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सादतपुर के बाबा : राधेश्‍याम तिवारी

जनकवि‍ बाबा नागार्जुन के जनशताब्‍दी वर्ष पर उन्‍हें स्‍मरण कर रहे हैं वरि‍ष्‍ठ कवि‍ राधेश्‍याम ति‍वारी-

अगर बनारस शि‍व के त्रिशूल पर टिका है, तो हम कह सकते हैं कि दिल्ली का सादतपुर बाबा नागार्जुन की कविताओं पर टिका है। नागार्जुन की कविताएं ऐसे लोगों को चुभती हैं जो इस व्यवस्था के पक्षधर या पोषक हैं। और यही नागार्जुन की कविताओं की ताकत भी है। ऐसे कवियों-लेखकों के लिए भी बाबा आदर्श नहीं हो सकते जो वातानुकूलित घर में बैठकर तपती दोपहरी में कविताएं लिखते हैं और मार्क्सवाद के सिद्धांतों को अपनी सुविधा के अनुरूप ढालने के आदी हैं। बाबा अपने समय के महत्वपूर्ण कवि इसलिए भी थे कि उन्होंने अपने लेखन के अनुरूप ही जीवन भी जीया। वे ऐसे कवि नहीं थे कि विरोध में मुट्ठी भी तनी रहे और कांख का बाल भी दिखाई न दे। हिन्दी में ही नहीं, विश्‍व साहित्य में ऐसा व्यक्तित्व विरल है जो अपने जीवन और लेखन में समान हो। आधुनिक हिन्दी साहित्य में महाप्राण निराला को छोड़कर ऐसा कोई दूसरा लेखक दिखाई नहीं देता। शयद इसीलिए नागार्जुन ने निराला के संबंध में लिखा है- ‘‘हे कवि कुल गुरु, हे महाप्राण, हे संन्यासी/तुम्हें समझता है साधारण भारतवासी।’’ निराला पर लिखते हुए एक तरह से बाबा ने अपने बारे में भी लिखा है। नागार्जुन भी जनता के कवि थे। जनकवि थे। जैसे बनारस बाबा विश्‍वनाथ की नगरी है, वैसे ही सादतपुर बाबा नागार्जुन की नगरी है। जैसे शि‍व औघड़ दानी थे,  वैसे ही बाबा नागार्जुन हिन्दी के औघड़ कवि। उन्हें हिन्दी का तांत्रिक कवि भी कहा जा सकता है। उनकी ‘मंत्र’ कविता को इस दृष्‍टि‍ से देखा जाना चाहिए। वे अपनी तांत्रिक कविता से इस ‘तंत्र’ को श्‍मशान तक पहुंचाना चाहते थे। वे भोजन भी तांत्रिक करते थे। वर्ष 1985 में कोलकाता के एक होटल में एक साथ भोजन करते हुए बाबा ने मुझसे कहा था- ‘‘क्या तुम तांत्रिक भोजन करते हो ?’’  मैं चकित था- ‘‘यह तांत्रिक भोजन क्या होता है!’’ उन्होंने मुस्कराते हुए कहा- ‘‘असली पंडितों का भोजन मांस, मछली…।’ ’ जब उन्हें पता चला कि मैं तांत्रिक भोजन नहीं करता तो बाबा ने बैरे को बुलाकर कहा-‘‘इस बाल कवि को छेना की मिठाई दो और मुझे मछली…।’’ वहां उपस्थित लोग बाबा के इस नटखट और अनन्य आत्मीय व्यवहार से अभिभूत थे। बाबा से यह मेरी पहली मुलाकात थी। उनका पूरा व्यक्तित्व ऐसा था कि‍ कोई अपरिचित देखकर कह नहीं सकता कि इस रूप-विन्यास में बैठा यह बूढ़ा व्यक्ति महाकवि नागार्जुन हैं। बाबा ने सहजता को साध लिया था। तीन दिनों तक साथ रहने, खाने-पीने और साथ कविता पढ़ने के बाद उनसे जो रिश्‍ता बना उसे आज भी मैं पूरी उष्‍मा के साथ महसूस करता हूं।

कितने लोगों की स्मृतियों में कितने तरह से बसनेवाले नागार्जुन मेरे लिए सिर्फ बाबा थे। उनके पूरे व्यक्तित्व में कोई ऐसा आतंक नहीं था जो आमतौर पर आज के प्रायोजित कवियों-लेखकों में होता है। बाबा खांटी देसी कवि थे- कबीर की परम्परा के कवि। इसका अहसास मुझे तब भी हुआ, जब उनकी नगरी सादतपुर में 21 नवम्बर, 2010 को उनका शताब्दीवर्ष बनाया जा रहा था। उस दिन ऐसा लगा कि हम लोग नाहक ही यह दुखद भ्रम पाले हुए हैं कि बाबा अब हम लोगों के बीच नहीं हैं। उस दिन जब सुबह साढे़ छह बजे लेखक-चित्रकार हरिपाल त्यागी के यहां गया तो लगा कि बाबा अभी भी हम लोगों के बीच ही बैठे हुए हैं और बता रहे हैं कि देखो इस हरिपाल को- ‘‘रेखने सौं जादू भरें, सुजन सखा हरिपाल।’’ त्यागीजी ने बाबा की 28 कविताओं पर पोस्टर और उनका एक तैल चित्र भी तैयार किया है। मेरे साथ बेटा उत्कर्ष भी था। त्यागीजी के यहां बनारस से बाचस्पतिजी आए थे। बाबा पर होने वाले आयोजन में शामिल होने के लिए। हम लोग थोड़ी देर वहां बैठे। इस बीच भी बाबा ने हमलोगों को चैन से बैठने नहीं दिया। प्रत्येक वाक्य में वे आ टपकते थे। त्यागीजी के पास मसाला बहुत है। बाबा के बारे में उन्होंने कहा कि एक बार नागार्जुन किसी के यहां गए थे। भोजन में रोटी थी। लेकिन रोटी ऐसी कि दांतों से खींचो तो वह कटने का नाम ही न ले। सो बाबा ने खीझकर घर वाले से कहा- ‘‘अगर ये रोटी तुम्हारे सिर पर दे मारूं तो तुम्हारे सिर के सौ टुकड़े हो जाएंगे, लेकिन इस रोटी का कुछ नहीं बिगड़ेगा।’’ त्यागीजी की बात सुनकर बाचस्पतिजी की कुंडली भी जागृत हो गई और उन्होंने भी बाबा से जुड़े जहरीखाल के कई संस्मरण सुनाए। फिर हमलोग पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार प्रातः पौने सात बजे-बाबा नागार्जुन के निवास पर पहुंचे।

