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अनुप्रि‍या की बाल कवि‍तायें

अनुप्रि‍या

अनुप्रि‍या

सुपौल, बिहार में जन्‍मीं अनुप्रि‍या की बाल कवि‍तायें नंदन, स्नेह, बाल भारती, जनसत्ता, नन्हे सम्राट, जनसंदेह टाइम्स, नेशनल दुनिया, बाल भास्कर, साहित्य अमृत, बाल वाटिका, द्वीप लहरी, बाल बिगुल आदि‍ पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त हो चुकी हैं। उनकी चार बाल कवि‍तायें-

मुस्कान पुरानी

होठों पर आ जाये फिर से
वो मुस्कान पुरानी
भीगा मन बहता जाए
वो बचपन की  शैतानी

पगडंडी की दौड़ हो
या छुक-छुक वो रेल
झगड़ा छोटी बात पर
मीठी-मीठी   मेल

झूला आम की डाल का
नीम की ठंडी छाँव
नटखट सी  नादानियाँ
अपनेपन सा गाँव

कच्चे-पक्के  बेर की
खट्टी -मीठी चाह
थाम के वो परछाईयाँ
चल दूँ फिर उस राह।

नींद

चँदा बादल संग खेलता
शोर मचाते तारे
तू भी सो जा कहती मम्मा
सो गए अब तो सारे

आसमान ने ओढ़ लिया है
काला सा क्यूँ रंग
नींद बाँटती सबको देखो
सपने रंग-बिरंग

ऊँघ रहे हैं परदे-खिड़की
तकिया और रजाई
सोने चला मैं भी अब तो
नींद मुझे भी आई।

जन्मदिन

आजा चंदा तू  संग मेरे
खा ले हलवा पूरी
करनी है तुमसे मुझको
बातें बहुत जरूरी

पापा लाए कई किताबें
मम्मी गुड़िया प्यारी
और भैया ने जन्मदिन की
कर ली हर तैयारी

आकर देखो जरा यहाँ
है कितना हंगामा
अब न देर करो तुम बस
आ जाओ न मामा।

किस्सा

मुनिया सुना रही है किस्सा
मुन्ना सुनता ध्यान से
एक कबूतर उड़कर आया
बनिए की दुकान से

उसके पंजे में था थैला
और थैले में दाने
रखकर थैला भूल गया वो
किसके घर में जाने

चल मम्मी से लेकर चावल
उसको दे दें थोड़े
हाथ पकड़ कर एक दूजे का
मुनिया मुन्ना  दौड़े।

जिसका काम उसी को साजे : वि‍वेक भटनागर

युवा कवि‍-पत्रकार वि‍वेक भटनागर की बाल कवि‍ता-

एक गधा था चंपक वन में
ढेंचू जिसका नाम
सीधा-सादा, भोला-भाला
करता था सब काम।

एक बार वह लगा सोचने
मैं भी गाना गाऊँ
जंगल के सब जानवरों पर
अपनी धाक जमाऊँ
लेकिन गधा अकेले कैसे
अपना राग अलापे
यही सोचकर गधा बेचारा
मन ही मन में झेंपे
कालू कौए को जब उसने
मन की बात बताई
कालू बोला- ढेंचू भाई
इसमें कौन बुराई
हम दोनों मिलकर गाएँगे
अपना नाम करेंगे
कोयल-मैना के गाने की
हम छुट्टी कर देंगे
मैं काँव-काँव का राग गढ़ूँ
तुम ढेंचू राग बनाना
डूब मरेगा चुल्लू भर में
तानसेन का नाना।

इतने में आ गई लोमड़ी
फिर उनको बहकाने
बोली- तुम तो गा सकते हो
अच्छे-अच्छे गाने
शेर सिंह राजा को जाकर
अपना राग सुनाओ
उनको खुश कर राजसभा में
मंत्रीपद पा जाओ।

अगले दिन था राजसभा में
उन दोनों का गाना
ढेंचू-ढेंचू-काँव-काँव का
बजने लगा तराना
वहाँ उपस्थित सब लोगों ने
कान में उंगली डाली
गाना खत्म हो गया लेकिन
बजी न एक भी ताली
निर्णय दिया शेरसिंह ने तब
कर्कश है यह गान
इससे हो सकता है प्रदूषित
हरा-भरा उद्यान
जाकर इस जंगल के बाहर
तुमको गाना होगा
वरना इस गाने पर तुमको
टैक्स चुकाना होगा।

सुनकर शेरसिंह का निर्णय
हो गये दोनों दंग
जैसे भरी सभा में दोनों
हो गये नंग-धड़ंग।
शेर सिंह की बातें सुनकर
सपने से वे जागे
जिसका काम उसी को साजे
और करे तो डंडा बाजे।

चि‍त्र: अंजलि‍ कुमारी

नये साल पर प्रकाश मनु के दो गीत

 

नये साल के अवसर पर वरिष्‍ठ कथाकार प्रकाश मनु के दो गीत-

नये साल क्या-क्या लाओगे?

