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शमशाद बेगम की शख्सियत के साथ कोई मिक्सिंग संभव नहीं

शमशाद बेगम

शमशाद बेगम

नई दिल्ली: मंगलवार 23 अप्रैल को मशहूर पार्श्‍वगायिका शमशाद बेगम हमारे बीच नहीं रहीं। चालीस और पचास के दशक के फिल्मों की लोकप्रिय गायिका शमशाद बेगम की आवाज में गाए गए कई गीत बाद के दौर में भी लोकप्रिय रहे। वह जीवित थीं इसका कोई खास ख्याल बाजार और फिल्म उद्योग को नहीं रहा, पर उनकी खनकदार आवाज में गाए गए कई मशहूर गानों को नब्बे के बाद गीत-संगीत के रिमिक्स के बाजार द्वारा खूब इस्तेमाल किया गया। चुलबुले, तीक्ष्ण और वजनदार आवाज वाले उन गानों के साथ जिस तरह के उत्तेजक दृश्यों को मिक्स किया गया, उससे उन गानों में मौजूद पवित्रता, नैसर्गिकता और अबोध अल्हड़पन का मानो एक तरह से विनाश तो हुआ, लेकिन यह भी साबित हुआ कि चालीस-पचास के दशक में उन्होंने लयकारी और शोखी का जो अंदाज रचा था, उसके सामने नए जमाने का संगीत कितना फीका लगता है। फिर भी बाजार उन गानों को गाने वाली शख्सियत को अपने साथ मिक्स नहीं कर सका। उस व्यक्तित्व के साथ कोई रिमिक्सिंग संभव नहीं था। वह शोहरत की पागल दौड़ और खुद को सुर्खियों में रखने की होड़ से मुक्त थीं। कई दशक पहले उन्होंने फिल्म और संगीत उद्योग से खुद को अलग कर लिया था।

शमशाद बेगम का जन्म पंजाब के अमृतसर में 14 अप्रैल 1919 को हुआ था। एक परंपरागत मुस्लिम परिवार में जन्मी मियां हुसैन बख्श और गुलाम फातिमा की आठ संतानों मे से एक शमशाद को बचपन से ही गाने का शौक था। ग्रामोफोन पर बजने वाले गानों की वह नकल करती थीं। मोहर्रम के मर्सिये भी याद करके सुनाती थीं। बचपन से ही वह मशहूर गायक के.एल. सहगल की प्रशंसक थीं और बताती थीं कि उनकी फिल्म ‘देवदास’ उन्होंने 14 बार देखी। उनके गाने के शौक को उनके चाचा ने काफी प्रोत्साहित किया। 13 साल की उम्र में जीनोफोन कंपनी ने उनकी आवाज में एक पंजाबी गाना रिकार्ड किया, जो बेहद मकबूल हुआ। उसी कंपनी से मशहूर संगीतकार गुलाम हैदर भी जुड़े हुए थे, जो शब्दों के शुद्ध उच्चारण की उनकी क्षमता के प्रशंसक हो गए। 1937 में उन्हें लाहौर रेडियो स्टेशन में गाने का मौका मिला, फिर उन्होंने पेशावर रेडियो और दिल्ली रेडियो स्टेशन के लिए भी गाने गाए। कहते हैं कि रेडियो पर उनकी आवाज को सुनकर ही कई संगीत निर्देशकों ने उन्हें अपनी फिल्मों के लिए गवाने की पेशकश की। 1939 में बैरिस्टर गणपतलाल बट्टो के साथ उनका विवाह हुआ और उसके बाद 1940 में फिल्मों के लिए गाने का सिलसिला शुरू हुआ। 1940 में उन्होंने पंजाबी फिल्म ‘यमला जट’ के लिए पहली बार गाया। इसके बाद पंजाबी फिल्म ‘चौधरी’ में उन्हें गाने का मौका मिला। दोनों फिल्मों के गाने बेहद मकबूल हुए। उनकी आवाज के प्रशंसक संगीतकार गुलाम हैदर ने ‘खजांची’(1941) और ‘खानदान’ (1942) में उनसे गवाया। फिर उन्हीं के साथ 1944 में वह मुंबई चली आईं और अगले दो दशक से अधिक समय तक वह हिन्‍दी सिनेमा की ऐसी गायिका बनी रहीं, जिनकी खनकदार आवाज का जादू सब पर तारी रहा। गुलाम हैदर, सी. रामचंद्र, खेमचंद्र प्रकाश, राम गांगुली, एस.डी. वर्मन, नौशाद और ओ.पी. नय्यर सरीखे अपने दौर के सारे प्रतिभावान संगीतकारों के लिए उन्होंने गाने गाए। नौशाद और ओ.पी.नय्यर ने उनकी आवाज की खासियत को सर्वाधिक समझा, इसलिए कि शमशाद बेगम की आवाज में जो एक देशज खनक थी, लोकगायिकी और लोकस्वर का जो अंदाज था, मिट्टी का खुरदुरापन और उसकी जो महक थी, वह लोकधुनों के पारखी इन संगीतकारों के संगीत में और भी निखर गई। हालांकि यह शमशाद बेगम की ही आवाज थी, जिसे सी. रामचंद्र ने ‘आना मेरी जान संडे के संडे’ जैसे पाश्चात्य शैली वाले गानों में जबर्दस्त तरीके से उपयोग किया। यह कम ही लोगों को पता है कि शास्त्रीय संगीत की उन्होंने बाकायदा शिक्षा ली थी। वह सारंगी के उस्ताद हुसैन बख्शवाले साहेब की शागिर्द थीं। बचपन के दिन भुला न देना ( दीदार ), दूर कोई गाए (बैजू बावरा), छोड़ बाबुल का घर, होली आई रे कन्हाई, ओ गाडी वाले गाडी धीरे हाँक रे (मदर इंडिया),  मेरे पिया गए रंगून (पतंगा), मिलते ही आंखें दिल हुआ दीवाना किसी का (बाबुल), सैया दिल में आना रे (बहार), धरती को आकाश पुकारे, मोहन की मुरलिया बाजे (मेला), तेरी महफिल में किस्मत आजमा कर (मुगल-ए-आजम), लेके पहला पहला प्यार, कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना (सी.आई.डी), कभी आर कभी पार (आर पार), कजरा मुहब्बत वाला(किस्मत) जैसे सदाबहार गाने शमशाद बेगम की याद को हमेशा जिंदा रखेंगे। शमशाद बेगम ने कभी अपना म्यूजिकल ग्रुप ‘द क्राउन थिएट्रिकल कंपनी ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट’ भी बनाया था जिसके जरिए उन्होंने पूरे देश में प्रस्तुतियां दी थीं।

भारत सरकार को बहुत देर से उनकी याद आई। जब पद्मभूषण जैसे पुरस्कारों की साख खत्म हो चुकी थी और इसके लिए जोड़तोड़ और सत्ता से नजदीकी एक खुला पैमाना बन चुका था, तब 2009 में उन्हें ‘पद्मभूषण’ दिया गया। शमशाद बेगम जिन्होंने हिंदी-उर्दू के अलावा पंजाबी, बंगाली और अन्य भारतीय भाषाओं में 500 से ज्यादा गाने गाए, जो हमेशा अपना फोटो खिंचवाने से बचती रहीं, उनकी आवाज ही उनकी पहचान है, वही विश्वसनीय है और विश्वसनीय है श्रोताओं की पसंद, सरकारी सम्मान और रिमिक्सिंग का उपभोक्ता समाज उसके सामने कोई महत्व नहीं रखता। शमशाद बेगम के एक प्रशंसक चंद्रकांत मोहन लाल ने उन पर ‘खनकती आवाज शमशाद बेगम‘ नाम की एक किताब लिखी है।

1955 में अपने खाबिंद गनपतलाल बट्टो के निधन के बाद से शमशाद बेगम अपनी बेटी ऊषा रात्रा के साथ रहती थीं। दामाद लेफ्टिनेन्ट कर्नल वाई. रात्रा जहां रहे वे वहीं रहीं और रिटायरमेंट के बाद जब वे स्थायी तौर पर मुम्बई में रहने आ गए तो शमशाद जी भी फिर से मुंबई आ गईं। 1998 में एक गलतफहमी से उनके निधन की खबर आ गई थी। लेकिन इस बार उन्होंने हमेशा के लिए अपने चाहने वालों को अलविदा कह दिया। जन संस्कृति मंच की ओर से शमशाद बेगम को हार्दिक श्रद्धांजलि!

सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी

कबीर कला मंच के संस्कृतिकर्मियों को रिहा करने की मांग

नई दिल्ली: महाराष्ट्र में कबीर कला मंच (पुणे) के इंकलाबी संस्कृतिकर्मियों के खिलाफ लम्‍बे समय से जारी राज्य दमन की हम कठोर शब्दों में निंदा करते हैं और विगत 2 अप्रैल को महाराष्ट्र विधानसभा के समक्ष सत्याग्रह करते हुए गिरफ्तार किए जाने वाले चर्चित संस्कृतिकर्मी शीतल साठे और सचिन माली की अविलंब रिहाई की मांग करते हैं। गर्भवती शीतल साठे को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है और सचिन माली को एटीएस के हवाले कर दिया गया है। इंकलाबी संस्कृतिकर्मियों के साथ राज्य सत्ता का यह पूर्णरूपेण गैर-लोकतांत्रिक और आपराधिक व्यवहार है। अखबार जिसे नक्सल समर्थकों का आत्मसमर्पण कह रहे हैं, वह आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि फर्जी आरोपों के कारण भूमिगत होने के लिए मजबूर किए गए और आतंकवाद निरोधक दस्ता द्वारा निरंतर तलाशी की प्रतिक्रिया में उठाया गया लोकतांत्रिक प्रतिवाद है। जन संस्कृति मंच के हम साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी, बुद्धिजीवी कबीर कला मंच के संस्कृतिकर्मियों के लोकतांत्रिक-संवैधानिक अधिकारों के साथ पूरी तरह एकजुटता जाहिर करते हैं और उनको राज्य मशीनरी द्वारा प्रताडि़त किए जाने तथा उन्हें गिरफ्तार किए जाने के खिलाफ व्यापक स्तर पर प्रतिवाद की अपील करते हैं। जन संस्कृति मंच की सारी इकाइयां इस प्रतिवाद को संगठित करेंगी।