वहां मैं दूसरी बार गया था। पहली बार तब जब बाबा जीवित थे। जब मैं उनसे मिला था,  वह समय सर्दी का था। बाबा एक खाट पर बैठे धूप का आनंद ले रहे थे। मैं उनके पास कितनी देर बैठा और क्या-क्या बातें हुईं ठीक-ठीक याद नहीं। बस इतना याद है कि बाबा घर-परिवार की बातें पूछते रहे। गोया घर का कोई बुजुर्ग सदस्य वर्षों बाद मिला हो। उस समय वह दमा से परेशान थे। देखा, वहां अभी भी एक तख्त रखा हुआ है। उनके बेटे श्रीकांतजी से जब मैंने कहा कि कभी बाबा यहीं धूप में बैठा करते थे और मैंने उनका दर्शन यहीं किया था,  तो उन्होंने कहा- ‘‘अभी भी यहां धूप आती है…।’’ मैंने कहा- ‘‘धूप तो आएगी ही मगर…।’’ मेरी बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि तभी एक लड़की आ गई। त्यागीजी ने बताया कि ये कणिका है यानी बाबा ने जिसके लिए ‘कणिका डियर’ कविता लिखी है। बाबा की पोती है। लोग धीरे-धीरे जुटने लगे थे। तभी देखा कुछ बच्चों के साथ सैनिक अंदाज में कथाकार महेश दर्पण हाजिए हुए। हम लोग भी उन्हीं के नेतृत्व में बाबा के निवास पर हाजिर हुए थे। महेशजी के आते ही हम सभी लोग एलर्ट हो गए। आज के महाभारत के कृष्‍ण महेशजी ही थे। अंतर सिर्फ इतना था कि कृष्‍ण ने अर्जुन युद्ध करने की बात कही थी, लेकिन महेशजी आज के आयोजन में कृष्‍ण भी थे और अर्जुन भी। उनके साथ पूरी एक सेना थी। बच्चों की सेना। सबके हाथों में महेशजी ने तख्तियां दे रखी थीं। जिन पर बाबा की कविताओं की पांक्यिां लिखी थीं। थोड़ी ही देर में रामकुमार कृषक, कौशल कुमार,  वीरेन्द्र जैन, हीरालाल नागर, रूपसिंह चंदेल, अरविंद कुमार सिंह, आशीष, विजय श्रीवास्तव, सुभाष आदि के साथ अनेक किशोर-किशोरियां भी धीरे-धीरे जुटते चले गए।

जब हमलोग बाबा के घर से निकल कर बाहर प्रभात फेरी के लिए पंक्तिबद्घ हो रहे थे, तभी विष्‍णुचंद्र शर्मा आ गए। विष्‍णुजी का रूप-विन्यास देखते ही बन रहा था। घुटने के नीचे तक उनका स्लिपिंग गाउन बेहद आकर्षक लगा। ऐसा लगा कि इस खास अवसर पर बाबा की आत्मा को रिझाने के लिए ही उन्होंने यह गाउन पहन रखा है। अगर बाबा जीवित होते तो विष्‍णुजी को देखकर कहते- ‘‘विष्‍णु, यह गाउन मुझे दे दो, तुम दूसरा खरीद लेना…।’’  इसके बाद विष्‍णुजी की क्या टिप्पणी होती, यह उनके मूड पर निर्भर करता। संभव है कि वे कहते यह केवल ‘विचंश’ के लिए है। इसी में मेरी पहचान है। यह सिर्फ और सिर्फ मेरे लिए है। आपके लिए कोई दूसरा कोट मंगवा दूंगा…।’’ और महेश दर्पण की ओर मुखातिब होकर कहते- ‘‘महेश,  चांदनी चौक से एक कोट बाबा के लिए लेता आना। रुपये मुझसे ले लेना और हां, यह ध्यान रखना कि वह कोट बिलकुल मेरे जैसा न हो…।’’ उस दिन विष्‍णुजी सचमुच सबसे अलग लग रहे थे। जैसे त्यागीजी अपने चि़त्रों में अलग लगते हैं,  कृषकजी अपने गीतों में और महेशजी कहानियों में उसी तरह विष्‍णुजी अपने गाउन में अलग लग रहे थे। आते ही विष्‍णुजी ने सबसे पहले बाबा के घर के चौखट पर माथा टेका। यह देख मेरी आंखें गीली हो गईं। उसके बाद हम लोग प्रभात फेरी में इन पक्तियों को दुहराते हुए निकल गए-

‘‘अमल-धवल गिरि के शि‍खरों पर/बादल को धिरते देखा है/सादतपुर की इन गलियों ने/बाबा को चलते देखा है।’’  इसकी पहली दो पंक्तियां तो बाबा की हैं,  लेकिन दूसरी पक्ति सलिलजी की है। इन पंक्तियों को दुहराते हुए बार-बार मेरी वाणी बंध-सी जाती थी। ऐसा लगता था जैसे वाणी बर्फ बनकर कंठावरोध कर रही हो। बड़ी मुश्‍कि‍ल से मैं अपने को रोक पाता था और इन पंक्तियों की गूंज में भी मौन हो जाता था।

