महफ़िल दो दिन तक, रही मनाती होली!

होली का त्यौहार : घमंडी लाल अग्रवाल

आया हँसता रंग-रंगीला होली का त्यौहार!
रंग-बिरंगी पोशाकें अब मुखड़े बे-पहचान,
भरा हुआ उन्माद हृदय में अधरों पर मुस्कान,
मस्त महीना फागुन वाला लुटा रहा है प्यार!
डफली ने धुन छेड़ी प्यारी, भरें कुलांचें ढोल,
मायूसी का हुआ आज तो सचमुच बिस्तर गोल,
भेदभाव का नाम मिटा दें, महक उठे संसार!
आया हँसता रंग-रंगीला होली का त्यौहार!

सतरंगी बौछारें लेकर : योगेन्द्र दत्त शर्मा

सतरंगी बौछारें लेकर
इन्द्रधनुष की धरें लेकर
मस्ती की हमजोली आई,
रंग जमाती होली आई!
पिचकारी हो या गुब्बारा,
सबसे छूट रहा फुब्बारा,
आसमान में चित्र खींचती
कैसी आज रंगोली आई!
टेसू और गुलाब लगाये,
मस्त-मलंगों के दल आये
नई तरंगों पर लहराती,
उनके संग ठिठोली आई!
रंग जमाती होली आई!

होली के दो शिशुगीत : गोपीचंद श्रीनागर

कोयल ने गाया
गाया रे गाना!
होली में भैया
भाभी संग आना!
……………
मैना ने छेड़ी
छेड़ी शहनाई!
होली भी खेली
खिलाई मिठाई!

जब आएगी होली : नागेश पाण्डेय ’संजय’

नन्ही-मुन्नी तिन्नी बिटिया,
दादीजी से बोली-
“खूब रंग खेलूंगी जमकर,
जब आएगी होली!
मम्मी जी से गुझिया लूंगी,
खाऊंगी मैं दादी!
उसमें से तुमको भी दूँगी,
मैं आधी की आधी!”

होली के  दिन: देवेन्द्र कुमार

होली के दिन बेरंग पानी
ना भाई ना!
जंगल घिस कर हरा निकालें
आसमान का नीला डालें
धूसर, पीला और मटमैला
धरती का हर रंग मिला लें
अब गन्दा पानी नहलाएं
फिर होगी सतरंगी होली!
हाँ भाई हाँ!
काली, पीली, भर भर डाली
मिर्च सभी ने मन भर खाली
मुंह जलता है पानी गायब
मां, अब सब कुछ शरबत कर दे
मटके सारे नदियाँ भर दे
जो आये मीठा हो जाए
तब होगी खटमिट्ठी  होली!
हाँ भाई हाँ!

होली का गीत : रमेश तैलंग

मुखडे़ ने रँगे हों तो
होली कि‍स काम की ?
रंगों के बि‍ना है, भैया !
होली बस नाम की।
चाहे हो अबीर भैया,
चाहे वो गुलाल हो,
मजा है तभी जब भैया,
मुखड़ा ये लाल हो,
बंदरों के बि‍ना कैसी
जय सि‍या-राम की ?
रंग चढ़े टेसू का या
कि‍सी और फूल का,
माथे लगे टीका लेकि‍न
गलि‍यों की धूल का,
धूल के बि‍ना ना मने
होली घनश्‍याम की।

दामोदर अग्रवाल की कुछ प्रसिद्ध बाल कविताएँ

प्रसिद्ध कवि‍ दामोदर अग्रवाल (4 जनवरी, 1932, वाराणसी, उत्तर प्रदेश – 1 जनवरी, 2009, बंगलौर) का हिंदी बाल कविता की समृद्धि‍ में महत्ववपूर्ण योगदान है। उन‍की बालकोचि‍त भाव-मुद्राओं में लि‍खीं बाल कवि‍ताएं बेहद मनमोहक हैं-

कोई लाके मुझे दे

कुछ रंग भरे फूल
कुछ खट्ठे-मीठे फल,
थोड़ी बाँसुरी की धुन
थोड़ा जमुना का जल—
कोई लाके मुझे दे!
एक सोना जड़ा दिन
एक रूपों भरी रात,
एक फूलों भरा गीत
एक गीतों भरी बात—
कोई लाके मुझे दे!
एक छाता छाँव का
एक धूप की घड़ी,
एक बादलों का कोट
एक दूब की छड़ी—
कोई लाके मुझे दे!
एक छुट्टी वाला दिन
एक अच्छी सी किताब,
एक मीठा सा सवाल
एक नन्हा सा जवाब—
कोई लाके मुझे दे!

