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कैसे रुकेगा संस्थाओं का अंत ? : प्रेमपाल शर्मा

 

पि‍छले दि‍नों एम्‍स की स्‍नातकोत्‍तर परीक्षा में परचा लीक व समय-समय पर उजागर होने वाले इस तरह के मामलों व नि‍युक्‍ति‍यों में होने वाली धांधलि‍यों को देश के लि‍ए वि‍नाशकारी बात रहे हैं वरि‍ष्‍ठ लेखक प्रेमपाल शर्मा-

सभ्यताओं के विकास में नागरिक जीवन को सुचारू और सर्वजन हिताय बनाने के लिए धीरे-धीरे संस्थाओं का जन्‍म हुआ। शायद शुरुआत विवाह संस्था से हुई हो। फिर कबीले और बस्तियाँ बनीं और अगले विस्तार के रूप में राज्य, राष्ट्र, देश बने होंगे। इनके अंदर भी सैकड़ों परतें स्कूल, अस्पताल, धर्म के प्रति‍ष्ठान न जाने क्या-क्या। मनुष्य ने ही ये बनाए और शायद दुष्ट मनुष्य ही वे प्राणी हैं जो लगातार इनको तोड़ने की फ़िराक में रहते हैं। हमारे देश के लिए आज़ादी के बाद का इतिहास तो संभवत: इन संस्थाओं को तोड़ने और विध्वंस की कहानी ज्यादा बयान करता है बजाय उनके निर्माण की। एम्स की स्नाकोत्तर परीक्षा में परचे लीक होने की कहानी इन्ही सैकडों संस्थाओं के अंत का एक नमूना है।

देश की पूरी नौजवान पीढ़ी इन संस्थाओ में आस्था रखती है। आईआईटी की प्रवेश परीक्षा हो, एमबीबीएस या एमडी की परीक्षा या प्रशासनि‍क सेवायें, आईएएस, पीसीएस से लेकर जजों की नियुक्ति, हर जगह विध्वंस दिखाई पड़ रहा है। पिछले दस-बीस सालों में तो शायद हम अति की सीमा के बहुत करीब पहुँच चुके हैं। हरियाणा, पंजाब में जजों की नियुक्ति में ऐसी धांधली हुई तो कुछ साल पहले चंडीगढ़ के पीजीआई के दाखिले में भी नालंदा के उस डॉक्टर की कहानी आपके जेहन में जिंदा होगी जो डॉक्टरी के काम को छोड़कर आईआईटी से लेकर प्रांतीय सेवाओं की इन सब परीक्षाओं में नकल करने, कराने और पास करने का पूरा गिरोह चलाता था। वक्त आ गया है कि समाज को जागरूक करने के लिए इन सबके बारे में मीडिया समय-समय पर खुलासा करता रहे। सरकार को भी न भूलने दें और न उन अपराधियों को जो ऐसे जघन्य अपराध करने के बाद बच निकलते हैं। नालंदा के उस शख्स के बारे में तो यह भी सुना था कि वह असेंबली के चुनाव के लिए भी खडा़ हुआ था। यानि इन अपराधों के बाद उनका लक्ष्य लोकतंत्र के उस मंदिर में प्रवेश करने का होता है जहाँ यह बदनामी उनके लिए रुकावट बनने के बजाय मार्ग प्रशस्त ज्यादा करती है।

