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मैं अपनी कविता को माँ मानता हूँ : लीलाधर मंडलोई

लीलाधर मंडलोई

नई दिल्ली : ‘‘मेरी कविता के अनेक रूप मेरी माँ के ही विभिन्न रूप है। माँ से विलग होकर मैं मानो कोई कविता कह नहीं पाता, अतः मैं कविता को अपनी माँ ही मानता हूँ।’’ यह भावपूर्ण विचार लब्धप्रतिष्ठ कवि लीलाधर मंडलोई ने 13 जून 2012 को साहित्य अकादेमी द्वारा उन पर केंद्रित ‘कवि-संधि’ कार्यक्रम में व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि मैं अपनी कविताओं की भाषा और फार्म में लगातार तोड़-फोड़ करता रहता हूँ। मेरे पहले कविता-संग्रह में जहाँ बुंदेली के चौकड़िया छंद का प्रभाव है तो अगले संग्रहों में उर्दू का प्रभाव। दूरदर्शन में कार्य के दौरान कविताओं को कैमरे की नज़र से भी लिखने की कोशिश की। मैं जहाँ-जहाँ गया वहाँ की भाषा, मुहावरे को कविता में उतारने की कोशिश करता रहा हूँ।

कार्यक्रम के दौरान उन्होंने दो दर्जन से ज्यादा कविताओं का पाठ किया। ‘गिरगिट’, ‘घरेलू मक्खी’, ‘त्यौहार का दिन’, ‘रिश्ता’, ‘बेटियों से क्षमा याचना’, ‘आदिवासियों का आधुनिक प्रार्थना गीत’, ‘दिल्ली के बारे में’ आदि कविताओं को श्रोताओं ने बेहद पसंद किया।

कार्यक्रम के आरम्‍भ में अकादेमी के उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने उनका संक्षिप्त परिचय देते हुए कहा कि मंडलोई कविता में आदिवासियों मज़दूरों, प्रकृति के प्रति केवल सरोकर ही व्यक्त नहीं करते, उनको एक चुनौती के रूप में भी लेते हैं। वह बुद्धि-वैभव के अतिक्रांत संसार के बरबस अपनी कविता में मनुष्य के पास बुनियादी नातेदारी के साथ जाना चाहते हैं। कार्यक्रम के अंत में उनकी कविताओं पर टिप्पणी करते हुए प्रसिद्ध आलोचक विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि उनकी कविता में केवल माँ ही नहीं पूरा परिवार लिपट कर आता है जो बहुत बड़ी बात है।

कार्यक्रम में उनकी पीढ़ी के कवियों के अलावा अनेक युवा कवि भी बड़ी संख्या में उपस्थित थे। पंकज सिंह, मंगलेश डबराल, दिनेश कुमार शुक्ल, मदन कश्यप, प्रभाकर श्रोत्रिय, अनामिका, मिथिलेश श्रीवास्तव, विष्णु नागर, विमल कुमार, कुमार अनुपम आदि कुछ प्रमुख नाम हैं।

प्रस्तुति: अजय कुमार शर्मा

एब्सर्ड नाटकों के जनक हैं भुवनेश्‍वर : नंद किशोर आचार्य

नंदकिशोर आचार्य

दिल्ली : भुवनेश्‍वर द्वारा लिखित नाटक ‘तांबे का कीड़ा’ (1946)  भारतीय ही नहीं, अंग्रेज़ी तथा अन्य विदेशी भाषाओं में भी लिखा गया पहला ‘एब्सर्ड’ (असंगत)  नाटक है। पश्‍चि‍म में भी इसकी शुरुआत द्वितीय विश्‍वयुद्ध के बाद होती है। अतः भुवनेश्‍वर को ‘एब्सर्ड’  नाटकों का जनक कहा जाना चाहिये। यह विचार प्रसिद्ध कवि, आलोचक और नाट्यचिंतक नंदकिशोर आचार्य ने साहित्य अकादेमी द्वारा भुवनेश्‍वर जन्मशतवार्षिकी के अवसर पर 15 मई, 2012 को आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में उद्घाटन व्याख्यान देते हुए व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि बड़ा रचनाकार वही होता है जो लेखन के लिए नई दृष्टि विकसित करता है और यह दृष्टि पाने के लिये उसे एक नए ‘फार्म’ को चुनना होता है। भुवनेश्‍वर ने अपने नाटकों और कहानियों के लिये एक नए ‘फार्म’ का आविष्कार किया। उनके ‘फार्म’ पर गम्‍भीर अध्ययन की ज़रूरत है।

