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एक पहाड़ी मैना की मौत : कांतिकुमार जैन

विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई पहाड़ी मैना को लेकर प्रसिद्ध लेखक कांतिकुमार जैन का संस्‍मरणात्‍मक आलेख-

पहाड़ी मैना की पूरी प्रजाति के ही विलुप्ति का शिकार होने की आशंका है। पहाड़ी मैना जितना निरीह, सुकुमार और विलक्षण प्रतिभासंपन्न प्राणी विश्व में शायद ही कोई दूसरा हो। आधी बित्ते से भी छोटा परिंदा जिसे आप अपनी हथेली पर बैठा लें, में और सब कुछ तो सामान्य मैना जैसा है पर इस नन्ही-सी जान में प्रकृति से पता नहीं कैसी अनुकरण की क्षमता मिली है कि वह मानव द्वारा उच्चरित ध्वनि की हूबहू नकल कर सकती है, बिना किसी अभ्यास या प्रशिक्षण के। आप बोलिए और पहाड़ी मैना उसकी नकल करती चली जाएगी, जैसे किसी ने उसके गले में कोई टेप-रिकॉर्डर फिट कर दिया हो। यह मैना केवल छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के पहाड़ों में ही पाई जाती है, इसलिए इसे बस्तरिहा मैना भी कहते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने इसकी अनन्यता को स्वीकृति प्रदान करने के लिए इसे राज्य के पक्षी वर्ग का प्रतीक घोषित किया है। राज्य के अन्य प्रतीक चिह्न  हैं, पेड़ों में साल और पशुओं में अरना भैंसा। अरना अर्थात जंगली भैंसा। पक्षियों में तोता ही एक ऐसा जीव माना जाता है, जिसके मनुष्य की बोली की नकल करने के सैकड़ों किस्से हमारी लोक-कथाओं और महाकाव्यों में भरे पड़े हैं। जायसी के पद्मावत के हीरामन को कौन नहीं जानता ? शुक-सारिका अपने प्रेमालाप के लिए प्रसिद्ध हैं, पर शुक को सिखाना पड़ता है, पहाड़ी मैना को मनुष्य की बोली का अनुकरण करना सिखाना नहीं पड़ता है। पहले के कलारसिक अपने घरों में शुक भी पालते थे और सारिका भी।
बस्तर के जंगलों में जो सारिका या मैना पाई जाती है उसकी नकल सुनकर बड़े-बड़े ध्वनि विशेषज्ञ चकरा जाएं। भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जब बस्तर के दौरे पर आईं थीं, तब वे ओरछा और नारायणपुर भी गई थीं। यह वही क्षेत्र है जो इन दिनों नक्सलवादी उथल-पुथल के लिए समाचारों में छाया रहता है। किंवदंती है कि इंदिराजी ने नारायणपुर के विश्रामगृह में जब अपनी ही आवाज सुनी तो वे कौतूहल से भर गईं। यहां मेरी आवाज में बोलने वाला कौन है? उनके सामने पिंजरबद्ध बस्तरिका मैना प्रस्तुत की गई। इंदिराजी को विश्वास नहीं हुआ। वहां के वन अधिकारियों ने पहाड़ी मैना की मानव ध्वनि अनुकरण विलक्षणता के बारे में बतलाया। पर उन्हें विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने मैना से स्वयं बातचीत की… यह क्या? मैना उनके संवादों को ज्यों का त्यों, उसी आरोह-अवरोह और बलाघात में दुहरा रही है। इंदिराजी ने जानना चाहा कि इसे पहाड़ी मैना क्यों कहते हैं ? क्योंकि ये पहाड़ों में रहती हैं, केवल बस्तर के पहाड़ों में। क्या कोई मैदानी मैना भी होती है?
