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हिंदी बाल साहित्य की 20 सर्वश्रेष्ठ किताबें : प्रकाश मनु

प्रकाश मनु

हिंदी में भी बहुत महत्‍वपूर्ण बाल साहित्‍य लिखा गया है। इस खजाने से बीस मोतियों को चुना है प्रसिद्ध लेखक प्रकाश मनु ने-

1

किताब : कुत्ते की कहानी (उपन्यास)
लेखक : प्रेमचंद
प्रकाशक : संदर्भ प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य : 70 रुपये

हिंदी बाल उपन्यास का यह बड़ा सौभाग्य है कि उसकी नींव रखने का श्रेय उपन्यास सम्राट प्रेमचंद को जाता है। प्रेमचंद की रचना ‘कुत्ते की कहानी’ हिंदी का पहला बाल उपन्यास है। ‘कुत्ते की कहानी’ की भूमिका में प्रेमचंद ने बाल पाठकों को संबोधित करते हुए लिखा है, ‘तुम देखोगे कि यह कुत्ता बाहर से कुत्ता होकर भी भीतर से तुम्हारे ही जैसा बालक है, जिसमें वही प्रेम और सेवा तथा साहस और सच्चाई है, जो तुम्हें इतनी प्रिय है।’ गली में भटकने वाले इस मामूली कुत्ते कल्लू की हिम्मत और बहादुरी की वजह से एक अंग्रेज साहब का ध्यान उस पर गया और देखते ही देखते वह उनका प्यारा और दुलारा दोस्त बन जाता है, जो संकट के समय उनकी जान बचाता है। कई बड़े और हैरतअंगेज कारनामों के बाद, अब उसे साहबों की तरह टेबल पर खाना मिलता है। नौकर-चाकर हमेशा सेवा करने और टहलाने के लिए मौजूद हैं। पर कल्लू सुखी नहीं है। वह महसूस करता है कि अब उसके पास सारे सुख हैं, लेकिन गले में गुलामी का पट्टा बंधा हुआ है और गुलामी से बड़ा कोई दु:ख नहीं है। यह एक दस्तावेजी उपन्यास है जिसमें प्रेमचंद की कलम का जादू मोह लेता है।

2

किताब : बजरंगी-नौरंगी (उपन्यास)
लेखक : अमृतलाल नागर
प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य : 15 रुपये

हिंदी के दिग्गज उपन्यासकार अमृतलाल नागर का ‘बजरंगी-नौरंगी’ एक लाजवाब और जिंदादिली से भरपूर उपन्यास है, जिसमें नागरजी की किस्सागोई का जाना-पहचाना अंदाज अपने पूरे रंग में नजर आता है। असल में बजरंगी और नौरंगी के रूप में उन्होंने जिन पात्रों को लिया है, वे हैं भी बड़े गजब के। बजरंगी और नौरंगी दोनों भाई हैं और दोनों में ऐसी-ऐसी खासियतें हैं कि अपनी-अपनी जगह दोनों ही बेजोड़ हैं। इनमें बजरंगी तो बड़े लहीम-शहीम और ऐसे आदमकद किस्म के पहलवान हैं कि चारों ओर उनके नाम की दुंदुभी बजती है। उपन्यास में बजरंगी पहलवान मायावी किले वाले जादूगर को पछाडऩे निकलते हैं, जिसने सबको आफत में डाल रखा है। वह मायावी राजा इतनी रहस्यमय शक्तियों से पूर्ण है कि उससे लड़ते-लड़ते बजरंगी पहलवान भी विचित्र मुसीबतों में फंस गए तो आखिर उन्हें छोटे भाई नौरंगी को याद करना पड़ा। फिर दोनों प्यारे भाई बजरंगी और नौरंगी मिलकर उस रहस्यमय राजा की रहस्यमयी शक्तियों की काट करते हुए किस तरह उसे पछाड़ते हैं और उस किले में गुलामों की-सी जिंदगी जी रहे लोगों को मुक्ति दिलाते हैं, यह उपन्यास पढ़कर ही जाना जा सकता है। उपन्यास इतनी जानदार भाषा-शैली में लिखा गया है तथा बजरंगी और नौरंगी के चरित्र इतने गजब के हैं कि हिंदी के बाल उपन्यासों में ‘बजरंगी-नौरंगी’ की धज कुछ अलग ही नजर आती है।

3

किताब : पहाड़ चढ़े गजनंदनलाल (कहानी)
लेखक : विष्णु प्रभाकर
प्रकाशक : प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली
मूल्य : 42 रुपये

‘पहाड़ चढ़े गजनंदनलाल’ में हिंदी के दिग्गज साहित्य विष्णु प्रभाकर की बच्चों के लिए लिखी गई बारह चुस्त-चपल कहानियाँ शामिल हैं। इनमें ‘पहाड़ चढ़े गजनंदनलाल’ और ‘दक्खन गए गजनंदनलाल’ एकदम निराली हैं। इन्हें पढ़ते हुए कभी हँसी की फुरफुरी छूट निकलती है तो कभी भीतर कोई गहरा एहसास बस जाता है, जो हमें जिंदादिली से जीने की ताकत देता है। इन कहानियों का नायक गजनंदनलाल है ही ऐसा, जो शरीर से भारी-भरकम होते हुए भी तेज बुद्धि का और बड़ा हरफनमौला है। यों संग्रह की हर कहानी में कुछ ऐसा है जिसमें एक बड़े कथाकार की मंजी हुई लेखनी का स्पर्श मन को मुग्ध करता है।

4

किताब : गीत भारती (कविता)
लेखक : सोहनलाल द्विवेदी
प्रकाशक : प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली
मूल्य : 20 रुपये

सोहनलाल द्विवेदी हिंदी बाल कविता के भगीरथों में से हैं जिन्होंने बाल कविता को हर बच्चे की जुबान तक पहुँचाया। ‘गीत भारती’ में द्विवेदी जी की चुनी हुई बीस सुंदर और अनूठी बाल कवितायें हैं जिनमें बड़ी विविधता और रस है। खासकर ‘अगर कहीं मैं पैसा होता’, ‘सपने में’, ‘नीम का पेड़’, ‘घर की याद’ ऐसी कविताएँ हैं जिनमें बहुत थोड़े शब्दों में जीवन की गहरी बातें उड़ेल दी गई हैं। इसीलिए ये ऐसी निराली और बेमिसाल कविताएँ हैं जिनसे बचपन में दोस्ती हो जाए तो ये जीवन भर साथ चलती हैं, कभी गुदगुदाती तो कभी राह दिखाती हैं।

5

किताब : आटे-बाटे सैर सपाटे (कविता)
लेखक : कन्हैयालाल मत्त
प्रकाशक : सुयोग्य प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य : 125 रुपये

कन्हैयालाल मत्त की निराले अंदाज की बाल कविताओं की लंबे अरसे तक धूम रही है, जिनमें अजब सी मस्ती और फक्कड़ता है। बच्चे आज भी उनकी कविताओं के दीवाने हैं। ‘आटे-बाटे सैर-सपाटे’ मत्त जी की बाल कविताओं का प्रतिनिधि संकलन हैं, जिसमें उनकी 51 चुनिंदा कवितायें हैं। इनमें ‘चल भई काके’, ‘जाड़े का गीत’, ‘चिडिय़ा रानी किधर चली’, ‘आटे-बाटे सैर सपाटे’, ‘चांद का सफर’, ‘पर्वत और गिलहरी’ तथा ‘तोतली बुढिय़ा’ जैसी मजेदार कवितायें हैं जिनमें गजब की लयात्मकता के साथ-साथ बात कहने का अलमस्त अंदाज और हास्य-विनोद की फुहारें बच्चों को खूब रिझाती हैं।

6

किताब : बतूता का जूता (कविता)
लेखक : सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य : 20 रुपये

‘बतूता का जूता’ हिंदी के मूर्धन्य कवि सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की बच्चों के लिए लिखी गई ऐसी कविताओं का संग्रह है जिन्होंने बाल कविता को नया मोड़ दिया। इस छोटी-सी पुस्तक में सर्वेश्वर की अठारह बाल कवितायें हैं, जो अपने समय में खूब चर्चित हुई थीं और आज भी उनका वही जादू बरकरार है। इनमें कई कवितायें तो ऐसी हैं जिन्हें गर्व से विश्व की किसी भी समर्थ भाषा की अच्छी से अच्छी बाल कविता के समकक्ष रखा जा सकता है। ‘इब्नबतूता पहन के जूता/निकल पड़े तूफान में,/थोड़ी हवा नाक में घुस गई/घुस गई थोड़ी नाक में…!’ जैसी पंक्तियों में जादुई लयकारी ऐसी है कि खुद ब खुद हमारा मन उनके साथ थिरकने लगता है।

7

किताब : तीनों बंदर महाधुरंधर (कविता)
लेखक : डॉ. शेरजंग गर्ग
प्रकाशक : आत्माराम एंड संस, दिल्ली
मूल्य : 75 रुपये

‘तीनों बंदर महाधुरंधर’ बच्चों के लिए लिखी गई डॉ. शेरजंग गर्ग की चुनिंदा इक्यावन कविताओं का संग्रह है। इस अनूठे संग्रह में डॉ. गर्ग की सबसे सुंदर और चर्चित कवितायें एक जगह आ गई हैं। ऐसी कवितायें जो अपनी चुस्ती और निराले जादू के कारण भारत के लगभग हर भाग में पहुँची है और हर बच्चे ने जिन्हें पसंद किया। ये ऐसी कवितायें हैं जिन्हें पढ़कर एक समूची पीढ़ी अब युवा हो गई है, पर इन कविताओं का जादू अब भी उतरा नहीं है। एक ओर इस पुस्तक में भोलेपन की मस्ती से भरे सुंदर और छबीले शिशुगीत शामिल हैं, तो दूसरी ओर ‘तीनों बंदर महा धुरंधर’ और ‘यदि पेड़ों पर उगते पैसे’  जैसी कवितायें, जिनमें खेल-खेल में बड़ी बातें सिखाई गई हैं। खूबसूरत ढंग से छपा यह ऐसा संग्रह है जिसे पढऩे का सुख किसी दुर्लभ उपहार को पा लेने जैसा है।

8

किताब : मेरे प्रिय शिशुगीत (कविता)
लेखक : डॉ. श्रीप्रसाद
प्रकाशन : हिमाचल बुक सेंटर, दिल्ली
मूल्य : 250 रुपये

हिंदी में बढिय़ा शिशुगीत लिखने वालों में डॉ. श्रीप्रसाद शीर्ष पर हैं। अपने चुस्त नटखट शिशुगीतों के लिए चर्चित रहे डॉ. श्रीप्रसाद के चुने हुए सुंदर शिशुगीतों का संकलन ‘मेरे प्रिय शिशुगीत’ एक सुखद विस्मय की तरह हैं। ‘मेरे प्रिय शिशुगीत’ में डॉ. श्रीप्रसाद के रंग-रंग के ढेरों शिशुगीत हैं। इनमें ‘भूखा मुझे उठाया है’, ‘दही-बड़ा’, ‘बड़ी बुआ’, ‘लड्डमल पेड़ा सरदार’ जैसे तमाम बढिय़ा खिलदंड़े शिशुगीत भी हैं, जिनके जिक्र के बगैर हिंदी शिशुगीत की चर्चा हो ही नहीं सकती। पुस्तक में ज्यादातर ऐसे शिशुगीत हैं जिनके साथ बच्चे खिलखिलाते हैं और कुछ सीखते भी हैं। बेहद खूबसूरत और सुरुचिपूर्ण ढंग से छपी यह किताब एक मानक की तरह हैं।

9

किताब : सूरज का रथ (कविता)
लेखक : बालस्वरूप राही
प्रकाशक : मेधा बुक्स, दिल्ली
मूल्य : 25 रुपये

एक दौर था जब बालस्वरूप राही की कविताएँ हर बच्चे के होंठों पर नाचती थीं। आज भी उनका वही जादू बरकरार है। यहाँ तक कि बड़े भी उनके रस से भीगते और रीझते हैं। ‘सूरज का रथ’ में राही जी की लीक से अलग हटकर लिखी गई इक्कीस बाल कविताएं हैं जिनमें नई सूझ, नए रंग और कुछ नया ही जादू है। खासकर ‘सूरज का रथ’ इस पुस्तक की ऐसी बेजोड़ कविता है जो सही मायने में अजब, गजब और यादगार है। यों ‘रंग जमाया टीवी ने’, ‘चूहे को निमंत्रण’, ‘लाल किला’, ‘चलती है लू’ समेत संग्रह की हर कविता ऐसी है जिसे पढ़कर बच्चे झूम उठते हैं।

10

किताब : कमलेश्वर के बाल नाटक (नाटक)
लेखक : कमलेश्वर
प्रकाशक : प्रवीण प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य : 150 रुपये

कमलेश्वर के बाल नाटकों का अपना अलग रंग है, जो बच्चों को ही नहीं, बड़ों को भी लुभाता है। ‘पैसों का पेड़’ में उनके समूचे बाल नाटक एक साथ पढऩे को मिल जाते हैं। कमलेश्वर के ये नाटक खेल-खेल में बड़ी बात कहते हैं और बच्चों को सही मायने में समझदार बनाते हैं। ‘पिटारा’, ‘जेबखर्च’, ‘झूठी दीवारें’, ‘डॉक्टर की बीमारी’ नाटक एकदम नए ढंग के हैं और कथ्य, भाषा और अंदाज में बहुत कुछ पुराना तोड़ और छोड़कर बाल नाटकों की एक नई राह बनाने की कोशिश के साथ लिखे गए हैं। खासकर ‘पिटारा’ नाटक इसलिए आकर्षित करता है, क्योंकि ऊपर से हलके-फुलके लगते इस नाटक में बहुत कुछ गंभीर भर दिया गया है। ‘झूठी दीवारें’ में देश की सांस्कृतिक विविधता की मनोरंजक तस्वीर है। हालाँकि पुस्तक का सबसे प्रभावशाली और लाजवाब नाटक है ‘पैसों का पेड़’ जो एक साथ मनोरंजक और प्रेरक भी है। हिंदी में बच्चों के लिए लिखे गए इतने सहज, सफल नाटक कम ही हैं।

