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श्रम और संघर्ष है बिहार की ऐतिहासिक पहचान

पटना में ‘शताब्दी वर्ष में बिहार: संघर्ष की विरासत-बदलाव की चाहत’ विषय पर आयोजि‍त सेमिनार पर लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन की रि‍पोर्ट-

बिहार के सौ साल होने पर 22 मार्च से सरकार की ओर से जो तीन दिनी जश्‍न चले, उसके जरिये बिहार में ऐसा माहौल बनाया गया, मानो यहाँ हर चीज बेहतर हो गई है और चारों ओर खुशनुमा माहौल है। कला, संस्कृति, समाज और बौद्धिक क्षेत्र के बहुत कम ही लोग थे, जो सरकार के इस खेल से परे थे। सवाल यह है कि करोड़ों रुपये के खर्च से किस बिहारी अस्मिता और स्वाभिमान को इस सरकार ने मजबूत बनाया? एक शेर को थोड़ा बदल के कहने को जी चाहता है- तुम शौक से मनाओ जश्‍ने सौ साल सरकार, इस रोशनी में लेकिन कितने घर भी जल रहे हैं। यह महीना पहले मार्च लूट के नाम से जाना जाता था, इस बार मालूम नहीं जश्‍न के नाम पर कितनी लूट हो रही होगी! बिहार में मीडियाकर्मी, साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी, बुद्धिजीवी इतने सत्तापरस्त तो कभी नहीं हुये थे। तरह-तरह के सम्मानों की खैरात बँट रही थी, लोकार्पण हो रहे थे, सांस्कृतिक कार्यक्रम हो रहे थे और लोग उसमें डूबते जा रहे थे। लेकिन बिहार सत्ताधारियों की सनक में जब नीले रंग में रोशनी में डूबाया जा रहा था, तब भी कुछ लोग ऐसे थे जो इसके पीछे मौजूद अंधेरे की शिनाख्त कर रहे थे।

22 मार्च को जब गाँधी मैदान में सरकार और प्रशासन जश्‍न की तैयारी में लगे हुये थे, उस वक्त उसी गाँधी मैदान के एक कोने पर आईएमए हॉल में छात्र संगठन ‘आइसा’ और इंकलाबी नौजवान सभा द्वारा आयोजित सेमिनार- ‘शताब्दी वर्ष में बिहार: संघर्ष की विरासत-बदलाव की चाहत’ में बिहार के बुनियादी बदलाव को लेकर गम्‍भीर विचार-विमर्श हो रहा था। सुबह-सुबह एक वरिष्ठ पत्रकार मार्निंग वॉक करते हुये मिले थे, जिन्होंने बताया कि आजकल बिहार में किस तरह मीडिया वही सबकुछ दिखाने को बाध्य है जो सरकार चाहती है, बाकायदा फोन करके पत्रकारों को निर्देशित किया जाता है कि किस तरह की खबरें छापनी हैं। जब हम सेमिनार में पहुँचे तो देखा कि वह पत्रकार भी मौजूद थे। सेमिनार में जाते वक्त दो तरह का बिहार साफ-साफ सड़कों पर दिख रहा था। एक बिहार था जो ऊँची बिल्डिंगों, लेटेस्ट मॉडल की गाडि़यों और विज्ञापनों के होर्डिंगों में दिख रहा था। जेपी की मूर्ति भी सरकार के विज्ञापनों से ढँक सी गई थी। दूसरी ओर ठेलेवाले, रिक्शेवाले आज भी सड़क किनारे खाना पका रहे थे। ठीक रेडियो स्टेशन के बगल में कुछ लोग फुटपाथ पर रहने को विवश थे। एक रिक्शेवाले का अंदाजा था कि पटना में 10000 लोग इसी तरह फुटपाथ पर सोते हैं। इधर पटना में बदलाव यह हुआ है कि दारू की दूकानें जगह-जगह दिख रही थीं, लेकिन हमेशा की तरह गरीबों और कम आय वालों के लिये सड़क किनारे खाना बनाकर बेचने वाले भी मौजूद थे। आखिर इस ‘बनते बिहार’ में वे रोजी-रोटी के लिये जायेंगे कहाँ! सेमिनार के बाद हमने भी अपनी भूख लिट्टी की ऐसी ही दूकान पर मिटाई।

सेमिनार में विषय प्रवर्तन करते हुये ‘समकालीन जनमत’ के प्रधान सम्‍पादक रामजी राय ने कहा कि बिहार में 58 प्रतिशत आबादी युवाओं की है और उनके लिये पिछले किसी भी दौर से ज्यादा महत्वपूर्ण है। राज्य सरकार प्रचारित कर रही है कि रोजगार रुक गया है। तो सवाल यह है कि ये जो रेलगाडि़याँ इस तरह से भरी-भरी जा रही हैं  तो क्या उसमें लोग देश घुमने जा रहे हैं? दूसरा सवाल है बिहार की शिक्षा का। नालंदा और विक्रमशीला जैसे विश्‍वविद्यालय जहाँ कभी थे, उसकी शिक्षा की गुणवत्ता की बात तो दूर, सामान्य शिक्षा के लिये भी छात्र बिहार से बाहर जा रहे हैं। बिहारियों को बिहारी होने की शर्म कभी नहीं रही। बिहार अपने बारे में उतनी ही बेबाकी से बात करता रहा है, जितना दूसरों के बारे में। देश की राजधानी भले दिल्ली हो, पर देश में बदलाव की राजधानी पटना रही है। उन्होंने कहा कि बिहार की पहचान नागार्जुन जैसे कवि हैं, जिनकी जन्मशती गुजर गई, पर सरकार को उनकी याद नहीं आई। रामजी राय ने कहा कि बिहार में भाषा-निर्माण की जितनी ताकत है, उतनी कहीं और नहीं हैं। अपनी समस्याओं के समाधान के लिये उठ खड़ा होना और जनविरोधी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष की चेतना बिहार की मूल चेतना है। बिहार में क्षेत्रवाद की प्रवृत्ति नहीं है, बल्कि बिहार में हमेशा संघर्षों की बड़ी एकता की पहल होती रही है। आज सरकार बनते बिहार का प्रचार कर रही है, पर इस बनते बिहार में रोजगार, शिक्षा, सुरक्षा की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। भ्रष्टाचार, घुसखोरी, महिलाओं का उत्पीड़न और अपराध तेजी से बढ़ रहा है। यह सरकार बिहार का नवनिर्माण नहीं कर सकती।

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रोफेसर नवल किशोर चौधरी ने एक मर्मबेधी कविता की तरह अपने वक्तव्य की शुरुआत की। वह उन चंद लोगों में से हैं, जो पिछले वर्षों में लगातार बिहार सरकार की आर्थिक नीति और विकास के मॉडल के खिलाफ मुखर रहे हैं। बिहार शताब्दी जश्‍न पर सवाल उठाते हुये उन्होंने कहा कि पटना को नीली रोशनी में डूबोकर जश्‍न मनाने वालों की निगाह उन सुदूर गाँवों पर नहीं है, जहाँ आज भी दीया नहीं जलता, चूल्हा 24 घंटे में एक बार ही जलता है, वे उन अस्पतालों में नहीं जाते जहाँ की कुव्यवस्था के कारण मरीज दम तोड़ देते हैं, उन संसाधनविहीन स्कूलों के विकास की उन्हें फिक्र नहीं है, जहाँ आम लोगों के बच्चे पढ़ते हैं। इस राज्य की बहुत बड़ी आबादी के विकास और उनकी जिंदगी में प्रकाश लाने की जिम्मेवारी से यह सरकार कन्नी काट चुकी है। बिहार में बदलाव का जो सरकार का दावा है वह बिल्कुल गलत है। आज बिहार के करीब बारह जिले खाद्य असुरक्षा से ग्रस्त हैं। कृषि, पशुपालन में नकारात्मक ग्रोथ हो रही है। बिहार में सिर्फ पाँच से दस प्रतिशत लोगों का विकास हो रहा है। पलायन बिल्कुल नहीं रुका है। सरकार झूठे दावे कर रही है। बिहार के 100 साल होने का जब जश्‍न मनाया जा रहा है तो सोचा यह जाना चाहिये कि जो 90 प्रतिशत आबादी है, वह इस जश्‍न में कहाँ है। किसान आंदोलनों ने बिहार में बुनियादी परिवर्तन का आधार तैयार किया था। आज विकास के लिये भूमि सुधार अनिवार्य है। लेकिन इस सरकार ने भूमि सुधार आयोग को रद्दी की टोकरी में डाल दिया है। कॉमन स्कूल सिस्टम को भी सरकार ने लागू करने से इनकार कर दिया है। शिक्षा की गुणवत्ता नष्ट हो रही है, शिक्षकों की गुणवत्ता खराब है। प्रोफेसर चौधरी ने बेहद क्षोभ के साथ कहा कि पूरी शिक्षा व्यवस्था अनैतिक, भ्रष्ट और चारित्रिक रूप से पतित लोगों के कब्जे में है, जिनमें से कुछ ने तो विश्‍वविद्यालयों को ऐशगाह बना दिया है। उन्होंने कहा कि आज कैबिनेट में कोई बहस नहीं होती। वर्तमान सरकार का पूरा रवैया अलोकतांत्रिक है। कमीशनखोरी, भ्रष्टाचार और लूट बढ़ी है, पूरा सिस्टम यहाँ चौपट हो चुका है। उन्होंने कहा कि बिहार शोषण व सामाजिक अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध की धरती रही है। गौतम बुद्ध भी एक क्रांतिकारी थे। राजनीति, शासन, अर्थ हर स्तर पर बिहार के पास एक जो गौरवशाली विरासत है, वह कुछ व्यक्तियों की नहीं, बल्कि जनता की सामूहिक चेतना की विरासत है।

शिक्षाविद् विनय कंठ ने कहा कि आज उपलब्धियों का जो शोर सरकार मचा रही है, वह कृत्रिम और नकली है। बिहार की सरकार के पास कोई मौलिक दृष्टि नहीं है, बल्कि वह निजीकरण-उदारीकरण की आर्थिक नीतियों की ही नकल कर रही है। इससे भ्रष्टाचार और विषमता ही बढ़ेगी। जो भी विकास हो रहा है, उससे बहुसंख्यक समाज को कोई फायदा नहीं हो रहा है। जनता के लिये एक नई अर्थनीति की जरूरत है, जिसके लिए एक बड़ा राजनीतिक आंदोलन खड़ा करना होगा।

वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर ने कहा कि आज बिहार में पत्रकारिता के आदर्शों पर चोट हो रही है। जनता की बुनियादी सुविधाओं की स्थिति बिल्कुल बदतर है, पर चमकते बिहार का सरकार खूब प्रचार कर रही है। करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं। अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन छप रहे हैं, जिनमें चार लाइन का विज्ञापन और मुख्यमंत्री की बड़ी तस्वीर होती है। सम्‍पादक से लेकर पत्रकार तक पर बंदिश है। आज बिहार में पत्रकारिता की सही दिशा का गम्‍भीर सवाल खड़ा हो गया है। उन्होंने कहा कि यह सेमिनार इस मायने में महत्वपूर्ण है कि एक ओर गाँधी मैदान में जहाँ सरकार जश्‍न में करोड़ों रुपये फूँक रही है, वहां दूसरी ओर यहाँ बिहार के वास्तविक बदलाव के लिये विचार-विमर्श हो रहा है।

पत्रकार श्रीनिवास ने कहा कि जिस तरह फ्राँस की क्रांति के समय वहाँ के राजा ने सरकस का खेल शुरू किया था, आज बिहार शताब्दी पर होने वाले जश्‍न उसी तरह की कोशिश है। लेकिन नीली रोशनी के पीछे के अंधेरे को यह सरकार लाख कोशिशों के बावजूद छिपा नहीं पायेगी। उन्होंने कहा कि बिहार की पत्रकारिता का उदय जनसंघर्षों से हुआ है। इस समय जो गड़बडि़यां सरकार कर रही है, उसका साथ देना पत्रकारिता की विरासत के खिलाफ है। ‘पीपुल वॉयस’ के सम्‍पादक डॉ. मुकेश ने कहा कि बिहार की समस्या यह है कि यहाँ लगातार स्वप्नविहीन सरकारें आती रही हैं, जो सिर्फ नकारात्मक काम करती रही हैं। जो भी सकारात्मक बदलाव हुये हैं, वे जनता के संघर्षों और कुर्बानियों के जरिये हुये हैं। ‘बिहार टाइम्स’ के सम्‍पादक अजय कुमार ने कहा कि बिहार सरकार इंवेंट मैनेजमेंट की सरकार बनकर रह गई है। बिहार में 50 लाख लोग गरीबी रेखा के नीचे चले गये, संसद में उस पर बहस भी हुई, पर वह खबर बिहार के किसी अखबार में नहीं है। ग्रोथ रेट में यह कैसी बढ़ोतरी है कि जिसके साथ गरीबी भी बढ़ रही है? विस्थापन भी 26 प्रतिशत बढ़ गया है। उन्होंने कहा कि बौद्धिक सच को छुपाने का काम कर रहे हैं। बिहार में नागरिक समाज की चुप्पी पर उन्होंने चिंता जाहिर की।

भाकपा-माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि बिहार में सत्ता की बागडोर सामंती-सांप्रदायिक सोच के लोगों के हाथ में है जिनकी साम्राज्यवाद के साथ साठगांठ है। बिहार में भी सरकार साम्राज्यवादपरस्त नीतियों को ही लागू कर रही है, यहाँ कोई बुनियादी बदलाव नहीं हुआ है। सरकार सिर्फ सत्ता-प्रबंधन, उपलब्धियों के फर्जी आंकड़ों और विज्ञापन तथा जनता के खजाने की लूट में लगी हुई है, जबकि राज्य में गरीबों की संख्या, बेरोजगारी और मजदूर-किसानों की बदहाली लगातार बढ़ती जा रही है। आज भी यहाँ रोजगार और मजदूरी का सवाल उठाने पर दमन हो रहा है, नाबालिग बच्चियों का बलात्कार और हत्या का विरोध करने वालों की हत्या हो रही है, बुद्धिजीवियों द्वारा सवाल पूछने पर उन्हें सत्ता द्वारा चुप कराया जा रहा है, मीडिया की स्वतंत्रता छीन ली गई है। भूमि सुधार से आतंकित होना ही इसका संकेत है कि अभी भी सत्ता, समाज, राजनीति और समाज की बनावट में सामंती सोच हावी है। न्यायपालिका के दोहरे मापदंड हैं, अमौसी जनसंहार में गरीबों को आजीवन कारावास और फाँसी दी जाती है और गरीबों के जनसंहार करने वाले और उनके राजनीतिक संरक्षक आज भी खुले घूम रहे हैं, आज भी उनके अपराध का धंधा चल रहा है, जबकि हमारे साथियों की आज भी हत्या की जा रही है। इसलिये बिहार में लोकतंत्र और जमीनी विकास का क्या होगा, यह सवाल इस वक्त ज्यादा महत्वपूर्ण है।

उन्‍होंने कहा कि अंग्रेजों से लेकर आज तक बिहार की सत्ता ने जनता की बदलाव और विकास की आकांक्षा का कुचलने का ही काम किया है। बिहार उनके लिये श्रम के शोषण-दोहन की प्रयोगशाला रहा है। इसी कारण शोषण के खिलाफ संघर्ष और बुनियादी तौर पर व्यवस्था को बदलने वाले क्रांतिकारी जनांदोलन भी बिहार में लगातार होते रहे हैं। श्रम और संघर्ष बिहार की मूल पहचान है। छोटी-छोटी चीजों के लिये भी बड़ी-बड़ी लड़ाइयां बिहार में छिड़ जाती रही हैं। यहाँ बदलाव का संघर्ष अपने अंतर्वस्तु में व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव की मांग करता है। वामपंथी आंदोलन में भी इसीलिये बिहार क्रांति की निरंतर कोशिशों के लिये जाना जाता रहा है। बिहार में आज आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक तौर पर आगे बढ़ने की परिस्थितियां हैं, पर इसके लिए वर्तमान यथास्थितिवादी सत्ता जिसने बदलाव का झूठा भ्रम खड़ा किया है, उसे बदलना बेहद जरूरी है और उसे बदलने का काम यहाँ के नौजवान, छात्र, मजदूर और किसान ही मिलकर कर सकते हैं। जनता की जो बदलाव की विरासत और संघर्ष की ताकत है, उसको आगे बढ़ाना आज बेहद जरूरी है।

