Tag: हंस

भेडिय़े : भुवनेश्‍वर

कथाकार भुवनेश्‍वर

 

शाहजहाँपुर में जन्‍में भुवनेश्‍वर अपने युग के सर्वाधिक विवादास्‍पद लेकिन सशक्‍त कथाकार हैं। उनकी अद्भुत कहानी ‘भेडिये़’ और इस पर वरिष्‍ठ कथाकार प्रेमपाल शर्मा की टिप्‍पणी-

‘भेडिया या क्या है’,- खारू बंजारे ने कहा- ‘मैं अकेला पनेठी से एक भेडिय़ा मार सकता हूँ।’ मैंने उसका विश्वास कर लिया। खारू किसी चीज से नहीं डर सकता और हालांकि 70 के आसपास होने और एक उम्र की गरीबी के सबब से वह बुझा-बुझा-सा दिख पड़ता था, पर तब भी उसकी ऐसी बातों का उसके कहने के साथ ही यकीन करना पड़ता था। उसका असली नाम शायद इफ्तखार या ऐसा ही कुछ था, पर उसका लघुकरण ‘खारू’ बिल्कुल चस्पा होता था। उसके चारों ओर ऐसी ही दुरूह और दुर्भेद्य कठिनता थी। उसकी आँखें ठंडी और जमी हुई थीं और घनी सफेद मूँछों के नीचे उसका मुँह इतना ही अमानुषीय और निर्दय था जितना एक चूहेदान।

‘जीवन से वह निपटारा कर चुका था, मौत उसे नहीं चाहती थी, पर तब भी वह समय के मुँह पर थूककर जीवित था। तुम्हारी भली या बुरी राय की परवाह किये बिना भी, वह कभी झूठ नहीं बोलता था और अपने निर्दय कटु सत्य से मानो यह दिखला देता था कि सत्य भी कितना ऊसर और भयानक हो सकता है। खारू ने मुझसे यह कहानी कही थी। उसका वह ठोस तरीका और गहरी बेसरोकारी, जिससे उसने यह कहानी कही, मैं शब्दों में नहीं लिख सकता, पर तब भी यह कहानी सच मानता हूँ- इसका एक-एक लफ्ज।’

‘मैं किसी चीज से नहीं डरता,  हाँ सिवा भेडिय़े के मैं किसी चीज से नहीं डरता।’ खारू ने कहा। एक भेडिय़ा नहीं, दो चार नहीं। भेडिय़ों का झुंड-200,300 जो जाड़े की रातों में, निकलते हैं और सारी दुनिया की चीजें, जिनकी भूख नहीं बुझा सकतीं, उनका- उन शैतानों की फौज का कोई भी मुकाबला नहीं कर सकता। लोग कहते हैं, अकेला भेडिय़ा कायर होता है। यह झूठ है। भेडिय़ा कायर नहीं होता, अकेला भी वह सिर्फ चौकन्ना होता है। तुम कहते हो लोमड़ी चालाक होती है, तो तुम भेडिय़ों को जानते ही नहीं। तुमने कभी भेडिय़े को शिकार करते देखा है किसी का- बारहसिंगे का? वह शेर की तरह नाटक नहीं करता, भालू की तरह शेखी नहीं दिखाता। एक मरतबा सिर्फ एक मरतबा- गेंद-सा कूदकर उसकी जाँघ में गहरा जख्म कर देता है- बस। फिर पीछे बहुत पीछे रहकर टपकते हुए खून की लकीर पर चलकर वहाँ पहुँच जाता है जहाँ वह बारहसिंगा कमजोर होकर गिर पड़ा है। या, उचककर एक क्षण में अपने-से तिगुने जानवर का पेट चाक कर देता है- और वहीं चिपक जाता है। भेडिय़ा बला का चालाक और बहादुर जानवर है। वह थकना तो जानता ही नहीं। अच्छे पछैयाँ बैल हमारे बंजारी गड्डों को घोड़ों से तेज ले जाते हैं, और जब उन्हें भेडिय़ों की बू आती है, तो भागते नहीं, उड़ते हैं। लेकिन भेडिय़े से तेज कोई चार पैर का जानवर नहीं दौड़ सकता।

‘सुनो, मैं ग्वालियर के राज से आईन में आ रहा था। अजीब सरदी थी और भेडिय़े गोलों में निकल पड़े थे। हमारा गड्डा काफी भारी था। मैं, मेरा बाप, गिरस्ती और तीन नटनियां- 15, 15, 16 साल की। हमलोग उन्हें पछाँह लिये जा रहे थे।’

‘किसलिए?’ मैंने पूछा।

‘तुम्हारा क्या ख्याल है, मुजरा करो? अरे बेचने के लिए। और किस मसरफ़ की हैं। ग्वालियर की नटनियाँ छोटी-छोटी गदबदी होती हैं और पंजाब में खूब बिक जाती हैं। यह लड़कियाँ होती तो बड़ी चोखी हैं, पर भारी भी खूब होती हैं। हमारे पास एक तेज बंजारी गड्डा था और तीन घोड़ों से तेज भागने वाले बैल।

हमलोग तडक़े ही चल दिये थे, दिन-ही-दिन में हम लोग जानेवाले साथियों से मिल जाना चाहते थे। वैसे डर के लिए हमारे पास दो कमान और एक टोपीदार बंदूक थी। बैल हौसले से भाग रहे थे और हमलोग 20 मील निकल आये थे कि बड़े मियाँ ने घूमकर कहा- ‘खारे भेडिय़े हैं?’

मैंने तेजी से कहा- ‘क्या कहा? भेडिय़े हैं? होते तो बैल न चौंकते?’

बूढ़े ने ‘सर’ हिलाकर कहा- ‘नहीं, भेडिय़े जरूर हैं। खैर, वह हमसे दस मील पीछे हैं और हमारे बैल थक चुके हैं, लेकिन हमें पचास मील और जाना है।’ बूढ़े ने कहा- ‘और मैं इन भेडिय़ों को जानता हूँ, पारसाल इन्होंने कुछ कैदियों को खा लिया था और बेडिय़ों और सिपाहियों की बंदूकों के सिवा कुछ न बचा। बंदूक भर लो।’

मैंने कमानों को तान के देखा, बंदूक तोड़ी, सब ठीक था।

‘बारूद की नई पोंगली भी निकाल के देख ले।’ मेरे बाप ने कहा।

‘बारूद की पोंगली’- मैंने कहा- ‘मेरे पास तो पुरानी ही वाली है।’

तब बूढ़े ने मुझे गालियाँ देनी शुरू की- ‘तू यह हैं, तू वह है।’

मैंने पूरा गड्डा उलट डाला, पर नई पोंगली कहीं नहीं थी।

मेरे बाप ने भी सब टटोला- ‘तू झूठ बोलता है, तू भेडिय़े की औलाद, मैंने तुझे नई पोंलगी दी थी।’ पर वह बारूद यहाँ कहीं नहीं थी। मेरे बाप ने मेरी पीठ पर कुहनी मारते हुए कहा- ‘शहर पहुँचकर मैं तेरी खाल उधेड़ दूँगा, शहर पहुँचकर… और इसी वक्त अचानक बैल एकदम रुककर पूँछ हिलाकर जोर से भागे। मैंने सुना मीलों दूर एक आवाज आ रही थी, बहुत धीमी जैसे खंडहरों में भी आँधी गुजरने से आती है-

ह्वा आ आ आ आ आ आ आ आ!

‘हवा’- मैंने सहम के कहा। ‘भेडिय़े!’ मेरे बाप ने नफरत से कहा, और बैलों को एक साथ किया। पर उन्हें मार की जरूरत नहीं थीं। उन्हें भेडिय़ों की बू आ गई थी और वे जी तोड़कर भाग रहे थे। दूर मैं एक छोटे-से काले धब्बे को हरकत करते हुए देख रहा था। उस सैकड़ों मील के चपटे रेगिस्तानी बंजर में तुम मीलों की चीज देख सकते हो। और दूर पर उस काले धब्बे के बादल की तरह आते मैं देख रहा था। बूढ़े ने कहा- ‘जैसे ही वह नजदीक आ जाय, मारो। एक भी तीर बेकार खोया तो मैं कलेजा निकाल लूँगा।’ और तब उन तीन लड़कियों ने एक दूसरे से चिपट कर टिसुए (आँसु) बहाना शुरू किया। ‘चुप रहो’, मैंने उनसे कहा-‘तुमने आवाज निकाली और मैंने तुम्हें नीचे ढकेला।’

भेडिय़े बढ़ते हुए चले आते थे, हम लोग भूरी पथरीली धरती पर उड़ रहे थे, पर भेडिय़े! बूढ़े ने लगामें छोड़ दीं और बन्‍दूक संभाल कर बैठा। मैंने कमान संभाली- मैं अंधेरे में उड़ती हुई मुर्गाबियों का शिकार कर सकता था और मेरा बाप- वह तो जिस चीज पर निशाना ताकता था अल्लाह उसे भूल जाता था। कोई 400 गज पर मेरे बाप ने आगेवाले भेडिय़े को गिरा दिया। धाँय! उसने नटों की तरह एक कलाबाजी खाई? और फिर दूसरी बिल्कुल नटों की तरह। बैल पागल होकर भाग रहे थे, हवा में उनके मुँह का फेन उडक़र हमारे मुँहों पर मेह की तरह गिरता था और वे रंभा रहे थे जैसे बंजारिन ब्यानेवाली भैसों की नकलें करती हैं। पर भेडिय़े नजदीक ही आते जा रहे थे। गिरे हुए भेडिय़ों को वे बिना रुके खा लेते थे, वे उनके ऊपर तैर जाते थे। मेरे बाप ने मेरे कंधे पर बन्‍दूक की नली रख दी थी। धाँय-धाँय! (मेरी गरदन पर अब तक जले का दाग है।) मैंने भी 16 तीरों से 16 ही भेडिय़े गिराये, बूढ़े ने 10 मारे थे, पर तब भी वह गोल बढ़ता ही आता था।

‘ले बन्‍दूक ले!’ उसने कहा- ‘मैं बैलों को देखूँगा।’

उसका ख्याल था कि बैल इससे भी तेज भाग सकते थे, पर यह ख्याल गलत था। दुनिया के कोई बैल उससे तेज नहीं भाग सकते थे।

मैं बन्‍दूक का भी निशाना खूब लगाता था, पर वह देशी जंग लगी बंदूक। खैर, वह लडक़ी उसे 5 मिनट में भर देती थी। बादीं अच्छी लडक़ी थी, वह बन्‍दूक भरती थी, मैं निशाना मारता था- अचूक। मैंने दस और गिराये-धाँय-धाँय-धाँय! जब सब बारूद खत्म हो गई तो भेडिय़े भी कुछ हारे से मालूम होते थे।

मैंने कहा- ‘अब वे पिछड़ गये।’

बूढ़ा हँसा- ‘वह इतनी-बात से नहीं पिछड़ सकते।’ पर मैं मरते-मरते कह चलूँगा कि सात मुल्क के बंजारों में खारे-सा खरा निशानेबाज नहीं है।

मेरा बाप बुढ़ापे में बड़ा हँसोड़ हो गया था।

हाँ, तो भेडिय़े कुछ पीछे रह गये थे। उन्हें कुछ खाने को मिल रहा था। ‘सप-सप-चट’ बैलों पर कोड़ा बोल रहा था कि पांच मिनट बाद ही उन्होंने फिर हमारा पीछा शुरू किया। वे हमसे 200 गज पर रह गये होंगे और बढ़ते ही आते थे। मेरे बाप ने कहा- ‘सामान निकालकर फेंको, गड्डा हल्का करो।’

एक बारगी ठोकर खाकर गड्डा चरकराकर चला। पूरे बंजारों में यह गड्डा अफसर था, और सब सामान फेंककर हमने उसे फूल-सा हल्का कर दिया था, और कुछ देर तो हम भेडिय़ों से दूर निकलते मालूम हुए, पर तुरंत ही वे फिर वापस आ गये।

बड़े मियाँ ने कहा- ‘अब तो, एक बैल खोल दो।’

‘क्या?’ मैंने कहा- ‘दो बैल गड्डा खींच ले जायेंगे?’

उसने कहा- ‘अच्छा, तब एक नटनिया फेंक दो।’ मैंने उन तीन में से मोटी को ही उठाया गड्डे के बाहर झुलाकर फेंक दिया। हाँ! ग्वालियर की नटनिया, उसके दाँत लगा दो तो वह भी भेडिय़ों का मुकाबला कर ले! पहले तो वह भागी पर यह जानकर कि भागना बेकार है, घूमकर खड़ी हो गई और सामनेवाले भेडिय़े की टाँगें पकड़ ली। पर इससे भी क्या फायदा था। एकदम वह नजर से ओझल हो गई। जैसे किसी कुँए में गिर पड़ी हो। गड्डा हल्का होकर और आगे बढ़ा, पर भेडिय़े फिर लौट आये।

‘दूसरी फेंको- बड़े मियाँ ने कहा। पर अब की मैंने कहा- ‘आखिर क्या हमलोग सैर करने के लिए मारे-मारे फिरते हैं, एक बैल न खोल दो।’

मैंने एक बैल खोल दिया। वह पीठ पर पूँछ रखकर चिंघाड़ता हुआ भागा और गोल उसके पीछे मुड़ गया।

मेरे बाप की आँखों में आँसू भर आये। ‘बड़ा असील बैल था, बड़ा असील बैल था…’ वह बुदबुदा रहा था।

‘हम बच तो गये’- मैंने कहा। पर तभी, ह्वा आ आ आ आ आ! गोल वापस आ गया था। ‘आज कयामत का दिन है’- मैंने कहा और बैलों को इतना भगाया कि मेरी हथेली में खून छलछला आया।

पर भेडिय़े पानी की तरह बढ़ते चले आ रहे थे और हमारे बैल मर के गिरना ही चाहते थे। ‘दूसरी लडक़ी भी फेंको!’- मेरे बाप ने चीखकर कहा।

इन दोनों में बादीं भारी थी और कुछ सोचकर काँपते हाथों वह अपनी चांदी की नथनी उतारने लगी थी और मैंने शायद बताया नहीं,  मुझे वह कुछ अच्छी भी लगती थी।

इसलिए मैंने दूसरी से कहा- ‘तू निकल!’ पर उसको तो जैसे फालिज मार गया था। मैंने उसे गिरा दिया और वह जैसे गिरी थी, वैसे ही पड़ी रही। गड्डा और हल्का हो गया और तेज दौड़ने लगा। पर पाँच ही मील में भेडिय़े फिर वापस आ गये। बड़े मियाँ ने गहरी साँस ली, माथा पीट लिया- ‘हम क्या करें, भीख माँग के खाना बंजारों का दीन है, हम रईस बनने चले थे…।’

मैंने बादीं की तरफ देखा, उसने मेरी तरफ। मैंने कहा- ‘तुम खुद कूद पड़ोगी कि मैं तुम्हें ढकेल दूँ। उसने चांदी की नथ उतारकर मुझे दे दी और बाँहों से आँखें बंद किये कूद पड़ी। गड्डा बिल्कुल हवा से उडऩे लगा। वह पूरे बंजारों में गड्डों का अफसर था।

पर हमारे बैल बेहद थक गये और बस्ती तक पहुँचने के लिए अब भी 30 मील बाकी थे। मैं बन्‍दूक के कुन्‍दे से उन्हें मार रहा था, पर भेडिय़े फिर लौट आये थे।

मेरे बाप के मुँह से पसीना टपकने लगा- ‘लाओ दूसरा बैल भी खोल दो।’

मैंने कहा- ‘यह मौत के मुँह में जाना है। हमलोग दोनों मारे जायेंगे, हमें या तुम्हें किसी को तो बचना चाहिए।’

‘तुम ठीक कहते हो।’ उसने कहा- ‘मैं बूढ़ा आदमी हूँ। मेरी जिन्‍दगी खत्म हो गई। मैं कूद पडूँगा।

मैंने कहा- ‘हिरास मत होना। मैं जिन्‍दा रहा तो एक-एक भेडिय़े को काट डालूँगा।

‘तू मेरा असील बेटा है।’ मेरे बाप ने कहा और मेरे दोनों गाल चूम लिये। उसने अपने दोनों हाथों में बड़ी-बड़ी छूरियाँ ले लीं और गले में मजबूती से कपड़ा लपेट लिया।

‘रुको’- उसने कहा- ‘मैं नये जूते पहने हूँ, मैं इन्हें दस साल पहनता, पर देखो, तुम इन्हें मत पहनना, मरे हुए आदमियों के जूते नहीं पहने जाते, तुम इन्हें बेच देना।’

उसने जूते खींचकर गड्डे पर फेंक दिये और भेडिय़ों के बीचोंबीच कूद पड़ा। मैंने पीछे घूमकर नहीं देखा, लेकिन थोड़ी देर में उसे चिल्लाते सुना रहा- यह ले! यह ले! भेडिय़े की औलाद! भेडिय़े की औलाद! और फिर चट-चट! चट-चट! मैं ही किसी भेडिय़ों से बच गया।’

खारू ने मेरे डरे हुए चेहरे की तरफ देखा जोर से हँसा और फिर खखारकर बहुत-सा जमीन पर थूक दिया।

‘मैंने दूसरे ही साल उनमें से साठ भेडिय़े और मारे।’ खारू ने फिर हँसकर कहा। पर उसके साथ ही उसकी आँखों में एक अनहोनी कठिनता आ गई, और वह भूखा, नंगा उठकर सीधा खड़ा हो गया।

मृत्यु पर जीवन, निराशा पर आशा की बेजोड़ कहानी: प्रेमपाल शर्मा

मैंने यह कहानी 1991 में ‘हंस’ में पढ़ी थी लेकिन उसके बाद मैं हर तीसरे मोड़ पर इस कहानी को याद करता हूं और उससे प्रेरणा भी पाता रहा हूँ। पहले एक रोजमर्रा की बात। हम और आप किताबों की दुनिया के आदमी हैं। हजारों किताबों, पत्रिकाओं के बोझ से लदे। आए दिन हम कुछ किताबों को ‘वीडआउट’ करते हैं। जब भी ऐसा मैंने किया, मुझे ‘भेडिय़े’ कहानी याद आती है कि कैसे रेगिस्तान से गुजरता बंजारा भेडिय़ों से जान बचाने के लिए उनके आगे चुग्गा फेंकता है। चुग्गा इसलिए कि जब तक भेडि़ये़ उसे खाएंगे तब तक उसकी गाड़ी थोड़ी और आगे निकल जाएगी। कहानी और जीवन दोनों में फेंकने के इस क्रम में सबसे पहले फेंकी जाती हैं वो चीजें जो अपेक्षाकृत कम महत्व की हैं। बंजारे पहले अपने साथ लाए खाने-पीने के सामान को फेंकते हैं। कोई और रास्ता न पाकर फिर तीसरे बैल को भेडिय़ों के हवाले कर देते हैं, लेकिन भेडिय़ों की भूख कहाँ शांत होने वाली है। फिर उन तीन नटनियों में से एक को फेंकते हैं। ये वो नटनियां हैं जिन्हें बेचने के लिए बंजारे पंजाब की तरफ जा रहे हैं। हर बार ऐसा लगता है जैसे घर के स्पेस में भेडि़ये एक जगह की तरह हैं। मैं जिन किताबों को बचाकर रख लेता हूँ साल-दो साल के बाद उन्हें अगले पड़ाव में नटनियों की तरह फेंक देता हूँ और कई बार जब कुछ भी रास्ता नहीं सूझता तो सब कुछ छोडऩा पड़ता है। बीस साल पहले मैनचेस्टर में कुछ विदेशी चीजों को साथ लाने के मोह और एयरपोर्ट ड्यूटी देने की कशमकश में भी मुझे ‘भेडि़ये’ की याद आई। एक-दो किताबों को छोडक़र मैंने सारा सामान एयरपोर्ट पर छोड़ दिया। यह चीजों को रखने, आमंत्रण देने, न देने के चयन में रोज होता है। बात बहुत मामूली है, लेकिन ‘भेडि़ये’ कहानी का कथ्य आपको भूलने नहीं देता।

