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‘बोल कि लब आजाद है तेरे’ पर गोष्‍ठी 15 को

देहरादून : महिला समाख्या, उत्तराखण्ड ने अपनी कार्यकर्ताओं के जीवन में आये उतार-चढ़ाओं और संघर्ष के बाद उनको मिली सफलताओं को ‘बोल कि लब आजाद है तेरे’ नाम की किताब में संकलित किया है। 15 नवम्बर, 2011 को अकेता होटल, राजपुर रोड, देहरादून में प्रातः 10.30 बजे से इस किताब पर केन्द्रित एक दिवसीय गोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। इस किताब के बहाने समाज की आधी आबादी की स्थिति-परिस्थिति को खंगालने की कोशिश की जाएगी। गोष्ठी में इस पुस्तक की सच्ची कहानियों पर तथा इनके माध्यम से महिलाओं की स्थिति पर चर्चा होगी। लेखिका सुश्री सुधा अरोड़ा, कृष्णा खुराना, अतुल शर्मा, कमल जोशी, सुभाष पंत आदि गोष्‍ठी के वक्‍ता होंगे।

साहित्य नहीं सच : फ़ज़ल इमाम मल्लिक

संस्‍था ‘महि‍ला सामख्‍या’ ने अन्‍तर्राष्‍ट्रीय महि‍ला दि‍वस के सौ वर्ष पूरे होने के अवसर पर आठ संघर्षशील महि‍लाओं के जीवन पर आधारि‍त कहानि‍यों की पुस्‍तक ‘बोल के लब आजाद हैं तेरे…’ का प्रकाशन कि‍या है। इस पर लेखक-पत्रकार फ़ज़ल इमाम मल्लिक की समीक्षा-

उत्तराखण्‍ड में महिलाओं के बीच काम कर रही संस्था ‘महिला सामख्या’ सामाजिक और जन सरोकारों को लेकर न सिर्फ सचेत है, बल्कि दूरदराज और दुर्गम पहाड़ी इलाकों में उन महिलाओं की ताक़त भी है जो समय और समाज की बंदिशों मे बंधी अभिशप्त ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं। पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं के लिए कई बार जीवन उतना आसान नहीं होता, जितना हम और आप सोचते-समझते हैं। उत्तराखण्‍ड  के दूरदराज़ के इलाकों में रहने वाली अपढ़ महिलाओं की स्थिति भी कुछ ज्यादा अच्छी नहीं है। इलाक़ा चाहे मैदानी हो या पहाड़ी, महिलायें लगभग हर जगह एक तरह की स्थितियों से जूझती हैं। हालांकि यह भी सही है कि शोषण, अत्याचार और ज़ुल्म का शिकार सिर्फ़ अनपढ़ या कम पढ़ी-लिखी महिलायें ही नहीं होतीं, शिक्षित महिलायें भी कई स्तर पर इस शोषण का शिकार होती रहती हैं। इसकी वजहें ढेरों हैं। समाज और परिवार तो इसके लिए ज़िम्मेदार है ही, कई बार ख़ुद महिलायें भी इसका कारण बन जाती हैं। ‘महिला सामख्या’ ऐसी ही महिलाओं के बीच लम्‍बे समय से काम कर ही रही, उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी तो दे ही रही है, साथ ही शिक्षित कर अपने पैरों पर खड़े करने की कोशिश में भी जुटी हुई है। बड़ी बात यह है कि उन महिलाओं को एक लम्‍बी-चौड़ी धरती और खुला-खुला आकाश देने के लिए संस्था की महिलायें न सिर्फ उनके बीच जाकर जनगीतों के ज़रिये सरोकार बनाती हैं बल्कि उन्हें गीत लिखने के लिए प्रेरित भी करती हैं। लघुनाटकों का लेखन और मंचन भी संस्था की महिलाएं करती हैं और जीवन के बेहतर तरीक़े से जीने के लिए उन्हें प्रेरित करती हैं जो घर और समाज के बीच कहीं पिस कर रह गई हैं।

संस्था की निदेशक गीता गैरोला का सरोकार साहित्य से भी है इसलिए इन महिलाओं को साहित्य से जोड़ने की कोशिश भी संस्था की होती है। लेकिन सिर्फ गीता गैरोला ही नहीं संस्था की दूसरी सदस्यों का अनुराग भी किताबों से है इसलिए संस्था ने उन महिलाओं के संघर्ष और जीवन को बड़े समाज से जोड़ने के लिए ‘बोल के लब आजाद हैं तेरे…’ का प्रकाशन किया है। इस पुस्तक में आठ महिलाओं की जिंदगी को हमारे सामने रखा गया है। इन कहानियों में फ़िक्शन कहीं नहीं है, सिर्फ़ यथार्थ है। जो जीवन उन महिलाओं ने जिया है उसे जस का तस सामने रख दिया गया है। न कोई अलंकरण, न कोई विशेषण, न किसी तरह का प्रयोग। आख़िर यह सब संभव भी तो नहीं है, जब जीवन को जस का तस देखते हैं तो फिर सारे संज्ञा-विशेषण गौण हो जाते हैं। रह जाती है जीवन की कड़वी और तल्ख़ हक़ीक़त। इसमें आप या हम कमला, अनामिका, मधुली, सितारा, मोहिनी, सुनीता, नंदी और मंगला जैसी महिलाओं के जीवन को जलते और गलते देखने के लिए अभिशप्त होते हैं। इन महिलाओं के जीवन को कृष्णा खुराना, डा गिरिबाला जुयाल, डा अतुल शर्मा, गीता गैरोला और कमल जोशी ने क़लमबद्ध किया है, लेकिन सच यह भी है कि जीवन की सच्चाई को कौन भला शब्दों में ढाल सका है। ‘बोल के लब आज़ाद हैं तेरे…’ की कहानियों को पढ़ते हुए ऐसा लगता भी है कि हम अपने बनाए हुए जहन्नुमों से गुज़र रहे हैं जहाँ ज़िंदगी कई-कई रंग में जलती है। इन कथाओं में काली और स्याह रात है तो सुबह का उजाला भी। संघर्ष और जीवन में कुछ करने की ललक के बीच ही उन महिलाओं ने काली और स्याह रात को पीछे छोड़ कर उजली और निखरी सुबह की तरफ़ क़दम बढ़ाए। यह भी सही है कि इन महिलाओं की राह में पग-पग पर परेशानियां खड़ी की गईं लेकिन उन्होंने ‘महिला सामख्या’ की साथियों की मदद से इन परेशानियों को दूर करने में कामयाबी पाई। हो सकता है कि साहित्यकारों और आलोचकों के लिए यह पुस्तक बहुत महत्त्व की न हो लेकिन इसमें भी दो राय नहीं कि इस पुस्तक का साहित्यिक महत्त्व भले नहीं हो लेकिन इसका सामाजिक महत्त्व है और यह महत्त्व उन साहित्यिक कृतियों से कहीं ज्यादा है जो सिर्फ पुस्तकालयों की ख़रीद के लिए लिखी और छापी जाती हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि महिला सामख्या इस तरह के पुस्तकों के प्रकाशन का सिलसिला जारी रखेगी, ताकि हम सच्ची और अच्छी कहानियां भी पढ़ सकें।

पुस्‍तक परि‍चय-
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे (आत्मकथा), संपादन: गीता गैरोला, कमल जोशी, संपादन सहयोग: डा. चंद्रकला भंडारी, हेमलता खंडूड़ी,
प्रकाशक: महिला सामख्या, 10, इंदिरा नगर, फेज-1, देहरादून (उत्तराखंड)।

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सितारा : कमल जोशी

 

सितारा : कमल जोशी

उत्‍तराखंड में महिलाओं के लिए काम कर करे सामाजिक संगठन ‘महिला समाख्‍या’ ने कई ऐसी महिलाओं का जीवन वृत्‍त प्रकाशित किया है, जो विषम परिस्थितियों का मुकाबला कर खुद तो पैरों पर खड़ी हुई हीं, अन्‍य महिलाओं का भी सहारा बनीं। ऐसी ही साहसी महिला है- सितारा। सितारा की जीवन गाथा सामाजिक विश्‍लेषण की मांग करती है, जिसे लिखा है वरिष्‍ठ फोटो जर्निलिस्‍ट और लेखक कमल जोशी ने-

सितारा आज खुश है। उसे स्वयं पर गर्व है कि वो किसी जरूरतमंद महिला के काम आ सकी है। रामन्ती बार-बार सितारा का हाथ पकड़ कर उसकी अहसामंद हो रही है। सितारा के साहस के कारण ही उसकी मजदूरी मिल पाई है। रामन्ती को इन पैसों की कितनी सख्त जरूरत थी। वो बीमार बेटी का इलाज अब अच्छी तरह करवा पायेगी।

सितारा नरमी और स्नेह से रामन्ती का हाथ दबाती है। रामन्ती गाँव की सभी महिलाओं की शुक्रगुजार है, सबने उसका साथ न दिया होता तो पंचायत का वार्ड सदस्य रामन्ती की मेहनत की कमाई कब उड़ा गया, पता ही नहीं चलता। सीधी-सादी रामन्ती से वार्ड सदस्य ने मनरेगा कार्यक्रम में मजदूरी करने के लिए बना जाब कार्ड मांगा। रामन्ती ने सोचा, अपने गाँव का जाना-पहचाना आदमी है। मजदूरी के रुपये लेने में सहायता करने के लिये ही जाब कार्ड माँग रहा है। वार्ड सदस्य ने कहा भी यही था। पता नहीं कब उसने जाब कार्ड में 32 दिन का रोजगार चढ़ाकर 3632 रुपये की मजदूरी स्वंय ले ली।

