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एक शब्‍दयोगी की आत्‍मगाथा : अनुराग

Shabdvedh

शब्‍दों के संसार में पि‍छले सत्‍तर साल से सक्रिय अरविंद कुमार को आधुनि‍क हिंदी कोशकारि‍ता की नीवं रखने का श्रेय जाता है। कोशकारि‍ता के लि‍ए कि‍ए अपना सब कुछ दांव में लगाने वाले अरविंद जी का जीवन संघर्ष भी कम रोमांचक नहीं है। पंद्रह साल की उम्र में उन्‍होंने हाई स्‍कूल की परीक्षा दी और पारि‍वारि‍क कारणों से रि‍जल्‍ट आने से पहले ही दि‍ल्‍ली प्रेस में कंपोजिंग से पहले डि‍स्‍ट्रीब्‍यूटरी सीखने के लि‍ए नौकरी शुरू कर दी। एक बाल श्रमि‍क के रूप में अपना कॅरि‍यर शुरू करने वाले अरविंद कुमार कैसे दि‍ल्‍ली प्रेस में सभी पत्रि‍काओं के इंचार्ज बने, कैसे अपने समय की चर्चित फि‍ल्‍म पत्रि‍का ‘माधुरी’ के संस्‍थापक संपादक बन उसे एक वि‍शि‍ष्‍ट पहचान दी और फि‍र कैसे रीडर डायजेस्‍ट के हिंदी संस्‍करण ‘सर्वोत्‍तम’ की की शुरुआत कर उसे लोकप्रि‍यता के शि‍खर तक पहुंचाया, ये सब जानना, एक कर्मयोगी के जीवन संघर्ष को जानने के लि‍ए जरूरी है।

कोशकार अरविंद कुमार के जीवन के वि‍भि‍न्‍न पहलुओं और कोशकारि‍ता के लि‍ए कि‍ए गए उनके कार्यों को समेटे हुए पुस्‍तक ‘शब्‍दवेध’ एक दस्‍तावेजी और जरूरी    कि‍ताब है। अरविंद जी के जीवन और कर्मयोग के अलावा इस दस्‍तावेजी पुस्‍तक में प्रकाशन उद्योग के वि‍कास और हि‍न्‍दी पत्र-पत्रि‍काओं के उत्‍थान-पतन की झलक भी इसमें मि‍लती है। यह पुस्‍तक नौ संभागों पूर्वपीठि‍का, समांतर सृजन गाथा, तदुपरांत, कोशकारि‍ता, सूचना प्रौद्योगि‍की, हिंदी, अनुवाद, साहि‍त्‍य और सि‍नेमा में बंटी है।

समांतर कोश बना कर हिंदी में क्रांति लाने वाले अरविंद कुमार की यह अपनी तरह की एकमात्र आत्मकथा है। कारण- वह अपने निजी जीवन की बात इस के पहले संभाग पूर्वपीठिका के कुल 21 पन्नोँ मेँ निपटा देते हैं। जन्म से उस दिन तक जब वह माधुरी पत्रिका का संपादक पद त्याग कर दिल्ली चले आए थे और लोग उन्हें पागल कह रहे थे। उन का कहना है, ‘मेरे जीवन मेँ जो कुछ भी उल्लेखनीय है, वह मेरा काम ही है। मेरा निजी जीवन सीधा सादा, सपाट और नीरस है।’ इसके बाद तो  किताब में शब्‍दों के संसार में उनके अनुभवों और योगदान की उत्तरोत्तर विकास कथा है।

समांतर सृजन गाथा और तदुपरांत नाम के दो संभागों में हम पहले तो समांतर कोश की रचना की समस्याओँ और अनोखे निदानोँ से अवगत होते हैं। यह जानते हैं कि कथाकार कमलेश्‍वर द्वारा उसके नामकरण में सहयोग और नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा उसका प्रकाशन कैसे हुआ और उनके अन्य कोशों (समांतर कोश, अरविंद सहज समांतर कोश, शब्देश्‍वरी, अरविंद सहज समांतर कोश, द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी, भोजपुरी-हिंदी-इंग्लिश लोकभाषा शब्दकोश, बृहत् समांतर कोश, अरविंद वर्ड पावर: इंग्लिश-हिंदी, अरविंद तुकांत कोश) से परिचित होते हैं। किसी एक आदमी का अकेले अपने दम पर, बिना किसी तरह के अनुदान के इतने सारे थिसारस बना पाना अपने आप मेँ एक रिकॉर्ड है।

कोशकारिता संभाग हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोश कला के सामाजिक संदर्भ और दायित्व तक ले जाता है। अमर कोश, रोजेट के थिसारस और समांतर कोश का तुलनात्मक अध्ययन पेश करता है।

सूचना प्रौद्योगिकी संभाग में अरविंद बताते हैं कि उन्होंने प्रौद्योगिकी को किस प्रकार हिंदी की सेवा में लगाया। साथ ही वह वैदिक काल से अब तक की कोशकारिता को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य मेँ पेश करने में सफल होते है। मशीनी अनुवाद की तात्कतालिक आवश्यकता पर बल देते है।

हिंदी संभाग मे वह हिंदी की मानक वर्तनी पर अपना निर्णयात्मक मत तो प्रकट करते ही हैं, साथ ही हिंदी भाषा में बदलावों का वर्णन करने के बाद आंखों देखी हिंदी पत्रकारिता मेँ पिछले सत्तर सालोँ की जानकारी भी देते है।

अनुवाद संभाग मेँ अनुवादकों की मदद के लिए कोशों के स्थान पर थिसारसों की वांछनीयता समझाते हैं। इसके साथ ही गीता के अपने अनुवाद के बहाने संस्कृत भाषा को आज के पाठक तक ले जाने की अपनी सहज विधि दरशाते हैं और ऐसे अनुवादों में वाक्यों को छोटा रखने का समर्थन करते हैं। वह प्रतिपादित करते हैँ कि पाठक के लिए किसी संस्कृत शब्द का अर्थ समझना कठिन नहीँ होता, बल्कि दुरूह वाक्य रचना अर्थ ग्रहण करने मेँ बाधक होती है।

साहित्य संभाग हर साहित्यकार के लिए अनिवार्य अंश है। इंग्लैंड के राजकवि जान ड्राइडन के प्रसिद्ध लेख काव्यानुवाद की कला के हिंदी अनुवाद शामिल कर उन्होंने हिंदी जगत पर उपकार किया हैा ड्राइडन ने जो कसौटियां स्थापित कीं, वे देशकालातीत हैं। ग्रीक और लैटिन महाकवियों को इंग्लिश में अनूदित करते समय ड्राइडन के अपने अनुभवों पर आधारित लंबे वाक्यों और पैराग्राफ़ोँ से भरे इस लेख के अनुवाद द्वारा उन्होँने इंग्लिश और हिंदी भाषाओँ पर अपनी पकड़ सिद्ध कर दी है। यह अनुवाद वही कर सकता था जो न केवल इंग्लिश साहित्य से सुपरिचित हो, बल्कि जिसे विश्व साहित्य की गहरी जानकारी हो।

सिनेमा संभाग की कुल सामग्री पढ़ कर कहा जा सकता है कि यह सब साहित्य संभाग मेँ जाने का अधिकारी था। कोई और फ़िल्म पत्रकार होता तो सिने जगत के चटपटे क़िस्सों का पोथा खोल देता, लेकिन अरविंद यह नहीं करते। जिस तरह उन्होंने माधुरी पत्रिका को उन क़िस्सोँ से दूर रखा, उसी तरह यहाँ भी वह उस सब से अपने आप को दूर रखते हैँ। यहाँ हम पढ़ते हैं जनकवि शैलेंद्र पर एक बेहद मार्मिक संस्मरणात्मक लेख, राज कपूर के साथ उन की पहली शाम के ज़रिए फ़िल्मोँ के सामाजिक पक्ष और दर्शकों की मानसिकता पर पड़ने वाले प्रभाव की चर्चा, फ़िल्म तकनीक के कुछ महत्वपूर्ण गुर।

माधुरी पत्रिका की चर्चा करने के बहाने वह बताते हैँ कि क्यों उन्होँने फ़िल्म वालों से अकेले में मिलना बंद कर दिया- जो बात उजागर होती है, वह पत्रकारिता मेँ छिपा भ्रष्टाचार।

इस संभाग मेँ संकलित लंबा समीक्षात्मक लेख माधुरी का राष्ट्रीय राजमार्ग प्रसिद्ध सामाजिक इतिहासकार रविकांत ने लिखा है,  जो अरविंद जी के संपादन काल वाली माधुरी के सामाजिक दायित्व पर रोशनी डालता है और किस तरह अरविंद जी ने अपनी पत्रिका को कलात्मक फ़िल्मोँ और साहित्य सिनेमा संगम की सेवा मेँ लगा कर भी सफलता हासिल की।

शब्दवेध की अंतिम रचना है प्रमथेश चंद्र बरुआ द्वारा निर्देशित और कुंदन लाल सहगल तथा जमना अभिनीत देवदास का समीक्षात्मक वर्णन। यह एक ऐसी विधा है जो अरविंदजी ने शुरू की और उन के बंद करने के बाद कोई और कर ही नहीँ  पाया। देवदास फ़िल्म का उन का पुनर्कथन अपने आप मेँ साहित्य की एक महान उपलब्धि है। यह फ़िल्म की शौट दर शौट कथा ही नहीँ बताता, उस फ़िल्म के उस सामाजिक पहलू की ओर भी इंगित करता है। देवदास उपन्यास पर बाद मेँ फ़िल्म बनाने वाला कोई निर्देशक यह नहीँ कर पाया। उदाहरणतः ‘पूरी फ़िल्‍म मेँ निर्देशक बरुआ ने रेलगाड़ी का, विभिन्‍न कोणों से लिए गए रेल के चलने के दृश्यों का और उस की आवाज़ का बड़ा सुंदर प्रयोग किया है। पुराने देहाती संस्‍कारों में पले देवदास को पार्वती से दूर ले जाने वाली आधुनिकता और शहर की प्रतीक यह मशीन फ़िल्‍म के अंत तक पहुँचते देवदास की आवारगी, लाचारी और दयनीयता की प्रतीक बन जाती है।

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पुस्‍तक : शब्दवेध: शब्दों के संसार में सत्तर साल– एक कृतित्व कथा
लेखक : अरविंद कुमार
मूल्य रु. 799.00
प्रकाशक: अरविंद लिंग्विस्टिक्स, ई-28 प्रथम तल, कालिंदी कालोनी, नई दिल्ली 110065
संपर्क – मीता लाल. फ़ोन नंबर: 09810016568–ईमेल: lallmeeta@gmail.com

 

उत्‍थान की राह देखती हिंदी : अरविंद कुमार

अरविंद कुमार

अरविंद कुमार

स्वतंत्रता आंदोलन में हम लोग हिंदी को राष्ट्रभाषा कहते थे। अधिकतर हिंदी वाले अब भी उसे राष्ट्रभाषा ही समझते और कहते हैं। यथास्थिति यह है कि हिंदी हमारे देश की दो राजभाषाओं में से एक है, वह भी नंबर दो की।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में 13 सितंबर 1949 के दिन बहस में भाग लेते हुए तीन आधारभूत बातें कही थीं–

1. किसी विदेशी भाषा से कोई राष्ट्र महान नहीं हो सकता।

2. कोई भी विदेशी भाषा आम लोगों की भाषा नहीं हो सकती।

3. भारत के हित में,  भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के हित में, ऐसा राष्ट्र बनाने के हित में जो अपनी आत्मा को पहचाने,  जिसे आत्मविश्वास हो,  जो संसार के साथ सहयोग कर सके, हमें हिंदी को अपनाना चाहिए।

इसके अगले दिन चौदह सितंबर को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिंदी की खड़ी बोली ही भारत की राजभाषा होगी। इस महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को रेखाँकित करने तथा हिंदी का प्रसार करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति,  वर्धा के अनुरोध पर सन 1953 से संपूर्ण भारत में 14 सितंबर को प्रतिवर्ष हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है।

आज 54 साल बाद हालत यह है कि दस सितंबर को दिल्ली की जिला अदालत में पहली बार हिंदी में निर्णय सुनाया गया तो यह प्रमुख समाचार बन गया! स्पष्ट है कि हिंदी उन सब जगहों से दूर है, जिनसे आम आदमी को काम पड़ता है। सर्वोच्च न्यायालय ने तो साफ़ शब्दों में बता दिया है कि उसके कक्षों में अभी हिंदी पहुँचने की कोई संभावना नहीं है।

तभी तो जब पूरा देश हिंदी दिवस मनाता है, तो आम आदमी को यह मात्र दिखावा या पाखंड लगता है।

सरकारी कामकाज में वास्तविक राजभाषा बनने से हिंदी अभी बहुत दूर है। कहा जाता है कि इसके कई ऐतिहासिक, व्यावहारिक और कार्यान्वयनीय कारण हैं। शायद इस तर्क मेँ कुछ तथ्य भी है। हिंदी से बाहर के राज्यों से आनेवाले हमारे अफ़सरशाह हिंदी नहीं जानते। कई हिंदी प्रदेशों के अधिकारी भी अभी तक हिंदी में काम करते समय सकुचाते हैं, जबकि उनकी सहायता के लिए उन्हीं के नीचे कुशल राजभाषा कर्मी मौजूद होते हैं।

सरकारी दफ़्तरों की बात तो दूर, आम आदमी के जीवन से संबंध रखने वाली ढेरों छोटी-छोटी जानकारियाँ तक हिंदी में कहाँ मिलती हैं? कितनी हिंदी फ़िल्मों की नामावली हिंदी में मिलती है? मुक़ाबिले मेँ यूरोप के छोटे-छोटे देशोँ तक में बिकने वाले सामान के डिब्बों पर जानकारी स्थानीय भाषा में होती है। वहाँ की फ़िल्मों की नामावली भी स्थानीय भाषाओं में होती है। वहाँ के कई देश तो हमारे कई बड़े जनपदोँ से छोटे हैं। हमारा एक एक राज्य उन देशों से कहीं बड़ा है। फिर भी तमिल, कन्नड़, गुजराती, पंजाबी भाषाओं की बात तो छोड़िए पूरे देश की राज्यभाषा हिंदी तक में यह सूचना उपलब्ध नहीँ होती।

मिसाल के तौर पर हिंदी क्षेत्रों में टेलिफ़ोन बिलों का, उनके ब्योरे का, उनके लिफ़ाफों का तथा रसीदों का हिंदी मेँ न होना। जबकि इसमें आज की तकनीकी दुनिया में कोई कठिनाई है ही नहीं। हर भाषा, हर लिपि अब यूनिकोड में हर कंप्यूटर पर कंपनियों के प्रोग्रामरों की सहायता के लिए आसानी से उपलब्ध है। सूचना प्रौद्योगिकी ने यहाँ तक संभव कर दिया है कि लिफ़ाफ़े पर पता पाने वाले के नगर की लिपि में हो और अंदर का मज़मून उसकी वांछित भाषा में– डाकिए का काम भी आसान, और पत्र पाने वाले की इच्छा भी पूरी!

कंपनियों को बस थोड़ी मेहनत करनी होगी। यह मेहनत वे तब तक नहीँ करेंगे, जब तक उन्हें मज़बूर न किया जाए, क्योंकि हमारी हर छोटी-बड़ी कंपनी के प्रबंधक अँगरेज़ी को ही एकमात्र भाषा समझते हैं।

पप्पू इंग्लिश का आविर्भाव

सरकारी दफ़्तर की बात तो मैंने लचर बहानों के एक तरफ़ रख दी। यह तो मैं ही नहीं हर कोई पूछ सकता है कि कितनी भारतीय कंपनियों के दफ़्तरों में कामकाज और पत्र-व्यवहार की भाषा हिंदी है? कठोर सत्य यह है कि हिंदी अभी तक हमारे देश में रोज़गार की भाषा नहीं बन सकी है। जब इन कंपनियों का थोड़ा-बहुत काम तक हिंदी में नहीँ होता, तो अकेली हिंदी भाषा जाननेवालों को वे काम पर कैसे रखेंगे? हिंदीवालों को काम नहीं मिलेगा, तो उन्हें अँगरेजी सीखनी ही पड़ेगी। परिणाम यह है कि आम आदमी की निगाह मेँ अँगरेजी पढ़ना जीवन-यापन के लिए, सामाजिक स्तर सुधारने के लिए लाज़िमी बनता नज़र आने लगा है।

अपने सीमित संसाधनोँ से जो इंग्लिश वे सीख पाएंगे उसे ‘पप्पू इंग्लिश’ ही कहा जा सकता है। अभी हाल ऐसी इंग्लिश पढ़े पप्पुओं द्वारा किए गए अनुवादोँ के कुछ नमूने इंटरनैट पर दिखाई दिए-

वो मेरी नवासी है (She is my eighty nine)

मुझे अंग्रेजी आती है (English comes to me)

मेरा ताल्लुक हरिद्वार से है (I belong to Green Gate)

मेरा मज़ाक मत उड़ाओ| (Dont fly my joke)

मुम्बई की सड़क पर गोलियाँ चल रही हैं (Tablets are walking on the road of Mumbai)

भारतीय नारियाँ अपने पति के खाने के बाद खाती हैं। (Indian women eat after eating their husbands.)

निश्चय ही ऐसी इंग्लिश का महाविद्वान पप्पू इन कंपनियों में बस चपरासी या मक्खी-पर-मक्खी मारने वाला पते टाइपिस्ट ही बन सकता है, इससे आगे कुछ नहीं।

चलिए कंपनियों की बात भी हम छोड़ देते हैं। हमारे समाचार पत्र प्रकाशक, विशेषकर वे जो इंग्लिश के साथ-साथ हिंदी समाचार-पत्र पत्रिकाएँ छापते हैं और रहे हैं, हिंदी को बोझ समझते हैं। पिछले सालों में जिस तरह उनकी हिंदी पत्रिकाएं बंद की गईं, यह सर्वज्ञात है। पत्र-पत्रिकाओं में विज्ञापन देने वाले बड़े साहबों के लिए हिंदी बेकार की भाषा है, लेकिन यह सिद्ध हो चुका है कि असली ख़रीददार देश की अपनी भाषा हिंदी वाला है, या किसी अन्य भारतीय भाषा वाला है। टीवी पर सबसे अधिक लोकप्रिय चैनल पहले नबंर पर हिंदी वाले हैं– चाहे वे समाचारों के हों, या पारिवारिक सोप आपेरा हों। और उन पर विज्ञापनों की भी कमी नहीं है।

बात यहाँ ख़त्म नहीं होती, बल्कि शुरू होती है। सूचना तकनीक से संबद्ध हर बड़ी विदेशी कंपनी– चाहे माइक्रोसाफ़्ट हो, ऐपल हो, गूगल हो, फ़ेसबुक हो, नोकिया हो, सोनी हो– हिंदी के महत्व को समझ चुकी है। वह हिंदी ही को सबसे पहले और बाद में अन्य भारतीय भाषाओं के उपयोग और प्रयोग की सुविधाएँ मुहैया कराने में जी-जान से जुटी हैं। वे जानती हैं कि भारत के गाँव-गाँव तक, घर-घर तक, पहुँचना है, तो सामग्री स्थानीय भाषाओं में देनी होगी, लेकिन अपने देशी महाप्रबंधक गण अपने को बदलने के लिए तैयार नहीं हैं।

अब शब्‍दों का विश्‍व बैंक बनाने की तैयारी : अनुराग

अरविंद कुमार

अरविंद कुमार

84वें वर्ष में प्रवेश कर रहे (जन्‍म 17 जनवरी 1930) कोशकार अरविंद कुमार पर लेख-

आधुनिक काल में हिन्‍दी के पहले शब्‍दकोश ‘समांतर कोश’(1996), ‘द हिंदी-इंग्लिश इंग्लिश-हिंदी थिसारस ऐंड डिक्शनरी’(2007) जैसे महाग्रंथ और ‘अरविंद लैक्सिकन’(2011) के रूप में इंटरनैट पर विश्‍व को हिन्‍दी-अंग्रेजी के शब्‍दों का सबसे बड़ा ऑनलाइन ख़ज़ाना देने वाले अरविंद कुमार अब ‘शब्दों का विश्‍व बैंक’ बनाने की तैयारी में जुटे हैं।

उनके डाटाबेस में हिन्‍दी-इंग्लिश के लगभग 10 लाख शब्द हैं। यहाँ शब्द से मतलब है एक पूरी अभिव्यक्ति, उसमें शब्द चाहे कितने ही हों। जैसे : उत्थान पतन, आरोह अवरोह, ज्वार भाटा,, rise and fall, ascent descent, going up and down, tide and ebb, up and down; नभोत्तरित होना, उड़ान भरना, टेकऔफ़ करना, go up in the sky, rise in the sky; क्षेत्र के ऊपर से उड़ना, किसी के ऊपर से उड़ना, overfly, fly across, pass over – एक एक शब्द गिनें तो शब्द संख्या दस लाख से कहीं ऊपर हो जाएगी, अनुमानतः साढ़े बारह लाख।

शब्‍दों को लेकर उनका जुनून अभी भी कम नहीं हुआ है। कुछ दिन पहले किसी ने उनसे पूछा कि आपके डाटा में ‘तासीर’ शब्द है या नहीं। उन्‍होंने चेक किया। शब्द था ‘प्रभाव’ के अंतर्गत। यह उसका अर्थ होता भी है- जैसे दर्द की ‘तासीर’। वह चाहते तो इससे संतोष कर सकते थे, लेकिन उनका मन नहीं माना। हिन्‍दी में तासीर शब्द को उपयोग आम ज़िंदगी में है तो उसका संदर्भ ‘आहार’ या ‘औषध’ की आंतरिक प्रकृति या स्वास्थ्य पर उसके ‘प्रभाव’ के संदर्भ में होता है। उन्‍हें लगा कि इसके लिए एक अलग मुखशब्द बनाना ठीक रहेगा। उन्‍होंने सटीक इंग्लिश शब्द की तलाश शुरू कर दी। लेकिन इसमें उन्‍हें किसी कोश से कोई सहायता नहीं मिली। प्रोफ़ेसर मैकग्रेगर के ‘आक्सफ़र्ड हिंदी-इंग्लिश कोश’ में मिला– effect; action, manner of operation (as of a medicine)। लेकिन ‘तासीर’ के मुखशब्द के तौर इनमें से कोई भी शब्द रखना उन्हें ठीक नहीं लगा। इधर-उधर चर्चा भी की, लेकिन बात नहीं बन रही थी। अंततः वह शब्‍द गढ़ने में लग गये। कई दिन बाद ‘तासीर’ मुखशब्द के साथ अन्य शब्द जोड़ पाए–

तासीर, असर, क्रिया, परिणाम, प्रभाव, प्रवृत्ति, वृत्ति, उदाहरण :‘उड़द की तासीर ठंडी होती है अत: इसका सेवन करते समय शुद्ध घी में हींग का बघार लगा लेना चाहिए।’

effective trait, the manner in which a food item or medicine affects its consumer, effect, impact, manner of operation (as of a food item or medicine), nature, reactive nature, trait.

यह केवल एक उदाहरण है। उनके मन में हर रोज़ कुछ न कुछ नए विचार आते रहते हैं। जो भी नए शब्द सुनते और पढ़ते हैं, हर रोज़ उसे डाटा में ढूँढ़ते हैं और फिर उनके नए संदर्भ डालते हैं। कई बार रात में कुछ ख़याल में आता है। एक रात उनके मन मेँ gubernatorial शब्द उमड़ता घुमड़ता रहा। यह governor का विशेषण ।

गवर्नर के कई संदर्भ हैँ- administrator, प्रशासक; controller, नियंत्रक; electricity regulator, विद्युत रैगुलेटर; ruler, शासक; speed controller, गति नियंत्रक।

भारत में गवर्नर का प्रमुख राजनीतिक प्रशासनिक अर्थ है- representativeand observer of the central government in a state किसी राज्य मेँ केंद्र सरकार का प्रतिनिधि और प्रेक्षक। अमेरिका मेँ गवर्नर chief executive of a state है। वहां राष्ट्रपति की ही तरह इस पद के लिए भी चुनाव होता है। हमारे यहां यह प्रतिनिधि मात्र है, शासन का संचालक नहीं (यह काम हमारे यहां राज्य के मुख्यमंत्री का होता है)। हमारे यहां इसके कई पर्याय हैं जैसे- राज्यपाल, नवाब, निज़ाम, प्रांतपाल, सूबेदार, उप राज्यपाल, गवर्नर जनरल, चीफ़ कमिश्‍नर, मुख्य आयुक्त, लैफ़्टिनैंट गवर्नर, सदरे रियासत (जम्मू और कश्मीर) हैं।

अतः gubernatorial के लिए उन्‍हें एक स्वतंत्र मुखशब्द बनाने की आवश्‍यकता महसूस हुई। जब तक यह ससंदर्भ अपने आप में एक स्वतंत्र प्रविष्टि के तौर पर सही जगह नहीं रखा जाता, तब तक इसके विशेषण gubernatorial को उपयुक्त जगह नहीं रखा जा सकता। वह नहीं चाहते थे कि gubernatorial को ‘गति नियंत्रकीय’ से कनफ़्यूज़ करने का मौक़ा दिया जा जाए। उसके लिये सही जगह वहीं हो सकती है जहाँ उसका सही अर्थ स्पष्ट हो- राज्यपालीय,राज्यपाल विषयक।

आजकल वह डाटा के सम्‍बर्धन के अतिरिक्त परिष्कार और साथ-साथ शब्दों के अनेक रूपों को सम्मिलित करने का काम भी कर रहे हैं। जैसे- जाना के ये रूप जोड़ना- गई, गए, गया, गयी, गये, जा, जाइए, जाइएगा, जाए, जाएगी,जाएँगी, जाएंगी, जाएँगे, जाएंगे, जाओ, जाओगी, जाओगे, जाने, और go के लिए goes, going, went। (डाटा में ये सभी रूप अकारादि क्रम से रखे गए हैं।) क्‍योंकि हिन्‍दी में वर्तनी की कई पद्धतियाँ प्रचलित हैं, अतः ‘गई’ और ‘गए’ के साथ-साथ ‘गयी’ और ‘गये’ जैसे विकल्प भी जोड़ रहे हैं। ये पद्धतियाँ क्योंकि प्रचलित हैं तो इन्हें अशुद्ध भी नहीं कहा जा सकता। इस बारे में उनका कहना है कि ये भिन्न पद्धतियाँ हिन्‍दी के किसी भी सर्वमान्य वर्तनी जाँचक के बनने बहुत बड़ी बाधा हैं।

यह तो हुई क्रिया पदों के रूपोँ की बात। अब संज्ञाओं को लें तो गौरैया के लिए गौरैयाएँ, गौरैयाओँ, गौरैयाओं; प्रांत/प्रदेश के लिए प्रदेशोँ, प्रदेशों, प्रांतोँ, प्रांतों। (वर्तनी की अनेकरूपता यहाँ भी देखने को मिलती है- अनुनासिक और अनुस्वार के भिन्न प्रचलनोँ के कारण।)

सुबह पांच बजे से

उनका दिन सुबह पाँच बजे शुरू हो जाता है। लगभग सन् 1978 से। और तभी कुल्ला-मंजन कर के शुरू हो जाता है अपने डाटाबेस पर काम। काम सुबह पाँच बजे से शुरू हो कर शाम के लगभग साढ़े छह बजे तक चलता है। लेकिन लगातार नहीं। बीच-बीच मेँ छोटे-छोटे ब्रेक लेते रहते हैं। कभी शेव करने और नहाने के लिए, कभी नाश्ते के लिए, कभी यूँ ही ऊब मिटाने के लिए दस-पंद्रह मिनट, कभी दोपहर खाने के लिए। लगभग चार-पाँच बजे छोटा सा काफ़ी ब्रेक। और साढ़े छह बजे पूर्ण विराम। अब रात के साढ़े नौ बजे तक एकमात्र मनोरंजनपूर्ण कार्यक्रम ही देखते हैं। बीच मेँ आठ से साढ़े आठ बजे तक समाचार।

