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फीस की फाँस : अनुराग

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हर साल नया शैक्षिक सत्र होने के साथ ही लगभग शत-प्रतिशत निजी स्कूलों में स्कूल प्रबंधन और अभिभावक आमने-सामने आ जाते हैं। मुद्दा वहीं जो पिछले कई वर्षों से चला आ रहा है- फीस में अत्यधिक वृद्धि और मनमाना एनुअल चार्ज। कई स्कूलों में तो स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि पुलिस बुलानी पड़ती है। मजेदार बात यह है कि इसी दौरान कुछ अभिभावक अपने बच्चों का एडमिशन कराने के लिए  इन्हीं स्कूलों के प्रबंधकों के आगे नाक रगड़ रहे होते हैं। उनके हर नियम-कायदे को मानने को लेकर उनका जवाब होता है, केवल ‘हां’। जरूरत पडऩे पर किसी की सिफारिश कराई जाती है। और इन सबके बावजूद डोनेशन तो देनी ही है। कैसी विडम्बना है कि आज अपने बच्चे के एडमिशन के लिए चिरौरी करने वाले ये माता-पिता भी अगले साल आंदोलनकारी अभिभावकों में शामिल हो जाएंगे। जब से देश में निजी स्कूलों का दौर शुरू हुआ है, एक भी अभिभावक ऐसा नहीं मिलेगा, जिसने बच्चा का एडमिशन कराते समय स्कूल प्रबंधन से हर साल बढऩे वाली फीस और एनुअल चार्ज के बारे में चर्चा की हो। या यह शर्त रखी होगी कि हर साल इतने प्रतिशत से ज्यादा फीस नहीं बढ़ाओगे और एनुअल चार्ज नहीं देंगे। जब सब कुछ स्कूल प्रबंधकों की मर्जी से हो रहा है तो बाद में हायतौबा मचाने का क्या तुक है?
कमीज सौ-पचास रुपये से लेकर हजारों रुपये में आती है। हर व्यक्ति अपनी हैसियत के हिसाब से ब्राड की कमीज खरीद लेता है और महंगी होने की शिकायत भी नहीं करता। निजी स्कूल भी ब्रांड बन गए हैं। हमें अपने बच्चों की अच्छी-बुरी शिक्षा से कोई मतबल नहीं है। हमें उनके लिए शिक्षा के ब्रांड की चिंता है ताकि समाज में कमीज के टैग की तरह इसका भी प्रदर्शन कर सकें।
यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि मूल सोसाइटी के स्कूल की ब्रांच तो गिनी-चुनी हैं, बाकी तो उन्होंने फ्रेंचाइजी दी हुई हैं।
पिछले दिनों एक स्कूल के आंदोलनरत अभिभावकों से मिलने हुआ। सभी की आर्थि और सामाजिक स्थिति काफी अच्छी थी। वे धरना-प्रदर्शन कर चुके थे। जनप्रतिनिधियों से लेकर सीबीएसई के चेयरमैन से भी कई बार मिल चुके थे। गरमागरम बहस हो रही थी। सभी का लहू खौल रहा था। मैंने सुझाव दिया कि आप अपने क्षेत्र में सरकारी स्कूल की मांग क्यों नहीं करते? हर साल होने वाला यह झंझट ही खत्म हो जाएगा। सभी ने मुझे ऐसे घूर कर देखा, मानो मैंने
उन्हें आत्महत्या करने के लिए कह दिया हो।
इससे बड़ा भ्रम कुछ नहीं हो सकता कि निजी स्कूलों में अच्छी पढ़ाई होती है। अधिकांश स्कूलों में ‘शिक्षा के उद्देश्य’ को लेकर ही सन्नाटा है, तो बाकी मुद्दों पर बात ही क्या की जाए। कोई भी व्यवसाय शुरू करने से उसकी विशेषज्ञता हासिल की जाती है या दो-चार साल कहीं काम करके अनुभव जुटाया जाता है। लेकिन स्कूल तो प्रापटी डीलर, डेयरी वाला, नेता-अभिनेता कोई भी खोल लेता है। बस पैसा होना चाहिए। इन स्कूलों में अध्यापकों की नियुक्ति के क्या मापदंड है, यह अबूझ पहेली है। नियुक्ति के बाद उन्हें कोई ट्रेनिंग भी नहीं दी जाती। फिर वहां बच्चों को सबसे अच्छी शिक्षा कैसे मिल सकती है? अधिक पैसे वसूलने के लिए आलीशान बिल्डिंग, महंगा फर्नीचर, हर क्लास में एसी और कंप्यूटर लगा देने भर से तो अच्छी शिक्षा बच्चों को नहीं मिल सकती। सरकारी स्कूलों में अध्यापक की नियुक्ति के लिए शिक्षा से जुड़ी विशेष डिग्री या सर्टिफिकेट लेना पड़ता है। नियुक्ति से पहले ट्रेनिंग दी जाती है और समय-समय पर वर्कशाप आदि को भी आयोजन किया जाता रहता है। कौन-कौन से और कि‍तने निजी स्कूल अपने यहां अध्यापकों की नियुक्ति से पहले और बाद में यह प्रक्रिया अपनाते हैं। फिर इन स्कूलों के शिक्षक कैसे
श्रेष्ठ शिक्षक हो सकते हैं?

फीसद की अंधी दौड़ : अनुराग

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पि‍छले दि‍नों हमारे पड़ोस रह रहे आठ-नौ साल के यश का रिजल्ट घोषित हुआ। मैंने उससे पूछा कि पास हो गया? उसने ‘हां’ में सिर हिला दिया। मैंने अगला सवाल किया कि कौन-सी क्लास में आ गया है। उसने जवाब दिया कि पांचवीं में। मैंने मुस्कराते हुए कहा कि मिठाई तो बनती है। उसने मायूसी से कहा कि नहीं। मैंने पूछा कि क्यों? उसने उत्तर दिया कि नम्बर कम आए हैं। मैंने अगला सवाल किया कि कितने नंबर आए हैं? उसने कहा कि 93 प्रतिशत। मैंने उसका कंधा थपथपाते हुए कि यह तो बहुत अच्छे नंबर है। वह बोला कि मेरा 96 परसेंट का टारगेट था। तीन परसेंट कम रह गए। यह कहते हुए उसका मुंह और लटक गया।

यश तो फिर भी फोर्थ में पढ़ रहा था, नर्सरी-केजी वाले बच्चों का भी कम बुरा हाल नहीं है। ‘स्टार कम क्यों आए’ का डंडा लिए अभिभावक हर समय सिर पर सवार हैं। उसकी कमीज मेरी कमीज से सफेद क्यों की तर्ज पर दूसरों बच्चों से तुलना और बुरा-भला कहना आम बात है। यह घर-घर की कहानी है।

नंबरों के प्रतिशत को लेकर हमारे देश में इस कदर मारामारी है कि समझ और ज्ञान की तो बात ही नहीं होती। वह स्कूल अच्छा जिसके छात्रों के अधिक नंबर आएं और बच्चा भी वही दुलारा, जो अधिक-से-अधिक नंबर लाए। स्कूल भी इसकी आड़ में अभिभावकों का खूब आर्थिक शोषण करते हैं। वह अपने स्कूल का रिपोर्ट कार्ड बताते हैं कि हमारे यहां इतने बच्चों के 97-98 परसेंट और इतनों के 90 परसेंट से अधिक नंबर आए हैं। जब बच्चों के नंबर अधिक आ रहे हैं तो फीस, डवलपमैंट चार्ज और अन्य चार्ज अधिक लगेंगे ही। इसलिए बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम आते ही स्कूलों के बोर्ड और बेनर जगह-जगह दिखाए देने लगते हैं, जिनमें उस स्कूल के सभी अधिक अंक लाने वाले बच्चों के फोटो और उनके अंक प्रतिशत को प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाता है।

