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बुद्धिमत्ता आखि‍र है क्‍या : आइजैक एसिमोव

आइजैक एसिमोव ( 2 जनवरी 1920- 6 अप्रैल 1992)

जब मैं फौज में था, मैंने एक एप्टीट्यूड टेस्ट में हिस्सा लिया था। अमूमन सभी सैनिक इस टेस्ट को देते हैं। आम तौर पर मिलने वाले 100 अंकों की जगह मुझे 160 अंक मिले। उस छावनी के इतिहास में किसी ने भी अब तक यह कारनामा अंजाम नहीं दिया था। पूर दो घंटे तक मेरी इस उपलब्धि पर तमाशा होता रहा।

(इस बात का कोई ख़ास मतलब तो था नहीं। अगले दिन मैं फिर से उसी पुरानी और शानदार फौजी ड्यूटी पर तैनात कर दिया गया- यानी लंगर की चौकीदारी!)

जीवन भर मैं इसी तरह शानदार अंक लाता रहा हूं। और एक तरह से खुद को तसल्ली देता रहा हूं कि बड़ा बुद्धिमान हूं और उम्मीद करता हूं कि दूसरे लोग भी मेरे बारे में यही राय रखें।

वास्तव में ऐसे अंकों का लब्बो-लुआब यही है कि मैं इस तरह के अकादमिक प्रश्नों का जवाब देने में खासा अच्छा हूं, जो इस तरह की बुद्धिमत्ता परीक्षाएं लेने वाले लोगों द्वारा पसंद किए जाते हैं। यानी मेरी ही तरह के बौद्धिक रुझान के लोग।

उदाहरण के लिए, मैं एक मोटर मैकेनिक को जानता था जो इन बुद्धिमत्ता परीक्षाओं में किसी भी हाल मेरे हिसाब से 80 से ज्यादा स्कोर नहीं कर सकता था। मैं मानकर चलता था कि मैं मैकेनिक से ज्यादा बुद्धिमान हूं।

लेकिन जब भी मेरी कार में कोई गड़बड़ी होती तो मैं भागकर उसके पास पहुंच जाता। बेचैनी से उसे गाड़ी की जांच करते हुए देखता और उसके निर्देशों को ऐसे सुनता जैसे कोई देववाणी हो और वह हमेशा मेरी गाड़ी दुरुस्त कर देता।

सोचिए अगर मोटर मैकेनिक को बुद्धिमत्ता परीक्षा का प्रश्नपत्र तैयार करने को कहा जाता।

या किसी अकादमिक को छोड़कर कोई बढ़ई, या कोई किसान इस प्रश्नपत्र को तैयार करते। ऐसी किसी भी परीक्षा में मैं पक्के तौर पर खुद को बेवकूफ साबित करता और मैं बेवकूफ होता भी।

एक ऐसी दुनिया में, जहां मुझे अपनी अकादमिक ट्रेनिंग और मेरी जुबानी प्रतिभा का इस्तेमाल करने की छूट न हो, बल्कि उसकी जगह कुछ जटिल-श्रमसाध्य करना हो और वह भी अपने हाथों से, मैं फिसड्डी साबित होऊंगा।  

इस तरह मेरी बुद्धिमत्ता, निरपेक्ष नहीं, बल्कि उस समाज का एक फलन है जिसमें मैं रहता हूं। और यह उस सच्चाई का भी नतीजा है जिसे समाज के एक छोटे से हिस्से ने खुद को ऐसे मामलों का विशेषज्ञ बनाकर थोप दिया है।

आइए, एक बार फिर अपने मोटर मैकेनिक की चर्चा करें।

उसकी एक आदत थी- जब भी वह मुझसे मिलता तो मुझे चुटकुले सुनाता।

एक बार उसने गाड़ी के नीचे से अपना सर बाहर निकाल कर कहा: “डॉक्टर! एक बार एक गूंगा-बहरा आदमी कुछ कीलें खरीदने को हार्डवेयर की दुकान में गया। उसने काउंटर पर दो अंगुलियां खड़ी कीं और दूसरे हाथ से उन पर हथौड़ा चलाने का अभिनय किया।

“दुकानदार भीतर से हथौड़ा ले आया। उसने अपना सर हिलाया और उन दो अंगुलियों की ओर इशारा किया जिस पर वह हथौड़ा चलाने का उपक्रम कर रहा था। दुकानदार ने उसे कीलें लाकर दीं। उसने अपनी ज़रूरत की कीलें चुनीं और चला आया। इसी तरह डॉक्टर, अगला बंदा जो दुकान में आया, वह अंधा था। उसे कैंची की ज़रूरत थी। तुम्हारे हिसाब से उसने दुकानदार को कैसे समझाया होगा?”

उसकी बातों में खोए-खोए मैंने अपना दायां हाथ उठाया और अपनी पहली दो अंगुलियों से कैंची की मुद्रा बनाकर दिखाई।

इस पर मोटर मैकेनिक जोर-जोर से हंसते हुए बोला, “हे महामूर्ख, उसने अपनी आवाज़ इस्तेमाल की और बताया कि उसे कैंची चाहिए।”

फिर उसने बड़ी आत्मतुष्टि से कहा, “आज मैंने दिनभर अपने ग्राहकों से यही सवाल पूछा।”

“क्या तुमने काफी लोगों को इसी तरह बेवकूफ साबित किया?” मैंने पूछा।

“बहुत थोड़े”, वह बोला, “लेकिन तुम्हें तो मैंने बेवकूफ साबित कर ही दिया।”

“ऐसा क्यों हुआ?” मैंने पूछा.

“क्योंकि तुम बुड़बक पढ़े-लिखे हो डॉक्टर. मैं जानता हूं कि तुम ज्यादा स्मार्ट हो भी नहीं सकते।”

 मुझे कुछ बेचैनी महसूस हुई कि वह मेरे बारे में थोड़ा-बहुत जानता है। 

(रूस में जन्‍में प्रसि‍द्ध वि‍ज्ञान लेखक की आत्‍मकथा का एक अंश। इसका अनुवाद आशुतोष उपाध्‍याय ने कि‍या है।)

बिनबुलाया मेहमान : एंड्रयू हिंटन

बच्चों के साथ बलोबसेंग फुन्स्तोक।

बच्चों के साथ बलोबसेंग फुन्स्तोक।

लोबसेंग फुन्स्तोक एक पूर्व तिब्बती साधु हैं। उन्होंने पवित्र दलाई लामा के साथ प्रशिक्षण लिया और वर्षों तक पश्चिमी देशों में बौद्ध धर्म और ध्यान की शिक्षा दी। 2006 में वह साधु का चोला उतारकर भारत में अपने जन्म स्थान अरुणाचल प्रदेश लौट आये। यहां आकर उन्होंने हिमालय की तलहटी में अनाथ और गरीब बच्चों का एक समुदाय खड़ा कर दिया- झाम्त्से गत्सल बाल समाज– तिब्बती शब्द ‘झाम्त्से गत्सल’ का अर्थ है ‘प्रेम और दया का उपवन’। इस बाल समाज पर 2014 में एक फिल्म बनी- ‘ताशी एंड द मोंक’। झाम्त्से गत्सल की शुरुआत मात्र 34 बच्चों के साथ हुई। पिछले करीब एक दशक में यहां के बच्चों की संख्या बढ़कर 85 हो गयी है। 5 आश्रममाताएं और 13 शिक्षक इन बच्चों की देखरेख करते हैं। झाम्त्से गत्सल को उम्मीद है कि वह इतना विस्तार करे कि 200 बच्चे यहां रह सकें। इस साक्षात्कार में फिल्म के निर्देशक एंड्रयू हिंटन लोबसेंग फुन्स्तोक से उनके तकलीफ़देह बचपन और उस प्रेरणा के बारे में बातचीत कर रहे हैं, जिनकी बदौलत वह गरीब बच्चों के लिए एक बेहतर ज़िन्दगी की राह बना पाए हैं।

क्या आप इस सवाल के जवाब से अपनी बात शुरू कर सकते हैं कि आप कौन हैं और इस दुनिया में कैसे आये?