सर्दी के चार महीने वह बेटे सुमीत के पास आरोवील आ जाते हैं। आजकल वह सपत्‍नीक वहीं हैं। वहाँ उन्‍हें अख़बार सुविधा से नहीं मिल पाते। इसलिए सुबह काम के बीच कभी इंटरनैट पर इंग्लिश और हिन्‍दी समाचारोँ पर सरसरी नज़र डालना, कभी ई-मेल देखना और हर दिन लगभग पंद्रह-बीस मिनट फ़ेसबुक पर छोटी-मोटी टीका, मित्रों की मेल पर पसंद का निशान, किसी-किसी पर छोटी सी टिप्पणी भी उनकी दिनचर्या में शामिल है। निकट के नगर पुडुचेरी में कभी कभार ही कोई हिन्‍दी फ़िल्म आती है। अतः आरोवील में वह समय बच जाता है। कभी-कभी ऊब मिटाने के लिए टीवी पर पुरानी फ़िल्म देख कर काम चला लेते हैं।

चंद्रनगर (गाज़ियाबाद) में रहने के दौरान दिल्ली-गाज़ियाबाद क्षेत्र में बने सिनेमाघरों में अकसर सुबह 12 से पहले की फ़िल्में देखते हैं।

हम सब साथ-साथ

अरविंद कुमार पत्नी कुसुम कुमार, बेटी मीता और बेटे सुमीत के साथ।

अरविंद कुमार पत्नी कुसुम कुमार, बेटी मीता और बेटे सुमीत के साथ।

कोशकारिता के अपने जुनून के लिए अरविंद कुमार ने 1978 में ‘माधुरी’ की जमी-जमाई नौकरी छोड़ी। तब से वह केवल इसी काम में लगे हैं। किसी से कोई आर्थिक सहायता नहीं ली और कोई रचनात्‍मक सहयोग भी नहीं लिया। जो काम करोड़ों के बजट और लम्‍बे-चौड़े स्‍टॉफ के बाद भी कोई संस्‍था नहीं कर पा रही है, उसे अरविंद कुमार ने कर दिखाया।

अरविंद कुमार इतना बड़ा काम कर पाए इसकी एक वजह उन्‍हें परिवार का पूरा सहयोग मिलना ही है। वह बताते हैं कि अम्मा-पिताजी ने कभी उनके किसी फ़ैसले का विरोध नहीं किया। ‘सरिता’, ‘कैरेवान’ छोड़ी तो उन्होंने उनके निर्णय का स्वागत ही किया। ‘माधुरी’ के लिए मुंबई गए, तो वे ख़ुश थे। छोड़ कर आए तो भी ख़ुश। जो भी उन्‍होंने किया, उनकी अम्‍मा-पिताजी के लिए स्वीकार्य था।

उनके निजी परिवार एकक ने तो इससे भी आगे बढ़ कर, उनका काम में हाथ बँटाया। जब 1973 में ‘माधुरी’ की अच्छी ख़ासी नौकरी छोड़ने की बात की, तो पत्नी कुसुम ने बड़े उत्साह से उनका समर्थन किया, बल्कि बाद में पूरा सहयोग किया। आरम्‍भ में उनकी भूमिका अरविंद कुमार के बनाए कार्डों का इंडैक्स बनाने की थी। बाद में वह अरविंद कुमार की ही तरह हिन्‍दी कोश में ‘अ’ से ‘ह’ तक जाते-जाते वस्तुओं, वनस्पतियों और देवी-देवताओं के नामों को सही कार्ड बना कर दर्ज़ करने लगीं। अरविंद कुमार का कहना है कि ‘शब्देश्‍वरी’ (पौराणिक नामों का थिसारस) का ढाँचा मेरा है और अधिकांश शब्द तो कुसुम के ही हैँ– नाम हम दोनों का है।’

1976 में नासिक में गोदावरी नदी में सपरिवार स्नान कर के उन्‍होंने ‘समांतर कोश’ का शुभारंभ रिकार्ड करने के लिए एक कार्ड बनाया। उस पर पहले उन्‍होंने, फिर पत्‍नी कुसुम, बेटे सुमीत (सोलह साल) और बेटी मीता (दस साल) ने दस्तख़त किए। एक तरह से यह उन सब की सहभागिता का दस्तावेज बन गया। शायद यही कारण है कि जब भी सुमीत और मीता सहयोग करने लायक़ उम्र में पहुँचे तो अपनी-अपनी तरह से उनके काम के साथ जुड़ते गए।

अरविंद कुमार 1978 में ‘माधुरी’ की नौकरी छोड़कर सपरिवार दिल्ली मेँ मॉडल टाउऩ वाले घर में आ टिके। सुमीत का दाख़िला मुंबई के एक प्रतिष्ठित डॉक्टरी के कालिज में हो चुका था। वह पढ़ाई के दिनों वहीं रहते। मीता नवीं में सरकारी स्कूल में दाख़िल हो गईं। धीरे-धीरे सुमीत ने डॉक्टरी पढ़ाई में सर्जरी में दो गोल्ड मैडल जीते, और कुछ महीनों बाद वह दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में रैज़िडैंट सर्जन बन गए। वहाँ कंप्यूटर लगाए जा रहे थे। यहीं से ‘समांतर कोश’ के काम की तकनीक बदलने की शुरूआत हो गई। कंप्‍यूटर देखकर सुमीत की समझ में यह बात आ गई कि हम जो कार्डों पर काम कर रहे हैं, उस तरह तो वह काम कभी पूरा ही नहीं हो पाएगा। उन्‍होंने अपने पिताजी यानी अरविंद कुमार को इसके लिए सहमत करने की मुहिम ही चला दी।

अंततः अरविंद कुमार सहमत हुए। लेकिन कंप्यूटर के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। उधार लेने की हिम्मत भी नहीं थी, और संभावना भी नहीं थी। आख़िर कुछ बचत करने के लिए सुमीत ने साल-डेढ़ साल ईरान में काम ले लिया। यथावश्यक राशि जमा होते ही वापस आ गए।

1993 में कंप्यूटर ख़रीदा गया। अब उसके लिए साफ़्टवेयर चाहिए था जिसे प्रोग्राम कहते हैं। ‘समांतर कोश’ के लिए एक ख़ास तरह के प्रोग्राम की ज़रूरत होती है। यह प्रोग्राम डाटाबेस बनाता है– यानी विशेष प्रकार की सूची, तालिका। अकेला डाटाबेस बनना काफ़ी नहीं होता। उसे वाँछित रिपोर्ट में तब्दील करना होता है। इस काम के संदर्भ में- थिसारस बनाना। इन दोनों ही कामों के लिए अलग-अलग प्रोग्राम चाहिए होते हैं। ये दोनों ही क़ीमती होते हैं। और अरविंद कुमार के बूते से बाहर थे। अतः सुमीत ने ही हिम्मत की। उन्‍होंने किताबें पढ़-पढ़ कर जाना कि डाटाबेस बनाने के लिए उस समय फ़ाक्सप्रो नाम का प्रोग्राम सब से अच्छा है। इधर-उधर सम्‍पर्क बना कर उसका प्रबंध कर लिया। अब फ़ाक्सप्रो से क्या काम लेना है– यह अरविंद कुमार और सुमीत को तय करना था। फिर उस काम के लिए एक उपप्रोग्राम या कंप्यूटरी भाषा मेँ ऐप्लिकेशन लिखनी थी जो फ़ाक्सप्रो पर काम कर सके। अब फिर किताबें पढ़ कर ख़ुद ही सीख कर पहले एक प्रारंभिक ऐप्लीकेशन बनी। जैसे-जैसे ‘समांतर कोश’ की ज़रूरतें बढ़ती गईं, सुमीत उस में नए-नए मौड्यूल जोड़ता गए। अब तक अरविंद कुमार के पास 60,000 कार्डों पर ढाई लाख सुव्यवस्थित शब्द जुड़ चुके थे। उसको कंप्यूटरिकृत करने के लिए डाटा प्रविष्टि कर्मचारी रखा। वह बड़ा मेहनती निकला, और लगभग बेचूक टाइप करने वाला। लगभग नौ-दस महीनों मेँ उसने वह काम पूरा किया। अब और शब्द जोड़ने थे। 1951 से ही अरविंद कुमार हिन्‍दी में टाइपिंग करते आ रहे थे। ‘सरिता’, ‘कैरेवान’ में अपनी सभी रचनाएं उन्‍होंने टाइपराइटरों पर लिखी थीं। इसका फायदा यह हुआ कि उन्‍हें कंप्यूटर डाटा में नए शब्द जोड़ने में बहुत ज़्यादा समय नहीं लगा। इस बीच सुमीत बंगलौर में डॉक्टरी करने चला गए थे।

समांतर कोश का विमोचन करते राष्ट्रंपति शंकर दयाल शर्मा।

समांतर कोश का विमोचन करते राष्ट्रंपति शंकर दयाल शर्मा।

अतः अरविंद कुमार दंपति भी सुमीत के पास बंगलौर चले गए। वहाँ जाना इसलिए भी ज़रूरी था कि अब भी उन्‍हें नई आवश्यकताओं के लिए प्रोग्राम को परिष्कृत करवाना होता था और इसमें सुमीत सहायक थे। 1990 मेँ मीता की शादी हो चुकी थी। अतः वे सुमीत के पास जाने के लिए स्वतंत्र थे। 1994 में बंगलौर जा पहुँचे। वहां सितंबर 1996 को ‘समांतर कोश’ का काम पूरा हुआ। (इस बीच यह भी तय हो चुका था कि नेशनल बुक ट्रस्ट से किताब छपेगी।) पूरे ‘समांतर कोश’ के प्रिंट आउट निकालकर तीनों नेशनल बुक ट्रस्ट के निदेशक अरविंद कुमार (उनका नाम भी अरविंद कुमार था) को सौंपने दिल्ली आए। अक्‍टूबर में प्रिंटआउट दिए। प्रिंटआउट मिलते ही अरविंद कुमार (निदेशक, नेशनल बुक ट्रस्‍ट) ने मुद्रण विभाग को आदेश दिया कि कोई बड़ा प्रेस तीनों शिफ़्टोँ के लिए बुक कर लें। पाँच हज़ार कापियों के लिए काग़ज़ इकट्ठा ख़रीद लें ताकि सभी 1,800 से पेजों में एक सा काग़ज़ रहे और काग़ज़ न होने के बहाने छपाई न रोकनी पड़े। किताब दिसंबर तक आनी ही चाहिए– राष्ट्रपति जी को समर्पित करने की तारीख़ 13 दिसंबर वह पहले ही समय ले चुके थे– किसी और को बताए बग़ैर!

और इस तरह से ‘समांतर कोश’ के रूप में एक अनमोल खजाना हिन्‍दी को मिल गया। पर बात यहीं ख़त्म नहीं हुई। यह तो केवल पूर्वकथा सिद्ध हुई। सुमीत को सिंगापुर मेँ कंप्यूटर की नौकरी मिल गई। बंगलौर से अरविंद कुमार दंपति चंद्रनगर (गाज़ियाबाद) वापस आ गए।

मीता का कहना था कि  अपने डाटा में इंग्लिश शब्दों का समावेश करें। यह बेहद ज़रूरी है। वह इंग्लिश मीडियम से पढ़ रही अपनी बेटी तन्वी को हिन्‍दी सिखातीं तो इंग्लिश के हिन्‍दी शब्द और पर्याय नहीं मिल पाते थे। अरविंद कुमार तत्काल मीता से सहमत हो गए। काम को आगे बढ़ाने का ज़िम्मा भी मीता ने लिया– ‘समांतर कोश’ की एक प्रति पर हाशियों पर सभी मुखशब्दों के इंग्लिश अर्थ लिख दिए। यही ‘द पेंगुइन इंग्लिशहिंदी/हिंदीइंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी’ की शुरूआत बनी।

अब तक सुमीत सिंगापुर की एक साफ़्टवेयर कंपनी मेँ सीनियर वाइस प्रेज़िडैंट बन चुके थे, और मलेशिया की राजधानी क्वालालंपुर के एक अस्पताल के संचालन का कंप्यूटरन करवा रहे थे। अरविंद दंपति उसके पास गए तो वहीं उसने डाटा में इंग्लिश अभिव्यक्तियाँ शामिल करने की ऐप्लिकेशन की पहली प्रविधि लिखी।

कर्म आजीवन आनंद है

अरविंद कुमार के जीवन के तीन मंत्र हैं—

मेहनत मेहनत मेहनत या कहें तो कर्म कर्म कर्म। गीता का यह श्‍लोक हर जगह उद्धृत किया जाता है—

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

यहाँ कृष्ण केवल सकाम और निष्काम कर्म के संदर्भ में बात कर रहे हैं। अरविंद कुमार इसे इहलौकिक अर्थ के साथ कुछ और भी जोड़ कर देखते हैं। वह कहते हैं कि ‘कर्म करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। हमारा कर्म सफल होगा या नहीं, हमें इस की तो परवाह करनी ही नहीं चाहिए, हम काम पूरा कर पाएँगे या नहीँ– इसकी भी चिंता नहीं करनी चाहिए।’ वह अपने कई उदाहरण देते हैं, ‘दिल्ली आ कर काम शुरू करते ही हमारे घर मॉडल टाउन में भयानक बाढ़ आ गई। सात फ़ुट तक पानी भर आया। अगर हमारे कार्ड ऊपर मियानी में न होते, तो सारी मेहनत धरी धराई रह जाती। इसी प्रकार मुझे 1988 में बेहद भारी दिल का दौरा पड़ा। अगर मैं अस्पताल मेँ ही न होता तो बच नहीं पाता। गुमनाम मर जाता। ऐसी कई घटनाएं जीवन में घटती रहती हैं। यूँ मर भी जाता तो जहाँ तक मेरा सवाल है मैं कर्म करने का पूरा आनंद तो लगतार भोग रहा था। तो मैं कहता हूँ— कर्म आजीवन आनंद है।’

सपना शब्दों के विश्‍व बैंक का

उनका कोश अरविंद लैक्सिकन (http://arvindlexicon.com) इंटरनैट पर है। उनका कहना है कि पर यहीं रुका तो नहीँ जा सकता।

आजकल वह एक तरफ़ तो डाटा के संवर्धन और परिष्कार में लगे हैं तो साथ ही साथ अकारादि क्रम से आयोजित ‘हिंदी-इंग्लिश-हिंदी कोश’ के लिए प्रविष्टियों का चयन कर रहे हैं। ऐसे थिसारसों में इंडैक्स की ज़रूरत नहीं होती। अतः वे अपनी सहजता के कारण लोकप्रिय होते जा रहे हैं। (राजकमल से प्रकाशित उनका ‘अरविंद सहज समांतर कोश’ की लोकप्रियता इसका सबूत है।) अब वह ऐसा द्विभाषी कोश-थिसारस बनाना चाहता हैं, जो कालिज तक के छात्रों की सभी ज़रूरतें पूरी कर सके। उनका विश्‍वास है कि यह काम मार्च, 2013 तक पूरा हो जाएगा।

अरविंद कुमार के कई सपने हैं। उनमें एक महान सपना है ‘शब्दोँ का विश्‍व बैंक’ यानी वर्ल्ड बैंक आफ़ वर्ड्स। उनका कहना है कि ‘यह अभी परिकल्पना और आधारभूत काम करने की स्थिति में है। एक बात ज़ाहिर है यह काम मेरे जीवन मेँ पूरा होना सम्‍भव नहीं है। मेरा काम है इस का आधार तैयार खड़ा करना। काम शुरू होने के बाद कई पीढ़ियाँ ले सकता है और इसके लिए अंतररष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता होगी। समय सीमा तो बन ही नहीं सकती। समांतर कोश के लिए दो साल की सीमा तय की थी। लग गए बीस साल! अभी तो विश्‍व शब्दबैंक की परिकल्पना का आधार जानना बेहतर है। मेरे पास हिन्‍दी और इंग्लिश अभिव्यक्तियों का विश्‍व में सब से बड़ा डाटा है। अब हिन्‍दी के माध्यम से हम भारत की सभी भाषाएं जोड़ सकते हैं। इंग्लिश डाटा के सहारे बाहर की भाषाएं मिलाई जा सकती हैं। भारत में सब से पहले मैं दक्षिण की सर्वप्रमुख भाषा तमिल से आरम्‍भ करना चाहूँगा–  इसके लिए तमिल सहयोगियों की तलाश निजी स्तर पर चल रही है। विदेशी भाषाओं में प्राथमिकता संयुक्त राष्ट्रमंडल की किसी भी आधिकारिक भाषाओं को दी जाएगी। फ्राँसीसी पहले आनी चाहिए।
‘इस परिकल्पना का आधार है यूनिकोड का अवतरण। इसके आने के बाद ही यह सोच पाना सम्‍भव हो सकता था। ऐसे किसी बैंक का महाडाटा बनने का सब से बड़ा लाभ यह होगा कि हम जब चाहें संसार की किन्हीं दो या अधिक भाषाओँ के थिसारस-कोश बना सकेंगे–  जैसे तमिल-हिन्‍दी-फ़्राँसीसी, या भारत की बात लें तो ज़रूरत हो तो गुजराती-बांग्ला-हिन्‍दी, या फिर मलयालम-हिन्‍दी…।’
उनका कहना है कि इस परिकल्पना का तकनीकी आधार है– हमारी विकसित शब्द-तकनीक। इस के ज़रिए हम अपने डाटा में अनगिनत भाषाएं और अनगिनत शब्दकोटियाँ समो सकते हैं। यह  प्रविधि बनाई है डॉक्‍टर सुमीत कुमार ने। और यह लगातार विकसित होती रह सकती है। अभी अरविंद कुमार डाटा को अपडेट करते हैं। उनका कहना कि यह एक निरंतर प्रक्रिया है। अगले साल तक इसके लिए कोई प्रणाली विकसित हो पाएगी।

अरविंद लिंग्विस्टिक्स प्रा. लि. की स्‍थापना

अरविंद कुमार ने अक्‍टूबर 2010 में कम्‍पनी अरविंद लिंग्विस्टिक्स प्रा. लि. की स्‍थापना की। कंपनी का उद्देश्य है भारतीय भाषाओं को संसार भर में ले जाना। अरविंद कुमार इसके संस्थापक और शब्‍द संकलन प्रमुख हैं। अन्य सदस्य हैं कुसुम कुमार, सुमीत और मीता लाल। मीता लाल कम्‍पनी की सीईओ हैं। सुमीत इसके तकनीकी पक्ष के अध्यक्ष हैं।
यह कम्‍पनी अ‍रविंद कुमार के सभी कोशों और अन्य रचनाओं की सर्वाधिकारी है। इसने पेंगुइन से उनकी पुस्तक ‘द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐँड डिक्शनरी’ के सभी अधिकार ले लिए हैं। इस पुस्तक की बिक्री यही कम्‍पनी कर रही है।
अरविंद कुमार की कई पुस्तकें राजकमल प्रकाशन समूह से प्रकाशित हुई हैं। उन सब पर उनका सर्वाधिकार है, प्रकाशकों के पास केवल एक बार तीन साल के लिए मुद्रण अधिकार है। उनमें एक ‘सहज समांतर कोश’  के बारे में उनका एग्रीमैंट कुछ इस प्रकार का है– यदि वे लोग हर तीन साल मेँ एक नियत संख्या में किताब बेच पाए तो अगले तीन सालों के लिए उन्हें उसके पुनर्मुद्रण का अधिकार मिल जाएगा। अतः यह कोश उनके पास चलता रहेगा।
नेशनल बुक ट्रस्ट से ‘समांतर कोश’ वापस लेने की उनकी कोई इच्छा नहीं है। अब तक एनबीटी उसके छह मुद्रण कर चुका है।
21 जून 2011 की शाम को अरविंद कुमार को दिल्ली की हिन्‍दी अकादेमी ने शलाका सम्मान दिया, उसी दिन थाईलैंड से उन के पुत्र डॉ. सुमीत कुमार ने अरविंद लैक्सिकन को www.arvindlexicon.com  पर ऑनलाइन कर दिया।

अरविंद कुमार अकारादि क्रम से संयोजित इंग्लिश-हिन्‍दी और हिन्‍दी-इंग्लिश थिसारसों पर भी काम कर रहे हैं। ये पुस्तकें उनकी कम्‍पनी 2013-14 में प्रकाशित कर पाएगी। इन कोशों की एक ख़ूबी है इंग्लिश में भारतीय शब्द बड़े पैमाने पर संकलन। उनका कहना है कि हमारे छात्र कब तक ऐसे इंग्लिश कोशों पर निर्भर करते रहेंगे जिन में हमारी संस्कृति ही न हो।

हिन्दी फ़िल्म अध्ययन: ‘माधुरी’ का राष्ट्रीय राजमार्ग : रवि‍कांत

रवि‍कांत

‘माधुरी’ अपने क़िस्म की अनूठी लोकप्रिय पत्रिका थी। पिछली सदी के सातवें दशक के मध्य में कोशकार अरविंद कुमार ने इसका संपादन कि‍या। उस दौर की ‘माधुरी’ को लेकर इति‍हासकार और सीएसडीएस के एसोसि‍एट फेलो रवि‍कांत का यह शोधपरक लेख बहुत महत्‍वपूर्ण है। यह लेख ‘लोकमत समाचार’ के दीवाली वि‍शेषांक, 2011 में प्रकाशि‍त हुआ। आभार सहि‍त यह लेख दि‍या जा रहा है-

बहुतेरे लोगों को याद होगा कि टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह की फ़िल्म पत्रिका ‘माधुरी’ हिन्दी में निकलने वाली अपने क़िस्म की अनूठी लोकप्रिय पत्रिका थी, जिसने इतना लम्‍बा और स्वस्थ जीवन जिया। पिछली सदी के सातवें दशक के मध्य में अरविंद कुमार के संपादन में ‘सुचित्रा’ नाम से बंबई से शुरू हुई इस पत्रिका के कई नामकरण हुए, वक़्त के साथ संपादक भी बदले, तेवर-कलेवर, रूप-रंग, साज-सज्जा,मियाद व सामग्री बदली तो लेखक-पाठक भी बदले, और जब नवें दशक में इसका छपना बंद हुआ तो एक पूरा युग बदल चुका था।[1] इसका मुकम्मल सफ़रनामा लिखने के लिए तो एक भरी-पूरी किताब की दरकार होगी, लिहाजा इस लेख में मैं सिर्फ़ अरविंद कुमार जी के संपादन में निकली ‘माधुरी’ तक महदूद रहकर चंद मोटी-मोटी बातें ही कह पाऊँगा। यूँ भी उसके अपने इतिहास में यही दौर सबसे रचनात्मक और संपन्न साबित होता है।

‘माधुरी’ से तीसेक साल पहले से ही हिन्दी में कई फ़िल्मी पत्रिकाएँ निकल कर बंद हो चुकी थीं, कुछ की आधी-अधूरी फ़ाइलें अब भी पुस्तकालयों में मिल जाती हैं, जैसे, ‘रंगभूमि’ ‘चित्रपट’, ‘मनोरंजन’ आदि। ये जानना भी दिलचस्प है कि हिन्दी की साहित्यिक मुख्यधारा की पत्रिकाओं- मसलन, ‘सुधा’, सरस्वती’, ‘चाँद’, ‘माधुरी’ – में भी जब-तब सिनेमा पर गंभीर बहस-मुबाहिसे, या, चूँकि चीज़ नई थी, बोलती फ़िल्मों के आने के बाद व्यापक स्तर पर लोकप्रिय हुआ ही चाहती थी, तो सिनेकला के विभिन्न आयामों से ता’रुफ़ कराने वाले लेख भी छपा करते थे। फ़िल्म माध्यम की अपनी नैतिकता से लेकर इसमें महिलाओं और साहित्यकारों के काम करने के औचित्य, उसकी ज़रूरत, भाषा व विषय-वस्तु,नाटक/पारसी रंगकर्म/साहित्य से इसके संबंध से लेकर विश्व-सिनेमा से भारतीय सिनेमा की तुलना,सेंसरशिप, पौराणिकता, श्लीलता-अश्लीलता, सार्थकता/अनर्थकता/सोद्देश्यता आदि नानाविध विषयों पर जानकार लेखकों ने क़लम चलाई।[2] इनमें से कुछ शुद्ध साहित्यकार थे, पर ज़्यादातर फ़िल्मी दुनिया से किसी न किसी रूप से जुड़े लेखक ही थे। इन लेखों से हमें पता चलता है कि पहले भले हिन्‍दू घरों की औरतों का फ़िल्मी नायिका बनना ठीक नहीं समझा जाता था, वैसे ही जैसे कि उनका नाटक करना या रेडियो पर गाना अपवादस्वरूप ही हो पाता था। पौराणिक-ऐतिहासिक भूमिकाएँ करने वाली मिस सुलोचना, मिस माधुरी आदि वस्तुत: ईसाई महिलाएँ थीं, जिन्होंने बड़े दर्शकवर्ग से तादात्म्य बिठाने के लिए अपने नाम बदल लिए थे। पारसी थियेटर का सूरज डूबने लगा था, ऐसी स्थिति में रेडियो या सिनेमा के लिए गानेवालियाँ ‘बाई’ या ‘जान’ के प्रत्यय लगाने वाली ही हुआ करती थीं। पुराने ग्रामोफोन रिकॉर्डों पर भी आपको वही नाम ज़्यादातर मिलेंगे। अगर आपने अमृतलाल नागर की बेहतरीन शोधपुस्तक ‘ये कोठेवालियाँ’[3] पढ़ी है, तो आपको अंदाज़ा होगा कि मैं क्या अर्ज़ करने की कोशिश कर रहा हूँ। हिन्दी लेखकों ने ज़्यादा अनुभवी नारायण प्रसाद ‘बेताब’ या राधेश्याम कथावाचक या फिर बलभद्र नारायण ‘पढ़ीस’ की इल्तिजा पर ग़ौर न करते हुए[4] प्रेमचंद जैसे लेखकों के मुख़्तसर तजुर्बे पर ज़्यादा ध्यान दिया, जो कि हक़ीक़तन कड़वा था। उन्होंने आम तौर पर फ़िल्मी दुनिया को भ्रष्ट पूंजीपतियों की अनैतिक अय्याशी का अड्डा माना, माध्यम को संस्कार बिगाड़ने वाला ‘कुवासना गृह’ समझा, उसे छापे की दुनिया में होने वाले घाटे की भरपाई करके वापस वहीं लौट आने के लिए थोड़े समय के लिए जाने वाली जगह समझा। पर पूरी तरह चैन भी नहीं कि उर्दू वालों ने एक पूरा इलाक़ा क़ब्ज़िया रखा है। हिन्दी और उर्दू के साहित्यिक जनपद के बुनियादी फ़िल्मी रवैये में अगर फ़र्क़ देखना चाहते हैं तो मंटो को पढ़ें, फिर उपेन्द्रनाथ अश्क और भगवतीचरण वर्मा के सिनेमाई संस्मरण, रेखाचित्र या उपन्यास पढ़ें।[5] भाषा के सवाल पर गांधी जी से भी दो-दो हाथ कर लेने वाले हिन्दी के पैरोकार, अपवादों को छोड़ दें तो, अपने सिनेमा-प्रेम के मामले में काफ़ी समय तक गांधीवादी ही रहे।