नये साल क्या-क्या लाओगे?
प्यारा-प्यारा नया कलेंडर
ताजा दिन, ताजी-सी शाम,
चिडिय़ाघर की सैर, और फिर
हल्ला-गुल्ला मार तमाम।
हलुआ, पूड़ी, बरफी, चमचम
से मुँह मीठा करवाओगे?

मीठी-मीठी एक बाँसुरी
नयी कहानी, नयी किताब,
मीठी-मीठी अपने शामें
हँसता जैसे सुर्ख गुलाब।
खुशबू का एक झोंका बनकर
सबके मन को बहलाओगे?

या बुखार पढऩे का सब दिन
कागज-पतर रँगवाओगे,
टीचर जी की डाँट-डपट
मम्मी की झिडक़ी बन जाओगे।
खेलकूद के, शैतानी के
सारे करतब भुलवाओगे?

झगड़ा-टंटा रस्ता चलते
जाने कैसे-कैसे झंझट,
बिना बात की ऐंचातानी
बिना बात की सबसे खटपट।
गया साल सच, बहुत बुरा था,
उसकी चोटें सहलाओगे?

नया कलेंडर

पापा, नए साल पर लाना,
बढिय़ा सा
एक नया कलेंडर!

बैठक में जो टँगा हुआ है
हुआ कलेंडर बहुत पुराना,
उस पर मैंने कभी लिखा था
कालू-भालू वाला गाना।
मम्मी ने भी लिखा उसी पर
शायद राशन का हिसाब है,
इसीलिए बिगड़ा-बिगड़ा सा
जैसे डब्बू की किताब है!

नया कलेंडर लाना जिस पर
फूल बने हो
सुंदर-सुंदर!

फूलों पर उड़ती हो तितली
उसे पकडऩे डब्बू भागा,
आसमान में नया उजाला
सूरज भी हो जागा-जागा।
ऐसा नया कलेंडर जिसमें
गाना गाये मुनमुन दीदी,
सुनकर के पेड़ों पर बैठी,
चिडिय़ा चहके चीं-चीं, चीं-चीं!

नई सुबह आएगी पापा
उस नन्ही
चिडिय़ा-सी फुर-फुर!

चित्रांकन  : प्रगति त्‍यागी

देवेन्द्र कुमार की कुछ बाल कविताएं

19 अक्टूबर, 1940 को दिल्लीं में जन्में  कवि देवेन्द्र कुमार 27 वर्षों  तक प्रतिष्ठित बाल पत्रिका ‘नंदन’ के  साथ जुड़े रहे। बाल कहानियों और कविताओं की कई पुस्‍तकें प्रकाशित। उनकी कुछ बाल कविताएं-

आइसक्रीम

आइसक्रीम-आइसक्रीम
ठंडम-ठंडम आइसक्रीम

धत तेरी गरमी तो देखो
पिघल गई लो आइसक्रीम

अब क्या  होगा कैसे होगा
पिघल गई लो आइसक्रीम

बर्फ मंगाओ इसे जमाओ
जम जाए तो मिलकर खाओ

मेरी मानो तो कहता हूँ
झटपट खाओ, खाते जाओ

जैसी भी है, अच्छी ही है
आइसक्रीम-आइसक्रीम

ठंडम-ठंडम आइसक्रीम
पिघलम-पिघलम आइसक्रीम।

फूल महकते हैं

पापाजी जब हँसते हैं
मम्मी खुश हो जाती हैं
मौसम रंग बदलता है

दोनों मुझे बुलाते हैं
ढेरों प्यार जताते हैं
जो मांगो मिलता है

मम्मीं सुंदर दिखती हैं
पापा अच्छे लगते हैं
घर में फूल महकते हैं।

हँसने का स्कूल

पहले सीखो खिल-खिल खिलना
बढ़कर गले सभी से मिलना
सारे यहीं खिलेंगे फूल
यह है हँसने का स्कूल