सेमिनार में इनौस के राष्ट्रीय महासचिव कमलेश शर्मा, आइसा के राज्य सचिव अभ्युदय, इनौस के राज्य सचिव नवीन कुमार, अरुण नारायण, युवा कवि मनोज कुमार झा, सजल आनंद, राजेश कमल, कथाकार शेखर, प्रो. तरुण कुमार, एडवोकेट मनोहर लाल, रत्नेश, रंगकर्मी संतोष झा, सुरेश कुमार ‘हज्जू’, माले नेता कृष्णदेव यादव, संतोष सहर, एपवा नेत्री अनीता सिन्हा समेत सैकड़ों गणमाण्य नागरिक, छात्रा-युवा मौजूद थे।

जाने माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा का नि‍धन

नई दि‍ल्‍ली : जाने-माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा नहीं रहे। 25 फरवरी को दिन के 12 बजे पटना के मगध अस्पताल में उनका निधन हो गया। 22 फरवरी को जब वे दिल्ली से पटना आ रहे थे, ट्रेन में ही उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हुआ। उन्हें पटना के मगध अस्पताल में अचेतावस्था में भर्ती कराया गया। तीन दिनों तक जीवन और मौत से जूझते हुए 25 को उन्होंने अन्तिम सांस ली। उनका अन्तिम संस्कार पटना में ही होगा। उनके निधन की खबर से पटना, लखनऊ, दिल्ली, इलाहाबाद सहित तमाम जगहों में लेखको, संस्कृतिकर्मियों के बीच दुख की लहर फैल गई। जन संस्कृति मंच ने उनके निधन पर गहरा दुख प्रकट किया है। उनके निधन को जन सांस्कृतिक आंदोलन के लिए एक बड़ी क्षति बताया है।

ज्ञात हो कि अनिल सिन्हा एक जुझारू व प्रतिबद्ध लेखक व पत्रकार रहे हैं। उनका जन्म 11 जनवरी, 1942 को जहानाबाद, गया, बिहार में हुआ। उन्होंने पटना वि‍श्‍वविद्यालय से 1962 में एम.ए. हिन्दी में उतीर्ण किया। वि‍श्‍वविद्यालय की राजनीति और चाटुकारिता के विरोध में उन्होंने पीएचडी बीच में ही छोड़ दी। उन्होंने प्रूफ रीडिंग, प्राध्यापिकी, विभिन्न सामाजिक विषयों पर शोध जैसे कई कार्य किये। 70 के दशक में उन्होंने पटना से ‘विनिमय’ साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया जो उस दौर की अत्यन्त चर्चित पत्रिका थी। आर्यवर्त, आज, ज्योत्स्ना, जन, दिनमान से भी वह जुड़े रहे। 1980 में जब लखनऊ से अमृत प्रभात निकलना शुरू हुआ, उन्होंने इस अखबार में काम किया। अमृत प्रभात लखनऊ में बन्द होने के बाद में वे नवभारत टाइम्स में आ गये। दैनिक जागरण, रीवाँ के वह स्थानीय संपादक रहे। लेकिन वैचारिक मतभेद की वजह से उन्होंने यह अखबार छोड़ दिया।

अनिल सिन्हा बेहतर, मानवोचित दुनिया की उम्मीद के लिए निरन्तर संघर्ष में अटूट विश्‍वास रखने वाले रचनाकार थे। वह मानते थे कि एक रचनाकार का काम हमेशा एक बेहतर समाज का निर्माण करना है, उसके लिए संघर्ष करना है। उनका लेखन इस ध्येय को समर्पित है। वह जन संस्कृति मंच के संस्थापकों में थे। वह उसकी राष्ट्रीय परिषद के सदस्य थे। वह जन संस्कृति मंच उत्‍तर प्रदेश के पहले सचिव थे। वी क्रान्तिकारी वामपंथ की धारा तथा भाकपा (माले) से भी जुड़े थे। इंडियन पीपुल्स फ्रंट जेसे क्रान्तिकारी संगठन के गठन में भी उनकी भूमिका थी। इस राजनीति जुड़ाव ने उनकी वैचारिकी का निर्माण किया था।

कहानी, समीक्षा, अलोचना, कला समीक्षा, भेंट वार्ता, संस्मरण आदि कई क्षेत्रों में उन्होंने काम किया। ‘मठ’ नाम से उनका कहानी संग्रह 2005 में भावना प्रकाशन से प्रकाशि‍त हुआ। पत्रकारिता पर उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘हिन्दी पत्रकारिता: इतिहास, स्वरूप एवं संभावनाएँ’ प्रकाशित हुई। पिछले दिनों उनके द्वारा अनुदित पुस्तक ‘साम्राज्यवाद का विरोध और जतियों का उन्मुलन’ छपकर आयी थी। उनकी सैकड़ों रचनाएँ पत्र पत्रिकाओं में छपती रही है। उनका रचना संसार बहुत बड़ा है, उससे भी बड़ी है उनको चाहने वालों की दुनिया। मृत्यु के अन्तिम दिनों तक वह अत्यन्त सक्रिय थे तथा 27 फरवरी को लखनऊ में आयोजित शमशेर, नागार्जुन और केदार जन्तशती आयोजन के वह मुख्य कार्यकर्ता थे।

उनके निधन पर शोक प्रकट करने वालों में मैनेजर पाण्डेय, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, आलोक धन्वा, प्रणय कृष्ण, रामजी राय, अशोक भैमिक, अजय सिंह, सुभाष चन्द्र कुशवाहा, राजेन्द्र कुमार, भगवान स्वरूप कटियार, राजेश कुमार, कौशल किशोर, गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव, चन्द्रशेखर, वीरेन्द्र यादव, दयाशंकर राय, वंदना मिश्र, राणा प्रताप, समकालीन लोकयुद्ध के संपादक बृजबिहारी पाण्डेय आदि रचनाकार हैं। अपनी संवेदना प्रकट करते हुए जारी वक्तव्य में रचनाकारों ने कहा कि अनिल सिन्हा आत्मप्रचार से दूर ऐसे रचनाकार रहे हैं जो संघर्ष में यकीन करते थे। इनकी आलोचना में सर्जानात्मकता और शालीनता दिखती है। ऐसे रचनाकार आज विरले मिलेंगे जिनमें इतनी वैचारिक प्रतिबद्धता और सर्जनात्मकता हो। इनके निधन से लेखन और विचार की दुनिया ने एक अपना सच्चा व ईमानदार साथी खो दिया है।

मानस चलन्तिका टीका के मटमैले पर्दे पर दास्तान-ए-वैशाली : संजीव कुमार

अधिकांश लोगों ने बचपन का वह दौर देखा होगा, जब गली-मुहल्‍ले में एक्‍का-दुक्‍का टीवी होती थी और उस पर कार्यक्रम देखने के लिए मन में बेचैनी। मेजबान के यहां भीड़ लग जाती थी। सिनेमा हॉल में फिल्‍म देखना तो उत्‍सव जैसा होता था। टीवी की घर-घर में पहुंच और मनोरंजन के अन्‍य साधनों के विकास ने उस दौर का अंत कर दिया। पटना के सिनेमा हॉल वैशाली के बहाने उस रोमांचकारी दौर और उसके अंत पर युवा कथाकार संजीव कुमार का स्‍मृति लेख-

Memory is the only one of our mental faculties that we accept as working normally when it malfunctions.                                                    -Mary Warnock

कम लोगों को पता होगा कि जिस प्रतिभाबहुल हिन्दी जगत ने एक ओर टेलीविजन के लिए दूरदर्शन, स्वीमिंग पूल के लिए तरण ताल- जैसे शब्द गढ़े और दूसरी ओर इंस्पेक्टर के लिए निसपिटर (नासपिटा के ध्वनिसाम्य पर),  लॉर्ड के लिए लाट,  अल्युमिनियम के लिए ललमुनियाँ इत्यादि का आविष्कार किया,  उसी ने इन दोनों परम्पराओं को मिलाते हुए मूवीज-टॉकीज यानी चलती बोलती तस्वीरों (के प्रदर्शन की जगह) के लिए एक शब्द दिया है- चलन्तिका टीका। बदकिस्मती से यह शब्द खुद अचलन्तिका साबित हुआ,  पर बिहार के बेगूसराय शहर से सम्बन्ध रखने वाले लोग वहां के ऐतिहासिक सिनेमाघर ‘श्री कृष्ण चलन्तिका टीका’  के कारण इससे परिचित हैं,  भले ही वे इसे जातिवाचक संज्ञा न मानते हों। वैसे भी यह मानने से ज्यादा जानने या पहचानने का मामला है और मेरी महीन मेधा का साधुवाद कीजिए,  जिसने पहली ही भिड़न्त में इसकी जातिवाचकता को पहचान लिया। तब से जो भी सिनेमाघर मुझे अपना-सा लगा,  उसे मैंने इस श्रुतिमधुर कुलनाम के साथ ही पुकारा है। यह सब सिर्फ इसलिए बता रहा हूँ,  ताकि आप मानस चलन्तिका टीका को रामचरितमानस का कोई चलताऊ किंवा प्रचलित भाष्य न समझ बैठें। यह तो कोटि-कोटि कविआए हुए जनों द्वारा कोटिशः प्रयुक्त रूपक अलंकार की एक और आजमाइश भर है। मानस चलन्तिका टीका- यानी मनरूपी टॉकीज। …फिलहाल इसके मटमैले पर्दे पर स्मृति के मायावी प्रोजेक्टर से प्रक्षेपित एक और चलन्तिका टीका- वैशाली- की दास्तान देख-सुन रहा हूँ,  जाहिर है,  सुनाने के लोभ से। मूल में यह दास्तान काफी-कुछ धुँधली और सम्बन्ध-व्यवस्था-रहित है और इस लिहाज से शायद वह दास्तान है ही नहीं। दिक्कत ये है कि उस धुन्ध और अव्यवस्था को दूर किये बगैर सुनाने का काम हो नहीं सकता। इसलिए कुछ तो उस मायावी प्रोजेक्टर के चलते जो माध्यम होने के साथ-साथ बहुधा हमारी जरूरत को भाँप कर सम्पादक और सर्जक की भूमिका अख्तियार कर लेता है और कुछ मेरी सचेत कोशिशों के चलते,  अपने शब्दावतार में यह दास्तान काफी हद तक सुसम्बद्ध दिखलाई पड़ेगी।

काश, स्मृति मूलतः इतनी व्यवस्था-प्रिय होती!

अब याद नहीं कि वह खबरनवीस कौन था,  जिसने हमारी सांध्य सभा में यह स्कूप पेश किया कि ‘कौमनिटी सेंटर के पिछुअत्ती ए गो हॉल बनेगा।’  पटना में उन दिनों सिर्फ ‘हॉल’  कहा जाय,  तो मतलब होता था, सिनेमा हॉल। दूसरे स्थानों और कालों में भी यह मतलब होता होगा, पर शायद तभी जब इस शब्द के प्रयोग का सन्दर्भ स्पष्ट हो। मसलन ‘फलाँ फिल्म किस हॉल में चल रही है?’  मैं जिस भाषिक व्यवहार की बात कर रहा हूँ, उसमें बिना किसी स्पष्ट सन्दर्भ के भी ‘हॉल’ का मतलब सिनेमा हॉल ही होता है या कहिए,  होता था। यह शायद उस ठिगने शहर का अपना तरीका था,  सिनेमा घरों की विराटता के प्रति सम्मान व्यक्त करने का। चारमंजिला इमारतें तक उन दिनों मुश्किल से मिलती थीं और हमने सुन रखा था कि बम्बई में पच्चीसवीं मंजिल पर रहने वालों के घरों में ऑक्सीजन का सिलेण्डर,  एहतियातन,  हमेशा मौजूद रहता है। इस सुनावत पर भरोसा न करने की कोई वजह नहीं थी। हम पढ़े-लिखे बालक थे और हमें पता था कि ऊँचाई के साथ-साथ वायुमण्डल विरल होता जाता है।

बहरहाल, ‘हॉल बनेगा’  की खुशी को अभी हम सहेज भी नहीं पाये थे कि खबरनवीस ने एक झटका दिया,  गोया चुम्बन के बाद चाँटा,  बकौल राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह। बताया,  ‘बनेगा,  बकी अभी टाइम लगेगा। रिजर्व बैंक वाला लोग केस कर दिया है कि हमारा क्वार्टर के सामने हॉल नहीं बनना चाहिए। फैमिली वाला जगह है ना! हॉल बनने से त लफुआ सब का जुटान होने लगेगा।’ रिजर्व बैंक वालों का इस तरह राजेन्द्र नगर की महान सांस्कृतिक उपलब्धि के आड़े आना हम सभी को बेहद नागवार गुजरा। हमने सर्वसम्मति से इस लोकोक्ति को दुहराया कि ऊपर वाला सब कुछ देखता है;  उसके यहां देर है,  अन्धेर नहीं। दो एक ने तो लगे हाथ कभी उस बैंक में खाता न खुलवाने की कसम खा ली और मेरी पक्की जानकारी है कि वे आज तक इसपर अडिग हैं।

अन्धेर सचमुच नहीं था। रिजर्व बैंक क्वार्टर्स वाले केस हार गये। ऐसा कुछ हकीकत में हुआ था या कि अफसानों और अफवाहों में ही केस लड़ा भी गया और जीता-हारा भी गया,  मैं नहीं जानता। पर यह सच है कि कुछ समय बाद हॉल बनने की शुरुआत हो गई। यह सन् 75-77 की बात रही होगी,  जब सम्पूर्ण क्रान्ति की लहर के साथ शहर के तमाम लफंगों ने अपने को क्रान्तिकारियों में शुमार करा लिया था और प्रतिक्रिया में भद्र समाज का एक बड़ा हिस्सा तमाम क्रान्तिकारियों को लफंगों में शुमार करने लगा था। हॉल बनने की शुरुआत का जब समाचार मिला,  तो हममें से कइयों ने क्रान्तिकारी लफंगों और लफंगे क्रान्तिकारियों के मुँह से सुनी हुई बात ‘जे.पी. जिन्दाबाद’  का उद्घोष किया। उत्साह के भाव को रसदशा तक पहुँचाने का यह माना हुआ तरीका था। एक मित्र ने तो,  जो उम्र में मुझसे तीन-चार साल बड़ा यानी चौदह-पन्द्रह की लपेट में रहा होगा,  उत्साह में कदमकुआँ थाने के गेट पर खड़े बन्दूकधारी सिपाही को मामू कह कर हुलका दिया और फिर यज्जा-वज्जा-शैली में भाग खड़ा हुआ। यह भी इमरजेंसी के दौर में उत्साह व्यक्त करने की एक लोकप्रिय पद्धति थी। इसी में कभी तथाकथित मामू पीछे पड़ जाय,  तो पद्धति जरा महंगी पड़ती थी। उस दिन भी हममें से एक को मुखबिर बना कर मामू ने उत्साही बालक पुन्नू का घर खोज ही लिया। फिर उसे यह समझाने में पुन्नू के घरवालों को खासी मिहनत करनी पड़ी कि लड़का हॉल के साइड यानी साइट पर गया हुआ था और उसका काम चालू देखकर उत्साह में आ गया था। फिर जो हुआ,  वह तो स्वाभाविक ही था। इसमें लड़के का क्या कसूर!

