
वरिष्ठ चित्रकार-लेखक अशोक भौमिक आजकल एक उपन्यास को पूरा करने में लगे हैं। उस उपन्यास का एक अंश-
शहर के बीचोंबीच पुराने घण्टाघर की घड़ी की सुई न जाने कबके समय चाट गयी है। अब लोग इसे नहीं देखते। अब यह घण्टाघर दफ्तर, स्कूल,कचहरी जाने वालों को समय नहीं बताता। वक्त का फेर है, वर्ना पूरा शहर एक जमाने में इस घड़ी के इशारे पर जागता और सोता था।
घंटाघर के रौनक भरे वक्त के बीते हालाँकि ज्यादा वक्त अभी नहीं बीते हैं- फिर भी शहर के लोगों को लगता है कि मानो सदियॉं गुजर गयी हैं, घंटाघर की सुइयों को रुके या इसके घण्टों को खामोश हुए।
बिना सुइयों वाली इस घड़ी की ओर अब कोई नहीं देखता। इस घड़ी के पीछे जहां कभी छोटे बड़े पीतल के पुजरों का मकड़ज़ाल था, अब वहां कबूतरों ने घोंसला बना लिया है। कबूतरों के इस घोंसले में अपने छोटे-छोटे सलेटी अण्डों को सेतते, वक्त को तेज गुजरते हुए देख, कबूतरों का जोड़ा सोचता है- ‘अरे कल ही की तो बात हैं, हम ही अण्ड़ों के अंदर गरमा रहे थे।’
इस घंटाघर से पांचों दिशाओं की ओर निकलने वाली सड़कों में, एक सड़क ऐसी है जो टहलते-घूमते, मंजिल पर पहुंच कर सीढ़ियों में तब्दील हो जाती है।
ये सीढ़ियां नीचे उतरकर, कीचड़ में सन कर एक नदी को छूती हैं। उस नदी को लोग शिप्रा के नाम से जानते हैं।
शिप्रा एक नदी का नाम है।
बिना सुइयों वाली, घंटाघर वाली घड़ी के काले अस्पष्ट होते बारह रोमन हरफ जड़े सफेद डायल के पीछे कबूतरों का जोड़ा गुटगुटाता है। मानो कहता हो कि- शिप्रा एक नदी का नाम है – शिप्रा एक नदी का नाम है।
2
गंगा का पानी, जून के बारहवें दिन तक पहुंचते-पहुंचते घाट से दूर जा चुका था। नदी और घाट के दरम्यान बालू के फैलाव में, हजारों लोगों की भीड़ के करीब शिप्रा की चिता सजी थी। बर्फ की सिल्लियों पर रखे शिप्रा के शरीर पर से पार्टी का तिरंगा झण्डा हटा लिया गया था। गर्मी में बर्फ तेजी से पानी होकर बह रहा था- अपने साथ गुलाब की असहाय पंखुड़ियों को साथ लिये, जो अभी-अभी मालों में जड़े फूलों से टूटकर अलग हुये थे।
शिप्रा एक नदी का नाम है।
चिता के पास खड़ी भीड़ से नारा उठा-
‘जब तक सूरज चाँद रहेगा
शिप्रा तेरा नाम रहेगा।’
शिप्रा की मौत दस जून की रात को हुई थी। देश के गृह राज्य मंत्री की पत्नी को अंतिम श्रद्घांजली देने बाहर से आने वाले लोगों का ख्याल रखकर दाह संस्कार को बारह जून की दोपहर तक रोक दिया गया था।
बर्फ की सिल्लियों पर गुलाब की कुछ पंखुड़ियां चिपकी हुई थीं- कुछ बह रही थीं। शिप्रा की नाक सुराखों पर जड़ी रूई के फाहें- अस्वाभाविक सफेद लग रही थी।
खादी के सादे लिबास में शिप्रा भीग रही थी।
मुझे लगा, शिप्रा बर्फ की शीतलता को अपने पूरे शरीर में आखिरी बार महसूस कर रही थी।
शिप्रा बह रही थी।
बारह जून को दोपहर दो बजे के आसपास शिप्रा की चिता को दिनेश ने आग दी थी।
दिनेश ने सफेद कुरता-पायजामा पहन रखा था। उसके आसपास काली वर्दी में, सरपर काला साफा बाँधे चारों कमाण्डो के हाथों में बन्दूकें थीं। उनकी निगाहें चारों ओर घूम रही थीं। मानों हजारों लोगों की भीड़ में वे किसी एक को तलाश रहे थे।
‘जब तक सूरज ……. ’
खादी की सफेदी में लिपटी भीड़ ने नारे लगाये, फूल बरसाये, अपने राजनैतिक दल के गरिमामय इतिहास को याद किया, और अन्त में ‘राम नाम सत्य है’ की गुनगुनाहटों के बीच पंडित जी के मन्त्रों को दोहराते हुए दिनेश ने चिता को आग दी।
चिता को आग देते ही, यकायक एक अजीब सी खामोशी छा गयी और इस खामोशी में चिता में आग पकड़ने की चट्पटाहट साफ सुनाई देने लगी। हालाँकि मैं चिता से कुछ दूर खड़ा था- कमाण्डों, पुलिस, मीडिया, हजारों पार्टी वर्कर्स और दिनेश- शिप्रा के परिचित लोगों से काफी दूर।
मुझे लगा कि इतनी दूर से भी मैं शिप्रा को साफ देख पा रहा था।
और ऐसे वक्त, मेरी दोनों आंखों से शिप्रा बह चली थी।
शिप्रा एक नदी का नाम है !