बेशक स्थिति धीरे-धीरे बदल रही थी, पर 1964 में जब ‘माधुरी’ निकली तब तक इसके संस्थापक संपादक के अपने अल्फ़ाज़ में ‘‘सिनेमा देखना हमारे यहाँ क़ुफ़्र समझा जाता था।’’ उन्होंने इस क़ुफ़्र सांस्कृतिक कर्म को हिन्दी जनपद में पारिवारिक-समाजिक स्वीकृति दिलाने में अहम ऐतिहासिक भूमिका अदा की। ‘माधुरी’ ने कई बड़े-छोटे पुल बनाए, जिसने सिनेमा जगत और जनता को तो आपस में जोड़ा ही, सिनेमा को साहित्य और राजनीतिक गलियारों से, विश्व-सिनेमा को भारतीय सिनेमा से, हिन्दी सिनेमा को अहिन्दी सिनेमा से, और सिनेमा जगत के अंदर के विभिन्न अवयवों को भी आपस में जोड़ा। पत्रिका की टीम छोटी-सी थी, और इतनी बड़ी तादाद में बन रही फ़िल्मों की समीक्षा, उनके बनने की कहानियों, फ़िल्म समाचारों, गीत-संगीत की स्थिति, इन सबको अपनी ज़द में समेट लेना सिर्फ़ ‘माधुरी’ की अपनी टीम के ज़रिय संभव नहीं था। अपनी लगातार बढ़ती पाठक संख्या का रुझान भाँपते हुए, उसके सुझावों से बराबर इशारे लेते हुए ‘माधुरी’ ने उनसे सक्रिय योगदान की अपेक्षा की और उसके पाठकों ने उसे निराश नहीं किया। प्रकाशन के तीसरे साल में प्रवेश करने पर छपा यह संपादकीय इस संवाद के बारे में बहुत कुछ कहता है:

हिन्दी में सिनेपत्रकारिता सभ्य, संभ्रांत और सुशिक्षित परिवारों द्वारा उपेक्षित रही है। सिनेमा को ही अभी तक हमारे परिवारों ने पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है। फ़िल्में देखना बड़े-बूढ़े उच्छृंखलता की निशानी मानते हैं। कुछ फ़िल्मकारों ने अपनी फ़िल्मों के सस्तेपन से इस धारणा की पुष्टि की है। ऐसी हालत में फ़िल्म पत्रिका का परिवारों में स्वागत होना कठिन ही था।

सिनेमा आधुनिक युग का सबसे महत्वपूर्ण और आवश्यक मनोरंजन बन गया है। अत: इससे दूर भागकर समाज का कोई भला नहीं किया जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि हम इसमें गहरी रुचि लेकर इसे सुधारें, अपने विकासशील राष्ट्र के लायक़ बनाएँ। नवयुवक वर्ग में सिनेमा की एक नयी समझ उन्हें स्वस्थ मनोरंजन का स्वागत करने की स्थिति में ला सकती है। इसके लिए जिम्मेदार फ़िल्मी पत्र-पत्रिकाओं की आवश्यकता स्पष्ट है। मैं कोशिश कर रही हूँ फ़िल्मों के बारे में सही तरह की जानकारी देकर मैं यह काम कर सकूँ। परिवारों में मेरा जो स्वागत हुआ है उसको देख कर मैं आश्वस्त हूँ कि मैं सही रास्ते पर हूँ। आत्मनिवेदन: (11 फ़रवरी, 1966)।

इस आत्मनिवेदन को हम पारंपरिक उच्च-भ्रू संदर्भ की आलोचना के साथ-साथ पत्रिका के घोषणा-पत्र और इसकी अपनी आकांक्षाओं के दस्तावेज़ के रूप में पढ़ सकते हैं। पत्रिका गुज़रे ज़माने के पूर्वग्रहों से जूझती हुई नयी पीढ़ी से मुख़ातिब है, सिनेमा जैसा है, उसे वैसा ही क़ुबूल करने के पक्ष में नहीं, उसे ‘विकासशील राष्ट्र के लायक़’ बनाने में अपनी सचेत जिम्मेदारी मानते हुए पारिवारिक तौर पर लोकप्रिय होना चाहती है। कहना होगा कि पत्रिका ने घोर आत्मसंयम का परिचय देते हुए पारिवारिकता का धर्म बख़ूबी निभाया, लेकिन साथ ही ‘करणीय-अकरणीय’ की पारिभाषिक हदों को भी आहिस्ता-आहिस्ता सरकाने की चतुर कोशिशें भी करती रही। भले ही इस मामले में यह अपने भगिनी प्रकाशन ‘फ़िल्मफ़ेयर’-जैसी ‘उच्छृंखल’ कम से कम समीक्षा-काल में तो नहीं ही बन पाई। बक़ौल अरविंद कुमार,जब पत्रिका की तैयारी चल रही थी, तो ‘सुचित्रा’ की पहली प्रतियाँ सिनेजगत के कई बुज़ुर्गों को दिखाई गईं। उनमें से वी शांताराम की टिप्पणी थी कि इस पर ‘फ़िल्मफ़ेयर’ का बहुत असर है। यह बात अरविंद जी को लग गई गई, और उन्हें ढाढ़स भी मिला। लिहाज़ा, ‘माधुरी’ ने अपना अलग हिन्दीमय रास्ता अख़्तियार किया, और मालिकों ने भी इसे पर्याप्त आज़ादी दी। अनेक मनभावन सफ़ेद स्याह, और कुछ रंगीन चित्रों और लोकार्षक स्तंभों से सज्जित ‘माधुरी’ जल्द ही संख्या में विस्तार पाते बड़े-छोटे शहरों के हिन्दी-भाषी मध्यवर्ग की अनिवार्य पत्रिका बन गई, जिसमें इसके शाफ़-शफ़्फ़ाफ़ और मेहनतपसंद संपादन- मसलन, प्रूफ़ की बहुत कम ग़लतियाँ होना – का भी हाथ रहा ही होगा। यहाँ ‘मध्यवर्ग की पत्रिका’ का लेबल चस्पाँ करते हुए हमें उन चाय और नाई की दुकानों को नहीं भूलना चाहिए, जहाँ पत्रिका को व्यापकतर जन समुदाय द्वारा पढ़ा-देखा-पलटा-सुना जाता होगा। अभाव से प्रेरित ही सही, लेकिन हमारे यहाँ ग्रामोफोन से लेकर सिनेमा-रेडियो-टीवी, पब्लिक फोन, और इंटरनेट(सायबर कैफ़े, ई-चौपाल) तक के आम अड्डों में सामूहिक श्रवण-वाचन-दर्शन-विचरण का तगड़ा रिवाज रहा है। संगीत रसास्वादन वॉकमैन और मोबाइल युग में आकर ही निजी होने लगा है। तो इस वृहत्तर पाठक-वर्ग तक फ़िल्म जैसे माध्यम को संप्रेषित करने के लिए माक़ूल शब्दावली जुटाने में मौजूदा शब्दों में नये अर्थ भरने से लेकर नये शब्दों की ईजाद तक की चुनौती संपादकों और लेखकों ने उठाई लेकिन अपरिचित को जाने-पहचाने शब्दों  और साहित्यिक चाशनी में लपेट कर कुछ यूँ परोसा कि पाठकों ने कभी भाषायी बदहज़मी की शिकायत नहीं की। शब्दों से खेलने की इस शग़ल को गंभीरता से लेते हुए अरविंद जी ने अगर आगे चलकर शब्दकोश-निर्माण में अपना जीवन झोंक दिया तो किमाश्चर्यम, कि यह काम भी क्या ख़ूब किया![6]

सिनेजनमत सर्वेक्षण

बहरहाल, पूछने लायक़ बात है कि माधुरी के लिए सिनेमा के मायने क्या थे। ऊपर के इशारे में ही जवाब था – विशद-विस्तृत। पत्रिका ने न केवल दुनिया-भर में बन रहे महत्वपूर्ण चित्रों या चित्रनिर्माण की कलात्मक-व्यावसायिक प्रवृत्तियों पर अपनी नज़र रखी, बल्कि कैसे बनते थे/बन रहे हैं,  इनका भी गाहे-बगाहे आकलन पेश किया, ताकि फ़िल्मी दुनिया में आने की ख़्वाहिश रखने वाले – लेखक, निर्देशक,अभिनेता, गायक – ज़रूरी हथियारों से लैस आएँ, या जो नहीं भी आएँ, वे जादुई रुपहले पर्दे के पीछे के रहस्य को थोड़ा बेहतर समझ पाएँ। इस लिहाज से ये ग़ौरतलब है कि ‘माधुरी’ ने अपने पन्नों में सिर्फ़ अभिनेता-अभिनेताओं को जगह नहीं दी, बल्कि तकनीकी कलाकारों – छायाकारों, ध्वनि-मुद्रकों और ‘एक्स्ट्राज़’ को भी, ठीक वैसे ही जैसे कि महमूद जैसे ‘हास्य’-अभिनेताओं को आवरण पर डालकर, या फ़िल्म और टेलीविज़न इंस्टीट्यूट, पुणे से उत्तीर्ण नावागंतुकों की उपलब्धियों को समारोहपूर्वक छापकर अपनी जनवादप्रियता का पता दिया। उनकी कार्य-पद्धति समझाकर, उनकी मुश्किलों, मिहनत को रेखांकित करते हुए उनकी मानवीयता की स्थापना कर सिनेमा उद्योग के इर्द-गिर्द जो नैतिक ग्रहण ज़माने से लगा हुआ था, उसको काटने में मदद की।

इस सिलससिले में घुमंतू परिचर्चाओं की दो शृंखलाएँ मार्के की हैं- पहली, जब ‘माधुरी’ ने मुंबई महानगरी से निकलकर अपना रुख़ राज्यों की राजधानियों और उनसे भी छोटे शहरों की ओर किया ये टटोलने के लिए कि वहाँ के बाशिंदे बन रही फ़िल्मों से कितने मुतमइन हैं, उन्हें उनमें और क्या चाहिए, क्या नहीं चाहिए, आदि-आदि। जवाब में मध्यवर्गीय समाज के वाक्पटु नुमाइंदों ने अक्सरहाँ फ़िल्मों की यथास्थिति से असंतोष जताया, अश्लीलता और फ़ॉर्मूलेबाज़ी की भर्त्सना की, सिनेमा के साहित्योन्मुख होने की वकालत की। इन सर्वेक्षणों के आयोजन में ज़ाहिर है कि ‘माधुरी’ का अपना सुधारवादी एजेंडा था, लेकिन इनसे हमें उस समय के फ़िल्म-प्रेमियों की अपेक्षाओं का भी पता मिलता है। हमारे पास उनकी आलोचनाओं को सिरे से ख़ारिज करने के लिए फ़िलहाल ज़रूरी सुबूत नहीं हैं, लेकिन ये सोचने का मन करता है कि इन पिटी-पिटाई, और एक हद तक अतिरेकी प्रतिक्रियाओं में उस ढोंगी, उपदेशात्मक सार्वजनिक मुखौटे की भी झलक मिलती है, जो अक्सरहाँ जनता के सामने आते ही लोग ओढ़ लिया करते हैं, भले ही सिनेमा द्वारा परोसे गए मनोरंजन का उन्होंने भरपूर रस लिया हो। मामला जो भी हो, ‘माधुरी’ ने अपने पाठकों को भी यदा-कदा टोकना ज़रूरी समझा : मसलन, फ़िल्मों में अश्लीलता को लेकर हरीश तिवारी ने जनमत से बाक़ायदा जिरह की और उसे उचित ठहराया।[7] उस अंक में तो नहीं,लेकिन गोया एक सामान्य संतुलन बनाते हुए लतीफ़ घोंघी ने हिन्दी सिनेमा के तथाकथित फ़ोहश दृश्यों की एक पूरी परंपरा को दृष्टांत दे-देकर बताना ज़रूरी समझा। लेकिन फिल्मेश्वर ने चुंबनांकन को लेकर जो मख़ौलिया खिलवाड़ किस न करने वाली भारतीय संस्कृति के साथ किया, वह तो अद्भुत था।[8] थोड़े मुख़्तलिफ़ तरह का एक दूसरा सर्वेक्षण भौगोलिक था। याद कीजिए कि उस ज़माने में कश्मीर फ़िल्मकारों का स्वर्ग जैसा बन गया था। एक के बाद एक कई फ़िल्में बनी थीं, जिनका लोकेशन वही था, और पूरा कथानक नहीं तो कम-से-कम एक-दो गाने तो वहाँ शूट कर ही लिए जाते थे।[9] जान पड़ता है कि लोगों को कश्मीर के प्रति निर्माताओं की यह आसक्ति थोड़ी-थोड़ी ऊब देने लगी थी। माधुरी ने एक पूरी श्रृंखला ही समूचे हिन्दुस्तान की उन अनजान आकर्षक जगहों पर कर डाली जहाँ फ़िल्मों को शूट किया जा सकता है, बाक़ायदा सचित्र और स्थानीय इतिहास और सुविधाओं की जानकारियों मुहैया कराते हुए। इस तरह ‘भावनात्मक एकता’ का जो नारा मुल्क के नेताओं और बुद्धिजीवियों ने उस ज़माने में बुलंद किया था,  उसकी किंचित वृहत्तर परिभाषा कर कश्मीरेतर दूर-दराज़ की जगहों को फ़िल्मों के भौतिक साँचे में ढालने की ठोस वकालत माधुरी ने बेशक की।

सिनेमाहौल और नागर चेतना

चलिए, आगे बढ़ें। सिनेमाघरों की दशा पर केन्द्रित माधुरी का तीसरा सर्वेक्षण अपेक्षाकृत ज़्यादा दिलचस्प था। इसकी प्रेरणा पाठकों से मिले शिकायती ख़तों से ही आई मालूम पड़ती है: जब पत्रों में अपने शहर के सिनेमा हॉल के हालात को लेकर करुण-क्रंदन थमा नहीं तो ‘माधुरी’ ने उसे एक वृहत्तर अनुष्ठान और मुहिम का रूप दे दिया। इस मुहिम की अहमियत समझने के लिए आजकल की मल्टीप्लेक्स-सुविधा-भोगी हमारी पीढ़ी[10] को मनसा उस ज़माने में और उन छोटे शहरों में लौटना होगा, जब सिनेमा देखने को ही समाज में सम्मानजनक नहीं माना जाता था तो देखनेवालों को सिने-मालिक लुच्चा-लफ़ंगा मान लें तो उनका क्या क़ुसूर। जैसे दारू के ठेकों पर सिर-फुटव्वल आम बात थी, या है, वैसे ही पहले दिन/पहले शो में हॉल के बाहर टिकट खिड़की पर लाठियाँ चल जाना भी कोई अजीब बात नहीं होती थी। आप ख़ुद देखिए, लोगों ने फ़िल्म देखने के लिए कितने त्याग किए हैं,पूंजीवादी समाज की कैसी बेरुख़ी झेली है, एक-दूसरे को कितना प्रताड़ित किया है। ‘माधुरी’ का शुक्रिया कि इसने सिनेमा हॉल को साफ़-सभ्य-सुसंस्कृत-पारिवारिक जगह बनाने की दिशा में पहल तो की।[11]नीचे पेश है एक बानगी उज्जैन, झाँसी, कानपुर, जमशेदपुर जैसे शहरों से दर्ज शिकायतनामों की। चक्रधरपुर, बिहार, से किसी ने लिखा कि हॉल में पीक के धब्बों और मूँगफली के छिलकों की सजावट आम बात है। सीटों पर नंबर नहीं और, लोग तो जैसे ‘धूम्रपान निषेध’ की चेतावनी देखते ही नहीं। फ़िल्म प्रभाग के वृत्तचित्र हमेशा अंग्रेज़ी में ही होते हैं, और जनता राष्ट्रगान के समय भी चहलक़दमी करती रहती है।( 8 सितंबर,1967)। इसी अंक में होशंगाबाद से ख़बर है कि किसी ने गोदाम को सिनेमा हॉल बना दिया है, पीने को पानी नहीं है, हाँ, खाने की चीज़ ख़रीदने पर ज़रूर ‘मुफ़्त’ मिल जाता है। फ़रियादी की दरख़्वास्त है कि महीने में कम-से-कम एक बार तो कीटनाशक छिड़का जाए, मूतरियों को साफ़ रखा जाए, और टिकट ख़रीदने के बाद के इंतज़ार को आरामदेह बनाया जाए। झाँसी से एक जनाब फ़रमाते हैं कि वहाँ दो-ढाई लाख की आबादी में कहने को तो सात सिनेमाघर हैं, लेकिन एक को छोड़कर सब ख़स्ताहाल। फटी सीटें, पीला पर्दा, गोया किसी फोटोग्रॉफर का स्टूडियो हो; लोग बहुत शोर मचाते हैं, जैसे ही बिजली जाती है या रील टूटती है, ‘कौन है बे’ की आवाज़ के साथ सीटियों का सरगम शुरू हो जाता है; गेटकीपर ख़ुद ब्लैक करता है और मना करने पर रौब झाड़ता है; पार्किंग में भी टिकट मिलता है,लेकिन साइकिल वहीं लगाने पर; अंग्रेज़ी-हिन्दी दोनों ही फ़िल्में काफ़ी देर से लगाई जाती हैं। ‘महारानी लक्ष्मीबाई ने नगर’ के इस शिकायती ने क्रांतिकारी धमकी के साथ अपनी बात ख़त्म की : अगर संबंधित अधिकारी कुछ नहीं करते तो झाँसी की जनता को फ़िल्म देखना छोड़ देना पड़ेगा। वाह! इसी तरह तीन सिनेमाघरों वाले बीकानेर से एक जागरूक सज्जन ने लिखा: एक हॉल तो कॉलेज से बिल्कुल सटा हुआ है, टिकटार्थियों की क़तार सड़क तक फैल जाती है, ब्लैक वालों के शोर-ओ-गुल से कक्षाएँ बाधित होती हैं; फ़र्स्ट क्लास की सीटें भी जैसे कष्ट देने के लिए ही बनाई गई हैं, एयरकंडीशनिंग ऐसी कि उससे बेहतर धूप में रहें, कभी सफ़ाई नहीं होती, कचरे के ढेर लगे होते हैं; तीसरे सिनेमा हॉल में तो बालकनी की हालत फ़र्स्ट क्लास से भी बदतर है।  फ़र्स्ट क्लास का दर्शक जब सिनेमा देखने में मग्न हो तब अचानक ऐसा लगता है कि किसी सर्प ने काट खाया हो या इंजेक्शन लगा दिया गया हो।  बरबस दर्शक उछल पड़ता है। पीछे देखता है तो मूषकदेव कुर्सियों पर विराजमान हैं। हॉल में कई चूहों के बिल देखने को मिल सकते हैं। सरदार शहर के एक सिनेमची ने शिकायत की कि वहाँ हॉल के अति सँकरे दरवाज़े से घुसने के बाद दर्शक और बदरंग पर्दे के बीच में दो-एक खंभे खड़े होकर फ़िल्म देखते हैं, ध्वनि-यंत्र ख़राब है, उससे ज़्यादा शोर तो छत से लटके पंखे कर देते हैं; बारिश में छत चूती है,कुर्सियों के कहीं हाथ तो कहीं पैर नहीं, कहीं पीठ ही ग़ायब है; आदमी ज़्यादातर ख़ुद को सँभालता रहता है: कोई नया हॉल बनाना भी चाहे तो लाइसेन्स नहीं मिलता। दरभंगा से रपट आई कि चार में से तीन सिनेमाहॉल तो ‘उच्च वर्गों’ के लिए हैं ही नहीं; नेशनल टॉकीज़ पूरा कबूतरख़ाना है; लोग हॉल में आकर अपनी सीट से ही टिकट ख़रीदते हैं, सीट संख्या नहीं होने पर काफ़ी कोहराम मचा होता है; ‘मेरा साया’ शुरू हुआ तो पंखे की छड़ ऐन पर्दे पर नमूदार हो गई, और जिस तरह की फ़िल्म थी, हमें लगा ज़रूर कुछ रहस्य है इस साये में! लेकिन बात हँसने वाली नहीं। कौन इनका हल करेगा – सरकार या व्यवस्थापक ? कोई नहीं, क्योंकि उनकी झोलियाँ तो भर ही रही हैं। सिनेमा का बहिष्कार ही एकमात्र रास्ता बचता है। ‘एप्रील फ़ूल’ देखकर आए गुरदासपुर के एक सचेत नागरिक ने हॉल वालों को तो आड़े हाथों लिया ही कि वहाँ निर्माण कार्य कभी बंद ही नहीं होता और पुराने प्रॉजेक्टर का शोर असह्य है, साथ ही दर्शकों के व्यवहार से भी घोर असंतोष ज़ाहिर किया:  ‘कामुक दृश्यों पर भद्दी आवाज़ों का शोर तमाम नैतिक मापदंडों की हत्या करके भी शांत नहीं होता। शायद यही कारण है कि कोई भी भलामानुस माँ-बहनों के साथ फ़िल्म देखने का साहस नहीं जुटा पाता…राष्ट्रगान के समय दरवाज़ा खुला छोड़ दिया जाता है, लोग बाहर निकल जाते हैं, जो अंदर भी रहते हैं, वे या तो बदन खुजाते या जम्हाइयाँ लेते दिखाई देते हैं।…अच्छी और सफल फ़िल्में जो पंजाब के बड़े शहरों में वर्ष के आरंभ में प्रदर्शित होती हैं,यहाँ अंत तक पहुँचती हैं, नतीजा ये होता है कि गणतंत्र दिवस की न्यूज़ रीलें हम स्वतंत्रता दिवस पर देखते हैं: हमें अभी तक ‘अनुपमा’ और ‘आए दिन बहार के’ का इंतज़ार है!

आरा से आकर एक सज्जन बड़े नाराज़ थे: छुट्टियाँ बिताने आरा गया हुआ था। यहाँ के सिनेमा-हॉल और व्यवस्थापकों की लापरवाही देखकर दुख हुआ। सिनेमा हॉल के बाहर कुछ लोग लाइन में खड़े रहते हैं जबकि टिकट पास की पान की दुकान पर मिल जाता है। नोस्मोकिंग आते ही लोग बीड़ी जला लेते हैं। अगर कोई रोमाण्टिक सीन आ जाए तो उन्हें चिल्लाकर ही संतोष होता है, जिन्होंने अभी सीटी बजाना नहीं सीखा है। सिनेमा शुरू होने का कोई निश्चित समय नहीं है। अगर किसी अधिकारी की फ़ेमिली आने वाली है तो सिनेमा उनके आने के बाद ही शुरू होगा। हॉल में घुसते ही कुछ नवयुवक इतनी हड़बड़ी में आते हैं कि जल्दबाज़ी में फ़ेमिली स्वीट्स में घुस जाते हैं। (29 दिसंबर 1967)।

डेविड धवन की हालिया फ़िल्म ‘राजा बाबू’ की बरबस याद आ जाती है, जिसमें तामझाम से सजे लाल बुलेट पर घूमने वाला गोविंदा का किरदार सिनेमा हॉल में जाकर अपने मनपसंद दृश्य को ‘रिवाइन्ड’ करवाके बार-बार देखता है। साठ के दशक में छोटे शहरों के असली बाबू भी राजा बाबू से कोई कम थे! लेकिन ये शिकायती स्वर इस बात की तस्दीक़ करते हैं कि सिनेदर्शक अपने नागरिक अधिकारों के प्रति सचेत हो रहा था, और सिने-प्रदर्शन में हो रही अँधेरगर्दी की पोल खोलने पर आमादा था। लेकिन इस तरह की परेशानियाँ सिर्फ़ छोटे शहरों तक सीमित नहीं थीं। एक आख़िरी उद्धरण देखिए, राजकुमार साहब के हवाले से:

दिल्ली के कुछ सिनेमा हॉल जो कि पुरानी दिल्ली में हैं बहुत ख़राब दशा में हैं। महिलाओं को केवल एक सुविधा प्राप्त है, और वो है टिकट मिल जाना। और इसके अलावा कोई सुविधा नहीं। अन्दर जाकर सीट पर बैठे तो क्या देखेंगे कि पीछे के दर्शक महोदय बड़े आराम से सीट पर पैर रख कर बैठे हुए हैं। ऐसा करना वे अपना अधिकार समझते हैं। आसपास के लोग बड़े प्रेम से घर की या बाहर की बातें करते नज़र आएँगे जबकि फ़िल्म चल रही होगी। मना किया जाय तो वे लड़ने लगेंगे और आप (जो कि माँ या बहन के साथ बैठे होंगे) लोगों की नज़रों के केन्द्र बन जाएँगे। यदि कोई प्रेम या उत्तेजक सीन होगा तो देखिए कितनी आवाज़ें कसी जाती हैं, गालियाँ दी जाती हैं, और सीटियाँ तो फ़िल्म के संगीत का पहलू नज़र आती हैं। यदि पास बैठी महिला के साथ छेड़छाड़ करने का अवसर मिल जाए तो वे हाथ से जाने नहीं देते। ये सब बातें सिर्फ़ इसलिए होती हैं कि सिनेमा हॉल में आगे बैठे लोग सिर्फ़ दोतरफ़ा मनोरंजन चाहते हैं। इस तरह सिनेमा देखना तो कोई सहनशील व्यक्ति भी गवारा नहीं करेगा। (29 दिसंबर 1967, पत्र)।

क़िस्सा कोताह यह कि दर्शकों की इन दूर-दराज़ की – सिनेव्यापार की भाषा में ‘बी’ ‘सी’ श्रेणी के शहरों-क़स्बों से आती –  आवाज़ों को राष्ट्रीय गलियारों तक पहुँचाने का काम करते हुए ‘माधुरी’ ने निहायत कार्यकर्तानुमा मुस्तैदी और प्रतिबद्धता दिखाई। इसका कितना असर हुआ या नहीं, कह नहीं सकते, लेकिन सिनेमा देखने वाले लोग भी नागरिक समाज की बुनियादी सहूलियतों और दैनंदिन सदाचरण के हक़दार हैं, अंक-दर-अंक यह चीख़ने के पीछे  कम-से-कम ‘माधुरी’ का तो वही भरोसा रहा, जो फ़ैज़ का था: ‘कुछ हश्र तो इनसे उट्ठेगा, कुछ दूर तो नाले जाएँगे’।[12] और नहीं तो कम-से-कम शेष पाठकों तक तो नाले गए ही होंगे क्योंकि चंद संजीदा क़िस्म की शिकायतें तो आम जनता, ख़ासकर पुरुषों, को ही संबोधित हैं! एक और दिलचस्प बात आपने नोट की होगी इन ख़तों में कि हिन्दी-भाषी पुरुष उस ज़माने में सिर्फ़ ‘माँ-बहनों’ के साथ फ़िल्म देखने जाता था!