‘भेडि़ये’ का रूपक एक चुनौती की तरह है। मेरा वश चले तो मैं इस कहानी को मैनेजमेंट की क्लास में पढ़ाऊँ। मेरी व्याख्या इस तरह होगी,  हर कैप्टन, सी.ई.ओ. मैनेजर के सामने कुछ लक्ष्य होते हैं। उनके सामने जो वाकई कुछ करना चाहते हैं। कहानी के कथ्य को दोहराने की इजाजत लूँ तो खाऊ बंजारे और उसके बाप को 50 मील का रेगिस्तान पार करना है। सूरज छिपने से पहले, यानी लक्ष्य और उसकी सीमा साफ है लेकिन अवरोध भी इतना बड़ा! गाड़ी सुनसान रेगिस्तान से गुजर रही है। उस रेगिस्तान से जिसमें भूखे भेडिय़ों के झुंड के झुंड हैं। जीवन-मरण के बीच झूलती इन स्थितियों के बीच आप कैसे अपना संतुलन बनाए हुए एक के बाद एक नई युक्ति, तरकीब ढूंढते हैं और अंत में कम से कम एक बंजारा तो सब कुछ खोने के बाद अपने लक्ष्य तक पहुँच ही जाता है। बेहतर प्रबंधन के लिए इससे बड़ी चुनौती और सफलता की क्या कहानी हो सकती है! वरना रेगिस्तान में प्रवेश करते ही भेडिय़ों के झुंड ने जैसे ही हमला किया था तभी सब की कहानी खत्म हो सकती थी। इतनी छोटी कहानी में इतना बड़ा दर्शन! यह हिंदी का दुर्भाग्य है कि प्रबंधन जैसे हाई-फाई विषयों में कोई भूलकर भी ऐसी अनमोल कृतियों की तरफ नहीं देखता। अंग्रेजी या किसी यूरोपियन भाषा में यह कहानी लिखी गई होती तो शायद अब तक कितने ‘मैनेजमेंट गुरु’ इस पर दर्जनों किताबें लिख चुके होते।

तीन छोटे पृष्ठों की इस कहानी में प्रेम की मुश्किल से चार लाइनें होंगी लेकिन वे बार-बार पाठक की आँखें भिगो सकती हैं। पहली नटनी (लडक़ी) को भेडिय़ों के आगे फेंकने के बाद जब भेडि़ये पानी की तरह आक्रामक मुद्रा में उनकी तरफ बढ़े चले आ रहे हैं तो बाप चीखकर कहता है, ‘दूसरी को भी फेंको’, बाप ने जिस लडक़ी की तरफ इशारा किया वह तुरंत अपनी चांदी की नथनी उतारना शुरू कर देती है लेकिन जवान खारू के मन में उसके प्रति प्रेम है, वह तुरंत तीसरी को कहता है कि तू निकल। कहानी के आयाम देखिए, पहले फेंकी जाने वाली लडक़ी का चित्रण। ‘उसे जहाँ गिराया गया वहीं गठरी की तरह बैठ गई’, मानो कह रही हो जब मुझे इस दुनिया में ही कोई नहीं चाहता तो जीकर क्या करूँगी, लेकिन भेडि़ये उसे खाकर फिर गाड़ी की तरफ दौड़ते हैं। बाप-बेटों ने माथा पीट लिया, कराहते हुए कहने लगे, ‘हम क्या करें,’ भीख मांगकर खाना बंजारों का दीन है। अब नंबर कुछ भारी, तीसरी नटनी का आता है। उसने तुरंत चांदी की नथ उतारकर युवक खारू को दे दी और और बाहों से आँखें बंद कर स्वयं कूद पड़ी। प्रेम के कुछ शब्द, कुछ संकेत ही कहानी को एक बड़ी प्रेमकथा में बदल देते हैं। मानो यह लडक़ी स्वयं सर्वस्य खुद देना चाहती है। नथ की निशानी देना और सहर्ष कूदना उसी का हिस्सा है। प्रेमचंद की कहानियों में एक वाक्य बार-बार आता है- प्रेम का अर्थ लेना नहीं, त्याग है। नटनी और इस युवक के बीच चंद शब्द इसे एक अनमोल कहानी में बदल देते हैं।

पिता और पुत्र के बीच भी इसी प्रेम के अलौकिक टुकड़े हैं। कोई और रास्ता न पाकर अंतिम निर्णय होता है कि हम दोनों में से भी भेडिय़ों के आगे कोई कूद जाए तो तब तक गाड़ी और आगे चली जाएगी। पिता तुरंत तैयार होता है। ‘मैं बूढ़ा आदमी हूँ। मेरी जिन्‍दगी खत्म हो गई है, मैं कूदता हूँ।’ और वह कूद जाता है, लेकिन कूदने से पहले वह अपने बेटे के गाल को चूमता है और कहता है- ‘मैंने नए जूते पहने हुए हैं। मैं जिंदा रहता तो ये जूते दस साल और चलते, लेकिन देखो तुम इन जूतों को मत पहनना। मरे आदमियों के जूते नहीं पहने जाते।’ यानी कि मरने के अंतिम क्षण में भी पिता अपने पुत्र के भविष्य में किस भी अपशकुन की आशंका तक से डरता है। कहीं ऐसा न हो कि ये जूते पहन ले और उसका कुछ नुकसान हो जाए। मृत्यु के पंजों के बीच फडफ़ड़ाता आदमी कैसे, कितने रूपों में अपने प्रेम, स्नेह को बचाए रहता है।

कहानी में नए दौर के ‘स्त्री-विमर्श’ और ‘समजाशास्त्र’ को खोजने की भी पर्याप्त गुंजाइश है। पिछले दो-तीन दशक की जनगणनाओं में पंजाब जैसे प्रांतों में लड़कियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। लेकिन भुवनेश्वर की इस कहानी में जो 1938 में ‘हँस’ से छपी थी यानी आज से 80 वर्ष पहले, क्या तब भी पंजाब प्रांत में लड़कियां ऐसे ही खरीदकर लाई जाती थीं जैसे यह बंजारा इन तीन नटनियों को ग्वालियर से पंजाब बेचने के लिए कुछ पैसों की खातिर जा रहा है। स्त्री-विमर्श की पूरी गुंजाइश यह कि सैकड़ों सालों से क्या यह देश लड़कियों को खरीद-फरोख्त की वस्तु ही मानता रहा है? आप पंजाब या उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में लड़कियां बंगाल, आसाम और दूसरे गरीब राज्यों से इसी अंदाज में अमानवीय ढंग से खरीदी जाती हैं। न वे पति की भाषा समझतीं, न उनके साथ उनकी उम्र का कोई संबंध होता है। सिर्फ पैसे के मोल-तोल में सब कुछ होता है। बंजारों की गरीबी का साक्षात कारुणिक चित्र ‘हम क्या करें, भीख मांगकर खाना बंजारों का दीन है, हम रईस बनने चले थे,’ किसी भी पाठक के सीने के आर-पार हो जाता है।

जीवन और मृत्यु के बीच की अद्भुत रस्साकसी है कहानी में। यह हम सबके साथ रोज होता है। लेकिन कहानी की खूबसूरती यह है कि ये पात्र हर स्थितियों में अपना मानव स्वभाव बचाए रखते हैं। भेडिय़ों की आहट पाते ही वे मानसिक रूप से तैयारी शुरू कर देते हैं। तभी पता लगता है कि बारूद की नई पोटली बेटा साथ लाना भूल गया है। बूढ़े बाप का गुस्सा फूट पड़ता है, ‘तू भेडि़ए की औलाद! मैंने तुझे नई पोंगली दी थी, शहर पहुंचकर मैं तेरी खाल उतार दूंगा।’ पिता और पुत्र के संबंध वाकई ऐसे ही होते हैं। एक और चित्र देखिए,  कुछ भेडि़ए जब मर जाते हैं तो उन्हें उम्मीद बंधती है। बेटा कहता है, ‘लगता है जब भेडि़ये पिछड़ गए।’ बूढ़ा हंसा- ‘मैं जानता हूँ भेडिय़ों को, वे नहीं पिछड़ सकते।’ उसने अगला पैंतरा बदला, ‘सामान निकालकर फेंको। गड्डा हल्का करो।’ जीवन के सबसे अभूतपूर्व संकट के समय भी अपनी बुद्धि को परास्त मत होने दो। कोई न कोई युक्ति सोचो, रास्ता निकालो। एक और चित्र, पिता अब भेडिय़ों के आगे कूदने की तैयारी करता है तो बेटे के अंदर एक प्रतिज्ञा गूंजती है। यदि जिंदा रहा तो एक-एक भेडि़ये को काट डालूँगा। तुरंत पिता गले लगा लेता है- तू मेरा असील बेटा है और अगले साल युवक खारू ने 60 भेडि़ये मारे।

यह कहानी मृत्यु पर जीवन, निराशा पर आशा की बेजोड़ कहानी है। 1991 में ‘हंस’ के संपादकीय में लिखी गई राजेन्द्र जी की बात सही है। ‘मानवीय जिजीविषा के नजरिए से इसे ‘ओल्ड मैन एंड दी सी’ के समकक्ष रखा जा सकता है।’ लेकिन अपनी संक्षिप्तता, कसाव, रूपक में शायद उससे भी अधिक प्रभावी।

वर्ष 2011 हिंदी की कई विभूतियों की जन्मशती मना रहा है। कवियों पर शहर दिल्ली का जोर कुछ ज्यादा ही है। लेकिन हिंदी के पाठक को भुवनेश्वर की ‘भेडि़ए’ जैसी कहानी ही वापस ला सकती है। आखिर जन्मशती तो भुवनेश्वर की भी है।

 

 

 

प्रगतिशील लेखक आन्दोलन: जड़ों की पहचान : शैलेश ज़ैदी

भारत में प्रगति‍शील लेखक संघ की स्‍थापना और उद्देश्‍य, हि‍न्‍दी-उर्दू लेखकों का नजरि‍या, प्रेमचन्‍द की भूमि‍का, संघ का महत्‍व और प्रगति‍शील लेखक आन्‍दोलन के अवसान का वि‍श्‍लेषण करता मुस्‍लि‍म वि‍श्‍ववि‍द्यालय के पूर्व हिंदी वि‍भागाध्‍यक्ष प्रोफेसर शैलेश जैदी का आलेख-

पृष्ठभूमि

1917 की रूसी क्रांति और उस क्रांति की सफलता भारतीय जनमानस को साम्यवाद और जन सरकार का स्वप्न देखने के लिए प्रेरित करने लगी थी। इस प्रेरणा के लिए यहाँ के राजनीतिक वातावरण में एक चिंगारी और कुछ-कुछ सुलगती आग पहले से मौजूद थी। 1908 में तिलक की गिरफ्तारी के बाद मुम्बई की सूती मिलों के मजदूरों ने ऐसी शानदार हड़ताल की थी कि लेनिन ने उसका स्वागत करते हुए कहा था- “यह हड़ताल इस तथ्य का संकेत करती है कि भविष्य के इतिहास में सर्वहारा वर्ग की कितनी बड़ी भूमिका होगी।” और हुआ भी ऐसा ही। 1911-12 तक अकेले बंगाल के न्यायलय में दर्ज राजनीतिक मुक़दमों की संख्या पांच सौ से ऊपर थी। इसमें मजदूर वर्ग की भूमिका किसी से कम नहीं थी। फिर 1918 में विश्‍व युद्ध के समाप्त होते ही जहाँ एक ओर महात्मा गाँधी वाइसराय को बधाई की चिट्ठी भेज रहे थे,  वहीं दिसम्बर 1918 तक सम्पूर्ण देश मजदूर हड़ताल की लपेट में आ चुका था। जनवरी, 1919 की हड़ताल में सवा लाख मज़दूर शरीक हुए और 1920 ई  के पूर्वार्ध में दो सौ हड़तालें हुईं जिनमें पन्द्रह लाख मज़दूरों ने भाग लिया।
यह स्थिति केवल सूत मिलों में काम करने वाले मज़दूरों की ही नहीं थी। यह स्थिति उनकी भी थी जो साहित्य की मिलों में वैचारिकता के सूत से रचनाओं के वस्त्र बुन रहे थे और उन वस्त्रों में जनता की रुचि और देश की आवश्यकताओं के अनुरूप डिज़ाइन डालना चाहते थे। ऐसे डिज़ाइन जिनमें आम इनसान की ज़िंदगी मुखर हो उठे। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि रूसी क्रांति ने इक़बाल को झंझोड़ा, प्रेमचंद को उकसाया और हसरत मोहानी को आंदोलित किया। इकबाल ने एक क्रांतिकारी स्वर अख्तियार करते हुए सम्पूर्ण देश के मजदूरों को एक जुट होने की प्रेरणा दी। प्रेमचंद ने बाल्शेविक सिद्धांतों के पक्षधर होने की घोषणा की। हसरत मोहानी ने कम्युनिस्ट विचारों का न केवल स्वागत किया, बल्कि उसकी सभाओं की अध्यक्षता भी की और कम्युनिस्ट कहलाने में गर्व महसूस किया।
महात्मा गांधी ने पूर्ण स्वाधीनता की दिशा में किए जाने वाले संघर्ष को कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में जब एक वर्ष के लिए मुल्तवी कर दिया तो एक खलबली मच गई। मजदूरों और किसानों ने कांग्रेस के निर्णय के विरुद्ध ज़बरदस्त प्रदर्शन किए। स्वतंत्र साम्यवादी प्रजातांत्रिक भारत के नारे लगाए और दो घंटे तक कांग्रेस के पंडाल को अपने अधिकार में लिये रहे। अंत में नरम दल को उनकी मांग पर विचार करना पड़ा और इसका फल यह निकला कि वर्ष 1929  के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण आज़ादी का प्रस्ताव पास किया गया। ध्यान देने की बात यह है कि पूर्ण आज़ादी का ऐसा ही एक प्रस्ताव कभी एक लेखक और रचनाकार हसरत मोहानी ने भी रखा था जो अनुकूल वातावरण न होने के कारण उस समय हास्यास्पद समझा गया था और बकौल प्रेमचंद “वे अपने गुरु (तिलक) से भी चार क़दम और आगे बढ़ गए और उस समय पूर्ण आज़ादी का डंका बजाया जब कांग्रेस का गर्म-से-गर्म नेता भी पूर्ण स्वराज का नाम लेते काँपता था।”  सच तो यह है कि भारत के उर्दू लेखकों में इंक़लाब, बगावत और साम्यवाद की जो चेतना सिर उभार रही थी, हिन्दी लेखाकों में उसका लगभग अभाव था।
इसका एक कारण यह था कि खिलाफत आन्दोलन जिन दिनों उत्कर्ष पर था, खिलाफत कमेटी की एक बैठक में निर्णय लिया गया कि अपना प्रतिरोध प्रदर्शित करने की नीयत से मुसलमान बड़ी संख्या में भारत छोड़कर तुर्की, अफगानिस्तान, ताशकंद आदि देशों में चले जायें। फलस्वरूप बहुत से लोगों ने प्रवासी के रूप में रूस की सर्हदों के निकट शरण ली। इनमें से अनेक लोग साम्यवाद से प्रभावित हुए और उन्होंने इस हथियार का प्रयोग भारत की अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध करना ज़रूरी समझा। इन लोगों ने भारत लौटकर गुप्त रूप से साम्यवाद का प्रचार करना प्रारम्भ कर दिया। अनेक लोग पकड़े गए और उनके विरुद्ध कम्युनिस्ट बगावत का सबसे पहला मुक़दमा रावलपिंडी में चला। आगे चलकर वर्ष 1923 में कुछ नवयुवकों को कम्युनिस्ट होने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया और कानपुर में मुक़दमा चलाकर उन्हें कड़े दंड दिए गए। कुछ अन्य समाजवादी विचारधारा के लोग मजदूरों के दल में इस प्रकार घुल-मिल गए कि उनका पहचानना कठिन हो गया। इस प्रकार कानून से सुरक्षित रहकर वे अपने विचारों को जनता के बीच फैलाने में सफल हुए। (प्रगतिशील लेखक संघ के प्रमुख पत्र ‘नया अदब’, जनवरी-मार्च 1940,  में प्रकाशित प्रो. एजाज़ हुसैन का आलेख).
साम्यवाद का प्रभाव तेज़ी से बढ़ता रहा। किंतु इसमें तीव्रता उस समय आई जब पंडित जवाहर लाल नेहरू रूस के हालात और समाजवादी विचारों का अध्ययन करके भारत लौटे। उन्होंने जिस वैज्ञानिक समाजवाद की आवश्यकता पर बल दिया उसकी ओर प्रगतिशील बुद्धिजीवी वर्ग विशेष रूप से आकृष्ट हुआ। हिंदू महासभा और हिंदू सोशल लीग ने पंडित जी के समाजवादी विचारों का कड़ा विरोध किया,  फिर भी कांग्रेस के भीतर सोशलिस्ट विचारधारा पनपती रही और वर्ष 1935  में कांग्रेस के नेतृत्व में ही एक दल ‘कांग्रेस सोशलिस्ट’ के नाम से बना। फिर 1936 के प्रारम्भ में कांग्रेस के ही संरक्षण में विद्यार्थियों के संगठन ‘स्टूडेंट्स फेडरेशन’ की स्थापना हुई जिसके पहले सभापति मुहम्मद अली जिन्ना निर्वाचित हुए। यह संगठन अपने जन्मकाल से ही साम्यवादी दृष्टिकोण के प्रति आस्थावान था।
जहाँ राजनीतिक चिंतन क्षेत्र में तेज़ी के साथ समाजवादी विचारधारा अपना स्थान बना रही थी, वहीं साहित्य के क्षितिज पर ऐसे-ऐसे रंग स्पष्ट रूप से उभरने लगे थे जो प्रेमचंद के इस कथन की पुष्टि कर रहे थे कि ‘साहित्य राजनीति के आगे-आगे चलने वाली मशाल है।”  1932 में कुछ नए युवक साहित्यकारों ने अपनी कहानियो का संग्रह ‘अंगारे’ प्रकाशित किया। फिर क्या था, इन्क़लाबी और प्रतिरोधी विचारों का एक तूफ़ान फट पड़ा। संग्रह ज़ब्त कर लिया गया और उसके लेखकों अर्थात सज्जाद ज़हीर, अहमद अली, रशीद जहाँ और महमूदुज्ज़फर में अभिव्यक्ति के नए माध्यमों को पा लेने की बेचैनी और बढ़ गई। इकबाल, हसरत मोहानी और मुहम्मद अली जौहर की काव्य रचनाओं की गूँज फ़िज़ा में पहले से मौजूद थी- ‘उटठो मेरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दो’, ‘कब डूबेगा सरमाया-परस्ती का सफ़ीना,’ ‘जिसमें न हो इंक़लाब मौत है वो ज़िंदगी,’ ‘ जिसको तू ज़ेवर समझता है वही ज़ंजीर है, ” दहका हुआ है आतिशे-गुल से चमन तमाम।”  ‘अंगारे’ ने इस गूँज को अपने ढंग से नए शब्द दिए, यह और बात है कि इन शब्दों में अपरिपक्वता थी, जवानी का उबाल था और सरकशी के तेवर थे।
हिंदी में स्थिति इसके सर्वथा विपरीत थी। दिनकर, राम नरेश त्रिपाठी, निराला, प्रसाद, पन्त सभी नर्म दलीय नीति अपनाए हुए थे। हाँ, प्रेमचंद की प्रगतिशील चेतना इस स्थिति को देख कर भीतर ही भीतर छटपटा रही थी। 27 फरवरी, 1936 को उन्होंने उर्दू के प्रसिद्ध प्रगतिशील लेखक अख्तर हुसैन रायपूरी को लिखा था, “अगर बच गया तो ‘बीसवीं सदी’ नाम का रिसाला अपने लोगों के ख़यालात की इशाअत के लिए ज़रूर निकालूँगा। ‘हंस’ जिस लिटरेचर की इशाअत कर रहा था वह हमारा लिटरेचर नहीं है, वह तो भक्ति वाला महाजनी लिटरेचर है जो हिन्दी ज़बान में काफ़ी है। ” यही बात आगे चलकर अगस्त, 1936 में सार रूप में आनंद राव को लिखी गई, “अगर अच्छा हो गया तो यहाँ से अपना एक नया पत्र प्रगति‍शील लेखक संघ की विचारधारा के अनुसार निकालूँगा। रायपूरी वाली चिट्ठी में ‘अपने लोगों’ और ‘हमारा लिटरेचर’ जैसे शब्दों का भावार्थ राव वाली चिट्ठी से स्पष्ट हो जाता है।
अख्तर हुसैन रायपूरी 1935 में प्रकाशित ‘साहित्य और ज़िंदगी’ शीर्षक अपने लेख से प्रगतिशील लेखकों के बीच काफी चर्चा में आ चुके थे। उन्होंने इस आलेख में समयुगीन लेखकों को ज़बरदस्त चुनौती देते हुए लिखा था, “क्या तुम लेखक बनने की इच्छा रखते हो? तो अपने देश के दुखों और पीड़ाओं की कथा पर दृष्टि डालो और इसके बाद यदि तुम्हारा दिल खून नहीं हो जाता तो अपने कलम को फ़ेंक दो। उस कलम की उपयोगिता केवल यह है कि तुम्हारे चेतना-शून्य हृदय की अपवित्रता को उद्घाटि‍त करता रहे।”
प्रेमचंद हिन्दी के एक मात्र ऐसे लेखक थे जो प्रगतिशील विचारधारा के साथ एकस्वर थे।  कुछ लोग इस सन्दर्भ में निराला का नाम भी लेते हैं, किंतु जहाँ निराला ‘भिक्षु’ शीर्षक कविता में एक संक्रमणशील प्रभाव का संकेत करते हैं वहीं बकौल शिवदान सिंह चौहान, ‘‘अन्य अनेक रचनाओं में पुनरुत्थानवादी दृष्टिकोण की वकालत करते हुए मध्ययुगीन हिन्दुओं की अकर्मण्यता,  विश्वासघात और पुन्सत्वहीनता पर विलाप करते हैं।” कदाचित यही सब देख कर प्रेमचंद ने 18  मार्च, 1936 को बनारसी दास चतुर्वेदी को लिखा था, “उर्दू वालों की साहित्यिक रुचि और अंतर्दृष्टि ज़्यादा अच्छी है। वे मूल्यांकन करना जानते हैं। उनके यहाँ कविता में वही संघर्ष मिलता है जो हमें जीवन में मिलता है। हिन्दी कविता अब भी व्यक्तिवादी और निरी भावुकतापूर्ण होती है। उसमें ज़िंदगी की हरकत नहीं है। वह ज़िंदगी को उजागर नहीं करती। वह बस हताश निराश बना देती है। मैं समझ नहीं पाता कि क्यों हमारे सब कवि निराशा के दर्शन में इस तरह अभिभूत हैं। उर्दू कवि दार्शनिक है, यथार्थवादी है और आशावादी है। आधे दर्जन कवि हथौड़ा मार-मार कर मुस्लिम जाति को समता और भ्रातृत्व और जनतंत्र के नए आदर्शों में ढाल रहे हैं। मुस्लिम कवि कम्युनिस्ट होता है, यहाँ तक कि इकबाल भी।”
एक बात निश्‍चि‍त है कि उर्दू के सारे कवि भले ही कम्युनिस्ट न होते हों, किंतु युवा पीढ़ी के वे सिरफिरे लेखक निश्‍चि‍त रूप से कम्युनिस्ट थे जो 1935 में लन्दन के ‘नॉनकिंग रेस्तरां’ में बैठे हुए एक प्रगतिशील संगठन की बुनियाद रखने के लिए उसका घोषणापत्र तैयार कर रहे थे। इन युवा लेखकों के नाम थे- सज्जाद ज़हीर, मुल्कराज आनंद, ज्योति घोष, प्रमोद्सेन गुप्ता और मुहम्मद दीन तासीर और संगठन का नाम पड़ा- ‘इंडियन प्रोग्रेसिव राईटर्स एसोसिएशन’।  सज्जाद ज़हीर ने संगठन के अस्तित्व में आने के पूर्व की अपनी जिस मनःस्थिति का विवरण अपनी पुस्तक ‘यादें’ में दिया है, उसका कुछ अंश देखने योग्य है-
“हमको लंदन और पेरिस में जर्मनी से भागे, निकाले हुए मुसीबत के मारे लोग रोज़ मिलते थे। फ़ासिज़्म के अत्याचार की दर्द भरी कहानियाँ हर तरफ़ सुनाई पड़तीं। जर्मनी में स्वाधीनता प्रेमियों और कम्युनिस्टों को पूंजीवादियों के गुंडे तरह-तरह की शारीरिक यातनाएं पहुँचा रहे थे। वह भयानक तस्वीरें जिनमें जनता के प्रिय नेताओं की पीठ और कूल्हे कोड़ों के निशान से काले पड़े हुए दिखाई देते,  वह दहशतनाक घटनाएं जो समय-समय पर अखबारों में छपतीं,  उन सबने हमारे दिलो-दिमाग़ की आतंरिक शांति और संतोष को मिटा दिया था। फलस्वरूप हम धीरे-धीरे समाजवाद की ओर झुकते जा रहे थे। मार्क्स और दूसरे साम्यवादी लेखकों की पुस्तकें हमने बड़े ध्यान से पढ़ना शुरू कीं। जैसे-जैसे हम अपने अध्ययन को बढ़ाते, हमारे दिमाग़ रौशन होते और हमारे मन को शांति मिलती।”
संगठन के बनते ही उसकी पाक्षिक गोष्ठियाँ होने लगीं। एक गोष्ठी में डॉ. सुनीति कुमार चेटरजी ने भी भाग लिया। ज्योति घोष ने नज़रुल इस्लाम की इन्क़लाबी कविता पर लेख पढ़ा। मुल्कराज आनंद की कहानी ‘द ट्रोवर्स्ट’ और सज्जाद ज़हीर का नाटक ‘बीमार’ इन्हीं दिनों लिखा गया। अभी कुछ ही दिन बीते थे कि जुलाई, 1935 में ‘वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ़ द राइटर्स फार द डिफेन्स ऑफ़ कल्चर’ के नाम से हेनरी बार्बस में मैक्सिम गोर्की, रोमें रोलां, टामस मान इत्यादि ने विश्‍व के साहित्यकारों की एक कांग्रेस पेरिस में बुलाई। इस अवसर पर साहित्यकारों के नाम जो अपील प्रकाशित कराई गई उसका एक उद्धरण यहाँ देना अनुपयुक्त न होगा-
“लेखक मित्रो! हमारी क़लम,  हमारी कला,  हमारा ज्ञान उन शक्तियों के विरुद्ध रुकने न पाये जो मौत को निमंत्रण देती हैं, जो मानवता का गला घोटती हैं, जो रूपये के बल पर शासन करती हैं, और अंत में फ़ासिज़्म के विभिन्न रूप धारकर सामने आती हैं और अबोध जनता का खून चूसती हैं।”
लंदन के भारतीय युवा लेखक वैचारिक स्तर पर इस कांग्रेस से बहुत निकट से जुड़े हुए थे। सज्जाद ज़हीर, राल्फ फाक्स और लुई आर्गावां जैसे साहित्यकारों के सम्पर्क से बहुत कुछ सीख रहे थे। प्रगतिशील लेखक संघ के घोषणा-पत्र में आर्गावां जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकार के भी सुझाव सम्मिलित थे। फलस्वरूप इस घोषणा-पत्र की प्रतियाँ अनेक प्रगतिशील मित्रों को मुल्कराज आनंद, सज्जाद ज़हीर, के.एस. भट्ट, ज्योति घोष, एस. सिन्हा तथा एम्.डी. तासीर के साथ भारत भेजी गयीं। प्रेमचंद ने इस मेनिफेस्टो को ‘हंस’ के जनवरी, 1936 अंक में प्रकाशित किया।

