Tag: सुखराम चौबे गुणाकर

हिदी के कुछ प्रसिद्ध कवियों की बाल कविताएँ

हिंदी के सुप्रसि‍द्ध कवि‍ श्रीधर पाठक, महावीर प्रसाद द्विवेदी, बालमुकुंद गुप्त, सुखराम चौबे गुणाकर, कामता प्रसाद गुरु, प. सुदर्शनाचार्य और राजर्षि पुरुषोत्तम टंडन की बाल कवि‍ताएं-

देल छे आए : श्रीधर पाठक

बाबा आज देल छे आए,
चिज्जी-पिज्जी कुछ ना लाए!
बाबा क्यों नहीं चिज्जी लाए,
इतनी देली छे क्यों आए?
का है मेला बला खिलौना,
कलाकद लड्डू का दोना।
चू चू गाने वाली चिलिया,
चीं चीं करने वाली गुलिया।
चावल खाने वाली चुइया,
चुनिया मुनिया मुन्ना भइया।
मेला मुन्ना मेली गैया,
का मेले मुन्ना की मैया।
बाबा तुम औ का से आए,
आ-आ चिज्जी क्यों न लाए?

कोकिल : महावीर प्रसाद द्विवेदी

कोकिल अति सुदर चिड़िया है,
सच कहते हैं अति बढ़िया है।
जिस रगत के कुवर कन्हाई,
उसने भी वह रगत पाई।
बौरों की सुगध की भाती,
कुहू-कुहू यह सब दिन गाती।
मन प्रसन्न होता है सुनकर,
इसके मीठे बोल मनोहर।
मीठी तान कान में ऐसे,
आती है वशीधुनि जैसे।
सिर ऊंचा कर मुख खोलै है,
कैसी मृदु बानी बोलै है!
इसमें एक और गुण भाई,
जिससे यह सबके मन भाई।
यह खेतों के कीड़े सारे,
खा जाती है बिना बिचारे।

हिम्मत : बालमुकुंद गुप्त

‘कर नहीं सकते हैं’ कभी मुँह से कहो न यार,
क्यों नहीं कर सकते उसे, यह सोचो एक बार।
कर सकते हैं दूसरे पाँच जने जो कार,
उसके करने में भला तुम हो क्यों लाचार।
हो, मत हो, पर दीजिए हिम्मत कभी न हार,
नहीं बने एक बार तो कीजे सौ-सौ बार।
‘कर नहीं सकते’ कहके अपना मुँह न फुलाओ,
ऐसी हलकी बात कभी जी पर मत लाओ।
सुस्त निकम्मे पड़े रहें आलस के मारे,
वही लोग ऐसा कहते हैं समझो प्यारे।
देखो उनके लच्छन जो ऐसा बकते हैं,
फिर कैसे कहते हो कुछ नहिं कर सकते हैं?
जो जल में नहिं घुसे तैरना उसको कैसे आवे,
जो गिरने से हिचके उसको चलना कौन सिखावे।
जल में उतर तैरना सीखो दौड़ो, सीखो चाल,
‘निश्चय कर सकते हैं’ कहकर सदा रहो खुशहाल।

बनावटी सिंह : सुखराम चौबे गुणाकर

गधा एक था मोटा ताजा
बन बैठा वह वन का राजा!
कहीं सिंह का चमड़ा पाया,
चट वैसा ही रूप बनाया!
सबको खूब डराता वन में,
फिरता आप निडर हो मन में,
एक रोज जो जी में आई,
लगा गरजने धूम मचाई!
सबके आगे ज्यों ही बोला,
भेद गधेपन का सब खोला!
फिर तो झट सबने आ पकड़ा,
खूब मार छीना वह चमड़ा!
देता गधा न धोखा भाई,
तो उसकी होती न ठुकाई!

छड़ी हमारी : कामता प्रसाद ‘गुरु’

यह सुदर छड़ी हमारी,
है हमें बहुत ही प्यारी।
यह खेल समय हर्षाती,
मन में है साहस लाती,
तन में अति जोर जगाती,
उपयोगी है यह भारी।
हम घोड़ी इसे बनाएँ,
कम घेरे में दौड़ाएँ,
कुछ ऐब न इसमें पाएँ
है इसकी तेज सवारी।
यह जीन लगाम न चाहे,
कुछ काम न दाने का है,
गति में यह तेज हवा है,
यह घोड़ी जग से न्यारी।
यह टेक छलाँग लगाएँ,
उँगली पर इसे नचाएँ,
हम इससे चक्कर खाएँ,
हम हल्के हैं यह भारी।
हम केवट हैं बन जाते,
इसकी पतवार बनाते,
नैया को पार लगाते,
लेते हैं कर सरकारी।
इसको बंदूक बनाकर,
हम रख लेते कधे पर,
फिर छोड़ इसे गोली भर,
है कितनी भरकम भारी।
अधे को बाट बताए,
लगड़े का पैर बढ़ाए,
बूढ़े का भार उठाए,
वह छड़ी परम उपकारी।
लकड़ी यह बन से आई,
इसमें है भरी भलाई,
है इसकी सत्य बड़ाई,
इससे हमने यह धारी।

हाऊ और बिलाऊ : प. सुदर्शनाचार्य

किसी गाँव में थे दो भाई–
हाऊ और बिलाऊ,
दोनों में था बडा़ बिलाऊ
छोटा भाई हाऊ,
था धनवान बिलाऊ पर था
वह स्वभाव का खोटा,
था गरीब, पर चतुर बहुत था
हाऊ भाई छोटा।
गाय-बैल थे बहुत
बिलाऊ के घर रुपया-पैसा,
पर गरीब हाऊ के केवल
था एक बूढ़ा भैंसा।

बंदर सभा : राजर्षि पुरुषोत्तम टंडन

हियॉं की बातें हियनै रह गईं अब आगे के सुनौ हवाल,
गढ़ बंदर के देश बीच माँ पड़ा रहा एक खेत विशाल!
सौ जोजन लबा अरु चौड़ा अरबन बानर जाय समाय,
तामें बानर भये इकट्ठा जौन बचे वे आवैं धाय!
जब सगिरा मैदनवा भरिगा पूछें टोपी लगीं दिखाय,
सबके सब कुरसिन से उछले हाथ-पाँव से ताल बजाय!
इतने माँ मल्लू-सा आए, बंदरी और मुसाहिब साथ,
बंदरी बड़ी चटक-चमकीली थामे मल्लू-सा को हाथ!
ओढ़े गउन लगाए टोपी, हीरे जड़े पांत के पांत,
मटकत आवत भाव दिखावत, आखिर मेहरारू की जात!

(नीरजा स्‍मृति‍ बाल साहि‍त्‍य न्‍यास, सहारनपुर से प्रकाशि‍त और बाल साहि‍त्‍यकार कृष्‍ण शलभ द्वारा संपादि‍त पुस्‍तक बचपन एक समंदर से साभार)