प्रभाकर श्रोत्रिय ने अपने बीज भाषण में कहा कि भुवनेश्‍वर का सम्‍पूर्ण साहित्य भावुकता को अस्वीकृत करता है। भुवनेश्‍वर रस की सत्ता को समाप्त कर ‘आत्मताप’ को प्रतिष्ठित करते हैं। हिन्‍दी जगत ने उनके ‘क़िस्सों’ पर ज़्यादा ध्यान दिया है जबकि उनके कृतित्व का जाँचा-परखा जाना अभी बाक़ी है। उनके नाटकों पर अपने अध्यक्षीय व्याख्यान में अकादेमी के उपाध्यक्ष विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि भुवनेश्‍वर अपने ज़माने से आगे के रचनाकार थे। 1930 से 1955 के बीच में उन जैसा प्रतिभाशाली लेखक कोई नहीं है। प्रेमचंद द्वारा उनको अपने लेखन में ‘कटुता’ कम करने के सन्‍दर्भ पर उन्होंने कहा कि इस ‘कटुता’ की उपज के पीछे के कारणों की भी पड़ताल होनी चाहिये। इससे पहले हिन्‍दी परामर्श मंडल के संयोजक माधव कौशिक ने कहा कि समाज से अलग सोचने वाले लेखकों के साथ हमने हमेशा अमानवीय व्यवहार किया है जो ग़लत है। भुवनेश्‍वर की त्रासदी अन्य लेखकों की भी त्रासदी है।

भुवनेश्‍वर की कहानियों पर आधारित सत्र की अध्यक्षता प्रोफेसर गोपेश्‍वर सिंह ने की और मंजुला राना व सुषमा भटनागर ने अपने आलेख प्रस्तुत किये। सुषमा भटनागर ने उनकी कहानियों में निर्भीक सच्चाइयों का विश्‍लेषण किया। गोपेश्‍वर सिंह ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि उनकी कहानियों में नई कहानी की तीन बातें पहली बार सामने आती हैं। पहली बात- अकेलापन,  दूसरी बात- प्रेम की सघन किन्‍तु मौन अनुभूति और तीसरी, सबसे महत्त्वपूर्ण बात- कहानी की नई भाषा। इस तरह भुवनेश्‍वर नई कहानी की प्रस्तावना लिखने वाले हैं। उन्हें केवल ‘भेड़िए’ कहानी तक सीमित नहीं कर देना चाहिये।

दिन के अंतिम सत्र में भुवनेश्‍वर के नाट्य साहित्य पर देवेन्द्र राज अंकुर की अध्यक्षता में भानु भारती, ज्योतिष जोशी और राजकुमार शर्मा ने विचार व्यक्त किये। भुवनेश्‍वर को रंगमंच पर पहली बार प्रस्तुत करने वाले भानु भारती ने कहा कि भारतीय रंगमंच भुवनेश्‍वर के बिना अधूरा है। हिन्‍दी रंग जगत ने उनके नाटकों के साथ अन्याय किया है। उनके नाटक घटनाओं से मुक्त हैं लेकिन उसका शिल्प चौंकाने वाला है। शब्दों की इतनी मितव्ययता आज दुर्लभ है।

ज्योतिष जोशी ने कहा कि भुवनेश्‍वर के नाटकों का कोई विकल्प नहीं है। स्त्री-पुरुष संबंधों को अपने समय में वह जिस बेबाकी से उठाते हैं, वह दुर्लभ है। उनके नाटकों में कला का कोई प्रभा मंडल नहीं है बल्कि एक वैचारिक मौलिकता है।

देवेन्द्र राज अंकुर ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि भुवनेश्‍वर को एब्सर्ड नाटककार के फ्रेम में रख दिया गया है जिससे उनके नाटकों से दूरी बना ली गई है जो सर्वथा ग़लत है। उनके नाटकों के दृश्य खंडों में जो चाक्षुष प्रभाव है, वह आज के समय में अकल्पनीय है। उनके नाटकों में कथा की नई रंग भाषा है, उसे समझकर उन्हें ज्यादा से ज्यादा मंचित करने की ज़रूरत है।

कार्यक्रम का संचालन उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने किया और धन्यवाद ज्ञापन उपसचिव के.एस. राव ने किया।

प्रस्तुति: अजय कुमार शर्मा

लेखक को समझा जाना सबसे ज़रूरी है : रमेशचंद्र शाह

लेखक-चिन्तक रमेशचंद्र शाह।

नई दि‍ल्‍ली : लेखक के लिये सबसे बड़ा पुरस्कार उसके लिखे को पाठकों द्वारा समझे जाने में होता है। यह विचार प्रसिद्ध लेखक-चिन्‍तक रमेशचंद्र शाह ने साहित्य अकादेमी द्वारा 17 अप्रैल, 2012 को आयोजित कार्यक्रम ‘लेखक से भेंट’  में व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि भारतीय लोग इतिहास का मिथकीय स्वरूप पसन्‍द करते हैं,  जिसके चलते हमारी ‘इनोसेंस’ तो बचती है लेकिन इतिहास कमज़ोर हो जाता है।

अल्मोड़ा में बिताये अपने बचपन के दिनों को उन्होंने ‘गोबर गणेश’ उपन्यास के पहले अध्याय ‘घर की घड़ी’ को पढ़ कर साझा किया। अपने पिता की दुकान और उसमें आई रद्दी में आये साहित्य को पढ़कर ही उनकी लिखने-समझने-जानने की इच्छा जागृत हुई। इसी क्रम में उन्होंने स्पष्ट किया कि आत्मकथा लिखना बहुत कठिन है, क्योंकि सत्य को अकेले चलने-फिरने में दिक्कत होती है। उसे कल्पना के ढीले-ढाले पहनावे के साथ ही ठीक से चलाया जा सकता है।

