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अनुप्रि‍या की बाल कवि‍ताएं

चि‍त्र: अनुप्रि‍या

कि‍ताब

काले अक्षर की माला में
गूंथा हुआ जवाब हूँ
मैं तो प्यारी मुनिया की
एकदम नयी किताब हूँ

मेरे भीतर कई कहानी
कितने सारे रंग
उड़ता बादल,चहकी चिड़िया
सब हैं मेरे संग

उड़नखटोला अभी उड़ा है
लेकर सपने साथ
आसमान की सैर करेंगे
दे दो अपना हाथ

प्यासा कौवा ढूँढ़ रहा है
पानी की एक मटकी
शेर आ रहा पास है अब तो
साँस हमारी अटकी

मुन्ना खाए आम रसीला
मुनिया देखे फूल
खेल-खेल में पढ़ते बच्चे
बातें सारी भूल।

चिड़िया रानी

चिड़िया रानी पल भर ठहरो
मुझको तुम एक बात बताओ
कैसे गाती इतना मीठा
आज पहेली यह सुलझाओ

कैसे नन्हे पंखों के बल
आसमान छू पाती हो
तुम्हें पकड़ने हम जो आएं
झट से तुम उड़ जाती हो

कैसे छोटी चोंच तुम्हारी
चुग जाती है दानों को
आज बताना होगा तुमको
हम नन्हे अनजानों को

एक दिन फुरसत में हमको भी
आसमान की सैर कराओ
चूं-चूं-चीं-चीं की भाषा में
नयी कहानी हमें सुनाओ।

सुबह सवेरा

हाथ थाम कर सूरज का
घर से चला सवेरा
चिड़ियों के पंखों ने डाला
आसमान में डेरा

धीमे-धीमे आँख मींचते
उठा है सारा बाग़
लहरों ने रच डाला  है
आज नया फिर राग

ढूंढ़ रहा है बादल कब से
खोयी हुई जुराब
भूल गया है मेज पे रख के
फिर वो नयी किताब

खिल आये हैं चेहरे फिर
फिर से सजे हैं खेल
जिससे कल झगड़ा कर आये
आज किया फिर मेल

चिड़िया और दाना : गोपाल प्रधान

लोककथाओं का एक रोमांचक संसार है। एक लोककथा कई भाषाओं/बोलियों में प्रचलित है और उनका अलग ही आनंद है। एक ऐसी ही लोककथा को भोजपुरी में लिखा है गोपाल प्रधान ने-
एक चिड़िया को दाल का एक दाना मिला । उसने सोचा कि इसमें से आधा वह अभी खा लेगी और बाकी आधा चोंच में दबाकर दूर देस उड़कर जा सकेगी । यही सोचकर उसने दाने को चक्की में दो हिस्सा करने के लिए डाला । चक्की चलाते ही एक हिस्सा तो टूटकर बाहर आ गिरा लेकिन शेष आधा चक्की के खूँटे में फँसा रह गया । अब तो कोई खूँटे को चीरे तो दाना निकले और वह अपना सफर शुरू करे । पहले चिड़िया बढ़ई के पास गई । बोली-
बढ़ई बढ़ई खूँटा चीर खूँटवे में दाल बा
का खाईं का पीहीं का ले परदेस जाईं

बढ़ई ने समय न होने का बहाना बनाकर इनकार कर दिया । तब चिड़िया राजा के पास गई । बोली-
राजा राजा बढ़ई डाँट बढ़ई न खूँटा चीरे
खूँटवे में दाल बा
का खाईं का पीहीं का ले परदेस जाईं

राजा ने कहा- जाओ, तुम्हारे लिये मैं बढ़ई को नहीं डाँटूँगा । चिड़िया रानी के पास गई । बोली-
रानी रानी राजा छोड़ राजा न बढ़ई डाँटे
बढ़ई न खूँटा चीरे
खूँटवे में दाल बा
का खाईं का पीहीं का ले परदेस जाईं