अभिभावक भी बच्चे को एडमीशन दिलाते समय मान लेते हैं कि सबसे अधिक अंक लाने वालों में उनका बच्चा भी होगा। वे यह भूल जाते हैं कि सबकी अलग-अलग क्षमताएं हैं। रुचियों में भी अंतर है। जिस बच्चे मन पढ़ाई में न लगता हो, उसे खेल, संगीत, नृत्य, रंगमंच, लेखन आदि में रुचि हो सकती है। एक प्रतिभाशाली बच्चे को केवल इसलिए नष्ट कर दिया कि उसके नंबर कम आते है। यह भी मान लिया कि बच्चा पढऩे में सामान्य से भी नीचे है। उसकी किसी और क्षेत्र में रुचि भी नहीं है। वह डॉक्टर, इंजीनियर या कोई अन्य अधिकारी नहीं बन सकता। तो भी उसे आत्महत्या के लिए तो विवश नहीं किया जा सकता। कई बार बहुत अच्छे नंबर वाले बच्चे भी एक-दो परसेंट के चकर में या कम्पीटन की तैयारी कर रहा बच्चा मनपसंद ब्रांच नहीं मिलने के डर से आत्महत्या कर ले रहा है।

इन आत्महत्यों के लिए कौन जिम्मेदार है? पिछले दिनों परीक्षा में अच्छे नंबर न ला पाने के डर से होशंगाबाद में पशु चिकित्सक के इकलौते बेटे और सागर जिले के बीना में शिक्षक की बेटी ने फांसी लगाकर जान दे दी। छात्र सीबीएसई से कक्षा 12वीं और छात्रा मध्यप्रदेश बोर्ड से कक्षा 12वीं की परीक्षा दे रही थी। छात्र ने अपने सुसाइड नोट में लिखा कि ‘सॉरी मम्मी-पापा, मुझसे फिजिक्स नहीं बनती। मैं फेल नहीं होना चाहता।‘ छात्रा ने अपने रजिस्टर में लिखा था, ‘पापा मैं अंग्रेजी में अच्छे नंबर नहीं ला सकती, मैं जा रही हूं।‘

बोर्ड परीक्षाओं के परि‍णाम आने का दौर शुरू हो चुका है। डर लगा रहता है कि‍ कि‍सी बच्‍चे के आत्‍महत्‍या करने की खबर पढ़ने-सुनने को न मि‍ल जाए।

केवल छात्रों की काउंसिलिंग करके इन आत्महत्याओं को नहीं रोका जा सकता है। इसके लिए शिक्षा व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन की जरूरत है। खासतौर से मूल्यांकन पद्धति को लेकर। न जाने क्यों इन बच्चों की मौत राजनीतिज्ञों को परेशान नहीं करती? बुद्धिजीवि भी इसे सहज भाव से ले लेते हैं। विभिन्न मुद्दों को लेकर आए दिन सड़क पर उतरने वालों को भी यह मुद्दा आंदोलन के लायक नहीं लगता।

एक शब्‍दयोगी की आत्‍मगाथा : अनुराग

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शब्‍दों के संसार में पि‍छले सत्‍तर साल से सक्रिय अरविंद कुमार को आधुनि‍क हिंदी कोशकारि‍ता की नीवं रखने का श्रेय जाता है। कोशकारि‍ता के लि‍ए कि‍ए अपना सब कुछ दांव में लगाने वाले अरविंद जी का जीवन संघर्ष भी कम रोमांचक नहीं है। पंद्रह साल की उम्र में उन्‍होंने हाई स्‍कूल की परीक्षा दी और पारि‍वारि‍क कारणों से रि‍जल्‍ट आने से पहले ही दि‍ल्‍ली प्रेस में कंपोजिंग से पहले डि‍स्‍ट्रीब्‍यूटरी सीखने के लि‍ए नौकरी शुरू कर दी। एक बाल श्रमि‍क के रूप में अपना कॅरि‍यर शुरू करने वाले अरविंद कुमार कैसे दि‍ल्‍ली प्रेस में सभी पत्रि‍काओं के इंचार्ज बने, कैसे अपने समय की चर्चित फि‍ल्‍म पत्रि‍का ‘माधुरी’ के संस्‍थापक संपादक बन उसे एक वि‍शि‍ष्‍ट पहचान दी और फि‍र कैसे रीडर डायजेस्‍ट के हिंदी संस्‍करण ‘सर्वोत्‍तम’ की की शुरुआत कर उसे लोकप्रि‍यता के शि‍खर तक पहुंचाया, ये सब जानना, एक कर्मयोगी के जीवन संघर्ष को जानने के लि‍ए जरूरी है।

कोशकार अरविंद कुमार के जीवन के वि‍भि‍न्‍न पहलुओं और कोशकारि‍ता के लि‍ए कि‍ए गए उनके कार्यों को समेटे हुए पुस्‍तक ‘शब्‍दवेध’ एक दस्‍तावेजी और जरूरी    कि‍ताब है। अरविंद जी के जीवन और कर्मयोग के अलावा इस दस्‍तावेजी पुस्‍तक में प्रकाशन उद्योग के वि‍कास और हि‍न्‍दी पत्र-पत्रि‍काओं के उत्‍थान-पतन की झलक भी इसमें मि‍लती है। यह पुस्‍तक नौ संभागों पूर्वपीठि‍का, समांतर सृजन गाथा, तदुपरांत, कोशकारि‍ता, सूचना प्रौद्योगि‍की, हिंदी, अनुवाद, साहि‍त्‍य और सि‍नेमा में बंटी है।

समांतर कोश बना कर हिंदी में क्रांति लाने वाले अरविंद कुमार की यह अपनी तरह की एकमात्र आत्मकथा है। कारण- वह अपने निजी जीवन की बात इस के पहले संभाग पूर्वपीठिका के कुल 21 पन्नोँ मेँ निपटा देते हैं। जन्म से उस दिन तक जब वह माधुरी पत्रिका का संपादक पद त्याग कर दिल्ली चले आए थे और लोग उन्हें पागल कह रहे थे। उन का कहना है, ‘मेरे जीवन मेँ जो कुछ भी उल्लेखनीय है, वह मेरा काम ही है। मेरा निजी जीवन सीधा सादा, सपाट और नीरस है।’ इसके बाद तो  किताब में शब्‍दों के संसार में उनके अनुभवों और योगदान की उत्तरोत्तर विकास कथा है।

समांतर सृजन गाथा और तदुपरांत नाम के दो संभागों में हम पहले तो समांतर कोश की रचना की समस्याओँ और अनोखे निदानोँ से अवगत होते हैं। यह जानते हैं कि कथाकार कमलेश्‍वर द्वारा उसके नामकरण में सहयोग और नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा उसका प्रकाशन कैसे हुआ और उनके अन्य कोशों (समांतर कोश, अरविंद सहज समांतर कोश, शब्देश्‍वरी, अरविंद सहज समांतर कोश, द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी, भोजपुरी-हिंदी-इंग्लिश लोकभाषा शब्दकोश, बृहत् समांतर कोश, अरविंद वर्ड पावर: इंग्लिश-हिंदी, अरविंद तुकांत कोश) से परिचित होते हैं। किसी एक आदमी का अकेले अपने दम पर, बिना किसी तरह के अनुदान के इतने सारे थिसारस बना पाना अपने आप मेँ एक रिकॉर्ड है।

कोशकारिता संभाग हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोश कला के सामाजिक संदर्भ और दायित्व तक ले जाता है। अमर कोश, रोजेट के थिसारस और समांतर कोश का तुलनात्मक अध्ययन पेश करता है।

सूचना प्रौद्योगिकी संभाग में अरविंद बताते हैं कि उन्होंने प्रौद्योगिकी को किस प्रकार हिंदी की सेवा में लगाया। साथ ही वह वैदिक काल से अब तक की कोशकारिता को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य मेँ पेश करने में सफल होते है। मशीनी अनुवाद की तात्कतालिक आवश्यकता पर बल देते है।

हिंदी संभाग मे वह हिंदी की मानक वर्तनी पर अपना निर्णयात्मक मत तो प्रकट करते ही हैं, साथ ही हिंदी भाषा में बदलावों का वर्णन करने के बाद आंखों देखी हिंदी पत्रकारिता मेँ पिछले सत्तर सालोँ की जानकारी भी देते है।

अनुवाद संभाग मेँ अनुवादकों की मदद के लिए कोशों के स्थान पर थिसारसों की वांछनीयता समझाते हैं। इसके साथ ही गीता के अपने अनुवाद के बहाने संस्कृत भाषा को आज के पाठक तक ले जाने की अपनी सहज विधि दरशाते हैं और ऐसे अनुवादों में वाक्यों को छोटा रखने का समर्थन करते हैं। वह प्रतिपादित करते हैँ कि पाठक के लिए किसी संस्कृत शब्द का अर्थ समझना कठिन नहीँ होता, बल्कि दुरूह वाक्य रचना अर्थ ग्रहण करने मेँ बाधक होती है।