वरि‍ष्‍ठ आलोचक वि‍श्‍वनाथ त्रिपाठीजी के शब्दों में- ‘‘1980 ई में भोपाल में ‘महत्व केदारनाथ अग्रवाल’ का आयोजन हुआ। आयोजन मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ ने किया था। सभा में नागार्जुन अध्यक्ष,  वक्ताओं में त्रिलोचन, केदरनाथ सिंह, धनंजय वर्मा, इन पंक्तियों का लेखक भी। धनंजय और पंक्ति लेखक ने पर्चा पढ़ा। किसी के पर्चे में ‘ऐंद्रिय’ शब्द आया था। त्रिलोचन को बोलने को कहा गया। त्रिलोचन ने लगभग 45 मिनटों तक एंद्रिय शब्द का अर्थ, एंद्रिय और ऐंद्रिक के अर्थ में अंतर, हिंदी शब्दोकोशों का महत्व, उनके निर्माण का इतिहास आदि बताया। केदार का पूरे भाषण में नामोल्लेख तक नहीं। 46 मिनट में धैर्य टूट गया। श्रोता तो सांस दबाए रहे। केदारनाथ अग्रवाल ने डपटकर कहा- ‘’त्रिलोचन, तुम शब्दकोशों पर बोलने आए हो या मुझ पर, मेरी कविताओं पर। यह (उन्होंने एक चकार का प्रयोग करते हुए कहा) बंद करो।’’ त्रिलोचन वाक्य बीच में छोड़कर चुप बैठ गए। कुछ हुआ ही नहीं मानो। सभा में, मौन में स्पदित वातावरण विषम छा गया। नागार्जुन अध्यक्ष थे। बोले, ‘‘केदार त्रिलोचन से उम्र में बड़े हैं। हमारे बीच ऐसा होता आया है। केदार जहां आदरणीय होते हैं वहां हम फादरणीय हो जाते हैं। जहां हम आदरणीय होते हैं वहां वह फादरणीय हो जाते हैं। आज तो केदार आदरणीय हैं और फादरणीय भी हो गए।’’  हंसी-ठहाके से विषम मौन टूटा। नागार्जुन बेवजह गंभीरता ओढ़ने वाले कवि नहीं थे। उनके पास जीवन का रस था इसीलिए वे अपने आसपास के माहौल में भी रस घोलते रहते थे। उनके लिए यह भी जरूरी नहीं था कि वे सिर्फ लेखकों-कवियों के बीच ही रह सकते थे। अनपढ़ और जन सामान्य के लिए भी वे उतने ही सुलभ और आत्मीय थे जितना लेखकों-कवियों के लिए। कहते हैं, इसी सादतपुर में एक वृद्ध गुर्जर महिला थी। बाबा के प्रति उसके मन में विशेष अनुराग था।

दो बजे से कार्यक्रम का दूसरा सत्र शुरू होना था। मैं घर से सीधे विजय श्रीवास्तव के घर जा रहा था कि रास्ते में मिल गए युवा कवि रमेश प्रजापति। वे भी मेरे साथ हो लिए। विजयजी के यहां से निकल कर हम लोग कृषकजी के घर की ओर मुड़ने ही वाले थे कि सामने से एक कार गुजरी। उसमें से आवाज आई- ‘‘ऐ रमेश…।’’ मैंने देखा तो कार में डा. भारतेंद्रु मिश्र थे। मिश्रजी के साथ थे डॉ विश्‍वनाथ त्रिपाठी। त्रिपाठीजी ने कहा- ‘‘हमलोग विष्‍णुजी को लेकर आ रहे हैं। विष्‍णुजी मेरे बनारस के मित्र हैं…।’’ त्रिपाठीजी का विष्‍णुजी के प्रति यह आत्मीय भाव मन को छू गया और उनका एक संस्मरण बाबा के संदर्भ में याद आया।

एक बार लंबे समय के लिए बाबा प्रवास पर रहे। लौटने पर जब उस वृद्धा से मिलने गए तो उसने देखते ही कहा- ‘‘‘रे बाबा, तू कहां मर गया था रे..।’’ बाबा उसके अटपटे प्रेम को ताड़ गए और अभिभूत हो गए। तुलसी ने राम-केवट संवाद के संदर्भ में कुछ ऐसी ही स्थिति का वर्णन किया है- ‘‘प्रेम लपेटे अटपटे विहसे करुणा अयन…।’ ’बाबा ने जो उस बृद्धा से कहा उसका आशय यही था कि मिलने में सचमुच इतना गैप नहीं होना चाहिए। बाबा ऐसी ही जगहों से कविता का वि‍षय और शब्द ग्रहण करते थे। हम कह सकते हैं कि बाबा अटपटे प्रेम के अद्भुत कवि थे।

इसी सादतपुर में ऐसे लोग भी मिल जाएंगे, जिन्हें देखकर ऐसा लगेगा कि वे एक साथ जवां पैदा हुए होंगे- एक तो वे स्वयं और दूसरा उनका शब्दकोश। बाबा भाषा शब्दकोश से नहीं, उस जनता से ग्रहण करते थे, जिसके लिए वे लिखते रहे। आज अगर बाबा होते तो हफ्ते-दस दिन में एक बार हमारे यहां अवश्‍य आ जाते और आते ही सबसे पहले किचेन में संजना के पास जाते और कहते- ‘‘देखो तुम खीर तो बहुत अच्छा बनाती हो, पूड़ी भी लाजवाब होती है, बस थोड़ा ध्यान रखो कि सब्जी में सूखी मिर्च मत डाला करो। मैं अस्सी बरस का उजबक। पेट का मरीज हूं…।’’ और मौका देखकर वे यह भी कह देते- ‘‘तुम इतनी सुंदर, समझदार हो और ‘जिंदालोग’ की संपादक भी। फिर कैसे इस बेवकूफ के पल्ले पड़ गई..।’’ और फिर मुस्करा देते…। यह बाबा का किचन पोलिटिक्स था। अगर संजना अपने संपादकीय विवेक का इस्तेमाल करते हुए कहती कि बाब, आप अपनी कोई नई कविता ‘जिंदालोग’ के लिए दे दीजिए तो बाबा झोले से अपना कोई संग्रह निकालते और कहते- ‘‘इसमें सारी कविताएं नई हैं। जो चाहो ले लो, लेकिन यह ध्यान रखो कि अगर कविता है तो कभी पुरानी नहीं होगी और अगर नहीं है तो वह चाहे कितनी भी नई क्यों न हो उसे छापकर क्या करोगी। यह सिर्फ कुछ पत्रिकाओं की चोंचलेबाजी है।’’ वह यह भी कह सकते थे कि ‘‘जब ये टीवी चैनल वाले एक ही खबर को दिनभर और कई-कई दिनों तक दिखा सकते हैं तो कोई अच्छी कविता हम अनेक बार क्यों नहीं छाप सकते।’’  बाबा नए लोगों से जुड़कर खुद भी नया हो जाते थे। एक बार उन्होंने मुझसे कहा कि सिर्फ तुम्ही लोग मुझसे कुछ नहीं सिखते। मैं भी तुम लोगों से नरंतर सिखता रहता हूं।