शासकवर्ग की राज्य मशीनरी लगातार दलाल, गुलाम और समझौतापरस्त बनाने की जो सांस्कृतिक मुहिम चलाती रहती है, जिसकी चपेट में बुद्धिजीवियों और कलाकारों का भी अच्छा-खासा हिस्सा आ जाता है, उसके समानांतर अगर कोई जनता की जिंदगी में बदलाव के लिए संस्कृतिकर्म को अपनी जिंदगी का मकसद बनाता है और सामाजिक-राजनीतिक वर्चस्व और शोषण-उत्पीड़न का विरोध करता है, तो वह अनुकरणीय है और उससे समाज में बेहतर परिवर्तन की उम्मीद बंधती है। कबीर कला मंच के संस्कृतिकर्मियों ने दलितों, कमजोर तबकों व मजदूरों के उत्पीड़न, शोषण और उनके हिंसक दमन के खिलाफ लोगों में चेतना फैलाने का बेमिसाल काम किया है। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों की लूट और भ्रष्टाचार के खिलाफ भी अपने गीतों और नाटकों के जरिए लोगों को संगठित करने का काम किया है। यह इस देश और इस देश की जनता के प्रति उनके असीम प्रेम को ही प्रदर्शित करता है।

शीतल और सचिन ने एटीएस के आरोपों से इनकार किया है कि वे छिपकर नक्सलियों की बैठकों में शामिल होते हैं या आदिवासियों को नक्सली बनने के लिए प्रेरित करते हैं। दोनों का कहना है कि वे डॉ.  बाबा साहेब अंबेडकर, अण्णा भाऊ साठे और ज्योतिबा फुले के विचारों को लोकगीतों के माध्यम से लोगों तक पहुँचाते हैं। सवाल यह है कि क्या अंबेडकर या फुले के विचारों को लोगों तक पहुँचाना गुनाह है? क्या भगतसिंह के सपनों को साकार करने वाला गीत गाना गुनाह है? सवाल यह भी है कि अगर कोई संस्कृतिकर्मी माओवादी विचारों के जरिए ही इस देश और समाज की बेहतरी का सपना देखता है, तो उसे अपने विचारों के साथ एक लोकतंत्र में संस्कृतिकर्म करने दिया जाएगा या नहीं?

इसके पहले मई 2011 में एटीएस (आतंकवाद निरोधक दस्ता) ने कबीर कला मंच के सदस्य दीपक डांगले और सिद्धार्थ भोसले को दमनकारी कानून यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया था। दीपक डांगले और सिद्धार्थ भोसले पर आरोप लगाया गया कि वे माओवादी हैं और जाति उत्पीड़न और सामाजिक-आर्थिक विषमता के मुद्दे उठाते हैं। पिछले दो सालों में इस आरोप को साबित करने के लिए कुछ किताबें पेश की गईं और यह तथ्य पेश किया गया कि कबीर कला मंच के कलाकार समाज की खामियों को दर्शाते हैं और अपने गीत-संगीत और नाटकों के जरिए उसे बदलने की जरूरत बताते हैं। प्रशासन के इस रवैये के कारण कबीर कला मंच के अन्य सदस्यों को छुपने के लिए विवश होना पड़ा, जिन्हें राज्य ने ‘फरार’ घोषित कर दिया। राज्य के इस दमनकारी रुख के खिलाफ कबीर कला मंच के इन युवा कलाकारों के पक्ष में प्रगतिशील-लोकतांत्रिक लोगों की ओर से दबाव बनाने के बाद गिरफ्तार कलाकारों को जमानत मिली। जाहिर है कि‍ उसी आरोप में शीतल साठे और सचिन को भी पकड़ा गया है।

हम सिर्फ जमानत से संतुष्ट नहीं है, बल्कि मांग करते हैं कि कबीर कला मंच के कलाकारों पर लादे गए फर्जी मुकदमे अविलंब खत्म किए जाएं और उन्हें तुरंत रिहा किया जाए, संस्कृतिकर्मियों पर आतंकवादी या माओवादी होने का आरोप लगाकर उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को बाधित न किया जाए तथा उनके परिजनों के रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की गारंटी की जाए।

(सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी)

पाश हमारे राष्ट्रकवि हैं : सुधीर सुमन

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क्रान्‍ति‍कारी कवि‍ पाश के शहादत दि‍वस पर सुधीर सुमन का आलेख-

पाश का जन्म 9 सितंबर 1950 को पंजाब के जालंधर जिले के गाँव तलवंडी सलेम में हुआ था। उनका पारिवारिक नाम अवतार सिंह था। उनके पिता सेना में थे और मेजर पद से रिटायर हुए। लेकिन एक मध्यवर्गीय किसान परिवार में जन्में अवतार सिंह किशोर उम्र से ही सामाजिक-राजनीतिक बदलाव की लड़ाई से जुड़ गये और महज 38 साल की उम्र में भारतीय शासकवर्ग द्वारा पैदा किए गये खालिस्तानी पृथकतावादियों की गोलियों से शहीद हुए।

अवतार सिंह ने पंद्रह साल की उम्र में अपनी पहली कविता लिखी और उसी समय उनका जुड़ाव कम्युनिस्ट आंदोलन से हुआ और दो साल बाद जब उनकी पहली कविता प्रकाशित हुई, उसी साल ऐतिहासिक नक्सलबाड़ी विद्रोह हुआ और उसने राष्ट्र, लोकतंत्र और देशभक्ति को आम मेहनतकश जनता की नजर से परिभाषित करने पर जोर दिया। पाश एक बौद्धिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता की तरह उस आंदोलन से जुड़ गये। उन्होंने राजनीति और साहित्य ही नहीं, बल्कि विज्ञान और दर्शन का भी जमकर अध्ययन किया। नक्सलवादी आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं का उनके यहाँ जमावड़ा होने लगा। मात्र 19 साल की उम्र में उन्हें एक झूठे केस में फँसाकर जेल में डाला गया और भीषण यंत्रणाएं दी गईं। लेकिन उनके इंकलाबी विचारों को कुचलने में शासकवर्ग विफल रहा। उस लोहे को नष्ट करने में उसे सफलता नहीं मिली, बल्कि लोहा फौलाद में ढलता गया। कवितायें जेल से बाहर आती रहीं और 1970 में उनका पहला कविता संग्रह ‘लौहकथा’ प्रकाशित हुआ, जिसमें 36 कविताएं थीं, जिन्होंने हिन्‍दी की क्रान्‍ति‍कारी कविता को नई चमक और आवेग दे दी। यह जनता का लोहा था, जिस लोहे में उसकी आकांक्षा, प्रतिरोध और उसके नैतिक मानवीय मूल्यों बड़ी मजबूती से मुखरित थे- मैंने लोहा खाया है/आप लोहे की बात करते हो/लोहा जब पिघलता है/तो भाप नहीं निकलती/जब कुठाली उठानेवालों के दिलों से/भाप निकलती है/तो लोहा पिघल जाता है/पिघले हुए लोहे को/किसी भी आकार में/ढाला जा सकता है।

पाश ने ज्यादातर कवितायें पंजाबी में ही लिखीं। जिस कविता को हिन्‍दी में उपलब्ध उनकी एकमात्र कविता बताया जाता है, उसकी पंक्तियाँ देखने लायक हैं- ‘वो मेरा वर्षों को झेलने का गौरव देखा तुमने?/ इस जर्जर शरीर में लिखी/लहू की शानदार इबारत पढ़ी तुमने?’ और सचमुच हिन्‍दी ही नहीं,  दूसरी भारतीय भाषाओं के पाठकों ने भी लहू की उस शानदार इबारत को पढ़ा और लहू के रिश्ते सा ही आत्मीय महसूस किया। जिस तरह भगतसिंह हमारे राष्ट्रनायक हैं, उसी तरह पाश मुझे अपने राष्ट्रकवि लगते हैं, जनता के वास्तविक राष्ट्र के स्वप्न को आकार देने वाले और उसे हकीकत में बदलने के लिये चलने वाले संघर्षों के साथी कवि। अपनी चर्चित कविता ‘भारत’ में उन्होंने लिखा है-

भारत-
मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द
जहाँ कहीं भी प्रयोग किया जाए

बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं। जाहिर है उनके लिए ‘भारत’ ऐसा शब्द नहीं है, जिसकी रक्षा के नाम पर जनता के जनवादी अधिकारों और उसके लिए चलने वाले आंदोलनों को शासकवर्ग कुचलता है। बकौल पाश-

इस शब्द के अर्थ
खेतों के उन बेटों में है
जो आज भी वृक्षों की परछाइयों से
वक्त मापते हैं
उनके पास, सिवाय पेट के, कोई समस्या नहीं….
उनके लिए जिंदगी एक पंरपरा है
और मौत के अर्थ हैं मुक्ति

अवतार सिंह साहित्य की दुनिया में पाश के नाम से मशहूर हुए। पिछले चार दशक की भारतीय कविता की दुनिया में पाश एक ऐसा नाम है, जिसे किसी भी स्थिति में नजरअंदाज करना सम्‍भव नहीं है। उनकी कवितायें क्रान्‍ति‍कारी कम्युनिस्ट आंदोलन की प्रतिनिधि आवाज तो बनी ही हुई हैं, जिस तरह शहीद-ए-आजम भगतसिंह के नारे और कई कथन भारतीय जनता के रोजमर्रा जीवन का हिस्सा बन गये, हर किस्म के परिवर्तनकामी शक्तियों ने जिस तरह इंकलाब जिंदाबाद को अपना लिया, उसी तरह पाश की कविता की पंक्तियाँ उद्धृत की जाती हैं। ‘हम लड़ेगे साथी’ और ‘सबसे खतरनाक’ जैसी कवितायें। ये दोनों कालजयी कवितायें हैं और हर किस्म की गुलामी के खिलाफ आजाद जिंदगी के लिये हर स्तर से लड़ने के लिये और बदलाव के सपनों को न मरने देने के लिए प्रेरित करती हैं- जब बंदूक न हुई, तब तलवार होगी/जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी/लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की जरूरत होगी/और हम लड़ेंगे साथी…..

