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पहला अनि‍ल सि‍न्‍हा स्‍मृति‍ कार्यक्रम 25 को

लखनऊ : अनि‍ल सि‍न्‍हा मेमोरि‍यल फाउंडेशन का पहला सालाना स्‍मृति‍ कार्यक्रम 25 फरवरी, 2012 को थ्रस्‍ट सभागार, भारतेन्‍दु नाट्य अकादेमी, लखनऊ में दोपहर 2 बजे से आयोजि‍त कि‍या जायेगा। मशहूर स्‍कॉलर और कला, थि‍येटर व फि‍ल्‍म आलोचक समि‍क बंधोपाध्‍याय ‘The Contested Ground of Culture ’वि‍षय पर अनि‍ल सि‍न्‍हा मेमोरि‍यल व्‍याख्‍यान देंगे। इस अवसर पर अनि‍ल सि‍न्‍हा अवॉर्ड भी दि‍या जायेगा। पहला अवॉर्ड एक राष्‍ट्रीय हि‍न्‍दी पत्रि‍का से जुडे़ और जन-पक्षधर ब्‍लॉग ‘जन-ज्‍वार’ चलाने वाले पत्रकार अजय प्रकाश को दि‍या जायेगा। भारत और बांग्‍लादेश में एथनोम्‍यूजि‍कोलॉजि‍कल रि‍सर्च से जुड़ी कलाकार और गायि‍का मौसमी भौमि‍क एक खास सांस्‍कृति‍क कार्यक्रम पेश करेंगी। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता वरि‍ष्‍ठ हि‍न्‍दी कवि‍ आलोक धन्‍वा करेंगे।

कार्यक्रम में अनि‍ल सि‍न्‍हा के सफर पर फोटो स्‍लाइड्स/वीडि‍यो शो होगा। इस अवसर पर समारोह की ‘स्‍मारि‍का’ और चि‍त्रकार-लेखक अशोक भौमि‍क की कि‍ताब ‘भारतीय चि‍त्रकला : हुसैन के बहाने’ का लोकार्पण भी कि‍या जायेगा।

गली रामकली : अनिल सिन्‍हा

जाने-माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा (11 जनवरी, 1942 – 25 फरवरी, 2011) की कहानी-

पाटानाला से कोई सौ गज आगे जाने पर दाहिने हाथ जो गली है उसमें बीसेक मकान होंगे, सभी एक-दूसरे से चिपके-चिपके कुछ ऐसे कि गली के मुहाने से सब एक ही मकान का आभास देते हैं। उनके रूप-रंग भी मिलते-जुलते। लगता लकड़ी के पुराने नक़्काशीदार, कोलतार-पुते खम्‍भों पर टिकी उनकी छतें जैसे नाले के ऊपर तक पहुँच रही हैं और हैरत से आगे फैले संसार को देख रही हैं। छतें ऐसी कि नजरें टपककर उनके नीचे के बरामदों में गिर जाएँ और जरा-सा उठकर दीवानखाने से होते हुए अन्‍दर आँगन तक चली जाएँ और चारों ओर के बरामदों में सिलसिलेवार बने कमरों को देखकर औचक हो जाएँ—अंदर क्या होगा मालूम नहीं; यहाँ से नजरें वहीं तक जा पाती हैं और पुराने अँधेरे में गुम हो जाती हैं।

सभी मकान खस्ताहाल! गोया सौ-डेढ़ सौ साल की उमर तो पार ही कर चुके हैं और उम्रदराजी की झुर्रियाँ लटकाये अपने झाँर्इंपन में पुराना उजास देखने की कोशिश कर रहे हों। पाँच-सात मकानों को छोड़ सबके रंग-रोगन उड़ चुके हैं। जिन पर रंग चढ़े हैं उन मकानों के बच्चे शायद बाहर कहीं ऐसा काम कर रहे हों कि रंगाई-पुताई, घर-खर्च के लिए कुछ पैसे यहाँ भी भेज रहे हों पर उनके पपड़ाये रंगों के पीछे से पुरानापन झाँक रहा है। इस पीढ़ी के दादा-परदादाओं ने कभी यहाँ जिन्दादिली और अपने तरीके के शान-ओ-शौकत के दिन गुज़ारे होंगे। अब तो यह पीढ़ी अपनी दाल-रोटी और आबरू बचा ले जाए यही बहुत है। उन्होंने अपने तरीक़े से ऐश किया, बच्चों के लिए कुछ खास नहीं छोड़ सिवा इन मकान के और कुछ सामानों व घर की व्यवस्था के! उन्हें अन्‍दाज भी न होगा कि ज़माना कुछ ऐसा आएगा कि बच्चों की हालत हमसे बेहतर न होगी और मकानों पर रंग चढ़ाना भी मुश्किल हो जाएगा- पीपल के पत्ते-सा कल को उन्होंने नहीं देखा, देखा अपने आज को!

जो भी हो अब इन घरों के लोगों के पास छोटी नौकरियाँ, दुकानें, रोजगार के कुछ अन्य छोटे-मोटे धंधे हैं जिनसे इनके दिन कटते हैं। शहर के नये मुहल्लों व नयी कॉलोनियों की तुलना में यहाँ पड़ोसन, जिन्दादिली और भाईचारा ज़्यादा है। जितना वक्त इन्हें मिलता है उसमें हँसी-मजाक, सुख-दु:ख, राय-मशवरा सब कुछ चलता। कुल मिलाकर गली एक बड़ा-सा परिवार लगती जिसमें अलग-अलग कौम के लोग थे पर सबके बीच हँसी-ठट्ठा, दु:ख-दर्द का बँटवारा, उधार-पैंचा भी चलता औऱ सब एक-दूसरे के भाई-बहन, चाचा-भतीजा, अम्मा-दादी, फूफी-मौसी, देवर-भाभी, बाबा-दादा का रिश्ता और छोटे-बड़े का लिहाज भी बरकरार था। इस गली की पहचान ही थी इसका सदाबहारपन, गो कि इसमें कमी आनी शुरू हो गयी थी। जिन्‍दगी के कठिन मरहले थे जिनके हल पैसों से ताल्लुक रखते थे पर अभी वे गली के नये-पुराने लोगों पर हावी नहीं हुए थे। असर बहुत धीरे हो रहा था और ऐसे असर को कम-से-कम इस गली में रोकने की कोशिश भी चलती रहती थी। आज के समय में भी गली खुशहाल थी, रौशन थी और जिन्दादिली के झोंके आया करते थे।

ऊपरी तौर पर यह अकेली गली खुश थी पर थी तो वह बदलते हुए एक बड़े शहर के बीच में ही जहाँ ज़िन्दगी और व्यवहार के तमाम तौर-तरीके बदल रहे थे। पहले जहाँ कोई पाटावाली गली पूछकर इन घरों में ठीक-ठाक से पहुँच जाता था अब उसे कई गलियों में भटकते और काफी पूछताछ के बाद पहुँचना सम्भव हो पाता था। जब से आबादी औऱ व्यवसाय के रूपों में बढ़ोत्तरी व बदलाव आया है, कई तरह की दुकानें, धन्धे, छोटी-छोटी कम्पनियाँ के छोटे-छोटे दफ्तर खुल गए हैं। अब कई घरों में ही फैक्ट्रियाँ जैसी चीजें लग गयी हैं। पुरानी पीढ़ियाँ लगभग निकल चुकी हैं और नयी पीढ़ियाँ आ चुकी हैं जो इस गली में भले ही न दिखाई देती हों पर गली से बाहर होते ही दिखाई देने लगती हैं। यहाँ तक कि अब इस गली की डाक भी गड़बड़ाने लगी है। पहले ‘नाम, पाटावाली गली’ के पते पर ही डाक आ जाती थी। यहाँ के लोगों को गुमान भी नहीं था कि इस पते पर अब डाक गड़बड़ाएगी। हो भी क्यों न! नयी पीढ़ी के नये धन्धे। लोग-ही-लोग, सवारियों की भरमार, खरीददारों की रेलम-पेल। पहले की तुलना में हज़ारों तरह के सामान और जरूरते जैसे सबके जीने का नक्शा ही बदल गया हो। तीन चौथाई लोग घर से जल्दी निकलते, शाम-रात के बीच घर लौटते। कुछ लोगों की तो देखा-देखी कई दिनों बाद होती, दुआ-सलाम कम होते पर जब होते तो बड़ी गर्मजोशी और हमदर्दी से। गनीमत थी गली अभी जीवित बची थी पर लोगों को परेशानी तब हुई ज्यादा जब मकान नम्‍बर- पाँच, ग्यारह और पन्द्रह के नाम आए मनीआर्डर वापस लौट गए, डाकिया इनमें दिये पते पर पहुँच नहीं पाया। इन घरों के बच्चे बाहर रहते थे और अपने परिवार के खर्चे के लिए पैसे भेजते थे। महीने का पैसा जब नहीं आया, बुजुर्ग परेशान हुए, डाकघर में दौड़-धूप की तो पता चला इन नामों के मनीआर्डर वापस कर दिए गए हैं क्योंकि डाकिए को पते मिले नहीं। अब आप लोग पता ठीक कराएँ तब डाक मँगाएँ। इस गली वालों के लिए यह एक नई आफत थी, कोफ्त अलग, पैसों के लाले अलग। पोस्टमास्टर ने सुझाव दिया, ‘गली का कोई नाम रखिए। नाम महापालिका में रजिस्टर कराइए। पाटानाला के पास अब कई गलियाँ हैं इसलिए नाम जरूरी है।महापालिका नाम हमारे पास भेजेगी फिर आपको डाक मिलने लगेगी। महापालिका का काम देर-सबेर होता रहेगा, यहाँ इस पोस्ट ऑफिस में गली के नाम की इत्तिला देकर जाइए अपने बाल-बच्चों को नया पता नोट कराइए। कोई दिक्कत नहीं होगी।’