मेरा नाम लोबसेंग फुन्स्तोक है। मैं भारतीय हिमालय के सुदूरवर्ती अरुणाचल प्रदेश में पैदा हुआ। जब मेरी मां गर्भवती हुए तो वह अविवाहित और बहुत छोटी थी। जाहिर है, गांव में यह भारी बदनामी की बात थी। उन्होंने छुप-छुपा के हमारे घर के शौचालय में मुझे जन्म दिया। उन्होंने मुझे सूखी पत्तियों से ढककर उसी तरह छोड़ दिया जैसे- लोग अपने मल को छोड़ते थे। मेरी बुआ और दादा-दादी ने किसी के रोने की आवाज़ सुनी। उन्हें लगा कि‍ शायद कोई बकरी उनके खेत में आ गयी है और उनकी फसल को खा रही है। मेरी बुआ देखने के लिए बाहर आईं और उन्होंने सूखी हुई पत्तियों की नीचे कुछ हिलता हुआ नज़र आया। देखा तो वहां एक शिशु था और वह मैं था। मैं एक तरह से नीला-बैगनी पड़ चुका था- मौत के बिलकुल करीब।

आम तौर पर जब घर में कोई नया बच्चा आता है, परिवार वाले, दोस्त और पड़ोसी खुशियां मनाते हैं। लेकिन मेरा जन्म ऐसी घटना नहीं थी, जिसकी ख़ुशियां मनाई जा सकें। मैं अपने घरवालों के लिए कितना दुःख और बदनामी लेकर आया था। यही वजह थी कि छोटेपन में मुझे हमेशा कहा जाता था- ‘इस दुनिया में बिनबुलाया मेहमान’।

आपका बचपन कैसा था?

लोग सचमुच मुझे पसंद नहीं करते थे। मैं लोगों की खिड़कियां तोड़ता और प्रार्थना पताकाएं फाड़कर आये दिन मुसीबतें खड़ी कर देता था। मुझे अच्छी तरह याद है, किसी ने मुझसे कहा था, “तुम कभी नहीं बदलोगे। तुम सुधरने वाले नहीं हो।” पता नहीं कैसे यह बात मेरे दिमाग में घर कर गयी थी। आज भी मैं उस जगह हो देखता हूं और उन लम्हों को महसूस करता हूं। जाने कितनी बार मुझे लगता था इससे तो मर जाना अच्छा। सौभाग्य से मेरे दादा-दादी थे जो तब भी मुझे बहुत प्यार करते थे, जब मैं प्यार के जरा भी लायक नहीं था। मैं इसे महसूस कर सकता हूं क्योंकि उनकी दयालुता के कारण ही आज मैं जिंदा हूं। किसी तरह उन्होंने मेरे भीतर कुछ महसूस किया, लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने तय किया कि मुझे बदलने का एक ही रास्ता है- मुझे मठ में भेज दिया जाये।

मेरे दादा बड़े कठोर इंसान लगते थे, लेकिन उनका हृदय बड़ा कोमल था। वह जताते नहीं थे, लेकिन उनके प्यार को आप महसूस कर सकते थे। मेरे दादा-दादी के पास ज्यादा कुछ था नहीं, लेकिन दक्षिण भारत स्थित मठ के लिए प्रस्थान करने से ठीक एक दिन पहले दादा जी ने अपने पैजामों को काट-पीटकर एक थैला बनाया और इसमें खूब सारा पैसा डालकर बाहर मेरा नाम लिख दिया। उन्होंने कहा, “इसे हमेशा अपने पास रखना और जब तक सचमुच बहुत ज़रूरत न पड़े इन्हें इस्तेमाल मत करना।” बहुत बाद में मैं इस बात को समझ पाया कि उन्हें मुझ से कितना प्यार था और किनता भरोसा मुझे पर करते थे।

इस तरह 7 वर्ष की आयु में आप घर छोड़कर मठवासी हो गए. वहां क्या हुआ?

मठ की दिनचर्या बहुत सख्त थी और अनुशासन बहुत कठोर। एक बच्चे के रूप में मेरे लिए यह कठिन था, लेकिन एक युवा साधु के रूप में मेरा दिमाग हर वक्त व्यस्त रहता था और मेरे पास कुछ और सोचने के लिए समय नहीं था। मुझे वहां की दिनचर्या, नीति, अनुशासन, गतिविधियां और मठ में किये जाने वाले तमाम कार्यों का पालन करना होता था। अच्छा बनाने में थोड़ा वक्त लगा। हर चीज़ के बारे में मेरा नजरिया नकारात्मक था, लेकिन एक बिंदु पर आकर मैंने सकारात्मक ढंग से सोचना शुरू किया। मेरा आत्मविश्वास बढ़ने लगा और मुझे भरोसा होने लगा कि मैं भी एक अच्छा इंसान बन सकता हूं।

मेरे शिक्षक से मिली शिक्षाओं में एक थी- तुम इस ब्रहमांड में एक बहुत विशाल परिवार के बहुत-बहुत छोटे हिस्से हो। खरबों मनुष्यों और अनगिनत जीवधारियों- जीव-जंतुओं, कीड़े-मकोड़ों व पंछियों के बीच एक अदने से इंसान.। इस बात ने मुझे अपनी चुनौतियों व कठिनाइयों के बीच दूसरे जीवों से जुड़ने में बड़ी मदद की। और जब ऐसा होता है तो हमारा फोकस बदल जाता है। शिकायत करने के बजाय आप खुद से सवाल करने लगते हैं, “अपने परिवार, अपने बड़े परिवार को उनकी कठिनाइयों से बाहर निकलने में मैं कैसे मदद करूं।”

आज मैं अपनी कठिनाइयों को छोटे बच्चों के साथ साझा करता हूं, क्योंकि उनमें से अधिकतर उन्हीं चुनौतियों का सामना कर रहे हैं जिनसे कभी मेरा वास्ता पड़ा था। मैं उन्हें यह भरोसा करने के लिए प्रोत्साहित करता हूं कि नकारात्मक होने की कतई ज़रूरत नहीं है। आज मैं जानता हूं कि मेरा जैसा तकलीफदेह बचपन भी एक तरह का आशीर्वाद है।

और कब आपको महसूस हुआ कि आप अपने अनुभवों को किसी सकारात्मक अंजाम में बदलना चाहते हैं?

मेरा ख़याल है कि बच्चों के समाज की स्थापना के बीज मेरे भीतर बहुत छोटी उम्र से थे।

जब मठ में मेरी परवरिश हो रही थी मेरे शिक्षक हमेशा इस बात की शिक्षा देते थे कि अपनी ज़िन्दगी में कुछ-न-कुछ अर्थपूर्ण ज़रूर करो। वह हमें प्रार्थना करने के लिए प्रेरित करते थे और उसके बाद अपने और दूसरों के लिए कुछ-न-कुछ उपयोगी काम करने का ज़ज्बा पैदा करते थे।

उन दिनों जब भी मैं घर आता था, देखता था कि यहां सारे बच्चे उसी तरह की समस्या से जूझ रहे हैं- कुछ करने के लिए यह सीधा सन्देश था। तब इस तरह के काम का मुझे कोई तजुर्बा नहीं था, आज जो मैं करता हूं, उसे कर पाने के लिए मेरे पास पर्याप्त शिक्षा नहीं थी। लेकिन अपने अनुभव के आधार पर मैं कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने के बारे में बोलता था।

आज मेरे पास जो कुछ भी है वह औरों की दयालुता की वजह से है। और अब मेरे सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि उस दयालुता की कीमत चुकाऊँ। मैं खुद को याद दिलाता हूं कि मेरा बचपन भले ही कठिन रहा हो, मैं उनमें आस्था और भरोसा कभी नहीं खोऊंगा।

आपके बाल समाज के नाम का क्या महत्व है?

झाम्त्से गत्सल का मतलब है- ‘प्रेम और दयालुता का उपवन’। यहां हम जो कुछ कर रहे हैं, उसे यह नाम पूरी सच्चाई से अभिव्यक्त करता है। इन बच्चों को परिवार, प्रेम और अपनेपन के अहसास की ज़रूरत है।

यही कारण है कि मैंने इसे बाल समाज कहने का निर्णय लिया- यह उनका परिवार है, उनका समाज है और उनकी ज़िन्दगी है। झाम्त्से गत्सल में बच्चे अनाथ नहीं हैं। यहां उनके माता-पिता हैं, उनकी कई मांएं हैं, कई पिता हैं और कई-कई भाई-बहन हैं, जो उनका ख़याल रखते हैं। यहां उन्हें वह सब ख़याल, प्यार और मदद मिलती है, जिसके वे हकदार हैं।

और आपने यह समाज यहां क्यों शुरू किया?

