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दो बाल कवि‍ताएं : कंचन पाठक

कंचन पाठक

कानून, प्राणिविज्ञान और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत से स्नातकोत्तर कंचन पाठक की रचनाएं सभी प्रमुख पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त हो चुकी हैं।

प्‍यारा भोलाभाला बचपन

उम्र यही है जब हम सबको
देखरेख और प्यार चाहिए,
निश्छल निर्मल भोले मन को
सबका स्नेह दुलार चाहिए,
दुनिया की विकृति से अछूता
प्यारा भोला-भाला बचपन।
निपट अबोध पुष्प सा पावन
होता बड़ा निराला बचपन।।
बचपन तो कच्ची मिट्टी है
हर साँचे में ढल सकता है
तपकर जब कुंदन होगा तब
काँटों पर भी चल सकता है
शुभ मंगलमय संस्कार भी,
इन्हें चाहिए नेह प्यार भी
कल उन्नति पथ पर गतिमय हो
ऐसे दर्शन सद्विचार भी
मिल जाए यह सब तब बन जाए
अमृतमधु प्याला बचपन।
निपट अबोध पुष्प-सा पावन
होता बड़ा निराला बचपन।।

नन्हें नव-पादप को जैसे
उचित खाद-पानी मिल जाए,
बने सुपुष्ट तरु तब उस पर
कितने विहग ठिकाने पाए,
पर्ण सघन छाया में रुक कर
कितने पथिक सुकूँ हैं पाते,
फल फूलों से लदकर तरुवर
पर उपकार की कथा सुनाते,
कल का कीर्ति स्तंभ बनेगा
राष्ट्र भविष्य उजाला बचपन।
निपट अबोध पुष्प-सा पावन
होता बड़ा निराला बचपन।।

शुभ चैतन्‍य सि‍तारे बच्‍चे

बड़े खिलंदड़ बड़े साहसी होते हैं ये प्यारे बच्चे
छल बल से अनजान अपरिचित दुनियाभर के सारे बच्चे

नहीं कभी थकते ऊर्जा की बहती इनमें ऐसी धारा
घर संसार इन्हीं से रोशन, रोशन इनसे ही जग सारा
इनकी नन्हीं बदमाशी में होती कितनी मासूमी है
गीली मिट्टी का सा दिल है संस्कारों की नम भूमि है
हर बच्चे के अन्दर होती है कोई न कोई क्षमता
वैमनश्य से दूर रहें बस चाहें थोड़ी माँ की ममता
ख़ुशी-ख़ुशी हर बात मानते शुभ चैतन्य सितारे बच्चे
छल बल से अनजान अपरिचित दुनियाभर के सारे बच्चे।।

इनके मन में प्रश्न हजारों दिवा रैन चलते रहते हैं
एक साथ पलकों में सौ-सौ मधुर स्वप्न पलते रहते हैं
क्यों कोयल कु-कु करती है बुलबुल दिन भर किसे बुलाती
रात-रात भर चाँद की बूढी़ माई किसको लिखती पाती
अपनी उजली हँसी से भर देते मन में उजियारे बच्चे
छल बल से अनजान अपरिचित दुनियाभर के सारे बच्चे।।

बच्चों को कहानियाँ क्यों सुनाएँ : संजीव ठाकुर

कि‍स्‍से-कहानि‍यों के माध्‍यम से बच्‍चों को वि‍ज्ञान की बातें बताते देवेंद्र मेवाड़ी।

एक समय ऐसा था, जब सभी व्यावसायिक पत्र-पत्रिकाओं में बच्चों के लिए नियमित पृष्ठ हुआ करते थे और उनमें कविताएं, कहानियां नियमित रूप से छपा करती थीं,  लेकिन जब बाजार के राक्षसी कदम पत्र-पत्रिकाओं की ओर बढ़ने लगे, तब उन कदमों ने सबसे पहले साहित्य के पन्नों को रौंदा और उसके बाद बच्चों के पन्नों को। बाजार के कदमताल के कुछ वर्षों बाद समीक्षा के रूप में साहित्य की थोड़ी-बहुत वापसी हुई भी लेकिन बच्चों के पृष्ठ न जाने किस गुफा में कैद कर दिए गए? कुछ अखबारों में बच्चों के पेज शुरू भी हुए तो उनका हाल यह रहा कि विज्ञापनों से बचे-खुचे किसी कोने में कोई बाल-कविता लग गई या हँसी की फुलझड़ियां छोड़ दी गईं। कुछ पारंपरिक अखबारों ने बच्चों के लिए कोई कोना जारी रखा भी तो वहां दृष्टिविहीन कथा-कविताओं की भरमार दिखाई पड़ती रही। कुछ मंझोले अखबारों ने बच्चों के लिए धूम-धाम से पृष्ठ भी निकाले तो वहां कहानियों के लिए कोई जगह नहीं थी। वहां था- रास्ता ढूंढ़़ो पहेलियां बूझो, गलतियां खोजो, वर्ग-पहली, पर्यावरण, क्विज कम्प्यूटर, खाना-पीना, सुडोकी निन्टेंडो, एस.एम.एस.! बच्चों के मनोरंजन करने और उन्हें सिखाने के अथाह सामान! नहीं थी तो बस कविता, कहानी। क्योंकि आधुनिक ‘बाल-गुरुओं’ को लगता है कि कविताएं एवं कहानियां महज अखबारों के पृष्ठ घेरने का काम करती हैं, बच्चों को तमाम तरह के ज्ञान से वंचित करने वाली होती हैं। दरअसल ऐसे संपादकों, उपसंपादकों को इस बात का पता ही नहीं होता कि कविताओं और कहानियों की बाल-शिक्षण में क्या भूमिका होती है? क्या वे यह भी नहीं जानते कि सीधे-सीधे उपदेश देने की बजाय बच्चों को कहानियां के जरिए कुछ सिखाना ज्यादा आसान होता है? क्या बच्चों का पृष्ठ देखने वाले उप-संपादकों को बच्चों के बारे में कोई जानकारी होती है? क्या उन्होंने बाल-शिक्षण से जुड़े टॉलस्टाय, वसीली सुखोम्लीन्स्की, ए.एस.नील., जॉन होल्ट, महात्मा गांधी, गिजुभाई, रवीन्द्रनाथ आदि के विचार पढ़ रखे हैं? क्या उन्हें इस बात का अनुभव है कि 21वीं सदी की गतिमय जिन्दगी में भी बच्चों को कहानियां सुनना-पढ़ना कितना अच्छा लगता है? राजा, रानी, परी, राक्षस, बौने, पशु-पक्षी आदि के माध्यम से कही गई कहानियां किस तरह बच्चों को कल्पना की दुनिया में ले जाती हैं और उन्हें कल्पनाशील बनाती हैं, इस बात की जानकारी उन्हें है? नहीं, वे तो बच्चों को कल्पना की दुनिया से बाहर लाकर कम्प्यूटर की दुनिया में लाना चाहते हैं। परियों की दुनिया से बाहर लाकर सुडोकी खिलवाना चाहते हैं, पशु-पक्षियों से बातें करने की बजाय मोबाइल से जोड़ना चाहते हैं।

पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों ने क्या गिजुभाई की लिखी किताब ‘दिवा स्वप्‍न’ पढ़ रखी है? ‘दिवा स्पप्‍न’ के शिक्षक लक्ष्मीशंकर की शिक्षा से कितने लोग इत्तेफाक रखते हैं? पढ़ाने के बदले कक्षा में कहानियां सुनाने वाले लक्ष्मीशंकर क्या पागल थे? कहानियों के द्वारा ‘भाषा पर काबू’, ‘वार्ता-कथन’ ‘रुचि का विकास’, ‘स्मृति-विकास’, ‘अभिनय’ आदि की शिक्षा देने वाले लक्ष्मीशंकर पागल कैसे हो सकते हैं?

