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साहित्य-कला के साथ दिल्ली सरकार का खेल

कला और साहित्य के करोड़ों के बजट को राष्ट्रमंडल खेलों की भट्ठी में झोंक देने के निर्णय ने एक बार फिर दिल्ली सरकार की मनमानी और साहित्य व कला के प्रति उसके नजरिये की पोल खोल दी है। सरकार ने छह अकादमियों और कला परिषद के बजट में 15 करोड़ से ज्यादा की कटौती कर दी है।
दिल्ली सरकार को यहीं तसल्ली नहीं हुई। उसने हिंदी, पंजाबी, उर्दू, संस्कृत, सिंधी और मैथिली-भोजपुरी अकादमियों तथा कला परिषद को पत्र भेजकर तमाम कार्यक्रम स्थगित करने का निर्देश दिया है। अकादमियों को केवल 20-20 लाख दिए जाएंगे, वे भी इस शर्त के साथ कि इन्हें राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान आयोजित कार्यक्रमों में ही खर्च किया जाएगा। कार्यक्रम और आयोजन स्थल भी सरकार तय करेगी।
दिल्ली सरकार ऐसा कारनामा पहली बार नहीं कर रही है। वरिष्ठ लेखक कृष्ण बलदेव वैद को लेकर हुआ विवाद जगजाहिर है। एक कांग्रेसी नेता के कहने पर उन्हें शलाका सम्मान नहीं दिया गया। इसके विरोध में वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने भी शलाका सम्मान ठुकरा दिया। उनके अलावा छह और रचनाकारों ने हिंदी अकादमी पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया। लेखकों के विरोध के बावजूद पुरस्कार समारोह आयोजित किया गया। इसका आयोजन किसी सभागार में न कर दिल्ली सरकार के सचिवालय में किया गया। हिटलरी रुख अपनाते हुए पत्रकारों तक को एंट्री नहीं दी गई। किसी सम्मानित लेखक को एक मिनट भी बोलने का भी मौका नहीं दिया गया। इस तरह का अभूतपूर्व साहित्यिक समारोह संभवत: पहली बार हुआ। यह भी शायद पहली बार हुआ कि किसी अकादमी के मुख्य पुरस्कार सहित कई और पुरस्कार ठुकरा दिए जाने के बाद भी समारोह आयोजित किया गया हो।
दिल्ली की मुख्यमंत्री छह अकादमियों की अध्यक्ष हैं। मुख्यमंत्री होने के नाते उन्हें राजनीतिक-प्रशासनिक कार्य करने पड़ते हैं। वे सभाओं, बैठकों, उद्घाटन आदि महत्वपूर्ण कार्यों में व्यस्त रहती हैं। साहित्य-कला जैसे तुच्छ विषयों के लिए उनके पास समय कहां! ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि उन्होंने साहित्य सृजन किया हो या वह भाषाविद् हों या कला-साहित्य के क्षेत्र में उनका किसी भी रूप में कोई योगदान रहा हो। ऐसे में वह अकादमियों में सक्रिय भूमिका कैसे निभा सकती हैं? क्या एक व्यक्ति का छह अकादमियों का अध्यक्ष बनना व्यवहारिक है? यह तो एक नजीर है। कमोवेश यह स्थिति सभी राज्यों की है। फिर क्यों न अकादमियां राज्य सरकार के शिकंजे से मुक्त की जाएं। उसमें पदाधिकारी रचनाकारों हों और उन्हीं के द्वारा चुने जाएं।
डॉक्टरों की संस्था डॉक्टर चलाते हैं, उद्योगपतियों की संस्था उद्योगपति चलाते हैं। यानी संस्था जिसकी होती है, उसी से जुड़े लोग उसे संचालित करते हैं। फिर रचनाकारों और कलाकारों की संस्थाएं राजनेता क्यों चलाएंगे?
असल में सरकारें साहित्य व कला अकादमियों को अपना भोंपू बनाकर रखना चाहती हैं। उनकी मंशा रहती है कि ऐसे लेखकों-कलाकारों को सम्मानित किया जाए, जो उनकी गलत-शलत नीतियों का समर्थन करें और विरोध में एक शब्द न बोलें? चुनाव में प्रचार भी करें तो सोने-पे-सुहागा। यह तभी संभव है जब अकादमियों पर उनकी पकड़ हो।
एक वजह यह भी है कि राजनेताओं की सोच सामंती है। वह कुर्सी मिलने पर खुद को जनसेवक नहीं, राजा समझते हैं। उसी की तर्ज पर पुरस्कार व सम्मान बांटने का अधिकार अपने हाथ में रखना चाहते हैं। इससे उनके दंभ की तुष्टि होती है।
आजकल की जोड़तोड़ की सिद्धांतहीन राजनीति की उपज अधिकतर नेता रीढ़विहीन हैं। ये अंदर से खोखले, वैचारिक रूप से दिवालिया और मूल्यहीन हैं। ये इतने कमजोर हैं कि वैचारिक आलोचना भी इन्हें भयभीत कर देती है। इन्हें स्तुति गान ही अच्छा लगता है। यह तभी संभव है, जब इनके हाथ में प्रलोभन देने की ताकत हो। इसलिए राज्य सरकारों से यह अपेक्षा करना बेकार है कि वे स्वेच्छा से अकादमियों को अपने चुंगल से मुक्त कर देंगी।
रचनाकार और कलाकार निजी स्वार्थों और प्रलोभनों से ऊपर उठकर उन अकादमियों और कला परिषदों में कोई पद ग्रहण नहीं करें, जो राज्य सरकारों के अधीन हैं। इनसे मिलने वाले पुरस्कारों और सम्मानों को भी ठुकरा दें। तभी राज्य सरकारों पर दबाव बनेगा और वे इस दिशा में कदम उठाएंगी।
संस्मरणकार कांतिकुमार जैन का कहना है कि सरकारों का साहित्य व कला का एजेंडा केवल मुखौटा है ताकि कोई यह न कह सके कि सरकार कला विरोधी है। इनके लिए कला-साहित्य का प्रोत्साहन केवल रस्म अदायगी है। सरकार का मकसद केवल राजनीति करना, वोट बैंक बढ़ाना ओर यह देखना है कि पैसा कहां से कमाया जा सकता है।
आज तक प्रेमचंद का स्मारक नहीं बनाया जा सका है। सरकारी पत्रिकाओं की हालत खराब है। वे स्तरहीन हैं और उनमें पठनीय सामग्री नहीं होती।
हमारी सरकारों की प्राथमिकता में कला, साहित्य, संस्कृति नहीं है। वे खुद को कला प्रेमी, साहित्य प्रेमी साबित करने के लए आयोजन करती हैं, लेकिन भयभीत भी रहती हैं कि कोई सरकार के खिलाफ न बोल दे। इसलिए सम्मानित साहित्यकारों को बोलने का मौका भी नहीं दिया जाता। उनका सम्मान केवल विज्ञापन के लिए करती हैं।
अकादमियों को सरकारों के चुगंल से मुक्ति मिलनी चाहिए।