हां, होती है पर उसे कौंदी मैना कहते हैं। कौंदी अर्थात् गूंगी। जब मैं बस्तर के मुख्यालय जगदलपुर के महाविद्यालय में हिंदी का प्राध्यापक होकर पहुंचा तब तक पूरे बस्तर में इंदिराजी और पहाड़ी मैना के किस्से किंवदंती बन चुके थे। यहां विद्यालय का मेरा एक विद्यार्थी था प्रफुल्ल कुमार सामंतराय। प्रफुल्ल का गला बेहद मीठा था, उसकी अंग्रेजी बहुत अच्छी थी, उसे गालिब के सैकड़ों शेर कंठस्थ थे। वह विख्यात अंग्रेजी साप्ताहिक ब्लिट्ज का क्षेत्रीय संवाददाता था। वह बैलाडिला की अयस्क खदानों की रिपोर्टिंग के लिए वन्यांचल के सुदूर क्षेत्रों में जा रहा था। तब वह मुझसे मिलने आया। सर, मैं बैलाडिला से आपके लिए क्या लाऊं?
पत्नी के मुंह से बेसाख्ता निकला- माड़ी मैना।
माड़ी बस्तर की बोली में पहाड़ी को कहते हैं। बस्तर का दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र इसीलिए अबूझमाड़ कहलाता है। हफ्तेभर बाद जब प्रफुल्ल अबूझमाड़ का दौरा कर लौटा तो बांस की तीलियों से बना एक सुंदर-सा पिंजरा उसके साथ था। उस पिंजरे में एक सुकुमार पक्षी था- पहाड़ी मैना। पक्षी बड़ा निरीह-सा लगा, पर जब प्रफुल्ल ने हल्बी में उससे बात की तब उस सुकुमारी मैना ने उसको ज्यों-का-त्यों दुहरा दिया। यदि हमारी पीठ प्रफुल्ल की ओर होती तो हम समझते कि यह मैना नहीं, प्रफुल्ल ही बोल रहा है।
हमने प्रफुल्ल की बताई हुई सारी सावधानियां बरतीं, खाने के लिए चावल की कनकी, कोदों के दाने, घास के बीज। देखो, यहां शोर मत करो, यहां बस्तर की जादूकंठी मैना सो रही है। हम लोगों ने उस विलक्षण मैना का नाम भी रखा- अरण्यप्रिया, दंडकारण्य की उस अनन्य मैना का दूसरा नाम होता भी क्या ? पर उसे देखने के लिए पूरा महाविद्यालय हमारे यहां जुट आया। पर उसे देखने
के लिए पूरा महाविद्यालय हमारे यहां जुट आया। जो आता वह बरांडे में टंगे पिंजरे में झांकता, कोई सीटी बजाता, कोई हंसता। चौथे दिन मैना कुछ लस्त-सी दिखी। पांचवें दिन सबेरे हमने जब दरवाजा खोला तो पिंजरा यथावत था, मैना भी सो रही थी, पर उसकी देह निस्पंद थी- रात बड़ा कोहरा था, सर्द हवा चली थी। मैना के गले में कांटे उग आए थे और ठंड से वह प्रकृति प्रिया अकड़ गई थी। लेकिन मुझे लगा न तो वह ठंड से अकड़ी थी, न ही कोहरे से निस्पंद हुई थी। पिंजरे का बंधन उसे रास नहीं आया था। नगर का कृत्रिम जीवन उसे भारी पड़ गया था, वह वन की स्वच्छंद विहारी थी, शहर में रहना उसे रास नहीं आया, मनुष्यों के संपर्क ने उसके जीवन में जैसे विष घोल दिया हो। दंडकवन की सुरम्य प्रकृति की बाल विहारिनी की मानव निर्मित कारा में मृत्यु हमारे बस्तर प्रवास की सबसे मर्मांतक घटना थी। हम लोग उस मैना को जीवनभर नहीं भूल पाए, उसके बाद हमने किसी भी पक्षी को बंदी नहीं बनाया।
पहाड़ी मैना की प्रजाति अब विलुप्ति के कगार पर है। उसकी मानव ध्वनि की असाधारण अनुकरण क्षमता ही उसकी सबसे बड़ी शत्रु सिद्ध हुई। मुंबई, दिल्ली, पुणे, हैदराबाद जैसे महानगरों के कला रसिकों की वह इतनी बड़ी पसंद सिद्ध हुई कि दूर-दूर के व्यापारी उसे खरीदने के लिए बस्तर आने लगे और विदेशों में भी उसका निर्यात होने लगा। अबूझमाड़, बैलाडिला, ओरछा, छोटे डोंगर, बारसूर, कुटमसरे की पहाडिय़ां पहाड़ी मैना का प्राकृतिक रहवास हैं। नागर जलवायु और असंयमित आहार उसे रास नहीं आया। ध्वनि प्रदूषण उसके लिए महारोग से कम नहीं। उसके गले में कांटे उगे नहीं कि उसकी स्वर तंत्रिका नष्ट हो जाती है। पहाड़ी मैना को संरक्षण की सख्त जरूरत है।

