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भगत सिंह को लेकर कुछ गैरवाजिब चिंताएं : सुधीर विद्यार्थी

क्रान्‍ति‍कारी लेखक सुधीर वि‍द्यार्थी का आलेख-

1. भगत सिंह को अकादमिक चिंतन या बौद्धिक विमर्श की वस्तु न बनाया जाये। यह याद रखा जाना चाहिए कि प्रगतिशील और बुद्धिजीवियों के मध्य चर्चा का बिन्‍दु बनने से बहुत पहले भगतसिंह लोक के बीच नायकत्व हासिल कर चुके थे। उन पर सर्वाधिक लोकगीत रचे और गाये गये। मुझे खूब याद पड़ता है कि अपनी किशोरावस्था में गाँवों में मेलों और हाटों में पान की दुकानों पर आइने के दोनों तरफ और ट्रकों के दरवाजों पर भगतसिंह की हैट वाली तथा चन्द्रशेखर आजाद की मूँछ पर हाथ रखे फोटुएं हुआ करती थीं। शुरुआत में जनसंघ के लोगों ने भी उन्हें इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते हुए बम फेंकने वाले एक बहादुर नौजवान, जो हँसते हुए फाँसी का फंदा चूमता है, के रूप में जिन्‍दा बनाये रखा। प्रगतिशीलों के विमर्श में तो वे बहुत देर से आये। जानना यह होगा कि भगतसिंह या आजाद की जगह लोक के मध्य है। वहीं से दूसरा भगतसिंह पैदा होगा, अकादमीशियनों के बीच से नहीं।

2. इस समय को पहचानिए कि जहाँ बिग बी के साथ भोजन करने की नीलामी दस लाख रुपये तक पहुँच रही हो, जिस समाज में मुन्नी बदनाम होती है तो फिल्म हिट हो जाती है यानी बदनाम होने में अब फायदा है सो इसे हम बदनाम युग की संज्ञा दे सकते हैं, कॉमनवेल्थ खेलों में जहाँ पग-पग पर हमें गुलाम होने का अहसास कराया जाता हो और हम गुलाम रहकर खुशी का अनुभव भी कर रहे हों; इसी कॉमनवेल्थ का तो कवि शंकर शैलेंद्र ने अपने मशहूर गीत ‘भगतसिंह से’ में विरोध किया था जिसमें कहा गया था- मत समझो पूजे जाओगे क्योंकि लड़े थे दुश्मन से/ रुत ऐसी है आँख लड़ी है अब दिल्ली की लंदन से। कामनवेल्थ कुटुंब देश का खींच रहा है मंतर से/प्रेम विभोर हुए नेतागण रस बरसा है अंबर से) तो ऐसे निकृष्ट संस्कृति विरोधी और इतिहास विरोधी समय में हमें बहुत सतर्क रहने की जरूरत है कि भगतसिंह को याद करने अर्थ केवल एक समारोह अथवा प्रदर्शनप्रियता में तब्दील होकर न रह जाये। मैं मानता हूँ कि भगतसिंह को सेमिनारों और जेएनयू मार्का विश्‍वविद्यालयी चर्चाओं से बाहर निकाल कर उन्हें जनता के मध्य ले जाने की पहल करने का उपयुक्त समय भी यही है।

3. मेरा निवेदन है कि भगतसिंह को कृपया देवत्व न सौंपें और न उन्हें क्रान्‍ति‍ का आदिपुरुष बनायें। भगतसिंह कोई व्यक्ति नहीं थे, अपितु उनके व्यक्तित्व में संपूर्ण भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का वैचारिक विकास बोल रहा है। सत्तर साल लम्‍बे क्रान्‍ति‍कारी आंदोलन ने भगतसिंह को पैदा किया। भगत सिंह उस आंदोलन को बौद्धिक नेतृत्व प्रदान करने वाले एक व्यक्ति ही थे। वे स्वयं विकास की प्रक्रिया में थे। कल्पना करिए कि यदि भगतसिंह की जेल में लिखीं चार पुस्तकें गायब न हो गई होतीं तब उनके चिंतन और बौद्धिक क्षमताओं का कितना बड़ा आयाम हमारे सम्मुख प्रकट हुआ होता। दूसरे यह कि आगे चलकर भारतीय क्रान्‍ति‍ के मार्ग पर उन्हें और भी बौद्धिक ऊँचाई हासिल करनी थी। पर इस सबको लेकर उनके मन में कोई गर्वोक्ति नहीं थी,बल्कि एक विनीत भाव से उन्होंने स्वयं सुखदेव को संबोधित करते हुए कहा था कि क्या तुम यह समझते हो कि क्रान्‍ति‍ का यह उद्यम मैंने और तुमने किया है। यह तो होना ही था। हम और तुम सिर्फ समय और परिस्थितियों की उपज हैं। हम न होते तो इसे कोई दूसरा करता। और कितना आत्मतोष था उस व्यक्ति के भीतर जिसने बलिदान से पूर्व यह भी कहा कि आज मैं जेल की चहारदीवारी के भीतर बैठकर खेतों, खलिहानों और सड़कों से इंकलाब जिंदाबाद का नारा सुनता हूँ तो लगता है कि मुझे अपनी जिन्‍दगी की कीमत मिल गई। ….और फिर साढ़े तेईस साल की इस छोटी सी जिन्‍दगी का इससे बड़ा मोल हो भी क्या सकता था।

4. आवश्यक तौर पर देखा यह भी जाना चाहिए कि भगतसिंह के साथ पूरी क्रान्‍ति‍कारी पार्टी थी। हम पार्टी और संपूर्ण आंदोलन को क्यों विस्मृत कर जाते हैं। हम यह क्यों नहीं याद रखते कि भगत सिंह के साथ चन्द्रशेखर आजाद का सर्वाधिक क्षमतावान और शौर्यमय नेतृत्व था। क्या भारतीय क्रान्‍ति‍कारी आंदोलन का मस्तिष्क कहे जाने वाले कामरेड भगवतीचरण वोहरा पार्टी के कम महत्वपूर्ण व्यक्ति थे जिन्होंने बम का दर्शन जैसा तर्कपूर्ण और बौद्धिक प्रत्युत्तर देने वाला पर्चा ही नहीं लिखा, बल्कि नौजवान भारत सभा और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन के घोषणापत्र आदि उन्होंने लिपिबद्ध किये। हमने विजय कुमार सिन्हा, जिन्हें दल में अंतरराष्ट्रीय संपर्कों और प्रचार-प्रसार की बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी, को भी हमने भुलाने योग्य मान लिया। यह सच है कि हम विजय दा से भगतसिंह की एक फुललेन्थ की जीवनी की अपेक्षा कर रहे थे जो उनेक जीवित रहते पूरी नहीं हो पाई। पर मेरा यहाँ जोर देकर कहना यह है कि हमने बटुकेश्‍वर दत्त से लेकर सुशीला दीदी, धन्वंतरि, सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य मास्टर रुद्रनारायण सिंह आदि सबको भुलाने देने में पूरी तरह निर्लज्जता का परिचय दिया। हमने इनमें से किसी की शताब्दी नहीं मनाई। यह सब स्वतंत्र भारत में जीवित रहे पर हमने इनमें से किसी क्रान्‍ति‍कारी की खैर खबर नहीं ली। क्या पूरी पार्टी और उसके सदस्यों के योगदान और अभियानों को विस्मृत करके अपनी समारोहप्रियताओं के चलते भगतसिंह को हम उस तरह का तो नहीं बना दे रहे हैं- उतना ऊँचा और विशाल, जिसकी तस्वीर को फिर अपने हाथों से छूना मुश्किल हो जाये हमारे लिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम अपनी आत्ममुग्धताओं में ही डूबे यह सब देख समझ ही न पा रहे हों। इससे भविष्य के क्रान्‍ति‍कारी संग्राम को बड़ा नुकसान होगा क्योंकि इतिहास के परिप्रेक्ष्य में संघर्ष की पूरी और सही तस्वीर को देख पाने में हम सर्वथा असमर्थ होंगे।