इस गली में रहने वालों के सामने एक नया झमेला खड़ा हुआ- ‘इस तरह तो हम सबसे कट कर रह जाएँगे। कोई हल तो ढूँढ़ना ही होगा।’

इस मसले को लेकर यहाँ के बुजुर्गों ने जल्दी-जल्दी कई बैठकें कीं पर गली का कोई माकूल नाम सूझा नहीं। कुछ नौजवान भी थे गली में, लेकिन वे अपने कामधन्धे में इतना फँसे रहते कि ऐसी बैठकों में आने का उनके पास वक़्त ही नहीं। बुजुर्गों को सूझ नहीं रहा था कि इसका क्या नाम रखा जाय ताकि पता सटीक हो क्योंकि अब तो आसपास भी कई गलियाँ बस गई हैं। पहले उनमें इक्का-दुक्का लोग थे अब वहाँ नये व्यवसायी व कुछ किराएदार आ गए हैं। व्यवसायियों ने वहाँ बड़े-बड़े मकान बनवा लिए हैं, कुछ किराए पर उठाये है, कुछ खुद उनकी रिहाइश हैं; कुछ में घरेलू फैक्ट्रियाँ। अतंत: बुजुर्गों ने तय किया कि गली के नौजवानों को शामिल किए बिना गली का नाम तय नहीं हो सकता। बाजार की साप्ताहिक बन्दी का दिन तय हुआ और यह कि सबको बताया जाय और इस दिन की बैठक की अहमियत बतायी जाय।

नाम छोड़कर गली का हाल पुराना ही था-गुलज़ार- गुलज़ार-सा। गली के करीब आधा रिहाइशों की महिलायें अपने घर का सारा काम खुद करती थीं। झाडू, पोंछा, बर्तन, कपड़ा-सफाई, सब्जी, सौदा-सुलुफ। इनके साथ घर के मर्दों की ताबेदारी जो इनके स्वभाव का हिस्सा बन चुकी थी- दादी, अम्मा, बुआ,चाची, दीदी ने यही सिखाया था। शुरू में यह सिखाना-सीखना बड़ा नागवार गुज़रा होगा पर घुट्टी पीते- पीते आदत हो गई, अब रूटीन!

गली के मर्द भी हिंसक नहीं थे, शायद हिंसक होने की उनकी उम्र बीत चुकी थी। वे भी जानते थे प्यार-मुहब्बत की बातें और अपनत्व दिखा कर महिलाओं से जो चाहो करा लो। पुराने बाप-दादाओं ने सामंती संस्कार का यह छोटा-सा टुकड़ा अपने बच्चों में डाल दिया था यह सोचकर कि बाकी तो वे सँभाल ही लेंगे। इसका असर भी गली में दिखाई देता। वहाँ सबमें एक शांति और समझदारी दिखाई देती- अक्सर हँसी-ठट्ठा मजाक यानी गली में एक गुलजार बना रहता। दूसरी गलियों वाले इससे रश्क करते, उनके यहाँ तो आए दिन झांऊ-झांऊ मची रहती। वहाँ की महिलाएँ इस गली का हवाला देकर मर्दोंका गुस्सा और बढ़ा देतीं। इस गली के गुलज़ार रहने का एक बड़ा कारण और भी था। यहाँ के बाकी रिहाइशों में महरी काम करती। महरी क्या, वह तो घरों के सदस्य की तरह थी। जहाँ काम करती वहाँ की तो वह थी ही बाकी घरों की भी वह अपनी ही थी। इस गली में बस एक ही महरी का प्रवेश था। वह सबका हाल लेती। दादी, अम्मा, चाची, भाभी, दीदी का रिश्ता जोड़कर कभी हँसी-मज़ाक भी कर लेती, सबसे मीठे बोल, कभी सौदा-सुलुफ भी कर देती। इस तरह वह पूरी गली की एक ऐसी सदस्य थी जिसमें ऊर्जा और उत्साह भरा हुआ था। लोग उसे देखकर अपना आलस्य तोड़ देते। नाम उसका रामकली- कली की तरह खिली औऱ तनी हुई- सुगन्ध फेंकती, गली में घुसती तो गली हरसिंगार की तरह महक उठती।

दूसरी गलियों वाली सब जली रहतीं इस गली के गुलजारपन से। कहतीं रमकलिया का मन तो उसी गली में रमता है। हमारी तो वह सुनती तक नहीं। आवाज दो तो ऐंठ कर चली जाती है। वहीं कमाएगी, वहीं खाएगी, हँसी-ठट्ठा करेगी जैसे वह उसकी कामवाली गली न होकर नैहर-ससुराल हो। रमकलिया को कहीं खोजने जाने की जरूरत नहीं। जिसे खोजना हो पाटानाला की सबसे पुरानी गली में चला जाय कहीं-न-कहीं मिल ही जाएगी बतक्कड़ करते जवानी की ऐंठ दिखाती हुई। बेशरम को लाज-हया तो है नहीं। छोकड़ों के सामने तो छोड़ दो, बुजुर्गों के सामने भी दाँत दिखाती रहती है। चाचा-बाबा कहकर मटकती रहती है। उनके बीड़ी-तम्बाकू ला देती है, नसीहत भी देती है पर उनका कहा टालती भी नहीं। सबके दिल में घुसी हुई है…

पाटानाला की इस गली के आजू-बाजू की गलियों के, गली के मुहाने के लगभग सभी लोग रमकलिया को जानते हैं- उसकी चाल-ढाल को लेकर, बेबाकी को लेकर, सीन को लेकर, ‘नयनों से चलते बाण’ को लेकर और उसके उद्धत स्वभाव को लेकर- ‘कहीं कुछ कहा और वह चढ़ न बैठे।’ ललचाई व चोर नजरों से लोग उसे देखते, शायद मन-ही-मन आहें भी भरते हों पर सामने से कुछ नहीं। कभी चिढ़ में, कभी हँसी में कहते- ‘‘रमकलिया की तो एक ही गली है, उसी के लिए बनी है वह गली। वहाँ रहने वाले भी कैसे लोग हैं चमारिन को रखे हुए हैं। कोई भेदभाव नहीं, जैसे घर की लड़की हो, धरम का नाश कर रखा है। क्या हिन्दू, क्या मुसलमान। सभी घरों में वैसे ही जाती है। क्या कर रखा है इसने सब पर!’

कलाली, चिक्किन, टोला पार करते हुए बेधड़क चलीआती है अपनी गली में। भला कोई डर-भय है उसे, उतान हुई चलती रहती है हिरणी जैसी। एक पल में यहाँ, दूसरे पल वहाँ।

अरे! उसे क्या डर-भय। वह तो खुद ही धड़काए रहती है सबको। पिछले साल का वह किस्सा याद नहीं जब भवानी क्लॉथ स्टोर के मालिक के बेटे ने रास्ते में उसका हाथ पकड़ा था तो उसे वहीं पटककर मारा था रमकलिया ने- ‘छैलागिरी दिखाता है? बहू-बेटियों की इज्जत पर हाथ डालना चाहता है? हाथ तोड़ बाप के पास भेज दूँगी।’ सड़क, गलियारा सब सन्न! लोग ठिठके दखते रहे। दो-चार लात उसने उसके कूल्हे पर लगाई और सीधे अपनी गली में चली गयी थी।

पहले लोग छूत-अछूत के डर से रामकली से नहीं लगते थे, इस घटना के बाद उसके साहस से, अब उसके टपर-टपर बेबाक बोलने से जैसे दुनिया भर की जानकारी उसी के पास, सवर्ण और दलित का मसला वह जानती है, दलित भी  आदमी हैं यह वह जानती है, अपने पर आक्रमण करने वालों को सबक सिखाना वह जानती है- गली के बुजुर्गों ने उसे क्या-क्या नहीं बता दिया है आज के समय और समाज के बारे में जैसे वह उस गली की बेटी हो, कोई कुछ कहकर तो देखे। भवानी के बेटे वाली घटना के बाद गली के सब लोगों ने भवानी से शिकायत की, आगे कोर्ट जाने की बात कही तब वह गिड़गिड़ाया- ‘कोर्ट-कचहरी में हम फँसे दादा तो रोटी-दाल कैसे चलेगी। माफ करना….’ लोग भड़ास निकालते- ‘उसका क्या ठिकाना, जरा-सी टोक-टाक पर वह किसे क्या कह दे, गाली-गुफता, मार-पीट पर उतारू हो जाए।’