क्रिकेट के जन्म की लोककथा : कांतिकुमार जैन

सभी का मानना है कि‍ क्रि‍केट का जन्‍म इंग्‍लैंड में हुआ, लेकि‍न यह सच नहीं है। इस खेल का जन्‍म छत्तीसगढ़, भारत में हुआ और वह भी त्रेता युग में। इसके जन्‍मदाता हैं राम जी और लखनजी। यकीन नहीं हो रहा है तो पढ़ि‍ए चर्चित संस्‍मरणकार कान्‍ति‍कुमार जैन का संस्‍मरण-

उस समय मुझे यह पता नहीं था कि जिसे सारी दुनिया क्रिकेट के नाम से जानती है, वह हम बैकुंठपुर के लड़कों का पसंदीदा खेल रामरस है। ओडगी जैसे पास के गांवों में रामरस को गढ़ागोंद भी कहते थे, पर सिविल लाइंस में रहने वाले हम लोगों को रामरस नाम ही पसंद था। रामरस यानी वह खेल, जिसे खेलने में राम को रस आता था। अब आप यह मत पूछिएगा कि राम कौन ? अरे राम- राजा राम, अयोध्या के युवराज, त्रेता युग के मर्यादा पुरुषोत्तम दशरथनंदन राम। मुझे राम और राम रस के संबंधों का पता नहीं था। वह तो अचानक ही खरबत की झील के किनारे मुझे जगह-जगह पर पत्थर के रंगबिरंगे गोल टुकड़े मिले- टुकड़े क्या-बिल्कुल क्रिकेट की गेंद जैसे आकार वाले ललछौंहे रंग के पत्थर। खरबत झील से लगा हुआ पहाड़ है। बैकुंठपुर से कोई सात मील यानी लगभग चार कोस दूर। इतवार की सुबह हमने तय किया कि आज खरबत चला जाए, वहीं नहांएगे, तैरंगे और झरबेरी खाएंगे। हम लोगों ने यानी मैंने और जीतू ने, जीतू मेरा बालसखा था। मेरे हरवाहे का लड़का- हम उम्र, हम रुचि। साइकिल थी नहीं तो हम लोग पैदल ही खरबत नहाने निकले। रास्ता सीधा था। छायादार। पास के गांव यानी नगर के तिगड्डे से बिना मुड़े सीधे सामने चले चलो। खरबत की झील आ जाएगी। सामने पहाड़, हराभरा जंगल। खरबत की झील का जल इतना पारदर्शी और निर्मल था कि चेहरा देख लो। हम लोगों ने निर्मल जल में सिर डुबोया ही था कि टकटकी बंध गई। जल में यह किसका प्रतिबिंब है ? आईने में अपने चेहरे का प्रतिबिंब तो रोज ही देखते थे, पर वह चेहरा इतना सुंदर और मनोहारी होग, यह कभी लगा ही नहीं। वह तो अच्छा हुआ कि उस समय तक मैंने नारसीसस की कथा नहीं पढ़ी थी अन्यथा मैं अपना प्रतिबिंब छूने के लिए नीचे झुकता और कुमुदिनी बनकर खरबत झील में अब तक डूबा होता। झील में कुमुदिनी के फूलों की कमी नहीं थी- कुमुदिनी को वहां के लोग कुईं कहते अर्थात् मुझसे पहले भी मेरी वय के लड़के वहां पहुंचे थे, उन्होंने जल में अपना प्रतिबिंब निहारा था और इस प्रतिबिंब को छूने या चूमने के लिए नीचे झुके थे और गुड़प- उनकी वहां जल समाधि हो गई होगी और कालांतर में वहां कुईं का फूल उग आया होगा।

