
पंजाबी के वरिष्ठ कवि सुरजीत पातर को हाल ही में सरस्वती सम्मान प्रदान किया गया। साहित्य अकादेमी सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित पातर का जन्म 1944 में जालंधर, पंजाब के एक गांव में हुआ। उनका पहला कविता संग्रह 1978 में हवा विच लिखे हर्फ प्रकाशित हुआ। अपनी कविताओं में साफगोई और बेबाकी के लिए प्रसिद्ध पातर की रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उनसे युवा पत्रकार संजीव माथुर की बातचीत के अंश-
क्या आप लफ्जों की सूफीयाना इबादत करते हैं?
मैं जिस माहौल में पला-बढ़ा हूं उसकी फिजा में ही गुरुबानी रची-बसी है। इसीलिए मेरी कविता में आपको लोकधारा, गुरुबानी और भक्ति या सूफी धारा का सहज प्रभाव मिलेगा। दरअसल मेरे चिंतन और कर्म दोनों में जो है वह प्रमुखत: मैंने पंजाब की फिजा से ही ग्रहण
किया।
एक बात और जुड़ी है। वह यह कि मैं जब भी दुखी होता हूं तो लफ्जों की दरगाह में चला जाता हूं। इनकी दरगाह में मेरा दुख शक्ति और ज्ञान में ट्रांसफॉर्म हो जाता है। यह ट्रांसफॉर्ममेंशन मुझे एक बेहतर इंसान बनाने में मददगार होता है। ध्यान रखें कि कविता मानवता में सबसे गहरी आवाज है।
पर आप को पढ़ते हुए कहीं-कहीं महसूस होता है कि अंधेरे दौरों से पैदा हुई उदासी की वजह भी दरगाह की तलाश को विवश कर रही है?
नहीं ऐसा नहीं है। मैं अक्सर कहता हूं कि संताप या दुख को गीत बना ले, चूंकि मेरी मुक्ति की एक राह तो है। अगर और नहीं दर कोई ये लफ्जों की दरगाह तो है। इसलिए लफ्जों की दरगाह मेरे लिए एक ऐसा दर है जो मुझे इंसा की मुक्ति की राह दिखता है। और जो दर मुक्ति की राह दिखाए वह उदासी को भी ताकत में तब्दील करने कर देता है। जिंदगी आत्मसजगता में है। शब्दों की गहराई में समा जाओं तो दुख छोटे पड़ जाएंगे।
माना जाता है कि सातवें दशक में उभरी पंजाबी कविता ने साहित्य में दो ऐसे नाम दर्ज कराए जिनके बिना भारतीय कविता के आधुनिक परिदृश्य की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। ये नाम है पाश और पातर। पाश की कविता पर माक्र्सवाद का साफ प्रभाव है, आप किस विचार या लेखक से प्रभावित महसूस करते हैं?
मैं कविता का प्यासा था। मैंने विश्व काव्य से लेकर भारतीय साहित्य तक में सभी को पढ़ा। लोर्का हो या ब्रेख्त। शुरुआत में मुझ पर बाबा बलवंत का खासा प्रभाव पड़ा। इनकी दो किताबों ने खासा बांधा था- बंदरगाह व सुगंधसमीर। मेरी शुरुआती कविताओं पर इनका प्रभाव साफ देखा जा सकता है। पर मुझ पर हरभजन, सोहन सिंह मीशा, गालिब, इकबाल और धर्मवीर भारती का भी खासा प्रभाव रहा है। इसके अलावा शिव कुमार बटालवी और मोहन सिंह ने भी मुझे और मेरे लेखन को प्रेरित किया है। मैं राजनीति में कभी सीधे तौर पर सक्रिय नहीं रहा। जहां तक विचारधारा की बात है तो मैं साफ तौर पर मानता हूं कि लोकराज हो पर कल्याणकारी राज्य भी हो। इसीलिए मैंने लिखा है कि -
मुझमें से नेहरू भी बोलता है, माओ भी
कृष्ण भी बोलता है, कामू भी
वॉयस ऑफ अमेरिका भी, बीबीसी भी
मुझमें से बहुत कुछ बोलता है
नहीं बोलता तो सिर्फ मैं ही नहीं बोलता।
पर जो दौर आपकी काव्य रचना की शुरुआत का है, वही वक्त वामपंथ में उथल-पुथल का दौर था। पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला जहां आप छात्र थे वह नक्सलवादी गतिविधियों का केंद्र था। आपके के कई मित्र पंजाब स्टूडेंट्स यूनियन में सक्रिय थे। इस माहौल का आप पर क्या असर पड़ा?