11

किताब : गणित देश और अन्य नाटक (नाटक)
लेखक : रेखा जैन
प्रकाशक : रत्नसागर, दिल्ली
मूल्य : 29.90 रुपये

रेखा जैन की गिनती हिंदी के उन सिरमौर नाट्यकर्मियों में की जाती है जिन्होंने बच्चों के साथ खेल-खेल में नाटक लिखे और उन्हें उतने ही अनौपचारिक लेकिन अनूठे अंदाज में पेश किया। उनका पूरा जीवन बाल नाटकों के लिए समर्पित रहा। ‘गणित देश और अन्य नाटक’ में रेखा जी के अलग-अलग रंग और शेड्स के छह बहुचर्चित नाटक है, जिनमें ‘गणित देश’ का तो जवाब ही नहीं। ज्यादातर बच्चे गणित से डरते हैं। पर गणित से डरने वाले उन बच्चों के लिए ऐसा खिलंदड़ा नाटक भी बुना जा सकता है, इसकी कल्पना करना मुश्किल है। इसी तरह ‘माल्यांग की कूची’ में कल्पना और मानवीय करुणा का अनोखा मेल है। ‘स्वाधीनता संग्राम’ में आजादी की लड़ाई की पूरी कहानी एक छोटे से मर्मस्पर्शी नाटक में समेट दी गई है तो ‘रामायण प्रसंग’ में रामकथा को एक सुंदर और रसपूर्ण नाटक की शक्ल में ढाला गया है। रेखा जी के नाटकों का यह ऐसा संग्रह है बच्चे जिसे खोज-खोजकर पढऩा और मंचित करना चाहेंगे।

12

किताब : दूसरे ग्रहों के गुप्तचर (उपन्यास)
लेखक : हरिकृष्ण देवसरे
प्रकाशक : शकुन प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य : 30 रुपये

‘दूसरे ग्रहों के गुप्तचर’ हरिकृष्ण देवसरे का कमाल का जासूसी बाल उपन्यास है, जिसमें वैज्ञानिक फंतासी बहुत करीने से बुनी गई है। उपन्यास का कथा-विन्यास और दृश्य गजब के हैं जो खासी रहस्यात्मकता की सृष्टि करते हैं। उपन्यास की कथा कुल मिलाकर यह है कि किसी दूसरे ग्रह के लोग, जो विज्ञान में यहाँ से काफी ज्यादा उन्नत हैं, जासूसी करने के लिए पृथ्वी पर आते हैं। वे यहाँ एक भव्य होटल स्थापित करते हैं, जो लोगों के लिए किसी आश्चर्यलोक से कम नहीं है। पूरे होटल में आर्डर लेने, खाने-पीने की चीजें लाने, सफाई करने या फिर पैसे लेने के लिए कोई आदमी नहीं है। सारे काम रोबोटों के जरिये होता है। उपन्यास में दो किशोर दोस्त राकेश और राजेश इसका रहस्य जानने के लिए निकलते हैं, तो एक के बाद एक कौतुकपूर्ण घटनायें घटने लगती हैं। देवसरे जी के इस उपन्यास में वैज्ञानिक फंतासी का इतना कमाल का इस्तेमाल हुआ है कि इसे साँस रोककर पढऩा पड़ता है।

13

किताब : घडिय़ों की हड़ताल (उपन्यास)
लेखक : रमेश थानवी
प्रकाशक : एनसीईआरटी, नई दिल्ली
मूल्य : 40 रुपये

रमेश थानवी का उपन्यास ‘घडिय़ों की हड़ताल’ सही मायने में एक प्रयोगधर्मी उपन्यास है, जिसमें हमारा समय और सच्चाइयाँ खुलकर सामने आती हैं। उपन्यास की कथा बहुत संक्षिप्त-सी है। पर उसे इस जिंदादिली से कहा गया है कि ‘घडिय़ों की हड़ताल’ इधर के बाल उपन्यासों में एक यादगार उपन्यास बन गया है। उपन्यास की शुरुआत में ही घडिय़ों की इस अनोखी हड़ताल का जिक्र है जिससे सब जगह हड़कंप मच जाता है और सारे काम रुक जाते है। लोग हैरान होकर देखते हैं कि अरे, यह क्या? घड़ी की सूइयाँ तो आगे बढ़ ही नहीं रहीं! बमुश्किल घडिय़ों की यह हड़ताल खत्म होती है, जिसने जीवन के पहियों की गति को ही रोक दिया था और पूरा देश जैसे थम सा गया था। रमेश थानवी का यह बच्चों के लिए लिखा गया अकेला उपन्यास है, पर यह बेशक बच्चों के मन में अपनी गहरी छाप छोड़ता है।

14

किताब : भोलू और गोलू (उपन्यास)
लेखक : पंकज बिष्ट
प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया
मूल्य : 14.5 रुपये

पंकज बिष्ट के बाल उपन्यास ‘भोलू और गोलू’  में सर्कस में काम करनेवाले एक भालू के बच्चे भोलू और महावत के बच्चे गोलू की दोस्ती है। बड़ी ही प्यारी दोस्ती, जिससे दोनों को ही बड़ी खुशी मिलती है। खासकर भोलू तो गोलू से दोस्ती से पहले एकदम उदास और अनमना रहता है। इतना कि गोलू उसके निकट आया तो उसे देखकर उलटे खीज गया और उसे सबक सिखाने पर उतारू हो गया। पर आखिर भोलू ने गोलू के दिल के प्यार को पहचाना। फिर तो उसके जीवन में एक नया उत्साह और उमंग भर जाती है। सर्कस में अपनी बारी आने पर ऐसे-ऐसे कमाल के खेल वह दिखाता है कि क्या कहें! अंत में यह गोलू की कोशिशों का ही नतीजा है कि भोलू सर्कस से छूटकर जंगल में जा पहुँचता है। उस जंगल में जो सचमुच उसका अपना और बड़ा घर है। वहाँ अपनी मस्ती से जीते हुए भोलू कितना खुश है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं!

15

किताब : मैली मुंबई के छोक्रा लोग (उपन्यास)
लेखक : हरीश तवारी
प्रकाशक : ग्रंथ सदन, दिल्ली
मूल्य : 100 रुपये

हरीश तिवारी का ‘मैली मुंबई के छोक्रा लोग’ हिंदी बाल उपन्यासों के इतिहास में बहुत कुछ नया जोडऩेवाला एक अद्भुत बाल उपन्यास है, जिसमें मुंबई की जिंदगी के सच्चे अक्स हैं। ‘मैली मुंबई के छोक्रा लोग’ उपन्यास का नायक रोज-रोज दुख और अपमान के धक्के खाता झोंपड़पट्टी का एक लड़का है, जिसके भीतर आखिर पढऩे और कुछ कर दिखाने की लौ पैदा हो जाती है। कल की रोटी तक का ठिकाना नहीं है, लेकिन जिद बेमिसाल है। किताबों के लिए उसका प्यार बढ़ता ही जाता है। और आखिर जब वह अपने जीवन की इस कठिन परीक्षा से गुजरकर, अपनी प्रतिभा की धाक जमा लेता है, तो लोग दाँतों तले उँगली दबा लेते हैं। उपन्यास में मुंबई के शोषण और अभावग्रस्त जीवन की बड़ी मार्मिक शक्लें हैं, जो मन पर गहरा असर डालती है।

16

किताब : चिडिय़ा और चिमनी (उपन्यास)
लेखक : देवेंद्र कुमार
प्रकाशक : आकाशदीप पब्लिकेशंस, दिल्ली
मूल्य : 50 रुपये

देवेंद्र का सबसे सशक्त उपन्यास है ‘चिडिय़ा और चिमनी’, जो आज की पर्यावरण की समस्या को इतनी संजीदगी से उठाता है कि उससे बाल उपन्यास को एक नई शक्ति ही नहीं, बल्कि एक अलग पहचान और अर्थवत्ता भी मिल जाती है। ‘चिडिय़ा और चिमनी’ में एक फैक्ट्री है, जिसकी चिमनी से रात-दिन काला धुआँ निकलता रहता है। यह धुआँ इतना खराब और प्रदूषणकारी है कि इससे चिडिय़ा का गला खराब हो जाता है और खाँसी के कारण उसकी हालत लगातार बिगड़ती जाती है। नन्ही चिडिय़ा की यह हालत हाथी दादा से देखी नहीं जाती। आखिर जंगल के सारे जानवर मिलकर उस फैक्ट्री को घेर लेते हैं और चिमनी को तोड़ देना चाहते हैं। मगर फिर समझ में आया कि फैक्ट्री के बंद हो जाने पर सैकड़ों मजदूर बेरोजगार हो जाएँगे। तब एक बढिय़ा तरकीब निकली, जिससे चिडिय़ा और हाथी दादा ही नहीं, जंगल के सभी जानवर खुश हैं। बाल उपन्यास होते हुए भी ‘चिडिय़ा और चिमनी’ की रेंज बड़ी है।

17

किताब : शेरसिंह का चश्मा (कहानी)
लेखक : अमर गोस्वामी
प्रकाशक : वैभवशाली, दिल्ली
मूल्य : 25 रुपये

अमर गोस्वामी की खासी चुस्त-दुरुस्त बाल कथाओं की एक अलग पहचान है, जिनमें हास्य के मनोरम छींटे हैं। ‘शेरसिंह का चश्मा’ उनकी ऐसी ही मजेदार बाल कहानियों का सुंदर और पठनीय संग्रह है। इसमें ‘शेरसिंह का चश्मा’, ‘खुशबू की ताकत’, ‘सुपर पावर से टक्कर’ जैसी कहानियों में शिष्ट हास्य के बड़े सुंदर नमूने हैं। इनमें ‘शेरसिंह का चश्मा’ तो अद्भुत हास्य-कथा है। जंगल के राजा शेर को बुढ़ापे के कारण कुछ कम दिखाई देने लगा। नजर कमजोर हो जाने के कारण वे खरगोश को चूहेराम समझ लेते हैं, ढेंचूराम को डंपी कुत्ता और लाली बंदर को गिलहरी। मगर लाली बंदर आखिर उनके लिए चश्मा ढूँढ़ लाया और शेर के लिए सही नंबर का चश्मा लाने में क्या-क्या कमाल हुए, यह इस बड़ी ही नाटकीय कहानी ‘शेरसिंह का चश्मा’ को पढ़कर जाना जा सकता है। ‘खुशबू की ताकत’ में फूल को नाचीज समझकर हँसने वाले घमंडी हाथी की कैसी दुर्गति होती है, इसे अमर गोस्वामी ने एक मीठी हास्य-कथा में ढालकर सामने रखा है।

18

किताब : शिब्बू पहलवान (उपन्यास)
लेखक : क्षमा शर्मा
प्रकाशक : ईशान प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य : 16 रुपये

क्षमा शर्मा ने बच्चों के लिए खूब लिखा है और खूब रमकर लिखा है। उनके बाल उपन्यासों का अलग ही रंग है। ‘शिब्बू पहलवान’ क्षमा शर्मा का खासा दिलचस्प उपन्यास है, जिसके नायक हैं शिब्बू पहलवान। लेकिन शिब्बू पहलवान सिर्फ पहलवान ही नहीं, वे और भी बहुत कुछ हैं। उपन्यास में शिब्बू पहलवान की बहादुरी और पहलवानी दावँ-पेच के अलावा उनकी दयालुता, सरलता, खुद्दारी और स्वाभिमान की भी एक से बढ़कर एक ऐसी झाँकियाँ हैं, जो मोह लेती हैं। बलवान वे इतने बड़े हैं कि जहाँ भी वे दंगल में जाते हैं, पहला इनाम जीतकर लाते हैं। पर दिल इतना कोमल कि किसी का भी दु:ख-दर्द देख नहीं पाते और उसकी मदद के लिए जी-जान से जुट जाते हैं। उपन्यास का अंत खासा रोमांचक है और देर तक मन पर उसकी छाप बनी रहती है। बेशक शिब्बू पहलवान ऐसा उपन्यास है कि एक बार पढऩे के बाद भुलाया नहीं जा सकता।

19

किताब : एक सौ एक कविताएं (कविता)
लेखक : दिविक रमेश
प्रकाशक : मेट्रिक्स पब्लिशर्स, दिल्ली
मूल्य : 200 रुपये

दिविक रमेश उन कवियों में से हैं जिन्होंने बच्चों के लिए बिल्कुल अलग काट की कवितायें लिखी हैं। पिछले कोई तीन दशकों में लिखी गई उनकी कविताओं में से चुनी हुई एक सौ एक कविताएँ इस पुस्तक में शामिल हैं, जिनमें दिविक की कविता का हर रंग और अंदाज है। यही नहीं, पुस्तक में बहुत-सी कवितायें चकित करती हैं कि अच्छा, बच्चों के लिए भी यह सब कहा जा सकता है और इतनी सहजता से कहा जा सकता है! खासकर ‘घर’, ‘जी करता जोकर बन जाऊँ’, ‘थकता तो होगा ही सूरज’, ‘अगर पेड़ भी चलते होते’, ‘सुंदर माँ का सुंदर गाना’,  ऐसी कवितायें हैं जिनमें बच्चे रमते भी हैं और जिनके जरियें नई दुनिया की नई हकीकतों से भी परिचित होते हैं।