कई दिनों तक जाब कार्ड वापिस न मिलने पर रामन्ती ने वार्ड सदस्य से जाब कार्ड वापिस माँगा। वो बहाने करने लगा। उसके बहानों से रामन्ती को शक हुआ। छानबीन करने पर पूरी सच्चाई रामन्ती के सामने खुल गई। उसने गाँव के महिला संगठन की बैठक में वार्ड सदस्य की धोखाध्ड़ी की समस्या रखी। उस दिन बैठक में सितारा भी मौजूद थी। सितारा ने पूरी घटना की जानकारी खण्डविकास अधिकारी को दी तथा जाँच करने का आग्रह किया। बी.डी.ओ. के बात करने के तरीके से सितारा समझ गई कि ये कोई कार्यवाही करने वाला नहीं है।

वो कुछ महिलाओं को लेकर ब्लाक आफिस में बी.डी.ओ. से फिर मिली। बी.डी.ओ. जाँच का झूठा आश्वासन देकर चुप बैठ गया। इसी बीच महिलाओं ने सितारा के साथ मिलकर एक रणनीति बनाई। वार्ड सदस्य को बैठक में बुलाकर बताया कि उन्हें उसकी बेईमानी की सारी सच्चाई पता चल गई है। यदि वो लिखित माफी माँग ले, तो ही बच सकता है वरना वो सब उसके खिलाफ जाँच करवायेंगी। उसने सोचा, इनकी शिकायत से कहीं वार्ड मेम्बरी न चली जाये। लिखा हुआ देने पर ये अनपढ़ महिलाऐं क्या कर लेंगी और लिखित माफीनामें में पूरी घटना का स्पष्ट जिक्र कर दिया।

संगठन को यही चाहिए था। कुछ महिलाएं सितारा को साथ लेकर पुनः ब्लाक कार्यालय शिकायत करने पहुँची। वहाँ किसी ने महिलाओं की बात पर तवज्जो नहीं दी। हारकर महिलाओं ने पत्रकारों से संपर्क किया और पूरी घटना की जानकारी उन्हें दे दी। अगले दिन यह घटना सभी अखबारों की सुर्खियां बन गई। अखबारों में घटना की खबर पढ़कर मुख्य विकास अधिकारी ने बी.डी.ओ. को घटना की जाँच करने के आदेश दिये।

बी.डी.ओ. को सारी फसाद की जड़ सितारा ही दिखाई दी। उसने स्थानीय मुस्लिम समुदाय के प्रभावशाली लोगों और पंचायत सदस्यों से संपर्क कर उनके द्वारा सितारा पर दबाव बनाने की बहुत कोशिश की। दो सौ से ज्यादा लोगों की बैठक बुलाई गई। इसमें अकेली सितारा ही मुस्लिम महिला थी। सारे मुस्लिम प्रतिनिधि धर्म का वास्ता देकर मामले को रफादफा करने का दबाव डालते रहे।

सितारा हैरान थी। सितारा को लगा था, उसका हौसला देखकर सारा मुस्लिम समुदाय उसकी तारीफ करेगा। पर यहां तो मामला उल्टा था। सभी उस बेईमान को छोड़ देने की बात कर रहे थे। उसने बेखौफ साफ-साफ कहा-

‘‘मेरे धर्म ने मुझे सच्चाई से अन्याय का विरोध करना सिखाया है। इसलिए मैं महिलाओं का साथ दूँगी। मैं धर्म से पहले फर्ज निभाऊँगी। चाहे आप लोग मुझे धर्म से निकाल दें। सितारा की हिम्मत के आगे कोई दबाव नहीं टिका। बी.डी.ओ. को वार्ड सदस्य के खिलाफ रिपोर्ट देनी पड़ी और रामन्ती को उसके हक के 3632 रुपये मिल गये। सितारा की इस जीत के पीछे पूरे संगठन की ताकत थी। संघ की महिलाओं ने उसकी हिम्मत की तारीफ की।

आज सितारा मुस्कुरा रही थी। पर उसकी जिंदगी हमेशा मुस्कुराहटों से भरी नहीं रही। उसने तो बस कांटों भरे तथा पथरीले रास्ते ही देखे थे। अपनी जिंदगी के पिछले पृष्ठों को टटोलते ही उसे झुरझुरी होने लगती है। जिंदगी में तमाम अभाव थे। बस दो ही चीजें उसके पास थी- हिम्मत और साथ में कुछ सपने। इन्हीं के सहारे जिंदगी का सफर तय कर आज वो यह मुकाम पा सकी। मुश्किल से मुश्किल दिनों में भी उसके सपने जिंदा रहे।

सितारा कट्टर सुन्नी परिवार में 15 दिसम्बर, 1968 को देहरादून में पैदा हुई। उसे गिनना भी नहीं आया था,  तब भी उसके परिवार में 15 की गिनती बार-बार सुनाई पड़ती। अभावग्रस्त परिवार में 15 सदस्य थे जिनके मुँह के लिए निवाले जुटाना आसान नहीं था। दो भाई और तीन बहनों में दूसरे नम्बर पर सितारा थी। घर में अब्बू-अम्मी के अलावा दादा-दादी दो बुआ व चार-चार चाचा रहा करते थे।

वो नहीं जानती कि अचानक उसके पिता ने उसकी माँ तथा बच्चों को बिजनौर के पुश्तैनी मकान में क्यों भेज दिया। वे वहां के हालातों से समझौता कर ही रहे थे कि वालिद दुर्घटना का शिकार हो गए। कमाने वाला बीमार हो तो पैसों की दिक्कत होना लाजिमी था। उन दिनों खाने के नाम पर आलू का घोल ही होता था। अम्मी का उदास चेहरा देखकर बच्चे कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।

बडे़ भाई ने मजदूरी शुरू की। भाई के कमाये दो रुपये से घर चलता। इसी बीच छोटी बहन बीमार हो गई। अब हाल ये था कि दो रुपये में घर के लिये खाना लिया जाये या बहन के इलाज पर खर्च किया जाये। यहाँ भूख ने बाजी मारी और बहन बिना इलाज के गुजर गई। धर्म ने यहाँ कुछ सहायता नहीं की। आस पड़ोस की लड़कियों को स्कूल जाते देख कर सितारा की भी पढ़ने की इच्छा होती।

उन्हीं दिनों उनकी एक रिश्तेदार की लड़की होमसांइस की परीक्षा का सामान ले जाने के लिए सितारा को अपने साथ स्कूल ले गई। स्कूल के माहौल ने सितारा पर जादू कर दिया। वो घरवालों के पीछे पड़ गई कि वह पढ़ेगी। उसके रोने-धोने से अजीज आकर उसका दाखिला यतीमखाने के स्कूल में कर दिया गया। कक्षा शुरू हुए 6 माह हो चुके थे। मेहनती सितारा ने 6 माह पढ़ने पर ही कक्षा एक पास कर ली। माँ थोड़ा खुश हुई। सितारा जाने क्यों उन्हें ज्यादा अच्छी लगती थी। पढ़ने जो लगी थी। शायद वो भी कभी पढ़ना चाहती होंगी!

अचानक ही वालिद ने परिवार को देहरादून बुला लिया। यहाँ पहला काम नन्हीं सितारा ने अपने लिए स्कूल ढूँढने का किया और जिदकर माजरा के महेशानन्द स्कूल में दाखिला ले लिया। स्कूल के बच्चे हाफटाइम में गडेरी, चाकलेट,  छोले खाते। सितारा की फीस के लिए भी पैसे नहीं होते थे तो उसे चाट खाने के पैसे कहाँ जुटते। वो मन मसोस कर रह जाती। एक दिन स्कूल जाते समय उसकी नजर 50 पैसे के सिक्के पर पड़ी। माँ ने वह किसी काम के लिये आले पर रखा था। सितारा की नीयत डोल गई। उसने चुपके से वह अठन्नी बस्ते में डाल ली। स्कूल जाते हुए जान बूझ कर वह अठन्नी सड़क पर गिराकर भाई से बोली-

‘‘अठन्नी गिरी है। चल उठाते हैं।’’ हाफ टाइम में दोनों भाई-बहन ने जमकर चाट-पकौड़े की ऐश उड़ाई। ऐसे मौके उन गरीबों को कहाँ से मिलते थे!