बहरहाल आज भी जब त्यागीजी, कृषकजी,  महेशजी, पटना के मेरे अनन्य मित्र डा. शि‍वनारायण आदि आत्मीय मेरे निवास पर आते हैं तो लगता है कि बाबा की परंपरा अभी भी बची हुई है।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में जीवन ज्योति पब्लिक स्कूल में अनेक पुराने मित्र और परिचित मिल गए। राठीजी (गिरिधर राठी) से बहुत दिनों बाद मिलना हुआ था। उनकी आत्मीयता ने मुझे बहुत बल दिया है। वे जब तक ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ के संपादक रहे, बराबर मुझसे कुछ लि‍खवाते रहे। यह उनका आत्मीय व्यवहार अनेक युवा लेखकों के साथ रहा। उनके साथ किरणजी (राठीजी की पत्नी) और त्रिनेत्र जोशी भी थे। जोशीजी से भी लम्बे समय बाद भेंट हुई थी। कार्यक्रम के इस सत्र में डा. वि‍श्‍वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि नागार्जुन की जन्मशती सारे देश में मनाई जा रही है। लेकिन सादतपुर में इसका मनाया जाना विशेष महत्व रखता है। यह समारोह तरौनी में मनाए गए समारोह से कम महत्वपूर्ण नहीं है। उन्होंने कहा कि उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर विचार करना आज की जरूरत है। बाबा का फोटो आपने किसी राजनेता के साथ नहीं देखा होगा। यहां आप यह विचार कीजिए कि आज जो प्रतिष्‍ठि‍त साहित्यकार हैं,  वे किनसे मिलते हैं और नागार्जुन किनसे मिलते थे। समालोचक मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने बाबा के कुछ संस्मरण सुनाए। उन्होंने कहा- ‘‘एक बार दिनकरजी ने मुझसे कहा कि बाबा उनसे मिल लें। मैंने बाबा से जब यह कहा तो वे बहुत नाराज हुए और पूछा कि तुमने दिनकर को क्या जवाब दिया ? मैं चुप। बाद में जब दिनकरजी ने बाबा की नाराजगी के बारे में जाना तो वे खुद उनसे मिलने आए और उनसे माफी मांगी।’’

यहां यह बता दूं कि बाबा अपने स्वाभिमान के लिए जतना विख्यात थे, उतने ही सजग दूसरे के स्वाभिमान के प्रति भी थे। बात 12 नजवरी, 1985 की। उस समय तक मैंने बाबा का नाम तो जरूर सुना था, लेकि‍न उनको देखा नहीं था। यहां तक कि उनकी तस्वीर भी नहीं। कोलकाता से डा. शंभुनाथ सिंह का आमंत्रण मिला था कि बाबा नागार्जुन के सान्निध्य में युवा कवियों का तीन दिवसीय सम्मेलन है। कटिहार के बी. झा. कॉलेज के हिन्दी के मेरे प्रोफेसर दीपकजी ने भी मुझे उत्प्रेरित किया कि ऐसा अवसर कभी-कभी ही मिलता है सो जरूर जाना चाहिए। वहां देशभर के युवा लेखक-कवि जुटे थे। ठहरने की व्यवस्था कलकत्ता विश्‍ववि‍द्यालय में थी। बाकी लोगों की तरह फर्श पर मैंने भी अपना विस्तर लगा दिया। ठीक उसी समय एक बूढा़ व्यक्ति वहां आए,  जिनके आते ही सभी लोग उनके पास इस तरह घि‍र गए जैसे चीनी पर चिंटियां घि‍र जाती हैं। उन सबों से वह सज्जन रस ले लेकर बातें करते रहे। मैं समझ नहीं पाया कि ये कौन हैं,  इसीलिए मैं चुपचाप अपने बिस्तर पर बैठा रहा। वैसे भी बिना परिचय के लपककर मिलने का मेरा स्वभाव कभी नहीं रहा, वह चाहे कितना भी बड़ा आदमी क्यों न हो। थोड़ी देर बाद जब हम लोग कार्यक्रम स्थल पर गए, तो देखा वही सज्जन अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठे हैं। मेरे बगल में कानपुर के आईआईटी के प्रोफेसर हेमंत दीक्षित थे। दीक्षितजी स्वभाव से बड़े सरल थे। जब मैंने दीक्षितजी से उनके के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि यही तो बाबा नागार्जुन हैं। मैं चकित था। बाबा के प्रति मेरे मन में जो छवि थी वह दूसरे तरह की थी। यानी किसी हाईफाई व्यक्ति की। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद बाबा फिर आए और मेरे बिस्तर पर ही बैठ गए। मैंने उन्हें प्रणाम किया तो उन्होंने पूछा-‘‘कहां से आए हो?’’ ‘‘कटिहार से।’’ मैंने कहा। बाबा आंखें बंदकर कुछ देर तक सोचते रहे। मैं समझ नहीं पाया कि आखिर बात क्या है? सोचने लगे। उसके बाद मैंने गहरे महसूस किया कि बाबा मेरे प्रति कुछ ज्यादा ही कृपालु लगे। बाद में उन्होंने कहा, ‘‘तुम खास हो, क्योंकि रेणु के क्षेत्र से आए हो…।’’ बाबा का अपने सामकालीनों के प्रति यह आत्मीय भाव आज के समय में दुर्लभ है। हिन्दी में आज कितने ऐसे लोग हैं जो अपने समकालीनों से इतना गहरा जुड़ाव रखते हैं। आज का हिन्दी लेखक अपने ही लोगों से इतना दाह करने लगा है कि इतना कोई तो औरत अपने सौत भी न करती होगी। कोई थोड़ा अच्छा लिखने लगा या उसकी चर्चा होने लगी तो उसके हजार शत्रु हो जाते हैं। यह बात बाबा में नहीं थी। सभी एक-दूसरे से बेहद प्यार करते थे। इस संदर्भ में केदारनाथ अग्रवाल की बाबा के लिए लिखी कविता याद आती है- ‘‘आओ साथी गले लगा लूं/तुम्हे, तुम्हारी मिथिला की प्यारी धरती को, तुममे ब्यापे विद्यापति को/और वहां की जनवाणी का छंद चूम लूं/और वहां के गढ़-पोखर का पानी छूकर नैन जुड़ा लूं/और वहां के दुख मोचन, मोहन माझी को मित्र बना लूं/’’