20

किताब : लड्डू मोती चूर के (कविता)
लेखक : रमेश तैलंग
प्रकाशक : ग्लोरियस पब्लिशर्स, नई दिल्ली
मूल्य : 150 रुपये

‘लड्डू मोतीचूर के’ रमेश तैलंग के एक सौ एक शिशु गीतों का अद्भुत गुलदस्ता है। सभी बालगीत ऐसे कि आप पढ़ते जायें और मंद-मंद मुसकराते जाएँ। सभी में बच्चों की दुनिया की कोई अलग शक्ल, अलग बात है। पर साथ ही एक मीठी गुदगुदी भी है, जिससे ये गीत पढ़ते ही हर बच्चे की जबान पर नाचने लगते हैं। रमेश तैलंग एक छोटे से बालगीत में बहुत कुछ कह देने की कला में माहिर हैं। इस संग्रह में शामिल ‘डुगडुग डंडा डोली’, ‘पानी पीने आई चूं-चूं’, ‘निक्का पैसा’, ‘गिरस्थी’, ‘हँसा कीजिए’, ‘लड्डू मोतीचूर के’ और ‘पापा की तनख्वाह’ में पढ़कर तो लगने लगता है कि रमेश तैलंग ने बाल मन का कोना-कोना छान लिया है।

हरिकृष्‍ण देवसरे सहित 24 लेखकों को साहित्‍य अकादेमी बाल साहित्‍य पुरस्‍कार

नई दिल्‍ली : साहित्‍य अकादेमी बाल साहित्य पुरस्कार-2011 की घोषणा कर दी गई है। हिन्‍दी के लिए इस बार हरिकृष्‍ण देवसरे को यह पुरस्‍कार उनके समग्र योगदान के प्रदान किया जाएगा। साहित्‍य अकादेमी की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार त्रिश्‍शूर में 16 अगस्त, 2011 को साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय की अध्यक्षता में अकादेमी के कार्यकारी मंडल की बैठक में विभिन्न भाषाओं के निर्णायक मण्डलों द्वारा चुनी गई 24 पुस्तकों को बाल साहित्य पुरस्कार के लिए अनुमोदित किया गया।

इस वर्ष बाल साहित्य पुरस्कार के लिए सात कविता-संग्रह, छह उपन्यास, पाँच कहानी-संग्रह, एक लोक-कथा एवं नाटक तथा पाँच लेखकों को बाल साहित्य में दिए गए उनके समग्र योगदान हेतु चुना गया है।

भारतीय भाषाओं के नाम, उनके लेखकों और उनकी रचनाओं के नाम-

असमिया / सेउजिया धरनी (उपन्यास)/ बंदिता फूकन
बांग्‍ला / बाल साहित्य में समग्र योगदान हेतु / सेलेन घोष
बोडो / पुराणनि सल फिथिखा (भाग 1-2)(कहानी) / महेश्‍वर नार्ज्‍जारी
डोगरी / बाल साहित्य में समग्र योगदान हेतु / श्‍यामदत्त ‘पराग’
अंग्रेज़ी / द ग्रासहोपर’स रन (उपन्यास) / सिद्धार्थ शर्मा
गुजराती / बाल साहित्य में समग्र योगदान हेतु / (स्व.)रमेश पारिख
हिन्दी / बाल साहित्य में समग्र योगदान हेतु / हरिकृष्‍ण देवसरे
कन्नड / मुलुगादे ओरिगे वंडावरु (लघु-उपन्यास) / एन. डी’सूजा
कश्‍मीरी / नव केंसा मेंसा (कविता एवं कहानी) / गुलाम नबी आतश
कोंकणी / वर्स फुकट वचंक ना (उपन्यास)/ गजानन जोग
मैथिली / जकर नारि चतुर होइ (कहानी) / मायानाथ झा
मलयाम/रुथाक्कुट्टियम माशुम (विज्ञान-उपन्यास)/ के. पापूट्टि
मणिपुरी/ ताल तारेट (लोक-कथा एवं नाटक)/ के. शांतिबाला देवी
मराठी / बोक्या सातबंडे (भाग 4 एवं 5)(लघु-कहानी)/ दिलीप प्रभवलकर
नेपाली / बाल-सुमन (कविता-संग्रह)/ स्नेहलता राई
ओड़िया / बाल साहित्य में समग्र योगदान हेतु / महेश्‍वर मोहांति
पंजाबी / बूझो बच्चेयों मैं हाँ कौन? (भाग 1-3)(कविता)/ दर्शन सिंह आष्‍ट
राजस्थानी / सतोलियो (कहानी)/ हरीश बी. शर्मा
संस्कृत/कौमारम् (कविता)/अभिराज राजेंद्र मिश्र
संताली / सिंगार अखरा (कविता)/ नूहुम हेम्ब्रह्म
सिन्धी/ नयों निरालो जंगल (उपन्यास)/ हुंदराज बलवानी
तमिल / शोलक कोल्लइ बोम्मई (कविता) / एम.एल. थंगप्पा
तेलुगु/उग्गुपाल्लु (कहानी)/ एम. भूपाल रेड्डी
उर्दू/कुल्लियात-ए-आदिल (भाग 1)(कविता)/आदिल असीर देहलवी

चालाक चिडिय़ा और दो गप्पी

ये दो बाल कहानियां मुंशी प्रेमचंद के नाती और वरिष्‍ठ लेखक प्रबोध कुमार से प्राप्‍त हुई हैं। उनका कहना है कि उनकी मां कमला देवी (प्रेमचंद जी की पहली संतान) ये कहानियां बचपन में हम भाई-बहन को सुनाती थीं-

चालाक चिडिय़ा

एक पेड़ पर एक घोंसला था जिसमें चिड़ा और चिडिय़ा की एक जोड़ी रहती थी। एक दिन चिडिय़ा ने चिड़ा से कहा, ‘‘आज मेरा मन खीर खाने को कर रहा है, जाओ जाकर कहीं से चावल, दूध और चीनी ले आओ।’’ चिड़ा ने चिडिय़ा को समझाया, ‘‘आजकल बहुत महंगाई है। लोग चावल खाते नहीं है या कम खाते हैं। चावल लाने में बड़ी मुसीबत है, लोग झट भगा देते हैं। और दूध ? उसका भी मिलना बड़ा कठिन है और मिला भी तो दूध के नाम सफेद पानी ! कहीं ऐसा भी दूध होता है भला- न गाढ़ापन और न चिकनाई ! और चीनी ? अरे बाप रे ! बिल्कुल नदारद, लोग तरस रहे हैं चीने के लिए ! ऐसे में कैसे बनेगी तुम्हारी खीर ?  हाँ, खिचड़ी-विचड़ी बनाना चाहो तो बना लो हालांकि वह भी सरल नहीं है।’’
पर स्त्री की जिद बुरी होती है। चिडिय़ा बोली,  ‘‘नहीं,  खीर ही बनेगी। जाओ इंतजाम करो और नहीं तो दूसरी चिडिय़ा तलाश लो, मैं बाज आई ऐसे कामचोर चिड़ा से। अरे ये झंझट तो रोज की है और इन्हीं के लिए बैठे रहो तो हो गई जिंदगी। मैं रोज तो किसी बड़ी चीज की फरमाइश करती नहीं हूँ। कभी कुछ अच्छा खाने का मन हुआ भी तो तुम ऐसे निखट्टू हो कि वह साध भी पूरी करने में इधर-उधर करते हो। मैं खीर खाऊँगी और आज ही खाऊँगी। अब जाओ जल्दी से और करो सारा इंतजाम। खीर क्या मैं अकेली खाऊँगी, तुम्हे भी तो मिलेगी।’’ अब चिड़ा करे तो क्या करे ! निकला खीर की सामग्री जुटाने। जैसे-तैसे चावल लाया,  दूध लाया और चीनी नहीं मिली तो कहीं से गुड़ ले आया।
चिडिय़ा तो बस खुशी से निहाल हो उठी और लगी चिड़ा को प्यार करने। खैर, खीर पकाई गई। दूध के उबाल की सोंधी महक चिडिय़ा की तो नस-नस में नशा छा गई। खीर तैयार हो जाने पर चिड़ा से कहा, ‘‘थोड़ी ठंडी हो जाए तब हम खीर खाएँगे। तब तक मैं थोड़ा सो लेती हूँ और तुम भी नहा-धोकर आ जाओ। चिड़ा नहाने चला गया तो चिडिय़ा ने सारी खीर चट कर डाली। और फिर झूठ-मूठ में सो गई। नहा-धोकर चिड़ा लौटा तो देखा चिडिय़ा सो रही है। उसने चिडिय़ा को जगाया और कहा, ‘‘मुझे बहुत भूख लगी है, चलो खीर खाई जाए। चिडिय़ा बोली, ‘‘तुम खुद निकालकर खा लो और जो बचे उसे मेरे लिए हांडी में ही रहने दो,  मैं तो अभी थोड़ा और सोऊँगी। आज इतनी थक गई हूँ खीर बनाते-बनाते कि कुछ मत पूछो !’’
चिड़ा ने छोटी-सी खीर की हाँड़ी में चोंच डाली तो खीर की जगह उसकी चोंच में चिडिय़ा की बीट आ गई। सारी खीर खाकर चिडिय़ा ने छोड़ी हाड़ी में बीट जो कर दी थी। चिड़ा गुस्से से चिल्ला पड़ा, ‘‘सारी खीर खाकर और हांड़ी में बीट कर अब नींद का बहाना कर रही हो !’’ चिडिय़ा ने अचरज दिखाते हुए कहा, ‘‘यह तुम क्या कह रहे हो ? मैं तो थकावट के मारे उठ तक नहीं पा रही हूँ और तुम मुझ पर झूठा इलजाम लगा रहे हो ? मैंने खीर नहीं खाई । मुझे क्या पता कौन खा गया। मैं तो खुद अब भूखी हूँ।’’ चिड़ा फिर चिल्लाया,  ‘‘अच्छा, खाओ कसम कि तुमने खीर नहीं खाई।’’ चिडिय़ा बोली,  ‘‘मैं तैयार हूँ। बोलो कैसे कसम खाऊँ।’’ चिड़ा ने कहा, ‘‘चलो, मेरे साथ कुएँ पर चलो तो बताता हूँ।’’ दोनों कुएँ पर गए। चिड़ा ने एक कच्चा, सूत का धाग कुएँ के एक किनारे से दूसरे किनारे तक बाँधा और चिडिय़ा से कहा,  ‘‘इस धागे को पकड़कर इस ओर से उस ओर तक जाओ। यदि तुमने खीर खाई होगी तो धागा टूट जाएगा और तुम पानी में गिर जाओगी। और जो नहीं खाई होगी तो मजे से इस ओर से उस ओर पहुंच जाओगी।’’ चिडिय़ा धागे पर चली। खीर से उसका पेट भरा था। उसने तो सचमुच खीर खाई थी। चिड़ा से वह झूठ बोली थी सो बीच रास्ते में धागा टूट गया और वह धम्म से पानी में जा गिरी। चिड़ा गुस्से में उसे  झूठी,  बेईमान  कहता वहां से उड़ गया और चिडिय़ा पानी में फडफ़ड़ाने लगी।
तभी शिकार की खोज में एक बिल्ली कुएँ पर पहुँची। उसकी नजर चिडिय़ा पर पड़ी वह सावधानी से कुएँ में उतरी और चिडिय़ा को मुँह में दबाकर निकाल लाई। बिल्ली ने अब चिडिय़ा को खाना चाहा। चिडिय़ा तो चालाक थी ही,  झट बोली, ‘‘बिल्ली रानी, अभी मुझे खाओगी तो मजा नहीं आएगा। थोड़ा ठहर जाओ। मुझे धूप में सूखने रख दो,  मेरे पंख सूख जाएँ तब खा लेना। और हाँ, न हो तो तुम भी मेरे पास बैठ जाना। तुम भी गीली हो गई हो। धूप में सूख भी जाओगी और मेरे ऊपर नजर भी रख सकोगी।’’
बिल्ली को चिडिय़ा की बात जँच गई। उसने चिडिय़ा को धूप में सूखने के लिए रख दिया और खुद भी वहीं पास में बैठ धूप का मजा लेने लगी। चिडिय़ा के पंख धीरे-धीरे सूखने लगे। गीले पंख लेकर वह ठीक से उड़ नहीं सकती थी। इसलिए उसने बिल्ली को यह सलाह दी थी। उसने सोचा था, जैसे ही मेरे पंख सूखें और मुझ में उडऩे की शक्ति आई फिर देखूँगी बिल्ली रानी मेरा क्या बिगाड़ सकती है ! इधर बिल्ली सावधान थी। इसकी पूरी नजर चिडिय़ा पर थी, पर वह धूप की गरमाहाट का मजा भी ले रही थी। चिडिय़ा के पंख जब काफी कुछ सूख गए और उसे लगा कि अब वह ठीक से उड़ सकती है तब उसने बिल्ली की ओर नजर फेरी। बिल्ली उसे पूरी तरह सावधान दिखी। उसने बिल्ली से कहा, ‘‘बिल्ली रानी,  मेरे पंख बस सूखने ही वाले हैं। वे सूख जाएँ तो तुम्हें अपनी पसंद का गरम-गरम गोश्त खाने को मिल जाएगा पर हाँ, बिल्ली रानी,  उसके पहले आँखे बंद कर तुम थोड़ी देर भगवान का ध्यान कर लो तो कितना अच्छा रहे ! भगवान का स्मरण कर मुझे खाओगी तो मेरा अगला जीवन सुधर जाएगा और मेरा कल्याण करने से भगवान भी तुमसे बहुत प्रसन्न होंगे।’’ चिडिय़ा की सलाह बिल्ली को अच्छी लगी। उसने आँखें बंद कर लीं और भगवान का स्मरण करने लगी। चालाक चिडिय़ा तो इसी मौके का इंतजार कर रही थी। जैसे ही बिल्ली की आँखें बंद हुईं वह फुर्र से उड़ कर एक पेड़ पर जा बैठी और बोली, ‘‘ बिल्ली रानी, आँखें खोलकर देखा तो सही मेरे पंख कैसे सूख गए ! ’’ बिल्ली ने आँखें खोली तो चिडिय़ा को पेड़ पर बैठी देख उसके गुस्से का ठिकाना न रहा। वह चिल्ला पड़ी,  ‘‘बेईमान, धोखेबाज चिडिय़ा….।’’ लेकिन बिल्ली की गालियाँ सुनने वाला पेड़ पर अब कौन था। चिडिय़ा तो आसमान में चहचहाती इधर-उधर चक्कर लगा रही थी। बिल्ली अपनी मूर्खता पर खिसिया कर रह गई और चिडिय़ा के गोश्त का स्वाद याद करते-करते अपनी जीभ अपने ही मुँह पर फेरने लगी।

