पेशे से अधिवक्ता चंद्रशेखर करगेती का व्यंग्यात्मक आलेख-
9 नवम्बर 2000 को उत्तराखण्ड राज्य बना।अलग राज्य होने पर यहाँ के सभी विभाग व ऑफिसों की स्थापना नये सिरे से हुयी। भले ही आज उत्तराखण्ड उत्तरप्रदेश से अलग होकर एक पर्वतीय राज्य बन चुका है, लेकिन शुरू से लेकर आजतक अधिकांश योजनायें व कार्यप्रणाली उत्तरप्रदेश की तरह हैं । बुरा हाल तो सबसे ज्यादा राजनीतिज्ञों का है। आज अधिकतर वे लोग इस प्रदेश के भाग्यविधाता बने हुए हैं जो इस राज्य की मूलभाषा को ही नहीं जानते, जब राजनेताओं के हाल ये है तो अधिकारियों के तो माशाल्लाह। किसी को कर्नाटक से उठाकर कर लाया गया तो किसी को हैदराबाद से तो किसी को मुम्बई से। कुछ को तो अपना नया घर इतना रास आया कि अपने घर का रास्ता ही भूल गये । उत्तराखण्ड संभवत: देश का पहला ऐसा राज्य होगा जहाँ घर की मुर्गी दाल बराबर है, इस राज्य के मुखिया (राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों) ऐसे हैं जिन्हें यहाँ की बोली तक नहीं आती।
इन बारह सालों के दौरान हमारे प्रदेश में राज्य के बाहर से आयात किये गये उत्कृष्ट अधिकारियों ने मंत्रियों के साथ मिलकर कई स्कीमें ऐसी निकालीं जिन्हें पूरे देश में सराहा गया । इन नीतियों को लागू करने के लिये हमारे प्रदेश के मंत्री व अधिकारीगण बहुत बार विदेश यात्रा के लिये गये । इनमें कुछ यात्रा किसी सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिये हुई हैं, तो बहुत सी यात्राएं विदेश में नयी चीजें समझने, सीखने व स्टडी करने के लिये की गईं । इन यात्राओं का उद्देश्य बाहरी दुनिया से कुछ सीख कर उस तकनीक का उपयोग प्रदेश की बेहतरी के लिये किया जाना था।
हर एक यात्रा में प्रदेश सरकार के लाखों रुपये खर्च होते हैं । हर एक यात्रा की जरूरत का पहले आंकलन किया जाता है कि इसकी आवश्यकता क्यों हैं ? इससे प्रदेश को तत्काल और दूरगामी, क्या लाभ होंगे ? इन यात्राओं में यह भी देखने की आवश्यकता होती है कि जो लोग प्रदेश सरकार की तरफ से जा रहे हैं, उनका ओबजर्वेशन कैसा है, तकनीकी ज्ञान कैसा है और आवश्यक बातों को समझने की और फिर यहाँ वापस आकर प्रदेश के लाभ के लिये उपयोग करने के लिये क्षमता कितनी है ?
प्रदेश हित के लिए शायद यात्रा से पहले उससे होने वाले फायदें की रिपोर्ट व उसकी जरूरत की रिपोर्ट व प्रतिनिधिमण्डल के सदस्यों की सक्षमता की रिपोर्ट बनायी गई होगी । वापसी के बाद उत्तराखण्ड में कैसे नयी स्कीम लागू की जाये, इसकी रिपोर्ट भी दी गई होगी । शायद उन रिपोर्टों के अनुसार प्रदेश के बहुमुखी विकास के लिए कार्य भी किये होंगे और शायद बहुत विकास भी हो गया होगा !
बस यह दिखाई नही देता, अदृश्य है !
वैसे इस बारे में न तो कोई उच्च पदस्थ पूछता है और न ही कोई बताता है। हो सकता है प्रदेश को अदृश्य लाभ कराने के लिए उन्हें भी विदेश यात्रा का मौका हाथ लगे ?
आजकल चर्चा है कि राज्य में ओलम्पिक स्तर के खिलाड़ी पैदा करने के लिये फिर राजनेताओं और अधिकारीयों का एक दल एक माह के लिये लंदन ओलम्पिक का टिकट कटवाने वाला है। अब इन अधिकारियों और मंत्रियों ने बचपन में भले ही गिल्ली-डंडा भी न खेला हो, पर इनसे पूछे कौन कि कौन से खेल में महारत हासिल है ? कितने ठो मेडल जीते हो भाई राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय खेलों में ? पर आज समझ में आ रहा है कि खिलाड़ी पैदा करने के लिये खुद का खिलाड़ी नहीं, राजनेता होना जरूरी है क्योंकि भारत भर में उससे बड़ा खिलाड़ी कौन ?




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