उन्होंने बताया कि मेरी भाषा के पहले संस्कार बालमुंकुद गुप्त के निबंधों से प्राप्त हुये। हँसोड़ शैली में गहन इतिहास बोध के साथ लिखी यह शैली मुझे अब तक प्रिय है। अपनी रचनाओं पर बात करते हुए कहा कि ‘गोबर गणेश’ जो कि मेरा पहला उपन्यास है, मुझे सबसे प्रिय है। ‘क़िस्सा गु़लाम’ उपन्यास के बारे में उन्होंने कहा कि पहले यह मैंने अंग्रेज़ी में लिखा था और अज्ञेय के कहने पर कई साल बाद इसको दुबारा हिन्‍दी में लिखा। इस उपन्यास ने मुझे सबसे ज़्यादा संतोष दिया। उन्होंने आपातकाल में लिखी अपनी कविता ‘हरिश्‍चन्‍द्र आओ’ सहित कई अन्य कविताएँ सुनाईं। अपने उपन्यास ‘गोबर गणेश’ के आरम्‍भि‍क अंश और निबंध ‘वह और मैं’ का भी पाठ किया।

कार्यक्रम के अंत में पाठकों के सवालों का उत्तर देते हुए उन्होंने बताया कि ‘गोबर गणेश’ का अगला हिस्सा उन्होंने पाठकों के अनुरोध पर ‘विनायक’ के रूप में लिखा है।

इससे पहले अकादेमी के उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने उनका विस्तृत जीवन परिचय देते हुए कहा कि अपनी संवादी शैली से पाठकों को प्रभावित करने वाले शाह जी ने अज्ञेय और प्रसाद की तरह हर विधा में श्रेष्ठ साहित्य की रचना की है। उन्होंने पश्‍चि‍म के दर्शन की बजाये भारतीय अनुभव की ज़मीन पर अपनी दार्शनिकता को तरज़ीह दी है।

1937 में अल्मोड़ा में जन्में शाह की इंटर तक की शिक्षा अल्मोड़ा में हुई। आगे की शिक्षा इलाहाबाद और आगरा में पूरी करने के बाद वह 1961 में हमीदिया महाविद्यालय, भोपाल में अंग्रेज़ी के अध्यापक नियुक्त हुये और 1997 में वहीं से अंग्रेज़ी विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हुये। बाद में निराला सृजन पीठ के निदेशक भी रहे। इनको ‘व्यास सम्मान’ तथा ‘पदमश्री’ अंलकरण से भी सम्मानित किया गया है।

इनके 11 उपन्यास, 9 काव्य-संग्रह, 7 कहानी-संग्रह, आलोचना की 10 किताबें, 10 निबंध-संग्रह सहित डायरी, अनुवाद, बाल साहित्य, यात्रावृत्त की पुस्तकें प्रकाशित हैं।

प्रस्तुति – अजय कुमार शर्मा

साहित्य अकादमी के युवा और अनुवाद पुरस्कार घोषि‍त

नई दि‍ल्‍ली : साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित होने वाले साहित्योत्सव समारोह की औपचारिक शुरुआत 13 फरवरी को अकादमी प्रदर्शनी-2011 के उद्घाटन से हुई। प्रदर्शनी में अकादेमी की वर्षभर की गतिविधियों पर आधारित छायाचित्रों और सूचनाओं को संजोया गया है। इसका उद्घाटन प्रसिद्ध सिंधी साहित्यकार वासुदेव मोही ने किया। इस अवसर पर अकादेमी के सचिव अग्रहार कृष्‍णमूर्ति ने अकादेमी की उपलब्धियों का संक्षिप्त ब्यौरा दिया।

साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार-2011 घोषि‍त

साहित्य अकादमी ने 16 भाषाओं में अपने प्रथम युवा पुरस्कार की घोशणा की; डोगरी और सिंधी के अतिरिक्त बाकी भाषाओं में पुरस्कारों की घोषणा बाद में की जाएगी। छह कविता-संग्रहों, एक उपन्यास, पाँच कहानी-संग्रहों, एक जीवनी, एक निबंध-संग्रह तथा दो नाटकों के लिए साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार घोषि‍त किया गया।

पुरस्कारों की अनुशंसा 24 भारतीय भाषाओं की निर्णायक समितियों द्वारा की गई तथा साहित्य अकादमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय की अध्यक्षता में आयोजित अकादेमी के कार्यकारी मंडल की बैठक में इन्हें अनुमोदित किया गया।

उमा शंकर चौधरी (हिन्‍दी), वीरन्ना मादिवालरा (कन्नड), निसार आज़म (कश्‍मीरी), ऐश्‍वर्य पाटेकर (मराठी), गायत्रीबाला पांडा (ओडि़या) और परमवीर सिंह (पंजाबी) को उनके कविता-संग्रह हेतु पुरस्कृत किया गया।