भारत में प्रगतिशील लेखक संगठन की स्थापना

1935 के अंत तक लंदन से अपनी शिक्षा समाप्त करके सज्जाद ज़हीर भारत लौटे। यहाँ आने से पूर्व वे अलीगढ़ में डॉ. अशरफ,  इलाहबाद में अहमद अली,  मुम्बई में कन्हैया लाल मुंशी,  बनारस में प्रेमचंद,  कलकत्ता में प्रो. हीरन मुखर्जी और अमृतसर में रशीद जहाँ को मेनिफेस्टो की प्रतियाँ भेज चुके थे। इलाहबाद पहुँचने से पहले उन्होंने कन्हैयालाल मुंशी से इस विषय पर बात करना ज़रूरी समझा, किंतु थोडी देर की ही बातचीत में सज्जाद ज़हीर किस निर्णय पर पहुंचे स्वयं उन्हीं से सुनिए-
“हमें यह स्पष्ट हो गया कि कन्हैयालाल मुंशी का और हमारा दृष्टिकोण मूलतः भिन्न था। हम प्राचीन दौर के अंधविश्‍वासों और धार्मिक साम्प्रदायिकता के ज़हरीले प्रभाव को समाप्त करना चाहते थे। इसलिए कि वे साम्राज्यवाद और जागीरदारी की सैद्धांतिक बुनियादें हैं। हम अपने अतीत की गौरवपूर्ण संस्कृति से उसका मानव प्रेम, उसकी यथार्थ प्रियता और उसका सौन्दर्य तत्व लेने के पक्ष में थे, जबकि कन्हैयालाल मुंशी सोमनाथ के खंडहरों को दुबारा खड़ा करने की कोशिश में थे।”
इलाहाबाद पहुंचकर सज्जाद ज़हीर अहमद अली से मिले जो विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के प्रवक्ता थे। अहमद अली ने उन्हें प्रो. एजाज़ हुसैन,  रघुपति सहाय फिराक,  एहतिशाम हुसैन तथा विकार अजीम से मिलवाया। सबने सज्जाद ज़हीर का ज़बरदस्त समर्थन किया । शिवदान सिंह चौहान और नरेन्द्र शर्मा ने भी सहयोग का आश्‍वासन दिया। प्रो. ताराचंद और अमरनाथ झा से स्नेहपूर्ण प्रोत्साहन मिला। सौभाग्य से 12-14  जनवरी, 1936  को हिन्दुस्तानी एकेडमी का वार्षिक अधिवेशन हुआ। अनेक साहित्यकार यहाँ एकत्र हुए- सच्चिदानंद सिन्हा, डॉ. अब्दुल हक़, गंगा नाथ झा, जोश मलीहाबादी, प्रेमचंद, रशीद जहाँ, अब्दुस्सत्तार सिद्दीकी इत्यादि।
सज्जाद ज़हीर ने प्रेमचंद के साथ कुछ लोगों को अपने घर चाय पर आमंत्रित किया और प्रगतिशील संगठन के मेनिफेस्टो पर खुलकर बातचीत की। सभी ने मेनिफेस्टो पर हस्ताक्षर कर दिए। फिर क्या था, अहमद अली के घर को लेखक संगठन का कार्यालय बना दिया गया। पत्र-व्यव्हार की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। सज्जाद ज़हीर पंजाब के दौरे पर निकल पड़े। इस बीच अलीगढ़ में सज्जाद ज़हीर के मित्रों- डॉ. अशरफ,  अली सरदार जाफरी,  डॉ. अब्दुल अलीम, जाँनिसार अख्तर आदि ने स्थानीय प्रगतिशील लेखकों का एक जलसा ख्वाजा मंज़ूर अहमद के मकान पर फरवरी, 1936 में कर डाला। अलीगढ में उन दिनों साम्यवाद का बेहद ज़ोर था। वहां की अंजुमन के लगभग सभी सदस्य साम्यवादी थे और पार्टी के सक्रि‍य सदस्य भी।

प्रथम अखिल भारतीय अधिवेशन: लखनऊ 1936

देखते-देखते सम्पूर्ण देश में प्रगतिशील लेखक संगठन की शाखाएँ फैलने लगीं। किंतु संगठन के प्रति हिन्दी लेखकों के उत्साह में कोई गर्मी नहीं आई। 9-10 अप्रैल, 1936 को प्रेमचंद की अध्यक्षता में होने वाले लखनऊ अधिवेशन में हिन्दी लेखकों की कोई भूमिका नहीं थी। वे एक तटस्थ दर्शक मात्र थे। वह भी सभा में शामिल होकर नहीं, केवल घर बैठे-बैठे। रामविलास शर्मा और निराला दोनों ही उस समय लखनऊ में थे, किंतु सम्मेलन में कोई शरीक नहीं हुआ। प्रेमचंद, जैनेन्द्र को अपने साथ खींच ज़रूर ले गए, किंतु जैनेन्द्र की सोच संगठन की सोच से मेल नहीं खाती थी।  सज्जाद ज़हीर ने अपनी पुस्तक रोशनाई में जैनेन्द्र पर जो टिप्पणी की है वह देखने योग्य है। हाँ, प्रेमचंद का अध्यक्षीय भाषण जो उर्दू में लिखा और पढ़ा गया था आगे चलकर जब हिन्दी में रूपांतरित हुआ तो हिन्दी लेखकों की प्रेरणा का स्रोत अवश्य बन गया। लखनऊ अधिवेशन में कई आलेख पढ़े गए जिनमें अहमद अली,  रघुपति सहाय, मह्मूदुज्ज़फर और हीरन मुखर्जी के नाम उल्लेख्य हैं। गुजरात, महाराष्ट्र और मद्रास के प्रतिनिधियों ने केवल भाषण दिए। प्रेमचंद के बाद सबसे महत्वपूर्ण वक्तव्य हसरत मोहानी का था।
हसरत ने खुले शब्दों में साम्यवाद की वकालत करते हुए कहा, “हमारे साहित्य को स्वाधीनता आन्दोलन की सशक्त अभि‍व्‍यक्‍ति‍ करनी चाहिए और साम्राज्यवादी, अत्याचारी तथा आक्रामक पूंजीपतियों का विरोध करना चाहिए। उसे मजदूरों, किसानों और सम्पूर्ण पीड़ित जनता का पक्षधर होना चाहिए। उसमें जन सामान्य के दुःख-सुख, उनकी इच्छाओं-आकांक्षाओं को इस प्रकार व्यक्त करना चाहिए कि इससे उनकी इन्क़लाबी शक्तियों को बल मिले और वह एकजुट और संगठित होकर अपने संघर्ष को सफल बना सकें। केवल प्रगतिशीलता पर्याप्त नहीं है। नए साहित्य को समाजवाद और कम्युनिज्म का भी प्रचार करना चाहिए।”
अधिवेशन के दूसरे दिन संध्या की गोष्ठी में जयप्रकाश नारायण, यूसुफ मेहर अली, इन्दुलाल याज्ञिक, कमलादेवी चट्टोपाध्याय आदि भी सम्मिलित हो गए थे। इस अवसर पर संगठन का एक संविधान भी स्वीकार किया गया और सज्जाद ज़हीर को संगठन का प्रधान मंत्री निर्वाचित किया गया।

विरोध के स्वर और संगठन का विस्तार

ब्रिटिश सरकार ने लखनऊ अधिवेशन में पारित प्रस्तावों को राजनीतिक ठहराया और लेखक संगठन के संकल्पों में खतरे की गंध महसूस की। कलकत्ता के अंग्रेज़ी अखबार ‘स्टेट्समैन’ ने संगठन के विरुद्ध जी भर कर ज़हर उगला। हिन्दी के लेखक वैसे भी किसी जोखिम में पड़ने से बचते थे । सरकार का कड़ा रुख देखकर और भी सतर्क हो गए। खतरों से दूर रहते हुए,  उपलब्धियों में यदि भागीदारी मिल जाय  तो इससे अच्छा क्या हो सकता है।  स्थिति यह हो गई थी कि संगठन की छोटी-छोटी गोष्ठियों में भी खुफिया पुलिस के एजेंट जहाँ-तहाँ दिखाई दे जाते थे। प्रचार यह किया जा रहा था कि इस आन्दोलन के पीछे ‘कम्युनिस्ट इंटरनेशनल’ का हाथ है जो कुछ भारतीय कम्युनिस्ट छात्रों के माध्यम से यहाँ के बुद्धिजीवियों में अपना जाल बिछाना चाहता है। इन बातों का प्रभाव इस हद तक पड़ा कि इलाहाबाद की गोष्ठियाँ,  जो अमरनाथ झा के पुस्तकालय में होती थीं,  उनके संकेत पर वहां होना बंद हो गयीं। इतना ही नहीं, सज्जाद ज़हीर को अख़बार में यह भी बयान देना पड़ा कि संगठन के मेनिफेस्टो पर हस्ताक्षर करने वालों में अमरनाथ झा का नाम भूल से छप गया है। फिर भी जो लोग संगठन के लिए पूर्णतः प्रतिबद्ध थे, वे निरंतर सक्रिय रहे।
दिल्ली में संगठन की एक शाखा कायम हुई जिसके मंत्री अख्तर हुसैन रायपूरी घोषित किए गए। ’साकी’ के सम्पादक शाहिद अहमद ने ‘शाहजहाँ’ पत्रिका को संगठन की मुख्य आवाज़ बना दिया।  6 अगस्‍त, 1936 को दिल्ली शाखा ने गोर्की दिवस मनाया जिसमें डॉ  आबिद हुसैन, रामचंद्र वर्मा, अंसार नासिरी, लक्ष्मीचंद्र जैन, मुमताज़ हुसैन और शाहिद अहमद आदि ने भाग लिया। दिल्ली शाखा में पढ़े जाने वाले लेखों को पुस्तक रूप में भी प्रकाशित किया गया।
कानपुर शाखा की गोष्ठियाँ हसरत मोहानी की अध्यक्षता में निरंतर चलती रहीं। लाहौर में सूफी तबस्सुम, फैज़ अहमद फैज़ तथा प्रो. सोमनाथ क्रमशः मंत्री बने। पटना में प्रेमचंद के प्रभाव से जो शाखा अस्तित्व में आई उसके अध्यक्ष रामवृक्ष बेनीपुरी बनाये गए। 1 दिसम्बर, 1936 की प्रथम गोष्ठी में रघुवंश नारायण सिंह ने ‘हिन्दी साहित्य की ज़रूरतें’ शीर्षक लेख पढ़ा। संगठन के मंच से हिन्दी में पढ़ा जाने वाला यह पहला लेख था। कलकत्ता और आसाम में भी संगठन की अनेक शाखाएं बनीं। कलकत्ता के लोकप्रिय अख़बार ‘आनंद बाज़ार पत्रिका’ में गोष्ठियों में दिये गए वक्तव्य मुख पृष्ठ पर छपते थे।  इस पत्र के संपादक सत्येन्द्रनाथ प्रगतिशील संगठन के सक्रिय सदस्य थे। 1 नवम्बर, 1936 को  लाहौर संगठन ने प्रेमचंद दिवस का आयोजन किया। इस अवसर पर आगा अब्दुलहमीद और इन्द्रनाथ मदान ने प्रेमचंद के साहित्यिक योगदान पर अपने आलेख पढ़े। अंत में रशीद जहाँ ने प्रेमचंद के विशाल अद्भुत व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। फरवरी, 1937 तक लायलपूर और मुल्तान में भी संगठन की शाखाएँ स्थापित हो चुकी थीं।
वस्तुस्थिति यह थी कि जहाँ एक ओर प्रगतिशील लेखक संगठन की गतिविधियाँ ज़ोर पकड़ रही थीं, वहीं दूसरी ओर चूँकि कम्युनिस्ट पार्टी पर पाबन्दी लगाई जा चुकी थी और प्रगतिशील लेखक संगठन साम्राज्य विरोधी माना जाने लगा था, अनेक ऐसे छात्र जो सरकारी मुक़ाबलों की परीक्षा में बैठ रहे थे, दूरदर्शिता से काम लेते हुए, संगठन की हवा के स्पर्श से भी बचने लगे। कुछ ऐसे लोग भी थे जो गोष्ठियों में तो आते थे, पर सदस्य बनना स्वीकार नहीं करते थे।  दबे-दबे स्वर में यह आवाज़ उठाई जाती थी कि प्रगतिशील संगठन एक साहित्यिक संस्था है, इसे राजनीति से अलग रहना चाहिए । यह रुझान अधिकतर हिन्दी लेखकों का था। वैसे भी बकौल रामबिलास शर्मा, “स्वाधीनता आन्दोलन के काल में जनता के जागरण में जो साहित्य की भूमिका है उसके प्रति हिन्दी में बहुत कुछ उपेक्षा का भाव रहा है।”  प्रेमचंद ने इस स्थिति को कुछ दूसरे ढंग से देखा था। उन्होंने 10 मई,  1936 के पत्र में सज्जाद ज़हीर को लिखा था, “हिन्दी वाले हीन-ग्रंथियों से मजबूर हैं। उनका कहीं ऐसा विचार तो नहीं है कि यह आन्दोलन उर्दू वालों ने उन्हें फंसाने के लिए चलाया है। अभी तक उनकी समझ में इसका मतलब ही नहीं आया है।” प्रेमचंद यह ‘मतलब’ बार-बार समझाने का प्रयास करते रहे और उन्होंने हिन्दी लेखकों की संस्था ‘हिन्दी लेखक संघ’ के सदस्यों का ध्यान भी प्रगतिशील लेखक संगठन के उद्देश्यों की ओर खींचना चाहा, किंतु उन्हें कोई सफलता नहीं मिली। उर्दू लेखक जिस प्रकार पी. डब्ल्यू.ए. के बैनर के नीचे देश भर में अपने संगठन चला रहे थे, हिन्दी लेखक इस नाम से कतराने में ही अपनी भलाई देख रहे थे। प्रगतिवाद के सैद्धांतिक पक्ष पर उनमें बहसें ज़रूर होती थीं,  किंतु कार्य-क्षेत्र में उतर पाना उनके लिए सम्भव नहीं था। दूसरी ओर सज्जाद ज़हीर और उनके सहयोगियों को जिद थी कि जबतक उर्दू-हिन्दी लेखक एकजुट होकर काम नहीं करेंगे इस आन्दोलन को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकेगी। उनका विश्‍वास था कि जिस आन्दोलन को प्रेमचंद,  डॉ. अब्दुल हक,  हसरत मोहानी, सरोजिनी नाइडू,  जोश मलीहाबादी, आचार्य नरेन्द्र देव, हीरन मुखर्जी,  डॉ.आबिद हुसैन जैसी जानी-मानी विभूतियों की सहानुभूति प्राप्त हो वह कभी शिथिल नहीं पड़ सकता।
उल्लेख्य बात यह थी कि प्रगतिशील लेखक संगठन के अधिकतर सक्रिय सदस्य कम्युनिस्ट पार्टी, कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी, स्टूडेंट्स फेडरेशन, किसान सभा और मजदूर यूनियन में से किसी-न-किसी के सदस्य अवश्य थे। इसी बुनियाद पर संगठन के विरोधियों को जवाब देते हुए सज्जाद ज़हीर ने कहा था, “संगठन का मूल उद्देश्य प्रगतिशील साहित्य का सर्जन और प्रचार है, न कि राजनीतिक अमल। किंतु इसका यह अर्थ नहीं कि प्रतिक्रियावादी शासकों की धमकियों और सख्तियों से डरकर प्रगतिशील साहित्यकार और उनका संगठन अपना स्वतंत्र राजनीतिक दृष्टिकोण रखना और उसे व्यक्त करना छोड़ दे या संगठन के ऐसे सदस्य जो राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ता हैं और साहित्यकार होने के अतिरिक्त उनकी एक अन्य राजनीतिक हैसियत भी है, संगठन से अलग हो जाँयें?