गरीब घर में 50 पैसे भी बहुत होते हैं। लौटने पर अम्मी ने पूछा कि आले पर रखे 50 पैसे किसने उठाए ? सितारा साफ मुकर गई। डाँट के डर से भाई ने पोल खोल दी कि सितारा को आज रास्ते में 50 पैसे मिले थे- अम्मी माजरा समझ गई। माँ ने सितारा की खूब पिटाई की। सितारा को क्या मालूम था कि अम्मी के लिये 50 पैसे की कितनी कीमत थी। माँ गुस्सा सितारा पर नहीं,  अपने हालातों पर उतार रही थी। पिटाई के बाद ऐसे कामों से सितारा ने तौबा कर ली। शायद अम्मी का दुःख भी उसे साल गया था।

वो छठी कक्षा में पहुँची ही थी कि वालिद फिर बीमार पड़ गए। कमाई का जरिया रुक गया। दादा-दादी ने कोई मदद नहीं की। हालात ये थे कि चार भाई-बहन तथा माँ एक ही चारपाई पर सोते थे। ऐसे में सितारा की पढ़ाई कैसे होती। पर माँ ने हिम्मत जुटाई- मुहल्ले से बुनाई का काम ले लिया। रात-रात भर बुनाई करती। सितारा माँ की बुनाई में सहायता करती-फिर थककर बगल में सो जाती। माँ के साथ बुनाई करते-करते सितारा जिंदगी के तानों-बानों को भी समझ रही थी। पिता की बीमारी के खर्चों की वजह से परिवार के खाने तक के लाले पड़ गए। इसके बावजूद सितारा ने स्कूल नहीं छोड़ा- इन्हीं हालातों में आठवीं पास की। शायद सितारा को यह समझ आ रहा था कि पढ़ाई ही परिवार की बीमारी का इलाज है।

माँ की हिम्मत तथा बेटी की दिलेरी ही थी कि विषम परिस्थितियों में भी पिता का स्वास्थ्य ठीक होने लगा। वे थोड़ा कामकाज करने लगे। घर के हालात कुछ सुधरे।

इधर घर के हालात सुधरे, पर सितारा के अपने हालात बिगड़ने लगे। वो 14 साल की हो गई थी। दादा ने स्कूल न जाने का फरमान सुना दिया- ‘‘सितारा बड़ी हो गई है। उसे पर्दे की हद में रहना होगा। घर से बाहर जाना वाजिब नहीं।’’

सितारा की समझ में नहीं आया कि जब वे भूखों मर रहे थे, तब दादा को कोई फर्ज याद नहीं आया- आज उसे अचानक पर्दे में बांधने,  बाहर जाने से रोकने के फर्ज पर ये मुस्तैदी क्यों ? पुरुषों के बनाए समाज पर यह उसका पहला सवाल था।

माजरा गाँव में आठवीं से आगे का स्कूल नहीं था। आगे पढ़ने देहरादून के कालेज में जाना था। दादाजी ने सख्त हिदायद दी- ‘‘हमारे खानदान की कोई लड़की बिना बुर्के के घर से बाहर नहीं जाती। ऐसे में सितारा स्कूल कैसे जा सकती है?’’

‘‘पता नहीं वो खानदान कहाँ था- जब हम भाई-बहन बिना खाए  सोते, बिना कपड़ों के सर्दी का मौसम काटते।’’-  सितारा सोचती। खानदान आया तो बस पढ़ाई रोकने और बुर्का पहनाने। बुर्के के नाम से ही उसे ऐसा लगता जैसे उसे कैद में जकड़ दिया गया है- वो जानती थी कि अगर उसने पढ़ाई छोड़ी तो ऐसे माहौल में वह जिंदा भी नहीं रह पाएगी।

विरोध की पहली सीढ़ी के रूप में उसने घर का सारा काम करना बंद कर दिया। कई दिनों तक खाना नहीं खाया। उसकी एक पक्की सहेली सुमन गुरुनानक स्कूल में दाखिला लेने जा रही थी। सितारा से रहा नहीं गया। वह भी घरवालों से लड़-झगड़ कर उसके साथ गुरुनानक स्कूल में एडमिशन फार्म भर आई। अम्मी के साथ बुनाई कर उसने कुछ पैसे जोडे़ थे। बचत के पैसे से एडमिशन की फीस जमा की। सुमन के किसी रिश्तेदार की सहायता से,  जो उसी कालेज में काम करता था,  उसे फीस माफी का फार्म भी मिल गया। फीस माफी की भी दर्खास्त दे दी। हिम्मत वालों का साथ खुदा के बंदे दे न दें- खुदा देता ही है। एडमिशन के साथ ही फीस माफ हो गई। यहाँ सब काम में अम्मी की पूरी सहमति थी।

सितारा के स्कूल जाने से घर में झगड़े बढ़ने लगे। परिवार के पुरुषों का अहम आड़े आ रहा था। उसका शहर के स्कूल में अकेले बस से जाना, जहाँ मर्द भी हों,  अपने समुदाय में उसके परिवार की बेइज्जती थी। कई बार लड़के पीछा करते,  ताने कसते,  इसकी सजा भी हर लड़की की तरह सितारा को ही मिलती। लड़कों द्वारा छेड़े जाने पर मार सितारा को पड़ती। सितारा के कारण अम्मी को बहुत कुछ सुनने को मिलता। हर ओर से पिसती अम्मी भी कभी-कभी कह देती- ‘‘मैं तुझे स्कूल भेज रही हूँ तो इसका मतलब यह नहीं कि तू अपनी मनमानी करने लगे।’’

वो समझ ही नहीं पाती कि बस में जाने पर, लडकों के ताने देने से उसकी मनमानी कैसे हुई। पर पढ़ाई की वजह से चुप रहती और अन्ततः लड़को की छेड़खानी की सजा उसको मिल गई। धर्म का वास्ता देकर घरवालों ने उसका स्कूल जाना बंद कर दिया। जब सितारा का पूरा परिववार भूखों मर रहा था,  उस समय ये धर्म काम नहीं आया। धर्म का वास्ता देकर डाले गये ये बंधन सितारा को कभी समझ नहीं आये। उसे पर्दे में डाल दिया गया।

परिस्थिति ने सितारा का साथ दिया। उसकी पढ़ाई के सबसे कट्टर विरोधी दादा जी का इन्तकाल हो गया। दादा के इंतकाल पर सितारा हंसी तो नहीं,  पर इत्मिनान की सांस जरूर ली। माहौल देखकर सितारा ने पढ़ाई के लिए माँ की खुशामद शुरू कर दी। सितारा की इच्छा समझकर, समझदार माँ ने इजाजत दे दी। सितारा फिर स्कूल जाने लगी।

परम्पराओं की छाया में पली सितारा की फूफी को सितारा की हरकतें बिल्कुल पंसद नहीं थी। वह परिवार और समाज के पुरुषों की ही भाषा बोलकर उसकी पढ़ाई की खिलाफत करती थी। हमेशा सितारा के वालिद से कहती- ‘‘तुम्हारी लड़की एक दिन भाग जायेगी। टोपी उछाल देगी, नाक कटवायेगी। खैर चाहते हो तो इसकी पढ़ाई बंद कर दो।’’

फूफी के उकसाने पर रोज घर में झगड़ा होता। सितारा पर पाबन्दियाँ लगनी शुरू हो गईं। पर्दे में रहोगी,  स्कूल बुर्का पहन कर जाओगी,  जोर से हंसोगी नहीं,  सहेलियों से नहीं मिलोगी। ढेरों दम घोटू हिदायतें। यहाँ तक कि अब वह स्कूल भी अकेले नहीं जा सकती थी। अम्मी फिर सहारा बनीं। सितारा की अम्मी बुर्का पहनकर उसे स्कूल छोड़ने,  लेने आने लगी। अन्य जगहों पर जाना तो एकदम बंद कर दिया गया था।

एक दिन, जब वो माँ के साथ स्कूल से वापस आ रही थी,  दो मनचलों ने उसका पीछा किया। वे स्कूटर में सवार हो उसके आगे-पीछे घूम-घूम कर परेशान कर रहे थे। सितारा का गुस्सा पूरे समाज पर तो था ही। इन्हीं के जैसे शोहदों की वजह से लड़कियों पर पाबन्दियाँ लगती हैं। उन शोहदों को न तो सितारा की हिम्मत के बारे में पता था और नहीं उसके अन्दर फूट रहे ज्वालामुखी का। अपनी हरकतों से बाज न आते लड़के जैसे ही पास आए,  सितारा ने स्कूटर को धक्‍का देकर लड़कों को गिरा दिया। एक तो झटपट उठकर भाग गया, पर दूसरे की किस्मत ऐसी नहीं थी। सितारा ने उसे पकड़कर पीटना शुरू किया। लोगों की भीड़ जमा हो गई। सितारा ने तो उसे पीटा ही, भीड़ ने भी दो-चार हाथ जड़ दिये। उसके बाद मजाल था कि कोई मनचला उसके आस-पास भी फटकता।

कठिन परिस्थतियों से जूझते हुए सितारा ने इण्टर पास कर लिया। वो डिग्री कालेज में पढ़ना चाहती थी। घरवालों ने आगे पढ़ाने से साफ इन्कार कर दिया। सितारा किस बूते पर लड़-झगड़कर डिग्री कालेज की पढ़ाई का हौसला कर पाती। कोई रास्ता सुझाई नहीं दिया और हार कर घर की चार दीवारी में कैद हो गई। चौखट से बाहर निकलना मुश्किल था। सहेलियों के घर जाने की सोचना भी गुनाह था। पाबन्दियों का हाल ये था कि सहेली के मिलने आने पर उसे छोड़ने बाहर तक जाने की हिम्मत करे तो भी उसे डांट पड़ती। एक बार तो घर की चौखट से बाहर झांकने भर से बड़े भाई ने पिटाई कर दी।