कितनों को पता है कि विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार लेव तोलस्तोय किसानों  के  लिए स्कूल चलाते थे और शिक्षा के लिए पारंपरिक तरीके नहीं अपनाते थे? बच्चों के लिए उन्होंने ‘लेव तोलस्तोय का ककहरा’ और ‘काउंट तोलस्तोय का नया ककहरा’ जैसी किताबें लिखी थीं, जिनमें छोटी-छोटी कहानियों के जरिए बड़ी-बड़ी बातें सिखलाने की क्षमता थी। समुद्र से पानी कहां जाता है? हाथी मनुष्य का गुलाम कैसे बना? शेखी बघारना क्यों गलत है? पढ़-लिखकर अपनी मातृभाषा भूल जाना कितना गलत है? सोने वाला चीजों को कैसे खो देता है? इस तरह की अनेक गंभीर बातों को सिखलाने के लिए तोलस्तोय ने जो माध्यम चुना, वह कहानियों का ही माध्यम था।

रूस के ही शिक्षाविद् वसीली सुखोम्लीन्स्की मानते थे कि ‘कथा कहानियां, खेल, कल्पना- यह बाल चिंतन का, उदात्त भावनाओं और आकांक्षाओं का जीवनदायी स्रोत है।’ वसीली का तो यह भी मानना था कि ‘‘कथा कहानियों में भलाई और बुराई, सच्चाई और झूठ, ईमानदारी और बेईमानी के जो नैतिक विचार निहित होते हैं, उन्हें इंसान केवल तभी आत्मसात करता है, जबकि ये कथा-कहानियां बचपन में पढ़ी गई हों।’’

यानी कहानियां सुन-पढ़कर बच्चे जीवन के कई मूल्यों को अनायास सीखते-चलते हैं। ‘सदा सच बोलना चाहिए’, ‘ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है’, ‘बड़ों का सदा आदर करना चाहिए’, ‘दूसरों की मदद करनी चाहिए’ आदि मूल्य रटाकर हम बच्चों को सही रास्ते पर नहीं ला सकते, लेकिन जब कोई बच्चा किसी कहानी में सुनता है कि किसी परेशान चींटी की सहायता उसके मित्रों ने किस तरह की तो उसके मन में मदद करने का भाव खुद पैदा हो जाता है।  इसी तरह बच्चा अगर सुनता है कि दुष्ट कौए का अंत कैसे हुआ तो वह खुद सीख जाता है कि दुष्टता बुरी चीज़ है। इस समय के प्रसिद्ध शिक्षाविद् कृष्ण कुमार की सुनें तो, ‘‘बहुत गंभीर विपदाओं के कल्पनाशील और न्यायसंगत हल इन कहानियों की संरचना में गुंथे होते हैं। मनुष्य की सामाजिकता और प्रकृति की चुनौती इन कहानियों की अंतर्धारा होती है।’’

यह ठीक है कि समय बदल गया है और आज के बच्चे कम्प्यूटर, मोबाइल, हवाईजहाज के युग में जी रहे हैं। इस लिहाज से उन्हें नई से नई बातें बताई जानी चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं होना चाहिए कि हम बच्चों को बैलगाड़ी, चापाकल या पोस्टकार्ड के बारे में नहीं बताएं? मॉल या मल्टीप्लेक्स के जमाने में हाट, मेले और मैदान में दिखाए जाने वाले सिनेमा के बारे में न बताएं? उसी तरह क्विज, सुडोकी और एस.एम.एस. के जमाने में कविताओं और कहानियों की बात न करें? कृष्ण कुमार के शब्दों में सच तो यह है कि ‘‘परिवार और समाज की नई परिस्थितियों में बच्चों को कहानी सुनाने की उतनी ही जरूरत है जितनी पहले थी।’’ बल्कि आज कहानियों की कुछ अधिक ही आवश्यकता है। अपने बच्चों को टी.वी. से अलग रखने के लिए भी कहानियों की आवश्यकता है। रंग-बिरंगी कहानियों की किताबें बच्चे को थोड़ी देर के लिए टी.वी. से अलग कर कहानियों की दुनियों में तो ले ही जा सकती हैं?

कुछ विज्ञान संपादक जो कृपापूर्वक बाल कहानी किसी कोने में छाप देते हैं,  नई तरह की कहानियों की मांग करते हैं। यानी ऐसी कहानियां जिनसे बच्चों को कम्प्यूटर, मोबाइल, ई-मेल, नेट आदि की शिक्षा दी जा सके। ‘राजा-रानी’ परियों वाली कहानियां से उन्हें सख्त़ परहेज होता है। उन्हें क्या रूसी शिक्षाविद् और बाल-साहित्यकार कोर्नेइ चुकोव्सकी के बारे में पता है, जो परीकथाओं और लोककथाओं के कटृर समर्थक थे? जिन्होंने कोर्नेइ का नाम नहीं भी सुना है, वे अपने घर में ही एक प्रयोग करके देख लें। अपने बच्चे को कोई परीकथा या लोककथा सुनाएं, फिर कोई आधुनिक कहानी और बच्चे से पूछें कि उन्हें कौन सी कहानी अच्छी लगी? यही नहीं, इस तरह का एक सर्वे ही कर लें तो सच्चाई का पता चल जाएगा।

वैसे दोष चंद संपादकों या उपसंपादकों का ही नहीं है। हमारा समाज जिस रफ्तार में आगे बढ़ रहा है, उस रफ्तार में बच्चों को सिखाने और हर जगह अव्वल बनाने की होड़ सी चल पड़ी है। यही वजह है कि बच्चों को गणित में पारंगत बनाने के लिए उन्हें ‘एबैकस’ की कक्षाओं में भेजा जा रहा है। कहानियों या कविताओं के द्वारा कुछ सिखाने का न तो माता-पिता के पास समय है, न धैर्य। फिर अखबार वालों के पास धैर्य कहां से आएगा? वहाँ तो और भी तेजी से धरती घूम रही है।

समय अभी भी है। अभिनेता-अभिनेत्रियों की रंग-बिरंगी तस्वीरों, उनके रोज-रोज बदलते प्रेमी-प्रेमियों और आने-जाने वाली फिल्मों से अटे रहने वाले अखबारों में थोड़ा ‘स्पेस’ निकाला जा सकता है और बच्चों के लिए नई-पुरानी हर तरह की कहानियों और कविताओं को छापा जा सकता है। अपने लिए ‘स्पेस’ देखकर तब बच्चे भी अखबारों से जुड़ सकते हैं।

प्रेमचंद और बच्चे

प्रेमचंद की कहानि‍यों पर आधारि‍त बच्चों के बनाए चित्र

प्रेमचंद की कहानि‍यों पर आधारि‍त बच्चों के बनाए चित्र

प्रेमचंद जयंती के अवसर पर जगह-जगह कार्यक्रम हुए और उनमें आम लोगों खासकर बच्‍चों की जो भागेदारी रही, वह सुखद संकेत है। जरूरत इसी बात की है कि‍ हम अपने लेखकों, कलाकारों, वैज्ञानि‍कों, चिंतकों और अन्‍य महापुरुषों के माध्‍यम से लोगों से जुड़ें। अगर हम ऐसा कर पाए, तो तब का समाज, आज से बेहतर ही होगा।

प्रेमचंद जयंती के अवसर पर आयोजि‍त दो कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर लेखक मंच प्रकाशन को भी मि‍ला। 31 जुलाई को वसुंधरा, गाजि‍याबाद स्थि‍त जनसत्ता अपार्टमेंट में जन संस्कृति मंच की ओर से मशाल-ए-प्रेमचंद का आयोजन किया गया। इसमें प्रेमचंद के साहि‍त्‍य और जीवन पर वि‍शेष प्रस्‍तुति‍ हुई। इसके साथ ही प्रेमचंद के सपनों का भारत विषय पर परिचर्चा हुई, प्रेमचंद की कथा पर एक नाट्य प्रस्तुति, मशहूर रंगमंडली ‘संगवारी’  ने जनगीत गाए, सत्यजित राय की फ़िल्म ‘सद्गति’ का प्रदर्शन हुआ और एक छोटा-सा पुस्तक मेला भी लगा। इसमें लेखक मंच प्रकाशन की ओर से भी स्‍टाल लगाया गया। कि‍ताबें देखने और खरीदने में बच्‍चों और बड़ों ने रुचि‍ दि‍खाई।

