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लोक जीवन की छवियाँ : अशोक भौमि‍क

Anuradha Thakur

नई दि‍ल्‍ली : इंडिया इंटरनेशनल सेंटर एनेक्सी की  तलघर गैलरी में 25 अप्रैल की शाम को युवा कलाकारों और चित्रकला प्रेमियों के बीच अहमदनगर (महाराष्ट्र) से आयीं चित्रकार अनुराधा ठाकुर की चित्रप्रदर्शनी SERENE HARMONY का शुभारम्भ प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक ने कि‍या। यह प्रदर्शनी 4 मई तक चलेगी। इस मौके पर अशोक भौमि‍क ने कहा कि मौजूदा  चित्रकला परिदृश्य  एक सर्वथा विषमतापूर्ण व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। एक ओर जहाँ दो तीन महानगरों की कला का एक चेहरा दिखायी  दे रहा है, वहीं  देश के हजारों अन्य छोटे शहरों की  कला एक नए प्रतिबद्ध चेहरे के साथ, बाजारवाद के दबाव  से मुक्त आगे बढ़ती दिखाई दे रही  है। इसके एक  महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में हम अहमदनगर से आयीं अनुराधा ठाकुर के चित्रों में देख सकते हैं।  उनके चित्रों में विभिन आदिवासी इलाकों के लोगों के सादे और उत्सव मुखर जीवन की छवियाँ दिखाई देती हैं। सबसे बड़ी बात जो हमें प्रभावित करती है कि अनुराधा ने केवल महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों तक सीमित न रहकर मध्य प्रदेश, राजस्थान, पूर्वात्तर इलाकों के लोक जीवन को समझने के लिए व्यापक यात्राएँ की हैं और उनके चित्र इन सब आदिवासी इलाकों में रहने वाले लोगों के सरल चेहरों को अभिव्यक्त कर पाते  हैं, जो महानगर के दर्शकों के लिए एक विरल अनुभव है।

अशोक भौमि‍क ने कहा कि‍ समकालीन महिला चित्रकारों में निसंदेह जिस महानगरीय गोलबंदी के चलते पिछले कई   वर्षों से कुछ विशिष्ट महिला कलाकारों का प्रचार-प्रसार होता रहा है, वहाँ अनुराधा एक महत्वपूर्ण महिला कलाकार के रूप में अपनी दावेदारी पेश करती हैं और इसमें कोई संदेह नहीं कि उनकी कला इस दावेदारी के समर्थन में  तौर पर खड़ी दिखाई देती है।

इस मौके पर युवा चित्रकार प्रणवेश, टुम्पा चक्रवर्ती, मनीषा सेठी, राजेश श्रीवास्तव, तेजिंदर कांडा, प्रोफ़ेसर शोविन भट्टाचार्य, अनूप कुमार, नंदिनी आवडे, स्वाति भौमिक, सुधीर सुमन, श्याम सुशील सहित कई कला प्रेमी और छात्र उपस्थित थे।  उद्घाटन सत्र का संचालन संजय जोशी ने किया।

वह जो एक जनाब सादेकैन थे : अशोक भौमिक

सादेकैन

चित्‍तप्रसाद, जैनुल आबदीन जैसे जनकलाकारों से वरिष्‍ठ चित्रकार अशोक भौमिक हमें परिचित करवा चुके हैं। इसी श्रृंखला में पाकिस्‍तान के जनकलाकार सादेकैन पर उनका आलेख-  

सत्तर दशक  के आरम्भिक वर्षों में पूर्वी उत्तर प्रदेश के  विभिन्न गाँवों-देहातों  में दुबई, अबुधाबी, रियाल, धिरम, बोस्की, पीली धारी, पाँच  सौ पचपन आदि शब्द बेरोज़गार  नौजवानों के सपनों में बसा करते थे । खाड़ी के इन रेगिस्तानी मुल्कों की  जमीन काला सोना उगल रही थी। तेल की ताक़त से दुनिया तेजी से परिचित हो रही थी। पूर्वी उत्तर प्रदेश के छोटे-बड़े  कस्बों-गाँवों से लाखों की तादाद में गये मजदूरों ने इन रेगिस्तानों को आधुनिक शहरों में  बदलने के लिए ईंट गारे में अपना खून-पसीना लगाया था। इन मजदूरों, उनके सगे-संबंधियों और उनके गाँवों वालों को मैं कभी बेहद नज़दीक से जानता था, लिहाज़ा दुबई का मतलब मेरे लिये बहुत कुछ और भी  था।

असगर साहब की लम्बी गाड़ी में  शारज़ा जाते समय मुझे  फूलपुर, सरायमीर, अम्बारी याद आ रहा था। हालाँकि दुबई में बसा हिन्‍दुस्तान केवल पूर्वी उत्तर प्रदेश से आये लोगों से आबाद नहीं है, केरल, पंजाब, बिहार और बंगाल से भी बड़ी तादाद में पुरुष-महिलायें यहाँ काम कर रही हैं। पर आदमी जहाँ भी जाता है अपने पूर्वाग्रहों को साथ लिये जाता है सो मैं भी अपना खोया हुआ आजमगढ़ तलाशता रहा, और इसी तलाश ने मुझे टैक्सी ड्राईवर जमाल से मुलाकात करा दी। जमाल को मैं पहले केरल का समझ रहा था, उसकी बोली, उसका रंग वैसा ही था। जमाल ने बताया कि वह बलूचिस्तान का है और उसकी जुबान पर पश्तो की मिठास मुझे रबीन्द्रनाथ ठाकुर की अमर कृति ‘काबुलिवाला ’ की याद दिला रही थी। ‘भाईजान, सब बर्बाद कर डाला, स्कूल में टीचर को मारता है, बच्चों को मारता। हम यहाँ घर-रिश्तेदारों से दूर अट्ठारह सालों से काम करता है।’ जमाल की बातें समझने की कोशिश करता हूँ। बहुत कुछ कहने की कोशिश में वह उलझ रहा था। ‘भाईजान, यह सियासत के चक्कर में हम सब अलग हो गये, साथ होते तो क्या अपना मुलुक छोड़ कर आना पड़ता यहाँ ?  सुनता है हिन्दोस्तान में लाखों बोरी अनाज सड़ जाती है, साथ होते तो दो वक़्त की रोटी की फ़िक्र तो नहीं होती,  हमारा बाप-दादा का बम्बई में कलकत्ता में कारोबार था,  पर हम कभी नहीं गया उधर।’ जमाल एक सौ बीस की रफ़्तार से टैक्सी चला रहा था, उसके सपने उसकी अपनी समझ के पंखों पर दुबई के आसमान  पर चक्कर लगा रहे थे। मैं चोरों की तरह सड़क पर गुजरने वाली गाड़ियों को देख रहा था, ताकि मुझे जमाल से यह न कहना पड़े, ‘हाँ  भाईजान, आपने सही सुना है, हमारे मुल्क में हर साल लाखों बोरियाँ अनाज की सड़ जाती हैं और यह भी कि हमारे यहाँ हजारों किसान ख़ुदकुशी करते हैं, हमारे बिहार, केरल के भाई-बहनों को अपने ही मुल्क के मुंबई में, (जहाँ कभी आपके  दादा-परदादों ने कारोबार किया था) लात-जूते खाने पड़ते हैं। जमाल भाई, दुबई में रात-दिन लाखों हिन्दुस्तानी, बांग्लादेशी, पाकिस्तानी अपना खून बहा कर जो कमाते हैं उसी से उनके घरों का चूल्हा जलता है। हमने बाँट-छाँट कर ऐसे मुल्कों को बनाया है कि एक मजदूर को दो हाथों के लिये अपने मुल्क में कोई काम नहीं है।’

दुबई में बलूचिस्तान का जमाल और केरल का स्वामी जब बांग्लादेशी मंसूर के साथ बात करता है तो हिंदी में बतियाता है, और जिसे पंजाब का जसविंदर हो या बंगाल का शुभोदीप हो, खूब समझता है। घरों से दूर विभिन्न मुल्कों और प्रदेशों से रोज़गार के लिये आये मजदूरों की मजबूरियों के बावजूद, यह  मेरे लिये दुबई का सबसे बड़ा तोहफा था। इस श्रम के उपनिवेश में श्रमिकों की अपनी भाषा हिन्दी है।

दिल्ली में रहने वालों को लगेगा कि  दुबई में गाड़ियों के हार्न काम नहीं करते। हजारों गाड़ियाँ साँय-साँय कर बिना हार्न की चीखों के दिन-रात सड़कों पर बिना किसी दुर्घटना के  आती-जाती रहती हैं। सड़क के दोनों ओर ऊँची-ऊँची, काँच से ढँकी कंक्रीट की  इमारतों में इन्सान दिखाई नहीं देते। न तो आसमान में चिड़िया दिखती है और न सड़क पर सिगरेट के टुर्रे या  पान  मसालों की पन्नियाँ। सुना है दुबई का हाल दो-चार सालों से बेहाल रहने के बाद कुछ महीनों से यहाँ की अर्थनीति पटरी पर लौट रही है। मेरे नये  दोस्त असगर भाई का आलिशान बंगला ज़ुमेरह आइलैंड में है। असगर अली अफ्रीका में पैदा हुए थे। लिखाई-पढ़ाई इंग्लैंड और फ्रांस में की, अकूत पैसा कमाया  पर आज भी  चे ग्वेवारा को बंद मुट्ठी से सलाम करते हैं। उनका बस एक ही शौक है, पेंटिंग संग्रह करना ! बंगले की कोई भी दीवार ऐसी नहीं जहाँ सूज़ा, रजा, यामिनी राय, चुगतई से लेकर जोगेन चौधरी, हुसैन साहब के चित्र न टंगे हों। मैं  पूरे यकीन के साथ कह सकता हूँ कि किसी के लिए भी, उनका कला संग्रह देखना ’एशियाई कला संग्रहालय’ देखने जैसा अनुभव होगा। ‘ मुझे दुनिया की हर कला से प्रेम है पर मैं  केवल हिंदुस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के कलाकारों की कृतियाँ ही खरीदता हूँ ’ , असगर भाई सगर्व यह दोहराते रहते हैं।

सादेकैन द्वारा निर्मित भित्तिचित्र ।

सादेकैन साहब से मेरी मुलाकात असगर भाई के एक बेहद ख़ास कमरे में  हुई। गहरे हरे काले रंग के सतहों को खुरच (क्रास-हैचिंग) कर कैनवास पर तीखी सफ़ेद लकीरों के ताने-बाने से उकेरी हुई तीन अशांत आकृतियाँ थीं , जो मुझे जानी-पहचानी सी लगीं। इसके पहले 2005 में लाहौर के नेशनल कालेज ऑफ़ आर्ट्स की दीवार पर टंगी एक पेंटिंग को मैं काफ़ी देर तक देखता ही रहा था। चित्रकला विभाग के प्रमुख बशीर साहब ने कहा था, ‘सादेकैन साहब का काम है।’ मेरे लिये  यह एक सुखद संयोग था जो दुबई में दूसरे ही दिन हुसैन साहब और सादेकैन साहब पर एक कार्यक्रम था, जिसे स्थानीय कैपिटल  क्लब में आयोजित किया गया था। प्रचुर मात्र में उत्कृष्ट पेय , उसी मात्र में विविध व्यंजनों और विभिन्न देशों के आये सुगन्धित अतिथियों की उपस्थिति में कुछ चित्र हुसैन साहब के थे और कुछ सादेकैन साहब के। मेरे साथ सादेकैन साहब के भतीजे सलमान अहमद थे जो ( वह सादेकैन फ़ाउंडेशन के अध्यक्ष हैं और अमेरिका में  रहते हैं ), मुझे सादेकैन साहब के  एक-एक चित्र समझा रहे थे। पर दिक्कत एक थी, और वह यह कि  मैं यह  नहीं समझ पा रहा था कि किस वज़ह से सादेकैन और हुसैन को एक साथ रख कर यह कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। क्योंकि इन दोनों  कलाकारों का कला रचना का उद्देश्य ही बिलकुल भिन्न रहा है । एक कलाकार ने जिंदगी भर एक भी चित्र नहीं बेचा, वहीं दूसरे कलाकार का कला रचना के पीछे  यही एक मात्र घोषित उद्देश्य रहा । जनता के पक्ष  में खड़े  होकर सादेकैन ने जीवन के पथरीले यथार्थ को चित्रों में दिखाया, वहीं हुसैन साहब ने समाज के प्रतिष्ठित जनों को चित्र में अमर किया। सवाल  यहाँ किसी कलाकार के छोटे या बड़े होने  का नहीं है, सवाल है अपने लिए प्राथमिकताओं के चयन  का, जिसकी आज़ादी हुसैन साहब को भी उतनी थी, जितनी सादेकैन साहब को। इसीलिए कैपिटल क्लब में हुसैन साहब के चित्रों की मौजूदा कीमतों पर बात करते लोगों की किलकारियों के बीच सादेकैन साहब की ख़ामोशी को मैं  साफ़ सुन पा  रहा था। रात्रि भोज के पहले दो और कार्यक्रम थे। पहला हुसैन साहब की नातिन द्वारा बनाई गई लघु फ़िल्म ‘माई बाबा’  और दूसरा सलमान अहमद  का सादेकैन साहब की कला  और जीवन पर शक्ति बिन्‍दु प्रस्तुति (पवार पॉइंट प्रेजेंटेशन)! फिल्म बेहद ईमानदार ढंग से बनायी गयी एक घरेलू डाक्युमेंट्री सी थी। पर हम एक बार फिर जान सके कि नंगे पैरों चलने और ताजिंदगी अपने बचपन की गरीबी की बात को दोहराने वाले हुसैन साहब की कुछ खास पसंदीदा चीज़ों में महंगी और तेज़ रफ़्तार वाली गाड़ियाँ, और लन्दन और दुबई के सबसे महंगे होटलों में खाना शामिल  था। और यह ऐसा समाज है, जहाँ न तो तेज़ रफ़्तार गाड़ियाँ कोई किसी कलाकार को भेट में  देता है और न ही किसी महंगे होटल में कोई मुफ्त पानी तक पिलाता है। लिहाज़ा ऊँची जिन्दगी जीने के लिए ऊँचे पैसे लगते हैं, और ऊँचे पैसे कमाने के लिये किसी अरबपति  के बेटे  की शादी के निमंत्रण के पत्रवाहक के रूप में गणेश के चित्र बना कर हो या इंदिरा गाँधी को दुर्गा के रूप में चित्रित करने  जैसे कलाकर्मों की अहमियत को हुसैन साहब ने शुरू से ही बखूबी पहचाना था। सादेकैन साहब फ़क़ीर थे, किसी ने खाना खिला दिया तो खा लिया नहीं तो सिगरेट और शराब तो थी ही जिंदगी जीने के लिये। कुछ  लोग एक बोतल शराब थमा कर उनसे  पेंटिंगें ले जाते रहे,  कुछ चाहने वाले ऐसे भी थे जो  जब भी मिलने आते तो साथ कुछ न कुछ खाने के लिये जरूर साथ लाते। सादेकैन साहब अकेले थे पर उन्हे आम लोगों का भरपूर प्यार मिला था।