लेकिन एम्स और इन सभी परीक्षाओं में नकल, धांधली कोई नई बात नहीं लगती। क्या यह उसी स्कूली और विश्वविद्यालयी शिक्षा का अगला चरण नहीं है जहाँ व्यवस्थित ढंग से टीचर से लेकर प्रधानाध्‍यापक तक नकल कराते हैं। वे खुद गलत रास्तों से नियुक्त होते हैं। दिल्ली से सटे राज्य उत्तर प्रदेश में तो यह शिक्षा की एक नीति के रूप में जनता ने मान लिया है कि बिना नकल किए आप पास हो ही नहीं सकते। देखा जाए तो एम्स के ये अपराधी भी नोएडा और ग्रेटर नोएडा की सीमा में ही काम कर रहे थे।राज्यों की सीमाओं का प्रश्न छोड़ भी दिया जाये तब भी क्या इस अपराध की शुरूआत उस क्षण से ही नहीं हो जाती जब उत्तर प्रदेश में बोर्ड की परीक्षा के ठीक पहले माता-पिता और रिश्तेदार बच्चों की खातिर व्यूह रचना करते हैं कि कैसे परचा स्कूल से निकाला जाएगा ? और कौन उसको हल करेगा ? और फिर कैसे बच्चे के पास तक पहुँचेगा ? पूरी तरह से उत्तर लिखने तक के प्रबंध किये जाते हैं तो कुछ स्कूलों में अलग-अलग रेट बने हुए हैं। तीस-चालीस साल पहले हम ये सुना करते थे कि जहाँ कापियाँ जाती हैं उनका पता लगा लिया जाता है और फिर उन कापी जाँचने वालों को पटा कर नंबरों में हेराफेरी की जाती है। क्या पूरी व्यवस्था को इसका अहसास नही है ? और ऐसे अहसास के बावजूद भी यदि सब चुप हैं तो, आप संस्थाओं के ध्वंस की कल्पना कर सकते हैं।

ऐसी नकल के बूते बने डॉक्टर या इंजीनियर, क्या तो किसी मरीज का इलाज करेंगे और क्या पुल और सड़क बनायेंगे। जिन रास्तों से उन्होंने डिग्री ली है वैसे ही कागज पर पुल और सड़क ऐसी रिश्वत के बूते वे अपने-अपने विभाग में तैयार करेंगे जिनमें करोडों खर्च तो हो जाते हैं लेकिन जमीन पर कुछ नहीं होता। इसीलिए यह नकल सिर्फ नकल के रूप में न ली जाये यह बेईमानी और भ्रष्टाचार की वो पगडंडियाँ हैं जो इस राष्ट्र को सर्वनाश की तरफ ले जा रही हैं। कभी-कभी आश्चर्य होता है कि देश की उस आम ईमानदार चेतना को हुआ क्या। आखिर आजादी के वक्त की वह बारूद इतनी भीगी हुई क्यों है? आखिर संस्थाओं के अंत को कैसे रोका जाये ? दिल्ली यूनिवर्सिटी में आरक्षण के लाभ लेने के लिए फर्जी मार्कशीट से लेकर सैकडों मामले आये हैं। मध्यप्रदेश में सैकड़ों डॉक्टरों के पास फर्जी सर्टिफिकेट मार्कशीट पकडी़ गयी हैं। यदि इन अपराधियों को ऐसे दंड दिये जाये जिन्‍हें पीढियों तक लोग याद रखें तो शायद दुबारा ऐसा करने की किसी की हिम्मत न पड़े। पिछले दिनों मलेशिया के प्रधानमंत्री ने दिल्ली की एक प्रेस कांफ्रेस में कहा था कि भारत का लोकतंत्र अच्छा जरूर है, लेकिन जरूरत से ज्यादा लोकतांत्रिक है। उन्होंने अपनी बात को बढा़ते हुए कहा कि इतना लोकतांत्रिक कि न संसद चलती है, न विश्वविद्यालय चल पाते, न पुलिस कुछ कर पाती, और न कानून । कुल मिलाकर पूरा राष्ट्र कुछ नहीं कर पाता। इस बात पर भी विचार कीजिये कि ऐसी नकल कराने वाले गरीब अनपढ़ नहीं होते। वे शातिर रईस लड़के हैं जिनके पास एमबीए, इंजीनियर और डॉक्टर की डि‍ग्रि‍याँ हैं। देखा जाये तो इस देश का विनाश ऐसे डिग्रीधारी, संभ्रांतों ने ज्यादा किया है बजाए आम किसान, मजदूर नागरिक ने। परीक्षा एमडी की और एमबीए का छात्र उसमें कैसे प्रवेश परीक्षा तक पहुँच गया ? फिर जिन पर्यवेक्षकों की ड्यूटी लगी थी वे क्या कर रहे थे? परत-दर-परत जाएं तो लगता है कि सिर्फ ये लड़के अपराधी नहीं पूरी व्यवस्था ही अपराधी है। इसी का अंजाम है कि धीरे-धीरे पिछले दस-पंद्रह वर्षों में एम्स खुद अस्पताल में भर्ती है। आए दिन इस बात पर चिंता नहीं होती कि उसका स्तर गिर रहा है, कोई शोध नहीं हो रहा है, बल्कि दूसरे वोट बैंकों की राजनीति पर ज्यादा सरगर्मी रहती है। इस घि‍नौनी राजनीति की उत्तर भारत की लगभग सारी सस्थाएं शिकार हो गयी हैं। विश्वविद्यालय हों, प्रशासन या स्कूली व्यवस्था, परिणाम सामने है। दुनिया के पहले सौ से पांच सौ विश्वविद्यालयों में न भारत का कोई विश्वविद्यालय आईआईटी आता, न अस्पताल या शोध संस्थान।