5. भगतसिंह के स्मरण के साथ एक खतरा यह भी है कि पिछले कुछेक वर्षों से हम देख रहे हैं कि उन्हें पगड़ी पहनाने का षड्यन्त्र बड़े पैमाने पर किया जाने लगा है। पर पंजाब के उस क्रान्‍ति‍कारी नौजवान का सिर इतना बड़ा हो गया कि अब उस पर कोई पगड़ी नहीं पहनाई जा सकती है। हम वैसा भ्रम भले ही थोड़ी देर को अपने भीतर पाल लें। यद्यपि शताब्दी वर्ष पर तो यह खुलेआम बहुत बेशर्मी के साथ संपन्न हुआ। देखा जाये तो हुआ पहले भी था जब मैं पंजाब के मुख्यमंत्री श्री दरबारा सिंह के आमंत्राण पर 1982 में चण्डीगढ़ में उनसे मिलने आया तो देखा कि उनके कार्यालय में भगतसिंह का जो चित्र लगा है उसमें उन्हें पगड़ी पहनाई गई है। अब विडंबना देखिए कि कोई आज उस पगड़ी को केसरिया रंग रहा है तो कोई लाल। इसमें आरएसएस से लेकर हमारे प्रगतिशील मित्र तक किसी तरह पीछे नहीं हैं। एक सर्वथा धर्मनिरपेक्ष क्रान्‍ति‍कारी शहीद को धर्म के खाँचे में फिट किये जाने की कोशिशों से सवधान रहना चाहिए। यहाँ अपनी बात कहने का हमारा अर्थ यह भी है कि सब भगतसिंह को अपने अपने रंग में रंगने का प्रयास कर रहे हैं। कोई कहता हे कि वे जिन्‍दा होते तो नक्सलवादी होते। उनके परिवार के ही एक सदस्य पिछले दिनों उन्हें आस्तिक साबित करने की असफल कोशिशें करते रहे। यह कह कर कि भगतसिंह की जेल नोटबुक में किसी के दो शेर लिखे हुए हैं जिनमें परवरदिगार जैसे शब्द आए हैं जो उनकी आस्तिकता को प्रमाणित करते हैं। सर्वाधिक तर्कहीन ऐसे वक्तव्यों की हमें निंदा ही नहीं, अपितु इसका विरोध करना चाहिए। यादविन्दर जी को भगतसिंह का लिखा ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ जैसा आलेख आँखें खोल कर पढ़ लेना चाहिए। मैं यहाँ निसंकोच यह भी बताना चाहता हूँ कि दूसरे राजनीतिक दल भी बहुत निर्लज्ज तरीके से इस शहीद के हाथों में अपनी पार्टी का झण्‍डा पकड़ाने का काम करते रहे जो कामयाब नहीं हुआ। धार्मिक कट्टरता और पुनरुत्थानवाद के इस युग में भगत सिंह की वास्तविक धर्मनिरपेक्षता की बड़ी पैरोकारी की हम सबसे अधिक जरूरत महसूस करते हैं। लेकिन ऐसे में जब गाँधी और जिन्ना को भी डंके की चोट पर धर्मनिरपेक्ष बताया जा रहा हो, और भाजपा के अलंबरदार स्वयं को खालिस और दूसरों को छद्म धर्मनिरपेक्ष बताते हों तब वास्तविक धर्मनिरपेक्षता जो नास्तिकता के बिना सम्‍भव नहीं है, उसका झण्‍डा कौन उठाए? यह साफ तौर पर मान लिया जाना चाहिए कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ सर्वधर्मसमभाव कतई नहीं है जैसा कि हम बार-बार, अनेक बार प्रचारित करते और कहते हैं। यह हमारा सर्वथा बेईमानी भरा चिंतन है जिसका पर्दाफाश किया जाना चाहिए। विचार यह भी किया जाना चाहिए कि धर्मनिरपेक्षता आखिर कितनी तरह की? रघुपति राघव राजाराम जपने वाले गाँधी भी धर्म निरपेक्ष थे, मजहब के नाम पर मुस्लिम होमलैंड ले लेने वाले जिन्ना भी धर्मनिरपेक्ष थे और भगतसिंह भी। तब इनमें से कौन सही धर्मनिरपेक्ष है, और धर्मनिरपेक्षता आखिर है क्या बला?

6. इधर भगतसिंह को संसद का पक्षधर साबित करने के भी प्रयत्न हुए और हो रहे हैं। संसद में भगतसिंह का चित्र या मूर्ति लगवाने का क्या अर्थ है। जिस संसदीय चरित्र और उसकी कार्यवाहियों के विरोध में उन्होंने, दल के निर्णय के अनुसार पर्चा और बम फेंका, क्या आज उस संसद और उसके प्रतिनिधियों की चाल-ढाल और आचरण बदल कर लोकोन्मुखी और जनपक्षधर हो गया है। यदि नहीं तो क्यों भगतसिंह पर काम करने वाले उन पर पुस्तकें जारी करवाने के लिए किसी सांसद अथवा मंत्री की चिरौरी करते हुए दिखाई पड़ते हैं। क्या हम वर्तमान संसदीय व्यवस्था के पैरोकार या पक्षधर होकर भगतसिंह को याद कर सकते हैं। आखिर क्यों भगतसिंह की शहादत के 52 वर्षों बाद उनकी बहन अमर कौर को भारत की वर्तमान संसद के चरित्र और उसकी कार्यप्रणाली पर उँगली उठाते हुए वहाँ घुसकर पर्चे फेंकने पड़े, जिसमें उठाए सवालों पर हमें गौर करना चाहिए। पर इस मुक्त देश में पसरा ठंडापन देखिए कि किसी ने भी 8 अप्रैल 1983 को अमर कौर की आवाज में आवाज मिलाकर एक बार भी इंकलाब जिंदाबाद बुलंद नहीं किया, जबकि यह दर्ज रहेगा कि इसी गुलाम देश ने तब भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त के स्वर में अपना स्वर बखूबी मिला दिया। जानने योग्य यह भी है कि पिछले दिनों संसद में भगतसिंह की जो प्रतिमा लगी उसमें वे पगड़ी पहने हुए हैं और वहाँ उनके साथ बम फेंकने वाले उनके अभिन्न बटुकेश्‍वर दत्त नदारद हैं।

7. जरूरी है कि भगतसिंह को याद करने और उनकी पूजा या पूजा के नाटक में हम फर्क करें। आज सारे जनवादी और प्रगतिशील राजनीतिक व सांस्कृतिक सामाजिक संगठन भगतसिंह को याद कर रहे हैं। दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी भी। यह चीजों को घालमेल करने की घिनौनी कोशिशें हैं ताकि असली भगतसिंह अपनी पहचान के साथ ही अपना क्रान्‍ति‍कारित्व भी खो बैठें। आखिर क्या कारण है कि भगतसिंह आज तक किसी राजनीतिक पार्टी के नायक नहीं बन पाए। यह सवाल बड़ा है कि आजाद की शहादत के बाद हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ को पुनर्जीवित करने के कितने और कैसे प्रयास हुए और वे कामयाब नहीं हुए तो क्यों? और क्यों आजादी के बाद कोई राजनीतिक दल हिसप्रस का झण्‍डा पकड़ने का साहस नहीं कर सका?