कभी-कभी अज्ञान भी कितना लाभदायी होता है। असल में कुईं के फूलों की तुलना में खरबत की झील और खरबत पहाड़ के बीच के मैदान में ललछौहें रंग के जो गोल-गोल पत्थर पड़े थे, उनमें हम लोगों का मन ज्यादा अटका हुआ था। समझ में नहीं आया कि इतने सारे पत्थर, वह भी एक ही रंग के सारे मैदान में क्यों बिखरे हैं। एक पत्थर उठाया, देखा वह मृदशैल का था- रंध्रिल, हल्का, स्पर्श-मधुर। इतनें में वहां से एक बुड्ढा गुजरा। मैंने उसे बुड्ढा नहीं कहा। कहा- सयान, एक गोठ ला तो बता। सयान कहने से वह बुड्ढा खुश हो गया, उसे लगा कि हम उसे सम्मान प्रदान कर रहे हैं। वह रुका- बोला, नगर के छौंड़ा हौं का?

हम लोग बैकुंठपुर के लड़के थे, बैकुंठपुर रियासत की राजधानी थी, उसे सभी कोरियावासी नगर ही कहते थे। उसने- सयाने, अनुभवी पुरुष ने हमें बताया कि खरबत पहाड़ पर गेरू की खदाने हैं। जोर की हवा चलती है तो वहां के पत्थर लुढ़कते हुए नीचे आते हैं गेरू से लिपटे हुए। इतने जोर की आंधी और शिखर से तल तक आने में इतनी रगड़ होती है कि पत्थरों के सारे कोने घिस जाते हैं और पत्‍थर बिल्कुल गोल बटिया बन जाते हैं। वह बैठकर वहीं चोंगी सुलगाने लगा। सरई के पत्ते की चोंगी में उसने माखुर भरी, टेंट से चकमक पत्थर निकाला, बीच में सेमल की रुई अटकाई और पत्थरों को रगड़ा ही थी कि भक्क से आग जल गई- दो चार सुट्टे लिए ही होंगे कि उसकी कुंडलिनी जाग्रत हो गई। अब उसके लिए न काल की बाधा थी, न स्थान की। काहे का कलयुग, काहे का द्वापर। मैंने जीतू से कहा कि यार, नहाएंगे बाद में, पहले इन गोल-गोल गेदों को बीनो और झोले में भर लो- जितनी आ जाएं। कान्ति भैया, अपन इन टुकड़ों का करेंगे क्या? मैं बोला- करेंगे क्या, इन पर साड़ी की किनारी लपेटेंगे, चकमकी मिट्टी का पोता फेरेंगे और रामरस खेलेंगे। रामरस सुनना था कि छत्तीसगढ़ का वह सयाना चैतन्य हुआ, उसने अपनी चोंगी से इतने जोर का सुट्टा लिया कि लौ तीन बीता ऊपर उठ गई। शायद वह त्रेता युग में पहुंच गया था। वह राम-लक्ष्मण को रामरस खेलते देख रहा था। इतने में एक सारस आया, वह हम लोगों से थोड़ी दूर पर एक टांग के बल खड़ा हो गया, उद्ग्रीव। बैठक वैसे ही जैसे कोई दर्शक क्रिकेट मैच में खिलाड़ी को बैटिंग करते देख रहा हो। ध्यानावस्थित, तदगतेन मनसा।