प्रसि‍द्ध अंग्रेजी लेखक रुडयार्ड किपलिंग ने 1893 में एक बडी़ गम्भीर टिप्पणी की थी। तब तक आजादी के निशान दूर-दूर तक नहीं थे। कांग्रेस की स्थापना हो चुकी थी और कुछ-कुछ मांगे की जा रही थीं। किपलिंग का कथन आजाद भारत की संस्थाओं के इस हश्र को देख कर और प्रासंगिक लगता है। उन्होंने कहा था कि ‘इस महाद्वीप के लोग मेहनती जरूर हैं, लेकिन ये मेहनत करते तभी हैं जब कोई इनको हाँके। शासन इनके उपर अगर छोड़ दिया जाए तो ये फिर से छोटे-छोटे कबीलों और राज्यों की अव्यवस्था की तरफ लौट जाएंगे।’ याद कीजिए ब्रि‍टिश शासन ने इस महाद्वीप पर पकड़ न्याय, राज्य, प्रशासन, शिक्षा, अस्पताल जैसी संस्थाओं को मजबूत करने के क्रम में की थी। क्या हमें सस्थानों के निर्माण के लिए फिर से विदेशों की तरफ लौटना पडे़गा ?

‘जनता के समर्थन से ही इस व्यावसायीकरण को रोका जा सकता है : डॉक्‍टर अनूप सराया

विश्‍व बैंक लगातार तीसरी दुनिया के देशों की सरकारों को सामाजिक क्षेत्र में वित्तीय कटौती की सलाह देता रहा है और यहां की दलाल सरकारें इन नीतियों को लागू करने में जुटी हुई हैं। पिछले कुछ वर्षों से इस बात की लगातार कोशिश की जा रही है कि एम्स में अब तक जो सुविधाएं उपलब्ध हैं उनके बदले मरीजों से पैसे लिए जायं जो बाजार की दर पर हों। इसके लिए सरकार की ओर से तरह-तरह के सुझाव पेश किये जा रहे हैं। सारा प्रयास एम्स के बुनियादी चरित्र को बदलने का है। इसी क्रम में वेलियाथन कमेटी का गठन हुआ और प्रधानमंत्री कार्यालय इस कमेटी की सिफारिशों को लागू करने पर जोर दे रहा है। ‘प्रोग्रेसिव मेडिकोज ऐंड साइंटिस्ट फोरम’ के सक्रिय सदस्य और एम्स के गैस्ट्राइटिस विभाग में प्रोफेसर डॉ. अनूप सराया का कहना है कि एम्स ऐक्ट के मुताबिक एम्स के कामकाज में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं हो सकता- प्रधनमंत्री भी हस्तक्षेप नहीं कर सकता। इसके स्वरूप में कोई भी बुनियादी तब्दीली संसद में बहस के बिना नहीं की जा सकती है। डॉ. सराया का यह भी कहना है कि  उन संस्थाओं के लिए जो जनता की सेवा के लिए हैं वित्तीय आधर पर स्वायत्‍तता  की अवधरणा ही गलत है। इसके पीछे असली मकसद एम्स को आम जनता की पहुंच से दूर करना है… प्रस्तुत है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश-

आखिर सरकार एम्स के चरित्र में बदलाव क्यों चाहती है ?