यह इलाका (अरुणाचल प्रदेश का तवांग जिला) आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण से सर्वाधिक पिछड़े इलाकों में एक है। जब 2006 में हमने शुरुआत की, तब यह जगह इतनी दूर थी कि हम आपसी बातचीत में इसे जुरासिक पार्क का रास्ता कहते थे। एक छोटे से कस्बे से 6-7 किलोमीटर के मोटर के सफ़र के बावजूद ऐसे घने जंगल से गुजरना पड़ता था, जहां दिन के समय भी आप अकेले जाने में घबराएंगे।

इसलिए एक तरह से मैं महसूस करता हूं कि हमारा बाल समाज भी शुरुआत भी एक अनाथ की तरह हुई। यह वास्तव में कोई शानदार जगह नहीं थी, जहां लोग अच्छा काम करना पसंद करते।

यहां के बच्चे कौन है और वे कहां से आते हैं?

हमारे बच्चों में ज्यादातर पहले पीढ़ी के शिक्षार्थी हैं। जब हम गावों में जाते हैं तो परिवार के सबसे तेज-तर्रार बच्चे को नहीं चुनते, बल्कि हम पूछते हैं- कौन सबसे चुनौतीपूर्ण बच्चा है? ऐसा कौन सा बच्चा है जिसे कोई नहीं चाहता?

हमारा काम उस बच्चे को स्वीकार करना है जिसकी कोई और देखभाल नहीं कर सकता और कोई करना भी नहीं चाहता। और उस बच्चे को सबसे शानदार इंसान में बदलने में मदद करना।

और यह आप सिर्फ प्यार और दयालुता के सहारे करते हैं?

हमारे बच्चों में लगभग सभी ने अपने-अपने गांव में बड़ा कठिन बचपन गुज़ारा है। लोग कहते हैं, “हे भगवान्, तुम्हें डॉक्टर की ज़रूरत पड़ेगी, तुम्हें मनोवैज्ञानिक बुलाना पड़ेगा, मनोचिकित्सक ही इन बच्चों को ठीक कर सकता है।” लेकिन अपने आठ साल के इतिहास में हमने अपने बच्चों को किसी तरह की दवा नहीं खिलाई।

सबसे पहले मैं समझता हूं यह सब झाम्त्से गत्सल के सादगी भरे जीवन का असर है। हम बच्चे को अपनाते हैं- बिना किसी निर्णय के उसे गले लगाते हैं, अच्छा, बुरा, कैसा भी। इसके बाद हम वास्तव में उसके लिए जगह बनाने की कोशिश करते हैं और उसके साथ सहयोगपूर्ण बर्ताव करते हैं।

इसके बाद सब प्रेम की ताकत है। ख़याल रखने की ताकत या दयालुता की ताकत जो हम हर बच्चे को देते हैं. और यह प्रत्येक बच्चे के लिए मरहम का काम करता है। और मुझे पक्का भरोसा है कि यह उपाय काम करता है। बेशक इसमें समय लगता है, लेकिन अंततः बच्चे बदल जाते हैं।

हमारे बाल समाज में बच्चे जो कुछ भी करते हैं, उसके लिए बराबर के भागीदार होते हैं। इससे उनमें जिम्मेदारी का अहसास पैदा होता है और वे समझ जाते हैं कि कैसे सक्रिय भागीदार बना जाता है।

मेरी समझ से यह स्वाभाविक है कि हमारे बच्चे निष्क्रिय लाभार्थी नहीं हैं- हमारे बच्चे उस बदलाव के सक्रिय एजेंट हैं, जो हम अपने समाज में लाना चाहते हैं। वे एक-दूसरे की मदद करते हैं, एक-दूसरे को सहारा देते हैं और काम को अंजाम तक पहुंचाते हैं- खाना पकाने, सफाई, छोटे बच्चों की देख-रेख, धोना, नहाना- हमारे समाज में होने वाले हर काम में बच्चे सक्रिय रूप से शामिल होते हैं। इस तरह देखें तो समाज होने का अहसास और जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे की मदद निश्चित रूप से झाम्त्से गत्सल की ख़ास बात है।

क्या आपका समाज अब भी बढ़ रहा है?

मेरे सबसे मुश्किल कामों में एक है कब और कैसे नए बच्चों को स्वीकार किया जाये। अभी हमारे पास 85 बच्चे हैं और 1000 से ज्यादा बच्चों के आवेदन पड़े हुए हैं।

रोज लोग मेरे पास आते हैं और ज्यादा बच्चों को लेने का आग्रह करते हैं। यह बहुत कठिन है, अगर मैं एक परिवार को हां कहता हूँ तो 10 अन्य को ना कहना पड़ता है। फिलहाल हमारे पास किसी भी नए बच्चे को लेने के लिए जगह और संसाधन नहीं हैं।

अंत में, आप किस चीज़ का अभ्यास करते हैं?

मेरा प्रमुख अभ्यास करुणा, स्थिरता, एकाग्रता को ज्यादा-से-ज्यादा बढ़ाने तथा धैर्य व दृढ़ता के मेरे प्रशिक्षण पर आधारित है।

अमीर या गरीब, पूर्व या पश्चिम, शिक्षित या अनपढ़, स्त्री या पुरुष- सभी मनुष्यों में एक बात सामान है- सब अपने जीवन में आनंद और खुशियों की कामना करते हैं।

मैं अपने आप को सौभाग्यशाली समझता हूं कि मुझे अपने जीवन में एक ऐसी चीज़ मिली जिसे करते हुए इतनी ख़ुशी और आनंद की प्राप्ति होती है। यही मैं महसूस करता हूँ। मैं कितना किस्मत वाला हूं। मैं प्रार्थना करता हूं कि मैं इसी तरह के कामों को करने और आगे बढ़ाने के लिए कई जन्म लूं। इस काम को करने में मुझे अपार ख़ुशी और आनंद मिलता है।

अनुवाद : आशुतोष उपाध्याय

माँ : हरि‍श्चंद पाण्डे

चर्चित कवि‍ हरि‍श्चंद्र पाण्डे की कवि‍ता ‘माँ’ पर कवि‍ता पोस्टर। इसकी परि‍कल्पना और संरचना आशुतोष उपाध्यायजी ने की है-

mother.माँ

भोजन का सफ़र : आशुतोष उपाध्‍याय

digestion

यह नाटक मनुष्य के भोजन की पाचन यात्रा पर आधारित है. क्या होता है जब हमारा भोजन हमारे मुंह के भीतर जाता है? भोजन की यात्रा के जरिये बच्चों को पाचन तंत्र और पाचन क्रिया से परिचय कराने का यह बड़ा मनोरंजक प्रयास है-

पात्र परिचय

भोजन     : पोषक व अपोषक

मुंह          : मुख्त्यार सिंह

भोजन नली  : इसोफेगस फिसलस

आमाशय : आमाशय महाशय

लिवर      : जिगर जरूराबादी

पित्ताशय  : पैन्क्री आज

छोटी आंत  :   छुटकी

रक्त वाहिनियां   : लाल सैनिक

बड़ी आंत : बड़की

मलाशय  : गोबर भंडारी

मलद्वार    : लू का

कोरस

भोजन खाने का नाम, खाते रहो सुबहो शाम… 2

के रस्ता कट जाएगा मितरा, पेट तेरा भर जाएगा मितरा

के भूखे रोना ना मितरा, के हर पल सोना ना मितरा

भोजन खाने का नाम, खाते रहो सुबहो शाम… 2

जो भोजन से हार मानता उसकी होगी छुट्टी

नाक चढ़ाकर कहे ज़िन्दगी तेरी मेरी हो गई कुट्टी

कि भूखा यार मना मितरा

यार को डटके खिला मितरा

कि पेट को साफ़ करा मितरा

बदन को  हिला-डुला मितरा

भोजन खाने का नाम, खाते रहो सुबहो शाम… 2

: सूत्रधार :

मेहरबान, कदरदान! लीजिये आपके मनोरंजन के लिए पेश है हमारा नया नाटक “भोजन का सफ़र”. इस नाटक में आप देखेंगे भोजन के दो जवान बेटे, माफ़ कीजिये दो हिस्से- यानी पोषक और अपोषक किस तरह पाचन तंत्र की यात्रा को अंजाम देते हैं. ये कहानी है पोषक और अपोषक की, जो शरीर को चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए अपनी जान कुर्बान कर देते हैं. इस बेमिसाल सफ़र में उनका सामना होता है मुख्त्यार सिंह यानी मुंह से. इसोफेगस फिसलस यानी भोजन नली से, महाशय आमाशय से. जिगर ज़रूराबादी यानी लिवर व पेंक्री आज यानी पित्ताशय नाम के दो शायर पहलवानों से. फिर वे मिलते हैं छुटकी और बड़की दीदी यानी छोटी व बड़ी आंत से. इसके बाद पोषक और अपोषक बिछुड़ जाते हैं. पोषक को लाल सैनिक यानी रक्त वाहिनियां अपने साथ ले जाती हैं जबकि अपोषक गोबर भंडारी के किले यानी मलाशय तक पहुंच जाता है, जहां उसे लू का यानी मलद्वार धक्के मार के बाहर निकाल देता है.

