कवि चंद्रकुँवर वर्त्वाल और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला 1939 से 42 तक लखनऊ में एक-दूसरे के सम्पर्क में रहे। उसके बाद परिस्थितियां ऐसी बनीं कि दोनों बिछुड़ गये। अस्वस्थ होने के कारण वर्त्वाल हिमवंत की ओर चले गये। निराला भी उन दिनों अस्वस्थ थे। यातनाओं के बीच उनका जीवन चल रहा था। एक दिन वर्त्वाल ने निराला को पत्र के रूप में ‘मृत्युंजय’ कविता भेजी जो उनके जीवन तथा निराला के काव्य की उच्चतम व्याख्या है-
सहो अमर कवि ! अत्याचार सहो जीवन के,
सहो धरा के कंटक, निष्ठुर वज्र गगन के !
कुपित देवता हैं तुम पर हे कवि, गा गाकर
क्योंकि अमर करते तुम दु:ख-सुख मर्त्य भुवन के,
कुपित दास हैं तुम पर, क्योंकि न तुमने अपना शीश झुकाया
छंदों और प्रथाओं के निर्बल में,
किसी भांति भी बंध ने सकी ऊँचे शैलों से
गरज-गरज आती हुई तुम्हारे निर्मल
और स्वच्छ गीतों की वज्र-हास सी काया !
निर्धनता को सहो, तुम्हारी यह निर्धनता
एक मात्र निधि होगी, कभी देश जीवन की !
अश्रु बहाओ, छिपी तुम्हारे अश्रु कणों में,
एक अमर वह शक्ति, न जिस को मंद करेगी,
मलिन पतन से भरी रात सुनसान मरण की !
अंजलियां भर-भर सहर्ष पीवो जीवन का
तीक्ष्ण हलाहल, और न भूलो सुधा सात्विकी,
पीने में विष-सी लगती है, किन्तु पान कर
मृत्युंजय कर देती है मानक जीवन को !



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