बात वाजिब थी। हमारे इलाके को एक सिनेमा हॉल की जितनी सख्त जरूरत थी और हॉल बनने की उम्मीद जगते ही इस जरूरत को जितनी शिद्दत से महसूस किया जाने लगा था,  उसे देखते हुए पुन्नू का उत्साह और तज्जनित कर्म अनुचित नहीं था। उत्साह के कारणों की चर्चा आगे सविस्तार होगी;  जहाँ तक तज्जनित कर्म का सवाल है,  वह दौरे-जहाँ से मिली हुई एक रस्म की अदायगी भर थी,  कोई मौलिक उद्भावना नहीं। इसके लिए भला एक बालक को कसूरवार कैसे ठहराया जाता! दौरे-जहाँ का करिश्‍मा क्या था,  यह इससे समझिए कि पप्पू के छोटे भाई (प.छो.भा.) ने,  जो उन दिनों बोलना सीख ही रहा था,  राइम-रटन्त की शुरुआत ‘जानी जानी यस पापा’  या ‘मछली जल की रानी है’  की जगह ‘देवकान्त बरुआ,  इन्दू जी के…..(तुक मिलाएँ!)’  से की थी और वह भी बिना किसी के सिखाए। उम्र के थोड़े फर्क के बावजूद हमारी पीढ़ी की हालत कमोबेश प.छो.भा. जैसी ही थी। हमें भी न तो उस उथल-पुथल के टुच्चेपन की समझ थी,  न ही उसके औदात्य की। तभी तो रात के आठ बजे जब हमारी गली से सौ कदम के फासले पर स्थित लोकनायक जयप्रकाश के आवास से थाली और कनस्तर बजने की आवाजें आनी शुरू होतीं और चन्द मिनटों कि भीतर पूरा पटना शहर थालियों और कनस्‍तरों की ढनढनाहट से गूँजने लगता,  तब उसे प्रतिरोध का दिगन्‍तव्यापी नाद मान कर नहीं,  बड़ों के बचपने का इजहार मान कर हमारी खुशी सारे बाँध तोड़ने लगती थी। हम उसमें काफी बढ़-चढ़ कर योगदान करते थे,  जिसे आज आप चाहें तो प्रतिरोध के कोरस में हमारा ऐतिहासिक योगदान कह सकते हैं,  पर जिसके पीछे हमारी प्रेरणा निहायत क्षणवादी होती थी। क्षणों में जीने की यह संकीर्णता एक बार खासी मंहगी पड़ी थी,  जब रसोईघर से थाली-कनस्तर की मांग पर दुत्कारे जाने के बाद हमारे समवयस्क,  तथापि आदरणीय मित्र मनोज जी ने हड़बड़ी में बिजली के खम्भे को लोहे की छड़ से पीटना शुरू किया और ऊपर तारों के जमघट में कुछ ऐसी सम्पूर्ण क्रान्ति मची कि आसपास के तीन-चार घरों में रातभर के लिए बत्ती गुल हो गई।

तो कहना ये है कि हम नादान बालक थे और हमारे प्रतिनिधि पुन्नू की कारस्तानी प.छो.भा. की राइम-रटन्त जितनी ही निष्पाप थी। हमें तो यह पता भी नहीं था कि सिपाही को मामू क्यों कहा जाता है। आज सोचता हूँ,  तो इसका सम्बन्ध उस लोकविश्‍वास के साथ जान पड़ता है, जिसके अनुसार भान्जे को पीटने वाले के हाथ बुढ़ापे में कांपते हैं। उन दिनों पुलिस वालों से आन्दोलनकारियों की मुठभेड़ें अक्सर हुआ करती थीं। ऐसी ही किसी घातक रूप से मजेदार मुठभेड़ में किसी लाठी खाते आन्दोलनकारी ने किसी लाठी भाँजते सिपाही को मामू कह कर उस लोकविश्‍वास का लाभ उठाने की कोशिश की होगी। तभी से यह मजाक चल पड़ा होगा और उत्साह के हर मौके को घातक रूप से मजेदार बनाने के लिए इसका इस्तेमाल होने लगा होगा।

इस विषयान्तर के बाद अब चर्चा उस उत्साह के कारण,  यानी हमारी जरूरतमन्दगी की! उस समय तक पटना शहर के सभी सिनेमाघर गांधी मैदान और रेलवे स्टेशन के आसपास थे। ये जगहें तब की यातायात सुविधाओं को देखते हुए हमारे इलाके से दूर पड़ती थीं। इससे हमें जो घाटे होते थे,  वे इस प्रकार हैं- 1.  अगर अभिभावकों से छुप कर फिल्म देखनी हो,  तो तीन की बजाय साढ़े चार घण्टे घर से गायब रहना पड़ता था,  जिसमे रिस्क ड्योढ़ा था। 2.  अगर अनुमति लेकर फिल्म देखना चाहें,  तो दूरी के नाम पर आवेदन को टाला जाता था। मसलन, ‘अगले महीने चाचा आयेंगे,  तब उनके साथ जाना।’  और 3. सिनेमाघरों के शो-केस में लगे ‘स्टिल्स’ को देखने-जैसे छोटे,  किन्तु अनिवार्य कार्य के लिए इतनी दूरी तय करनी पड़ती थी। ये सभी घाटे उस इलाके में रहने के चलते हमें उठाने पड़ते थे,  जो उस समय से एकाध दशक पहले तक पटना का एक छोर हुआ करता था। राजेन्द्र नगर को छूती हुई रेलवे लाइन गुजरती थी और उसके बाद बाइपास। यही पटना की दक्षिणी सीमा थी,  हमारे होश सम्भालने से पहले तक,  ऐसा हमने सून रखा था। हमारे होशमन्द होते-होते बाइपास के उस पार कंकड़बाग नामक एशिया की सबसे बड़ी कॉलोनी तेजी से बसने लगी थी। कंकड़बाग का अतीत, वर्तमान और भविष्य हमारे इलाके के मध्यवर्गीय घरों में अक्सर चर्चा का विषय हुआ करता था। वहां जमीन ले चुके लोग किराये के मकान में रहने वाले अपने ऐसे परिचितों पर तरस खाते थे,  जो वहां एक कट्ठा जमीन तक नहीं ले सके और वहां जमीन न ले पाने वाले यह कहकर अपनी तकदीर को कोसते थे कि जब हजार रुपये कट्ठा जमीन मिल रही थी, तब यह सोच कर नहीं ली कि कौन जायेगा उस उजाड़ में रहने! ‘मति मारी गयी थी’- ऐसा यथार्थवादियों का निष्कर्ष होता और ‘भगवान को मंजूर नहीं था’- इस पर वे पहुँचते,  जो अपनी मति का सम्मान बचने के लिए यथार्थवाद से दूर हट गये थे। ढेर सारी भविष्यवाणियों के हवाले से तरस खाने और ढेर सारी विगत परिस्थितियों के हवाले से अफसोस करने का यह चलन बड़ों की बैठकों से इतना हावी था कि हमारी किशोर पीढ़ी को जब परिपक्व बातचीत का शौक चर्राता,  तो हम इमरजेंसी की खूबियों-खामियों पर चर्चा करने के साथ-साथ ‘कंकड़बाग में जमीन की खरीद-फरोख्त उर्फ क्या से क्या हो गया’  को भी अपना विषय बनाते थे। वैसे सच पूछा जाय,  तो हम कभी इस बात के कायल नहीं हो पाये कि किसी भले आदमी को कंकड़बाग में जा बसना चाहिए। हमें तब किसी ने यह नहीं बतलाया था कि कंकड़बाग न बस रहा होता, तो हमारे इलाके को सिनेमाघर का उपहार भी नहीं मिलता। उसके बसने के साथ-साथ शहर का केन्द्र हमारी ओर खिसकता आ रहा था और सिनेमाघर की योजना राजेन्द्र नगर के इसी नये स्टेटस का नतीजा थी। अगर बाइपास,  जिसका नाम अब पुराना बाइपास हो चुका है,  के पार खेत ही खेत होते,  तो उससे पचास कदम इधर सिनेमाघर बनाने का ख्याल किसी के दिमाग में भला क्यों आता! इस तरह हमें कंकड़बाग का अहसानमन्द होना चाहिए था,  जो कि अज्ञानवश हम नहीं थे।

चर्चा सिनेमाघर की जरूरत पर चल रही थी। तो उसका ऐसा है कि वह सिर्फ हम किशोरों को ही नहीं,  हमारे माता-पिताओं को भी थी। सिनेमा मनोरंजन का मुख्य,  बल्कि अपने तरह का एकमात्र साधन था और आसपास हॉल न होने की स्थिति में रिक्शा-भाड़ा इत्यादि मिलाकर मामला खासा खर्चीला पड़ जाता था। नौटंकी या फगुआ-चैती- जैसे सामूहिक गान से अपना मनोरंजन करना या किसी की दालान पर घण्टों बैठकी मारना सम्भव नहीं था,  क्योंकि आखिर शहरीपन भी कोई चीज है। यह सही है कि बगल के ही इलाके लोहानीपुर में यह शहरीपन नदारद था,  पर हमारे थ्री स्टार मुहल्ले में इस चीज की खासी पूछ थी। मानसिकता के स्तर पर उसकी पूछ न भी होती,  तो वस्तुगत परिस्थितियों मे वह शहरीपन विद्यमान था। सिन्धियों,  पंजाबियों, मारवाड़ियों और बंगालियों के कई परिवार हमारे मुहल्ले में रहते थे। आज तख्‍़मीना करने बैठता हूँ,  तो थोड़ी हैरत होती है कि यह प्रेम-प्रिपासु उस उम्र में जब-जब दिल के हाथों लाचार हुआ,  उसकी वजह कोई-न-कोई पंजाबन या बंगालन थी। बिहारी परिवारों में भी कोई भोजपुरी भाषी इलाके से आता था,  कोई मिथिलान्‍चल से। इन सब तरह के बाशिन्दों के बीच कोई कौटुम्बिक या पीढ़ीगत रिश्ता हाने का सवाल ही नहीं था। इनके बीच पुश्तों के साझा अनुभव नहीं थे,  एक-जैसा पेशा नहीं था,  एक-जैसी नियति नहीं थी। ऐसे में शहरीपन उनका शौक ही नहीं,  उनकी मजबूरी भी थी और मनबहलाव के गँवई साधन पूरी तरह उनकी पकड़ से छू चुके थे। बस ले-देकर एक सिनेमा का आसरा रह गया था। इसके अलावा रेडियो नाम की भी एक चीज हुआ करती थी, जिसके शॉर्ट वेव पर कोई मनचाहा स्टेशन पकड़वाने में तनी हुई रस्सी पर चलने का-सा अनुभव होता था। इसे सिनेमा के विकल्प की तरह इस्तेमाल करना वैसा ही था,  जैसे विलायती शराब की कमी को देसी ठर्रे की बजाय चाय से पूरा करना। जहाँ तक टी.वी. का सवाल है,  ये उसके तुतलाने के दिन थे। उसका सर्वभक्षी विस्तार अभी बहुत दूर की चीज थी।

सिनेमा हॉल बनने की शुरुआत के आसपास ही टी.वी. का प्रवेश हमारे इलाके में हुआ था। राजेन्द्र नगर रोड नं. 1 और 2 के जो मकान तिनकोनिया पार्क की परिधि में और उसके आसपास थे,  उनमें से दो या तीन में ही टी.वी. सेट हुआ करता था। जिन-जिन घरों में यह बला थी, उनमें रविवार की शाम का तो आलम न पूछिए। बैठक में रखे सोफों-कुर्सियों को दीवार से लगा दिया जाता और बीच की जगह में जाजिम-चादर इत्यादि बिछा कर बीसियों लोगों के बैठने की व्यवस्था की जाती। अक्सर यह व्यवस्था नाकाफी साबित होती थी। इसलिए पाँच बजे से शुरू होने वाली फिल्म के लिए लोग साढ़े चार बजे से ही जगह लूटने लगते थे। अन्ततः फिल्म शुरू होने के समय तक बैठक में मुख्यधारा के समाज के अलावा एक हाशिए का समाज भी दिखलाई पड़ने लगता था, जिसमें सही समय पर न आने वाले आगन्तुकों के साथ-साथ मेजबान परिवार के सदस्य भी शामिल होते थें। यह हाशिए का समाज खिड़कियों पर चढ़ा,  दीवारें के सहारे खड़ा या दरवाजे की चौखट में अड़ा नजर आता था।

मेजबान परिवार के सदस्यों को हाशिए की जगह मुख्यधारा में बैठ कर फिल्म देखने का मौका तभी मिलता था,  जब कोई कला-फिल्म दिखलाई जा रही हो। पर,  जाहिर है,  इस मौके का भी वे पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाते थे। आध-पौन घण्टे में टी.वी. बन्द कर दी जाती और दूरदर्शन वालों केा गरियाने का अध्याय अगले ढाई घण्टे तक जारी रहता। कई बार तो ऐसी फिल्म की घोषणा होते ही लोग रविवार की शाम का कोई और कार्यक्रम तय कर लेते थे। मिसाल के लिए जिस रविवार को मणि कौल की ‘दुविधा’  आने वाली थी,  उस शाम हमारे सभी महत्वपूर्ण ठिकानों पर ताला बन्द पाया गया या फिर यह सूचना मिली कि आज टी.वी. नहीं चलेगा। हार कर कला की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हम बालकों को एक घर की बरसाती में रहने वाले कुँवारे घोष बाबू के यहाँ पहुँचना पड़ा,  जो ‘मिली’  फिल्म के बरसाती-वासी अमिताभ बच्चन की तरह ही पूरी दुनिया से कटे-कटे रहते थे। घोष बाबू ने बिना कोई खुशी या नाराजगी जाहिर किये हम लोगों को बरसाती में बिठाया ओर शुरुआती विज्ञापनों के बीच ही यह समझाया कि ‘फिलिम शमझने वाला है। आप लोक अगर हाल्ला मचाएगा,  तो फिलिम का मैशेज शमझ नहीं पायेगा। इश्‍लिए इदर शान्ति शे…।’  हम लोगों ने यथासम्भव शान्ति से रहने की कोशिश भी की,  लेकिन हम उत्तरोत्तर इस कोशिश में असफल होते गये। अब धुँधली-सी याद है कि पहली बार हम लोगों के मुँह से ‘फिक्क’-सी हँसी तब निकली,  जब बैलों के गले की घण्टियों और पहिए की चर्रक-चूँ के साथ बहुत देर तक चलती रहने वाली बैलगाड़ी एक विशाल पेड़ के नीचे रुकी और नायक ने पर्दा हटाते हुए नायिका से पूछा,  सम्भवतः उस फिल्म का पहला संवाद,  ‘केले खाओगी?’  इस हँसी से आगे बढ़ते-बढ़ते हम इस हद तक गये कि नायक को देवानन्द का नौकर और नायिका को हेमा मालिनी की आया घोषित करते हुए कहकहे लगाने लगे। ठीक इसी समय घोष बाबू ने उठ कर टी.वी. बन्द कर दिया और हम उनके कूचे से बेआबरु होकर निकले। बाहर हम लोगों के बीच यह मुद्दा बहस तलब बना कि घोष बाबू ने ऐसा हमारी हरकतों से ऊब कर किया था या फिल्म से ऊब कर?

उपर्युक्त प्रकरण से यह स्पष्ट है कि रविवार की फिल्म देखने के मामले में हम बालकों और किशोरों का हुजूम रिश्ते की नजदीकी-दूरी या परिचय-अपरिचय की परवाह नहीं करता था। हम अँगुली पकड़ कर पहुंचा पकड़ने वाले लोग थे। जहाँ थोड़ी-सी गुंजाइश दिखी,  हम वहाँ पूरा कब्जा जमा लेते। पर लड़कियों और माता-पिताओं की स्थिति ऐसी नहीं थी। माता-पिता तो हमारी तरह किसी भी घर में घुस जाने का गँवारपन दिखला नहीं सकते थे और जहाँ तक लड़कियों का सवाल था,  उन्हें माता-पिता की निगाहों के सामने ही रहना था,  इसलिए जहाँ वो नहीं,  वहाँ ये नहीं। यों शहरीपन और गँवारपन की समझ हममें भी थी,  लेकिन इस समझ की बिना पर मुफ्त की फिल्म देखने का लोभ संवरण करना हमें ज्यादती लगती थी। इस प्रकार लज्जा और लोभ में से बुजुर्ग लोभ का गला घोंटते थे,  हम लज्जा का। और लड़कियाँ?  मेरा अन्दाजा है कि हर रविवार की शाम उनमें से ज्यादातर खुद अपना गला घोंटने की नाकाम कोशिश करती थीं।

तो ये था वह पूरा सांस्कृति परिदृश्य,  जिसके बीच रख कर आपको वैशाली सिनेमा हॉल के महत्व और उससे जुड़ी हमारी उत्तेजना को समझना होगा। जी हाँ,  यही नाम था उसका,  जो हमने तब जाना,  जब पहली बार उसके प्रस्वावित निर्माण-स्थल पर गये। केस,  हकीकत या अफसाने में, तब चल ही रहा था। इसलिए हॉल बनने की शुरुआत नहीं हुई थी। सिर्फ एक बड़ा-सा बोर्ड लगा था,  जिस पर आर्किटेक्ट की कल्पना तस्वीर मे उतारी गई थी। इस तस्वीर में सब कुछ निहायत भव्य और सुन्दर था,  पर सबसे खूबसूरत थी उस नाम की लिखावट,  जो भवन के दाहिने हिस्से में उसके शिखर पर मुकुट की तरह सजा हुआ था। तस्वीर को देख कर हम सभी गौरवान्वित हुए,  क्योंकि यह वह चीज थी,  जो ठीक हमारे मुहल्ले के मुहाने पर बनने जा रही थी। फिर तो जब-जब हम सामूहिक स्तर पर आत्मगौरव की थोड़ी भी कमी महसूस करते,  उस साइट पर जाकर तस्वीर को देख आते थे। स्टे-आर्डर हटने के बाद जब काम की शुरुआत हो गई,  तब उस धूल-धक्कड़ में भी हमारा जाना-आना लगा रहा। उस प्रकार आप कह सकते हैं कि हमारी अनवरत देख-रेख में वैशाली का निर्माण-कार्य सम्पन्न हुआ।

वैशाली के बनने के साथ-साथ उसके आसपास कई चीजें बन रही थीं। बात ये थी कि रेलवे क्रासिंग की ओर जाती सड़क का वह हिस्सा अब तक थोड़ा वीराना-सा था,  पर हॉल बनने की शुरुआत होते ही दूकानों और ढाबों की तादाद भी बढ़ने लगी। इस तरह काम पूरा होते-होते उस जगह की शक्ल काफी बदल चूकी थी। बाद के दौर में सब्जियों की खरीददारी में बचाये गये पैसे से चाट,  समोसा,  मसाला डोसा इत्यादि खाना होता,  तो हम उत्तर में नाला रोड तक जाने की बजाय दक्षिण में वैशाली तक जाना पसन्‍द करते थे। आखिर नाला रोड हमारे होश सम्भालने के पहले से ही जमा-जमाया बाजार क्षेत्र था,  जबकि वैशाली और उसके आजू-बाजू का पूरा विकास हमारी देख-रेख में हुआ था!