सितारा बुनाई का काम कर घर खर्च के लिए आय बढ़ाने में अम्मी का हाथ बंटाती। सितारा बंध नहीं सकती थी। उसने घर से बाहर आने-जाने का बहाना ढूँढ ही लिया। अम्मी को बुनाई का सामान लेने बाजार जाना झँझट लगता था। एक-आध बार वो माँ के साथ ही बुनाई का सामान लेने बाजार गई। मोल-भाव ठीक कर लेती थी सितारा। माँ अब अकेले उसे ही सामान लाने बाजार भेजने लगी। इस पर रोक-टोक कम होने लगी,  क्योंकि उसे हिसाब-किताब आता था। कोई उसे ठग नहीं सकता था। सबसे बड़ी बात- पैसे जो बचते थे। इस बहाने बाहर जाने की थोड़ी ढील मिल जाती थी।

जो आज सितारा झेल रही थी, अम्मी ने भी यही सब झेला होगा। इसलिए उनकी सहानुभूति सितारा के साथ थी। बुनाई का सामान लाने के बहाने सितारा सहेलियों से भी मिल लेती। अम्मी के साथ बुनाई कर उसने थोड़े पैसे भी जमा कर लिये थे। इसी बीच उसे एक सहेली से बी.ए. के फार्म आने का पता चला। वह बुनाई के सामान लाने के बहाने घर से निकली तथा सहेली के साथ जाकर देहरादून के एम.के.पी. गर्ल्‍स कालेज से बी.ए. का फार्म भर आई। ये राज उसने सिर्फ अम्मी के साथ बांटा। कभी-कभी कक्षाएं लगतीं तो माँ की चिरौरी कर उसे साथ ले जाती। बेटी क्लास में पढ़ती,  माँ बाहर बैठकर बुनाई करती।

माँ-बेटी दोनों मेहनती थीं। सितारा सुबह आठ बजे से शाम आठ बजे तक बुनाई करती। माँ घर का काम दिन में करती। रात के खाना बनाने में वो माँ का हाथ बटांती और फिर देर रात तक पढ़ती। इसी तरह उसने बी.ए. सेकेंण्ड इयर पास कर लिया। यही नहीं अपनी बुनाई के दम पर सितारा ने अस्सी हजार रूपये भी जमा कर लिए।

समाज पाबन्दियाँ लगा रहा था। प्रकृति बिना पाबंदी से काम कर रही थी। अब सितारा जवान हो गई। ‘‘जवान’’ लड़की घर की समस्या होती है- जिसका एक ही हल होता है- निकाह याने शादी। घर में सितारा के निकाह की चिन्ता होने लगी। माँ-बाप चुपके-चुपके आपस में बात करने लगे। उसकी मनमानी से परेशान भाई भी छुटकारा चाहता था- सितारा की शादी उन पर बोझ नहीं थी। उसने अपनी मेहनत से अस्सी हजार रुपये जो जमा किए हुए थे। इन पैसों से सितारा आगे पढ़ना चाहती थी, पर घरवालों के लिए यह शादी का खर्चा था। इस मामले में सितारा की एक न चली।

1990 में सितारा का निकाह तो हो गया पर विदाई नहीं हुई। बिना दहेज के ससुराल जा नहीं सकती थी। दहेज जुटाने में 6 माह लग गए। बीच-बीच में सास-ससुर आकर अपनी जरूरतों को किसी बहाने बताते रहते। दहेज की लिस्ट लंबी होने लगी। हैसियत के अनुसार दहेज जुटाया गया था- फ्रिज, कूलर, फर्नीचर, हैसियत भर सोना,  कपड़े धोने की मशीन, वगैरह। पर जब सितारा ससुराल पहुँची तो देखा सब नाराज हैं। वो लोग एक कलर टी.वी. चाहते थे- जो नहीं दिया गया था। उसी के लिये ताने दिए जाते। यह सिलसिला लम्बे समय तक चला।

ससुराल भी लम्बा चौड़ा था। पति के तीन भाई तथा पाँच बहने थीं। कुल 12 जनों का परिवार था। ससुर स्थानीय इण्टर कालेज में अध्यापक थे। निकाह के वक्त बताया गया था कि सितारा का शौहर दिल्ली में खाते लिखने का काम करता है। निकाह के बाद तो उसने अपने शौहर को घर पर ही देखा। दिल्ली गया ही नहीं।

ससुराल में बुर्का लाजिमी हो गया था। एक साल के भीतर ही उसकी बेटी पैदा हुई। यह खुशी उसी तक ही सीमित रही। लड़की के पैदा होने से शौहर और परिवार वाले खुश नहीं थे। बेटी के पैदा होने पर न छठ की,  न हमीमा किया और न कोई जश्न। अम्मी ने जरूर कुछ सामान बेटी के जन्म पर भेज दिया।

पढ़ी-लिखी सितारा आज के तौर-तरीके जानती थी। वो जानती थी कि बच्चे को टीके वगैरह लगवाने कितने जरूरी हैं। बेटी के पैदा होने के तीन माह बाद जब उसे वो टीका लगवाने जाने लगी तो शौहर नाराज हो गया। बोला-  ‘‘टीका लगवाने की क्या जरूरत है। मेरी भी तो पाँच बहने हैं,  किसी को टीका नहीं लगवाया,  सब ठीक हैं।’’  इस बात पर ही झगड़ा हो गया। शौहर बेटी को पंसद नहीं करता। वह कभी नहीं चाहता था कि सितारा बेटी की ज्यादा देखभाल करे।

सितारा ने लड़-झगड़ कर बेटी का टीकाकरण करवाया। परिवार में टकराहट शुरू हो गयी थी। सितारा अपने शौहर से खर्चा मांगती, वो खर्चा देने के बजाय झगड़ा व मारपीट करता और कहता, ‘‘मुझे पढ़ी-लिखी बीबी नहीं चाहिये थी, गाँव की बिना पढ़ी-लिखी बीबी चाहिए थी।’’ हालात ये थे कि बेटी के खर्चे तक के लिये सितारा अपनी माँ की मोहताज थी। सुबह-शाम गन्ने की सूखी पत्तियों से सारे परिवार के लिये खाना बनाती। ढाई किलो से ज्यादा आटे की रोटियाँ थेपती। आँखों से आँसू बहते। कभी धुंए से तो कभी अपनी परिस्थितियों से। हर वक्त काम,  साथ ही किसी न किसी बात पर या बहाने पर शौहर की मार।

जाहिल पति को सितारा की जहनियत पसंद न थी। वो हर बात पर सितारा पर शक करता। ‘यहाँ खड़ी किसे देख रही है ? मेरे पीछे किससे बात करती है ? देहरादून जाकर कहाँ-कहाँ जाती है ? किस-किस से मिलती है?’ ऐसे सवाल हर वक्त सितारा का पीछा करते। वो चुपचाप सहती। इसी में भलाई थी।

सितारा फिर गर्भ से थी। काम कम नहीं हुआ। पति की ज्यादतियाँ चालू थीं। इन स्थितियों के चलते सितारा को मजबूरन अपनी 8 माह की बच्ची को अम्मी के पास देहरादून भेजना पड़ा।

और फिर 1992 में उसने एक लड़के को जन्म दिया। सारे ससुराल वाले खुश,  लड़का जो हुआ था। लड्डू खिलाए गए, मिठाई बाँटी गई- खूब जश्न हुआ। सितारा को समझ में नहीं आया कि नया क्या हुआ जो इतने खुश हैं। जैसे बेटी पैदा हुई थी, वैसे ही बेटा। ये अबूझ पहेलियाँ थीं।

बेटे का खर्च परिवार वाले खुशी से उठा रहे थे। एक बार वे बेटे के लिये कपड़े खरीदने बाजार गए। बेटे के लिए सूट खरीदने के बाद बेटी के लिए फ्राक की मांग करते ही शौहर ने बाजार में ही हँगामा खड़ा कर दिया। घर आकर सितारा के घरवालों को, अम्मी को गाली देकर कहने लगे ‘‘अपनी बेटी को तो बिगाड़ ही रखा है, अब बेटी की बेटी को भी बिगाड़ रही हैं।’’

सितारा की ममता बेटी को देखना चाहती थी। शौहर मायके भेज ही नहीं रहे थे। घर में तनाव बढ़ रहा था। बहुत खुशामद पर शौहर तैयार हुआ। उसे देहरादून स्टेशन पर आटो में बैठाकर बोला, ‘‘तुम घर जाओ। मैं काम निपटा कर आता हूँ।’’ और अगले दिन तक भी नहीं आया।

पता चला कि पड़ोसी के घर नाराज होकर बैठा है। बार-बार बुलाने के बावजूद वो घर नहीं आया। जब वह खुद उसे बुलाने गई तो बिफर पड़ा। पता नहीं किस बात का गुस्सा था कि वो बाहर आकर सड़क पर मायके वालों के सामने ही उसे मारने लगा और यह कह कर चला गया कि वो अब उसे नहीं रखेगा। सितारा भी अब ज्यादा सह नहीं सकती थी। शरीर से टूटी और मन से बिखरी सितारा ने तय कर लिया कि अब वापस नहीं जायेगी। मायके में ही रहेगी। पर पड़ोसियों के तानों से वालिद-वालिदा परेशान हो गये। अम्मी-अब्बू की परेशानी समझकर वह 10 माह बाद सास की खुशामद करने के बाद इस शर्त पर पुनः ससुराल जाने को राजी हुई कि वे उसे बी.ए. फाइनल की परीक्षा देने की इजाजत देगें।