साहित्य संभाग हर साहित्यकार के लिए अनिवार्य अंश है। इंग्लैंड के राजकवि जान ड्राइडन के प्रसिद्ध लेख काव्यानुवाद की कला के हिंदी अनुवाद शामिल कर उन्होंने हिंदी जगत पर उपकार किया हैा ड्राइडन ने जो कसौटियां स्थापित कीं, वे देशकालातीत हैं। ग्रीक और लैटिन महाकवियों को इंग्लिश में अनूदित करते समय ड्राइडन के अपने अनुभवों पर आधारित लंबे वाक्यों और पैराग्राफ़ोँ से भरे इस लेख के अनुवाद द्वारा उन्होँने इंग्लिश और हिंदी भाषाओँ पर अपनी पकड़ सिद्ध कर दी है। यह अनुवाद वही कर सकता था जो न केवल इंग्लिश साहित्य से सुपरिचित हो, बल्कि जिसे विश्व साहित्य की गहरी जानकारी हो।

सिनेमा संभाग की कुल सामग्री पढ़ कर कहा जा सकता है कि यह सब साहित्य संभाग मेँ जाने का अधिकारी था। कोई और फ़िल्म पत्रकार होता तो सिने जगत के चटपटे क़िस्सों का पोथा खोल देता, लेकिन अरविंद यह नहीं करते। जिस तरह उन्होंने माधुरी पत्रिका को उन क़िस्सोँ से दूर रखा, उसी तरह यहाँ भी वह उस सब से अपने आप को दूर रखते हैँ। यहाँ हम पढ़ते हैं जनकवि शैलेंद्र पर एक बेहद मार्मिक संस्मरणात्मक लेख, राज कपूर के साथ उन की पहली शाम के ज़रिए फ़िल्मोँ के सामाजिक पक्ष और दर्शकों की मानसिकता पर पड़ने वाले प्रभाव की चर्चा, फ़िल्म तकनीक के कुछ महत्वपूर्ण गुर।

माधुरी पत्रिका की चर्चा करने के बहाने वह बताते हैँ कि क्यों उन्होँने फ़िल्म वालों से अकेले में मिलना बंद कर दिया- जो बात उजागर होती है, वह पत्रकारिता मेँ छिपा भ्रष्टाचार।

इस संभाग मेँ संकलित लंबा समीक्षात्मक लेख माधुरी का राष्ट्रीय राजमार्ग प्रसिद्ध सामाजिक इतिहासकार रविकांत ने लिखा है,  जो अरविंद जी के संपादन काल वाली माधुरी के सामाजिक दायित्व पर रोशनी डालता है और किस तरह अरविंद जी ने अपनी पत्रिका को कलात्मक फ़िल्मोँ और साहित्य सिनेमा संगम की सेवा मेँ लगा कर भी सफलता हासिल की।

शब्दवेध की अंतिम रचना है प्रमथेश चंद्र बरुआ द्वारा निर्देशित और कुंदन लाल सहगल तथा जमना अभिनीत देवदास का समीक्षात्मक वर्णन। यह एक ऐसी विधा है जो अरविंदजी ने शुरू की और उन के बंद करने के बाद कोई और कर ही नहीँ  पाया। देवदास फ़िल्म का उन का पुनर्कथन अपने आप मेँ साहित्य की एक महान उपलब्धि है। यह फ़िल्म की शौट दर शौट कथा ही नहीँ बताता, उस फ़िल्म के उस सामाजिक पहलू की ओर भी इंगित करता है। देवदास उपन्यास पर बाद मेँ फ़िल्म बनाने वाला कोई निर्देशक यह नहीँ कर पाया। उदाहरणतः ‘पूरी फ़िल्‍म मेँ निर्देशक बरुआ ने रेलगाड़ी का, विभिन्‍न कोणों से लिए गए रेल के चलने के दृश्यों का और उस की आवाज़ का बड़ा सुंदर प्रयोग किया है। पुराने देहाती संस्‍कारों में पले देवदास को पार्वती से दूर ले जाने वाली आधुनिकता और शहर की प्रतीक यह मशीन फ़िल्‍म के अंत तक पहुँचते देवदास की आवारगी, लाचारी और दयनीयता की प्रतीक बन जाती है।

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पुस्‍तक : शब्दवेध: शब्दों के संसार में सत्तर साल– एक कृतित्व कथा
लेखक : अरविंद कुमार
मूल्य रु. 799.00
प्रकाशक: अरविंद लिंग्विस्टिक्स, ई-28 प्रथम तल, कालिंदी कालोनी, नई दिल्ली 110065
संपर्क – मीता लाल. फ़ोन नंबर: 09810016568–ईमेल: lallmeeta@gmail.com

 

हिंसक होते बच्चे : अनुराग

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फर्रुखाबाद के एक गांव में प्राइमरी स्कूल की तीसरी और पहली क्लास के बच्चों में किसी बात को लेकर मारपीट हो गई। तीसरी के छात्र ने पहली के छात्र को प्लास्टिक की बोरी में बंदकर लात-घूंसों से जमकर पीटा। इससे उसको अस्पताल ले जाना पड़ा। वहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। दिल्ली के जामिया नगर में रहने वाली 15 वर्षीय किशोरी घर से 38 लाख रुपये चोरी कर देहरादून घूमने-फिरने के लिए तीन सहेलियों के साथ रफूचक्कर हो गई। दिल्ली के ही एक स्कूल छात्रों के बीच झगड़ा होने पर छठी कक्षा के एक छात्र के साथ उसके छह सहपाठियों ने कुकर्म किया।

पहले इस तरह की घटनाएं कभी-कभी सुनाई देती थीं, लेकिन अब आए दिन समाचार-पत्रों में प्रकाशित होती रहती हैं। बच्चों में बढ़ रही हिंसक प्रवृत्ति चिंता का विषय है। आने वाला समय इन्हीं बच्चों का होगा, तो हम भला कैसे समाज का निर्माण कर रहे है। बच्चों में बढ़ रही इस हिंसक प्रवृत्ति को क्या केवल कठोर सजा देकर रोका जा सकेगा? बिल्कुल नहीं।

बच्चा सबसे अधिक अपने चारों ओर चल रही गतिविधियों और जो बार-बार देख व सुन रहा है, उनसे सीखता है। बच्चे के सबसे नजदीक है, परिवार। जिन परिवारों में पति-पत्नी में आए दिन बात-बात पर तू-तू मैं-मैं होती है या उनमें से किसी में भी चारित्रिक दुर्बलताएं हैं, उनके बच्चों में दुष्प्रवृत्तियां पनपने की आशंकाएं बहुत अधिक रहती हैं। बच्चे के पहले आदर्श उसके मां-बाप होते हैं और वह सबसे अधिक उन्हीं के निकट रहता है। फिर उनका प्रभाव बच्चे पर न पड़े, यह कैसे हो सकता है।

टेलीविजन घर के सदस्य की तरह हो गया है, जिससे बच्चों का सीधा संपर्क रहता है। टेलीविजन पर जो कार्यक्रम दिखाए जा रहे हैं, उनमें से अधिकांश में पारिवारिकता, सामाजिकता, राजनीतिक विमर्श, मानवीय सरोकार जैसे गुणों का अभाव है। इनकी जगह पारिवारिक षड्यंत्र, अनैतिक संबंध, विवाहेतर संबंध, हिंसा का बोलबाला है। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि बच्चों के नाम पर प्रसारित होने वाले अधि‍कांश कार्यक्रम भी स्तरीय नहीं हैं। इन कार्यक्रमों में बाल प्रवृत्तियों को विकृत रूप में पेश किया जा रहा है। दिन-रात टेलीविजन देख रहे बच्चों के मनमस्तिष्क पर नि‍श्‍चि‍तरूप से इनका कोई प्रभाव पड़ेगा।