मधुर संगीतप्रियता

अच्छा साहब, बहुत हो लीं रोने-धोने की बातें। आइए अब कुछ गाने की भी की जाएँ। ‘माधुरी’ ने यह बहुत जल्द पहचान लिया था कि रेडियो और ग्रामोफोन के ज़रिय लोग सिनेमा को सिर्फ़ देखते नहीं हैं, उसे सुनते भी हैं, वैसे लोग भी जो नहीं देखते, गुनगुनाते ज़रूर हैं, और इसके लिए वे बोलती फ़िल्मों के शुरुआती दिनों से ही सस्ते काग़ज़ पर छपे चौपतिया मार्का ‘कथा-सार व गीत’ या बाद में नारायण ऐण्ड को., सालिमपुर अहरा, पटना जैसे प्रकाशकों द्वारा मुद्रित ‘सचित्र-गीत-डायलॉग’ के बेहद शौक़ीन थे, बल्कि उन पर मुनहसर थे। क्योंकि इससे बार-बार सिनेमा जाकर या रेडियो पर सुन-सुनकर कॉपी पे उतारने की उनकी अपनी मेहनत बचती थी। सिनेमा के गीतों ने  एक अरसे से रोज़ाना की अंत्याक्षरी से लेकर औपचारिक, शास्त्रीय हर तरह की महफ़िलों में अपना रंग जमा रखा था, तो जो लोग राग-आधारित गाने गाना चाहते थे, उनके लिए गीत के बोल के साथ-साथ स्वराक्षरी देने का काम संपादक ने संगीत-मर्मज्ञ श्रीधर केंकड़े से काफ़ी लंबे अरसे तक करवाया। उन पृष्ठों पर संगीतकार-गीतकार-गायक-गायिका का नाम बड़े सम्मान से छापा जाता था। लेकिन जल्द ही ‘रिकार्ड तोड़ फ़ीचर’ और पैरोडियाँ भी स्तंभवत छपने लगीं, जो जनता के हाथों पुराने-नए मशहूर गानों के अल्फ़ाज़ की रीमिक्सिंग (= पुनर्मिश्रण, पुनर्रचना) के लोकाचार का ही एक तरह से साहित्यिक विस्तार था। इसलिए स्वाभाविक ही था कि हुल्लड़ मुरादाबादी और काका हाथरसी जैसे मशहूर कवियों के अलावा बेनाम तुक्कड़ों ने अच्छी तुकबंदियाँ पेश कीं। इस तरह की हास्य-व्यंग्य से लबरेज़ नक़्क़ाली के विषय अक्सर सामाजिक होते थे, कई बार फ़िल्मी, पर बाज़ मर्तबा राजनीतिक भी, जैसे कि सदाबहार मौज़ू ‘महँगाई’ को लेकर सीधे-सीधे भारत की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री से पूछा गया सवाल, जो कि बतर्ज़ ‘बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं’ गुनगुनाये जाने पर सामान्य से किंचित अतिरिक्त फैलती मुस्कान की वजह बनता होगा:

इतना महँगा गेहूँ, औ इतना महँगा चावल
बोल इन्द्रा बोल सस्ता होगा कि नहीं

कितने घंटे बीत गए हैं मुझको राशन लाने में
साहब से फटकार पड़ेगी देर से दफ़्तर आने मे
इन झगड़ों का अन्त कहीं पर होगा कि नहीं॥ बोल इन्द्रा बोल…

दो पाटों के बीच अगर गेहूँ आटा बन जाता है
क्यों न जहाँ पर इतने कर हों, दम सबका घुट जाता है
कभी करों का यह बोझा कम होगा कि नहीं।। बोल इन्द्रा बोल…

हम जीने को तड़प रहे ज्यों बकरा बूचड़ख़ाने में
एक नया कर और लगा दो साँस के आने-जाने में
आधी जनता मरे चैन तब होगा कि नहीं? बोल इन्द्रा बोल…(22 सितंबर 1967)।

अब आप ही बताइए साहब कि ये नक़ल, असल से कविताई में कहीं से उन्नीस है ? इसी तरह काका ने एक पैरोडी बनाई थी संत ज्ञानेश्वर के मशहूर गीत ‘ज्योति से ज्योति जलाते चलो, प्रेम की गंगा बहाते चलो’ पर, ‘नोट से नोट कमाते चलो, काले धन को पचाते चलो’, जिसका थीम इतना शाश्वत है कि कभी पुराना नहीं होगा। पता नहीं हम ऐसे ख़ज़ाने का जमकर इस्तेमाल क्यों नहीं करते। पुनर्चक्रण पर्यावरण-प्रिय युग की माँग है। ‘माधुरी’ ने तो अपनी पुनर्चक्रण-प्रियता का सबूत इस हद तक दिया कि एक पूरा फ़िल्मी पुराण और एक संपूर्ण फ़िल्मी चालीसा ही छाप दिया,  जिसमें फ़िल्मी इतिहास के बहुत सारे अहम नाम सिमट आए हैं। कुछ कहने की ज़रूरत नहीं, आप ख़ुद पाठ करें, तर्ज़ वही है गोस्वामी तुलसीदासकृत हनुमान चालीसा वाली:

दोहा: सहगल चरण स्पर्श कर, नित्य करूँ मधुपान
सुमिरौं प्रतिपल बिमल दा निर्देशन के प्राण
स्वयं को काबिल मानि कै, सुमिरौ शांताराम
ख्याति प्राप्त अतुलित करूँ, देहु फिलम में काम

चौपाई: जय जय श्री रामानंद सागर, सत्यजीत संसार उजागर
दारासिंग अतुलित बलधामा, रंधावा जेहि भ्राता नामा
दिलीप ‘संघर्ष’ में बन बजरंगी, प्यार करै वैजयंती संगी
मृदुल कंठ के धनी मुकेशा, विजय आनंद के कुंचित केशा।

विद्यावान गुनी अति जौहर, ‘बांगला देश’ दिखाए जौहर
हेलन सुंदर नृत्य दिखावा, लता कर्णप्रिय गीत सुनावा
हृषीकेश ‘आनंद’ मनावें, फिल्मफेयर अवार्ड ले जाएं
राजेश पावैं बहुत बड़ाई, बच्चन की वैल्यू बढ़ जाई

बेदी ‘दस्तक’ फिलम बनावें, पबलिक से ताली पिटवावें
पृथ्वीराज नाटक चलवाना, राज कपूर को सब जग जाना
शम्मी तुम कपिदल के राजा, तिरछे रोल सकल तुम साजा
हार्कनेस रोड शशि बिराजें, वाम अंग जैनीफर छाजें

अमरोही बनायें ‘पाकीजा’, लाभ करोड़ों का है कीजा
मनोज कुमार ‘उपकार’ बनाई, नोट बटोर ख्याति अति पाई
प्राण जो तेज दिखावहिं आपैं, दर्शक सभी हांक ते कांपै
नासैं दुख हरैं सब पीड़ा, परदे पर महमूद जस बीरा

आगा जी फुलझड़ी छुड़ावैं, मुकरी, ओम कहकहे लगावैं
जुवतियों में परताप तुम्हारा, देव आनंद जगत उजियारा
तुमहिं अशोक कला रखवारे, किशोर कुमार संगित दुलारे
राहुल बर्मन नाम कमावें, ‘दम मारो दम’ मस्त बनावें

नौशादहिं मन को अति भावें, शास्त्रीय संगीत सुनावें
रफी कंठ मृदु तुम्हरे पासा, सादर तुम संगित के दासा
भूत पिशाच निकट पर्दे पर आवें, आदर्शहिं जब फिल्म बनावें
जीवन नारद रोल सुहाएं, दुर्गा, अचला मा बन जाएं

संकट हटे मिटे सब पीड़ा, काम देहु बलदेव चोपड़ा
जय जय जय संजीव गुसाईं, हम बन जाएं आपकी नाईं
हीरो बनना चाहे जोई, ‘फिल्म चालीसा’ पढ़िबो सोई
एक फिलम जब जुबली करहीं, मानव जनम सफल तब करहीं

बंगला कार, चेरि अरु चेरा, ‘फैन मेल’ काला धन ढेरा
अच्छे-अच्छे भोजन जीमैं, नित प्रति बढ़िया दारू पीवैं
बंबई बसहिं फिल्म भक्त कहाई, अंत काल हालीवुड जाई
मर्लिन मनरो हत्या करईं, तेहि समाधि जा माला धरईं

दोहा: बहु बिधि साज सिंगार कर, पहिन वस्त्र रंगीन
राखी, हेमा, साधना, हृदय बसहु तुम तीन। (वीरेन्द्र सिंह गोधरा, 15 सितंबर 1972)

मज़ेदार रचना है न, बाक़ायदा दोहा-चौपाई से लैस, भाषा व शिल्प में पुरातन, सामग्री में यकलख़्त ऐतिहासिक और अद्यतन, फ़िल्म भक्ति के सहस्रनाम-गुण-बखान में निहायत समावेशी, नामित आराध्य की भक्ति में सराबोर लेकिन साथ ही अमूर्त देवी-देवताओं के ‘काले कार्य-व्यापार’ से आधुनिक आलोचनात्मक दूरी बनाती हुई भी, जो आख़िरी चौपाई में मुखर हो उठती है। हमारे ज़माने में ‘चोली के पीछे क्या है’,के कई काँवड़िया संस्करण बन चुके हैं – अगले सावन में ‘मुन्नी बदनाम हुई’ के भी बन जाएँगे – अब अगर प्रामाणिक धर्म-धुरंधरों को इस तथाकथित अश्लील आयटम गीत की तर्ज़ पर शिवभक्ति अलापने में परहेज़ नहीं है तो उस ज़माने में ‘माधुरी’ को इसकी उलट पैरोडी पेश करने में भला क्यों होता। फ़िल्म का एहतराम करना तो उसका घोषित धर्म ही ठहरा, और पाठक अगर धार्मिक पैकेजिंग में ही सिनेमा को घर ले जाना चाहते हैं तो वही सही। उन्हीं दिनों की बात है न जब ‘जय संतोषी माँ’ आई थी तो लोग श्रद्धावश पर्दे पर पैसे फेंककर अपनी भक्ति का इज़हार कर रहे थे, जैसे कि किसी आयटम गाने पर ख़ुश होकर वे हॉल में सिक्के फेंकते पाए जाते थे, गोया किसी तवायफ़ की महफ़िल में बैठे हों। कैसा मणिकांचन घालमेल, कैसी अजस्र निरंतरता पायी जाती है हमारे लोक के धर्म-कर्म, नाच-गाने, और रुपहली दुनिया में कि शुद्धतावादियों का दम घुट जाए। वैसे ‘माधुरी’ ने चंद बहसें धार्मिक फ़िल्मों के इतिहास व वर्तमान, उसके निर्माण के औचित्य-अनौचित्य पर भी चलाईं, एक ऐसे विशेषांक में अपना जवाब ख़ुद देता सवालिया प्रस्थान-बिंदु याद आता है: क्या धार्मिक फ़िल्मों के रथ को व्यावसायिकता का छकड़ा ढो रहा है ?[13] यह तय है कि धर्म को लेकर ‘माधुरी’ न तो भावुक थी न ही संवेदनशील; अगर किसी एक धर्म में इसकी अदम्य आस्था देखी जा सकती है, तो उसका नाम हमें राष्ट्रधर्म देना होगा। इसपर कुछ बातें, थोड़ी देर में।

‘रिकार्ड तोड़ फीचर’ स्तंभ में गानों की पंक्तियों से अटपटे सवाल पूछे जाते थे, या कटुक्तियाँ चिपकाई जाती थीं, कुछ इस बेसाख़्तगी से कि बोल के अपने अर्थ-संदर्भ गुम हो जाते थे, उनमें असली जीवन की छायाएँ कौंध जाती थीं। कुछ मिसालें मुलाहिज़ा फ़रमाएँ:

क) ओ, पंख होते तो उड़ जाती रे…..
….चिड़िया नहीं तो फ़िल्मी हीरोइन तो हो, हवाई जहाज़ में क्यों नहीं उड़ आतीं ?

ख) तख़्त क्या चीज़ है और लालो-जवाहर क्या है,
इश्क़ वाले तो ख़ुदाई भी लुटा देते हैं….
…..हाँ जी, दूसरे का माल लुटाने में क्या लगता है!

ग) जज़्बा-ए-दिल जो सलामत है तो इंशाअल्लाह
कच्चे धागे में चले आएँगे सरकार बँधे।
…..जनाब, वो नज़ाकत-नफ़ासत के ज़माने लद गए, अब तो लोहे की हथकड़ियों में बांधकर घसीटना पड़ेगा सरकार को।

घ) और हम खड़े-खड़े गुबार देखते रहे
कारवाँ गुज़र गया, बहार देखते रहे…
….निकम्मों की यही पहचान होती है पुत्तर! (24 सितंबर, 1965).

क्या प्यारा हश्र हुआ है नीरज के पश्चाताप के आँसू रोते इस मशहूर भावुक गीत का! मूलत: हल्के-फुल्के हास्यरस का यह फ़ीचर बहुत लंबा नहीं चल पाया, लेकिन समझने लायक़ बात यह है कि यह उस परम-यथार्थवादी युग की दास्तान भी कहता है, जो तथाकथित फ़ॉर्मूला फ़िल्मों की हवा-हवाई बातों में आने से इन्कार कर रहा था, लिहाज़ा ‘ये बात कुछ हज़म नहीं हुई’ वाले अंदाज़ में प्रतिप्रश्न कर रहा था। जिसे आगे जाकर ‘समांतर’ सिनेमा कहा गया, उसका शबाब भी तो अँगड़ाइयाँ ले रहा था इस दौर में,जिसकी घनघोर प्रशंसिका बनकर ख़ुद ‘माधुरी’ उभरती है। संक्षेप में, सत्यजीत राय आदि के नक़्शे-क़दम चलकर लोकप्रिय मुख्यधारा की फ़ंतासियों के बरक्स ठोस दलीलें और वैकल्पिक फ़िल्में देने का वक़्त आ गया था, इन फुलझड़ियों से भला क्या होना था! उसके लिए तो उन साहित्यिक कृतियों के नाम गिनाए जाने थे, जो पता नहीं कब से फ़िल्म-रूप में ढल जाने को तैयार होकर बैठी थीं, और निर्माता कहते फिरते थे कि अच्छी कहानियाँ नहीं हैं।[14] दरमियानी धारा की फ़िल्में भी कई बनीं इस समय और साहित्यिक कृतियों पर भी, पर शुद्ध कलात्मक फ़िल्में ‘माधुरी’ के परोक्ष-अपरोक्ष समर्थन के बाद भी बहुत नहीं चल पाईं। अपवादों को छोड़ दें तो उनमें से ज़्यादातर के नसीब में सरकारी वित्तपोषण, फ़िल्मोत्सवी रिलीज़ और ‘आलोचनात्मक प्रशंसा’ ही आई।

साहित्यप्रियता

जितने अभियान माधुरी ने चलाए, जितने पुल इसने सिरजे, उनमें एक पुल और एक अभियान का ज़िक्र ज़रूरी है। साहित्य और सिनेमा के बीच सेतु बनाने में ‘माधुरी’ ने कोई कसर नहीं उठाई, हिन्दी को हरेक अर्थ में प्रतिष्ठित करने की भी हर कोशिश इसने की। इसने इसरार करके हिन्दी के दिग्गजों से लेख लिखवाए, हरिवंश राय बच्चन से गीतों पर, पंत से फ़िल्मों की उपादेयता, उनके गुण-दोषों पर और दिनकर’ को तो बाक़ायदा एक फ़िल्म दिखवाकर उसी पर उनकी समीक्षात्मक टिप्पणी भी छापी।[15] एक तरफ़ कवि, गीतकार, लेखक और विविध भारती के पहले निदेशक बनकर आए नरेन्द्र शर्मा से फ़िल्मी  गीतों की महत्ता’[16] पर लिखवाया तो दूसरी ओर गुलशन नंदा से यादवेन्द्र शर्मा चंद्र की आत्मीय बातचीत छापी।[17] ये याद दिलाना बेज़ा न होगा कि विविध भारती (ये शर्मा जी का रचनात्मक अनुवाद था अंग्रेज़ी के ‘मिस्लेनियस प्रोग्राम’ का) की स्थापना एक तरह से केसकर साहब के नेतृत्व वाले सूचना व प्रसारण मंत्रालय की बड़ी हार थी, लोकरंजक फ़िल्मी गीतों की ज़बर्दस्त लोकप्रियता के आगे। क्योंकि 1952 में भारतीय जनता को अपने मिज़ाज के माफ़िक बनाने के चक्कर में उन्होंने आकाशवाणी से फ़िल्मी गीतों के प्रसारण पर अनौपचारिक रोक लगा दी थी। जनता ने रेडियो सीलोन, और रेडियो गोआ की ओर अपने रेडियो की सूई का रुख़ कर दिया। अमीन सायानी इसी दौर में (बिनाका/सिबाका) गीतमाला के ज़रिय जो आवाज़ की दुनिया के महानायक बने तो आज तक हैं। घाटा भारतीय सरकारी ख़ज़ाने का हुआ जो पूरे पाँच साल तक चला, आख़िरकार केसकर साहब ने घुटने टेके, ‘विविध भारती’ चलायी, जिसे बाद में व्यावसायिक सेवा में तब्दील कर दिया गया।[18] बाक़ी तो देखा-भाला इतिहास होगा आपमें से कइयों के लिए। तो जब नरेन्द्र शर्मा ने ‘माधुरी’ के लिए लिखा कि ‘फ़िल्म संगीत इंद्र का घोड़ा है : आकाशवाणी उसका सम्मान करती है’ तो वह भी सरकार की तरफ़ से उसको नकेल कसने की कोशिश की नाकामियों का इज़हार ही कर रहे थे, और क्या ठोस वकालत की उन्होंने फ़िल्मी गानों की। गुलशन नंदा ने, जिनका नाम आज तक हिन्दी साहित्यिक जगत में हिकारत से लिया जाता है, पर जिनके उपन्यासों पर कई सफल और मनोरंजक फ़िल्में बनीं, उस बातचीत में बग़ैर किसी शिकवा-शिकायत के, मुतमइन भाव से, अपनी बात रखी। तो ‘माधुरी’ जहाँ एक ओर शुद्ध साहित्यिकों से बातचीत कर रही थी, वहीं दूसरी ओर फ़िल्मी लेखकों-शायरों- मजरूह सुल्तानपुरी, हसरत जयपुरी, गुलज़ार, राही मासूम रज़ा, मीना कुमारी, सलीम-जावेद आदि से मुसलसल संवादरत थी।[19] नायक-नायिकाओं के साथ-साथ गायक-गायिकाओं को काफ़ी तवज्जो दी गई तो कल्याणजी-आनंदजी की चुटकुलाप्रियता की स्थानीय शोहरत को राष्ट्रीय में तब्दील करने में उनके ‘माधुरी’ के स्तंभ का बेशक योगदान रहा होगा। नए-पुराने लिखने वाले निर्माता-निर्देशकों से भी साग्रह लिखवाया गया :  किशोर साहू, बिमल राय,  के.एन सिंह आदि की जीवनी/आत्मकथा धारावाहिक छपी तो राधू करमारकर जैसे छायाकार की कहानी को भी प्रमुखता मिली। शैलेन्द्र तो अरविन्द जी के प्रिय गीतकार और मित्र थे ही, ‘तीसरी क़सम’ के बनने, असफल होने और शैलेन्द्र के उस सदमे से असमय गुज़र जाने की जितनी हृदयछू कहानियाँ ‘माधुरी’ ने सुनाईं, शायद किसी के वश की बात नहीं थी। इनमें शोकसंतप्त रेणु की आत्मग्लानि से लेकर राजकपूर के अकाल-सखा-अभाव को वाणी देतीं भावभीनी श्रद्धांजलियाँ शुमार की जा सकती हैं।

लेकिन साहित्य को सिनेमा से जोड़ने के सिलसिले में सबसे रचनात्मक नुस्ख़े जो ‘माधुरी’ ने कामयाबी के साथ आज़माए उनमें एक-दो ख़ास तौर पर उल्लेखनीय हैं। हालाँकि नायक-नायिकाओं के चित्रों के साथ काव्यात्मक शीर्षक देने की रिवायत पुरानी थी- उर्दू की मशहूर फ़िल्मी पत्रिका ‘शमा’ में पचास के दशक में इसकी मिसालें मिल जाएँगी। वैसे ही जैसे कि तीस-चालीस के दशक की साहित्यिक पत्रिकाओं में ‘रंगीन’ तस्वीरों के साथ दोहा या शे’र’ डालने का रिवाज था। ‘माधुरी’ में भी उर्दू के शे’र मिलते थे लेकिन कभी-कभार ही, उनकी जगह यहाँ हिन्दी कवियों को प्रतिष्ठित किया गया। दो-चार उदाहरणों से बात साफ़ हो जानी चाहिए। पूरे पृष्ठ पर ‘पत्थरों में प्राण भरने वाले शिल्पी अभिनेता जीतेन्द्र’ की सुंदर-सुडौल सफ़ेद-स्याह आवक्ष चित्ताकर्षक तस्वीर छपी है, लेकिन उसमें अतिरिक्त गरिमा डालने के लिए दिनकर की ‘उर्वशी’ से पुरुरवा का दैहिक वर्णन डाल दिया गया है:

सिंधु सा उद्दाम, अपरंपार मेरा बल कहाँ है ?
गूँजता जिस शक्ति का सर्वत्र जय-जयकार
उस अटल संकल्प का संबल कहाँ है ?
यह शिला सा वक्ष, ये चट्टान सी मेरी भुजाएँ,
सूर्य के आलोक से दीपित समुन्नत भाल,
मेरे प्यार का सागर अगम, उत्ताल, उच्छल है।[20]

जिसे हिन्दी साहित्य पढ़ने-पढ़ानेवालियों ने अवश्य सराहा होगा। उसी तरह सायरा बानो की दिलकश रंगीन तस्वीर के साथ टुकड़ा लगाया- ‘कनक छरी-सी कामिनी’ और जानने वालों ने अपनी तरफ़ से दोहे की दूसरी अर्धाली अनायास जोड़ी होगी, ‘काहे को कटि क्षीण’![21] उससे भी ज़्यादा जाननेवालों ने इस दोहे के साथ औरंगज़ेबकालीन कृष्णभक्त कवि आलम को भी याद किया होगा और उस रंगरेज़न को भी,जिसने कहते हैं, इस दोहे की दूसरी पंक्ति – ‘कटि को कंचन काटि विधि, कुचन मध्य धरि दीन’- पूरी कर दी, और उसके बाद तो आलम उसके इश्क़ में गिरफ़्तार ही हो गए। ‘माधुरी’ को सायरा बानो की आवरण-कथा का सिर्फ़ एक शीर्षक देना था, इसलिए उसका काम पहली अर्धाली से ही हो गया था, लेकिन दूसरी अर्धाली और पंक्ति न देकर शायद इसने अपने ‘पारिवारिक’ आत्मसंयम का भी परिचय दिया, कि चतुर-सुजान ख़ुद कल्पना कर लें! वरना ‘यह शिला सा वक्ष, ये चट्टान सी मेरी भुजाएँ’ और ‘कुचन मध्य धरि दीन’ में यही तो फ़र्क़ है कि पहले में पुरुष-देह-सौंदर्य बखाना गया है, और दूसरे में स्त्री-सौंदर्य की ओर इशारा है! वैसे, आगे चलकर जब रंगीन पृष्ठ बढ़ते हैं तो कई स्थापित या संघर्षशील तारिकाओं की अपेक्षाकृत कम या छोटे कपड़ोंवाली तस्वीरें भी ‘माधुरी’ छापती है, और पाठकों के पत्रों में सेन्सरशिप की गुहार नहीं मचती दिखती है, तो ये मान लेना चाहिए कि वक़्त के साथ इसके पाठक भी ‘वयस्क’ हो रहे थे। वैसे फ़िल्म सेन्सरशिप के तंत्र की आलोचना- ‘अंधी कैंची, पैनी धार’- बासु भट्टाचार्य जैसे दिग्दर्शक ‘माधुरी’ के पृष्ठों में कर ही रहे थे, सो पाठकों तक पत्रिका का उदारमना संदेश तो जा ही रहा होगा।[22] मौखिक और लिखित तथा छप-साहित्य की जानी-मानी लोकप्रिय विधा -समस्यापूर्ति – का भी ख़ूब इस्तेमाल किया ‘माधुरी’ ने। पाठकों से अक्सर किसी (सिर्फ़ बड़े नहीं) सिनेसितारे की दिलचस्प छवि के जवाब में मौलिक कविता माँगी जाती थी, और तीन-चार अच्छी प्रविष्टियों पर नक़द ईनाम भी दिए जाते थे। एक और आवरण कथा थी माला सिन्हा पर, बग़ीचे में लताओं व पेड़ों के बीच इठलाती उनकी तीन रंगीन तस्वीरों के साथ, साथ में छपा था विद्यापति कृत ये काव्यांश:

कालिन्दी पुलिन-कुंज बन शोभन।
नव नव प्रेम विभोर।
नवल रसाल-मुकुल-मधु मातल।
नव-कोकिल कवि गाय,
नव युवति गन चित उमता भई।
नव रस कानन धाय।

जिसे उद्धृत करने के पीछे मेरा ध्येय सिर्फ़ माधुरी के काव्य-चयन का विस्तृत दायरा दिखाना है। कुछ मिसालें उर्दू शायरी से भी। शर्मीला टैगोर का चित्र है, शीर्षक में मजरूह का शे’र:

यह आग और नहीं, दिल की आग है नादाँ,
शमअ हो के न हो, जल मरेंगे परवाने।

एक और जगह रंगीन, जुड़वाँ पृष्ठों पर शर्मीला और मनोज कुमार आमने-सामने हैं, एक ही ग़ज़ल के दो अश’आर से जुड़े हुए:

शर्मीला: किस नजर से आज वह देखा किया।
दिल मेरा डूबा किया उछला किया।।
मनोज:  उनके जाते ही ये हैरत छा गई।
जिस तरफ़ देखा किया, देखा किया।।(10 सितंबर, 1965)

वाह! वाह!!