8. विचार यह करिए कि अब भावी इंकलाब का आधार क्या होगा। आजाद के नेतृत्व में भगतसिंह और दूसरे सारे युवा क्रान्‍ति‍कारी अधिकांशतः मध्यवर्ग से आए थे। आज पूँजीवादी व्यवस्था और बाजार के अनापशनाप विस्तार ने मध्यवर्ग को नागरिक से उपभोक्ता में तब्दील कर दिया है। नई पीढ़ी पूरी तरह कैरियर में डूबी है। उसके सपनों में अब देश और समाज नहीं है। वहाँ नितांत लिजलिजे व्यक्तिगत सपनों की कंटीली झाडि़याँ उग आई हैं। समाज टूट रहा है तो सामाजिक चिंताएं कहाँ जन्मेंगी। निम्न वर्ग जिन्‍दगी जीने की कशमकश में डूबा रह कर दो जून की रोटी मुहैया नहीं कर पा रहा है तो दूसरी ओर उच्च वर्ग क्रान्‍ति‍ क्यों चाहेगा? क्या अपने विरुद्ध? ऐसा तो सम्‍भव ही नहीं है। तब फिर क्रान्‍ति‍ का पौधा कहाँ पनपेगा और उसे कौन खाद-पानी देगा। यह बड़ा सवाल हमारे सामने मुँह बाये खड़ा हुआ है और हम हवा में मंचों पर क्रान्‍ति‍ की तलवारें भाँज रहे हैं। हम जो थोड़ा बहुत क्रान्‍ति‍ के नाम पर कुछ करने की गलतफहमियाँ पाल रहे हैं, क्या वह हमारा वास्तविक क्रान्‍ति‍कारी उद्यम है। कौन जानता है हमें। जिनके लिए क्रान्‍ति‍ करने का दावा हम करते रहे हैं, वे भी हमसे सर्वथा अपरिचित हैं। आप जेएनयू के किसी एअरकंडीशंड कमरे में तीसरी मंजिल पर बैठकर तेरह लोग क्रान्‍ति‍ की लफ्फाजी करेंगे तो देश की जनता आपको क्यों पहचानेगी। याद रखिए कि जेएनयू देश नहीं है। पूछिए इस मुल्क के लोगों से छोटे शहरों, कस्बों, देहातों में जाकर अथवा सड़क पर चलते किसी आम आदमी को थोड़ा रोककर इन बौद्धिक विमर्श करने वाले लोगों के बारे में पूछिए तो वह मुँह बिचकाएँगे। वे तो इनमें से किसी को भी जानते बूझते नहीं। तो आप कर लीजिए क्रान्‍ति‍। इस देश की साधारण जनता आपसे परिचित नहीं है। न आप उसके साथ खड़े हैं, न ही वह आपके साथ। ऐसे में क्या आप जनता के बिना क्रान्‍ति‍ करेंगे? लगता है कि इस देश में अब थोड़े से हवा हवाई लोग ही क्रान्‍ति‍ की कार्यवाही को संपन्न करने का ऐतिहासिक दायित्व पूरा कर लेंगे। जनता अब उनके लिए गैरजरूरी चीज बन गई है।

9. आज भाषा का मुद्दा सबसे बड़ा मुद्दा है। यह आजादी के सवाल से गहरे तक जुड़ा हुआ है। अपनी भाषा के बिना आप आजादी की कल्पना नहीं कर सकते। पर आज सब ओर गुलामी की भाषा सिर माथे और उसकी बुलंद जयजयकार। भाषा का मामला सिर्फ भाषा का नहीं होता, वह संस्कृति का भी होता है। भगतसिंह ने यों ही भाषा और लिपि की समस्या से रूबरू होते हुए अपनी भाषाओं की वकालत नहीं की थी। क्या हम अंग्रेजी के बिना एक कदम भी आगे नहीं चल सकते? भाषा आज सबसे अहम मुद्दा है। हम उस ओर से आँखें न मूंदें और न ही उसे दरकिनार करें। भाषा के बिना राष्ट्र अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता।

10. अब तीन अन्य गौर करने वाली बातों पर हम अपना पक्ष और चिंताएं प्रकट करेंगे। वह यह कि आज भी ईमानदारी से भगतसिंह को याद करने वालों को वर्तमान सत्ता और व्यवस्था उसी तरह तंग और प्रताडि़त करती है, जिस तरह साम्राज्यवादी हुकूमत किया करती थी। शंकर शैलेंद्र का ‘भगतसिंह से’ गीत गाने पर संस्कृतिकर्मियों पर यह कह कर प्रहार किया जाता है कि यह गीत 1948 में सरकार ने यह कह कर जब्त किया था कि यह लोकप्रिय चुनी हुई सरकार के विरुद्ध जनता के मन में घृणा पैदा करता है। मैं स्वयं जानना चाहता हूँ कि क्‍या शंकर शैलेंद्र के इस गीत पर से 1948 के बाद से अभी तक सरकारी पाबंदी हटी है अथवा नहीं। यदि ऐसा हुआ है तो कब? दूसरा यह कि कई वर्ष पहले पाकिस्तान की फौज हुसैनीवाला से भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव के स्मारकों को तोड़कर ले गई। हमने क्यों नहीं अब तक उन स्मारकों की वापसी की मांग पाकिस्तान सरकार से की। क्या वह हमारा राष्ट्रीय स्मारक नहीं था। और तीसरा विन्दु यह है कि कुछ वर्ष पहले उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक महोत्सव हुआ था, मेला लगा था। यह तब की बात है जब भगतसिंह पर एक साथ कई-कई फिल्में आई थीं यानी हमारे बॉलीवुड को भी क्रान्‍ति‍ करने का शौक चर्राया था। बाजार और बॉलीवुड में यदि भगतसिंह को बेचा जा सकता है तो इसमें हर्ज क्या है। बाजार हर चीज से मुनाफा कमाना चाहता है। पर मैं यहाँ फिल्मों में भगतसिंह को बेचने की बात नहीं कर रहा, न ही इस बात पर चिन्‍ता प्रकट कर रहा हूँ कि उन्होंने तुडुक तुडुक और बल्ले बल्ले करके भगतसिंह जैसे क्रान्‍ति‍कारी नायक को पर्दे पर नाचना दिखा दिया। मैं यहाँ बात कुछ दूसरी कहना चाहता हूँ। लखनऊ के उस मेले में एक रेस्त्रां बनाया गया था जिसका दरवाजा लाहौर जेल की तरह निर्मित किया गया। उसमें बैरों को वह ड्रेस पहनाई गई थी जिसे जेल के भीतर भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव ने पहना था। पानी जो वहाँ परोसा जा रहा था उसे काला पानी का नाम दिया गया था और घिनौनापन देखिए कि खाने के नाम पर स्वराज्य चिकन और काकोरी कबाब। यह हद से गुजर जाना है। लखनऊ एक प्रदेश की राजधानी है–सांस्कृतिक संगठनों और राजनीतिक दलों का केंद्रीय स्थान। पर सब कुछ कई दिनों तक उस जगह ठीक ठाक चलता रहा। कोई हलचल नहीं। कोई विरोध नहीं। क्या हम वास्तव में मर चुके हैं, क्या हमारे भीतर कोई राष्ट्रीय चेतना शेष नहीं है। क्या हमें अपने राष्ट्रीय नायकों और शहीदों का अपमान कतई विचलित नहीं करता। क्या इतिहास के सवाल हमारे लिए इतने बेमानी हो गए हैं कि वे हमारे भीतर कोई उद्वेलन पैदा नहीं करते। कुछ लोग थोड़े वर्षों से तीसरा स्वाधीनता आंदोलन नाम से एक संगठन चला रहे हैं। शहीदेआजम भगतसिंह के दस्तावेजों को सामने लाने लाने का सर्वाधिक महत्वपूर्ण काम करने वाले प्रो. जगमोहन सिंह जी भी उससे जुड़े हैं। पर इस संगठन के चिंतन के प्राथमिक बिन्‍दु पर गौर करिए कि आंदोलन चलाने से पहले ही उसने घोषित कर दिया कि इंडिया गेट को ध्वस्त कर वहाँ शहीदों की बड़ी मीनार बनाना है। क्या यही इस देश का तीसरा स्वतंत्राता युद्ध होगा। कल तक हम अपने बीच बचे रहे जिन्‍दा शहीदों को कोई सम्मान और आदर नहीं दे पाए, उनकी ओर आँख उठाकर भी हमने देखा नहीं, उन्हें ठंडी और गुमनाम मौत मर जाने दिया पर आज उनके ईंट पत्थर के बुत खड़े करने में हमारी गहरी दिलचस्पी है। भगतसिंह को याद करने वाले संगठन कितनी गलतफहमियों में जी रहे हैं यह देखने के लिये आँखों को ज्यादा फैलाने की आवश्यकता नहीं है। क्या यह भी गौर करने लायक सच्चाई और त्रासदी नहीं है कि वामपंथी और साम्यवादी आंदोलन ही नहीं भगतसिंह के अनुयायी कहे जाने वाले लोगों और संस्थाओं ने भी सैद्धांतिक मीनमेख और थोड़े विमर्शों में स्वयं को अधिक उलझा लिया है। उनके बीच निर्लज्ज किस्म की संकीणताएं भी विद्यमान हैं। भगतसिंह का नाम स्वयं को प्रतिष्ठित करने के लिए लिया जाना कतई ठीक नहीं।