जैसे मैंने पहले कहा कि मैं किसी राजनैतिक समूह का कार्यकर्ता तो नहीं था। इसीलिए नक्सलवाद के राजनीतिक पक्ष के बारे में तो आपको मेरी कविताओं में सीधे कोई नारा शायद न मिले, पर यह भी सच है कि इस विचार के मानवीय पक्ष- जैसे नवयुवकों की त्याग भावना, विचार के आधार पर मर-मिटने का जज्बा व गहरे और उष्म मानवीय संबंधों ने मुझे गहरे तक प्रभावित किया है। इस प्रभाव को आप मेरे सौंदर्यबोध में पा सकते हैं। इस दौर में एक दोस्त था रुपोश, जिसने माक्र्सवाद से परिचय करने में अहम भूमिका निभायी। पर मेरी पीएसयू के साथियों से लगातार हिंसा व लेखकीय स्वतंत्रता को लेकर बहस चलती रहती थी। इसके बावजूद मेरी सहानुभूति
उनके साथ थी। चौक शहीदां में उसका आखिरी भाषण में मैंने साफ कहा है कि -
चलो यह चौक छोडें
किसी चौरस्ते पर पहुंचे
और वहां जाकर फिर दुविधा में पड़ें
यहां दुविधा में पड़ना फिर लौटकर कोख में पड़ना है
तुम्हें मैं क्या बताऊं कीमती दोस्तों
तुम तो जानते हो
कि जिस चौक में
अपने हंसमुख हमउम्रों का खून बह जाए
फिर वह चौक चौरास्ता नहीं रहता,
जिन चौकों में अभी हमउम्रों का खून बहाना है
वे आगे हैं।
वैसे मैं अपनी कविता और जीवन में कभी ऊंचे पैडिस्टियल से बात नहीं करता। मैं आम के बीच में ही खुद को सहज महसूस करता हूं। मैंने ये भी लिखा है कि – मेरा जी करता है कि जंगल में छिपे गोरिल्ले से कहूं, ये लो मेरी कविताएं जलाकर आग सेंक लो।
इमरजेंसी और पंजाब में आंतक का एक पूरा दौर आपने देखा है। कैसे देखते हैं इन दोनों अंधेरे दौरों को?
इमरजेंसी पर मैंने कहा था कि कुछ कहा तो अंधेरा सहन कैसे करेगा, चुप रहा तो शमांदान क्या कहेंगे। जीत की मौत इस रात हो गई, तो मेरे यार मेरा इस तरह जीना सहन कैसे करेंगे। बुढ़ी जादूगरनी भी इमरजेंसी और सत्ता के दमनकारी पक्षों का सूक्ष्म व्यंग्य के साथ पर्दाफाश करती है। इमरजेंसी या आतंकवाद हमारे लोकतांत्रिक समाज पर धब्बा है। यह दौर कवि और कविता के लिए सर्वाधिक घातक थे।
आंतकवाद पर तो मैंने बिरख अर्ज करें में काफी कुछ कहा है। कुछ कविताओं जैसे कि
मातम,
हिंसा,
खौफ,
बेबसी
और अन्याय -
यें हैं आजकल नाम मेरे दरियाओं के।
या फिर एक लरजता नीर था को मैंने पाश को समर्पित किया है। एक दरिया को भी आप इसी संदर्भ में पढ़ सकते हैं। इसी संदर्भ में मैंने लिखा था – इस अदालत में बंदे वृक्ष हो गए, फैसले सुनते-सुनते सूख गए । इन्हें कहो कि ये अब अपने उजड़े घरों को लौट जाएं। ये कब तक यहां खड़े रहेंगे।
साहित्य का राजनीति से कैसा रिश्ता होना चाहिए?
बेशक प्रतिरोध की राजनीति साहित्य के फोकस में होनी चाहिए। व्यंग्य इसमें एक कारगर औजार हो सकता है। जैसे कि मैंने गहरे क्रंदनों को क्या मापना में कहा है कि जद तक उह लाशां गिणदें आपा वोटां गिणिए (जब तक वह लाशों को गिनते हैं आप वोटों को गिने)। सुलगता जंगल में भी आप इसकी झलक देख सकते हैं। साहित्य और लेखक की अपने वक्तों के प्रति एक जिम्मेदारी यह भी होती है कि वह इसको साफ साफ देखें और दिखाएं। ध्यान रखना चाहिए कि हम चाहे या न चाहें राजनीति या अपने माहौल से उदासीन होकर की गई साहित्य की रचना कमजोर होती है। उसमें मानवीय उष्मा की गरिमा नहीं होती है। साहित्य या रचना में हमारी मैं भी सिर्फ हमारी मैं नहीं होती है वह कवि खुद ही नहीं होता है।
क्या रचना की रचना एक निजी मामला नहीं है?