दरअसल स्वास्थ्य संबंधी नीति में भूमंडलीकरण के बाद जो आमूल परिवर्तन आया है उसी का यह असर है। आज ये लोग रेवेन्यू पैदा करने के मॉडल की ओर जा रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और वर्ल्ड बैंक के स्ट्रक्चरल ऐडजस्टमेंट प्रोग्राम के तहत सामाजिक सुरक्षा में कटौती की नीति जब से बनी है तो स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च में भी कटौती की योजना बनी। राजस्व पैदा करने के मॉडल पर ये लोग चलना चाहते हैं और कह रहे हैं कि हम उन लोगों को जिनके लिए बहुत जरूरी है और जो बीपीएल कार्ड होल्डर हैं उनको फ्री कर देंगे। अब सवाल ये है कि बीपीएल कार्ड कौन हासिल कर सकता है। अगर राज्य कहता है कि हमारे यहां गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की संख्या ज्यादा है तो केंद्र इस पर सवाल खड़े करता है। बीपीएल के साथ दिक्कत यह भी है कि अगर यह दूसरे राज्य का है तो हो सकता है दिल्ली में इसे स्वीकार न किया जाय। मसलन इंस्टीट्यूट ऑफ बिलिअरी साइंसेज जैसी कुछ संस्थाएं ऐसी हैं जिसमें केवल दिल्ली का बीपीएल कार्ड होल्डर ही फायदा ले सकता है। अगर दूसरे राज्य से कोई इलाज कराने आ गया और बीपीएल कार्ड उसके पास नहीं है तो क्या आप उसका इलाज नहीं करेंगे?

जो लोग बीपीएल से ऊपर हैं उनमें से भी तो बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिनको यहां इलाज कराने की जरूरत पड़ती है।

बिलकुल ठीक कह रहे हैं। जो लोग गरीबी रेखा से ऊपर हैं उनकी भी हैसियत ऐसी नहीं है कि वे अच्छी चिकित्सा के लिए पैसे खर्च कर सकें। अब ये लोग नयी नीति के तहत बहुत सारे लोगों को इलाज से वंचित कर रहे हैं। ज्यादा से ज्यादा लोगों को शामिल करने (इन्क्ल्यूजन) की बजाय अब ज्यादा से ज्यादा लोगों को इससे दूर करने (एक्सक्ल्यूजन) की नीति पर ये लोग चल रहे हैं। इसके अलावा लगातार व्यावसायीकरण की एक मुहिम चल रही है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्‍व बैंक के नुस्खे के बाद आप देखेंगे कि स्वास्थ्य के बजट में बढ़ोत्तरी नहीं हुई। यूपीए ने अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम में कहा था कि इसे तीन प्रतिशत करेंगे जो आज भी डेढ़ प्रतिशत से नीचे ही है। भारत जैसे एक गरीब देश में जहां बड़ी तादाद में लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं, जहां 77 प्रतिशत लोग 20 रुपये से कम की दैनिक आय पर गुजारा करते हैं वहां अगर आप चिकित्सा को महंगी कर देंगे तो लोगों की क्या हालत होगी। एन सी सक्सेना कमीशन की रिपोर्ट हो या योजना आयोग की ढेर सारी रपटों को अगर आप देखें तो साफ पता चलता है कि इस देश में कितनी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो चिकित्सा पर पैसा नहीं खर्च कर सकते। हालांकि उन रिपार्टों में भी जो उन्होंने प्रति व्यक्ति कैलोरी का मानदंड रखा है वह आईसीएमआर की गाइड लाइंस को अगर देखें या नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रीशन की गाइड लाइन देखें तो वह कैलोरी इनटेक भी कम है। यानी अगर आप उसे भी उपयुक्त कैलोरी पर ले आयें तो यह संख्या और भी ज्यादा बढ़ जाएगी। तो ऐसी हालत में भारत जैसे देश में स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने की जिम्मेदारी सरकार की हो जाती है। लेकिन सरकार अपना पल्ला झाड़ रही है और कह रही है कि वह महज प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करेगी। यानी प्राथमिक से ऊपर की जरूरत है तो वह खरीदकर उसका लाभ उठायें। जहां पहले ‘सबके लिए स्वास्थ्य’ की बात होती थी अब एफोर्डेबुल हेल्थ पर बात होने लगी है। इतना ही नहीं सरकारी अस्पताल में भी बहुत सारी सेवाएं अब आउट सोर्स की जाने लगी हैं। धीरे-धीरे सरकार अब अपने हाथ खींचने लगी है। नियुक्तियों में भी अगर आप देखें तो मनमाने ढंग से काम हो रहा है। सरकार धीरे-धीरे अपनी संस्थाओं को तबाह करके प्राइवेट संस्थाओं को मदद करने में लगी है।