दुबई में कराची से अपनी प्रदर्शनी के लिये मुअज्जम अली आये ही थे। मुअज्जम जलरंग में राजस्थानी (थार) औरतों के चित्र बनाते हैं। मुअज्जम ने एक भित्ति चित्र (म्यूरल) बनाते समय सादेकैन साहब के साथ लम्बे समय तक काम किया था। उन्होंने सादेकैन साहब और ऊँचे पैसों का एक दिलचस्प वाकया  सुनाया। सादेकैन साहब अपने को फ़क़ीर मानते थे। एक दिन अपने नौकर को परेशान  देख कर सादेकैन साहब ने उससे उसकी  परेशानी की वज़ह पूछी। पता चला की बेटी की शादी तय हो चुकी है पर पूरे पैसों का अभी तक इन्तेजाम नहीं हो पाया है। ‘कितने कम पड़ रहे है?’ सादेकैन साहब के इस सवाल के जवाब में नौकर ने ससंकोच कहा, ‘ जनाब, अस्सी हज़ार !’  सादेकैन साहब  ने उसे आश्‍वस्त किया और चाय लाने भेज दिया। थोड़ी देर बाद कोई कला संग्राहक सादेकैन साहब से मिलने आया। एक पेंटिंग की और इशारा करते हुए उस सज्जन ने सादेकैन साहब से उस पेंटिंग की कीमत पूछी। सादेकैन साहब तैयार थे, बोले, ‘अस्सी हज़ार !’  खरीददार को थोड़ा आश्‍चर्य हुआ,  हिम्मत   जुटाकर  उसने सादेकैन साहब से पूछ ही लिया, ‘अस्सी हज़ार ही क्यों?’ सादेकैन साहब ने बड़ी सादगी के साथ जवाब दिया,  ’मेरे नौकर के बेटी की शादी है और इसमें अस्सी हज़ार कम पड़ रहे हैं, सो मेरी पेंटिंग अस्सी हज़ार की, और अगर उसकी बेटी की शादी में एक  लाख कम पड़ते तो इस पेंटिंग की कीमत एक लाख होती।’

इतने सालों बाद भी मुअज्जम अली सादेकैन साहब की एक नायाब  नसीहत को भी याद रखे हैं। सादेकैन साहब ने अपने गिलास में शराब डालते हुए कहा था, ‘सैयद मुअज्जम अली रिज़वी, इस शराब को कभी हाथ न लगाना। कोई अगर पीने  के लिए जबरदस्ती करे तो कहना,  मैं तो पी ही नहीं सकता, क्योंकि मेरे हिस्से की पूरी शराब तो सादेकैन पी कर चला गया है।’

इस उप महादेश में हमारे घर के इतने करीब  एक ऐसा जनपक्षधर कलाकार काम कर रहा था इसकी खबर हमारी पीढ़ी के कम ही लोगों को है। दिल्ली के करीब अमरोहा में  1930 में जन्‍मे थे सैयद सादेकैन अहमद नक़वी। फ्राँस में चित्रकला विद्यालय  पढ़ने गये थे लिहाज़ा उन पर विदेशी कला का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। साहित्य से उनका लगाव शुरू से ही था। पेरिस मे रहते समय उन्होंने  अल्बेर कामू के विश्‍व प्रसिद्ध उपन्यास ‘ द स्ट्रेंजर’ ( या ‘द आउटसाइडर’ ) का चित्रण (इलस्ट्रेशन) भी किया था। चित्रकला में उनका विषय ठेठ एशियाई था। उन्होंने दुनिया के मेहनतकशों के सुख-दुःख को किसी  मुल्क के दायरे में कभी नहीं बाँधा। उनके चित्रों में धार्मिक कट्टरता का भी कोई स्थान नहीं रहा। उर्दू कैलिग्राफी (अक्षरांकन )  के वह माहिर थे, एक लम्बे समय तक उन्होंने कैलिग्राफी पर काम किया। उनकी कई पेंटिंगों में  हम कविताओं के उद्धरण पाते  हैं जो सहज ही हमें  कविता पोस्टरों की याद दिलाते हैं।

सादेकैन द्वारा बनाया गया चित्र।

दुबई में हमाइल आर्ट गैलरी में अचानक ही सादेकैन की एक स्याह सफ़ेद कृति पर मेरी नज़र अटक गयी। चित्र में  एक राक्षस एक लबादा सा ओढ़े,  गहने पहने खड़ा है। उसके पैरों के पास एक गरीब आदमी पूजा की मुद्रा में झुका हुआ है।  पर जो बात हमें  इस चित्र में सबसे ज्यादा चौंकाती है,  वह है एक कौआ, जो उस आदमी की पीठ पर आश्‍वस्त बैठा है। मानो सदियों यह आदमी योँ ही नमन की मुद्रा में  है जिसके चलते कौवा इसकी पीठ पर, इसे मृत या काठ का समझ कर बेपरवाह बैठा हुआ है। चित्र में एक कविता की दो पंक्तियाँ लिखी हुई हैं। सादेकैन निःसंदेह जनपक्षधर ही नहीं, बल्कि राजनीतिक चित्रकार थे, लिहाज़ा मुझे लगा कि चित्र को एक नया आयाम देने के उद्देश्य से ही इन पंक्तियों को यहाँ इस्तेमाल किया गया होगा और जिसे मैं समझ नहीं पा रहा था। इस पर जब मैंने गुलज़ार साहब की मदद मांगी तो सचमुच यह चित्र मेरे सामने नई प्रासंगिकताओं  के साथ और भी अर्थपूर्ण हो उठा। इस चित्र में महान कवि इक़बाल  (नवम्‍बर 9, 1877- अप्रेल 21, 1938) की कविता की दो पंक्तियाँ हैं जिनके जरिये वह कहते हैं कि अत्याचार और शोषण का राक्षस आज लोकतंत्र का लबादा ओढे़ तुम्हारे सामने खड़ा है और तुम उसे आज़ादी की नीलम परी समझ रहे  हो।

सादेकैन खुद भी बड़ी अच्छी कविता लिखते थे। चित्रकार को उन्होंने एक मेहनतकश मज़दूर के समकक्ष रखते हुए लिखा है-

फिर यह किया रंगों का झमेला मैंने,
इस तेल से फन का खेल खेला मैंने,
इस अपने बदन की हड्डियों को दिन रात
तखलीक के कोल्हू में है पेला मैने।

सादेकैन साहब की कई  कवितायेँ हैं जहाँ उनके जीवन जैसा ही बनावटीपन नहीं है। यह कविता तो सीधे हमारे मर्म को छू जाती है-

दिन रात  हो जब शाम या पौ फूटती है
कन्नी मेरे हाथों से नहीं छूटती है
फिर काम से दुख जाता है इतना मेरा हाथ
रोटी को जो तोड़ू तो नहीं टूटती है।

आज पाकिस्तान का कला बाज़ार सादेकैन के उन चित्रों के इर्द गिर्द फलफूल रहा है जिसे सादेकैन ने या तो उपहार में  लोगों को दिया था या फिर उनके स्टूडियो से उनकी अपनी असावधानी के चलते चोरी हो गये थे। सादेकैन की पेंटिंग्स आज नीलाम घरों के विशेष आकर्षण बन चुकी हैं लिहाज़ा सादेकैन साहब के चित्रों के अब प्रतिकृतियाँ ही हम देख पाते हैं। सादेकैन  साहब के  चित्रों के साथ-साथ उनके भित्ति चित्र (म्यूरल) हमें अचंभित करते हैं। पाकिस्तान के मंगला बाँध के लिये बनाया गया म्यूरल विश्‍व के कुछ महत्वपूर्ण  भित्ति चित्रों में से एक है। बनारस हिन्दू विश्‍वविद्यालय, अलीगढ विश्वविद्यालय और हैदराबाद में उनके म्यूरल आज भी संरक्षित हैं, दिल्ली में  भी उनके कई चित्र मौजूद हैं।

सलमान अहमद अपने साथ दस बारह चित्रों के प्रिंट्स लाये थे, जिन्हें उन्होंने दुबई के इस आयोजन  में प्रदर्शित किया। सलमान अहमद  ने सादेकैन की जिंदगी और उनकी कला के रिश्तों के बारे में एक बेहद  खूबसूरत वाकया सुनाया। सादेकैन साहब का अपने  एक नौकर को अपने पैसों से एक रिक्शा खरीदवा दिया था, जो रोज़ उन्हे स्टूडियो ले आता था और रात को घर पहुँचा देता था। दिन के बाकि वक़्त वह रिक्शा चला कर पैसे कमाता था। एक दिन शाम को सादेकैन साहब ने देखा कि उनका रिक्शे वाला दिन  भर  की कड़ी  मेहनत  के बाद थक कर रिक्शे की सवारी वाली सीट पर अपना बदन टिकाय सो रहा था। सादेकैन  साहब को यह दृश्य छू गया और उन्होंने  इसे एक पेंटिंग में उतार लिया। इस पेंटिंग का एक रंगीन प्रिंट सलमान साहब ने इस प्रदर्शनी में शामिल किया था,  मेरे लिए इस महान कृति  का प्रिंट देखना भी एक सौभाग्य की बात थी। सादेकैन साहब से किसी जलसे में किसी ने सवाल किया था कि उनके लिये सबसे खूबसूरत चेहरा किसका है। सवाल पूछने वाले को उम्मीद थी कि सादेकैन किसी औरत की खूबसूरती का जिक्र करेंगे, पर सादेकैन का जवाब था, ‘सारे दिन हाड़तोड़ मेहनत के बाद जब एक थका हुआ मजदूर आराम की नींद ले रहा होता है, तो मुझे  उसका चेहरा सबसे खूबसूरत लगता है।’ सादेकैन साहब की जिंदगी और कला के बीच कहीं कोई अंतर नहीं था।

दुबई के कैपिटल क्लब के इस माहौल की मद्धिम रौशनी में, अपने रिक्शे पर आराम करते हुए उस मेहनतकश रिक्शेवाले की तस्वीर को देखते हुए मैं सोच रहा था कि दिल्ली से कराची तो शायद दूर है पर अमरोहा कब हमसे इतना दूर हो गया। और यह भी, कि इस रिक्शे वाले की पहचान क्या है ? क्या वह कराची का है, या कि ढाका का या फिर लखनऊ या अमरोहा का ?

दुबई में रात गहरा चुकी  थी जब मैं कैपिटल क्लब के बाहर आया। इसी शहर के मजदूर बस्तियों में सादेकैन साहब के रिक्शे वाले से थोड़ा सा  चैन-सुकून उधार लेकर, दूर दराज़ के मुल्कों से रोटी कमाने आये, दिन भर के थके हुए लाखों मजदूर अपने अपने बिस्तरों में  इसी ‘ खूबसूरती’ के साथ सो रहे होंगे।

चित्‍तप्रसाद के दुर्लभ चित्र

जनवादी चित्रकार चित्‍तप्रसाद के कुछ दुर्लभ चित्र और उन पर वरिष्‍ठ चित्रकार अशोक भौमिक की टिप्‍पणी-

‘भोमा और हरित शिकार’  पर काम करते हुए चित्तप्रसाद  का एक अद्भुत काम हाथ लगा। यह शायद पचास के दशक में स्क्रेपर बोर्ड पर बनाया काम है। आदिवासी  योद्धाओं के अपने जंगल और जमीन के लिए संघर्ष की लम्बी परंपरा का यह एक  बेहद महत्वपूर्ण  काम है,  जो इतने  लम्बे समय तक हम सब की नज़रों से दूर ही रहा। इन चित्रों में एक महत्वपूर्ण उपस्थिति के रूप में महिलाएं भी हैं। चित्तप्रसाद ने जब भी संघर्ष को चित्रित किया,  वह महिलाओं की अनिवार्य उपस्थिति को चिह्नित करने से कभी नहीं चूके। इस  बात को अन्य चित्रों में भी देखा जा सकता है- अशोक भौमिक

 

 

 


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


भोमा और ग्रीन हंट : अशोक भौमिक

वरिष्ठ चित्रकार अशोक भौमिक इन दिनों नयी चित्र  श्रृंखला  ‘भोमा और ग्रीन हंट ’ बना रहे हैं। हमने उनसे इन चित्रों के बारे में लिखने के लिए कहा। इस पर उन्‍होंने जो टिप्‍पणी की वह उनके चार चित्रों के साथ दी जा रही है-

मैं चित्रों के शीर्षक पर दो शब्द जरूर कहना चाहूँगा। ‘भोमा और ग्रीन हंट’ में भोमा बादल सरकार  के प्रसिद्ध

नाटक ‘भोमा’ से लिया हुआ है।

सुंदरबन के आदिवासी इलाकों में रहने वाला भोमा ‘भूखा रहता है ताकि हमें भात मिलता रहे’,  ‘ऐसे  भोमाओं का खून’ रोज़  हमारी थालियों में  सफ़ेद भात बन कर चमेली की तरह खिल उठता है’। बादल सरकार ने ‘भोमा’  नाटक  में एक सवाल पूछा था कि ‘कब ‘मै’,  तुम ‘सब’ से मिल कर एक ‘हम’ बनेंगे।’ ये सवाल मेरी इस चित्र श्रृं खला की मूल प्रेरणा हैं।

पर यह सच है कि  शब्दों के जरिये किसी चित्र की व्याख्या से चित्रों के रंग फीके पड़ जाते है, रेखाएं मिटने लगती हैं और धीरे-धीरे चित्र आपके सामने से गायब हो जाता है। पर जो रह जाता है वह है  व्याख्याकार का पांडित्य !

तो क्या  चित्र और चित्रकार  से चित्र की गलत-सही व्याख्या पेश करने  वाला व्यक्ति ज्यादा महत्वपूर्ण है ? क्या आप  कवियों से  यह उम्मीद  करते  हैं  कि  कविता  के  साथ- साथ  कविता  का  अर्थ  भी  अलग  से लिखकर  दिया  करे, या  फिर  किसी  संगीतकार  या  किसी नर्तक  से हम  ऐसी  मांग  करते  हैं ?