बुक स्टाेल पर कि‍ताब पढ़ती परी

बुक स्टाेल पर कि‍ताब पढ़ती परी

कि‍ताबों को उलटते-पलटते करीब पांच वर्ष की परी ने चहकते हुए कहा कि‍ आपकी कि‍ताबें तो बहुत अच्‍छी हैं। कुछ क्षण बाद फि‍र बोली- क्‍या में क्या कि‍ताब पढ़ सकती हूं। हमने उसे कुर्सी दे दी। वह कुर्सी पर बैठकर कि‍ताबों के पन्‍ने पलटने लगी। उसकी सहेली तरु ने भी कहा- अंकल, मैं भी कि‍ताब पढ़ सकती हूं। फि‍र दोनों सहेलि‍यां कि‍ताबों के पन्‍ने पलटते रहीं।

इस अवसर पर प्रेमचंद की कहानि‍यों पर आधारि‍त बच्चों के बनाए चित्रों‍ की प्रदर्शनी तो इस आयोजन की एक खास उपलब्‍धि‍ रही। इससे बच्‍चों की कलात्मकता तो सामने आई ही, इस बहाने उनका प्रेमचंद साहि‍त्‍य से भी परि‍चय हुआ।

शाइनिंग स्टार में कार्यक्रम का आनंद लेते बच्चे

शाइनिंग स्टा्र स्कूल में कार्यक्रम का आनंद लेते बच्चे

2 अगस्त को शाइनिंग स्टार स्कूल, रामनगर में प्रेमचंद जयंती के अवसर पर कार्यक्रम का आयोजन कि‍या गया। वहां भी बच्‍चों के बीच जाने के अवसर मि‍ला। बच्‍चों ने प्रेमचंद की कहानी कफन का मंचन कि‍या। बहुत से बच्‍चों ने प्रेमंचद की कहानि‍यां सुनाईं और उनके जीवन और साहि‍त्‍य के बारे में अपने वि‍चार व्‍यक्‍त कि‍ए। दो छात्रों  ने तो प्रेमचंद की दो कहानि‍यों को गढ़वाली और कुमांउनी में रूपांतरि‍त कर सुनाया। स्‍कूल के नि‍देशक डीएस नेगी जी ने बताया कि‍ बच्‍चों ने यह सारी तैयारी तीन-चार दि‍न में ही की है। जि‍न छात्रों  ने गढ़वाली और कुमाउनी में रूपांतरण कि‍या है, उन्‍हें आधे घंटे पहले ही कहानि‍यां दी गई थीं। उन्‍होंने एक बार कहानी को पढ़ा और फि‍र बि‍ना देखे, बि‍ना कि‍सी रूकावट या घबराहट के पूरी कहानी सुना दी।

यहां लगाए गए बुक स्टाल में भी बच्चों ने अपने लि‍ए कि‍ताबें पसंद कीं।

डॉ डीडी पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला, बेरीनाग, उत्तराखंड में 31 जुलाई को प्रेमचंद जयंती समारोह हुआ। यहां हम तो नहीं जा पाए, लेकि‍न यहां की रि‍पोर्ट भी उत्‍साहजनक है।

डॉ डीडी पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला में कार्यक्रम प्रस्तुत करते बच्चे

डॉ डीडी पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला में कार्यक्रम प्रस्तुत करते बच्चे

प्रेमचंद जयंती के अवसर पर 10 से ज्यादा विद्यालयों के करीब 125 बच्चों ने पूरे जोशोखरोश से विभिन्न कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। 68 बच्चों द्वारा प्रेमचंद की कहानियों पर बनाए गए चित्रों की प्रदर्शनी लगाई गई। दो कहानियों- ‘दो बहनें’ और ‘राष्ट्र का सेवक’ का मंचन किया गया। छह बच्चों ने कहानियों का पाठ किया। मगर सबसे प्रभावशाली था रा.बा.इ.का. बेरीनाग की कक्षा 6 की छात्रा भावना द्वारा ‘ठाकुर का कुआं’ कहानी का स्वअनूदित कुमांउनी पाठ। इन सब के अलावा कई शिक्षकों ने भी बच्चों का उत्साहवर्धन किया।समारोह का समापन कहानी ‘सद्गति’ पर सत्यजित रे निर्देशित फिल्म से किया गया।

साथि‍यो, जन संस्कृति मंच की ओर से प्रेमचंद  जयंती पर जनसत्ता अपार्टमेंट, वसुंधरा में आयोजित कार्यक्रम के बारे में गौरव सक्सेनाजी ने सुखद जानकारी भेजी है—

prem chand

31 जुलाई को प्रेमचंद जयंती पर जनसत्ता अपार्टमेंट, वसुंधरा में आयोजित ‘मशाल-ए-प्रेमचन्द’ कार्यक्रम में कोठारी इंटरनेशनल स्कूल, नॉएडा ने भी भागीदारी की। इस कार्यक्रम के तहत विद्यालय में बच्चों को प्रेमचंद की कहानियां सुनाई गईं। बच्चों को कहानी के आधार पर पोस्टर बनाने के लिए प्रेरित किया गया। इस कार्यक्रम में हिंदी विभाग की अध्यापिकाओं (श्रीमती गीता शर्मा, श्रीमती रश्मि सिन्हा,  श्रीमती पंकजा जोशी) ने पूरे उत्साह से साथ भागीदारी की। हफ्तेभर चले इस कार्यक्रम के अंत में मन को हर लेने वाले तीस पोस्टर मिले। सबसे ज्यादा पोस्टर ईदगाह और नन्हा दोस्त पर बनाए गए। पंच परमेश्वर पर भी  बेहद सुन्दर पोस्टर बनाए गए। बच्चों को प्रेमचन्द तक और प्रेमचन्द को बच्चों तक लाने की इस अनूठी पहल का हिस्सा बनना बच्चों और विद्यालय के लि‍ए सुखद अनुभव रहा।

विद्यालय प्रबंधन द्वारा इस पहल को सराहा गया और भविष्य में इस तरह के आयोजन करते रहने व भागीदारी के लिए प्रेरित किया गया। विद्यालय की ओर से गौरव सक्सेना इस कार्यक्रम का हिस्सा बने। अगले वर्ष प्रेमचन्द जयंती को विद्यालय में हर्षोउल्लास के साथ मानाने का प्रण किया गया।

प्रेमचंद के बहाने

premchand

31 जुलाई को कालजयी कथाकार प्रेमचंद का जन्‍मदि‍न है। आज जि‍स तरह से साम्प्रदायि‍कता, जाति‍वाद, अमानवीयता, सामाजि‍क असमानता, संवेदनहीनता बढ़ रही है, ऐसे में प्रेमचंद हमें रास्ता दि‍खा सकते हैं। सरल, सहज और मानवीय सरोकारों से परि‍पूर्ण लेखन के कारण आज भी प्रेमचंद सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले लेखक हैं।

हमारी योजना है कि‍ प्रेमचंद जयंती पर पठन–पाठन को लेकर कार्यक्रम आयोजि‍त कि‍ए जाएं। जैसे— उनकी कहानि‍यां का पाठ हो, मंचन हो और उन पर चर्चा हो। पुस्तक मेले, पोस्टर प्रदर्शनी, काव्य पाठ जैसे आयोजन भी कि‍ए जाएं। यह जरूरी है कि‍ इन कार्यक्रमों में बच्चों की सक्रि‍य भागेदारी हो।

इस तरह के कार्यक्रम आयोजि‍त कि‍ए जाने इसलि‍ए जरूरी हैं कि‍ अच्छा साहि‍त्य बच्चों में रचनाशीलता का वि‍कास करता है। आज रवीन्द्रनाथ टैगोर देश और दुनि‍या में जाने जाते हैं, तो इसका श्रेय रवीन्द्र जयंती के अवसर पर ऐसे साहि‍त्‍यि‍क कार्यक्रमों को ही जाता है। न केवल प्रेमचंद, बल्कि अन्य साहि‍त्यकारों, वैज्ञानि‍कों, चिंतकों और दूसरे महापुरुषों की जयंती पर इस तरह के आयोजन कि‍ए जाएं। इसका फायदा आने वाली पीढ़ी को भी मि‍लेगा।

संचार माध्यमों की दूसरी प्राथमि‍कताओं, कैरि‍यर की आपाधापी और समाज में गैर–साहि‍त्यि‍क माहौल के कारण बडे और बच्चे सभी साहि‍त्य से दूर होते जा रहे हैं। यह बेहद भयानक स्थि‍ति‍ है।