जल्दी  आकर नाम लिखाओ
पहले हँसकर जरा दिखाओ
बच्चे जाते रोना भूल
यह है हँसने का स्कूल

झगड़ा-झंझट और उदासी
इसको तो हम देंगे फांसी
हँसी-खुशी से झूलम झूल
यह है हँसने का स्कूल।

चूहा किताबें पढ़ता है

पढ़ते-पढ़ते खाता है
जाने किसे सुनाता है
हर पुस्तक पर चढ़ता है
चूहा किताबें पढ़ता है

अभी भगाया झट फिर आया
इसने शब्दकोश है खाया
ज्ञान इसी से बढ़ता है
चूहा किताबें पढ़ता है

बार-बार पिंजरा लगवाया
फिर भी चुंगल में न आया
मेरा पारा चढ़ता है
चूहा किताबें पढ़ता है।

दादी का मौसम

गरमी को पानी से धोएं
बारिश को हम खूब सुखाएं
जाडे़ को फिर सेंक धूप
में दादी को हम रोज खिलाएं

कैसा भी मौसम आ जाए
उनको सदा शिकायत रहती
इससे तो अच्छा यह होगा
उनका मौसम नया बनाएं

कम दिखता है, दांत नहीं हैं
पैरों से भी नहीं चल पातीं
बैठी-बैठी कहती रहतीं
ना जाने कब राम उठाए

शुभ-शुभ बोलो प्यारी दादी
दर्द भूलकर हँस दो थोड़ा
आंख मूंदकर लेटो अब तुम
बच्चे मीठी लोरी गाएं।

गड़बड़झाला

आसमान को हरा बना दें
धरती नीली पेड़ बैंगनी
गाड़ी नीचे ऊपर लाला
फिर क्या होगा- गड़बड़झाला

दादा मांगें दांत हमारे
रखगुल्ले हों खूब करारे
चाबी अंदर बाहर ताला
फिर क्या होगा- गड़बड़झाला

दूध गिरे बादल से भाई
तालाबों में पड़ी मलाई
मक्खी बुनती मकड़ी जाला
फिर क्या‍ होगा- गड़बड़झाला।

मीठी अम्मा

ताक धिना धिन
ताल मिलाओ
हँसते जाओ
गोरे गोरे
थाल कटोरे
लो चमकाओ

चकला बेलन
मिलकर बेलें
फूल फुलकिया
अम्मा मेरी
खूब फुलाओ

भैया आओ
मीठी-मीठी
अम्मा को भी
पास बुलाओ
प्यारी अम्मा
सबने खाया
अब तो खाओ।

सड़कों की महारानी

सुनो कहानी रानी की
सड़कों की महारानी की

झाड़ू लेकर आती है
कूड़ा मार भगाती है
सड़कें चम चम हो जाएं
वह प्यारी है नानी की

धूल पुती है गालों पर
जाले उलझे बालों पर
फिर भी हँसती रहती है
बात बड़ी हैरानी की

आओ उसके दोस्त बनें
अच्छी-अच्छी बात सुनें
बस कूड़ा ने फैलाएं
शर्त यही महारानी की।

दिल्ली के रिक्शा वाले

ये बंगाल बिहार उड़ीसा
उधर हिमाचल मध्य प्रदेश
दूर-दूर से चलकर आए
ये दिल्ली के रिक्शावाले

पहियों के संग पहिए बनकर
सारा दिन हैं पैर घुमाते
मेहनत पीते, मेहनत खाते
ये दिल्ली के रिक्शा वाले

सर्दी में भी बहे पसीना
कैसा मुश्किल जीवन जीना
सच्चे अच्छे परदेसी हैं
ये दिल्ली के रिक्शावाले

मुनिया, बाबा, अम्मा, भैया
सबको भूल चले आए हैं
न जाने कब वापस जाएं
ये दिल्ली  के रिक्शा वाले।

रमेश तैलंग के बाल गीत

रमेश तैलंग के शीघ्र प्रकाश्य बाल-गीत संग्रह ‘काठ का घोड़ा टिम्मक टूँसे कुछ नये मनोरंजक बाल-गीत-

माँ जो रूठे

चाँदनी का शहर, तारों की हर गली
माँ की गोदी में हम घूम आए।
नीला-नीला गगन चूम आए।

पंछियों की तरह पंख अपने न थे,
ऊँचे उड़ने के भी कोई सपने न थे,
माँ का आँचल मिला हमको जबसे मगर
हर जलन, हर तपन भूल आए।
नीला-नीला गगन चूम आए।