आजादी के आंदोलन के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए और भविष्य में देशी और विदेशी शासकवर्ग के बीच समझौते की आशंका जताते हुए भगतसिंह ने यही तो कहा था कि शोषण के विरुद्ध जनता की लड़ाई भिन्न-भिन्न रूपों में जारी रहेगी। पाश के आदर्श भगतसिंह थे और उन्होंने लिखा था कि लेनिन की पुस्तक के उस मुड़े हुए पन्ने से पंजाब की नौजवानी को वे आगे बढ़ाना चाहते हैं, जिसे छोड़कर भगतसिंह फाँसी पर चढ़े थे। आज पाश पंजाब ही नहीं, भारत के हर उस नौजवान के प्रिय कवि हैं, जो मौजूदा व्यवस्था से असंतुष्ट और आक्रोशित है और इसमें बदलाव चाहता है।

हमारे दौर में जिस तरह जीवन के संकट और असुरक्षा के बहाने हमारे भीतर यथास्थिति के तर्क घर करते जाते हैं, पाश की कविता ‘सबसे खतरनाक’ उसी से टकराती है- ‘मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती/पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती/गद्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती/….सबसे खतरनाक होता है/मुर्दा शांति से भर जाना/न होना तड़प का सब सहन कर जाना/घर से निकलना काम पर/और काम से लौटकर घर आना/सबसे खतरनाक होता है/हमारे सपनों का मर जाना।’ अकारण नहीं है कि हमें एक यंत्र या गुलाम में तब्दील कर देने वाली राजनीतिक पार्टियों और शासकवर्ग को सपनों को इस तरह जगाए रखने की कोशिश खतरनाक लगती है, पाठ्यक्रम में पाश की कविता होना खतरनाक लगता है। एक दूसरी कविता में उन्होंने लिखा है- ‘हम अब खतरा हैं सिर्फ उनके लिये/जिन्हें दुनिया में बस खतरा ही खतरा है’। ‘युद्ध और शांति’, ‘प्रतिबद्धता’, ‘पुलिस के सिपाही से’, ‘जहाँ कविता खत्म होती है’, ‘बेदखली के लिए विनयपत्र’, ‘धर्मदीक्षा के लिए विनयपत्र’, ‘सलाम’, ‘घास’, ‘वफा’, ‘सच’, ‘जिंदगी/मौत’ जैसी उनकी कई कवितायें हैं, जो बार-बार उद्धृत की जाती हैं। वर्ग-संघर्ष को वह जनता की मुक्ति का रास्ता समझते हैं और यह कभी नहीं भूलते कि ‘यहाँ हर जगह पर एक बार्डर है/जहाँ हमारे हक खत्म होते हैं/और प्रतिष्ठित लोगों के शुरू होते हैं।’ और प्रतिष्ठित लोगों यानी शासकवर्ग हमेशा उनके निशाने पर रहता है। इस लिहाज से अपेक्षाकृत कम उद्धृत की जाने वाली कविता ‘द्रोणाचार्य के नाम’ को भी देखा जा सकता है।

नक्सलबाड़ी आंदोलन की खासियतों को रेखाँकित करते हुए प्रो. नामवर सिंह ने कहा था कि उसने साहित्य का रुख गाँवों की ओर मोड़ा, पाश की कविता और उनके रचनाकार-व्यक्तित्व दोनों पर यह बात लागू होती है। उन्होंने ‘सिआड़’, ‘हेम ज्योति’ ‘हाँक’ और ‘एंटी-47’ का सम्‍पादन करते हुए कई महत्वपूर्ण साहित्यिक-राजनीतिक लेख लिखे। 1971 में जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने अपने गाँव से ‘सिआड़’ पत्रिका निकाली। 1982-83 में उन्होंने गाँवों में हस्तलिखित पत्रिका ‘हाँक’ को लोगों के बीच वितरित करने काम भी किया। यह लोगों की वैचारिक-राजनीतिक चेतना को उन्नत बनाने की ही कोशिश थी।

पाश वामपंथ के पिछलग्गूपन को कतई पसंद नहीं करते थे। ‘हमारे समयों में’ नामक अपनी बहुचर्चित कविता में उन्होंने लिखा-

यह शर्मनाक हादसा हमारे ही साथ होना था
कि दुनिया के सबसे पवित्र शब्दों ने
बन जाना था सिंहासन की खड़ाउँ
मार्क्‍स का सिंह- जैसा सिर
दिल्ली की भूल-भुलैयों में मिमियाता फिरता
हमें ही देखना था
मेरे यारों, यह कुफ्र हमारे ही समयों में होना था।

मगर इस कुफ्र के बावजूद न वह निराश हुए न उनकी कविता। वह एकाधिकारवादी राष्ट्रवाद और पृथकतावाद दोनों से लड़ते रहे और खालिस्तानी उग्रवादियों की गोलियों से भगतसिंह की शहादत के दिन ही शहीद हुए।

अगर उन्हीं की कविता पंक्तियों से उन्हें याद किया जाए, तो ‘प्रतिबद्ध’ कविता की ये पंक्तियाँ बिल्कुल वाजिब हैं उनके लिये-

हम झूठमूठ का कुछ भी नहीं चाहते
और हम सब कुछ सचमुच का देखना चाहते हैं
जिंदगी, समाजवाद या कुछ और

बाजार के दबावों के खिलाफ एक खामोश प्रतिवाद थे गणेश पाइन

ganesh pyne

पेंटर ऑफ डार्कनेस के नाम से मशहूर चि‍त्रकार गणेश पाइन का 12मार्च 2013 को नि‍धन हो गया। जन संस्‍कृति‍ मंच की ओर से श्रद्धांजलि‍-

नई दिल्ली: बाजार के दबावों और उसकी शर्तों के खिलाफ एक खामोश प्रतिवाद की तरह सृजनरत रहने वाले मशहूर चित्रकार गणेश पाइन का मंगलवार 12  मार्च को कोलकाता के एक अस्पताल में दिल के दौरे से निधन हो गया, सीने में दर्द के कारण उन्हें सोमवार को वहाँ भर्ती किया गया था।

1937 में जन्मे गणेश पाइन आजादी के बाद की दूसरी पीढ़ी के कलाकार थे और कई मामले में अपने समकालीनों में सर्वथा अलग थे। अपनी कला के प्रचार के प्रति प्रायः उदासीन रहने वाले गणेश पाइन लोकस्मृतियों, परम्‍परा और जनजीवन को एक कलाकार की कल्पना से जोड़कर पेश करने के लिए चर्चित रहे। उन्होंने इसका जिक्र कई बार किया कि कैसे उन्होंने एक बूढ़े मोची का चित्र बनाया, तो पूरा होने पर ध्यान में डूबे किसी दार्शनिक की तरह लगने लगा, कि कैसे किसी सफाई मजदूर का चित्र उन्होंने बनाया, तो उसका चेहरा कवि की तरह नजर आने लगा। अपने चित्रों में वस्तु या यथार्थ को हुबहू पेश करने की बजाय उसे अपनी मनःस्थितियों के अनुरूप पेश करना उन्हें ज्यादा भाता था। और यह मन  मानो दादी माँ की कथाओं में मग्न बच्चे का मन था, जहाँ ‘हत्यारा’ अचानक कहीं से नहीं टपक पड़ता था, बल्कि अतीत से निकलकर आता था, लोककथाओं से निकले किसी पुराने योद्धा की वेशभूषा में पुराने किस्म की ही तलवार लेकर। वे बताते थे कि बचपन में दादी माँ के मुँह से सुनी कहानियों का भी असर उनके चित्रों पर था। ‘हत्यारा’ शीर्षक चित्र मानो आज के हत्यारों की वंश परम्‍परा का दस्तावेज है। राजा, रानी, सौदागर, रथ आदि उनके चित्रों में नजर आते हैं- एक पूरा अतीत है, जिसे आजादी के बाद की पीढ़ी ने प्रत्यक्ष नहीं देखा, लेकिन जो विभिन्न रूपों में उसके अवचेतन का हिस्सा बने हुए हैं। यहाँ यह गौर करने लायक है कि अन्य भारतीय कलाकारों की तरह मिथकीय देवी-देवता, महापुरुष या ऐतिहासिक राजा-रानी को उन्होंने अपने चित्रों का विषय नहीं बनाया, बल्कि वे नामहीन हैं, किसी ऐतिहासिक या मिथकीय संदर्भ से उनका नाता नहीं है। गणेश पाइन के एक चित्र का शीर्षक ही है- ‘एक प्राचीन पुरुष की मृत्यु’। वे प्राचीन दुनिया की कल्पनाओं में हमेशा खोए रहने वाले व्यक्ति नहीं थे, भविष्य की कल्पनाएं उन्हें भाती थी, उन्हें टीवी पर साइंस फिक्शन वाले सीरियल देखना पसंद था। कविताओं में उनकी दिलचस्पी थी और जीवनानंद दास उनके प्रिय कवि थे।

उन्हें पेंटर ऑफ डार्कनेस यानी अंधेरे का चित्रकार भी कहा गया, क्योंकि मौत की छाया उनके कई चित्रों में दिखती है। इसका कारण वे बताते थे कि नौ साल की उम्र में ही 1946 में उन्होंने दंगे में मारे गए लोगों को करीब से देखा था, जिसका प्रभाव उनके चित्रों पर पड़ा तथा इसके अलावा कई प्रियजनों के बिछड़ने का भी असर पड़ा। कोलकाता गवर्नमेंट कॉलेज के स्नातक  गणेश पाइन ने लम्‍बे समय तक एनिमेटर का काम किया। वे अपने चित्रों पर वाल्ट डिजनी के कार्टूनों का प्रभाव भी मानते थे। अपने बेहतरीन रेखाँकन के लिए भी उन्हें जाना गया। लेकिन इससे भी ज्यादा वे अपने चित्रों की खास शैली के लिए मशहूर रहे। टेंपरा माध्यम में काम करना उन्हें पसंद था।