दो गप्पी

एक छोटे से शहर में दो गप्पी रहते थे। दूर की हाँकने वाले। अपने को सबसे बड़ा बताने वाले। एक दिन दोनों में ठन गई। देखें कौन बड़ा गप्पी है। शर्त लग गई। जो जीते दो सौ रुपये पाए और जो हारे वह दो सौ रुपये दे।
बात शुरू हुई। गप्पें लगने लगीं। पहला बोला, ‘‘ मेरे बाप के पास इतना बड़ा, इतना बड़ा मकान था कि कुछ पूछो मत। बरसों घूमों,  दिन-रात घूमों पर उसके
ओर-छोर का पता न चले।’’ दूसरे ने कहा, ‘‘सच है भाई, वह मकान सचमुच इतना बड़ा रहा होगा।’’ उसे मालूम था कि पहला गप्पी बिल्कुल झूठ बोल रहा है, लेकिन इस होड़ में यह शर्त थी कि कोई किसी को झूठा नहीं कहेगा, नहीं तो शर्त हार जाएगा। इसीलिए उसे, ‘सच है भाई’, कहना पड़ा।
पहला गप्पी फिर बोला,  ‘‘उस बड़े मकान में घूमना बहादुरों का काम था, कायरों का नहीं। मेरे बाप ने उस मकान को ऐसे बनवाया था- ऐसा, जैसे चीन की दीवार हो। बाप भी मेरे बस दूसरे भीमसेन ही थे- इतने तगड़े, इतने तगड़े कि बस हाँ।
दूसरा गप्पी बोला, ‘‘भाई,  मेरे बाप के पास इतना लम्बा बाँस था कि कुछ पूछो मत- इतना लम्बा कि तुम्हारे बाप के मकान के इस सिरे से डालो तो उस सिरे से निकल जाए और फिर भी बचा रहे। उस बाँस से यदि आसमान को छू दो तो बस छेद हो जाए आसमान में और झर-झर-झर वर्षा होने लगे, पानी की धार लग जाए।’’
पहले गप्पी ने कहा,  ‘‘ठीक है भाई ठीक है, और अब मेरी सुनो- मेरे बाप उस मकान से निकले तो उन्हें मिल गई एक घोड़ी। घोड़ी क्या थी, हिरण बछेड़ा थी। हवा से बातें करती थी- उड़ी सो उड़ी, कहो दुनिया का चक्कर मार आए। हाँ,  तो बाप थे मेरे घोड़ी पर सवार और तभी किसी कौए ने बीट कर दी घोड़ी पर और उग आया उस पर एक पीपल का पेड़। मेरे बाप तो आखिर मेरे बाप ही थे न। अकल में भला कोई उनकी बराबरी कर सकता था। उन्होंने झट पीपल के पेड़ पर मिट्टी डाली और खेत तैयार कर उसमें ज्वार बो दी। अब बिना पानी के ज्वार बढ़े तो कैसे बढ़े ! पानी बरस नहीं रहा था। लोग परेशान थे। फसलें बर्बाद हो रही थीं। बस समझो कि अकाल पड़ गया था, अकाल ! तभी मेरे बाप को वह लम्बा बाँस याद आया जिससे तुम्हारे बाप आसमान में छेदकर पानी बरसाते थे। बस घोड़ी पर सवार मेरे बाप तुम्हारे बाप के घर पहुँच गये और उन्हें पानी बरसाने के लिए मना लिया। फिर क्या कहना था ! जहां-जहां तुम्हारे बाप आसमान में छेद कर पानी बरसाते, वहां-वहां मेरे बाप घोड़ी को ले जाते और जहां-जहां घोड़ी जाती, वहां-वहां पीपल और जहां-जहां पीपल, वहां-वहां ज्वार का खेत। भाई मेरे, कुछ पूछो न ! ऐसी ज्वार हुई, ऐसी ज्वार हुई जैसे मोती- सफेद झक्क और मोटे दाने। ज्वार क्या थी भाई, अमृत था ! अब जो तुम्हारे बाप ने देखी वैसी अजूबा ज्वार तो मचल गए और पांच सौ रुपये की ज्वार लेकर ही रहे। मेरे बाप ने पैसे माँगे तो बोले, ‘अभी मेरे पास नहीं हैं, उधार दे दो।’ मेरे बाप बड़े दरियादिली तो थे ही, उन्होंने उधार दे दी ज्वार। और भाई क्या कहें, तुम्हारे बाप भी बड़े ईमानदार थे। उन्होंने कहा, ‘अगर मैं यह कर्ज न उतार सकूँ तो मेरे बेटे से पूरे पैसे ले लेना। मेरा बेटा बहुत अच्छा है और अच्छे बेटे अपने बाप का कर्ज जरूर अदा करते हैं।’’
दूसरे गप्पी ने यह सूना तो उसकी तो बोलती बंद ! न तो वह,  सच है भाई,  कह सकता था न,  झूठ है,  ही कह सकता था। सच कहता तो पाँच सौ रुपये का कर्ज चुकाना पडे़गा और झूठ कहता तो शर्त हारने के दो सौ रुपये देने पड़ेंगे। मतलब यह कि इधर कुँआ तो उधर खाई। उसने सोचा कुँए से तो खाई ही भली। वह झट बोला, ‘‘झूठ-झूठ-झूठ मेरे बाप ने कभी तुम्हारे बाप से पाँच सौ रुपये की ज्वार नहीं ली।’’ उसका इतना कहना था कि पहला गप्पी बोला, ‘‘मैं जीत गया, लाओ दो सौ रुपये दो।’’ दूसरे गप्पी ने दो सौ रुपये देकर अपनी जान छुड़ाई।

चित्रांकन : प्रगति त्‍यागी, कक्षा-11

रमेश तैलंग के बाल गीत

रमेश तैलंग के शीघ्र प्रकाश्य बाल-गीत संग्रह ‘काठ का घोड़ा टिम्मक टूँसे कुछ नये मनोरंजक बाल-गीत-

माँ जो रूठे

चाँदनी का शहर, तारों की हर गली
माँ की गोदी में हम घूम आए।
नीला-नीला गगन चूम आए।

पंछियों की तरह पंख अपने न थे,
ऊँचे उड़ने के भी कोई सपने न थे,
माँ का आँचल मिला हमको जबसे मगर
हर जलन, हर तपन भूल आए।
नीला-नीला गगन चूम आए।

दूसरों के लिए सारा संसार था,
पर हमारे लिए माँ का ही प्यार था
सारे नाते हमारे थे माँ से जुड़े
माँ जो रूठे तो जग रूठ जाए।
नीला-नीला गगन चूम आए।

अम्माँ की रसोई में

हल्दी दहके
धनिया महके
अम्माँ की रसोई में।

आन बिराजे हैं पंचायत में
राई और जीरा,
पता चले न यहाँ किसी को
राजा कौन फकीरा
सिंहासन हैं ऊँचे सबके
अम्माँ की रसोई में।

आटा-बेसन, चकला-बेलन
घूम रहे हैं बतियाते,
राग-रसोई बने प्यार से
ही, सबको ये समझाते,
रूखी-सूखी से रस टपके
अम्माँ की रसोई में।

थाली- कडुछी और कटोरी
को सूझी देखो मस्ती,
छेड़ रही है गर्म तवे को
दूर-दूर हँसती-हँसती,
दिखलाती हैं लटके-झटके
अम्माँ की रसोई में।

समुंदर की लहरों!

समुंदर की लहरों, उछालें न मारो।
हवाओं का गुस्सा न हम पर उतारो।

बनाएंगे बालू के घर हम यहाँ पर,
जगह ऐसी पाएंगे सुंदर कहाँ पर?

न यू अपनी ताकत की शेखी बघारो,
कभी झूठी-झूठी ही हमसे भी हारो।

हमें तो यहाँ पर ठहरना है कुछ पल,
दिखा लेना गुस्से के तेवर कभी कल,

करो दोस्ती हमसे, बाँहें पसारो।
बहो धीरे-धीरे, थकानें उतारो।

समुंदर की लहरों, उछालें न मारो।

जम्हाई, जम्हाई, जम्हाई, जम्हाई !

दद्दू को आई तो दादी को आई,
जम्हाई, जम्हाई, जम्हाई, जम्हाई!

लगा छूत का रोग जैसे सभी को
मुँह खोले बैठे हैं सारे तभी तो,
करे कोई कितनी भी क्यों न हँसाई।
जम्हाई, जम्हाई,जम्हाई, जम्हाई!

छुपाए न छुपती, रूकाए न रूकती,
बिना बात छाने लगी सब पे सुस्ती,
हमने तो चुटकी भी चट-चट बजाई।
जम्हाई, जम्हाई,जम्हाई, जम्हाई!

हद हो गई अब, दवा कोई देना,
जम्हाई को आ कर भगा कोई देना,
न फिर से हमें घर में दे ये दिखाई।
जम्हाई, जम्हाई,जम्हाई, जम्हाई!

बारिश के मौसम के हैं कई रूप

पिछली गली में झमाझम पानी
अगली गली में है सुरमई धूप
बारिश के मौसम के हैं कई रूप।

माई मेरी, देखो चमत्कार कैसा,
धोखाधड़ी का ये व्यापार कैसा,
किसना की मौसी की टोकरी में ओल,
बिसना की मोसी का सूखा है सूप।

सुनता नहीं सबकी ये ऊपर वाला,
उसके भी घर में है गड़बड़ घोटाला
चुन्नू के घर में निकल गए छाते
मुन्नू के घर वाले रहे टाप-टूप।

बारिश के मौसम के हैं कई रूप ।

वाह, मेरे किशन कन्हाई!

मेट्रो में घूमे न शापिंग मॉल देखा,
मूवी-मूवी देखी न सिनेमाहॉल देखा,
माखन के चक्कर में खाई पिटाई।
वाह मेरे, वाह मेरे किशन कन्हाई!

बाँसुरी की धुन में ही मस्त रहे हर दिन,
काम कैसे चल पाया सेलफोन के बिन ?
थाम के लकुटिया बस गैया चराई।
वाह मेरे, वाह मेरे किशन कन्हाई!

काश कहीं द्वापर में इंटरनेट होता,
ईमेल से सबका कांटेक्ट होता,
गली-गली ढूँढ़ती न फिर जसुदा माई।
वाह मेरे, वाह मेरे किशन कन्हाई!

बाल साहि‍त्य पर हर माह लि‍खेंगे रमेश तैलंग

नई दि‍ल्ली : सुप्रसि‍द्ध साहि‍त्यकार रमेश तैलंग ‘लेखक मंच’ के लि‍ए हर महीने प्रकाशि‍त हुए बाल साहि‍त्य पर आलेख लि‍खेंगे। लेखकों/प्रकाशकों से अनुरोध है कि‍ वह बाल साहि‍त्य से संबंधि‍त नवीनतम प्रकाशि‍त अपनी पुस्तक की दो प्रति‍यां नि‍म्‍न पतों में से कि‍सी पर भी भि‍जवाने का अनुग्रह करें ताकि‍ उनका आवश्‍यकता अनुसार उपयोग कि‍या जा सके।
1. श्री रमेश तैलंग, ए-369 गणेश नगर नंबर-2, शकरपुर, दिल्ली -110092,
ईमेल : rameshtailang@yahoo.com
2. अनुराग, 433, नीति‍खंड- तृतीय, इन्‍दि‍रापुरम, गाजि‍याबाद-201014, उत्‍तर प्रदेश
ईमेल : anuraglekhak@gmail.com

आकर्षित कर रहीं हैं नई बाल-पुस्तकें : रमेश तैलंग

वर्ष 2010 में प्रकाशि‍त बाल साहि‍त्‍य पर सुप्रसि‍द्ध कवि‍ रमेश तैलंग का आलेख-

हर वर्ष की तरह, इस वर्ष भी सैंकड़ों बहुरंगी बाल पुस्तकों ने हिंदी बाल-साहित्य को अपनी नव्यता एवं भव्यता के साथ समृद्ध किया है। चाहे विषयों की विविधता हो या सामग्री की उत्कृष्टता, चित्रों की साज-सज्जा हो या मुद्रण की कुशालता, हर दृष्टि से हिंदी की बाल-पुस्तकें अब अंग्रेजी बाल-पुस्तकों के बरक्स विश्‍वस्तरीय मानदंडों को छू रही हैं। पर, जैसा कि हर बार लगता है, पुस्तकों की कीमत पर एक हद तक नियंत्रण होना अवश्‍य लाजमी है। यदि 48 पृष्ठों की पुस्तक के लिए आपको 150 रुपये खर्च करने पड़ें तो कम से कम हिंदी बाल-पाठकों की जेब पर यह भारी ही पड़ता है।