हम लोग लोग उस सयाने के पास बैठ गए। वह सयाना सचमुच सयाना था, सज्ञान, सुजान। हमें लगा कि वह सदैव से सयान था,  न कभी वह बालक रहा था, न तरुण,  जैसा वह त्रेता में था, वैसे ही आज भी है। वह चोंगी का एक कश लेता, सरई के पत्ते की मोटी बीड़ी से लौ उठता और एक युग पार कर लेता। तीसरे कश में तो वह जैसे राम के युग में ही पहुंच गया। कहने लगा कि राम, सीता और लखन भैया वनवास मिलने पर चित्रकूट से सीधे खरबत आए। सीधे अर्थात् चांगभखार के रास्ते से, जनकपुर, भरतपुर होते हुए। खरबत की झील देखकर सीता दे ने जिद पकड़ ली- बस, कुछ दिन यहीं रहूंगी। कहा रहोगी, न यहां कंदरा, न गुफा। न मठ, न मढ़ी। लखन भैया ने कोई बहस नहीं की। अपनी धनुही उठाई, कांधे पर तूणीर टांगा और खरबत पहाड़ी की टोह लेने निकल गए। जिन खोजा तिन पाइयां। बड़के भैया और भाभी वहां झील तीरे चुपचाप बैठे थे। राम कह रहे थे- थोड़ा आगे चलो, सरगुजा में एक बोंगरा है। लंबी खुली गुफा। वह स्थल भी बड़ा सुरम्य है। वहां के निवासी भी बड़े अतिथिवत्सल हैं, पर सीताजी रट लगाए बैठी थीं- खरबत, खरबत। लक्ष्मण ने लौटकर अग्रज को बताया कि यहां से कोसेक की दूरी पर तीन गुफाएं प्रशस्त हैं, स्वच्छ हैं, जलादि की सारी सुविधाएं हैं। हम लोग चातुर्मास यहीं बिता सकते हैं। तो ठीक है, भाभी को ले जाओ, दिखाओ, उन्हें पसंद आती है तो हम लोग चार महीने यहीं रहेंगे। गुफाओं को देखकर सीताजी प्रसन्न हो गईं। उन्हें अपने मायके मिथिला की याद आई।

ऐसी ही हरतिमा, ऐसा ही प्रकाश, ऐसा ही मलय समीर। लखन भैया, तुम इस गुफा में रहना, यहां मेरा रंधाघर होगा। सीताजी वहां की रसोई को रसोई न कहकर स्त्रियों की तरह रंधागृह कहतीं- रंधनगृह। यह गुफा थोड़ी बड़ी है- इसमें हम दोनों रहेंगे। राम ने भी गुफाओं को देखकर सीताजी के मत की पुष्टि की। चतुर पतियों की तरह। चलो, यहां सीता का मन लगा रहेगा। खरबत में राम परिवार के चार माह बड़े आराम से कटे। विहान स्नान-ध्यान में कटता, प्रात: जनसंपर्क के लिए नियत था। स्त्रियां भी आतीं, पुरुष भी। मध्याह्न में दोनों भाई आखेट के लिए निकल जाते। यही समय फल-फूल, कंदमूल के संचय का होता। आखेट से लौटने के बाद वे क्या करें ? एक सांझ लखनलाल ने दादा से कहा- दादा, शाम को हम लोग कोई खेल खेलें। क्या खेल खेलें ? लक्ष्मण बड़े चपल, बड़े कौतुक प्रिय, बड़े उत्साही। बोले- खरबत पहाड़ के नीचे जगह-जगह गोल-गोल पत्थर पड़े हुए हैं- ललछौंहे रंग के, बिलकुल कंदुक इव। मैं कल भाभी से उनकी सब्जी काटने का पहसुल मांग लूंगा और उससे महुआ की छाल छील लाऊंगा। महुआ की छाल यों ही लसदार होती है। खूब कसकर पाषाण कंदुक पर लपेटेंगे तो एक आवेष्टन बन जाएगा। उससे चोट नहीं लगेगी।