दृश्य-1: मुंह

बड़ी-बड़ी मूंछों वाला मुख्त्यार सिंह एक हाथ में दांत वाली तलवार और दूसरे में लार की बोतल लेकर खड़ा है. पोषक और अपोषक सज-धजकर मुख्त्यार सिंह के दरवाजे पर आते दिखाई देते हैं.

मुख्त्यार सिंह       :        आओ दोस्तो आओ. कब से राह देख रहा हूं तुम दोनों की. हमारी छोटी और बड़की बड़ी देर से कुलबुला रही हैं तुम्हारे लिए. ये देखो दांत वाली मेरी तलवार और ये रही लार की बोतल. दोनों तैयार है.

  (पोषक-अपोषक के नजदीक पहुंचने पर उन्हें सूंघता और छूता है) ओहो.. आज तो बड़ी खुशबू बिखेर रहे हो तुम दोनों…! अरे.. बड़े गरमा-गरम भी लग रहे हो..!!

पोषक        : तसल्ली रखो मुख्त्यार भैया. ऐसी भी क्या जल्दी है. मगर एक रिक्वेस्ट है हमारी.

मुख्त्यार सिंह       :        रिक्वेस्ट? कैसी रिक्वेस्ट??

अपोषक    : इस बार खूब बारीक काटना हमें. बारीक काटे बिना निगलोगे तो आपके पड़ोसी मिस्टर इसोफेगस को बड़ी तकलीफ होगी.

पोषक        : और हां, लार फेंकने में भी कतई कंजूसी मत करना. पिसाई ठीक होगी तो हम फिसलते हुए मजे से लुढ़क जायेंगे.

अपोषक    : याद है, पिछली बार तुमने ठीक से लार नहीं फैंकी थी! जानते हो क्या हुआ? इसोफेगस सर हमसे उलझ गए. कितनी देर तक उन्होंने हमें अपनी चौकी पर रोके रखा!

पोषक        : वो तो अच्छा हुआ हिचकियां सुनकर किसी ने तुम्हारे दरवज्जे से खूब सारा पानी उड़ेल दिया. तब जाकर हम मिस्टर इसोफेगस की चौकी से निकल पाए.

मुख्त्यार सिंह       :        ये अच्छा याद दिलाया बेटा. आज मैं तुम्हें कायदे से काट-पीसकर भेजूंगा. लार का क्या कहना… एक नंबर की मूडी है. कभी-कभी तो खाने के नाम पर ही बरसने लगती है. और कभी मुंह ठूंस दो तो भी रिसने का नाम नहीं लेती. मैं तो कहता हूं तुम्हारे स्वाद में दम होगा तो खुद को वो रोक नहीं पाएगी.

अपोषक    : अबकी बार मम्मी ने हमें अच्छे से तैयार कर के भेजा है. मिर्च-मसाला डाल के खूब चटपटा बनाया है. देखते हैं कैसे नहीं निकलती लार की बच्ची!

पोषक        : बातें बहुत हो गईं मुख्त्यार भैया. हम ठंडे हुए जा रहे हैं. जल्दी से हाथ बढ़ाओ और हमें भीतर खींच लो.

मुख्त्यार सिंह दोनों को दरवाजे से भीतर खींचकर उनपर तलवार चलाता है और बीच-बीच में लार की बोतल उडेलता है. पोषक और अपोषक कचर-कचर की आवाज करते हुए नीचे गिर जाते हैं.

दृश्य-2: भोजन नली

पोषक और अपोषक घुटनों के बल चलते हुए इसोफेगस फिसलस की चौकी पर आते हैं. इसोफेगस अपने पांवों का गेट बनाकर खड़ा है. दोनों गेट के भीतर जाने को आतुर हैं.

पोषक-अपोषक        :         गुड मॉर्निंग मिस्टर इसोफेगस! प्लीज अलाऊ अस टू गो इनसाइड. यू नो, छुटकी एंड बड़की दीदीज आर ईगरली वेटिंग फॉर अस.

इसोफेगस   : वेलकम किड्स. दिस टाइम यू लुक फ्रेश एंड लुब्रिकेटेड. गुड, गुड, वैरी गुड! मेनी टाइम्स यू कम अनकट एंड ड्राई. इट पेन्स मी अ लॉट!

पोषक और अपोषक इसोफेगस के पांवों के नीचे से कठिनाई से निकलते हैं. वह उन्हें पीछे से लात मारकर आगे बढ़ाता है.

दृश्य-3: आमाशय

पोषक और अपोषक घुटनों के बल चलते हुए आमाशय महाशय के दरवाजे पर पहुंचकर उन्हें आवाज लगाते हैं.

पोषक        : महाशय जी… ओ महाशय जी… सो गए क्या?

आमाशय    : आया जी आया… अरे मैं तो जाने कब से तुम्हारी राह देख रहा था. इंतजार में मेरा जी खट्टा हो जाता है.

अपोषक     : खट्टा? वो क्यों महाशय जी?

आमाशय    : तुम्हें याद करते ही मेरे भीतर तेज़ाब के आंसू निकलने लगते हैं. ना जी ना, ये तो ख़ुशी के आंसू होते हैं. तुम दोनों से बड़ा प्यार है न मुझे.

पोषक        : हां. हमें भी आपके आंसुओं में डुबकी लगाने में बड़ा मज़ा आता है. तेज़ाब हमारे पोर-पोर में घुस जाता है.

अपोषक     : और महाशय जी आप हमें अपनी गोद में बिठाकर झुलाते भी तो हो. हमारा बदन मथकर मट्ठा हो जाता है.

आमाशय    : अच्छा.. अब और न तरसाओ. जल्दी से भीतर आकर तेज़ाब के तालाब में डुबकी लगा लो. आओ.. आओ.

पोषक और अपोषक आमाशय के घुटनों के नीचे से सरकते हुए आगे बढ़ते हैं. उनके मुंह से छपाक-छपाक की आवाजें निकलती हैं. वे तालाब में नहाने का अभिनय करते हैं.

 दृश्य-4: लिवर (जिगर) और पित्ताशय

आमाशय से बाहर निकलते ही पोषक और अपोषक को दो पहलवान- जिगर ज़रूराबादी और पैन्क्री आज मिलते हैं. दोनों पहलवान शायराना मिजाज़ के हैं.

जिगर       :           जिगर नाम है, ज़रूरी काम है अपना,

तले-भुनों को रसों से पचा के रखना.

जो पचे नहीं, वो सूरमा-ए-सफर निकले

ढाल बदबू में उन्हें भी बढ़ा के रखना.

पैन्क्री आज  :        वाह, वाह…! क्या शेर किल किया है ज़नाब! मगर एक ठो इधर वाला भी सुनिए:

जो मीठे होते हैं वो जानलेवा हो सकते हैं,

दाग जवानी के क्या बुढ़ापे में धो सकते हैं?

मीठी चीज़ों पे कंट्रोल हमारी ड्यूटी है

कड़वे बीज भी सेहत के लिए बो सकते हैं.

पोषक        : सलाम जिगर साहब, सलाम पैन्क्री साहब… आज तो महफिल सजा के बैठे हैं आप दोनों!

अपोषक    : अरे कुछ हमें भी तो सुनाइये हुज़ूर.

जिगर       : क्यों नहीं, क्यों नहीं… मुलाहिजा फरमाइए..