दोस्तो, अनुरोध है कि‍ आप सभी अपने–अपने स्तर पर इस तरह के कार्यक्रम आयोजि‍त करें। देशभर के अलावा वि‍देशों में रह रहे साथी भी इसमें सहयोग दें। अगर सार्वजनि‍क स्तर पर कोई कार्यक्रम नहीं कर पा रहे हैं, तो कम–से–कम अपने आसपास के बच्चों या अपने परि‍जनों के साथ बैठकर प्रेमचंद की कि‍सी कहानी का पाठ या उनके जीवन प्रसंग की चर्चा तो कर ही सकते हैं।

लेखक मंच के लि‍ए आपके कार्यक्रम की रि‍पोर्ट का इंतजार रहेगा।

धन्यवाद सहि‍त
अनुराग
9871344533
anuraglekhak@gmail.com

बच्‍चों का विज्ञान-बोध : विवेक भटनागर

apne bachche ko den vigyan drishti

आमतौर पर विज्ञान के बारे में धारणा है कि यह बड़ा ही कठिन विषय होता है। यह सिर्फ एक भ्रामक धारणा है। जो ज्ञान हमारी जिंदगी से जुड़ा हो, वह कठिन कैसे हो सकता है? उठते-बैठते, खाते-पीते, सोते-जागते यानी हर वक्‍त, हर गतिविधि में हम विज्ञान को ही जीते हैं। विज्ञान के कठिन होने की धारणा बनने के पीछे हमारी शिक्षा पद्धति की भूमिका हो सकती है, जो बच्चों का मनोविज्ञान समझे बिना उसे विज्ञान पढ़ाने की कोशिश करती है। बच्चा शुरू से ही कुछ-न-कुछ सीखना शुरू कर देता है। वह जो कुछ भी देखता है, उसे जानने की कोशिश करता है। उसकी उत्सुकता ही उसका वह ज्ञान-बोध है, जो उसमें प्राकृतिक रूप से मौजूद होता है। बच्चा जैसे-जैसे बढ़ता जाता है, उसके सवाल भी बढ़ते जाते हैं। कुछ का मतलब वह स्वयं समझता है, लेकिन कुछ बातों में जब उसे संशय होता है, तो वह सवाल करता है। इसी में उसके विज्ञान को समझने की दृष्टि छिपी होती है। ऐसे में बच्चे को, उसके सवालों को सुलझाने में अभिभावकों को बड़ी समझदारी से काम लेना होगा, तभी बच्चे की विज्ञान-दृष्टि बन पाएगी। हाल ही में नैन्सी पाउलू और मोर्गेरी मार्टिन की पुस्तक हिंदी में अनूदित होकर आई है- अपने बच्चे को दें विज्ञान दृष्टि। आशुतोष उपाध्याय ने इस पुस्तक का बड़ा ही सरल और सुबोध अनुवाद किया है।

आज के बच्चे अलग हैं। हम कह सकते हैं कि उनमें विज्ञान एवं तकनीक का सहज-ज्ञान इन्बिल्ट होता है। लेकिन हम गलती यह करते हैं कि उन्हें अपने बचपन की तरह ट्रीट करते हैं। पुस्तक में लिखा है- ‘माता-पिता के रूप में हमें अपने बच्चों को एक ऐसी दुनिया के लिए तैयार करना है, जो हमारे अपने बचपन से बिल्कुल अलग है। इकीसवीं सदी में इस देश को ऐसे नागरिकों की जरूरत पड़ेगी, जिन्हें प्राथमिक कक्षाओं में विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी का हमसे ज्यादा प्रशिक्षण मिला होगा।’

पुस्तक कहती है कि विज्ञान महज तथ्यों का अंबार नहीं है। तथ्य महज उसका एक हिस्सा हैं। विज्ञान में चार चीजें शामिल हैं। पहली, जो कुछ घट रहा है, उसे गौर से देखना। दूसरा- घटना की वजह का अंदाजा लगाना। तीसरा, अपने अंदाजे को सही या गलत सिद्ध करने के लिए जांच करना। चौथा, जांच में आए परिणाम का मतलब निकालना। पुस्तक में बच्चों के लिए छोटे-छोटे कई प्रयोग दिए गए हैं, जो घर में ही किए जा सकते हैं और जिनसे विज्ञान के बड़े-बड़े सिद्धांतों को समझा जा सकता है। इन प्रयोगों में अभिभावकों को क्‍या करना चाहिए और बच्चों को क्‍या करना चाहिए, विस्तार से बताया गया है। कुल मिलाकर यह पुस्तक बच्चों में विज्ञान-दृष्टि और विज्ञान-बोध को बढ़ाने का बेहद सरल प्रयास है, जिसका स्वागत होना चाहिए।

पुस्‍तक : अपने बच्‍चे को दें विज्ञान दृष्टि
लेखक : नैन्‍सी पाउलू और मार्गेरी मार्टिन
अनुवाद: आशुतोष उपाध्‍याय

मूल्‍य (अजिल्‍द) : 40 रुपये
(सजिल्‍द) : 75 रुपये

प्रकाशक – लेखक मंच प्रकाशन
433 नीतिखंड-3, इंदिरापुरम-201014
गाजियाबाद

ईमेल : anuraglekhak@gmail.com

(दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण, 11 जनवरी 2014 से साभार)

अपने बच्चे को दें विज्ञान दृष्टि : नैन्सी पाउलू

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‘लेखक मंच’ प्रकाशन की चौथी पुस्‍तक ‘अपने बच्चे को दें विज्ञान दृष्टि’ अंग्रेजी पुस्‍तक का अनुवाद है। इसके लेखक नैन्सी पाउलू और मार्गेरी मार्टिन हैं। इसका अनुवाद आशुतोष उपाध्याय ने किया है। बच्‍चों को विज्ञान को लेकर जिज्ञासू बनाने की दिशा में यह महत्‍वपूर्ण पुस्‍तक है। इस पुस्‍तक की भूमिका यहां दी जा रही है-

‘क्यों?’

एक ऐसा सवाल, जिसका जवाब देने का प्रयास हम माता-पिता हमेशा से करते आए हैं। यह अच्छी बात है कि बच्चे सवाल पूछते हैं– सीखने का इससे बढिय़ा कोई और तरीका नहीं हो सकता। सभी बच्चों के पास सीखने के दो आश्चर्यजनक स्रोत होते हैं– कल्पनाशीलता और उत्सुकता। माता-पिता के रूप में आप अपने बच्चे की कल्पनाशीलता व उत्सुकता को बढ़ावा देकर उसे सीखने के आनन्द से सराबोर कर सकते हैं।

‘अपने बच्चे को दें वैज्ञानिक दृष्टि’ विभिन्न शैक्षिक विषयों पर अभिभावकों के लिए लिखी गई पुस्तक शृंखला की एक कड़ी है, ताकि वे बच्चों की सहज उत्सुकता का जवाब दे सकें। शिक्षण और सीखना महज स्कूल की चारदीवारी के भीतर सम्पन्न होने वाली रहस्यमय गतिविधियाँ नहीं हैं। वे तब भी होती हैं, जब माता-पिता और बच्चे बेहद आसान चीजों को साथ-साथ करते हैं।

उदाहरण के लिए–आप और आपका बच्चा सीखने के लिए किस तरह की गतिविधियाँ कर सकते हैं– धुलने वाले कपड़ों के ढेर से मोजों को उनके जोड़ों के हिसाब से छाँटकर गणित और विज्ञान की गुत्थियाँ सुलझा सकते हैं। साथ मिलकर खाना बना सकते हैं, क्योंकि खाना बनाने से गणित और विज्ञान के अलावा अच्छी सेहत की भी सीख मिलती है। एक-दूसरे को कहानियाँ सुना सकते हैं। कहानी सुनाना पढऩे और लिखने का आधार है (इसके अलावा बीते दिनों की कहानियों को ही तो इतिहास कहते हैं)। आप अपने बच्चे के साथ स्टापू खेल सकते हैं। उछल-कूद वाले इन खेलों से बच्चे गिनती सीखते हैं और जीवनपर्यंत अच्छी सेहत का पाठ भी पढ़ते हैं।

बच्चों के साथ मिलकर कुछ करने से आप समझ जाएँगे कि सीखना मनोरंजक और बेहद महत्वपूर्ण क्रियाकलाप है। ऐसा करके आप अपने बच्चे को पढऩे, सीखने और स्कूल में रहने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