दूसरों के लिए सारा संसार था,
पर हमारे लिए माँ का ही प्यार था
सारे नाते हमारे थे माँ से जुड़े
माँ जो रूठे तो जग रूठ जाए।
नीला-नीला गगन चूम आए।

अम्माँ की रसोई में

हल्दी दहके
धनिया महके
अम्माँ की रसोई में।

आन बिराजे हैं पंचायत में
राई और जीरा,
पता चले न यहाँ किसी को
राजा कौन फकीरा
सिंहासन हैं ऊँचे सबके
अम्माँ की रसोई में।

आटा-बेसन, चकला-बेलन
घूम रहे हैं बतियाते,
राग-रसोई बने प्यार से
ही, सबको ये समझाते,
रूखी-सूखी से रस टपके
अम्माँ की रसोई में।

थाली- कडुछी और कटोरी
को सूझी देखो मस्ती,
छेड़ रही है गर्म तवे को
दूर-दूर हँसती-हँसती,
दिखलाती हैं लटके-झटके
अम्माँ की रसोई में।

समुंदर की लहरों!

समुंदर की लहरों, उछालें न मारो।
हवाओं का गुस्सा न हम पर उतारो।

बनाएंगे बालू के घर हम यहाँ पर,
जगह ऐसी पाएंगे सुंदर कहाँ पर?

न यू अपनी ताकत की शेखी बघारो,
कभी झूठी-झूठी ही हमसे भी हारो।

हमें तो यहाँ पर ठहरना है कुछ पल,
दिखा लेना गुस्से के तेवर कभी कल,

करो दोस्ती हमसे, बाँहें पसारो।
बहो धीरे-धीरे, थकानें उतारो।

समुंदर की लहरों, उछालें न मारो।

जम्हाई, जम्हाई, जम्हाई, जम्हाई !

दद्दू को आई तो दादी को आई,
जम्हाई, जम्हाई, जम्हाई, जम्हाई!

लगा छूत का रोग जैसे सभी को
मुँह खोले बैठे हैं सारे तभी तो,
करे कोई कितनी भी क्यों न हँसाई।
जम्हाई, जम्हाई,जम्हाई, जम्हाई!

छुपाए न छुपती, रूकाए न रूकती,
बिना बात छाने लगी सब पे सुस्ती,
हमने तो चुटकी भी चट-चट बजाई।
जम्हाई, जम्हाई,जम्हाई, जम्हाई!

हद हो गई अब, दवा कोई देना,
जम्हाई को आ कर भगा कोई देना,
न फिर से हमें घर में दे ये दिखाई।
जम्हाई, जम्हाई,जम्हाई, जम्हाई!

बारिश के मौसम के हैं कई रूप

पिछली गली में झमाझम पानी
अगली गली में है सुरमई धूप
बारिश के मौसम के हैं कई रूप।

माई मेरी, देखो चमत्कार कैसा,
धोखाधड़ी का ये व्यापार कैसा,
किसना की मौसी की टोकरी में ओल,
बिसना की मोसी का सूखा है सूप।

सुनता नहीं सबकी ये ऊपर वाला,
उसके भी घर में है गड़बड़ घोटाला
चुन्नू के घर में निकल गए छाते
मुन्नू के घर वाले रहे टाप-टूप।

बारिश के मौसम के हैं कई रूप ।

वाह, मेरे किशन कन्हाई!

मेट्रो में घूमे न शापिंग मॉल देखा,
मूवी-मूवी देखी न सिनेमाहॉल देखा,
माखन के चक्कर में खाई पिटाई।
वाह मेरे, वाह मेरे किशन कन्हाई!

बाँसुरी की धुन में ही मस्त रहे हर दिन,
काम कैसे चल पाया सेलफोन के बिन ?
थाम के लकुटिया बस गैया चराई।
वाह मेरे, वाह मेरे किशन कन्हाई!

काश कहीं द्वापर में इंटरनेट होता,
ईमेल से सबका कांटेक्ट होता,
गली-गली ढूँढ़ती न फिर जसुदा माई।
वाह मेरे, वाह मेरे किशन कन्हाई!