क्या पिछले 10 वर्षों में एम्स में इसकी कोई झलक मिली है ?

पिछले 10 वर्षों से लगातार इस दिशा में सरकार काम कर रही है। यहां एम्स में पहले 1992-93 में यूजर्स चार्जेज लगाने की कोशिश की गयी। उसके बाद 1996-97 में उसका विरोध कर हमने उसे रुकवाया। इसी वर्ष के आस पास इन्सेंटिव स्कीम लागू करने की कोशिश की गयी कि जो आय होगी उसका एक हिस्सा डॉक्टरों में बांटा जाएगा। उसको भी हम लोगों ने रुकवाया। हमने कहा कि हमारा सबसे बड़ा इन्सेंटिव यही है कि हमारा मरीज सही सलामत ठीक होकर यहां से चला जाय। हमने कहा कि आप जो भी इन्सेंटिव देंगे वह पैसा गरीब आदमी की जेब से ही निकलकर आयेगा इसलिए हमें उसकी जरूरत नहीं है। हां, आप अगर इन्सेंटिव देना ही चाहते हैं तो सरकार अपने किसी मद से इसकी व्यवस्था कर दे। आप किस तरह का इन्सेंटिव देना चाहते हैं। हमने कहा कि यह तो लूट में हिस्सेदारी होगी जो हमें नहीं चाहिए। फि‍र इन्होंने 2002 में कुछ यूजर्स चार्जेज लगाने की कोशिश की। फि‍र उसका विरोध हुआ। मेन इंस्टीट्यूट में तो नहीं लगा लेकिन जहां-जहां सेंटर बन गये हैं,  जैसे कार्डियो-न्यूरो सेंटर में- वहां लगा दिया। मेन इंस्‍टीट्यूट में वही जांच निःशुल्क होती है लेकिन इस सेंटर में उसके पैसे देने पड़ते हैं, जबकि वह भी इंस्टीट्यूट का ही हिस्सा है। यह लगभग सन् 2000 से शुरू हुआ। फि‍र इन्होंने 2005 में बाकायदा ‘रेश्‍नलाइजेशन ऑफ चार्जेज’ के नाम पर (जिसे मैं कामर्शियलाइजेशन ऑपफ हेल्थ केयर कहता हूं) हर जांच के,  हर ऑपरेशन के, हर चीज के पैसे लगा दिये। ये शुरू भी हो गया। सितंबर, 2005 से यह लागू हुआ जिसका फि‍र हम लोगों ने लगातार विरोध किया। इसके लिए हम लोगों ने लिखने से लेकर धरना-प्रदर्शन सब कुछ किया। लगातार सांसदों से मिलकर इस मुहिम को चलाया। अंततः आठ महीने बाद उस आदेश को वापस लिया गया। यह भूमंडलीकरण के दौर में हमारी एक बड़ी जीत थी। अब फि‍र से उसको किसी न किसी तरीके से लागू करना चाहते हैं। पहले फैकल्टी का कोई भी व्यक्ति छूट दे सकता था जिसे अब विभागाध्यक्ष तक सीमित कर दिया गया है। इनकी कोशिश है कि किसी तरह फि‍र से पैसा वसूला जाय लेकिन हम लोग लगातार इसका विरोध कर रहे हैं।

इसका मतलब यहां के डॉक्टरों में एक तरह की चेतना है?