अब तो जमाना ही बदल गया न! मुसहर, चमार तो घर में घुसे रहते हैं औऱ ये शरीफ़ लोग, बुजुर्ग लोग उसे बेटी बनाए हुए हैं। आदमी, जाति-धरम का फ़र्क ही मिटा दिया है। अपना ही धरम बिगाड़ रहे हैं। वह तो अपने को दलित मानती ही नहीं उसकी चाल, बातचीत देखो तब समझोगे- जमाना बदल रहा है तेज़ी से। रामकली जब अपनी गली आती-जाती है तो नुक्कड़ पर खड़े लड़कों के दिल जलते हैं। कहते हैं ‘हमारी गली में तो आओ रामकली। हम बताएँगे कि गली क्या होती है’। जिन लोगों ने भवानी और उसके बेटे का हाल देखा है वे समझाते हैं छोकरों को- ‘रमकलिया से न लगना, लोक-परलोक बिगाड़ देगी। उसके बहुत सारे बाप-भाई हैं यहाँ…’

रामकली, जैसे सूरज के साथ झम्म-से गिरती है गली में और बहार आ जाती है। बूढ़े-बुजुर्ग सभी उठकर अपना हुक्का-पानी सँभालते हैं। सबका हाल लेती है रामकली। यह उसका रोज का काम है।

गली के ही बुजुर्ग बताते हैं- ‘बहुत पहले नक्खास से आगे ‘चमरटोली’ में रहते थे रामकली के घर वाले। समय के साथ इधर-उधर बिखर गए, कोई जूता-चप्पल का काम करता, कोई म्युनिस्पैलिटी में लग गया, कोई बिखरते हुए नवाबों के पड़पोतों के यहाँ सफाई के लिए चला गया। यह लड़की हमारे सामने बड़ी हुई। घर वाले इधर-उधर हुए। माँ ने मिट्टी, अद्धा, फूस, टाट, सेवार वग़ैरह से लीप-लापकर नाले के किनारे एक कोठरी-सी बनाई। हमारे पास आई, हमने काम कराया अब वह बूढ़ी लाचार-सी है। रामकली ही उसकी बेटा-बेटी है। हमारे यहाँ की घरवालियों ने उसे बेटी-सा माना अब वह हमारी गली की शोभा है- निडर, दिलेर और समाज को समझने वाली। आज भी रोज कुछ-न-कुछ पूछती-जानती रहती है…’

ऐसी रामकली के बुजुर्ग परेशान हैं कि उनकी गली का नाम क्या रखा जाय। जब तक गली का नाम दर्ज नहीं होगा उनका नाता-रिश्ता दुनिया से टूट जाएगा। उनके बाल-बच्चों का हाल उन्हें नहीं मिलेगा। शहर के ही नये लोग भटक जाएँगे। बुजुर्गों और गली के सभी लोगों में इस बात से परेशानी है। सब प्रतीक्षा में हैं कि कितनी जल्दी बाजार की साप्ताहिक बन्दी हो और पूरी गली के लोगों की मीटिंग हो। कोई नाम उभर कर आ जाए। ऐसा नाम जिससे सभी गली को पहचान लें। गली की एक छवि बने औऱ इसके नाम में अपनापा हो। बुजुर्गों की अपनी बातचीत में, रोज के मिलने-जुलने में भी गली के नामकरण का ज़िक्र निकल आता। लोगों का सोचना था किसी मजहब, सम्प्रदाय, देवी-देवता, अल्लाह-पैगम्बर, नेता आदि के नाम पर गली का नामकरण हो। लेकिन मुश्किल थी कि गली में कोई ऐसा बड़ा आदमी भी नहीं हुआ था जिसके नाम पर सबकी सहमति हो।

असमंजस की स्थिति में साप्ताहिक बन्दी का दिन आया। ग्यारह बजे दिन में बैठक-बैठी- बुजुर्ग, युवा, अधेड़ सब थे, कुछ महिलाएँ भी। रामकली समझ नहीं पा रही थी सब लोग इकट्ठे क्यों हुए हैं उसकी उत्सुकता बढ़ी हुई थी। बैठक में बुजुर्गों ने असली बात साफ की कि गली का नाम अब क्यों जरूरी हो गया है। देश-दुनिया से जुड़े रहने के साथ अपनी पहचान का भी सवाल था और गली को एक नया नाम देने का भी जिसमें आत्मीयता हो, अपनापन हो, एका हो और तुरंत लोगों की जबान पर नाम चढ़ जाए। उससे लगाव भी हो। सबने अपने-अपने सुझाव रखे पर बात बन नहीं रही थी। युवाओं की समझ में कुछ आ नहीं रहा था। अधेड़ भी अब चाह रहे थे किसी नेता के नाम पर सहमति हो और छुट्टी हो। काफ़ी समय बीत गया था सभी उठना चाहते थे, सबकी घर-गृहस्थी थी, आराम का दिन था, कई काम निपटाने थे, लोगों में निराशा भर रही थी इतनी कोशिशों के बावजूद असफलता! अन्त में पाँच नम्बर मकान वाले बुजुर्ग उठे- ‘भई! मैं थक गया, अब बैठ नहीं सकता। नाम नहीं सूझ रहा तो मेरी मानो। नाम रखो ‘गली रामकली’।’ सबने एक दूसरे को देखा और मुस्कुराए चेहरे पर था गहरा संतोष!

 

 

जन सांस्कृतिक मूल्यों के लिए काम करेगा अनिल सिन्हा मेमोरियल फाउंडेशन: वीरेन डंगवाल

अनिल सिन्हा मेमोरियल फाउंडेशन के कार्यक्रम में मंगलेश डबराल, मैनेजर पाण्डेय और वीरेन डंगवाल।

 

नई दिल्‍ली : ईमानदारी के साथ अनवरत अपने विचारों और मूल्यों के साथ सक्रिय रहने वाले शख्स कभी हमख्याल लोगों द्वारा विस्मृत नहीं किये जाते, इसका साक्ष्य मिला 23 जुलाई की शाम को अनिल सिन्हा मेमोरियल फाउंडेशन की ओर से ललित कला अकादमी के कौस्तुभ सभागार में आयोजित पहले आयोजन में, जिसमें अनिल सिन्हा के परिजनों और जसम-सीपीआई (एमएल) के साथियों के साथ-साथ वाम-लोकतांत्रिक साहित्यिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक जगत के बड़े दायरे के लोगों ने भाग लिया। लखनऊ जहां उनके जीवन का लंबा समय गुजरा, वहां से जसम के उनके कई महत्वपूर्ण साथी इस आयोजन में मौजूद थे। उनकी बेटी रितु ने कहा कि फाउंडेशनों की भीड़ में यह अलग किस्म का फाउंडेशन होगा, जो व्यक्ति तक सिमटा नहीं रहेगा, बल्कि उन मूल्यों, सिद्धांतों और संघर्षशील चेतना को आगे बढ़ाएगा, जो अनिल सिन्हा की जिंदगी का मकसद था। साहित्य-कला-पत्रकारिता की दुनिया में मौजूद अजीब से बनावटीपन और सरोकारों की कमी का जिक्र करते हुए रितु ने अनिल सिन्हा की एक कहानी के शब्दों के हवाले से कहा कि पिछले बीस-पच्चीस वर्षों में भारत में एक ऐसा समाज उभरा है, जो भूमंडलीकरण का शिकार है। बाजार की शक्लें परिवार के भीतर तक पैठ कर चुकी हैं। कलाकार, पत्रकार, साहित्यकार भी कहीं न कहीं इन परिस्थितियों से जूझ रहे हैं, अनिल सिन्हा मेमेरियल फाउंडेशन की नींव ऐसे ही लोगों को संबल देने के लिए डाली गई है। उन्‍होंने बताया कि हर साल लखनऊ में फाउंडेशन की तरफ से आयोजन होगा, जिसमें अनिल सिन्हा स्मृति व्याख्यान और संगोष्ठी होगी तथा उनके नाम पर एक सम्मान दिया जाएगा।

इस मौके पर अनिल सिन्हा के दूसरे कहानी संग्रह एक पीली दोपहर का किस्साका लोकार्पण मशहूर कवि वीरेन डंगवाल ने किया। अनिल सिन्हा के साथ दोस्ती के अपने लंबे अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि वह हमेशा विनम्र और सहज रहे। उनकी तरह लो प्रोफाइल रहकर गंभीरता के साथ काम करने वालों को हिंदी साहित्य समाज प्रायः वह सम्मान नहीं देता, जिसे वे डिजर्व करते हैं। कला-साहित्य की कई विधाओं में उनकी रुचि का जिक्र करते हुए वीरेन डंगवाल ने कहा कि अनिल एक संजीदा पाठक भी थे। जसम की स्थापना में उनकी भूमिका को याद करते हुए उन्होंने उम्मीद जाहिर की कि फाउंडेशन उन्हीं जन सांस्कृतिक मूल्यों के लिए काम करेगा, जिसके लिए जसम की स्थापना हुई थी।

 