खैर! वैशाली बनकर खड़ी हो गई,  तब उसके मुहूर्त का दिन तय हुआ और हम लोग उत्सुकतापूर्वक इन्तजार करने लगे कि देखें,  कौन-सी फिल्म लगती है! हमारी उत्सुकता की तान निराशा पर टूटी,  जब उसका उद्घाटन महान सामाजिक फिल्म ‘आनन्द आश्रम’ से हुआ। फिर हमारे ही बीच के किसी परिपक्व दिमाग ने सुझाया कि जब शुरू के कुछ दिन वैसे ही हाउसफुल जाने हैं,  तो हॉल-मालिक क्या बेवफूक है, जो ‘आनन्द आश्रम’  की जगह ‘डॉन’  के चक्कर में पड़े। इस सूझ से हमारी निराशा दूर हुई। किन्तु निराशा पर यह विजय बहुत टिकाऊ नहीं थी। हमने पाया कि एक-के-बाद-एक महान सामाजिक या महान फ्लॉप फिल्में हमारी इस महान उपलब्धि पर हावी हैं। भूले-भटके कभी चर्चित फिल्म लग जाती थी। वह भी ज्यादातर गांधी मैदान के पास के किसी हॉल का शुरुआती हंगामा बाँटने के लिए। ऐसी फिल्म आमतौर पर दो हफ्ते के लिए लगाई जाती और हाउसफुल रहते हुए ही उतर भी जाती थीं। बहुत कम हिट फिल्में ऐसी रही होंगी,  जो अकेले वैशाली के हिस्‍से आयी हों। इसमें हमें कोई सन्देह नहीं था कि वैशाली पटना का सबसे उम्दा हॉल है। पहली बार 70 एम.एम. स्क्रीन,  पहली बार स्टीरियो साउण्ड ट्रैक, सबसे बड़ा और खुला हुआ परिसर। ‘एलिफिन्सटन’ की लॉबी में जहाँ ब्लीचिंग पाउडर की गन्ध थी,  वहीं वैशाली की लॉबी में मशीन से भूने जाते पॉपकार्न और बढ़िया इत्र की मिली-जुली खुशबू बसी हुई थी। इन सबके बावजूद ‘जानी दुश्मन’, ‘कुर्बानी’,  ‘हिम्मतवाला’,  ‘मुकद्दर का सिकन्दर’- जैसी फिल्में उसकी किस्मत में कम ही आती थीं और वह भी ज्यादातर एलिफिन्सटन,  वीणा,  अशोक या अप्सरा की थाली से फेंके गये टुकड़े की तरह। वजह शायद ये रही हो कि व्यावसायिक केन्द्रों के आसपास सिनेमाघरों के जो दो गुच्छे थे,  उनसे छिटक कर वह एक रिहायशी इलाके में अलग-थलग पड़ी थी। किसी सुपरहिट फिल्म को अकेले उसके भरोसे छोड़े देने में वितरक पचास बार सोचते होंगे। मैं यह अन्दाजा ही लगा सकता हूँ,  क्योंकि वितरण-व्यवसाय की प्राथमिकताओं और काम के तरीकों के बारे में मुझे कुछ पता नहीं है।

मुझे यह भी पता नहीं कि कब वैशाली की स्तरहीनता को ही नियति मान कर हम आशा-निराशा से ऊपर उठ गये। साल-छः महीने में कोई ‘ए’ ग्रेड फिल्म लग जाती,  तो हम खुश होते थे। नहीं लगने की सूरत में दुखी नहीं होते थे। बाद को जब हमने हाफ टाइम से बिना टिकट फिल्म देखने का सिलसिला शुरू किया,  तब यह बात अच्छी तरह दिमाग में बैठ गयी कि वैशाली जैसी भी है,  हमारे बुरे दिनों की साथी है।

हाफ टाइम से बिना टिकट फिल्म देखने का आइडिया हमारे बीच के ही किसी खुराफाती दिमाग ने निकाला था। आइडिया यों था कि इण्टरवल से ठीक पहले अगर हॉल की चारदीवारी के भीतर चले आओ,  तो इण्टरवल में बाहर आई भीड़ के साथ अन्दर जाकर बैठा जा सकता है और बाद की आधी फिल्म देखी जा सकती है। ‘जानी दुश्मन’ का हाउस फुल दौर बीतने के बाद आइडिया पर अमल किया गया। कामयाबी मिली। उत्साहित हो कर ‘जानी दुश्मन’  के उत्तरार्द्ध को हमने सात-आठ दफा देखा। इसके बाद तो सिलसिला ही चल पड़ा। इस कार्यवाही में सिर्फ दो-तीन चीजों का खयाल रखना पड़ता था। एक तो यह कि मैटिनी शो के दरम्यान चार से सवा चार बजे के बीच हॉल की चारदीवारी के भीतर चले जाएँ,  क्योंकि इण्टरवल से ठीक पहले मेन गेट बन्द कर दिये जाते थे। दूसरा यह कि बालकनी में बैठें, क्‍योंकि उसके वर्गीय आधार के चलते वहां चेकिंग कम होती थी। तीसरे,  एक बार में चार से ज्यादा लोग न जाएँ। ये सावधानियाँ बरतते हुए हम साल भर से ज्यादा समय तक यह सिलसिला चला ले गये। उसके बाद,  जैसा कि एक मूर्धन्य गीतकार कह गये हैं,  छोटी-सी इक भूल ने सारा गुलशन जला दिया। हुआ यों कि एक दिन हम तीन लोग बालकनी के सुख से ऊब कर फर्स्ट क्लास में बैठ गये और वह भी ऐसी कतार में,  जहाँ हमारे अलावा और कोई नहीं था। राजेन्द्र कुमार की कोई फिल्म थी,  जिसका नाम सदमे के कारण भूल गया हूँ। जनाब अभी यात्रा से लौट कर नायिका को तस्वीरों से भरी अलबम दिखला ही रहे थे कि हमारे चेहरों पर टार्च की चुंधियाती रोशनी पड़ी। रोशनी ने टिकट की माँग की और हमने रोशनी से ही मुखातिब होकर कहा कि नहीं है। ‘तीनों को बुक करो।’ रोशनी ने गरज कर कहा। फिर दो लोग हमें अर्द्धचन्द्र होकर बाहर की ओर ले चले। कतारों के बीच धकियाये जाते हुए मैंने विधाता को धन्यवाद दिया, जिसने हॉल के भीतर अन्धेरे का प्रावधान रखा है। साथ ही यह प्रार्थना भी की कि यह जो तकनीकी पदबन्ध है,  बुक करना,  उसका कोई भयावह अर्थ न हो। बाहर आये। पहलवान जी,  अर्थात् मुख्य दरबान के आगे पेशी हुई। पहलवान ने कद-काठी में सबसे बड़ा देखकर मुझी से पूछना शुरू किया।

‘अन्दर कैसे आया?’

‘इण्टरवल में।’

‘कहाँ रहता है?’

‘राजेन्द्र नगर,  1 नम्बर।’

‘कहाँ पढ़ता है?’

‘पाटलिपुत्रा।’

‘किस क्लास में?’

‘नौवाँ नवीन।’

‘सेक्शन?’

‘ए।’

‘रॉल नम्बर?’

‘एक।’

पहवान हैरत से मुझे ऊपर-नीचे देखने लगा। आधे मिनट का विस्मित मौन। फिर पूछा,  थोड़े बदले हुए स्वर में,  ‘पाटलिपुत्रा में फर्स्ट आता है, बोर्ड इम्तहान में मेरिट लिस्ट में रहेगा और ई धन्धा? क्लास-टीचर शमीम साब हैं ना!’

‘जी।’

‘बतला दें उनको?’

‘……’

‘जाओ,  भागो। आगे से आया है त बड़ी मार मारेंगे। बड़ा आदमी बनना है कि हॉल का दरबानी करना है।’

हम बुक न किये जाने का- उसका जो भी मतलब हो- शुक्र मनाते बाहर आये। फिर बेटिकट क्या,  बाटिकट भी हॉल में घुसने का साहस कम-से-कम मुझे अगले एक-डेढ़ साल तक नहीं हुआ।

शायद इसी बीच हमारे बिहार माध्यमिक बोर्ड के इम्तहान भी हुए,  जिसमें सर गणेशदत्त पाटलिपुत्र हाई स्कूल की कक्षा दसवीं नवीन के सेक्शन ‘ए’  का रोल नम्बर 1 मेरिट लिस्ट में अनुपस्थित पाया गया। इतना ही होता, तब भी कोई बात न थी। उसी स्‍कूल के दो ‘लो प्रोफाइल’ विद्यार्थी लिस्ट में मौजूद थे। तेज झटका लगा। नतीजतन मैं साहित्यकार बन बैठा। यह अपने लुप्त आत्मसम्मान को फिर से हासिल करने की बेचैन कोशिश थी। ‘हमन दुनिया से यारी क्या’  वाली मुद्रा के चलते पुराने संगी-साथियों से मेल-जोल कम हुआ। परिचय के नये वृत्त बने। सिनेमाघरों के शो-केस में लगे ‘स्टिल्स’ देखने का शौक छूटा और उसकी जगह राजकमल प्रकाशन और पी.पी.एच. में खड़े होकर किताबें देखने का शौक तारी हुआ। वैशाली पास रह कर भी दूर होती गई। अब उसके पास से गुजरे कभी-कभी महीनों बीत जाते। कुल मिलाकर,  सन् 82 की बोर्ड परीक्षाओं के बाद के इन वर्षों में वह मेरे सरोकार या उत्सुकता की चीज नहीं रह गई थी। ऐसा नहीं कि मैंने उन दिनों फिल्में नहीं देखीं। ‘हिम्मतवाला’  और ‘मुकद्दर का सिकन्दर’  तभी देखी गई थीं। ऐसा नहीं कि मैं कभी यों ही भटकता वैशाली के परिसर में नहीं गया। ‘पुकार’  की होर्डिंग बनाते एक मजदूर की कलाकारी किंवा कलाकार की मजदूरी को नजदीक से तभी देखा था। इन सबके बावजूद उन तीन-चार सालों की मेरी याददाश्त में वैशाली की मौजूदगी बहुत झीनी है।

हो सकता है,  यह समझ बहुत सब्जेक्टिव हो,  पर मुझे बड़ी शिद्दत से महसूस होता है कि इस समय तक आते-आते मेरे लंगोटिया यार और मुहल्ले के लोग भी वैशाली से लगभग वीतराग हो गये थे। उनकी सान्ध्य-सभा में जब कभी मैं शामिल होता,  वह कहीं भी एजेण्डे में न होती। टेलीविजन तिनकोनिया पार्क को घेरने वाले लगभग सभी घेरों में आ चुका था। हिन्दी के बेमिसाल किस्सागो मनोहर श्याम जोशी के गढ़े हुए पात्र इन घरों के सदस्य बन चुके थे। प्रसारण की तकनीकी गुणवत्ता में काफी सुधार हो गया था और अब चलती-बोलती तस्वीरों की रबड़ के टुकड़े की मानिन्द खींच-तान नहीं होती थी। तवे- जैसे रिकार्ड की जगह कैसेट्स और उसमें भी टी सिरीज के आने से मनचाहे गाने जब चाहे सुनने का अधिकार निम्न मध्यवर्गीय जनों को भी मिल गया था। रेडियो सीलोन से सिबाका गीतमाला सुनने के लिए तनी हुई रस्सी पर चलने की अब जरूरत नहीं थी।

इन्हीं वर्षों में वैशाली के ठीक सामने वह फ्लाई ओवर बनाकर तैयार हुआ था,  जो रेलवे क्रासिंग के ऊपर से निकलता हुआ राजेन्द्र नगर और कंकड़बाग को जोड़ता है। इसका निर्माण रुकवाने के लिए हॉल वालों ने काफी कोशिश की,  क्योंकि इससे वैशाली के सामने की जगह तंग हो रही थी और भव्यता आहत। इसका निर्माण रुकवाने के लिए शायद रिजर्व बैंक वालों और आसपास के दूसरे निवासियों ने भी कोशिश की,  क्योंकि फ्लाई ओवर के साथ चोरी-झपटमारी का कोई नजदीकी रक्त-सम्‍बन्‍ध उन्होंने ढूँढ़ निकाला था। पर विरोध के बावजूद जैसे वैशाली का बनाना नहीं रुका था,  वैसे ही फ्लाई ओवर का बनना भी नहीं रुका। ठीक-ठीक किस साल उसका काम पूरा हुआ,  मुझे याद नहीं। पर इतना अवश्य याद है कि काम के दरम्यान वैशाली तक जाने वाले रास्ते की जो टूट-फूट हुई थी,  उसकी लम्बे समय तक कायदे से मरम्मत नहीं हो पायी और न ही मलबे को ठिकाने लगाया गया। वजह शायद ये हो कि मुख्य ट्रैफिक के लिए अब उस रास्ते की दरकार नहीं रह गई थी। कंकड़बाग जाने के लिए इस फ्लाई ओवर से गुजरते हुए मैं वैशाली को ऊपर से देखता,  तो वह उतनी विराट और उत्तुंग नहीं लगती थी।

वह नवें दशक के मध्य से थोड़ा आगे या पीछे का कोई दिन रहा होगा, जब फ्लाई ओवर से गुजरते हुए मैं उसे देख कर ठिठक गया। वहाँ एक अस्वाभाविक वीरानगी थी। पार्किंग में कोई गाड़ी-स्कूटर नहीं,  पीछे साइकिल-स्टैण्ड भी खाली। टिकट काउण्टर के सामने क्यू के लिए लगाये गये लोहे के घेरे सूने पड़े थे। सामने की सीढ़ियों पर इक्का-दुक्का लोग थे,  जिन्हें देख कर लगा नहीं कि फिल्म देखने आये होंगे। सीढ़ियों के ऊपर शीशे के दरवाजे का एक पल्ला खोल कर पहलवान जी ने अपनी कुर्सी लगा रखी थी। दाहिनी ओर चारदीवारी के साथ किसी फिल्म की होर्डिंग लगी थी,  जिसकी फीकी रंगत बता ही थी कि फिल्म की किस्मत-जैसी भी रही हो,  होर्डिंग ने सिल्वर जुबली पूरी कर ली है। मुझे लगा कि हॉल बन्द पड़ा है। लौट कर साथियों से पूछताछ की,  तो पता चला कि उसे बन्द हुए दो महीने बीत चुके हैं। हॉल के चार हिस्सेदार थे, जिनमें कुछ अनबन चल रही थी। इस अनबन के बीच ‘कहानी फूलमती की’ और ‘नारद गाथा’- जैसी फिल्मों के सहारे वैशाली कई महीनों तक घिसटती रही। फिर जब अनबन अदालत तक पहुँच गई,  तब उसे बन्द कर दिया गया।

लगता है कि ‘हमन दुनिया से यारी क्या’  वाले इस स्वयंभू साहित्यकार को ही नहीं,  इसके स्थानीय भाई-बन्दों को भी वैशाली के बन्द होने से कोई फर्क नहीं पड़ा था। पड़ा होता,  तो उसे लेकर चर्चाएँ अवश्य होतीं और मैं दो महीने तक इस घटना से नावाकिफ न रहता।