सूरज और चाँद की निगरानी में चलते इस संसार में शिप्रा अब कभी नहीं दिखेगी।
मैंने अपनी जेब से रूमाल निकालकर उसे तहा कर छोटा कर लिया ताकि मैं आँखों से उफनायी हुई शिप्रा को सोख सकूं। पर रूमाल मेरी मुट्ठी के अंदर ही धरा ही रह गया। मैं, अपनी पलकों को बिना झपकें एक टक शिप्रा को देख रहा था-
शिप्रा बह रही थी।
बारह जून के ऐसी एक दोपहरी में मैं एक नदी किनारे एक विशाल भीड़ से कुछ दूर खड़ा खामोश, रो रहा था।
धीरे-धीरे भीड़ छटने लगी थी।
घाट से दिनेश सिंह के चले जाने के साथ ही मीडिया, पुलिस कमान्डों और अर्थी के साथ आये हुए लोग भी चले गये थे। मैं नदी के किनारे खड़ा नदी को बहते देख रहा था-
यह शिप्रा नहीं थी,
संगम की ओर बढ़ती हुई यह गंगा थी।
सात-आठ भैंसें नदी से अपना सर बाहर निकाले घाट की ओर देख रहे थे। कुछ की सींगों पर जलकुम्भी फंसा हुआ था। जलकुम्भी का ताज पहने वे निर्लिप्त दार्शनिकों जैसी नजर से अपने आसपास देख रहे थे। नदी में पानी उतना कम नही था जितना मैं समझ रहा था।
कुछ मालायें, कुछ फूल पानी में बहते हुए संगम की ओर बढ़ रहे थे- शायद कुछ देर पहले तक वे शिप्रा के ठंडे शरीर से लिपटे हुए थे।
मैंने मुड़ कर नदी किनारे के उस ओर देखा, जहां अब शिप्रा की चिता बुझ रही थी।
जून की ठहरी हुई, उमस भरी उस दुपहरी में नदी किनारे में भी हवा नहीं चल रही थी।
चिता से निकल कर बनी सलेटी-सफेद धुँए की मीनार साफ़ नजर आ रही थी। किसी पुराने ऐतिहासिक नगर के बीचोंबीच एक गैरज़रूरी सफेद घण्टाघर की तरह- जिसकी सुइयों को न जाने कब, वक्त चाट गया था।
मैं हल्के पांव चिता के करीब पहुंच गया था।
लकड़ी के कुंदों पर आग की लपटें नहीं थीं। उन पर राख से ढंकी बिवाइयों जैसी दरारों के बीच से धधकती आग की लाली दिख रही थी, जो तब भी लकड़ी को चटखा रही थी।
परसों रात, यान कि दस जून की रात के बाद, मैं इतने करीब से इतने एकान्त में शिप्रा को देख रहा था।
पर शिप्रा कहीं नहीं थी।
3
शिप्रा एक नदी का नाम है !
शिप्रा के लिए इन्तज़ार करते हुए लीला फैन्सी स्टोर्स के बाहर पट्टेदार तिरपाल की छाँव में मैंने न जाने कितनी बार कविता की पंक्तियों को पकड़ने की कोशिश की थी- याद नहीं।
लीला फैन्सी स्टोर्स के बाहर तिरपाल की वह छोटी सी कंजूस छाँव, दरअसल राहगीरों और मेरे जैसे भरी दोपहरी में कविता खोजते नौजवानों के लिए नहीं बनी थी। यह छाँव काँच के बड़े शो-केस में, रंग बिरंगी साढ़ियों में लपटी सात मैनिक्विन लड़कियों को धूप से बचाने के लिए था।
शिप्रा के लिए इंतजार करते हुए- कभी गर्मी की चिलचिलाती धूप में- जब सड़क की कोलतारी सतह पर फफोंलें फूटते थे, या फिर जाड़े की किसी खुशनुमा दिन के ऐसे वक्त जब अच्छी यादों की पश्मीनी गर्माहट, मुझे यह यकीन करने को हठ करती थी कि इस खूबसूरत दुनिया का यह खूबसूरत वक्त सिर्फ मेरे लिए ही बना है, और ऐसे वक्त बुरे लोगों की बुराइयों को माफ करने को जी चाहता था, या बरसाती आसमान में से जब काले बादलों का गिरोह सूरज को अगुवा कर लेता था, और आसमान साँवली कुवारी लड़की जैसी गुमसुम खामोश रहता था, मानो लड़के वालों के ख़त का इंतजार होता था, उस कलमुंही को। मैं, कभी मौसम के प्रस्ताव पर, कभी सपनों के तकाजे पर, कभी अपमान को भुलाने की नाकामयाब कोशिशों में उलझकर,शो केस के अन्दर रंगबिरंगी साड़ियों में लिपटी मैनिक्विन लड़कियों को नाम देता था। पहली को दमयन्ती,
दूसरी उर्मिला,
तीसरी शकुन्तला,
चौथी चित्रांगदा,
पांचवीं का नाम नन्दिनी,
छठी मालविका और
सातवीं ?
शिप्रा ! !