मंगलेश डबराल

चर्चित कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि जीवन के ऐसे निर्माणाधीन दौर में अनिल सिन्हा से उनकी दोस्ती हुई, जिस दौर में बनी दोस्ती हमेशा कायम रहती है। लखनऊ में ‘अमृत’ अखबार में काम करने के दौरान सहकर्मी और बतौर साथी अजय सिंह, मोहन थपलियाल और सुभाष धुलिया को भी उन्होंने याद किया। उन्होंने कहा कि हमलोगों के नाम व्यक्तिवाचक नहीं थे, हम भाववाचक संज्ञाओं की तरह रहा करते थे। मंगलेश डबराल ने कहा कि बिना कोई शिकायत किए अनिल सिन्हा जिस तरीके से अपने पारिवारिक जरूरतों और वैचारिक मकसद के लिए पूरे दमखम के साथ संघर्ष करते थे, वह उन्हें आकर्षित करता था। सभागार में अनिल सिन्हा की पत्नी आशा सिन्हा भी मौजूद थीं। मंगलेश डबराल ने कहा कि आशा जी और अनिल जी की जोड़ी बहुत आदर्श जोड़ी मानी जाती थी। अनिल सिन्हा के साथ आशा सिन्हा ने भी बहुत संघर्ष किया। उन दोनों में अद्भुत तालमेल था। आर्थिक और वैचारिक संघर्ष के साथ-साथ ही बतौर पिता बच्चों को सुशिक्षित और योग्य नागरिक बनाने में अनिल सिन्हा की जो भूमिका थी, उसे भी मंगलेश डबराल ने याद किया। मंगलेश डबराल ने फोटोग्राफी के उनके शौक और कला-संबधी उनके लेखन का खास तौर पर जिक्र किया और कहा कि उनके कलासंबधी लेखन की पुस्तक जरूर प्रकाशित की जानी चाहिए। विस्तार से लिखने की अनिल सिन्हा की आदत की भी उन्होंने चर्चा की, जिसके कारण उनके लेख प्रायः लंबे हो जाया करते थे।

‘समकालीन तीसरी’ दुनिया के संपादक आनंदस्वरूप वर्मा ने सत्तर के दशक से शुरू हुई अनिल सिन्हा के साथ अपनी दोस्ती को याद करते हुए कहा कि उनके विचारों में जबर्दस्त दृढ़ता और व्यवहार में लचीलापन था। साहित्य-संस्कृति और राजनीतिक-सामाजिक समस्याओं से संबंधित उनके लेखन की तो जानकारी मिल जाती है, लेकिन मूलतः वे पत्रकार थे। उन्होंने 80 के दशक में सरकार और पुलिस द्वारा एक जनपक्षीय पत्रकार के दमन और हत्या के विरुद्ध भडके जनाक्रोश और स्कूटर इंडिया के कर्मचारियों के आंदोलन की पृष्ठभूमि में पत्रकारों और श्रमिकों के बीच एकता की जरूरत महसूस की थी। नेता, पुलिस, ब्यरोक्रेसी और दलाल पत्रकारों के नेक्सस के खिलाफ उन्होंने जनपक्षीय पत्रकारों को संगठित करने की पहल भी की। मीडिया पर ग्लोबलाइजेशन का जो खतरनाक असर हुआ, खास तौर से उसके बारे में उन्होंने काफी लिखा। जब 93 में नवभारत टाइम्स से 92 पत्रकारों को हटाया गया, तब उसी बिल्डिंग से निकलने वाला टाइम्स ऑफ इंडिया एक दिन के लिए भी बंद नहीं किया गया। कर्मचारियों में कोई हलचल नहीं हुई, एक दिन भी उन्होंने अपना काम बंद नहीं किया। होना तो यह चाहिए था कि लखनऊ के सारे अखबार कम से कम एक दिन के लिए बंद कर दिए जाते। इसे लेकर अनिल सिन्हा ने लेख भी लिखे। उन्होंने लिखा कि इस घटना ने यह भी सिद्ध किया है कि वर्तमान पत्रकार संगठन और ट्रेड यूनियन किस तरह विभाजित, असंगठित और अपने अंतर्विरोधों का शिकार हैं। अखबारों में फिर से नए रूप में ट्रेड यूनियन का गठन करना चाहिए। बहुत जल्दी चीजों को समझ लेना और दूर तक देखना अनिल सिन्हा की खूबी थी। नितांत निजी स्वार्थों के लिए निरतंर श्रमिक विरोधी होती पत्रकारिता के प्रति वे बेहद चिंतित रहते थे। वह देख रहे थे कि कि किस तरह हिंदी पत्रकारिता पर लहराने वाले संकट के पीछे दलाल चरित्र के संपादक और अखबार मालिक जिम्मेवार हैं। वह अपनी गरिमा व काम की महत्ता को ताक पर रखकर सरकारी अधिकारियों और सरकार के चाकर बन गए हैं। नवभारत टाइम्स से अलग होने के बाद उन्होंने एक फ्रीलांसर की तरह काम किया। दरअसल इस सिस्टम में वे रांग फान्ट की तरह थे। आनंद स्वरूप वर्मा ने कहा कि अनिल चाहे नौकरी में रहे या नौकरी से अलग हुए, उनके चेहरे पर हमेशा विनम्रता और लाचारगी-सी रहती थी, जिसे देखकर दया आती थी, पर उनके व्यक्तित्व में बेचारगी कभी नहीं देखी गई, उनमें संघर्ष की अदम्य इच्छाशक्ति थी। उनका हमारे बीच न होना, एक दुखद अनुभूति है, पर यह देखकर अच्छा लग रहा है कि इतने सारे लोग अनिल को याद करने इकट्ठे हुए हैं। निश्चित तौर पर वे सब उस पत्रकारिता, उस विचार और उस साहित्य साधना को आगे ले जाएंगे, जो संघर्ष में विश्वास बनाना चाहते हैं या सामाजिक बदलाव में अपनी भूमिका तय करना चाहते हैं।

 

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में उपस्थित लोग।

इरफान ने अपनी सधी हुई आवाज में अनिल सिन्हा के एक पीली दोपहर का किस्सासंग्रह की एक कहानी गली रामकलीका पाठ किया। कुछ तो इरफान की आवाज का जादू था और कुछ कहानीकार की उस निगाह का असर जिसमें एक दलित मेहनतकश महिला के प्रति निर्मित होते सामाजिक सम्मान के बोध की बारीक दास्तान रची गई है, उसने कुछ समय के लिए श्रोताओं को अपने मुहल्लों और कस्बों की दुनिया में पहुंचा दिया।

बेहतर दुनिया के लिए ख्वाब और उन ख्वाबों के लिए होने वाले संघर्षों को अपनी चित्रकला में जगह देने वाले एक विलक्षण कलाकार थे चित्त प्रसाद, जिनकी चित्रकला के बारे में पिछले मार्च में गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल में चित्रकार-कथाकार अशोक भौमिक ने पहला अनिल सिन्हा स्मृति व्याख्यान दिया था। वही व्याख्यान-प्रदर्शन उन्होंने इस आयोजन में भी पेश किया। अपनी कला-समीक्षाओं में अनिल सिन्हा की जितनी गहरी निगाह चित्रकारों के सामाजिक सरोकारों पर रहती थी, उसी परंपरा को मानो अशोक भौमिक ने बडे प्रभावशाली तरीके से मूर्त किया। कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में चले तेलंगाना, तेभागा जैसे क्रांतिकारी किसान आंदोलनों और नाविक विद्रोह पर बनाए गए चित्रों की राजनीतिक पृष्ठभूमि, रचना-प्रक्रिया और उनकी विशेषताओं को देखना-सुनना खुद को आज के दौर में राजनीतिक-सांस्कृतिक ऊर्जा से लैस करने के समान था।

आयोजन की अध्यक्षता कर रहे प्रो. मैनेजर पांडेय इस व्याख्यान-प्रदर्शन से बेहद प्रभावित दिखे। उन्होंने चित्त प्रसाद की सारी व्यापकता, गहराई और नवीनता को सहज-सरल और संप्रेषणीय ढंग सामने रखने के लिए अशोक भौमिक की तारीफ की। अनिल सिन्हा मेमोरियल फाउंडेशन के बारे में प्रो. पांडेय ने दो सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि हिंदी और अंग्रेजी में अनिल सिन्हा का जो लेखन इधर-उधर बिखरा हुआ है, उसे एक क्रम में व्यवस्थित करके ठीक से एक जगह रखा जाना चाहिए। उन्होने कहानी, आलोचना, पत्रकारिता के साथ-साथ राजनीतिक-सामाजिक विचारों के क्षेत्र में जो काम किया है, उसके बारे में व्यवस्थित बात होनी चाहिए तथा लेख लिखे जाने चाहिए। संचालन युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने किया।