ऐसी स्थिति में हमें  इसमें आश्‍चर्य नहीं होना चाहिये कि मेरे चित्रों में,  हमारे देश के जंगलों मे जीने वालें लोगों से उनकी जमीन और जंगल छीनने के षड्यंत्र के विरोध में लामबंद होते आदिवासियों को किसी विस्तृत व्‍याख्‍या के बगैर हम नहीं पहचान पाते हैं। उस  लाल चिड़िया के सन्देश को समझने के लिये व्याख्या की मांग करते है। या कि हम महानगरों मे रहने वाले लोगों को  उस लाल नगाड़े की आवाज़ नहीं सुनाई दे रही है। आज मुझे उन आदिवासी देशवासियों के शरीर पर धारियां दिख रही हैं। मैं सपने मे एक हरा शेर देखता हूँ जो लाल चिड़िया के कूक से, लाल नगाड़े की आवाज़ से एक नई लड़ाई के लिये तैयार  हो रहा है।

‘ मैं ‘,  उन सबसे मिलकर एक व्यापक  हम बनने की जरुरत को महसूस करता हूँ। मेरे चित्रों का अर्थ समझने से  ज्यादा जरूरी है कि उस लाल नगाड़े के आवाज़ को समझ कर उन हरे शेरों तक पहुंचा जाये।

नोट : भौमिक जी ‘चित्र और उनकी व्याख्या विषय पर लेख लिख रहे हैं। पूरा होते ही उसे ‘लेखक मंच ’ में प्रकाशित किया जाएगा। इन चित्रों पर अपनी बात के लिए आप उनसे bhowmick.ashok@googlemail.com पर संपर्क कर सकते हैं।

चित्रों के जरिए भारतीयता की खोज

इंदौर : बंगाल के चित्रकार चित्‍तप्रसाद के चित्रों को देखना भारतीय जनजीवन के अथक संघर्षों की कहानी से रुबरू होना है। वे अपने गहरे राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक सरोकारों और गहन मानवीय करुणा के साथ एक ऐसी कला का ईजाद करते हैं जिसे लाल रोशनाई से रंगा गया है। यही कारण है कि एक तरफ उनके चित्रों में अकाल में भूखी-प्‍यासी जनता चित्रित है तो दूसरी तरफ किसानों का सशस्‍त्र संघर्ष चित्रित है। एक तरफ रोजमर्रा के संघर्ष के चित्र हैं तो दूसरी तरफ अन्‍याय का सामूहिक प्रतिरोध करती जनता है। इन चित्रों को देखना प्रगतिशील धारा को देखना-समझना है। प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक ने यह बात चित्‍तप्रसाद के चित्रों का स्‍लाइड शो दिखाते और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्‍य में भारतीय चित्रकाल की प्रगतिशील धारा पर व्‍याख्‍यान के दौरान कही। कार्यक्रम का आयोजन संदर्भ केंद्र की ओर से गुरुदेव के 150वें जन्‍म वर्ष के अवसर पर इंदौर प्रेस क्‍लब के राजेंद्र माथुर सभागार में किया गया। 21 और 22 मई को आयोजित दो‍ दिवसीय कार्यक्रम के पहले दिन जनवादी चित्रकार चित्‍तप्रसाद के चित्रों का स्‍लाइड शो हुआ और उनकी कला पर चित्रकार अशोक भौमिक का व्‍याख्‍यान हुआ।

अशोक भौमिक ने कहा कि चित्‍तप्रसाद ने भारतीय जनजीवन के संघर्ष को न केवल अपनी कलागत विशेषाओं के साथ रचा, बल्कि कई बार वह उनके संघर्ष में शामिल भी हुए। उन्‍होंने भीमबैठका से लेकर लोककला, मधुबनी, पट्टचित्र, मुगल मिनिएचर और राजा रवि वर्मा से लेकर रजा सूजा तक बिंदूवार टिप्‍पणी की। उन्‍होंने जोर दिया कि यह कला हिंदू कला है जिसमें या तो धार्मिक बिम्‍ब है या फिर तंत्र-मंत्र, लेकिन पहली बार चित्‍तप्रसाद ने अपने चित्रों में भारतीय जनजीवन को विषय बनाया। उन्‍होंने स्‍लाइड शो के जरिए बताया कि चित्‍तप्रसाद ने किस तरह अकाल और आंदोलन, एंजेल्‍स विदाउट फेयरी टेल सीरिज के तहत बर्तन धोते, बीड़ी बनाते और अखबार बेचते बच्‍चों को चित्रित किया। बाद में सवाल-जवाब भी हुए। संचालन विनीत तिवारी ने किया। इप्‍टा द्वारा आयोजित कविता पोस्‍टर वर्कशॉप में बच्‍चों द्वारा बनाए गए कविता पोस्‍टर्स प्रेस क्‍लब के परिसर में ही प्रदर्शित किए गए।

कार्यक्रम के दूसरे दिन रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर के चित्रों पर व्‍याख्‍यान देते हुए अशोक भौमिक ने कहा कि रवीन्‍द्र के चित्रों में कोई नायक या चरित्र नहीं, बल्कि आम आदमी सहजता के सा‍थ चित्रित हुआ है। वह हर दबाव से मुक्‍त होकर और पूरे कलात्‍मक कौशल के साथ अपने चित्रों का निरूपण करते हुए स्‍त्री के विषाद और आत्‍मविश्‍वास को चित्रित करते हैं। कभी मानवरहित प्रकृति के भू-दृश्‍यों को चित्रित करते हैं तो कभी कॉमिकल कैरेक्‍टर्स चित्रित करते हैं और कभी आम आदमी को। उन्‍होंने रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर के चित्रों का स्‍लाइड शो दिखाते हुए उनके चित्रों को कुछ कैटेगरी में विभाजित कर उनकी कलात्‍मक विशिष्‍टताओं पर रोशनी डाली। उन्‍होंने बताया कि किस रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर ने यूरोपीय प्रभावों से मुक्‍त होकर अपने चित्रों में खालिस भारतीयता की खोज की और एक नया सौंदर्यशास्‍त्र गढ़ा।

भौमिक ने कहा कि रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर ने अपनी कला को जीवनसंध्‍या की प्रेयसी कहा है क्‍योंकि उन्‍होंने जीवन के उत्‍तरार्ध में पेंटिग्‍स शुरू की थी। कागज पर कविता लिखने के दौरान काटे गए शब्‍दों या पंक्तियों से किस तरह से उनकी पेंटिग्‍स बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई, इस पर उन्होंने रोशनी डाली। रवीन्‍द्र बाबू की ज्‍योमेट्रिकल लाइंस हों या लिरिकल लाइंस, उनके लैंडस्‍केप्‍स हों या पोर्ट्रेटेस उनमें उनकी कलात्‍मक दक्षता देखने को मिलती है।

उन्‍होंने कहा कि रवीन्‍द्र बाबू के बनाए चित्रों में गहन विषाद तो है लेकिन साथ ही उस समय की स्‍त्री के बढ़ते आत्‍मविश्‍वास और उसका बदलता जीवन खूबसूरती से अभिव्‍यक्‍त हुआ है। स्‍त्री चित्रों में उन्‍होंने उसके भावों को बारीकी से रचा है बल्कि उसकी आंखों से झलकती करुणा और आत्‍मविश्‍वास का चित्रण पूरे कलात्‍मक धैर्य के साथ हुआ है। उनके चित्रों में कुछ कॉमिकल एलिमेंट्स भी मिलते हैं। मूँछे, नाक या भौंहों के चित्रण में इसे साफ लक्षित किया जा सकता है।

इससे पहले विनती तिवारी ने रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर की एक कहानी ‘शहजादा’ का पाठ किया और संचालन भी किया। शुरुआत में अशोक भौमिक ने अपने चित्रों का एक स्‍लाइड शो भी दिखाया। अंत में इंदौर के वरिष्‍ठ चित्रकार जवरचंद दस्‍सानी ने शांति निकेतन की स्‍मृतियां बाँटी और रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर की कविताओं के अंश सुनाए।

चित्रकार अशोक भौमिक ने स्‍कूलों बच्‍चों को वर्कशॉप में चित्र बनाना भी सिखाया। इसमें बच्‍चों ने मन की बात को चित्रों में उकेरा। भौमिक ने बताया कि कई लोगों तक अपनी बात को पहुँचाने का पोस्‍टर बहुत अच्‍छा माध्‍यम है और एक अच्‍छा पोस्‍टर बनाने के लिए चित्रकला का ज्ञान होना जरूरी नहीं है। जिन्‍हें लगता है कि वे अच्‍छा चित्र नहीं बना सकते, वे भी अच्‍छा पोस्‍टर बना सकते हैं। ‘रूपांकन’ के अशोक दुबे ने बच्‍चों को अक्षरों की बनावट में कुछ नहीं प्रयोग करने के टिप्‍स दिए। कार्यक्रम में शिक्षाविद् अनिल सदगोपाल भी मौजूद थे।

 

 

बादल सरकार- एक परिचय : अशोक भौमिक

सुप्रसिद्ध रंगकर्मी बादल सरकार का 13 मई को कलकत्‍ता में निधन हो गया। उन पर वरिष्‍ठ चित्रकार अशोक भौमिक का आलेख-

15 जुलाई, 1925 को कोलकाता के एक ईसाई परिवार में बादल उर्फ सुधीन्द्र सरकार का जन्म हुआ। पिता महेन्द्रलाल सरकार स्काटिश चर्च कॉलेज में पढ़ाते थे और विदेशियों द्वारा संचालित इस संस्था के वे पहले भारती प्रधानाचार्य बने थे। मां, सरलमना सरकार से बादल सरकार को साहित्य की प्रेरणा मिली।
1941 में प्रथम श्रेणी में मैट्रिक पास करने के बाद वे शिवपुर इंजीनियरिंग कॉलेज में भर्ती हुए और 1946 में वे सिविल इंजीनियर बने। इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ते समय वे मार्क्‍सवादी विचारधारा और राजनीति से सघन रूप से जुड़ गए। कम्युनिस्ट पार्टी में सक्रिय रूप से कई वर्षों तक जुड़े रहने के बावजूद, बाद में वे पार्टी राजनीति से अलग हट गए।
बादल सरकार ने 1947 में नागपुर (तब मध्‍य प्रदेश) के पास एक निर्माण संस्‍था में पहली नौकरी की। बाद में वे फिर कोलकाता लौट आए जहां उन्होंने जादवपुर और कोलकाता विश्वविद्यालय में इंजीनियर की नौकरी की। वे उन दिनों नौकरी के साथ-साथ शिवपुर इंजीनियरिंग कॉलेज में सायंकालीन कक्षाओं में ‘टाउन प्‍लानिंग’ का डिप्‍लोमा के लिए पढ़ाई करते रहे।
1953 में दोमादर वैली कारपोरेशन की नौकरी लेकर माइथन गए। माइथन में बादल सरकार 1956 तक थे। इसी दौरान नाटक के प्रति उनका रुझान दिखने लगा। दफ्तर के सहकर्मियों के साथ मिलकर एक अभिनव रिहर्सल क्‍लब की शुरुआत की जहां, बादल सरकार के शब्‍दों में ‘रिहर्सल होगा पर नाटक का मंचन कभी नहीं होगा।’ जैसा अभिनव नियम लागू किया गया था, पर बाद में सदस्यों के उत्साह से इस नियम में तोड़कर नाटकों के मंचन की शुरुआत हुई।
बचपन से ही बादल सरकार नाटकों के प्रति आकर्षित थे। उन्हें नाटकों में हास्य रस सबसे ज्यादा पसंद था, लिहाजा यह स्वाभाविक ही था कि उनके प्रारंभिक नाटकों में हमें यह तत्व ज्यादा मुखर दिखता है। वे इसे ‘सिचुएशन कामेडी’ कहते हैं।
उनका 1956 में लिखा गया पहला नाटक ‘सल्यूशन एक्स’ था। यह नाटक एक विदेशी फिल्म, Monkey Business की कहानी पर आधारित एक सिचुएशन कॉमेडी के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
1957 से 1958, इन दो वर्षों के दौरान उन्होंने इंग्लैंड में ‘टाउन-प्‍लानिंग’ को कोर्स करने के साथ-साथ नौकरी की। इसी दौरान उन्‍हें प्रसिद्ध अभिनेताओं का अभिनय देखने का मौका मिला। विवयन ली, चार्लस लैटन, माइकल रॉडरेथ, मार्गरेट कॉलिन्‍स आदि के अभिनय और वहां के रंगकर्म से वे बेहद प्रभावित हुए। पर शायद उनके ‘तीसरे रंगमंच’ की नींव की पहली ईंट के रूप में फ्रेंच कवि रासिन की कृति ‘फ्रिड्रे’ नाटक को देखने का अनुभव था। 21 फरवरी, 1958 को देखे गए ‘थिएटर-इन-राउण्‍ड’ में इस प्रस्तुति के बारे में अपने अनुभवों को डायरी के पन्नों में दर्ज करते हुए उन्होंने लिखा था, ‘आज जो देखा उसे कभी भुला न पाऊंगा।‘ मुक्त मंच के इस अनुभव को हम वर्षों बाद उनके तीसरे रंगमंच की अवधारणाओं में विकसित होते देख पाते हैं।
इंग्लैंड प्रवास के दिनों में ही उन्होंने ‘बोड़ो पीशी मां’ (बड़ी बूआजी) लिखा। इसी समय उन्‍होंने एक छोटा नाटक ‘शनिवार’ लिखा। यह नाटक जी.बी. प्रिस्‍टले के नाटक ‘एन इन्स्पेक्टर कॉल्स’ पर आधारित था। 1959 में वे इंग्लैंड से कोलकाता लौट आए और आते ही अपने उत्साही मित्रों के साथ ‘चक्रगोष्ठी’ नाम से एक नाट्य संस्था की नींव रखी। हर शनिवार को इस गोष्ठी में नाटक के साथ-साथ संगीत, साहित्‍य, विज्ञान आदि विभिन्न विषयों पर चर्चा होती थी।
इसी ‘चक्रगोष्ठी’ के प्रयास से उनके कई आरंभिक नाटकों से दर्शक परिचित हुए। ‘बोड़ो पीशीमां’, ‘शोनिबार’, ‘समावृत’, ‘रामश्यामजदु’ आदि जिनमें प्रमुख हैं।
इसके बाद बादल सरकार फ्रांस सरकार के आर्थिक अनुदान पर वहां गए और फिर तीन वर्षों तक नाइजीरिया में नौकरी की। इस विदेश प्रवास के दौरान उन्होंने ‘एबों इन्द्रजित’, ‘सारा रात्तिर’, ‘बल्लभपुरेर रूपकथा’, ‘जोदी आर एकबार’, ‘त्रिंश शताब्दी’, ‘पागला घोड़ा’, ‘प्रलाप’, ‘पोरे कोनोदिन’ जैसे महत्वपूर्ण नाटक लिखे।
देश में लौटने के पहले ही ‘एबों इन्द्रजित’ बहुरूपी नाट्य पत्रिका में (अंक : 22, जुलाई, 1965)  प्रकाशित हुआ। इसके प्रकाशन के साथ ही बादल सरकार की ख्याति चारों ओर फैल गई। इसका पहला मंचन ‘शौभनिक’ नाट्यसंस्था ने 16 दिसंबर, 1965 को किया। नाटक के प्रकाशन और मंचन ने नाट्य जगत में मानों धूम मचा दी। 1968 को उन्हें इस नाटक के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला।
नाइजीरिया से देश लौटने के तुरंत बाद उन्होंने ‘बाकी इतिहास’ लिखा। उन दिनों शंभु मित्र रंगमंच के शीर्षस्थ व्यक्तियों में थे। उनकी नाट्य संस्था ‘बहुरूपी’ ने ‘बाकी इतिहास’ का सफल मंचन किया।
ये दोनों नाटक उनके सिचुएशनल कामेडी वाले नाटकों से बिल्कुल भिन्न थे- जो भारतीय रंगमंच में एक नए युग का संकेत था।