इस संदर्भ यह उल्लेखनीय है कि नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह और त्रिलोचन एक दूसरे से बेहद प्रेम करते थे। यह प्रेम ही इनकी कविताओं की सबसे बड़ी ताकत है। मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि उन चारों में ऐसा व्यवहार नागार्जुन ही कर सकते थे कि जो व्यक्ति स्वागत में बिस्तर छोड़कर उनकी अगवानी में नहीं उठा, वह उसी के बिस्तर पर आ कर बैठ गए। उसके बाद बाबा का बिस्तर भी वहीं लग गया। उस रात करीब दो बजे मेरी नींद खुली तो दखा बत्ती जल रही थी और बाबा कुछ लिख रहे थे। मुझे देखा तो कहने लगे, ‘‘नींद नहीं आ रही है। दमा ने बेदम कर दिया है…।’’ मैंने लक्ष्य किया बाबा पोस्टकार्ट पर लिख रहे थे। उसमें पता था ‘तरौनी’ का। कार्यक्रम के अंतिम दिन बाबा ने मेरी डायरी में लिखा- ‘‘काश, आंखें/पीठ की ओर होतीं!/काश, पीठ के कान होते!/काश, सिर/खिसक-खिसक कर/कभी-कभी/दिल के नीचे आ लगता!’’ बाबा की आंखें पीठ की ओर भी थीं। इसीलिए उनकी कविताएं उनलोगों की व्यथा की कथा कहती हैं जो आजादी के इतने वर्षों बाद भी कहीं पीछे छूट गए हैं।

बाबा से अंतिम मुलाकात 1994 में दिल्ली के प्रगति मैदान के विश्‍वपुस्तक मेले में हुई थी। वे राजपाल एंड संस के स्टाल पर कोई पुस्तक देख रह थे। मेरे साथ संजना भी थी। हम दोनों ने बाबा के पांव छूए, तो बाबा बेहद खुश हुए। जब संजना से परिचय करवाया तो उसके सिर पर हाथ रखकर कहने लगे- ‘‘खूब फलो-फूलो..।’’ उसके बाद बाबा ने कहा- ‘‘बहुत देर से मेले में था। अब मैं जाना चाहता हूं…।’’ बाबा उसके बाद सचमुच मेले से चले गए- इस दुनिया के मेले से। उसके कुछ ही दिनों बाद वे दरभंगा गए तो फिर कभी नहीं लौटे।