होली के रंग कवि‍ताओं के संग

रंगों के त्‍यौहार होली पर भवानी प्रसाद मिश्र, कन्हैया लाल मत्त, घमंडी लाल अग्रवाल, प्रकाश मनु, योगेन्द्र दत्त शर्मा, गोपीचंद श्रीनागर, नागेश पाण्डेय ‘संजय’, देवेन्द्र कुमार और रमेश तैलंग की कवि‍ताएं-
 

फागुन की खुशियाँ मनाएं : भवानी प्रसाद मिश्र

 
चलो, फागुन की खुशियाँ मनाएं!
आज पीले हैं सरसों के खेत, लो;
आज किरणें हैं कंचन समेट, लो;
आज कोयल बहन हो गई बावली
उसकी कुहू में अपनी लड़ी गीत की हम मिलाएं।
 
आज अपनी तरह फूल हंसकर जगे,
आज आमों में भोंरों के गुच्छे लगे,
आज भोरों के दल हो गए बावले
उनकी गुनगुन में अपनी लड़ी गीत की हम मिलाएं।
आज नाची किरण, आज डोली हवा!
आज फूलों के कानों में बोली हवा
उसका सन्देश फूलों से पूछें, चलो
और कुहू करें गुनगुनाएं।
चलो, फागुन की खुशियाँ मनाएं
 
 

रंगों का धूम-धड़क्का : प्रकाश मनु

 
फिर रंगों का धूम-धड़क्का, होली आई रे,
बोलीं काकी, बोले कक्का—होली आई रे!
मौसम की यह मस्त ठिठोली, होली आई रे,
निकल पड़ी बच्चों की टोली, होली आई रे!
 
लाल, हरे गुब्बारों जैसी शक्लें तो देखो—
लंगूरों ने धूम मचाई, होली आई रे!
मस्ती से हम झूम रहे हैं, होली आई रे,
गली-गली में घूम रहे हैं, होली आई रे!
 
छूट न जाए कोई भाई, होली आई रे,
कह दो सबसे—होली आई, होली आई रे!
मत बैठो जी, घर के अंदर, होली आई रे,
रंग-अबीर उड़ाओ भर-भर, होली आई रे!
 
जी भरकर गुलाल बरसाओ, होली आई रे,
इंद्रधनुष भू पर लहराओ, होली आई रे!!
फिर गुझियों पर डालो डाका, होली आई रे,
हँसतीं काकी, हँसते काका—होली आई रे!
 
 

हाथी दादा की होली: प्रकाश मनु

 
जंगल में भी मस्ती लाया
होली का त्योहार,
हाथी दादा लेकर आए
थोड़ा रंग उधार।
 
रंग घोल पानी में बोले—
वाह, हुई यह बात,
पिचकारी की जगह सूँड़ तो
अपनी है सौगात!
 
भरी बालटी लिए झूमते
जंगल आए घूम,
जिस-जिस पर बौछार पड़ी
वह उठा खुशी में झूम!
 
झूम-झूमकर सबने ऐसे
प्यारे गाने गाए,
दादा बोले—ऐसी होली
तो हर दिन ही आए!
 
 

जमा रंग का मेला : कन्हैया लाल मत्त

 
जंगल का कानून तोड़कर जमा रंग का मेला!
भंग चढ़ा कर लगा झूमने बब्‍बर शेर अलबेला!
 
गीदड़ जी ने टाक लगाकर एक कुमकुमा मारा!
हाथी जी ने पिचकारी से छोड़ दिया फब्बारा!
 
गदर्भ जी ने ग़ज़ल सुनाई कौवे ने कब्बाली!
ढपली लेकर भालो नाचा, बजी जोर की ताली!
 
खेला फाग लोमड़ी जी ने, भर गुलाल की झोली!
मस्तों की महफ़िल दो दिन तक, रही मनाती होली!
 
 

होली का त्यौहार : घमंडी लाल अग्रवाल

 
आया हँसता रंग-रंगीला होली का त्यौहार!
रंग-बिरंगी पोशाकें अब मुखड़े बे-पहचान,
भरा हुआ उन्माद हृदय में अधरों पर मुस्कान,
मस्त महीना फागुन वाला लुटा रहा है प्यार!
 
डफली ने धुन छेड़ी प्यारी, भरें कुलांचें ढोल,
मायूसी का हुआ आज तो सचमुच बिस्तर गोल,
भेदभाव का नाम मिटा दें, महक उठे संसार!
आया हँसता रंग-रंगीला होली का त्यौहार!
 
 

सतरंगी बौछारें लेकर : योगेन्द्र दत्त शर्मा

 
सतरंगी बौछारें लेकर
इन्द्रधनुष की धरें लेकर
मस्ती की हमजोली आई,
रंग जमाती होली आई!
 