 

पुस्‍तक : अपने बच्‍चे को दें विज्ञान दृष्टि

लेखक : नैन्‍सी पाउलू और मार्गेरी मार्टिन

अनुवाद : आशुतोष उपाध्‍याय

प्रकाशक : लेखक मंच प्रकाशन

433 नीतिखंड-3, इंदिरापुरम

गाजियाबाद-201014

ईमेल : anuraglekhak@gmail.com

मूल्‍य(अजिल्‍द) : 40 रुपये

(सजिल्‍द) : 75  रुपये

मेरी जिंदगी में बच्चे : सुधीर सुमन

छुटकू बच्चे की शक्ल से मिलती तस्वीर।

लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन को हाल ही में दो बच्चे मि‍ले। ये बच्‍चे जिस तरह से मिले, उसे याद करते हुए लिखा गया लेख-

बच्चे मेरी जिंदगी की ऊर्जा रहे हैं। हमेशा बच्चों के बीच घिरा रहा हूँ। कुछ पढ़ाकू छवि होने के कारण और ज्यादा बच्चों से लगाव होने के कारण अक्सर माता-पिता मुझसे ही उनका नाम रखने की गुजारिश करते थे। करीब 20-25 बच्चों का नामकरण मैंने किया ही होगा। आज भी कोई न कोई ऐसा आग्रह कर ही देता है। कितने शिशु मेरी बाहों में झुलते हुए, मेरे कंधे पर सैर करते हुए बड़े हुए। हमारे यहाँ एक गीत जो बच्चों को झुलाते हुए अक्सर गाया जाता था- तोरा मइया न डोलावे, तोरा बप्पा न डोलावे तोरा हमहीं डोलाईं, वह तो जैसे पूरी तरह से हकीकत रहा है।

किशोर उम्र में मैंने ‘बच्चों के बारह उपन्यास’ नामक एक किताब पढ़ा था, जिसमें एक उपन्यास की कथा पराग नाम के एक बच्चे के बारे में थी। कहानी तो काल्पनिक थी, पर कल्पना ऐसी थी, जिसने मुझ पर गहरा असर छोड़ा था। पराग की उम्र बढ़ती नहीं, वह अमर है। और यह अमरता ही उसके लिये गहरे दुख और अवसाद की वजह बन जाती है। उसके साथी बच्चे बड़े होते हैं, बूढे़ होते हैं, फिर मर जाते हैं। जो नये बच्चे आते हैं, वे उसके दोस्त बनते हैं। लेकिन एक वक्त ऐसा आता है, जब वह अपनी अमरता को अभिशाप समझने लगता है और जिस लड़की से वह गहरा स्नेह करता है, उसके मरने के बाद वह भीषण पीड़ा से भर उठता है और अमरता से मुक्ति चाहता है। शायद हू ब हू कथा इसी रूप में न हो, पर इसी रूप में मेरी स्मृति में बची हुई है। कभी-कभी लगता है कि वह पराग मेरे भीतर बैठा हुआ है। फिर भी मैं उसकी तरह मुक्ति नहीं चाहता। मैं बच्चों की आँखों से इस दुनिया को लाखों बार देखना चाहता हूँ। उनके साथ उनकी भाषा में बात करना चाहता हूँ।

मैं शुक्रगुजार हूँ उन मां-बापों का जिन्होंने मेरे वात्सल्य पर यकीन किया और उन बच्चों का जिन्होंने मुझे बेहद प्यार किया। आज तो बच्चे बड़ों की महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिये ऐसे रेस में झोंक दिये जा रहे हैं, कि उनका बचपन समय से पहले ही खत्म हो जाता है। ऐसे माहौल में हाल में दो बच्चे मुझे कुछ इस तरह मिले कि मैं भूल नहीं पाया। एक तो बिल्कुल नन्हा-सा शायद साल-डेढ़ साल का होगा, गोरा-चिट्टा, मुस्कुराता हुआ, आँखों में अजीब सी शरारत भरी थी जिसकी। मेट्रो की लाइन में खड़ा था तो पीछे से किसी ने मेरी शर्ट खींची। मैंने पीछे मुड़के देखा  तो पाया महाशय मेरी शर्ट पर अपनी उंगलियों की जबर्दस्त पकड़ बनाये हुए हैं। मैंने पकड़ बनाये रहने दी। मेट्रो के अंदर घुसने तक उन्होंने शर्ट नहीं छोड़ा। लेकिन उनकी माता जी को सीट मिल गई  तो उन्हें मेरी शर्ट छोड़नी पड़ी। फिर भी उनकी आँखें मेरा पीछा करती रहीं। जब मैं अपने स्टेशन पर उतरा तो देखा महाशय शीशे से मुझे देख रहे हैं। मैंने गर्मजोशी से बाय किया, मेट्रो चली गई, पर उन्होंने हमेशा के लिये स्मृति में जगह बना ली। ठीक वैसे ही बच्चे की शक्ल मेरी एक फेसबुक फ्रेंड के वॉल पर जाने पर दिखती है।

मनमोहक मुस्कान के साथ जाह्नवी।

दूसरी दिलचस्प मुलाकात सात साल की एक बच्ची से लखनऊ जाते वक्त गोमती एक्सप्रेस में हुई। मैं अपनी सीट पर बैठ चुका था। ट्रेन खुलने से पहले मेरी सीट की बगल में एक दंपत्ति अपनी दो बच्चियों के साथ आये। मेरी सीट खिड़की के पास थी। मेरे ठीक विपरीत साइड की खिड़की पर वे दोनों बच्चियां बैठ गईं। अचानक मेरे आगे की सीट पर एक और बच्ची का सिर उभरा, उसने मुझे देखा, मैंने उसे देखा। मैं मुस्कुराया, वह भी मुस्कुराई। मगर कहीं थोड़ी सी हिचक थी। पहले तो उसने मेरे बगल वाले दंपत्ति को दूसरे साइड की सीट पर भेजा, वहाँ से उनकी बच्चियों को अधिकारपूर्वक बुलाया और फिर लगे खेलने। एक खेल था- पिकाचू, जिसमें हारने वाले का गाल पकड़कर खींचा जाता है। हमारी चंचल, चपल सहयात्री ने अपना नाम जाह्नवी बताया, उसके साथ यह सूचना जोड़ते हुए कि यह नाम उनकी दादी माँ ने रखा था। मेरे पूछने पर उन्होंने जाह्नवी का अर्थ भी बताया, फिर से इस सूचना के साथ कि उनकी दादी माँ ने बताया है कि जाह्नवी का अर्थ गंगा होता है। खैर, जाह्नवी अद्भुत ऊर्जा से भरी थीं। थकान का नामोनिशान उनके चेहरे पर नहीं आ रहा था। उन्होंने जो नये दोस्त बनाए थे, वे थोड़ी देर रुकना चाहते थे, पर उनका खेल- पिकाचू थम ही नहीं रहा था। तेज गति से हथेलियों का टकराना, फिर कैंची और पत्थर की शक्ल में मुद्राएं और हारने वाले के गालों को खींचना। और साथ ही यह भी बताना कि अंकल गाल खींचने में कितना मजा आता है न! खेल से थोड़ा डायवर्ट हुईं तो अंत्याक्षरी शुरू कर दी और साबित कर दिया कि उनका अंग्रेजी के शब्दों का ज्ञान सबसे अधिक है, अपने बड़े गोल मटोल भाई से कहीं अधिक, जो खेल में उनका साथ देने को मजबूर थे। उनके पिता बस एकाध बार उन पर निगाह डाल ले रहे थे। उनकी माँ दूसरी साइड की चेयर पर अपने ही ख्यालों में खोई हुई थीं। बाकी गोमती के चेयर कार डिब्बे का मेरे ठीक सामने का चेयर तो मानो जाह्नवी का घोड़ा था, जिसकी लगाम हाथ में लिये वह उसे दौड़ाए लिये जा रही थीं।