पोषक तत्वों के बिना नहीं भोज में जान,

चटपट खाना देखके क्यों होता अभिमान.

क्यों होता अभिमान जंक औ कचरा खाते,

बदन को कुछ ना लगता, सौ दफे टट्टी जाते.

पैन्क्री आज :        अपोषक की महिमा कोई कम नहीं है,

भोजन में इनके बिना दम नहीं है.

जो इनको नियम से चबा के न खाता,

सज़ा के तौर पे उसका पेट सूख जाता.

पोषक        : वाह, वाह… आज तो तबियत खुश कर दी आपने.

अपोषक    : लाइए अब जल्दी से हमें हमारी सौगात दीजिये ताकि हम छुटकी और बड़की दीदी के दीदार कर सकें.

दोनों पहलवान अपनी-अपनी बोतलों से पोषक और अपोषक पर कुछ छिड़कते हैं. छींटे पड़ते ही पोषक और अपोषक अँधेरे की ओर भाग जाते हैं.

दृश्य-5: छोटी आंत

पोषक और अपोषक छोटी आंत के दरवाजे पर खड़े हैं. छोटी आंत उन्हें देखकर ख़ुशी से नाचने लगती है.

छुटकी       : आखिर आ ही गए तुम दोनों. तुम्हारे इंतज़ार में मैं कब से कुलबुला रही हूं.

पोषक        : छुटकी दीदी, हम आ तो गए हैं. लेकिन मेरी एक शिकायत है. तुम हर बार हम दोनों को जुदा कर देती हो. यह ठीक नहीं. हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त हैं. हम हमेशा साथ रहना चाहते हैं.

छुटकी       : मैं जानती हूं, लेकिन क्या करूं लाल सैनिक सिर्फ पोषक को ही अपने साथ ले जाते हैं. वे कहते हैं अपोषक उन्हें नहीं चाहिए.

अपोषक    : (चिढ़कर) आखिर मुझे ले जाने में उन्हें दिक्कत क्या है? क्या मैं भोजन का ज़रूरी हिस्सा नहीं हूं?

छुटकी       : कौन कहता है ज़रूरी हिस्सा नहीं हो? तुम्हारे बिना पाचन क्रिया पूरी नहीं होती. लेकिन खून में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं. अगर तुम खून में पहुंच गए तो नुकसान ही पहुंचाओगे. क्या तुम चाहते हो कि तुम्हारी वजह से शरीर बीमार पड़ जाय.

अपोषक    : नहीं नहीं मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से किसी को तकलीफ हो. मुझे बिछुड़ना  मंज़ूर है पर बदनामी नहीं.

(पोषक से) विदा दोस्त. हमारी जुदाई का समय आ गया है. तुम इन सैनिकों के साथ लाल सागर के सफ़र में निकलो. मुझे हमेशा की तरह बड़की दीदी के पास जाना होगा.

पोषक        : विदा मेरे दोस्त.

(दोनों गले मिलते हैं और गाते हैं.)

ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे

तोड़ेंगे दम मगर तेरा साथ न छोड़ेंगे…2

ऐ मेरी जीत तेरी जीत, तेरी हार मेरी हार

सुन ऐ मेरे यार

तेरा ग़म मेरा ग़म, मेरी जान तेरी जान

ऐसा अपना प्यार

जान पे भी खेलेंगे तेरे लिए ले लेंगे

जान पे भी खेलेंगे तेरे लिए ले लेंगे

सब से दुश्मनी

ये दोस्ती…

छुटकी       : आओ पोषक, लाल सैनिक तुम्हें लेने पहुंच गए हैं.

लाल सैनिक पोषक को अपने कंधों पर उठा के ले जाते हैं. अपोषक आगे बढ़ता है और बड़की के दरवाजे पर पहुँच जाता है.

दृश्य-6: बड़ी आंत

अपोषक बड़ी आंत के दरवाजे पर खड़ा है. बड़ी आंत उसका स्वागत करती है.

बड़की        : आओ अपोषक. तुम्हारे बिना मेरा घर खाली-खाली लग रहा था. यह तुम्हारे हाथ में क्या है?

अपोषक    : ओह… ये तो पोषक का पानी है. विदाई के वक्त मैं उसे लौटाना भूल गया. अब क्या करूं? पानी के बिना वह लाल सागर का सफ़र कैसे करेगा?

बड़की        : फिक्र मत करो अपोषक. इस पानी को मुझे दे दो. मैं उसे पोषक के पास पहुंचा दूंगी.

अपोषक    : बहुत बहुत धन्यवाद बड़की दीदी. अब मैं निश्चिन्त होकर आगे जा सकता हूं.

बड़की        : ज़रूर जाओ मगर थोड़ा ध्यान से. आगे का रास्ता अंधेरा और बदबूदार है. अपने आसपास के पानी का ध्यान रखना. गन्दे पानी में जाना तुम्हारी सेहत के लिए ठीक नहीं.

अपोषक    : हां, पिछली बार गंदे पानी के कारण मुझे दस्त बनाना पड़ा था. बार-बार निकलने से मेरी हालत खस्ता हो गयी थी. अच्छा दीदी अब चलता हूं. नमस्ते.

दृश्य-7: मलाशय व मलद्वार

अपोषक आगे बढ़कर गोबर भंडारी के घर पहुंचता है. हट्टे-कट्टे अपोषक को देखकर गोबर खुश हो जाता है.

गोबर भंडारी          :        आओ अपोषक. इस बार तुम बड़ी अच्छी सेहत लेकर आये हो!

अपोषक    : माफ़ करना भंडारी जी, पिछली बार मैंने आपको मुसीबत में डाल दिया था. इस बार मैं गंदे पानी से दूर ही रहा हूं. कोई तकलीफ नहीं होगी आपको.

गोबर भंडारी          :        पानी से ज्यादा दूर भी मत चले जाना. तुम ज्यादा कड़क हो गए तब भी मेरी मुसीबत बढ़ जाएगी.

(लू का को आवाज देता है) अरे लू का! कहां मर गया? जल्दी से आ और अपोषक को बाहर धकेल.

सिकुड़ता-फैलता लू का दौड़ता हुआ आता है और अपोषक का हाथ पकड़ता है.

लू का        : ठीक से पांव जमाकर कूदना अपोषक भाई. वरना बाहर गिरते ही तुम्हारा कचूमर निकल जाएगा.

अपोषक    : धन्यवाद लू का. तुम मेरा कितना ख़याल रखते हो. मुझे हल्का सा धक्का तो दो ताकि मैं हवा में कूद सकूं.

लू का अपोषक को धक्का देता है. धक्का देते ही जोरदार धमाका होता है और अपोषक एक ढेर बनकर ज़मीन पर गिर जाता है.

सारे कलाकार मंच पर वापस आते हैं और पहला वाला कोरस फिर से गाते हैं.

भोजन खाने का नाम, खाते रहो सुबहो शाम… 2

के रस्ता कट जाएगा मितरा, पेट तेरा भर जाएगा मितरा

के भूखे रोना ना मितरा, के हर पल सोना ना मितरा

भोजन खाने का नाम, खाते रहो सुबहो शाम… 2

जो भोजन से हार मानता उसकी होगी छुट्टी

नाक चढ़ाकर कहे ज़िन्दगी तेरी मेरी हो गई कुट्टी  

कि भूखा यार मना मितरा

यार को डटके खिला मितरा

कि पेट को साफ़ करा मितरा

बदन को  हिला-डुला मितरा

भोजन खाने का नाम, खाते रहो सुबहो शाम… 2

पाचन के इस किस्से को तुम याद हमेशा रखना

बॉडी पर जो ख़तरा लाये उसको कभी न चखना

कि पानी साफ़ पिला मितरा

कि पानी खूब पिला मितरा

कि सबके हाथ धुला मितरा

समय पर खूब सुला मितरा

भोजन खाने का नाम, खाते रहो सुबहो शाम… 2

बच्चे किताबें नहीं पढ़ते क्योंकि माता-पिता किताबें नहीं पढ़ते: जार्डन सैपाइरो

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यह एक सांस्कृतिक मान्यता है कि आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बच्चों को किताबों से दूर कर रहे हैं। मैं जब दूसरे विश्‍वविद्यालयी प्राध्यापकों से मिलता हूं तो वे अकसर शिकायत करते हैं कि विद्यार्थी अब पढ़ते नहीं हैं क्योंकि उनकी आंखें हर वक्त उनके फोन से चिपकी रहती हैं। टेक्नोफोब (टेक्नोलॉजी से भयभीत रहने वाले) जमात के लोग सोचते हैं कि हम एक ऐसी पीढ़ी को तैयार कर रहे हैं, जो साहित्य की कीमत नहीं समझती। नए और पुराने के बीच ध्रुवीकरण जारी है। संभव है यह धारणा किसी स्क्रीन-विरोधी मानस की बची-खुची भड़ास हो जो टेलीविजन के स्वर्णकाल की परिधि से बाहर नहीं निकल पाता। यह पिटी-पिटाई मनगढ़ंत कहानी भी हो सकती है जो तकनीकी साम्राज्यवाद के खिलाफ संग्राम में  किताबों की हार पर छाती कूट-कूट कर कह रही है- कागज सच्चा नायक और गोरिल्ला ग्लास दुष्ट खलनायक!