रानी ने भी उसकी माँग की ओर ध्यान नहीं दिया और डाँटकर भगा दिया । चिड़िया साँप के पास गई । बोली-
सरप सरप रानी डँस रानी न राजा छोड़े
राजा न बढ़ई डाँटे
बढ़ई न खूँटा चीरे
खूँटवे में दाल बा
का खाईं का पीहीं का ले परदेस जाईं

साँप को भी यह काम करने लायक नहीं लगा । फिर चिड़िया लाठी के पास गई । बोली-
लाठी लाठी सरप ठेठाव सरप न रानी डँसे
रानी न राजा छोड़े
राजा न बढ़ई डाँटे
बढ़ई न खूँटा चीरे
खूँटवे में दाल बा
का खाईं का पीहीं का ले परदेस जाईं

लाठी ने भी उसकी मदद करने से इनकार कर दिया । चिड़िया भाड़ के पास गई । बोली-
भाड़ भाड़ लाठी जार लाठी न सरप ठेठावे
सरप न रानी डँसे
रानी न राजा छोड़े
राजा न बढ़ई डाँटे
बढ़ई न खूँटा चीरे
खूँटवे में दाल बा
का खाईं का पीहीं का ले परदेस जाईं

भाड़ को भी उसकी माँग नाजायज लगी । चिड़िया हाथी के पास गई । बोली-
हाथी हाथी भाड़ बुताव भाड़ न लाठी जारे
लाठी न सरप ठेठावे
सरप न रानी डँसे
रानी न राजा छोड़े
राजा न बढ़ई डाँटे
बढ़ई न खूँटा चीरे
खूँटवे में दाल बा
का खाईं का पीहीं का ले परदेस जाईं

हाथी भी इस काम के लिए तैयार न हुआ । चिड़िया भँवर के पास गई । बोली-
भँवर भँवर हाथी छान हाथी न भाड़ बुतावे
भाड़ न लाठी जारे
लाठी न सरप ठेठावे
सरप न रानी डँसे
रानी न राजा छोड़े
राजा न बढ़ई डाँटे
बढ़ई न खूँटा चीरे
खूँटवे में दाल बा
का खाईं का पीहीं का ले परदेस जाईं

भँवर भी उसकी मदद करने से इनकार कर बैठा । हारकर चिड़िया पुराने दोस्त मूस के पास गई । बोली-
मूस मूस भँवर काट भँवर न हाथी छाने
हाथी न भाड़ बुतावे
भाड़ न लाठी जारे
लाठी न सरप ठेठावे
सरप न रानी डँसे
रानी न राजा छोड़े
राजा न बढ़ई डाँटे
बढ़ई न खूँटा चीरे
खूँटवे में दाल बा
का खाईं का पीहीं का ले परदेस जाईं

आखिरकार चूहा उसकी मदद को राजी हो गया और चला भँवर को काटने । भँवर ने जब सुना तो बोला-
हमको काटो ओटो मत कोई
हम हाथी छानब लोई
हाथी ने सुना तो बोला-
हमको छानो ओनो मत कोई
हम भाड़ बुताइब लोई

भाड़ ने सुना तो बोला-
हमको बुताओ उताओ मत कोई
हम लाठी जारब लोई
लाठी ने सुना तो बोली-
हमको जारो ओरो मत कोई
हम सरप ठेठाइब लोई

साँप ने सुना तो बोला-
हमको ठेठाओ ओठाओ मत कोई
हम रानी डँसब लोई

रानी ने सुना तो बोली-
हमको डँसो ओसो मत कोई
हम राजा छोड़ब लोई

राजा ने सुना तो बोला-
हमको छोड़ो ओड़ो मत कोई
हम बढ़ई डाँटब लोई

बढ़ई ने सुना तो बोला-
हमको डाँटो ओटो मत कोई
हम खूँटा चीरब लोई

और बढ़ई ने खूँटा चीर दिया । चिड़िया ने दाना चोंच में दबाया और उड़ चली परदेस ।

चित्र : रिया शर्मा, कक्षा-तीन

गौरैया का पुनर्वास : कान्तिकुमार जैन

सुबह-सुबह धूप में फुदकती-चहकती गौरैया अब अमूमन दिखाई नहीं पड़ती। यह नन्‍ही-सी चिड़िया दुर्लभ होती जा रही है। गौरैया को लेकर चर्चित संस्‍मरणकार कांतिकुमार जैन का संस्‍मरण-