गोमती एक्सप्रेस अपने नियत समय से देर होती जा रही थीं, लेकिन हमारी जाह्नवी तो समय को अपने हिसाब से नचा रही थीं। हमारी बातचीत शुरू हो चुकी थी। अचानक उन्होंने मेरी ओर पाँच-छह पॉपकार्न बढ़ाए, मैंने कहा- तुम खाओ। वह कहाँ मानने वाली थीं। उन्होंने मेरे हाथों में मौजूद किताब को बंद किया और उस पर पॉपकार्न रख दिये। अब मैं क्या करता, मैंने तो खा लिये। फिर कुछ देर बाद मैंने आलू भुजिया देना चाहा, पर उन्होंने मना कर दिया। लेकिन कुछ देर बाद ही उनकी बंधी हुई मुट्ठी हल्की सी ढीली हुई, गोकि उनका चेहरा कोई देखता तो उसे लगता कि उनका ध्यान कहीं और हैं, पर मैंने संकेत समझ लिया। मैंने सबकी आँख बचाकर आलू भूजिया उनकी नन्हीं हथेलियों में रख दी। उन्होंने कनखियों से अपने पिता की ओर देखा, उनका ध्यान कहीं और था। और वह इस तरह अपनी हथेलियों को अपने मुँह तक ले गईं, मानो बस यूँ ही हथेलियाँ उधर चली गई हों। और किसी को पता नहीं चल पाया। बल्कि भाई ने ताड़ने की कोशिश की, पर उन्होंने उसे डॉज दे दिया। कमाल यह था कि यह मुद्रा उन्होंने चार-पाँच बार दुहराई और किसी को पता नहीं चला कि हम दोनों अपने खाने की वस्तुएं शेयर कर रहे हैं।

मुझे अगले दिन साथी मदन मोहन के उपन्यास पर कार्यक्रम का संचालन करना था। मैं दुबारा उनके उपन्यास ‘जहां एक जंगल था’ को पढ़ लेना चाहता था। लेकिन जाह्नवी के थपेड़े न केवल कभी-कभी मेरे माथे पर लग रहे थे, बल्कि वे किताब के पन्नों को भी गड्डमड्ड कर दे रहे थे। अचानक किताब ही उनके कब्जे में चली गईं और उन्होंने उसके अंदर के आखिरी कवर पर अपने मां-पिता का मोबाइल नम्‍बर लिखा। यह भी लिखा कि माई नेम इज जाह्नवी। मुझे लगा कि यह नटखट कहीं अपने माँ-बाप के लिये मुश्किल न पैदा कर दे। मैंने तुरत उन्हें अपना परिचय दिया और बताया कि जब मैं लखनऊ फिल्म फेस्टिवल में आऊँगा तो आपको फोन करूँगा। बच्चों के लिये जब फिल्में दिखाई जायेंगी तो आपलोग जाह्नवी को लेकर आइयेगा। फिल्मों का नाम सुनते ही जाह्नवी अपने सवालों के साथ तैयार हो गईं। लेकिन ट्रेन लखनऊ में दाखिल हो चुकी थी। मुझे लग रहा था कि मेरी अगली ट्रेन छूट न जाये। मैं अपना सामान व्यवस्थित करने लगा। जाह्नवी इसे लेकर परेशान थीं कि अंकल कहाँ ठहरेंगे। मैंने चुटकी ली- आपके यहाँ ठहर जाऊँगा। वे बोलीं- नहींऽऽ। स्टेशन पर ट्रेन के लगते ही मुझे तेजी से भागना पड़ा। एक हड़बड़ी की विदाई ली, इस उम्मीद के साथ कि हम फिर मिलेंगे।

चाँदनी रात में नाचा भालू : प्रकाश मनु

कथाकार प्रकाश मनु को हिंदी के लिए साहित्‍य अकादमी के पहले बाल साहित्‍य पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया जा रहा है। उन्‍हें यह पुरस्‍कार एक था ठुनठुनिया के लिए दिया जा रहा है। उपन्‍यास का अंश-

एक दिन ठुनठुनिया जंगल में घूम रहा था कि उसे एक अनोखी चीज दिखाई दी। पास जाकर देखा, वह काले रंग का एक मुखौटा था, जिस पर काले-काले डरावने बाल थे।

ठुनठुनिया को हैरानी हुई, जंगल में भला यह मुखौटा कौन छोड़ गया? क्या किसी नाटक-कंपनी के लोग यहाँ से गुजरे थे और गलती से इसे यहाँ छोड़ गए। या फिर जंगल का कोई जानवर इसे शहर से उठा लाया और यहाँ छोड़कर चला गया? जो भी हो, चीज तो बड़ी मजेदार है ! ठुनठुनिया ने उस मुखौटे को उठाया और अपने चेहरे पर पहनकर देखा। मारे खुशी के चिल्ला उठा, ”अरे रे, यह तो मुझे बिल्कुल फिट आ गया!’’

ठुनठुनिया का मन हो रहा था, अभी दौड़कर घर जाए और शीशे के आगे खड़े होकर देखे कि यह अनोखा मुखौटा पहनकर वह कैसा लगता है? पर उसे तो उतावली थी, सो दौड़ा-दौड़ा गया नदी के किनारे। वहाँ पानी के पास सिर झुकाकर देखने लगा और सचमुच खुद अपनी शक्ल देखकर वह डर गया कि ‘अरे, यह भालू कहाँ से आ गया!’ चौंककर वह दो कदम पीछे हट गया। फिर खुद-ब-खुद अपने इस रूप पर ठठाकर हँस पड़ा।

सिर्फ ठुनठुनिया की आँखें ही थीं, जिनसे वह थोड़ा-बहुत पहचान में आता था। वरना तो, एकदम ऐसे बदल गया था, जैसे वह ठुनठुनिया न होकर अभी-अभी जंगल से भागकर आया कोई जंगली भालू हो। कोई एकदम जंगली भालू!

अचानक ठुनठुनिया के मन में एक आयडिया आया और वह खुद अपनी सोच पर खुश होकर उछल पड़ा। उसने सोचा, अभी नहीं, मैं रात में यह मुखौटा पहनकर गाँव वालों के पास जाऊँगा, तब आएगा मजा!

यह सोचकर ठुनठुनिया ने वह मुखौटा जतन से एक पुराने कपड़े में लपेटकर गाँव के पास वाले बरगद की डाल में छिपा दिया।

रात के समय ठुनठुनिया ने पेड़ की डाली से वह मुखौटा उतारा और पहन लिया। वह एक दोस्त से काले रंग के कपड़े भी माँग लाया था। उन्हें पहनकर वह चुपके से चलता हुआ गाँव की चौपाल तक आ गया। और झूमते हुए आगे बढ़ा। वहाँ दो-चार लोग बैठे आपस में कुछ बातचीत कर रहे थे। उन्होंने एक भालू को झूमते-झामते पास आते देखा, तो चिल्लाते हुए सिर पर पैर रखकर भागे।

फिर ठुनठुनिया आगे बढ़ा तो रामदीन चाचा नजर आ गए। वे घर के बाहर चारपाई डालकर सो रहे थे। ठुनठुनिया ने जाते ही हाथ से हिलाकर उन्हें जगाया। नींद खुलते ही काले रंग के विशालकाय भालू पर उनकी नजर पड़ी, तो वे भी चीखते-चिल्लाते हुए भाग खड़े हुए। अब तो पूरे गाँव में जगार हो गई। लोग चिल्लाकर एक-दूसरे से कह रहे थे, ”पकडिय़ो रे, भागियो रे, पकडिय़ो रे, भागियो रे, भालू आ गया, भालू! सब हाथ में एक-एक लाठी पकड़ लो और मिलकर चलो। जरा एक आदमी आग जलाकर जलती मशाल पकड़ ले। आग देखकर भालू भागेगा, तब उसे दबोचना।’’

ठुनठुनिया समझ गया, अब तो वह जरूर पकड़ा जाएगा। इसलिए उसने मुखौटा उतारकर झटपट कहीं छिपा दिया और फिर घूमता-घामता घर आकर सो गया।

सुबह ठुनठुनिया उठा तो गोमती ने कहा, ”अच्छा हुआ बेटा, तू जल्दी आ गया और सो गया, वरना गाँव वालों पर तो कल बहुत बुरी बीती। सब रात-भर जागते रहे। एक बड़ा-सा जंगली भालू न जाने कहाँ से आ गया! गाँव में कितने ही लोगों ने उसे देखा, पर कोई पकड़ नहीं पाया। अच्छा हुआ कि गाँव में जगार हो गई, नहीं तो क्या पता, एक-दो बच्चों को वह पकड़कर ही ले जाता और…!’’