गणेश पाइन की जिंदगी भी अपने समकालीन आधुनिक चित्रकारों से सर्वथा अलग थी। करीब पाँच दशक के अपने कैरियर में उनका ज्यादा समय कोलकाता में ही गुजरा, वे आयोजनों और समारोहों से प्रायः बचते रहे। यद्यपि पश्चिम की तमाम आधुनिक कला शैलियों से वे परिचित थे। उन्होंने खुद स्वीकार किया था कि उन पर अवनींद्रनाथ टैगोर के अतिरिक्त हाल्स रेम्ब्रांडिट व पाल क्ली का ज्यादा असर है। पाइन भारत के उन गिने-चुने कलाकारों में थे, जो पश्चिम की आधुनिक कला और उसके बाजार से कभी आतंकित नहीं हुए। भारत के अतिरिक्त पेरिस, लंदन, वाशिंगटन और जर्मनी सहित दुनिया भर में उनकी पेंटिंग की प्रदर्शनियां लगाई गईं। एमएफ हुसैन गणेश पाइन के प्रशंसकों में थे। कुछ लोगों की राय है कि इसने भी उनके चित्रों की कीमत बढ़ाने में अपनी भूमिका अदा की, लेकिन खुद वे बाजार के पीछे कभी नहीं भागे, बल्कि उनके चित्रों का दुर्लभ होना ही उनको मूल्यवान बनाता था।

गणेश पाइन ने बीबीसी के साथ एक साक्षात्कार में कला पर बाजारवाद के बढ़ते दबाव के बारे में पूछे गए एक सवाल का जवाब देते हुए कहा था कि ‘पहले के चित्रकारों के लिए कला जीवन का एक मकसद थी। अब कला की बिक्री बढ़ने से जहाँ चित्रकारों को लाभ हुआ है, वहीं इसने कुछ कलाकारों की कुछ नया कर दिखाने की क्षमता को नष्ट कर दिया है। लेकिन ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिनको इससे एक नया उत्साह मिला है।’ हालाँकि कला को अपने जीवन का मकसद बताते हुए उन्होंने दो टूक कहा था कि ‘रोजगार का कोई वैकल्पिक साधन नहीं होने के कारण इसी से मेरी रोजी-रोटी भी चलती है। जहाँ तक चित्रों के लिए विषय का सवाल है, मैं अपने अंतर्मन से ही इसे तलाशता हूँ।’ उनका मानना था कि ‘कला समाज का सौंदर्य है। अगर कला की उपेक्षा हुई तो समाज का सौंदर्य और संतुलन नष्ट हो जाएगा।’

अपनी ही शर्तों पर खामोशी से अपना काम करने वाले, बाजार की शर्तों को नामंजूर करते हुए कला और स्मृति की अपनी परम्‍परा के साथ अविचल सृजनरत रहने वाले इस विलक्षण भारतीय चित्रकार को जन संस्कृति मंच की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि।

(सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच की ओर से जारी)

न्याय और सुरक्षा के मुद्दे संघर्षों की दिशा तय करेंगे

कार्यक्रम में पत्रकार अमि‍त सेन गुप्तान और लेखि‍का अरुंधति राय।

कार्यक्रम में पत्रकार अमि‍त सेन गुप्ता और लेखि‍का अरुंधति राय।

नई दि‍ल्‍ली : अनिल सिन्हा मेमोरियल फाउंडेशन की ओर से 2 मार्च, 2013 को इंडिया इस्लामिक सेंटर में आयोजित दूसरे सालाना आयोजन में ‘मैपिंग एंगर: स्पॉन्टेनियस प्रोटेस्ट ऐंड कम्पिलिसीट साइलेंस’ विषय पर जानी-मानी एक्टिविस्ट लेखिका अरुंधति राय और पत्रकार अमित सेन गुप्ता के बीच विचारोत्तेजक बातचीत हुई। अमित ने शुरुआत बांग्लादेश से की, जहाँ आजकल 1971 में जनसंहार, बलात्कार और उत्पीड़न की घटनाओं को अंजाम देने वालों के खिलाफ जनता न्याय की मुहिम चला रही है और न्यायपालिका की ओर से उन्हें दंडित किया जा रहा है। कश्मीर और भारत की स्थितियों की बांग्लादेश से तुलना करते हुए अरुंधति ने कहा कि दोनों भिन्न तरह की चीजें हैं। बांग्लादेश के प्रसंग में भारत सरकार कह सकती है कि उसने मुक्ति योद्धाओं का साथ दिया। खुद भारत सरकार लिट्टे जैसे संगठनों की मदद करे तो ठीक, पर यहाँ कोई उसी तरह की माँग करता है तो उसे सरकार और मीडिया पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद कहता है। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में बहुत महत्वपूर्ण और दिलचस्प आंदोलन चल रहा है, जाहिर है लोगों की स्मृतियाँ 1971 से जुड़ी हुई हैं, पर स्मृतियाँ निर्मित भी की जाती हैं। स्मृति अपने आप में बहुत ही ट्रिकी विषय है।

अमित सेन गुप्ता ने जब पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में सुहार्तो शासनकाल में इंडोनेशिया में जनसंहार रचाने वाले सालिम ग्रुप का जिक्र किया, तो अरुंधति ने छूटते ही नेल्सन मंडेला का नाम लिया, जो एक दौर में दुनिया में प्रतिरोध के नायक थे, लेकिन उनकी सरकार बनने के बाद उसी सुहार्तो को वहाँ का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान दिया गया। और तो और उसी सुहार्तो के कारनामों पर जो फिल्म बनी, उसे धन फोर्ड फाउंडेशन की ओर से मिला। इसलिए नैतिकता की कोई स्पष्ट प्र्रवृत्ति नहीं है। अमित सेन गुप्ता ने 1971 के आसपास के सालों में दुनिया में छात्र-युवा आंदोलनों और संस्कृति-कला के क्षेत्र में उभरे आंदोलनों के इंद्रधनुषी आयामों की ओर ध्यान आकृष्ट किया, तो अरुंधति ने बीच में चुटकी लेते हुए कहा कि इंद्रधनुष में काला रंग नहीं होता। अमित ने स्पष्ट किया कि‍ उनका आशय इस वक्त चल रहे विभिन्न किस्म के जनआंदोलनों से है,  मसलन इसी वक्त में जबकि छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है और वहाँ एक पुलिस अधिकारी सोनी सोढ़ी के गुप्तांग में पत्थर भरता है, जिसे यूपीए की सरकार गैलेंट्री एवार्ड देती है और तब कोई बड़ा आंदोलन नहीं होता, लेकिन दिल्ली गैंगरेप के बाद दिल्ली ही नहीं देश के छोटे-छोटे कस्बों और शहरों में भी लोग सड़कों पर उतर पड़ते हैं, कई जगह बिना सैद्धांतिक राजनीतिक समझदारी के भी, तो इसे किस तरह समझा जाए?

anil sinha memorial foundation

अरुधंति ने कहा कि दिल्ली में बलात्कार के खिलाफ जो प्रोटेस्ट हुआ, वह महिला आंदोलनों और जेंडर स्टडी का विषय अधिक है। केरल की सूर्यनल्ली के मामले तथा कश्मीर, खैरलांजी, छत्तीसगढ़ में महिलाओं के साथ हुए बलात्कारों पर समाज के रुख पर उन्होंने सवाल उठाया। कला माध्यमों में बलात्कार को उत्तेजना के एक विषय के तौर पर इस्तेमाल करने की मलयालम फिल्मों की आम प्रवृत्ति का उन्होंने उदाहरण दिया। बैंडिट क्वीन नाम की मशहूर फिल्म का जिक्र करते हुए अरुंधति ने कहा कि वहाँ फूलन देवी को एक फेमस विक्टिम ऑफ रेप के तौर पर पेश किया गया, एक फेमस बैंडिट के तौर पर नहीं। सोनी सोढ़ी का जिक्र करते हुए अरुंधति ने कहा कि दरअसल बलात्कार महिलाओं को आतंकित करने की एक स्ट्रैटजी है, बांग्लादेश, श्रीलंका हर जगह ऐसा ही किया गया।

प्रोटेस्ट के कमोडिटी बनने की प्रवृत्ति पर अरुधंति ने चिंता जाहिर की। उन्होंने चिदंबरम के बयान को याद किया जो कि गैंगरेप के तीन दिन बाद समाचार पत्रों के मुखपृष्ठ में छपा, जो गरीबों को ही अपराधी के तौर पर चिह्नित करता है। बातचीत में आर्म्‍स स्पेशल पावर एक्ट की चर्चा भी हुई। उमर अबदुल्ला और नीतीश कुमार द्वारा गुजरात सरकार की तारीफ के बरअक्स दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा गुजरात जनसंहार के दोषी के तौर पर मोदी के प्रतिवाद का अमित सेन गुप्ता ने जिक्र किया। संसद पर हमले और अफजल की फाँसी का संदर्भ भी आया। अरुंधति ने सवाल उठाया कि 84 में 3000 सिक्खों, 1993 में मुंबई में तथा 2001 में गुजरात में हजारों मुसलमानों पर हमला किया जाना क्या लोकतंत्र पर हमला नहीं था? इसे लेकर इतनी घृणित चुप्पी क्यों है?

छत्तीसगढ़ में माओवादी आंदोलन का जिक्र करते हुए अरुधंति ने कहा कि वहाँ आदिवासी तो महज इसलिए लड़ रहे हैं कि जो है उसे उनके पास रहने दिया जाए, उसे भी न छिना जाए। अमित सेन गुप्ता ने पोस्को द्वारा महिलाओं और बच्चों पर बर्बर जुल्म ढाने की घटना की चर्चा की,  जगतपुर,  काशीपुर में वर्षों से चल रहे आंदोलनों की ओर ध्यान दिलाया और आदिवासी विद्रोहों की परम्‍परा से उनका संबंध जोड़ा। और सवाल किया कि क्या हम आज के दौर में किसी संघर्षों को लेकर कोई नई परिकल्पना कर सकते हैं?