लेकिन इस बहस में पड़ेंगे तो हरि अनंत हरि कथा अनंता वाली कहावत चरितार्थ हो जाएगी। अतएव हियां की बातें हियनै छोड़ो अब आगे का सुनो हवाल… की डोर पकड़ें तो,  हाल-फ़िलहाल पचास के लगभग नई बाल-पुस्तकें मेरे सामने हैं और उनमें बहुत सी ऐसी हैं जो विस्तृत चर्चा की हक़दार हैं। पर हर पत्रिका की अपनी पृष्ठ-सीमा होती है और इस सीमा के चलते यदि इन बाल पुस्तकों पर मैं परिचयात्मक टिप्पणी ही कर सकूं तो आशा है सहृदय पाठक-लेखक-प्रकाशक अन्यथा नहीं लेंगे।

तो सबसे पहले दो बाल-उपन्यास, जो मुझे हाल ही में मिले हैं। पहला है डॉ. श्री निवास वत्स का गुल्लू और एक सतरंगी ( किताबघर, दिल्ली) और दूसरा है राजीव सक्सेना का मैं ईशान ( बाल शिक्षा पुस्तक संस्थान, दिल्ली)।

श्रीनिवास वत्स एक सक्षम बाल कथाकार हैं और काफी समय से बाल-साहित्य सृजन में सक्रिय हैं। मां का सपना के बाद गुल्लू और एक सतरंगी उनका नया बाल-उपन्यास आया है जिसका मुख्य पात्र यूं तो गुल्लू नाम का बालक है पर उपन्यास की पूरी कथा और घटनाएं सतरंगी नाम के एक अद्भुत पक्षी के चारों ओर घूमती हैं। यह पक्षी मनुष्य की भाषा समझ और बोल सकता है इसीलिए गुल्लू और सतरंगी की युगल-कथा पाठकों को अंत तक बांधे रखती है। 159 पृष्ठों में फैले इस उपन्यास का अभी पहला खंड ही प्रकाशिात हुआ है जो आगे जारी रहेगा। देखना यह है कि आगे के खंड एक श्रंखला के रूप में कितने लोकप्रिय होते हैं। वैसे लेखक ने इसे किसी भारतीय भाषा में लिखा गया प्रथम वृहद् बाल एवं किशोरोपयोगी उपन्यास माना है।

दूसरा उपन्यास- ‘मैं ईशान’ राजीव सक्सेना का प्रयोगात्मक बाल-उपन्यास है। उपन्यास क्या है, ईशान नाम के एक बालक की आत्मकथा है जिसमें उसी की जुबानी उसकी शैतानियां, उसकी उपलब्धियां, उसकी कमजोरियां, और उसकी परेशानियां बखानी गई हैं। संभव है, इसे पढ़ते समय ईशान के रूप में बाल-पाठक अपना स्वयं का चेहरा तलाशने लगें क्योंकि बच्चे तो सभी जगह लगभग एक से ही होते हैं।

कथा-साहित्य के फलक पर ही आगे नजर डालें तो मदन बुक हाउस, नई दिल्ली द्वारा आरंभ की गई मेरी प्रिय बाल कहानियां श्रंखला में पांच सुपरिचित लेखकों की कहानियों के संग्रह इस वर्ष प्रकाशित हुए हैं। ये लेखक हैं- मनोहर वर्मा, यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र,  देवेन्द्र कुमार, भगवती प्रसाद द्विवेदी एवं प्रकाशा मनु। इससे पूर्व डॉ. श्रीप्रसाद की प्रिय कहानियों का संग्रह भी यहां से प्रकाशिात हो चुका है। मेरी समझ में ऐसे संग्रहों का महत्व इसलिए अधिक है कि इनमें लेखकों के शुरुआती दौर से लेकर अब तक की लिखी गई प्रतिनिधि कहानियों का संपूर्ण परिदृशय एक जगह पर मिल जाता है।

इन संग्रहों की यादगार कहानियों में मनोहर वर्मा की नन्हा जासूस, मां का विश्‍वास, चाल पर चाल, लीना और उसका बस्ता, यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र की समुद्र खारा हो गया, एक छोटा राजपूत, टप-टप मोती, साहसी शोभा, भगवती प्रसाद द्विवेदी की फिसलन, भटकाव, गलती का अहसास, छोटा कद-बड़ा पद, देवेन्द्र कुमार की बाबा की छड़ी, मास्टर जी, डाक्टर रिक्शा, पुराना दोस्त, धूप और छाया, प्रकाश मनु की गुलगुल का चांद, आईं-माईं आईं-माईं मां की आंखें, मैं जीत गया पापा के नाम लिए जा सकते हैं।

भगवती प्रसाद द्विवेदी ने फिसलन और भटकाव जैसी कहानियों में किशोरावस्था के ऐसे अनछुए बिंदुओं (योनाकर्षण एवं फिल्मी दुनिया के मायाजाल) को छुआ है जिन्हें बाल-साहित्य में ‘टेबू’ समझ कर छोड़ दिया जाता है।

ऐसा ही एक और कहानी संग्रह डॉ. नागेश पाण्डेय संजय का यस सर-नो सर (लहर प्रकाशन, इलाहाबाद ) है जिसमें उनकी 14 किशोरोपयोगी कहानियां संकलित हैं। नागेश पांडेय ने लीक से हटकर कहानियां/कविताएं लिखी हैं। यही कारण है कि उनकी बाल-कहानियां आधुनिक संदर्भों से जुड़कर पाठकों को बहुत कुछ नया देती हैं।

यहां मैं डॉ. सुनीता के बाल-कहानी संग्रह ‘दादी की मुस्कान’ ( सदाचार प्रकाशन, दिल्ली) की चर्चा भी करना चाहूंगा जिसमें उनकी छोटी-बड़ी 21 मनभावन कहानियां संकलित हैं। गौर से देखें तो सुनीता की कहानियों में जगह-जगह एक गंवई सुगंध या कहें,  एक अनगढ़ सौंदर्य देखने को मिलता है। सुनीता देवेन्द्र सत्यार्थी की तरह अपनी कहानियों में पत्र-शौली, यात्रा-कथा, सामाजिक, ऐतिहासिक जीवन-प्रसंग तथा पारिवारिक संबंधों की जानी-पहचानी मिठास…. सभी कुछ रचाए-बसाए चलती हैं जो पाठकों को एक अलग ही तरह का सुख देता है।

मेरी प्रिय बाल कहानियां के अलावा धुनी बाल-साहित्य लेखक और चिंतक प्रकाश मनु के इधर और भी अनेक कहानी संग्रह इस वर्ष प्रकाशित हुए हैं। यथा- रंग बिरंगी हास्य कथाएं ( शशांक पब्लिकेशन्स, दिल्ली), तेनालीराम की चतुराई के किस्से, बच्चों की 51 हास्य कथाएं, ज्ञान विज्ञान की आशचर्यजनक कहानियां ( तीनों के प्रकाशक डायमंड पाकेट बुक्स, दिल्ली ), अद्भुत कहानियां ज्ञान-विज्ञान की ( कैटरपिलर पब्लिशर्स, दिल्ली), जंगल की कहानियां, ( स्टेप वाई स्टेप पब्लिशर्स, दिल्ली),  चुनमुन की अजब-अनोखी कहानियां ( एवरेस्ट पब्लिशिंग कंपनी, दिल्ली),  सुनो कहानियां ज्ञान-विज्ञान की ( ग्लोरियस पब्लिशर्स, दिल्ली),  रोचक कहानियां ज्ञान-विज्ञान की ( बुक क्राफ्ट पब्लिशर्स, दिल्ली)  । ज़ाहिर है कि प्रकाश मनु न केवल अपने लेखन में गति और नियंत्रण बनाए हुए हैं, बल्कि समकालीन बाल-साहित्य के समूचे परिदृश्‍य पर भी एक पैनी नजर रखे हुए हैं। मैं नहीं जानता, इतने विविध और महत्वपूर्ण बाल कहानी-संग्रह एक साथ एक ही वर्ष में किसी और लेखक के प्रकाशित हुए हैं।

जाने-माने कथाकार अमर गोस्वामी  की 51 बाल कहानियों का एक नया संग्रह ‘किस्सों का गुलदस्ता’ (चेतना प्रकाशन, दिल्ली) भी इधर आया है जिसमें बाज की सीख, घमंडी गुलाब, चुनमुन चींटे की सैर, लौट के बुद्धु के अलावा उनकी मशहूर बाल कहानी शोरसिंह का चशमा भी शामिल है। पाठक इन सभी कहानियों का भरपूर आनंद उठा सकते हैं।

लोक-परक, पौराणिक एवं प्रेरक बाल-कथा साहित्य के अंतर्गत आनंद कुमार की ‘जीवन की झांकिया, ( ट्रांसग्लोबल पब्लिशिंग कंपनी, दिल्ली),  मनमोहन सरल एवं योगेन्द्र कुमार लल्ला द्वारा संपादित भारतीय गौरव की कहानियां, ( बुक ट्री पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली),  हरिमोहन लाल श्रीवास्तव तथा ब्रजभूषण गोस्वामी द्वारा संपादित मूर्ख की सूझ, विष्णु दत्त ‘विकल’ की इंसान बनो, दो खंडों में प्रकाशिात राज बहादुर सिंह की चरित्र निर्माण की कहानियां (सभी के प्रकाशाक एम.एन. पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली),  सावित्री देवी वर्मा रचित इन्सान कभी नहीं हारा,  प्यारे लाल की गंगा तेली, ( दोनों के प्रकाशक-सावित्री प्रकाशन, दिल्ली), राम स्वरूप कौशल की पाप का फल, ( स्वास्तिक प्रकाशन, दिल्ली )  तथा डॉ. रामस्वरूप वशिष्ठ की एक अभिमानी राजा (ओरिएंट क्राफ्ट पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली)  के नाम प्रमुखता से लिए जा सकते हैं।

कथा-साहित्य की तरह ही बाल कविताएं भी अपनी सहजता, मधुरता और सामूहिक गेयता के कारण हमेशा से बच्चों को प्रिय रही हैं।

यह हर्ष की बात है कि इस वर्ष हमारे समय के पुरोधा बालकवि डॉ. श्रीप्रसाद के तीन संग्रह क्रमश: मेरे प्रिय शिशु गीत ( हिमाचल बुक सेंटर, दिल्ली), मेरी प्रिय बाल कविताएं ( विद्यार्थी प्रकाशन, दिल्ली)   और मेरी प्रिय गीत पहेलियां ( सुधा बुक मार्ट, दिल्ली),   एक साथ प्रकाशिात हुए हैं। इन काव्य-संग्रहों में श्रीप्रसाद जी की लंबी बाल-काव्य यात्रा का विस्तृत परिदृश्य अपनी पूरी वैविध्यता के साथ देखा जा सकता है। श्रीप्रसाद जी के अलावा डॉ. प्रकाशा मनु के भी 101 शिशु गीत इधर चेतना प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुए हैं जिनका मजा नन्हे-मुन्ने़ पाठक ले सकते हैं।

शिशु गीतों की बात चली है तो संदर्भवश मैं यहां यह भी उल्लेख करना चाहूंगा कि अंग्रेजी में रेन रेन गो अवे,  ब बा ब्लेकशीप, हिकरी-डिकरी,  जैसे बहुत से ऐसे नरसरी राइम्स हैं जिनके पीछे कोई न कोई ऐतिहासिक, सामाजिक घटना जुड़ी है। जिज्ञासु पाठक यदि चाहें तो,  इन घटनाओं का संक्षिप्त ब्‍योरा www.rhymes.org.uk वेबसाइट पर देख सकते है। हिंदी शिशु गीतों, खासकर जो लोक में प्रचलित हैं, में ऐसे संदर्भों को ढूंढना श्रम-साध्य होने के बावजूद रोचक होगा। क्योंकि कोई भी लेखक या शिशु गीत रचयिता अपने समय से कटकर कुछ नहीं रच सकता।

इस वर्ष जिन अन्य बाल-कविता संग्रहों ने मेरा ध्यान आकर्षित किया है उनमें डॉ. शकुंतला कालरा का हंसते-महकते फूल ( चेतना प्रकाशन, दिल्ली ),   डॉ. बलजीत सिंह का गाओ गीत सुनाओ गीत, डा. शंभुनाथ तिवारी का धरती पर चांद  ( दोनों के प्रकाशक हिंदी साहित्य निकेतन, बिजनौर), प्रत्यूष गुलेरी का बाल गीत ( नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली),   डॉ. आर.पी. सारस्वत के दो संग्रह- नानी का गांव और चटोरी चिड़िया ( दोनों के प्रकाशक नीरजा स्मृति‍ बाल साहित्य न्यास, सहारनपुर),    राजा चौरसिया का अपने हाथ सफलता है ( बाल वाटिका प्रकाशन, भीलवाड़़ा), अजय गुप्त का जंगल में मोबाइल ( श्री गांधी पुस्तकालय प्रकाशन, शाहजहांपुर ), चक्रधर नलिन का विज्ञान कविताएं( लहर प्रकाशन, इलाहाबाद),   और गया प्रसाद श्रीवास्तव श्रीष का वीथिका ( कवि निलय,  रायबरेली) प्रमुख हैं।

डॉ. आर पी सारस्वत अपेक्षाकृत नए बाल कवि हैं पर उनकी बाल-कविता चटोरी चिड़िया की गेयता और उसका चलबुलापन सचमुच चकित करता है। सच कहूं तो बाल-कविता के सामने बहुत सी चुनौतियां हैं जिनमें सबसे बड़ी चुनौती लोकलय एवं पारिवारिक संबंधों की प्रगाढ़ता को बचाए रखने की है।

कवि‍ता के बाद नाटक विधा की बात करें तो बाल नाटकों की इधर दो किताबें मुझे मिली हैं। ये हैं डॉ. प्रकाश पुरोहित की ‘तीन बाल नाटक’ ( राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर) तथा भगवती प्रसाद द्विवेदी की आदमी की खोज ( कृतिका बुक्स इंटरनेशनल, इलाहाबाद),  जिसमें उनके सात बाल एकांकी संग्रहीत हैं।