(समकालीन तीसरी दुनि‍या/मार्च 2012 से साभार)

भारत का बनेगा क्या : सुधीर सुमन

मुख्यधारा के सिनेमा द्वारा फिल्मों के माध्यम से शहीद भगतसिंह की गलत छवि पेश करने की साजिश को उजागर करे रहे हैं चर्चित लेखक सुधीर सुमन-

मुख्यधारा का हिंदी सिनेमा प्रायः शासकवर्ग की संस्कृति और विचारधारा का  ही प्रचार-प्रसार करता है, अपनी व्यावसायिक बाध्यताओं के कारण वह किसी  क्रांतिकारी विषय या चरित्र को उठाता भी है  तो इतनी सावधानी के साथ कि  शासक वर्ग के लिए वह कोई गंभीर संकट न खड़ा कर दे। गौर से देखें  तो आमतौर पर भारतीय राजनीति और समाज पर जिनका वर्चस्व है- जो शासक वर्ग है,  उसके लिए भगतसिंह की विचारधारा आज भी खतरनाक है। इसके बावजूद इक्कीसवीं सदी की शुरुआत होते ही, पांच-पांच फिल्में बनाने की घोषणाएं हुईं, सन् 2002 में तीन फिल्में प्रदर्शित भी हुईं, जिनमें से धर्मेंद्र और राजकुमार संतोषी द्वारा बनाई गई फिल्में अक्सर देशभक्ति के लिए तय दिवसों को किसी न किसी टीवी चैनल पर दिखाई जाती रही हैं। इनके बाद एक और फिल्म आई- रंग दे बसंती।
भगतसिंह निर्विवाद रूप से आजादी की लड़ाई के सर्वाधिक लोकप्रिय नायक रहे हैं। पोपुलर सिनेमा में गांधी, सावरकर या किसी अन्य चरित्र को लेकर शायद ही कभी ऐसी प्रतिस्पर्धा हुई होगी, जैसी भगतसिंह और उनके साथियों को लेकर  हाल के वर्षों में रही है। बेशक आज देश जिस तरह के संकट से गुजर रहा है, उसमें लोगों की स्वाभाविक आकांक्षा है कि भगतसिंह जैसा राष्ट्रनायक फिर से  पैदा हों। हिंदी सिनेमा इस जनाकांक्षा को भुनाने के चक्कर में ही अचानक  भगतसिंह की जीवन-गाथा की ओर दौड़ पड़ा। लेकिन जिस तरह सर्वव्यापी  भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई और अपराधियों और काले धन वालों के वर्चस्व के तले पीस रही जनता के विक्षोभ को संगठित न होने देने और उसे गलत दिशा में भटका देने के लिए शासक वर्ग सांप्रदायिक, जातिवादी-अंधराष्ट्रवादी उन्माद का सहारा लेता है या ऐसे भूतपूर्व नौकरशाहों, कारपोरेट संतों और राजनेता पुत्रों को नायक के बतौर उभारता है, जो वास्तव में पूंजी की सत्ता का विनाश करने वाले नहीं बल्कि उसके चारण होते हैं, उसी तर्ज पर हिंदी सिनेमा ‘सुपरमैन’ से लगने वाले लड़ाकों को पेश करता है, जो किसी भी समस्या  की मूल वजह नहीं तलाशते, उनके सामने कोई एक दुश्मन रहता है, जिसे खत्म कर देना ही हर समस्या का समाधान होता है। उसके लिए भगतसिंह एक ऐसे ‘ही मैन’ हैं, जो देश के दुश्मन अंग्रेजों से दिलेरी के साथ लड़ते हुए फांसी पर चढ़ गए। भगतसिंह साम्राज्यवाद के खिलाफ राष्ट्रीय मुक्ति के नायक हैं और वे और  उनके साथी एक आधुनिक धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण के लिए राजनैतिक-वैचारिक संघर्ष चला रहे थे, यह तथ्य भगतसिंह पर बनी फिल्मों में  प्रायः नहीं है।
‘राष्ट्रवाद’ की अन्य धाराओं से भगतसिंह और उनके साथियों की जो बहसें थी, जो वैचारिक टकराव थे, वे सामने नहीं आते। भगतसिंह पर बनी फिल्मों में सबसे ज्यादा आपत्तिजनक प्रसंग धर्मेंद्र की फिल्म ‘शहीद: 23 मार्च 1931’ में दिखाई देता है। इसमें भगतसिंह को एक उग्र हिंदू अंधराष्ट्रवादी के रूप में  दिखाया गया है। फिल्म के शुरुआती हिस्से में भगतसिंह जब एक देशभक्ति गीत  गाते हैं तब वहां मंच की पृष्ठभूमि में भारतमाता की जो तस्वीर है, वह आरएसएस द्वारा प्रचारित छवि से मेल खाती है। अकारण नहीं है कि भगतसिंह जो साम्राज्यवाद प्रेरित युद्धों के कट्टर विरोधी थे, उन पर बनी फिल्म को देखते वक्त पाकिस्तान के खिलाफ नारे लगे थे। बॉबी देओल ने बाकायदा एक साक्षात्कार में कहा था- ‘‘भगतसिंह का किरदार निभाने से पता चला कि वे किस मिट्टी के बने थे, वे कितने बुद्धिमान व विचारवान थे और उनके क्या अहसास  थे। अंग्रेज शासकों की तरह पाकिस्तान के खिलाफ भी हम सब भारतीयों को एकजुट  होना चाहिए।’’
‘23 मार्च 1931 शहीद’ में भगतसिंह को हिंदूसभाई लाला लाजपत राय के  अंधअनुयायी की तरह दिखाया गया है। एक लिजलिजी श्रद्धा है, जो भगतसिंह के  व्यक्तित्व से मेल नहीं खाती। इतिहास गवाह है कि भगतसिंह और उनके साथी  लाला लाजपत राय के सांप्रदायिक विचारों के सख्त विरोधी थे। राय की हत्या का प्रतिशोध भावनात्मक कम, राजनीतिक रणनीति अधिक थी। मगर एक दूसरी फिल्म ‘शहीद-ए-आजम’ में भी इसे महज भावनात्मक प्रतिक्रिया के रूप में ही दिखाया गया है। राजकुमार संतोषी की फिल्म ‘लिजेंड ऑफ़ भगतसिंह’ इस मायने में सर्वथा भिन्न है। उसमें भगतसिंह का वैचारिक-राजनैतिक स्टैंड स्पष्ट रूप से सामने आता है। अधिकांश समीक्षकों ने संतोषी की फिल्म को भगतसिंह पर बनी फिल्मों में अधिक तथ्यपरक माना। इसकी वजह यह भी है कि यह पीयूष मिश्रा के नाटक ‘गगन दमामा बाज्यो’ पर आधारित है। इसके गीतों में निहित भावों को एआर  रहमान का संगीत अत्यंत संवेदनात्मक कुशलता से अभिव्यक्त करता है। यह पहली  फिल्म है जो भगतसिंह और उनके साथियों पर पड़े रूसी क्रांति के प्रभावों की ओर संकेत करती है।
अपने शिक्षक विद्यालंकार जी से उनका जब पहले-पहल समाजवादी अवधारणाओं  से परिचय होता है, उस वक्त पृष्ठभूमि में दर्शकों को मार्क्स और लेनिन की तस्वीरें नजर आती हैं। भगतसिंह और उनके साथी समाजवादी हैं, यह तथ्य ‘शहीद-ए-आजम’ में भी है, पर समाजवाद का मकसद क्या है, इसके बारे में यह फिल्म चुप रहती है। संतोषी की फिल्म ‘द लिजेंड ऑफ़ भगतसिंह’ जरूर उस मकसद के बारे में बताती है हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी की प्रसिद्ध फिरोजशाह कोटला मीटिंग के दृश्य में भगतसिंह कहते हैं- ‘‘सिर्फ आजादी हमारा मकसद नहीं है। अगर कांग्रेस की राह से आजादी आ भी गई तो उससे गरीबों, मजदूरों और किसानों की हालत में कोई बदलाव नहीं आएगा। गोरे साहब की जगह भूरे साहब आ जाएंगे और आगे चलकर धर्म और जात-पांत के नाम पर पूरे देश में जो आग  भड़केगी, आने वाली पीढि़यां उसे बुझाते-बुझाते थक जाएंगी। हमारा मकसद इस शोषण करने वाली व्यवस्था को खत्म कर समाजवाद लाना है।’’ इसी मीटिंग में एच.आर.ए. के साथ ‘सोशलिस्ट’ शब्द जुड़ा। इस फिल्म में एच.एस.आर.ए. की बैठकों में क्रांतिकारी एक दूसरे को कामरेड कहकर संबोधित करते हैं। जहां  दूसरी फिल्मों में चंद्रशेखर आजाद को छोड़कर सारे पात्र भगतसिंह के पिछलग्गू जान पड़ते हैं, वहीं ‘द लिजेंड ऑफ़ भगतसिंह’ में कामरेडों का एक पूरा ग्रुप उभरता है। शिव वर्मा और अजय घोष भी नजर आते हैं।