शिप्रा एक नदी का नाम भी है। शहर के चारों ओर लहराती हुई बहने वाली शिप्रा सुदूर किसी प्रान्त से निकल कर चम्बल नदी में खो जाती है।
उस दिन देर रात उन्नाव से लौट रहा था। बस से उतर कर पैदल ही चल पड़ा था- घर की ओर। अभी सिनेमाघरों में आखरी शो खत्म नहीं हुआ था,दुकानें बन्द हो चुकी थीं और सड़कें वीरान थीं।
लीला फैन्सी स्टोर्स की बत्तियां जल रही थीं। शो-केस का शटर आधा गिरा हुआ था। आधे खुले शटर से दुकान के अन्दर की बत्तियां, जो सारे दिन उन सात मैनिक्विन लड़कियों को रौशन किये रहती थीं- बुझी हुई थीं। दुकान की रौशनी शो केस के अन्दर तक पहुंच कर, सात-सात नग्न नारी मूर्तियों को एक साथ देख कर जैसी ठिठक गयी थी, पर उन मैनिक्विन निर्जीव शरीरों में शर्म ढंकने की कोई कोशिश भी नहीं थी। प्रागऐतिहासिक युग के किसी सुडौल, मांसल, नग्न नारियों का जुलूस। मुझे न जाने क्यों लगा कि उन सातों में छह तो शादीशुदा हैं ही। सातवीं लड़की, शरीर पर उम्र की सीमित सिलवटों के चलते कुँआरी लग रही थी।
मैं उसे एकटक देखता ही रहा था।
किस्से-कहानियों से लेकर छोटे-छोटे देहातों-कस्बों में दर्जी की टुटही दुकानों में देखे जाने वाले, बूढ़े दर्जी जैसा एक आदमी नये कपड़ों के ढेर को पास की एक तिपाई पर रख कर चाय का एक छोटा सा गिलास हाथ में थामे, गौर से उन लड़कियों को देख रहा था- मानो उन लड़कियों के भविष्य के बारे में वह कोई गहरी साजिश रच रहा हो।
मेरी साँसें शायद तेज चल रही थीं, या कि ठीक उस रफ्तार से चल रही थीं- जितनी मेरे उम्र के किसी नौजवान की चलनी चाहिए। पर रात के इस तिलस्मी वक्त में मेरी बालिग साँसें, शो केस के काँच को बार-बार धुँधला रही थीं।
मैंने हाथ से काँच पर के धुँधलके को साफ कर शो केस के अन्दर देखा। वह बौना दर्जीनुमा बूढ़ा सातों लड़कियों के बीच, बायें हाथ में एक साड़ी थामे दाहिने हाथ में आलपिन थामे, शो-केस के अन्दर टहल रहा था। शो केस के बाहर से ठहरी हुई रात के सन्नाटे में मुझे लगा जैसे वह बूढ़ा नींद से उठकर, सपनों का पिटारा हाथों में थामे फेरी करने निकला हो।
सातों लड़कियां, एक बौने बूढ़े और कम रौशनी की मौजूद्गगी में मायावी लगने लगी थी। मानो जंगल में शाम उतर आयी थी- पर सूरज नहीं था आसमान पर बाती भी नहीं थी। कहीं, पर अंधेरा भी नहीं था वहां।
रौशनी की ऐसी हल्की फुसफुसाहट में, सात लड़कियों के इस जंगल में बूढ़े दर्जी की आँखें चमक रही थीं।
पर्णविहीन उस जंगल के पेड़ों के तनों पर जैसे मौका पाकर किसी चित्रकार ने अपनी कूँची से नर्म रौशनी का रंग फेर दिया था।
मैं उन दरख्तों के नाम तलाशने लगा।
शाल्मली
वनतुलसी
माधवी
पलाश
कनेर
चिरार और
शिप्रा।
‘शिप्रा एक़…… ’
‘मियाँ साब !’
मैंने जोर से पुकारा था उस बूढ़े को।
‘मियाँ साब ! आपके हाथ की सिन्दूरी रंग वाली साड़ी बस शिप्रा को पहनाना।’
सिन्दूर का रंग लाल होता है, ठीक हमारे सपनों के रंग जैसा।
मेरे सपनों में जब भी शिप्रा आती थी, अकेली नहीं होती थी वह नदियों के जुलूस में शामिल एक दूर से पहचानी जाने वाली बेहद खास नदी जैसी लहराती हुई अलग से दिखलाती थी। ऐसे जुलूस में चंद्रभागा, अलकनंदा, सुवर्णरखा, तुंगभद्रा, मेघना और कावेरी के साथ रहकर भी अलग बहती हुई दिखती थी शिप्रा।
पर इस नाम को मेरे हाठों तक पहुंचने में दो साल लग गये थे।
4
कालेज कैण्टीन का हॉल काफी बड़ा था।
इसी हॉल के एक किनारे वाली मेज पर सुधीर नायक, जीतेन्द्र, दिलीप और मैं बैठे थे। हॉल में ज्यादा रौशनी नहीं थी। हॉल की बड़ी दीवार पर की चार खिड़कियों से आती रौशनी फर्श पर चार उजली पट्टियाँ बनाये हुए थी। कैण्टीन की और मेजों पर लड़के-लड़कियों का शोर जारी था। उनके करीब गये बगैर भी उनकी बातचीत के मुद्दों का आसानी से अन्दाज़ लगाया जा सकता था। पॉप कल्चर के चपेट में यह पीढ़ी झूम रही थी, लिहाजा कालेज कैण्टीन फैशन से लेकर पॉप सांग के नये अलबमों, गांजा हशीश एल.सी.डी. की चर्चाओं से भरा रहता था।
ऐसे ही कोलाहल के भरी कॉलेज कैण्टीन में शिप्रा दौड़ती हुई दाखिल हुई थी।
‘कामरेड, आने में देर हो गयी। हमारे माथुर सर, एक तो शेक्सपीयर के दीवाने हैं, फिर उनका किंग-लीयर। माई गॉड़….। सॉरी, में तो बोलती ही जा रही हूं…. ।’
फिर मेरी ओर इशारा करते हुए सुधीर से पूछा था।
‘सुधीर, ये कौन ?’