पिचकारी हो या गुब्बारा,
सबसे छूट रहा फुब्बारा,
आसमान में चित्र खींचती
कैसी आज रंगोली आई!
 
टेसू और गुलाब लगाये,
मस्त-मलंगों के दल आये
नई तरंगों पर लहराती,
उनके संग ठिठोली आई!
रंग जमाती होली आई!
 
 

होली के दो शिशुगीत : गोपीचंद श्रीनागर

 
कोयल ने गाया
गाया रे गाना!
होली में भैया
भाभी संग आना!
……………
मैना ने छेड़ी
छेड़ी शहनाई!
होली भी खेली
खिलाई मिठाई!
 
 

जब आएगी होली : नागेश पाण्डेय ‘संजय’

 
नन्ही-मुन्नी तिन्नी बिटिया,
दादीजी से बोली-
“खूब रंग खेलूंगी जमकर,
जब आएगी होली!
 
मम्मी जी से गुझिया लूंगी,
खाऊंगी मैं दादी!
उसमें से तुमको भी दूँगी,
मैं आधी की आधी!”
 
 

होली के  दिन: देवेन्द्र कुमार

 
होली के दिन बेरंग पानी
ना भाई ना!
 
जंगल घिस कर हरा निकालें
आसमान का नीला डालें
धूसर, पीला और मटमैला
धरती का हर रंग मिला लें
 
अब गन्दा पानी नहलाएं
फिर होगी सतरंगी होली!
हाँ भाई हाँ!
 
काली, पीली, भर भर डाली
मिर्च सभी ने मन भर खाली
मुंह जलता है पानी गायब
मां, अब सब कुछ शरबत कर दे
मटके सारे नदियाँ भर दे
 
जो आये मीठा हो जाए
तब होगी खटमिट्ठी  होली!
हाँ भाई हाँ!
 
 

होली का गीत : रमेश तैलंग

 
मुखडे़ ने रँगे हों तो
होली कि‍स काम की ?
रंगों के बि‍ना है, भैया !
होली बस नाम की।
 
चाहे हो अबीर भैया,
चाहे वो गुलाल हो,
मजा है तभी जब भैया,
मुखड़ा ये लाल हो,
 
बंदरों के बि‍ना कैसी
जय सि‍या-राम की ?
 
रंग चढ़े टेसू का या
कि‍सी और फूल का,
माथे लगे टीका लेकि‍न
गलि‍यों की धूल का,
 
धूल के बि‍ना ना मने
होली घनश्‍याम की।
 
 
 
 

हिदी के कुछ प्रसिद्ध कवियों की बाल कविताएँ

हिंदी के सुप्रसि‍द्ध कवि‍ श्रीधर पाठक, महावीर प्रसाद द्विवेदी, बालमुकुंद गुप्त, सुखराम चौबे गुणाकर, कामता प्रसाद गुरु, प. सुदर्शनाचार्य और राजर्षि पुरुषोत्तम टंडन की बाल कवि‍ताएं-

देल छे आए : श्रीधर पाठक

बाबा आज देल छे आए,
चिज्जी-पिज्जी कुछ ना लाए!
बाबा क्यों नहीं चिज्जी लाए,
इतनी देली छे क्यों आए?
का है मेला बला खिलौना,
कलाकद लड्डू का दोना।
चू चू गाने वाली चिलिया,
चीं चीं करने वाली गुलिया।
चावल खाने वाली चुइया,
चुनिया मुनिया मुन्ना भइया।
मेला मुन्ना मेली गैया,
का मेले मुन्ना की मैया।
बाबा तुम औ का से आए,
आ-आ चिज्जी क्यों न लाए?

कोकिल : महावीर प्रसाद द्विवेदी

कोकिल अति सुदर चिड़िया है,
सच कहते हैं अति बढ़िया है।
जिस रगत के कुवर कन्हाई,
उसने भी वह रगत पाई।
बौरों की सुगध की भाती,
कुहू-कुहू यह सब दिन गाती।
मन प्रसन्न होता है सुनकर,
इसके मीठे बोल मनोहर।
मीठी तान कान में ऐसे,
आती है वशीधुनि जैसे।
सिर ऊंचा कर मुख खोलै है,
कैसी मृदु बानी बोलै है!
इसमें एक और गुण भाई,
जिससे यह सबके मन भाई।
यह खेतों के कीड़े सारे,
खा जाती है बिना बिचारे।