बचपन में ही जिन पक्षियों से मेरी पहचान हो गई थी, उनमें गौरैया और कौआ प्रमुख हैं। मुझे गौरैया अच्छी लगती है। सहज, शालीन, निराभिमानी और प्रसन्न। वह कोई शोर नहीं करती, न जबरदस्ती स्वयं को आप पर लादती है। वह घरेलू पक्षी है- अहिंसक और शांतिप्रिय। दूसरों की भावनाओं का खयाल रखने वाला कौआ भी घरेलू पक्षी है, पर वह उद्घत और कर्कश है। आप उसका भरोसा नहीं कर सकते। कृष्ण नंद जब आंगन में खेल रहे हैं- माखन रोटी खाते हुए और कौए ने क्या किया ? ‘हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी।’ यह आजकल की चेन स्नैचिंग की तरह का घटिया काम था। गौरैया ऐसा नहीं करती। कौआ बोलता भी तो कैसा है- कांव, कांव कर्कश। गौरैया मृदुभाषिणी है। बहुत हुआ तो चीं-चीं करेगी। अंग्रेजी में ‘टी वी टुट टुट।’ हिन्दी के प्रकृतिप्रेमी कवि सुमित्रानंदन पंत की चिड़िया ‘टी वी टुट टुट’ बोलती है। इन दिनों लोकप्रिय नेताओं और अभिनेताओं के जो ट्विटर छपते हैं, वे यही हैं ‘टी वी टुट टुट।’ कौआ किसी के सिर पर बैठ जाए तो बड़ा अपशगुन होता है। गौरैया के साथ ऐसा नहीं होता। वह तो दो वियोगियों को मिलाने वाला पक्षी है- जायसी ने गौरैया को प्रमाण पत्र दिया है – ‘जेहि मिलावै सोई गौरवा।’ गौरैया के लिए मेरे मन में बड़ा प्यार है।
बचपन में मैंने एक कहानी पड़ी थी। एक राजा की कहानी पर मुझे अब लगता है कि उस कहानी का शीर्षक होना चाहिए था- एक गौरैया की कहानी। गौरैया ने कैसे अपनी अक्ल और लगन से एक किसान की जान बचाई थी और राजकुमारी से उसका ब्याह  करवाया था। आप भी सुनें-
एक राजा था, कहानियां सुनने का बेहद शौकीन, पर उसकी एक शर्त होती थी, कहानी ऐसी हो, जो कभी खत्म न हो। यदि कहानी खत्म हो गई तो कहानी सुनाने वाले का सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा। पर यदि कहानी ऐसी हो, जिसका कभी अंत ही न हो तो पुरस्कार भी बड़ा था। आधा राज्य और राजा की एकमात्र सुन्दर बेटी से विवाह। राज्य के और बाहर के भी अनेक प्रतिस्पर्धी आए। कोई एक रात कहानी कह पाया कोई दो रात। तीन-चार रातों तक कहानी सुनाने वाले भी आए, पर सबका अंत एक ही होता, सिर धड़ से अलग कर दिया जाता। पर आधे राज्य की और उससे बढ़कर राजकुमारी के पाणिग्रहण की संभावना इतनी आकर्षक थी कि लोग सिर हथेली पर रखे खींचे चले आते और बाजी हारकर प्राण गंवा बैठते।