फिल्मों खासतौर पर हिंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्‍या करोड़ों में है, जिनमें बच्चों की भी अच्छी-खासी संख्‍या है। आजकल की फिल्मों में सेक्स और हिंसा का मसाला बहुत अधिक पड़ता है। द्विअर्थी संवाद तो फिल्म के लिए जरूरी जैसे हो गए हैं। कलात्मकता का स्थान हिंसा और नग्नता ने ले लिया है। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि कुछ तथाकथित कला समीक्षक इस हिंसा और नग्नता का सिनेमा के विकास और प्रगति‍शीलता के रूप में पेश कर रहे हैं। कुछ साल पहले तक शहरों में मुख्‍यधारा की फिल्मों के अलावा सी-ग्रेड फिल्में लगती थीं, जिन्हें लोग चोरी-छिपे देखने जाते थे। उन फिल्मों में बीच-बीच में मिनट-दो मिनट के सेक्स के दृश्य होते थे और इनमें मुख्‍यधारा के कलाकार काम नहीं करते थे। अब उन सी-ग्रेड फि‍ल्‍मों से ज्‍यादा फूहड़ता, अश्‍लीलता और हिंसा तो धारावाहि‍कों में दि‍खाई जा रही है, फि‍ल्‍मों की क्‍या बात करें। आज की फिल्मों के सफल नायक का डॉक्टर, इंजीनियर, लेखक, पत्रकार या वैज्ञानिक न बन पाने का अफसोस नहीं होता, उसकी इच्छा पोर्न फिल्मों में काम करने की होती है। पोर्न फिल्मों के कलाकारों पर चर्चा होती है।

पहले फिल्मों एक खलनायक और दूसरा नायक होता था, लेकिन अब नायक ही खलनायक है। वह वर्षों पहले फख्र से घोषणा कर चुका है- नायक नहीं खलनायक हूं मैं। वह हिंसक है, छिछोरा है, लंपट है, फूहड़ है, द्विअर्थी संवाद बोलता है, लेकिन फिर भी नायक है। वह हर हाल में अपनी मंजिल (नायिका) पाना चाहता है। वह इसके लिए नायिका को परेशान करता है तथा हर गलत-सही तरीके अपनाता है। और फिर ना-ना करके प्यार तुम्‍हीं से कर बैठे की तर्ज पर नायिका मान जाती है। अब तो आधुनिकता के नाम फिल्मों में नायिका की भूमिका भी सड़क-छाप मवाली जैसे गढ़ी जा रही है।

टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले विभिन्न उत्पादों के विज्ञापनों की हाल भी जुदा नहीं है। जूते-जुराब से लेकर कंघी तक और पेन से लेकर कार देकर हर विज्ञापन का मकसद है- लड़की या लड़के को रिझाना। क्या दुनिया में यही एक गम बचा है।

राजनीति‍ का हाल भी कोई अच्‍छा नहीं है। हर बार लोकसभा और वि‍धानसभाओं में बड़ी संख्‍या में दागी जनप्रति‍नि‍धि‍ चुनकर आते हैं। इनमें आथिर्क अपराध से लेकर खूनी तथा बलात्‍कार तक के आरोपी होती हैं। लोकसभा और वि‍धानसभाओं में हंगामे आए दि‍न देखने को मि‍लते हैं। नेताओं के बेहूदे बयान और एक-दूसरे के प्रति‍ हलके शब्‍दों को प्रयोग भी उनकी छवि‍ को दागदार ही बनाते हैं।

बच्चों में बड़ रही हिंसक प्रवृत्ति के लिए उन्हें दोष देने के बजाय हमें अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जैसे नायक हम उनके लिए गढेंगे, वैसा ही वह खुद को ढाल लेंगे।

एक गंभीर संकेत : अनुराग

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पिछले दिनों समाचार पत्रों में लंदन की एक खबर प्रकाशित हुई कि ‘द फेबुलस बेकर्स’ के सर्वे में बच्चों ने बताया कि पेड़ पर उगती हैं चॉकलेट और फ्रिज से निकलती है स्ट्रॉबेरी। चौंकाने वाली बात यह भी है कि ब्रिटेन का हर दस में से एक बच्चा यही सोचता है कि कई फल पेड़ों पर नहीं, बल्कि कारखाने में बनते हैं। प्रसिद्ध मफिन फर्म ‘द फेबुलस बेकर्स’ ने हाल ही में छह से दस साल की आयु वर्ग के एक हजार बच्चों के बीच यह सर्वे कराया था। इस सर्वे के नतीजे बेहद दंग कर देने वाले हैं। सर्वे के अनुसार दस में से एक बच्चे का मानना था कि सेब पेड़ पर नहीं उगते। चार में से एक यह समझता है कि स्ट्रॉबेरी जमीन के अंदर उपजती है। 10 में से एक ने जवाब दिया कि ये पेड़ पर उगते हैं, जबकि कुछ ने कहा, ये फ्रीज से बाहर आते हैं। बच्चों को लगता है कि चॉकलेट पेड़ों पर उगती हैं। शहद गाय से मिलता है। एक-चौथाई से ज्यादा को यह नहीं मालूम था कि केला पेड़ पर उगता है। 10 में से एक ने बताया कि अंगूर लताओं से नहीं, बल्कि पेड़ से चुने जाते हैं। बच्चे सबसे ज्यादा तरबूज को लेकर भ्रमित हुए। कइयों का मानना था कि यह पानी भरा फल जमीन के अंदर, पेड़ों या झाड़ियों पर उगता है। हालांकि इस पर थोड़ा संतोष किया जा सकता है कि आम को लेकर सबसे ज्यादा सही जवाब मिले और बच्चों ने बताया कि यह पेड़ पर उपजता है।

यह सर्वे रिपोर्ट पढ़कर किसी का मन यह सोचकर मुस्करा सकता है कि बच्चों के जवाब कितने मजेदार और मासूमियत भरे हैं। मुझे भी कुछ ऐसा ही लगा था। लेकिन क्षण भर में ही मेरा मन अवसाद से भर गया कि हम बच्चों को किस तरह की शिक्षा दे रहे हैं कि वह इतनी मामूली सी बात भी नहीं जानते कि फल पेड़ों पर लगते हैं, न कि कारखानों में बनते हैं। शिक्षा का यह झोल केवल ब्रिटेन का नहीं है। भारत में बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा का भी कमोबेश यही हाल है। बच्चों को ग्लोबल बनाने के नशे में हम उन्हें आसपास की दुनिया से काटते जा रहे हैं। जिस तरह की तथाकथित कान्वेंटी शिक्षा का प्रचलन भारत में बढ़ता जा रहा है, उसमें तो आस-पास की दुनिया को जानने-समझने के अवसर खत्म होते जा रहा हैं। बच्चा सुबह उठेगा, बस या कार से स्कूल जाएगा, वहां पाठ्यक्रम की पुस्तकों से जुझता रहेगा, घर वापस आकर होमवर्क का दबाव, बाकी बचा समय कंप्यूटर और टेलीविजन को समर्पित। पढ़ाई पूरी करके कोई डिग्री और अधिक से अधिक का पैकेज। ऐसे में आसपास की दुनिया को जानने-समझने की न तो कोई गुंजाइश है और न ही बच्चा इसकी जरूरत महसूस करता है। माता-पिता भी इससे खुश रहते हैं कि उनका बच्चा अमेरिका के राज्यों के नाम जानता है और उसे पता है कि दुनिया का सबसे बड़ा झराना कहां है या माइकल जैक्सन के जीवन में क्या-क्या विवाद जुड़े हुए हैं।

इस शिक्षा का दुष्परिणाम यह भी है कि जब बच्चे के मन में ग्लोबल ज्ञान ठूंसा जा रहा है, तो उसकी सपनों की दुनिया भी तो उसी ग्लोब का हिस्सा बनती है। यही वजह है कि जैसे-जैसे बच्चा उच्च शिक्षा की सीढ़ी चढ़ता जाता है, उसे अपने देश में बदबू आने लगती है और कमियां ही कमियां दिखाई देने लगती हैं। नतीजा यह होता है कि वह शिक्षा पूरी करते है ही अमेरिका, कनाडा आदि की ओर रुख कर लेता है। जिन चीजों के बारे में बच्चे को पढ़ाया और समझाया जाएगा, लगाव भी उसका उन्हीं से होगा।

ब्रिटेन की सर्वे रिपोर्ट हम सबके लिए खतरे की घंटी है। देश में जो शिक्षा का मॉडल अपनाया जा रहा है, उसके बारे में पुनर्विचार किया जाए। उसमें इस तरह का बदलाव किया जाए कि बच्चे के मन में आसपास की दुनिया को जानने की ललक पैदा हो? माता-पिता भी थोड़ा समय निकालकर बच्चों को प्राकृतिक स्थलों-नदी, तालाब, खेत, वन क्षेत्र आदि में ले जाएं, तो उन्हें अपने आसपास की दुनिया को जानने-समझने का एक मौका मिलेगा।