1967 में उन्होंने अपने साथियों के साथ ‘शताब्दी’ नाट्य संस्था की स्थापना की। 18 मार्च, 1967 को रवीन्द्र सरोवर मंच से ‘शताब्दी’ ने अपनी रंगयात्रा शुरू की। 1956 से लेकर 1967 तक के सभी नाटक बादल सरकार ने प्रोसेनियम मंच के लिए लिखे थे। लिहाजा ‘शताब्दी’ की आरंभिक प्रस्तुतियां प्रोसेनियम ही थीं।
1971 से रंगमंच को लेकर बादल सरकार की अवधारणाएं तेजी से बदलने लगी थीं और वे निरंतर प्रयोग कर रहे थे। प्रयोगों के इस दौर से गुजरते हुए वे ‘तीसरे रंगमंच’ तक जल्द ही पहुंच सके। वे मानने लगे थे कि ‘नाटक एक जीवंत कला माध्यम है- Live slow ! लोगों का दो समूह- एक ही वक्‍त, एक ही स्‍थान पर इकट्ठे होकर एक कला माध्‍यम के साथ जुड़ रहे हैं- अभिनेताओं और दर्शकों के दो समूह के रूप में। यह एक मानवीय क्रिया है- मनुष्‍य का मनुष्‍य के साथ जुड़ाव। सिनेमा हमें ऐसे प्रत्‍यक्ष जुड़ाव का मौका नहीं देता।’ ऐसे ही विचारों से रंगमंच पर प्रयोग करते हुए, उन्‍होंने अन्‍तत: रंगमंच को सार्थक कला माध्‍यम के रूप में स्‍थापित करने के उद्देश्‍य से, प्रोसेनियम रंगमंच को त्याग, तीसरे रंगमंच को आम जनता तक एक ‘फ्री-थिएटर’ के रूप में ले जाने में कामयाबी हासिल की।
1970 से 1993 तक बादल सरकार के सभी नाटक तीसरे या विकल्प के रंगमंच को ध्यान में रखकर लिखे गए। ‘शताब्दी’ के अलावा पूरे देश में इन नाटकों को विभिन्न भाषाओं में, छोटे-बडे़ शहरों-कस्‍बों में विभिन्‍न नाट्य संस्‍थाओं द्वारा खेला गया। बादल सरकार के तीसरे रंगमंच ने भारत की भाषाई,  प्रांतीय और सांस्कृतिक दूरियों को खत्म कर पहली बार एक सार्थक भारतीय रंगमंच विकसित करने की दिशा में एक सफल प्रयास किया। मराठी,  हिंदी,  पंजाबी, गुजराती,  मलयाली, कन्नड़,  ओडिय़ा आदि भारतीय भाषाओं में उनके नाटक मंचित हुए और किसी न किसी रूप में देश के सभी प्रांतों के रंगकर्मियों को तीसरे रंगमंच ने अपनी ओर आकर्षित किया।
हाल ही में प्रसिद्ध कला और साहित्य समीक्षक चिन्मय गुहा ने बादल सरकार के जीवन और कृतित्व पर चर्चा करते हुए ‘आनंद बाजार पत्रिका’ 18 जुलाई, 2008 में लिखा है कि जो बेहद गौरतलब है- ‘आज से सौ वर्ष बाद शायद इस बात पर बहस हो कि क्या बीसवीं और इक्कीसवीं सदी के संधि काल में, एक ही साथ तीन-तीन बादल सरकार हुए थे जिनमें से एक ने सरस पर बौद्धक रूप से प्रखर
संवादों से भरे, कॉमिक स्थितियों की बारीकियों पर अपनी पैनी नजर साधे, बेहद प्रभावशाली हास्य नाटक लिखे थे।
दूसरे, जिन्होंने समाज में हिंसा के, विश्व राजनीतिक खींचातानी के चलते युद्ध की काली परछाई के,  परमाणु अस्त्रों के,  आतंक के और समाज में बढ़ती आर्थिक असमानता के खिलाफ अपनी आवाज को अपने नाटकों में दर्ज किया था।
और तीसरे, जिन्होंने प्रेक्षागृहों के अंदर कैद मनोरंजन प्रधान रंगमंच को एक मुक्ताकाश के नीचे आम जनता तक पहुंचाने का सपना देखा था।’

आज से सौ वर्ष बाद के पाठकों को शायद इन तीनों बादल सरकार को एक ही व्यक्तित्व के रूप में चिह्नित करने में कठिनाई होगी। लेकिन राहत की बात कि भारतीय जनता के सुख-दुख, उनकी चिंताओं,  उनकी समस्याओं और सत्ता द्वारा उनके शोषण की समानता के चलते उनकी जो एक विशिष्ट  पहचान बनी थी- भाषा, प्रांत और संस्कृति के बीच की दीवारों को तोड़े कर बनी थी। इसी विशिष्ट
पहचान को आधार मानकर भारतीय रंगमंच का विकास संभव हुआ था। बंगाल का ‘मिछिल’ कब पूरे देश का जुलूस बन गया था, यह जानना दिलचस्प रहेगा। रंगाबेलिया गांव का ‘भोमा’ कैसे अधूरे आर्थिक विकास का शिकार बन पंजाब के खेतों के काम कर रहे बिहार के मजदूरों के बीच दिख गया था। जर्मन नाटककार ब्रेष्ट  का नाटक ‘कॉकेशियन चाक सर्कल’, भारत के भूमिहीन मेहनतकश खेत
मजदूरों की कहानी कैसे बन सकी थी और यह भी कि काल और स्थान की सीमाओं को तोड़कर कैसे आम भारतीय के लिए रोमन क्रीतदास ‘स्पार्टकस’  की कथा उनके लिए इतना प्रासंगिक हो गया था। ‘बासी खबर’ नाटक के इन संवादों को, जो दरअसल ‘समाचार’ में रूप में दर्शकों को पेश किए गए थे, उन्हें वे किस रूप में देखेंगे?
तीन : 1978 के पहले नौ महीनों में हरिजनों पर अत्याचार के 3,019 घटनाएं सामने आये हैं। 175 हरिजनों की हत्या की गई है, 129 हरिजन महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ है, लूटपाट और दंगों की 289 घटनाएं…
चार : एक सन्‍थाल अपने खेत की फसल, अपना हल, बैलों को अपने और परिवार के साथ बेच कर ही कर्जे का ब्याज दे पाएगा। अपने कर्ज की रकम का दस गुना अदा करने के बाद भी उस पर कर्जे का बोझ…
पांच : 13 अप्रैल, 1978  पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में पुलिस ने प्रवेश और निकास के रास्तों को बंद कर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे 500  मजदूरों पर गोलियां चलाईं। 150  मजदूर मारे गए, घायलों की संख्या का पता अब भी नहीं चल पाया है। लाशों को गन्ने के खेत में इकट्ठा कर खेत में आग लगा दिया गया है।
छ : ‘शांतिप्रिय, निरक्षर संथाल इस तरह से ठगे जाते थे कि वे अपनी जायदाद से हाथ धो बैठते थे। उनके अनाज,  भेड़-बकरियों, सब्जियों आदि उनसे छीन लिया जाता था। उनको मारा-पीटा और अपमानित किया जाता था। उनकी महिलाओं के साथ बलात्‍कार तो आम बात थी। शोषण के सभी तरीके उन पर आजमाये जा रहे थे…।
सात : बिहार के बाजितपुर में हरिजनों पर अत्याचार की एक और घटना सामने आई है। पास के गांव के जोतदार और उसके चार सौ गुंडों के दल ने 15  नवंबर को सुबह नौ बजे से दोपहर चार बजे तक गांव में लूटपाट किया। नौ हरिजन महिलाओं के साथ बीच बाजार में सामूहिक बलात्कार किया। उनके घरों में आग लगा दी गई और संपत्ति लूट ली गई थी।
आठ : पचास पागल हाथियों को सन्‍थालों के गांव में खुला छोड़ दिया गया था जिससे पूरा गांव, उसकी झोपडिय़ां और स्‍त्री-पुरुष-बच्‍चों की आबादी को तहस-नहस किया जा सके।
एक : अगस्‍त 1971 में बरहानगर में दो दिनों में 150 लोग पुलिस के संरक्षण में मारे गए थे। लाशें खुली सड़क पर बिछी पड़ी थीं, बाद में उन्हें रिक्शों और ठेलों पर लादकर हुगली नदी में बहा दिया गया था। साठ साल के एक वृद्ध को जलाकर मार दिया गया था, क्योंकि उसने अपने भतीजे के बारे में जानकारी देने से इंकार किया था। एक स्कूली लड़की का हाथ काट लिया गया था।…
दो : मार्शल-लॉ, अमानवीय और बर्बर कानून। बे-रोक टोक लूटपाट, नरसंहार, विध्‍वंस, अत्याचार, महिलाओं का अपमान और आतंक। संथाल परगना और वीरभूमि तब अत्याचार, ध्वंस और नरसंहार की आंधी तले…
तीन : डायमण्‍ड हारबर में गंगा के किनारे, 1971 की जनवरी में छ: लोगों की लाशें मिलीं। सभी के शरीर पर गोलियों के निशान थे और उनके दोनों हाथ पीछे बंधे थे। जून, 1971 में कोन्नगर में नौ लाशें जमीन के नीचे गड़े मिले थे। सभी के सर शरीर से कटे हुए थे और उनके शरीर पर घावों के निशान थे।
चार : जब तक वे खडे़ होकर लड़ते रहे हम उन पर गोलियां बरसाते रहे। सभी संथाल जिन्‍हें हमने कैद किया उनका शरीर गोलियों से लहू-लुहान था। पर संथाल लोग…
पांच : सरकारी आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर, 1970 से अप्रैल, 1973 के बीच पश्चिम बंगाल और बिहार की जेलों में पुलिस और राजनीतिक कैदियों के बीच मुठभेड़ में 80 कैदियों की मौत और 645 कैदी घायल हुए थे। लाठियों से पीट-पीटकर 39 कैदियों की हत्या की गई थी।
छह : न केवल एक या दो नेताओं को बल्कि उन इलाकों की समूची जनता को, जहां विद्रोह हुआ हो बर्मा के खतरनाक जंगलों में निष्‍काशित किया जाए या फिर उन्हें फांसी पर लटकाया जाए, या गोली मार दिया जाए…
सात : बिहार के जादूगोड़ा इलाके से पकड़े गए सभी 54 लोगों को दो सालों तक हजारीबाग सेंट्रल जेल में जंजीरों से बांधकर रखा गया। इनमें से अधिकांश कैदियों की उम्र 18 से 20 वर्ष की थी। वे न्यायिक हिरासत के कैदी थे, पर उन पर तीन वर्षों बाद भी मुकदमा नहीं चलाया गया।
आठ : उनमें से 46 बच्‍चों की उम्र नौ से दस की थी। उन्हें कोड़े लगाने की सजा मिली थी। बाकी को सात से चौदह वर्षों की जेल की सजा सुनाई गई थी। उनमें से बहुत से कैदियों की मौत जेल में ही हुई…
नौ : पश्चिम बंगाल के पुलिस मुख्‍यालय लाल बाजार के खुफिया विभाग में जिरह के वक्‍त पंद्रह वर्ष के कक्षा दस के छा. की कलाई मरोड़कर तोड़ दिया गया था। उसके शरीर पर जलती सिगरेट से उकेरे घावों के असंख्य निशान थे, हाथों और पैरों के नाखून उखाड़ लिए गए थे। महिला राजनीतिक कैदियों को जिरह के नाम पर हर महीने एक बार…
कोरस का पहला दल : उन्‍नीसवीं सदी…
कोरस का दूसरा दल : बीसवीं सदी…
पहला दल : पांचवां दशक…
दूसरा दल : सत्‍तर दशक…
पहला दल : ब्रिटिश भारत…
दूसरा दल : आजाद भारत…
एक : मृत्‍यु, खून और डर का राज है आज इस धरती पर। हम सब जानते हैं कि जेल की दीवारों के पीछे क्या होता है, और क्या होने वाला है। फिर क्यों नहीं इसके विरोध में चीख उठते हैं हम ? क्या अभी इसका वक्त नहीं आया है ? क्या
अब भी सही वक्त का हमें इंतजार है?
(‘बासी खबर से)

इसी प्रकार आने वाले कल के पाठक भी इन सवालों को जांचेंगे-परखेंगे और शायद कुछ हद तक आश्चर्यचकित भी होंगे कि बाजारू सिनेमा-टेलीविजन और तमाम अन्य मनोरंजन के साधनों के जरिए जहां सत्ता की संस्कृति जन संस्‍कृति के खिलाफ व्यापक रूप से सक्रिय हो रही थी और जनता के सरोकारों और सवालों से उन्हें भ्रमित करने में लगी थी,  तब समाज परिवर्तन के उद्देश्य से न सही,  महज एक देशव्यापी प्रतिरोध की संस्कृति को जिंदा रखने के लिए, तीसरे रंगमंच ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बादल सरकार और उनके तीसरे रंगमंच को आने वाले कल के पाठक उसी तरह तरह से अपने करीब पाएंगे- जितने करीब और आत्‍मीय सरकार आज हमारे हैं।

( अशौक भौमिक की पुस्‍तक ‘बादल सरकार : व्‍यक्ति और रंगमंच’ से साभार)

बादल सरकार से संबंधित अन्‍य आलेख-

मेहनतकश जनता के महान नाट्यकर्मी का अवसान

 

जन चेतना का चितेरा : अशोक भौमिक

जनवादी चित्रकार देवब्रत मुखोपाध्याय का बनाया हुआ चित्तप्रसाद का पोर्ट्रेट

जनवादी चित्रकार चित्तप्रसाद के जन्‍मदिवस पर उनकी कला की विशेषताओं को रेखांकित करता वरिष्‍ठ चित्रकार अशोक भौमिक का आलेख-

चित्तप्रसाद एक प्रगतिशील चित्रकार ही नहीं थे,  वह सक्रिय राजनीतिक कर्मियों की पहली कतार पर तैनात एक सजग  सिपाही भी थे। भारतीय चित्रकला के इतिहास में  उनके जैसा दूसरा उदाहरण नहीं है। 15 मई, 1917 में बंगाल के दक्षिण 24 परगना  के नैहाटी शहर में उनका जन्‍म हुआ। उनका परिवार अत्‍यंत शिक्षित परिवार था। उनकी मां ने आजादी की लड़ाई में क्रांतिकारियों की कई तरह से मदद की थी। बीए की परीक्षा पास करने के बाद चित्तप्रसाद सक्रिय रूप से चित्रकला, संगीत, नाटक आदि कलाओं की ओर झुके। यहां उल्‍लेखनीय यह है कि उन्‍होंने चित्रकला में कोई शिक्षा नहीं ली। वह 1942 में भारतीय कम्‍युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने थे।

वर्ष 1942-43  में बंगाल के मिदनापुर और चिटगांव  इलाके में उन्होंने महाअकाल के विकराल रूप को बेहद करीब से देखा और इस इलाके में घूम-घूम कर  स्केचेस बनायें और रिपोर्ताज लिखे जो ‘पीपुल्स वार’ में नियमित प्रकाशित  होते रहे। इन प्रकाशनों के जरिये चित्तप्रसाद ने पत्रकारिता के एक सर्वथा नये आयाम से पाठकों को परिचित कराया।

1944 (20-27  दिसंबर) में पार्टी द्वारा मुंबई के खेवाड़ी स्थित ‘रेड फ्लैग हॉल’  में आयोजित ‘ भूखा बंगाल’ चित्र प्रदर्शनी में  चित्तप्रसाद के चित्र दिखे, साथ ही पी.पी.एच. ने चित्तप्रसाद द्वारा लिखी पुस्‍तक ‘हंगरी बंगाल’ प्रकाशित की। इसके प्रकाशन के  तुरंत बाद सरकार  ने इसे प्रतिबंधित घोषित कर इसकी सारी प्रतियाँ जला दीं।

मुंबई प्रवास के दौरान वह फिल्‍म से जुडे़ लोगों, कवियों, चित्रकारों, गायकों के बहुत चेहते थे। नेमीचंद जैन, रेखा जैन, शमशेर बहादुर सिंह आदि रचनाकारों के साथ-साथ बलराज साहनी, सलील चौधरी जैसे लोगों और पंजाबी के प्रसिद्ध लेखक सुखबीर जी से भी इनका अच्‍छा परिचय था। हिन्‍दी फिल्‍म के इतिहास में विमल राय की महत्‍वपूर्ण फिल्‍म ‘दो बीघा जमीन’ का वुडकट के माध्‍यम से बनाया गया पोस्‍टर निश्चित रूप से ऐतिहासिक महत्‍व रखता है।

1946 के नौसेना विद्रोह में हम चित्तप्रसाद को नौसैनिकों के साथ  कंधे से कंधा मिलाये न केवल सड़कों पर देख पाते हैं, साथ ही इस विद्रोह  के समर्थन में  उनके द्वारा बने गये यादगार चित्रों और पोस्टरों में हम चित्रकला के एक ऐसे जुझारू स्वरूप को देख पाते हैं जिसे  केवल जन आंदोलन को देख कर नहीं, बल्कि उसमे सशरीर शरीक होकर ही रचा जा सकता है। इसी चित्रकार को हम एक ओर जहाँ बंगाल के तेभागा किसान आन्दोलन के करीब  जाकर चित्र रचते पाते हैं ,  वहीँ 1946 के जून महीने में आंध्र प्रदेश के तेलंगाना  सशस्त्र किसान आन्दोलन के केंद्र तक पहुँच  कर एक अभूतपूर्व  चित्र श्रृंखला बनाते पाते हैं। इस  चित्रकार को हम महाराष्ट्र के कोल्हापुर में  आये सूखे के दौरान किसानों के करीब पाते हैं, विजयवाडा़ अखिल भारतीय किसान सम्मलेन (1944) में श्रोताओं के बीच बैठ कर चित्र बनाते पाते हैं,  मुंबई की बस्तियों  में रह रहे गरीब बाल श्रमिकों की व्यथा कथा को कैनवास पर उतारते पाते हैं।