हिन्दीप्रियता

इन उद्धरणों से यह साफ़ हो गया होगा कि हिन्दुस्तानी सिनेमा और उर्दू के बीच जो पारंपरिक दोस्ताना रिश्ता[23] था, उसके बीच ‘माधुरी’ हिन्दी के लिए भी जगह तलाशने की कोशिश कर रही थी। इस तरह की कोशिशें हिन्दी की तरफ़ से कई पीढ़ियाँ कम-से-कम सौ साल से करती आ रही थीं : चाहे वह छापे की दुनिया के भारतेन्दु और उनके बाद के दिग्गज रहे हों, जो कविता में हिन्दी को ब्रजभाषा-अवधी वग़ैरह के बरक्स ‘खड़ी’ करने में, या पारसी नाटक-लेखन के क्षेत्र में पं. राधेश्याम कथावाचक के सचेत प्रयास हों, या फिर रेडियो की दुनिया में पं. बलभद्र नारायण दीक्षित ‘पढ़ीस’ के परामर्श हों या पं. रविशंकर शुक्ल की आक्रामक राजनीतिक मुहिम हो, इन सबका एक सामान्य सरोकार उन इलाक़ों में हिन्दी की पैठ बनाना रहा जो उसके लिए नए थे।[24] ये इलाक़े हिन्दीवादियों को भाषायी नुक्ता-ए-नज़र से ख़ाली बर्तन की तरह नज़र आते थे, जिन्हें हिन्दी की सामग्री से भरना इन्हें परम राष्ट्रीय कर्तव्य लगता था। अगर ग़लती से किसी और ज़बान, और ख़ुदा न करे उर्दू का वहाँ पहले से क़ब्ज़ा हो, तब तो मामला और संगीन हो उठता था, युद्ध-जैसी स्थिति हो उठती थी, कि हमें इस ‘विदेशी’ ज़बान को अपदस्थ करना है, अपनी ज़मीन पर निज भाषा का अख़्तियार क़ायम करना है। बेशक आज़ादी के बाद स्थिति तेज़ी से बदली, हिन्दी का अधिकार-क्षेत्र बढ़ा, उर्दू विभाजन और मुसलमानों की भाषा बनकर हिन्दुस्तान में बदनाम और बेदख़ल कर दी गई, लेकिन, जैसा कि हम नीचे देखेंगे, तल्ख़ियाँ अभी बाक़ी हैं, घाव अभी तक ताज़ा हैं। ‘माधुरी’ ‘हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान’ के लिए चले इस लंबे संघर्ष में हिन्दूवादी बनकर तो शायद नहीं, लेकिन कम-से-कम फ़िल्मक्षेत्रे हिन्दी राष्ट्रवादी हितों का हामी बनकर ज़रूर उभरती है।[25]

अपनी बात की पुष्टि के लिए चलिए एक बार फिर एक संपादकीय, ‘हमारी बात’ से ही यात्रा शुरू की जाए, जिसका शीर्षक था ‘हिन्दी की फिल्में और हिन्दी’:

कुछ पुरानी और कुछ आनेवाली फिल्मों के नाम इस प्रकार हैं: ‘फ्लाइट टू बैंकाक’, ‘गर्ल फ्राम चाइना’, ‘हण्डरेड एण्ड एट [डेज़] इन कश्मीर’, ‘पेनिक इन पाकिस्तान’, ‘द सोल्जर’, ‘द कश्मीर रेडर्स’, ‘अराउण्ड द वर्ल्ड’, ‘लव इन टोकियो’, ‘ईवनिंग इन पेरिस’, ‘जौहर एण्ड जौहर इन चाइना’, ‘लव इन शिमला’, ‘मदर इंडिया’, ‘सन आफ इंडिया’, ‘मिस्टर एण्ड मिसेज फिफ्टी फाइव’, ‘मिस्टर एक्स इन बाम्बे’, ‘लव मैरिज’, ‘होलीडे इन बाम्बे’….। इन नामों को पढ़कर क्या आपको भ्रम नहीं होता कि भारत की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी है और कुछ सिरफिरे लोग बिना मतलब ‘हिन्दी-हिन्दी’ की रट लगाए रहते हैं ? यह छोड़िये। सिनेमाघर में जब आप फिल्म देखते हैं तो आपको इतना तो अवश्य ही लगता होगा कि यदि भारत की भाषा हिन्दी, उर्दू, हिन्दुस्तानी या इससे मिलती-जुलती कोई और भाषा हो भी तो उसकी लिपि नागरी अरबी नहीं, रोमन है। इस सन्देह की पुष्टि तब और मिलती है, जब सड़कों, मुहल्लों के रोमन लिपि में लिखे नामपटोंपर कोलतार पोतने वाली राजनीतिक पार्टियाँ फिल्मों की रोमन नामावली पर चुप्पी साध लेती हैं। इन पार्टियों के सदस्य फिल्में नहीं देखते होंगे- इस पर तो विश्वास नहीं होता।

आपने अकसर यह दावा सुना होगा : हिन्दी के प्रचार में सबसे बड़ा योगदान फिल्मों का है। फिल्मकार इस आत्मछलपूर्ण दावे से अपने को हिन्दी सेवको में सबसे अगला स्थान देना चाहें तो आश्चर्य नहीं। आश्चर्य तब होता है जब आम लोग हिन्दी फिल्मों की लोकप्रियता देखकर इस दावे को सत्य मान लेते हैं। यह ऐसा ही है कि पूर्व में सूर्योदय और पश्चिम में सूर्यास्त देख कर लोग समझते रहे कि सूर्य धरती की परिक्रमा करता है।[26]

इस तरह की कोपरनिकसीय भाषावैज्ञानिक क्रांति को स्थापित करने के बाद हिन्दी फिल्मकारों के ‘हिन्दी-प्रेम’ की पोल ये कहकर खोली जाती है कि ‘फ़िल्म कला का एक तरह का थोक व्यवसाय है, जिसे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाकर ही लाभ कमाया जा सकता है, लिहाज़ा, इसकी ज़बान औसत अवाम की ज़बान रखी जाती है। लेकिन अफ़सोस कि नामावली और प्रचार-प्रसार में एक प्रतिशत अंग्रेज़ी-भाषी जनता की लिपि को प्रश्रय दिया जाता है, जबकि 35 प्रतिशत पढ़े-लिखे लोग टूटी-फूटी हिन्दी और देवनागरी जानते हैं। ऐसा करके निर्माता वस्तुत: अपने पाँव में आप कुल्हाड़ी मार रहे होते हैं। बेहतर प्रचार होता अगर वे कुछ और पैसे ख़र्च करके भारत की दीगर लिपियों में भी फिल्म का नाम दें: हाल ही में निर्माता-निर्देशक ताराचंद बड़जात्या ने अपनी फिल्म ‘दोस्ती’ के प्रचार में इस नीति को अपनाकर उचित लाभ उठाया था। बंगला फिल्मों के अधिकांश निर्माता नामावली में बंगला लिपि ही काम में लाते हैं। लेकिन हिन्दी में हाल यह है कि भोजपुरी फिल्मों में भी रोमन नामावली होती है (जबकि ये फिल्में हिन्दी क्षेत्र के बाहर कहीं नहीं देखी जाती)। यहाँ तक कि उन मारकाट वाली स्टण्ट फिल्मों में भी,जिन्हें अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोग नहीं देखते। कई बार यह देखकर निर्माताओं की व्यावसायिक बुद्धिहीनता पर हंसी ही आती है।’

इस संपादकीय से आरंभ करके ‘माधुरी’ ने जैसे रोमन नामावली के ख़िलाफ़ बाक़ायदा जिहाद ही छेड़ दिया, जिसका कई पाठकों ने भी खुले दिल से समर्थन किया। मसलन जब वे पत्र लिखते तो ये शिकायती स्वर में बताना नहीं भूलते कि फ़लाँ-फ़लाँ फिल्म में नामावली रोमन में दी गई है। लेकिन इस मुहिम की सबसे सनातन रट तो फ़िल्म समीक्षा के स्तंभ ‘परख’ में सुनाई पड़ती है। चाहे समीक्षक की राय में पूरी फ़िल्म अच्छी ही क्यों न हो, अगर नामावली नागरी में नहीं है तो उस पर एक टेढ़ी टिप्पणी तो चिपका ही दी जाती थी। ‘माधुरी’ के अंदरूनी पृष्ठों पर सिने-समाचार नामक एक अख़बार भी होता था,अख़बारी काग़ज़ पर अख़बारी साज-सज्जा लिए, जिसमें ‘जानने योग्य हर फिल्मी खबर’ छपती थी। उसका 15 दिसंबर, 1967 का अंक मज़ेदार है क्योंकि इसके मुख्य पृष्ठ पर सुर्ख़ी ये लगाई गई थी: ‘फिल्म उद्योग में हिन्दी नामों की जोरदार लहर: हिन्दी के विरुद्ध दलीलें देने वालों को चुनौती’। उपशीर्षक भी हमारे काम का है : ‘उपकार, संघर्ष, अभिलाषा, विश्वास, समर्पण, जीवन मृत्यु, परिवार, धरती, वासना, भावना आदि फिल्मों के कुछ ऐसे शीर्षक हैं जो इस मत का खण्डन करते हैं कि केवल उर्दू या अंग्रेजी के नाम ही सुंदर होते हैं’। जैसा कि ऊपर उद्धृत संपादकीय से भी ज़ाहिर है, भाषा की ‘माधुरी’ की अपनी आधिकारिक समझ वैसे तो आमतौर पर व्यापक है, पर कुछ और मिसालें लेने पर हमें उस आबोहवा का अंदाज़ा लग जाएगा, जिसमें हस्तक्षेप करने की चेष्टा वो कर रही थी। संपादकीय इस पंक्ति के साथ ख़त्म होता है: ‘अहिन्दी भाषी क्षेत्रों के लिए फिल्म का नाम व अन्य मुख्य नाम हिन्दी के साथ दो-तीन अन्य प्रमुख भारतीय लिपियों (जैसे बंगला व तमिल) में भी दिए जा सकते हैं।’ पूछना चाहिए कि अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में नाम नागरी में क्यों दिए जाएँ, केवल स्थानीय भाषा में ही क्यों नहीं। लेकिन ऐसा मानना हिन्दी-हित के साथ समझौता करना होता, चूँकि इस भाषा की पहचान इसकी लिपि से नत्थम-गुत्था है, आख़िरकार लिपि की लड़ाई लड़कर ही तो भाषा अपनी स्वतंत्र इयत्ता बना पाई थी। ठीक है हिन्दी-विरोध की हवा है, ख़ासकर दक्षिण में तो इतना मान लिया जाता है कि उनकी लिपि भी चलेगी: ‘भी’; ‘ही’- कत्तई नहीं। इस सिलसिले में दिलचस्प है कि ‘माधुरी’ ने किसी प्रोफ़ेसर मनहर सिंह रावत से दक्षिण का दौरा करवा के एक लेख लिखवाया जिसका मानीख़ेज़ शीर्षक था- ‘दक्षिण का नारा : हमें फिल्मों में हिन्दी चाहिए’। लब्बेलुवाब यह था कि भारत की ज़्यादातर भाषाएँ संस्कृत के नज़दीक हैं, दक्षिण की भी। इसलिए वहाँ के लोगों के लिए संस्कृत के तत्सम-तद्भव शब्द सहज ग्राह्य हैं। साथ ही संस्कार का सनातन सवाल भी है:

एक सामान्य भारतीय के लिए गुरु-उस्ताद, रानी-बेगम, विद्यालय-मदरसा, कला-फन, ज्ञान-इल्म,,धर्म-मजहब, कवि सम्मेलन-मुशायरा, हाथ-दस्त, पाठ-सबक आदि शब्द युग्मों में बिम्ब ग्रहण या संस्कार शीलता की दृष्टि से बहुत बड़ा अंतर आ जाता है जो कि अनुभूत सत्य है।

पर इसके साथ ही हमें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिये कि जन-साधारण की भाषा में जो शब्द सदियों से घुलमिलकर उनके जीवन संस्कार के अंग बन चुके हैं, उन्हें जबरदस्ती हटाकर एक नयी बनावटी भाषा का निर्माण करना भी बहुत हानिकारक होगा। फिर वे प्रचलित शब्द या प्रयोग कहीं से क्यों न आये हों। मातृभाषा के प्रति अनावश्यक पूर्वाग्रह, ममत्व… द्वेषनात्मक दृष्टिकोण का ही सूचक है। सरल भाषा की तो केवल एक ही कसौटी होनी चाहिये कि किसी शब्द प्रयोग या मुहावरे से सामान्य जनता कितनी परिचित या आसानी से भविष्य में परिचित हो सकती है। उदाहरण के लिये यदि हम कहें- “यह बात मुझे मालूम है।’’ तो साधारण हिन्दी से परिचित श्रोताओं को भी समझने में कोई कठिनाई नहीं होती। पर इसी बात को अगर हम अनावश्यक रूप से अल्प परिचित संस्कृतनिष्ठ भाषा में कहें कि- ‘‘प्रस्तुत वार्ता मुझे विदित है।’’ तो यह भाषा का मज़ाक उड़ाने जैसा हो जाता है।

इसके साथ-साथ कुछ सुन्दर सरल, उपयुक्त तथा अर्थ व्यंजक शब्द हमें जहाँ कहीं भी प्रादेशिक भाषाओं से मिलें, विशेषत: ऐसे शब्द जिनके समानार्थी या पर्यायवाची शब्द हिन्दी में उतने निश्चित प्रभावोत्पादक एवं व्यापक अर्थों को देने वाले नहीं होते तो उन्हें नि:संकोच स्वीकार कर लेना चाहिये। (30 जुलाई, 1965)

रावत साहब से पूछने लायक़ बात यह है कि ये सामान्य भारतीय कौन हैं, और क्या पूरे दक्षिण की भाषाओं-उपभाषाओं की  संस्कृतमयता यकसाँ है ? अगर हाँ तो इतनी सदियों तक वे संस्कृत से अलग अपनी इयत्ता बनाकर क्यों रख पाईं ? अगर हाँ तो ये सभी भाषाएँ संस्कृत ही क्यों नहीं कही जातीं। क्या तमिल भाषा के अंदर कई तरह की अंतर्विरोधी धाराएँ नहीं बह रही थीं, एक पारंपरिक ब्राह्मणवादी किंचित संस्कृतनिष्ठ तमिल के साथ-साथ दूसरी, दलित तमिल, भी तो उन्हीं दिनों अपने को राजनीतिक,साहित्यिक और फ़िल्मी गलियारों में स्थापित करने की कोशिश कर रहा था। तो दार्शनिक धरातल पर जहाँ रावत साहब उदारमना हैं, वहीं ‘संस्कार’ का सनातन सवाल उन्हें भाषाओं की उचित व्यावहारिक स्थिति का आकलन करने से रोक-रोक देता है। सवाल अंतत: शुद्धता का है, जैसा कि पटना की कुमुदिनी सिन्हा के इस ख़त से ज़ाहिर हो जाएगा:

‘माधुरी’ एक ऐसी जनप्रिय पत्रिका है, जिसने हम जैसे हजारों पाठकों का दिल जीत लिया है। 10 सितंबर के अंक में ‘आपकी बात’’ स्तंभ में प्रकाशित मधुकर राजस्थानी के विचार पढ़े…. वास्तव में आज अच्छे से अच्छे कलाकार, लेखक, कवियों का फिल्म जगत में प्रवेश आवश्यक है। फिल्म ही आज एक ऐसा माध्यम है, जो जन-जन तक पहुँचता है।

इसी स्तंभ में कलकत्ता के भाई निर्मल कुमार दसानी का पत्र पढ़ा, उन्हें भी धन्यवाद देती हूँ। इस लोकतंत्र राष्ट्र में हिन्दी के नाम पर खिचड़ी अधिक चल नहीं सकती। उसका एक अपना अलग रूप होना ही चाहिए और इसमें फिल्मों का सहयोग आवश्यक है। फिल्म के हरेक कलाकार, गीतकार को चाहिए कि फारसीउर्दू मिश्रित भाषा त्यागकर यथाशक्ति संशोधित, परिमार्जित और मधुर हिन्दी व्यवहृत कर उसे फैलाने में अपना सहयोग दें

अंत में पुन: ‘माधुरी’ की लोकप्रियता और सफलता की कामना करती हूँ।[27](ज़ोर हमारा)

एक तरफ़ जहाँ दशकों पुरानी गुहार– कि हिन्दी साहित्यकार सिनेमा की ओर मुड़ें-     को बदस्तूर दुहराया गया है, वहीं लोकतंत्र की अद्भुत परिभाषा भी की गई है कि यहाँ फ़ारसी-उर्दू मिश्रित खिचड़ी भाषा नहीं चलेगी। एक तरफ़ लोकप्रियता की अभिलाषा, दूसरी तरफ़ परिमार्जित, संशोधित और परिनिष्ठित हिन्दी की वकालत- ज़ाहिर है कि लेखिका को इन दोनों चाहतों में कोई विरोधाभास नहीं दिखाई देता। लेकिन भाषायी ज़मीन पर क़ब्ज़े की युयुत्सा तब ख़ासी सक्रिय हो उठती है जब मुक़ाबले में हिन्दी की पुरानी जानी दुश्मन उर्दू खड़ी हो जाए, और कुछ नहीं बस अपना खोया हुआ नाम ही माँग ले तो यूँ लगता था गोया क़यामत बरपा हो गई।[28] मिसाल के तौर पर एक विवाद का ज़िक्र करना उतना ही ज़रूरी है जितना कि उसकी तफ़सील में जाना।  सिने-समाचार में छपी इस ख़बर को देखें:

साहिर द्वारा हिन्दी के विरुद्ध विष वमन: फिल्म उद्योग में आक्रोश

(‘माधुरी’ के विशेष प्रतिनिधि द्वारा : तथाकथित प्रगतिशील शायर साहिर लुधियानवी की उर्दूहिन्दी का विवाद उठाकर साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने की कोशिशशों की फिल्म उद्योग में सर्वत्र निंदा की जा रही है।)

हाल ही में एक मुशायरे में साहिर ने कहा कि भारत में 97 प्रतिशत फिल्में उर्दू में बनती हैं, इसलिए इन फिल्मों की नामावली उर्दू में होनी चाहिए। उन्होंने घोषणा की कि ‘हिन्दी साम्राज्यवाद’ नहीं चलने दिया जायेगा।

सारी दुनिया के शोषित वर्ग का रहनुमा बनने वाले इस शायर की साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाने की यह कोई पहली हरकत नहीं है। कुछ ही मास पूर्व बिहार के बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए चन्दा एकत्रित करने के उद्देश्य से साहिर, ख्वाजा अहमद अब्बास, सरदार जाफरी आदि ने बिहार, उत्तर प्रदेश राजस्थान, पंजाब आदि प्रदेशों का दौरा किया था। लेकिन बिहार के अकाल का सिर्फ एक बहाना बन रह गया। हर मुशायरे में सम्बन्धित प्रदेश की द्वितीय राजभाषा बनायी जाने का प्रचार किया गया।

आम चुनाव से पूर्व बम्बई के कुछ उर्दू पत्रकारों को इन्हीं शायर महोदय ने सलाह दी थी कि उत्तर प्रदेश के साथ महाराष्ट्र में भी द्वितीय राजभाषा का स्थान उर्दू को देने के लिए आंदोलन शुरू किया जाना चाहिए। उनका तर्क था कि महाराष्ट्र में सम्मिलित मराठवाड़ा क्षेत्र के निजाम के आधीन था और वहाँ के वासी उर्दू बोलते हैं। इस आंदोलन में तन-मन-धन से सहायता देने का आश्वासन भी उन्होंने दिया था।

साहिर द्वारा साम्प्रदायिक आग भड़काने की इन कोशिशों से फिल्म उद्योग में आक्रोश फैल गया है। फिल्म लेखक संघ के अध्यक्ष ब्रजेन्द्र गौड़ ने साहिर की निन्दा करते हुए कहा कि फिल्म उद्योग में साम्प्रदायिकता फैलाने की यह कोशिश सफल नहीं हो सकेगी।

सुप्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक-अभिनेता मनोजकुमार, निर्माता शक्ति सामंत, गीतकार भरत व्यास, मजरूह सुल्तानपुरी, पं. गिरीश, संगीतकार एस. एन. त्रिपाठी आदि ने भी ‘माधुरी’ प्रतिनिधि से हुई भेंट में साहिर की इन हरकतों की निन्दा की। (16 दिसंबर, 1967)

देखा जा सकता है कि ‘माधुरी’ का हिन्दी राष्ट्रवाद जागकर गोलबंदी शुरू कर चुका है। साहिर ने अक्षम्य अपराध जो किया है, उर्दू की अपनी ज़मीन को अपना कहने का, इसके आगे उनके सारे प्रगतिशील पुण्य ख़ाक हो जाते हैं, अब तक के सारे भजन-कीर्तन बेकार, सारी लोकप्रियता ताक पर। आज का पाठक यह पूछ सकता है कि अगर हिन्दी के लिए आंदोलन चलाना साम्प्रदायिक नहीं था तो उर्दू में ऐसी क्या ख़ास बात थी जिसके स्पर्श मात्र से आपकी तरक़्क़ीपसंदगी मशकूक हो जाती थी? यह उसी ‘शूच्याग्रे न दत्तव्यं’वाले युयुत्सु’ उत्साहातिरेक का लक्षण था जो हिन्दी के हिमायतियों में पचास और साठ के दशक में ज़बर्दस्त तौर पर तारी था, जो कुछ राज्यों में उर्दू को दूसरी भाषा का दर्जा देने के नाम पर ही अलगाववाद सूँघने लगता था। पाठकों ने एक बार फिर ‘माधुरी’ के मुहिम की ताईद करते हुए कई ख़त लिखे, सिर्फ़ एक लेते हैं:

‘साहिर का असली चेहरा’  शीर्षक-पत्र में कहा गया: ‘साहिर की लोकप्रियता प्रगतिशील विचारों के कारण ही बढ़ी है। एक प्रगतिशील साहित्यजीवी अगर संकीर्णता और अलगाववादी लिजलिजी विचारधारा को प्रोत्साहन देता है तो ऐसी प्रगतिशिलता को ‘फ्राड’ ही कहा जाएगा। साहिर निश्चय ही उर्दू का पक्षपोषण कर सकते हैं, लेकिन राष्ट्रभाषा का अपमान करके या अपमान की भाषा बोलकर नहीं। साहिर साहब को यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि राष्ट्र और राष्ट्रभाषा की क्या अहमियत होती है। उर्दू को हथियार बनाकर हिन्दी पर वार करना कौन देशभक्त हिन्दुस्तानी पसंद करेगा?…फिरकापरस्तों की यह कमजोरी होती है कि वे वतन की मिट्टी के साथ, उसकी पाकीजा तहजीब के साथ, उसकी भावनात्मक एकता के साथ गद्दारी ही नहीं बलात्कार तक करने की कोशिश करते हैं।…अच्छा हो साहिर साहब अपने रुख में परिवर्तन कर लें अन्यथा प्रगतिशीलता का जो नकाब उन्होंने चढ़ा रखा है, वह हमेशा के लिए उतार फेंके ताकि असली चेहरे का रंग-रोगन तो नजर आए।’

इस धौंस-भरे विमर्श में राष्ट्रभाषा हिन्दी तो सदा-सर्वदा लोकाभिमुख रही है, वह तो जनवाद के ऊँचे नैतिक सिंहासन से जनता से बोलती हुई जनता की अपनी भाषा है, उसको साम्राज्यवादी भला कहा कैसे जा सकता है! ऐसा पूर्वी बंगाल में बांग्ला के साथ पाकिस्तान भले कर सकता है, जबकि भारत की पूरी तवारीख़ में आक्रामकता के उदाहरण नहीं मिलते। दिलचस्प यह भी है कि इस विवाद के दौरान साहिर को कभी अपनी स्थिति साफ़ करने का मौक़ा नहीं दिया, हाँ चौतरफ़ा उनपर हल्ला अवश्य बोला गया। इस विवाद की अनुगूँज अंग्रेजी ‘फ़िल्मफ़ेयर’ में भी उठी, पर वहाँ कम-से-कम कुछ ऐसी चिट्ठियों को भी छापा गया जो उर्दू व हिन्दुस्तानी यानि साहिर का पक्ष लेती दिखीं, जबकि एक भी ऐसी चिट्ठी ‘माधुरी’ की उपलब्ध फ़ाइलों में नहीं दिखी।[29]

‘माधुरी’ से ही एक आख़िरी ख़त– चूँकि यह इस मुद्दे पर सबसे उत्कृष्ट बयान है- देकर इस विवाद और लेख की पुर्णाहुति की जाए। फिल्मेश्वर[30] ने अपने अनियत स्तंभ ‘चले पवन की चाल’ में ‘हिन्दी-उर्दू के नाम पर नफरत के शोले भड़काने वाले साहिर के नाम एक खुला पत्र’ लिखा, जिसमें सिद्ध किया गया कि हिन्दी-उर्दू दो अलहदा भाषाएँ नहीं हैं, गोकि उनकी लिपियाँ एक नहीं हैं: ग़ालिब ने अपने को हिन्दी का कवि कहा, और ख़ुद साहिर की नागरी में छपी किताबें उर्दू संस्करणों से ज़्यादा बिकी हैं, वो भी बग़ैर अनुवाद के, तो हिन्दी साम्राज्यवादी कैसे हो गई? और फिल्मों की भाषा अगर 97 प्रतिशत उर्दू है, तो वो हिन्दी हुई न? फि‍र झगड़ा कैसा!  इस ख़त में साहिर के पूर्व-जन्म के पुण्य को बेकार नहीं मानकर उनके ‘अलगाववादी’ उर्दू-प्रेम पर एक छद्म अविश्वास, एक मिथ्या आहत भाव का मुजाहिरा किया गया है, कि ‘साहिर, आप तो ऐसे न थे’ या ‘आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी’। छद्म और मिथ्या विशेषणों का सहारा मैंने इसलिए लिया है क्यूँकि शीर्षक में ही निर्णय साफ़ है, बाक़ी पत्र तो एक ख़ास अंदाज़े-बयाँ है, कोसने का एक शालीन तरीक़ा, बस। बहरहाल, पत्र-लेखक बेहद हैरत में है:

आख़िर बात क्या है? हिन्दी और उर्दू की? या हिन्दी और उर्दू के नाम पर सम्प्रदाय की? इस धर्मनिरपेक्ष राज्य में आजादी के बीस सालों में इतना करिश्मा तो किया ही है कि हमारे अन्दर जो संकुचित भावनाओं की आग घुट रही है, हमने उसे उसके सही नाम से पुकारना बंद कर दिया है, और उसे हिन्दी-उर्दू का नाम दे कर हम उसे छिपाने की कोशिश करते [रहते] हैं।

आप अपनी भावुक शायरी में कितनी ही लफ्फाजी करते रहते हों, यह सही है कि आपके दिल में एक दिन इनसान के प्रति प्रेम भरा था। आप सब दुनिया के लोगों को एकसाथ कंधे से कंधा मिलाकर खुशहाली की मंजिल की तरफ बढ़ते हुए देखना चाहते थे। लेकिन दोस्त, आज ये क्या हो गया? इनसान को इनसान के करीब लाने के बजाए, आप हिन्दी-उर्दू की आड़ में किस नफरत के शोले से खेलने लगे? सच कहूँ तो आपकी आवाज से आज जमाते-इस्लामी की घिनौनी बू आती है। आपने पिछले दिनों वह शानदार गीत लिखा था:

नीले गगन के तले,
धरती का प्यार पले

यह पत्र लिखते समय मुझे उस गीत की याद हो आयी, इसलिए आपको देशद्रोही कहने को मन नहीं होता। पर मुशायरे में आपकी तकरीर को पढ़कर आपको क्या कहूँ यह समझ में नहीं आता। पूरे हिन्दुस्तान की एक पीढ़ी, जिसमें पाकिस्तान की भी एक पीढ़ी शामिल की जा सकती है, आपकी कलम पर नाज करती थी, आपके खयालों से (खयालों उर्दू का नहीं हिन्दी का शब्द है, उर्दू में इसे खयालात कहते हैं, हुजूरेवाला) प्रभावित थी। आपने उस पीढ़ी की तमाम भावनाओं को अपनी साम्प्रदायिकता की एक झलक दिखा कर तोड़ दिया।…आपने एक बार लिखा था:

तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा
इनसान की औलाद है इनसान बनेगा

लेकिन आपकी आजकल की गतिविधि देखते हुए तो ऐसा लगता है कि ये आपकी भावनाएँ नहीं थीं, आप सिर्फ फिल्म के एक पात्र की भावनाएँ लिख रहे थे…सारे हिन्दुस्तान में फिल्म उद्योग एक ऐसी जगह थी जहां जाति, प्रदेश और धर्म का भेदभाव काम के रास्ते में नहीं आता था। और आप इन्सानियत के हामी थे। पर आपने इस वातावरण में साम्प्रदायिकता का जहर घोल दिया। लगता है इनसान की औलाद का भविष्य आपकी नजर में सिर्फ एक है:

तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा
शैतान की औलाद है शैतान बनेगा

मैं आख़िर में इतनी ही दुआ करना चाहता हूँ: खुदा उर्दू को आप जैसे हिमायतियों से बचाये! (15 दिसंबर 1967)।

एक झटके में साहिर लुधियानवी जैसा लोकप्रिय शायर ‘फ़्राड’, ‘फिरकापरस्त’, ‘साम्प्रदायिक’ और अमूमन ‘देशद्रोही’ क़रार दिया जाता है। इसमें इतिहास के विद्यार्थी को कोई हैरत नहीं होती क्योंकि फिल्मेश्वर की आलोचना चिरपरिचित ढर्रे पर चलती है, और इसको अपने मंत्रमुग्ध पाठक-समूह पर पूरा भरोसा है। कई दशकों से साल-दर-साल चलते आ रहे मुख्यधारा के राष्ट्रवादी विमर्श ने एक ख़ास तरह की परंपरा का सृजन किया था, और उसमें जो कुछ पावन, महान और उदात्त था, उसे अपनी झोली में डाल लिया था,और जो अल्पसंख्यक एक ख़ास तरह के सांस्कृतिक वर्चस्व को मानने से इन्कार करते थे, वे अलगाववादी कह कर अलग-थलग कर दिए गए थे। ये दोनों धाराएँ परस्पर प्रतिद्वंद्वी मानी गईं जबकि दोनों एक ही राष्ट्रवादी नदी के दो किनारे-भर थे। हिन्दी राष्ट्रवाद इस प्रवृत्ति का एक अतिरेकी विस्तार मात्र था, वैसे ही जैसे कि उर्दू राष्ट्रवाद। जब इन दो किनारों को मिलाने वाली फ़िल्मी दुनिया की बिचौलिया पुलिया ज़बान को उर्दू के शायर ने उर्दू नाम दिया तो इस हिमाकत पर उन्हें वैसे ही संगसार होना ही था, जैसे एक-डेढ़ पीढ़ी पहले गांधी को उनकी हिन्दुस्तानी की हिमायत के लिए।[31]