सन् 89 में मैं दिल्ली आ गया। हर गर्मी और जाड़े की छुट्टियों में पटना जाना होता। पता नहीं क्यों,  अब वैशाली की स्थिति और गति में मेरी दिलचस्पी बढ़ गई थी। यह दिलचस्पी शायद वैसी ही थी, और है, जैसी किशोरावस्था में अपने बचपन की जंग लगी तिपहिया साइकिल और विकलांग गुड्डे-गुड़ियों को लेकर होती है। हर बार मैं यह सुनने के लिए कान खड़े रखता कि वैशाली का क्या मामला चल रहा है। एक बार सुना,  लालू प्रसाद यादव ने उसे खरीद लिया है (क्या इसलिए कि उसके बनने का समाचार सुनते ही हमने जे.पी. जिन्दाबाद का नारा लगाया था!) और वह दुबारा चालू होने वाली है। दूसरी बार सुना कि वह बात अफवाह थी। खरीदा किसी और ने है। चालू होने ही वाली थी कि पी.डब्ल्यू.डी. ने खतरनाक पाया। बिना पर्याप्त मरम्मत के उसे जनता के लिए खोला नहीं जा सकता और हालत ये है कि नये मालिक ने अपनी पाई-पाई उसे खरीदने में ही झोंक दी है,  अब वह मरम्मत नहीं करा सकता। तीसरी बार सुना कि उसे मालगोदाम में तब्दील करने की योजना है। यह मेरी अब तक की आखिरी जानकारी थी। जानकारी मिलते ही याद आया कि गांधी मैदान के सामने का एक सिनेमा हॉल ‘रीजेण्ट’  बहुत पहले कभी मालगोदाम हुआ करता था। इसे क्या कहें नियति का मजाक,  जिसका फलसफा बहुत पहले वैशाली में ही ‘ग्रैण्ड रिवाइवल’  पर देखी गई ‘वक्त’  ने समझाया था।

सन् 95 में अपनी ताजा-ताजा शादी के बाद मैं पटना गया था। पत्नी को लेकर फ्लाई ओवर की तरफ घूमने निकल गया। शाम धुँधलका था,  जब ऊपर चढ़ते हुए उस पर मेरी नजर पड़ी। उसके परिसर में धुँधलका थोड़ा और गहरा था,  क्योंकि अन्दर कहीं बिजली-बत्ती नहीं थी और बाहर की स्ट्रीट-लाइट उतने विशाल परिसर की चारदीवारी से चार-पाँच कदम आगे ही दम तोड़ देती थी। चारदीवारी से लगा हुआ बाहर का हिस्सा भी,  जहाँ कभी ठेलों,  खोमचों,  पान-सिगरेट की दुकानों और ढाबों का ताँता हुआ करता था,  बिल्कुल वीरान था। इस वीरानगी और नीम अन्धेरे में अपने सर पर नाम का मुकुट सजायें वह ऐसी दीख रही थी,  माने दरबार का पूरा तामझाम समेट लिए जाने के बावजूद कोई बादशाह जड़ाऊ हीरों से खाली कर दिये गये अपने तख्त पर बैठा हो। मैंने पत्नी को यह दृश्य दिखलाया। हम दोनों काफी देर तक फ्लाई ओवर की रेलिंग पर टिके उसे देखते रहे और मुझे रेणु के वे पात्र याद आये,  जो गौने के बाद घर आती अपनी पत्नियों को निलहे साहबों की कोठी दिखलाया करते थे।

‘‘जरा यहाँ गाड़ी धीरे-धीरे हाँकना! कनिया साहेब की कोठी देखेंगी। …यही है मकै साहब की कोठी।..वहाँ है नील महने का हौज!

नई दुलहिन ओहर के पर्दे को हटाकर घूँघट को जरा पीछे खिसकाकर झाँकती है- झरबेर घने जंगलों के बीच ईंट-पत्थर का ढेर! कोठी कहाँ है?

दूल्हे का चेहरा गर्व से भर जाता है- अर्थात् हमारे गाँव के पास साहेब की कोठी थी,  यहाँ साहेब-मेम रहते थे।’’    (मैला आँचल)

हुजूर! यह विकास का मतलब क्या होता है?

पिछले दिनों ब्लॉग हाशिया पर नृतत्वशास्त्री फेलिक्स पैडेल और समरेंद्र दास की शोधपरक रिपोर्ट पढऩे को मिली। यह रिपोर्ट तथाकथित विकास की अवधारण पर पुनर्विचार की मांग करती है। इस रिपोर्ट को ज्यों का त्यों हाशिया से साभार प्रस्तुत कर रहे हैं-

भारत समेत तीसरी दुनिया के अर्धउपनिवेशों के लिए विकास का क्या मतलब है? सिर्फ यह कि वे अपने संसाधनों और सस्ते श्रम को विकसित साम्राज्यवादी देशों के बहुराष्ट्रीय निगमों के मुनाफे और अपार लालच के लिए उन्हें सौंप दें? और इन कथित विकासशील देशों में लोकतंत्र का क्या मतलब है? यह कि अपने संसाधनों की लूट का विरोध कर रही अपनी जनता को संसद में बनाए कानूनों के जरिए बंदूक और सेना के बल पर चुप रखना या कुचल देना। पश्चिम बंगाल से लेकर उड़ीसा, झारखंड और बस्तर तक यही चल रहा है। पूरे भारत में और पूरी दुनिया में विकास और लोकतंत्र के नाम पर पर जो हो रहा है, उसके निहितार्थ क्या हैं? इससे किनको फायदा हो रहा है? जाने-माने नृतत्वशास्त्री फेलिक्स पैडेल और समरेंद्र दास की यह शोधपरक रिपोर्ट हमें इसका ब्योरा देती है। इसे हम पानोस दक्षिण एशिया की पुस्तक बुलडोजर और महुआ के फूल से साभार पेश कर रहे हैं। एक विनम्र सूचना यह भी कि पुस्तक में प्रकाशित मूल अनुवाद की कुछ गलतियों को हमने सुधारने की कोशिश की है।

फेलिक्स पैडेल और समरेंद्र दास  

 उड़ीसा में अल्युमिनियम की तलाश का नतीजा सांस्कृतिक जनसंहार के रूप में सामने आया है। विस्थापन ने जहां एक ओर आदिवासी समाज की संरचना की रीढ़ तोड़ दी है, वहीं कारखानों से फैलते प्रदूषण ने इलाके से खेती की संभावना समाप्त करके यहां के बाशिंदों से उनकी जीविका का सबसे अहम स्रोत छीन लिया है। चूंकि अल्युमिनियम उत्पादन को आगे बढ़ाने में हथियारों के उद्योग का वरदहस्त है, इसलिए स्थानीय लोगों की ओर कोई ध्यान भी नहीं देता और यह कहीं ज्यादा आपराधिक है।
औद्योगीकरण की एक नई आंधी, जिसे विकास, उन्नति और गरीबी निवारण की आड़ में थोपने की कोशिश हो रही है, से उड़ीसा और उसके पड़ोसी राज्यों के सैकड़ों गांवों के विस्थापन का खतरा पैदा हो गया है। खनन, धातु शोधन, बांध और ऊर्जा संयंत्र के लिए आदर्श जगहों के रूप में चिह्नित ये सारे इलाके आदिवासियों के रिहायशी स्थल हैं, जिनके नुकसान को विकास की अंधी दौड़ में एक ऐसी चीज के रूप में देखा जा रहा है जिससे बचा नहीं जा सकता।
पिछले 60 वर्षों में भारत में औद्योगीकरण की वजह से कोई छह करोड़ लोग पहले से ही विस्थापित हो चुके हैं। इनमें से कोई 20 लाख वंचित लोग उड़ीसा में रहते हैं और चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से 75 प्रतिशत लोग आदिवासी या दलित हैं। इनमें से कुछ ही लोगों को समुचित मुआवजा मिला और अधिकांश लोगों के जीवन स्तर में किसी तरह का कोई सुधार नहीं हुआ, हालांकि बड़ी बेशर्मी से कहा यही जाता है कि विकास की शुरुआत विस्थापन से होती है। विस्थापितों के अनुसार सच यह है कि परियोजनाओं के उल्टे नतीजे निकले हैं। गरीबी की जिन हदों तक ये लोग पहुंच गए हैं, वे उतनी ही तकलीफदेह हैं जितनी उनकी सांस्कृतिक मान्यताओं और परम्पराओं के टूटने की कसक। यह कसक निश्चित रूप से उस जमीन के साथ रिश्ता बिगडऩे से पैदा होती है जिसे कभी उन्होंने खुद या उनके पुरखों ने जोता था।
इस प्रक्रिया को किस प्रकार समझा जा सकता है? हममें से हर किसी को एक न एक क्षेत्र में विशिष्टता हासिल है मगर जो कुछ घटित हो रहा है, उसे समझने के लिए हमें बहुआयामी माध्यम अपनाना पड़ेगा। मानव ज्ञान के अनुसार किसी भी चीज की समझदारी विकसित करने के लिए हमें सम्बद्ध व्यक्तियों के अभिमत को उन्हीं के शब्दों में सुन कर समझने का प्रयास करना होगा। मगर हममें से कम ही लोग ऐसे हैं जो यह सुनना चाहते हैं कि आदिवासी लोग कह क्या रहे हैं। हम लोग जानते हैं कि हजारों आदिवासियों को पूरे भारत में सभा-सम्मेलनों में ले जाने के लिए घुमाया जाता है, मगर रोड शो में उन्हें दर-किनार कर दिया जाता है। शायद ही उनसे कभी कहा जाता हो कि वे अपनी बात सबके सामने रखें, पूरी मीटिंग में वे अपने चेहरे पर एक गौरवशाली चुप्पी लेकर बैठे रहते हैं और फिर अपने गांव वापस चले जाते हैं। उन्हें उन लोगों की नासमझी सालती है जो यह दावा करते हैं कि वे उनकी मदद करेंगे।

सांस्कृतिक जनसंहार

भारत की मौजूदा औद्योगीकरण की प्रक्रिया उसकी विकास दर को तो बढ़ा सकती है, मगर इसका आदिवासियों पर प्रभाव किसी सांस्कृतिक जनसंहार से कम नहीं है। आदिवासी संस्कृति उनकी सामाजिक संस्थाओं द्वारा कायम संबंधों के आधार पर जीवंत बनी रहती है और विस्थापन इसी पारस्परिक बंधन के चिथड़े उड़ा देता है।
खेती की परम्परा और उसके साथ जुड़ी हुई आर्थिक व्यवस्था तब बिखर जाती है, जब लोग जमीन से कट जाते हैं और फिर कभी किसानों की तरह काम नहीं कर सकते। नाते-रिश्तों में दरार पड़ जाती है क्योंकि पारम्परिक रूप से सामाजिक रिश्ते गांवों की संरचना और दूसरे गांवों में रह रहे अपने आत्मीय स्वजनों से पारस्परिक दूरी पर निर्भर करते हैं। इलाके में किसी भी खनन कंपनी का प्रवेश निर्विवाद रूप से लोगों को उसके पक्ष या विपक्ष में बांट देता है। किसी भी इलाके में अगर किसी परियोजना की वजह से विस्थापन होता है तो वहां ऐसे लोगों के बीच जो मुआवजे की रकम स्वीकार कर लेते हैं और अपना घर-बार छोड़ कर ले जाते हैं और वे लोग जो इस योजना का विरोध करते हैं, हमेशा एक तनाव बना रहता है।
धार्मिक व्यवस्था दरक जाती है क्योंकि गांव के पवित्र पूजा स्थल हटा दिए जाते हैं और वे पहाड़ जिन्हें लोग सम्मान से देखते थे, उनकी खुदाई हो जाती है। लांजीगढ़ रिफाइनरी के निर्माण का रास्ता आसान करने के लिए किनारी गांव के बाशिंदों को वेदांतानगर ले जाया गया। उनमें से एक महिला ने गांव में बुलडोजर चलते देखा, जिसने गांव के सामूहिक पृथ्वी मंदिर को सपाट कर दिया। उसने इस जबरन विस्थापन की घटना के कुछ दिन बाद हम लोगों को बताया, ’हमारे देवता तक नष्ट हो गए।’ उसके लिए उसके पास जमीन न होने का मतलब था कि वह अब अपने लिए कभी भी अन्न का उत्पादन नहीं कर पाएंगी। पारम्परिक जीवन शैली की सारी मान्यताएं जिनसे लोग ऊर्जा पाते थे, वे सब ध्वस्त हो गईं।
स्थानीय तौर पर उपलब्ध सामग्रियों की संस्कृति, जिसके पास जो है उसका सबसे बेहतर इस्तेमाल कर लेना, वह भी उसी समय ध्वंस हो गई जब स्थानीय मिट्टी और लकड़ी के बने घरों को गिरा कर उनकी जगह कंक्रीट के घर बना दिए गए। लेकिन सबसे बड़ी बात हुई समाज व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन। कल तक जहां लोग अपने क्षेत्र और अपने संसाधनों के मालिक थे, वही आज अपने आप को शक्ति और क्षमता के एक जबरदस्त सीढ़ीनुमा प्रशासन तंत्र की सबसे निचली पायदान पर फेंका हुआ पाते हैं।
इस पूरे काले कारनामे में भ्रष्टाचार की अपनी भूमिका है जिसकी वजह से पूरा का पूरा गांव परियोजनाओं के हवाले हो जाता है और भले ही यह सब टेबुल के नीचे होता हो, मगर इसका समाज पर एक बहुत ही नकारात्मक प्रभाव जरूर पड़ता है। इससे लोगों का ध्रुवीकरण होता है, सम्पत्तिशाली वर्ग की सम्पत्ति उत्तरोत्तर बढ़ती है और उनके ‘भोग-विलास’ के क्रम में पहले से कहीं ज्यादा बदतरी और बेशर्मी देखने को मिलती है।
फरवरी 21, 2007 के उडिय़ा समाचार पत्र ‘सम्बाद’ के मुख पृष्ठ पर तालचर के निकट की एक कोयला खदान के एक नए स्कैंडल की खबर छपी। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि टंगरापड़ा, नियमगिरी और खंडधरा खनन लीजों के मामले के न सुलझने के बावजूद एक अकेली खदान की लीज हासिल करने के लिए 200 करोड़ रुपयों (लगभग 45 मिलियन डॉलर) की घूस दी गई है। टंगरापड़ा खदान जाजपुर जिले में क्रोमाइट डिपॉजिट की खान है जिसकी लीज िजंदल स्ट्रिप्स को दी गई थी। लेकिन उड़ीसा उच्च न्यायालय ने इस अनुबंध की यह कर आलोचना की थी कि अगर योजना के अनुसार खदान का काम आगे बढ़ाया गया तो राज्य को 450 करोड़ डॉलर का नुकसान होगा। नियमगिरी उड़ीसा का सबसे अधिक विवादास्पद बॉक्साइट भंडार है जिसका विस्तार कालाहाण्डी और रायगड़ा जिलों तक फैला हुआ है, जबकि खंडधरा क्योंझर जिले का एक जंगल है जिसके पहाड़ों में प्रचुर मात्रा में लौह अयस्क उपलब्ध है।

यह सम्पत्ति किसकी है?