अमृतसर अधिवेशन

1937 की गर्मियों के प्रारम्भ में ‘पंजाब किसान सभा’ का वार्षिक जलसा अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ में हुआ।  वहाँ सज्जाद ज़हीर और डॉ. अशरफ को भी आमंत्रित किया गया। अवसर का लाभ उठाकर प्रगतिशील लेखकों ने भी अपना एक सम्मेलन कर डाला। यह सम्मेलन किसान सभा के ही पंडाल में किया गया- किसानों के बीच धंसकर, उनकी साँसों को अपनी साँसों में शामिल करके।  इस सम्मेलन के समायोजन की सम्पूर्ण ज़िम्मेदारी फैज़ अहमद फैज़ की थी जो उन दिनों संगठन की अमृतसर शाखा के मंत्री थे। इस सम्मेलन में उर्दू और पंजाबी के जिन साहित्यकारों ने भाग लिया उनमें सज्जाद ज़हीर, डॉ.अशरफ, फैज़ अहमद फैज़ के अतिरिक्त चिराग हसन ‘हसरत’, टीकाराम ‘सुखन,’  डॉ. तासीर,  प्रो. संत सिंह,  फीरोज़ुद्दीन मंसूर, प्रो. रघुवंश कुमार और रघुपति चोपडा के नाम विशेष उल्लेख्य हैं।

इलाहाबाद अधिवेशन: 1937

सज्जाद ज़हीर देख रहे थे कि हिन्दी-उर्दू विवाद निरंतर ज़ोर पकड़ता जा रहा था और हिन्दी-उर्दू लेखकों के मध्य की दूरियां गहराती जा रही थीं। वे इस दूरी को कम करने के लिए बराबर प्रयत्नशील रहे। उनका विश्‍वास था कि जिस मंजिल की ओर प्रगतिशील लेखकों को बढ़ना है उसमें परस्पर सहयोग आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है। इसी विश्‍वास के साथ उन्होंने हिन्दी-उर्दू लेखकों का एक मिला-जुला अधिवेशन 1937 में ही करने का निश्‍चय किया । परिस्थितियां प्रतिकूल होने के बावजूद सज्जाद ज़हीर को ऐसे सहयोगी मिलते गए जिन्होंने योजना को सफल बनाने की सशक्त भागीदारी निभाई।
श्रीमती श्याम कुमारी नेहरू के आश्‍वासन, प्रयास और भाग- दौड़ के फलस्वरूप 1937 का इलाहाबाद अधिवेशन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। श्रीमती नेहरू स्वदेशी अंजुमन की सेक्रेटरी थीं।  हिन्दी लेखकों को अधिक से अधिक जोड़ने के विचार से पाँच अध्यक्ष चुने गए जो अलग-अलग सत्रों का सफल संयोजन करा सकें। इस अधिवेशन में आचार्य नरेन्द्र देव का अध्यक्षीय वक्तव्य विशेष उल्लेख्य था। डॉ. अब्दुल हक का भाषण क्रांतिकारी और ठोस होते हुए भी अपना वह प्रभाव नहीं बना सका जिसकी अपेक्षा की जाती थी। कारण कदाचित यह था कि प्रगतिशील लेखकों का मन उनकी ओर से बहुत साफ नहीं था। पं. रामनरेश त्रिपाठी का अध्यक्षीय भाषण निष्प्राण और फुसफुसा था। इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के छात्रों की बड़ी संख्या में उपस्थिति ने अधिवेशन में प्राण फूँक दिए थे।  हिन्दी के जिन लेखकों ने विभिन्न सत्रों में आलेख पढ़े उनमें शिवदान सिंह चौहान,  नरेन्द्र शर्मा,  रमेशचंद्र सिन्हा और ओमप्रकाश सिंघल के आलेख विशेष चर्चा में रहे। शिवदान सिंह चौहान के आलेख का शीर्षक था- ‘भारत में प्रगतिशील साहित्य की आवश्यकता’। यह आलेख आज भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।

इलाहाबाद अधिवेशन: 1938

ठीक एक वर्ष बाद 1938 में उर्दू-हिन्दी के प्रगतिशील लेखकों का दूसरा अधिवेशन स्वदेशी के नुमाइश पंडाल में हुआ। उन दिनों पं. विश्वम्भर नाथ पांडेय इलाहाबाद शाखा के मंत्री थे।  यह अधिवेशन 1937 की अपेक्षा कहीं अधिक सफल था।  विभिन्न विभागों के अध्यक्ष मंडल में जिन लोगों के नाम चयनित किए गए उनमें सुमित्रानंदन पन्त,  आनंद नरायन मुल्ला, जोश मलीहाबादी विशेष उल्लेख्य हैं।  मुख्य अतिथियों में पं. जवाहर लाल नेहरू,  बाबा साहब कालेकर तथा मैथिलीशरण गुप्त भी थे। इस अवसर पर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भी प्रगतिशील लेखकों के नाम अपना एक संदेश भेजा था जिसे पढ़कर सुनाया गया।
हिन्दी/उर्दू लेखकों की भागीदारी में कुछ नए नाम भी जुड़े थे।  जैनेन्द्र, रामवृक्ष बेनीपुरी, अमृत राय, रमेशचंद्र सिन्हा,  सुरेन्द्र बालूपुरी,  नरेन्द्र शर्मा,  मजाज़ लखनवी,  अली सरदार जाफ़री, रघुपति सहाय फिराक, जोश मलीहाबादी,  डॉ.अब्दुल अलीम,  प्रो. एजाज़ हुसैन,  डॉ. अशरफ,  प्रो. एहतिशाम हुसैन, प्रो.विकार अजीम आदि सभी जाने-माने लेखक एक मंच पर एकत्र थे।
डॉ. अब्दुल अलीम के आलेख पर जमकर वाद-विवाद हुआ और कुछ कड़वाहटें भी पैदा हुईं।  डॉ. अलीम चाहते थे कि हिन्दी और उर्दू के लेखक रोमन लिपि स्वीकार कर लें। इस प्रसंग में अधिवेशन के कुछ निमंत्रण-पत्र और विज्ञापन भी रोमन लिपि में छपवाए गए थे।  काका कालेलकर की प्रतिक्रिया बहुत तीव्र थी उनहोंने आक्रोश भरे स्वर में कहा, “मैं प्रगतिशील लेखक संघ से सहानुभूति अवश्य रखता हूँ किंतु यदि लेखक संघ ने रोमन लिपि के प्रस्ताव को अपना लिया तो उस स्थिति में मैं पूरे आन्दोलन का विरोध करूंगा।” सज्जाद ज़हीर ने किसी प्रकार बीच-बचाव किया और उन्हें कहना पड़ा कि रोमन लिपि के सुझाव का संगठन की नीति से कोई सम्बन्ध नहीं है।

पं. जवाहर लाल नेहरू का भाषण

प्रगतितिशील लेखकों के सम्मेलन में जवाहर लाल नेहरू का सम्मिलित होना, एक असाधारण घटना थी। किंतु इससे इतना संकेत तो मिलता ही है कि देश की राजनीति से जुड़े शिखर के नेता भी उनदिनों साहित्य की गतिविधियों में रूचि रखते थे और उसकी समृद्धि और प्रोत्साहन में अपनी भागीदारी के इच्छुक थे। उनमें साहित्यकारों के प्रति एक आदर भाव था।  पंडित नेहरू ने अपने भाषण में कहा, “कलाकार और साहित्यकार की एक अलग पहचान होती है और जिसमें यह पहचान नहीं है, मैं उसे कलाकार नहीं कह सकता। पर उसकी पृथक पहचान यदि ऐसी है कि वह समाज से अलग है और जो चीज़ें समाज को हिलाती हैं, उनसे प्रभावित नहीं होता,  तो उस साहित्यकार की कोई उपयोगिता नहीं है। यह पहचान यदि विकसित हो सकती है तो केवल समाज के समाजवादी ढाँचे में। यह कहना कि समाजवाद आकर हमारी पृथक पहचान को मिटा देगा, सर्वथा ग़लत है। आने वाले इंक़लाब के लिए देश को तैयार करना साहित्यकार की ज़िम्मेदारी है। आप जन-सामान्य कि समस्याओं का समाधान कीजिए, उनको रास्ता बताइये, लेकिन आपकी बात उनके दिल में उतर जानी चाहिए। प्रगतिशील लेखक संघ एक बड़ी ज़रूरत को पूरी करता है और उस से हमें बड़ी आशाएं हैं।”
पंडित नेहरू के भाषण का एक लाभ यह अवश्य हुआ कि वे लोग जो नेहरू जी के प्रति श्रद्धा रखते थे और प्रगतिशील सम्मेलनों में भाग लेने से कतराते थे, अब इस संस्था के लिए पर्याप्त नर्म पड़ गए।

रवीन्द्र नाथ टैगोर का संदेश

टैगोर ने अपना जो संदेश प्रगतिशील संगठन के पास भेजा वह इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है कि उसमें जहाँ एक ओर आत्मालोचन किया गया है, वहीं दूसरी ओर समय की आवश्यकताओं को समझने-समझाने का सोचा-समझा प्रयास भी मौजूद है। टैगोर ने संदेश में लिखा था, “… एकांत-प्रियता मेरा स्वभाव बन गया है, किंतु यह एक वास्तविकता है कि समाज से कटा हुआ साहित्यकार मानव-प्रकृति से परिचित नहीं हो सकता। समाज को जानने-पहचानने के लिए और उसके विकास मार्ग का पता देने के लिए ज़रूरी है कि हमारा हाथ समाज की नाड़ी पर हो और हम उसके दिल की धडकनों को सुनें… साहित्यकार का कर्तव्य यह होना चाहिए कि वह देश में नयी ज़िंदगी की रूह फूँके, जागरण और जोश के गीत गाये… देश,  समाज और साहित्य की भलाई की सौगंध जब तक हर व्यक्ति नहीं खायेगा,  उस समय तक संसार का भविष्य प्रकाशमय नहीं हो सकता। यदि तुम यह कहने के लिए तैयार हो,  तो तुम्हें अपनी दौलत खुले हाथों लुटानी होगी और फिर कहीं तुम इस योग्य हो सकोगे कि संसार से किसी पारिश्रमिक की आशा करो।”

द्वितीय अखिल भारतीय अधिवेशन: कोलकाता, 1938

कोलकाता अधिवेशन के स्वागताध्यक्ष सुधेन्दुनाथ दत्त थे।  वह बंगाली प्रगतिशील मासिक ‘छाया’ के संपादक थे। कोलकाता का अखिल भारतीय अधिवेशन दिसम्बर, 1938 के अंत में संपन्न हुआ। अध्यक्षता के लिए मुल्कराज आनंद का नाम चुना गया।  अन्य सभासदों में हीरन मुखर्जी, प्रमथ बेनर्जी, बुद्धिदेव बोस, ताराशंकर बेनर्जी, मानिक बेनर्जी, अली सरदार जाफ़री, मजाज़ लखनवी, बलराज साहनी, डॉ. अब्दुल अलीम, रजिया सज्जाद ज़हीर, कृश्‍न चंदर, श्रीमती दमयंती के अतिरिक्त बिहार, आसाम, उडीसा और तमिलनाडु के साहित्यकारों के प्रतिनिधि थे। इस अधिवेशन में संगठन के संविधान में अपेक्षित परिवर्तन भी किए गये।  अंग्रेज़ी पत्रिका ‘न्यू इंडियन लिटरेचर’ के प्रकाशन की अनुमति भी प्राप्त की गई और उसके संपादन का दायित्व आनंद नरायन मुल्ला, डॉ. अब्दुल अलीम तथा अहमद अली को सौंपा गया। एक और बड़ा परिवर्तन यह हुआ कि सज्जाद ज़हीर के स्थान पर डॉ. अब्दुल अलीम संगठन के नए मंत्री चुने गये।

फरीदाबाद सम्मेलन और अन्य गतिविधियाँ

प्रगतिशील लेखक संगठन के सक्रिय सदस्य और किसान कवि सैयद मुत्तलबी के सुझाव पर जून, 1938 में अपने ढंग का एक अदभुत सम्मेलन फरीदाबाद में किया गया। यह फरीदाबाद के देहाती कवियों का सम्मेलन था। इसमें सैयद मुत्तलबी ने मथुरा,  गुडगाँव, रोहतक और दिल्ली तथा उसके आस-पास के ऐसे ग्रामीण कवियों को एकत्र किया था, जो किसान आन्दोलन से जुड़े हुए थे। मथुरा के हकीम ब्रजलाल तथा दिल्ली के भालसिंह ने इस आयोजन को सफल बनाने में पूरा सहयोग दिया। विशेष महत्व की बात यह थी की इस सम्मेलन में कृषक कवियों द्वारा जो भी कविताएं पढ़ी गयीं, वे सब अपने विषय की दृष्टि से समकालीन राजनीतिक, सामाजिक स्थितियों से जुड़ी हुई थीं।  अहमद अली ने इस सम्मेलन की एक विस्तृत रिपोर्ट अंग्रेज़ी में तैयार करके मद्रास के एक प्रगतिशील मासिक ‘न्यू एरा’ में छपवाई।  इस रिपोर्ट की एक विशेषता यह थी कि इसमें ग्रामीण रचनाओं के उद्धरण भी दिए गए थे। रजनी पामदत्त ने इसी के आधार पर अपनी पुस्तक ‘न्यू इंडिया’ के एक अध्याय का प्रारम्भ ग्रामीण कवि स्वातिकी शर्मा की एक रचना से किया था।
1938 में आनंद नरायन मुल्ला के लंदन से वापस आने पर सज्जाद ज़हीर और उनके साथियों को विशेष बल मिला।  प्रेमचंद, जयप्रकाश नारायण से बात करके सज्जाद ज़हीर के सामने अपनी यह इच्छा व्यक्त कर चुके थे कि संगठन की ओर से अंग्रेज़ी और उर्दू में पत्रिकाएँ निकाली जायें। प्रेमचंद के अध्यक्षीय भाषण का अंग्रेज़ी अनुवाद संगठन का मेनिफेस्टो, प्रथम अखिल भारतीय अधिवेशन के प्रस्ताव और संगठन में पढे जाने वाले महत्वपूर्ण आलेखों को एकत्र करके केन्द्रीय आयोग ने जब ‘टूवर्ड्स प्रोग्रेसिव लिटरेचर’ शीर्षक पुस्तक सितम्बर, 1936 में प्रकाशित की, प्रेमचंद अपनी बीमारी की हालत में भी उसे देखकर, खुशी से उछल पड़े। अब प्रेमचंद नहीं थे, पर उनका आशीर्वाद प्रगतिशील लेखक संगठन के साथ था।
अप्रैल, 1939 में मुल्कराज आनंद के सम्पादन में ‘न्यू इंडियन लिटरेचर’ का प्रथम अंक प्रकाशित हुआ। इलाहबाद लॉ जरनल प्रेस से प्रकाशित होने के कारण इसकी छपाई और सज्जा बड़ी सुंदर और आकर्षक थी। इस अंक में कुल चार आलेख थे। एक सुधेन्दुनाथ दत्त का, दूसरा डॉ. अब्दुल अलीम का, तीसरा मुल्कराज आनंद का और चौथा डी.पी. मुखर्जी का। डॉ.  आनंद का आलेख प्रगतिशील लेखक आन्दोलन के मूलभूत सिद्धांतों, रचनाकारों के दायित्व और समाजवाद की समझ से जुड़ा होने के कारण पर्याप्त महत्त्वपूर्ण था। इसके अतिरिक्त प्रेमचंद की विशेष चर्चित कहानी ‘कफ़न’ का अंग्रेज़ी अनुवाद, जिसे अहमद अली ने बड़ी लगन से किया था, इस अंक को और भी महत्त्वपूर्ण बना रहा था। इसी समय अर्थात अप्रैल, 1939 में ‘नया अदब’ उर्दू मासिक का पहला अंक भी प्रकाशित हुआ। इसके संपादक मंडल में सिब्ते हसन, अली सरदार जाफरी और मजाज़ लखनवी शामिल थे। बाद में जोश मलीहाबादी भी इस से जुड़ गए। काश प्रेमचंद यह सब कुछ अपनी आंखों से देख पाते।