ससुराल में जाकर फिर वही खर्चे की तंगी। इस बार सितारा ने तय किया कि वह परिस्थितियों से समझौता नहीं करेगी,  उन्हें बदलेगी। उसने घर में ही बच्चों का स्कूल खोलने की ठानी। घर के बारमदे में स्कूल चलाने लगी। इससे घर में ही चार पैसों की आमदनी होने लगी। मायके में भी पैसे की तंगी तो थी ही। इसलिए सितारा छुप-छुपकर माँ को बेटी की देखभाल के लिए पैसे की मदद भी करने लगी।

परिवार की आर्थिक स्थिति में योगदान से ससुराल में अब उसकी बात सुनी जाने लगी। शौहर भी थोड़ा नर्म हुआ। स्थितियाँ पक्ष में देखकर सितारा ने पति को समझाया कि उन्हें कोई नौकरी करनी चाहिए। निठल्ले रहेंगे तो घरवाले भी इज्जत नहीं करेंगे। शायद अपनी इज्जत के ख्याल से शौहर ने मुस्लिम फंड में नौकरी कर ली। जून में सितारा अपनी बिटिया से मिलने मायके गई। वापस आने पर उसे एक नई बात पता चली। पता चला कि उसका शौहर किसी औरत के चक्कर में ज्यादा समय अपने एक दोस्त के घर बिताता है। उसने पीछा कर सच जानने की कोशिश की तो शौहर को पता चल गया। इसी बात पर पति ने इतना मारा कि बचने की भी उम्मीद नहीं थी। सास को सब पता था। फिर भी कहती थी, ‘‘परिवार की इज्जत की खातिर तुम्हें चुप रहना चाहिए।’’  ऐसी ‘इज्जत’ को सितारा समझ नहीं पाई।

एक दिन तो हद ही हो गई। सितारा के शौहर ने कहा, ‘‘मेरा दोस्त चाहता है कि तुम उसके साथ दोस्ती कर लो।’’ पहले सितारा को पति की यह ख्वाहिश समझ में नहीं आई। पर धीरे-धीरे पति की चालबाजी समझ गई। उसका शौहर चाहता था कि दोस्त सितारा के चक्कर में चुपचाप रहे  और वह दोस्त की बीबी के साथ जैसे भी चाहे  रहे। वह सितारा पर गैर मर्द के साथ दोस्ती का लांछन भी लगाना चाहता था। सब समझकर सितारा ने अपने पति को आड़े हाथों लिया। उसे बताया कि वो सब समझती है कि ऐसा क्यों चाहता है। सितारा शौहर के दोस्त के घर गई। उसने दोस्त के रिश्तेदारों से सब बातें कह दीं। उसने अपने शौहर के दोस्त का घर में आना बंद करा दिया।

अब सितारा को यह महसूस होने लगा था कि उसका शौहर उसके साथ रहना पंसद नहीं कर रहा है। उसने तो पत्नी के रूप में गूँगी गुडि़या चाही थी। सितारा सब कुछ देख समझकर गूँगी नहीं रह सकती थी। सितारा का शौहर मारपीट करता और गालियां देता,  उसके बाद माफी माँगता- मिन्नतें करता। जरूरत पड़ने पर पैर पकड़ लेता। हमारे समाज की हर औरत की तरह उसे लगता ये आदमी मुझे छोड़ेगा नहीं। वह इतनी ज्यादतियाँ तथा अपमान सहकर भी पति की एक मीठी बात से पिघल जाती।

आने वाले दिनों की आहट पहचान कर सितारा ने तैयारी शुरू कर दी। उसने दिन में स्कूल चलाया और रात को स्वेटर बुने। स्कूली बच्चों को टाफी, बिस्कुट बेचने लगी। घर के खर्च चलाने के बाद बचे पैसों को बैंक में जमाकर देती। पर शौहर अपनी हरकतों से बाज नहीं आया। हद तो तब हुई जब वह अपने ममेरे भाई को यह सिखा-पढ़ाकर आया कि अपनी भाभी से अकेले में छेड़खानी करना। वो फोटो खींच लेगा। सितारा को बदनाम कर पीछा छुड़ा लेगा। इससे पहले कि वे अपने षड्यंत्र में सफल होते,  सितारा उनका इरादा समझ गई। उसने मामा के लड़के को डांट कर भगा दिया। इस सबके बावजूद उसका शौहर जलील करने की हरकतों से बाज नहीं आया। जलालत की जिंदगी और पति की हरकतों से तंग आकर सितारा ने अपने सास-ससुर से कहा कि इन हालातों में वह ससुराल में नहीं रह सकती। उसे मायके भेज दिया जाए। वे कहाँ मानते। ज्यादतियां दिन-ब-दिन बढ़ती गईं। ससुराल वाले झूठे इल्जाम लगाते। पति उसके चरित्र पर बेबुनियाद आरोप लगाता और मारपीट करता।

झूठे इल्जामों से अजीज आकर सितारा ने ससुराल वालों को धमकी दी कि वे उसके ऊपर लगाये इल्जाम का प्रमाण दें, नहीं तो वह अपने ऊपर मिट्टी का तेल छिड़कर जान दे देगी। उसकी ध्मकी से शौहर डर गया। उसने माना कि वो झूठे इल्जाम लगाता है।

पर इससे जिंदगी सरल कहाँ होने वाली थी। जब उसने इन सब बातों का जिक्र अपनी माँ से किया तो समाज के नियमों से डरी हर माँ की तरह उसकी माँ ने भी शौहर के सुधर जाने की दिलासा दिया। सितारा सिर्फ सह ही सकती थी। सोचती, कभी खुदा की नजरें इनायत उस पर भी हों और सितारा का नसीब चमके।

अचानक एक हादसा हुआ। उसके देवर का उठना-बैठना अपराधी प्रवृति के लोगों के साथ था। किसी मामले में जब उसके दोस्त पकड़े गए तो पुलिस वाले उसके देवर की खोज में घर पर आये। घर में सितारा, उसकी ननद तथा देवर थे। रात को लगभग तीन चार बजे 15-20 पुलिस वाले दरवाजा खटखटाने लगे। दरवाजा न खुलने पर वे आंगन की दीवार फलांग कर आंगन में आ गए। पुलिसवाले कमरे की कुण्डी बंदूक की बट से तोड़कर उसके देवर को जबर्दस्ती उठाकर ले गए। सारा परिवार डर गया, पर सितारा ने हिम्मत नहीं हारी। वह अपने स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के परिवार के सम्पर्क से किसी वकील के साथ थाने जाकर देवर को छुड़ा ले आई। घर का दरवाजा तोड़ने वाले तीन पुलिस के सिपाहियों को पहचान कर उनके खिलाफ रिपोर्ट भी लिखवा आई।

इस घटना से सुसराल वालों पर अच्छा प्रभाव पड़ा। कुछ दिन अच्छे बीते। पर सितारा को अभी बहुत कुछ देखना बाकी था। कुछ ही दिनों बाद सितारा की दूसरी बेटी पैदा हुई। दकियानूसी परिवार में बहू का दूसरी लड़की पैदा करने से बड़ा अपराध क्या हो सकता था ?  सितारा गोद में बेटी लिये सारा दिन अपराधी की तरह घर के काम करती- ताने सुनती। कुछ साल पहले ही बेटा जनकर वाह-वाही पाने वाली सितारा, दूसरी बेटी के आते ही अपराधी थी। ससुराल वालों के साथ ही शौहर का व्यवहार भी बदल गया।

अन्ततः सितारा ने तय किया कि वो उस परिवार के साथ नहीं रहेगी, जहाँ उसकी बेटियों की कोई गिनती नहीं। उसे हमेशा बड़ी बेटी की याद आती। उसके प्रति स्वंय को अपराधी महसूस करती। बेटी बड़ी होने पर जब पूछेगी कि सबके साथ तूने भी मुझे क्यों छोड़ा ? तो वह क्या जवाब देगी। सितारा मन मसोस कर रह जाती। ससुराल वाले उसे ही दोष देते। बेटी पैदा करने की जिम्मेदारी अकेली सितारा की तो नहीं थी, फिर वो अकेली अपराधी कैसे हो गई ? उसने पति को साफ-साफ कह दिया कि वह अब अपनी गृहस्थी अलग करेगी। पहले शौहर ने मना किया,  बहुत मिन्नतों के बाद वह मान गया और वो लोग देहरादून आकर किराये के मकान में रहने लगे।

सितारा के शौहर ने हकीमी का डिप्लोमा लिया था। सितारा ने स्कूल चलाकर तथा बुनाई से जो पैसा जमा किया था, उससे 20 हजार रुपये अपने शौहर को हकीम की दुकान खोलने के लिए दिये।

दो-चार दिन ठीक रहने के पश्चात शौहर फिर पुराने ढर्रे पर आ गया। उसके चरित्र पर इल्जाम लगा और बेटियाँ पैदा करने की तोहमत लगा, शराब पीकर मारपीट करने लगा। अगस्त 1998 की सुबह सितारा को कभी नहीं भूलेगी। इसी दिन सितारा ने अपने को सब से ज्यादा दुखी, अकेली तथा असहाय पाया था। यह भी सच है, इसी घटना ने उसकी जिंदगी को एक नया मोड़ दिया।