विनोद घोषाल (बांग्‍ला), सुश्‍मेश चंद्रोथ (मलयालम्), दुलाराम सहारण (राजस्थानी), जोफा गोन्साल्वीस (कोंकणी) और वेमपल्ली गंगाधर (तेलुगु) को उनके कहानी-संग्रह तथा एम. तवासी (तमिल) को उनके उपन्यास हेतु पुरस्कृत किया गया।

आनंद कुमार झा (मैथिली) और ध्वनिल पारेख (गुजराती) को उनके नाटक, विक्रम संपत (अंग्रेज़ी) को उनकी जीवनी तथा अरिंदम बरकतकी (असमिया) को उनके निबंध-संग्रह के लिए पुरस्कृत किया गया।

पुरस्कार स्वरूप एक उत्कीर्ण ताम्रफलक और एक 50,000/- रुपये की राशि‍ एक विशेष समारोह में प्रदान की जाएगी।

साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार 2011

भाषा           शीर्षक एवं विधा                                रचनाकार

असमिया        अनुशीलन (निबंध-संग्रह)                   अरिंदम बरकतकी
बांग्‍ला          डानाओला मानुष (कहानी-संग्रह)            विनोद घोषाल
अंग्रेज़ी         ‘माई नेम इज गौहर जान’ – द लाइफ़ एंड   विक्रम संपत
टाइम्स ऑफ़ ए म्युजिसियन (जीवनी)
गुजराती       अंतिम युद्ध(नाटक)                            ध्वनिल पारेख
हिन्दी          कहते है तब शंहशाह सो रहे थे (कविता-संग्रह) उमा शंकर चौधरी
कन्नड           नेलादा करुणेया दानी (कविता-संग्रह)       वीरन्ना मादिवालरा
कश्‍मीरी         पत्ते लेजी ज़ून दरस (कविता-संग्रह)          निसार आज़म
कोंकणी          निर्णय (कहानी-संग्रह)                          जोफा गोन्साल्वीस
मैथिली          हठात् परिवर्तन (नाटक)                        आनंद कुमार झा
मलयालम       मरण विद्यालयम् (कहानी-संग्रह)             सुश्‍मेश चंद्रोथ
मराठी          भुईशास्त्र (कविता-संग्रह)                          ऐश्‍वर्य पाटेकर
ओडि़या         गान (कविता-संग्रह)                              गायत्रीबाला पांडा
पंजाबी          अमृत वेला (कविता-संग्रह)                      परमवीर सिंह
राजस्थानी       पीड़ (कहानी-संग्रह)                              दुलाराम सहारण
तमिल           सेवलकट्टु (उपन्यास)                         एम. तवासी
तेलुगु          मोलोकलापुन्नामी (कहानी-संग्रह)         वेमपल्ली गंगाधर

साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार-2011

साहित्य अकादमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय की अध्यक्षता में रवीन्द्र भवन, नई दिल्ली में सोमवार 13 फ़रवरी 2012 को आयोजित अकादेमी के कार्यकारी मंडल की बैठक में 22 पुस्तकों को साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार-2011 के लिए अनुमोदित किया गया। नेपाली और संस्कृत भाषाओं के पुरस्कारों की घोषणा बाद में की जाएगी। पुरस्कार के रूप में 50000/- रुपये की राशि‍ और उत्कीर्ण ताम्र फलक इन पुस्तकों के अनुवादकों को अगस्त-2012 में आयोजित एक विशेष समारोह में प्रदान किए जाएँगे।

पुरस्‍कृत होने वाली पुस्‍तकें- अदम्य शक्‍ति‍ (सुरेश शर्मा, असमिया), राघवेर दिनरात (जयंत देवनाथ, बांगला), भलगानिफ्राय गंगा (हरिनारायण खाख्लारी, बोड़ो), दो गज़ ज़मीन (जितेन्द्र उधमपुरी, डोगरी), सीकिंग द बिलव्ड (अंजू मखीजा, अंग्रेज़ी ), कार्मेलीन (दर्शाना ढोलकिया, गुजराती), गिफ़्ट पैकेट (एस. शेषारत्नम्, हिन्‍दी), नन्नु अवनल्ला… अवालु…(तमिल सेल्वी, कन्नड), वूनल ते सिरयी (सतीश विमल, कश्‍मीरी), महाकवि गोविन्द पै (एल. सुनीता बाय, कोंकणी), उपरवास कथात्रयी (खुशी लाल झा, मैथिली), मीरायुम महात्मावुम (के.बी. प्रसन्न कुमार, मलयालम), करि मांगखे करि फङ्गे (एस. नंदकिशोर सिंह, मणि‍पुरी), रजई (कविता महाजन, मराठी), उमराव जान अदा (संग्राम जेना, ओडि‍या), भारती निक्की कहाणी     (गुरबक्स सिंह फ्रैंक, पंजाबी), अेक चादर मैली सी (कमल रंगा, राजस्‍थानी), संताड़ पाहड़ा (ठाकुरदास मुर्मू, संताली), शादी ता करी (जेठो लालवाणी, सिंधी), परावइगल ओरुवेलइ थूंगी पोयिएसक्कलम (इंद्रन, तमि‍ल), प्रताप मुदलियार चरित्र (एस. जयप्रकाश प्रताप, तेलुगु), मुंतखाब दलित कहानियाँ (एफ.एस. एजाज़, उर्दू)।