तृतीय अखिल भारतीय अधिवेशन: दिल्ली, 1922

जून, 1941 में हिटलर ने सोवियत संघ पर आक्रमण कर दिया. भारतीय जन-मानस पर इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। वैसे तो सामान्य जनता की चिंताएं कुछ कम नहीं थीं, किंतु भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों में विशेष खलबली थी। पार्टी के अधिकतर सदस्य गिरफ्तार किए जा चुके थे जिस से भावी योजनाओं का कोई स्वरूप स्पष्ट नहीं हो पा रहा था। 1941 के अंत तक आते-आते ब्रिटिश सरकार ने अपनी नीतियों में जब थोड़ा परिवर्तन किया और कांग्रेस के नेता जेलों से छोड़े जाने लगे, स्थितियां पहले की अपेक्षा अधिक साफ हुईं। मार्च, 1942 में, पूरे दो वर्ष बाद, सज्जाद ज़हीर जेल से बाहर आए । उन्हें संगठन की सोई हुई नाड़ी में फिर से प्राण फूंकने की आवश्यकता महसूस हुई।
सज्जाद ज़हीर के मार्गदर्शन में डॉ. अब्दुल अलीम, अली सरदार जाफरी, शिवदान सिंह चौहान, सिब्ते हसन और उनके अन्य मित्रों ने एकजुट होकर परिस्थितियों पर विचार किया और यह निश्‍चय पाया कि प्रगतिशील लेखकों का शीघ्र ही अखिल भारतीय अधिवेशन बुलाया जाये और युद्ध से उत्पन्न नई स्थितियों पर विचार करके, संगठन की एक नीति सुनि‍श्‍चि‍त की जाये। मार्च के अन्तिम सप्ताह में सज्जाद ज़हीर दिल्ली गए।  वहां मजाज़ लखनवी, हार्डिंग लाइब्रेरी में असिस्टेंट लाइबरेरियन थे।  उपेन्द्र नाथ अश्क,  कृश्‍न चंदर और सआदत हसन मंटो आकाशवाणी में काम कर रहे थे।  सरकारी मुलाज़मत में इन प्रगतिशील लेखकों को देख कर सज्जाद ज़हीर को ज़बरदस्त धक्का लगा। दिल्ली में सज्जाद ज़हीर की भेंट भदंत आनंद कौशल्यायन से भी हुई। निश्‍चय हुआ कि अधिवेशन दिल्ली में ही किया जाये।
संगठन का तीसरा अखिल भारतीय अधिवेशन अप्रैल, 1942 में दिल्ली के हार्डिंग हाल में संपन्न हुआ। इसमें अधिकतर उर्दू लेखक ही सम्मिलित हुए। शिवदान सिंह चौहान और आनंद कौशल्यायन की उपस्थिति के बावजूद हिन्दी के वे लेखक जिन्हें आज प्रगतिशील कहा और माना जाता है, संगठन से दूर ही दूर रहे। सच पूछा जाये तो इस अधिवेशन को किसी दृष्टि से भी सफल नहीं कहा जा सकता। हाँ, इसका इतना महत्त्व अवश्य है कि इसमें सर्व-सम्मति से युद्ध के विरुद्ध प्रस्ताव पारित किया गया। प्रस्ताव में कहा गया कि “हम प्रगतिशील लेखकों की सहानुभूति एकता-प्रिय देशों के साथ है और हम अपने कलम और अपने प्रभाव को प्रजातांत्रिक प्रयासों की हिमायत के लिए इस्तेमाल करेंगे और देश को फासिज्म के खतरे से सतर्क करेंगे। हम ब्रिटिश सरकार के इस रवैये की कड़ी निंदा करते हैं कि ऐसी विकट स्थिति में भी वह हमारी मातृभूमि को स्वतंत्र करने के लिए तैयार नहीं है।”
स्टेट्समैन में इस अधिवेशन के प्रस्ताव का खूब प्रचार किया गया और वही अख़बार जो अभी कल तक प्रगतिशील लेखक संगठन का विरोधी था उसे अब सोवियत रूस और कम्युनिज्म की अच्छाइयाँ भी दिखाई देने लगी थीं। हवा का रुख बदल रहा था और ‘अंग्रेजो भारत छोडो’ की गूँज से दबे-दबे और दूर-दूर रहने वाले लेखकों का मन भी संगठन से जुड़ने के लिए भुर्भुराने लगा था।

चौथा अखिल भारतीय अधिवेशन: मुम्बई,1945

जून, 1942 में सज्जाद ज़हीर और अली सरदार जाफरी एक मार्क्सवादी साप्ताहिक के संपादन के लिए मुम्बई आ गए। वहां ख्वाजा अहमद अब्बास पहले से मौजूद थे। उनका आवास साहित्य- चर्चा का केन्द्र बन गया। हिन्दी, गुजराती, मराठी, कन्नड़, और मलयालम भाषाओं के साहित्यकार एक स्थान पर एकत्र होकर वौचारिक आदान-प्रदान करने लगे। यह कार्य उत्तर प्रदेश के किसी भी शहर में अभी तक सम्भव नहीं हो पाया था। तमाम प्रयास के बावजूद हिन्दी लेखक उर्दू लेखकों के साथ बैठकर रोज़मर्रा की ज़िंदगी में वैचारिक आदान-प्रदान के लिए आमादा नहीं थे। मुम्बई की शाखा अन्य शाखाओं से हर दृष्टि से अलग थी। वहाँ मामा वरेरकर थे, वाकुलेश थे, नरेन्द्र शर्मा और नरेन्द्र सिन्हा थे, अख्तरुल ईमान और महेन्द्र नाथ थे, मजाज़ लखनवी और कृश्‍न चंदर थे, और कुछ ही समय बाद, जोश मलीहाबादी तथा साग़र निज़ामी भी इस जमावड़े का हिस्सा बन चुके थे। वहाँ की शाखा ने सुभद्राकुमारी चौहान, उदयशंकर, ई. एम्. फोस्टर और डी. पी. मुखर्जी के सम्मान में सभाएं आयोजित कीं, मुम्बई के मराठी मजदूरों की लोक-कविता ‘पवांड़ा’ की गोष्ठियों का आनंद लिया, जिसमें मजदूरों की स्थिति, उनके संघर्ष, मजदूर आन्दोलन और रूस की साम्यवादी सरकार की गतिविधियों का विवेचन किया गया था।
चौथे अखिल भारतीय अधिवेशन के अध्यक्ष मंडल के लिए जोश मलीहाबादी (उर्दू), पं. राहुल सांकृत्यायन (हिन्दी) सत्येन मजुमदार (बंगाली), एम्.ए. डांगे (मराठी), और पेचाइया (तेलुगू) के नाम चुने गए। डांगे का नाम प्रस्तावित होने पर सज्जाद ज़हीर को आश्‍चर्य हुआ। वह उन्हें एक सशक्त साम्यवादी नेता के रूप में जानते थे। वैसे भी उनकी गणना मजदूर आन्दोलन की नींव रखने वाले की हैसियत से की जाती थी। यह जानकर आश्‍चर्य का होना स्वाभाविक था कि वे मराठी भाषा के एक प्रसिद्ध साहित्यकार, विद्वान् एवं इतिहासज्ञ भी हैं। डांगे ने अपना अध्यक्षीय भाषण मराठी भाषा और साहित्य के विकास पर अंग्रेज़ी भाषा में दिया था। यह भाषण मुम्बई अधिवेशन की उपलब्धि था। बाद में यह एक पुस्तिका के रूप में भी प्रकाशित हुआ।
इस अधिवेशन में सबसे महत्त्वपूर्ण वह घोषणा-पत्र था जिसमें युद्ध से उत्पन्न परिस्थितियों के प्रकाश में देश के साहित्यकारों के कर्तव्य एवं दायित्व का सामान्य रूप से और प्रगतिशील लेखकों के कर्तव्यों का विशेष रूप से निर्धारण किया गया था और स्पष्ट रूप से यह कहा गया था कि इन परिस्थितियों में लेखकों को एक संयुक्त मोर्चा बनाना ज़रूरी है।  इस प्रकार यदि देखा जाये तो देश में संयुक्त मोर्चा बनाने का विचार भी साम्यवादी सोंच का ही नतीजा है।
इस अधिवेशन में यह भी निर्णय लिया गया कि संगठन का केन्द्रीय कार्यालय लखनऊ से हटाकर मुम्बई कर दिया जाये। यह भी निश्‍चय पाया कि डॉ. अब्दुल अलीम के स्थान पर दुबारा सज्जाद ज़हीर संगठन के मंत्री का कार्य-भार संभालें।  ख्वाजा अहमद अब्बास को ज्वाइंट सेक्रेटरी बनाया गया।

दिल्ली शाखा की गतिविधियाँ, 1946

शमशेर सिंह नरूला जब दिल्ली शाखा के मंत्री चुने गए तो उनके प्रयास से वहां के प्रगतिशील लेखकों में एक नई ज़िंदगी का संचार हुआ। उन दिनों दिल्ली में फैज़ अहमद फैज़, डॉ. तासीर, शिवादन सिंह चौहान, देवेन्द्र सत्यार्थी आदि अनेक उर्दू-हिन्दी साहित्यकार एकत्र थे। 1946  में सज्जाद ज़हीर के दिल्ली आने पर एक बड़ा जलसा आयोजित किया गया। इस समारोह की अध्यक्षता सर रज़ा अली ने की और इसमें प्रगतिशील आन्दोलन के विरोधियों को करारा जवाब दिया गया। हिन्दू-मुस्लिम तनाव के बावजूद दिल्ली के हिन्दी-उर्दू साहित्यकारों में वह दूरियां नहीं थीं जो उत्तर प्रदेश के हिन्दी लेखक उर्दू के प्रगतिशील लेखकों से बनाये हुए थे।

हिन्दी के प्रगतिशील लेखकों का अधिवेशन: इलाहाबाद, 1947

देश विभाजन के पूर्व से हिन्दी-उर्दू भाषा समस्या को लेकर हिन्दी-उर्दू लेखकों के मध्य जो असहमतियां थीं, वे देश की स्वाधीनता के बाद खुलकर सामने आ गयीं। राहुल जी और सज्जाद ज़हीर के मध्य जो मत-वैभिन्य था, उसमें वैचारिक संकीर्णता नहीं थी। किंतु हिन्दी के वे लेखक जो स्वाधीनता से पूर्व, संगठन से कभी नहीं जुड़े थे, अब अपनी एक विशेष भूमिका के साथ प्रगतीशील मंच पर दिखायी दिए। उनकी अलगाववादी मनोवृत्ति ने उर्दू लेखकों को पूरी तरह काटकर हिन्दी लेखकों का पृथक अधिवेशन इलाहाबाद में 1947 के अंत में करने का निश्‍चय किया। संगठन की पृष्ठभूमि अभी तक इस प्रकार के किसी भी अलगाववादी नज़रिए की सख्त विरोधी थी। इलाहाबाद अधिवेशन में सज्जाद ज़हीर को प्रगतिशील लेखक संगठन का प्रधान-मंत्री होने के रिश्ते से आमंत्रित किया गया। अली सरदार जाफरी भी सज्जाद ज़हीर के साथ, न बुलाए जाने के बावजूद चले आए। इलाहबाद में होने के कारण फिराक गोरखपुरी भी सम्मिलित हो गए। इस प्रकार उर्दू के तीन लेखक तो इस अधिवेशन में आ ही गए।
अधिवेशन में सम्मिलित हिन्दी लेखकों में राहुल सांकृत्यायन और अज्ञेय के अतिरिक्त सुमित्रानंदन पन्त, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, रामबिलास शर्मा, शिवमंगल सिंह सुमन, अमृत राय, नरेन्द्र शर्मा और प्रकाशचन्द्र गुप्त के नाम विशेष उल्लेख्य हैं। राहुल सांकृत्यायन 1938 से ही प्रगतिशील लेखक संगठन से जुड़े हुए थे और उनका व्यक्तित्व सभी के लिए आदरणीय था। अन्य हिन्दी लेखकों में प्रकाशचन्द्र गुप्त यद्यपि संगठन के अधिवेशनों में इस से पहले सम्मिलित नहीं हुए थे, किंतु स्तालिनग्राद का महायुद्ध (1944), जनता अजेय है (1945) जैसी पुस्तकें प्रकाशित करके वे समाजवाद के प्रति अपनी गहरी प्रतिबद्धता पहले ही व्यक्त कर चुके थे। अमृत राय और नरेन्द्र शर्मा का जुड़ाव लेखक संगठन के साथ पुराना था। किंतु निराला या रामबिलास या पन्त का समाजवादी नज़रिये से लगाव पहली बार दिखायी दे रहा था। यही स्थिति शिवमंगल सिंह सुमन की भी थी। शिवदान सिंह चौहान को या तो इस अधिवेशन में बुलाया नहीं गया था या वे किन्हीं कारणों से नहीं आ पाये,  किंतु, अधिवेशन में उनकी अनुपस्थिति खटकती अवश्य है और आयोजकों की नीयत पर हल्का सा प्रश्न-चिह्न भी लगा देती है।
प्रगतिशील हिन्दी लेखकों के इस अधिवेशन का उदघाटन पं. अमरनाथ झा ने किया। ध्यान रहे की 1936 में अमरनाथ झा ने संगठन से अपना हाथ पूरी तरह खींच लिया था और सज्जाद ज़हीर को उनके दबाव में यह स्पष्टीकरण भी देना पड़ा था की संगठन के मेनिफेस्टो पर हस्ताक्षर करने वालों में उनका नाम भूल से छप गया है। इस अधिवेशन में केवल दो सत्र संपन्न हुए। एक सत्र की अध्यक्षता राहुल सांकृत्यायन ने की और दूसरे सत्र के अध्यक्ष अज्ञेय थे। राहुल जी की अध्यक्षता में हिन्दी-उर्दू विवाद प्रबल रूप से सामने आया। अज्ञेय ने प्रस्ताव रखा कि सम्पूर्ण देश की एकमात्र राष्ट्रभाषा हिन्दी घोषित की जाये। सज्जाद ज़हीर का विचार था कि हिन्दी और उर्दू को एक-दूसरे से निकट लाने का प्रयास जारी रहे और जबतक नागरी-लिपि को सभी स्वीकार न कर लें, एकमात्र हिन्दी और नागरी की बात न की जाये। रामबिलास शर्मा, फिराक गोरखपुरी, प्रकाशचन्द्र गुप्त, अली सरदार जाफरी और अमृत राय आदि का विचार था कि इस अधिवेशन में इस प्रस्ताव पर कोई निर्णय न लिया जाये। इस निर्णय को अखिल भारतीय अधिवेशन के लिए छोड़ दिया जाये। अंत में हुआ भी यही, किंतु इस से मनमुटाव को बढावा मिला।

उत्तर-प्रदेश के हिन्दी उर्दू लेखकों का अधिवेशन, 1949

हिन्दी के प्रगतिशील लेखकों के अधिवेशन में भाषा-विवाद को लेकर जो हलकी सी दरारें आ गई थीं, उनका भरा जाना ज़रूरी था। इससे पहले कि पांचवां अखिल भारतीय अधिवेशन आयोजित किया जाये, यह निश्‍चय पाया कि उत्तर प्रदेश के हिन्दी-उर्दू लेखकों का एक मिला-जुला अधिवेशन कर लिया जाये।फलस्वरूप अप्रैल, 1949  में यह अधिवेशन संपन्न हुआ। इसमें रामवि‍लास शर्मा, डॉ. अब्दुल अलीम,  प्रकाशचन्द्र गुप्त, आले अहमद सुरूर,  शिवदान सिंह चौहान, एहतिशाम हुसैन, मजरूह सुल्तानपूरी, नरोत्तम नागर, साहिर लुधियानवी, शील और मुमताज़ हुसैन आदि ने भाग लिया। सज्जाद ज़हीर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के निर्देश पर 1948 में पाकिस्तान जा चुके थे ताकि वहां पार्टी को संगठित और व्यवस्थित कर सकें। भाषा के सम्बन्ध में इस अधिवेशन ने सर्व-सम्मति से जो प्रस्ताव पारित किया उसके कुछ अंश यहाँ देना आवश्यक जान पड़ता है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य हिन्दी-उर्दू लेखकों को एक बड़े लक्ष्य के लिए जोड़ना और निकट लाना था। प्रस्ताव इस प्रकार था -
“उत्तर-प्रदेश के प्रगतिशील लेखकों की यह सभा घोषणा करती है कि प्रत्येक भाषा को स्वतंत्र और बेरोक-टोक तरक्की करने का अधिकार होना चाहिए। यह सभा किसी भी भाषा के बोलने वालों पर एक सरकारी भाषा के लादे जाने का विरोध करती है।
“हमारा विचार है कि हिन्दी और उर्दू भाषाएँ मूल रूप से एक हैं और जनता की बोल-चाल की ज़बान को आधार मानकर वह जीवित हैं। उत्तर-प्रदेश तथा अन्य स्थानों पर जिस प्रकार उर्दू को कुचला जा रहा है,  उससे भाषा की एकता कायम नहीं हो सकती, बल्कि इसका उद्देश्य जनता में फूट डालना और अंधी राष्ट्रीयता की प्रवृत्ति पैदा करना है।”

पांचवां अखिल भारतीय अधिवेशन: भीमड़ी, 1949

मई, 1949 में भीमड़ी (मुम्बई) में होने वाले पांचवें अखिल भारतीय अधिवेशन का एक विशेष महत्त्व है। बदली हुई परिस्थितियों में संगठन ने महसूस किया कि 1936  का घोषणा-पत्र कई दृष्टियों से अपर्याप्त है। अब आवश्यक हो गया है कि एक नया घोषणा-पत्र तैयार किया जाये। इस अधिवेशन में रामवि‍लास शर्मा को नया मंत्री चुना गया और सर्व सम्मति से एक नया घोषणा-पत्र पास किया गया। यहाँ इस घोषणा-पत्र के कुछ अंश प्रस्तुत करना असंगत न होगा-
“भारत का पूंजीपति वर्ग राष्ट्रीय आन्दोलन के समय में भी साम्राज्य से समझौता करने के प्रयास में लगा हुआ था। अब खुल्लमखुल्ला उसका साथी और दोस्त बन गया। इसका प्रमाण यह है कि भारत सरकार ने बरतानवी कामनवेल्थ में रहने का निर्णय लिया है। यह निर्णय भारतीय जनता की इच्छा के विरुद्ध है।… पिछली लड़ाई समाप्त हुए अभी बहुत समय नहीं बीता कि एक बार फासिज्म को नीचा दिखाने के बाद फिर विश्‍व की आम जनता को तीसरे महायुद्ध की नयी तैयारी में लगाया जा रहा है।… बरतानवी और अमरीकी पूंजीवादी देश जो अपने लाभ को न केवल बनाए रखना बल्कि बढा़ना चाहते हैं, इस षड्यंत्र में लगे हैं कि डालर और एटमबम से दुनिया को गुलाम बनाये रखें।… हजारों आदमी जिनमें मज़दूर, किसान, साहित्यकार और कला शिल्पी सभी शामिल हैं,  भारतीय जेलों में तरह-तरह के कष्ट झेल रहे हैं, उन लोगों को जेल भेजने से पहले औपचारिक रूप से अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने की आवश्यकता भी नहीं समझी जाती।… प्रगतिशील साहित्यकार अतीत की संस्कृति और साहित्य के सच्चे वारिस हैं और वे मानव सभ्यता की श्रेष्ठ परम्पराओं को लेकर आगे बढते हैं। समाज के ऐतिहासिक विकास के परिदृश्य में वे अपनी सांस्कृतिक विरासत को आलोचनात्मक दृष्टि से मूल्यांकित करते हैं।…’
‘प्रगतिशील साहित्यकार जानते हैं कि शोषक और शोषित में समझौता नहीं हो सकता। और इस दिशा में सत्य और अहिंसा की बात करना एक ऐसा परदा है जिसके पीछे पूंजीवादी लूट-खसोट को छिपाने का प्रयास किया जाता है।…’
‘अगर हम पिछले बीस वर्षों के साहित्य पर दृष्टि डालें तो बड़े गर्वपूर्वक कह सकते हैं कि औरों की तुलना में प्रगतिशील लेखक ही थे जिन्होंने अपने साहित्य में स्वाधीनता आन्दोलन के नए मोड़ों को प्रस्तुत किया, फासिस्ट शक्तियों का जमकर विरोध किया,  सोवियत यूनियन की जनता के साथ अपनी मैत्री की अभिव्यक्ति की,  जापानी फासिज्म के विरुद्ध लड़ती हुई चीनी जनता से मैत्री के रिश्ते जोड़े,… अकाल के ज़माने में बंगाल के लिए सम्पूर्ण देश के लोगों को एकस्वर किया। ये प्रगतिशील लेखक ही हैं जिन्होंने जन एकता और शांति का झंडा बुलंद किया,  जनसाहित्य और जन संस्कृति का भविष्य प्रगतिशील लेखकों के हाथ में है, यह सिद्ध करना उनका कर्तव्य है।”