राजा के राज्य में एक युवा किसान भी था। बड़ा विदग्ध, धैर्यवान, समझदार और चतुर। उसने एक रणनीति बनाई और चला आया राजा को कहानी सुनाने। लोगों ने लाख मना किया, पर वह युवक इतना आत्मविश्वास दीप्त था कि जैसे उसे पता हो इस पूरे प्रसंग का अंत क्या होगा? उसने कहानी शुरू की- एक था राजा। राजा ने टोका, तुमको कहानी की शर्त तो पता है न ! कहानी खत्म हुई कि तुम गए काम से। युवक ने राजा को शर्त के उत्तरार्ध की याद दिलाई। राजा ने हुंकारी भरी। युवक ने कहानी का सिरा पकड़ा-
एक था राजा । उसके राज्य की धरती बड़ी उर्वर थी। उसमें बहुत धान होता। राजा ने राज्य में बड़े-बड़े भंडार बनवा रखे थे। उन भंडारों में धान इकट्ठा की जाती। राज्य में सूखा पड़े, अकाल आए तो भी कोई भूखा न मरे। प्रजा तो प्रजा, उस राजा के राज्य में पशु-पक्षी भी बड़े सुखी थे। गौरैया तो जब चाहती, भंडार में आकर दाना ले जाती। एक दिन एक गौरैया आई और भंडार से एक दाना लेकर उड़ गई- फुर्र। फिर एक चिड़िया और आई और एक दाना लेकर उड़ गई- फुर्र। फिर एक चिड़िया और आई और एक दाना लेकर उड़ गई- फुर्र। राजा इस फुर्र-फुर्र से उक्ता रहा था, बोला, ‘कहानी आगे बढ़ाओ।’ भावी दामाद बोला, ‘कैसे बढ़ाएं? राजा के राज्य में न धान की कमी थी, न गौरैयाओं की।’ उसने फिर फुर्र-फुर्र शुरू  की। एक रात बीती, दूसरी बीती, तीसरी के बाद चौथी आई। अब राजा को गुस्सा आ गया, कहानी आगे बढ़ा, नहीं तो तेरी गर्दन धड़ से अलग हो जाएगी। किसान चतुर था। उसने कहा शर्त तो यही है कि जब तक कहानी खत्म न हो, तब तक आप कुछ नहीं कर सकते। उसने फिर शुरू किया- एक गौरैया आई और एक दाना लेकर उड़ गई- फुर्र। राजा को पसीना आ गया। समझ गया कि इस बार किसी चतुर आदमी से पाला पड़ा है। आखिर में हार कर राजा ने उस चतुर युवक को अपना आधा राज्य सौंप दिया और राजकुमारी के साथ उसके सात फेरे करवाए।