समान शिक्षा की ओर : अनुराग

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हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा लिए एक फैसले के मुताबिक अब उत्तर प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों, विधायकों और सांसदों के बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढ़ेंगे। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने चीफ सेकट्ररी को निर्देश दिया कि इस फैसले को लागू करने के लिए जो भी आधारभूत जरूरतें हैं, उन्हें जल्द से जल्द पूरा किया जाए। स्कूल अच्छी स्थिति में संचालित होने चाहिए और यह फैसला अगले शैक्षणिक सत्र से अमल में आ जाना चाहिए। प्राथमिक स्कूलों की दयनीय हालत देखते हुए दायर की गई एक याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने यह फैसला दिया। कोर्ट ने चीफ सेकट्ररी से इस बारे में की गई कार्रवाई के संबंध में छह माह में रिपोर्ट भी मांगी है। इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह आदेश यदि किसी कानूनी दांवपेच में नहीं फंसा और इस पर अमल हुआ तो यह समान शिक्षा की दिशा में क्रांतिकारी कदम होगा। इसके बहुत ही सार्थक और दूरगामी परिणाम निकलेंगे।

भले ही हम लोकतंत्र की बात करते हों, लेकिन सच्चाई यह है कि राजनेता, नौकरशाह और पूंजीपति खुद को आम आदमी से ऊपर की कोई विशिष्ट चीज समझते हैं। जब वे विशिष्ट हैं, तो उनके बच्चे कैसे आम आदमी के बच्चों के साथ पढ़ सकते हैं। ऐसे में उनके बच्चों के लिए चाहिए विशिष्ट स्कूल। शायद इसी मानसिकता के कारण निजी स्कूलों को जन्म हुआ और इनका विस्तार लगातार हो रहा है। जब असमान शिक्षा लेकर बच्चे आगे बढ़ता है, तो उनमें समानता का भाव कैसे आ सकता है। वह भी भविष्य में जो भी बनता है, अपने को विशेष और आम आदमी को तुच्छा प्राणी समझता है। यह मानसिकता लोकतंत्र की आत्मा को मारने वाली है।

आज देश में कई स्तरीय असमान शिक्षा दी जा रही है। धीरे-धीरे शिक्षा का निजीकरण किया जा रहा है। शिक्षा को लेकर देश की शासक वर्ग की सोच का इससे पता चलता है कि पहली बार केंद्र सरकार ने शिक्षा का बजट ही घटा दिया। देशभर में बड़ी संख्या में ऐसे स्कूल हैं, जहां शिक्षकों की बात छोड़िए, मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव है। हाई कोर्ट के आदेश से शासक वर्ग पर दबाव बनेगा कि वह सरकारी स्कूलों की व्यवस्था सुधारे और उनकी जरूरतों को पूरा करे। इससे साधनविहीन, निचले पायदान के बच्चों को भी श्रेष्ठ शिक्षा मिल सकेगी।

यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि सरकारी स्कूलों में बच्चे पढ़ने नहीं आ रहे हैं, जबकि कोर्ट ने पाया कि खराब स्थिति होने के बावजूद इन स्कूलों में 90 फीसद बच्चे जाते हैं। यह इस बात का संकेत है कि शिक्षा का निजीकरण कर देश के बड़े वर्ग को अशिक्षित बनाए रखने की साजिश हो रही है, ताकि ‘उनकी’ विशिष्टता में आंच न आए। यह बात बिल्कुल सही है कि क्योंकि अधिकारियों, राजनेताओं के बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ते, इसलिए उन्हें इन स्कूलों की कोई विशेष चिंता भी नहीं रहती। यदि उनके बच्चे इन स्कूलों में पढ़ेंगे, तो वे मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध कराएंगे और शिक्षा का स्तर सुधारने का भी हर संभव प्रयास करेंगे। निजी स्कूलों की शिक्षा बहुत महंगी है और शासक वर्ग सरकारी स्कूल खोल नहीं रहा है। इसका दुष्परिणाम यह है कि बच्चे के जन्म लेते ही माता-पिता पर उसकी पढ़ाई-लिखाई को लेकर एक तनाव हावी हो जाता है, जिससे वह बच्चे की पढ़ाई पूरी होने तक छुटकारा नहीं पा पाते। बच्चे को अच्छे स्कूल में एडमिशन दिलाने के लिए वह कमाई के लिए गलत रास्ते अख्तियार करते हैं या अपनी जरूरतों को भी त्याग देते हैं। और जो यह नहीं कर पाते, वे इस कुंठा में जीते हैं कि अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा नहीं दे पाए।

लोकतांत्रिक मूल्यों को मानने वाले देश के लिए क्या यह आदर्श स्थिति है कि उसका नागरिक बच्चों की पढ़ाई के लिए इतना आक्रांत रहे कि तनावमुक्त जीवन भी न जी पाए। लचर सरकारी शिक्षा व्यवस्था केवल उत्तर प्रदेश की समस्या नहीं है। कमोबेश पूरे देश का यही हाल है। हाई कोर्ट ने अच्छा अवसर दिया है। इसको ध्यान में रखकर देश अच्छी और समान शिक्षा की ओर ठोस कदम बढ़ाए।

बच्चों के बीच : अनुराग

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पि‍छले दि‍नों बच्‍चों से मि‍लने का सुअवसर मि‍ला। हुआ यह कि‍ ट्रि‍ब्‍यून मॉडल स्‍कूल, चंडीगढ़ में हि‍न्‍दी सप्‍ताह (3 से 8 अगस्‍त) के अर्न्‍तगत 4-5 अगस्‍त को दो दि‍वसीय पुस्‍तक मेले का आयोजन कि‍या गया। पुस्‍तक मेले की आयोजि‍त करने की जि‍म्‍मेदारी लेखक मंच प्रकाशन को सौंपी गई। मैंने लेखक मंच से प्रकाशि‍त पुस्‍तकों के अलावा नेशनल बुक ट्रस्‍ट, एकलव्‍य और प्रथम से कुछ कि‍ताबें ले लीं। कुछ कि‍ताबें ट्रांसपोर्ट से चंडीगढ़ भि‍जवा दी थीं। ये कि‍ताबें स्‍कूल को आयोजन से तीन-चार दि‍न पहले ही मि‍ल गई थीं। मंगलवार और बुधवार को पुस्‍तक मेला था। यह सभी आयोजन स्‍कूल में हिंदी की वि‍भागाध्‍यक्ष रजनी जी की देखरेख में हो रहा था। मैंने उनसे कहा कि‍ वह चाहें तो सोमवार को भी बच्‍चों को कि‍ताबें उपलब्‍ध करा सकती हैं। ऐसे में बच्‍चों को कि‍ताबें देखने-खरीदने के लि‍ए तीन दि‍न मि‍ल जाएंगे। यह वि‍चार उन्‍हें पसंद आया और सोमवार को ही कि‍ताबें प्रदर्शित कर दी गईं। इस तरह से पुस्‍तक मेला दो दि‍वसीय की बजाय तीन दि‍वसीय हो गया।  lekhakmanch.book fair 1

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मंगलवार सुबह करीब सवा नौ बजे मैं अपने मि‍त्र केवल ति‍वारी जी के साथ उनके घर से स्‍कूल पहुंच गया। स्‍कूल की शानदार इमारात, खुली जगह और खूब हरि‍याली देखकर मन प्रसन्‍न हो गया। मैं सोचने लगा कि‍ सरदार दयालसिंह मजीठि‍या की दूरदर्शिता की दाद देनी होगी कि‍ करीब 135 साल पहले समाज को शि‍क्षि‍त करने के लि‍ए उन्‍होंने जगह-जगह स्‍कूल-कॉलेज खोले और इनके संचालन की जि‍म्‍मेदारी lekhakmanch.book fair 3lekhakmanch.book fair 4lekhakmanch.book fair 5कि‍सी प्रबंधन समि‍ति‍ या अपने परि‍वार के सदस्‍यों को सौंपने की बजाय ट्रस्‍ट बनाए।

प्राधानाचार्या श्रीमती वंदना सक्‍सेना जी से संक्षि‍प्‍त मुलाकात हुई। काफी वि‍न्रम और जुनूनी लगीं।

पुस्‍तक मेला पुस्‍तकालय में आयोजि‍त कि‍या गया था। वहां पुस्‍तकालय अध्‍यक्ष के अलावा और भी एक-दो अध्‍यापि‍काएं मौजूद थीं। सोमवार को हुई कि‍ताबों की बि‍क्री का हि‍साब-कि‍ताब बडे़ ही सलीके से बनाया हुआ था।