दिनेश कुमार शुक्ल का कविता-पाठ

नई दिल्ली : साहित्य अकादेमी के ‘कवि-संधि’ कार्यक्रम में  08 दिसंबर, 2011 को हिन्‍दी के वरिष्ठ कवि दिनेश कुमार शुक्ल का कविता-पाठ आयोजित किया गया। शुक्ल ने कानपुर प्रवास के दौरान लिखी गई अपनी दो छोटी कविताओं ‘भाई कवि’ और ‘खोलो आँख’ से शुरू कर 15 अन्य कविताएँ प्रस्तुत कीं। सस्वर पढ़ी गई इन कविताओं में कुछ लम्बी कविताएँ ‘यह रंग है क्या?’ तथा ‘चैत की चैपाई’ भी शामिल थीं। ‘यह रंग है क्या?’ शीर्षक कविता की यह पंक्तियाँ श्रोताओं द्वारा बेहद पसंद की गईं -

बहुत से रंग हैं उधेड़बुन के उन्हीं में दुनिया उलझ रही है
कहीं जो साबुन का बुलबुला है उसी को सूरज समझ रही है।
समय के गिरगिट ने रंग बदला रंगों के रंग भी बदल गए हैं।
गुफा से आकर पुराने अजगर तमाम इतिहास निगल गये हैं।

‘नया नियम’ शीर्षक की यह पंक्तियाँ भी सराही गईं-
अब कहाँ सम्‍भव
बिना आवाज़ का संगीत
बिना भाषा की कविता
बिना हवा का तूफ़ान
बिना बीज के फल
बिना युद्ध का समय
नहीं,
उस तरह सम्‍भव नहीं हो पाता
अब संसार।

उनके द्वारा सुनाई गई अन्य कविताओं के शीर्षक थे- ‘काया की माया रतनज्योति’, ‘चतुर्मास’, ‘सुबह से पहले’, ‘पान-फूल’, ‘षटपद’, ‘पुनुरोदय’, ‘चैत की चैपाई’, ‘भूल’, ‘सागर का सभागार’, ‘आएँगे हम भी अगर आ पाये’, ‘विलोमानुपात’, ‘पूस के खेत की रात, जगह जानी-पहचानी’।

कविता-पाठ से पहले अकादेमी के उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने दिनेश कुमार शुक्ल का परिचय देते हुए कहा कि शुक्ल जी की कविता में हम अतिपरिचित समय के अलिखित चहरे को भी पढ़ सकते हैं। उनकी कविता समस्त आशंकाओं, स्मृतियों, संवेदनाओं को सुरक्षित रखने की कविता है। खास देशज और लोक स्वर उनकी विशिष्टता है। उनकी कविता में स्मृति और यथार्थ की अनुभूतियों को महसूस किया जा सकता है।

1950 में कानपुर के नर्वल गाँव में जन्मे दिनेश कुमार शुक्ल की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हुई। उनका पहला कविता-संग्रह ‘समयचक्र’ 1997 में आया। इसके बाद आपके छह अन्य काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए हैं। ताजा काव्य-संग्रह ‘समुद्र में नदी’ इसी वर्ष ‘भारतीय ज्ञानपीठ’ से आया है। आपने पाब्लो नेरूदा की कविताओं का अनुवाद भी किया है जो एक काव्य पुस्तक के रूप में प्रकाशित है। ‘केदार सम्मान’ और ‘सीता स्मृति सम्मान’ से सम्मानित शुक्ल गुड़गाँव में रह रहे हैं।

कार्यक्रम में नामवर सिंह, केदारनाथ सिह, विश्वनाथ त्रिपाठी, मंगलेश डबराल, त्रिनेत्र जोशी, मदन कश्यप, मिथिलेश श्रीवास्तव, वीरेन्द्र कुमार वरनवाल, प्रेमपाल शर्मा, रामकुमार कृषक व अन्य कवि/लेखक उपस्थित थे।

प्रस्तुति – अजय कुमार शर्मा

श्रीलाल शुक्ल को व्यंग्यकार के खाते में डालना अनुचित

श्रीलाल शुक्ल के चित्र पर फूल अर्पण करते विश्वानाथप्रसाद तिवारी

नई दिल्ली : प्रख्यात हिन्दी कथाकार श्रीलाल शुक्ल की स्मृति में  02 नवंबर, 2011 को साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित श्रद्धांजलि सभा में लगभग सभी वक्ताओं ने उन्हें केवल व्यंग्यकार के रूप में मान्यता देने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसा करके हम उनके विशाल और विविधतापूर्ण रचनाकर्म को नज़रअंदाज कर रहे हैं। साहित्य अकादेमी के सभागार में शाम 5 बजे आयोजित इस श्रद्धांजलि सभा में सबसे पहले श्रीलाल शुक्ल की पुत्रवधु साधना शुक्ल ने अकादेमी को इस आयोजन के लिए तथा उपस्थिति सभी लेखकों/पत्रकारों का धन्यवाद दिया।