कोलकाता की ही एक और घटना,  जिसे मैं कभी नहीं भूल नहीं पाता। हुगली नदी के किनारे स्थित जूट मिल के गेट पर मिल मजदूरों के बीच काव्य पाठ का आयोजन था। जहां तक मुझे याद है हजारों की संख्या में वहां मजदूर कवियों के स्वागत में पहले से जमा थे। वहां पहुंचने पर मजदूरों ने जिस तरह कवियों का स्वागत किया, वैसा फिर कभी देखने को नहीं मिला। उस दिन पहली बार लगा था कि कविता लिखना आज सार्थक हो गया। क्योंकि जिनके लिए ये कविताएं हैं, वे उन कविताओं को सुनने के लिए आतुर थे। वहां मैंने सबसे पहले एक गीत सुनाया था। गीत की पंक्तियां थीं- ‘‘सदियों से जो ढूंढ रहे हैं/उत्तर ज्ञानी-ध्यानी में/प्यासे ही अब डूब गए हैं गंगाजी के पानी में।’’ और भी कवियों ने कविताएं सुनाईं, लेकिन वे कविताएं इतनी उम्दा थीं कि मजदूरों के पल्ले नहीं पड़ीं। इसलिए मुझे पुनः कविता सुनाने को कहा गया। मैं संकोच में पड़ गया तो बाबा ने कहा- ‘‘जन कवि हो। जनता सुनना चाहती है तो सुनाओ…।’’ उसके बाद वहां उपस्थित युवा कवियों से बाबा ने कहा- ‘‘छंद में लिखो या मुक्त छंद में इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, अगर उसमें लोक चेतना नहीं है तो…। सिर्फ छंद कविता नहीं है और न ही मुक्त छंद कविता है। ये सिर्फ प्रस्तुति के माध्यम भर हैं। कविता हमारे जीवन से आती है। जैसा जीवन होगा, वैसी कविता होगी…।’’ सच तो यह है कि कविता के मामले में बाबा मध्यमार्गी थे। उन्हें न तो छंदों से परहेज था न मुक्त छंद से। उनकी पीढ़ी के बाकी कवियों के साथ भी लगभग यही बात रही। यही कारण है कि उनकी पीढ़ी के कवियों में विविधता अनेक स्तरों पर देखी जा सकती है। अपनी पीढी़ के बाकी कवियों की अपेक्षा बाबा की कविताओं में जनपदीयता का प्रभाव अधिक है। इसीलिए उनकी कविताएं जनता के अधिक करीब लगती हैं। यह बाबा की कविताओं की सबसे बड़ी ताकत है। बाबा की कविताएं अबुझ पहेली जैसी नहीं हैं। उनकी कविताएं हकलाती नहीं हैं। वे पानी पी-पीकर कविताएं नहीं लिखते थे,  बल्कि जिनके खिलाफ वे लिखते थे उन्हें वे पानी पिला-पिलाकर कविताएं सुनाते थे। लेकिन आज बाबा की परंपरा की कविताओं को संचार माध्यमों से लगभग दूर कर दिया गया है। जो कविताएं प्रकाश में आ रही हैं उनसे यह भ्रम पैदा हो रहा है कि हिन्दी में ऐसी ही कविताएं लिखी जा रही हैं। यही कारण है कि प्रकाशक कविता संग्रह छापने से कतराने लगे हैं और जनता कविता से दूर होती जा रही है। सच तो यह है कि आज भी जनता को अच्छी कविता का इंतजार है। इसके लिए जरूरी है कि प्रकाशक अच्छे कविता संग्रहों की तलाश करें। जो संग्रह वे छाप रहे हैं, उनकी सरकारी खरीद तो हो सकती है लेकिन जनस्वीकृति नहीं मिल सकती। जनपक्षधर साहित्य के लिए आज जैसा संकट है, पहले ऐसा शायद कभी नहीं था। इसका कारण यह है कि पहले साहित्य के पीछे बाजार था, लेकिन अब बाजार में साहित्य है। जो बाजार देगा उसी का साहित्य संचार माध्यमों में आएगा। प्रकाशक उसे ही छापेंगे और पुरस्कार समितियां उन्हें ही पुरस्कृत करेंगी। सारा मामला लेन-देन का है। इसलिए इसको लेकर बहुत निराश होने की जरूरत नहीं है। बचता है अंततः साहित्य ही। अगर अच्छा कुछ लिखा जा सका तो वही सबसे बड़ी उपलब्धि है। कोशि‍श भी इसी की होनी चाहिए। अच्छे साहित्य को पुरस्कार की जरूरत नहीं है। सच तो यह है कि पुरस्कृत साहित्य के प्रति संदेह होने लगा है। हिन्दी का यह कितना बड़ा व्यंग्य है कि निराला को साहित्य अकादेमी पुरस्कार नहीं मिला, जबकि साहित्य अकादेमी की स्थापना के दस वर्ष बाद तक निराला जीवत रहे। और नागार्जुन को भी जो मिला वह हिन्दी के लिए नहीं, मैथिली के लिए। फिर भी उम्मीद है कि बाबा की परंपरा की कविताएं आएंगी। वह आएंगी, लेकिन टीबी के जरिए नहीं, अखबारों के जरिए नहीं, वह हवाई जहाज से नहीं आएंगी और न हीं महंगी गाड़ियों से आएंगी। वह चल चुक
ी हैं तो आएंगी ही, लेकिन थोड़ा विलंब से, क्योंकि उन्हें पांव-पैदल ही आना है। उनकी कविताओं को स्मरण करते हुए जब मैं सादतपुर की गलियों में प्रभात फेरी कर रहा था तो लगा कि इन्हीं गलियों से बाबा न जाने कितनी बार गुजरे होंगे। आज भी मैं उनके कदमों की आहट गहरे महसूस करता हूं।