‘ओह, कॉलेज में नया आया है। विमलेश मिश्रा। बी़एस़सी़ पार्ट वन।’ विजयदा के साथ है।
और विमलेश इनसे मिलों- कामरेड शिप्रा- शिप्रा सिंह।
शिप्रा को मैं पहली बार देख रहा था और वह भी इतने करीब से। गर्मी और उमस से शिप्रा के चेहरे पर पसीने की नन्हीं-नन्हीं बूंदें उभर कर ठहर गयी थीं।
मेरे लिए पसीने की ये बूंदें, शिप्रा जैसी ही नयी थीं। पसीने की ऐसी बूंदें थकावट से नहीं उभरतीं।
सुधीर ने कैण्टीन के बेरे को आवाज दी।
‘पिंटू, चाय। तीन का पाँच। ग्लास धोकर लाना।
चाय आते ही शिप्रा ने अपने पर्स से पैसे निकाल कर पिंटू को देते हुए कहा था, ‘कीप द चेंज। बाकी पैसे तुम्हारे।’
शिप्रा के साथ बीते उस दोपहर के बाद असंख्या दोपहरियों, अनगिनत साझों के बाद वह रात भी आयी थी, जब मेरी बांहों में शिप्रा सिंह का मृत शरीर धीरे-धीरे ठंडा पड़ रहा था।
उस दिन भी उसका चेहरा ओंस से नहाये एक सुबह की तरह भींगा था। पर इस पसीने में एक लंबे सफर की थकावट थी- जो सफर के खत्म होने पर ही नजर आ सकती थी।
कालेज कैण्टीन की शिप्रा और दस जून की रात वाली शिप्रा के बीच पूरे तैंतीस सालों का फासला था।
मैंने शिप्रा के साथ तैंतीस साल गुजारे थे।
पर शिप्रा ने मुझे एक बार भी मेरे नाम से नहीं पुकारा था।
मैं विमलेश मिश्रा- माँ-बाप के तीन बेटों में सबसे छोटा मुन्ना- पप्पू, टुक्कू !
शिप्रा के लिए मैं दस जून की रात तक, कभी साथी, कभी कामरेड ही बना रहा। गार्डिनाल की कई गोलियां एक साथ ले लेने के बाद और अपनी आखरी नींद में डूबने से हफ्ते पहले शिप्रा ने कहा था, ‘साथी, मैं अब जीना नहीं चाहती …..।’
सुधीर से मुझे मिलना है अभी, तुरन्त …..।’
ऐसा कुछ कहते हुए शिप्रा शान्त हो गयी थी।
पसीने से तर, शिप्रा के चेहरे को चादर से ढकते हुए डाक्टर ने कहा था- ‘नेताजी, आय एम सॉरी- शी इस नो मोर।’
शिप्रा चली गयी थी।
शिप्रा एक नदी का नाम है
गर्मी के मौसम में जलकुंभी की मोटी हरी कथरी तले अपना चेहरा छिपाये सोयी रहती है, शिप्रा। पर बारिश आने पर फिर अपनी लहरों से दोनों पाटों को चूमती मुस्कुराती, वह चंचल और सचल हो उठती है। और दौड़ पड़ती है शिप्रा, चंबल से मिलने के लिए। शिप्रा दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है।
उत्तर गामी शिप्रा, सुधीर से मिलने चली गयी थी।
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शिप्रा अपने माँ-बाप की एक मात्र संतान थी।
राजकमल ठाकुर और मीनाक्षी खरे एक साथ मेडिकल कालेज में दाखिल हुए थे। एम.बी.बी.एस. के बाद दोनों ने एम.एस. किया था। मीनाक्षी खरे ने गायनोकोलॉजी में और राजकमल ने जनरल सर्जरी में। दोनों ने जल्द ही अपनी प्रैक्टिस जमा ली थी, हालाँकि उनका नर्सिंग होम कुछ सालों बाद ही बन सका था। शादी के कई साल गुज़र चुके थे पर मीनाक्षी की गोद सूनी ही थी।
राजकमल और मीनाक्षी के परिवार के लोगों का नियति, पूजापाठ, दान हवन आदि पर गहरा विश्वास था। मीनाश्री के पिता उज्जैन के किसी कालेज में विज्ञान पढ़ाते थे- पर ज्योतिष शास्त्र पर उनका पूरा भरोसा था। अपनी बेटी की कुण्डली में पढ़ कर उन्हें पता था कि मीनाक्षी के तीन संतानें होंगी और तीनों ही पुत्र रत्न होंगे। शिप्रा के जन्म से भी ज्योतिष पर उनके विश्वास का कोई फक्र नहीं पड़ा। उन्हांने ऐलान किया ‘बेटी में तीन पुत्रों जैसे गुण होंगे। तीन पुत्रों के समान यश और शक्ति इस एक बेटी में होगी।’
शिप्रा नाम उन्हीं का दिया हुआ था।
हजारों साल पहले मालवा में भयंकर सूखा पड़ा था। नदियां, ताल, पोखर सब सूख गये थे। चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गयी थी। राजा के भंडार में हालाँकि अन्न की कमी नहीं थी। सो चमुर राजा ने एक ही कर्म से दयावान और ईश्वर भक्त होने की ख्याति पानी चाही। उसने भगवान विष्णु के लिए एक मन्दिर बनवाने का संकल्प किया। मन्दिर के निर्माण में काम करने वाले मजदूरों को पूरे दिन काम करने के बदले में मुट्ठी अन्न देने के इंतजाम का ऐलान करवा दिया। सूखे से ग्रसित मालवा के लोगों के लिए यह आशातीत प्रस्ताव था। राजा की जय जयकार करते हुए, सारे दिन वे पूरे परिवार के साथ लग कर काम करते और शाम को दो-दो मुट्ठी अनाज लेकर घर लौटते। कुछ ही महीनों में भगवान विष्णु का भव्य मन्दिर बनकर तैयार हो गया। प्रसन्न मुद्रा में विष्णुजी ने जिस दिन मन्दिर की मूर्ति में प्रवेश कर राजा को चक्रवर्ती होने का आशीर्वाद दिया, उसी दिन राजा ने अपने अनाज का भंडार जनता के लिए बन्द करवा दिया।