अकादेमी के उपाध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने नए लेखकों के प्रति उनकी उदारता को याद करते हुए कई संस्मरण सुनाए। अज्ञेय पर गोरखपुर विश्वविद्यालय में उनके दिए गए वक्तव्य को याद करते हुए उन्होंने कहा कि इतने विद्धतापूर्ण व्यक्तित्व को केवल व्यंग्य लेखक मान लेना बहुत गलत है। प्रभाकर श्रोत्रिय ने कहा कि उनके जाने से लखनऊ का साहित्यिक आकाश सूना हो गया है। वह नम्रता की पराकाष्ठा थे। उन्होंने व्यंग्य में जो प्रबंधाकत्मता और महाकाव्यता पैदा की वह दुर्लभ है। वह संभवतः लेखकीय गरिमा के अंतिम प्रतीक थे।

विश्वनाथ त्रिपाठी ने उन्हें स्वतंत्र भारत का सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाली हिन्‍दी लेखक बताते हुए कहा कि शुरू में आलोचकों ने ‘राग दरबारी’ की उपेक्षा इसलिए की कि वे उस समय व्यंग्य उपन्यास की कल्पना ही नहीं कर सकते थे। उन्होंने उनके संस्कृत, उर्दू, संगीत की व्यापक समझ और स्वाभिमान की भी चर्चा की। प्रयाग शुक्ल ने उन्हें हर बार चौंकाने वाला रचनाकार बताया। वह कला, संगीत से लेकर किसी भी विषय पर अपने विचार और लेखन से हमेशा प्रभावित करते रहे। मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने लखनऊ में बन्‍दी रहने के दौरान जेल में आकर मिलने की चर्चा करते हुए कहा कि श्रीलाल जी ने कभी रचना के साँचे को दोहराया नहीं। उनका लिखा, आने वाली पीढि़यों के लिए चुनौती रहेगा। मंगलेश डबराल ने उनके लेखन के विस्तृत दायरे की चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने उत्तर भारत की राजनीतिक व्यवस्था और सर्वण समाज की पतनशीलता को बेहद विश्वसनीयता के साथ चित्रित किया। उन्होंने उत्तर भारत के समाज का नया रूपक सामने रखा। वे पहले साहित्यकार थे, जिन्होंने दलित साहित्य का पक्ष लिया।

कृष्णदत्त पालीवाल ने उन्हें अखण्ड व्यक्तित्व का रचनाकार बताते हुए कहा कि उनमें कहीं कोई दोहराव नहीं है। वह जो कहते थे, करते थे। व्यंग्य उनकी लेखन शैली थी। उसे विधा मान लेने की गलती हम सब करते रहते हैं, जो उचित नहीं है।

श्रद्धांजलि सभा में कैलाश वाजपेयी, प्रो. इंद्रनाथ चौधुरी, उद्भ्रांत, गंगा प्रसाद विमल, सुशील सिद्धार्थ और पद्मा सचदेव ने भी विचार व्यक्त किए।

श्रद्धांजलि सभा में उनकी दोनों बेटियों मधुलिका और विनीता तथा उनके पुत्र और पुत्रवधु के अलावा आलोक जैन, रणजीत साह, मदन कश्यप, रामकुमार कृषक, देवेन्द्र चौबे, रेखा सिंह, कृष्ण कल्पित आदि उपस्थित थे। अंत में ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने साहित्य अकादेमी द्वारा तैयार शोक प्रस्ताव पढ़ा और उपस्थित सभी लोगों ने खड़े होकर एक मिनट का मौन रखा।

प्रस्तुति – अजय कुमार शर्मा

जोसेफ मेकवान को मत भूलिए

जोसेफ मेकवान

गुजराती के महत्वपूर्ण कथाकार जोसेफ मेकवान को उनके उपन्यास आंगलियात के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिल चुका है। उनसे करीब तीन साल पहले परिचय हुआ था। अकसर फोन पर लंबी बातचीत होती, लेकिन मिलना नहीं हुआ। दो-तीन दिन पहले फोन किया तो दुखद समाचार मिला कि उनका 28 मार्च को देहांत हो गया है। इससे भी ज्यादा दुख इस बात का हुआ कि मीडिया में इस बारे में कोई खबर नहीं छपी। एक महत्वपूर्ण रचनाकार के संबंध में इस तरह की उपेक्षा अफसोसजनक है।
श्रद्धांजलि स्वरूप उनके बारे में आलेख-