हम लोग लगातार इन मुद्दों पर लड़ते रहे हैं इसलिए कुछ चीजों को रोक पाते हैं।

अच्छा ये बताइए कि वेलियाथन कमेटी का गठन किस मकसद से किया गया?

पहली चीज तो यह समझ लीजिए कि वेलियाथन साहब हैं कौन। वेलियाथन साहब जब श्री चित्रा इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर थे तो वहां उन्होंने एक रेवेन्यू जेनरेशन मॉडल लागू किया था। उसके बाद उन्होंने अवकाश ग्रहण करने के बाद मनीपाल ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल के लिए प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों के खोलने का काम शुरू किया। तो इस प्रकार वेलियाथन साहब इंडस्ट्री के मददगार और रेवेन्यू जेनरेशन मॉडल की वकालत करने वाले डॉक्टर हैं। इसलिए मनमोहन सिंह और मंटेक सिंह अहलूवालिया की सोच के साथ उनका तालमेल पूरी तरह बैठ गया और उनकी अध्यक्षता में एक कमेटी बनायी गयी। पहली बार जब यहां रेवेन्यू जेनरेशन प्रोग्राम लागू करने की कोशिश की गयी थी उसमें मुंह की खानी पड़ी। दूसरी बार मई, 2006 में यह कोशिश हुई। वह एम्स में आरक्षण विरोधी आंदोलन का दौर था और आंदोलन के जोर पकड़ने के साथ एम्स में अराजकता का माहौल बन गया। यहां के डायरेक्टर पूरी तरह आरक्षण विरोधि‍यों को समर्थन दे रहे थे। और कांग्रेस में भी एक बड़ा सेक्शन था जो आरक्षण विरोधि‍यों के साथ खड़ा था। अब देखिए कि प्रधनमंत्री मनमोहन सिंह प्रोटोकोल तोड़ कर हड़ताली डॉक्टरों से दो बार मिले, जबकि कोई भी प्रधनमंत्री यही कहता कि पहले आप हड़ताल समाप्त करिए फि‍र बात करिए। वह हड़ताल अदालत के आदेश का उल्लंघन करके चल रही थी। उसमें न कोर्ट हस्तक्षेप कर रहा था और न स्थानीय प्रशासन। डॉक्टरों को हड़ताल के लिए टेंट लगवाये जा रहे थे, कूलर लगवाये जा रहे थे और सारी व्यवस्था की जा रही थी। तो पूरी तरह से अराजकता का माहौल था। उसमें यह कमेटी बनायी गयी थी जो इसकी कार्यक्षमता बढ़ाने के तरीकों का सुझाव दे सके। लेकिन उसने उन कारणों के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की जिसकी वजह से अराजकता पैदा हुई थी। हां, उसने यह जरूर बताया कि एम्स को किस तरह बड़े उद्योगों के लिए उपलब्ध कराया जाय। यह रिपोर्ट तैयार हो गयी। इसमें भी एक बात ध्यान देने की है। कमेटी की रिपोर्ट को इंस्टीट्यूट के निकाय ने स्वीकृति नहीं दी। उस सूरत में इसकी कोई वैधता नहीं थी। तब भी पीएमओ यह बार बार लिख रहा है कि वेलियाथन की सि‍फारिशों को लागू करिए। कैबिनेट मीटिंग में प्रधनमंत्री ने इंस्टीट्यूट को तीन महीने का समय दिया था कि इसे लागू कर दिया जाय। इस प्रकार हम देखते हैं कि जो रिपोर्ट तैयार की गयी है वह इंस्टीट्यूट के कामकाज के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि इंस्टीट्यूट को इंडस्ट्री के लिए कैसे उपलब्ध कराया जाय। उसका इरादा ही कुछ और है।

तो अगर एम्स पर यह लागू हो जायेगा तो जितने पीजीआई हैं उन पर भी यह लागू होगा ?