जनता की हालत फिर पूर्ववत् हो गयी।
राजा को अब जनता की जय जयकार की जरूरत नहीं थी, क्योंकि उनके मन्दिर में स्वयं विष्णु कमलासीन जो थे। विष्णु भी राजा के भले के बारे में ही सोचने लगे थे, जनता का ध्यान उन्हें भी न था।
भगवान को देने के लिए गरीबों के पास कुछ जंगली फूल और एक लोटा पानी के अलावा और था ही क्या। महाकाले- खर शिवजी सब देख रहे थे- समझ रहे थे। उनके लिए राजा का महत्व कुछ भी न था, वे गरीब जनता के कष्टों के बारे में चिन्ति हो उठे।
ऐसे ही एक दिन महाकालेश्वर शिव विष्णु के दरबार पहुंचे। मालवा के अकाल और राजा की चालाकी की बात तो की ही, पर साथ ही उन्होंने विष्णु पर भी राजा से मन्दिर और भोग के रूप में उत्कोच लेने का आरोप भी जड़ दिया। विष्णु नाराज हो गये। नाराज विष्णु ने शिव की तर्जनी दिखा दी। महाकालेश्वर को लगा कि विष्णु उनका अपमान कर रहे हैं- पर वास्तव में ऐसा था नहीं। पर जब तक शिव इस बात को समझ सकते उनका त्रिशूल चल चुका था। त्रिशूल ने विष्णु की तर्जनी को बेध दिया।
विष्णु और शिव दोनों को ही अपनी गलतियों का अहसास हुआ।
महाकालेश्वर ने विष्णु की तर्जनी से निकले खून को अपने माथे पर ले लिया ताकि जमीन पर यह देव रक्त न गिर सके।
विष्णु की तर्जनी का रक्त, महाकालेश्वर के कपाल से होकर एक नदी के रूप में बह निकला। इसी नदी के चलते, मालवा का वर्षा तक चलने वाला सूखा भी खत्म हुआ।
विष्णु और महाकालेश्वर शिव के स्पर्श से जन्मी यह नदी शिप्रा थी।
अपने माँ-बाप की एकमात्र संतान शिप्रा, बारहवीं क्लास तक दार्जिलिंग के सेंट मेरीज़ में पढ़ी थी। दार्जिलिंग के बोर्डिंग हाउस में उसने पूरे बारह साल गुजारे थे।
बड़े दिन से लेकर नये साल की लंबी छुट्टियां होती थीं स्कूल में। साल में एक बार ही शिप्रा घर आ पाती थी अपने मम्मी-पापा के पास। पर चूंकि वे दोनों शहर के नामीगिरामी डाक्टर थे इसलिए वे सुबह से रात तक नर्सिंग होम में व्यस्त रहते थे। छुट्टियों में कुछ दिनों के लिए घर आयी अपनी बेटी के साथ कुछ वक्त गुजारने का उनके पास वक्त नहीं हो पाता था।
शिप्रा आर्ची, टिनटिन और एस्ट्रिक्स के कॉमिक्स, मिल्स एण्ड बून, एनिड व्लाईटन के किस्से-कहानियों को पार कर कब जिमी हेन्ड्रिक्स बीटल्स् और एल्विस प्रिस्टले के गीतों से गुजरते हुए मैझड्रेक्स और ग्रास के उपन्यासों के साथ कब जवान हो गयी थी- उसे खुद भी खबर नहीं हुई।
सुधीर से उसकी मुलाकात कानपुर क्रिश्चयन कालेज में हुई थी। सुधीर और उसके दूसरे दोस्त तब सभी छात्र थे। सुधीर पार्टी से काफी नजदीक जुड़ा था। शिप्रा को सुधीर और उसके दोस्तों की दुनिया बिल्कुल नयी सी लगी थी। शिप्रा बहुत कम समय में बेहद सक्रिय हो उठी थी।
शिप्रा में बदलाव आने लगा था। उसके बाडे़ में कुछ नयी किस्म की पुस्तकें, तस्वीरें, पोस्टर आदि घुसने लगी थीं। इन सब का बहाव इतना तेज था कि चन्द दिनों में ही शिप्रा की जिंदगी से मैन्ड्रेक्स-एल्विस-जैकलन सुझान आदि गायब हो गये थे।
दोज़ वेर द डेज़ माई फ्रेंड़
आइ थॉट दे उड् नेवर एण्ड़- जिमी हेन्ड्रिल्स
शिप्रा के आसपास दुनिया तेजी से बदल रही थी। लड़के-लड़कियों के लिबास बदल रहे थे। एक ओर जहां लंबी कलमें, बेल बाटम, गोगो गॉग्लस-हरे कृष्ण हरे राम- पॉप सांग-पॉप स्टार- गाँजा-जैम सेशन था, वहीं दूसरी ओर चे-ग्वेवारा, वियेतनाम नक्सलवाडी, होचीमिन्ह-चारू मजुमदार-चीन था।
वियतनाम में अमरीका की दादागिरी नहीं चल पा रही थी। फौजियों का मनोबल टूट रहा था। वे हार-हार कर थक गये थे। मनोरंजन की मृत संजीवनी से उन सैनिकों के मन को रंगने पहुंची भारत की ‘मिस यूनिवर्स’- रीता फारिया।