बचपन की यह कहानी मेरा पीछा नहीं छोड़ती। मैंने इस कहानी से यह सीखा कि आदमी में धैर्य हो और वह थोड़ी समझदारी से काम ले तो जीत उसी की होती है। उसके सहायक  भी भरोसे के होने चाहिए। गौरैया आदमी की सबसे अच्छी दोस्त है। वह संकट में आपका साथ देती है। चीन में वहां के नेताओं ने हरित क्रांति के फेर में एक  नारा दिया था- ‘एक गौरैया मारो और एक चवन्नी ले जाओ।’ एक चवन्नी के लालच में वहां की गौरैया की आबादी बहुत कम हो गई। फलस्वरूप खेती के दुश्मन  कृमि-कीटों की संख्या बढ़ गई। चीनी नेताओं को अपनी गलती समझ में आई। उन्होंने अपनी नीति बदली और देश में कृषि उत्पादन की वुद्घि के लिए उन्हें  गौरैयाओं का पुनर्वास करना पड़ा।
बचपन की प्यारी गौरैया का मैं कुछ भला कर सकूं, इसका मौका पिछले साल मुझे अनायास ही मिला। विगत वर्ष सितंबर-अक्टूबर की एक सुबह मैंने देखा कि मेरे घर की बैठक झड़ चुकी थी, फिर उसमें खिड़की के नीचे ये तिनके कहां से आए? पत्नी ने बताया कि ये तिनके उस घोंसले के हैं, जो गौरैया इन दिनों खिड़की की मच्छर जाली और कांच के बीच बना रही है। चिड़िया अपनी चोंच में एक तिनका दबाकर लाती और बड़ी जुगत से खिड़की की मच्छर जाली और कांच के बीच जमाती। उसका चिड़ा भी इस काम में उसकी मदद कर रहा था। मैंने कहा कि उसका घोंसला अलग करो, इससे बैठक की साफ-सफाई में दिक्कत होती है, पर पत्नी मुझसे सहमत नहीं हुई। पत्नी ने बताया कि पिछले साल चिड़िया ने़ अपना घोंसला सामने के  प्रवेश द्वार पर लगी चमेली में बनाया था, पर जब चमेली से आंगन में कचरा बढ़ने लगा तो चमेली का वितान अलग करना पड़ा था। वितान अलग हुआ तो गौरैया का घोंसला भी उजड़ गया। अब गौरैया दंपत्ति अपने आशियाने के लिए सुरक्षित स्थान की तलाश में था। लगता है उसे खिड़की के कांच और मच्छरजाली के बीच का ठिकाना सुरक्षित लगा। अब उसे उजाड़ना ठीक नहीं। घोंसला मिटेगा तो बेचारी के अंडे कहां होंगे? वह आसन्न प्रसवा है। फिर उसके चूजे कहां जाएंगे?
पत्नी गौरैया के मातृत्व को लेकर चिंतित थी। मुझे उसकी चिंता सही लगी। मुझे लगा सुरुचि और व्यवस्था के नाम पर किसी का घर-बार उजाड़ना ठीक नहीं। हमने उस साल घर की पुताई नहीं करवाई। पुतैया ने कहीं घोंसले को उखाड़ दिया तो, वहां कोई खतरा मोल नहीं लिया जा सकता।
एक दिन सबेरे हम लोग चाय पी रहे थे कि घोंसले से चीं-चीं की आवाजें आईं। गौरैया के अंडे फूट गए थे। मां प्रसन्न थी, पिताजी भी अपने पितृत्व की खुशी में फुदक-फुदककर नाच रहे थे। पत्नी ने आंगन में एक सकोरे में पानी भर दिया और मुरमुरे फैला दिए थे।
अम्माजी आतीं, चोंच में दाने समेटतीं और चूजों को दाना खिलातीं, उसे चोंच में भरकर पानी ले जाते भी हमने यह चोंचलेबाजी देखी। पर यह चोंचलेबाजी बहुत दिनों तक नहीं चली। चूजे बड़े हो गए, वे अपने पर खोलने लगे, घोंसले से बाहर उड़ने लगे, खुद दाने चुगने लगे और चोंच भी तर करने लगे। चिड़िया और चिड़े ने  उन्हें इस लायक बना दिया कि वे अपनी देखरेख स्वयं कर सकें।
एक दिन हमने देखा गौरैया का आशियाना खाली है। अब हमारी बैठक में तिनके नहीं गिरते। अब हम खिड़की के पल्ले खोलने लगे हैं। थोड़ी-सी संवेदना से हमने गौरैया की एक पीढ़ी को बचा लिया।
एक विस्थापित गौरैया का पुनर्वास कर हमें बड़ी खुशी हुई। पत्नी ने उसके बाद यह नियम ही बना लिया है कि वह रोज सबेरे आंगन में रखे सकोरे में पानी भर दे और नीचे मुरमुरे, कनक बिखेर दे। आओ गौरैया आओ, पानी पियो और दाना खाओ। आखिर तुमने एक युवा की जान बचाई और राजकुमारी से उसकी शादी करवाई थी। उस किसान का जो तुमने भला किया था, उसका प्रतिदान संभव नहीं है, पर तुम्हारे लिए हम जो भी थोड़ा-बहुत कर सकें, हमें करना चाहिए।