देखिए, यह कमेटी इंस्टीट्यूट के लिए बनायी गयी थी। लेकिन सरकार अपनी नीयत साफ कर चुकी है। प्लानिंग कमीशन की मीटिंग के बाद मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने साफ कहा है कि एम्स जैसी संस्थाओं को पीपीपी मोड पर डाल दिया जाय- प्राइवेट-पब्लिक पार्टीसिपेशन। लिहाजा जितनी और संस्थायें हैं या बनेंगी वे सभी प्राइवेट-पब्लिक पार्टीसिपेशन के तरीके पर ही चलेंगी। अभी तो तमाम कमियों के बावजूद गरीब से गरीब आदमी को भी यहां से राहत मिल जाती है, लेकिन अब यह जो आखिरी उम्मीद है वह भी खत्म हो जायेगी। इसका चरित्र ही बदल जायेगा। गौर करिये कि इस इंस्टीट्यूट को किस लिए बनाया गया था। जब नेहरू मंत्रिमंडल में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अमृतकौर ने संसद में इसका बिल पेश किया तो उसमें कहा गया था कि इसका मकसद गरीब से गरीब आदमी को उत्तम स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करना, राष्ट्र के हित में शोध करना,  चिकित्सा के लिए लोगों को प्रशिक्षित करना और अध्यापन के नये तरीके विकसित करना है। इसका मतलब अनुसंधान और मरीजों की देखभाल पर मुख्य जोर था।

अब जब आप इंडस्ट्री के साथ जुड़ेंगे तो इसका इस्तेमाल इंडस्ट्री करेगी, जो कंसल्टेंट हैं वे इंडस्ट्री के लिए काम करेंगे, पढ़ाई पर बुरा असर पड़ेगा, मरीजों की स्वास्थ्य सुविधा पर बुरा असर पड़ेगा और अगर आप इसका व्यावसायीकरण करेंगे तो गरीब से गरीब आदमी को आप इलाज नहीं दे सकेंगे। इसका जो मुख्य उद्देश्य है उससे आप दूर हो जायेंगे। इसलिए बुनियादी चरित्र में कोई भी परिवर्तन अगर आप लाना चाहते हैं तो उसके लिए संसद में बहस की जानी चाहिए।

अभी आपको इसका भविष्य कैसा दिखायी दे रहा है? क्या आप लोग इस बदलाव को रोक पायेंगे?

हम लोग तो इसको रोकने की लड़ाई लड़ रहे हैं। हमको जनता से जितना ही अधि‍क समर्थन मिलेगा और राजनीतिक क्षेत्रों से जो समर्थन मिलेगा उतना ही हम इसे रोक पायेंगे। लेकिन राजनीतिक दलों से कोई उम्मीद नहीं है क्योंकि अगर वे इसके प्रति गंभीर होते तो काफी पहले ही इसे रोकने की दिशा में कुछ करते। जहां तक मीडिया का सवाल है, जो मेनस्ट्रीम अखबार हैं और नयी आर्थिक नीति का समर्थन करते हैं, वे हर क्षेत्र की तरह स्वास्थ्य सेवाओं के भी निजीकरण और व्यावसायीकरण के ही समर्थन में आमतौर पर दिखायी देते हैं। इसलिए उन अखबारों में ये खबरें जगह नहीं पातीं।0

क्या स्वतंत्रा रूप से डॉक्टरों का ऐसा कोई समूह है जो आम जनता के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हो और उसकी तरफ से कोई सामूहिक प्रयास किया जा रहा हो?