उत्तरी भारत के लेखकों का अधिवेशन: दिल्ली, 1950

तीसरे महायुद्ध का आतंक कच्चे धागे से बंधी नंगी तलवार की तरह सिर पर लटक रहा था। प्रत्येक चिंतनशील साहित्यकार वि‍श्‍वशांति के प्रश्‍न को लेकर पर्याप्त गंभीर था। फलस्वरूप दिल्ली, राजस्थान और पंजाब के प्रगतिशील लेखकों ने वि‍श्‍वशांति प्रसंग पर विमर्श के लिए अधिवेशन के आयोजन की आवश्यकता महसूस की। यह आयोजन जुलाई, 1950 में दिल्ली में संपन्न हुआ। इसमें लेखकों से अपील की गई कि “तीसरे महायुद्ध की तैयारियां, हमारी संस्कृति के लिए खतरे का संकेत हैं। युद्ध के प्रचार का सम्बन्ध जातिगत ऊंच-नीच, साम्प्रदायिक-वैमनस्य और जातीय घृणा से है। हम सब एकजुट होकर प्रेमचंद का झंडा ऊंचा करें और प्रत्येक ऐसे हाथ को मरोड़ दें, जो हमारे कलम को छूना भी चाहता हो।”
अधिवेशन का स्वागत भाषण जनता थियेटर के श्यामलाल ने दिया जो उन दिनों टाइम्स आफ इंडिया के संपादक थे और अध्यक्षता राजेन्द्र सिंह बेदी ने की। केन्द्रीय संगठन के मंत्री की हैसियत से डॉ. रामविलास शर्मा ने अपील के पक्ष में भाषण दिया। डॉ.  शर्मा ने कहा कि “आज संसार में कोई ईमानदार श्रेष्ठ साहित्यकार ऐसा नहीं है जो युद्ध और शांति के मामले में अपनी गैर-प्रतिबद्धता की घोषणा करे।” उन्होंने कहा कि “महादेवी जी ने बंगाल के अकाल पर छपी सामग्री को संपादित करते हुए लिखा था कि जिस साहित्यकार के मन में मानवता का दर्द नहीं पैदा हुआ, उसका कलम सोने का होते हुए भी राख है। हमें स्वीकार करना चाहिए कि आज शांति का प्रश्‍न सम्पूर्ण मानवता का प्रश्‍न है।”
इस अवसर पर सोवियत रूस के साहित्यकारों (कान्सीटन समानोफ़, तर्सूनज़ादे, सिब्ते मकानोफ़, और एलेकज़ेनडर विन्सकी) ने भी संगठन के मंत्री के नाम एक चिट्ठी भेजी थी जिसमें लिखा था कि “संसार की सभी प्रगतिशील ताक़तों के लिए अनिवार्य हो गया है कि वे अपने दलों को सशक्त बनाएं और व्यावहारिक रूप से शांति की इच्छा से साम्राज्यवादियों को चेतावनी दें। इस चिट्ठी में भारत के प्रगतिशील लेखकों के साथ रूसी लेखकों ने अपने भरपूर सहयोग का भी आश्‍वासन दिया था।

इलाहबाद अधिवेशन, 1952

डॉ. रामविलास शर्मा के प्रयास से अप्रैल, 1952  में हिन्दी-उर्दू के प्रगतिशील लेखकों का एक सम्मेलन इलाहाबाद में संपन्न हुआ जिसमें रांगेय राघव, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय,  अमृत राय, एहतिशाम हुसैन,  धर्मवीर भारती,  डॉ.  अब्दुल अलीम,  प्रकाशचन्द्र गुप्त,  रघुपति सहाय फिराक,  अली सरदार जाफरी इत्यादि सम्मिलित थे। इसमें डॉ. रामविलास शर्मा ने कुछ एक प्रगतिशील लेखकों की कड़ी आलोचना की और एक उपदेशात्मक रुख अख्तियार किया जिससे संघ में दरारें पड़ने की संभावनाएं बढ़ गयीं। वैसे भी हिन्दी के प्रगतिशील लेखक रामविलास शर्मा के रवैये से संतुष्ट नहीं थे।

छठा अखिल भारतीय अधिवेशन: दिल्ली, 1953

भीमड़ी अधिवेशन में जो मेनिफेस्टो पास हुआ था उस से प्रगतिशील लेखकों के बीच जन्मा असंतोष गहराता जा रहा था। इसलिए यह निश्‍चय पाया की छठे अखिल भारतीय अधिवेशन में एक नया मेनिफेस्टो तैयार किया जाये। रामविलास शर्मा और अली सरदार जाफरी ने अन्य मित्रों के सहयोग से इसकी रूपरेखा तैयार की जिसे इस अधिवेशन में बिना किसी परिवर्तन के स्वीकार कर लिया गया। रामविलास शर्मा के विरुद्ध हिन्दी लेखकों का जो असंतोष दबा-दबा सा था, इस अधिवेशन में उसकी गंध बहुत साफ महसूस की गई। कुछ लेखकों का विचार था कि‍ रामविलास शर्मा संगठन को चलाने में पूरी तरह असफल रहे। अमृत राय और मुक्तिबोध रामविलास के रवैये को पहले ही मानव विरोधी घोषित कर चुके थे। डॉ. शर्मा ने इस अधिवेशन में जो रिपोर्ट प्रस्तुत की,  उसे भी उपदेशात्मक कहा गया।  इसका भी संकेत किया गया की संगठन पार्टी के हाथों में कठपुतली बन कर रह गया है। किंतु इन तमाम विरोधों के बावजूद, उर्दू तथा अन्य भाषाओं के लेखकों के बीच रामविलास की छवि किसी कोण से भी धूमिल नहीं हुई थी।  इस अधिवेशन में डॉ.  रामविलास शर्मा के स्थान पर कृश्‍न चंदर को नया मंत्री चुना गया।

प्रगतिशील लेखक आन्दोलन का अवसान

अपने प्रारम्भ काल से ही जिस आन्दोलन की जड़ें जनता में गहराई तक पैठी हुई थीं,  वह लेखकों की आपसी बौद्धिक पैतरेबाजी के कारण 1954  तक खोखला हो चुका था। किसी को उसमें कुत्सित समाजशास्त्र की झलक दीखने लगी थी,  कोई उसे कोरी नारेबाजी समझता था।  किसी ने किसी के लेखन में ‘परशुराम के कुल्हाडे’ का चित्र देखना प्रारम्भ कर दिया तो कहीं इसमें संकीर्ण मतवादी प्रवंचना को जन्म देने वाली प्रवृत्ति रेखांकित की गई। कृश्‍न चंदर के मंत्री होने के बाद संगठन की गतिविधियाँ पूरी तरह शिथिल पड़ गयीं। स्वयं कृश्‍न चंदर एक तिजारती साहित्यकार होकर रह गए थे।  कुछ अन्य प्रगतिशील लेखकों में भी तिजारती मनोवृत्ति ज़ोर पकड़ने लगी थी।  इलाहाबाद में परिमल समूह के लेखक युगीन राजनीति से अपना दामन बचाए रखना चाहते थे और साहित्यकारों के बीच इस समूह की ताक़त निरंतर बढ़ रही थी। इसकी गोष्ठियों में प्रगतिशील लेखकों का सक्रिय दिखाई देना, प्रगतिशील लेखक संगठन के अवसान का स्पष्ट संकेत था।  नामवर सिंह और सुमित्रानंदन पन्त की बात तो फिर भी समझ में आती है, किंतु प्रकाशचन्द्र गुप्त जैसा साम्यवादी लेखक इन गोष्ठियों को सशक्त बना रहा था, यह देख कर आश्‍चर्य अवश्य होता है।
1953-54 में  काशी में भी ‘साहित्यिक संघ’ की गोष्ठियाँ ज़ोर पकड़ने लगी थीं। इस संघ के नाम से ही स्पष्ट है कि इसे प्रगतिशील लेखक संघ का बदल स्वीकार कर लिया गया था। इस संघ के बहस-मुबाहासों में शिवदान सिंह चौहान,  प्रकाशचन्द्र गुप्त,  हजारी प्रसाद द्विवेदी, नलिन,  त्रिलोचन,  अमृत राय,  नेमिचंद्र जैन, भारत भूषण अग्रवाल, धर्मवीर भारती और केदारनाथ अग्रवाल जैसे रचनाकर्मियों की विशेष भूमिकाएं थीं।
1954 में सज्जाद ज़हीर जब पाकिस्तान से लौटे,  उन्हें संगठन का यह बिखराव देख कर दुःख हुआ। फिर भी उन्होंने अपने आप को इप्टा (इंडियन पीपिल्स थिएट्रिकल एसोसिएशन), ए.आई.पी. डबल्यू (इंडियन प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन) और ऐफ्रो-एशियन राइटर्स एसोसिएशन जैसे वामपंथी सांस्कृतिक आंदोलनों से जोड़े रखा। सच पूछा जाये तो प्रगतिशील लेखक संगठन का सम्पूर्ण अस्तित्त्व ही सज्जाद ज़हीर के एकल व्यक्तित्त्व पर टिका हुआ था। यदि वे पाकिस्तान न गए होते तो प्रगतिशील संगठन का बिखराव इतनी आसानी से सम्भव न हो पाता।

विश्‍लेषण और निष्कर्ष

प्रेमचंद ने 1936 में जब प्रगतिशील लेखक संगठन के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता की  तो संगठन पर चोट करते हुए नरोत्तम नागर ने लिखा था, ”इस संगठन की अध्यक्षता तो युवा पीढ़ी के ही किसी व्यक्ति को करनी चाहिए थी।” सज्जाद ज़हीर के नाम अपनी चिट्ठी में प्रेमचंद ने इस टि‍प्‍पणी का सन्दर्भ देते हुए लिखा था, “उस अहमक को ये नहीं मालूम के यहाँ वही जवान है, जिसमें प्रोग्रेसिव रूह हो। जिसमें ऐसी रूह नहीं, वह जवान होकर भी बूढा़ है।” इस वाक्य में जवान होना ज़िंदगी को प्रतीकयित करता है। उस ज़िंदगी को जिसकी आत्मा प्रगतिशीलता के झरनों में धुली हुई हो। यानी प्रगतिशीलता प्रेमचंद की दृष्टि में बौद्धिक व्यायाम से नहीं जन्म लेती। मार्क्स के दार्शनिक सिद्धांतों की जानकारी यदि अंतस में प्रवेश न करे और आत्मा के साथ अंतरंग होकर संस्कारों में न घुल-मिल जाये  तो प्रगतिशीलता का बाह्य धरातल अर्थहीन होगा। यहाँ जानकारी से आगे बढ़कर उस समझ की आवश्यकता है जो प्रतिबद्धता को जन्म देती है। प्रगतिशीलता किसी पादरी का चोगा नहीं है जिसे पहनकर उपदेश दिये जाएँ। यह प्रगतिशीलता एक पूरी ट्रेनिंग है जो संस्कारों के भीतर से फूटती है।सांस्कृतिक विरासत के ऐतिहासिक विकास को आम जनता की पृष्ठभूमि में रख कर देखने और परखने से पल्लवित होती है। प्रेमचंद ने अन्य हिन्दी लेखकों की भांति प्रगतिशीलता को ओढा नहीं था। इसे अपने समूचे रक्त में घोल लिया था।
हिन्दी के अधिकांश तथाकथित प्रगतिशील लेखक, संगठन के केन्द्रीय आयोजकों से जुड़ना नहीं चाहते थे। शायद जुड़ भी नहीं सकते थे। बात कुछ कड़वी हो सकती है, किंतु सच्चाई यही है कि जिसे आन्दोलन की समझ कहते हैं, वह हिन्दी लेखकों में एक सिरे से थी ही नहीं। हालांकि प्रेमचंद ने इस ‘समझ’ को उनके बीच पहुंचाने के प्रयास में कोई कमी नहीं की। जिस आन्दोलन की जड़ें मजदूरों और किसानों के बीच हों, उसकी समझ पैदा करने के लिए ज़रूरी है कि मजदूरों-किसानों के साथ जुड़ाव पैदा किया जाये। केवल सैद्धांतिक स्तर पर नहीं, व्यावहारिक स्तर पर भी। जब ऐसा नहीं किया जायेगा तो वही होगा जो बालकृष्ण शर्मा नवीन के साथ हुआ। “तुम जिनको कीडा समझे थे वो तो मानव निकले यारो।” कहने वाले नवीन प्रगितिशीलाता की दौड़ में ‘अपलक’ तक आते-आते भहराकर गिर पड़े। सुमित्रानंदन पन्त भी चले तो बहुत ज़ोर-शोर से,  पर आगे चलकर अरविंद के दर्शन में समाधित हो गए।
मार्क्सवाद के दार्शानिक सिद्धांतों का अध्ययन करने वालों की कमी न हिन्दी में पहले थी और न अब है, पर मार्क्सवाद के ज़मीनी विकास की पकड़ उतनी नहीं है, जितनी होनी चाहिए।  इसलिए जहाँ तक सिद्धांत के विवेचन का प्रश्‍न है हिन्दी के प्रगतिशील आलोचकों ने अपनी समझ का भरपूर सुबूत दिया। हाँ, रचना के स्तर पर बच्चन को छोड़कर लगभग सभी कवियों ने प्रगतिशीलता की आत्मा को समझ कर उसका निर्वाह करने का प्रयास नहीं किया। शिवदान सिंह चौहान ने कदाचित इसीलिए 1954 में लिखा था, “मार्क्सवाद के दार्शनिक सिद्धांतों को पद्यबद्ध कर के मार्क्सवादी (प्रगतिवादी) कविता तो तैयार की जा सकती है, लेकिन तब उसे न काव्य की संज्ञा दी जा सकती है न साहित्य के इतिहास में कोई अलग स्थान ही।”
प्रगतिशील लेखक आन्दोलन का फलक बहुत व्यापक था किंतु इस व्यापकता को समझने के लिए संकल्प की पारदर्शिता अपेक्षित थी। ऐसी पारदर्शिता जो समाजवादी आन्दोलन से बहुत पहले भारतेंदु हरिश्‍चन्‍द्र और अल्ताफ हुसैन हाली में थी। उनके सामने एक सामाजिक-सांस्कृतिक लक्ष्य था जिसके लिए वे पूरी तरह प्रतिबद्ध थे। हिन्दी में इस परम्परा का विकास नहीं हो पाया। प्रेमचंद उर्दू की परम्परा से आए थे, जहाँ संघर्ष का पहिया थमा नहीं था। फलस्वरूप वह अपने युग के सभी हिन्दी लेखकों से अलग खड़े थे और पहले क्या, आज भी अलग दिखायी देते हैं।शायद इसी लिए प्रगतिशीलता की बैसाखी लगाने वाले बार-बार प्रेमचंद का नाम दुहराते हैं। देश की स्वाधीनता से पूर्व, हमारे लेखकों के पास एक साथ जुड़ने के लिए एक कामन प्लेटफार्म था, पर स्वाधीनता के बाद वह अलगाववादी बीज जो दबे-दबे से थे, अँखुआ फोड़कर सिर उभारने लगे और ‘अपनी ढपली अपना राग’ की स्थिति पैदा हो गई।
साहित्य और कला को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की बात पर लोग चौंकते हैं और कुछ नासमझ अपनी रचनाओं को सचमुच बंदूक की गोली के रूप इस्तेमाल करने और उसका वही प्रभाव देखने का स्वप्न बुन लेते हैं।प्रगतिशीलता के दौर में भी ऐसा हुआ और आज भी ऐसा हो रहा है। रोचक बात ये है कि मित्रों से उसकी खूब-खूब व्याख्याएं भी कराई जा रही है। ऐसे रचनाकारों को यह समझना अभी शेष है कि साहित्य का कोई भी हथियार भयाक्रांत करने के लिए नहीं होता। वह शत्रु सत्ता की आक्रामक शक्तियों और उसके कुचक्रों के विरुद्ध व्यावहारिक स्तर पर युद्धरत व्यक्तियों और समूहों में उत्साह जगाये रखता है और अन्य समझदार लोगों की सोई हुई चेतना को जगाकर संघर्ष के इस मोरचे पर एकजुट होने के लिए प्रेरित करता है। ’पार्टी समझ’ शब्द को रूढ़ अर्थों में ग्रहण करके नारेबाजी तो की जा सकती है किंतु यह नारेबाजी हथियार साबित होने के बजाय धीरे-धीरे उबाऊ बनकर घातक सिद्ध होती है। प्रगतिशील आन्दोलन के दौर में ऐसा ही हुआ।
प्रगतिशीलता की जिसके पास ज़रा भी समझ होती है वह ‘हिन्दी जाति’ का अलगाववादी स्वप्न नहीं देखता, वह जागो फिर एक बार जैसी केसरिया कवितायेँ नहीं लिखता,  वह शैव दर्शन की गुत्थियाँ सुलझाने नहीं बैठता, वह ब्राह्मणवादी, ठाकुर्वादी या भाई-भतीजवादी बनकर आलोचना की पीठ पर गद्दीनशीन नहीं होता। वह इच्छानुरूप कुछ नुस्खे तैयार करके ‘नुस्खावादी आलोचना’ को बढावा नहीं देता। वह वस्तु और रूप के अंतर्संबंधों को व्याख्यायित करते समय लकड़ी के पटरों की तरह पानी में ऊपर-ऊपर नहीं तैरता। वह सामने खड़ी चुनौतियों को मस्लेहत के तराजू पर नहीं तौलता। वह काव्य मूल्यों तथा जीवन मूल्यों की आकांक्षित एकतानता को उद्घाटित करने से गुरेज़ नहीं करता। सच तो यह है कि जो रचना की बुनियादी ज़रूरतों और उसकी अपनी अंतरंग स्वायत्तता को खुले ह्रदय से स्वीकार नहीं कर सकता, वह प्रगतिशील बुजुर्गों की कमाई को जोड़-तोड़ से हथियाकर उसके ब्याज से अपने कैरियर की इमारत भले ही खडी कर ले, उसकी प्रगतिशीलता सदैव संदिग्ध रहेगी।
डॉ. शिव कुमार मिश्र ने एक स्थल पर लिखा है, “रचनाकार हों या आलोचक, जब वे अराजक हो उठाते हैं, अपने कर्म से जुड़ी अपेक्षाओं के दायरे से बाहर जाने की कोशिश करने लगते हैं, उनका कर्म आहत होता है, अपनी साख खो देता है। आज आवश्यकता है यह रेखांकित करने की, कि कौन कौन अपनी साख खो चुका है या खोता जा रहा है। ज़ाहिर है कि वह साख जिसकी बुनियाद टेढी और भुसभुसी होगी, उसे अधिक दिन तो निश्‍चि‍त  रूप से नहीं टिकना है। कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह ने एक जगह कहा था, “आज राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय माहौल में कुछ ग़लत और अराजक तत्त्वों का एक मोर्चा खड़ा होता जा रहा है, जो क्रांतिकारी तत्वों के संगठन और विकास के प्रमाणों के लिए नहीं, विघटन और विलोपन की ओर ढकेलते जाने की गैर-क्रांतिकारी हरकतों के कारण क्रांतिकारी बना हुआ है।” बात तो अच्छी है पर खुल कर नहीं कही गई है। और यह खुल कर न कहना भी एक ख़ास चरित्र का परिचायक है।
देखने की बात यह है कि जिस प्रकार प्रगतिवादी युग में पुनरूत्थानवाद की अधोगामी प्रवृत्ति से लैस, अनेक लेखक प्रगतिशीलता का मुखौटा ओढ़कर प्रगतिवादी दस्ते में खड़े हो गए, ठीक उसी प्रकार वे लोग जो प्रगतिशीलता के चेहरे पर जब तक प्रतिष्ठा की चमक देखते रहे, उसके साथ जुड़े रहे और जब यह दीप्ति धीमी पड़ गई और उसकी सार्थकता पर संदेह होने लगा तो प्रगति का मुखौटा उतारकर जनवादी मुखौटे में अपनी सार्थकता साबित करने बैठ गए। ज़रूरत बार-बार मुखौटा बदलने की नहीं है। ज़रूरत है एक संयुक्त मंच पर आकर अपना आत्मालोचन करने की और जब तक ऐसा नहीं होगा प्रगतिशील लेखक आन्दोलन की जड़ों की पहचान अधूरी रह जायेगी।

(यह आलेख प्रोफेसर जैदी के ब्‍लॉग युग-वि‍मर्श से साभार लि‍या गया है।)

 

विधाओं की कोई एल.ओ.सी. नहीं होती : कान्तिकुमार जैन

कांतिकुमार जैन उन संस्‍मरणकारों में से जिन्‍होंने संस्‍मरण को साहि‍त्‍य की केंद्रीय वि‍धा के रुप में स्‍थापित किया। उनके संस्‍मरण खासे चर्चित और कुचर्चित भी हुए। उनसे प्रसिद्ध समीक्षक साधना अग्रवाल की बातचीत-

कान्ति जी, जहाँ तक मुझे मालूम है, छत्तीसगढ़ी बोली का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन आपने किया है- नई कविता और भारतेन्दु पूर्व हिन्दी गद्य पर भी आपका कार्य है। आलोचना की पुरानी फाइल पलटने से मुझे उसमें आपका एक लेख- ‘मुक्तिबोध मंडल के कवि’ देखने को मिला। मुक्तिबोध मंडल के कवियों ने ही आरंभ में ‘नर्मदा की सुबहकी योजना बनाई थी जिसे अज्ञेय ने न केवल झटक लिया बल्कि बहुत से पुराने कवियों को हटा दिया। ऐसा क्यों कर हुआ? कृपया इसे स्पष्ट करें।

1972 में जब मैं मप्र हिन्दी ग्रंथ अकादमी के लिए ‘नई कविता’ नामक पुस्तक लिख रहा था, तब मैंने देखा कि विवेचकों के आग्रहों, पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों के कारण नई कविता का सच्चा इतिहास नहीं लिखा जा सका है। हिन्दी में समीक्षा को ही इतिहास मान लिया जाता है। नई शोध के फलस्वरूप उपलब्ध नई जानकारी को इतिहास में समाहित करने की परंपरा हमारे विश्वविद्यालयों में नहीं है। मैंने उक्त पुस्तक में मुक्तिबोध के विवेचन के साथ जब ‘मुक्तिबोध मंडल के कवि’ का विचार सामने रखा तो डॉ. जगदीश गुप्त जैसे नई कविता के विचारकों ने प्रारंभ में अपनी असहमति प्रकट की, किन्तु बाद में वे भी मेरे तर्कों और तथ्यों से आश्‍वस्‍त हुए।

मुक्तिबोध ने ‘नर्मदा की सुबह’ की योजना बनाई थी। मुक्तिबोध के मित्र और शुजालपुर में उनके विद्यालय-सहयोगी रह चुके वीरेन्द्र कुमार जैन मानते हैं कि मालवा में ही हिन्दी की प्रयोगवादी और नई कविता का जन्म हुआ था। बाद में इस काव्यधारा में नेमिचंद जैन और भारतभूषण अग्रवाल जुड़े। वीरेन्द्र कुमार जैन ने मुक्तिबोध पर लिखे और 13 मई, 1973 के ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित अपने लंबे संस्मरण में स्पष्ट किया है कि कैसे अज्ञेय जी की संगठन क्षमता के कारण उन्हें ‘तारसप्तक’ के संपादन के लिए आमंत्रित किया गया। ठीक यही बात शमशेर जी ने भी कही है। अज्ञेय जी ने ‘तार सप्तक’ की मूल सूची से कुछ नाम निकाल दिए और कुछ नए जोड़ दिए। अज्ञेय तारसप्तक के झंडा बरदार नेता नहीं थे। मुक्तिबोध के ‘अनन्य मित्र और मुक्तिबोध मंडल के कवि’ प्रमोद वर्मा ने मुझे अपने पत्र में लिखा: ‘दूसरा तारसप्तक’ छप चुका था। मुक्तिबोध को यह देखकर हैरानी हुई कि नई कविता के नाम से प्रस्तुत छठे दशक की कविता ‘तारसप्तक’ के मूलतः वामपंथी रुझान को काट तराश कर कोरम कोर, सौंदर्यपरक कलावादी बना दी गई है। ऐसा तो छायावाद के जमाने में भी नहीं हुआ था। तो क्या यह सब उनके नव स्वाधीन देश को अंतरराष्ट्रीय पूँजीवाद की गिरफ्त में रहे चले आने के लिए ही किया जा रहा था?’