उड़ीसा के समृद्ध संसाधनों से बहुत से विवादों का जन्म होता है, इसमें ‘विकासÓ के हामी काफी बड़े हिस्से पर हाथ साफ कर देते हैं, जबकि इस इलाके में लंबे समय से रहने वाले आदिवासी वंचित रह जाते हैं। उदाहरण के लिए भारत की सबसे बड़ी बॉक्साइट खदान पंचपाट माली में है, जो नाल्को के अधीन है। यहां देश की सात चालू रिफाइनरियों में से दो मौजूद हैं, पहली नाल्को की दामनजुड़ी में और दूसरी हाल में पूरी की गई वेदांत की लांजीगढ़ में। इसके साथ देश के छह स्मेल्टरों में से दो स्मेल्टर, एक नाल्को का अनगुल में और दूसरा इडल का हीराकुंड में, यहीं चालू हैं। बहुत सी नई परियोजनाएं भी आने वाली हैं जैसे उत्कल की एक रिफाइनरी का काम काशीपुर में चल रहा है। कुछ दूसरे स्मेल्टर्स की भी योजना है जिसमें से वेदांत का एक कारखाना झारसुगुड़ा जिले में निर्माणाधीन है और दूसरा संबलपुर जिले में हिंडाल्को के अधीन योजना के अंतिम दौर में है।
यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि अंग्रेज भूगर्भ वैज्ञानिकों ने मूलत: इस पूरी योजना की रूपरेखा 1920 के दशक में तैयार की थी जिसमें फैक्ट्रियों की ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिए बांधों का निर्माण, रेलों का नेटवर्क और बंदरगाहों की व्यवस्था थी। उनके अनुसार उड़ीसा के पहाड़ों में पाया जाने वाला बॉक्साइट ‘इतना अच्छा है कि अगर यह अधिक मात्रा में मौजूद हो तो यह इलाका (रायपुर-वैजाग) रेलवे लाइन के निर्माण के बाद बहुत महत्वपूर्ण हो जाएगा… इसकी महत्ता इसलिए और भी बढ़ जाती है क्योंकि यहीं दक्षिण-पश्चिम दिशा में मद्रास क्षेत्र (जयपुर रियासत) में जल-विद्युत पैदा करने की बहुत सी जगहें हैं और विशाखापत्तनम के पास में एक बंदरगाह का निर्माण किया जानेवाला है।’ इसके अलावा टीएल वाकर नाम का एक भूगर्भशास्त्री था जिसने उड़ीसा के बॉक्साइट से ढके पहाड़ों के इन खनिजों को यहां की कंध जनजाति के नाम के आधार पर खोंडालाइट नाम दिया था। यह आदिवासी इन पहाड़ों के चारों ओर निवास करते हैं और इन पहाड़ों को बहुत पवित्र स्थान मानते हैं।
उड़ीसा की बहुचर्चित खनिज सम्पदा को अर्थशास्त्री एक अनछुआ संसाधन मानते हैं लेकिन यहां के आदिवासी इन खनिज-समृद्ध पहाड़ों को अपनी जमीन की उर्वरता का स्रोत मानते हैं। अगर पेड़ काट दिए जाएं और पहाड़ों का खनन कर लिया जाए तो उड़ीसा का एक बहुत बड़ा क्षेत्र सूख जाएगा और तेजी से उसकी उर्वरता नष्ट हो जाएगी- यह चीज पंचपाट माली और दामनजुड़ी वाले इलाके में तो अभी से साफ दिखाई पड़ रही है।
काशीपुर आंदोलन के एक कंध नेता भगवान मांझी उत्कल अल्युमिना परियोजना के बारे में इसी तरह की बात बताते हैं। आंदोलन की वजह से बारह वर्षों तक परियोजना का काम रुका रहा, लेकिन उत्कल ने 2006 में फिर इस रिफाइनरी पर काम शुरू किया। भगवान मांझी के गांव कुचेईपदर के आसपास की कई वर्ग किलोमीटर जमीन अब नंगी हो गई है। पहाड़ों को नोच कर मशीनें उन्हें सपाट करने पर लगी हैं। रिफाइनरी साइट के पास के दो गांवों रामीबेड़ा और केंदूखुंटी का अब कोई वजूद नहीं बचा है। इन गांवों के बाशिंदों को कार्यस्थल के पास की एक कॉलोनी में रख दिया गया है और उनकी हैसियत बंधुआ मजदूरों के एक समूह से अधिक कुछ नहीं है।
रामीबेड़ा के सबसे मातबर नेता और सबसे बड़े भूमिधर मंगता मांझी की मौत 1998 में पुलिस उत्पीडऩ के कारण हो गई। बताते हैं कि पुलिस वाले उत्कल कंपनी की गाड़ी में रात में आए और अपनी मिर्च की फसल की रखवाली कर रहे मांझी को मचान से उतार कर बंदूक के कुंदों से मारा और केंदूखुंटी के दो अन्य दलितों के साथ बांध कर ले गए। उन्हें कई हफ्तों तक पुलिस हिरासत में रखा। जब उनको रिहा किया गया, तब पुलिस की मार-पीट से उनका चेहरा विकृत हो चुका था और कुछ दिनों बाद ही उनकी मृत्यु हो गई।
अभी उत्कल की योजना है कि स्थानीय पहाड़ बापला माली से 19.5 करोड़ टन बॉक्साइट का खनन किया जाए। इन पहाड़ों को आसपास के बड़े क्षेत्रों में फैली तीन जनजातियों के लोग बड़ा पवित्र मानते हैं। इस बीच उत्कल का मानना है कि आने वाले 30 वर्षों के भीतर यह स्रोत समाप्त हो जाएगा। इस तरह से उनके काम की वजह से यह गैर-नवीकरणीय संसाधन हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। सिर्फ इतना ही नहीं होगा, बल्कि बापला माली की बहुत सी सदानीरा जल-धाराओं पर भी उसका बुरा असर पड़ेगा।
पुलिस के लगातार हमलों के खिलाफ कुचेईपदर गांव के निवासियों ने कुछ वर्षों के लिए गांव में पुलिस के घुसने पर पाबंदी लगा दी थी। ऐसी ही झड़पों में एक बार भगवान मांझी ने एक वरिष्ठ अधिकारी से बात की। वह बताते थे, ‘मैंने एसपी से पूछा कि ”हुजूर! यह विकास का मतलब क्या होता है? क्या आप लोगों को उजाड़ देने को ही विकास मानते हैं? जिन लोगों के लिए विकास किया जाता है, उसका फायदा उन्हें मिलना चाहिए। इसके बाद यह फायदा आने वाली पीढिय़ों को मिलना चाहिए। इस तरह से विकास होना चाहिए। यह सिर्फ कुछ अधिकारियों के लोभ को शांत करने के लिए नहीं होना चाहिए। लाखों साल पुराने इन पहाड़ों को नष्ट करना विकास नहीं हो सकता। अगर सरकार ने यह फैसला कर लिया है कि उसे अल्युमिना चाहिए और इसके लिए उसे बॉक्साइट की जरूरत है तो फिर उसे हमें पुनस्र्थापना के लिए जमीन देनी चाहिए। आदिवासी होने के नाते हम लोग किसान हैं। हम जमीन के बिना नहीं रह सकते।’’
अब यह तो साफ है कि अल्युमिनियम हासिल करने की ललक में दो तरह से सांस्कृतिक जनसंहार की मार पड़ती है। एक तो विस्थापन आदिवासियों के सामाजिक ढांचे को सीधे तौर पर बर्बाद कर देता है और दूसरे कारखाने ख़ुद पर्यावरण को इस कदर तबाह करेंगे कि जल्दी ही पश्चिमी उड़ीसा का एक बड़ा क्षेत्र सूख कर खेती लायक नहीं बचेगा। बॉक्साइट के खनन से पहाड़ों की जल-धारण क्षमता समाप्त हो जाती है जिसके फलस्वरूप पानी के स्रोत सूख जाते हैं। वैसे भी कारखानों में पानी की बहुत ज्यादा खपत होती है और उनसे पर्यावरण का भी प्रदूषण फैलता है। जंगलों की सफाई और कारखानों से निकलने वाला धुआं दोनों मिल कर बारिश की मात्रा को बेतरह घटा देते हैं। इस बात को न केवल आदिवासी अच्छी तरह जानते हैं, बल्कि वैज्ञानिक भी मानते हैं।
अल्युमिनियम के अत्यधिक उत्पादन की वजह से अमूमन सांस्कृतिक जनसंहार का जन्म होता है। यह क्षेत्र ‘संसाधनों से अभिशप्त है’ और ऐसे क्षेत्र हर प्रकार की आर्थिक चालबाजी और हर संभव तरीके से शोषण के शिकार बनते हैं। अल्युमिनियम उद्योग ने शुरू से ही बहुत से देशों की आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता की जड़ें खोद डाली हैं। अब ‘संसाधन अभिशाप’ की परतें उड़ीसा में खुलने लगी हैं जहां मूल्यों का पतन हुआ है और रिश्वतखोरी जगजाहिर हो रही है। सांस्कृतिक जनसंहार का जन्म अल्युमिनियम और हथियारों के उद्योगों के आपसी रिश्तों से भी होता है। इसके युद्ध से संबंध की कोई सीधी जानकारी नहीं मिलती, मगर अल्युमिनियम की गिनती उन चार प्रमुख धातुओं में होती है जिन्हें ‘सामरिक महत्व’ का माना जाता है क्योंकि हथियारों के निर्माण में इनका महत्वपूर्ण उपयोग होता है। यही वजह है कि न्यूक्लियर वैज्ञानिक अब्दुल कलाम ने, जो इस लेख लिखे जाने के समय भारत के राष्ट्रपति थे, अपनी पुस्तक ‘इण्डिया 2020’ में अल्युमिनियम की महत्ता समझाने और भारत के 2020 तक विकसित देशों की कतार में खड़ा होने की अपनी कल्पना में इसकी भूमिका पर कई पन्ने लिखे हैं। इन दोनों ही बिंदुओं पर इस लेख में आगे विस्तार से चर्चा है।

प्रतिरोध और पुनर्वास

अब यह कहा जा सकता है कि 2 जनवरी, 2006 वह तारीख है जिस दिन विस्थापन के विरुद्ध आदिवासी प्रतिरोध मजबूत हुआ। यही वह दिन था जब कलिंगनगर हत्याकाण्ड में पुलिस के हाथों 12 आदिवासी मारे गए थे जब वे अपनी जमीन पर टाटा स्टील के कारखाने के निर्माण का विरोध कर रहे थे। विस्थापन विरोधी मंच ने तभी से कलिंगनगर में विशाल नाकेबंदी कर रखी है।
छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में टाटा स्टील के एक दूसरे कारखाने के निर्माण को भी इसी तरह के आदिवासी प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि आदिवासियों का कहना है कि उनकी ‘रजामंदी’ पूर्णत: स्वेच्छा से नहीं दी गई थी। उनका प्रतिरोध एक प्रायोजित गृह-युद्ध की पृष्ठ-भूमि में शुरू हुआ, जब मध्य मार्च 2005 में सरकार समर्थित सलवा जुड़ुम (शांतिमार्च) कार्यक्रम हाथ में लिया गया। इस युद्ध का लक्ष्य केवल माओवादियों को ही समाप्त करना नहीं था, वरन औद्योगीकरण की उन योजनाओं को भी पूरा करना था जिनका आदिवासी समाज लंबे अरसे से विरोध कर रहा था। इसकी वजह से दंतेवाड़ा जिले में 80,000 आदिवासियों का विस्थापन हुआ जिसमें भय और आतंक का माहौल बना कर मानवीय अधिकारों का ऐसा जघन्य हनन हुआ जो किसी भी कल्पना से परे है। पश्चिम बंगाल में जहां भूमि अधिग्रहण के बाद भयंकर रक्तपात हुआ तब उच्च न्यायालय ने गैर-कानूनी ढंग से टाटा द्वारा सिंगूर में तथाकथित भूमि अधिग्रहण के खिलाफ बहुत कड़ा फैसला सुनाया था।
भारत में अब राष्ट्रीय स्तर पर एक उदार नई पुनर्वास और पुनस्र्थापन नीति की बात चल रही है, लेकिन इस उदार पुनर्वास और पुनस्र्थापन नीति में कहा क्या गया है? इस नीति का लब्बोलुआब यह है कि जिन थोड़े बहुत लोगों के पास जमीन का पट्टा है, उन्हें नगद पैसा दिया जाएगा, साथ में दिया जाएगा कारखाने के पास कॉलोनी में कंक्रीट का एक नया घर और रोजगार का वायदा जो पिछले समय में शायद ही कभी पूरा किया गया। इस तरह के पुनर्वास पैकेजों में शायद ही कभी विस्थापित लोगों को छीनी गई जमीन के बदले जमीन दी गई हो। यद्यपि अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ यह मानते हैं कि यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा है। विश्व बांध आयोग ने इस तरह की व्यवस्था के प्रावधान की सिफारिश की थी, लेकिन इस प्रस्ताव को केंद्र और राज्य-सरकार दोनों ने ही खारिज कर दिया। इसी तरह से एक्स्ट्रैक्टिव इंडस्ट्री रिव्यू ने, जो विश्व बैंक द्वारा गठित एक स्वतंत्र पुनरीक्षण था, सिफारिश की थी कि विश्व बैंक विकासशील देशों में कोयला और खनन परियोजनाओं के लिए पैसा देना बंद कर दे और उसके स्थान पर ऊर्जा के पुनर्नवीनीकरण वाले संसाधनों पर अपना ध्यान केंद्रित करे। इस सलाह को भी दरकिनार कर दिया गया।
भगवान (मांझी) ने जमीन के मुद्दे के इर्द-गिर्द चल रहे बहुत से अनुत्तरित सवालों को सामने रखा। उनका कहना था, ”विकास के नाम पर जिन लोगों का विस्थापन हुआ है उनके बारे में हमने सरकार से सफाई मांगी है। कितने लोगों का आपने सही तरीके से पुनर्वास किया? आपने उनको रोजगार नहीं दिया, आपने पहले से विस्थापितों का तो पुनर्वास किया नहीं फिर आप और अधिक लोगों को कैसे विस्थापित कर सकते हैं? आप उनको लेकर कहां जाएंगे और उनको क्या काम देंगे? यह आप पहले हमें बताइये। सरकार हमारे सवालों का जवाब नहीं देती है। हमारा बुनियादी सवाल है कि अगर हमारी जमीन ले ली जाती है तो हम जिंदा कैसे रहेंगे? हम लोग आदिवासी किसान हैं। हम लोग मिट्टी के कीड़े हैं, उन्हीं मछलियों की तरह जिन्हें अगर पानी से निकाल दिया जाए तो वे मर जाएंगी। एक किसान से उसकी जमीन ले लीजिए, वह जिंदा नहीं बचेगा। इसलिए, हम अपनी जमीन छोड़ेंगे नहीं।’’
पुनर्वास और पुनस्र्थापन विशेषज्ञों तथा विश्व बैंक की पुनर्वास नीति की खास सिफारिश है कि विस्थापित लोगों की जीवन शैली में सुधार आना चाहिए। इसके बावजूद ऐसा कभी होता नहीं है। कंपनियां निगमों के सामाजिक उत्तरदायित्व जैसी बड़ी-बड़ी बातें करके इन सच्चाइयों पर परदा डाल देती हैं और दान-धर्म के मिशनरी मॉडल का विज्ञापन करती हैं, जबकि उनकी सारी कोशिश शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल-कूद और स्वयं सहायता समूहों तक केंद्रित रह जाती हैं। इन सारे कार्यक्रमों का मतलब है कि उन्हें आदिवासी संस्कृतियों की कोई समझ ही नहीं है।
अपनी वार्षिक आम रिपोर्ट (2006) में वेदांत रिसोर्सेज ने 60 पृष्ठ इस बात का बखान करने में लगाए हैं कि उसने अपने सामाजिक उत्तरदायित्व कार्यक्रम में कितने अच्छे-अच्छे काम किए हैं। इस (रिपोर्ट) में चमकीले कागज पर मुस्कुराते हुए उन आदिवासियों के रंगीन चित्र लगे हुए हैं जिनको इस कार्यक्रम के अधीन ‘सुसंस्कृत’ किया गया है। यह वास्तविक सच्चाई से एकदम परे है। वेदांत की लांजीगढ़ रिफाइनरी में काम के समय की दुर्घटनाओं में सैकड़ों लोग मारे गए हैं और इलाके में इस बात को सारे लोग जानते हैं कि अक्सर मजदूरों से काम करवा कर उन्हें पैसा नहीं दिया जाता और उन्हें काम पाने के लिए काफी लल्लो-चप्पो करनी पड़ती है।