जब तक हम लोग रेजिडेंट डॉक्टर थे, यह कोशिश हमारी लगातार चलती रही। ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन का अंतिम अधि‍वेशन 1987 में हुआ। उसमें इस तरह के तमाम मुद्दे हमने उठाये थे और इस पर प्रस्ताव पारित किये थे। इसमें स्वास्थ्य नीति से लेकर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बजट बढ़ाने तक की बातें शामिल थीं। हम लोगों ने मेडिकल संस्थाओं में कैपिटेशन फी का विरोध किया था। आज मानव संसाध्न मंत्रालय, यूजीसी और मेडिकल काउंसिल ये सभी डॉक्टरी की पढ़ाई के निजीकरण और व्यावसायीकरण के पक्ष में हैं। जितने कॉलेज सरकारी सेक्टर में खुले हैं उससे ज्यादा प्राइवेट सेक्टर में हैं। प्रतिभा के इन सारे पुजारियों को उस समय मेरिट की याद आ जाती है जब हम लोग जाति आधरित आरक्षण की बात करते हैं। उन मेडिकल कॉलेजों में जहां सिर्फ पैसे से एडमिशन दिया जाता है वहां इन्हें मेरिट की चिंता नहीं होती। दरअसल जो सुविधाप्राप्त वर्ग है उसने अपने लिए कुछ अपने संस्थान खोल लिए हैं और सरकार अब उन्हीं को मदद करना चाहती है। इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि यूजीसी ने हाल में एक निर्णय लिया है कि वे लोग जो प्राइवेट विश्वविद्यालयों या प्राइवेट कालेजों में भी हैं वे भी रिसर्च ग्रांट के लिए हकदार हैं और आवेदन कर सकते हैं। अब अगर आपने इसकी अनुमति दे दी तो आप देखेंगे कि प्राइवेट संस्थानों के लोगों को ही सारी फेलोशिप जायेगी। इनके निहितार्थों पर गौर करिए। वे लोग जो अभी मेडिकल एजुकेशन की सीट्स के लिए एक एक करोड़ तक दे रहे हैं वो फि‍र धीरे-धीरे यूजीसी से टाईअप करके कुछ फेलोशिप्स भी अपने यहां रख लेंगे। वे कहेंगे आप इतना दे दीजिए हम आपको फेलोशिप दे देंगे। तो जो पैसा अभी रेजीडेंसी का देना पड़ता है वे भी ये संस्थान नहीं देंगे। रेजीडेंसी की जो तनख्वाह देनी पड़ती वे भी न देकर वे फेलोशिप दे देंगे। तो यह सब एक सुनियोजित ढंग से लूट की साजिश चल रही है। प्राइवेट कैपिटल के लिए सब कुछ है, आम जनता के लिए कुछ नहीं। यही निदेशक सिद्धांत बन गया है।

वेलियाथन कमेटी रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज करने की जरूरत है या इसकी कुछ सिफारिशों को स्वीकार किया जा सकता है ?

यह जिस भावना से लिखी गयी है उसमें ही यह बात निहित है कि इसका पूरा मकसद बहुसंख्यक गरीब जनता के खिलाफ और सुविधासंपन्न वर्ग तथा उद्योगों के हित में है। इसलिए इसे तो पूरी तरह खारिज करने की जरूरत है। इसमें सब कुछ आउटसोर्सिंग पर आधरित है। अब इसकी अनुसंधान परिषद (रिसर्च काउंसिल) के ढांचे की परिकल्पना देखिए जिसमें कहा गया है कि उद्योग क्षेत्र से दो लोग होंगे और एक विख्यात वैज्ञानिक होगा। यह वैज्ञानिक भी किसी फर्मास्यूटिकल उद्योग का नामांकित व्यक्ति होगा। इसमें अनुसंधान और शोध को भी उद्योगों के हित के लिए बताया गया है। इसमें यह भी कहा गया है कि एम्स ऐक्ट में संशोध्न कर दिया जाय और इसके निकायों में जिन लोगों को रखा जाय उनमें उद्योग के लोग हों, सीआईआई और पिफक्की से लोग लिए जायं। इंस्टीट्यूट के काम काज के बारे में इन्होंने जिनसे राय मांगी वे सभी उद्योग क्षेत्र से आते हैं। इसमें रिसर्च इंसेंटिव देने की बात कही गयी है जिसके खिलाफ हम 150 लोगों ने हस्ताक्षर करके भेजा कि हमें यह नहीं चाहिए क्योंकि इससे हमारा पूरा ओरिएंटेशन गड़बड़ हो जायेगा, फर्जी रिसर्च किए जाएंगे और फि‍लहाल उसे रोक दिया गया है।

(डॉक्‍टर सराया से यह बातचीत समकालीन तीसरी दुनि‍या के संपादक और वरि‍ष्‍ठ पत्रकार आनन्‍द स्‍वरूप वर्मा ने की है। समकालीन तीसरी दुनि‍या, जनवरी-2011 से साभार)