मैंने मुक्तिबोध मंडल की अपनी स्थापना का लंबा विवेचन किया जो डॉ. नामवर सिंह संपादित ‘आलोचना’ में छपा भी। इस विवेचन में जिन कवियों और विचारकों के नाम आए थे वे सब मेरे परिचित मित्र थे, श्रीकांत वर्मा, शिवकुमार श्रीवास्तव, रामकृष्ण श्रीवास्तव, जीवनलाल ‘विद्रोही’, प्रमोद वर्मा, अनिल कुमार, सतीश चौबे- सभी मुक्तिबोध के प्राचीन मित्र। परसाई और भाऊ समर्थ भी गो वे कवि नहीं थे। मुक्तिबोध ने बहुत सोच-विचार कर कवियों की सूची की अंतिम रूप दिया और उनकी कविताएँ भी एकत्र की थीं। यदि ‘नर्मदा की सुबह’ छप गई होती तो हिन्दी की स्वतंत्रता परवर्ती कविता का इतिहास कुछ दूसरा ही होता। अज्ञेय जी ने सप्तक श्रृंखला के माध्यम से मुक्तिबोध द्वारा प्रस्तावित ‘नर्मदा की सुबह’ वाली वामपंथी रुझान की कविता को हाईजैक कर लिया। सप्तकों की खानापूरी करने के लिए बाद में वे बहुत ही साधारण कवियों को ही हाईलाइट करते रहे। ‘आलोचना’ में प्रकाशित अपने लेख में मैंने विवेचित कवियों का समीक्षात्मक आकलन तो किया ही था, उनका संस्मरणात्मक आख्यान भी प्रस्तुत किया था, दोनों को ताने-बाने की तरह बुनते हुए। मेरे बाद के संस्मरणों में इसी शैली का उपयोग किया गया है। मुझे संतोष है कि यह शैली सामान्य पाठकों के साथ ही सुधी आलोचकों को भी पसंद आई। यह शैली विद्वत्ता का आतंक पैदा करने के स्थान पर हार्दिकता जगाती है।

कायदे से सागर विवि के हिन्दी विभाग के आचार्य एवं अध्यक्ष होने के नाते ही नहीं, बल्कि आप में जो आलोचनात्मक प्रतिभा है, उसे देखते हुए आपको आलोचक होना चाहिए था, क्योंकि आपके संस्मरणों में आपके आलोचक की चमक की चिंगारी जहाँ-तहाँ प्रचुरता से दिखती है, मेरे मन में जब-तब यह सवाल उठता है। कृपया अपनी स्थिति से हमें परिचित कराएँ।

एक समय था जब हिन्दी का विश्‍वविद्यालयीन अध्यापक कवि होता ही था। फिर कवि के रूप में प्रतिष्ठा न मिलने पर वह कविता का पाला छोड़कर आलोचना के क्षेत्र में सक्रिय होता था। आचार्य नगेन्द्र, डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ. नामवर सिंह जैसे अनेकानेक कवि-आलोचकों से हम परिचित हैं। हमारे यहाँ आलोचना के साथ विद्वता का फलतः गंभीरता का अनिवार्य रिश्ता माना जाता है। विद्वता आतंकित तो करती है, आकर्षित नहीं करती। हमारे विश्‍वविद्यालय विद्वत्ता का विकास तो करते हैं, संवेदना का नहीं। ज्यादा विद्वत्ता से मुझे भय लगता है। ऐसा नहीं है कि आलोचना के क्षेत्र में मैंने कुलांचे न भरी हों, पर वहाँ बहुत भीड़ थी। वहाँ कोई किसी को तब तक घास नहीं डालता जब तक उसके साथ अपना गुट या शिष्यमंडली न हो। आलोचना के क्षेत्र में मेरी स्थिति शरणार्थी की थी। हिन्दी समाज कुम्हार के उस चाक के समान है जो माँगे दिया न देय। ऐसे में मैंने संस्मरणों की राह पकड़ी, शरणार्थी से पुरुषार्थी बनने के लिए। वह भी लगभग दिवसावसान के समय। समीक्षा को मैंने संस्मरणों की मुस्कान से मिला दिया, 33, 67 के अनुपात में। यह मेरी अपनी ‘रेसेपी’ थी। मेरी यह ‘रेसेपी’ आलोचकों को पसंद आई। मेरे अच्छे संस्मरण वे माने गए, जिनमें मैंने रचनाकार या चिंतक या अध्यापक के छोटे-छोटे आत्मीय प्रसंगों के आधार पर उसके व्यापक एवं बृहत्तर रचना कर्म और जीवन मूल्यों का विश्‍लेषण किया। जैसे बच्चन के, डॉ. रामप्रसाद त्रिपाठी के, रजनीश के या ‘सुमन’ के। आप चाहें तो इन्हें संस्मरणात्मक समीक्षा कह लें या समीक्षात्मक संस्मरण। ‘तुम्हारा परसाई’ शीर्षक पुस्तक मैंने इसी शैली में लिखी है।

पाठकों को गंभीरता और आलोचना की यह फिजां पसंद आई। याद कीजिए, शायर का वह मंसूबा जिसमें वह कहता है:

क्यों न फिरदौस में दोजख को मिला दें या रब

सैर के वास्ते थोड़ी सी फिजां और सही।

मेरे संस्मरण साहित्य की सैर के शौकीनों को यही थोड़ी सी फिजां मुहैया करते हैं।

सागर विवि से अवकाश प्राप्त करने के बाद संस्मरण लिखने की बात सहसा आपके मन में कैसे उठी? यूँ जहाँ-तहाँ आपने इसका संकेत दिया है लेकिन मुझे लगता है आपके पाठक के नाते मेरे मन में इस प्रश्‍न को लेकर जो जिज्ञासा है, उसका निदान आप ही कर सकते हैं।

संस्मरण लिखने की न तो मेरी कोई तैयारी थी, न ही आकांक्षा, कोई योजना भी न थी। डॉ. कमला प्रसाद के कहने से मैं श्रीमती सुधा अमृतराय पर एक संस्मरण लिख चुका था। उसे मित्रों ने पसंद किया, भाषा विज्ञान जैसा नीरस विषय पढ़ाने वाले से ऐसी तरल भाषा और रोचक शैली की अपेक्षा किसी को नहीं थी। ऐसे में एक दिन स्थानीय महाविद्यालय के अध्यापक मित्र घर आए। वे लेखक भी हैं, समीक्षा जैसी गुरु गंभीर विधा में लिखते हैं। कमला से उन्हें एलर्जी है, पुराने सहयोगी रह चुकने कारण। उनके गुरुओं ने उन्हें बताया था कि संस्मरण हल्की-फुल्की विधा है। उनके गुरु के गुरु आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी प्रेमचंद द्वारा संपादित ‘हंस’ के आत्मकथांक/संस्मरणांक का काफी मखौल उड़ा चुके थे। उन्हें लगा कि भाषा विज्ञान और समीक्षा के पुण्य तीर्थ से संस्मरण के गटर में पतन मेरे सारे पुण्यों को नष्ट कर देगा। मेरे उद्धार की चिंता के कारण उन्होंने फरमाया-संस्मरण तो वो लिखता है जो चुक जाता है। संस्मरण तो मरे हुओं पर लिखे जाते हैं। कुछ भी लिख दो, मरा हुआ व्यक्ति न प्रतिवाद कर सकता है, न ही आपकी खबर ले सकता है। फिर संस्मरण तो आत्मश्‍लाघा की विधा है। जिसे कोई भाव नहीं देता, वह अपनी पीठ ठोकने लगता है। संस्मरण उनके लिए शेड्यूल्ड कास्ट विधा थी और संस्मरण लेखक को वे कुल की हीनी, जात कमीनी, ओछी जात बनाफर राय का सगोत्री मानते थे। उनकी चेतना पर संस्मरण का मरण काबिज था, संस्‍मृत के पक्ष में भी, मनोवैज्ञानिक और व्यक्तिपरक सोनोग्राफी की। सुमन जी, त्रिलोचनजी या प्रेमशंकर जी ने तो कम आपत्ति की, उनके अनुगतों ने ज्यादा हो-हल्ला मचाया।

जो जितना पुराना और बड़ा कांवड़िया था, उसने उतना ही ज्यादा हल्ला मचाया। यह सब तो सच है पर लिखना नहीं चाहिए। कुछ ने मेरी औकात बताई। क्या पिद्दी, क्या पिद्दी का शोरबा। कुछ ने मुझ पर ‘क्रुयेलिटी’ का आरोप लगाया। मुझे संतोष है कि सुमन जी ने अपने होशो हवास में ‘हंस’ में प्रकाशित मेरा संस्मरण पढ़ लिया था, प्रेमशंकर जी ने भी। मैं संस्मरण श्रद्धालुओं के लिए नहीं लिखता। आस्था सुदृढ़ करने के लिए जो संस्मरण पढ़ते हैं, उन्हें मेरी सलाह है कि वे ‘कल्याण’ या ‘कल्पवृक्ष’ पढ़ें। इसी बीच दो दुर्घटनाएँ और हो गईं। मेरी कूल्हे की हड्डी टूट गई, काफी अर्से तक चलना-फिरना दूभर हो गया। न पुस्तकालय जा सकते, न ही अपने अध्ययन कक्ष की अलमारियों की ऊपरी शेल्फों से किताब निकाल सकते। ईश्‍वर प्रदत्त इस चुनौती का सामना मैंने संस्मरण लिखकर किया। ईश्‍वर से तो मैं निबट लिया पर कमलेश्वर का क्या करूँ? कमलेश्‍वर को अध्यापकों की सारी प्रजाति ‘पतित’ और ‘नालायक’ लगती है। उनके लेखे ‘रचनशीलता’ही सर्वोपरि है। सो भैये, लो ‘एक पतित और नालायक प्राध्यपक’ के संस्मरण पढ़ो। जान कर संतोष हुआ कि उनको मेरे संस्मरण पठनीय ओर प्रिज्म की तरह लगे। वाहे गुरु की फतह।

सवाल यह भी है कि पहला संस्मरण लिखने-छपने के बाद पत्रिका के संपादक और पाठकों की प्रतिक्रिया का आप पर कैसा असर हुआ?

पहला संस्मरण छपा अप्रैल-अक्टूबर ‘96 की ‘वसुधा’ में। वह किंचित् लंबा था, डॉ. कमला प्रसाद ने कहा कि आपके संस्मरण ‘वसुधा’ के बहुत पन्‍ने घेरते हैं पर रोचकता के कारण पाठक उन्हें पूरा पढ़ते हैं। मैं छोटे संस्मरण लिख ही नहीं पाता। छोटे संस्मरण मुझे या तो शोक प्रस्ताव जैसे लगते हैं या चरित्र प्रमाणपत्र जैसे। ‘हंस’ में मेरे लंबे-लंबे संस्मरण छपे और पाठकों को पसंद आए। भारत भारद्वाज ने लिखा कि संस्मरणों का जो दिग्विजयी अश्‍व काफी अर्से से प्रयाग और काशी के बीच घूम रहा था, वह अब सागर में स्थायी रूप से बाँध लिया गया है। मेरे संस्मरणों पर कमला प्रसाद को और राजेन्द्र यादव को बहुत सुनना पड़ा, अश्‍लीलता को लेकर। अश्‍लीलता मेरे संस्मरणों में मेरे कारण नहीं थी, संस्मृत के अपने व्यक्तित्व के कारण थी। पर कई सुधियों को दुःशासन द्वारा भरी सभा में द्रौपदी के चीरहरण में अश्‍लीलता या अनैतिकता नहीं दिखाई पड़ी, दिखाई पड़ी वेदव्यास द्वारा महाभारत में चीरहरण का उल्लेख किए जाने पर। इन दिनों एक विज्ञापन आ रहा है दूरदर्शन पर। लड़की पूछती है- क्या खा रहे हो? लड़का कहता है- लो तुम भी खाओ। लड़की फिर कहती है- पर यह तो तंबाखू है। लड़का कहता है- जीरो परसेंट टोबेको, हंड्रेड परसेंट टेस्ट। मेरे संस्मरणों में भी अश्‍लीलता जीरो प्रतिशत ही है, स्वाद कुछ लोगों को शत-प्रतिशत मिलता है। यह उनकी अपनी स्वादेन्द्रिय का कमाल है।

संस्मरण हिन्दी में एक अरसे से लिखे जाते रहे हैं बल्कि पिछले वर्षों में काशीनाथ सिंह, दूधनाथ सिंह एवं रवीन्द्र कालिया की संस्मरण पुस्तकें भी छपीं जो वस्तुतः उनके समकालीन रचनाकारों पर केन्द्रित हैं। आपने किस तरह संस्मरण की पूरी परंपरा से अलग हटकर कबीर के कपूत बनने का साहस संजोया?

अभी कुछ दिन हुए, संस्मरणों के एक प्रेमी पाठक मुझसे मिलने आए थे। उन्होंने बातचीत के दौरान बचपन में पूछी जाने वाली एक बुझौवल सुनाई:

तीतर के इक आगे तीतर

तीतर के इक पीछे तीतर

आगे तीतर पीछे तीतर

बताओ कुल कितने तीतर

फिर इस बुझौवल का संस्मरण-पाठ भी पेश किया:

का के है आगे इक का

का के पीछे है इक का

आगे इक का, पीछे इक का

बताओ कुल कितने हैं का

यहाँ एक का काशीनाथ का है, दूसरा कालिया का, तीसरा इस नाचीज कान्तिकुमार का है। यह सब कबीर के कपूत हैं, कपूतों की वह परंपरा ‘उग्र’ और ‘अश्क’ से होती हुई कृष्णा सोबती, हरिपाल त्यागी तक पहुँचती है। मैं भी इसी परंपरा का एक पड़ाव हूँ। मैं कुछ ज्यादा ही कपूत साबित हुआ।

कुछ विद्वानों का मत है कि आपने संस्मरण विधा को हाल के दिनों में प्रकाशित अपने संस्मरणों से केन्द्रीय विधा बना दिया है। इस बारे में आपको क्या कहना है?

इस संबंध में मैं क्या कहूँ? संस्मरण विधा आज समकालीन लेखन की केन्द्रीय विधा बन गई हैं, इसमें संदेह नहीं। पर इसका सारा श्रेय मेरा ही नहीं है। काशीनाथ सिंह, रवीन्द्र कालिया, दूधनाथ सिंह के संस्मरणों से इस विधा में जो खुलापन आया था, उससे पाठकों की एक मानसिकता बन गई थी। मुझे उस मानसिकता का लाभ मिला। किसी भी संस्मरणीय के केवल कृष्णपक्ष का उद्घाटन करना लक्ष्‍य नहीं है, बल्कि उसके व्यक्तित्व की संरचना के तानों-बानों और उसके परिवेश की सन्निधि में उसकी रचनात्मकता के छोटे-बड़े प्रसंगों के माध्यम से ‘स्कैनिंग’ मेरा अभीप्सित है। अपने संस्मरणों को रोचक और पठनीय बनाने के लिए रचनात्मक कल्पना का उपयोग तो मैंने किया है पर ‘फेकता’(fake) का नहीं। मेरे संस्मरणों में अनेक प्रसंग सेंधे भरने के लिए गाल्पनिक तो हो सकते हैं पर वे पूरी तरह काल्पनिक नहीं हैं। अपने संस्मरणों में मैं स्वयं को बचाकर नहीं चलता।

मैंने कभी डायरी नहीं लिखी। स्मृति के और पुराने पत्रों के सहारे ही लिखता हूँ। एकाध संस्मरण में जहाँ भ्रमवश दूसरों से सुने तथ्यों के सहारे मुझसे घटनाओं की पूर्वापरता में गड़बड़ी हुई है, पाठकों ने मुझे पकड़ लिया है, इसका अर्थ मैंने यही लगाया कि हिन्दी में सुधी और सावधान पाठकों की कमी नहीं है। असावधानीवश हुई इन चूकों को स्वीकार करने में मुझे कोई संकोच नहीं हुआ। जैसे ‘विद्रोही’ के संदर्भ में कमलेश्‍वर ने या मुक्तिबोध के संदर्भ में ललित सुरजन ने या ‘वसुधा’ के अंतिम अंक के संबंध में भारत भारद्वाज ने मेरी त्रुटि की ओर ध्यान आकर्षित किया। मैं इनका कृतज्ञ हूँ। ये त्रुटियाँ किसी बदनीयती के कारण नहीं हुईं। संस्मृतों के संपूर्ण व्यक्तित्व या रचनाशीलता के नियामक तत्त्वों के मेरे निष्कर्षों पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। पर भूल तो भूल है।

अपने संस्मरणों पर मेरे पास हजारेक पत्र तो आए ही होंगे। टेलीफोन भी कम नहीं आए। लोग पाठकों के न होने का रोना बेवजह ही रोते हैं। अकेले रजनीश वाले संस्मरण पर ही मुझे सैकड़ों पत्र मिले और अभी तक मिल रहे हैं। देश से भी, विदेशों से भी। इन पत्रों के आधार पर मैंने एक श्रृंखला लिखने का मन बनाया है- संस्मरणों के पीछे क्या है? रजनीश के संस्मरण पर प्राप्त प्रतिक्रियाओं वाला संस्मरण तो लिखा भी जा चुका है- ‘रजनीश का दर्शन: आध्यात्मिक दाद खुजाने का मजा।’असल में संस्मरणों को संस्मृत का ही आईना नहीं होना चाहिए, उसे उसके परिवेश का भी अता-पता देना चाहिए। उसे प्रचलित जीवन मूल्यों की प्रासंगिकता की भी जाँच पड़ताल करनी चाहिए। मेरे लिए संस्मरण विशिष्ट कालखंड का सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक इतिहास है।

पिछले दिनों हिन्दी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में रसाल जी, अंचल जी और सुमन जी पर जिस तरह आपके संस्मरण छपे उससे आपके दुश्मनों की संख्या में जरूर इजाफा हुआ, लेकिन सच बात यह भी है कि आज हिन्दी की कोई भी पत्रिका आपके संस्मरण के बिना अधूरी लगती है। क्या अब आप पूर्णतः संस्मरण समर्पित हैं या और भी आपकी कोई योजना है?