अरुंधति राय ने कहा कि जब हम कहते हैं कि जनता खुद तय करेगी तो इसका मतलब ही है कि हम नहीं जानते कि वह प्रतिरोध किस तरह करेगी, उसका प्रतिरोध हिंसक होगा या अहिंसक, इसे उनके मुद्दे और जमीनी हकीकतें तय करेंगी। अरुंधति ने आंदोलनों के एनजीओकरण पर भी चिंता जाहिर की और कहा कि न केवल सरकार, बल्कि विपक्ष, एनजीओ और यहाँ तक कि अब लिटरेरी फेस्टिवल के जरिए साहित्य पर भी कारपोरेट का कब्जा हो चुका है। रिलायंस के 27 टीवी चैनल्स आ गये हैं। टाटा स्टील लिटरेरी फेस्टिवल में सलमान रुश्दी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को प्रायोजित करेगा और खुद जगदलपुर में आदिवासियों के दमन पर चुप्पी साध लेगा। उन्होंने आदिवासियों उनके जंगल और जमीन से बेदखल करने वाली कम्‍पनियों द्वारा अस्पताल और लॉ स्कूल खोलने पर भी सवाल उठाया। जिसे अमित सेन गुप्ता ने प्रतिरोध के संकट यानी क्राइसिस ऑफ रेसिस्टेंस के तौर पर चिह्नित किया। बातचीत आखिरकार यहाँ पहुँची कि इस वक्त कोई बड़ा विकल्प नहीं है, खुद मुख्यधारा की वामपंथी पार्टियाँ भी सवालों के दायरे में हैं। अरुंधति ने कहा कि यह बड़ी बेईमानियों और बड़ी चुप्पियों का दौर है। सारे बड़े विचार असफल हो चुके हैं। अब स्मॉल आइडिया का दौर है, जो न्याय और सुरक्षा के सवालों और संघर्षों में मौजूद है, वह दंतेवाड़ा में भी है और वह मारुति फैक्ट्री के मजदूरों के संघर्ष में भी है।

बातचीत के बाद श्रोताओं ने अरुंधति से सवाल भी किए। वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने स्मॉल थिंग्स के संबंध में उनके आइडिया के बारे में पूछा। ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ के सम्‍पादक आनंदस्वरूप वर्मा ने कहा कि सारी चीजों को नकार कर किस तरह के स्टेट की कल्पना की जा सकती है? युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने कहा कि चूँकि अरुंधति राय की बातों पर लोग गौर करते हैं और वे चाहते हैं कि वे किसी चीज के बारे में क्या सोचती हैं, इसलिए उन्हें इसका ध्यान रखना चाहिए। फिर उन्होंने दिल्ली गैंगरेप के बाद के आंदोलन में शामिल मध्यवर्गीय लोगों की दुनिया को अलगा कर देखे जाने पर सवाल खड़ा किया कि क्या वह अपने आप में स्वायत्त दुनिया है या उसमें से भी बहुत सारे लोग नीचे गिर रहे हैं और कुछ थोड़े से लोग किसी तरह ऊपर जा रहे हैं? क्या इस मध्यवर्गीय दुनिया से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए?

इस बातचीत से चित्रकार सादकेन की दो पेंटिग्स के पोस्टर जारी किए गये। वरिष्ठ चित्रकार और लेखक अशोक भौमिक ने कहा कि कला और कला समीक्षा की दुनिया में सत्ता की संस्कृति हावी रही है, अनिल सिन्हा ने अपने लेखन और संगठन जसम के जरिए जिसका हमेशा विरोध किया। आज आम आदमी को चित्रकला से जिस तरह काट दिया गया, अनिल सिन्हा इससे चिंतित थे और यह चिंता उनकी कला समीक्षाओं में भी दिखती है। सत्ता की संस्कृति ने जिस तरह बंगाल के महाअकाल की त्रासदी को अपने चित्रों में दर्ज करने वाले जैनुल आबदीन को भुला दिया, उसी तरह सादकेन को भुला दिया। अशोक भौमिक ने कहा कि जैनुल आबदीन, चित्तो प्रसाद और सादकेन के लिए हिंदुस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच कोई फर्क नहीं है, वे तीनों देशों की जनता के चित्रकार हैं। उन्होंने वादा किया कि अगले साल के आयोजन में जैनुल आबदीन के पोस्टर जारी किए जाएंगे। संचालन ऋतु सिन्हा ने किया।

(सुधीर सुमन, जन संस्कृति मंच, राष्ट्रीय सहसचिव द्वारा जारी)

मानवीय-मुक्ति के इतिहास का अमर योद्धा

hugo Rafael Chávez Frías

नयी दिल्ली : ह्यूगो रैफेल शावेज फ्रिआस (28 जुलाई 1954- 5 मार्च, 2013)  21वीं सदी के समाजवाद के स्वप्नद्रष्टा और अनुपम प्रयोगकर्ता तथा भूमंडलीकरण, निजीकरण और उदारीकरण की नई विश्‍व-व्यवस्था की अजेयता के मिथक को ध्वस्त करनेवाले महान जन-नायक और क्रांतिकारी, वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज ने 5 मार्च 2013 के दिन दुनिया को अलविदा कहा। पिछले साल राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद से वह कैंसर से जूझते हुए अब तक पद की शपथ नहीं ले सके थे। दुनिया ने 21 सदीं का अब तक का महानतम साम्राज्यवाद-विरोधी योद्धा खो दिया। यह क्षति जितनी वेनेजुएला और लैटिन अमरीका की जनता की है, उतनी ही  विश्‍व के तमाम शोषितों की है, जिन्हें शोक को शक्ति में बदलना है, उनके प्रयोगों को अंतिम जीत तक जारी रखना है।

शावेज ने 21वीं सदी में लैटिन अमरीका के साम्राज्यवाद-विरोधी उभार को 18वीं-19वीं सदी के लैटिन अमरीका की स्पैनिश दासता से मुक्ति (साइमन बोलिवार द्वारा की गई क्रान्ति) की अगली कड़ी के रूप में परिभाषित किया। सैन्य अधिकारी रहे शावेज ने 1992 में अमरीका समर्थित वेनेजुएला के वहाँ नव-उदारवादी निजाम के खिलाफ नागरिक तख्ता पलट की असफल कोशिश की और दो साल जेल में रहे।1998 में साम्राज्यवाद-विरोधी ऐसे गठबंधन के प्रतिनिधि के बतौर वे चुनाव जीते जिसने देश के नये जनतांत्रिक संविधान का वायदा किया। नया संविधान एक साल के भीतर बना जो स्त्री-पुरुष समानता पर आधारित था, जिसमें स्त्रियों और मूल निवासियों को तमाम नये अधिकार दिये गये, राष्ट्रपति सहित सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार जनता को प्राप्त हुए, शिक्षा और स्वास्थ्य नागरिकों के मौलिक अधिकार बना दिये गये। 1998 से लेकर 2012 का चुनाव जीतने तक वह लगातार वेनेजुएला के राष्ट्रपति चुने जाते रहे।  अमरीकी षड्यंत्र से जब अप्रैल 2002 में उनके  तख्ता-पलट की कोशिश की गई तो जनता ने सड़कों पर उतर कर उसे नाकाम कर दिया। शावेज ने न केवल तेल कम्‍पनियों का बल्कि टेलिकॉम सहित कुछ अन्य महत्वपूर्ण कम्‍पनियों का राष्ट्रीयकरण किया, बड़ी कम्‍पनियों पर शिकंजा कसा और उन पर टैक्स बढाए, विश्‍व-बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष का क़र्ज़ चुका कर इनसे संबंध खत्म किया तथा ‘बैंक आफ साउथ’ नाम से दक्षिण अमरीकी देशों के अपने केन्द्रीय बैंक का 2007 में निर्माण किया। फिदेल कास्त्रो के साथ मिलकर शावेज ने अमरीकी वर्चस्व के विरुद्ध, उसके विकल्प के बतौर लैटिन अमरीकी देशों बोलीविया, क्यूबा, डोमोनिका, होंडूरास, निकारागुआ और वेनेजुएला का व्यापार संघ ‘बोलीवारियन आल्टरनेटिव फॉर पीपुल्स ऑफ आवर अमेरिकाज़’ (आल्बा) का निर्माण किया।

जब दिसंबर 2002 में बड़ी कम्‍पनियों ने तालाबंदी करके अर्थव्यवस्था को ध्वस्त करने की कोशिश की, तो शावेज ने पूँजीपतियों द्वारा बंद किये गये कारोबारों को राज्य की भागीदारी के साथ श्रमिकों की समिति के हवाले कर दिया। विकास के ढाँचे, स्वशासन के तमाम मुद्दे और बजट के एक हिस्से को कैसे खर्च किया जाए, ये सारे निर्णय हजारों  सामुदायिक नागरिक समितियों (प्रत्येक समिति 200-400 परिवारों की है) के हवाले किये गये। 2004 से 2012 के बीच शावेज के नेतृत्व में वेनेजुएला की गरीबी घट कर आधी हो गई, बेरोजगारी बीस फीसदी से घट कर सात फीसदी हो गई, निरक्षरता समाप्त हो गई, वेनेजुएला की खेती योग्य ज़मीन का पचहत्तर फीसदी हिस्सा जो पहले महज पाँच फीसदी लोगों के हाथ में था, उसके एक अच्छे- खासे हिस्से को सरकार ने अपने हाथों में लेकर सहकारी खेती कराना शुरू किया और लाखों परिवारों का पुनर्वास किया।  शावेज ने अपने लाये संविधान में निर्वाचित प्रतिनिधियों को वापस बुलाए जाने के अधिकार की पहली अग्नि-परीक्षा खुद दी। 2004 में  उन्हें राष्ट्रपति पद से हटाने के लिये हुए जनमत संग्रह में वे विजयी हुए। 20 सितंबर 2006 के दिन संयुक्त राष्ट्रसंघ की जनरल असेम्बली में बोलते हुए शावेज ने अमरीकी साम्राज्यवाद को ललकारते हुए कहा था, ” हे, विश्‍व के तानाशाह! मुझे महसूस होता है कि तुम्हारे जीवन के बाकी के दिन दु:स्वप्न की तरह बीतेंगे।” सचमुच वे जीवन के अंत तक साम्राज्यवादियों और फाँसीवादी ताकतों के लिए दु:स्वप्न बने रहे और उनके  हमले झेलते रहे।

शावेज के नेतृत्व में वेनेजुएला तमाम लैटिन अमरीकी देशों को खुले हाथों हर तरह की मदद करता रहा। 2008 में तबाही और अन्न के लिये दंगे झेल रहे हैती को शावेज ने अपने देश से 364 टन गोश्त, सब्जियाँ और अनाज भिजवाए। अमरीकी राजसता के भीषण विरोधी शावेज वहाँ की गरीब जनता को बेहद प्यार करते थे जिसका प्रमाण उन्होंने बारम्बार दिया, खासतौर पर कैटरीना समुद्री तूफ़ान के समय राहत की पेशकश करके।

वह लैटिन अमरीका ही नहीं, बल्कि इरान, ईराक, फिलिस्तीन, लेबनान यानी हर वो देश जो अमरीकी साम्राज्यवाद का सताया हुआ था, उसके हितों के सर्वोत्तम विश्‍व प्रवक्ता थे।

शावेज अब शरीर से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन मानवीय-मुक्ति के इतिहास में वह अमर रहेंगे। उनकी स्मृति को हमारा सलाम!