दूसरे दिन लखन सचमुच मधूक वृक्ष का वल्कल ले आए। ललछौंहे पाषाण खंड पर मधूक वल्कल का वह एक आवेष्टन ऐसे चिपका कि गेंद पर परिधान का अंतर ही मिट गया। राम को एक उपाय सूझा। उन्हें याद आई कि सीता के पास एक पुरानी साड़ी है। उसकी किनारी बड़ी सुंदर है- चमकीली। गोटेदार। यदि उस किनारी को मधूक आवेष्टन पर लपेट दिया जाए तो गेंद के आघात का कोई दुष्प्रभाव नहीं होगा। लखनलाल को अब कंदुक क्रीड़ा की कल्पना साकार होती हुई लगी। लखन पास के ही एक गर्त से चकमिकी मिट्टी उठा लाए। चकमिकी यानी चकमक वाली। बैकुंठपुर में नदी-नालों की सतह पर जो चकमिकी मिट्टी दिखाई पड़ती है, वह और कुछ नहीं, अभ्रक है।

लखन की लाई हुई अभ्रक में गेंद को लिथड़ाया जा रहा है। सीता देखकर हँस रही हैं- अरे, ये काम तुम लोगों के नहीं हैं, तुम लेोग तो तीर-धनुष चलाओ। वह सरई के पत्तों की चुरकी में झील से थोड़ा-सा जल भर लाई हैं। अभ्रक पर उन्होंने जल सिंचन किया है। थोड़ा-सा जल अपनी हथेलियों में लेकर गोंद को भी आर्द्र किया है। अरे, गेंद तो अब चमकने लगी है। अब अंधेरा भी होए तो गेंद गुमेगी नहीं, दिखती रहेगी। खेल के नियम तय किए जा रहे हैं। राम ने सीता खपडिय़ों को लेकर तरी ऊपर जमा लिया है- खपड़ी यानी खपरे के टुकड़े, तरी ऊपर यानी नीचे-ऊपर। राम ने उन सात खपडिय़ों की सुरक्षा का भार स्वत: स्वीकार किया है यानी बल्लेबाजी। लखनजी को गेंद ऐसे फेंकनी थी कि सात खपडिय़ों वाला स्तूप ढह जाए। राम जी सावधान-सतखपड़ी के सामने ऐसी वीर मुद्रा में खड़े होते कि लखनजी को लक्ष्य पर आघात का मौका ही नहीं मिलता। इधर लखनजी ने गेंद फेंकी, उधर रामजी ने उस गेंद को ऐसे ठोका कि कभी सामने खड़े आंवले के तने से टकराती, कभी दाएं फैली खरबत पहाड़ी की तलहटी से। कभी-कभी तो रामजी अपना बल्ला ऐसे घुमाते कि गेंद खरबत झील का विस्तार पारकर उस पार। अब लखनजी गेंद के संधान में लगे हैं। दिन डूब जाता, सूर्यदेव अस्त हो जाते। दोनों भाई गुफा में वापस लौटते। क्लांत भाभी देवर से मजाक करती- आज फिर दिनबुडिय़ा। दिनबुडिय़ा यानी दिन डूब गया है और तुम दांव दिए जा रहे हो। लखन कहते- भाभी, भैया ने बहुत दौड़ाया। बल्ला ऐसे घुमते हैं कि जैसे उनके बल्ले में चुंबक लगा हो, गेंद कैसे भी फेंको, भैया, उसे धुन ही देते हैं। दो-एक दिन तो ऐसे ही चला, फिर सीताजी ने मध्यस्थता की। उन्हें देवर पर दया आई- कल से तुम दोनों बारी-बारी से कंदुक बाजी और बल्लेबाजी करोगे। मैं तुम दोनों भाइयों का खेल देखूंगी। कोई नियम विरुद्ध नहीं होना चाहिए।