जोसेफ मेकवान का जन्म 9 अक्तूबर, 1935 को खेड़ा जिले की आणंद तहसील के गांव त्रणोल में हुआ। उसके पिता डाहयाभाई रोमन कैथालिक चर्च के मिशनरी केटेकिस्ट (अध्यापक) एवं धर्म प्रचारक थे।
डाहयाभाई खाते-पीते, समृद्ध परिवार के वारिस थे। 26 बीघा जमीन थी। छह दुधारू भैंसें थीं। जोसेफ की दादी का नाम धन्नी मां (धनवाली) था। घर-खेत के पूरे कामकाज पर उनका अधिकार था। कहा जाता था कि धन्नी डोसी (बुढिय़ा) के टोकरी भर गहने हैं। वह छोटे बेटे से बार-बार बहियां लिखवातीं और लेनदारों से सूद वसूलने खुद दौड़-धूप करती थीं।
डाहयाभाई नौंवी तक पढ़े थे। उन्होंने बाइबिल की थीम पर ‘डेविड और गोलियाथ’, ‘सयाना राजा साऊल’, ‘महान मोजेज’, ‘जोसेफ एवं उसके भाई’ तथा ‘सच्चा दोस्त’, ‘धन्य वह जो मथ्था (सिर) दे दे’ और ‘अब जागो’ सामाजिक नाटक लिखे थे। वह निर्देशन और अभिनय भी करते थे। गुजराती के विख्यात रंगकर्मी एवं अभिनेता चीमन मारवाड़ी से उनकी दोस्ती थी।
डाहयाभाई पहनावे के शौकीन थे। रंगीन मिजाज और अय्याश किस्म के थे। शास्त्रीय संगीत के अनुरागी थे। खूब गाते थे। उनके छह विवाह हुए। बाल विवाह की स्त्री पसंद न आने पर उससे गौना ही नहीं किया। नाता तोड़ दिया। दूसरी शादी की। वह निपट गंवारू निकली। तीसरा विवाह गंगा से हुआ। सुहागरात को वह घुंघट तान कर उलटे मुंह बैठ गई। पूछने पर पता चला कि उनसे पहले उनके ममेरे भाई की मंगनी हुई थी। मायके वालों ने हामी कर दी थी। बाद में उनसे मंगनी हो गई। खाता-पीता घर देखकर मायके वालों ने पहली मंगनी नकार दी। दूसरी कबूल कर ली। गंगा के मन में यही मलाल था।
डाहयाभाई ने पूछा, ”क्या तुम्हें यह घर पसंद नहीं है?”
गंगा ने कहा, ”मैंने उनको बैन दिया था। चाहे वे गरीब रहे। मेरा मन नहीं मानता।”
यह सुनकर वह बाहर निकल गए। दूसरे दिन भाई के साथ गंगा को उसके मायके सादर पहुंचा दिया। समाज का दंड भुगत लिया। एक ही महीने में गंगा का पुनर्विवाह ममेरे भाई के साथ करा दिया।
चौथे विवाह में उनसे धोखा किया गया। तब तक वे बाइस साल के हो चुके थे। पांचवी शादी जोसेफ  की मां हीरी बहन से हुई। इन दोनों का गृहस्थ जीवन नौ साल चला।
1938 में हीरी बहन को टी.बी. हो गई। उस जमाने में यह असाध्य रोग था। इसलिए डाहयाभाई ने मान लिया कि अब यह बचने वाली नहीं है। उनका पत्नी की ओर से दिल-दिमाग उचट गया। हीरी बहन करीब सात माह तक अस्पताल में रहीं। डाहयाभाई उस दौरान गांव खंभोलज में मिशनरी महकमे में तैनात थे। उसी गांव की एक तलाकशुदा औरत दिवाली बहन से उनकी आंखें लड़ गईं। वह बहुत खूबसूरत थी। जब हीरी बहन वापस आईं, तब तक बात बहुत आगे बढ़ चुकी थी। वह सब जान चुकी थीं। एक दिन कुंए पर जाकर दिवाली बहन से मिलीं। उससे गुहार लगाई कि अब जीने का मन नहीं रहा है। मैं तो मर जाऊंगी। ये अवश्य तेरे साथ विवाह कर लेंगे। मेरे दो बेटे हैं। इन्हें प्यार से पालने-पोसने का वचन दे दो तो तुम्हारा सौभाग्य अमर रहे, ऐसा आशीष देती जाऊंगी। दिवाली बहन ने कोई जवाब नहीं दिया और मुंह चढ़ाकर चली गई।
चौथे दिन रविवार था। खंभोलज से ओड आठ मील की दूरी पर था। डाहयाभाई के छोटे भाई सोमभाई भाभी को लेने बैलगाड़ी लेकर आने वाले थे। लेकिन उन्होंने पति के साथ पैदल चलने का आग्रह किया। वह पति से सच्ची बात जानना चाहती थीं।
जोसेफ और उसका पांच साल बड़ा भाई मनु बाते करते, खेलते थोड़ा आगे चल रहे थे। हीरी का स्वर पति के साथ उलझ रहा था। मनु बार-बार पीछे मुड़कर देख लेता। वह कुछ-कुछ समझता था। इसलिए चिंता में था।