(सुधीर सुमन, जन संस्कृति मंच, राष्ट्रीय सहसचिव द्वारा जारी)

बेखौफ आजादी अभियान में हिरावल की नाट्य प्रस्तुति

bekhauf azadee

नई दिल्ली: महिलाओं पर बढ़ती हिंसा के खिलाफ देश भर में चल रहे ‘बेखौफ आजादी’ अभियान के तहत जन संस्कृति मंच की गीत नाट्य इकाई ‘हिरावल’ अपनी नाट्य प्रस्तुति करने दिल्ली पहुँची। 19 फरवरी से ही हिरावल की ओर से विभिन्न कॉलेजों में नवीनतम नाटक ‘बेखौफ आजादी’ की प्रस्तुति जारी है। युवा रंगकर्मी संतोष झा लिखित और निर्देशित इस नाटक की बिहार की राजधानी पटना में 10 फरवरी और 11 फरवरी को मंचन हो चुका है।

21 फरवरी को यौन हिंसा के खिलाफ वर्मा कमेटी की सिफारिशों को लागू करने के लिये ‘बेखौफ आजादी’ अभियान की ओर से संसद के समक्ष एक प्रदर्शन होना है, जिसे सफल बनाने के लिए हिरावल भी अपनी भूमिका निभा रही है। 19 फरवरी को उसकी ओर से सत्यवती कॉलेज, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, सेंट स्टीफेंस और जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय में तथा 20 फरवरी को हंसराज कॉलेज, रामजस कॉलेज, सोशल वर्क डिपार्टमेंट, दिल्ली विश्‍वविद्यालय आदि में ‘बेखौफ आजादी’ नुक्कड़ नाटक की प्रस्तुति की गई।

क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय की कविताएं और गीत महिलाओं की आजादी, बराबरी, सुरक्षा और उनके लिए न्याय के लिए चल रहे इस आंदोलन में आंदोलनकारियों की जुबान और उनके प्लेकार्ड्स पर लगातार रहे हैं। हिरावल के इस नाटक की शुरुआत भी उनकी कविता ‘बंद खिड़कियों से टकराकर’ से होती है। प्रथम दृश्य में दो बुर्जुगों की बातचीत के जरिए आजादी संबंधी पितृसत्तात्मक धारणाएं सामने आती हैं, जिनसे लड़कियां स्त्री आजादी की अपनी धारणा को लेकर बहस करती हैं। वे दो टूक कहती हैं कि वे मर्द और औरत के फर्क को नहीं मानेंगी।

दूसरे दृश्य में आशाराम बापू जैसे धर्मगुरुओं की मानसिकता पर तीखा व्यंग्य किया गया है। तीसरे दृश्य में यौन उत्पीड़न की शिकार लड़कियों के साथ पुलिस प्रशासन के बर्ताव और लड़की के प्रतिरोध को पेश किया गया है। तीसरे दृश्य में नाटक ने यूपीए-एनडीए की महिला विरोधी प्रवृत्तियों पर सवाल उठाया गया है, कि किस तरह वे किसी का तर्क न सुनते हुए लगातार फाँसी की मांग कर रहे, जबकि केंद्र हो या राज्य, हर जगह सरकारें उन्हीं की है और दोषियों को दंडित भी उन्हें ही करना है। नाटक में वर्मा कमेटी की रिपोर्टों को लागू करने के तर्कों को मजबूती से रखा गया।

30 मिनट अवधि के इस नाटक ने यौन हिंसा के खिलाफ न्याय, आजादी और बराबरी के लिये चल रहे आंदोलन की मांगों, बहसों और सवालों को बहुत ताकतवर तरीके से पेश किया। हिरावल की दिव्या गौतम, समता राय, संतोष झा, सुमन कुमार के साथ इसमें जेएनयू और दिल्ली विश्‍वविद्यालय की श्‍वेता, अंजलि, आकृति, ज्योति, मार्तंड प्रगल्भ, विशाल, शौर्यजीत, विशाल आदि ने भूमिकाएं निभाई हैं।

(सुधीर सुमन, जसम राष्ट्रीय सहसचिव की ओर से जारी)

जननायक, जनांदोलन और साहित्य : सुधीर सुमन

जगदीश मास्टर की शहादत के चालीस साल होने पर लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन का आलेख-

दिल्ली देखे जरा
हम तुम्हारी कथा
ले जा रहे राजधानी
टूटे-फूटे साथियों के संग
नहीं कोई बेमिसाल ढंग।

जननायक,
हम तुम्हारे चारण
तुम्हारे उदास साथियों की
लड़ाकू जिजीविषा से खोज के
तुम्हारी आवाज के बीज
रोप देना चाहते हैं हर ओर।

देखे जरा
यह बेरहम
राजधानी भी।

सुनो दिल्ली
दिल्ली में बैठे तुम
नहीं जान पाओगे
सबकुछ खत्म करने का जोम
क्या होता है
और तुम
कभी फर्क नहीं कर पाओगे
हत्या और हत्या के बीच का फर्क।

यह नाटक बंद करो
अब भी है वक्त
सुनो जमीन की धमक
जो लगती है
अविश्वसनीय तुम्हें
सुनो!
फिर-फिर सुनो।

9 अक्टूबर 1998 के ट्रेन में मैंने ये दो कविताएं लिखी थीं। उस रोज हम दिल्ली में जसम के सम्मेलन में ‘मास्टर साब’ का नाट्य मंचन करके लौट रहे थे। ज्ञानपीठ ने मशहूर लेखिका महाश्‍वेता देवी के एक पुराने बांग्ला उपन्यास का अनुवाद ‘मास्टर साब’ छापा था। इसके पहले जनवरी में हमलोग आरा में इस  उपन्यास का तीन दिवसीय मंचन कर चुके थे, जिसमें दर्शकों की भारी मौजूदगी थी। चित्रकार राकेश दिवाकर ने नाटक के प्रचार के लिए बड़ी-बड़ी वाल पेंटिंग बनाई थीं। लगभग तीस कलाकारों ने उस नाटक को किसी आंदोलनात्मक अभियान की तरह तैयार किया था।

उन दिनों बिहार में सत्ता के संरक्षण में जातीय-साम्‍प्रदायिक घृणा से  भरी एक निजी सेना गरीब-मेहनतकशों का जनसंहार कर रही थी। उसका सरगना मासूम बच्चों और बेगुनाह औरतों की हत्या को भी जायज ठहरा रहा था और जिनका जातिवादी-सामंती व्यवस्था और सत्ता के साथ रिश्ता था, वे साहित्यकार, बुद्धिजीवी, पत्रकार, राजनीतिकर्मी, समाजसेवी और नागरिक लोग आंदोलन करने वाले गरीबों और उनकी पार्टी पर ही अत्याचार करने का आरोप लगा रहे थे। बथानी टोला में दलित-मुस्लिम महिलाओं और बच्चों का नृशंस जनसंहार हुए डेढ़ साल बीत चुके थे। हम देख रहे थे कि साहित्य में सतही मध्यवर्गीय स्त्री-दलित विमर्श चलाने वाले किस तरह उस सरकार से पुरस्कार ग्रहण कर रहे थे, जो हत्यारों को खुलेआम संरक्षण दे रही थी। हम यह भी महसूस कर रहे थे कि किस तरह गरीबों का आंदोलन किसी अंधहिंसात्मक प्रतिक्रिया में न चला जाये, इसकी सचेत कोशिशें उसके नेतृत्व द्वारा चलाई जा रही हैं।

‘मास्टर साब’ का मंचन उसी दौर में हुआ और वह अपने आप में मानो गरीबों के आंदोलन पर किए जा रहे हमले का एक मजबूत वैचारिक-सांस्कृतिक जवाब था।

मास्टर साहब के बारे में कब मैंने पहली बार जाना आज याद नहीं है। शायद किशोर उम्र में पहली बार मेरे एक मामा ने बताया था कि मधुकर सिंह ने ‘अर्जुन जिंदा है’ नाम का जो उपन्यास लिखा है, वह जगदीश मास्टर की जिंदगी पर आधारित है, कि उस उपन्यास को छिपाकर रखा जाता है, कि मास्टर जगदीश नक्सलाइट थे, कि उन्होंने सामंती उत्पीड़न, जातिगत भेदभाव और महिलाओं पर किए जाने वाले अत्याचार का विरोध किया था। बाद में मैंने जब मधुकर सिंह की कहानियाँ पढ़ीं, तो कई कहानियों में जगदीश मास्टर के जीवन की छवि दिखाई पड़ी। जगदीश मास्टर उनके साथ ही आरा के जैन स्कूल में साइंस के शिक्षक थे। मुझे जगदीश मास्टर के एकाध शिष्य जो मिले, उन्होंने बताया कि वह छात्रों में बहुत लोकप्रिय थे।

मास्टर साहब एक ऐसे बुद्धिजीवी थे, जिनका अपना लिखा हुआ हमारे पास कुछ नहीं है, हालाँकि मधुकर सिंह बताते हैं कि वह अपनी डायरी में कवितायें लिखा करते थे। उनके बारे में जो दूसरों ने लिखा, वही आज हमारे पास है। आखिर वह क्या बात है कि शहादत के चालीस साल बाद भी मास्टर जगदीश हमें याद आते हैं और उनके द्वारा शुरू किया गया आंदोलन हमें अपनी ओर आकर्षित करता है? क्या यह सच नहीं है कि विचार जब जीवन में उतरता है, तभी वह ऊर्जावान होता है? और कलम का भी रिश्ता उस जीवन से जब बनता है तब उसमें भी ताकत आती है?

