
कोशकार अरविंद कुमार और उनकी पत्नी कुसुम कुमार
आधुनिक युग में हिंदी कोशकारिता के जनक अरविंद कुमार पिछले तीन दशक से शब्द संकलन कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने अपनी जमी-जमाई नौकरी छोड़ी और महर्षि जैसे जीवन चुना। बीस साल की अटूट मेहनत के बाद उन्होंने हिंदी को अनमोल खजाना दिया- समांतर कोश। इसका प्रकाशन 1996 में नेशनल बुक ट्रस्ट ने किया। पेंगुइन से प्रकाशित द्विभाषी समांतर कोश से हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाएं समृद्ध हुई हैं। शब्द, शब्द की महत्ता, कोशकारिता के जन्म और उसके विकास पर उनसे बातचीत :
हमारे जीवन में शब्द का क्या महत्व है?
शब्द भाषा की सर्वाधिक महत्वपूर्ण और अपरिहार्य कड़ी है। हमारे संदर्भ में शब्द का केवल एक अर्थ है- एकल, स्वतंत्र, सार्थक ध्वनि। वह ध्वनि जो एक से दूसरे तक मनोभाव पहुंचाती है। संसार की सभी संस्कृतियों में इस सार्थक ध्वनि को बड़ा महत्व दिया गया है। संस्कृत ने शब्द को ब्रह्म का दर्जा दिया है। शब्द जो ईश्वर के बराबर है, जो फैलता है, विश्व को व्याप लेता है। ग्रीक और लैटिन सभ्यताओं में शब्द की, लोगोस की, महिमा का गुणगान विस्तार से है। ईसाइयत में शब्द या लोगोस को कारयित्री प्रतिभा(क्रीएटिव जीनियस) माना गया है। कहा गया है कि यह ईसा मसीह में परिलक्षित ईश्वर की रचनात्मकता ही है। Read more


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