”ठीक है माँ, पर तेरे ठुनठुनिया का तो वह बाल बाँका नहीं कर सकता था।’’ ठुनठुनिया ने मंद-मंद हँसते हुए कहा।

”क्यों, ऐसा क्यों कह रहा है बेटा?’’ गोमती ने चौंककर कहा, ”क्या तू जंगली भालू से भी बढ़कर है?’’

”हाँ-हाँ, क्यों नहीं?’’ ठुनठुनिया हँसा, ”मैं ठुनठुनिया जो हूँ, ठुनठुनिया! माँ का लाड़ला बेटा। ऐसे बहादुर लड़के पर हमला करने की हिम्मत है भला किसी भालू या चीते की! मेरा तो कोई बड़े से बड़ा दुश्मन भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता।… फिर भालू तो बेचारा आलू माँगने लगता! मैं उसे आलू खिलाता और झट से पकड़कर पिंजरे में बंद कर लेता।’’

गोमती ने सुना, तो बलैयाँ लेते हुए बोली, ”अच्छा बेटा, अगर वह भालू आता तो क्या तू उससे लड़ लेता?’’

”क्यों नहीं माँ, क्यों नहीं! मैं तो एक झटके में उसका मुखौटा…!’’ कहते-कहते ठुनठुनिया रुक गया।

”कैसा मुखौटा बेटा?’’ गोमती की कुछ समझ में नहीं आया।

”मुखौटा मतलब…मुँह!’’ ठुनठुनिया ने समझाया, ”माँ, तेरे कहने का मतलब यह था कि जैसे ही वह भालू आता, मैं तो सबसे पहले उसका मुँह रस्सी से बाँध देता। फिर उसे पर ठाट से वो सवारी करता, वो…कि बच्चू याद रखता जिंदगी-भर!’’ फिर हँसता हुआ बोला, ”और हाँ, माँ, मैं उस भालू पर बैठकर तेरी सात परिक्रमा करता, पूरी सात!’’

”चुप…!’’ गोमती हँसकर बोली, ”ज्यादा बढ़-चढ़कर बातें नहीं किया करते।’’

और ठुनठुनिया अंगड़ाई लेता हुआ उठ खड़ा हुआ, ताकि अब चलकर गाँव वालों से रात भालू के आने की गरमागरम खबरें सुनकर पूरा मजा ले सके।

जाने कितने दिनों तक गुलजारपुर में उस जंगली भालू की चर्चा चलती रही, जो लपकते-झपकते हुए गाँव की चौपाल पर आया था और वहाँ से रामदीन चाचा के घर की ओर गया। आखिर में सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम करता हुआ, वह गायब हो गया।

”गायब होने से पहले उसने बड़ा जबरदस्त नाच दिखाया था और उसके पैरों में चाँदी के बड़े-बड़े और खूबसूरत छल्ले भी थे, जो बिजली की तरह चम-चम-चम चमक रहे थे! अजीब-सी डरावनी छन-छन-छन और टंकार हो रही थी…!’’ मुखिया ने कसम खाकर यह बात कही थी। यों किसी-किसी का यह भी कहना था कि वह भालू नहीं, कोई राक्षस था जो जादू से भालू की शक्ल धारण करके आया था। किसी को उसमें भगवान् राम और हनुमान के बूढ़े मित्र जाबावान की छाया दिखाई दी। जबकि गंगी ताई का कहना था, ”यह रावण था, रावण जो कलियुग में रूप बदलकर आया है। बड़ा भीषण संकट आ गया गुलजारपुर गाँव पर तो!’’

किसी को लगा कि वह भालू नहीं, सिर्फ भालू की डरावनी छाया थी। जरूर पड़ोसी गाँव के लोगों ने गुलजारपुर गाँव के लोगों को डराने के लिए कोई जादू-मंतर किया है! किसी-किसी को इसके पीछे गाँव के मोटेराम पंडित जी का भी हाथ लगा।

एक-दो ने कहा, ”नहीं भाई, हमें तो लगता है, यह वही भालू है जो कुछ महीने पहले पड़ोसी गाँव के दो बच्चों को उठाकर ले गया। यहाँ भी आया तो इसी इरादे से था, पर अच्छा हुआ कि राम जी की कृपा से जगार हो गई। तो एक बड़ी दुर्घटना होते-होते टल गई, वरना तो गाँव में किसी-न-किसी पर आफत आनी ही थी!’’

ठुनठुनिया गौर से सबकी बातें सुनता और कभी इसकी, कभी उसकी बात पर हाँ-हूँ कर देता। असली बात बताकर क्या उसे लोगों से मार खानी थी!

मगर…आखिर एक दिन उस भालू-कांड की पोल खुल ही गई और उसे किसी और न नहीं, खुद ठुनठुनिया ने ही खोला।

असल में गुलजारपुर में हर साल सर्दियों में चाँदनी रात में गाने-बजाने का प्रोग्राम होता था। उसमें गाँव के जमींदार गजराज बाबू भी आते थे, साथ ही शहर के बड़े-बड़े लोग भी आते थे। इनमें अफसर, वकील, लेखक, कलाकार, प्रोफेसर, पत्रकार, नेता सभी होते थे। अच्छी रौनक लगती थी। तरह-तरह के मजेदार कार्यक्रम होते। कोई गाने-बजाने का कार्यक्रम पेश करता तो कोई अनोखा नाच नाचकर दिखाता। पुराने लोकगीत और राग-रागिनियाँ गाई जातीं। नए-नए गीत भी खुद बनाकर पेश किए जाते। छोटे-छोटे मजेदार नाटक भी होते थे। कोई बाँसुरी, कोई ढोल, कोई तुरही बजाकर अपनी कला पेश करता। सबसे बढिय़ा प्रोग्राम दिखाने वाले को इनाम भी दिया जाता।

ठुनठुनिया बोला, ”माँ-माँ, मैं भी इस बार चाँदनी रात वाले मेले में भाग लूँगा।’’

”ठीक है बेटा।’’ गोमती ने कहा।

पर ठुनठुनिया कुछ ज्यादा ही उत्साह में था। बोला, ”सिर्फ ठीक कहने से काम नहीं चलेगा माँ! आशीर्वाद दे कि इस साल मुझे ही पहला इनाम मिले।’’

इस पर ठुनठुनिया की माँ ने हैरान होकर कहा, ”अरे, चाँदनी मेले का पहला इनाम तुझे कैसे मिल सकता है बेटे? तुझे तो इतना अच्छा नाच-गाना आता नहीं है। वहाँ तो एक से बढ़कर एक नचैया और धुरंधर कलाकार आएँगे। एक-से-एक अच्छे कार्यक्रम होंगे। लोगों के पास बहुत पैसा, बहुत साधन हैं, जबकि तेरे पास तो एक ढंग की पोशाक तक नहीं है, तो फिर…?’’

”चिंता न कर माँ, मैं इस बार ऐसा नाच दिखाऊँगा और ऐसी बढिय़ा पोशाक पहनकर दिखाऊँगा कि तू खुद चकरा जाएगी। हो सकता है, तू मुझे पहचान भी न पाए।’’ ठुनठुनिया ने हँसते हुए कहा।

”अच्छा, चल-चल, ज्यादा बातें न बना। भला ऐसा भी हो सकता है कि माँ अपने बेटे को ही न पहचान पाए!’’ गोमती ने हँसते हुए कहा।

”हो सकता है माँ, हो सकता है!’’ कहकर ठुनठुनिया नाचा। खूब मस्ती में नाचा और देर तक नाचता ही रहा। माँ हैरानी से उसे देख रही थी।

शाम के समय ठुनठुनिया घर से बाहर आकर खुले मैदान में टहलने लगा। फिर टहलते-टहलते उसके कदम गाँव के तालाब की ओर बढ़ गए। अचानक उसका ध्यान बरगद के उस पेड़ की ओर गया जिसमें ऊपर की घनी डालियों के बीच उसने भालू का मुखौटा छिपाकर रखा था।

”देखूँ, कहीं कोई उसे ले तो नहीं गया?’’ कहकर ठुनठुनिया एक मैले कपड़े में लिपटे उस मुखौटे को तलाशने लगा। एक पल, दो पल, तीन…और आश्‍चर्य कि वह वहाँ था! सचमुच बरगद की ऊँची डाली पर वह ज्यों-का-त्यों लिपटा पड़ा था।

ठुनठुनिया को अचंभा हुआ, ‘क्या गजब है, भला किसी का ध्यान इधर गया ही नहीं! पर चलो, अब यही मेरे काम आएगा। समझो कि मेरा पहला इनाम पक्का!’