अनिल सिन्हा मेमोरियल फाउंडेशन का ईमेल है- anilsinhafoundation@gmail.com

प्रस्‍तुति : सुधीर सुमन

अनिल सिन्हा की स्मृति में कार्यक्रम 23 को

नई दिल्‍ली : अनिल सिन्हा मेमोरियल फाउन्डेशन  की ओर से अनिल सिन्‍हा की स्‍मृति में  पहला कार्यक्रम 23 जुलाई, 2011 को शाम 5 बजे कौस्तुभ सभागार, ललित कला अकादमी, रवीन्द्र भवन, मंडी हाउस,   नई दिल्ली में आयोजित किया जा रहा है।
अनिल सिन्हा के कहानी संग्रह  ‘एक पीली दोपहर का किस्सा’ का लोकार्पण वीरेन डंगवाल करेंगे। आलोकधन्वा, मंगलेश डबराल और  आनंद स्वरुप वर्मा द्वारा अनिल सिन्हा को याद किया जाएगा। इरफान अनिल सिन्हा की एक कहानी का पाठ करेंगे।
कार्यक्रम में जनवादी चित्रकार चित्तप्रसाद की कला और  इतिहास दृष्टि पर अशोक भौमिक का  व्याख्यान-प्रदर्शन होगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता मैनेजर पाण्डेय करेंगे।

अनिल सिन्हा (11 जनवरी 1942 – 25 फरवरी 2011)  ने पत्रकारिता की शुरुआत ‘दिनमान’ से की। फिर वह ‘अमृत प्रभात’, ‘नवभारत टाइम्स’, ‘राष्ट्रीय सहारा’ और ‘दैनिक जागरण’ से भी जुड़े। वह  हिंदी अखबारों की बदलती कार्यशैली से तालमेल न बिठा सके और अपने सरोकारों के लिए उन्होंने फ्रीलांस पत्रकारिता, शोध कार्य और स्वतंत्र लेखन का रास्ता चुना। वह जन संस्कृति मंच के संस्थापक सदस्य थे और आजीवन वाम राजनीति में संस्कृति कर्म की सही भूमिका तलाशते रहे ।

प्रतिरोध का सिनेमा का छठा गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल 23 से

नई दिल्‍ली : प्रतिरोध का सिनेमा अभियान का सोलहवां और गोरखपुर का छठा फिल्म फेस्टिवल इस बार आधी दुनिया के संघर्षों की शताब्दी  और लेखक-पत्रकार अनिल सिन्हा की स्मृति को समर्पित होगा। आयोजन गोकुल अतिथि भवन, सिविल लाइंस, गोरखपुर में होगा।

यह वर्ष अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का शताब्दी वर्ष है। इस अवसर पर गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल में महिला फिल्मकारों और महिला  मुद्दों को प्रमुखता दी जा रही है। इसके अलावा जन संस्कृति मंच के संस्थापक सदस्य और लेखक-पत्रकार अनिल सिन्हा स्मृति को भी छठा फेस्टिवल समर्पित है। इस फेस्टिवल से ही अनिल सिन्हा स्मृति व्याख्यान की शुरुआत होगी। पहला व्याख्यान फेस्टिवल के दूसरे दिन 24 मार्च की शाम  मशहूर चित्रकार अशोक भौमिक ‘चित्तप्रसाद और भारतीय चित्रकला की प्रगतिशीलधारा’ पर देंगे।

23 मार्च की शाम 5 बजे प्रमुख नारीवादी चिन्तक उमा चक्रवर्ती के भाषण से फेस्टिवल की शुरुआत होगी। पांच दिन तक चलने वाले फेस्टिवल में इस बार 16 भारतीय महिला फिल्मकारों की फिल्मों को जगह दी गयी है। इन फिल्मकारों में से इफ़त फातिमा, शाजिया इल्मी, पारोमिता वोहरा और बेला नेगी समारोह में शामिल भी होंगी। फेस्टिवल में दो नयी फिल्मों का पहला प्रदर्शन कि‍या जाएगा। ये फिल्में हैं- नितिन के. की कवि विद्रोही की कविता और  जीवन को  तलाशती ‘मैं तुम्हारा कवि हूँ’ और  दिल्ली शहर और एक औरत के रिश्ते की खोज करती समीरा जैन की फिल्म ‘मेरा अपना शहर’। बेला नेगी की चर्चित कथा फिल्म ‘दायें या बाएं’ से फेस्टिवल का समापन होगा।

इस बार दूसरी कला विधाओं को भी प्रमुखता दी गयी है। अशोक भौमिक के व्याख्यान के अलावा उद्घाटन वाले दिन उमा चक्रवर्ती पोस्टरों के अपने निजी संग्रह के हवाले महिला आन्दोलनों और राजनीतिक इतिहास के पहलुओं को खोलेंगी। मशहूर कवि बल्ली सिंह चीमा और विद्रोही का एकल काव्य पाठ फेस्टिवल का प्रमुख आकर्षण होगा। पटना और बलिया की सांस्कृतिक मंडलियाँ हिरावल और संकल्प के गीतों का आनंद भी दर्शक ले सकेंगे। महिला शताब्दी वर्ष के खास मौके पर संकल्प की टीम भिखारी ठाकुर के ख्यात नाटक ‘बिदेशिया’ के गीतों की एक घंटे की प्रस्तुति देंगे। बच्चों के सत्र में रविवार को उषा श्रीनिवासन बच्चों को चाँद-तारों की सैर करवाएंगी।

फिल्म फेस्टिवल में ताजा मुद्दों पर बहस शुरू करने के इरादे से इस बार भोजपुरी सिनेमा के 50 साल और समकालीन मीडिया की चुनौती पर बहस के दो सत्र संचालित किये जायेंगे। इनमें देशभर से पत्रकारों के भाग लेने की उम्मीद है।

गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल से ही 2006 में प्रतिरोध का सिनेमा का अभियान शुरू हुआ था। पांच वर्ष बाद फिर से गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल ने इस बार एक महत्वपूर्ण पहलकदमी की है। इसके तहत देशभर में स्वंतंत्र रूप से काम कर रही फिल्म सोसाइटियों का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन कि‍या जाएगा। फेस्टिवल के दूसरे दिन इन सोसाइटियों का सम्मेलन होगा। इसमें प्रतिरोध का सिनेमा अभियान के बारे में महत्वपूर्ण विचार-विमर्श होगा और उनके राष्ट्रीय नेटवर्क का निर्माण भी होगा।

इरानी फिल्मकार जफ़र पनाही के संघर्ष को सलाम करते हुए उनकी दो महत्वपूर्ण कथा फिल्मों ‘ऑफ़साइड’ और ‘द व्हाइट बैलून’ को फेस्टिवल में शामिल किया गया है। गौरतलब है कि इरान की निरंकुश  सरकार ने राजनीतिक मतभेद  के चलते जफ़र पनाही को 6 साल की कैद और 20 साल तक किसी भी प्रकार की अभिव्यक्ति पर पाबंदी लगा दी है।

आयोजन में शामिल होने के लिए किसी भी तरह के प्रवेश पत्र या औपचारिकता की जरूरत नही है।

 

 

अनि‍ल सि‍न्‍हा की श्रद्धांजि‍ल सभा 3 को

नई दि‍ल्‍ली: वरि‍ष्‍ठ लेखक और पत्रकार अनि‍ल सि‍न्‍हा को श्रद्धांजलि‍ देने के लि‍ए जन संस्‍कृति‍ मंच, दि‍ल्‍ली की ओर से गांधी शांति‍ प्रति‍ष्‍ठान, नई दि‍ल्‍ली में 3 फरवरी को शाम 5.30 बजे शोक सभा का आयोजन कि‍या जा रहा है।

11 जनवरी, 1942 को जहानाबाद, गया, बिहार में जन्‍में अनि‍ल सि‍न्‍हा का 25 फरवरी को पटना के मगध अस्पताल में निधन हो गया था। 22 फरवरी को दिल्ली से पटना आते समय उन्‍हें ट्रेन में ही ब्रेन स्ट्रोक हुआ था। उन्हें पटना के मगध अस्पताल में अचेतावस्था में भर्ती कराया गया था, जहां उन्‍होंने अंति‍म सांस ली।

अमेरिकी पुलिस का लोकतंत्र : अनिल सिन्हा

हाल ही में (25 फरवरी को) जाने-माने लेखक और पत्रकार अनि‍ल सि‍न्‍हा का नि‍धन हो गया है। श्रद्धांजलि‍ स्‍वरूप में उनका यह यात्रावृतांत दि‍या जा रह है-