हिम्मत : बालमुकुंद गुप्त

‘कर नहीं सकते हैं’ कभी मुँह से कहो न यार,
क्यों नहीं कर सकते उसे, यह सोचो एक बार।
कर सकते हैं दूसरे पाँच जने जो कार,
उसके करने में भला तुम हो क्यों लाचार।
हो, मत हो, पर दीजिए हिम्मत कभी न हार,
नहीं बने एक बार तो कीजे सौ-सौ बार।
‘कर नहीं सकते’ कहके अपना मुँह न फुलाओ,
ऐसी हलकी बात कभी जी पर मत लाओ।
सुस्त निकम्मे पड़े रहें आलस के मारे,
वही लोग ऐसा कहते हैं समझो प्यारे।
देखो उनके लच्छन जो ऐसा बकते हैं,
फिर कैसे कहते हो कुछ नहिं कर सकते हैं?
जो जल में नहिं घुसे तैरना उसको कैसे आवे,
जो गिरने से हिचके उसको चलना कौन सिखावे।
जल में उतर तैरना सीखो दौड़ो, सीखो चाल,
‘निश्चय कर सकते हैं’ कहकर सदा रहो खुशहाल।

बनावटी सिंह : सुखराम चौबे गुणाकर

गधा एक था मोटा ताजा
बन बैठा वह वन का राजा!
कहीं सिंह का चमड़ा पाया,
चट वैसा ही रूप बनाया!
सबको खूब डराता वन में,
फिरता आप निडर हो मन में,
एक रोज जो जी में आई,
लगा गरजने धूम मचाई!
सबके आगे ज्यों ही बोला,
भेद गधेपन का सब खोला!
फिर तो झट सबने आ पकड़ा,
खूब मार छीना वह चमड़ा!
देता गधा न धोखा भाई,
तो उसकी होती न ठुकाई!

छड़ी हमारी : कामता प्रसाद ‘गुरु’

यह सुदर छड़ी हमारी,
है हमें बहुत ही प्यारी।
यह खेल समय हर्षाती,
मन में है साहस लाती,
तन में अति जोर जगाती,
उपयोगी है यह भारी।
हम घोड़ी इसे बनाएँ,
कम घेरे में दौड़ाएँ,
कुछ ऐब न इसमें पाएँ
है इसकी तेज सवारी।
यह जीन लगाम न चाहे,
कुछ काम न दाने का है,
गति में यह तेज हवा है,
यह घोड़ी जग से न्यारी।
यह टेक छलाँग लगाएँ,
उँगली पर इसे नचाएँ,
हम इससे चक्कर खाएँ,
हम हल्के हैं यह भारी।
हम केवट हैं बन जाते,
इसकी पतवार बनाते,
नैया को पार लगाते,
लेते हैं कर सरकारी।
इसको बंदूक बनाकर,
हम रख लेते कधे पर,
फिर छोड़ इसे गोली भर,
है कितनी भरकम भारी।
अधे को बाट बताए,
लगड़े का पैर बढ़ाए,
बूढ़े का भार उठाए,
वह छड़ी परम उपकारी।
लकड़ी यह बन से आई,
इसमें है भरी भलाई,
है इसकी सत्य बड़ाई,
इससे हमने यह धारी।

हाऊ और बिलाऊ : प. सुदर्शनाचार्य

किसी गाँव में थे दो भाई–
हाऊ और बिलाऊ,
दोनों में था बडा़ बिलाऊ
छोटा भाई हाऊ,
था धनवान बिलाऊ पर था
वह स्वभाव का खोटा,
था गरीब, पर चतुर बहुत था
हाऊ भाई छोटा।
गाय-बैल थे बहुत
बिलाऊ के घर रुपया-पैसा,
पर गरीब हाऊ के केवल
था एक बूढ़ा भैंसा।

बंदर सभा : राजर्षि पुरुषोत्तम टंडन

हियॉं की बातें हियनै रह गईं अब आगे के सुनौ हवाल,
गढ़ बंदर के देश बीच माँ पड़ा रहा एक खेत विशाल!
सौ जोजन लबा अरु चौड़ा अरबन बानर जाय समाय,
तामें बानर भये इकट्ठा जौन बचे वे आवैं धाय!
जब सगिरा मैदनवा भरिगा पूछें टोपी लगीं दिखाय,
सबके सब कुरसिन से उछले हाथ-पाँव से ताल बजाय!
इतने माँ मल्लू-सा आए, बंदरी और मुसाहिब साथ,
बंदरी बड़ी चटक-चमकीली थामे मल्लू-सा को हाथ!
ओढ़े गउन लगाए टोपी, हीरे जड़े पांत के पांत,
मटकत आवत भाव दिखावत, आखिर मेहरारू की जात!