उलटा असर

अल्युमिनियम उद्योग सबसे ज्यादा ऊर्जा की खपत वाले उद्योगों में से एक है। अल्युमिना की एक मीट्रिक टन मात्रा के शोधन में औसतन 250 किलोवाट पावर (केवीएच) बिजली की खपत होती है, जबकि अल्युमिनियम को गलाने में कम से कम 1300 केवीएच बिजली लग जाती है। जर्मनी के वप्परटल इंस्टीट्यूट का अनुमान है कि एक टन अल्युमिनियम के उत्पादन में 1,378 टन से कम पानी नहीं लगता है (इस्पात की इसी मात्रा के उत्पादन में 44 टन पानी लगता है जो तुलना में काफी कम होने के बावजूद ज्यादा ही है।) कुल मिला कर एक टन अल्युमिनियम बनाने में रिफाइनरियों में से 4 से 8 टन तक का जहरीला ठोस लाल कचरा निकलता है, मुख्यत: स्मेल्टर्स से लगभग 13.1 टन कार्बन-डाईऑक्साइड और 85 टन पर्यावरणीय कूड़ा-करकट और निर्जीव अपशिष्ट निकलता है। सीधे शब्दों में हम कह सकते हैं कि अल्युमिनियम उत्पादन का नकारात्मक प्रभाव उसके सकारात्मक प्रभाव से 85 गुना ज्यादा है। इंग्लैंड सरकार की हाल की एक रिपोर्ट के अनुसार अकेले एक टन कार्बन उत्सर्जन से होने वाली क्षति की लागत 85 डॉलर प्रति टन बैठती है जिसका मतलब होता है अल्युमिनियम के एक टन के उत्पादन पर 1000 डॉलर का नुकसान।
बॉक्साइट से अल्युमिनियम के उत्पादन तक समाज और पर्यावरण चार स्तरों पर नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है। ये हैं बॉक्साइट का खनन, अल्युमिना का शोधन, अल्युमिनियम का गलाना और इन तीनों कथित कामों को करने के लिए बिजली का उत्पादन। जल-विद्युत के लिए बड़े बांधों का निर्माण या कोयले से ताप विद्युत पैदा करने के लिए ताप विद्युत घरों के निर्माण से यह जरूरतें पूरी की जाती हैं। इसी कड़ी में उड़ीसा में हजारों लोग जलाशयों के निर्माण और कोयला खदानों के कारण विस्थापित हुए हैं और यह दोनों संसाधन ऊर्जा के उत्पादन के लिए जरूरी हैं। इनकी कुर्बानी के पीछे भी अल्युमिनियम उद्योग का हाथ है।
बांधों, रिफाइनरियों और स्मेल्टरों की अनचाही कीमतों के बारे में अपेक्षाकृत बहुत कुछ लिखित सामग्री उपलब्ध है। इसके विपरीत पहाड़ों की चोटियों से बॉक्साइट के खनन से उड़ीसा की जमीन की उर्वरता को कितना नुकसान पहुंचा है, उसके बारे में खास जानकारी उपलब्ध नहीं है। बॉक्साइट की जल-संचय क्षमता बहुत ज्यादा होती है। यह रंध्र युक्त होता है और स्पंज की तरह काम करता है। बारिश के पानी को यह पूरे वर्ष तक पकड़ कर रखता है और धीरे-धीरे छोड़ता है। पहाड़ों के खनन से उनकी जल-संग्रह क्षमता बेतरह कम हो जाती है। इस समस्या का बहुत कम अध्ययन हुआ है और वह शायद इसलिए कि अल्युमिनियम कंपनिया बॉक्साइट पर तो बहुत शोध करती हैं, मगर उन शोधों से बचने की कोशिश करती हैं जिनसे उनके कारनामों का नकारात्मक पक्ष सामने आता है। मौसम परिवर्तन के क्षेत्र में वैज्ञानिक सबूतों के साथ जो चालबाजी खेली जा रही है, उसी की तर्ज पर ये विकृतियां भी खुल कर सामने आती हैं।
अल्युमिनियम उद्योग के इतिहास का सावधानीपूर्वक अध्ययन किए जाने पर यह जाहिर होता है कि वास्तव में अल्युमिनियम को इसकी उत्पादन लागत से कम कीमत पर बेचा जाता है। रिफाइनरी और स्मेल्टर्स तभी मुनाफा कमा सकते हैं जब उन्हें बिजली, पानी, परिवहन आदि पर भारी सब्सिडी के साथ-साथ टैक्सों में भी कटौती के लाभ मिलें। भारत में अल्युमिनियम उद्योग की ऊर्जा ऑडिट (1988) में यह बात साफ-साफ कही गई है। यह ऑडिट स्वतंत्र रूप से करवाया गया था। कंपनिया खुद भी बहुत से लागत खर्च को अपने हिसाब-किताब से दरकिनार कर देती हैं जिसमें समाज द्वारा चुकाये जानी वाली कीमतें और पर्यावरणीय लागत मुख्य है। ये कीमतें मेजबान सरकारों पर थोप दी जाती हैं और आखिरकार इनको वही भुगतता है जो पूरी आबादी में सबसे कमजोर होता है।
दूसरे देश खनन और धातु उत्पादन उद्योगों को भारत में लगाने में सबसे ज्यादा रुचि ले रहे हैं। यूरोप और अमेरिका में अल्युमिनियम बंदी के कगार पर पहुंच गया है क्योंकि वहां बिजली के दाम बढ़ रहे हैं और पर्यावरण संबंधी कानूनों में भी सख्ती आ रही है। अल्कैन ने जैसे ही काशीपुर में रिफाइनरी लगाने का फैसला किया, उसने 2003 में इंग्लैण्ड की अपनी आखिरी रिफाइनरी (बर्नटिसलैंड) बंद कर दी। ऐसा लगता है कि घरेलू उत्पादन प्रक्रिया को दूसरे देशों के हवाले करके यूरोप अपना कार्बन उत्सर्जन कुछ कम कर रहा है पर यह भी वहम के अलावा कुछ नहीं है। अल्युमिनियम का जितना उपयोग अभी यूरोप में हो रहा है उससे भी काफी कार्बन का उत्सर्जन होता है। यह बात अलग है कि वह अभी यूरोप को छोड़ कर भारत को प्रदूषित कर रहा है।

संसाधनों का अभिशाप

संसाधनों का अभिशाप दुनिया के बहुत से ऐसे क्षेत्रों को प्रभावित कर रहा है जो प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न हैं। इन इलाकों में इस समृद्धि का दोहन करने के लिए बड़े-बड़े प्रकल्प यह कह कर लगाए जाते हैं कि इससे स्थानीय लोगों की सम्पत्ति बढ़ेगी मगर जो वास्तव में मिलता है वह है शोषण, गरीबी और हिंसा। नाइजीरिया का तेल समृद्ध डेल्टा, सिअरा लिओन, अंगोला और अफ्रीका के दूसरे अन्य देश, दक्षिण अमेरिका और भारत इस बानगी की पराकाष्ठा के कुछ उदाहरण हैं। नाइजीरिया में तेल कंपनिया जिस तरह का सलूक कर रही हैं, उदाहरण के लिए, वह उड़ीसा के लिए आने वाले दिनों में एक सबक हो सकता है। शेल और उसी तरह की दूसरी कंपनियां लोगों की जिंदगी और पर्यावरण की कीमत पर भारी मुनाफा कमा रही हैं। किसी भी तरह के विरोध का गला घोंटने के लिए विरोध करने वाले को सुरक्षा कर्मी मार डालते हैं। इस तरह की सबसे मशहूर घटना केन सारो वीवा की मौत थी जिन्हें कत्ल के झूठे आरोप में आठ दूसरे ओगोनी लोगों के साथ 1995 में शेल के षड्यंत्र और सारी दुनिया से भत्र्सना के बीच फांसी पर चढ़ा दिया गया।
अल्युमिनियम उद्योग ने व्यावहारिक तौर पर बहुत से देशों की अर्थ-व्यवस्था को तभी से नियंत्रित कर रखा है, जबसे उन्होंने आज़ादी हासिल की। गुयाना की आजादी 1957 से लेकर 1966 तक टलती रही जिस दरम्यान अंग्रेजों ने उन्हें देश में केवल सीमित तौर पर स्वशासन की मोहलत दी थी। इन वर्षों में छेदी जगन को तीन बार सत्ता इस शर्त पर मिली कि वे बॉक्साइट की रॉयल्टी एक समुचित स्तर तक बढ़ा देंगे और अल्कैन की सहायक कंपनी का राष्टरीयकरण कर देंगे। इसके बदले में एमआई-6 और सीआईए ने देश को अस्थिर करने की कोशिश की और जब अंतत: 1970 में उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया तब उस पर विश्व बैंक की तरफ से काफी दबाव डाला गया कि वह अल्कैन की क्षतिपूर्ति करे।
जमैका में 1972 में अमरीकी राजदूत ने माइकेल मैनली को ताकीद की थी कि अगर उन्होंने बॉक्साइट की रॉयल्टी बढ़ाने या उद्योगों के राष्ट्रीयकरण को चुनावी मुद्दा बनाया तो उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिए जाने का अंजाम भुगतना पड़ सकता है। यह केवल बंदर घुड़की नहीं थी क्योंकि अगले ही साल सीआईए ने चिली में पिनोशे द्वारा किए गए तख्तापटल का समर्थन किया और यह काम अनाकोण्डा और केन्निकॉट तांबे की खदानों और पेप्सीकोला की शह पर हुआ था। फिर भी मैनली ने अपनी योजना के अनुसार ही काम किया और 1974 में उन्होंने देश की बॉक्साइट खदानों में 51 साझेदारी का राष्ट्रीयकरण कर डाला। उसी साल उन्होंने बॉक्साइट पैदा करने वाले देशों का इंटरनेशनल बॉक्साइट एसोसिएशन (आईबीए) नाम का संगठन बनाया और कुछ समय के लिए अल्युमिनियम कंपनियों के साथ बॉक्साइट के बेहतर दामों के लिए करार किया। इस मामले में कच्चे माल का दाम तैयार माल का 7.5 प्रतिशत रखा गया। इसकी तुलना अगर लंदन मेटल एक्सचेंज की अल्युमिनियम कीमतों से करें तो वह इंगट का मात्र 0.4 प्रतिशत थी और भारत का रॉयल्टी रेट भी 2004 से इतना ही है।
कैजर अल्युमिनियम द्वारा संचालित एक सहायक कंपनी वाल्को (वोल्टा अल्युमिनियम कंपनी) के एक विशाल स्मेल्टर की ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिए घाना में वोल्टा नदी पर दुनिया के सबसे बड़े बांधों में से एक, पर बहुत घटिया किस्म के बांध का निर्माण किया गया। इसकी वजह से कोई 80,000 लोग विस्थापित हुए, 740 गांवों को तबाह किया गया और अनुमानित तौर पर 70,000 लोग रिवर ब्लाइंडनेस और शिस्टोसोमियासिस नाम की बीमारियों के शिकार होकर हमेशा के लिए आंखों की रोशनी खो बैठे। कंपनी और घाना के पहले राष्ट्रपति एनक्रूमा के बीच हुए इकरारनामें को कपटपूर्वक कैजर के हक में कर दिया गया। इस पूरे उपक्रम में विश्व बैंक ने कंपनी के हिमायती की भूमिका अदा की थी। सीआइए ने 1957 से 1966 के बीच देश को अस्थिर करने का प्रयास किया और बांध और स्मेल्टर के चालू होने के एक महीने बाद एनक्रूमा को सत्ताच्युत कर दिया गया।
आजकल भारत में विषद चर्चा का विषय स्पेशल इकनॉमिक जोन (एसईजेड) भी कोई अजूबी चीज नहीं है। वह क्षेत्र जो संसाधन सम्पन्न हैं, उनकी औद्योगिक संस्थाओं का उपयोग बहुराष्टरीय कंपनियां अपने लाभ के लिए कर लेती हैं (इसका एक लंबा इतिहास है) जबकि इलाका गरीब बना रहता है। अल्युमिनियम उद्योग ने गुयाना, जमैका, घाना और गिनी जैसी कई जगहों में मुनाफा केवल इसलिए कमाया क्योंकि ये सब सब्सिडी वाले अंत:क्षेत्र थे। कंपनियों द्वारा इन देशों का शोषण इस बात की नजीर है कि उड़ीसा में बनने वाले अल्युमिनियम कारखानों से यहां का क्या हश्र होने वाला है। वेदांत और हिंडाल्को के प्रस्तावित स्मेल्टर्स उत्तर उड़ीसा में इन्हीं एसईजेड में स्थापित होने वाले हैं। घाना के वाल्को मास्टर करारनामे के मुकाबले 2005 के एसईजेड एक्ट में बिजली, पानी और जमीन के दामों में छप्पर फाड़ सब्सिडी देने का प्रावधान है और यह सभी प्रावधान भारत के उन कानूनों के खिलाफ हैं जिनमें श्रमिकों के अधिकार, भूमि के अधिकार और पर्यावरण की बात कही जाती है।
अल्युमिनियम उद्योग द्वारा पैदा किया हुआ ऐसा ही संसाधनों का अभिशाप आस्ट्रेलिया और ब्राजील के कुछ भागों में भी देखने को मिलता है। उत्तरी आस्ट्रेलिया में अल्कैन और अलकोआ परियोजनाओं में केप यॉर्क और अन्र्हेमलैंड में आदिम जाति के लोगों का विस्थापन हुआ, जबकि ब्राजील के टुकुरूई बांध की वजह से वहां से मूल वासियों का विस्थापन हुआ। मध्य भारत के खनन क्षेत्रों में भी यही कहानी दुहराई जाती है जिसके बारे में 25 जनवरी, 2001 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने गणतंत्रा दिवस के समय चिंता व्यक्त की थी। पांच सप्ताह पहले घटी मईकांच पुलिस हत्याकांड का हवाला देते हुए उन्होंने कहा था, ”जंगलों के बीच चल रही खनन प्रक्रिया से बहुत सी आदिवासी जन-जातियों के अस्तित्व और जीविका पर खतरा मंडरा रहा है… हमारी आने वाली पीढिय़ाँ ऐसा न कहें कि गणतंत्रीय भारत हरी-भरी पृथ्वी और निरीह आदिवासियों के मलबे पर खड़ा है जहाँ वे सदियों से रहते आए हैं।’’