सुधीर ने अकेले ही कानपुर के सभी कालेजों मे जाकर छात्रों से बातचीत की और छात्रों का एक विशाल प्रदर्शन परेड के मैदान से अमरीकी सूचना केन्द्र तक निकाला। सुधीर कुछ ही महीनों में कानपुर के कालेजों के छात्रों के बीच जाना पहचाना नाम बन गया था।
अपोलो ग्यारह- नील आमस्ट्रांग-पैटन टैंक- सातवाँ बेड़ा-एण्टरप्राईज़ आदि अमीरकी प्रगति के प्रतीक बन रही सूचनाओं को विश्वभर में प्रचार के लिए अमरीका करोड़ों डालर बहा रहा था।
कानपुर के मेहता पार्क की केनेडी सेंटर लाइब्रेरी की दीवार पर एयरक्राफ्ट कैरियर ‘एन्टर प्राइज़’ का बड़ा सा चित्र लोगो के दु:स्वप्नों में भी दिखने लगा था। अमरीकी नौसेना के सातवें बेड़ का उस्ताद था ‘एन्टर प्राइज़’। जिस देश के ठाँव यह नाँ बांध जाय- तो उस देश की तबाही में ज्यादा वक्त नहीं लगता था।
तेजी से दुनिया बदल रही थी। शहर के पढ़े-लिखे नौजवानों के एक बड़े से हिस्से ने व्यापक बदलाव के रूख को जनता की ओर मोड़ना चाहा। सदियों से शोषित किसान और ग्रामीण लोगों के सपनों के साथ उन्होंने अपने सपने जोड़ दिये। पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्से के एक छोटे गांव से निकली चिनगारी, देखते-देखते पूरे देश के महानगरों-शहरों-गावों-कस्बों में रहने वाले हजारों हजार नौजवानों की आंखों में दिखने लगी थी।
किस गाँव की या किस इलाके से सुधीर का ताल्लुक था पता नहीं, पर वह भोजपुर-कलकत्ता-श्रीकाकुलम-लखीमपुर या उन्नाव कहीं का भी हो सकता था। कालेज में उसने दाखिला जरूर लिया था पर उसका उद्देश्य डिग्री हासिल करना नहीं था- यह उसके लेक्चरर-प्रोफेसर के साथ-साथ सुधीर के साथ पढ़ने वाले सभी जान गये थे।
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कहते हैं किसी शहर का इतिहास शहर में रहने वाले लोगों से ही बनता है, पर कभी-कभी मौसम भी आकर इतिहास में सेंध लगाकर अपनी जगह बना जाता है।
सन् उन्सठ का ठंड याद है न ? बेना झावर पानी की टंकी का पानी जम गया था- कड़ाके की ठंड, उस पर शीत लहरी-पहले कभी इतनी ठंड नहीं पड़ी थी इस शहर में।’
सन् उन्सठ के बीते, दसेक साल से ज्यादा का समय बीत गया था। अब यह सत्तर का दशक था- मुक्ति का दशक !
जाड़े की उस रात में, जब लोग लिहाफ-कंबलों के नीचे दुबके सन् उन्सठ को याद कर रहे थे, सड़क किनारे अलाव से सटकर बैठे गरीब-मजबूर ऐसी रातों के बीतने का इंतजार कर रहे थे; बेनाझावर पानी की टंकी का पानी अपने को बर्फ में बदल जाने के आतंक से घड़ियाँ गिन रहा था, मेहता पार्क में लगी- ओंस से नहायी हुई बर्फ जैसी ठंडी, गांधी जी की काँसे की मूर्ति की गरदन पर लोहा काटने की आरी की कर्कश आवाज से मेहता पार्क का सन्नाटा टूट कर बिखर गया था।
गांधी की मूर्ति आठ फीट ऊँची थी जो लगभग छह फीट ऊँचे पेडेस्टल पर जड़ी थी। गुलाबी-सफेद, छोटे-छोटे मौसमी फूलों की पतली क्यारी से घिरी गांधी की चौदह फुट ऊँची मूर्ति, जनवरी के भयंकर ठंड वाली रात के इस सन्नाटे में मायावी लग रही थी।
लंबी नाक पर टिके चश्मे के दो गोलाकार फ्रेमों के अन्दर गांधी की आँखें नहीं दिख रही थीं, जबकि मैं उनके चेहरे के इतना करीब था। मैं उनकी कमर पर, जहां उन्होंने अपनी धोती लपेट रखी थी; अपने पैर टिकाये, मूर्ति की दाहिनी बांह पर बैठा था। इसी हाथ से गांधी अपनी लाठी थामे थे- जो उनके कद से कुछ ज्यादा ऊँची थी। मूर्ति की पीठ पर विमल ने अपने को जस-तस चिपका रखा था, क्योंकि उसे मेरे जैसे गांधी के बांये हाथ का सहारा नहीं था। लोहा काटने वाली आरी की मूँठ मेरे हाथों में थी और इसका दूसरा छोर विमल थामे था।
गरदन पर आरी चलाने के पहले मैंने अपनी बांयी हथेली से गांधी के कंधे को छुआ। वहां हड्डी का उभार स्पष्ट था। दुबले, कमजोर और बूढ़े गांधी जी निर्विकार-निर्लिप्त भाव लिए खड़े थे। मानो जनवरी की इस भयंकर ठंड को उन्होंने अपने शरीर में समेटे रखा हो।
मुझे नन्दलाल बोस का प्रसिद्घ चित्र याद आया, जिसे उन्होंने गांधी जी की डांडी यात्रा के समय बनाया था। इस मूर्ति की मुद्रा लगभग वैसी ही थी।