अनभै सांचा का कवि : विश्वनाथ त्रिपाठी

विश्वनाथ त्रिपाठी

विगत 25 जून को नागार्जुन के जन्म स्थान तरौनी गांव में प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान में उनके जन्मशताब्दी समारोह का शुभारंभ हुआ। मिथिलांचल बिहार प्रदेश के अंतर्गत है। इसमें बिहार के अनेक प्रगतिशील साहित्यकारों ने भाग लिया। बाहर से भी अनेक प्रसिद्ध साहित्यकार पहुंचे। आयोजन बिहार प्रगतिशील लेखक संघ ने किया था। वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने भी कार्यक्रम में भाग लिया। वहां से लौटकर बाबा को याद कर रहे हैं- 
समारोह में शामिल होने के लिए तरौनी की यह यात्रा वस्तुत: तीर्थयात्रा थी। नागार्जुन को बाबा के नाम से कहा और जाना जाता था। हिंदी में बाबा नाम से केवल एक और साहित्यकार को जाना जाता है। वे हैं बाबा तुलसीराम। तुलसीदास ने घर और परिवार छोड़ दिया था। बाबा ने घर-परिवार से संबंध तो नहीं तोड़ा, लेकिन वे अधिकांशत बाहर ही रहते थे।
गृहस्थ से ज्यादा यात्री थे। तुलसीदास की कविता के बारे में समालोचकों का विचार है कि उन्होंने अपने समय में प्रचलित सभी काव्य रूपों का उपयोग किया। नागार्जुन ने आधुनिक समय में प्रचलित शायद ही कोई ऐसा छंद हो जिसमें कविता न की हो- केवल शिष्ट साहित्यिक छंद ही नहीं, लोक गानों और लोक धुनों में भी। लेकिन तुलसीदास और नागार्जुन में केवल समानता ढूंढना गलत तो होगा ही अनर्थक भी। बाबा नागार्जुन सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी के वर्णाश्रम व्यवस्थावादी रामभक्त नहीं, बीसवीं शताब्दी के समाजवादी विचारधारा से प्रतिबद्ध रचनाकार हैं। उन्होंने ‘हरिजन गाथा’ नामक महाकाव्यात्मक कविता लिखी, जिसमें नए युग के नायक का हरिजनावतार कराया। नागार्जुन ने इस हरिजन शिशु को वराह अवतार कहा है। वराह का अवतार अर्थात् वह धरती का उद्धार करने वाला होगा। नागार्जुन की कविता हिंदी साहित्य में एक नए बोध और शिल्प का आविष्कार करती है। दलितों और हरिजनों को सहानुभूति देने वाली कवितायें तो इसके पहले लिखी गई थीं, लेकिन हरिजन का यह सशक्त रूप हिंदी साहित्य में पहले नहीं दिखलायी पड़ा था। हरिजन शिशु की छोटी हथेलियों में- आड़ी तिरछी रेखाओं में हथियारों के ही निशान हैं खुखरी है, बम है, अस्ति भी है, गंड़ासा माला प्रधान है।
नागार्जुन के रचनाकार में कबीर और तुलसीदास का मणि कांचन योग है। नागार्जुन का व्यक्तित्व भी कालजयी लगता है। नागार्जुन दिल्ली प्राय: आते रहते थे। पूर्वी दिल्ली में सादतपुर में एक छोटा सा मकान था। उसमें अपने पुत्र श्रीकांत के साथ ठहरते थे। अगर आप यह पता लगाएं कि दिल्ली आकर वे किन लोगों से मिलते थे तो आप आश्चर्य चकित रह जाएंगे। मैंने उनकी कोई ऐसी फोटो नहीं देखी जिसमें वे किसी मंत्री, उद्योगपति, नेता या गुंडे के साथ दिखलाई पड़े। वे अज्ञात या अल्प-अज्ञात निम्न वर्गीय नवयुवक साहित्यकारों या उपेक्षित अधेड़ या वृद्ध मित्र साहित्यकारों के यहां बिन बुलाये पहुंच जाते थे। जिस घर पहुंचते थे कुछ दिनों के लिए उस घर के हो जाते थे। कभी-कभी तो अतीव मनोरंजक तनाव की स्थितियां पैदा हो जाती थीं। सो एक बार नागार्जुन ने मेरे घर पर भी आने की कृपा की।
मैं सादतपुर से उन्हें रिक्शे पर बिठाकर अपने घर लाया। रास्ते भर बाबा भुनभुनाते रहे ऑटो नहीं कर सकते थे। खैर किसी तरह घर पहुंचे। आते ही फरमाइश की दलिया खिलाओ। पत्नी ने दलिया बनाया। चखा, तो बोले, कैसी दलिया बनायी है? इसमें नमक ही नहीं है। पत्नी ने कहा कि इन्हें ब्लड प्रेशर है इसलिए हम नमक कम खाते हैं। अतिथि को इतना तेज गुस्सा आया कि दलिया का कटोरा लेकर चौके में जा पहुंचे। बोले- दलिया ऐसे बनाया जाता है? दलिया को पहले घी में भूना जाता है। फिर दूध या पानी से पकाया जाता है। तब दलिया खिलता है। पत्नी चुप रहीं। अकेले में मुझसे बोली, यह तुम मेरी सास को कहां से पकड़ लाए? लेकिन चार-पांच दिनों के बाद जब नागार्जुन जाने लगे तो पत्नी रोने लगी। मां-बाप की तरह ऐसे लोग बड़े भाग्य से घर आते हैं। इन्हीं दिनों मैंने नागार्जुन के रचना धर्मी रूप की एक झलक भी देखी। मेरी बड़ी नातिन चार-पांच साल की थी। उससे नागार्जुन की सबसे ज्यादा पटती। एक दिन तीसरे पहर भोजनोपरांत शयन के बाद उठा तो देखा नागार्जुन बहुत देर तक फर्श पर पड़ी किसी चीज को बड़ी गंभीरता से देखने में तन्मय हैं। समाधि लगी हो मानो। जब उन्हें मेरी आहट मिली तो बोले ‘देखो, कविता है यह। ‘नातिन की छोटी-छोटी चप्पलों को वह देख रहे थे। रचना-समाधि में लीन उनका चेहरा मैं कभी नहीं भूल सकता।