अन्य विधाओं में मनोहर वर्मा की भारतीय जयन्तियां एवं दिवस ( साहित्य भारती, दिल्ली) महत्वपूर्ण पुस्तक है जिसमें लेखक ने भारतीय महापुरुषों के संक्षिप्त जीवन परिचय के साथ उनकी जयंतियां मनाने का सही तरीका तथा आवश्‍यक उपदानों का रोचक ढंग से वर्णन किया है। जिन पाठकों को महापुरूषों के प्रेरणादयी वचनों के संग्रह में रुचि है उन्हें गंगाप्रसाद शर्मा की पुस्तक 1001 अनमोल वचन (स्वास्तिक प्रकाशन, दिल्ली) सहेजने योग्य लग सकती है। इनके अलावा, जैसा कि सब जानते हैं,  हर वर्ष भारत के कुछ बच्चों को उनके साहस और वीरता भरे कारनामों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जाता है। रजनीकांत शुक्ल ने ऐसे ही राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित सोलह बहादुर बच्चों की सच्ची कहानियां लिखी हैं जो छोटे-बड़े सभी पाठकों को प्रेरणादायी एवं रोमांचकारी लगेंगी।

आध्यात्मिक गुरु, चिंतक एवं वक्ता ओशो ने एक बार कहा था कि जब हम ईश्‍वर से बात कर रहे होते हैं तो वह प्रार्थना कहलाती है और जब हम ईश्‍वर की बात सुन रहे होते हैं तो वह साधना बन जाती हैं। सच कुछ भी हो पर यह तो मानना पड़ेगा कि प्रार्थना हर मनुष्य को आंतरिक शक्ति प्रदान करती है और शायद यही कारण है कि लगभग हर घर, संस्थान, विद्यालय में अलग-अलग समय पर प्रार्थनाएं गाई जाती हैं। ऐसी ही शक्तिदायी प्रार्थनाओं और राष्ट्रीय वंदनाओं का एक रुचिकर संग्रह शान्ति कुमार स्याल का विनय हमारी सुन लीजिए (विद्यार्थी प्रकाशन, दिल्ली)  है जिसमें एक सौ के लगभग प्रार्थनाएं संग्रहीत हैं।

बाल-साहित्य में रुचि रखने वाले बहुत से पाठकों को साहित्यकारों के बचपन और उनके जीवन के बारे में भी जानने की उत्सुकता रहती है। इस संदर्भ में दो पुस्तकों का उल्लेख मैं यहां करना चाहूंगा। पहली पुस्तक है बचपन भास्कर का (साहित्य भारती,  दिल्ली) जिसमें प्रख्यात साहित्यकार रामदरश मिश्र के बचपन के प्रसंग हैं और दूसरी पुस्तक है ‘वह अभी सफ़र में हैं’ ( प्रवाल प्रकाशन, गाजियाबाद) जिसमें जाने-माने बाल-साहित्यकार योगेन्द्र दत्त शर्मा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर मार्मिक लेख हैं। ज्ञातव्य है कि योगेन्द्र दत्त शर्मा के दो बालगीत संग्रह आए दिन छुट्टी के और अब आएगा मजा पहले ही काफी चर्चित हो चुके हैं।

और अंत में चलते-चलते प्रकाशान विभाग नयी दिल्ली से प्रकाशित देवेन्द्र मेवाड़ी की पुस्तक- विज्ञान बारहमासा का उल्लेख करना चाहूंगा जिसमें लेखक ने प्रकृति से जुड़े अनेक सवालों के जवाब सीधे, सरल और सटीक ढंग से दिए हैं। निस्संदेह, देवेन्द्र मेवाड़ी की यह पुस्तक विज्ञान पर लिखी गई महत्वपूर्ण बाल पुस्तकों में अपना यथोचित स्थान बनाएगी।

(आजकल, नवंबर, 2010 में प्रकाशि‍त आलेख के संपादि‍त अंश)

माँ-बेटे के कोमलतम रिश्ते की विरल अनुभूतियों का बयान : रमेश तैलंग

साहित्‍य अकादमी के पहले बाल साहित्‍य पुरस्‍कार से सम्‍मानित कथाकार प्रकाश मनु के बाल उपन्‍यास एक था ठुनठुनिया का अवलोकन कर रहे हैं चर्चित लेखक रमेश तैलंग-

कथा-पुरुष देवेन्द्र सत्यार्थी अक्सर कहा करते थे कि पाठक (आलोचक) को किसी भी कृति का मूल्याँकन लेखक की ज़मीन पर बैठ कर करना चाहिए। सत्यार्थीजी की यह उक्‍ति‍ मुझे इसलिए भी याद आ रही है कि ‘एक था ठुनठुनिया’ को पढ़ते हुए मैं कई बार कई जगह पर फिसला हूँ। शायद यही कारण है कि रचना कई बार पुनर्पाठ की अनिवार्यतः माँग करती है।

सरसरी तौर पर देखें तो एक था ठुनठुनिया एक पितृहीन पाँच साल के बच्चे की साधारण-सी कथा है जो अपनी चंचलता और विनोदप्रियता से अपनी माँ के साथ-साथ पूरे गांव वालों का प्रिय बन जाता है और किशोरावस्था तक पहुँचते-पहुँचते अपनी सूझ-बूझ, कला-प्रवीणता और मेहनत से एक दिन अपनी माँ का सहारा बनकर सफलता की ऊँचाइयाँ हासिल करता है। पर इस साधारण-सी दिखने वाली कथा में कई असाधारण बिंदु गुंफित हैं।

मसलन, पहला बिंदु तो ठुनठुनिया की माँ के ममता भरे उस सपने से जुड़ा है जिसमें वह ठुनठुनिया के बड़े तथा सक्षम होने पर परिवार के भरण-पोषण की समस्या का निदान खोज रही है। पुत्रजन्म के एक साल बाद ही पति का देहावसान किसी भी माँ के लिए बज्राधात से कम नहीं होता खासकर उस गरीब परिवार में जहाँ जीवनयापन का अर्थ सतत संघर्ष के सिवा कुछ और नहीं है- ‘‘बस यही तो मेरा सहारा है, नहीं तो भला किसके लिए जी रही हूँ मैं। ……अब जरूर मेरे कष्ट भरे दिन कट जाएँगे।…… मेरा तो यही अकेला बेटा है ….. लाड़ला! इसी के सहारे शायद बुढ़ापा पार हो जाए।’’

दूसरा बिंदु,  ठुनठुनिया की माँ के मन में पल रहे उस अज्ञात डर का है जो उसे सदैव इस आशंका से आतंकित किए रहता है कि उसका इकलोता बेटा और एकमात्र सहारा ठुनठुनिया अगर किसी कारणवश उससे दूर चला गया तो उसका क्या होगा। क्या वह उसका वियोग सह पाएगी? और एक दिन जब मानिक लाल कठपुतली वाले के साथ ठुनठुनिया सचमुच गाँव छोड़ कर चला जाता है और काफी दिनों तक माँ की सुध नहीं लेता तो माँ का यही डर प्रत्यक्ष हो कर उसके सामने आ खड़ा होता है। पूर्वअध्यापक अयोध्याप्रसाद जब ठुनठुनिया को अपने साथ लेकर गाँव लौटते हैं तो कई दिनों से बीमार पड़ी माँ का अकुलाता हृदय ठुनठुनिया के सामने उपालंभ भरे स्वर में फट पड़ता है- ‘‘बेटा ठुनठुनिया, तूने अपनी माँ का अच्छा ख्याल रखा। कहा करता था-‘माँ, माँ, तुझे मैं कोई कष्ट न होने दूँगा। पर देख, तूने क्या किया?’’

तीसरा बिंदु शैशव और किशोरावस्था के बीच झूलते ठुनठुनिया के उस निश्छल, विनोदप्रिय एवं निर्भीक स्वभाव का है जिसके तहत वह अपने गाँव गुलजारपुर के भारीभरकम सेहत वाले जमींदार गजराज बाबू को हाथी पर सवार देखकर विनोद करता है- ‘‘माँ! माँ! देखो, हाथी के ऊपर हाथी…, देखो माँ,  हाथी के ऊपर हाथी।’’ ठुनठुनिया के विनोदी एवं निर्भीक स्वभाव का वहाँ भी परिचय मिलता है जहाँ वह भालू का मुखौटा लगा कर रात को रामदीन काका सहित बहुत से गाँव वालों को पहले डराता है और कुछ दिनों बाद गाँव के ही एक उत्सव में भालू नाच दिखाने के बाद इस रहस्य का पर्दा भी खोल देता है,  बिना इस भय के कि उसकी इस शरारत के लिए उसे सजा भी मिल सकती है। यह और बात है कि उसे सजा तो नहीं मिलती, गजराज बाबू द्वारा गुलजारपुर के रत्न का खिताब अवश्य मिल जाता है।

यहाँ यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि आमतौर पर बहुत से बच्चों में पढ़ाई से हट कर कंचे खेलने, पतंग उड़ाने, पेंच लड़ाने या कुछ ऐसा कर गुजरने की इच्छा बलवती होती है जो दूसरे न कर सके। ठुनठुनिया इसका अपवाद नहीं। वह भी इन सभी कामों में अपनी महारत सिद्ध करना चाहता है और ऐसा कर भी लेता है । यही नहीं उसकी एक दबी हुई इच्छा यह भी है कि वह पढ़ाई की जगह खिलौने बनाकर या कठपुतली का नाच दिखा कर अपने तथा अपनी माँ के लिए खूब पैसा कमाए। उसकी यही इच्छा उसे पहले रग्घु काका के खिलौने बनाने तथा बाद में मानिक लाल के कठपुतली नचाने की कला के प्रति आकर्षित करती है और अचानक माँ से दूर एक ऐसी दुनिया में ले जाती है जहाँ थोड़ा पैसा और शोहरत तो है पर वह माँ नहीं है जिसकी जिंदगी का हर पल उसी के सहारे टिका हुआ है।

स्कूली शिक्षा से विचलन और कम से कम समय में येन-केन प्रकारेण ज्यादा पैसा कमा लेने की चाह अंकुरण के बाद पल्लवित होती आज की नई पीढ़ी को किस तरह उनके सही लक्ष्‍य तथा अपने प्रियजनों से दूर भटका रही है इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण ठुनठुनिया के चरित्र में देखने को मिलता है।

पर वो कहते हैं न कि अंत भला सो सब भला।

अपने पूर्व अध्यापक अयोध्या प्रसाद के साथ जब ठुनठुनिया आगरा से वापस अपने गाँव गुलजारपुर लौटता है तो उसके जीवन की राह ही बदल जाती है। अब वह दोबारा स्कूल में दाखिला लेकर पढ़ाई में पूरी तरह जुट जाता है और हाईस्‍कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करता है। पढ़ाई के साथ-साथ उसकी क्रियात्मक कलाओं में अभिरुचि तथा प्रवीणता उसे एक दिन कपड़ा फैक्टरी के मालिक कुमार साहब तक पहुँचा देती है जो इंटर पास करने के बाद ठुनठुनिया को उसकी कुशलता तथा विश्वास पात्रता के चलते अपने डिजाइनिंग विभाग में असिस्टेंट मेनेजर की नौकरी दे देते हैं। इस तरह ठुनठुनिया जहाँ अपनी मां गोमती का वर्षों से पाला हुआ सपना पूरा करता है, वहीं गोमती अपने बेटे के लिए उसके अनुरूप बहू भी ढूंढ़ लेती है।

एक था ठुनठुनिया का एक और बेहद मनोरंजक प्रसंग वह है जहाँ ठुनठुनिया अपने दोस्तों के उपहास से तंग आकर अपनी माँ के सामने अपना नाम बदलने की पेशकश रखता है। उत्तर में जब माँ उसे शहर जा कर कोई नया नाम खोज लेने के लिए कहती है तो ठुनठुनिया की कशमकश देखते बनती है। जब वह अशर्फीलाल को भीख माँगते, हरिश्चंद्र को जेब काटते और छदामीमल को सेठ की जिंदगी जीते हुए देखता है तो उसको समझ आ जाती है कि उसे और किसी दूसरे नाम की जरूरत नहीं, वह तो ठुनठुनिया ही भला।

आह वे फुंदने वाले प्रसंग को पढ़कर मुझे राम नरेश त्रिपाठी की कहानी सात पूंछों वाला चूहा स्मरण हो आई। लोक में ऐसी कथाएं अनेक रूपों में प्रचलित होकर लेखकों को प्रेरित करती है जहाँ कहीं-कहीं साम्य भी नजर आ जाता है।

एक था ठुनठुनिया की एक प्रमुख विशेषता है प्रकाश मनु की बाल-सुलभ चुलबुली भाषा और कथा कहने का खिलंदड़ा अंदाज जो उन्हें कथा लेखक से कहीं ज्यादा कुशल कथावाचक के रूप में स्थापित करते हैं।

पुस्तक- एक था ठुनठुनिया (2007),  पृष्ठ-95
प्रकाशक- शब्दकलश,  एस-55 प्रताप नगर, दिल्ली-110007
मूल्य- 100 रुपये

बाल साहित्य की दुनिया में बहुत बेशकीमती नगीने है : प्रकाश मनु

साहि‍त्‍य से पहली मुलाकात, उसके जादुई असर और बाल साहि‍त्‍य की स्‍थि‍ति‍ पर कथाकार प्रकाश मनु का आलेख-