आमतौर पर असेंबली में बम फेंकने की साहसपूर्ण कार्रवाई की चर्चा के क्रम में लोग यह भूल जाते हैं कि भगतसिंह ने मजदूर हड़तालों को कुचलने के लिए बनाए जा रहे ‘ट्रेड डिस्प्यूट बिल’ के विरोध में बम फेंका था। ‘द लिजेंड ऑफ़  भगतसिंह’ इस मामले में सचेत रही है। फिल्म में अन्यत्र भी भगतसिंह अपनी बातों को किसान-मजदूरों तक पहुंचाने की जरूरत पर जोर देते हैं। मगर  वे कौन सी बातें हैं, वे कैसे विचार हैं, जिनको भगतसिंह किसान-मजदूरों, नौजवानों और बुद्धिजीवियों तक पहुंचाना चाहते थे, उनकी आज क्या प्रासंगिकता है, इस बारे में यह फिल्म भी बहुत कुछ नहीं बताती।
इसके लिए राजकुमार संतोषी को जरूर बधाई देना चाहिए कि भगतसिंह के मंगेतर  वाले प्रसंग को छोड़कर उन्होंने आमतौर पर ऐतिहासिक तथ्यों से कोई खिलवाड़ नहीं किया है। एक ओर जहां सन्नी देओल अपनी फिल्म में पार्टी का नाम तक  नहीं लेते, वहीं संतोषी अपनी फिल्म में उस पार्टी का नाम और सोशलिज्म के  प्रति उसकी आस्था को बेझिझक सामने लाते हैं। अपनी फिल्म के अंत में  स्क्रीन पर दर्शकों के लिए वे एक सवाल छोड़ते हैं- ‘‘भगतसिंह और उनके  साथियों ने अपना जीवन एक आजाद, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए  बलिदान किया। आज भी हम भारत में सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार और शोषण का सामना कर रहे हैं। क्या हमने उनके बलिदान के साथ विश्वासघात नहीं किया?’’ आखिर अंग्रेजी में लिखे इस सवाल का दर्शकों पर कितना असर पड़ता है ? विश्वासघात आखिर किसने किया, रहनुमाओं ने या आमलोगों ने ?
भगतसिंह पूंजीवाद, साम्राज्यवाद, वर्णभेद, सांप्रदायिकता और अंधविश्वास के विरोधी थे। गांधी से उनका टकराव सिर्फ हिंसा-अहिंसा को लेकर नहीं था, जबकि भगतसिंह पर बनी फिल्में कमोबेश उन्हें हिंसा-अहिंसा के प्रतीकों में  तब्दील कर देती हैं। गांधी जी के वर्ग समन्वय और अध्यात्मवाद से भी क्रांतिकारियों का विरोध था। गांधी और लाला लाजपत राय, दोनों बोल्शेविक किस्म की क्रांति के पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि साम्यवादी विचारों के प्रचार से पूंजीपति सरकार के साथ मिल जाएंगे। क्रांतिकारियों ने पूंजीपतियों के सहयोग से चलने वाले संघर्ष पर काफी व्यंग्य भी किया था। उन्होंने तो लाला लाजपत राय पर सरकार के लिए क्रांतिकारियों की मुखबिरी  करने का आरोप भी लगाया था। सरकार कांग्रेस और गांधी जी पर इसलिए मेहरबान  थी कि वे किसी जनक्रांति, खासकर कम्युनिस्ट क्रांति के पक्षधर नहीं थे। अपने ‘महात्मापन’ के प्रति सदैव सचेत रहने वाले गांधी जी ने ‘ऐतिहासिक कलंक’ की आशंका के बावजूद अगर भगतसिंह को बचाने के लिए कुछ नहीं किया  तो इसकी एकमात्र वजह यही थी। भगतसिंह पर बनाई गई सारी फिल्मों में यह दिखाया गया है कि ब्रिटिश सरकार भगतसिंह को येन-केन-प्रकारेण खत्म कर देना चाहती थी। आखिर क्यों ? सिर्फ इसलिए नहीं कि भगतसिंह साम्राज्यवाद के खिलाफ आजीवन  समझौताविहीन संघर्ष चलाने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ थे, बल्कि इसलिए कि वे क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन विकसित करना चाहते थे। गुप्तचर ब्यूरो के तत्कालीन निदेशक डेविड पेट्रिक की रिपोर्ट में भी कम्युनिज्म के प्रति सरकार के खौफ को महसूस किया जा सकता है।
साम्राज्यवादियों को आज भी कम्युनिज्म बर्दाश्त नहीं होता। उनकी पिट्ठू सरकारें आज भी कम्युनिज्म के भय से कांपती हैं। अपने देश की सरकारों की साम्राज्यवादपरस्ती तो जगजाहिर है। 2002 में जब ये फिल्में प्रदर्शित हुईं, तब फिल्म सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष ने भगतसिंह द्वारा लेनिन की जीवनी  पढ़ने पर इसलिए एतराज किया था कि कहीं लोग यह न मान लें कि वे वामपंथी विचारधारा के थे। उनका बयान था कि ‘‘हम नहीं चाहते कि दूसरे राष्ट्रीय  नेताओं की कीमत पर भगतसिंह की तारीफ की जाए। जहां तक लेनिन का सवाल है, हम रूस का महिमामंडन क्यों करें?’’ मृत्यु के इतने सालों के बाद भी भगतसिंह के विचारों के प्रति शासकवर्ग के खौफ की यह बानगी है। उनके विचारों और जीवन पर केंद्रित किताबें बेचने को भी इस आजाद देश की सरकारों ने गुनाह  ठहराया और लोगों को जेल में डाला। कुछ ऐसे ही हाल देखकर कभी गीतकार शैलेंद्र ने लिखा था- भगतसिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की/देशभक्ति  के लिए आज भी सजा मिलेगी फांसी की। खैर, देखने लायक है कि वे कौन से विचार हैं, जिनके लिए आज भी भगतसिंह को मारने के लिए शासकवर्ग हरसंभव कोशिश करता है। असेंबली बमकांड वाले केस में सेशन कोर्ट में बयान देते हुए उन्होंने कहा था- ‘‘देश को एक आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है और जो लोग इस बात को महसूस करते हैं उनका कर्तव्य है कि साम्यवादी सिद्धांतों पर समाज का पुनर्निमाण करें। जब तक यह नहीं किया जाता और मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण तथा एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का शोषण, जो साम्राज्यशाही के नाम से विख्यात है, समाप्त नहीं कर दिया जाता, तब तक मानवता को उसके क्लेशों से छुटकारा मिलना असंभव है।’’