नागार्जुन बुजुर्गों के साथ बुजुर्ग-जवानों के साथ जवान और बच्चों के साथ हो जाते थे। जिन लोगों ने उन्हें महिलाओं के साथ घुल-मिलकर बातें करते देखा है वे लिस्ट को आगे बढ़ाएंगे। अपनी एक कविता में वह शिशु चिनार से बात करते हैं और कालिदास से जवाब-तलब करते हैं- ‘कालिदास सच-सच बतलाना।’ उनका जीवन अनुभव व्यापक था, कबीरदास की भांति वह अनेक परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों के समुच्चय थे। जीवन के प्रति गहरी आसक्ति थी। तीव्र सौंदर्यानुभूति के रचनाकार थे और इसलिए गहरी घृणा और तिलमिला देने वाले व्यंग्य के सहज कवि। यह सहजता जटिल अंतर्वस्तु का रूप है। जटिल अंतर्वस्तु के बगैर सहजता आ ही नहीं सकती। कविता की बात छोडि़ए, जीवन में भी वह जो इतने सहज थे, उसकी भी वजह व्यापक परस्पर-विरोधी जीवन स्थितियों को पचा सकने वाली क्षमता का ही प्रभाव है। बात सुनने में थोड़ा अजीब लगेगी, लेकिन है सच कि नागार्जुन कविता करते समय भी सिर्फ कवि नहीं, आदमी बने रहते हैं। मतलब यह कि वे रचना की प्रक्रिया में रचनात्मकता के व्याकरण का ही पालन नहीं करते। आम आदमी की तरह स्थितियों और घटनाओं का प्रभाव ग्रहण करने वाले नागार्जुन काव्य-रूढिय़ों का अतिक्रमण करते हैं। संवेदना और शिल्प का तालमेल करते हैं। ऐसा व्यक्ति साहित्य रचते समय भी न तो काव्य रूढिय़ों का ही अनुशासन पूरी तरह स्वीकार कर सकता है और न विचारधारा या पार्टी का ही। नागार्जुन की कवितायें पढ़ते ही पाठक कविता की दुनिया से निकलकर जीवन में आ जाता है। और उसके लिए जीवन-रस ही काव्य स्वाद बन जाता है। नागार्जुन की बहुत अच्छी कविता है- फूले कदंब। कंदब पुष्प की शोभा का बयान करके उसे साक्षात कर दिया। यह हो गया कवि का काम। अपने ही द्वारा रचित पुष्पित कंदब को छूने का मन कवि में छिपे आदमी का हो रहा है। सो आखिर में लिखा ‘मन कहता है छू ले कदंब’।
अनार के दानों का उपमान सुंदर दंत पंक्ति के लिए किया जाता है। प्राय: सुंदर नायिकाओं की सुंदर दंत पंक्ति के लिए। लेकिन उस आदमी के दांत जो अभी दिल्ली से टिकट मार कर लौटा है। पान चबा रहा है। इतना पुलकित-प्रसन्न है। कैसा लग रहा है। कुटिल आदमी की प्रसन्नता कितनी घृणास्पद होती है। दांत तो अनार ही जैसे हैं, लेकिन खिले हुए हैं। खिले क्रिया से दांतों का दूर-दूर होना, बीच की खाली जगह का दिखलाई पडऩा। जिसे ‘बीडर’ कहते हैं ‘खिले’ क्रिया से अनार के दानों का उपमान सौंदर्य नहीं, कुरुचि प्रदान करता है। और यह व्यंग्य का प्रहार निर्मम है-
आये दिन बहार के
खिले हैं दांत ज्यों दाने अनार के
दिल्ली से लौटे हैं अभी टिकट मारकर
नागार्जुन को आधुनिक कबीर यों ही नहीं कहा जाता है। कबीर ‘आंखिन देखी’ में विश्वास करते थे। ‘अनभै सांचाÓ की अभिव्यक्ति का साहस रखते थे। ‘अनभै सांचा’ अनुभव और निर्भीकता दोनों का अर्थ देने वाला संश्लिष्ट पद है। प्रगतिशील कवि कल्पना, स्मृति आदि की अपेक्षा देखने पर अर्थात् जो सामने दिख रहा है, उससे ज्यादा आकृष्ट होते हैं। ‘जो सामने हैÓ उसी में इतिहास, भविष्य सब कुछ समाया है। इसलिए देखने की कल्पना आदि से कम महत्वपूर्ण नहीं समझना चाहिए। वस्तुत: यह अंतर लोक और वेद का है। लोक और वेद के संतुलन की बात तुलसी करते थे। कबीर लोक और वेद के संतुलन पर नहीं, उसके अंतर पर बल देते थे- तू कहता है कागद लेखी, मैं कहता हूं आंखिन देखी।
इस देखी की रचनात्मकता में बड़ी महिमा है। नागार्जुन की एक कविता है- बादल को घिरते देखा है। ‘देखा है’ का अर्थ प्रत्यक्ष अनुभव किया है, अपनी आंखों देखकर जाना है। किताबों में पढ़कर, सुनी-सुनाई बात नहीं। मैं अपने अनुभव को अभिव्यक्त कर रहा हूं। आंख और कान में अंतर होता है। अनुभव का सर्वाधिक विश्वसनीय इंद्रिय माध्यम आंख है। आंख प्रतीक है प्रत्यक्ष अनुभव का, अनुमान इससे कमतर है। इसी कविता में नागार्जुन ने लिखा-
कहां गया धनपति कुबेर वह, कहां गई उसकी वह अलका
नहीं ठिकाना कालिदास के, व्योम-प्रवाही गंगाजल का
ढूंढ़ा बहुत परंतु लगा क्या, मेघदूत का पता कहीं पर
जाने दो वह कवि-कल्पित था
मैंने तो भीषण जाड़ों में
नभ चुंबी कैलाश-शीर्ष पर
महामेघ को झंझानिल से
गरज-गरज भिड़ते देखा है
बादल को घिरते देखा है।
कुबेर, अलका, व्योम-प्रवाही गंगाजल- सुनी-सुनाई बातें हैं, मेघदूत किताब है- मैंने जो बादल देखे, वे किताबी नहीं- आंखों से देखे, ये पंक्तियां उनको चित्रित करती हैं। लोग कालिदास के बादलों के बारे में लिखते होंगे।
‘मैंने तो में ‘तो’ के आग्रह पर विचार कीजिए। कालिदास की महानता से इंकार नहीं, लेकिन उनका अनुभव नागार्जुन का अनुभव हो- तो नागार्जुन की कविता की क्या जरूरत है। सच्चे अर्थ में यह कवि की स्वायत्तता और निजता है। ‘यह देखना’ कबीर का ‘आंखिन देखी’ ही है। कवि सरस्वती-पुत्र होता है। वह ‘अनभै साँचा’ की ही अभिव्यक्ति करता है। कबीर भक्त होते हुए भी राम के सामने भी तन कर खड़े होते थे। नागार्जुन सामाजिक विचारों के हैं, अपने को बार-बार प्रतिबद्ध घोषित करते हैं, लेकिन वामपंथी पार्टियों की खुलकर आलोचना करते हैं। बड़े कवि के पास विचारधारा का आग्रह तो होता है, लेकिन वह अपने अनुभव के आधार पर विचारधारा को तोड़ता भी है। नागार्जुन ने पारंपरिक काव्य-रूपों का हिंदी और उसकी बोलियों की क्षमता का अभूतपूर्व उपयोग किया है। नागार्जुन मैथिली और हिंदी दो भाषाओं के महाकवि हैं। जैसे तुलसीदास अवधी और ब्रजभाषा के। नागार्जुन ऐसे आधुनिक कवि हैं, जिनके पास विद्यापति, कबीर और तुलसी की परंपरा का उत्तराधिकार है। वे आधुनिक हिंदी और मैथिली के कालजयी कवि हैं।