‘कॉमन सेन्स मीडिया’ की ताज़ा रिपोर्ट ‘बच्चे, किशोर और पढ़ने की आदत’ अमेरिका में ‘बच्चों के पढ़ने की आदतों के बारे में एक बड़ी तस्वीर’ पेश करती है और पड़ताल करती है कि हाल के दशकों में हुई तकनीकी क्रांति के दरम्यान ये आदतें किस कदर बदली हैं। यह तस्वीर बताती है-

सरकारी अध्ययन के मुताबिक 1984 से अब तक हफ्ते में एक बार पढ़ने वाले 13 वर्ष तक की आयु के बच्चों का प्रतिशत 70% से घटकर 53% हो गया है। सप्ताह में एक बार पढ़ने वाले 17 वर्ष के बच्चों में यह आंकड़ा 64% से लुढ़ककर 40% पर पहुँच गया। वहीं इस दरम्यान 17 वर्ष के बच्चों में, कभी नहीं या मुश्किल से कभी-कभी पढ़ने वालों की तादाद 9% से बढ़कर 27% हो गयी। बेशक ये आंकड़े झकझोर देने वाले हैं, लेकिन मुझे समझे में नहीं आता कि इनका टेक्नोलॉजी से क्या ताल्लुक है। यह आरोप मुझे निहायत बेतुका लगता है।

मुझे तो लगता है कि हम आज ऐसे सांस्कृतिक परिवेश में रह रहे हैं जो इतिहास के किसी भी दौर के मुकाबले कहीं ज्यादा पाठ-संपन्न है। लोग दिन भर पढ़ते रहते हैं। गूगल, ट्विटर और फेसबुक शब्दों का अम्बार लगाते रहते हैं। लोग अपनी आंखों को स्मार्टफोन से अलग नहीं कर पाते- जो मूलतः पाठ और सूचना बांटने वाली मशीन है। सच कहें तो हमारी समस्या हर वक्त पढ़ते ही रहने की है। लोग लगातार अपने ई-मेल या टेक्स्ट मैसेज चैक करते रहते हैं। कभी-कभी तो उन्हें शब्दों के इस जंजाल से बाहर निकालना भी मुश्किल हो जाता है।

फिर भी, लोग क्या पढ़ रहे हैं? ऐसा लगता है कि वे ढेर सारी किताबें नहीं पढ़ते। मैं बच्चों की नहीं, बल्कि बड़ों की बात कर रहा हूं। यहां तक कि टेक्नोफोब भी किताबें नहीं पढ़ते। मैं ऐसे कई पढ़े-लिखे भद्रजनों से मिल चुका हूं जिन्होंने मुझे बताया कि उन्हें किताबें पढ़ने का समय ही नहीं मिलता। वे न्यूयॉर्क टाइम्स में छपने वाली पुस्तक समीक्षाओं को देख लेते हैं ताकि पार्टियों में होने वाली पुस्तक चर्चाओं में अपनी इज्जत बचा सकें। वे विमान में मिलने वाली पत्रिकाओं के पिछले पन्ने पर छपने वाले पुस्तक सारांश से काम चला लेते हैं। मैं हैरान रह जाता हूं जब कई लोग मुझसे मेरी किताबों के ऑडियो संस्करण की उपलब्धता के बाबत पूछते हैं।

यह समस्या क्या बच्चों के किताबें न पढ़ने की है या फिर किसी के भी किताबें न पढ़ने की? क्या हमारी संस्कृति घनघोर रूप से गैर-अकदामिक और बौद्धिकता विरोधी नहीं हो गयी है? हम पत्रिकाओं व ब्लॉग पढ़ने को तरजीह देते हैं। ये मानविकी, लिबरल आर्ट्स एजुकेशन या किताबों पर निर्भर विश्‍वविद्यालयी डिग्री के मूल्यों पर सतत सवाल खड़े करते हुए छुपे तौर पर आत्म-प्रचारात्मक होते हैं। चालू फैशन चीख रहा है कि आज हमें एसटीईएम (साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, मैथ्स) शिक्षा- यानी ज्यादा इंजीनियरों, ज्यादा व्यवसायियों की दरकार है। परोक्ष रूप से हम एक पुस्तक विरोधी एजेंडे से घिरे हुए हैं और फिर भी हैरान हैं कि बच्चे पढ़ क्यों नहीं रहे हैं।

मैं यह स्वीकार करता हूं कि मैं पक्षपाती हूं। मैं एक अकादमिक हूं। मुझे पढ़ने के ही पैसे मिलते हैं। लेकिन मेरे बच्चे (6 और 8 वर्ष) भी खुद से खूब पढ़ते हैं। इसलिए नहीं कि मैं ऐसा चाहता हूं- वीडिओ गेम खेलना हो तो पहले 30 मिनट पढ़ो। इसलिए भी कि उनके डैड की पढ़ने की आदत उनके लिए मॉडल का काम करती है। डैड हमेशा नई-नई किताबें मंगाते रहते हैं; डैड हमेशा उन्हें पढ़ते हुए दिखाई देते हैं। मेरे घर में वयस्क होने का मतलब किताबों की सोहबत में रहने वाला होता है। परिपक्व होने का मतलब छपे हुए शब्दों के लम्बे रूपों से ज्यादा से ज्यादा अंतरंग होना।

कॉमन सेंस मीडिया की रिपोर्ट स्वीकार करती है कि- ‘माता-पिता पढ़ने की प्रेरणा दे सकते हैं।’ रिपोर्ट कहती है, ‘छपी हुई किताबें घर में रखने से, उन्हें खुद पढ़ने से और अपने बच्चों के लिए रोज पढ़ने का समय तय करने से पढ़ने की प्रेरणा जन्म ले सकती है।’

माता-पिता की गतिविधियों और बच्चों में पढ़ने की ललक के बीच गहरा सम्बन्ध पाया गया है (स्कौलेस्टिक, 2013)। उदाहरण के लिए, नियमित रूप से पढ़ने वाले बच्चों में 57% के माता-पिता ने अपने बच्चों के पढ़ने के लिए रोजाना अलग से समय निर्धारित किया हुआ है। इसके विपरीत अनियमित रूप से पढ़ने वाले बच्चों में सिर्फ 17% के माता-पिता ने ही ऐसी व्यवस्था की है।

जहां तक किताबों का सवाल है, अधिकांश अध्ययन बताते हैं कि पाठ प्रस्तुत करने की विधि की ख़ास प्रासंगिकता नहीं होती। पढ़ने में गहरी रुचि रखने वालों के लिए तकनीक कोई मुद्दा नहीं। ई-रीडर, टेबलेट, लैपटॉप स्क्रीन आदि सभी में लम्बे पाठ पढ़े जा सकते हैं। खरे पाठक के लिए किताब का कागजी रूप में होना बहुत मायने नहीं रखता। सच तो यह है कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों ने किताब तक पहुंचना और आसान बना दिया है। जोआन गैंज कूनी सेंटर की इस साल की शुरुआत में जारी एक रिपोर्ट कहती है कि 2 से 10 आयुवर्ग के अधिकतर बच्चों के पास पढ़ने की कोई न कोई इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस है- 55% के पास घर पर बहुउपयोगी टेबलेट है और 29% के पास अपना ई-रीडर (62% की इनमें से किसी एक तक पहुंच) है। घर पर इन उपकरणों में से किसी एक को रखने वाले बच्चों में आधे (49%) इलेक्ट्रॉनिक तरीकों से पढ़ते हैं, या अपने या फिर अपने माता-पिता (30%) के उपकरणों से। किताबें मायने रखती हैं मगर बच्चे उन्हें किस तरह पढ़ते हैं, यह नहीं।