बतौर निष्कर्ष यह कहा जा सकता है कि ‘माधुरी’ ने सिनेमा को हिन्दी जनपद में सम्मानजनक, लोकप्रिय और चिंतन-योग्य वस्तु बनाने में अभूतपूर्व, संयमित, रचनात्मक योग दिया। लेकिन जिस तरह फ़िल्म-निर्माताओं की व्यावसायिक चिंताओं को समझे बग़ैर मुख्यधारा का सिनेमा नहीं समझा जा सकता, उसी तरह ‘माधुरी’ की हिन्दी-प्रियता का आकलन किए बग़ैर इसके सिनेमा-प्रेम और सिने-अध्ययन की इसकी विशिष्ट प्रविधि का जायज़ा नहीं लिया जा सकता।

इस विशिष्ट पद्धति की एक आख़िरी मिसाल। हम मुख्यधारा के फ़िल्म अध्ययन में कथानक को संक्षेप में कहते हैं, और जल्द ही काम के दृश्य के विश्लेषण पर बढ़ जाते हैं। लेकिन अरविंद कुमार ने बक़लम ख़ुद फ़िल्म को क़िस्सागोई के अंदाज़ में पेश किया। फ़िल्मों को शॉट-दर-शॉट, बआवाज़, शब्दों में पेश करने की पहल करके उन्होंने एक नई विधा को ही जन्म दे दिया, जो आप कह सकते हैं कि किसी हिन्दुस्तानी सिनेमची के हाथों ही संभव था। क्योंकि यहीं पर आपको ऐसे लोग बड़ी तादाद में मिल सकते हैं जो कि फ़िल्म देखकर आपसे तफ़सील से उसकी कहानी बयान करने को कहेंगे। ख़ासतौर पर उस ज़माने में, जब आप ये नहीं कह सकते थे कि देख लेना, टीवी पर आ जाएगा, या देता हूँ, है मेरे पास। इस क़दर विस्तार से सुनने के लिए, और कहने के लिए वक्ता-श्रोता के पास फ़ुर्सत का वक़्त होना भी ज़रूरी है। ये बात भी याद रखने की है कि आठवें दशक के उस दौर में एक मौखिक लोकाचार को अपनी पसंद की पुरानी फ़िल्मों को कहन शैली में ढालकर उन्होंने अपने चिर-सहयोगी और नए संपादक विनोद तिवारी का हाथ भी मज़बूत किया, कि संपादकी का संक्रमण-काल सहज गुज़र जाए, पत्रिका वैसी ही लुभावनी व ग्राह्य बनी रहे। धारावाहिक रूप में छपने वाली इस शृंखला में ‘आदमी’, ‘प्यासा’, ‘महल’, ‘बाज़ी’, ‘देवदास’ जैसी शास्त्रीय बन चुकी कई लोकप्रिय फ़िल्मों का पुनरावलोकन किया, और यह लेखमाला ‘शिलालेख’ के नाम से जानी गई।[32]

और भी बहुत कुछ ऐतिहासिक और दिलकश था ‘माधुरी’ में, पर बाक़ी पिक्चर फिर कभी।

(इस लेख को सीएसडीएस व बाहर के कई गुरुओं-दोस्तों-सहयोगियों ने सुना-पढ़ा है। उनकी हौसलाअफ़ज़ाई का शुक्रिया- ख़ासतौर पर शाहिद अमीन, रवि वासुदेवन, आदित्य निगम, अभय दुबे, प्रभात, संजीव, विभास, भगवती, विनीत व सौम्या का। राष्ट्रीय फ़िल्म अभिलेखागार, पुणे की मददगार श्रीमती रचना जोशी व दीगर स्टाफ़ का भी बहुत-बहुत शुक्रिया। पंकज जी-वंदना राग तथा राजेश-संगीता व करुणाकर का विशेष शुक्रिया जिन्होंने मेरे पुणे-प्रवास को हर बार लज़ीज़ बनाया। मित्र पीयूष दईया को भी अनेकश: धन्यवाद कि मुझसे लिखवा लिया।)


[1] इधर फिर से ‘फ़िल्मफ़ेयर’  और ‘सिनेब्लिट्ज़’ जैसी अंग्रेज़ी पत्रिकाओं के हिन्दी संस्करण आने लगे हैं, लेकिन नाम सहित पूरी सामग्री अनुवाद ही होती है। याद करें कि बंद होने के पहले कुछ समय तक ‘माधुरी’ का नाम भी  ‘फ़िल्मफ़ेयर’ ही रहा था।

[2] हिन्दी फ़िल्म पत्रकारिता पर देखें ललित मोहन जोशी का सुचिंतित आलेख, ‘सिनेमा ऐण्ड हिन्दी पीरियॉडिकल्स इन कॉलोनियल इंडिया: 1920-1947’ जो मंजू जैन(सं.) नैरेटिव्स ऑफ़ इंडियन सिनेमा, प्राइमस बुक्स, दिल्ली, 2009 में संकलित है।

[3] अमृतलाल नागर, ये कोठेवालियाँ, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2010।

[4] देखें इनकी आत्मकथाएँ: नारायण प्रसाद ‘बेताब’, बेताब चरित, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली, 2002(मूलत: 1937 में प्रकाशित); कविरत्न पं. राधेश्याम कथावाचक, मेरा नाटककाल: थिएटर के एक आदि व्यक्ति की आत्मकथा, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली, 2004। तुलना के लिए आग़ा हश्र कश्मीरी के व्यक्तित्व व कृतित्व को देखा जा सकता है: अनीस आज़मी: आग़ा हश्र कश्मीरी के चुनिंदा ड्रामे, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली, 2004, ख़ासतौर पर ‘हयात और कारनामे’,खंड 1. पारसी थिएटर में भाषा के मसले को लेकर देखें कैथरीन हैन्सन का अहम लेख, ‘लैंग्वेजेज आन स्टेज: लिंग्विस्टिक प्लुरलिज़म ऐण्ड कम्युनिटी फ़ॉर्मेशन इन लेट नाइन्टीन्थ सेन्चुरी पारसी थिएटर’, मॉडर्न एशियन स्टडीज़, वॉल्यूम 27, नंबर2, (मई 2003), पृ. 381-405। हमारे अपने समय के बहुमाध्यमी लेखक स्वर्गीय मनोहर श्याम जोशी ने प्यार के इज़हार के लिए ‘कसप’ में उर्दू शायरी और सिनेगीतों पर हमारी निर्भरता पर रचनात्मक टिप्पणियाँ की हैं। देखें इस विषय पर मेरा आलेख, ‘कसपावतार में मनोहर श्याम की भाषा लीला’, संवेद, फ़रवरी, 2007, पृ. 81-92।

[5] स’आदत हसन मंटो, दस्तावेज़ मंटो, (सं. बलराज मेनरा, शरद दत्त), खंड 5, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1995; उपेन्द्रनाथ अश्क, फिल्मी दुनिया की झलकियाँदो भाग, नीलाभ प्रकाशन, इलाहाबाद, 1979; भगवतीचरण वर्मा, रचनावली,खंड 7 और 13, राजकमल प्रकाशन, 2008। दिलचस्प है कि इन तीनों अदीबों का त’आल्लुक रेडियो और सिनेमा से भी रहा, मंटो का बेशक सबसे ज़्यादा और गहरा।

[6] अरविंद जी हमारे समय के अथक और बेमिसाल कोशकार हैं- उनकी वेबसाइट http://arvindlexicon.com/3340/arvind-kumar-and-his-works/ पर तमाम तफ़सीलात और शब्दार्थ-खोज के विकल्प मौजूद हैं। उनकी जीवनी के लिए देखें, अनुराग की  दो प्रस्तुतियाँ,  http://lekhakmanch.com/2011/01/16/रुकना-मेरा-काम-नहीं और http://lekhakmanch.com/2011/01/17 लगन-से-किए-सपने-सच।

[7] हरीश तिवारी, ‘फिल्मी गीतों में अश्लीलता सहनी ही पड़ेगी’, सरगम का सफ़र, 2 मार्च, 1973।

[8] फ़िल्ल्लमेश्वर, ‘किस्स्स्स्सा किस्स का’, 22 सितंबर, 1967।

[9] अभी हाल में मशहूर सिने-चिंतक जयप्रकाश चौकसे ने शम्मी कपूर को गोया श्रद्धांजलि देते हुए कश्मीर में बनी फ़िल्मों को याद किया। देखें, उनके स्तंभ, ‘पर्दे के पीछे’, में छपा लेख, ‘डल झील के आईने में यादें’,दैनिक भास्कर,  8 सितंबर 2011।

[10] हमारे दौर में सिने-मनोरंजन टीवी-वीडियो और नक़ल करने की सहूलियतों के निहायत सस्ता और सहज-सर्वोपलब्ध हुआ है। मिसाल के तौर पर देखें मल्टीप्लेक्स के बरक्स ‘खोमचाप्लेक्स’ पर रवीश की यह रिपोर्ट : http://naisadak.blogspot.com/2010/10/blog-post_13.html

[11] 30 जून, 1967 का अंक अच्छे सिनेमाघर के लिए चलाए गए आंदोलन का औपचारिक प्रस्थान-बिन्दु था‌।

[12] वैसे कुछ ठोस नतीजे भी निकले थे, ख़ासकर महानगरों में। मिसाल के तौर पर ‘फिल्मक्षेत्रे’ नामक स्तंभ में यह ख़बर छपी कि ‘माधुरी’ में छपी शिकायत के बाद बंबई के पुलिस कमिश्नर ने नॉवेल्टी सिनेमाघर का एक दिन का लाइसेन्स रद कर दिया, 3 अगस्त, 1973।

[13] देखें धार्मिक फिल्म विशेषांक, 20 अक्तूबर, 1967।

[14] ये लहर वैसे 70 के दशक में ज़ोर पकड़ती है, तभी ‘माधुरी’ कहानियाँ लेकर भी आती है, मसलन, गोविंद मूनिस की हिमायत, रांगेय राघव की कहानी ‘काका’ के लिए, 6 जुलाई, 1973, और जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘गुण्डा’ के  लिए, 7 दिसंबर, 1973।

[15] ‘सिनेमा और साहित्यकार’ स्तंभ में  सुमित्रानंदन पंत, ‘जनरुचि का प्रश्न’, 24 फ़रवरी, 1967। दुष्यंत कुमार, ‘जब रामधारी सिंह दिनकर ने चेतना देखी’, विजय बहादुर सिंह (सं), दुष्यंत कुमार रचनावली, खंड 4, किताब घर प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ.128-32।

[16] ‘बलूचिस्तान से दिल्ली, दिल्ली से बंबई: लोकप्रिय लेखक गुलशन नंदा की लंबी कहानी’, 21 अप्रैल 1967। ‘माधुरी’ की यह साहित्यिक यात्रा दोतरफ़ा थी: शास्त्रीय से लोकप्रिय की और, तो उलट भी:   मिसाल के तौर पर देखें 22 मई 1964 के अंक में छपा शशि बंधुभ का आलेख, ‘फिल्मी गीतों में छायावाद’। यहाँ व्यंजना रंचमात्र भी नहीं, उल्टे प्रसाद व महादेवी के बरक्स शकील बदायूँनी के गीतों के मौजूँ उद्धरण हैं। हालाँकि ‘माधुरी’ ने फ़िल्मी प्रतिमानों का साहित्यिक मख़ौल भी जब-तब उड़ाया। इस तरह वह अपने साहित्य में पगे दुचित्ता पाठकों को फ़िल्मों को लेकर निंदा-रसपान से पूरी तरह महरूम भी नहीं रख रही थी। मज़ेदार है कि उसी साल आगरा विश्वविद्यालय से ओंकारप्रसाद माहेश्वरी ने ‘हिन्दी चित्रपट और गीति-साहित्य’ पर अपनी पीएचडी हासिल की, जो 14 साल बाद, 1978 में जाकर इसी नाम से विनोद पुस्तक मंदिर,आगरा से छपी। किताब के लिए मिले अनुदान की संस्तुति के लिए लेखक ने डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ओर डॉ. रामविलास शर्मा को शुक्रिया कहा है। देखें, प्राक्कथन, पृ. 4. इस अनूठी किताब की ओर ध्यान खींचने के लिए मैं ‘तलत गीत कोश’ के संकलक, कानपुर निवासी श्री राकेश प्रताप सिंह का आभार मानता हूँ।

[17] 17 जून 1966।

[18] देखें एरिक बार्नोव व कृष्णास्वामी, इंडियन फ़िल्म्स, कोलंबिया युनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क व लंदन, 1963, पृ. 55-68. पी सी चैटर्जी, ब्रॉडकास्टिंग इन इंडिया, सेज पब्लिकेशन्स, 1987।

[19] एक ईमेलाचार में अरविंद जी ने बताया कि ‘राही मासूम रज़ा का छद्मनाम से एक स्थायी स्तंभ था ‘माधुरी’ में। उसका काम था फ़िल्मजगत की अंदरूनी बातों पर मज़ेदार भाषा में लिखना। वह भाषा राही ही लिख सकते थे। उन्हीं की एक लेखमाला इसी स्तंभ में थी- ‘हेमा मालिनी पर मुक़दमा’…यह इंदिरा गांधी पर चल रहे मुक़दमे की पैरोडी होती थी।’

[20] 30 जुलाई, 1965।

[21] महेन्‍द्र सरल, ‘कनक छरी-सी कामिनी’, 12 जून 1966।

[22] ‘अंधी कैंची, पैनी धार: भारतीय सेंसर पर एक चिंतनशील निर्देशक के विचार’, 24 सितंबर, 1965।

[23] देखें मुकुल केशवन, ‘उर्दू, अवध ऐण्ड द तवायफ़: दि इस्लामिकेट रूट्स आफ़ इंडियन सिनेमा’, जो ज़ोया हसन(सं),फ़ोर्जिंग आइडेन्टिटीज़: जेन्डर, कम्युनिटीज़ ऐण्ड स्टेट, काली फ़ॉर विमेन, 1994, दिल्ली में संकलित है।  अली हुसैन मीर व रज़ा मीर, ऐन्थेम्स आफ़ रेसिस्टेन्स: अ सेलेब्रेशन ऑफ़ प्रोग्रेसिव उर्दू पोएट्री, रोली बुक्स, नई दिल्ली, 2006, ख़ासतौर पर अध्याय 7: ‘वो यार जो है ख़ुशबू की तरह, है जिसकी ज़बाँ उर्दू की तरह’।

[24] रविशंकर शुक्ल, हिन्दी वालो, सावधान!, प्रचार पुस्तकमाला, काशी नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, 1947।

[25] हिन्दी, अंग्रेज़ी व उर्दू में इस मसले के ऐतिहासिक विवेचन पर काफ़ी कुछ लिखा जा चुका है। मिसाल के तौर पर देखें, आलोक राय हिन्दी नैशनलिज़म, ओरिएण्ट लॉन्गमैन, दिल्ली, 2000। फ़्रन्चेस्का ओरसीनी, द हिन्दी पब्लिक स्फियर,ऑक्सफ़र्ड युनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्ली, 2003। दिलचस्प यह भी है कि अपनी हालिया किताब प्रिन्ट ऐण्ड प्लेज़र: पॉपुलर लिटरेचर ऐण्ड एन्टरटेनिंग फ़िक्शन्स इन कॉलोनियल नॉर्थ इंडिया (ऑक्सफ़र्ड युनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्ली, 2009) में फ़्रन्चेस्का ने बताया है कि लोकप्रिय साहित्य व संस्कृति में भाषा-व्यवहार की वह हदबंदी नहीं दिखाई देती जो पढ़े-लिखों की दुनिया में थी। पारसी थिएटर और सिनेमा की ज़बान उसी दरियादिल जनपद से तो आ रही थी।

[26] 5 नवंबर, 1965।

[27] 22 अक्तूबर, 1965।

[28] मैं ये चर्चा आधुनिक हिन्दी के संदर्भ में कर रहा हूँ, जहाँ आकर भाषाएँ अलग-अलग रास्ते बनाने लगती हैं, और नाम को लेकर भी लफ़ड़ा शुरू हो जाता है, वरना इतिहासकारों में अब तो ये आम सहमति है कि जो भी वो ज़बान रही हो, उसका सबसे पुराना, मध्यकालीन नाम तो हिन्दी ही था। देखें, शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी, अर्ली उर्दू लिटररी कल्चर ऐण्ड हिस्ट्री, ऑक्सफ़र्ड युनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्ली, 2001। तारिक़ रहमान, फ़्रॉम हिन्दी टू उर्दू: ए सोशल ऐण्ड पॉलिटिकल हिस्ट्री,क्सफ़र्ड युनिवर्सिटी प्रेस, कराची, 2011।

[29] फ़िल्मफ़ेयर, 16 फ़रवरी, 1968।

[30] यह ‘फ़िल्मेश्वर’ कोई और नहीं, ख़ुद अरविंद जी थे, यह ईमेल में बताते हुए उन्होंने यह भी जोड़ा कि एक बार कमलेश्वर ने उनसे कहा, कोई और नाम क्यों नहीं ले लेते, लोग समझते हैं कि फ़िल्मेश्वर मैं ही हूँ।

[31] इस लिहाज से 25 सितंबर, 1964 यानि शुरुआती दौर का संपादकीय ‘राष्ट्रभाषा हिन्दी’ काफ़ी संतुलित है, और हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी साहित्य व सिनेमा के संबंध को लेकर आशान्वित भी, लेकिन तब साहिर ने ये बात नहीं कही थी। एक और अहम बात यह कि अरविंद जी का मानना था कि उर्दू को लोग अब समझते नहीं हैं। इसके लिए उन्होंने ‘बर्क सी लहराई तो…गाने को लेकर एक सर्वेक्षण करवाया, बर्क का मतलब फ़िल्म उद्योग के लोगों से पुछवाया,अधिकतर को इसका मतलब पता नहीं था। उन्होंने साबित कर दिया भाषा वह चलेगी जो आसान हो, फिर वह चाहे उर्दू हो या हिन्दी, लेकिन बर्क जैसा शब्द नहीं चलेगा।’ देखें, उनकी जीवनी वाला वेबपृष्ठ।

[32] मिसाल के लिए देखें 1 जुलाई 1977 का अंक, पृ. 15 : जिसका बैनर था- वी. शांताराम निर्देशित प्रभात चित्र, आदमी;हिन्दी फ़िल्म इतिहास के शिलालेख * अरविंद कुमार द्वारा पुनरावलोकन।

दुनिया नाक रगड़ कर हिंदी के पास आएगी : अरविंद कुमार

पेंगुइन वाले कोश के विमोचन पर बोलते अरविंद कुमार

ऐसे सौभाग्यशाली लोग बहुत ही कम होते हैं जिन्हें अपने सपने साकार करने में पूरे परिवार का निरंतर सहयोग मिले। विशेषकर ऐसे जोख़िमभरे सपने जिस में स्वप्नद्रष्टा को अपनी अच्छी भली नौकरी छोड़नी हो, अनुदान तो दूर की बात है, कहीं से कैसी भी आर्थिक सहायता न मिलने वाली हो, जिनका पूरा होना भी अनिश्चित हो। इतना ही नहीं, जिसके रास्ते में एक के बाद एक भारी से भारी अड़चन आती रहे, फिर भी किसी का मनोबल न टूटे, ऐसी मिसालें दुनिया में कुछ कम ही हैं। अरविंद कुमार ऐसे ही सौभाग्यशाली व्यक्ति हैं। प्रस्तुत हैं उनसे अनुराग की बातचीत के कुछ अंश-

आपको शलाका सम्‍मान प्रदान किया गया। आपकी क्‍या प्रतिक्रिया है?

कभी सपने में भी कल्पना नहीं थी कि मेरे साथ ऐसा कुछ होगा। ग़ालिब के शब्दों में इतना ही कह सकता हूं– बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा। हिंदी अकादेमी के उपाध्यक्ष श्री अशोक चक्रधर और उनके चयन मंडल ने मुझे इस योग्‍य समझा—चमत्कृत हूं और बहुत प्रसन्न।

आपको यह नहीं लगता कि भाषा के क्षेत्र में जितना काम किया है, उस हिसाब से आपको समुचित मान-सम्‍मान नहीं मिला ?

काम करने वाले का काम है काम करना, मान-सम्मान करने वाले का काम है मान-सम्मान करना। उनके बारे में मियाँ ग़ालिब के ही अल्फ़ाज़ हैं– चाहिए अच्छों को जितना चाहिए, वे अगर चाहें तो फिर क्या चाहिए। इसका संदर्भ तो बिल्कुल दूसरा है, पर सम्मान देने वालों पर भी चस्पाँ होता है।

जब पंद्रह साल की उमर में बालश्रमिक के रूप में छापेख़ाने में दाख़िल हुआ, तभी से मेरे लिए काम, अपने आप में सम्‍पूर्ण आत्मसम्मान रहा है। कभी किसी से कोई गिला नहीं किया। सन् 45 में ही मैं करोलबाग़, दिल्ली के कांग्रेस सेवादल और आज़ादी के दीवाने एक उग्र दल ‘लालक़िला ग्रुप’ का सदस्य बन गया था। सन् 47 में देश आज़ाद हुआ तो मुझ जैसे कुछ दोस्तों ने देशभक्ति की एक परिभाषा गढ़ी। वह यह कि हर काम मेहनत से करना, ईमानदारी से करना ही 47 के बाद देशभक्ति का पैमाना है। मैं अभी तक उस पर क़ायम हूँ—हर नारेबाज़ी से दूर, जितना कर सकता हूँ, करता हूँ। दूसरों की बात दूसरे जानें।

समांतर कोश’, ‘द पेंगुइन इंग्लिश हिंदी/हिंदी इंग्लिश थिसारस एंड डिक्‍शनरीऔर अब अरविंद लैक्सिकन। क्‍या इन सबके लिए आपको किसी संस्‍थान या सरकार से आर्थिक सहायता या अन्‍य तरह की मदद मिली ? आपने इसके लिए कभी कोशिश की ? इसे लेकर आपको किस तरह के अनुभव हुए।

शुरू में, यानी 1973-74 में कई जगह कोशिश की। किसी-न-किसी बहाने टाल दिया गया। हिंदी के किसी काम के लिए कुछ माँगना सब से बड़ी ज़लालत है। अगर कोई कुछ देता भी है तो पहले सारे काम का श्रेय लेना चाहता है, फिर किसी-न-किसी बहाने टालता रहता है। सहायता के पीछे भागते-भागते न जाने कितना समय निकल जाता। मैंने सोचा, चलो समुद्र में कूद पड़ते हैं, जो होगा देखा जाएगा। एक सहारा बिल्कुल अपना था। दिल्ली के मॉडल टाउन में अपना मकान था। रहन-सहन सादा था। मुंबई में ‘माधुरी’ के संपादन काल की थोड़ी-बहुत बचत थी। सोचा था कि दो साल में थिसारस बनाने का काम पूरा हो जाएगा।

पर ऐसा हुआ नहीं। कहावत है सिर मुँडाते ही ओले पड़े। मुझ पर ओले नहीं पड़े, बारिश पड़ी। 1978 की 21 मई को दिल्ली पहुँचे थे। कुछ ही महीने बीते थे। 4 सितंबर को यमुना की मैनमेड भारी बाढ़ ने हमारे घर को सात फ़ुट तक ग़र्क़ कर दिया। मुंबई का जो भी थोड़ा-बहुत अच्छा सामान था, यमुना में बह गया। घर माँ-बाप और भाई और उसकी पत्नी के लिए छोटा था। बस, यही हमारा तारनहारा बना। ‘समांतर कोश’ का काम हम कार्डोँ पर कर रहे थे। मकान में ऊपर ज़ीने के रास्ते में छः फ़ुट ऊँची, गरमी में आँवे जैसी तपती मियानी थी। वहीं कार्ड जमाए थे। यमुना मैया वहाँ तक नहीं गईं। हमारा भविष्य बच गया। वहीं पूरा टब्बर पाँच दिन टंगा रहा। चारों ओर पानी था। हम बिना किसी ख़र्चे के वैनिस में रहने का मज़ा उठाते रहे। चारों तरफ़ कामचलाऊ किश्तियाँ चलती देखते रहे।

मेरा विश्वास है कि ‘समांतर कोश’ ने अपने होने का संकल्प कर लिया था। वह अपने को तो बचाता रहा, और इसके लिए हर क़दम पर मेरी रक्षा करता रहा।

हिंदी की व्यापारिकता और हिंदी के नाम पर सरकारी तंत्रोँ की कृपणता कई बार दयनीय लगती है। स्वयं हिंदी वाले इसमें आगे बढ़ कर हिस्सा लेते हैं, और हिंदीवालों के शोषण में सहभागी बनते हैं। एक कारण यह है कि हम हिंदी वाले अपना अवमूल्यन आप करते हैँ। हिंदी को इंग्लिश से हीनतर समझने की आदत हमें पड़ गई है। अपने 65 साल के प्रिंटमीडिया और अब कंप्यूटर पर काम के बल पर मैँ कह सकता हूँ कि हम अंगरेजी वालोँ से कहीँ आगे और बढ़ कर हैं।

जब ‘समांतर कोश’ प्रकाशित हुआ तो DOE नाम की एक सरकारी संस्था की ओर से मुझे फ़ोन मिला। फ़ोन पर ही उसे इंटरनेट पर डालने की अनुमति तत्काल चाहते थे। मैंने पछा, ‘बीस-पच्चीस साल के तनदेही के बदले मुझे क्या मिलेगा।’ जवाब मिला, ‘कुछ नहीं। आप यह कोश जनहित में सरकार को दे दीजिए!’ मैँ हक्का बक्का रह गया। फिर एक पल बाद मैंने हिंदी के उन लाभभोक्ता से पूछा कि ‘क्या आप महान जनहित वाली नौकरी अवैतनिक कर रहे हैं। चलिए नहीं, तो भी क्या आप भविष्य में पगार लेना बंद कर देंगे। यदि हाँ तो मैं जनहित के लिए यह कोश सरकार को देने के लिए तत्पर हूँ।’ उधर से फ़ोन काट दिया गया।

इसी प्रकार अब मेरे ई-कोश के लिए मेरी बेटी ने उस विभाग से संपर्क किया। अब भी वही उत्तर था ‘अरविंद लैक्सिकन आप हमें जनहित में दे दीजिए…’

अरविंद कुमार का परिवार– ऊपर बाएं पुत्र सुमीत कुमार, बेटी मीता लाल, दामाद अतुल बिहारी लाल। नीचे बीच में अरविंद कुमार और कुसुम कुमार, बाएँ धेवती तन्वी, दाहिने धेवता अक्षय

जो काम कोई संस्था नहीँ कर सकी, आप ने कर दिखाया। कैसे इतना बड़ा काम कर सके ?