देखिए, कवि या लेखक की मैं भी उसने खुद नहीं बनाई होती है। वह भी समाज से उसने पाई है। इसीलिए रचना एक हद ही निजी होती है, पर उसके बावजूद वह होती एक सामाजिक प्रक्रिया का हिस्सा ही है।
वैश्वीकरण का हमारे समाज पर क्या असर पड़ा है?
वैश्वीकरण के प्रक्रिया ने सरकार की संकल्पना को कमजोर किया है। आज हमारी सरकारे बस लॉ एंड ऑर्डर का थाना भर बन कर रह गई हैं। शिक्षा और सेहत की जिम्मेदारी सरकार को उठानी चाहिए। पर कानूनों के बावजूद सरकारें इसे लागू करने से बच रही हैं। वह इसे किसी और के कंधे पर डालना चाह रही हैं। शिक्षा की तो एक लहर चलनी चाहिए। शिक्षा में असमानता खत्म होनी चाहिए। इसी असमानता के कारण गांवों के बच्चे अच्छे विश्वविद्यालयों में दाखिला नहीं ले पाते हैं। सेहत के मामले में भी ऐसा ही हो रहा है। शिक्षा और सेहत सबकी पहुंच में हो और यह करने की जिम्मेदारी सरकार की है, न की बाजार की। वैश्वीकरण ने सरकार को इस
जिम्मेदारी से आजाद करने में नकारात्मक भूमिका निर्वाह की है। इसके अलावा वैश्वीकरण की बयार ने हमारे मानवीय संबंधों को भी खासा प्रभावित किया है। माइग्रेट लेबर का सवाल एक बड़ा सवाल है। मेरी कविता आया नंदकिशोर में इस दर्द को
समझने की कोशिश आपको दिखाई देगी।
आपने शिरोमणि अवार्ड क्यों ठुकराया था?
मेरा मानना है कि पुरस्कारों में राजनीतिज्ञों का दखल नहीं होना चाहिए। इस पुरस्कार देने की प्रक्रिया में राजनीतिज्ञों का खासा दखल था। यह मुझे गवारा नहीं था सो मैंने यह पुरस्कार ठुकरा दिया।
कैसे रचते हैं अपनी कविताएं?
कविता को खोजते या रचते समय राजनीति, प्रकृति और आदम की बुनियादी इच्छाएं मेरी कविता में बुन जाती हैं। पर कविता में ये सचेतन नहीं आती है सहज-स्वाभविक हो तभी आती हैं। मैं खुद पर कोई विचारधारा लादता नहीं हूं। मैं कविता से विचारधारा नहीं करता हूं। मेरी प्रतिबद्धता इंसा और लोगों के साथ बनती है।
आजकल रचनात्मक व्यस्ताएं क्या हैं?
आजकल भाषा पर और उसके विज्ञान पर ध्यान दे रहा हूं। भाषावैज्ञानिकों ने यह काम छोड़ रखा है। मां बोली यानि मातृ-भाषा पंजाबी के विकास पर काम कर रहा हूं। यात्रा संस्मरण लिखने की भी योजना है। शीर्षक होगा सूरज मंदिर दां पौडियां।
अपने घर- परिवार के बारे में कुछ बताएं?
मेरा बचपन खुशहाल नहीं था। काम करने के लिए पिता हरभजन सिंह पूर्वी अफ्रीका चले गए । घर में चार बड़ी बहनें और मां हरभजन कौर के साथ खासे संघर्ष के दिन बिताए। पिता मां की मृत्यु पर नहीं आ सके। इसका दर्द जीवन भर रहेगा। कवि नहीं होता तो गायक होता। मेरी पत्नी भूपिंदर ने हमेशा साथ निबाहया है। दो बेटे हैं अंकुर और मनराज। बडे़ की शादी हो गई है।
नए लेखकों को कुछ राय?
देखों मैं अपनी कविता में भी उपदेश देने से बचता हूं। इसीलिए सिर्फ कुछ मशविरे हैं। जैसे फैशन की पीछे नहीं भागो। मन में गहरा झांक कर देखों। लेखन में एक कंटीनियूटी होनी चाहिए। परम्परा और वर्तमान का संजीदा भान व ज्ञान होना चाहिए। जैसे बे्रख्त के बारे तो आज बहुत सों को पता होता पर बुल्लेशाह या वारिस के बारे में भी मालूम होना चाहिए। स्टाइल पर जोर न हो। परिवेश से जुड़े। निरंतरता और बदलाव की समझ हो। सोचना चाहिए कि लोग हमसे दूर क्यों हो रहे हैं। मैं अक्सर युवा साथियों से कहता हूं- वो लोग जा रहे हैं आज की कविता से दूर, तो हजूर होगा इसमें भी आपका कुछ कसूर।
(कादम्बिनी से साभार)



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