यह संयोग मात्र नहीं है कि भगतसिंह पर केंद्रित फिल्मों में साम्राज्यवाद के नए हमलों के प्रति कोई चिंता नहीं दिखाई पड़ती। बल्कि बाद में प्रदर्शित ‘रंग दे बसंती’, जिसमें आज के कुछ नौजवान भगतसिंह और उनके साथियों की जिंदगी को जीने की कोशिश करते हैं और एकाध भ्रष्ट नेताओं की हत्या के जरिए बदलाव का सपना देखते हैं, उसमें भी साम्राज्यवाद के साथ भारतीय शासकवर्ग का रिश्ता कहीं नहीं दिखता, बल्कि भ्रष्टाचार और राष्ट्रवाद का भी जो संदर्भ है, वह सेना से ही जुड़ा हुआ है। अब इसका क्या करें कि देशभक्ति का पर्याय बना दी गई सेना के भ्रष्टाचार के किस्से भी अब सरेआम हो चुके हैं। सवाल यह है कि फौज और पुलिस किनके हितों की रक्षा करती है, किनके हितों के लिए सिपाही कुर्बान होते हैं ? पूरे देश को बहुराष्ट्रीय कंपनियों का चारागाह बना देने वाली सरकारें क्या देशभक्त  हैं? भगतसिंह ने कहा था कि ‘‘अगर कोई सरकार जनता को उसके मूलभूत अधिकारों  से वंचित रखती है तो जनता का केवल यह अधिकार ही नहीं, बल्कि आवश्यक  कर्तव्य बन जाता है कि ऐसी सरकारों को समाप्त कर दे।’’ क्या मौजूदा रंग-बिरंगी पार्टियों की सरकारों ने जनता को उनके मूलभूत अधिकारों से  वंचित नहीं कर रखा है ? और क्या जो लोग अपने मूलभूत अधिकारों के लिए लड़  रहे हैं उनको बर्बरता के साथ कुचलने के मामले में  इन सारी सरकारों के बीच एकता नहीं है?
पाकिस्तान विरोधी अंधराष्ट्रवाद का मामला हो या धर्म और सांप्रदायिकता के राजनीतिक इस्तेमाल का, भारत की अधिकांश पार्टियां और सरकारें इससे व्यवहार  में सहमत दिखती हैं, जबकि भगत सिंह इसके प्रबल विरोधी थे। अपने स्वाधीनता आंदोलन की बुनियादी गड़बड़ी का जिक्र करते हुए उन्होंने ‘सांप्रदायिक दंगों और उसका इलाज’ लेख में लिखा है कि ‘‘ऐसे नेता जो सांप्रदायिक आंदोलन  में जा मिले हैं, वैसे तो जमीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं, जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं, और सांप्रदायिकता की ऐसी  बाढ़ आई हुई है कि वे भी उसे रोक नहीं पा रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है।’’ भगतसिंह ने इसीलिए धर्म से राजनीति  को अलग रखने पर जोर दिया और सच्चे इंकलाब और समाजवाद के लिए नास्तिकता के  पक्ष में जोरदार तर्क दिया। बाकुनिन, मार्क्स और लेनिन की नास्तिकता और  सफल क्रांतियों के बीच उन्हें एक सम्बद्धता महसूस होती थी। मगर सिर्फ ‘लिजेंड ऑफ़ भगतसिंह’ फिल्म के भगतसिंह कहते हैं कि रब में उनका यकीन नहीं है। वैसे संतोषी भी नास्तिकता के पक्ष में उनके प्रबल तर्कों को सामने  लाने से कतरा जाते हैं। मजेदार तथ्य यह है कि इसी फिल्म के कैसेट और सीडी  जारी करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने कहा था कि फिल्म देखकर ऐसा लगता है, जैसे भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु का एक बार फिर जन्म हो गया है। बात इतनी ही होती तो कोई बात न थी। लेकिन वे यह भी बताना नहीं भूले कि ‘हमारे देश में पुनर्जन्म पर विश्वास किया जाता है।’ राव यह भी कह सकते थे  कि अभिनेताओं ने जीवंत अभिनय किया है। यह महज लहजे का फर्क नहीं है, यह है पुनर्जन्म में विश्वास और आस्तिकता का आग्रह जिसके कारण एक ओर उग्र  हिंदूवादी भगतसिंह (बाबी देओल/शहीद: 23 मार्च 1931) अपनी मां से पुनर्जन्म की बात करता है तथा बताता है कि भगवान का वास हम सबके भीतर है  और थोड़े उदार किस्म का भगतसिंह (सोनू सूद/शहीद-ए-आजम) आस्तिकता-नास्तिकता के संबंध में कही गई विवेकानंद की उक्ति को दुहराता है, जबकि ऐसा नहीं है कि इन फिल्मों को बनाने वाले भगतसिंह के बहुचर्चित लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं?’ से अनभिज्ञ रहे होंगे।
फिल्मों की तो नहीं,  पर अखबारों की भूमिका की आलोचना करते हुए भगतसिंह ने लिखा था- ‘‘अखबारों का असली कर्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, सांप्रदायिक भावनाएं हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था, लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, सांप्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना, भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है  कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आंसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या?’
विडंबना यह है कि ये फिल्में भगतसिंह के सपनों के विरुद्ध जो भारत बना है, उसकी ओर संकेत कर मौन हो जाती हैं या उस ‘अवांछित भारत’ के लिए जिम्मेवार सामंती-पूंजीवादी, सांप्रदायिक और साम्राज्यवादपरस्त शक्तियों के राष्ट्रवाद के दायरे में ही प्रायः चक्कर लगाती रह जाती हैं। कोई भी फिल्म ‘भारत का बनेगा क्या ?’ यानी भारत के भविष्य, उसके नवनिर्माण के सपनों से  प्रेरित होकर नहीं बनाई गई है। इसलिए इनमें निर्माण की वह ताकत यानी  किसान-मजदूर गायब हैं, जिन्हें संगठित करने का आह्वान भगतसिंह ने नौजवानों से किया था। ‘रंग दे बसंती’ के नौजवानों के सामने से वह वैचारिक-सांगठनिक  पर्सपेक्टिव गायब है। हकीकत में जिन लोगों ने भगतसिंह सरीखी जिंदगी और मौत का चुनाव किया या जो भगतसिंह और उनके साथियों के रास्तों पर चल रहे हैं, उनकी राजनीति की गहराइयों में जाने से व्यावसायिक सिनेमा हमेशा गुरेज करता है। जेएनयू के पूर्व अध्यक्ष और भाकपा-माले के नेता चंद्रशेखर के जीवन पर संभावित फिल्म के बहाने समकालीन जनमत के मार्च 2011 के अंक में कविता कृष्णन ने इस सवाल को उठाया है कि क्या व्यावसायिक सिनेमा क्रांतिकारी के  साथ न्याय कर सकता है ? दरअसल आज के सूचना माध्यमों, खासकर तथाकथित लोकतंत्र के चौथे खंभे यानी अखबारों और टीवी चैनलों में जिनकी पूंजी लगी है, उनके हित में जिस तरह से जनांदोलनों और जनराजनीतिक कार्रवाइयों की उपेक्षा की जाती है या उनकी नकारात्मक छवि बनाई जाती है, लगभग उसी तरह का काम हिंदी सिनेमा भी करता है। कहीं क्रांति का कोई नायक, कोई विचार या कोई संगठित आंदोलन जनता को नायक में तब्दील न कर दे, कोई कहानी इंकलाबी उभार की उत्प्रेरक न बन जाए, इसका फिल्मकार प्रायः ध्यान रखते हैं।