अमेरिकी सैनिकों की बर्बरता व क्रूरता से आज पूरी दुनिया परिचित है। ऐसा शायद ही कोई दिन होता हो जब अमेरिकी सैनिक दुनिया के किसी न किसी हिस्से में अपने करतब न दिखा रहे हों। दरअसल उनका प्रशिक्षण ही ऐसा है कि उन्हें ट्रिगर, बैरल, बम राकेट आदि के सामने जो भी दिखाई देता है, चाहे वह आदमी हो या प्रांतर, उसे उड़ा देना है, उसे नेस्तनाबूद कर देना है। यह ट्रेनिंग उन्हें तब से मिलती आ रही है जब कोलम्बस ने अमेरिका की खोज की थी और वहां के मूल निवासियों को नेस्तनाबूद करते हुए ब्रितानी, मेक्सिकन आदि साम्राज्यवादियों के लिए यहां का रास्ता खोल दिया था। हॉवर्ड जिन जैसे अमेरिकी लेखक ने इस स्थिति को बड़े प्रमाणिक और तथ्यपूर्ण ढंग से अपनी किताब ‘पीपुल्स हिस्ट्री आफ अमेरिका’ में लिखा है। सैनिकों की बात छोड़ दें तो अमेरिकी पुलिस और जितनी तरह के सुरक्षाकर्मी हैं, जैसे- इमिग्रेशन आफिसर, रेल पुलिस, सिविल पुलिस आदि कानून लागू करने के नाम पर हिंसा और बर्बरता की हद पार करते हुए दिखाई देते हैं। फोमांट (कैलीफोर्निया, अमेरिका) से लौटते हुए मुझे कुछ महीने बीत गए हैं, पर वहां की पुलिस की बर्बरता मेरी आंखों के सामने बार बार नाच उठती है। किस हद तक जातीय द्वेष-

वह एक ठंडा दिन था। 31 दिसंबर, 2008 की मध्य रात्रि, कुहराविहीन, झक्क तारों से भरे आसमान में अमेरिकी बत्तियों की तेज रोशनी तुरंत ही कहीं गुम हो जा रही थी। अमेरिका में और शायद पश्‍चि‍म में भी दो बड़े त्यौहार समारोह होते हैं- बड़ा दिन (क्रिसमस) और नया साल। सैन फ्रांसिस्‍को में नये साल का भारी उत्सव होता है। पूरी बे एरिया (खाड़ी) के शहर से लोग सैन फ्रांसिस्को के घंटाघर के खुले में इकट्ठे होते हैं। पुराने साल की वि‍दाई देने के लिए और नए साल का स्वागत करने के लिए। प्रशांत महासागर की खाड़ी पर बसा सैन फ्रांसिस्को इस समय जन समुद्र की लहरें एक तरह से संभाल नहीं पा रहा है। फ्रीमांट से हम भी सैन फ्रांसिस्को के इस समुद्र में खो गए थे। मेरे लिए नया अनुभव था जहां उम्र और अवस्था, काले-गोर का भेद नहीं था। कोई एक समारोह-उत्सव था जो लोगों को जोड़े हुए था इस घंटाघर चौक से। शीत की परवाह नहीं, लोग कॉफी पी रहे हैं, आइसक्रीम, बर्गर और पेस्ट्री खा रहे हैं, कोक पी रहे हैं और बारह बजने का इंतजार कर रहे हैं। एक दूसरे पर गिरते पड़ते व घंटाघर के नजदीक पहुंचना चाहते हैं। चारों ओर ऊंची अट्टालिकाएं हैं। विशाल होटल सीरीज बल्ब से जगमगा रहे हैं। दूर-दूर तक कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट (गो की अमेरिका में सार्वजनिक यातायात अच्छा नहीं है) और निजी वाहन का पता नहीं। आज सब प्रतिबंधित हैं और सुरक्षा के जवान चारों ओर छितराए हैं- पूरी तरह से चौकस। बिल्ली की तरह उनकी नजरें चारों ओर घूम रही हैं पर कोई हस्तक्षेप नहीं कर रही हैं। बारह बजा और पटाखों और विभिन्न प्रकार की आतिशबाजियों से सैन फ्रांसिस्को जगमगा उठा। ऐसी ही आतिशबाजियां तमाम लोगों के मन में छूट रही थीं। यहां हम विदेशी थे फिर भी पूरा माहौल अच्छा लग रहा था, खुशियों से भरा हुआ और उन युवाओं का तो पूछना ही क्या जिन्होंने प्यार की दुनिया की पहली यात्रा शुरू की थी। अभी तो कुछ ही कदम चले थे। पूरी यात्रा बाकी थी…

हम फ्रीमांट से सैन फ्रांसिस्को ‘बार्ट’ (बे एरिया रैपिड ट्रांजिट डिस्ट्रिक्ट- इसे बोलचाल में यहां बे एरिया रैपिड ट्रांसपोर्ट भी कहते हैं) से आए थे। वापसी भी उसी से थी क्योंकि आज निजी वाहन समारोह स्थल तक पहुंच ही नहीं सकते थे। छोटी दूरी की रेल सेवाओं में ‘बार्ट’ सबसे सुव्यवस्थित सेवा मानी जाती है। (कुछ दूरी तक इसे समुद्र के नीचे से भी गुजरना पड़ता है)। कुछ सेवायें सैन फ्रांसिस्को से सीध हैं, कुछ बीच में तोड़कर यानी सेवा बदल कर फ्रीमांट पहुंचती हैं। सुरक्षा का प्रबंध बार्ट में भी है। जिस तरह भारतीय रेल में रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) होते हैं, उसी तरह ‘बार्ट’ में भी बार्ट पुलिस हैं- अपने ‘काम’ में पूरी तरह चाक चौबंद।

31 दिसंबर 2008 की मध्य रात्रि थी पूरी तरह सर्द और हमारे लिए हाड़ भेदने वाली फिर भी बहुत उत्साह के साथ लोगों ने सन् 2009 का स्वागत किया था। किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था कि रात कितनी सर्द है या समय कितनी तेजी से भाग रहा है पर लोगों को पता था कि तीन बजे भोर में अंतिम गाड़ी जाएगी। फिर ट्रेनें विराम लेंगी और सुबह से ही शुरू हो पाएंगी। इसी अहसास के कारण लोगों के समय बंध गए थे और भीड़ लगातार ‘बार्ट’ स्टेशन की ओर भाग रही थी। अमूमन यहां की बसें और ट्रेनें खाली होती हैं पर उस दि‍न सर्द रात में भी ट्रेनें ठसाठस भरीं थी। हम दो बजे तक ही स्टेशन पहुंच पाए तब पता चला कि सीधी फ्रीमांट जाने वाली अब कोई ट्रेन नहीं हैं। हमें बीच के किसी स्टेशन संभवत ओकलैंड में ट्रेन बदलनी होगी। एशियाई मूल के हर उम्र के लोगों से स्टेशन भरा था। उनमें काले लोगों की संख्या ज्यादा थी। अमेरिकी नागरिकों में काले लोगों की संख्या काफी है, फिर भी वे कानूनी दृष्टि से हर चीज में बराबर हैं। जहां मेरिट का मामला है अगर वे उसमें आ जाते हैं तो किसी गोरे अमेरिकी नागरिक को वहां नहीं डाल दिया जाएगा, पर अंदर कहीं एक जातीय श्रेष्ठता का दर्प गोरे अमेरिकी नागरिकों में मौजूद है। कई जगह इसके उदाहरण भी मिलते हैं। व्यवहार में ऐसी जातीय श्रेष्ठता या काले होने के कारण उसे दोयम दर्जे का मानाना दीखता है।

शायद यह संयोग ही होगा कि हमारे आगे युवाओं का एक जत्था चलता रहा। उनमें पांच लड़के और तीन लड़कियां । सभी 20 से 25 वर्ष के आसपास रहे होंगे- पर्व के उत्साह से भरे हुए- बहस, हंसी ठट्ठा, थोड़ी बहुत टीका-टिप्पणी जिसे हम पूरी तरह समझ नहीं पा रहे थे पर उनकी मुद्रा से लग रहा था कि वे उनके युवा- मस्ती व फाकेमस्ती के दिन थे। वे काम भी करते थे, पढ़ भी रहे थे। अपनी प्रेमिकाओं से शादी भी करना चाहते थे और रि‍सेशन (व्यापक छटनी, मंदी, बेरोजगारी) से डरे हुए थे। दुनिया के पहले देश का युवा नागरिक बेरोजगारी व अनिश्‍चि‍त  भविष्य ये चिंतित था। वे इन्हीं बातों को लेकर आपस में बहस भी कर रहे थे और शायद बुश प्रशासन की आलोचना भी जिसने अमेरिका को गारत में डाल दिया। उनकी बातें शायद कुछ सफेद, गोरे बुजुर्गों को अच्छी नहीं लग रही थीं। वे भी हमारे साथ ही चल रहे थे और भीड़ के दबाव के कारण कभी उन्‍हीं की तरफ हो जाते तो कभी हमारी तरफ। वे उन्हें घूर रहे थे। हमारी ओर भी देख रहे थे पर उन्हें अहसास हो गया कि हम एशियाई विदेशी हैं।

ट्रेन आई। भीड़ जितनी उतरी उससे ज्यादा चढ़ गई। हम सब एक ही डिब्बे में चढ़े पर एक किनारे हम थे और दूसरे किनारे आठ युवाओं की वह जत्था और गोरे अमेरिकी। युवाओं का जत्था पहले की तरह  उन्मुक्त होकर बातें कर रहा था, कभी-कभी उनकी आह्लाद भरी चीख हमारे पास भी पहुंच रही थी जिससे लगता था कि गाड़ी की गति के शोर, भीड़ भरे डिब्बे का शोर चीर कर अगर वह हमारे तक पहुंच रही है तो उस आह्लाद में कितना जोश होगा। नये साल के स्वागत ने शायद उनमें आशाएं भर दी थीँ क्योंकि ओबामा उन्हीं की बदौलत उन्हीं की बिरादरी का देश का सर्वशक्तिशाली नेता बन गया था और बुश प्रशासन के विभिन्‍न कदमों के विरुद्ध निर्णय लेने की सार्वजनिक घोषणाएं कर चुका था। खासतौर से इस खाड़ी क्षेत्र और कैलिफोर्निया से उसे भारी समर्थन मिला था।