इसके साथ ही उन्होंने  जन आंदोलनों के  एक सजग इतिहासकार के रूप में अपने चित्रों में  कश्मीर-आन्दोलन, भगत सिंह की शहादत, डाक कर्मचारियों और रेल कर्मचारियों के आंदोलनों को अमर भी किया है।

हमारे देश में सभी चित्रकारों के साथ कोई-न-कोई प्रान्त जुड़ा हुआ है। राजा रवि वर्मा, यामिनी राय,  नन्दलाल बोस से लेकर प्रायः सभी समकालीन चित्रकारों  पर इस पहचान को सहज ही देखा जा सकता है, पर एक आधुनिक चित्रकार अपने  राजनीतिक-सामजिक सरोकारों के चलते प्रान्तों  और प्रदेशों की सीमा के पार जाकर एक  जनपक्षधर चित्रकार बन सकता है, इसकी मिसाल हम केवल  चित्तप्रसाद में ही पाते हैं। सही  मायने में  भारतीय चित्रकार कहलाने के हकदार शायद चित्तप्रसाद  ही  हैं।

देश के विभिन्न जन आंदोलनों पर बनाये गये चित्तप्रसाद के कुछ यादगार चित्रों से मौजूदा बाजारवाद की गिरफ्त में कैद जनता से पूरी तरह से कट कर अराजक पूंजी के सहारे पनपती समकालीन कला को बेहतर  पहचानने मे मदद मिेलती है।

चित्तप्रसाद ने जन आंदोलनों के साथ रह कर असंख्य चित्र बनाये थे,  यह हम सब जानते हैं, पर गरीब बच्‍चों पर, खासकर उनकी जिन्‍दगी की बदहाली पर उनके चित्र बेहद महत्वपूर्ण हैं। विश्‍व कला के इतिहास में बच्‍चों के चित्र बहुत कम हैं। भारतीय कला में देवताओं के बाल रूप  और शिशु राजकुमारों  के चित्रण के अलावा बच्चों को हम बहुत ही हम उपस्थित पाते हैं। पाश्‍चात्‍य कला में भी फरिश्‍ते के रूप में डैनों वाले नंगे बच्‍चे दिख जाते हैं, पर वे चित्रों के मूल विषय नहीं बनते हैं। चित्तप्रसाद ने अपनी चित्र श्रृंखला ‘Angels without Fairytales ‘  के केंद्र में बच्चों को रखकर उन्हें नायक का अपूर्व दर्ज़ा दिया है। अनाथ बच्चों के एकाकीपन के लिये जहाँ चित्तप्रसाद एक दीया और एक खेले जाने के लिये इंतज़ार करती गुड़िया को कमरे में संयोजित कर चित्र को  इतना मार्मिक बनाते हैं, वहीं होटलवाला बच्चा देर रात होटल के बंद हो जाने के बाद  अकेला बर्तनों के ढेर से जूझ रहा है। साथ में एक रतजगा कुत्ता है,  एक  तिरछी  लौ वाली  ढिबरी है और फर्श पर रेंगते बहुत सारे तिलचट्टे हैं,  पर इन  सब के बावजूद कितना अकेलापन है यहाँ !
गहरी रात को फुटपाथ पर कथरी ओढ़े बच्चों के बीच गुजरता कुत्ता क्या इन  बच्चों के मुकाबले अपनी जिन्दगी के बेहतर होने का ऐलान नहीं कर रहा है ?  इन यादगार चित्रों में बच्चों के प्रति चित्तप्रसाद का गहरा प्रेम तो दिखता ही है, साथ ही ये भी साफ़ नज़र आता है कि इन चित्रों को चित्तप्रसाद ने  बच्चों के लिये नहीं बनाया, बल्कि इन बच्चों के ऐसे हालात के लिये जिम्मेदार समाज को धिक्कारा है।

चित्तप्रसाद के चित्रों में महिलाओं का एक बेहद महत्वपूर्ण  स्थान है। इन चित्रों में वे मेहनतकश पुरुषों के कंधे से कंधा मिला कर जीवन संघर्ष के समान हिस्सेदार के रूप में दिखती है। कोल्‍हापुर के सूखे में भी वे पुरुषों के पास हैं तो गारो पहाड़ में जंगली सूअर का शिकार करते हुए भी पुरुषों के साथ है। बांध बनाते हुए वे समान रूप से मेहनत करती है तो बाढ़ जैसी विपदा में समान रूप से पीडि़त है।

इप्टा के गठन के बाद एक नाट्य प्रस्तुति के ठीक पहले कामरेड  शांति बर्धन  नगारा बजा कर नाट्य प्रस्तुति का एलान कर रहे थे। चित्तप्रसाद ने उस मुहूर्त को अपने स्केच बुक मे कैद किया। बाद मे इसको  आधार बना कर चित्तप्रसाद ने इप्टा का लोगो बनाया। भारत मे प्रगतिशील सांस्कृतिक कर्मियों के सपनों का प्रतीक यह चिन्ह हम सबको चित्तप्रसाद की याद भी दिलाता है।

चित्तप्रसाद के चित्रों को देखते हुए हम जनोन्मुख और अजिट-प्राप (agit-prop) कला के एक ऐसे रूप से परिचित होते है,  जो चित्र होकर भी महज  नारा या पोस्टर नहीं हैं। यहाँ शोषित-पीड़ितों के पास जाने का साहस है जो दरअसल कला के सामंती मानकों को चुनौती देने का साहस भी है। युगों से शास्त्रीय कला सामंतों और धनी कला व्यापारियों के बनाये हुए मानदंडों पर पनपती रही है,  पर इसके समानांतर  लोक कला अपने सहज सरल स्वरूप- गरीब किसान के आंगन में  रंगोली-अल्पना बन या किसी लोक उत्सव के प्रांगण सज्जा के रूप तक ही सीमित रही। यह कला उत्सवधर्मी होकर भी जीवन से कटी हुई नहीं थी (इसका सबसे अच्छा उदाहरण वारली की लोक कला है )। इस कला मे मेहनत करते,  शोषित होते लोगों का जिक्र तो  है, पर राजनीतिक  विचारों के अभाव के कारण इसमें  प्रतिरोध का आह्वान नहीं है। चित्तप्रसाद इन दोनों कलाओं की गहरी जाँच-पड़ताल के बाद इनके  विकल्प के रूप में एक तीसरी कला का  अनुसरण करते हैं (इस सन्दर्भ में  आधुनिक कला पर सामंती प्रभाव और गुफा चित्रों पर चित्तप्रसाद के दो  महत्वपूर्ण लेखों को हम देख सकते हैं  ) । चित्तप्रसाद की कला में  मेहनतकश वर्ग का जहाँ शोषण का चित्रण है, वहीँ उनके प्रतिरोध की गाथा भी  मौजूद है। वह  वास्तव में संघर्षशील आम जनता के इतिहासकार होने के साथ-साथ संघर्ष की कथाओं के हरकारा भी हैं, जो बंगाल  की कथा को महाराष्ट्र तक पहुचते हैं तो तेलंगाना जाकर  भगत सिंह की चर्चा करते हैं।

उनके अनेक चित्रों में बार-बार मजदूर-किसान वर्ग के लिये एक विशिष्ट राजनीतिक एकता की पुकार दिखती है। जन आंदोलनों में वह  कांग्रेस, कम्‍युनिस्ट पार्टी और मुस्लिम लीग के झंडे एकसाथ फहराते हैं, वहीं विभिन्न मोर्चों पर संघर्ष करते लोगों के बीच संकीर्ण साम्प्रदायिकता को गैर हाजिर  पाते हैं और हर चित्र में स्त्री-पुरुष को हर संघर्ष में समान साझेदार  बनाते हैं। मेहनतकशों की एकता हर स्तर पर हर कीमत पर चित्तप्रसाद के लिये सबसे जरूरी था जिसे उन्होंने अपने चित्रों में बार-बार रेखंकित किया।

उनके रंगीन चित्रों में कई पाश्‍चात्‍य चित्रकारों का प्रभाव देखा जा सकता है। इनमें मातिस और ब्रॉक प्रमुख हैं। यहां गौरतलब यह भी है कि रंगीन चित्रों में चित्तप्रसाद ने आनंद और सुख का उत्‍सव दिखाया है, वहीं उनके काले-सफेद चित्रों (या प्रिंट) में हमारे जीवन के कठोर यथार्थ को व्‍यक्‍त किया है।

चित्रकार चित्तप्रसाद की जयंती मनाने की अपील

चित्तप्रसाद का मां शीर्षक से चित्र

नई दिल्‍ली : जन संस्कृति मंच ने महान प्रगतिशील चित्रकार चित्तप्रसाद का जन्‍मदिन मनाने की अपील की है। जसम के महासचिव प्रणय कृष्‍ण ने कहा कि चित्तप्रसाद एक प्रगतिशील चित्रकार ही नही थे, वह सक्रिय राजनीतिक कर्मियों की पहली कतार पर तैनात एक सजग  सिपाही थे। भारतीय चित्रकला के इतिहास में  उनके जैसा दूसरा उदाहरण नहीं है। 15 मई, 1915 में बंगाल के दक्षिण 24 परगना के नैहाटी शहर में जन्‍में चित्तप्रसाद 1942 में भारतीय कमुनिस्ट पार्टी के सदस्य बने। देश के विभिन्न जन आंदोलनों पर उनके कुछ यादगार चित्र हैं। इन चित्रों से मौजूदा बाजारवाद के गिरफ्त में कैद  जनता से पूरी तरह से कट कर अराजक पूंजी के सहारे पनपती समकालीन कला को बेहतर  पहचानने मे मदद मिलती है।

15 मई को अगर  कुछ और न हो तो अपने मित्रो को घर बुला कर एक साथ इन चित्रों को देखें और  चित्तप्रसाद और उनके चित्रों पर चर्चा  करें। बहुत जरूरी है ऐसे जन कलाकार को हमारे बीच जिन्दा बनाये रखना। गैलरियों, सरकारी संस्थाओं और अकादमियां के सहारे जनता के कलाकार नहीं जीते।

उन्‍होंने कहा कि चित्तप्रसाद  के कई हाई रेसलयूशन चित्र चित्रकार अशोक भौमिक के पास हैं। अगर चाहे तो उनके  प्रिंट निकाल कर अपने-अपने  शहर में  दोस्तों के बीच प्रदर्शनी-गोष्ठी कर 15 मई को चित्तप्रसाद को याद कर सकते हैं। अशोक भौमिक का ईमले पता है- bhowmick.ashok @gmail .com

शिप्रा एक नदी का नाम है : अशोक भौमि‍क

वरि‍ष्‍ठ चि‍त्रकार-लेखक अशोक भौमि‍क आजकल एक उपन्‍यास को पूरा करने में लगे हैं। उस उपन्‍यास का एक अंश-

शहर के बीचोंबीच पुराने घण्टाघर की घड़ी की सुई न जाने कबके समय चाट गयी है। अब लोग इसे नहीं देखते। अब यह घण्टाघर दफ्तर, स्कूल,कचहरी जाने वालों को समय नहीं बताता। वक्त का फेर है, वर्ना पूरा शहर एक जमाने में इस घड़ी के इशारे पर जागता और सोता था।
घंटाघर के रौनक भरे वक्त के बीते हालाँकि ज्यादा वक्त अभी नहीं बीते हैं- फिर भी शहर के लोगों को लगता है कि मानो सदियॉं गुजर गयी हैं, घंटाघर की सुइयों को रुके या इसके घण्टों को खामोश हुए।
बिना सुइयों वाली इस घड़ी की ओर अब कोई नहीं देखता। इस घड़ी के पीछे जहां कभी छोटे बड़े पीतल के पुजरों का मकड़ज़ाल था, अब वहां कबूतरों ने घोंसला बना लिया है। कबूतरों के इस घोंसले में अपने छोटे-छोटे सलेटी अण्डों को सेतते, वक्त को तेज गुजरते हुए देख, कबूतरों का जोड़ा सोचता है- ‘अरे कल ही की तो बात हैं, हम ही अण्ड़ों के अंदर गरमा रहे थे।’
इस घंटाघर से पांचों दिशाओं की ओर निकलने वाली सड़कों में, एक सड़क ऐसी है जो टहलते-घूमते, मंजिल पर पहुंच कर सीढ़ियों में तब्दील हो जाती है।
ये सीढ़ियां नीचे उतरकर, कीचड़ में सन कर एक नदी को छूती हैं। उस नदी को लोग शिप्रा के नाम से जानते हैं।
शिप्रा एक नदी का नाम है।
बिना सुइयों वाली, घंटाघर वाली घड़ी के काले अस्पष्ट होते बारह रोमन हरफ जड़े सफेद डायल के पीछे कबूतरों का जोड़ा गुटगुटाता है। मानो कहता हो कि- शिप्रा एक नदी का नाम है – शिप्रा एक नदी का नाम है।

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गंगा का पानी, जून के बारहवें दिन तक पहुंचते-पहुंचते घाट से दूर जा चुका था। नदी और घाट के दरम्यान बालू के फैलाव में, हजारों लोगों की भीड़ के करीब शिप्रा की चिता सजी थी। बर्फ की सिल्लियों पर रखे शिप्रा के शरीर पर से पार्टी का तिरंगा झण्डा हटा लिया गया था। गर्मी में बर्फ तेजी से पानी होकर बह रहा था- अपने साथ गुलाब की असहाय पंखुड़ियों को साथ लिये, जो अभी-अभी मालों में जड़े फूलों से टूटकर अलग हुये थे।