भगत सिंह : सिनेमाई छवि से परे सच्‍चाई : मीरा विश्‍वनाथन

एक साजिश के तहत भगत सिंह की बॉलीवुड अभिनेता जैसी छवि बनाई जा रही है, जिसका मकसद केवल पिस्‍तौल लेकर अंग्रेजों को मार भगाना था। भगत सिंह की राजनीतिक सोच, जीवन संघर्ष और आज के समय में प्रासंगिकता को लेकर वरिष्‍ठ पत्रकार और लेखिका मीरा विश्‍वनाथन का आलेख-

भगत सिंह को फांसी देने वाले साम्राज्य का सूरज कब का डूब चुका है, लेकिन भगत सिंह की विरासत आज भी जिंदा है। हम आज जिस तरह की दुनिया में रह रहे हैं, जिस तरह के सवालों से जूझ रहे हैं, उसमें उनका काम और उनके विचार और भी ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं।

पिछले कुछ सालों में आश्चर्यजनक रूप से भगतसिंह के प्रति लोगों का नए किस्‍म का रूझान देखने को मिल रहा है। संसद ने उन्हें एक मूर्ति के जरिए ‘अमर’ करने की कोशिश की है, जिसमें वे पगड़ी पहने हुए हैं। संघ परिवार उन्हें आक्रामक राष्ट्रवाद का प्रतिनिधि मानता है, ओपीनियन पोल वाले उन्हें गांधी से भी अधिक महान बता रहे हैं। और भला फिल्मों की भरमार को कैसे भूला जा सकता है- कुल पांच फिल्में बनीं। ये सभी फिल्‍में भगतसिंह के जीवन और उनकी शहादत के प्रति समर्पित थीं, जिनमें बॉबी देओल और सनी देओल जैसे अभिनेता व्यर्थ ही अपने शरीर का प्रदर्शन करते हुए देखे गए।

यह पूरा उद्योग भगतसिंह की छवि को भुनाने के लिए आगे आ गया है। कुछ वैसे ही जैसे कि चे ग्वेरा पैकेज करके बेचे जाने वाले उत्पाद में बदल दिए गए। एक तरह का राजनीतिक स्मृति-भ्रंश है जो इस तरह की पैकेजिंग का साथ देता है । भगत सिंह के विचारों को तिरोहित कर उनकी राजनीति को महज एक प्रतीक में बदला जा रहा है। यहां भगतसिंह की शहादत ‘सर्वोच्च बलिदान’ के मूर्त रूप के बतौर मानी जाती है, लेकिन उनके जीवन संघर्ष और उनकी राजनीति को महज एक टोकन के रूप में सीमित किया जा रहा है। इन फिल्‍मों से भगतसिंह की छवि एक ऐसे बॉलीवुड अभिनेता की बनती है जो सरसों के खेतों में ‘रंग दे बसंती’ गा रहा है, फिर पिस्तौल लेकर एक अंग्रेज को मार देता है और ‘भारत माता’ की सेवा में स्वयं फांसी पर लटक जाता है। एक क्रांतिकारी जीवन का महान संघर्ष,  उसका साहस और बलिदान, राजनीतिक शिक्षा की कष्ट-साध्य प्रक्रिया सब कुछ मीडिया द्वारा बनायी सिनेमाई छवि में धुल जाता है।

सिनेमा के जरिए भगत सिंह के जो पाठ प्रस्तुत किए गए उनमें सबसे ज्यादा अपढ़ (सबसे ज्यादा सफल होने के बावजूद) पाठ शायद राकेश ओम प्रकाश मेहरा की फिल्म ‘रंग दे बसंती’ का था। संक्षेप में कहें तो फिल्म की कहानी इस तरह है- एक संघर्षशील ब्रिटिश फिल्म निर्माता को अपने दादा की डायरी मिलती है, जिसमें भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, अशपफाकउल्ला और रामप्रसाद बिस्मिल के जीवन, उनके साहसिक कारनामों और उनकी शहादतों का ब्यौरा है। वह इन क्रांतिकारियों पर फिल्म बनाने के निश्चय के साथ भारत आती है। यहां आकर वह पांच नौजवानों के एक ग्रुप से मिलती है, जो एकदम ही बेपरवाह किस्म के हैं। अपनी फिल्म में काम करने के लिए प्रोत्साहित करने के क्रम में वह डायरी में उल्‍लेखित क्रांतिकारियों के जीवन से उनका परिचय कराती है। इसी दौरान उनके एक दोस्त की मिग हादसे में मौत हो जाती है। इस प्रकिय्रा से गुजरते हुए नौजवान इस समझ पर पहुंचते हैं कि सरकार और भ्रष्‍ट नेता भारत की सभी समस्‍याओं की जड् हैं।

परिणामस्वरूप अपने दोस्त की मौत का बदला लेने के लिए वे रक्षा मंत्री की हत्या कर देते हैं। साथ ही एक रक्षा-उपकरणों के एक भ्रष्‍ट डीलर की भी हत्या कर देते हैं, जो इन पांचों में से ही एक का पिता है। इन हत्याओं का औचित्य बताने के लिए वे ऑल इण्डिया रेडियो के स्टेशन पर कब्जा कर लेते हैं, लेकिन कमांडो उन्हें मार गिराते हैं। वैसे इससे पहले वे सच से पर्दा उठा देते हैं। इन पांचों ‘शहीदों’ की मृत्यु को मीडिया मुद्दा बनाता है और आखिरी दृश्य में एक ‘युवा भारत’ दिखाया गया है, जो इन मौतों के चलते गुस्से में है और कुछ करना चाहता है।

रंग दे बसंती की तारीफ इसके ताजे लुक और ‘युवा अपील’ के चलते हुई। फिल्म के रिलीज होने के महीनों पहले इसका प्रचार हुआ और बहुत से ब्रांड इसके साथ जुड़े, साथ ही इसे गणतंत्र दिवस के दिन रिलीज किया गया था। फिल्म के रिलीज के बाद विभिन्न पुरस्कारों और उनके लिए नामित किए जाने का सिलसिला चला, जिसमें इस फिल्म को आधिकारिक रूप से भारत की तरफ से ऑस्कर के लिए नामित किया जाना भी शामिल था। जिस चीज ने और भी ध्यान खींचा, वह थी मिडिया द्वारा पैदा की गई बहस कि इस फिल्म ने युवा सक्रियता के नए द्वार खोल दिए हैं। चाहे जेसिका लाल या प्रियदर्शिनी मट्टू के लिए न्याय की मांग करते हुए निकलने वाले मोमबत्ती जुलूस हों या फिर आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे मेडिकल कॉलेजों के छात्रा, इन सबको मीडिया ने ‘आर.डी.बी. इफेक्ट’ के रूप में दिखाने की कोशिश की। रंग दे बसंती को इस रूप में प्रस्तुत किया गया कि मानों इसने जनपहलकदमी का नया द्वारा खेला दिया हो।