स्‍कूल में आठवी, सातवीं और छठी के बीच हिंदी भाषण प्रति‍योगि‍ता का आयोजन कि‍या गया था। इस प्रति‍योगि‍ता के तीन नि‍र्णायकों में से एक की जि‍म्‍मेदारी मुझे भी सौंप दी गई। मंच का संचालन दो बच्‍चों ने बि‍ल्‍कुल प्रोफशनल्‍स अंदाज में कि‍या। प्रति‍योगि‍ता में बच्‍चों ने आत्‍मवि‍श्‍वास के साथ अपनी बात बडे़ ही तार्किक ढंग से रखी। यह सब देखकर अच्‍छा लगा। स्‍कूलों में पाठ्यपुस्‍तकों की पढ़ाई के अलावा इस तरह की गति‍वि‍धयां बेहद जरूरी हैं।

प्रति‍योगि‍ता में अनीश, मुस्‍कान राणा व शि‍वांश को प्रथम, आँचल, गुलि‍स्‍तान व महक को द्वि‍तीय और इशान व प्रेरणा को सांत्‍वना पुरस्‍कार मि‍ला।

ऐसे आत्‍मवि‍श्‍वासी बच्‍चों से भला मैं क्‍या कहता। मैंने सि‍र्फ इतना कहा कि‍ वे अपने आत्‍मवि‍श्‍वास को कायम रखें। जीवन का जो भी लक्ष्‍य नि‍र्धारि‍त कि‍या है, उसकी तैयारी अभी से शुरू कर दें। आपके लक्ष्‍य और माता-पि‍ता की आपको लेकर इच्‍छाएं अलग-अलग हो सकती हैं। ऐसे में अपने माता-पि‍ता के साथ बैठ अपनी रुचि‍ और क्षमताएं बताएंगे, तो अवश्‍य ही इसका समाधान नि‍कल जाएगा।

इसके बाद दो बजे तक बच्‍चों का लायब्रेरी में कि‍ताबों को लेकर आना-जाना लगा रहा। अगले दि‍न भी यही स्‍थि‍ति‍ रही।

यह देखकर बेहद अच्‍छा लगा कि‍ छोटी कक्षाओं के बच्‍चे कि‍ताबों में अधि‍क रुचि‍ ले रहे हैं। बड़ी कक्षाओं के बच्‍चों ने कोई खास रुचि‍ नहीं दि‍खाई। इसके दो-तीन कारण मेरी समझ में आ रहे हैं। पहला- कॅरि‍यर का दबाव। उन्‍हें लगता होगा कि‍ अब हमें पाठ्यक्रम की या प्रति‍योगि‍ताओं से जुड़ी कि‍ताबें ही पढ़नी चाहि‍ए। दूसरा- जब बचपन से ही पुस्‍तक संस्‍कृति‍ से दूर रहे, तो अचानक पुस्‍तकों से प्रेम कैसे जाग सकता है। तीसरा- उनकी प्राथमि‍कताएं। बचपन से हुए पालन-पोषण के कारण उनकी प्राथमि‍कता कि‍ताब की बजाय बर्गर, पि‍ज्‍जा, चाकलेट, कोल्‍ड ड्रिंक आदि‍ हो।

इस दौरान कुछ ऐसी घटनाएं हुईं, जि‍नका उल्‍लेख करना जरूरी लगता है।

एक बच्‍ची दस रुपये वाली कि‍ताब खरीद ढूंढ़ रही थी। मैंने पूछा कि‍ फि‍ल्‍म देखने जाती हो? उसने ‘हां’ में सि‍र हि‍ला दि‍या। मैंने फि‍र पूछा कि‍ टि‍कट कि‍तने कहा है? सौ रुपये का? उसने कहा कि‍ नहीं, दो सौ रुपये का। मैंने मुस्‍कराते हुए कहा कि‍ फि‍ल्‍म दि‍खाने के लि‍ए पापा से जि‍द कर सकती हो। कि‍ताबें दि‍लाने की जि‍द नहीं कर सकती! वह भी मुस्‍करा दी और कि‍ताब देखने लगी।

बुधवार यानी 5 अगस्‍त को सातवीं के एक छात्र ने कथाकार शेखर जोशी का कहानी संग्रह और एक अन्‍य कि‍ताब पसंद की। उसके पास पैसे नहीं थे। उसका आग्रह था कि‍ उसे ये कि‍ताबें दे दी जाएं और वह पैसे कल दे देगा। मैडम से इस बारे में पूछा, तो उन्‍होंने मना कर दि‍या। उनका कहना था कि‍ महंगी कि‍ताबें हैं। कल इसके पैरेंटस आब्‍जेक्‍शन उठा सकते हैं। बात तर्क संगत थी। बच्‍चे को समझाया कि‍ कल हम लोग चले जाएंगे, इसलि‍ए आपको कि‍ताब देना मुश्‍कि‍ल है। वह चला गया। करीब बीस-पच्‍चीस मि‍नट बाद वह फि‍र से आया। इस बारे उसके पास सौ रुपये थे। उसने कहा कि‍ शेखर जोशी का कहानी संग्रह तो दे ही दो। हमें थोड़ा आश्‍चर्य भी हुआ कि‍ यह बच्‍चा शेखर जोशी का कहानी संग्रह ले जा रहा है। उससे पूछा, तो उसने कहा कि‍ वह शेखर जोशी की कहानि‍यां पढ़ना चाहता है। इसलि‍ए उनकी कि‍ताब खरीद रहा है।

वि‍ज्ञान की अध्‍यापि‍का नि‍धि‍ जी मंगलवार को ही कुछ कि‍ताब छांटकर अलग रख गई थीं। साथ ही हि‍दायत दे गई थीं कि‍ ये कि‍ताबें कि‍सी और को न दी जाएं। इन्‍हें वह ले लेंगी। अगले दि‍न यानी बुधवार को उन्‍होंने कुछ और कि‍ताबें लीं। उन्‍होंने बताया कि‍ उनके नाती-पोते गर्मियों की छुट्टि‍यों में उनके पास आते हैं। ये कि‍ताबें उन्‍हीं के लि‍ए ली हैं। उन्‍होंने एक कि‍ताब खरीदी जि‍से छोटे बच्‍चे पढ़ नहीं सकते थे। केवल जी ने कहा कि‍ यह कि‍ताब तो बच्‍चे अभी पढ़ नहीं पाएंगे। वह हंस कर बोली कि‍ उनकी मम्‍मी तो पढ़ेगी।

आशा मैडम पंद्रह-बीस बच्‍चों को लेकर आईं। उन्‍होंने बच्‍चों से अपनी पसंद की कि‍ताब छांटने के लि‍ए कहा और साथ ही हि‍दायत दे दी कि‍ कोई कि‍ताब बीस रुपये से अधि‍क कीमत की न हो। बच्‍चों ने कि‍ताबें पसंद कीं। आशा जी ने बच्‍चों और कि‍ताबों का नाम नोट कर उन्‍हें कक्षा में भेज दि‍या। एक-दो बच्‍चों ने महंगी कि‍ताबें पसंद की थीं, उन्‍हें आशा जी ने सूची से हटा दि‍या। उन्‍होंने कि‍ताबों का भुगतान कर दि‍या।

बाद में केवल जी ने बताया कि‍ इन बच्‍चों के पास पैसे नहीं थे, लेकि‍न कि‍ताब लेना चाहते थे। मैडम ने अपने रि‍स्‍क पर बच्‍चों को कि‍ताबें दि‍लवा दीं कि‍ कल घर से पैसे लेकर आएंगे। हो तो यह भी यह सकता है कि‍ कि‍सी बच्‍चे के माता-पि‍ता पैसे न दें।

बच्‍चों के साथ हुई इस मुलाकात से यह नि‍ष्‍कर्ष आसानी से नि‍काला जा सकता है कि‍ बच्‍चों में पाठ्यक्रम से इतर वि‍भि‍न्‍न वि‍षयों की कि‍ताबें पढ़ने की चाह है। हमें बच्‍चों के बीच कि‍ताबों को लेकर जाना होगा, ताकि‍ उनकी यह रुचि‍ बनी रहे। अन्‍यथा यह होगा कि‍ अच्‍छी और मनपसंद कि‍ताबें नहीं मि‍लने से वे इस ओर से वि‍मुख हो जाएंगे और उनकी प्राथमि‍कता बदल जाएगी, जो कि‍ आजकल हो भी रहा है।