शिप्रा एक नदी का नाम है।
चिता के पास खड़ी भीड़ से नारा उठा-
‘जब तक सूरज चाँद रहेगा
शिप्रा तेरा नाम रहेगा।’
शिप्रा की मौत दस जून की रात को हुई थी। देश के गृह राज्य मंत्री की पत्नी को अंतिम श्रद्घांजली देने बाहर से आने वाले लोगों का ख्याल रखकर दाह संस्कार को बारह जून की दोपहर तक रोक दिया गया था।
बर्फ की सिल्लियों पर गुलाब की कुछ पंखुड़ियां चिपकी हुई थीं- कुछ बह रही थीं। शिप्रा की नाक सुराखों पर जड़ी रूई के फाहें- अस्वाभाविक सफेद लग रही थी।
खादी के सादे लिबास में शिप्रा भीग रही थी।
मुझे लगा, शिप्रा बर्फ की शीतलता को अपने पूरे शरीर में आखिरी बार महसूस कर रही थी।
शिप्रा बह रही थी।
बारह जून को दोपहर दो बजे के आसपास शिप्रा की चिता को दिनेश ने आग दी थी।
दिनेश ने सफेद कुरता-पायजामा पहन रखा था। उसके आसपास काली वर्दी में, सरपर काला साफा बाँधे चारों कमाण्डो के हाथों में बन्दूकें थीं। उनकी निगाहें चारों ओर घूम रही थीं। मानों हजारों लोगों की भीड़ में वे किसी एक को तलाश रहे थे।
‘जब तक सूरज ……. ’
खादी की सफेदी में लिपटी भीड़ ने नारे लगाये, फूल बरसाये, अपने राजनैतिक दल के गरिमामय इतिहास को याद किया, और अन्त में ‘राम नाम सत्य है’ की गुनगुनाहटों के बीच पंडित जी के मन्त्रों को दोहराते हुए दिनेश ने चिता को आग दी।
चिता को आग देते ही, यकायक एक अजीब सी खामोशी छा गयी और इस खामोशी में चिता में आग पकड़ने की चट्पटाहट साफ सुनाई देने लगी। हालाँकि मैं चिता से कुछ दूर खड़ा था- कमाण्डों, पुलिस, मीडिया, हजारों पार्टी वर्कर्स और दिनेश- शिप्रा के परिचित लोगों से काफी दूर।
मुझे लगा कि इतनी दूर से भी मैं शिप्रा को साफ देख पा रहा था।
और ऐसे वक्त, मेरी दोनों आंखों से शिप्रा बह चली थी।
शिप्रा एक नदी का नाम है !
सूरज और चाँद की निगरानी में चलते इस संसार में शिप्रा अब कभी नहीं दिखेगी।
मैंने अपनी जेब से रूमाल निकालकर उसे तहा कर छोटा कर लिया ताकि मैं आँखों से उफनायी हुई शिप्रा को सोख सकूं। पर रूमाल मेरी मुट्ठी के अंदर ही धरा ही रह गया। मैं, अपनी पलकों को बिना झपकें एक टक शिप्रा को देख रहा था-
शिप्रा बह रही थी।
बारह जून के ऐसी एक दोपहरी में मैं एक नदी किनारे एक विशाल भीड़ से कुछ दूर खड़ा खामोश, रो रहा था।
धीरे-धीरे भीड़ छटने लगी थी।
घाट से दिनेश सिंह के चले जाने के साथ ही मीडिया, पुलिस कमान्डों और अर्थी के साथ आये हुए लोग भी चले गये थे। मैं नदी के किनारे खड़ा नदी को बहते देख रहा था-
यह शिप्रा नहीं थी,
संगम की ओर बढ़ती हुई यह गंगा थी।
सात-आठ भैंसें नदी से अपना सर बाहर निकाले घाट की ओर देख रहे थे। कुछ की सींगों पर जलकुम्भी फंसा हुआ था। जलकुम्भी का ताज पहने वे निर्लिप्त दार्शनिकों जैसी नजर से अपने आसपास देख रहे थे। नदी में पानी उतना कम नही था जितना मैं समझ रहा था।
कुछ मालायें, कुछ फूल पानी में बहते हुए संगम की ओर बढ़ रहे थे- शायद कुछ देर पहले तक वे शिप्रा के ठंडे शरीर से लिपटे हुए थे।
मैंने मुड़ कर नदी किनारे के उस ओर देखा, जहां अब शिप्रा की चिता बुझ रही थी।
जून की ठहरी हुई, उमस भरी उस दुपहरी में नदी किनारे में भी हवा नहीं चल रही थी।
चिता से निकल कर बनी सलेटी-सफेद धुँए की मीनार साफ़ नजर आ रही थी। किसी पुराने ऐतिहासिक नगर के बीचोंबीच एक गैरज़रूरी सफेद घण्टाघर की तरह- जिसकी सुइयों को न जाने कब, वक्त चाट गया था।
मैं हल्के पांव चिता के करीब पहुंच गया था।
लकड़ी के कुंदों पर आग की लपटें नहीं थीं। उन पर राख से ढंकी बिवाइयों जैसी दरारों के बीच से धधकती आग की लाली दिख रही थी, जो तब भी लकड़ी को चटखा रही थी।
परसों रात, यान कि दस जून की रात के बाद, मैं इतने करीब से इतने एकान्त में शिप्रा को देख रहा था।
पर शिप्रा कहीं नहीं थी।

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शिप्रा एक नदी का नाम है !
शिप्रा के लिए इन्तज़ार करते हुए लीला फैन्सी स्टोर्स के बाहर पट्टेदार तिरपाल की छाँव में मैंने न जाने कितनी बार कविता की पंक्तियों को पकड़ने की कोशिश की थी- याद नहीं।
लीला फैन्सी स्टोर्स के बाहर तिरपाल की वह छोटी सी कंजूस छाँव, दरअसल राहगीरों और मेरे जैसे भरी दोपहरी में कविता खोजते नौजवानों के लिए नहीं बनी थी। यह छाँव काँच के बड़े शो-केस में, रंग बिरंगी साढ़ियों में लपटी सात मैनिक्विन लड़कियों को धूप से बचाने के लिए था।
शिप्रा के लिए इंतजार करते हुए- कभी गर्मी की चिलचिलाती धूप में- जब सड़क की कोलतारी सतह पर फफोंलें फूटते थे, या फिर जाड़े की किसी खुशनुमा दिन के ऐसे वक्त जब अच्छी यादों की पश्मीनी गर्माहट, मुझे यह यकीन करने को हठ करती थी कि इस खूबसूरत दुनिया का यह खूबसूरत वक्‍त सिर्फ मेरे लिए ही बना है, और ऐसे वक्त बुरे लोगों की बुराइयों को माफ करने को जी चाहता था, या बरसाती आसमान में से जब काले बादलों का गिरोह सूरज को अगुवा कर लेता था, और आसमान साँवली कुवारी लड़की जैसी गुमसुम खामोश रहता था, मानो लड़के वालों के ख़त का इंतजार होता था, उस कलमुंही को। मैं, कभी मौसम के प्रस्ताव पर, कभी सपनों के तकाजे पर, कभी अपमान को भुलाने की नाकामयाब कोशिशों में उलझकर,शो केस के अन्दर रंगबिरंगी साड़ियों में लिपटी मैनिक्विन लड़कियों को नाम देता था। पहली को दमयन्ती,
दूसरी उर्मिला,
तीसरी शकुन्तला,
चौथी चित्रांगदा,
पांचवीं का नाम नन्दिनी,
छठी मालविका और
सातवीं ?
शिप्रा ! !
शिप्रा एक नदी का नाम भी है। शहर के चारों ओर लहराती हुई बहने वाली शिप्रा सुदूर किसी प्रान्त से निकल कर चम्बल नदी में खो जाती है।

उस दिन देर रात उन्नाव से लौट रहा था। बस से उतर कर पैदल ही चल पड़ा था- घर की ओर। अभी सिनेमाघरों में आखरी शो खत्म नहीं हुआ था,दुकानें बन्द हो चुकी थीं और सड़कें वीरान थीं।
लीला फैन्सी स्टोर्स की बत्तियां जल रही थीं। शो-केस का शटर आधा गिरा हुआ था। आधे खुले शटर से दुकान के अन्दर की बत्तियां, जो सारे दिन उन सात मैनिक्विन लड़कियों को रौशन किये रहती थीं- बुझी हुई थीं। दुकान की रौशनी शो केस के अन्दर तक पहुंच कर, सात-सात नग्न नारी मूर्तियों को एक साथ देख कर जैसी ठिठक गयी थी, पर उन मैनिक्विन निर्जीव शरीरों में शर्म ढंकने की कोई कोशिश भी नहीं थी। प्रागऐतिहासिक युग के किसी सुडौल, मांसल, नग्न नारियों का जुलूस। मुझे न जाने क्यों लगा कि उन सातों में छह तो शादीशुदा हैं ही। सातवीं लड़की, शरीर पर उम्र की सीमित सिलवटों के चलते कुँआरी लग रही थी।
मैं उसे एकटक देखता ही रहा था।
किस्से-कहानियों से लेकर छोटे-छोटे देहातों-कस्बों में दर्जी की टुटही दुकानों में देखे जाने वाले, बूढ़े दर्जी जैसा एक आदमी नये कपड़ों के ढेर को पास की एक तिपाई पर रख कर चाय का एक छोटा सा गिलास हाथ में थामे, गौर से उन लड़कियों को देख रहा था- मानो उन लड़कियों के भविष्य के बारे में वह कोई गहरी साजिश रच रहा हो।
मेरी साँसें शायद तेज चल रही थीं, या कि ठीक उस रफ्तार से चल रही थीं- जितनी मेरे उम्र के किसी नौजवान की चलनी चाहिए। पर रात के इस तिलस्मी वक्त में मेरी बालिग साँसें, शो केस के काँच को बार-बार धुँधला रही थीं।
मैंने हाथ से काँच पर के धुँधलके को साफ कर शो केस के अन्दर देखा। वह बौना दर्जीनुमा बूढ़ा सातों लड़कियों के बीच, बायें हाथ में एक साड़ी थामे दाहिने हाथ में आलपिन थामे, शो-केस के अन्दर टहल रहा था। शो केस के बाहर से ठहरी हुई रात के सन्नाटे में मुझे लगा जैसे वह बूढ़ा नींद से उठकर, सपनों का पिटारा हाथों में थामे फेरी करने निकला हो।
सातों लड़कियां, एक बौने बूढ़े और कम रौशनी की मौजूद्गगी में मायावी लगने लगी थी। मानो जंगल में शाम उतर आयी थी- पर सूरज नहीं था आसमान पर बाती भी नहीं थी। कहीं, पर अंधेरा भी नहीं था वहां।
रौशनी की ऐसी हल्की फुसफुसाहट में, सात लड़कियों के इस जंगल में बूढ़े दर्जी की आँखें चमक रही थीं।
पर्णविहीन उस जंगल के पेड़ों के तनों पर जैसे मौका पाकर किसी चित्रकार ने अपनी कूँची से नर्म रौशनी का रंग फेर दिया था।
मैं उन दरख्तों के नाम तलाशने लगा।
शाल्मली
वनतुलसी
माधवी
पलाश
कनेर
चिरार और
शिप्रा।
‘शिप्रा एक़…… ’

‘मियाँ साब !’
मैंने जोर से पुकारा था उस बूढ़े को।
‘मियाँ साब ! आपके हाथ की सिन्दूरी रंग वाली साड़ी बस शिप्रा को पहनाना।’
सिन्दूर का रंग लाल होता है, ठीक हमारे सपनों के रंग जैसा।

मेरे सपनों में जब भी शिप्रा आती थी, अकेली नहीं होती थी वह नदियों के जुलूस में शामिल एक दूर से पहचानी जाने वाली बेहद खास नदी जैसी लहराती हुई अलग से दिखलाती थी। ऐसे जुलूस में चंद्रभागा, अलकनंदा, सुवर्णरखा, तुंगभद्रा, मेघना और कावेरी के साथ रहकर भी अलग बहती हुई दिखती थी शिप्रा।
पर इस नाम को मेरे हाठों तक पहुंचने में दो साल लग गये थे।

4

कालेज कैण्टीन का हॉल काफी बड़ा था।
इसी हॉल के एक किनारे वाली मेज पर सुधीर नायक, जीतेन्द्र, दिलीप और मैं बैठे थे। हॉल में ज्यादा रौशनी नहीं थी। हॉल की बड़ी दीवार पर की चार खिड़कियों से आती रौशनी फर्श पर चार उजली पट्टियाँ बनाये हुए थी। कैण्‍टीन की और मेजों पर लड़के-लड़कियों का शोर जारी था। उनके करीब गये बगैर भी उनकी बातचीत के मुद्दों का आसानी से अन्दाज़ लगाया जा सकता था। पॉप कल्चर के चपेट में यह पीढ़ी झूम रही थी, लिहाजा कालेज कैण्‍टीन फैशन से लेकर पॉप सांग के नये अलबमों, गांजा हशीश एल.सी.डी. की चर्चाओं से भरा रहता था।
ऐसे ही कोलाहल के भरी कॉलेज कैण्‍टीन में शिप्रा दौड़ती हुई दाखिल हुई थी।
‘कामरेड, आने में देर हो गयी। हमारे माथुर सर, एक तो शेक्सपीयर के दीवाने हैं, फिर उनका किंग-लीयर। माई गॉड़….। सॉरी, में तो बोलती ही जा रही हूं…. ।’
फिर मेरी ओर इशारा करते हुए सुधीर से पूछा था।
‘सुधीर, ये कौन ?’
‘ओह, कॉलेज में नया आया है। विमलेश मिश्रा। बी़एस़सी़ पार्ट वन।’ विजयदा के साथ है।
और विमलेश इनसे मिलों- कामरेड शिप्रा- शिप्रा सिंह।
शिप्रा को मैं पहली बार देख रहा था और वह भी इतने करीब से। गर्मी और उमस से शिप्रा के चेहरे पर पसीने की नन्हीं-नन्हीं बूंदें उभर कर ठहर गयी थीं।
मेरे लिए पसीने की ये बूंदें, शिप्रा जैसी ही नयी थीं। पसीने की ऐसी बूंदें थकावट से नहीं उभरतीं।
सुधीर ने कैण्टीन के बेरे को आवाज दी।
‘पिंटू, चाय। तीन का पाँच। ग्लास धोकर लाना।
चाय आते ही शिप्रा ने अपने पर्स से पैसे निकाल कर पिंटू को देते हुए कहा था, ‘कीप द चेंज। बाकी पैसे तुम्हारे।’
शिप्रा के साथ बीते उस दोपहर के बाद असंख्या दोपहरियों, अनगिनत साझों के बाद वह रात भी आयी थी, जब मेरी बांहों में शिप्रा सिंह का मृत शरीर धीरे-धीरे ठंडा पड़ रहा था।
उस दिन भी उसका चेहरा ओंस से नहाये एक सुबह की तरह भींगा था। पर इस पसीने में एक लंबे सफर की थकावट थी- जो सफर के खत्म होने पर ही नजर आ सकती थी।
कालेज कैण्टीन की शिप्रा और दस जून की रात वाली शिप्रा के बीच पूरे तैंतीस सालों का फासला था।
मैंने शिप्रा के साथ तैंतीस साल गुजारे थे।
पर शिप्रा ने मुझे एक बार भी मेरे नाम से नहीं पुकारा था।
मैं विमलेश मिश्रा- माँ-बाप के तीन बेटों में सबसे छोटा मुन्ना- पप्पू, टुक्कू !
शिप्रा के लिए मैं दस जून की रात तक, कभी साथी, कभी कामरेड ही बना रहा। गार्डिनाल की कई गोलियां एक साथ ले लेने के बाद और अपनी आखरी नींद में डूबने से हफ्ते पहले शिप्रा ने कहा था, ‘साथी, मैं अब जीना नहीं चाहती …..।’
सुधीर से मुझे मिलना है अभी, तुरन्त …..।’
ऐसा कुछ कहते हुए शिप्रा शान्त हो गयी थी।
पसीने से तर, शिप्रा के चेहरे को चादर से ढकते हुए डाक्टर ने कहा था- ‘नेताजी, आय एम सॉरी- शी इस नो मोर।’
शिप्रा चली गयी थी।

शिप्रा एक नदी का नाम है
गर्मी के मौसम में जलकुंभी की मोटी हरी कथरी तले अपना चेहरा छि‍पाये सोयी रहती है, शि‍प्रा। पर बारिश आने पर फिर अपनी लहरों से दोनों पाटों को चूमती मुस्कुराती, वह चंचल और सचल हो उठती है। और दौड़ पड़ती है शिप्रा, चंबल से मिलने के लिए। शिप्रा दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है।
उत्तर गामी शिप्रा, सुधीर से मिलने चली गयी थी।