किसी संस्था ने यह काम नहीं किया तो कारण यह था कि किसी संस्था ने ऐसा करने का विचार नहीं किया। भारत सरकार ने कोश निर्माण के लिए कई संस्थाएँ बनाई थीं। जहाँ तक मुझे पता है, किसी के पास ऐसा कार्यक्रम नहीं था। अगर कोई संस्था इसमें लगती तो जो होता वह मैंने जापान में देखा है। 1997 में मुझे वहाँ की भाषा संस्था के निमंत्रण पर विश्‍व में थिसारसों की विशाल गोष्ठी में जाना पड़ा। उस संस्था ने 200 लोगों के स्टाफ़ के साथ लगभग बीस साल में जो थिसारस बनाया था, वह समांतर कोश के सामने पिद्दी-सा था। मेरे पास उनका थिसारस है। शायद अब दस-बारह साल में वह कुछ बड़ा हो गया हो।

आपकी दिनचर्या क्‍या है?

आज जब डाटा का काम एक तरह से पूरा हो चुका है, उसमेँ एक-एक अभिव्यक्ति संस्करणानुसार क्रमांकित हो चुकी, तो भी काम को पूरी तरह पूरा नहीं माना जा सकता। मूल डाटा में शब्दकोशोँ जैसी परिभाषाएँ नहीँ थीँ। आख़िर हम तो थिसारस बना रहे थे, न कि शब्दार्थ कोश। पर अब मुझे लगा कि सभी मुखशब्दों या शीर्षशब्दोँ की हिंदी और इंग्लिश परिभाषाएँ जोड़ दी जाएँ तो ‘अरविंद लैक्सिकन’ और भी उपयोगी हो जाएगा। यह काम अब धीरे-धीरे चल रहा है। लगभग 15 प्रतिशत काम हो गया है। शेष भी कालांतर में हो जाएगा। ऑनलाइन संस्करण का सबसे बड़ा लाभ ही यह है कि इसकी सामग्री जब चाहे परिष्कृत होकर सभी उपभोक्ताओँ को मिल जाती है।

आज भी अकसर मैं सुबह सबेरे पाँच बजे उठ जाता हूँ। आचमन आदि से निवृत्त होकर कंप्यूटर के सामने आ बैठता हूँ। बीच-बीच मेँ नहाने के लिए, नाश्ते के लिए, खाने के लिए ब्रेक लेता रहता हूँ। इससे काम की ऊब से आराम मिल जाता है।

शाम के समय, सात बजते-बजते टीवी के सामने जा बैठता हूँ, तथाकथित सस्ते सोप आपेरा यानी सीरियल सपत्नीक देखता हूँ। इसी बीच शाम का खाना भी हो जाता है।

और हाँ, जब से हमारे इलाक़े में बहुत सारे मल्टीप्लैक्स सिनेमा खुल गए हैँ, तो जब भी मन करता है फ़िल्म देख आते हैं। हर तरह की, अच्छी हो या बुरी– इससे कोई मतलब नहीँ होता। घर से निकलने का बहाना भर होता है। जब तब कोई रंगमंचीय नाटक। या कोई साहित्यिक गोष्ठी- यह बहुत ही कम।

थिसारस की रचना प्रक्रिया क्‍या है। मसलन आप शब्‍दों को कहां-कहां से और कैसे ढूंढते हैं। उनसे जुडे़ शब्‍दों को कैसे ढूंढते हैं। शब्‍दों के बीच के संबंध को ध्‍यान में रखकर उन्‍हें कैसे क्रम देते हैं ?

पहले हमें थिसारस और शब्दकोश का अंतर समझना चाहिए।

थिसारस को हम शब्द सूची भी कह सकते हैं। बस, फ़र्क़ यह है कि इसमें शब्दों का संकलन संदर्भ क्रम से किया जाता है। यह संदर्भ क्या हो, यह तय करना बड़ी टेढ़ी खीर है। अपने अनुभव से बताता हूँ। मूर्खतावश मैंने जब दो साल मेँ हिंदी का थिसारस बना डालने की बात सोची थी, तो रोजेट के थिसारस के आधार पर। मुझे लगा था कि उसका संदर्भ क्रम तो बना बनाया है, उसी के खाँचों में हिंदी के शब्द डालने ही तो हैं। पर बाबा रे, ऐसा संभव नहीं था।

हमने हिंदी कोशोँ के ‘अ’ से शब्द खोजने शुरू किए और उन्हें रोजेट के खाँचों में डालना चाहा तो पता चला कि वहाँ उनके उपयुक्त आर्थी कोटियाँ थीं ही नहीं। वे संदर्भ, वे भाव ही वहाँ नहीं थे। भारत के लिए वह मॉडल बेकार था। हमारे पैरों तले से ज़मीन खिसक गई।

उसका थिसारस 1852 में बना था। 20वीं सदी का साठादिक दशक आते-आते उसके बृहद संस्करण बनने लगे। तब तक रोजेट का क्रम अधूरा मालूम पड़ने लगा था। मूल में कुल छः मुख्य विभाग थे। उनमें दो और जोड़े गए। खेद की बात यह है कि इन बृहद् तथाकथित अंतरराष्ट्रीय संस्करणोँ की रचना रोजेट के उत्तराधिकारियोँ से फ़्रैंचाइज़ लेकर कई प्रकाशकों द्वारा संपादक नियुक्त करवा के की गई। इन लोगों ने ऊपरी टीमटाम मात्र की। इधर-उधर किसी ऐंट्री की क्रम संख्या बदल दी गई– किसी अन्य प्रकाशक का कापीराइट ब्रेक करने भर के लिए। मूल आधार रोजेट का वही पुराना संदर्भ क्रम रहा।

रोजेट वैज्ञानिक थे, और उनका वर्गीकरण विज्ञान पर आधारित था। पर मानव मन वैज्ञानिक वर्गीकरण थोड़े ही जानता है! आम आदमी के लिए गेहूँ का संबंध अनाजों से है। विज्ञान में गेहूँ एक घास है। अतः रोजेट में गेहूँ, केला और घास एक साथ हैं। यह क्रम आम आदमी के काम का हो ही नहीँ सकता। हम स्टील या इस्पात की बात करते हैं, दिमाग़ में लोहा भी आता है। पर रोजेट में इन दोनों में कोई रिश्ता नहीं है। लोहा धातुओं में है,  इस्पात एलौय के अंतर्गत। शेर बिल्ली के साथ है,  रीछ आदि वन्य पशुओं के साथ नहीं।

जब यह आधार छिन गया, तो हमने सोचा कि कोई बात नहीं। हमारा अपना छठी सदी का सुप्रसिद्ध ‘अमर कोश’ तो है ही। उसी को मॉडल बना लेते हैं। यह विचार और भी लचर निकला। कहाँ छठी सदी का वर्णाश्रम से ग्रस्त समाज और कहाँ आज का भारत। ‘अमर कोश’ में संगीत तो नैसर्गिक गतिविधि निकली, गायक शूद्र। कैसे संबंध बैठाएँ, कैसे कहाँ जोड़ें!

आपने अभी बताया कि रोजेट का खाँचा काम नहीं आया और न ही अमर कोश का। ऐसे में आपने कौन-सा तरीका अपनाया?

हम तो एक तरह से मर ही गए थे। कहाँ दो साल में काम पूरा करने की बात सोची थी, कहाँ कामचलाऊ क्रम की तलाश में ही चौदह साल निकल गए। बस,  इतना था कि हमने शब्दों का संकलन एक दिन के लिए भी नहीं रोका। हर विषय और उसके उपविषय के कार्ड एक स्वतंत्र ट्रे में रखते गए। ट्रे हमने अपनी ज़रूरत के हिसाब से बनवाई थीं, और कार्ड भी अपने काम के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किए थे। संदर्भ क्रम बदलना होता तो ट्रेओं का क्रम बदल देते। इसे ही मैँ अपनी शब्दोँ को कोई क्रम देने की तलाश की प्रक्रिया कह सकता हूँ। यह आसान सा तरीक़ा ही हमारे काम आया।

थिसारस का विचार आपके मन में कब आया और आपको यह काम इतना महत्‍वपूर्ण क्‍यों लगा कि आपने जमी-जमाई नौकरी छोड़ दी और अपना जीवन थिसारस को समर्पित कर दिया।

मैं आपको 22-23 साल के एक लड़के से मिलवाता हूँ। इससे पहले वह ‘सरिता’ पत्रिका में उपसंपादक था। शाम के समय सांध्य कॉलेज में पढ़ रहा था। बीए में पहुँचा, और मालिक तथा संपादक विश्‍वनाथ जी ने उसकी इंग्लिश के साथ-साथ विश्‍व साहित्य में रुचि देखी तो ‘कैरेवान’ (CARAVAN) में उप संपादक बना दिया। सबसे पहला काम था- सरिता की हिंदी कहानियों का इंग्लिश अनुवाद। साथ-साथ प्रकाशनार्थ आई इंग्लिश रचनाओं को पढ़ना, लेखकों से वांछित विषयों पर लिखवाना, और छपने के लिए तैयार करना। वह ठहरा नौसिखिया! बहुत से शब्द तो वह जानता ही नहीं था। हिंदी से अनुवाद करना हो या किसी इंग्लिश शब्द को बदल कर बेहतर करना हो, तो शब्द संपदा समृद्ध चाहिए। तभी किसी ने उससे रोजेट का थिसारस ख़रीदने को कहा। वह मगन हो गया, उसका दीवाना हो गया। जब वह ‘सरिता’ में था तो इंग्लिश से हिंदी अनुवाद भी करता था। तब हिंदी शब्द नहीं मिलते थे। इसीलिए रोजेट देखते ही वह सोचने लगा कि ऐसी कोई किताब हिंदी में होनी चाहिए।

लेकिन वह जो लड़का था, जिससे मैंने आपको अभी मिलवाया, वह लड़का मैं था। मैं यह हिमाक़त सोच ही नहीं सकता था कि मैं वैसी कोई किताब बनाऊँ। मैं तो यही सोचता था, सोचता क्या था, मुझे पूरा भरोसा था कि तब (बीसवीं सदी के पचासादि दशक में) हिंदी शब्दावली बनाने के जो ताबड़तोड़ प्रयास हो रहे थे, उन्हीं में से हिंदी का थिसारस भी कभी-न-कभी निकलेगा ही। मैं तो अपने काम को बेहतर करने में लगा रहा। मेहनत कर रहा था, तो तरक्क़ी भी होती रही। लेकिन कभी इतना भी नहीं सोचा था कि मैं उस समूह की सभी पत्रिकाओं का एग्ज़क्टिव सहायक संपादक बन जाऊँगा। इस सैंस में मेरी कोई महत्वाकांक्षा कभी नहीं रही। अगर भविष्य की कोई तस्वीर मन में थी थी तो बस यही कभी-न-कभी कंपोज़िंग विभाग का फ़ोरमैन बन पाऊँगा। बस, काम करता रहा, बढ़ता गया, बढ़ता क्या गया, बढ़ाया जाता रहा।

1973 तक वह लड़का 43 साल का अधेड़ हो चुका था। ‘माधुरी’ जैसी यशस्वी और लोकप्रिय पत्रिका का प्रथम संपादक बन चुका था। लेकिन दस साल वहाँ रह कर ऊब चुका था। बार-बार वह सोचता कि क्या इसीलिए पैदा हुआ हूँ। क्या यही उस की नियति है। और तब फ़िल्मी दुनिया की चकाचौंध भरी पार्टियों से परेशान थका-हारा वह 25-26 दिसंबर की रात देर रात तक सो नहीं पा रहा था। न जाने किसने उस रात में उसे याद दिलाया–

‘बीस साल पहले जो तेरी चाहत थी, हिंदी थिसारस की, वह अभी तक अधूरी है। तुझे जो तलाश है जीवन में कुछ करने की, तो उस चाहत को पूरा कर। इच्छा तेरी थी, सपना तेरा था। बस, उसे पूरा करने में जुट जा।’

तब तक मेरे जीवन का कोई सुनिश्चित उद्देश्य नहीँ था। अगली सुबह (26 दिसंबर 1973 की सुबह) मलाबार हिल पर सैर करते करते कुसुम और मैंने मिल कर संकल्प कर लिया चाहे जो हो, हम हिंदी को थिसारस देंगे।

विवाह की स्वर्ण जयंती पर अरविंद कुमार को केक खिलातीं कुसुम कमार

आपके परिवार ने आपकी किस तरह मदद की।

उस सुबह से ही मैं और कुसुम पति-पत्नी से बढ़ कर सहकर्मी हो गए। बच्चे छोटे थे। सुमीत 13 साल का था, मीता 8 की। सबसे पहला काम था महाप्रयास के लिए अपने को तैयार करना। हर तरह के संदर्भ ग्रंथ ख़रीदे—अधिकतर हिंदी और इंग्लिश कोश थे। इंग्लिश के दसियों थिसारस भी ख़रीद डाले। यह भी पता था कि नौकरी छोड़ने के बाद जेब हल्की होगी। काफ़ी कपड़े भी बना लिए। साथ-साथ प्रोविडेंट फ़ंड बचत की दर बढ़ा दी। घर का ख़र्च कम से कम कर दिया।

19 अप्रैल, 1976 को नासिक में गोदावरी स्नान के बाद हमने किताब को पहला कार्ड बनाया। उस पर हम चारोँ के दस्तख़त हैं। सुमीत और मीता थे तो बच्चे, लेकिन उनके मन में सहभागिता की बात कहीँ अड़ी रही होगी। जैसे-जैसे वे बड़े होते गए, हमारे काम के सक्रिय भागीदार बनते गए। कोई 1988 से सुमीत ने हमारे काम के लिए कंप्यूटर की आवश्यकता पर बल देना शुरू किया। बाद में उसने कार्डों के कंप्यूटराइजेशन की प्रक्रिया सँभाली। मीता ने इंग्लिश डाटा की आधारशिला तैयार की।

समाज के लिए कोश ग्रंथों की क्या उपयोगिता है ? या कहें की जीवंत समाज के लिए शब्दकोश क्यों ज़रूरी हैं ?

शब्द मानव की महानतम उपलब्धि हैं। शब्दों ने ही ज्ञान-विज्ञान को जन्म दिया, एक पीढ़ी से दूसरी तक, एक देश से दूसरे तक पहुँचाया, मानवों में संप्रेषण सहज बनाया। यही कारण है कि भाषा के जन्म के साथ ही थिसारस (शब्द सूचियाँ) और शब्दार्थ कोश बनने लगे थे। सबसे पहले सटीक थिसारस और शब्दकोश भारत में बने। निघंटु था तो कुल 1,800 शब्दों की सूची, लेकिन तत्‍कालीन समाज ने उसके निर्माता कश्यप को प्रजापति कह कर सम्माना। और फिर महर्षि यास्क ने निघंटु की व्याख्या के रूप में संसार को सबसे पहला शब्दार्थ कोश और ऐनसाइक्लोपीडिया दिया- निरुक्त। ये दोनों अभी तक पूरे सम्मान के भागी हैं।

शब्दकोश एक आदमी से दूसरे तक पहुँचे शब्द को प्रमाणित करते हैं, ताकि ग़लतफ़हमी की गुंजाइश न रहे। थिसारस हमें अपनी बात कहने के लिए सही शब्दावली देता है। शब्दकोश और थिसारस एक दूसरे के पूरक हैं, लेकिन दो अलग तरह की चीज़ें हैं।

हिंदी का भविष्य क्या है ? वैश्‍वीकरण के दौर में क्या हिंदी सिमट कर रह जाएगी?

हिंदी को कई निराशावादी लोग एक मरती हुई ज़बान समझते और कहते फिर रहे हैं। वे उसी तरह के लोग हैं जो इस्लाम ख़तरे में, हिंदुत्व संकट में जैसे नारे लगाते रहते हैं। हिंदी में इंग्लिश शब्दों के बढ़ते चलन को देख कई बार उनकी बात सही लग सकती है, लेकिन मैं उनसे सहमत नहीं हूँ। बदलते समाज, बदलती तकनीक के साथ हिंदी का बदलना ज़रूरी है। यह बात हर भाषा पर लागू होती है। आज हिंदी वह नहीं है जो ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ के ज़माने में थी, न ही वह जो भारतेंदु जी के युग में थी। और सन् 2050 में वह नहीं होगी, जो आज है। वह हर जगह से शब्द लेगी, विचार लेगी। नए मुहावरे आएँगे। नए लोग नई शैलियाँ लाएँगे। वे लोग नई वर्तनी भी ला सकते हैं। तब हिंदी संसार में शायद सबसे अधिक प्रचलित भाषाओं में बहुत ऊपर होगी।

आप देख रहे हैं, हिंदी के समाचार पत्र प्रसार संख्या में सबसे आगे हैं, और उनकी गुणवत्ता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है। हिंदी के टीवी चैनल संसार के सर्वाधिक लोकप्रिय चैनलों में गिने जाते हैं। हमारी फ़िल्में पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय हो चुकी हैं। तो डर कैसा, डर किससे। आप यह बात समझ लीजिए कि हिंदी बोलने वाले संख्या में इतने अधिक हैं और आज हिंदी वाले संसार में एक बहुत बड़ा ग्राहक समूह हैं। उन तक माल पहुँचाने और बेचने के लिए दुनिया को नाक रगड़ कर उनके पास आना होगा। हिंदी ही क्योँ, दुनिया को भोजपुरी, ब्रजभाषा, गढ़वाली—सब के पास आना होगा।

आज विश्‍व की कई भाषाएँ मरणासन्न हैं। क्या उन्हें बचाया जा सकता है ?

जिन भाषाओं के बोलने वाले कम हैं, या कम होते जा रहे हैं, वे म्यूज़ियम पीस बन कर ही बची रह सकती हैं। यही बात शब्दों की भी है। मेरे बचपन के वे सब शब्द मर चुके हैं, जो उन चीज़ों के थे जो तब काम आती थीं, या उन रीतिरिवाज़ों के हैं जो तब चलते थे। दमड़ी, छदाम, कौड़ी, अधन्ना, इकन्नी कुछ ऐसे ही शब्द हैं। कुछ ही दिनों में चवन्नी शब्द भी भुला दिया जाएगा। यह होना अवश्यंभावी है।

अब आप की क्या योजनाएँ हैं ? हिंदी-इंग्लिश के अतिरिक्त अन्य भाषाओं के कोश भी बनाएँगे क्या ?

हमारे सपने बहुत बड़े हैं। और योजनाएँ भी बहुत बड़ी हैं। अरविंद लैक्सिकन से जो पैसा आएगा, उसका बहुत बड़ा भाग हमारे डाटा में नई भाषाएँ जोड़ने में काम आएगा। तमिल और चीनी भाषाएँ हमारी प्राथमिकता हैं।

इसके पीछे जो राष्ट्रीय और देशभक्ति से भरा विचार है, आप वह समझने की कोशिश करें। भारत की आर्थिक और राजनीतिक सामर्थ्य बढ़ रही है, बढ़ेगी। जिस तरह इंग्लिश भाषी समाजों ने दुनिया भर के देशों से उनकी भाषाओं के कोश बनाए, जैसे इंग्लिश-हिंदी-इंग्लिश या इंग्लिश-चीनी-इंग्लिश, इंग्लिश-जापानी-इंग्लिश, उसी तरह हमारे देश को करना होगा- हिंदी-इंग्लिश-हिंदी, हिंदी-चीनी-हिंदी, हिंदी-जापानी-हिंदी… । सरकार तो इस तरफ़ कुछ करती नज़र नहीं आ रही। इतनी दूरदृष्टि भी उनके पास कभी नहीं रही है। सरकार न ही करे तो ठीक ही है। इंग्लिश में भी ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस के साथ अनेक निजी प्रकाशकों ने यह काम किया।

आपने बाहरी आर्थिक सहायता की बात शुरू में ही पूछी थी। तब मेरे पास अपने को सुपात्र सिद्ध करने का कोई साधन नहीं था। क्या था मैं ? एक महत्वाकांक्षी कोशकार तो था, पर था तो कोरा फ़िल्म पत्रकार ही। लेकिन अब तो मैं अपने को सिद्ध कर चुका हूँ। फिर भी मैं जानता हूँ कि मुझे या मेरे समूह को कहीं से कैसी भी सहायता नहीं मिलेगी। शायद मुझे माँगने की कला ही नहीं आती। लेकिन अब एक हद तक मैं और मेरे साथी आत्मनिर्भर हैं। हम समर्थ हैं, हमारे पास इरादा है। हम न सिर्फ़ तमिल और चीनी शब्द सँजोएँगे, हम जापानी, अरबी, फ़्रैंच, जरमन, स्पेनी—सभी भाषाएँ समाहित करेंगे। बरसों लगेंगे, शायद पीढ़ियाँ, लेकिन जो काम शुरू होता है, या होना चाहता है वह अपना कारिंदा भी चुन लेता है और उसके कंधे पर सवार होकर उसे धकेलता रहता है। इस काम ने हमें चुन लिया है।

‘अरविंद लैक्सिकन’ में आपने रोमन लिपि को भी शामिल किया है। इसकी ख़ास वज़ह क्या है ?

रोमन लिपि शामिल करने के पीछे एक सीधी सी समझ थी। कितने लोग हैं जो हिंदी में टाइपिंग कर सकते हैं ? कितने सारे अ-हिंदी भारतीय हैं, जैसे, लदाखी, बंगाली, तमिल, कन्नड़ जो हिंदी तो समझते हैं पर पढ़ना नहीँ जानते या समझना चाहते हैं पर देवनागरी न जानने के कारण पढ़ नहीं सकते, उनके लिए किसी कोश में हिंदी शब्दों की खोज के लिए रोमन लिपि होनी चाहिए। मेरे छोटे भाई विनोद अमरीका में रहते हैं। उनका बेटा रोहित बड़ा अफ़सर है, पर हिंदी नहीं जानता। विदेशों में बसे भारतीय परिवारोँ की दूसरी पीढ़ी का यही हाल है। पर उनका भारत प्रेम या हिंदी से लगाव कम नहीं हुआ है। अगर रोमन लिपि के साथ-साथ वे लोग वही शब्द देवनागरी में लिखा देखेंगे तो हिंदी का रंगरूप उनकी समझ में आने लगेगा।

अरविंद लैक्सिकन 24 जून से उपलब्ध हो गया है। उसे http://arvindlexicon.com पर देखा जा सकता है। हो सकता है कुछ कमियाँ हों, हमारे सर्वर अभी उतने समर्थ न हों। पर हम और सर्वरों पर ख़र्च करने के संसाधन जुटा रहे हैं। मैं समझता हूँ उस साइट पर उपलब्ध अरविंद लैक्सिकन का नि:शुल्‍क संस्करण आम हिंदी भाषी परिवार की दैनिक शब्दावली की सारी आवश्यकताएं पूरी कर देगा। हिंदी और इंग्लिश के ढेर सारे पर्याय और एक भाषा से दूसरी भाषा के लिए शब्दों की तलाश यहाँ पूरी होगी। लेकिन इसके लिए साइट पर रजिस्टर कराना– अरविंद परिवार का सदस्य बनना ज़रूरी है। आवश्यक फ़ार्म या प्रपत्र साइट पर ही मिलता है।

प्रेस में बाल श्रमिक के रूप में आपने करियर की शुरूआत की। बाद में वहाँ की सभी पत्रिकाओं के प्रभारी सहायक संपादक बने। ‘माधुरी’ और ‘सर्वोत्तम’ जैसी पत्रिकाओं के प्रथम संपादक बने। आपकी सफलता का राज़ क्या है ?

तीन राज़ हैं— मेहनत, लगन, ईमानदारी।

आपका जन्‍म मेरठ में हुआ। बचपन के कुछ वर्षों को छोड़कर आप मेरठ में नहीं रहे। दुनिया भर में घूमे। क्‍या मेरठ याद आता है ?