ट्रेन की गति काफी तेज थी। इस बीच उन गोरे बुजुर्गों में कोई कहीं बार-बार फोन कर रहा था। उनके चेहरों पर संताप व क्षोभ के भाव रहे होंगे। डिब्बे में तेज रोशनी होते हुए भी जहां हम बैठे थे वहां से उनका चेहरा नहीं दिख रहा था। गाड़ी बीच में ही (शायद टवे, ओकलैंड) रुक गई। उसका अंतिम पड़ाव यहीं था। अब हमें दूसरी गाड़ी में सवार होकर फ्रीमांट पहुचना था। डिब्बे में जो सुखद गर्मी थी वह प्लेटफार्म पर आकर लहूलुहान हो गयी। हमने अपने कोर्ट के कालर खड़े कर लिए। मफलर को इस तरह लपेटा जो कान, गला ढंकते हुए सिर पर पहुंचकर टोपी का भी काम दे दे। गो कि यह मौसम यहां पतझड़ का था पर ठंड मेरे लिए दुख पहुंचाने वाली स्थिति तक जा रही थी- रात्रि के ढाई बज रहे थे। इसी समय प्लेटफार्म पर गोली चली, उसकी बहुत धीमी आवाज के बावजूद वह हमें सुनाई दे गई क्योंकि जितने लोग भी यहां चढऩे-उतरने वाले थे सब चुपचाप अगली गाड़ी का इंतजार कर रहे थे, सर्द रातें वैसे भी काफी सन्नाटा भरी होती हैं। गाड़ी दो मिनट बाद आने वाली थी।

गोली की आवाज से हम चौंके। जिस डिब्बे से हम उतरे थे उसी के दूसरे दरवाजे के सामने गोली चली थी और उन आठों में से एक गठीला नौजवान प्लेटफार्म पर खून के बीच तडफ़ड़ाकर शांत हो चुका था। बार्ट पुलिस के एक अधिकारी ने उसे गोली मार दी थी। अधिकारी गोरा था जोहान्स मेहशर्ल। बार्ट पुलिस ने उन्हें घेर रखा था और बाकी लोगों को वहां से हटा रही थी। लोगों को हटाने के लिए महिला पुलिस को तैनात किया गया था। शायद पुलिस लोगों को लिंग संबंधी कमजोरी को जानती थी। पर प्लेटफार्म पर ही बार्ट पुलिस के विरोध में नारे लगने शुरू हो गए। नारे उस जत्थे के बचे सात साथियों ने शुरू किये जो एकदम से प्लेटफार्म के इस पार से उस पार फैल गए। मीडिया ने तत्काल कवर किया। कुछ ही देर में खबर आग की तरह फैल गई। और प्लेटफार्म के बाहर शहर का जो हिस्सा था वहां से भी नारे की आवाजें आ रही थीं। वह लड़का ओकलैंड का निवासी ऑस्कर ग्रांट था। वह काम भी करता था, पढ़ाई भी करता था। उसकी एक बेटी थी और वे फरवरी, 2009 में किसी तारीख को शादी करने वाले थे। बाइस साल के किसी युवा को तड़प कर शांत होते हुए मैंने पहली बार देखा था। इस घटना ने मुझे सन्न कर दिया था। स्टेशन पर ट्रेन आने की जो सूचना आ रही थी वह मुझे दिखाई नहीं दे रही थी। सन् 1984 में जब भारत में सिख विरोधी दंगा हुआ था, तब लखनऊ जंक्‍शन के बाहर कुछ सांप्रदायिक उग्रवादी हिंदुओं द्वारा मैंने एकसिख युवा को जलाया जाते हुए देखा था। वहां स्टेशन पर पंजाब मेल घंटों से रुकी थी, वह कब आएगी इसकी कोई सूचना नहीं आ रही थी। सारा देश स्थगित था उस दिन। पंजाब मेल से ही आनंद स्वरूप वर्मा, अजय सिंह तथा पार्टी के विभिन्न साथियों को कलकत्ता सम्मेलन में जाना था। मैं उन्हें विदा करने आया था क्योंकि मेरा जाना संभव नहीं हो पाया था। उस एक घटना ने मुझे कई साल तक परेशान किया। आज भी वह समय-समय पर एक काले निशान की तरह उभरता है और असहज कर जाता है- कम से कम उस दिन तो कोई काम नहीं हो पाता। और इतने वर्षोँ बाद एक काले अमेरिकी नागरिक की गोरे अमेरिकी पुलिस के एक हिस्से द्वारा सरेआम पहली तारीख के नव वर्ष पर्व के दिन हत्या कर दिया जाना…

हम जानते हैं कि अमेरिकी पुलिस लॉ एन्फोर्समेंट एजेंसी है। उसके लिए वह किसी हद तक जा सकती है (इसके ताजा उदाहरण हावर्ड के प्रोफेसर के साथ बदसलूकी, पिछले दिनों भारत के पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे अब्दुल कलाम, शाहरुख खां आदि की घटनाओं को लिया जा सकता है)

दरअसल, अमेरिकी पुलिस और सुरक्षाकर्मियों को लेकर बहुत सारे प्रश्‍न उठते रहे हैं। मसलन इस पुलिस पर किसका प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष नियंत्रण है- वहां के कॉरपोरेट घरानों का, राजसत्ता का ? क्योंकि हावर्ड के प्रोफेसर की तमाम दलीलों के बावजूद उन्हें पुलिस द्वारा परेशान किया जाना और बाद में पुलिस के उस छोटे से अधिकारी को ओबामा द्वारा आमंत्रित कर बियर पिला कर एक तरफ उसे हीरो बना देना और दूसरी तरफ पुलिस की ज्यादतियों को किसी आवरण में लपेट कर जस्टीफाई करना। संभवत: कछ ऐसा ही रुख होगा जिसके कारण घोर जन प्रतिरोध के बावजूद आस्कर ग्रांट के हत्यारे पुलिस अधिकारी को अब तक कोई सजा नहीं हुई। उसने दूसरे दिन ही यानी पहली जनवरी, 2009 को अपने कार्यालय जाकर बड़े अधिकारियों के सामने त्यागपत्र दे दिया जो स्वीकार भी कर लिया गया और व्यापक जन प्रतिरोध व मीडिया की भूमिका के कारण उसके विरुद्ध हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया। बस मामला ठंडे बस्‍ते में पड़ गया है गो कि समय-समय पर लोगों द्वारा विरोध प्रदर्शन भी होते ही रह रहे हैं। अमेरिका में इस मानी में व्यापक लोकतंत्र है कि लोग खुले तौर पर प्रदर्शन कर सकते हैं। उन्हें तंग नहीं किया जाएगा।

अमेरिका की क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी (जिसके सर्वेसवा हैं चेयरमैन बॉब अवेकन) के कुछ फ्रंटल ऑर्गनाइजेशन जैसे बे एरिया रिवोल्यूशन क्लब, रिवोल्यूशनरी वर्कर्स आदि ने इस घटना को लेकर 22 मार्च, 2009 को ओकलैंड में एक बड़ा प्रदर्शन किया। उन्होंने जन अदालतें भी लगाईं और पिछले 15 वर्षों में कानून लागू कराने के नाम पर हजारों काले नागरिकों को वहां की पुलिस द्वारा मौत के घाट उतार दिए जाने की एक लिस्ट भी जारी की और सबके विरुद्ध चल रहे मुकदमें को न्यायपूर्ण ढंग से निपटाने की मांग की। ऐसे कुछ लोगों के नाम हैं- ऑस्कर ग्रांट, अमाडू डिआलो, ताइशा मिलर, जे रॉल्ड हाल, गैरी किंग, अनीता गे, जुलिओ परेड्स, असा सुलिवान, मार्क गार्सिया, रैफेल ग्रिनेत, ग्लेन विलिस, रिचर्ड डी सैन्टिस आदि थे। ये केवल कैलिफोर्निया खाड़ी क्षेत्र के ही काले अमेरिकी नागरिक नहीं हैं, बल्कि इनमें न्यायार्क के भी लोग हैं। इन्हें गोलियों से, पीट-पीट कर और आंख-मुंह में मिर्ची का चूरा झोंक कर यानी तड़पा-तड़पा कर मारा गया। यह ठीक उसी तरह का कृत्य था जैसा अमेरिका के ईजाद के बाद आम लोगों को भूखे रखकर, बीमारी की हालत में छोड़कर, सोने की जगह न देकर, कोड़ों से पिटाई कर-यानी तड़पा-तड़पा कर मारा गया था। लगभग तीन सौ साल बाद आज अमेरिका अपने को हर तरह से दुनिया का ‘नंबर वन’ देश घोषित करता रहाता है। ओबामा ने भी अपने शुरुआती भाषण में यही कहा था कि हम दुनिया के नंबर वन देश हैं और भविष्य में भी बने रहेंगे।