युद्ध को हवा देते हुए

अल्युमिनियम उत्पादन को आगे बढ़ाने में हथियारों के उद्योग का मुख्य हाथ है यद्यपि यह बात खुल कर सामने नहीं आती है। भगवान मांझी इस सबंध का खुलासा तब करते हैं जब वह पूछते हैं कि बापला माली का बॉक्साइट कहां भेजा जायेगा, ”अगर उन्हें इसकी इतनी ज्यादा जरूरत है तो उन्हें यह हमें बताना चाहिए कि यह जरूरत क्यों है। हमारे बॉक्साइट का उपयोग कितनी मिसाइलों में किया जाएगा? आप कैसा बम बनाएंगे? कितने लड़ाकू हवाई जहाज बनेंगे? आपको हमें पूरा हिसाब देना होगा।’’
अल्युमिनियम का युद्ध से संबंध उसके पहले संरक्षकों-फ्रांस के नेपोलियन तृतीय और जर्मनी के कैसर विल्हेम तक जाता है। अल्युमिनियम के विस्फोटक गुण का आविष्कार 1901 में हुआ था, जब अमोनल और थर्माइट को खोज निकाला गया था। उसके बाद इस धातु ने दुनिया के इतिहास की धारा ही बदल दी।
अल्युमिनियम प्लांट में बिजली की भारी खपत क्यों होती है और इस धातु का अस्त्र-शस्त्रों के उपयोग में क्या रिश्ता है? अल्युमिनियम ऑक्साइड के अणुओं में अल्युमिनियम के ऑक्सीजन के साथ बॉण्ड को तोडऩे के लिए स्मेल्टरों में बिजली की जरूरत पड़ती है। थर्माइट इस प्रक्रिया को उलट देता है। बम में आइरन ऑक्साइड को अल्युमिनियम पाउडर के साथ भर दिया जाता है। जब फ्यूज में पलीता लगता है तब अल्युमिनियम का तापक्रम बहुत ज्यादा बढ़ जाता है और यह आक्सीजन के साथ फिर बॉण्ड करने की कोशिश करता है जिससे बहुत ज्यादा धमाकेदार विस्फोट होता है। थर्माइट का इस्तेमाल सबसे पहले मिल्स बम हैंड ग्रेनेड में पहले विश्व युद्ध में हुआ था जब ब्रिटेन ने 70,000 ऐसे ‘बमÓ बनाए थे। इससे कम से कम 70,000 सिपाही मारे गए थे और इसके आविष्कारक सर विलियम मिल्स को इसके लिए नाइटहुड से नवाजा गया था। पहले विश्व युद्ध के दौरान ही अल्युमिनियम कंपनियों को यह आभास हो गया था कि उनका भविष्य हथियारों और विस्फोटकों के निर्माण के साथ जुड़ा हुआ है। अलकोआ के लगभग 90 प्रतिशत उत्पादन का इस्तेमाल हथियारों के निर्माण में लगा और अल्युमिनियम कार्पोरेशन ऑफ अमेरिका की मानक आत्मकथा में कहा गया है कि ‘अलकोआ के लिए युद्ध शुभ था।’
1930 के आस-पास हवाई जहाजों के डिजाइन में अल्युमिनियम का उपयोग होना शुरू हो गया और जैसे ही जर्मनी, ब्रिटेन और अमेरिका ने हजारों लड़ाकू जहाजों का निर्माण करना शुरू किया, अल्युमिनियम कंपनियों ने बेतरह पैसा बनाया। अल्युमिनियम अब भी एक खाली जंबो जेट तथा दूसरे हवाई जहाजों के पूरे वजन का 80 प्रतिशत होता है जिसमें इसे प्लास्टिक के साथ भी यौगिक बना कर इस्तेमाल किया जाता है।
दूसरे विश्व युद्ध में अल्युमिनियम का उपयोग, मुख्य रूप से नापाम बम समेत, बमों में पलीता लगाने के लिए किया जाता था जिसकी वजह से हवाई हमलों में जर्मनी और जापान में हजारों नागरिकों को जान गंवानी पड़ी थी। वास्तव में युद्ध संबंधी धातुओं के निर्माण में जो भी खनिज लगते हैं, वे सब के सब उड़ीसा में पाए जाते हैं- लोहा, क्रोमाइट, मैंगनीज; इस्पात के लिए और बॉक्साइट तथा यूरेनियम, सब कुछ।
हिटलर को उड़ीसा के बॉक्साइट खनिज की जानकारी थी और यह एक वजह थी जो उड़ीसा के बंदरगाहों पर जापान ने बम गिराए थे। अमेरिका में विशालकाय बांधों के निर्माण के पीछे मुख्य कारण अल्युमिनियम स्मेल्टर्स के लिए बिजली की आपूर्ति करना था। ‘पश्चिमी बांधों से पैदा होने वाली बिजली के कारण दूसरा विश्व युद्ध जीतने में मदद मिली थी’ क्योंकि इससे अल्युमिनियम बनाने में मदद मिलती थी जिसका उपयोग हथियारों और हवाई जहाजों में होता था।
युद्ध के बाद अल्युमिनियम से होने वाली आमदनी धराशायी हो गई, लेकिन इसमें फिर उछाल आया जब कोरिया में युद्ध शुरू हुआ, उसके बाद वियतनाम और फिर कितने ही युद्ध अमेरिका के उकसाने पर हुए। कोरियाई युद्ध के समय अमेरिका के तात्कालिक राष्ट्रपति ड्वाइट डी आइजनहॉवर द्वारा स्थापित ‘सैन्य उद्योग कॉम्प्लेक्स की आधारशिलाÓ अल्युमिनियम ही थी। उनका कार्यकाल 1961 में इस चेतावनी के साथ समाप्त हुआ कि ‘हमें एक बहुत बड़े पैमाने पर स्थाई युद्ध उद्योग के निर्माण पर मजबूर कर दिया गया था।’
अमेरिका ने 1950 में इस धातु का संग्रह करना शुरू किया था। एक अमरीकी अल्युमिनियम विशेषज्ञ ने एक पैम्पफलेट में 1951 में लिखा था, ‘आधुनिक युद्ध कला में अल्युमिनियम अकेला सबसे महत्वपूर्ण पदार्थ है। भारी मात्रा में अल्युमिनियम के उपयोग और उसको नष्ट किए बिना आज न तो कोई युद्ध संभव है और न ही उसे सफलतापूर्वक उसके अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है… अल्युमिनियम युद्ध में सुरक्षा के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसकी मदद से लड़ाकू और परिवहन के लिए जहाजों का निर्माण होता है। आणविक हथियारों के निर्माण और उनके प्रयोग में अल्युमिनियम का उपयोग होता है। अल्युमिनियम और उसके महत्वपूर्ण गुणों की वजह से ही हार-जीत का अंतर पता लगता है।’
ईराक या अफगानिस्तान में दागी जाने वाली हर अमरीकी मिसाइल में विस्फुरण प्रक्रिया में शेल के खोखों और धमाकों में अल्युमिनियम का इस्तेमाल होता है। कार्पेट बॉम्बिंग में इस्तेमाल होने वाला डेजीकटर बम अल्युमिनियम की विस्फोटक क्षमता पर काम करता है। यही उपयोग आणविक मिसाइलों और अमेरिका के 30,000 आणविक विस्फोटक शीर्षों में होता है। दोनों विश्व युद्धों के बीच परदे के पीछे से युद्ध को उकसाने में हथियार बनाने वाली कंपनियों की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। 1927 में लीग ऑफ नेशंस ने यह घोषणा की थी कि ‘निजी उद्योगों द्वारा हथियारों और युद्ध में प्रयुक्त होने वाली वस्तुओं का निर्माण घोर आपत्तिजनक है।Ó लेकिन इससे जुड़े निहित स्वार्थ कहीं ज्यादा मजबूत थे। 1927 में ही जेनेवा में लीग के निरस्त्रीकरण अधिवेशन में एक अमरीकी पैरवीकार को 27,000 डॉलर इसलिए दिए गए थे कि वह छह सप्ताह तक हथियार बनाने वाली कंपनियों की तरफ से माहौल बनाने का काम करे ताकि ऐसा कोई समझौता होने ही न पाए। आज की ही तरह तब भी बहुत से शक्तिशाली देशों की अर्थव्यवस्था इसी शस्त्र उद्योग पर आधारित थी। इस सम्मेलन की असफलता के बाद एक ब्रितानी समीक्षाकार ने टिप्पणी की थी कि ‘युद्ध न केवल बहुत बुरी चीज है वरन यह बुरी तरह से फायदमेंद चीज भी है।Ó इन हथियार बनाने वाली कंपनियों के पीछे खनन कम्पनियां और धातुओं के विक्रेता समर्थन में खड़े रहते हैं। अमरीका द्वारा शुरू किए गए किसी भी युद्ध में दागे गए हर गोले की खाली जगह पर नया गोला लगता है और इसका निर्माण नए निकाले गए खनिजों से ही होता है।

रजामंदी का निर्माण

अगर कोई टिकाऊपन का सवाल उठाता है तो इसमें कोई शक नहीं है कि विस्थापित होने वाले आदिवासी समुदायों के पास अधिकांश प्रश्नों का उत्तर मिल जाएगा। वह प्रकृति से बहुत कम ग्रहण करते हैं और लगभग कुछ भी बरबाद नहीं करते। इसलिए अगर भगवान मांझी और उस तरह के कई लोग यह पूछते हैं कि स्थानीय आबादी और पर्यावरण की इतनी बड़ी कीमत पर खनन उद्यमों की कोई योजना बनती है तब क्या वह सचमुच विकास की योजना होती है? इस पर किसी को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
ऐसे सम्मेलनों में जहां अल्युमिनियम के गुणों का बखान होता है, ये विचार प्रगट किए जाते हैं कि भारत एक पिछड़ा हुआ देश है क्योंकि यहां प्रति व्यक्ति अल्युमिनियम की सालाना खपत एक किलोग्राम से भी कम है जबकि ‘विकसित’ देशों में यह खपत 15.30 किलोग्राम प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष तक होती है। अल्युमिनियम उत्पादन की ऊंची लागत और उससे होने वाले मौसम परिवर्तन के दुष्प्रभावों को देखते हुए कहा यह जाना चाहिए था कि भारत में अल्युमिनियम की कम खपत बेहतर विकसित विकल्प का सूचक है। इसके अलावा चिकित्सा के क्षेत्र में होने वाले शोध बताते हैं कि भले ही थोड़ी मात्रा में हो मगर अल्युमिनियम की एक चिंताजनक मात्रा मानव शरीर में पैकेजिंग और जल-प्रदाय माध्यमों से लगातार प्रवेश कर रही है। इसका मानव शरीर से उत्सर्जन नहीं हो पाता और यह मस्तिष्क में जाकर इकट्ठा होने लगता है और कहा तो यहां तक जाता है कि इससे अल्जाइमर (भूलने) की बीमारी का खतरा रहता है।
मजे की बात यह है कि अल्युमिनियम दो कारणों से ‘पर्यावरण के लिए नुकसानदेह नहीं’ होने का दावा करता है। पहला यह कि इसका दुबारा-तिबारा उपयोग संभव है और दूसरा यह कि इसके उपयोग से मोटर गाडिय़ों का वजन अपेक्षाकृत कम होता है जिससे ईंधन की खपत कम होती है। लेकिन यह फायदे गुमराह करने वाले हैं और वास्तव में बेमानी हैं क्योंकि इसकी पर्यावरणीय लागत और ऐसे कारखानों में ईंधन की जिस मात्रा की जरूरत पड़ती है उसको अगर ध्यान में रखा जाए तो यह जाहिर होता है कि इस धातु के शोधन और खपत दोनों में कितना अधिक ईंधन लगता है। ध्यान देने लायक एक महत्वपूर्ण बात है कि आदिवासी लोग, जिन्हें टुकड़े-टुकड़ों में किसी चीज को देखने की आदत नहीं है, बापला माली के बॉक्साइट तथा बम और युद्ध जिनमें ‘भारी मात्रा में अल्युमिनियम की खपत होती है’, के बीच के संबंध को तुरंत भांप लेते हैं। जिस तरह के सवाल भगवान मांझी और उस तरह के लोग खड़ा करते हैं उनका उत्तर मिलना चाहिए और अल्युमिनियम परियोजनाओं के लाभ और लागत का विश्लेषण होना चाहिए। नाल्को की उड़ीसा की मौजूदा परियोजनाओं की सामाजिक और पर्यावरणीय लागत क्या है? अगर एक टन धातु का उत्पादन करने में 1,378 टन पानी की खपत होती है तब दामनजुड़ी के आस-पास की जमीन किस हद तक बंजर बनेगी? इन सवालों के जवाब कंपनियों द्वारा अल्युमिनियम के निर्यात से होने वाले मुनाफे के दूसरे पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं।
यह हमें सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न की ओर ले जाता है- औद्योगीकरण की नीति का असली नियंत्रण किसके हाथ में है? राज्य में विभिन्न संरचनात्मक परियोजनाओं के लिए विश्व बैंक और दूसरी संस्थाओं ने जो पैसा दिया है, उसके फलस्वरूप उड़ीसा पूरे भारत में सबसे ज्यादा कर्ज में डूबा हुआ प्रांत है। इन कर्जों से सरकार पर बेवजह दबाव पड़ता है क्योंकि इनका भुगतान विदेशी मुद्रा में किया जाना है। इतना ही नहीं, कंपनियों की ताकत को कम करने वाले सारे नियम-कानूनों को ढीला करने की बात को भी मानना पड़ता है। परिणामस्वरूप एसईजेड तैयार किए जा रहे हैं ताकि ‘विदेशी निवेश के लिए माहौल बनाया जा सके’ और भारतीय कानून और संविधान में जमीन के अधिकार, श्रमिक अधिकार और पर्यावरण सुरक्षा के जो प्रावधान किए गए हैं उन्हें बिखेर देने की कोशिश हो रही है।
उड़ीसा की राजनीति और अर्थनीति के फैसले अब लंदन या वाशिंगटन में एक ऐसी व्यवस्था से किए जाते हैं जिनके बारे में परियोजनाओं से प्रभावित होने वाले लोगों को कोई जानकारी ही नहीं है। ब्रिटिश सरकार के डिपार्टमेंट फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (डीएफआइडी) के नीति निर्देशक अधिकारी द्वारा 2003 के एक्सट्रैक्टिव इंडस्ट्रीज रिव्यू का काम देखने वाले व्यक्ति को लिखे गए एक पत्र से इस बात का खुलासा होता है कि इन अधिकारों का किस तरह का उपयोग होता है। निर्देशक ने पत्र में इस बात की चेतावनी दी थी कि अगर रिपोर्ट में कुछ बुनियादी परिवर्तन नहीं किए गए तो रिपोर्ट को विश्व बैंक बोर्ड द्वारा खारिज कर दिए जाने का ‘सचमुच खतरा’ है (यह हुआ भी)। पत्र में लिखा है कि ‘पहले से पूरी सूचना के साथ रजामंदी (कृपया नोट करें कि इसमें रजामंदी के साथ किसी भी बंधन से मुक्त रजामंदी शब्दों का उपयोग नहीं किया गया है) पर कुछ सफाई जरूरी है। यह स्पष्ट नहीं होता है कि रजामंदी पूरी परियोजना के बारे में एकमुश्त आवश्यकता है… अगर कोई एक व्यक्ति राष्ट्रीय विकास पैकेज से सहमत नहीं होता है तो बैंक या सरकार किस हद तक इसे खारिज करने के लिए तैयार है?Ó अंतिम प्रश्न पूरी तरह से आदिवासी समुदायों के भूमि संबंधी अधिकार को व्यक्तिगत अधिकारों के साथ घालमेल कर के गलत तरीके से पेश करता है। यहां ब्रिटिश सरकार का एक अधिकारी इस बात पर आक्रोश जताता है कि भारत या किसी दूसरे देश के आदिवासी लोगों के हाथ में अभी जमीन पर कोई भी खनन परियोजना हाथ में लेने पर वीटो करने का अधिकार होगा। यह वही औपनिवेशिक मनोवृत्ति है जो भारत की आजादी के पहले ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यवहार में झलकती थी।
जब ‘पूरी सूचना के साथ किसी भी बंधन से मुक्त सहमतिÓ को ही खारिज कर दिया जाता है तो उड़ीसा में जो कुछ भी हो रहा है, उस पर स्वीकृति की मुहर लग जाती है जहां जन-सुनवाई में ‘सहमति’ का निर्माण पुलिस की धमकी और मौजूदगी में छलपूर्वक किया जाता है। यह भी एक कारण है कि क्यों उड़ीसा और पड़ोसी राज्यों में सैकड़ों परियोजनाओं से प्रभावित होने वाले ग्रामीण ‘रजांमदी’ देने और अपनी जमीन छोडऩे के लिए मजबूर कर दिए जाते हैं हालांकि उन्हें अपनी जमीन से विरत न कर पाने का अधिकार भारत के संविधान के पांचवीं अनुसूची में बुनियादी अधिकार के रूप में प्राप्त है।
परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव का मूल्यांकन भी गंभीरता के साथ नहीं किया जाता, इसमें हमेशा देर की जाती है और इसके लिए जिस प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाता है उसी पर सवालिया निशान लगे हुए हैं। सामाजिक प्रभावों का मूल्यांकन तो होता ही नहीं है और कभी अगर यह काम हुआ भी तो यह उन अधिकारियों द्वारा किया जाता है जिनकी इस काम के लिए कोई ट्रेनिंग ही नहीं होती। इस बात को कोई मान्यता नहीं मिलती कि ये परियोजनाएं भारत की सांस्कृतिक धरोहर के लिए बहुत मंहगी साबित होती हैं। भारतीय संस्कृति क्या है और यह कहां रहती है? भारतीय संगीत, परम्परागत धर्म और शिल्प का इस तरह से बाजारीकरण और राजनीतिकरण हुआ है कि उनकी मूल आत्मा ही मर गई है और उनका नकली रूप ही सामने आता है जो ग्रामीण समाजों की शाश्वत परम्पराओं के बिलकुल उल्टा पड़ता है। भारतीय संस्कृति वह है जिसे महात्मा गांधी ने समझा था। खेती करना और जंगलों से पौधे इकट्ठा करना आदिवासी संस्कृति के मूल में है और जब उनका विस्थापन होता है तब उनकी यह परम्परा भी समाप्त हो जाती है। इसके बावजूद सांस्कृतिक जनसंहार को और मजबूत करने के लिए एक अनवरत प्रक्रिया के तहत उनकी बातों पर सेंसर बैठाना, उनकी अवहेलना करना तथा आदिवासियों के ज्ञान को नकारने का काम चलता रहता है, ऐसा भगवान मांझी तथा दूसरे लोग इशारा करते हैं। उनका कहना है, ‘हम स्थाई विकास चाहते हैं। हमारी जमीनों को सिंचाई उपलब्ध करवा दीजिए। हमारे लिए अस्पताल और दवाइयों की व्यवस्था कर दीजिए। हमारे स्कूल बनवा दीजिए और अध्यापकों की व्यवस्था कर दें। हमें जंगल और जमीन दे दें। हमें कंपनी नहीं चाहिए। कंपनी का खात्म कर दीजिए। यह बात हम पिछले 13 सालों से लगातार कह रहे हैं मगर सरकार है कि सुनती ही नहीं है।’
भारत पहले से ही एक अति-विकसित देश है और इन यूरोपीय कंपनियों के यहां आने के पहले भी था। जनता के बुनियादी अधिकारों और आने वाली पीढिय़ों के लिए पर्यावरण की सुरक्षा किसी भी विकसित समाज का प्रमाण है। लेकिन उन कानूनों की, जो इन अधिकारों की रक्षा करते थे और जिनका विकास आजादी के बाद के 60 वर्षों में एक लंबी और कष्टप्रद प्रक्रिया के तहत हुआ, अब विदेशों के दबाव की वजह से धज्जियां उड़ रही हैं। जो उद्योग स्थानीय लोगों पर थोपे जा रहे हैं वे टिकाऊ नहीं हैं और इन उद्योगों के क्रियाकलाप निश्चित रूप से किसी भी मायने में विकास को सुनिश्चित नहीं कर रहे हैं।