लेकिन इस फिल्म या इस तरह की अन्य फिल्मों की समस्या यह है कि ये भगतसिंह और उनके साथियों के बारे में जितना बताती हैं, उससे अधिक छिपाती हैं। ये उनकी राजनीति के बारे में कुछ नहीं कहती, सिर्फ उन्हें राष्ट्रवादी के रूप में दिखाती है, जो ब्रिटिश राज को उखाड़ फेंकने से अधिक कुछ नहीं चाहते थे। ये फिल्‍में मध्यवर्ग के भ्रष्टाचार के बारे में गुस्से को सामने लाते हुए यह सुझाती हैं कि यदि भ्रष्ट नेताओं को मार दिया जाए तो देश में सब कुछ दुरुस्त हो जाएगा। भूमण्डलीकृत दौर के लिए कॉरपोरेट द्वारा पैकेज किया हुआ ‘विरोध’ इस बात से पूरी तरह इनकार करता है कि किसी तरह के ढांचागत परिवर्तन की आवश्यकता है। भगतसिंह के साम्राज्यवाद या सांप्रदायिक एजेंडे के बारे में क्या विचार थे, जाति आधारित उत्‍पीड्न के बारे में वे क्या सोचते थे, देश के किसानों और मजदूरों को वे कितना महत्व देते थे, यह सब गायब है। उनकी राजनीति के मार्क्सवादी पहलू को सिरे से खामोश कर दिया गया है।

जिस तरह की सामान्य धरणा बनाई गई है, उसमें बहुत कम लोग यह समझ पाते हैं कि भगतसिंह की राजनीति कितनी विस्तृत और मुखर थी। उनकी जेल नोटबुक में बहुत से लेखकों के पैराग्रापफ नोट किए गए हैं। इनमें मार्क्स-एंगेल्स से लेकर रूसो, देकार्त, स्पिनोजा, मार्क ट्वेन, रवीन्द्रनाथ, दोस्तोयेव्स्की और अरस्तू जैसे लेखकों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है। यह लिस्ट काफी विस्तृत है। किताबों के लिए उनकी भूख तब और भी बढ़ गई, जब वे जेल में थे और अपनी तयशुदा मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे थे। फांसी के लिए ले जाए जाने के कुछ मिनट पहले भी वे लेनिन की किताब पढ़ रहे थे। पंजाब के क्रांतिकारी कवि पाश ने ठीक ही लिखा है कि भगतसिंह ने लेनिन की किताब को जहां पढ़ना छोड़ा था, उसके आगे के पृष्ठों को पढ़ने की जिम्मेदारी आज के भारत के नौजवानों की है।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भगत सिंह के राष्ट्रवाद में छात्रों और नौजवानों को केन्द्रीय भूमिका अदा करनी थी। लेकिन हिंसा की अराजक कार्रवाइयों में उतर पड़ने की जगह उन्होंने अपील की कि छात्रा-नौजवान जनता के बीच और गहरे पैठें, वे मजदूरों की कॉलोनियों और ग्रामीण गरीबों की झोपड़ियों में जाएं। यही वह परंपरा थी जिसने जे.एन.यू. छात्रासंघ के पूर्व अध्यक्ष चंद्रशेखर प्रसाद को क्रांतिकारी जीवन के लिए प्रेरित किया, जो भाकपा (माले) के पूर्णकालिक कार्यकर्ता के बतौर अपने घर सिवान वापस लौटे, जहां माफिया डॉन और राजद के सांसद शहाबुद्दीन के लोगों द्वारा उनकी हत्या कर दी गई। (कुछ समय से हम सुन रहे हैं कि महेश भट्ट चंद्रशेखर प्रसाद पर एक फिल्म बनाने वाले हैं। इसका तो सिर्फ कयास ही लगाया जा सकता है कि बॉलीवुड उनकी राजनीति में से किस चीज को दिखाना चाहेगा।)

भगतसिंह के शुरुआती लेखन में अराजकता और क्रांतिकारी आतंकवाद की तरफ थोड़ा झुकाव है, लेकिन उन्होंने बहुत जल्दी मार्क्सवाद के क्रांतिकारी सारतत्व को आत्मसात कर लिया। उन्होंने एक संगठित कम्युनिस्ट पार्टी की आवश्यकता पर जोर दिया और स्वतंत्रता व समाजवाद के लिए कम्युनिस्ट राजनीति की केन्द्रीयता पर बल दिया। संघर्ष के सभी रूपों के संयोजन की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसविदा दस्तावेज तैयार किया जिसमें चीजों के प्रति सारगर्भित और तर्कसंगत रुख लिया गया है। गांधीवादी संघर्ष के जरिए जनता की बड़े पैमाने पर गोलबंदी की प्रशंसा करते हुए भी उन्होंने कांग्रेस के वर्ग चरित्र का स्पष्ट किया और मजदूरों के राजनीतिकरण की कोशिश के गांधीवादी विरोध के प्रति आगाह किया था। उन्होंने ‘भूरे साहबों’ के राज्य की स्थापना के खतरे के प्रति सचेत करते हुए कहा कि यह केवल साम्राज्यवादी शासन की, एक चेहरे से दूसरे चेहरे की अदलाबदली होगी, जहां बहुसंख्यक भारतीयों, मजदूरों और किसानों का शोषण जारी रहेगा।

आज के दौर में भगतसिंह का संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जब हम देखते हैं कि हमारे भारत के शासकों ने खुद को साम्राज्यवादी और नव-उदारवादी राजनीति की सेवा में अर्पित कर दिया है। हमारी संप्रभुता विदेशी हितों के समक्ष गिरवी रख दी गई है, बड़े-बड़े भूखण्ड कर-मुक्त करके कारपोरेट लूट के लिए भेंट कर दिए गए हैं। जब लोग हक मांगते हैं राज्य अपनी आंखें मूंद लेता है, और जब विरोध करते हैं तो राज्‍य द्वारा लोगों पर कहर बरपाया जाता है। युद़ध की सी स्थिति घोषित कर दी गई है जो ऑपरेशन ग्रीन हंट के नाम से जारी है, जिसके निशाने पर हमारे देश के सबसे गरीब लोग, दलित और आदिवासी हैं। आज भारतीय राज्य विरोध का झंडा उठाने वालों को उसी निर्ममता से गोलियों का निशाना बना रहा है, जैसे उनके उपनिवेशवादी पूर्वज करते थे। ऐसे में हमें भगतसिंह की बातें याद आती हैं। अपनी फांसी के तीन दिन पहले उन्होंने पंजाब के गवर्नर को पत्रा में लिखा था कि-

हम यह कहना चाहते हैं कि युद़ध छिडा हुआ है और यह लडाई तब तक चलती रहेगी जब तक कि शाक्तिशाली व्‍यक्तियों ने भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार कर रखा है- चाहे ऐसे अंग्रेज पूंजीपति हों… या शुद़ध भारतीय पूंजीपतियों द्वारा ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा हो, तो भी इस स्थिति में कोई अंतर नहीं पडता।… परंतु युद़ध चलता रहेगा। हो सकता है कि यह लडाई भिन्‍न–भिन्‍न दशाओं में भिन्‍न–भिन्‍न स्‍वरूप ग्रहण करे। किसी समय यह लडाई प्रकट रूप ले ले, किसी समय गुप्‍त रूप से चलती रहे… । यह आपकी इच्‍छा है कि आप चाहे लडाई के जिस रूप को चुन लें, परंतु यह लडाई जारी रहेगी।… यह युद़ध तब तक समाप्‍त नहीं होगा, जब तक कि समाज का वर्तमान ढांचा समाप्‍त नहीं होता, समाजवादी गणराज्‍य स्‍थापित नहीं होता…। तभी शोषण के सभी रूपों का खात्‍मा होगा और वास्‍तविक और स्‍थाई शांति के युग में मानवता प्रवेश करेगी।

भगत सिंह और उनके साथियों के बारे में बात करना वस्‍तुत इतिहास पर पुनः दावेदारी और उसे अपना बनाने का मसला है। फिल्मों से परे, संसद में प्रतिमा से परे और भारत के शासक वर्ग द्वारा भगत सिंह की विरासत को हजम कर जाने की कोशिशों से भी परे, भगत सिंह की याद जिंदा है। यह कय़यूर और पुन्नप्रा वायलार में जिंदा है। तेभागा, तेलंगाना, नक्सलबाड़ी, श्रीकाकुलम्, भोजपुर और नंदीग्राम में जिंदा है। भगत सिंह हमारे समय के संघर्षों में जिंदा हैं जहां ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ का नारा आज भी गूंजता है।

(जनमत, सितंबर, 2010 से साभार)