(नीरजा स्‍मृति‍ बाल साहि‍त्‍य न्‍यास, सहारनपुर से प्रकाशि‍त और बाल साहि‍त्‍यकार कृष्‍ण शलभ द्वारा संपादि‍त पुस्‍तक बचपन एक समंदर से साभार)

अयोध्यासिह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की चार बाल कवि‍ताएं

खड़ी बोली के प्रथम महाकाव्य प्रियप्रवास’ के रचि‍यता अयोध्यासिह उपाध्याय ‘हरिऔध’(15 अप्रैल, 1965-16 मार्च, 1947) का सृजनकाल हिन्दी के तीन युगों भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग और छायावादी युग तक है। उन्‍होंने पर्याप्‍त मात्रा में बाल साहि‍त्‍य का भी सृजन कि‍या-

एक तिनका

मैं घमडों में भरा ऐंठा हुआ
एक दिन जब था मुडेरे पर खड़ा,
आ अचानक दूर से उड़ता हुआ
एक तिनका आख में मेरी पड़ा।
मैं झिझक उट्ठा, हुआ बेचैन-सा
लाल होकर आख भी दुखने लगी,
मूठ देने लोग कपड़े की लगे
ऐंठ बेचारी दबे पावों भागी।
जब किसी ढब से निकल तिनका गया
तब समझ ने यों मुझे ताने दिए,
ऐंठता तू किसलिए इतना रहा
एक तिनका है बहुत तेरे लिए।

एक बूंद

ज्यों निकल कर बादलों की गोद से
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी,
सोचने फिर-फिर यही जी में लगी
हाय क्यों घर छोड़कर मैं यों बढ़ी।
मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में,
चू पड़ूँगी या कमल के फूल में।
बह गई उस काल एक ऐसी हवा
वो समदर ओर आई अनमनी,
एक सुदर सीप का मुँह था खुला
वो उसी में जा गिरी मोती बनी।
लोग यों ही हैं झिझकते सोचते
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर,
कितु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें
बूँद लौं कुछ और ही देता है कर।

जागो प्यारे

उठो लाल अब आँखें खोलो,
पानी लाई हूँ, मुँह धो लो।
बीती रात कमल-दल फूले,
उनके ऊपर भौंरे झूले।
चिड़ियाँ चहक उठी पेड़ों पर,
बहने लगी हवा अति सुदर।
नभ में न्यारी लाली छाई,
धरती ने प्यारी छवि पाई।
भोर हुआ सूरज उग आया,
जल में पड़ी सुनहरी छाया।
ऐसा सुदर समय न खोओ,
मेरे प्यारे अब मत सोओ।

चंदा मामा

चंदा मामा दौड़े आओ,
दूध कटोरा भर कर लाओ।
उसे प्यार से मुझे पिलाओ,
मुझ पर छिड़क चाँदनी जाओ।
मैं तैरा मृग छौना लूँगा,
उसके साथ हँसूँ खेलूँगा।
उसकी उछल कूछ देखूँगा,
उसको चाटूँगा चूमूँगा।

सुपरमैन हैं मेरे पापा : विवेक भटनागर

युवा कवि‍ वि‍वेक भटनागर की बाल कवि‍ता-

सुपरमैन हैं मेरे पापा…।
अक्सर चीतों से भिड़ जाते
शेरों से न तनिक घबराते
भालू से कुश्ती में जीते
हाथी तक का दिल दहलाते
मगरमच्छ का जबड़ा नापा…।
सुपरमैन हैं मेरे पापा…।

भूत-प्रेत भी उनसे डरते
सारे उनकी सेवा करते
सभी चुड़ैलें झाड़ू देतीं
सारे राक्षस पानी भरते
उनमें पापा का डर व्यापा…।
सुपरमैन हैं मेरे पापा…।

आसमान तक सीढ़ी रखते
खूब दूर तक चढ़ते जाते
इंद्रलोक में जाकर वह तो
इंद्रदेव से हाथ मिलाते
उनसे डर इंद्रासन कांपा…।
सुपरमैन हैं मेरे पापा…।