यह एक अद्भुत संयोग है कि मास्टर साहब के जन्म और शहादत की तारीख एक ही है। 10 दिसंबर 1935 को उनका जन्म बिहार के भोजपुर जिले के एक गाँव एकवारी में हुआ था। उनकी उम्र जब बारह साल हुई तो कहा गया कि देश आजाद हो गया। लेकिन जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती गई, उन्हें लगा कि गरीब खेतिहर मजदूरों और मेहनतकश किसानों को तो कहीं कोई आजादी और बराबरी हासिल ही नहीं है। उस सामंती माहौल में संघर्ष करते हुए वह शिक्षक तो बन गये, पर उन्हें लग रहा था कि समाज में बहुत बदलाव नहीं हुआ है, शोषण-उत्पीड़न उसी तरह बरकरार है। उन्होंने उस दौर में कई चेतनशील युवाओं के साथ आरा शहर में दलितों को संगठित किया। उनके साथियों में विभिन्न जातियों के नौजवान थे। इन लोगों ने हरिजनिस्तान की माँग के साथ एक बड़ी रैली की। लेकिन उन्हें बहुत जल्दी यह लग गया कि सामंतवाद इस रास्ते से खत्म नहीं होगा। वह रास्ते की तलाश में थे। इस बीच कम्युनिस्ट नेता रामनरेश राम सामंतों के धनबल को चुनौती देते हुए एकवारी के मुखिया बन गये थे। 1967 में जब वे सीपीआई-एम के उम्मीदवार के बतौर सहार विधानसभा से चुनाव लड़े तो उनके चुनाव एजेंट की जिम्मेवारी मास्टर जगदीश ने सम्‍भाली और उसी चुनाव में अपने ही गाँव में सामंती शक्तियों द्वारा फर्जी वोटिंग का विरोध करने पर उन पर जानलेवा हमला हुआ, सामंती शक्तियों ने अपने जानते उन्हें मार ही दिया, लेकिन कई माह तक जीवन-मृत्यु  के बीच संघर्ष में जिंदगी की जीत हुई। समाज को बदलने के लिए वह गाँव लौटे। इस बीच नक्सलबाड़ी विद्रोह हो चुका था और उसकी चिंगारी संघर्ष का रास्ता तलाश रहे इन नौजवानों तक पहुँची और फिर उसके बाद जो समर शुरू हुआ, वह देश का सामंतवाद विरोधी किसान संघर्ष और क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास का एक शानदार अध्याय बन गया। जगदीश मास्टर, रामनरेश राम और रामेश्‍वर यादव की त्रयी के नेतृत्व में जो संघर्ष शुरू हुआ, वह भोजपुर आंदोलन के रूप में चर्चित हुआ और जनकवि नागार्जुन समेत अनेक साहित्यकारों ने इसका आह्लाद के साथ स्वागत किया। सत्तर के दशक में शासकीय दमन में मास्टर जगदीश के कई साथी शहीद हुए, यहाँ तक पुनर्गठित कम्युनिस्ट पार्टी भाकपा-माले के महासचिव सुब्रत दत्त उर्फ जौहर भी पुलिस की गोलियों से भोजपुर में ही शहीद हुए। मास्टर साहब के साथी रामनरेश राम भूमिगत होकर उस संघर्ष को चलाते रहे, आंदोलन विभिन्न परिस्थितियों में अपने संघर्ष के तौर-तरीके बदलता रहा, पर गरीबों की राजनीतिक-सामाजिक दावेदारी का संघर्ष कभी थमा नहीं, यहाँ तक कि उसी सहार से रामनरेश राम 28 साल बाद जनता के प्रतिनिधि बने और जब तक जीवित रहे, कभी पराजित नहीं हुए।

महाश्‍वेता देवी का उपन्यास चूँकि मास्टर साहब की जिंदगी पर केंद्रित है, इस कारण उसमें बाद के संघर्षों का जिक्र नहीं है, लेकिन बाद के संघर्षों में वह किताब भी किसी न किसी रूप में शामिल है। इस किताब की जब भी  मैंने कोई प्रति ली, कोई न कोई इसे हमेशा के लिए लेकर चला गया और मुझे इससे खुशी होती रही। दिनेश मिश्र उस वक्त ज्ञानपीठ के निदेशक थे। दिल्ली आया तो उनसे कई बार मुलाकात हुई। अचानक एक दिन किताब पलटते वक्त उनका नाम देखा और उन्हें मैंने बधाई दी ज्ञानपीठ से इस किताब के प्रकाशन के लिए। कौन कहता है कि किताबों का प्रभाव नहीं होता? मेरे सारे साथी इस किताब से प्रभावित रहे हैं। इसका जब मंचन हुआ, तो मास्टर साहब की भूमिका मुझे ही निभाने का मौका मिला और इस नाते भी उनके आंदोलन के गहरे असर में आज भी हूँ। मास्टर साहब तो अपने एक साथी रामायण राम के साथ 10 दिसंबर 1972 को ही शहीद हो गये। लेकिन वह संघर्षशील जनता के लिए हमेशा लीजेंड बने रहे, जनता ने उन्हें कभी विस्मृत नहीं किया। शासकीय हिंसा का प्रतिरोध और उसकी हर रणनीति का माकूल जवाब देने के लिये संघर्ष के उपयुक्त तरीके को अपनाना भोजपुर आंदोलन की खासियत रही है।

‘मास्टर साहब’ और ‘अर्जुन जिंदा है’ ही नहीं, बल्कि कई अन्य उपन्यास और कहानियां जगदीश मास्टर की जिंदगी से प्रभावित रही हैं। हमने एक साल उनकी शहादत के मौके पर ‘साहित्य में जननायक’ विषय पर विचार गोष्ठी की थी, जिसमें इस तरह की कई रचनाओं की चर्चा हुई थी। बाद में उनके जीवन पर केंद्रित सुरेश कांटक का महाकाव्य ‘रक्तिम तारा’ प्रकाशित हुआ, तो उसके लोकार्पण के अवसर पर भी हमने साहित्य, जनांदोलन और जननायकों के रिश्ते पर बातचीत की।

इस बार 10 दिसंबर को मास्टर साहब की शहादत की 41वीं वर्षगांठ के अवसर पर दो घटनाएं हुईं। एक तो आरा शहर में वर्षों से प्रतीक्षित मास्टर जगदीश स्मृति भवन के निर्माण का काम शुरू हुआ, जो भोजपुर आंदोलन से जुड़े इतिहास और दस्तावेजों का एक अर्काइव भी होगा, इसके निर्माण का काम जनसहयोग से ही आगे बढ़ रहा है, दूसरे भोजपुर जिला के बिहिया नामक प्रखंड के मुसहर समुदाय के उसी टोले में मास्टर जगदीश और रामायण राम के स्मारक का शिलान्यास किया गया, जहाँ गलतफहमी में गरीबों ने उनकी हत्या कर दी थी। हुआ यह था कि 40 साल पहले वह उस इलाके के एक जालिम सामंत का अंत करके लौट रहे थे और उस सामंत के हितैषी चोर और डाकू का शोर मचा रहे थे। पार्टी के उसूल के अनुसार गरीब जनता पर गोली चलाने का निर्देश नहीं था। रामायण राम ने मास्टर जगदीश को निकल जाने के लिए कहा, पर वे उन्हें अकेला छोड़कर जाने को तैयार नहीं हुए। मुसहर लोगों को वह अपना परिचय दे पाते, उसके पहले ही उनकी लाठियों से मास्‍टर साहब की मौत हो गई। बाद में जब उन लोगों को पता चला तो वे गहरे शोक में डूब गये। हालाँकि शासकीय दमन में बहुत सारे नेतृत्वकारियों की शहादत के बावजूद आंदोलन अगर फिर से उभरा, और बार-बार पुर्ननवा होता रहा, तो उसकी नींव में ये गरीब ही रहे। फिर भी एक कसक तो इस समुदाय के भीतर रहती ही थी कि उन्हीं  के हाथों मास्टर साहब की हत्या हो गई थी। 40 साल बाद उसी समुदाय के दिनेश  मुसहर ने जैसे उस कलंक को मिटा दिया। उन्होंने अपनी जमीन उनके स्मारक के लिये दी। स्मारक के शिलान्यास के मौके पर दिनेश मुसहर और उनकी पत्नी का चेहरा गर्व से भरा हुआ था। लगभग डेढ़ दशक पहले भी स्मारक बनाने की कोशिश की गई थी, जिसे पुलिस ने कामयाब नहीं होने दिया था। लेकिन इस बार न केवल स्मारक का शिलान्यास हुआ, बल्कि वहाँ जनसभा भी हुई।

महाश्‍वेता देवी के उपन्यास के अंत में बूढ़ी दादी जो कथा सुना रही है, उसका अंत नहीं हुआ है, वह दास्तान अभी जारी है। हालाँकि मरघट की शांति कायम करने की कई बार कोशिश की गई, पर जीवन है कि कभी हार नहीं मानता; बराबरी, इंसाफ और आजादी के सपने हैं कि जो हर दमन, झाँसे और प्रलोभन को पार कर अपना वजूद बनाए रखते हैं।