5

शिप्रा अपने माँ-बाप की एक मात्र संतान थी।
राजकमल ठाकुर और मीनाक्षी खरे एक साथ मेडिकल कालेज में दाखि‍ल हुए थे। एम.बी.बी.एस. के बाद दोनों ने एम.एस. किया था। मीनाक्षी खरे ने गायनोकोलॉजी में और राजकमल ने जनरल सर्जरी में। दोनों ने जल्द ही अपनी प्रैक्टिस जमा ली थी, हालाँकि उनका नर्सिंग होम कुछ सालों बाद ही बन सका था। शादी के कई साल गुज़र चुके थे पर मीनाक्षी की गोद सूनी ही थी।
राजकमल और मीनाक्षी के परिवार के लोगों का नियति, पूजापाठ, दान हवन आदि पर गहरा विश्वास था। मीनाश्री के पिता उज्जैन के किसी कालेज में विज्ञान पढ़ाते थे- पर ज्योतिष शास्त्र पर उनका पूरा भरोसा था। अपनी बेटी की कुण्डली में पढ़ कर उन्हें पता था कि मीनाक्षी के तीन संतानें होंगी और तीनों ही पुत्र रत्न होंगे। शिप्रा के जन्म से भी ज्योतिष पर उनके विश्वास का कोई फक्र नहीं पड़ा। उन्हांने ऐलान किया ‘बेटी में तीन पुत्रों जैसे गुण होंगे। तीन पुत्रों के समान यश और शक्ति इस एक बेटी में होगी।’
शिप्रा नाम उन्हीं का दिया हुआ था।

हजारों साल पहले मालवा में भयंकर सूखा पड़ा था। नदियां, ताल, पोखर सब सूख गये थे। चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गयी थी। राजा के भंडार में हालाँकि अन्न की कमी नहीं थी। सो चमुर राजा ने एक ही कर्म से दयावान और ईश्वर भक्त होने की ख्याति पानी चाही। उसने भगवान विष्णु के लिए एक मन्दिर बनवाने का संकल्प किया। मन्दिर के निर्माण में काम करने वाले मजदूरों को पूरे दिन काम करने के बदले में मुट्ठी अन्न देने के इंतजाम का ऐलान करवा दिया। सूखे से ग्रसित मालवा के लोगों के लिए यह आशातीत प्रस्ताव था। राजा की जय जयकार करते हुए, सारे दिन वे पूरे परिवार के साथ लग कर काम करते और शाम को दो-दो मुट्ठी अनाज लेकर घर लौटते। कुछ ही महीनों में भगवान विष्णु का भव्य मन्दिर बनकर तैयार हो गया। प्रसन्न मुद्रा में विष्णुजी ने जिस दिन मन्दिर की मूर्ति में प्रवेश कर राजा को चक्रवर्ती होने का आशीर्वाद दिया, उसी दिन राजा ने अपने अनाज का भंडार जनता के लिए बन्द करवा दिया।
जनता की हालत फिर पूर्ववत् हो गयी।

राजा को अब जनता की जय जयकार की जरूरत नहीं थी, क्योंकि उनके मन्दिर में स्वयं विष्णु कमलासीन जो थे। विष्णु भी राजा के भले के बारे में ही सोचने लगे थे, जनता का ध्यान उन्हें भी न था।
भगवान को देने के लिए गरीबों के पास कुछ जंगली फूल और एक लोटा पानी के अलावा और था ही क्या। महाकाले- खर शिवजी सब देख रहे थे- समझ रहे थे। उनके लिए राजा का महत्व कुछ भी न था, वे गरीब जनता के कष्टों के बारे में चिन्ति हो उठे।
ऐसे ही एक दिन महाकालेश्वर शिव विष्णु के दरबार पहुंचे। मालवा के अकाल और राजा की चालाकी की बात तो की ही, पर साथ ही उन्होंने विष्णु पर भी राजा से मन्दिर और भोग के रूप में उत्कोच लेने का आरोप भी जड़ दिया। विष्णु नाराज हो गये। नाराज विष्णु ने शिव की तर्जनी दिखा दी। महाकालेश्वर को लगा कि विष्णु उनका अपमान कर रहे हैं- पर वास्तव में ऐसा था नहीं। पर जब तक शिव इस बात को समझ सकते उनका त्रिशूल चल चुका था। त्रिशूल ने विष्णु की तर्जनी को बेध दिया।
विष्णु और शिव दोनों को ही अपनी गलतियों का अहसास हुआ।
महाकालेश्वर ने विष्णु की तर्जनी से निकले खून को अपने माथे पर ले लिया ताकि जमीन पर यह देव रक्त न गिर सके।
विष्णु की तर्जनी का रक्त, महाकालेश्वर के कपाल से होकर एक नदी के रूप में बह निकला। इसी नदी के चलते, मालवा का वर्षा तक चलने वाला सूखा भी खत्म हुआ।
विष्णु और महाकालेश्वर शिव के स्पर्श से जन्‍मी यह नदी शिप्रा थी।

अपने माँ-बाप की एकमात्र संतान शिप्रा, बारहवीं क्लास तक दार्जिलिंग के सेंट मेरीज़ में पढ़ी थी। दार्जिलिंग के बोर्डिंग हाउस में उसने पूरे बारह साल गुजारे थे।
बड़े दिन से लेकर नये साल की लंबी छुट्टियां होती थीं स्कूल में। साल में एक बार ही शिप्रा घर आ पाती थी अपने मम्मी-पापा के पास। पर चूंकि वे दोनों शहर के नामीगि‍रामी डाक्टर थे इसलिए वे सुबह से रात तक नर्सिंग होम में व्यस्त रहते थे। छुट्टियों में कुछ दिनों के लिए घर आयी अपनी बेटी के साथ कुछ वक्त गुजारने का उनके पास वक्त नहीं हो पाता था।
शिप्रा आर्ची, टिनटिन और एस्ट्रिक्स के कॉमिक्स, मिल्स एण्ड बून, एनिड व्लाईटन के किस्से-कहानियों को पार कर कब जिमी हेन्ड्रिक्स बीटल्स् और एल्विस प्रिस्टले के गीतों से गुजरते हुए मैझड्रेक्स और ग्रास के उपन्‍यासों के साथ कब जवान हो गयी थी- उसे खुद भी खबर नहीं हुई।
सुधीर से उसकी मुलाकात कानपुर क्रिश्चयन कालेज में हुई थी। सुधीर और उसके दूसरे दोस्त तब सभी छात्र थे। सुधीर पार्टी से काफी नजदीक जुड़ा था। शिप्रा को सुधीर और उसके दोस्तों की दुनिया बिल्कुल नयी सी लगी थी। शिप्रा बहुत कम समय में बेहद सक्रिय हो उठी थी।
शिप्रा में बदलाव आने लगा था। उसके बाडे़ में कुछ नयी किस्म की पुस्तकें, तस्वीरें, पोस्टर आदि घुसने लगी थीं। इन सब का बहाव इतना तेज था कि चन्द दिनों में ही शिप्रा की जिंदगी से मैन्ड्रेक्स-एल्विस-जैकलन सुझान आदि गायब हो गये थे।

दोज़ वेर द डेज़ माई फ्रेंड़
आइ थॉट दे उड् नेवर एण्ड़- जिमी हेन्ड्रिल्स

शिप्रा के आसपास दुनिया तेजी से बदल रही थी। लड़के-लड़कियों के लिबास बदल रहे थे। एक ओर जहां लंबी कलमें, बेल बाटम, गोगो गॉग्लस-हरे कृष्ण हरे राम- पॉप सांग-पॉप स्टार- गाँजा-जैम सेशन था, वहीं दूसरी ओर चे-ग्वेवारा, वियेतनाम नक्सलवाडी, होचीमिन्ह-चारू मजुमदार-चीन था।
वियतनाम में अमरीका की दादागिरी नहीं चल पा रही थी। फौजियों का मनोबल टूट रहा था। वे हार-हार कर थक गये थे। मनोरंजन की मृत संजीवनी से उन सैनिकों के मन को रंगने पहुंची भारत की ‘मिस यूनिवर्स’- रीता फारिया।
सुधीर ने अकेले ही कानपुर के सभी कालेजों मे जाकर छात्रों से बातचीत की और छात्रों का एक विशाल प्रदर्शन परेड के मैदान से अमरीकी सूचना केन्द्र तक निकाला। सुधीर कुछ ही महीनों में कानपुर के कालेजों के छात्रों के बीच जाना पहचाना नाम बन गया था।
अपोलो ग्यारह- नील आमस्ट्रांग-पैटन टैंक- सातवाँ बेड़ा-एण्टरप्राईज़ आदि अमीरकी प्रगति के प्रतीक बन रही सूचनाओं को विश्वभर में प्रचार के लिए अमरीका करोड़ों डालर बहा रहा था।
कानपुर के मेहता पार्क की केनेडी सेंटर लाइब्रेरी की दीवार पर एयरक्राफ्ट कैरियर ‘एन्टर प्राइज़’ का बड़ा सा चि‍त्र लोगो के दु:स्वप्नों में भी दिखने लगा था। अमरीकी नौसेना के सातवें बेड़ का उस्ताद था ‘एन्टर प्राइज़’। जिस देश के ठाँव यह नाँ बांध जाय- तो उस देश की तबाही में ज्यादा वक्त नहीं लगता था।
तेजी से दुनिया बदल रही थी। शहर के पढ़े-लिखे नौजवानों के एक बड़े से हिस्से ने व्यापक बदलाव के रूख को जनता की ओर मोड़ना चाहा। सदियों से शोषित किसान और ग्रामीण लोगों के सपनों के साथ उन्होंने अपने सपने जोड़ दिये। पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्से के एक छोटे गांव से निकली चिनगारी, देखते-देखते पूरे देश के महानगरों-शहरों-गावों-कस्बों में रहने वाले हजारों हजार नौजवानों की आंखों में दिखने लगी थी।
किस गाँव की या किस इलाके से सुधीर का ताल्लुक था पता नहीं, पर वह भोजपुर-कलकत्ता-श्रीकाकुलम-लखीमपुर या उन्नाव कहीं का भी हो सकता था। कालेज में उसने दाखिला जरूर लिया था पर उसका उद्देश्य डिग्री हासिल करना नहीं था- यह उसके लेक्चरर-प्रोफेसर के साथ-साथ सुधीर के साथ पढ़ने वाले सभी जान गये थे।

6

कहते हैं किसी शहर का इतिहास शहर में रहने वाले लोगों से ही बनता है, पर कभी-कभी मौसम भी आकर इतिहास में सेंध लगाकर अपनी जगह बना जाता है।
सन् उन्सठ का ठंड याद है न ? बेना झावर पानी की टंकी का पानी जम गया था- कड़ाके की ठंड, उस पर शीत लहरी-पहले कभी इतनी ठंड नहीं पड़ी थी इस शहर में।’
सन् उन्सठ के बीते, दसेक साल से ज्यादा का समय बीत गया था। अब यह सत्तर का दशक था- मुक्ति का दशक !
जाड़े की उस रात में, जब लोग लिहाफ-कंबलों के नीचे दुबके सन् उन्सठ को याद कर रहे थे, सड़क किनारे अलाव से सटकर बैठे गरीब-मजबूर ऐसी रातों के बीतने का इंतजार कर रहे थे; बेनाझावर पानी की टंकी का पानी अपने को बर्फ में बदल जाने के आतंक से घड़ियाँ गिन रहा था, मेहता पार्क में लगी- ओंस से नहायी हुई बर्फ जैसी ठंडी, गांधी जी की काँसे की मूर्ति की गरदन पर लोहा काटने की आरी की कर्कश आवाज से मेहता पार्क का सन्नाटा टूट कर बिखर गया था।
गांधी की मूर्ति आठ फीट ऊँची थी जो लगभग छह फीट ऊँचे पेडेस्टल पर जड़ी थी। गुलाबी-सफेद, छोटे-छोटे मौसमी फूलों की पतली क्यारी से घिरी गांधी की चौदह फुट ऊँची मूर्ति, जनवरी के भयंकर ठंड वाली रात के इस सन्नाटे में मायावी लग रही थी।
लंबी नाक पर टिके चश्मे के दो गोलाकार फ्रेमों के अन्दर गांधी की आँखें नहीं दिख रही थीं, जबकि मैं उनके चेहरे के इतना करीब था। मैं उनकी कमर पर, जहां उन्होंने अपनी धोती लपेट रखी थी; अपने पैर टिकाये, मूर्ति की दाहिनी बांह पर बैठा था। इसी हाथ से गांधी अपनी लाठी थामे थे- जो उनके कद से कुछ ज्यादा ऊँची थी। मूर्ति की पीठ पर विमल ने अपने को जस-तस चिपका रखा था, क्योंकि उसे मेरे जैसे गांधी के बांये हाथ का सहारा नहीं था। लोहा काटने वाली आरी की मूँठ मेरे हाथों में थी और इसका दूसरा छोर विमल थामे था।
गरदन पर आरी चलाने के पहले मैंने अपनी बांयी हथेली से गांधी के कंधे को छुआ। वहां हड्डी का उभार स्पष्ट था। दुबले, कमजोर और बूढ़े गांधी जी निर्विकार-निर्लिप्त भाव लिए खड़े थे। मानो जनवरी की इस भयंकर ठंड को उन्होंने अपने शरीर में समेटे रखा हो।
मुझे नन्दलाल बोस का प्रसिद्घ चि‍त्र याद आया, जिसे उन्होंने गांधी जी की डांडी यात्रा के समय बनाया था। इस मूर्ति की मुद्रा लगभग वैसी ही थी।
काले काँसे की फौलादी सतह मुझे अचानक जीवन्त सी लगी। मुझे लगा गांधी जी के धंसे हुए गालों के बीच तने कमजोर से होठों से वे बस कुछ कहने ही वाले थे। देर तक अन्धेरे में रहने से चीजें कुछ-कुछ साफ दिखने लगती हैं- गांधी का चेहरा मुझे पहले से ज्यादा स्पष्ट दिख रहा था। दो आंखें मुझे देख रही थीं- क्या वे मुझसे कुछ सवाल करने की तैयारी में थीं या मुझ पर हंस रही थीं ? – मैं ठीक से समझ नहीं सका।
मैंने गांधी की मजबूत दाहिनी बांह पर बैठ कर नीचे देखा। मूर्ति के पेडेस्टल के नीचे, सफेद-गुलाबी मौसमी फूलों की पतली क्यारी से घिरे चबूतरे पर मेरे चार साथी खड़े थे। उनमें से मैं शिप्रा के अलावा किसी से भी पहले कभी नहीं मिला था। इतनी ऊँचाई से वे सब बेहद बौने लग रहे थे।
‘‘पावर फलोज़ फ्राम द बैरल आफ अ गन ! कामरेड शुरू करो- क्वीक, देर हो रही है।’’
मुझे लगा कि ठंडे घने कोहरे की मोटी चादर के उस पार से मुझे शिप्रा नहीं, कोई और आवाज दे रहा था। जो कई हज़ार मीलों के लंबे सफर को तय कर, हिमालय की ऊँची चट्टानों को लाँघ कर मुझ तक पहुंच रही थी।
मैंने आरी चलाने के पहले अपनी बांयी हथेली से गांधी जी की आंखों को ढंक लिया।
विमल पूरी ताकत से आरी के दूसरे छोर को थामे था।
पर जितना हम लोगों ने सोचा था- उतना आसान काम नहीं था यह। और जल्द ही, काले काँसे की गांधी की गरदन रेतने की हमारी कोशिश नाकामयाब हो गयी। कुछ देर तक हम और विमल मेहनत करते रहे थे, पर अचानक आरी ही टूट गयी थी।
लोहा काटने वाली आरी शायद कमजोर नहीं थी- शायद हमारी बाजुओं में ही ताकत की कमी थी।
मूर्ति से नीचे उतरने के पहले मैंने गांधी की आंखों से अपनी बांयी हथेली हठा ली थी। गांधी की ओर देखने की हिम्मत मुझ में नहीं थी। मेरी हथेली में उनके चश्मे के फ्रेम के निशान शायद बन गये थे – थोड़ा दर्द भी हो रहा था।
‘‘कामरेड, हम फिर अटैक करेंगे। पीपल मस्ट फील आवर प्रेजे़न्स- लोगों को पता चलना चाहिए कि हम हैं ।
हम सशस्त्र क्रान्ति के जरिये
सर्वहारा जनता की मुक्ति लायेंगे।
भारत वर्ष की कम्युनिस्ट पार्टी
माक्र्सवादी लेनिनवादी
जिन्दाबाद जिन्दाबाद।
उन्सठ के ठंड से ज्यादा ठंडी उस रात में, मेहता पार्क के सन्नाटे में, हमने मिलकर नीची आवाज में नारे गुनगुनाये थे।