सच कहूँ तो ये ऐसे क्षण हैं जब मैं अपने आपको थोड़ी अजब सी स्थिति में पा रहा हूँ और क्या कहूँ, कैसे कहूँ, कुछ ठीक-ठीक समझ में नहीं आ रहा। कभी लगता है, बहुत कुछ है कहने को और मुझे कह ही डालना चाहिए। या कुछ तो जरूर कहना चाहिए जो मुझे अरसे से भीतर इतना मथता रहा और अब भी मथ रहा है। पर फिर अगले ही क्षण लगने लगता है कि नहीं, कुछ कहा न जाएगा। कुछ न कहूँ, चुप ही रहूँ—यह अच्छा है।

इस दुविधा से बचने का एक तरीका शायद यह समझ में आया कि बचपन में जाकर थोड़ा उन लम्हों को टटोलूँ, जब साहित्य या किताब की दुनिया से पहला-पहला परिचय हुआ था। और तभी मैंने थोड़ा-थोड़ा जाना था कि एक छोटी सी सौ-डेढ़ सौ सफे की किताब यह करिश्मा कैसे करती है कि वह हर इनसान के भीतर झाँक लेती है और पत्थर को भी थोड़ा मुलायम, थोड़ा इनसान बना देती है।

और मुझे लगता है कि यह सब जो जादू है, एक अजब सी मायानगरी का जादू यानी लिखना, लिखने का आनंद या कि किताब पढऩा, पढऩे का आनंद…यहाँ तक कि किताब के नजदीक जाने का रोमांच और कोई रचना, कोई बढिय़ा रचना जो आपको आत्मिक तृप्ति दे और आपके अबूझ सवालों का जवाब दे, आपको निराशा से बचाकर राह सुझाए, एक नई मंजिल की ओर इशारा करे,  उसे पढऩे का एक निराला सा आनंद—इसकी शुरुआत तो शायद बचपन से ही हो जाती है, चाहे वह कितने ही अबोध और नौसिखिए रूप में हो। मगर किताब का उजाला नन्हे हाथों में आता है और फिर कैसे उसके दिल-दिमाग में फैलता है, यह मैंने जाना है। सभी लोगों ने इसे किसी न किसी रूप में महसूस किया होगा।

मुझे याद है, बचपन में एक बार ‘मनमोहन’ पत्रिका मेरे हाथ में आ गई थी। उस पत्रिका का एक अंक पढ़ लेना मुझे किस कदर रोमांच दे गया है, उसे बता पाना लगभग असंभव है। वह आज भी मेरे लिए एक तिलिस्म, एक जादू की तरह है। अभी तक किताब का मतलब मैं पाठ्य पुस्तक ही समझता था। मगर पाठ्य पुस्तकों की स्पष्ट ही सीमाएँ थीं। वे अच्छी लगती थीं, पर मन उनके साथ खुलकर बहता नहीं था। एक दूरी, एक परायापन सा था। पर मनमोहन को देखा तो लगा, और पहली बार लगा, कि अखबारी कागज पर छपी एक साधारण सी छपाई वाली पत्रिका भी मन पर जादू कर सकती है! उसमें बहुत सी कहानियाँ थीं, कविताएँ थीं, लेख थे, पहेलियाँ थीं। और वे सब के सब मैं इस कदर चाट गया, जैसे एक भुक्खड़ को बहुत दिनों बाद बढिय़ा भोजन मिला हो, मन और तबीयत के व्यंजन खाने को मिले हों। एक बच्चे की बाल साहित्य से यह पहली मुलाकात थी और वह इस कदर प्रेममयी और रोमांचक थी कि दुनिया की किसी भी बड़ी से बड़ी प्रेमकथा को उस पर निछावर किया जा सकता है। एक छोटा सा अबोध बच्चा था और वह पहली बार अपने हाथ-पैर हिलाते हुए मुक्त हवा में तैर रहा था, आसमान में उड़ रहा था और उसे लग रहा था कि यह सारी दुनिया मेरी है, यह आसमान मेरा है। ओह! मेरे घर के दरवाजे-खिड़कियाँ अभी तक बंद थीं। मैंने कभी इस नए जादू और रोमांच को जाना ही नहीं। आज एक छोटी सी पत्रिका, जो कि शायद उन दिनों चवन्नी या अठन्नी की रही होगी, एकाएक उसने वे सारी खिड़कियाँ-दरवाजे खोल दिए कि मैं उडऩे लगा, उड़ता रहा, उड़ता रहा बहुत देर तक। और मैंने महसूस किया मेरे अंदर बहुत सारे आसमान हैं, बहुत सारी सृष्टियाँ हैं, बहुत सारी कल्पनाओं और जिज्ञासाओं का ब्रह्मांड व्याप्त है, उनका आनंद है, और बहुत गहरी संवेदना है जिसे मैं छू सकता हूँ, देख सकता हूँ, महसूस कर सकता हूँ।

मुझे अब भी याद है कि उस मनमोहन में एक राजकुमारी थी जिसकी नाक किसी वजह से लंबी, लंबी, बहुत लंबी होती जा रही थी। यहाँ तक कि वह जंगलों, झाडिय़ों तक चली गई और काँटों से लहूलुहान हो गई। तब उसकी पीड़ा से मैं किस कदर तड़पा और छटपटाया था आपको बता नहीं सकता। फिर उस कहानी का नायक, पता नहीं वह कौन था, उसने कुछ ऐसा किया कि वह नाक छोटी हुई और राजकुमारी फिर राजकुमारी बन गई। वैसी ही राजकुमारी जिसे मैं पहले से जानता था और पसंद करता था। तब मुझे कुछ चैन पड़ा। वरना अब तक तो मेरी साँस ही रुकी हुई थी।

उसके बाद फिर एक और अनुभव। बच्चों की एक और पत्रिका ‘चंदा मामा’ कहीं से हाथ आ गई और उस पूरे अंक में एक रहस्य और रोमांच भरा बाल उपन्यास छपा था। मैंने उसे आधा पढ़ा और फिर आधा वहीं रुक गया, क्योंकि मुझे अपने बड़े भाईसाहब की दुकान पर जाकर उनकी मदद करनी थी। शाम को उन्होंने किसी काम से भेजा,  तो मुझे मुक्ति मिली। मैं दुकान से छूटा तो वह पत्रिका जेब में ही थी और मुझमें इतना धैर्य नहीं था कि कहीं बैठकर उसे पढ़ लूँ। मैं दुकान से निकला और रास्ते में चलते हुए उस किताब को पढऩे लगा। आस-पास रिक्शे-ताँगे, लोगों की भीड़-भाड़, पौं-पौं, पैं-पैं। लेकिन एक बच्चे की अपनी प्रिय पत्रिका से मुलाकात अबाध जारी थी। अब भी याद है, पूरे रास्ते भर मैं उस उपन्यास को पढ़ता गया था। आज सोचकर काँप उठता हूँ कि अगर मेरा एक भी कदम गलत पड़ गया होता तो…? कुछ भी हो सकता था, कुछ भी।

लेकिन बच्चे और बाल साहित्य का जो रिश्ता होता है, वह कुछ अजब सी दीवानगी वाला रिश्ता है। उसमें ये सारी चीजें नहीं चलतीं। और यह दीवानगी न होती, तो दुनिया के हजारों लेखक और लाखों पाठक बार-बार तकलीफें झेलकर भी, यों दौड़-दौड़कर किताबों की दुनिया के नजदीक न जाते। और बच्चों में—मैंने महसूस किया है—यह दीवानगी कहीं अधिक होती है। मैं विनम्रता से कहना चाहूँगा कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया के तमाम आतंक के बावजूद आज भी वह है और बनी रहने वाली है।

अब हिंदी में बाल साहित्य की स्थिति के बारे में दो बातें। मुझे लगता है, हिंदी के बाल साहित्य पर बात करते समय एक बात का ध्यान रखना जरूरी है कि एक ओर जहाँ खानापूर्ति वाली ढेरों चीजें हैं, वहीं इतनी अच्छी और बेहतरीन रचनाएँ भी लिखी गई हैं कि देखकर चकित रह जाना पड़ता है। निरंकारदेव सेवक, सर्वेश्वर, दामोदर अग्रवाल और डा. शेरजंग गर्ग सरीखे कवियों ने जो कविताएँ लिखी हैं, वे सचमुच असाधारण और विश्‍व कविता में पांक्तेय हैं। इसी तरह प्रेमचंद, भूपनारायण दीक्षित, सत्यप्रकाश अग्रवाल, हरिकृष्ण देवसरे, रमेश थानवी, पंकज बिष्ट और देवेंद्रकुमार के उपन्यास हों या नई-पुरानी पीढ़ी के लेखकों द्वारा लिखी गई कहानियाँ और नाटक, गुणाकर मुले, दिलीप एम. सालवी और देवेंद्र मेवाड़ी सरीखे लेखकों का बच्चों और किशोरों के लिए लिखा गया विज्ञान साहित्य—यह ऐसा नहीं है कि इसे कोई बच्चों का खेल समझ ले। रेखा जैन, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और केशवचंद्र वर्मा ने बच्चों के लिए ऐसे दिलचस्प नाटक लिखे जिन्होंने बाल नाटकों की धारा ही बदल दी। इसके पीछे बड़ा तप और साधना जरूरी है। जबकि बाल साहित्य की एक मुश्किल तो यही कि अकसर लोग बिना पढ़े ही उसके बारे में फतवे देने लगते हैं। और जानकारी का हाल यह है कि हिंदी का पहला महत्वपूर्ण बाल उपन्यास ‘कुत्ते की कहानी’ प्रेमचंद ने लिखा था और वह भी अपनी मृत्यु से थोड़ा ही पहले, यही लोगों को नहीं पता। बाल साहित्य का यह कितना बड़ा गौरव है कि इसकी उपन्यास विधा का प्रारंभ प्रेमचंद ने किया था 1936 में, यह बाल साहित्य के लेखकों को ही नहीं पता। इसी तरह प्रेमचंद ने बच्चों के लिए खास तौर से जो कहानियाँ लिखी थीं, ‘जंगल की कहानियाँ’, वे इतनी अद्भुत और रोमांचक हैं कि क्या कहा जाए? पर उन पर ही किसी ने ध्यान नहीं दिया, तो फिर बाल साहित्य की चिंता कौन करे? इसी तरह हिंदी के एक से एक मूर्धन्य कवियों ने बच्चों के लिए कविताएं लिखीं, इनमें एक ओर मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर, सुभद्राकुमारी चौहान, पंत और महादेवी तो दूसरी ओर भवानी भाई, प्रभाकर माचवे, भारत भूषण और रघुवीर सहाय सरीखे कवि हैं। ऐसे ही मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी सरीखे लेखकों की बाल कहानियों का अपना रंग है। भारत के पूर्व राष्ट्रपति और शिक्षाविद् डॉ.जाकिर हुसैन ने बच्चों के लिए बड़ी अद्भुत कहानियाँ लिखीं हैं और वे उपलब्ध हैं। पर इसका क्या किया जाए कि इन सबको एक बार पढ़ लेने की बजाय लोग बार-बार यही सवाल पूछते हैं कि बाल साहित्य में लिखा क्या जा रहा है और उसे हम क्यों महत्व दें? बाल साहित्य में अभी बहुत सारे क्षेत्रों में काम होना बाकी है। पर बाल साहित्य की मौजूदा हालत ऐसी भी नहीं है कि कोई उस पर तरस खाए।

एक दूसरी चीज जो मुझे बहुत विचलित करती है वह यह कि आज के बच्चे से जबरन उसका बचपन छीना जा रहा है। उसके कंधे पर भारी-भरकम बस्ता लादकर और घड़ी की सूइयों पर टँगी जिंदगी के बीच उसे कीलित करके मानो उसे असमय प्रौढ़ बना दिया गया है। सच तो यह है कि कभी-कभी मुझे लगता है, हम सब अपराधी हैं जिनके सिर पर बच्चे से उसका बचपन छीनने का बड़ा भारी अपराध है। कोई भी ऐसा बच्चा नहीं है जो तबीयत से खेलना-कूदना और अपनी मनपसंद किताबें-पत्रिकाएँ पढऩा न चाहता हो। बच्चों के लिए सारी दुनिया में एक से एक खूबसूरत फिल्में बनती हैं, एक से एक बढिय़ा सीरियल भी। पर हमने उन्हें ऐसे सीरियलों के भरोसे छोड़ दिया है, जिनमें घोर हिंसा और सेक्स के दृश्य हैं। बड़े-बच्चे सब मिलकर उन्हीं कुरुचिपूर्ण सीरियलों को देख रहे हैं। बच्चों पर इसका क्या असर पड़ रहा है और आगे चलकर वे क्या बनेंगे, सोचकर कई बार तो मैं काँप उठता हूँ।

अब ‘एक था ठुनठुनिया’…! दो-एक बातें इसके बारे में भी कहने का मन है। सच कहूँ तो इस पर प्रथम साहित्य अकादेमी बाल साहित्य पुरस्कार दिए जाने का पत्र मिला, तो मुझे एक सुखद और अकल्पनीय आश्‍चर्य सा हुआ था। इसलिए कि बाल साहित्य में आप कुछ भी लिखें,  उसकी चर्चा न के बराबर होती है। हाँ,  कुछ बाल पाठकों की बहुत उत्साहपूर्ण प्रतिक्रियाएँ मुझे याद हैं और उनमें से एक चेहरा भी, जिसने बड़े अटपटे ढंग से लेकिन असाधारण उत्साह से ठुनठुनिया के बारे में अपनी राय बताई थी। ठुनठुनिया उसे भा गया था, और इसे बताते हुए अति उत्साह में वह कुछ हकलाने लगा था। कुल मिलाकर तो बस इतना ही था जिसे मैंने सँजोकर रख लिया और जो मेरे साथ रहेगा। अब उस पर बाल साहित्य के मर्मज्ञों का भी ध्यान गया तो लगा, चलो, इस उपन्यास में कुछ तो है, जिसने लोगों के दिलों को छुआ और वह मेरी तरह उनके साथ भी रह गया। इससे एक तरह की खुशी तो होती ही है।