मेरे बच्चे आई-पैड, ई-रीडर और कागज़, सभी तरीकों से किताब पढ़ते हैं। मैं यह सुनिश्चित करता हूं कि वे पढ़ें। मैं हर रात अपने बच्चों के लिए पढ़ता हूं। मैं दिन में भी उनके साथ पढ़ता हूं। मैं यह इसलिए करता हूं क्योंकि मैं इसे उनकी शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग समझता हूं। मैं अपने बच्चों की परवरिश को यूं ही किसी विशेषज्ञ को आउटसोर्स नहीं कर सकता। और फिर यह रोना नहीं रो सकता कि ये टीचर नाकामयाब हैं। मेरे लिए यह बात बिलकुल स्पष्ट है कि बच्चों की पढ़ाई में माता-पिता की भूमिका ज़रूरी है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके बच्चे किताबें पढ़ लेते हैं।

बेशक किताब बनाम डिजिटल जैसी खबरें गढ़ना बहुत आसान है। इससे हमें अपने बच्चों के साथ जुटने से बचने का बहाना मिल जाता है। हम खुद को दोष देने के बजाय वीडिओ गेम्स या ऐप्स को कोसने लगते हैं। बच्चों को विवेकवान, संवेदनशील और खुले दिमाग वाले वयस्क के रूप में तैयार करने की ज़िम्मेदारी माता-पिता को लेनी होती है। किताबें शिक्षा का अहम् हिस्सा हैं, लेकिन अगर हम अपने जीवन से सारे के सारे डिजिटल उपकरण हटा दें तो भी बच्चे किताबें नहीं पढ़ेंगे, जब तक कि हम उन्हें यह अहसास न करा दें कि वयस्क बनने के लिए किताबें पढ़ना कितना ज़रूरी है।

अपने बच्चों को पढ़ने के लिए शिक्षित करें। और उन्हें शिक्षित करें कि जो कुछ वे पढ़ते हैं उससे फर्क पड़ता है। रेनेसां लर्निंग की वार्षिक रिपोर्ट ‘बच्चे क्या पढ़ रहे हैं’ विस्तार से बताती है कि बच्चे आजकल क्या-क्या पढ़ रहे हैं और उनमें सबकुछ अच्छा नहीं है। यह भारी-भरकम अध्ययन किताबों की बिक्री या लाइब्रेरी के आंकड़े पेश नहीं करता। यह अमेरिका के 98 लाख छात्रों द्वारा  पढ़ी गयी 31.8 करोड़ किताबों के आंकड़ों का अध्ययन है ताकि यह पता लगाया जा सके कि साल में कौन सी किताबें बच्चों के बीच सबसे लोकप्रिय रहीं। यह अमेरिका की सबसे विस्तृत रिपोर्ट है जो कक्षा 12  तक के बच्चों की पढ़ने की आदतों का खुलासा करती है।

तीन दिलचस्प निष्कर्ष-

  1. लैंगिक रुझान की पढ़ाई पहली कक्षा से ही शुरू हो जाती है।बुनियादी कक्षाओं के लड़के कैप्टन अंडरपेंट्स’ के ढेर के ढेर पढ़ जाते हैं लेकिन ये किताबें लड़कियों की पसंद की शीर्ष 20 में भी जगह नहीं बना पातीं। हमें इन आंकड़ों के आधार पर यह समझाया जाता है कि लड़के और लड़कियों की प्राथमिकताएं, रुचियां और रुझान अलग-अलग तरह का होता है। मैं इस बात पर यकीन नहीं करता। इसके विपरीत हम इन आकड़ों को इस बात के सबूत के तौर पर भी ले सकते हैं कि हम लैंगिक आधार पर बांटी गई ऐसी दुनिया बनाते जा रहे हैं जहां भूमिकाएं व बौद्धिक अपेक्षाएं जैविक प्रजनन अंगों के आधार पर विभाजित हैं। अगर आप यही चाहते हैं तो येन केन प्रकारेण इसे जारी रखिये। अगर नहीं, ऐसी किताबों की कमी नहीं जिनमें लैंगिकता नहीं है; अपने बच्चों को जानने दीजिये कि आप इन सब से ऊपर सोच सकते हैं।
  2. मिडिल स्कूल (खासकर कक्षा 6 के बच्चे) सबसे ज्यादा पढ़ते हैं।प्रति छात्र पढ़ी गयी औसत शब्द संख्या मिडिल स्कूल के दौरान बढ़ती है मगर हाईस्कूल आते-आते यह फिर से घटने लगती है। मैं इसे इस बात के प्रमाण के तौर पर समझता हूं कि माता-पिता अपने बच्चों को किताबों के बारे में गलत सन्देश दे रहे हैं। हम साक्षरता को भाव देते हैं और छोटे बच्चों के जल्द से जल्द पढ़ना सीख लेने पर खुश होते हैं। लेकिन यही बच्चे जब किशोर हो जाते हैं तब वे सीधे अपने बड़ों की आदतों का अनुसरण करने लगते हैं। अगर बड़े पढ़ते हुए नहीं दिखाई देते तो वे भी न पढ़ने को बड़े होने का गुण मान बैठते हैं।
  3. ट्वीलाईट और हंगर गेम्सक्लासिकी साहित्य की तुलना में ज्यादा लोकप्रिय हैं। आजकल शिक्षक शेक्सपियर या डॉन क्विक्जोट की जगह इन किताबों को तरजीह देते हैं। ज्यादातर की दलील होती है कि हर तरह पाठ अच्छा होता है और ये किताबें छात्रों को ज्यादा आकर्षित करती हैं। एक ओर से देखने पर यह सही लगता है, लेकिन दूसरी ओर हमें याद रखना चाहिए कि इन लोकप्रिय किताबों के लिए कथ्य के बजाय बिक्री ज्यादा अहमियत रखती है। वे मूलतः पैसा कमाने के लिए लिखी गयी हैं और मानव परिस्थितियों का साहित्यिक अन्वेषण उनकी प्राथमिकताओं में सबसे आखि‍र में है। मेरा यह मतलब नहीं कि लोकप्रिय कहानियां बुरी होती हैं, लेकिन इस बात में भी दम है कि ऐसी किताबें अपने युग की आर्थिक, राजनीतिक और ज्ञानशास्त्रीय प्रवृत्तियों के पार नहीं देख पातीं।

और आखिरकार हमारे बच्चे कैसे पढ़ते हैं और क्या पढ़ते हैं, इस बात से किताबों के बारे में बच्चों के बजाय बड़ों के नज़रिए का ज्यादा पता चलता है। आप अपने बच्चों को जैसा देखना चाहते हैं, पहले व्यवहार और तौर-तरीकों से वैसा आदर्श तो पेश कीजिये।

जार्डन सैपाइरो शिक्षक, लेखक और संपादक हैं.

(हिंदी अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय)

कछुए के कान : आशुतोष उपाध्‍याय

Ashutosh Upadhyayहमारे मोहल्ले में इस बार स्वतंत्रता दिवस के मौके पर मंचन के लिए बच्चों ने मुझसे नाटक की मांग की। कुछ मिला नहीं तो मैंने उर्दू के मशहूर व्यंग्यकार इब्ने इंशा द्वारा किये गए पंचतंत्र की कहानियों के पाठांतर पर हाथ आजमाने का प्रयास किया। खरगोश और कछुए की दौड़ की जानी-पहचानी कहानी का विरूपित संस्करण ‘कछुए के कान’ नाम से नाटक के रूप में पेश है। इस बच्चों के साथ किया जा सकता है। अगर आप इसका मंचन अपने साइंस सेंटर या किसी स्कूल में करते हैं तो अनुभव साझा करना न भूलें।– लेखक

दृश्य 1

मंच पर दो सूत्रधार प्रवेश करते हैंएक के हाथ में डफली है और दूसरा बाजा बजा रहा है

सूत्रधार-1 :    (डफली बजाते हुए) सुनो-सुनो-सुनो… बच्चा लोग सुनो और बड़ा लोग सुनो… आधे लोग सुनो और पूरे लोग सुनो… इधर से सुना अब उधर से सुनो…

सूत्रधार-2     : (शत्रुध्न सिन्हा की तरह) खामोश..! आपको सुनाते हैं एक कहानी! जिसे सुनाती थी हमारी नानी!!