अभी शाम के साढे छह ही बजे थे, मेहता पार्क वीरान हो गया था। पार्क के मेन गेट से अन्दर आकर सड़क गांधी जी की मूर्ति से गुजर कर जहां खत्म होती थी- वह टाउन हॉल का चबूतरा था। टाउन हाल की पहली मंजिल पर दो एक सरकारी दफ्तर थे पर इसके एक बड़े से हिस्से में केनेडी सेंटर का ऑफिस था और उसी से सटी केनेडी सेंटर लायब्रेरी।
मैं, केनेडी सेंटर लायब्रेरी की ओर जाने के लिए, जब गांधी की मूर्ति के बगल से गुजर रहा था, तभी मुझे पिछले हफ्ते की उस रात की याद आयी। मैं रुक गया।
‘बापू, कैसे हो ?’
हाथ में लाठी को मजबूती से पकड़े, काले काँसे की बनी फौलादी मूर्ति की आंखों का चश्मा अपनी कमजोर कमानी के सहारे लंबी नाक पर टिका था।
उस चश्मे के गोल फ्रेम के पीछे एक जोड़ी आंखों को मैंने पिछले हफ्ते रात के ठंडे, कोहरे भरे गहराये वक्त में इतने करीब से देखा था।
हम पिछले हफ्ते अपने एक्शन में नाकामयाब रहे थे- यह सोचकर मुझे बुरा नहीं लगा, पर गांधी की मूर्ति की आंखों में एक हफ्ते बाद जरूरत से ज्यादा क्षमा का भाव झलक रहा था- मुझे लगा गांधी जीत गये थे।
गांधी मूर्ति के पास के गुजरने वाली सड़क पर खड़े, हार जाने का अहसास मुझे अपमानित कर गया।
‘हम लौट कर आयेंगे एण्ड दिस टाइम वी विल विहेड यू श्योरली। कानपुर के लोगों को- उत्तर प्रदेश के लोगों को पता चलेगा कि हम हैं उनके आसपास। वी हैव टू मेक आवर प्रेज़ेन्स फेल्ट।’
मैंने गांधी की मूर्ति को देखते हुए शिप्रा के कहे शब्दों को दोहराया।
गांधी जी छह फीट ऊँचे पेडेस्टल पर खड़े मेहता पार्क के पास से गुजरते माल रोड पर तेज रफ्तार गाड़ी, स्कूटर, रिक्शों को आते-जाते देख रहे थे- मेरी खतरनाक मौजूद्गी की तनिक भी परवाह किये बगैर।

‘कल सुबह ही जान जाओगे हम कौन हैं ! मेरे कंधे से लटकते इस झोले को देख रहे हो ? इसमें तीन साबुत डबल रोटियां हैं और पूरे एक लीटर पेट्रोल से भरी बोतल है।
सोच रहे होंगे, इसका क्या होगा ?
सावरमती के संत ! तुमने तो बिना खड्ग बिना ढाल के हमें आजादी दिलाने का कमाल किया था ना ? आजादी की जंग न हुआ, तुम्हारी तिलस्मी जादू का कोई करिश्मा था मानो।
सर्वहारा की असली आजादी जादुई छड़ी के लहराने से नहीं मिलती। क्रान्ति की जरूरत होती है- सशस्त्र क्रान्ति की।
बापू, तुम जहां बुत बने खड़े हो, उसी से कुछ दूर मेहता पार्क के दूसरे छोर पर केनेडी सेंटर लायब्रेरी है। लायब्रेरी ठीक आठ बजे बन्द होती है। लायब्रेरियन के अलावा उस समय तीन और कर्मचारी होते हैं। इस समय लायब्रेरी का बड़ा दरवाजा अन्दर से बन्द कर दिया जाता है। सब लोगों के बाहर आ जाने के बाद आठ बजकर पांच से दस मिनट के बीच लायब्रेरियन और तीन स्टाफ बाहर आकर छोटे दरवाजे पर ताला लगा कर दरवाजे के बाहर लगे मेन स्वीच का ऑफ कर देते हैं। मैं और शिप्रा ठीक आठ बजे हाल के छोटे दरवाजे पर पहुंचेंगे। विमल और उसके दो साथी पहले से ही हॉल के अंदर होंगे। हॉल के बीचोंबीच रखे अखबारों वाली ऊँची मेज जहां लोग खड़े होकर अखबार पढ़ते हैं, वहीं तीनों खड़े अखबार पलटते रहेंगे। आठ बज जाने के बाद जब और लोग हॉल से बाहर चले जायेंबे तब तीनों साथी लायब्रेरियन और तीनों स्टाफ को कैपचर कर लेंगे और उन्हें बाहर ले आयेंगे। विमल के माचिस से अखबारों में आग लगा कर बाहर आते ही मैं तीनों डबल रोटियों को पेट्रोल में तर कर एक के बाद एक हॉल के अंदर फेंक दूंगा। यह सब केवल बीस से बाइस सेकेण्डों में होना है़… ।’
गांधी जी की मूर्ति से बातचीत करते, उन्हें डराते-धमकाते हुए मैं भूल ही गया था कि शिप्रा को आकर मुझसे यहीं मिलना था।
‘कामरेड सलाम, आर यू रेडी ?’
मेरे पीछे शिप्रा खड़ी थी और आज भी, जब मैं, मेरे सबसे बड़े एक्शन के इतने पास खड़ा था- वह मुझे मेरे नाम से नहीं पुकार रही थी। पर मेरे साथ उसका इस वक्त होना मुझे बहुत अच्छा लगा।
चाय के रंग के ऊनी ओवर कोट में शिप्रा ढकी हुई थी। दोनों हाथ ओवरकोट की जेबों के अन्दर थे। शिप्रा का बस चेहरा दिख रहा था। रात के बढ़ते ठंड और गहराते अंधेरे में मुझे शिप्रा, संगमरमर में तराशी हुई रेनेसाँ कालीन कोई इटालियन मूर्ति सी लगी जो श्राबस्ती नगर की प्राचीन कथाओं में,विदिशा की निशा में, कपिलवस्तु के राजमार्गों में, प्रयाग की यज्ञशालाओं के गंभीर मन्त्रोच्चारों में, काशी की गलियों से गुजरने वाली हवाओं में और अवन्ती शहर के घाटों को चूमकर दक्षिण से उत्तर की ओर बहने वाली नदी के नाम में, एक रहस्य बन कर हजारों सालों से जी रही थी।
मैंने, पेट्रोल से तर तीनों डबल रोटियां हाल के छोटे से दरवाजे से अंदर उछाल कर दरवाजा बन्द कर दिया था। लायब्रेरी की ऊँची मेजों पर बि‍छे अखबार जल रहे थे। इस आग से पहली डबल रोटी के टूटते ही एक जोरदार भभक के साथ डबल रोटी से आग का फौवारा फूट पड़ा- चारों ओर। इस हाल की दीवारों पर जहां हजारों किताबें तरतीब से कतारों में लगी थीं, वहीं एक दीवार पर अमरीकी युद्घपोत ‘एण्टर प्राइज़’ का विशाल चित्र था। जहाज पर बनी हवाई पट्टी पर शातिर बाज की शक्लों वाले शैतान लड़ाकू विमानों का काफिला खड़ा था।
दूसरे दिन अखबारों में इस खबर के छपते ही पूरा शहर ही नहीं, पूरा प्रदेश हमारी मौजूद्गी के बारे में जान गया था।
दो दिनों में पुलिस ने हमारे छह साथियों को पकड़ लिया था। एक लड़की को भी पुलिस ने गिरफ्तार किया था, पर वह शिप्रा नहीं थी- शकील फातिमा थी।
हम पांचों उसी रात शहर छोड़ कर, अलग-अलग शहरों को निकल गये थे। पुलिस के रिकॉर्ड में हमारे एक्शन के किसी साथी के बारे में जानकारी नहीं थी।
केनेडी लायब्रेरी आगजनी के सिलसिले में गिरफ्तार साथियों पर थर्ड डिग्री का टार्चर हुआ था। स्वाभाविक कारणों से ही शकील फातिमा पर टार्चर सबसे ज्यादा हुआ था। सुधीर की कोशिशों से शहर के बुद्घिजीवियों, वकीलों और छात्रों के दबाव के चलते शकील फातिमा को दस दिनों बाद रिहा कर दिया गया था, पर पुलिस ने उसके शहर छोड़ने पर रोक लगा दी थी।
मैं एक महीने के लिए मुंबइ चला गया था।

पिताजी को उनके जाने वाले शास्त्री जी के नाम से जानते थे। वे इण्टर कालेज में हिन्दी और संस्कृत पढ़ाते थे। तीनों बेटों के बारे में उनके तमाम सपने थे। मेरे दोनों बड़े भाइयों ने लगता है उन्हें निराश नहीं किया था।

सोमनाथ होड़ का कलाकर्म जनांदोलनों से जुड़ने के लिए प्रेरित करता है: अशोक भौमिक

 

नई दिल्ली: सोमनाथ होड़ का कलाकर्म कलाकार को जनांदोलनों से जु़ड़ने के लिए यह प्रेरित करता है। यह बात चर्चित चित्रकार व साहित्यकार अशोक भौमिक ने कौस्तुभ सभागार, ललित कला अकादमी, नई दिल्ली में जसम के फिल्म समूह द ग्रुप की ओर से ‘तेभागा आंदोलन और सोमनाथ होड़ का कलाकर्म’ विषय पर आयोजित व्याख्यान-प्रदर्शन में कही। यह आयोजन हिंदी के मशहूर कवि शमशेर बहादुर सिंह, जो कि एक चित्रकार भी थे, की याद को समर्पित था। यह वर्ष शमशेर का जन्मशताब्दी वर्ष भी है। अशोक भौमिक ने बताया कि 1946 में भारत की अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी ने 23 साल के युवा कला छात्र सोमनाथ होड़ को तेभागा आंदोलन को दर्ज करने का कार्य सौंपा था। सोमनाथ होड़ ने किसानों के उस जबर्दस्त राजनीतिक उभार और उनकी लड़ाकू चेतना को अपने चित्रों और रेखांकनों में तो अभिव्यक्ति दी ही, साथ-साथ अपने अनुभवों को डायरी में भी दर्ज किया। उनकी डायरी और रेखाचित्र एक जन प्रतिबद्ध कलाकार द्वारा दर्ज किया गया किसान आंदोलन का अद्भुत ऐतिहासिक दस्तावेज है।

उन्होंने सोमनाथ होड़ के रेखाचित्रों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। बीच-बीच में उनकी डायरी के अंशों का जिक्र करते हुए कहा कि 1942 से लेकर 1946 तक सोमनाथ होड़ की कला का सफर, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा जनांदोलनों को संगठित करने के समानांतर विकसित होते दिखता है। यही वह दौर था जब सांप्रदायिक शक्तियां भी मजबूती से सर उठा रही थीं। तेभागा आंदोलन में किसानों ने भूस्वामियों की सांप्रदायिक रणनीति का भी जोरदार जवाब दिया। किसान परिवार की महिलाओं ने भी इस संघर्ष में शानदार भूमिका निभाई। इस आंदोलन के प्रत्यक्ष अनुभव सोमनाथ होड़ के लिए आजीवन प्रेरणा का स्रोत बने रहे। उनका उस आंदोलन के केंद्र रंगपुर में जाना, एक रचनाकार का राजनीतिक गतिविधियो और सक्रिय आंदोलनों के करीब जाने की जरूरत को आज भी रेखांकित करता है। सोमनाथ होड़ द्वारा डायरी में एक बेहद गरीब किसान द्वारा एक जोतदार के प्रलोभन को ठुकरा दिए जाने की घटना की तुलना नेहरू के कथनी और करनी के फर्क से जिस तरह की गई है, वह एक तीखा राजनैतिक व्यंग्य है। सोमनाथ होड़ को मूल्यों के मामले में किसान एक प्रधानमंत्री से बेहतर लगता है, क्योंकि उसे घूस लेना नहीं आता- वह अपना हक लड़ कर लेना चाहता है।

कार्यक्रम का संचालन युवा मार्क्सवादी विचारक पथिक घोष ने किया। अध्यक्षता कर रहे सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक प्रो. मैनेजर पांडेय ने कहा कि इस व्याख्यान-प्रदर्शन के जरिए एक तरह से तेभागा के क्रांतिकारी किसान आंदोलन का इतिहास जीवंत हो उठा। प्रो. पांडेय ने तेभागा आंदोलन में संथाल आदिवासियों और महिलाओं की जबर्दस्त भूमिका की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि आज कला की दुनिया पर बाजार का जिस तरह कब्जा हो गया है उसने चित्रकारों की राजनीतिक भूमिका को कमजोर किया है। ऐसा नहीं है कि आज चित्रकला का राजनीतिक प्रभाव कम हो गया है, बल्कि हुआ यह है कि राजनीतिक चित्रकार कम हो गए हैं। प्रो. पांडेय ने कहा कि आज इस देश में जब सरकार की कारपोरेटपरस्त अर्थनीति के कारण लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं और जब जमीन और जंगल से किसानों और आदिवासियों को बेदखल करने के लिए सरकार जनसंहार कर रही है, तब कलाकारों का यह दायित्व है कि वे उसके प्रतिरोध में खड़े हों, उन सच्चाइयों को अपने कलाकर्म के जरिए दर्शाएं, जिनपर पर्दा डाला जा रहा है।

विचार-विमर्श के सत्र में वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि सोमनाथ होड़ ने आगे चलकर किस तरह का सृजन किया व्याख्यान में इसकी झलक भी होनी चाहिए थी। कवि रोहित प्रकाश ने तेभागा और आजादी के बाद के जनांदोलनों का जिक्र करते हुए उनके चित्रकला पर प्रभाव को लेकर सवाल किया। संस्कृतिकर्मी सुधीर सुमन ने उस दौर के साहित्यकारों और कलाकारों के सौंदर्यबोध को निर्मित करने में राजनीति और संस्कृति के गहन रिश्ते की जो भूमिका थी, उसे चिह्नित किया।

आयोजन के अंत में दो मिनट का मौन रखकर उत्तराखंड के आंदोलनकारी जनकवि गिरीश तिवारी गिर्दा के असामयिक निधन पर शोक प्रकट किया गया। मुरली मनोहर प्रसाद, अशोक वाजपेयी, प्रयाग शुक्ल, इब्बार रबी, रेखा अवस्थी, कांति मोहन, अनिल सिन्हा, नीलाभ, मदन कश्यप, प्रणय कृष्ण, आशुतोष कुमार, वैभव सिंह, स्वाति भौमिक, मधु अग्रवाल, राधिका, नंदिनी चंद्रा, भाषा सिंह, उमा, वंदना, प्रदीप दास, अनुपम राय, अजय भारद्वाज, मोहन जोशी, गौरीनाथ, कुमार मुकुल, पंकज श्रीवास्तव, रोहित कौशिक, अवधेश आदि कई जाने माने साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी और टेकानिया कला विद्यालय के छात्रा-छात्राएं मौजूद थे।