ठुनठुनिया ने उसी समय वह मुखौटा बगल में दबाया और अपने दोस्त मीतू के घर की ओर चल पड़ा। मीतू से उसे काली पोशाक और काले जूते लेने थे, वरना उसके बगैर खेल में पूरा मजा कैसे आता! भालू वाला काला मुखौटा ले जाकर भी उसे मीतू के पास रख दिया।

मीतू का बंगलानुमा बड़ा-सा तिमंजिला घर था। खुद मीतू का अपना कमरा भी बहुत बड़ा था। वहाँ से तैयार होकर आसानी से मेले में पहुँचा जा सकता था।

और सचमुच उस रात ठुनठुनिया ने जब भालू का मुखौटा, काले कपड़े और काले जूते पहनकर अपनी कला दिखाई, तो वह कोई छोटा-मोटा नहीं, पूरा विशालकाय जंगली भालू ही लग रहा था।

पहले तो मीतू के कमरे में ही ठुनठुनिया दोस्तों के बीच अपनी नृत्य-कला का प्रदर्शन करता रहा। फिर दोस्तों के साथ ही अजब अंदाज में नाचता-कूदता, उछलता और किलकारियाँ भरता मेले में पहुँचा। सभी यह अनोखा भालू देखकर सहम गए और एक ओर छिटक गए।

इसके बाद ठुनठुनिया ने मंच पर अपना अनोखा नाच दिखाना शुरू किया। वह इतनी मस्ती से नाच रहा था कि सचमुच का भालू ही लगता था। उसका पैर उठाने, मटकने, गरदन हिलाने का अंदाज, सबमें ऐसी प्यारी कला थी कि लगता था, जंगल से अभी-अभी आकर कोई सचमुच का भालू अपना रंग बिखरा रहा है। उसकी हर अदा पर देखने वाले झूम-झूम उठते थे। गजराज बाबू और उनके दोस्त तो बार-बार ‘वाह! वाह!’ कर रहे थे।

इसके बाद ठुनठुनिया ने ठुमके लगा-लगाकर यह अनोखा गाना भी सुनाया :

भालू रे भालू!

अम्माँ, मैं तेरा भालू!

अभी-अभी चलकर जंगल से आया भालू,

ला खिला दे, ला खिला दे, दो-चार आलू!

अम्माँ, मैं नहीं टालू,

अम्माँ, मैं नहीं कालू,

अम्माँ, मैं तेरा भालू…!

जब ठुनठुनिया का नाच बंद हुआ तो देर तक चारों तरफ तालियाँ बजती रहीं। इसके बाद पूरी की पूरी भीड़ ने बिल्कुल ठुनठुनिया के भालू वाले अंदाज में ही नाचना और थिरकना शुरू कर दिया। सब मिलाकर गा रहे थे—

”भालू रे भालू! अम्माँ, मैं तेरा भालू!/अभी-अभी चलकर जंगल से आया भालू,/ला खिला दे, ला खिला दे दो-चार आलू!/अम्माँ, मैं नहीं टालू,/अम्माँ, मैं नहीं कालू,/अम्माँ, मैं तेरा भालू!’’ बड़ी देर तक सभी में यही नाच-रंग चला। आयोजकों की बहुत प्रार्थना के बाद लोग थमे।

इसके बाद और भी कार्यक्रम हुए। कई लोग तरह-तरह के रंग-बिरंगे कपड़े और गहने पहनकर नाच दिखाने आए। अजीबोगरीब मुखौटों वाले नाच हुए। हँसी-मजाक से भरपूर नाटक भी हुए। पर ठुनठुनिया ने भालू बनकर जो मजा बाँध दिया था, उसका मुकाबला कोई और नहीं कर पाया।

और सचमुच भालू बनकर ठुनठुनिया इतना बदल गया था कि और तो और, खुद गोमती भी उसे नहीं पहचान पाई थी। पर बाद में जब ठुनठुनिया का नाम लेकर इनाम की घोषणा हुई और खुद गजराज बाबू ने अपने हाथ से उसे चाँदी की थाली और एक मैडल इनाम में दिया, तो गोमती ने पहचाना—अरे, तो यह ठुनठुनिया ही था जो भालू बना हुआ था!

ठुनठुनिया को जो मैडल दिया गया, वह भी चाँदी का था। उस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ था—’गुलजारपुर का रत्न’। उस मैडल को एक सुंदर-से काले धागे में पिरोया गया था। गजराज बाबू के कहने पर ठुनठुनिया ने उस मैडल को गले में हार की तरह पहना, तो खूब जोर से तालियाँ बजी।

फिर ठुनठुनिया से गजराज बाबू ने कहा, ”भई, ठुनठुनिया, तुम भी कुछ कहो!’’

इस पर ठुनठुनिया ने कहा, ”पुरस्कार पाकर मैं खुश हूँ। पर…मुझसे बढ़कर खुशी मेरी माँ को होगी। मैंने कल उससे कहा तो उसे यकीन नहीं हो रहा था। माँ का कहना था—’रे ठुनठुनिया, तेरे पास तो ढंग की पोशाक तक नहीं है! तू भला कैसे इनाम जीतेगा?’पर अब उसने देख लिया होगा कि उसके बेटे की जो पोशाक है, उसका मुकाबला तो बेशकीमती रंग-बिरंगी पोशाकें भी नहीं कर सकतीं।’’

लोग हैरानी से ठुनठुनिया की बातें सुन रहे थे।

इसके बाद ठुनठुनिया ने कहा, ”अगली बार अपनी कला और निखार सकूँ, आप सब इसका आशीर्वाद दीजिए। हाँ, अपने एक अपराध की क्षमा आप सब लोगों से माँगता हूँ। अभी कुछ रोज पहले गाँव की चौपाल पर जो भालू आया था और जिसने गाँव के बहुत से लोगों के साथ-साथ चाचा रामदीन को भी डरा दिया था, वह सचमुच का भालू नहीं, मैं ही था। और मैंने यही पोशाक पहनी थी, जिसे देखकर सभी को भालू नजर आने लगा। मगर यह पोशाक मुझे मिली कहाँ से, इसका भी एक किस्सा है। यह पोशाक मुझे जंगल में एक पेड़ के नीचे मिली थी और मैंने सोचा, जरा देखूँ, इसे पहनकर मैं कैसा लगता हूँ? आप सबको मेरे कारण परेशानी हुई, इसके लिए माफी चाहता हूँ। पर सच तो यह है कि उसी दिन मेरे मन में आया कि अगर इस मुखौटे को पहनकर मैं ‘भालू-नाच’ नाचूँ तो इनाम जीत सकता हूँ। और आज सचमुच मेरा सपना पूरा हो गया…’’

”हाँ, और एक बात गजराज बाबू जी से भी कहनी है। उनके हाथों से इनाम पाकर मुझे अच्छा लगा, पर उनसे पहली दफा मुझे यह इनाम नहीं मिला है। कई बरस पहले होली मेले में उन्होंने मुझे दस रुपये का एक खरखरा नोट इनाम में दिया था, जिससे मैंने में खूब सारी चीजें ली थीं और पहली बार चरखी वाले झूले पर झूला था। वह इनाम मुझे गजराज बाबू ने क्यों दिया, इसकी याद नहीं दिलाऊँगा, क्योंकि आपमें से बहुत से लोग जानते ही हैं। गजराज बाबू को भी अब याद आ गया होगा कि मजाक-मजाक में उनका नाम ‘हाथी बाबू’ कैसे पड़ गया! अगर उन्हें बुरा लगा हो, तो उनसे भी मैं माफी माँगता हूँ।’’

ठुनठुनिया जब बोलकर मंच से उतरा, तो देर तक पंडाल में तालियाँ बजती रहीं। गजराज बाबू ने आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया और खूब जोरों से पीठ थपथपाई। इतने में गोमती भी वहाँ आ गई। ठुनठुनिया ने आगे बढ़कर माँ के पैर छुए तो मारे खुशी के उसकी आँखों में आँसू छलछला आए।