सितारा का शौहर दिलफेंक किस्म का इन्सान था। अपनी आदतों से बाज कहाँ आता ? देहरादून आकर फिर इश्क में फँस गया। धर्म ने उसे एक से अधिक शादी करने का विशेषाधिकार दिया हुआ था। 5 अगस्त, 1998 को सुबह-सुबह शराब के नशे में चूर,  झूठे इल्जाम लगा,  मारपीट कर तीन बार ‘तलाक, तलाक, तलाक’ कह  सितारा से बँधे निकाह के रिश्ते से मुक्त हो गया।

शौहर के मुँह से निकले ये शब्द सितारा के कानों में पिघले शीशे की तरह उतर गये। शौहर तलाक के हथियार से सितारा को मारकर चला गया। सदमें से सितारा कुछ समय तक तो उबर नहीं पाई। जिंदगी के सबसे हसीन और ऊर्जावान साल चूस कर उसके शौहर ने उसे तीन बच्चों के साथ तीन कपड़ों में चौराहे पर खड़ा कर दिया था। कोई रास्ता ऐसा नहीं था, जिधर उसे सहारा मिल सके। सितारा ने किसी तरह अपने को समेटा। अपनी माँ तथा सास दोनों को संदेशा दे बुला भेजा। माँ दौड़कर चली आई,  पर सास ने कहा, ‘‘मेरे बेटे ने जो करना था कर दिया,  तुम्हें जो करना है करो।’’

माँ उसे मायके ले आई। उसका दिल गुस्सा, मजबूरी, ग्लानि से भरा हुआ था। कचहरी के सामने गुजरते हुए अचानक उसने देखा कि वहाँ नईम (यही उसके शौहर का नाम था) एक औरत के साथ खड़ा है। उसे झटका लगा। जिस व्यक्ति ने उसे चैराहे पर ला खड़ा किया था, वही व्यक्ति एक दूसरी औरत के साथ निकाह के चक्कर में कचहरी में खड़ा था। सितारा का खून खौल गया। सब्र का बाँध टूट गया। वह दौड़ कर गई और बिना सोचे-समझे उस हैवान पर झपट पड़ी। उसकी गर्दन पकड़कर मारने लगी। लातों से,  घूंसों से, जिससे वह उसे मार सकती थी। उसके सामने तो तीन बेसहारा मासूम बच्चों के चेहरे घूम रहे थे। वहाँ पर खड़े वकील तथा अन्य लोग नईम को छुड़ाने लगे। उसे होश कहाँ था। गैरहोशी में बस इतना याद था कि इस शैतान ने उसे किस तरह पीटा, जलील किया है। जैसे-जैसे उसे याद आता,  पागलों’सी वह और जोर-जोर से उसे घूँसों-लातों से मारने लगती। भीड़ जमा हो गई। पुलिसवाले भी आ गए। उसने पुलिस वालों को बताया कि इस आदमी ने उसे सात-आठ साल से परेशान किया है। अपने शरीर पर पहले दिन की चोट के निशान दिखाए। पुलिस वालों के साथ उसे वह थाने ले गई। सितारा ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि इस व्यक्ति ने उसे जहर देकर मारने की कोशिश की है। इस पर पुलिस ने उस व्यक्ति के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की तथा उसे जेल भेज दिया। उस व्यक्ति को अपना शौहर बताने में सितारा को शर्म महसूस होने लगी थी।

नईम को बड़ी मुश्किल से जमानत मिली। उसने नईम को सबक सिखाने की ठान ली। वो सोचती कितनी मुश्किल से मांग-तांग कर उसने बी.ए. पास किया है। जब इतना पढ़ने के बाद वो ही हार जायेगी तो उसके समाज की बाकी लड़कियाँ क्या करेंगी, जिन्हें चौखटों के अन्दर पर्दे में बंद कर बेजुबान किया हुआ है। उसे ऐसा कुछ करना है जिससे तलाक के तीन शब्द बोलकर बरी होने वाले आदमियों को कुछ सबक मिल सके।

सितारा ने नईम को वकील के मार्फत अपनी मेहर तथा बच्चों की सुपुर्दगी के मुकदमें का नोटिस भेजा। अब वो डर गया था। सितारा का विकराल रूप देख ही चुका था। उसने सितारा के वकीलों के सामने समझौते का प्रस्ताव रखा। लिखित समझौते के अनुसार सितारा को मेहर के तीस हजार रुपये,  दहेज का सामान तथा अपने बच्चों पर अधिकार मिल गया। तलाक के बाद मुस्लिम धर्म की रीति के अनुसार तीन माह दस दिन के लिये इद्दत की रस्म निभानी होती है। यह माना जाता है कि इद्दत की रस्म शौहर के तलाक देने या मर जाने पर कर्ज होती है। सितारा को लगा कि वह यह कर्ज ढो कर क्या करेगी। जब उसने वो रिश्ता ही थूक दिया तो कर्ज भी थूक देगी। उसने इद्दत की रस्म निबाही- यह मानकर नहीं कि उसे तलाक मिला है- बल्कि यह मानते हुए कि वह व्यक्ति मर गया है।

इद्दत के दौरान नमाज पढ़ते वह अक्सर अपने भविष्य के बारे में सोचती। फिर खुद ही उसे जवाब मिलता कि शौहर के नाम से जो शख्स उसके साथ रहता था, वह कोई जिम्मेदारी नहीं निभाता था। उसका जीवन ही दूभर किये था। अब उसे जो भी करना है, अपने लिये खुद ही करना है।

ऐसे अवसाद के दिनों में जब वो जिंदगी के सवालों से उलझ रही थी, उसकी अम्मी ने उसे मानसिक सहारा दिया। शायद ये एक औरत का दूसरी औरत के साथ समझ का और दर्द बांटने का रिश्ता था। अम्मी कहतीं, ‘‘फिक्र मत कर, जब तक मैं जिंदा हूँ- जितना होगा मिल बाँटकर खा लेंगे।’’

फिलहाल वो अपने मायके में ही रहने लगी। इद्दत की मुद्दत में सितारा ने तय कर लिया वो अपनी दोनों बेटियों की जिंदगी में इद्दत की सजा नहीं आने देगी। इसके लिए उसे समाज और धर्म से जितना लड़ना पड़े, वो लड़ेगी।

जहाँ वो फिलहाल रह रही थी, वहां अब भाई की छाया थी- छाया में रहने के लिये अपने अस्तित्व को मिटाना जरूरी था- हर बात के लिये हाथ फैलाना था- अपने आत्म सम्मान को खो देना था।

इद्दत की मुद्दत खत्म होते ही उसने घर में अपना फैसला सुनाया कि ‘वह कहीं कुछ नौकरी करेगी, जिससे उसे अपने बच्चों की परवरिश के लिये हाथ न फैलाना पड़े।’ भाई जो अब सर्वेसर्वा हो गया था, ने कहा, ‘‘उसे इस घर में रहना है तो पर्दे में रहे।’’

इस पर सितारा ने अपने भाई से कहा, ‘‘मेरे तीन बच्चे हैं। मुझे उनका भविष्य भी देखना है। तुम चाहते हो कि मैं घर से बाहर काम के लिए न जाऊँ, पर्दे में रहूँ तो ठीक है। तुम बच्चों की परवरिश के लिए मुझे तीन हजार रुपये हर महीने दे दो।’’ इस बात का जवाब भाई के पास न था।

अम्मी ने यहाँ भी उसका साथ दिया। उसका हौसला बढ़ाया। सितारा काम की तलाश में निकल पड़ी। किस्मत से उसे घर के पास ही एक संस्था में छह सौ रुपये महीने की नौकरी मिल गई। संस्था में सरकारी योजनाओं की जानकारी आमजन तक पहुँचाने का कार्य किया जाता था। उसने संस्था का कार्य समझा और मेहनत से काम करने लगी। पर संस्था से भी उसे धोखा ही मिला। दो महीने तक तनख्वाह न मिलने के कारण उसने वहाँ काम छोड़ दिया। बाद में संस्था प्रबंधक पर उसने कानूनी कार्यवाही हेतु दबाव बनाकर अपनी तनख्वाह ले ली।

नौकरी तो गई पर उसकी मेहनत व्यर्थ नहीं गई। संस्था में उसने जाति प्रमाण पत्र,  मूल निवास प्रमाण पत्र जैसे कागजात बनाने की तथा समाज कल्याण विभाग की योजनाओं की अच्छी जानकारी हासिल कर ली थी। वो लोगों के विभिन्न प्रमाण पत्र बनवाने व समाज कल्याण विभाग की योजनाओं हेतु आवेदन करने में सहायता करने लगी। लोग अपनी खुशी से, हैसियत के अनुसार 30 से 100 रुपये तक देते थे। इससे ही उसकी आय होने लगी।