यों ठुनठुनिया थोड़ा अजीब पात्र है, जिसका परिवेश थोड़ा गँवई और काफी कुछ पिछड़ा हुआ सा है। लेकिन अच्छी बात यह है कि वह परिस्थितियों से कतई हार नहीं मानता। वह जिंदादिली से भरा ऐसा पात्र है जिसमें हँसी की फुरफुरियां फूटती रहती हैं। बुरे से बुरे हालात में भी वह पस्त नहीं होता और कोई न कोई रास्ता निकाल लेता है। पढ़ाई-लिखाई में बहुत आगे न सही, मगर समझदारी में वह अव्वल है और खुली आँखों से दुनिया को देखना जानता है। जीवन की खुली पाठशाला में वह पढ़ा, इसलिए उसकी समझ बड़ी अचूक है और हमेशा मौके पर काम आती है। लोगों के दिलों को पढऩा और उनसे प्यार करना उसे आता है, इसीलिए चाहे रग्घू खिलौने वाला हो, चाहे कठपुतली का खेल दिखाने वाला मानिकलाल या फिर गाँव का भारी-भरकम शख्सियत वाला जमींदार, हर कोई उसे प्यार करता है। और ठुनठुनिया की माँ! इसके बारे में तो सिर्फ इतना ही कि उपन्यास में कई प्रसंग हैं, जिन्हें लिख रहा था तो ममता से झुक आई डाली की तरह मेरी माँ सामने थी और ठुनठुनिया मैं था, मैं खुद। बस, अब कुछ और कहना शायद फिजूल है। हाँ, ठुनठुनिया की एक बात शायत सभी पाठकों को अच्छी लगी कि वह जिंदगी में आगे बढ़ता है, मगर अपने पुराने दोस्तों को नहीं भूलता और सबको साथ लेकर एक अद्भुत दुनिया रच डालता है, जिसमें कला-संगीत, नाटक और हँसी-खुशी के बड़े अलमस्त रंग हैं। सच कहूँ तो खुद मुझे वह दुनिया बड़ी प्रिय है और किसी यूटोपिया की तरह लगती है।

अंत में बस इतना और कि मैं जो ‘यह जो दिल्ली है’, ‘कथा सर्कस’ सरीखे उपन्यासों और आलोचनात्मक लेखों में डूबा हुआ था, बाल साहित्य में शायद कुछ देर से आया। पर आया तो इसका श्रेय सबसे अधिक ‘नंदन’ पत्रिका और वहाँ के बहुत अच्छे मित्रों और स्नेहिल सहयात्रियों को ही जाता है। हम लोग शायद एक कारवाँ की तरह थे और बुरे वक्तों में भी एक अलग तरह की अबोधता का पूरा आनंद ले रहे थे। ‘नंदन’ में बच्चों के लिए लिखने-पढऩे और बच्चों से सीधे संवाद के इतने मौके मिले कि बाल साहित्य की दुनिया के बहुत सारे अनजाने क्षितिज मेरे आगे उदघाटित हुए। मुझे लगा, अभी बहुत कुछ है जो किया जा सकता है और बच्चों के लिए लिखना कितना सुख, आनंद और रोमांच से भरा है, यह मैंने तभी जाना। शायद यही वजह है कि बच्चों के लिए लिखना इधर कुछ अधिक हुआ। पिछले आठ-दस वर्षों से हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखने में जुटा हूँ और वह अब लगभग पूरा होने वाला है। वह सामने आए तो लगेगा कि यह जीवन एकदम निरर्थक तो नहीं गया। इसलिए कि उसमें ऐसे अनेक लोगों का जिक्र है जो अनाम मर गए, लेकिन घोर अभावों के बावजूद बाल साहित्य को बेशकीमती नगीने दे गए। यह इतिहास पूरा हो तो लगेगा कि मुझे उन सभी का आशीर्वाद मिल गया है।

(मनुजी को उनके बाल उपन्‍यास ‘एक था ठुनठुनिया’ पर हि‍दी के लि‍ए साहि‍त्‍य अकादमी के पहले बाल साहि‍त्‍य पुरस्‍कार से सम्‍मानि‍त कि‍या गया है। उन्‍होंने यह व्‍याख्‍यान सम्‍मान समारोह में दि‍या था।)

मासुमियत के सिक्‍के भले ही कागज के भी हो, चल सकते हैं : जसबीर भुल्‍लर

पंजाबी के लिए साहित्‍य अकादमी का पहला बाल साहित्‍य पुरस्‍कार सुप्रसिद्ध कथाकार जसबीर भुल्‍लर को प्रदान किया गया है। बाल साहित्‍य को लेकर समारोह में दिया गया उनका वक्‍तव्‍य-

हम जरा पीछे की ओर झांकें तो आदिकाल से मांओं, नानियों-दादियों ने मौखिक बाल साहित्‍य को अपनी स्‍मृतियों में संभालकर रखा है और बाल साहित्‍य की किस्‍मों के साथ बच्‍चों को बड़ा किया है।

मौखिक बाल-साहित्‍य की परंपरा अभी समाप्‍त नहीं हुई है।

बचपन में बहुत सारी बातें (कहानियां) मैंने भी सुनी थीं। उन कहानियों का परी-अंश मुझे मोह लेता था, लेकिन ज्‍यादातर वो साहित्‍य बच्‍चों की उम्र से बड़ा होता था। उदाहरण के लिए ‘पंच फूलां रानी’ वाली बात (कहानी) ही ले लो। उस कहानी की रानी को प्रत्‍येक सुबह पांच फूलों से तोला जाता था, लेकिन जिस रात वह रानी कहीं दूर देश के अपने चाहने वाले राजकुमार को मिल लेती थी तो उसका भार पांच फूलों से अधिक हो जाता था। वो कहानी औरत-मर्द के संबंधों की थी, परंतु बच्‍चों को सुनाई जाती थी।

दरअसल, पंजाब की मेरी वाली पीढ़ी के पास सही मायनों में बाल साहित्‍य था ही नहीं। बाल साहित्‍य के नाम पर तब जो कुछ भी उपलब्‍ध था, वो प्रेरणा से खाली था। उस समय की कहानियों में बहुत कुछ तिलिस्‍मी–सा होता था। दीया रगड़ने भर से चहल-पहल हो जाती थी। राख की चुटकी भर से गरीब आदमी राजा बन जाता था। सोना बनाने वाले पत्‍थर मिल जाते थे। गुप्‍त खजाना मिल जाता था।

बाल साहित्‍य के नाम पर जो कुछ भी था, वो सब बच्‍चों को अपाहिज बनाने के लिए था, उन्‍हें संघर्ष करने से रोकता था।

पंजाबी में बाल साहित्‍य का स्‍वतंत्र अस्तित्‍व और सर्जना के सचेत प्रयत्‍न दरअसल स्‍वतंत्रता के पश्‍चात ही समाने आए हैं।

बाल साहित्‍य की सर्जना के आरंभ के दौर में हम ने बच्‍चों को बहुत नुकसान किया है और बाल साहित्‍य का भी। बाल साहित्‍य के नाम पर हम सामाजिक कद्रों-कीमतों की घनी खुराक बच्‍चों को पिलाते रहे हैं। पत्रिकाओं और पाठ्य पुस्‍तकों की जरूरतों की पूर्ति हेतु रचनाएं लिखी गई हैं और उस बचकाने साहित्‍य को हमने बाल साहित्‍य की संज्ञा दी है। बाल साहित्‍य का निर्झर हमने सहज रूप से नहीं बहने दिया।

आधुनिक साहित्‍यकार इसके प्रति चेतन हुआ है। उसने बाल मनोविज्ञान को भी समझने का प्रयत्‍न किया है और बच्‍चों की आवश्‍यकताओं को भी। उसे मालूम है कि दुनिया की कोई ताकत किसी बच्‍चे को उसकी इच्‍छा के विरुद्ध साहित्‍य नहीं पढ़वा सकती। वह पढ़ते हुए सो सकता है, जम्‍हाई ले सकता है और पुस्‍तक को परे हटा सकता है।

जब कोई यूं करता है तो वह अपने ढंग से मुझे बाल साहित्‍य की समझ भी प्रदान कर रहा होता है। वह साफ शब्‍दों में कहता-सा प्रतीत होता है- ‘‘मुझसे जो भी बात करनी है, सरलता से करो, साफ व स्‍प्‍ष्‍ट। कहानी को मुश्किल मत करो। कहानी को पंख लगे होने चाहिए ताकि मैं भी उस कहानी के साथ उड़ पाऊं। आपकी रचना मेरे अंदर इतनी उड़ान भर दे कि मैं किसी ग्रह तक पहुंच सकूं। आप मेरे लिए परी-कथा के दरवाजे भी खोल दो। किसी भी और दुनिया को कोई दरवाजा मेरे लिए बंद न रखो।’’ यह मांग बच्‍चे बाल साहित्‍य के प्रत्‍येक लेखक से करते हैं।

बाल साहित्‍य लिखने के लिए कलम उठाने से पहले मैं अपने बचपन की ओर लौटा था। मेरे बाल साहित्‍य के बीज वहीं पर बिखरे पडे़ थे और मैंने एक-एक करके चुने हैं।

जब मेरे पिताजी थके-हारे अपने काम से लौटते तो कमीज उतार कर खूंटी पे टांग देते थे और कुछ पल आराम के लिए लेट जाते थे। तब मैं चार वर्ष का नन्‍हा बालक उनकी नाभि में से रूई निकालता और उस रूई से रजाई बनाने की कल्‍पना करता।

क्‍या तीन-चार वर्ष का वह बालक कभी उस रूई के साथ रजाई बना पाया। वह बच्‍चा बड़ा हो गया है। इस प्रश्‍न के उत्‍तर में मैं आपके समक्ष खड़ा हूं। देख लो, चाहे मैंने वो रजाई बना ली है। कल्‍पना की इंतहा के साथ मैं कुछ भी बना लूं।

बाल साहित्‍य की बातें करते हुए बचपन की एक घटना मेरे सामने आ गई है, जिसने साहित्‍य की शक्ति का एहसास भी मुझे करवा दिया है।

वह घटना इस प्रकार है-

तब मैं मुश्किल से चार साल का था। मेरी मां धागे से सीने-पिरोने का कुछ काम कर रही थी। धागे का गोला उनके पास ही पड़ा था। उस गोले में गत्‍ते का एक गोल टिक्‍का फंसा पड़ा था। गत्‍ते का वह गोल टिक्‍का पैसे की भांति लग रहा था। उस टिक्‍के पर सुनहरी अक्षरों में कुछ लिखा हुआ था। वो शायद फैक्‍टरी का नाम था, जिसने धागा बनाया था। मुझे लगा गत्‍ते का वह गोल टिक्‍का एक पैसा था जिसे में खर्च कर सकता हूं।

मैं वो पैसा लेकर बाहर की तरफ चल पड़ा। गली के मोड़ पर हलवाई की दुकान थी। गत्‍ते का वो सिक्‍का हलवाई को देकर मैंने गुलाब जामुन की ओर संकेत किया।

हलवाई ने एक बार हाथ में पकड़े गत्‍ते के पैसे की ओर देखा और एक बार मेरी ओर। वह मुस्‍कुराया और दोने में गुलाब जामुन रखकर मेरी ओर सरका दिया।

तब मुझे मालूम नहीं था, लेकिन आज मैं मानता हूं कि मासुमियत के सिक्‍के भले ही कागज के भी हो, चल सकते हैं।

मेरे भीतर का वह बच्‍चा अभी तक जीवित है। मैंने उसे अपने सांसों में बसाया हुआ है। उसकी मासुमियत, सहजता और सादगी बरकरार है… और यही बाल साहित्‍य की शक्ति है।

जिस साहित्‍यकार के भीतर का बच्‍चा समय की गर्दो- गुब्‍बार में कहीं  खो जाता है, उसे बाल साहित्‍य नहीं लिखना चाहिए। उसे बाल साहित्‍य लिखने का कोई अधिकार नहीं है।

मेरे बचपन के पास बाल साहित्‍य की सर्जना हेतु बड़ी उपजाऊ मिट्टी थी। अभी भी मैं उसी मिट्टी से कहानी उगा रहा हूं। उस मिट्टी की उपजाऊ शक्ति ने कभी भी खत्‍म नहीं होना है।

मैं चाहता हूं बाल साहित्‍य के द्वारा बच्‍चों को सुंदर दुनिया का सपना दूं ताकि वे अपना परी लोक खुद सर्ज सकें। वे अच्‍छे मनुष्‍य बनने के मार्ग की ओर चलते रहें।

बाल साहित्‍य के द्वारा कितनी सुंदर दुनिया बन सकती है, फिलहाल तो हम इसका अनुमान ही लगा सकते हैं।

आज आप सब विशेष रूप में बाल साहित्‍य के जश्‍न में शामिल होने के लिए आए हैं तो बच्‍चों के लिए एक कहानी अपने साथ लेकर जाना।

‘‘अण्‍डे के अंधेरे में जन्‍म ले रहे चूजे ने चोंच के साथ टुक-टुक अण्‍डा तड़क गया, टूट गया और चूजा अण्‍डे से बाहर आ गया। बाहर आकर उस चूजे ने अपने से पहले अण्‍डों में से निकले चूजों को बताया, आज तो कमाल हो गई। एक बहुत बढि़या बात का पता चला है। हमें हमेशा टुक-टुक करते रहना चाहिए, कुछ न कुछ हो जाता है।’’

बस कहानी इतनी ही है। आपने देख ही लिया है कि बाल साहित्‍य की इस टुक-टुक के साथ कुछ हो गया है।