सितारवादक पंडित रविशंकर को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि

नई दिल्‍ली : 12 दिसंबर, 2012 के दिन सैन फ्रांसिस्को, अमरीका में महान सितारवादक पंडित रविशंकर (मूल नाम रबिन्द्र शंकर चौधुरी) ने आखिरी साँसें लीं। 7 अप्रैल, 1920 को जन्में रविशंकर ने 10 साल की उम्र से ही अपने बड़े भाई उदयशंकर की नृत्य-मंडली के साथ सारी दुनिया का भ्रमण शुरू कर दिया। लेकिन 17 साल की उम्र में उन्होंने नृत्य कला से हटकर संगीत के प्रति पूरे तौर पर समर्पण का निर्णय लिया। 18 की उम्र से बाबा अलाउद्दीन खान से सितार की तालीम लेनी शुरू की। 1941 में अन्नपूर्णा देवी (अभी जीवित) से उनका विवाह हुआ। अन्नपूर्णा बाबा अलाउद्दीन खान की पुत्री तथा विख्यात सरोदवादक अली अकबर खान की बहन ही नहीं, बल्कि खुद में महान सुरबहार वादक और संगीतकार हैं तथा प्रसिद्ध बांसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया और सितारवादक निखिल चक्रवर्ती की गुरु भी हैं। 1942 में दोनों के पुत्र शुभेंदु का जन्म हुआ, लेकिन दोनों का साथ अधिक दिन नहीं चल सका। 1940 के दशक में ही रविशंकर इप्टा के नजदीक आये। इन्हीं दिनों उन्होंने मैक्सिम गोर्की की कृति ‘लोवर डेफ्थ्स’ पर आधारित चेतन आनंद की हिन्‍दी फिल्म ‘नीचा नगर’ का संगीत दिया। ख्वाजा अहमद अब्बास की ‘धरती के लाल’ में भी रविशंकर ने संगीत दिया। बाद को हिन्‍दी फिल्मों में उन्होंने ऋषिकेश मुखर्जी की ‘अनुराधा’, त्रिलोक जेटली निर्देशित ‘गोदान’ और गुलजार की ‘मीरा’ का भी संगीत दिया, लेकिन फिल्म संगीत में उनकी शोहरत का आधार ‘अपू त्रयी’ के नाम से विख्यात सत्यजित राय की तीन फिल्मों- ‘पथेर पांचाली’ (1955), ‘अपराजितो’ तथा ‘अपूर संसार’ में दिया गया संगीत ही है। 1982 में उन्होंने रिचर्ड एटनबरो की ‘गाँधी’ के लिए भी संगीत दिया। 1949 से 1956 तक उन्होंने आकाशवाणी में बतौर संगीत निर्देशक काम किया। \

1952 में रविशंकर की मुलाकात दूसरे विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों के सैनिकों की हौसला-अफजाई के लिए संगीत के कार्यक्रम देनेवाले विश्‍वविख्यात वायलिनवादक तथा आर्केस्ट्रा कंडक्टर यहूदी मेनुहिन से हुई जिनके बुलावे पर 1955 में न्यूयार्क में उन्होंने अपना कार्यक्रम दिया। दोनों का साझा अल्बम ‘वेस्ट मीट्स ईस्ट’ नाम से बाद को निकला जिसे 1967 में ग्रैमी अवार्ड मिला। 1964 से 1966 के बीच रविशंकर अमरीका में 60 के दशक के तमान व्यवस्था-विरोधी युवाओं की पीढ़ी से जुड़े रॉक और जैज संगीत के नामचीन प्रतिनिधियों जार्ज हैरिसन, जॉन काल्तरें, जिमी हेंड्रिक्स आदि के साथ भी संगीत कार्यक्रम देते देखे जाते हैं। पश्चिम और पूरब की संगीत परम्पराओं के सम्मिश्रण के जिस ‘फ्यूजन म्यूजिक’ के आगाज का श्रेय पंडित रविशंकर को जाता है,  उसमें पूरब और पश्चिम के भीतर भी अनेक अंतर्धाराओं का शुमार है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में वह बड़े आराम से कर्नाटक और हिंदुस्तानी दोनों का उत्कृष्ट सम्मिश्रण उसी तरह कर सकते थे जिस तरह पश्चिम के क्लासिकीय और लोक संगीत का भारतीय संगीत के साथ। भारतीय संगीत के विश्‍व-प्रसार, संगीत की मार्फत दुनिया भर के इंसानों के बीच खडी सरहदों के अतिक्रमण के साथ ही साथ इप्टा से आरंभिक दिनों में जुड़ाव,  बांग्लादेश के रिफ्यूजियों के सहायतार्थ 1971 में न्यूयार्क में बॉब डिलन, एरिक क्लैपटन, जार्ज हैरिसन आदि के साथ मिलकर रॉक कंसर्ट आयोजित कर करोड़ों डालर इकट्ठा करने की पहल तथा भारत में 1990-92 में बाबरी-मस्जिद ढहाए जाने के बाद कलाकारों के सांप्रदायिकता-विरोधी मोर्चे में शिरकत करके उसे मजबूती देने तक, उनके व्यक्तित्व के अनेक आयाम थे। भारत की और भारतीय संगीत की जिस गंगा-जमुनी तहजीब के वाहक उनके गुरु बाबा अलाउद्दीन खान जैसे महान संगीतज्ञय थे, उसकी नुमाइंदगी वह विश्‍व-स्तर पर ताजिन्दगी करते रहे। विगत 4 नवंबर को उन्होंने ऑक्सीजन मास्क लगाकर अपनी आखिरी प्रस्तुति दी थी।

1967 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। 1986 में वह राज्य सभा के सदस्य मनोनीत हुए तथा 1999 में भारतरत्न सम्मान से नवाजे गये। वह ऐसे संगीतकार रहे, जिन्हें जीवन में तीन बार ग्रैमी पुरस्कार मिला। मरणोपरांत उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी अवार्ड देने की घोषणा हुई है।

मानवीय संस्कृति अत्यंत प्राचीन काल से ही मिश्रित रही है,  संकरता  संस्कृति का प्राण है,  उसकी गति है,  जबकि विशुद्धता पर अधिक जोर उसे गतिरुद्ध करता है। पंडित रविशंकर का 92 साल का अद्वितीय कलात्मक जीवन इसी सत्य को प्रखरता से स्थापित करता है। विश्‍व-संगीत के तसव्वुर को व्यावहारिक स्तर पर चरितार्थ करने में उनका महान प्रयास सदैव स्मरणीय रहेगा।

-सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच की ओर से जारी

प्रगतिशील जनपक्षीय मूल्यों के साथ खड़े रहे कामतानाथ

कामतानाथ

दिल्ली : कथाकार कामतानाथ नहीं रहे। 7 दिसंबर, 2012 को 78 साल की उम्र में गुर्दे के कैंसर से लखनऊ के डॉक्‍टर राममनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में उनका निधन हो गया। उनका जन्म 22 सितंबर, 1934 को हुआ था। स्वाधीनता आंदोलन पर केंद्रित उनका उपन्यास ‘कालकथा काफी चर्चित हुआ, जिसके दो खंड प्रकाशित हो चुके थे और दो अभी प्रकाशित होने वाले हैं। कामतानाथ की पहली कहानी ‘मेहमान’ 1961 में प्रकाशित हुर्इ थी। उनकी दूसरी कहानी ‘लाशें’ काफी चर्चित रही। वह साठ के दशक से अब तक की हिन्‍दी कहानी के सफर के चश्मदीद गवाह थे। कामतानाथ साठोत्तरी पीढ़ी के ऐसे रचनाकार थे, जो अपने लेखन में हमेशा प्रगतिशील जनपक्षीय मूल्यों के साथ खड़े रहे। इतिहास के प्रति उनका प्रगतिशील नजरिया उनके उपन्यास ‘कालकथा’ में भी परिलक्षित होता है। प्रगतिशील और समांतर कथा आंदोलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही। ‘सुबह होने तक’, ‘एक और हिंदुस्तान’, ‘समुद्रतट पर खुलने वाली खिड़की’, ‘पिघलेगी बर्फ’ और ‘तुम्हारे नाम’ उनके प्रमुख उपन्यास हैं। ‘छुटिटयाँ’, ‘तीसरी आँख’, ‘सब ठीक हो जाएगा’,’’शिकस्त’, ‘रिश्ते नाते’, ‘आकाश से झाँकता वह चेहरा’, ‘सोवियत संघ का पतन क्यों हुआ’ आदि कहानी संग्रहों की उनकी कर्इ कहानियाँ काफी चर्चित रहीं। कुछ कहानियों का नाटय मंचन भी हुआ। उनकी कहानी ‘संक्रमण’ की लगभग 500 सौ प्रस्तुतियां हुर्इं, जिसमें देवेंद्रराज अंकुर और नसीरुद्दीन शाह जैसे नाट्य निर्देशक और अभिनेता की भागीदारी भी रही। उन्होंने ‘दिशाहीन’, ‘फूलन’, ‘कल्पतरु की छांह’, ‘दाखिला डाट काम’ नामक नाटक लिखे। एकांकी ‘वार्ड नं-1’ और प्रहसन ‘भारत भाग्य विधाता’ ही नहीं, बलिक इब्सन के मशहूर नाटक ‘घोस्ट’ का ‘प्रेत’ नाम से अनुवाद तथा मोपांसा की कहानियों पर आधारित नाटक ‘औरत’ का लेखन नाटकों के प्रति उनके गहरे जुड़ाव की बानगी है। उनकी कहानी ‘खलनायक’ पर एक लघु फिल्म भी बनी। कामतानाथ को उनके साहित्यिक योगदान के लिए पहल सम्मान, मुकितबोध पुरस्कार, यशपाल पुरस्कार, महात्मा गांधी सम्मान तथा उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का साहित्य भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

कामतानाथ का व्यकितत्व जितना सहज, सरल, सादगी और आत्मीय था, उनका लेखन और भाषा शैली भी उसी तरह की थी। लेखन में किसी सनसनी और चमत्कार के पीछे दौड़ने के बजाए पूरे धैर्य के साथ वह अपने समय और इतिहास की सच्चाइयों को दर्ज करते रहे। कामतानाथ उन लेखकों में से थे, जो लेखन को एक सामाजिक-राजनीतिक कर्म मानते हैं। उन्होंने मजदूरों के जीवन पर तो कहानियाँ  लिखीं हीं, श्रमिक आंदोलनों में भी उनकी भागीदारी रही। कामतानाथ रिजर्व बैंक से सेवानिवृत्त हुए थे। अपने कार्यस्थल पर एक कामरेड के तौर पर ही उनकी पहचान थी। समाज और देश के प्रति एक लेखक और बुद्धिजीवी की सक्रिय भूमिका के वह पक्षधर थे। उनके मित्रों का एक बहुत बड़ा संसार था। अपनी पत्नी के बीमारी की वजह से हाल के वर्षों में उनका कहीं आना-जाना कम ही हो पाता था और खुद भी लम्‍बे समय से बीमार चल रहे थे। अपने आत्मीय स्वभाव और जनपक्षीय लेखन के लिए कामतानाथ हमेशा याद आएंगे। उन्हें जन संस्कृति मंच की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि।

सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच की ओर से जारी