मेरे वहां रहते ही एक दूसरी घटना घटी,  बीस साल का ब्रैंडनली इवांस नवंबर, 2008 में सैन फ्रांसिस्को पढ़ाई और नौकरी के लिए सैन्टियागो से आया था। सैन फ्रांसिस्को के प्रसिद्ध गोल्डेन गेट ब्रिज के पास उसने शेयर में एक फ्लैट लिया था, पर दिसंबर के अंत में गोल्डेन गेट ब्रिज पार्क में उसकी हत्या कर दी गई। पुलिस जिस तरह से इस मामले की छानबीन में उदासीन दिखाई दे रही है, उससे वहां के लोगों को अंदाज है कि शायद इसमें पुलिस की भी भूमिका है क्योंकि वह इलाका अत्यंत व्यस्त और महत्वपूर्ण है और सुरक्षा व्यवस्था भी चौकस।

अमेरिकी पुलिस कानून लागू कराने के लिए तो किसी हद तक जा सकती है पर उसकी केवल यही भूमिका नहीं है- अपराध रोकना उसकी मुख्य भूमिका है। पर अमेरिका में अपराध बेतहाशा हैं चाहे हत्या हो, अपहरण हो, या अपराध के जितने भी रूप हो सकते हें। जि‍स अपराध को हम अपनी आंखों के सामने देख आए हैं, वह अमेरिकी पुलिस की तस्वीर बहुत साफ करती है।

पूरा प्रकरण देखते हुए लगता है कि अपराध जगत में यहां भी कॉरपोरेट घरानों और बड़े पूंजीपतियों का हाथ है। एक उदाहरण देकर मैं इसे स्पष्ट करना चाहूंगा क्योंकि मेरे फ्रीमांट में रहते हुए यह मामला उछला था। इलेना मिशेल नाम की एक लड़की थी जो 13 वर्ष की उम्र में ही पूरे बे एरिया (खाड़ी क्षेत्र) में आइस स्केटिंग में नंबर एक पर पहुंच गई थी और 30  जनवरी, 1989 के ओलंपिक गेम्स में भागीदारी की उसकी दावेदारी तय हो गई थी। 30 जनवरी, 1989 में उसका अपहरण कर लिया गया। आज तक उसके बारे में कुछ पता नहीं चला। अमेरिका स्टेट डिपार्टमेंट आफ जस्टिस की एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल कैलि‍फोर्निया राज्‍य से पचास बच्‍चों का अपहरण होता है और उनका मि‍ल पाना असंभव सा ही होता है, बल्‍कि‍ वहां के संघीय आंकड़ों के अनुसार गायब बच्‍चों में से केवल एक प्रति‍शत ही 10 वर्षों की अवधि‍ में वापस आ पाते हैं।

फ्रीमांट लौटने के लि‍ए ट्रेन कुछ देर से मि‍ली। भारी मन से हम सवार हुए। ठंड गायब हो चुकी थी और मन पर तकलीफ का एक कुहासा छा गया था। आज भी वह घटना याद आती है तो प्रशांत महासागर की खाड़ी का सारा सौन्‍दर्य ति‍रोहि‍त हो जाता है और रातभर नींद नहीं आती…।

(समकालीन तीसरी दुनि‍या, अक्‍टूबर, 2009 से साभार)

जाने माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा का नि‍धन

नई दि‍ल्‍ली : जाने-माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा नहीं रहे। 25 फरवरी को दिन के 12 बजे पटना के मगध अस्पताल में उनका निधन हो गया। 22 फरवरी को जब वे दिल्ली से पटना आ रहे थे, ट्रेन में ही उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हुआ। उन्हें पटना के मगध अस्पताल में अचेतावस्था में भर्ती कराया गया। तीन दिनों तक जीवन और मौत से जूझते हुए 25 को उन्होंने अन्तिम सांस ली। उनका अन्तिम संस्कार पटना में ही होगा। उनके निधन की खबर से पटना, लखनऊ, दिल्ली, इलाहाबाद सहित तमाम जगहों में लेखको, संस्कृतिकर्मियों के बीच दुख की लहर फैल गई। जन संस्कृति मंच ने उनके निधन पर गहरा दुख प्रकट किया है। उनके निधन को जन सांस्कृतिक आंदोलन के लिए एक बड़ी क्षति बताया है।

ज्ञात हो कि अनिल सिन्हा एक जुझारू व प्रतिबद्ध लेखक व पत्रकार रहे हैं। उनका जन्म 11 जनवरी, 1942 को जहानाबाद, गया, बिहार में हुआ। उन्होंने पटना वि‍श्‍वविद्यालय से 1962 में एम.ए. हिन्दी में उतीर्ण किया। वि‍श्‍वविद्यालय की राजनीति और चाटुकारिता के विरोध में उन्होंने पीएचडी बीच में ही छोड़ दी। उन्होंने प्रूफ रीडिंग, प्राध्यापिकी, विभिन्न सामाजिक विषयों पर शोध जैसे कई कार्य किये। 70 के दशक में उन्होंने पटना से ‘विनिमय’ साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया जो उस दौर की अत्यन्त चर्चित पत्रिका थी। आर्यवर्त, आज, ज्योत्स्ना, जन, दिनमान से भी वह जुड़े रहे। 1980 में जब लखनऊ से अमृत प्रभात निकलना शुरू हुआ, उन्होंने इस अखबार में काम किया। अमृत प्रभात लखनऊ में बन्द होने के बाद में वे नवभारत टाइम्स में आ गये। दैनिक जागरण, रीवाँ के वह स्थानीय संपादक रहे। लेकिन वैचारिक मतभेद की वजह से उन्होंने यह अखबार छोड़ दिया।

अनिल सिन्हा बेहतर, मानवोचित दुनिया की उम्मीद के लिए निरन्तर संघर्ष में अटूट विश्‍वास रखने वाले रचनाकार थे। वह मानते थे कि एक रचनाकार का काम हमेशा एक बेहतर समाज का निर्माण करना है, उसके लिए संघर्ष करना है। उनका लेखन इस ध्येय को समर्पित है। वह जन संस्कृति मंच के संस्थापकों में थे। वह उसकी राष्ट्रीय परिषद के सदस्य थे। वह जन संस्कृति मंच उत्‍तर प्रदेश के पहले सचिव थे। वी क्रान्तिकारी वामपंथ की धारा तथा भाकपा (माले) से भी जुड़े थे। इंडियन पीपुल्स फ्रंट जेसे क्रान्तिकारी संगठन के गठन में भी उनकी भूमिका थी। इस राजनीति जुड़ाव ने उनकी वैचारिकी का निर्माण किया था।

कहानी, समीक्षा, अलोचना, कला समीक्षा, भेंट वार्ता, संस्मरण आदि कई क्षेत्रों में उन्होंने काम किया। ‘मठ’ नाम से उनका कहानी संग्रह 2005 में भावना प्रकाशन से प्रकाशि‍त हुआ। पत्रकारिता पर उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘हिन्दी पत्रकारिता: इतिहास, स्वरूप एवं संभावनाएँ’ प्रकाशित हुई। पिछले दिनों उनके द्वारा अनुदित पुस्तक ‘साम्राज्यवाद का विरोध और जतियों का उन्मुलन’ छपकर आयी थी। उनकी सैकड़ों रचनाएँ पत्र पत्रिकाओं में छपती रही है। उनका रचना संसार बहुत बड़ा है, उससे भी बड़ी है उनको चाहने वालों की दुनिया। मृत्यु के अन्तिम दिनों तक वह अत्यन्त सक्रिय थे तथा 27 फरवरी को लखनऊ में आयोजित शमशेर, नागार्जुन और केदार जन्तशती आयोजन के वह मुख्य कार्यकर्ता थे।

उनके निधन पर शोक प्रकट करने वालों में मैनेजर पाण्डेय, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, आलोक धन्वा, प्रणय कृष्ण, रामजी राय, अशोक भैमिक, अजय सिंह, सुभाष चन्द्र कुशवाहा, राजेन्द्र कुमार, भगवान स्वरूप कटियार, राजेश कुमार, कौशल किशोर, गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव, चन्द्रशेखर, वीरेन्द्र यादव, दयाशंकर राय, वंदना मिश्र, राणा प्रताप, समकालीन लोकयुद्ध के संपादक बृजबिहारी पाण्डेय आदि रचनाकार हैं। अपनी संवेदना प्रकट करते हुए जारी वक्तव्य में रचनाकारों ने कहा कि अनिल सिन्हा आत्मप्रचार से दूर ऐसे रचनाकार रहे हैं जो संघर्ष में यकीन करते थे। इनकी आलोचना में सर्जानात्मकता और शालीनता दिखती है। ऐसे रचनाकार आज विरले मिलेंगे जिनमें इतनी वैचारिक प्रतिबद्धता और सर्जनात्मकता हो। इनके निधन से लेखन और विचार की दुनिया ने एक अपना सच्चा व ईमानदार साथी खो दिया है।