वो लोगों के बीच जगह बनाने लगी। अपनी जरूरतों की जानकारी लेने के लिये लोग उससे मिलने लगे। इस तरह अजनबियों का सितारा से मिलना, उसकी तारीफ करना कई लोगों को पंसद नहीं आया। हमारे समाज में औरत किसी भी जाति धर्म की हो,  पुरूष वर्ग उसे मोहताज बना देखना चाहता है। जिससे उसकी लाचारी,  मोहताजी का फायदा उठा सके। फिर वो तो एक तलाकशुदा औरत थी जिसका कोई कथित मालिक नहीं था। वे तरह-तरह की बातें बनाते- पर सितारा जानती थी,  वो जो कर रही है सही कर रही है। उसने कोई परवाह नहीं की। तय कर लिया कि बहुत रो लिया,  बहुत सह लिया, अब और नहीं सहेगी। दुनिया जहान का उसूल है, रोतों को छोड़ कर आगे बढ़ते जाना। वो रोती ही रही तो जमाने के साथ समय भी उसके हाथ से छूट जायेगा।

सितारा की जिंदगी आसान नहीं थी। भाभी उसकी परिस्थितियाँ या तो समझ नहीं रही थी या अनजान बन रही थी। वो प्रमाण पत्र बनवाने और आवेदन करवाने में लोगों की मदद करने के लिये घर से बाहर रहने के कारण घर के कामों में हाथ नहीं बँटा पाती थी। भाभी इसी बात से नाराज रहती। भाई से शिकायत करती और भाई उससे लड़ता। सितारा समझ गई थी कि वो इस घर में ज्यादा नहीं रह पाएगी। अपने बूते ही इंतजाम करना होगा।

पड़ोस में एक सस्ता मकान बिक रहा था। सितारा ने अपनी जमा पूँजी-जेवर,  माँ की सहायता- सब कुछ जोड़ कर देखा। बहुत कम पैसे हो पा रहे थे। उसे डर था कि वो जब तक मकान खरीदने की रकम जोड़ पाएगी, तब तक कहीं मकान बिक ही न जाय। भले ही सितारा के पास रुपये कम थे, पर हिम्मत की कमी नहीं थी। बचपन से ही गुरबत से लड़ते रहने की ताकत उसके काम आई।

मकान को बेचने वाले मुश्ताक भाई शायद सितारा की मजबूरी जानते थे। वो थोड़ी-सी रकम लेकर सितारा मुश्ताक भाई से मिली, अपनी स्थिति बताई। उनसे अनुरोध किया कि मकान के बयाने के रूप में ये रकम कुबूल कर लें। वो कुछ दिनों में बाकी पैसे का इंतजाम कर लेगी। सितारा की स्थिति तथा हिम्मत देखकर मुश्ताक भाई मान गए।

धीरे-धीरे पैसे जोड़कर,  समाज कल्याण की योजना से तथा अन्य कई जगहों से ऋण लेकर सितारा ने मुश्ताक भाई से मकान खरीद लिया। मकान खरीदते वक्त जब वो मुश्ताक भाई का शुक्रिया अदा कर रही थी, उसकी आँखों में आँसू थे। पहली बार ये आँसू खुशी के थे। वो मुश्ताक भाई का अहसान कभी नही भूलेगी। अब सितारा अपने उस घर में रहने लगी जहाँ वो खुद मुख्तार थी। जहाँ से कोई उसे तीन कपड़ों में बाहर नहीं निकाल सकता था। जहाँ बच्चों की जिम्मेदारी के साथ उनका भविष्य उसका इन्तजार कर रहा था। दिनभर संघर्ष की थकान के बाद जहाँ कोई भी शख्स उसकी नींद में खलल डालने वाला नहीं था। समझदार सितारा ने अपने को बच्चों के साथ एक कमरे में समेट लिया। दो कमरे किराये पर दे दिए। मकान के किराये से उधर चुकाने लगी- तीन बच्चों के साथ जिंदगी कम आय में काटनी मुश्किल हो रही थी। संस्था के साथ कार्य करते हुये उसे जानकारी हो गई थी कि तलाकशुदा औरत बच्चे पालने के लिए अपने शौहर से मुवावजा ले सकती है। उसने तय किया कि जिस व्यक्ति की वजह से वो इन हालातों में हैं, बच्चों की परवरिश के लिये उसी से खर्चा माँगेगी। उसके पास बच्चों की परवरिश के लिए ही पैसे नहीं थे- तो मुकदमा लड़ने का खर्चा कहाँ से आता ? काफी कोशिश के बाद उसने एक ऐसे वकील को ढूँढ लिया जो मुकदमा जीतने के बाद ही फीस लेने को तैयार था।

जैसे ही नईम  को मुकदमे का नोटिस मिला, उसने बिजनौर से बच्चों की गार्जियनशिप का उल्टा मुकदमा कर दिया। अब सितारा डरने लगी कि इस नये मुकदमे को लड़ने के लिए खर्च कहाँ से आएगा। अन्ततः हिम्मतवालों का साथ मुकद्दर भी देता है। उन्हीं दिनों सितारा को हरिद्वार में स्वजल परियोजना में फील्ड वर्कर का कार्य मिल गया- जिससे उसे साढ़े चार हजार मानदेय मिलने लगा। सितारा की हिम्मत बढ़ गई। इससे मुकदमा लड़ने में सक्षम हो गई। साथ ही बच्चों की पढ़ाई भी जारी रही।

इसी बीच नईम ने दूसरी शादी कर ली थी। ये सितारा के हक में रहा। जब सितारा ने कोर्ट में नईम की दूसरी शादी साबित कर दी तो नईम गार्जियनशिप का मुकदमा हार गया। सितारा की जिंदगी में आर्थिक कठिनाई बनी रही। दुनिया में बुरे लोगों के साथ अच्छे लोग भी हैं। स्वजल परियोजना में काम के लिए हरिद्वार जाने को भी पड़ोसी गलत तरीके लेकर उसे बदनाम करते। लेकिन वहीं ऐसे भी अनजान लोग थे जिन्होंने सितारा की सहायता की। ऐसे ही एक शख्स सलमान साहब थे। हरिद्वार ट्रेन में जाते वक्त उनसे मुलाकात हुई। औपचारिक बातों के बाद जब उन्होंने परिवार के बारे में पूछा तो सितारा ने कहा कि शौहर मर गया है- तीन बच्चे हैं- उनको किसी तरह पालती हूँ। सलमान साहब ने अपने संपर्कों से हिम ज्योति फाउंडेशन से उसे आर्थिक सहायता दिलवाई। बच्चों के बीमार पड़ने पर सलमान साहब ने ही मुख्यमंत्री निधि से बच्चों का इलाज करवाया।

जिंदगी के कठिन सफर के बावजूद सितारा टूटकर थकने वाली नहीं थी। ऐसे वक्त में भी उसने स्वर्ण जंयती रोजगार योजना से चालीस हजार रुपये कर्ज लेकर मकान में एक कमरा और बनवा दिया तथा किराये के पैसों से ऋण चुका दिया।

गुजारा भत्ता का मुकदमा चल ही रहा था कि उसे खबर मिली, नईम ने दूसरी बीबी को तलाक देकर तीसरी शादी कर ली है। उसने ये तमाम सबूत कोर्ट में पेश किए और अपनी तथा बच्चों की परवरिश के भत्ते का मुकदमा जीत गई। कोर्ट ने फैसला दिया कि नईम सितारा को बच्चों की परवरिश के लिए 3000 रुपये मासिक अदा करे। नईम हाई कोर्ट गया। सितारा ने किसी तरह हाई कोर्ट में वकील किया। नईम को वहाँ भी नहीं छोड़ा। वहाँ से भी जीत कर डिस्ट्रिक कोर्ट से रिकवरी के आदेश ले आई। पैसे न देने पर नईम के खिलाफ वांरट जारी हो गए। वो भोपाल भाग गया। सितारा उसका ऐसे इंतजार करती रही जैसे बिल्ली चूहे का। पर वो हत्थे नहीं आया। उसने नईम का मकान कुड़क करवाकर नीलाम करवाया तथा अपने सत्ताइस हजार रुपये वसूले।

मुकदमें के दौरान परेशान नईम सितारा से गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘तू अब क्या चाहती है?’’ सितारा ने शान्त होकर कहा, ‘‘मैं तुझे इतना परेशान करना चाहती हूँ कि तेरी सात पुश्तें याद रखें  और वे औरत के साथ ऐसा बर्ताव न करें, जैसे तूने मेरे साथ किया है।’’ नईम मुँह ताकता रह गया।

मुकदमेबाजी में तीन वर्ष गुजर गये थे। हरिद्वार में स्वजल परियोजना समाप्त हो गई। सितारा बेरोजगार हो गई। ऐसे मुश्किल वक्त में सितारा की हिम्मत उसकी माँ तथा मुश्ताक भाई ने बढ़ाई। सितारा खुद बेरोजगार थी पर वह मां के लिए जो बूढ़ी हो चली थी, कुछ करना चाहती थी। उसके मायके का मकान कच्चा था। वह चाहती थी कि उसकी अम्मी भी पक्के मकान में रहे। सितारा ने दौड़भाग की। मकान के कागजात बैंक में जमाकर माँ के नाम से लोन लिया। प्रधानमंत्री ग्रामीण योजना तथा समाज कल्याण से अनुदान का इंतजाम किया और माँ की काबिल बेटी ने पक्के मकान में 12 कमरे बनवायें। माँ-बाप समझ चुके थे कि काबिल बेटी एक अलग ही मिट्टी की बनी है।