बस्ते में गुलमोहर

जाने कौन रख गया मेरे
बस्ते में गुलमोहर?
छुट्टी का जो घंटा बोला
मैंने अपना बस्ता खोला,
मह-मह, मह-मह महक रहा
बस्ते में गुलमोहर!
गुलमोहर अंदर से झाँका
लगा मुझे वह इतना बाँका,
जी चाहा, मैं भी बन जाऊँ
बस्ते में गुलमोहर!
गुलमोहर जो चिडिय़ा होते
चाहे वो नीड़ों में सोते,
पर वे दाना खाने आते
बस्ते में गुलमोहर!
सब संगी, सब साथी आओ
अपने-अपने बस्ते लाओ
ले जाओ सब भर-भर अपने
बस्ते में गुलमोहर!

गागरी में क्या है?

मेघ राजा, मेघ राजा, गागरी में क्या है?
गागरी में बिजुरिया, गागरी में पानी,
गागरी में हरियाली, खेल धानी-धानी।
गागरी में सात रंग, इंद्र की सभा है
मेघ राजा, मेघ राजा, गागरी में क्या है?
गागरी में कुहु-कुहु, गागरी में कोयल
गागरी में छमा-छम मोरनी की पायल।
गागरी में मिसरी का घुला ज्यों डला है,
मेघ राजा, मेघ राजा, गागरी में क्या है?
गागरी में मेघ राग, गागरी में मलहार,
गागरी में चंपा-जूही फूलों की भरमार।
मेघों की गागरी में क्या नहीं भरा है?
मेघ राजा, मेघ राजा, गागरी में क्या है।

जादू की एक गठरी

जादू की एक गठरी लाऊँ
बच्चों में बच्चा बन जाऊँ!
एक जेब से शेर निकालूँ
एक जेब से भालू,
शेर बहुत भोला-भाला हो
भालू हो झगड़ालू।
दोनों को झटपट खा जाऊँ,
जादू की जो गठरी लाऊँ।
चूहा एक निकल गठरी से
हाथी को दौड़ाए,
हाथी डर से थर-थर काँपे
बिल में जा छुप जाए।
चूहे का फोटो छपवाऊँ,
जादू की जो गठरी लाऊँ।
एक जेब से पिज्जा निकले
एक जेब से डोसा,
परियाँ पिज्जा खाएँ, तोता
माँगे गरम समोसा।

टीचर जी

टीचर जी, ओ टीचर जी
गिनती खूब सिखाओ जी,
लेकिन पहले बल्बों में
बिजली तो ले आओ जी!
सूरज जी, ओ सूरज जी
कभी देर से आओ जी,
रोज पहुँचकर, सुबह सुबह
यों ना मुझे जगाओ जी!
छुट्टी जी, ओ छुट्टी जी
लो यह टॉफी खाओ जी,
बस, इतनी सी विनती है
जल्दी-जल्दी आओ जी।
पापा जी, ओ पापा जी
बहुत न रोब जमाओ जी,
दूध कटोरी में पीकर
चम्मच से खिलाओ जी।

एक था तोता

एक था तोता, एक था तीतर,
टाँय टूँ, टाँय टूँ दोनों आए भीतर।
टाँय टूँ, टाँय टूँ दे दो एक दाना,
मैंने कहा, पहले सुनाओ एक गाना।
टाँय टूँ, टाँय टूँ दोनों लगे गाने,
गाने क्या लगे, मेरे कान लगे खाने।
दाने कुछ फेंक दिए मैंने उनके आगे,
टाँय टूँ, टाँय टूँ करते हुए भागे।