काले काँसे की फौलादी सतह मुझे अचानक जीवन्त सी लगी। मुझे लगा गांधी जी के धंसे हुए गालों के बीच तने कमजोर से होठों से वे बस कुछ कहने ही वाले थे। देर तक अन्धेरे में रहने से चीजें कुछ-कुछ साफ दिखने लगती हैं- गांधी का चेहरा मुझे पहले से ज्यादा स्पष्ट दिख रहा था। दो आंखें मुझे देख रही थीं- क्या वे मुझसे कुछ सवाल करने की तैयारी में थीं या मुझ पर हंस रही थीं ? – मैं ठीक से समझ नहीं सका।
मैंने गांधी की मजबूत दाहिनी बांह पर बैठ कर नीचे देखा। मूर्ति के पेडेस्टल के नीचे, सफेद-गुलाबी मौसमी फूलों की पतली क्यारी से घिरे चबूतरे पर मेरे चार साथी खड़े थे। उनमें से मैं शिप्रा के अलावा किसी से भी पहले कभी नहीं मिला था। इतनी ऊँचाई से वे सब बेहद बौने लग रहे थे।
‘‘पावर फलोज़ फ्राम द बैरल आफ अ गन ! कामरेड शुरू करो- क्वीक, देर हो रही है।’’
मुझे लगा कि ठंडे घने कोहरे की मोटी चादर के उस पार से मुझे शिप्रा नहीं, कोई और आवाज दे रहा था। जो कई हज़ार मीलों के लंबे सफर को तय कर, हिमालय की ऊँची चट्टानों को लाँघ कर मुझ तक पहुंच रही थी।
मैंने आरी चलाने के पहले अपनी बांयी हथेली से गांधी जी की आंखों को ढंक लिया।
विमल पूरी ताकत से आरी के दूसरे छोर को थामे था।
पर जितना हम लोगों ने सोचा था- उतना आसान काम नहीं था यह। और जल्द ही, काले काँसे की गांधी की गरदन रेतने की हमारी कोशिश नाकामयाब हो गयी। कुछ देर तक हम और विमल मेहनत करते रहे थे, पर अचानक आरी ही टूट गयी थी।
लोहा काटने वाली आरी शायद कमजोर नहीं थी- शायद हमारी बाजुओं में ही ताकत की कमी थी।
मूर्ति से नीचे उतरने के पहले मैंने गांधी की आंखों से अपनी बांयी हथेली हठा ली थी। गांधी की ओर देखने की हिम्मत मुझ में नहीं थी। मेरी हथेली में उनके चश्मे के फ्रेम के निशान शायद बन गये थे – थोड़ा दर्द भी हो रहा था।
‘‘कामरेड, हम फिर अटैक करेंगे। पीपल मस्ट फील आवर प्रेजे़न्स- लोगों को पता चलना चाहिए कि हम हैं ।
हम सशस्त्र क्रान्ति के जरिये
सर्वहारा जनता की मुक्ति लायेंगे।
भारत वर्ष की कम्युनिस्ट पार्टी
माक्र्सवादी लेनिनवादी
जिन्दाबाद जिन्दाबाद।
उन्सठ के ठंड से ज्यादा ठंडी उस रात में, मेहता पार्क के सन्नाटे में, हमने मिलकर नीची आवाज में नारे गुनगुनाये थे।
अभी शाम के साढे छह ही बजे थे, मेहता पार्क वीरान हो गया था। पार्क के मेन गेट से अन्दर आकर सड़क गांधी जी की मूर्ति से गुजर कर जहां खत्म होती थी- वह टाउन हॉल का चबूतरा था। टाउन हाल की पहली मंजिल पर दो एक सरकारी दफ्तर थे पर इसके एक बड़े से हिस्से में केनेडी सेंटर का ऑफिस था और उसी से सटी केनेडी सेंटर लायब्रेरी।
मैं, केनेडी सेंटर लायब्रेरी की ओर जाने के लिए, जब गांधी की मूर्ति के बगल से गुजर रहा था, तभी मुझे पिछले हफ्ते की उस रात की याद आयी। मैं रुक गया।
‘बापू, कैसे हो ?’
हाथ में लाठी को मजबूती से पकड़े, काले काँसे की बनी फौलादी मूर्ति की आंखों का चश्मा अपनी कमजोर कमानी के सहारे लंबी नाक पर टिका था।
उस चश्मे के गोल फ्रेम के पीछे एक जोड़ी आंखों को मैंने पिछले हफ्ते रात के ठंडे, कोहरे भरे गहराये वक्त में इतने करीब से देखा था।
हम पिछले हफ्ते अपने एक्शन में नाकामयाब रहे थे- यह सोचकर मुझे बुरा नहीं लगा, पर गांधी की मूर्ति की आंखों में एक हफ्ते बाद जरूरत से ज्यादा क्षमा का भाव झलक रहा था- मुझे लगा गांधी जीत गये थे।
गांधी मूर्ति के पास के गुजरने वाली सड़क पर खड़े, हार जाने का अहसास मुझे अपमानित कर गया।
‘हम लौट कर आयेंगे एण्ड दिस टाइम वी विल विहेड यू श्योरली। कानपुर के लोगों को- उत्तर प्रदेश के लोगों को पता चलेगा कि हम हैं उनके आसपास। वी हैव टू मेक आवर प्रेज़ेन्स फेल्ट।’
मैंने गांधी की मूर्ति को देखते हुए शिप्रा के कहे शब्दों को दोहराया।
गांधी जी छह फीट ऊँचे पेडेस्टल पर खड़े मेहता पार्क के पास से गुजरते माल रोड पर तेज रफ्तार गाड़ी, स्कूटर, रिक्शों को आते-जाते देख रहे थे- मेरी खतरनाक मौजूद्गी की तनिक भी परवाह किये बगैर।
‘कल सुबह ही जान जाओगे हम कौन हैं ! मेरे कंधे से लटकते इस झोले को देख रहे हो ? इसमें तीन साबुत डबल रोटियां हैं और पूरे एक लीटर पेट्रोल से भरी बोतल है।
सोच रहे होंगे, इसका क्या होगा ?