इस सबके बावजूद सितारा मन ही मन दुखी थी। बेरोजगारी ने बच्चे पालना मुश्किल किया हुआ था। ऐसे मुश्किल दौर में सितारा ने अखबार में महिला समाख्या का विज्ञापन देखा। हालात ये थे कि रजिस्ट्री तक के पैसे पास में नही थे। मुश्ताक भाई ने फिर साथ निभाया और आवेदन के लिये रजिस्ट्री के पैसे दिये।

महिला समाख्या में पहले लिखित परीक्षा हुई फिर साक्षात्कार। घर के काम में ही व्यस्त होने तथा रोजी-रोटी के लिए ही दौड़भाग करने के चक्कर में सितारा की पढ़ाई छूट गई थी। लिखित परीक्षा बहुत अच्छी नहीं हुई। इंटरव्यू में सितारा ने साफ-साफ अपनी स्थिति तथा जीने के लिए की गई लड़ाइयों के बारे में बता दिया। महिलाओं की स्थिति तथा व्यक्तिगत जिंदगी के विषय में उससे कितने ही सवाल किए गए। साक्षात्कार कर्ताओं को उसके जीवन के संघर्ष में ऐसा कुछ दिखाई दिया कि उसे महिला समाख्या में काम का मौका मिल गया।

एक बार फिर सितारा थोड़ी-सी चैन की साँस ले सकती थी। सितारा बहुत-सी संस्थाओं में काम कर चुकी थी- पर उसने महसूस किया कि महिलाओं के बारे में इतनी गहराई से छोटी-छोटी बातों पर कोई वैसा ध्यान नहीं देता, जैसा महिला समाख्या वाली बहनें देतीं। शुरू-शुरू में तो समझ ही नहीं पाई कि क्यों ये लोग सिर्फ काम की ही बात नहीं करते ?  क्यों एक-दूसरे के सुख-दुख बाँटते हैं, जैसे सब उनके अपने घर के ही हों ? ऐसा तो उसने किसी और संस्था में नही देखा था। वह बड़ी असमंजस में रहती थी।

सितम्बर, 2006 को उसे कार्य अनुभव के लिए पौड़ी जिले के थलीसैण ब्लाक भेजा गया। पौड़ी जिले का सबसे बीहड़ इलाका,  सितारा ने कभी इतने ऊँचे पहाड़ और इतनी कठिन चढ़ाई नहीं देखी थी। पर उसकी जरूरत ने उसका साहस बनाये रखा। उसे गढ़वाली समझ में नहीं आती थी। गाँव की सब महिलाऐं और महिला समाख्या की साथिनें गढ़वाली में ही बात करतीं। साथी बहनें  सितारा को विस्तार से बाद में समझाती कि गाँव संघ की बहनें क्या बातचीत कर रही थीं। मुस्लिम होने के बावजूद गाँव की महिलाएं भी उसे परिवार की सदस्या की तरह समझतीं। औरतों ने गाँव में संघ बनाए हुए थे। संघ सदस्याएं अपनी साझी तथा व्यक्तिगत समस्याओं को वहाँ बाँटती- समाधन ढूँढ़ने की कोशिश करतीं। सितारा को यह सब अच्छा लगा- वह खुद भी हल्का महसूस करने लगी।

महिला समाख्या की पौड़ी इकाई के कार्यक्षेत्र में काम का अनुभव लेने के बाद उसे ऊधमसिंह नगर में कार्य करने का मौका मिला। वो साथी कार्यकर्ताओं के साथ काम सीखती और गाँव-गाँव में महिलाओं का संगठन बनाती।

पहली बार उसे पता चला कि समाज में उसके अलावा भी महिलाओं की जिंदगी में कठिन संघर्ष गाथाएं छिपी हुई हैं। जिंदगी, समाज, रूढि़वादिता से वही अकेली संघर्ष नहीं कर रही है, बल्कि हजारों महिलाएं या यों कहें हर महिला किसी-न-किसी स्तर पर ये लड़ाइयाँ लड़ रही हैं। वह कार्यक्रम में जुड़कर महिलाओं की स्थितियों,  उसके कारणों पर समझ विकसित करने लगी। गहराई से सोचने लगी।

पर यहाँ भी उसे सुकून नहीं मिला। हमारे समाज में तलाकशुदा अकेली औरत पुरुषों के नजर में सर्वसुलभ मानी जाती है। पुरुष मानसिकता उसे सार्वजनिक सम्पत्ति समझने की भूल हमेशा से ही करते आई हैं। लोग पूछते, वो कौन है ? एक मुस्लिम महिला अकेले क्यों रह रही है? कई बार काम के लिए रात को गाँवों में भी रहना पड़ता। लोग सोचते कि ये रात-रात भर कहाँ रहती है ? इसका पति कहाँ है ? वे उससे किसी-न-किसी बहाने पूछते। वो जानती थी कि उसे अकेली समझ, सहानुभूति के नाम पर ये भेडि़ये उसके साथ क्या कुछ नहीं कर सकते। उसने शुरू-शुरू में झूठ बोला कि मेरा शौहर देहरादून में मोटर मैकेनिक है- बच्चे उन्हीं के पास रहते हैं।

फिर लोगों ने उसके बारे में छानबीन शुरू की- महिला समाख्या कार्यालय में शिकायत की कि ये रात-रात कहाँ रहती है? महिला समाख्या में सबने उसे इन परेशानियों से उबरने में सहयोग दिया। सितारा ने लोगों की बातों पर ध्यान नहीं दिया- कोई जवाब नहीं दिया। मेहनत से अपना काम करती रही। वो जान रही थी कि वक्त आने पर उसके काम पर की गई मेहनत ही उसकी गवाही देगी। झक मार कर लोग चुप हो गए। धीरे-धीरे सितारा के काम की चर्चा उन तक पहुँच ही रही थी। सितारा महिला समाख्या में रहकर अपना एक और सपना पूरा करने की ओर बढ़ी। एम.ए. की परीक्षा दी और पास हो गई।

उसके बच्चे जो अब बड़े हो गए हैं, माँ के पास देहरादून रहते हैं। उसने महिला समाख्या से जो भी सीखा- उससे केवल गाँव की महिलाओं की सहायता नहीं की वरन अपने आप को भी मजबूत किया।

महिला समाख्या उसके परिवार की तरह है। उसके बच्चों की अब वही एक माँ नहीं- सभी साथिनें उनकी माँ हैं- उनकी चिंता करने वाली हैं। व्यक्तिगत जीवन में भी अब वह उन्ही के अनुभवों तथा सलाहों से काम करती है। महिला समाख्या ने उसे आर्थिक मदद तो दी ही है, उससे ज्यादा तो गाँव की औरतों से रिश्ते, अपनापन तथा अन्दरूनी ताकत दी है, जो शायद ही कहीं से मिल पाती। वह महिला समाख्या की ऋणी है। जब भी वह महिलाओं की समस्या, मुद्दे सुलझाती है उसे नहीं लगता कि वो किसी और औरत की समस्या सुलझाने जा रही है। उसे तो लगता है वह अपने ही जीवन की गाँठ खोल रही है। सैकड़ों औरतों के साथ से उसके संघर्ष को धार मिल गई है।

उसने गाँव में जो महिला संघ बनवाए, वे ही उसकी ताकत बन गए हैं। प्रशासनिक अधिकारी उसका सम्मान करते हैं। अब उन्हें तलाकशुदा अकेली सितारा नहीं दिखती- बल्कि उसके पीछे खड़ी महिलाओं की फौज दिखाई देती है, जिन्हें सितारा ने संगठित किया है। वो सोचती है, ‘हम औरतें सारी दुनिया में एक क्यों नहीं हो जातीं। जाति-धर्म में बँटी हम औरतों को तोड़ना पिद्रशाही के ठेकेदारों के लिए कितना आसान होता है, पर महिलायें कभी तो अपना हक समझेंगी और एक होकर इस समाज की समानता की लड़ाई लडेंगी।’

कहाँ हैं हम अकेली,  दीदी लोग नारीवादी आन्दोलन के संघर्ष के बारे में लगातार बताती हैं। हम सब उसी संघर्ष का हिस्सा हैं। हम लडे़गी, टूटेंगी, बिखरेंगी तो एक-दूसरे का हाथ पकड़ लेंगी, यही सच है। एक दिन तो हमारा होगा। आने वाले दिनों के बारे में सोच कर ही वो मुस्करा दी।

‘‘सितारा ऐसे अकेले क्यों मुस्करा रही हो?’’  प्रमिला ने पूछा। मुद्दा सुलझाकर जा रही सितारा को अकेले-अकेले मुस्कराता देख प्रश्न पूछना लाजिमी था। सितारा क्या बताए, उसने आज फिर एक औरत की मदद की है। आज फिर उसने एक गाँठ खोली है। आज फिर बोझ हल्का हुआ है। सहेली की पीठ पर धौल जमाती हुई वो बोली, ‘‘मेरा भी तो हक है मुस्कराहट पर!’’

सरसों के फूलों से भरे खेत के बीच की पगडण्डी पर चलती दोनों सहेलियाँ खिल खिला कर हंस पड़ीं। उनकी खिलखिलाहट सुनकर उनके आगे चल रहा कुत्ता चौंककर भाग गया।

(महिला समाख्‍या उत्‍तराखंड द्वारा प्रकाशित पुस्‍तक ‘बोल के लब आजाद हैं तेरे’ से साभार)