लेकिन माफ करना भाइयो और बहनो, हमने की है थोड़ी मनमानी!!

सूत्रधार-1 :    ये है कछुए और खरगोश की कहानी… बड़ी पुरानी.. मगर जानी-पहचानी!

लेकिन आपने जो सुनी वो नकली थी… हम जो सुनाएंगे वो असली है.. 100% देसी घी जितनी!!

सूत्रधार-2 :    बड़ी पुरानी बात है। बहुत-बहुत पुरानी…. जब धरती में इंसान का राज नहीं था।

सूत्रधार-1 :    इंसान भी बाकी जानवरों के साथ जंगल में रहता था।

सूत्रधार-2 :    यह कहानी हमारे परदादा के परदादा के परदादा परदादा…

सूत्रधार-1 :    इतने परदादा कि बोलते-बोलते सुबह हो जाय… तो उस परदादा ने अपने परदादा से सुनी थी।

सूत्रधार-2 :    और उसके पहले जाने कितने परदादाओं ने सुनी और सुनाई थी।

दर्शक    : अबे कहानी सुनाओगे या परदादाओं का हिसाब-किताब करते रहोगे?

दोनों सूत्रधार :  खामोश….! (मुस्कराकर) सुनाते हैं भाई, सुनाते हैं।

सूत्रधार-1 :    एक जंगल में दो दोस्त रहते थे। पहला खरगोश और दूसरा कछुआ। आपको तो पता ही है?

सूत्रधार-2 :    दोनों में एक बार रेस हुई। दौड़ाक खरगोश काफी आगे निकल गया। कछुए की चाल देख उसने सोचा क्यों न थोड़ा सुस्ता लूं। और जब वह रास्ते में बैठा तो उसे नींद आ गई। वैसे आप इस किस्से को जानते ही हैं!

सूत्रधार-1 :    कछुआ धीरे-धीरे लगातार चलता रहा। रास्ते में उसने खरगोश को सोते हुए देखा। मगर उसे उठाया नहीं, बस चुपचाप चलता रहा और आखिर में रेस जीत गया। आप कहोगे ये कहानी तो सुनी-सुनाई है। नहीं जनाब हमारी कहानी तो अब शुरू होती है।

सूत्रधार-2 :    दौड़ में हार जाने से खरगोशों की इज्ज़त पर दाग़ लग गया। उनके बच्चे इस दाग़ को धोने के सपने देखते थे। फिर बच्चों के बच्चों ने यह सपना देखा। आखिर वह दिन आया, जब खरगोशों को इस दाग़ से छुटकारा मिल गया।

दृश्य 2

मंच में एक खरगोश और एक कछुआ अलसाए से बैठे हुए हैं उनके चेहरे पर बोरियत छाई हुई है

खरगोश : कच्छप दादा, कुछ मजा नहीं आ रहा। अजी बोर हो रहे हैं। चल कोई गेम खेलते हैं।

कुछ टैम कटे, कुछ बोझ घटे। कड़वी यादों से कुछ ध्यान हटे।

कछुआ   :    देखो हमको फिर से दौड़ने को मत बोलना। भूल तो नहीं गए? हमारे दादाजी, तुम्हारे दादाजी को हराए थे! बोलो हराए कि नहीं? तुम खरगोश दौड़ते तेज हो मगर हम कछुओं की खोपड़ी ज्यादा तेज दौड़ती है।

खरगोश : ठीक है ठीक है। ज्यादा स्याणा मत बन। बड़ा आया टोकड़िया में खोपड़िया देने वाला! एक बार फिर क्यों नहीं दौड़ लेता? मिल्क का मिल्क और वाटर का वाटर हो जाएगा।

कछुआ  : लगता है अपनी बेजती खराब किए बिना मानोगे नहीं। चलो दौड़ लेते हैं.. मगर इस बार शरत लगानी पड़ेगी।

खरगोश :    कैसी शर्त?

कछुआ   :    जो जीतेगा, वो हारने वाले के कान काट लेगा। (अपने आप सेइस बार हम इसके लंबेलंबे कान अपनी बैठक में सजाएंगे बेटा ऐसी सुस्ती फैलाएंगे कि जन्नत में बैठे तुम्हारे दादाजी भी खर्राटे लेने लगेंगे)

खरगोश : मंज़ूर है। (अपने आप सेकछुए के बच्चे! तेरे कान तो गए इस बार मैं नींद उड़ाने वाली बूटी खाकर दौडूंगा!).

दृश्य 3

खरगोश और कछुआ दौड़ की लाइन पर खड़े हैं एक आदमी उन्हें दौड़ाने की तैयारी कर रहा है

आदमी के हाथ में एक बड़ा सा चाकू है

आदमी   :    भाइयो और बहनो! आपको यह जानकार खुशी होगी, आपके जंगल में, खरगोश और कछुए की मशहूर दौड़, फिर से होने जा रही है। वही दौड़ जिसके किस्से आपने बचपन में सुने थे। लेकिन अबकी बार, इस दौड़ में एक शर्त जोड़ दी गई है। जो जीतेगा, वो हारने वाले के कान काट कर अपने घर ले जाएगा।

तो श्रीमान खरगोश और कछुआ… अपनी-अपनी जगह पर पहुंचो। और दौड़ने के लिए तैयार हो जाओ.. ओके?

रेडी… वन… टू… थ्री… गो…!

दोनों दौड़ते हैं लेकिन इस बार खरगोश बिना पीछे देखे दौड़ता रहता है और जल्दी ही मंज़िल पर पहुंच जाता है

मंज़िल पर आदमी दोनों का इंतज़ार कर रहा है

खरगोश : हुर्रे! इंसान चाचा, मैं जीत गया। मैंने खरगोशों का इतिहास बदल दिया। आप अपना चाकू तेज कर लो, कछुआ आता ही होगा। उसके कान लक्कड़ में टांगकर अपनी बैठक में सजाऊंगा।

आदमी और खरगोश कछुए की राह देखते हैं लेकिन उसका दूरदूर तक पता नहीं है दोनों थककर सो जाते हैं

दृश्य 4

मंज़िल पर एक नया आदमी और खरगोश बैठे हैं तभी दूर से कछुआ आता दिखाई पड़ता है

दोनों चौकन्ने हो जाते हैं

कछुआ   :    (बूढ़ों की आवाज में) अरे बच्चो, सुनो तो… तुमने एक आदमी या खरगोश को यहां देखा था?

दोनों     : अंधे हो क्या? क्या हम आदमी और खरगोश नहीं लगते?

कछुआ   :    माफ करना! हम आप दोनों की बात नहीं कर रहे। वे दोनों हमारे पुराने दोस्त हैं।

आदमी  : कछुआ अंकल, वो तो हमारे दादाजी थे। आपका इन्तजार करते-करते दोनों मर गए।

खरगोश :    उनके मरने की बाद हमारे डैडी यहां बैठे-बैठे बुढ़ा गए।

आदमी : मरते वक्त उन्होंने हम दोनों को यहां बिठाया और कहा कि कछुआ आए तो उसके कान काट लेना।

खरगोश : हम यहां तुम्हारे कान काटने के लिए बैठे हैं। लाओ अपने कान बाहर निकालो।

कछुआ   :    अरे नहीं! हम अपने कान नहीं कटवाएंगे…!

आदमी आगे बढ़कर कछुए के कान काटने की कोशिश करता है

कछुआ अपने कान छुपाता है और अपने कवच में जा छुपता है

आदमी   :    अरे ये तो अपने कवच में छुप गया। (कछुए की पीठ ठोकता है) सुनो कच्छप महाराज! बाहर निकलो। हम तीन पीढ़ियों से तुम्हारे कानों की राह देख रहे हैं।

खरगोश : जाने दो चाचा, वर्ना इसके इन्तजार में हमारी ज़िंदगी भी यहीं बीत जाएगी।

आदमी सहमति में सर हिलाता है मंच पर सारे पात्र आते हैं कछुआ कवच में छुपा वहीं पड़ा रहता है

सारे पात्र :    अब पता चला कछुए अपने कान क्यों नहीं दिखाते! क्या आपने देखे हैं कछुए के कान?