समान शिक्षा की ओर: अनुराग

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पिछले दिनों पटना में आयोजित एक सम्मेलन में सात साल के बच्चे कुमार राज ने शिक्षा व्यवस्था को लेकर जोरदार ढंग से जो बातें कहीं, वे चर्चा में रहीं। उसने कहा, ‘दो तरह की शिक्षा व्यवस्था है, अमीरों के लिए अलग, जिनके बच्चे नामी प्राइवेट स्कूलों में पढऩे जाते हैं और गरीबों के लिए अलग, जिनके बच्चे सरकारी स्कूलों में पढऩे जाते हैं। इससे साफ पता चलता है कि प्राइवेट स्कूलों के मुकाबले सरकारी स्कूलों में शिक्षा का घोर अभाव है। आखिर क्या कारण है कि कोई भी डॉक्टर, इंजीनियर, वकील यहाँ तक कि उस स्कूल के शिक्षक भी अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में पढ़ाना नहीं चाहते? यही वजह है कि हम बच्चे हीन भावना का शिकार हो जाते हैं।’

इस खबर का प्रचार-प्रसार करने वालों की टोन ऐसी थी, कि मानों शिक्षा को लेकर यह चिंताजनक स्थिति केवल बिहार में है, जबकि देशभर में शिक्षा व्यवस्था का कमो बेश यही हाल है। कुमार राज की बात सौ फीसद सही है। सोचने की बात यह है कि जब सात साल के बच्चे को समझ में आ रहा है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था की स्थिति दिन-प्रतिदिन खराब हो (या की जा रही है) रही है और देश में कई तरह ही शिक्षा दी जा रही है, तो प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों, शिक्षामंत्रियों और बुद्धिजीवियों को यह बात क्यों समझ में नहीं आ रही है! या वे जानकर भी अनजान बन रहे है! या उनके लिए समान शिक्षा का मुद्दा गैरजरूरी है! क्या वे भी आम आदमी के बच्चों को शिक्षा से वंचित करने की साजिश में शामिल है! क्या वे चाहते हैं कि बच्चे में शिक्षा के दौरान असमानता के बीच बोए जाएँ! फिर समाज में समानता और समरसता की बात करने का क्या तुक है!

केंद्र की सरकारें हों या राज्यों की, सभी सरकारी शिक्षा व्यवस्था से हाथ खींच रही हैं। तथाकथित आंकड़ों और रिपोर्टों से यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था बेकार है, लोग सरकारी स्कूलों में पढ़ाने नहीं चाहते हैं और निजी स्कूलों में बच्चों को प्रतिशत लगातार बढ़ता रहा है। ये बातें कुछ हद तक सही हैं, लेकिन खराब सरकारी शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही से सरकारें बच सकती हैं? आजादी के कई दशक बीत जाने के बाद भी सरकारी स्कूलों मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं, पर्याप्त संख्या में अध्यापक नहीं हैं, उनसे वर्ष भर कई गैरशैक्षणिक कार्य कराएँ जाते हैं, तो इन सबके लिए कोई तो जिम्मेदार होगा। इन सबके लिए भी अध्यापक जिम्मेदार हैं? कुछ आर्थिक रूप से सम्पन्न और मध्यम वर्गीय लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाने चाहते हैं, तो देश केवल इन लोगों का है। गरीब और साधनहीन लोगों के बच्चों की शिक्षा का क्या होगा?

कुमार राज ने अपने भाषण आगे जो बातें कहीं थी, वे भी गौरतलब हैं। उसने कहा कि ‘बड़ा होकर संयोग से इस देश का प्रधानमंत्री बन गया, तो सबसे पहले पूरे देश के प्राइवेट स्कूलों को बंद करवा दूंगा ताकि सभी बच्चे सरकारी स्कूलों में एक साथ पढ़े सकें। चाहे वह डॉक्टर का बच्चा हो या किसान का। चाहे वह इंजीनियर का बच्चा हो या मजदूर का। तभी इस देश में समान शिक्षा लागू होगी।’

जब सात साल के बच्चे को समझ आ रही हैं कि देश में कैसी शिक्षा व्यवस्था होनी चाहिए, तो देश-विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त जनप्रतिनिधियों और बुद्धिजीवियों को यह सीधी-सादी बात क्यों नहीं समझ में आ रही है। रिपोर्ट के अनुसार बच्चे की बातें सुनकर बिहार के मुख्यमंत्री के गर्दन उठाना भी मुश्किल हो गया, लेकिन क्या असमान शिक्षा हम सबके लिए शर्मिंदगी की बात नहीं है। यह क्या केवल बिहार का मामला है?

कुमार राज का सुझाव बिल्कुल सही है कि अगर लोग अपने गांव के स्कूलों की निगरानी करें, तो शिक्षा

के हालात में बड़ा सुधार होगा। इस छोटे बच्चे की सीख के बाद भी क्या अभी किसी और बात का इंतजार करने की जरूरत है? अगर हम अभी भी सचेत नहीं हुए, तो चिडिय़ा खेत चुग जाएगी और हम सिर पीटते ही रह जाएँगे।

सरकारी स्कूल में पढ़ाने का सार्थक कदम : अनुराग

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राजधानी दि‍ल्‍ली के मटि‍याला वि‍धानसभा से आम आदमी पार्टी के विधायक गुलाब सिंह ने अपने छोटे बेटे का पब्लिक स्कूल से नाम कटाकर उसका दाखिला
सरकारी स्कूल में करवा दि‍या है। स्थानांतरण प्रमाण-पत्र नहीं मिल पाने के कारण वह निजी स्कूल में पढ़ रहे अपने बड़े बेटे का दाखिला सरकारी स्कूल में नहीं करवाया सके। वह 10वीं कक्षा का छात्र है।अगले वर्ष उसका दाखिला भी सरकारी स्कूल में करवा दिया जाएगा।

ऐसे समय में जब शि‍क्षा का नि‍जीकरण तेजी से हो रहा है और उच्‍च ही नहीं, मध्‍य और नि‍म्‍न वर्ग भी सरकारी स्‍कूलों की अपेक्षा घर-घर दुकान की तरह खुले तथाकथि‍त पब्‍लि‍क स्‍कूलों को प्राथमिकता दे रहा है, वि‍धायक गुलाब सिंह का अपने बच्‍चों को पब्‍लि‍क स्‍कूल से सरकारी स्‍कूल में पढ़ाने का फैसला साहसि‍क और प्रशसंनीय है।

वि‍धायक बेटे के सरकारी स्‍कूल में पढ़ने से उस स्‍कूल की शि‍क्षा और प्राशसि‍नक व्‍यवस्‍था पर सकारात्‍मक असर पडे़गा। इसका लाभ उस स्‍कूल में पढ़ रहे अन्‍य बच्‍चों को भी प्रत्‍यक्ष और अप्रत्‍यक्ष रूप से मि‍लेगा। दुर्भाग्‍यपूर्ण स्‍थि‍ति‍ है कि‍ नौकरशाहों, सरकारी कर्मचारि‍यों, सम्‍पन्‍न लोगों और मध्‍यवर्ग ने भी अपने बच्‍चों को सरकारी स्‍कूलों में पढ़ाना बंद कर दि‍या है। सि‍फारि‍श कराएंगे, मोटा डोनेशन और हर महीने अच्‍छी-खासी फीस देंगे, बीच-बीच में स्‍कूल को चढ़ावा चढ़ाते रहेंगे और
इस सबका रोना भी रोएंगे, लेकि‍न बच्‍चे के लि‍ए स्‍कूल चाहि‍ए ऐसा, जि‍सके नाम के आगे पब्‍लि‍क स्‍कूल, कांवेंट स्‍कूल जैसे शब्‍द जुडे़ हों। उस स्‍कूल में क्‍या पढ़ाया जाता है और कितने योग्‍य अध्‍यापक उस स्‍कूल में हैं, इससे उसे कोई खास मतलब नहीं होता। अभिभावकों ने मान लिया
है कि पब्‍लिक या कांवेट शब्‍द ऐसे ही अच्‍छे स्‍कूल की गारंटी हैं, जैसे सामना खरीदने में आइएसआइ चिह्न का होना। हमारी इसी मानसि‍कता ने सरकार को मौका दे दि‍या है कि‍ वह सरकारी स्‍कूल नहीं खोल रही है और जो खुले हैं, उन्‍हें या बंद कि‍या जा रहा है या पीपीपी मॉडल के नाम नि‍जी हाथों को सौंपा जा रहा है। ऐसे में और सरकारी स्‍कूल खोलने की बात करना भी बेईमानी है।