आपके इस प्रश्‍न के उत्तर में मैं नसीम रामपुरी का एक शेर उद्धृत करना चाहता हूँ:

हार फूलों का मेरी कब्र पर खुद टूट पड़ा

देखते रह गए मुँह फेर के जाने वाले

ऐसा तो नहीं है कि मैं अब संस्मरण छोड़कर कुछ और नहीं लिखता, पर अब जो कुछ लिखता हूँ, वह संस्मरणमय हो उठता है। ‘तुम्हारा परसाई’ मेरी नव्यतम पुस्तक है जिसे मैंने परसाई जी के जीवन, व्यक्तित्व, परिवेश और व्यंग्यशीलता का संस्मरणात्मक आख्यान कहा है। ‘तुम्हारा परसाई’ पढ़कर एक नामी-गिरामी प्रकाशक ने मुझे लिखा कि मुक्तिबोध पर भी ऐसी पुस्तक मैं क्यों नहीं लिखता? मेरा उत्तर था, ऐसी पुस्तक लिखने के जितने धैर्य और समय की आवश्यकता है, वह अब मेरे पास नहीं है। हाँ, मुक्तिबोध जी के नागपुर के दिनों पर लिखने का मन जरूर बना रहा हूँ, ‘महागुरु मुक्तिबोध: जुम्मा टैंक की सीढ़ियों पर’ नाम से। यह जीवनलाल वर्मा ‘विद्रोही’, रामकृष्ण श्रीवास्तव, श्रीकांत वर्मा, शिवकुमार श्रीवास्तव, प्रमोद वर्मा, अनिल कुमार, सतीश चौबे, भाऊ समर्थ, हरिशंकर परसाई जैसे रचनाकारों के साहित्य, संस्मरणों और पत्रों के माध्यम से नागपुर के दिनों के मुक्तिबोध के जीवन, मानसिकता और रचनाशीलता को ‘डिस्कवर’ करने की संस्मरणमय कोशिश होगी। इस कोशिश के कुछ अंश आपने ‘हंस’, ‘वसुधा’, ‘साक्षात्कार’, ‘आशय’, ‘अन्यथा’, ‘परस्पर’ जैसी पत्रिकाओं में देखे भी होंगे। मालगुड़ी डेज़ की तरह अपने बचपन के दिनों का वृत्तांत भी मैं लिख रहा हूँ ‘बैकुंठपुर में बचपन’ के नाम से। छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचल के अभावों, संघर्षों, शोषण, प्रकृति से तादात्म्य और लोक की अदम्य जिजीविषा का आख्यान। यह भी संस्मरणात्मक ही होगा। फिर संस्मरणों की मेरी नई पुस्तक भी है-‘जो कहूँगा, सच कहूँगा’ नाम से। एक तरह से ‘लौटकर आना नहीं होगा’ का दूसरा खंड। इन संस्मरणों में मेरी शिकायत मानवीय दुर्बलता से उतनी नहीं, जितनी टुच्चे स्वार्थों और संकीर्ण सोच के कारण किए जाने वाले छल, छद्म और फरेब से है। कथनी और करनी में जितनी दूरी आज दिखाई पड़ रही है, उतनी शायद कभी नहीं रही। मानवीय गरिमा का क्षरण करने वाली किसी भी चतुराई या संकीर्णता से मुझे एलर्जी है। इस एलर्जी को प्रकट करना दुश्मनों की संख्या में इजाफा करना है। मेरे दुश्मन बढ़ रहे हैं अर्थात् मेरे संस्मरण ठीक जगह पर चोट कर रहे हैं। ‘मे देअर ट्राइव इनक्रीज़’।

अभी शब्द शिखरपत्रिका में आपके नाम लिखे कुछ महत्वपूर्ण लेखकों के पत्र छपे हैं। राजेन्द्र यादव के लिखे पत्रों से ऐसा आभास होता है कि आप पर लगातार दबाव डालकर हंसके लिए उन्होंने आपसे संस्मरण लिखवाए ही नहीं बल्कि आपको जेल भिजवाने का भी पूरा प्रबंध कर दिया है। वस्तुस्थिति क्या है, यह आप ही बताएँगे।

नहीं, राजेन्द्र यादव का मुझ पर संस्मरण के लिए कोई दबाव नहीं था। संस्मरण के पात्र का चुनाव सदैव मेरा ही रहा है, उसका ढंग भी। अब 70 साल की उम्र में कोई मुझ पर दबाव डालकर कुछ लिखा लेगा, यह प्रतीति ही मुझे हास्यास्पद लगती है। राजेन्द्र यादव अच्छे संपादक हैं, वे रचनाकार की सीमाओं को और क्षमताओं को पहचानते हैं। वे साहसी भी हैं, मुझे लगता है वे जितने बद नहीं, बदनाम उससे बहुत ज्यादा हैं। शायद बदनामी मनोवैज्ञानिक रूप से उनके लिए क्षतिपूर्ति उपकरण है। बदनामी और विवाद उन्हें अपनी महत्ता सिद्ध करने के लिए अनिवार्य लगते हैं। कुछ लोग होते हैं जिन्हें चर्चा में बने रहना अच्छा लगता है। चर्चा और बदनामी उनके लिए लगभग पर्याय होते हैं। मैं आपको बताऊँ, ‘अंचल’ वाला संस्मरण तो कोई छापने को तैयार ही नहीं था। अंचल प्रगतिशील रह चुके थे, ‘लाल चूनर’वाले। अतः प्रगतिशील खेमे की पत्रिकाएँ अपने नायक का सिंदूर खुरचित रूप दिखाने को तैयार नहीं थीं। अंचल जी हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष भी रह चुके थे। अतः सम्मेलन से संबद्ध पत्रिकाओं के अपने संकोच थे। अक्षय कुमार जैन ने तो मुझे साफ लिखा कि हिन्दी के पाठक अभी ऐसी मानसिकता के नहीं हो पाए हैं कि वे आपके ऐसे संस्मरण पचा सकें। ‘वागर्थ’ (उस जमाने की), ‘वाणी’, ‘अक्षरा’ जैसी निरामिष पत्रिकाओं से मैं क्या उम्मीद करता? अन्ततः मैंने वह राजेन्द्र यादव को भेज दिया। राजेन्द्र यादव से मेरी कोई आत्मीयता नहीं थी। जीवाजी विश्‍वविद्यालय में मैंने उनका उपन्यास नहीं लगाया था। वे मुझसे रुष्ट थे। सोचा, उनको भी खंगाल लिया जाए। हफ्ते भर में उनका पत्र आया, शीघ्र छपेगा। ‘अंचल’ छपने पर बड़ा बावेला मचा। अश्‍लील, क्रुयेल, अनैतिक, चरित्रहनन, खुद बड़े पाक बने फिरते हैं टाइप। जेल पहुँचाने का इंतजाम राजेन्द्र यादव ने नहीं, मेरे मित्रों ने किया। भोपाल के मेरे एक बहुत पुराने मित्र ने जो स्वयं को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से बड़ा तो नहीं, पर उनके समकक्ष मानते हैं, अंचल जी की बेटी को कानूनी कार्यवाही के लिए उकसाया। वह स्वयं अनुभवी है, उसके पति न्यायाधीश हैं। वे कानून के जानकार हैं, समझदार। अतः उन मित्र महोदय के बहकावे में नहीं आए। हाँ, एक अखिल मुहल्ला कीर्ति के धनी कवि ने जरूर मुझ पर मानहानि जैसा कुछ करने की धमकी दी। पर वे भी टांय-टांय फिस्स से ज्यादा नहीं बढ़ पाए। सुधीर पचौरी और विष्णु खरे जैसी सुधी और नीरक्षीर विवेकी विचारकों ने अश्‍लीलता की चलनी में मेरी छानबीन की, यह भूलकर कि सूप कहे तो कहे, चलनी क्या कहे जिसमें बहत्तर छेद। हिन्दी समाज में अश्‍लीलता की कबड्डी खेलना समीक्षकों का सबसे पसंदीदा खेल है। यार लोग चाहते हैं कि मैं मित्रों के कांधे पर चढ़कर नहीं, भूतपूर्व मित्रों के कांधों पर चढ़कर अंतिम यात्रा पर निकलूँ। यहाँ हर पड़ोसी, दूसरे की खिड़की में ताक-झाँक की फिराक़ में रहता है, अपनी खिड़की में मोटे-मोटे ‘ब्लाइंड’ डालकर। अपने संस्मरणों के हर शब्द के लिए मैं स्वयं जिम्मेदार हूँ। किसी राजेन्द्र यादव के पाले में गेंद फेंकना बेईमानी भी है, अनैतिकता भी। वह कायरता तो है ही।

कहने की जरूरत नहीं कि आज हिन्दी में आपने संस्मरण विधा में नई जान फूंकी है और हर नया लेखक कान्तिकुमार जैन बनने की कोशिश में लगा है। आप इस स्थिति को किस रूप में देखते हैं।

आपके इस तरह के प्रश्‍न के उत्तर में मैं आपको एक लतीफा सुनाना चाहता हूँ- स्कूल में पढ़ने वाले और नए-नए तरुण हुए एक छात्र को उसके एक सहपाठी ने एक प्रेम प्रसंग के निपटारे के लिए द्वंद युद्ध में ललकारा। यह युद्ध तलवारों से लड़ा जाना था। ललकारित छात्र ने अपने पिताजी से कहा कि पिताजी, आप मेरे लिए एक लंबी तलवार बनवा दें जो सहपाठी की तलवार से छह इंच लंबी हो। पिताजी समझ गए। बोले- बेटे! यदि तुम्हें सामनेवाले को परास्त करना है तो छह इंच आगे बढ़कर मारो। इस तरह के युद्ध तलवार की लंबाई से नहीं, भीतर के हाँसले से लड़े जाते हैं। यदि किसी का मेरुदंड कमजोर हो तो न तलवार की लंबाई काम आती है, न पिताजी का संरक्षण। ऐसे लोगों को संस्मरण नहीं लिखने चाहिए।

मुझे लगता है कि आपके संस्मरणों के पीछे परसाई खड़े हैं आशीर्वाद की मुद्रा में, क्योंकि यह बात तो बिल्कुल साफ है कि आपके भीतर के आलोचक और परसाई के व्यंग्य की धार से आपके संस्मरण परवान चढ़े हैं। वैसे तो अपनी नई पुस्तक तुम्हारा परसाईमें विनम्रतापूर्वक यह कहकर कि तुम्हारा परसाई में मेरा क्या है, आपने अपना संकोच स्पष्ट कर दिया है फिर भी कुछ बचा रहता है परसाई से उऋण होने के लिए। इस प्रसंग में आप कुछ और जोड़ना चाहेंगे।

परसाई जी मेरे मित्र थे- आत्मीय और अंतरंग। उनका और मेरा लगभग चालीस वर्षों का साथ था। उनसे प्रेरित और प्रभावित न होना कठिन था। वे मुझसे बड़े थे, प्रतिष्ठित। फिर विचारधारा के स्तर पर भी मैं उनके बहुत निकट रहा हूँ। मुझे उनकी जो बात सबसे पसंद थी वह यह कि अपनी विचारधारा की वे अपने व्यंग्यों में घोषणा नहीं करते थे, उसे संवेदित होने देते थे। जैसे बिजली इंसुलेटेड वायर के भीतर ही भीतर दौड़ती रहती है, यहाँ से वहाँ तक। पर अंत में वह तार झटका भी देता है और प्रकाश भी। इस अर्थ में वे हिन्दी के अनेक वामपंथी लेखकों से विशिष्ट हैं। दुर्भाग्य है कि हिन्दी में संघवाद, विचारधारा और उसके संगठनों का प्राधान्य है। हर संगठन अपने आदमी की तमाम-तमाम चूकों, खामियों, विचलनों को ढाँकने-मूँदने में लगा है। ठीक राजनीतिक दलों की तरह। संप्रदायवाद, भ्रष्टाचार, छल, घोटालों, बेईमानियों का हम गुट निरपेक्ष या संगठन तटस्थ होकर विरोध नहीं करते। परसाई ऐसा करते थे। इसीलिए परसाई की मार चतुर्मुखी होती थी ओर उनका प्रभाव भी इसीलिए सब तरह के पाठकों पर था। ऐसे समय परसाई जी जैसे लेखकों को होना चाहिए। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की एक कविता है, जिसमें अपने अवसान के समय सूर्य पूछता है कि मेरे बाद पृथ्वी का अंधकार कौन दूर करेगा। मिट्टी का एक दिया सामने आया। बोला- अपनी शक्ति भर मैं करूँगा। मैं मिट्टी का वही दिया हूँ।

तुम्हारा परसाईएक विलक्षण पुस्तक है जो काशीनाथ सिंह जी की पुस्तक काशी का अस्सीकी तरह धमाके से विधाओं की वर्जनाओं को तोड़ती है। संस्मरणात्मक भी यह है लेकिन उससे ज्यादा परसाई के जीवन और लेखन का मोनोग्राफ। क्या आपको ऐसा नहीं लगता?

विधाओं का वर्गीकरण तो साहित्य शास्त्रियों ने सुविधा के लिए कर रखा है। विधाओं की चौहद्दी में बँधने से रचनाकारों की क्रियेटिविटी बाधित होती है। जैसे बहुत घिसने से बासन का मुलम्मा छूट जाता है, वैसे ही पीढ़ी दर पीढ़ी काम में आते रहने से विधाओं की दीप्ति भी फीकी पड़ जाती है। समर्थ रचनाकार प्रत्येक युग में साहित्य के परिधान में कुछ न कुछ परिवर्तन करता है। वास्तव में विधाओं की कोई एलओसी नहीं होती। विधाओं का अतिक्रमण करने से साहित्य की थकान मिटती है, साहित्यकार की भी। ‘तुम्हारा परसाई’ को मैंने जानबूझकर परसाई के जीवन, व्यक्तित्व, परिवेश और व्यंग्यशीलता का संस्मरणात्मक आख्यान कहा है। इससे परसाई जी के जीवन के और लेखन के तानों-बानों को समझने में सुविधा होती है। मुझे संतोष है कि इधर हिन्दी के बहुत से लेखक संस्मरण लिखने में रुचि ले रहे हैं। हर पत्रिका के लिए संस्मरण लगभग अनिवार्य हो गए हैं। इन संस्मरणों से हिन्दी साहित्य के वास्तविक इतिहास का कच्चा माल सामने आ रहा है। हिन्दी साहित्य के समकालीन इतिहास की दूसरी परंपरा का सामने आना कई दृष्टियों से वांछनीय है।

अंतिम सवाल, मुझे ठीक से नहीं मालूम लेकिन मैं यह जानना चाहती हूँ कि आपकी धर्मपत्नी साधना जैन का आपके लेखन में कितना सहयोग है- आपकी स्मृति को रिफ्रेश करने में या संदर्भों को दुरुस्त करने में?

साधना मेरी पत्नी हैं पढ़ी-लिखीं, साहित्यिक समझ से भरपूर। घटनाओं के पूर्वापर क्रम की और व्यक्ति द्वारा उच्चरित कथन को ज्यों का त्यों दुहरा सकने की उनमें विलक्षण प्रतिभा है। उर्दू के शेर तो उन्हें ढेरों याद हैं। अपने संस्मरण लेखन में जहाँ कहीं मैं अटकता हूँ, स्मृति का मैगनेट साफ करने में वे मेरी सहायता करती हैं। वे मेरी जीवन-संगिनी हैं फलतः संस्मरण-संगिनी भी। 1962 में मुझसे विवाह के उपरांत वे मेरे सारे मित्रों को जानती हैं और उन्हें समझती भी हैं। मैं डायरी नहीं लिखता पर यदि लिखता तो पत्नी से छिपाकर नहीं रखता। मैं हिन्दी के उन लेखकों में नहीं हूँ जो अपनी पत्नी को दर्जा तीन पर स्थान देते हैं- पहले मेरा लेखन, फिर मेरे दोस्त, फिर तू। मैं उन लेखकों में भी नहीं हूँ जो यह कहकर गौरवान्वित होते हैं, लेखन तो मेरा अपना है, मेरी पत्नी का इसमें कोई योग नहीं है। ऐसे लोग या तो मुझे सामंती पुरुषाना अहंकार से ग्रस्त लगते हैं या अपनी पत्नी को निर्बुद्धि समझते हैं। संयोग से न तो मुझमें वैसा अहंकार है, न ही साधना वैसी निर्बुद्धि हैं।

अपने संस्मरणों में अपनी पत्नी का उल्लेख करने का परिणाम यह हुआ है कि बहुत से संस्मरण लेखक अपनी पत्नी को भी क़ाबिले उल्लेख समझने लगे हैं। एक ने तो अपनी पत्नी को करवाचौथी परिधि से निकालकर साहित्य का कोई पुरस्कार भी दिलवा दिया है। गुजरात की एक धर्मपत्नी ने जिनके पति अच्छे खासे साहित्यकार हैं और जिन्होंने प्रेम विवाह किया था, बड़े दुःख से मुझे लिखा- काश! मेरे पति भी अपने संस्मरणों में उसी सम्मान और स्नेह से मेरा उल्लेख करते जैसे आप अपनी पत्नी का करते हैं। उस उमर में जब साहित्यकार पति और कुछ नहीं कर सकता, उसे इतना तो करना ही चाहिए।

(भारतीय लेखक, अक्टूबर-दिसंबर, 05  से साभार)

ज्ञान प्राप्त करने की कुंजी है कोश : अरविंद कुमार

 
 
 

कोशकार अरविंद कुमार और उनकी पत्नी कुसुम कुमार

आधुनिक युग में हिंदी कोशकारिता के जनक अरविंद कुमार पिछले तीन दशक से शब्द संकलन कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने अपनी जमी-जमाई नौकरी छोड़ी और महर्षि जैसे जीवन चुना। बीस साल की अटूट मेहनत के बाद उन्होंने हिंदी को अनमोल खजाना दिया- समांतर कोश। इसका प्रकाशन 1996 में नेशनल बुक ट्रस्ट ने किया। पेंगुइन से प्रकाशित द्विभाषी समांतर कोश से हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाएं समृद्ध हुई हैं। शब्द, शब्द की महत्ता, कोशकारिता के जन्म और उसके विकास पर उनसे बातचीत :

हमारे जीवन में शब्द का क्या महत्व है?
शब्द भाषा की सर्वाधिक महत्वपूर्ण और अपरिहार्य कड़ी है। हमारे संदर्भ में शब्द का केवल एक अर्थ है- एकल, स्वतंत्र, सार्थक ध्वनि। वह ध्वनि जो एक से दूसरे तक मनोभाव पहुंचाती है। संसार की सभी संस्कृतियों में इस सार्थक ध्वनि को बड़ा महत्व दिया गया है। संस्कृत ने शब्द को ब्रह्म का दर्जा दिया है। शब्द जो ईश्वर के बराबर है, जो फैलता है, विश्व को व्याप लेता है। ग्रीक और लैटिन सभ्यताओं में शब्द की, लोगोस की, महिमा का गुणगान विस्तार से है। ईसाइयत में शब्द या लोगोस को कारयित्री प्रतिभा(क्रीएटिव जीनियस) माना गया है। कहा गया है कि यह ईसा मसीह में परिलक्षित ईश्वर की रचनात्मकता ही है। Read more

अरविंद कुमार: लगन से किए सपने सच

लेकिन सपने साकार करना बहुत मुश्किल। सपनों को साकार करने के लिए किस तरह की दृढ़ इच्छा शक्ति की जरूरत होती है, कैसे सुख-आराम भूल जाना पड़ता है और किस तरह लगन से काम किया जाता है, इसकी मिसाल हैं- समांतर कोश के कोशकार अरविंद कुमार। Read more