मेरठ शहर में जन्मा और वहाँ रहा बंदा मेरठ को कभी भूल ही नहीं सकता। नौचंदी उसे हमेशा याद आती रहेगी, वहाँ की रेवड़ी गज़क़ हमेशा मुँह में लार लाती रहेगी।

एक बार टाइम्स संस्थान की कर्ताधर्ता श्रीमती रमा जैन ने मुझ से पूछा था कि आपकी क्या महत्वाकांक्षा है। मेरा जवाब था,  गुज़ारे लायक़ आमदनी और मेरठ में वास। उन्होंने कहा था कि गुज़ारे लायक़ आमदनी की बात समझ में आती है, मेरठ में रहना क्यों ? जवाब में मैंने पूछा था– आपने कभी मेरठ की चाट खाई है। वह हँस पड़ी थीं, और बोली थीं- मैं समझ गई।

आपको बताऊँ कि हम मेरठ वाले चटोरे होते हैं। सुबह नाश्ते में हलवाई की बेड़वीं के साथ जलेबी पर रखा हलवा, तीसरे पहर चाट पकौड़ी। चाट की बात यह है, कभी समोसा, कभी आलू का लच्छा, आलू का भल्ला (टिकिया, कटलेट), दही सौंठ वाली पकौड़ियाँ, गोलगप्पे (पानी पूरी) तो खाते ही हैं, वहाँ शादी-ब्याह में जो ख़ास तरह की कचौरी बनती है, वह कहीं और नहीं मिलती। बाहर हम उसके लिए तरसते रहते हैँ। यह और बात है कि अब न तो वैसा स्वास्थ्य है, न वैसा हाज़मा कि ये लज्जत पूरी तरह उठा सकें।

और एक बात। मेरठ खड़ी बोली का जन्म स्थान माना जाता है। लेकिन वहाँ की बोली वह नहीं है, जो आज की लिखत की हिंदी है। वहाँ के कुछ अजीब मुहावरे हैं। जैसे: अजी, हुआ बहुत! इस का मतलब होता है कि होने की कोई संभावना नहीं है। ऐसे कितने ही मुहावरे मैं गिनाता रह सकता हूँ। काश कोई उनका कोश बनाए।

 

हिंदी भारतीय भाषाओं को करीब लाने का सर्वोत्तम माध्‍यम : महापात्र

नई दिल्ली : हिंदी सिर्फ भाषा नहीं है, बल्कि भारतीय भाषाओं को करीब लाने का एक सर्वोत्तम माध्यम है। किसी कृति का हिंदी अनुवाद के बाद उसका अन्य भारतीय भाषा में अनुवाद आसान हो जाता है। यह बात ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता उडिय़ा कवि डा. सीताकांत महापात्र ने 24 जून, 2011 को दिल्‍ली सचिवालय में आयोजित हिंदी अकादमी, दिल्‍ली के सम्‍मान समारोह में कही। उन्‍होंने कहा कि भाषा केवल वर्णमाला की वस्तु नहीं हैं, बल्कि संस्कृति, सामाजिक इतिहास और समर्थ भाषा उच्च साहित्य को जन्म देती है।

कोशकार अरविंद कुमार को वर्ष 2010-11 के शलाका सम्‍मान से सम्‍मानित किया गया। इसके तहत दो लाख रुपये और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया। उनके ऑनलाइन शब्दकोश ‘अरविंद लैक्सिकन’  को आज ही शुरू किया गया। उनके अलावा रमणिका गुप्ता को विशिष्ट योगदान सम्मान, कृष्ण शलभ को बाल साहित्य सम्मान, गिरधर राठी को काव्य सम्मान, देवेंद्र राज अंकुर को नाटक सम्मान, बृजमोहन बख्शी को ज्ञान प्रौद्योगिकी सम्मान और आलोक पुराणिक को हास्य व्यंग्य सम्मान दिया गया। प्रो. परमानंद श्रीवास्तव को गद्य विधा सम्मान दिया गया,  लेकिन वह स्वास्थ्य कारणों से कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो सके। अन्य सम्मान के रूप में 50-50 हजार रुपये और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया।

दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा कि किसी भी अन्य राज्य की बजाय दिल्ली की हिंदी अकादमी अधिक सक्रिय हैं और पिछले कुछ सालों में इनका दायरा बढ़ गया है।
हिन्दी अकादमी के उपाध्यक्ष अशोक चक्रधर ने कहा कि साहित्य जीवन की पुनर्स्‍थापना है। कार्यक्रम के अंत में दिल्ली सरकार की मंत्री किरण वालिया ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

आज मिलेगा शब्दों का अनोखा खजाना

नई दिल्‍ली: कोशकार अरविंद कुमार शब्‍दों का एक और अनोखा खजाना आज देने जा रहे हैं। 24 जून, 2011 की शाम को हिंदी अकादेमी दिल्ली की ओर से उन्‍हें सन् 2010-2011 का ‘शलाका सम्मान’ दिया जा रहा है। इस शुभ अवसर पर उनकी चिरप्रतीक्षित वेबसाइट ‘अरविंद लैक्सिकन’ ऑनलाइन हो रही है। इस पर शब्दों की खोज नि:शुल्‍क की जा सकेगी। साइट का पता है— http://arvindlexicon.com

वेबसाइट के दो मुख्य भाग हैं— एक ब्‍लॉग (Blog) और दूसरा लैक्सिकन (LEXICON)।

ब्लाग के प्रमुख आकर्षण हैं— अरविंद कुमार द्वारा लिखित भाषा संबंधी सारगर्भित लेख, तथा अन्य रचनाएँ। उनके द्वारा अनूदित कुछ क्लासिक कृतियाँ। जैसे- श्रीमद् भगवद् गीता, शैक्सपीयर कृत त्रासदी ‘जूलियस सीज़र’ का काव्यानुवाद,  ‘जूलियस सीज़र’ का भारतीयकरण ‘विक्रम सैंधव’, जर्मन महाकवि गोएथे के अमर क्लासिक ‘फ़ाउस्ट’ का अविकल काव्यानुवाद, अनेक पुस्तक और फ़िल्म समीक्षाएँ।

और शीघ्र ही अरविंद कुमार द्वारा लिखित हिंदी फ़िल्म इतिहास के शिलालेख सीरीज़ में ‘मदर इंडिया’, ‘मुग़ले आज़म’, ‘प्यासा’ जैसी अमर फ़िल्मों के उपन्यास से भी अधिक रोचक विवरण…। इनके साथ-साथ हिंदी-इंग्लिश वर्ड पावर बढ़ाने वाले वे असंख्य लेख जो ‘अहा ज़िंदगी’ में प्रकाशित हुए थे। या अब नए लिखे जा रहे हैं।

भारत और विदेशों में हिंदी या इंग्लिश भाषा शिक्षण संस्थानों, कालिजों, विश्वविद्यालयों आदि की सूचियाँ भी संकलित की जाएँगी।

लैक्सिकन के तीन संस्करण हैं। किसी भी संस्करण का लाभ उठाने के लिए अरविंद लैक्सिकन की वेबसाइट का सदस्य बनना (अपने को रजिस्टर करना) आवश्यक है।

निःशुल्क (FREE) यह संस्करण अरविंद लैक्सिकन परिवार के हर सदस्य को नि:शुल्क प्राप्य है। इसमें 8,500 आर्थी कोटियों के अंतर्गत 85,000 हिंदी और 73,000 इंग्लिश पर्याय और विपर्याय हैं। दैनिक जीवन में हरएक को इनकी ज़रूरत पड़ती है। इनकी सहायता से छात्र परीक्षाओं के लिए पर्याय याद कर सकते हैं और अध्यापक गण छात्रों से अभ्यास के ज़रिए उन की शब्दावली समृद्ध कर सकते हैं।

सशुल्क उच्चस्तरीय (PREMIUM)यह संस्करण मुख्यतः लेखकों, अनुवादकों और भाषाकर्मियों के लिए है। इन्हें अपने व्यावसायिक जीवन में सही शब्द की खोज नित्य प्रति पड़ती है। इस संस्करण में 20,000 आर्थी कोटियों के अंतर्गत 3,35.000 हिंदी और 3,00,000 इंग्लिश पर्याय और विपर्याय शब्द हैं।

पुस्तकालय (LIBRARY)जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है कि यह सर्वोच्च संस्करण पुस्तकालयों, ट्रांसलेशन एजेंसियों, विज्ञापन एजेंसियों, दूतावासों आदि के लिए है। इसमें 38,500 आर्थी कोटियों के अंतर्गत 5,20,000 हिंदी और 4,30,000 इंग्लिश पर्याय और विपर्याय हैं। यह एकल सदस्य को नहीं मिलेगा। कम से कम दस कंप्यूटरों पर स्वतंत्र उपयोगियों का होना आवश्यक है।

आम आदमी का काम नि:शुल्क संस्करण से भी चल जाएगा। उसे जीवन भर कोई शुल्क नहीं देना है। यह शब्द भंडार लगातार विकसित होता रहेगा, नए शब्द जुड़ते रहेंगे।

सपंर्क—
मीता लाल
कृते अरविंद लिंग्विस्टिक्स प्रा. लि.
ई-28 प्रथम तल, कालिंदी कालोनी, नई दिल्ली- 110065
lallmeeta@airtelmail.in

 

 

कोशकार अरविंद कुमार को शलाका सम्‍मान

नई दिल्‍ली : आधुनिक युग में हिंदी कोशकारिता के जनक अरविंद कुमार को वर्ष 2010-11 का हिन्‍दी अकादेमी, दिल्‍ली का सर्वोच्‍च सम्‍मान शलाका सम्‍मान दिया जाएगा। इसके अलावा  प्रो. परमानंद श्रीवास्तव को गद्य सम्मान, गिरधर राठी को काव्य सम्मान, प्रो. देवेंद्र राज अंकुर को नाटक सम्मान, डा आलोक पुराणिक को हास्य व्यंग्य सम्मान, रमणिका गुप्ता को विशिष्ट योगदान सम्मान, कृष्ण शलभ को बाल साहित्य सम्मान और बृजमोहन बख्शी को ज्ञान प्रौद्योगिकी सम्मान प्रदान किया जाएगा। शलाका सम्मान के तहत दो लाख रुपये तथा अन्य सम्मानों के लिए 50-50 हजार रुपये, ताम्रपत्र और शाल देकर सम्मानित किया जाएगा।

ये सम्मान सुप्रसिद्ध सहित्यकार और ज्ञानपीठ पुरस्कार चयन समिति के अध्यक्ष डा. सीताकांत महापात्र द्वारा 24 जून, 2011 को आइटीओ स्थित दिल्‍ली सचिवालय में आयोजित समोराह में प्रदान किए जाएंगे।

हिंदी भाषा को संस्कृत के ‘अमर कोश’ और रौजेट के अंगरेजी ‘थिसारस’ जैसा बृहद् ‘समांतर कोशहिंदी थिसारस’ और विश्व का विशालतम द्विभाषी कोश ‘द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी’ और अब ‘अरविंद लैक्सिकन’ नाम से हिंदी-इंग्लिश का विशाल शब्दकोश-थिसारस और भाषा खोजी उपकरण बना कर विश्वकोशकारिता को नया आयाम देने वाले लेखक, कवि, नाटककार, समीक्षक, अनुवादक, पत्रकार अरविंद कुमार का जन्म 17 जनवरी 1930 को मेरठ में हुआ। वहां पत्थर वालों के म्यूनिसिपल स्कूल में प्राइमरी शिक्षा और वैश्य तथा देवनागरी हाई स्कूलों से नवीं के बाद उन्होंने 1945 दिल्ली (करोल बाग़) में नए खुले खालसा हाई स्कूल से मैट्रिक पास किया।

अरविंद ने अपना कार्य जीवन मैट्रिक का परीक्षाफल आने से पहले ही 1 अप्रैल, 1945 से 15 वर्ष की उमर में एक बालश्रमिक के रूप में दिल्ली के एक प्रसिद्ध मुद्रणालय (दिल्ली प्रेस) में कंपोज़िंग तथा डिस्ट्रब्यूटिंग सीखने से आरंभ किया। कुछ ही महीनों में दिल्ली प्रेस से हिंदी की पारिवारिक पत्रिका ‘सरिता’ का प्रकाशन आरंभ हुआ। उस के संपादन विभाग तक पहुंचने के लिए अरविंद कुमार ने छः साल तक कंपोज़ीटर, मशीनमैन, कैशियर, टाइपिस्ट, और प्रूफ़रीडर के तौर पर काम किया। साथ ही साथ वे सायंकालीन संस्थानों में पढ़ भी रहे थे। कैंप कालिज से 1956 में पंजाब विश्वविद्यालय से अंगरेजी साहित्य में एम. ए. की डिग्री ली।

‘सरिता’ में उप संपादक से सहायक संपादक और फिर दिल्ली प्रेस की ही प्रसिद्ध अंगरेजी पत्रिका ‘कैरेवान’ में सहायक संपादक पद पर वे उसी संस्थान में सन् 1963 के मध्य तक रहे। वहीं से उनकी देखरेख में उर्दू ‘सरिता’ और हिंदी ‘मुक्ता’ का प्रकाशन भी आरंभ हुआ।

‘कैरेवान’ के बाद अरविंद कुमार ‘टाइम्स आफ़ इंडिया’ संस्थान से हिंदी की फ़िल्म पत्रिका ‘माधुरी’ का संपादन आरंभ करने मुंबई चले गए। वहां अपने समकालीन हिंदी संपादकों के संपर्क से तो बहुत कुछ सीखा ही, फ़िल्म उद्योग के गुणी निर्देशकों, कलाकारों और संगीतकारों की रचना प्रक्रिया को नज़दीक से देखा भी। वह कला फ़िल्मों के आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े रहे। उस आंदोलन को ‘समांतर सिनेमा’ नाम उन्होंने ही दिया था।

1978 में ‘समांतर कोश’ की रचना को पूरा समय देने के लिए वे ‘माधुरी’ का संपादन त्याग कर सपरिवार दिल्ली चले आए। ‘समांतर कोश’ के लिए कहीं से कोई आर्थिक अनुदान या सहायता नहीं मिल रही थी। दिल्ली की बाढ़ में फंसने के बाद घर बदल कर गाज़ियाबाद चले गए। बिगड़ती आर्थिक स्थिति को संभालने के लिए एक बार फिर 1980 से कुछ बरसों के लिए पत्रकारिता की ओर रुख़ किया और ‘रीडर्स डाइजेस्ट’ का हिंदी संस्करण ‘सर्वोत्तम’ आरंभ किया। 1985 से उन्होंने एक बार फिर से ‘समांतर कोश’ को पूरा समय देना शुरू किया।

शैक्सपीयर कृत ‘जूलियस सीज़र’ के अरविंद कुमार के हिंदी काव्यानुवाद का प्रथम मंचन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लिए इब्राहिम अल्काज़ी के निर्देशन में हुआ था। इस के बाद विद्यालय के छात्रों द्वारा उस का मंचन होता रहा है।

कुसुम से अरविंद का विवाह दिल्ली में 1959 में हुआ। उनकी दो संतान हैं- बेटा डाक्टर सुमीत कुमार और बेटी मीता लाल।

अरविंद कुमार ने इटली, मारीशस, फ़्राँस, हालैंड. संयुक्त राज्य अमरीका, जापान, सिंगापुर, आस्ट्रेलिया, मलेशिया, थाईलैंड, इंग्लैंड, जरमनी आदि देशों की यात्रा की है। 1997 मेँ जापान में वहां के भाषा संस्थान द्वारा विश्व थिसारसों पर आयोजत अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के मुख्य सत्र का सभापतित्व उन्होंने किया।

अब अरविंद कुमार की आकांक्षा और योजना है कि अरविंद लैक्सिकन के 9 लाख शब्दों वाले डाटा के ज़रिए भारत की सब भाषाओं के साथ साथ विश्व की कुछ प्रमुख भाषाओँ को एक सूत्र में पिरोना। आरंभ में तमिल और चीनी भाषा पर काम करने का प्रयास शीघ्र ही आरंभ किया जाएगा।

उन्‍हें महाराष्ट्र राज्य हिंदी अकादेमी द्वारा हिंदी सेवा सम्मान, केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा डाक्टर हरदेव बाहरी सम्मान आदि सम्‍मानों से सम्‍मानित किया जा चुका है।

रुकना मेरा काम नहीं : अनुराग

हिंदी रुकने वाली नहीं है : अरविंद कुमार

अरविंद कुमार

हिंदी की अपरिहार्य और अनवरोध्य प्रगति के प्रति माधुरी तथा सर्वोत्तम रीडर्स जाइजेस्ट जैसी पत्रिकाओं के पूर्व संपादक तथा हिंदी के पहले शब्‍दकोश समांतर कोश के रचियता और शब्देश्वरी तथा पेंगुइन हिंदी-इंग्लिश/इंग्लिश-हिंदी थिसारस द्वारा भारत में कोशकारिता को नई दिशा देने वाले अरविंद कुमार। वह हिंदी को आधुनिक तकनीक से लैस करने के हिमायती हैँ और आजकल इंटरनेट पर पहले सुविशाल हिंदी-इंग्लिश-हिदी ई-कोश को अंतिम रूप देने में लगे हैं-

हिंदी के उग्रवादी समर्थक बेचैन हैं कि आज भी इंग्लिश का प्रयोग सरकार में और व्यवसाय मेँ लगभग सर्वव्यापी है। वे चाहते हैं कि इंग्लिश का प्रयोग बंद कर के हिंदी को सरकारी कामकाज की एकमात्र भाषा तत्काल बना दिया जाए। उनकी उतावली समझ में आती है, लेकिन यहाँ यह याद दिलाने की ज़रूरत है कि एक समय ऐसा भी था जब दक्षिण भारत के कुछ राज्य, विशेषकर तमिलनाडु, हिंदी की ऐसी उग्र माँगोँ के जवाब में भारत से अलग होकर अपना स्वतंत्र देश बनाने को तैयार थे। तब ‘हिंदी वीरों’ का कहना था कि चाहे तो तमिलनाडु अलग हो जाए, हमें हिंदी चाहिए… हर हाल, अभी, तत्काल… उस समय शीघ्र होने वाले संसद के चुनावोँ में उन्होँने नारा लगाया कि वोट केवल उस प्रत्याशी को देँ जो हिंदी को तत्काल लागू करने के पक्ष मेँ हो। सौभाग्य है कि भारत के लोग इतने नासमझ न थे और न आज हैं कि एकता भंग होने की शर्त पर हिंदी को लागू करना चाहेँ।

मैँ समझता हूँ कि पूरी राजनीतिक और भाषाई तैयारी के बिना हिंदी को सरकारी कामकाज की प्रथम भाषा बनाना लाभप्रद नहीं होगा। हिंदी पूरी तरह आने मेँ देर लग सकती है, पर प्रजातंत्र और राष्ट्रीय एकता के लिए यह देरी बरदाश्त करने लायक़ है। तब तक हमें चाहिए कि सरकारी कामकाज में हिंदी प्रचलन बढ़ाते रहें और साथ-साथ अपने आप को और हिंदी को आधुनिक तकनीक से लैस करते रहेँ।

इंग्लिश के विरोध की नीति हमेँ अपने ही लोगोँ से भी दूर कर सकती है। आम आदमी इंग्लिश सीखने पर आमादा है तो एक कारण यह है कि आज आर्थिक और सामाजिक प्रगति के लिए इंग्लिश का ज्ञान आवश्यक है। दूसरा यह कि संसार का सारा ज्ञान समेटने के लिए देश को इंग्लिश में समर्थ बने रहना होगा, वरना हम कूपमंडूक रह जाएँगे। यही कारण था कि 19वीं सदी मेँ जब मैकाले की नीति के आघार पर इंग्लिश शिक्षा का अभियान चला था, तब राजा राम मोहन राय जैसे देशभक्त और समाज सुधारक ने उस का डट कर समर्थन किया था। वह देश को दक़ियानूसी मानसिकता से उबारना चाहते थे। राममोहन राय ने कहा था, ‘एक दिन इंग्लिश पूरी तरह भारतीय बन जाएगी और हमारे बौद्धिक सामाजिक विकास का साधन।’ स्वामी विवेकानंद ने भी अमरीका में भारतीय संस्कृति का बिगुल इंग्लिश के माध्यम से ही फूँका था।

इसके माने यह नहीँ हैँ कि आज हम लोग हिंदी का महत्त्व नहीँ जानते या हिंदी की प्रगति और विकास रुक गया है या रुक जाएगा। मैं समझता हूँ कि हिंदी के विकास का राकेट नई तेज़ी से उठता रहेगा। हिंदी अब रुकने वाली नहीं है, हिंदी रुकेगी नहीं। कारण है हिंदी बोलने समझने वालोँ की भारी तादाद और उन के भीतर की उत्कट आग।

भाषा विकास क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिकों का तथ्याधारित अनुमान हिंदी प्रेमियों के लिए उत्साहप्रद है कि आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय महत्त्व की जो चंद भाषाएँ होंगी उन में हिंदी अग्रणी होगी।

संसार में 60 करोड़ से अधिक लोग हिंदी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। फ़िजी, मारीशस, गयाना, सूरीनाम की अधिकतर और नेपाल की कुछ जनता हिंदी बोलती है। अमरीकी, यूरोपीय महाद्वीप और आस्ट्रेलिया आदि देशोँ में गए हमारे तथाकथित एनआरआई कमाएँ चाहे इंग्लिश के बल पर, लेकिन उनका भारतीय संस्कृति और हिंदी के प्रति प्रेम बढ़ा ही है। कई बार तो लगता है कि वे हिंदी के सब से कट्टर समर्थक हैँ।

अकेले भारत को ही लें तो हिंदी की हालत निराशाजनक नहीं, बल्कि अच्छी है। आम आदमी के समर्थन के बल पर ही पूरे भारत में 10 शीर्ष दैनिकों में हिंदी के पाँच हैँ (दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हिंदुस्तान, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका),  तो इंग्लिश का कुल एक (टाइम्स आफ़ इंडिया) और मलयालम के दो (मलयालम मनोरमा और मातृभूमि), मराठी का एक (लोकमत), तमिल का एक (दैनिक थंती)। इसी प्रकार सब से ज़्यादा बिकने वाली पत्रिकाओँ में हिंदी की पाँच, तमिल की तीन, मलयालम की एक है, जबकि इंग्लिश की कुल एक पत्रिका है। हिंदी के टीवी मनोरंजन चैनल न केवल भारत मेँ बल्कि बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान में भी लोकप्रिय हैं और हिंदी के साथ-साथ हमारे सामाजिक चिंतन का प्रसार कर रहे हैँ।

जहाँ तक हिंदी समाचार चैनलोँ का सवाल है इंग्लिश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित न्यूज़ वीकली इकोनमिस्ट ने 14 अगस्त 2010 अंक मेँ पृष्ठ 12 पर ­‘इंटरनेशल ब्राडकास्टिंग’ पर लिखते हुए कहा है कि अमरीका और ब्रिटेन के विदेशी भाषाओँ में समाचार प्रसारित करने वाले संस्थानोँ को अपना धन सोच’समझ कर बरबाद करना चाहिए। उदाहरण के लिए भारत की अपनी भाषाओँ के न्यूज़ चैनलोँ से प्रतियोगिता करना कोई बुद्धिमानी का काम नहीं है।

हमारी ताक़त है हमारी तादाद…

यह परिणाम है हमारी जनशक्ति का। यही हिंदी का बल है। बहुत साल नहीं हुए जब हम अपनी विशाल आबादी को अभिशाप मानते थे। आज यह हमारी कर्मशक्ति मानी जाती है। भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने सही कहा है: ‘अधिक आबादी अपने आप में कोई समस्या नहीं है, समस्या है उस की ज़रूरियात को पूरा न कर पाना। अधिक आबादी का मतलब है अधिक सामान की, उत्पाद की माँग। अगर लोगों के पास क्रय क्षमता है तो हर चीज़ की माँग बढ़ती है।’ आज हमारे समृद्ध मध्य वर्ग की संख्या अमरीका की कुल आबादी जितनी है। पिछले दिनोँ के विश्वव्यापी आर्थिक संकट को भारत हँसते खेलते झेल गया तो उस का एक से बड़ा कारण यही था कि हमारे उद्योगोँ के उत्पाद मात्र निर्यात पर आधारित नहीँ हैँ। हमारी अपनी खपत उन्हें ताक़त देती है और बढ़ाती है।

इसे हिंदी भाषियोँ की और विकसित देशोँ की जनसंख्या के अनुपातोँ के साथ साथ सामाजिक रुझानोँ को देखते हुए समझना होगा। दुनिया की कुल आबादी आज लगभग चार अरब है। इसमेँ से हिंदुस्तान और चीन के पास 60 प्रतिशत लोग हैँ। कुल यूरोप की आबादी है 73-74 करोड़, उत्तर अमरीका की आबादी है 50 करोड़ के आसपास। सन 2050 तक दुनिया की आबादी 9 अरब से ऊपर हो जाने की संभावना है। इसमेँ से यूरोप और अमरीका जैसे विकसित देशों की आबादी बूढ़ी होती जा रही है। (आबादी बूढ़े होने का मतलब है किसी देश की कुल जनसंख्या मेँ बूढे लोगोँ का अनुपात अधिक हो जाना।) चुनावी नारे के तौर पर अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा कुछ भी कहें, बुढाती आबादी के कारण उन्हेँ अपने यहाँ या अपने लिए काम करने वालोँ को विवश हो कर, मजबूरन या तो बाहर वालोँ को आयात करना होगा या अपना काम विदेशों में करवाना होगा।

इस संदर्भ मेँ संसार की सब से बड़ी साफ़्टवेअर कंपनी इनफ़ोसिस के एक संस्थापक नीलकनी की राय विचारणीय है। तथ्यों के आधार पर उनका कहना है कि ‘किसी देश में युवाओँ की संख्या जितनी ज़्यादा होती है, उस देश में उतने ही अधिक काम करने वाले होते हैँ और उतने ही अधिक नए विचार पनपते हैं। तथ्य यह है कि किसी ज़माने का बूढ़ा भारत आज संसार में सबसे अधिक युवा जनसंख्या वाला देश बन गया है। इस का फ़ायदा हमें 2050 तक मिलता रहेगा। स्वयं भारत के भीतर जनसंख्या आकलन के आधार पर 2025 मेँ हिंदी पट्टी की उम्र औसतन 26 वर्ष होगी और दक्षिण की 34 साल।’

अब आप भाषा के संदर्भ में इस का मतलब लगाइए। इन जवानों में से अधिकांश हिंदी पट्टी के छोटे शहरोँ और गाँवोँ में होंगे। उन की मानसिकता मुंबई, दिल्ली, गुड़गाँव के लोगोँ से कुछ भिन्न होगी। उनके पास अपनी स्थानीय जीवन शैली और बोली होगी।

नई पहलों के चलते हमारे तीव्र विकास के जो रास्ते खुल रहे हैँ (जैसे सबके लिए शिक्षा का अभियान), उनका परिणाम होगा असली भारत को, हमारे गाँवोँ को, सशक्त कर के देश को आगे बढ़ाना। आगे बढ़ने के लिए हिंदी वालोँ के लिए सबसे बड़ी ज़रूरत है अपने को नई तकनीकी दुनिया के साँचे मेँ ढालना, सूचना प्रौद्योगिकी में समर्थ बनना।

यही है हमारी नई दिशा। कंप्यूटर और इंटरनेट ने पिछ्ले वर्षों मेँ विश्व मेँ सूचना क्रांति ला दी है। आज कोई भी भाषा कंप्यूटर तथा अन्य इलैक्ट्रोनिक उपकरणों से दूर रह कर पनप नहीं सकती। नई तकनीक में महारत किसी भी काल में देशोँ को सर्वोच्च शक्ति प्रदान करती है। इसमेँ हम पीछे हैँ भी नहीँ… भारत और हिंदी वाले इस क्षेत्र मेँ अपना सिक्का जमा चुके हैँ।

इस समय हिंदी में वैबसाइटेँ, चिट्ठे, ईमेल, चैट, खोज, ऐसऐमऐस तथा अन्य हिंदी सामग्री उपलब्ध हैं। नित नए कम्प्यूटिंग उपकरण आते जा रहे हैं। इनके बारे में जानकारी दे कर लोगों मेँ  जागरूकता पैदा करने की ज़रूरत है ताकि अधिकाधिक लोग कंप्यूटर पर हिंदी का प्रयोग करते हुए अपना, देश का, हिंदी का और समाज का विकास करें।

हमेँ यह सोच कर नहीँ चलना चाहिए कि गाँव का आदमी नई तकनीक अपनाना नहीं चाहता। ताज़ा आँकड़ोँ से यह बात सिद्ध हो जाती है। गाँवोँ मेँ रोज़गार के नए से नए अवसर खुल रहे हैँ। शहर अपना माल गाँवोँ में बेचने को उतावला है। गाँव अब ई-विलेज हो चला है। तेरह प्रतिशत लोग इंटरनेट का उपयोग खेती की नई जानकारी जानने के लिए करते हैँ। यह तथ्य है कि ‘गाँवोँ में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालोँ का आंकड़ा 54 लाख पर पहुँच जाएगा।

इसी प्रकार मोबाइल फ़ोन दूरदराज़ इलाक़ोँ के लिए वरदान हो कर आया है। उस ने कामगारोँ कारीगरोँ को दलालोँ से मुक्त कर दिया है। यह उनका चलता फिरता दफ़्तर बन गया है और शिक्षा का माध्यम। अकेले जुलाई 2010 में 1 करोड़ सत्तर लाख नए मोबाइल ग्राहक बने और देश में मोबाइलोँ की कुल संख्या चौबीस करोड़ हो गई। अब ऐसे फ़ोनोँ का इस्तेमाल कृषि काल सैंटरों से नि:शुल्‍क  जानकारी पाने के लिए, उपज के नवीनतम भाव जानने के लिए किया जाता है। यह जानकारी पाने वाले लोगोँ में हिंदी भाषी प्रमुख हैँ। उनकी सहायता के लिए अब मोबाइलों पर इंग्लिश के कुंजी पटल की ही तरह हिंदी का कुंजी पटल भी उपलब्ध हो गया है।

हिंदी वालोँ और गाँवोँ की बढ़ती क्रय शक्ति का ही फल है जो टीवी संचालक कंपनियाँ इंग्लिश कार्यक्रमोँ पर अपनी नैया खेना चाहती थीँ, वे पूरी तरह भारतीय भाषाओँ को समर्पित हैँ। आप देखेंगे कि टीवी पर हिंदी के मनोरंजन कार्यक्रमोँ के पात्र अब ग्रामीण या क़स्बाती होते जा रहे हैँ।

सरकारी कामकाज की बात करेँ तो पुणेँ में प्रख्यात सरकारी संस्थान सी-डैक कंप्यूटर पर हिंदी के उपयोग के लिए तरह तरह के उपकरण और प्रोग्राम विकसित करने मेँ रत है। अनेक सरकारी विभागोँ की निजी तकनीकी शब्दावली को समो कर उन मंत्रालयोँ के अधिकारियोँ की सहायता के लिए मशीनी अनुवाद के उपकरण तैयार हो चुके हैँ। अभी हाल सी-डैक ने ‘श्रुतलेखन’ नाम की नई विधि विकसित की है जिस के सहारे बोली गई हिंदी को लिपि में परिवर्तित करना संभव हो गया है। जो सरकारी अधिकारी देवनागरी लिखने या टाइप करने में अक्षम हैं, अब वे इसकी सहायता से अपनी टिप्पणियाँ या आदेश हिंदी में लिख सकेंगे। यही नहीं इस की सहायता से हिंदी में लिखित कंप्यूटर सामग्री तथा ऐसऐमऐस आदि को सुना भी जा सकेगा।

निस्संदेह एक संपूर्ण क्रांति हो रही है।