हर साल की तरह आजकल इस बार फि‍र कई स्‍कूलों में फीस और एनुअल चार्ज में बेतहाशा वृद्धि‍ के खि‍लाफ अभि‍भावकों का आंदोलन चल रहा है। वे प्रदर्शन कर रहे हैं, शासन-प्रशासन से गुहार लग रहे है, कुछ ने न्‍यायालय का दरवाजा भी खटखटाया है और कई जगह तो स्‍कूल प्रबंधन और अभि‍भावकों के बीच झड़प भी हो चुकी है, लेकि‍न इस सबका परि‍णाम क्‍या नि‍कलेगा? बहुत हुआ तो फीस व एनुअल चार्ज में दो-चार प्रतिशत की कमी और मामला रफादफा। अब तो हर साल यह सब एक रस्‍म अदायगी जैसा होना लगा है। शायद ये निजी स्‍कूल वाले भी इसके लिए तैयार रहते हैं। इसलिए वे पहले ही तीस-चालीस प्रतिशत तक बढ़ोत्‍तरी कर देते हैं। ऐसे में पांच-सात प्रतिशत कम करने पर भी उन पर कोई खास असर नहीं पड़ता।

इस समस्‍या का स्‍थाई समाधान शिक्षा के सरकारीकरण में ही है। सरकार स्‍कूल खोले, उनमें व्‍यवस्‍थागत खामियां दूर करे और अध्‍यापकों को गैरसरकारी कार्यों में न लगाए। शिक्षकों को अपनी जिम्‍मेदारी समझनी होगी। स्‍कूलों में शिक्षा के स्‍तर सुधार होगा तो अभिभावक भी इस ओर कदम बढ़ाएंगे। बकौल उत्‍तराखंड के बागेश्‍वर जिले के गरुड खंड के खंड शिक्षा अधिकारी आकाश सारस्‍वत उनके खंड के स्‍कूलों में सभी शिक्षकों सहयोग से शिक्षा का स्‍तर बेहतर हुआ है। इसका परिणाम है कि कई अभिभावकों ने अपने बच्‍चों का निजी स्‍कूलों से निकालकर सरकारी स्‍कूलों में एडमिशन कराया है। यह अनुभव बहुत कुछ कहता है।

अभिभावकों को इसके लिए आगे आना होगा। कल्‍पना कीजिए कि किसी मंत्री, सचिव, आइएएस अधिकारी या किसी प्रभावशाली व्‍यक्‍ति का बच्‍चा सरकारी स्‍कूल में पढ़ता है। वह अपने पिता को स्‍कूल की शिक्षा और वहां की कमियों के बारे में बताता है तो उसका तुरंत और प्रभावशाली ढंग से समाधान होगा।

विधायक गुलाब सिंह का कथन महत्‍वपूर्ण है कि नेता लोगों के बीच बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन उस पर खुद अमल नहीं करते। यहां नेताओं के साथ ही अन्‍य लोगों को शामिल कर लिया जाए तो स्‍थिति यही है। विधायक गुलाब सिंह ने तो एक शानदार पहल की है। हम न जाने कब इस ओर कदम बढ़ाएंगे।

लोकतंत्र के लिए खतरा : अनुराग

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लगाता है कि यह लोकसभा चुनाव दूरगामी परिणाम वाले होगा, लेकिन डर इस बात है कि यह चुनाव सकारात्मक चीजों के लिए नहीं, बल्कि नकारात्मक बातों के लिए अधिक याद किया जाएगा। इस चुनाव में कुछ ऐसी कुप्रवृत्तियां पनप चुकी हैं, जो कि लोकतंत्र के लिए घातक साबित होंगी। चुनाव के दौरान एक-दूसरे पर आरोप लगना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार जिस घटिया स्तर के आरोप लगाए जा रहे हैं, यह चिंताजनक है। इसमें छुटभैय्या नेता ही नहीं, बड़े कहे जाने वाले नेता भी पीछे नहीं हैं। इस पर विरोध होने पर ये नेता अपनी गलती स्वीकार करने के बजाय कुतर्क कर रहे हैं। दुखद यह है कि पार्टियां या तो चुप्पी साध ले रही हैं या बचाव में उतर रही हैं।

लोकतंत्र में असहमति को भी महत्व दिया जाता है। इस चुनाव में असहमति होने पर लोग उग्र होकर अराजकता पर उतर रहे हैं। गाली-गलौच से लेकर मारपीट व हमले तक किए जा रहे हैं। जैसे-जैसे चुनाव का समर अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है, यह कुप्रवृत्ति तेज होती जा रही है। यह लोकतंत्र के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। असहमति को सहन न कर पाना एक तरह की बर्बरता है। यह तानाशाही की शुरुआत है। लोकतंत्र में विरोधी की भी बात सुनकर उसका समाधान करने या उसका तर्क संगत जवाब दिया जाता है, लेकिन अब बाहुबल से मुंह बंद करने पर जोर है। राजनेता टुकड़े-टुकड़े करने, जमीन में गाड़ देने जैसी धमकियां नाम ले-लेकर दे रहे हैं। दूसरी ओर एक ने तो चेता दिया है कि जो उनकी पार्टी के नेता को विरोध करेगा, उसे पाकिस्तान भेज दिया जाएगा। कोढ़ की खाज यह कि एक नेता ने तो अपनी कौम को सांप्रदायिक होने की सलाह तक दे दी। इससे अराजकता ही बढ़ेगी और जनहित की बातें पीछे रह जाएंगी।

इस बार के चुनाव की यह भी देन है कि नेता ब्रांड बन गए हैं। पार्टियां साम दाम दंड भेद से दूसरी पार्टी के नेताओं की छवि धूमिल करने और अपनी पार्टी के नेताओ की छवि चमकाने में लगी हैं। इसके लिए करोड़ों खर्च कर पीआरओ कंपनियों की मदद ली जा रही है। पहले नेता अपने और अपनी पार्टियों के कामों का उल्लेख कर और भविष्य की योजनाएं (उन पर अमल कितना होता था, यह दूसरी बात है) लेकर लोगों के बीच जाते थे और अब इस पर जोर है कि लोगों के बीच कैसी बॉडी लैंग्वेज हो, कैसे कपड़े हों, जो उन्हें आकर्षित करे। पार्टियां पैसा पानी की तरह बहा रही हैं। इतना पैसा कहां से और कैसे आ रहा है, इसका लेकर सभी गोलमाल जवाब दे रही हैं। नेताओं के भाषणों पर ताली पीटनेवाली आम जनता भी नहीं सोच रही कि आखिर चुनाव बाद इसका बोझ किस पर पड़ेगा? यह समझना मुश्किल नहीं है कि चुनाव के बाद सरकार चाहे जिसकी बने, जनहित में योजनाएं बनेंगी या उनके लाभ का ध्यान रखा जाएगा, जो पैसा लगा रहे हैं!

इस चुनाव को देखकर यह भी लग रहा है कि भारत में अधिनायकवाद का उदय हो चुका है। पार्टी स्तर पर टिकट वितरण और अन्य फैसले लेने में जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाई जाती थी (भले ही ढोंग सही), अब वह भी नहीं हो रहा है। दूसरी पार्टियों पर ‘एक परिवार का शासन’ का आरोप लगाने वाली पार्टियों में भी सामुहिक विचार-विमर्श के बाद निर्णय लेने के बजाय फैसले थोपे जा रहे हैं। विरोध करने वाले या असहमति जताने वाले को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है या उसे नजरअंदाज किया जा रहा है। जब पार्टी नेताओं की असहमति बर्दाश्त नहीं हो रही है, तो देश में विपक्षी पार्टियों होती हैं और दूसरी विचारधारा के लोग भी, तब?

पार्टियां ये सब इस दावे के साथ कर रही हैं कि उन्हें देश और आम लोगों की चिंता है। इससे उनकी नीयत पर शक और गहराता है, क्‍योंकि‍ देश व जनता का हि‍त करना ही उनका एकमात्र उद्देश्‍य होता तो, नि‍चले तबके तक भी सुवि‍धाएं पहुंचतीं, उनका जीवन-स्‍तर सुधरता, न कि‍ केवल कुछ मुट्ठी भर लोग लोकतंत्र की मलाई चाट रहे होते।