रामजी को मर्यादा का बड़ा ध्यान रहता है। ये मर्यादा पुरुषोत्तम यों ही तो नहीं कहलाते। फिर सीताजी जैसे निर्णायक। खेल में वे कोई पक्षपात नहीं करतीं। गोरे देवर, श्याम उन्हें के ज्येष्ठ हैं। फिर दर्शक दीर्घा में सारस भी तो हैं- एक टांग पर खड़े क्रीड़ा का आनंद उठाते हुए। निर्णय देने में जरा-सी चूक हुई कि सारस वृंद क्रीं-क्रीं करने लगता है। रामरस की ऐसी धूम मची कि खरबत के आदिवासी युवा तो वहां समेकित होने ही लगे, बैकुंठपुर, नगर, ओडग़ी के तरुण भी खेल देखने के लिए एकत्र हो रहे हैं। चतुर्दिक रामरस का उन्माद छाया हुआ है। राम के परिवार में आनंद ही आनंद है। लोक से जुडऩे का संयोग अलग से। रामजी ने देखा कि आसपास के गांवों के युवा भी इस खेल में सम्मिलित होना चाहते हैं। उन्होंने सीताजी से परामर्श किया, लखनभाई से भी पूछा। सब खेल को व्यापक आधार देने के पक्ष में हैं। अगले दिन से अभ्यास पर्व मनाए जाने की घोषणा हुई। बल्ले सब अपने-अपने लाएंगे। शाखाएं चुनी जा रही हैं, टंगिया से डगालें काटी जा रही हैं, हंसिया से उन्हें छीला जा रहा है। ऊपर का भाग पतला-मूठवाला। हाथ से पकडऩे में आसानी हो। नीचे का भाग चौड़ा, समतल। बल्ला तैयार हो गया तो उसे मंदी आंच पर तपाया जा रहा है। सामने से कितनी भी तेज गेंद आए, बल्लेबाज का बल्ला उसे ऐसे ठोके कि सीमा के पार। राम नवमी के दिन राम और लखन के दल में विशेष प्रतिस्पर्धा होगी। गांव के सयाने आमंत्रित हैं- खरबत के ही नहीं, आसपास के गांवों के भी। नगर के, ओड़गी के। निर्णय निष्पक्ष होना चाहिए। एक चत्वर बनाया गया। धर्माधिकारी उस चत्वर पर बैठेंगे, वाद-विवाद होने पर पंचाट का निर्णय सर्वमान्य होगा। रामरस मर्यादा का खेल है, भद्रजनों का। रामरस से मर्यादा के जो नियम निर्धारित हुए थे, वे आज भी न्यूनाधिक परिर्वतन के साथ अक्षुण्ण रूप से प्रचलित हैं। अब लोग उसे रामरस नहीं कहते, क्रिकेट कहते हैं, पर नाम में क्या धरा है- आज जब कोई कहता है ‘ये तो क्रिकेट नहीं है’ तो भैया, हमारी तो छाती चौड़ी हो जाती है। बैकुंठपुर में क्रिकेट के पूर्वज रामरस का बचपन बीती। छत्तीसगढ़ में क्रि‍केट का पहला मैच खेला गया।

वह सयाना त्रेता युग की पूर्व स्मृतियों में खो गया। उसकी चोंगी की लौ धीरे-धीरे मंदी पड़ रही थी। उसने उस ओर देखा जिस ओर सारस खड़े थे। वह जनता था कि सारस रामरस के ऐसे दर्शक हैं, जिन्हें न भूख प्यास व्यापती है, न प्यास। वे रात-दि‍न रामरस में ऐसे डूबे रहते हैं कि खेलनेवाले थक जाएं, पर उन्हें कोई क्लांति नहीं होती। सीताजी की रसोई तैयार थी- आईं। दोनों भाइयों को ब्यालू की सूचना दी। सभी सयानमन से कहा दादाजी- आप भी ब्यालू हमारे साथ ही करें। धर्मरक्षक लोगों से भी आग्रह किया कि ब्यालू के बाद ही जाइएगा। हम लोगों को लगा कि हम भी तेता युग में हैं। सीताजी ने, लखनलाल ने दादा राम ने भी रोका, पर हम लोग रुके नहीं। घर में बोलकर नहीं आए थे, कौन विश्‍वास करेगा। पिताजी को पता चलेगा तो सौ सवालों का जवाब देना पड़ेगा। हम लोगों ने कहा- दीदी, हम लोग बराबर आते रहेंगे। हम लोगों को भी रामरस में रस आने लगा है। रामरस में कौन अभागा है, जिसे आनंद न आए?

(सामयि‍क बुक्‍स से प्रकाशि‍त पुस्‍तक बैकुंठपुर में बचपन से साभार)