सावरमती के संत ! तुमने तो बिना खड्ग बिना ढाल के हमें आजादी दिलाने का कमाल किया था ना ? आजादी की जंग न हुआ, तुम्हारी तिलस्मी जादू का कोई करिश्मा था मानो।
सर्वहारा की असली आजादी जादुई छड़ी के लहराने से नहीं मिलती। क्रान्ति की जरूरत होती है- सशस्त्र क्रान्ति की।
बापू, तुम जहां बुत बने खड़े हो, उसी से कुछ दूर मेहता पार्क के दूसरे छोर पर केनेडी सेंटर लायब्रेरी है। लायब्रेरी ठीक आठ बजे बन्द होती है। लायब्रेरियन के अलावा उस समय तीन और कर्मचारी होते हैं। इस समय लायब्रेरी का बड़ा दरवाजा अन्दर से बन्द कर दिया जाता है। सब लोगों के बाहर आ जाने के बाद आठ बजकर पांच से दस मिनट के बीच लायब्रेरियन और तीन स्टाफ बाहर आकर छोटे दरवाजे पर ताला लगा कर दरवाजे के बाहर लगे मेन स्वीच का ऑफ कर देते हैं। मैं और शिप्रा ठीक आठ बजे हाल के छोटे दरवाजे पर पहुंचेंगे। विमल और उसके दो साथी पहले से ही हॉल के अंदर होंगे। हॉल के बीचोंबीच रखे अखबारों वाली ऊँची मेज जहां लोग खड़े होकर अखबार पढ़ते हैं, वहीं तीनों खड़े अखबार पलटते रहेंगे। आठ बज जाने के बाद जब और लोग हॉल से बाहर चले जायेंबे तब तीनों साथी लायब्रेरियन और तीनों स्टाफ को कैपचर कर लेंगे और उन्हें बाहर ले आयेंगे। विमल के माचिस से अखबारों में आग लगा कर बाहर आते ही मैं तीनों डबल रोटियों को पेट्रोल में तर कर एक के बाद एक हॉल के अंदर फेंक दूंगा। यह सब केवल बीस से बाइस सेकेण्डों में होना है़… ।’
गांधी जी की मूर्ति से बातचीत करते, उन्हें डराते-धमकाते हुए मैं भूल ही गया था कि शिप्रा को आकर मुझसे यहीं मिलना था।
‘कामरेड सलाम, आर यू रेडी ?’
मेरे पीछे शिप्रा खड़ी थी और आज भी, जब मैं, मेरे सबसे बड़े एक्शन के इतने पास खड़ा था- वह मुझे मेरे नाम से नहीं पुकार रही थी। पर मेरे साथ उसका इस वक्त होना मुझे बहुत अच्छा लगा।
चाय के रंग के ऊनी ओवर कोट में शिप्रा ढकी हुई थी। दोनों हाथ ओवरकोट की जेबों के अन्दर थे। शिप्रा का बस चेहरा दिख रहा था। रात के बढ़ते ठंड और गहराते अंधेरे में मुझे शिप्रा, संगमरमर में तराशी हुई रेनेसाँ कालीन कोई इटालियन मूर्ति सी लगी जो श्राबस्ती नगर की प्राचीन कथाओं में,विदिशा की निशा में, कपिलवस्तु के राजमार्गों में, प्रयाग की यज्ञशालाओं के गंभीर मन्त्रोच्चारों में, काशी की गलियों से गुजरने वाली हवाओं में और अवन्ती शहर के घाटों को चूमकर दक्षिण से उत्तर की ओर बहने वाली नदी के नाम में, एक रहस्य बन कर हजारों सालों से जी रही थी।
मैंने, पेट्रोल से तर तीनों डबल रोटियां हाल के छोटे से दरवाजे से अंदर उछाल कर दरवाजा बन्द कर दिया था। लायब्रेरी की ऊँची मेजों पर बिछे अखबार जल रहे थे। इस आग से पहली डबल रोटी के टूटते ही एक जोरदार भभक के साथ डबल रोटी से आग का फौवारा फूट पड़ा- चारों ओर। इस हाल की दीवारों पर जहां हजारों किताबें तरतीब से कतारों में लगी थीं, वहीं एक दीवार पर अमरीकी युद्घपोत ‘एण्टर प्राइज़’ का विशाल चित्र था। जहाज पर बनी हवाई पट्टी पर शातिर बाज की शक्लों वाले शैतान लड़ाकू विमानों का काफिला खड़ा था।
दूसरे दिन अखबारों में इस खबर के छपते ही पूरा शहर ही नहीं, पूरा प्रदेश हमारी मौजूद्गी के बारे में जान गया था।
दो दिनों में पुलिस ने हमारे छह साथियों को पकड़ लिया था। एक लड़की को भी पुलिस ने गिरफ्तार किया था, पर वह शिप्रा नहीं थी- शकील फातिमा थी।
हम पांचों उसी रात शहर छोड़ कर, अलग-अलग शहरों को निकल गये थे। पुलिस के रिकॉर्ड में हमारे एक्शन के किसी साथी के बारे में जानकारी नहीं थी।
केनेडी लायब्रेरी आगजनी के सिलसिले में गिरफ्तार साथियों पर थर्ड डिग्री का टार्चर हुआ था। स्वाभाविक कारणों से ही शकील फातिमा पर टार्चर सबसे ज्यादा हुआ था। सुधीर की कोशिशों से शहर के बुद्घिजीवियों, वकीलों और छात्रों के दबाव के चलते शकील फातिमा को दस दिनों बाद रिहा कर दिया गया था, पर पुलिस ने उसके शहर छोड़ने पर रोक लगा दी थी।
मैं एक महीने के लिए मुंबइ चला गया था।
पिताजी को उनके जाने वाले शास्त्री जी के नाम से जानते थे। वे इण्टर कालेज में हिन्दी और संस्कृत पढ़ाते थे। तीनों बेटों के बारे में उनके तमाम सपने थे। मेरे दोनों बड़े भाइयों ने लगता है उन्हें निराश नहीं किया था।
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