अचानक हीरी बहन के कंठ से करुण चीख निकली। मुड़कर देखते ही जोसेफ और मनु सहम गए। हीरी बहन नीचे पड़ी थी और डाहयाभाई उसे छाते से बेरहमी से पीट रहे थे। उन पर मानों शैतान सवार हो गया था। हीरी बहन के लिए यह अनेपक्षित था। वह बीच-बचाव का कोई प्रयास नहीं कर रही थीं। डर के मारे जोसेफ का पेशाब निकल गया। वह जोर-जोर से चीख-पुकार कर रोने लगा। मनु से नहीं रहा गया। वह झपटा और पिता की कोहनी पर दांत गड़ा दिए। उनके हाथ से छाता छूट गया। वे कोहनी छुड़ाने का प्रयास करने लगे। लेकिन छुड़वा नहीं पाए। उनका दूसरा हाथ मारने के लिए उठा भी, लेकिन शर्मिंदगी के कारण ठिठक गए। आखिर खून की उल्टी करती हीरी बहन ने लडख़ड़ाते स्वर में कहा, ”छोड़ दे बेटे! ये तो हमें मार डालने के लिए पैदा हुए हैं।”
मां के स्वर ने मनु को पिघला दिया। डाहयाभाई का झटका और मनु का जबड़ा खोलना एक साथ हुआ। इससे लगे धक्के से वह झड़बेरी की झाड़ी में जा फंसा। कांटों से उसकी छाती और पीठ छलनी हो गई। वह ज्यों-ज्यों कंटीली झाडिय़ों से अपने को छुड़ाने का प्रयास करता, त्यों-त्यों और अधिक फंसता जाता।
इस अशुभ घटना ने जोसेफ के बाल सुलभ मन को मार दिया- पिता मेरे लिए मर गया। गोदी में बिठाकर निवाले खिलाते, कंधे पर बिठाकर मौज कराते, बड़े चाव से नहलाते और कपड़े पहनाते, रात को कहानियां सुनाते, लोरियां गाकर सुलाते पिता की छवि धूमिल हो गई।
बैलगाड़ी लेकर आते सोमभाई ने जोसेफ की आवाज सुन ली। वह बैलगाड़ी को छोड़कर उस ओर दौड़ पड़े। करीब आकर उन्होंने यह दृश्य देखा तो मानों उन्हें काठ मार गया। वह बड़े भाई का बहुत आदर करते थे। भाभी को मां की तरह चाहते थे। वह कुछ नहीं बोले, तिरस्कृत नजरों से भाई को घूरते रहे। डाहयाभाई छोटे भाई की आंखों से आंखें नहीं मिला सके और मुंह मोड़कर वापस चले गए।
सोमभाई ने पहले मनु को कांटों से मुक्त कराया। फिर भाभी को उठाकर गाड़ी पर रखे गुदड़ पर लिटा दिया। जोसेफ को गोद में लिया और बैलगाड़ी चला दी।
उसी शाम धन्नी मां ने डाहयाभाई को बुलावा भेजा। शाम के धुंधलके में वे आए। धन्नी मां औसरे में बैठी थीं। डाहयाभाई देहरी पर पैर रख ही रहे थे कि वह चिल्लाईं, ”मेरे घर की देहरी पर पैर रखकर उसे छूत मत लगा। कान खोलकर सुन ले। आज से तू मेरे लिए मर गया। यदि मैं मर भी जाऊं तो मेरे मुर्दा शरीर पर मिट्टी डालने भी मत आना। मेरी अवगति होगी। मुझे मुंह मत दिखा। बस लौट जा।” वह अंदर चली गईं।
डाहयाभाई का चेहरा उतरा हुआ था। कोहनी पर पट्टी बंधी थी। पहनावा सादा था। पैर में जूते तक नहीं थे। दोपहर को उन्होंने शायद खाना नहीं खाया था। जब वह जाने लगे तो पास वाले दूसरे घर के किवाड़ की ओट में खड़ी जोसेफ की छोटी चाची जवेरबा मनौवल करने लगी, ”जेठजी, बिना खाये-पीये मत जाइए। मैंने खिचड़ी और गर्म दूध रखा है। थोड़ा खाते जाइए।”
एक पल के लिए वह ठिठके फिर चले गए। इस हादसे के बाद से हीरी बहन की जीने की इच्छा नहीं रही। लाख मनाने पर भी वह दूध-घी आदि पौष्टिक आहार नहीं लेतीं। वह बार-बार देवरानी जवेरबा से चिरौरी करतीं कि मनु को भी गोद ले ले। चाचा-चाची निसंतान थे। दोनों बच्चों को बहुत प्यार करते थे। दूध, दही, घी, मक्खन से बच्चे पुष्ट हों इसलिए ज्यादातर वे गांव में दादी के साथ ही रहते थे।
उस हादसे को दो महीने बीत गए थे। सितंबर का महीना था। हीरी बहन के चेहरे पर अजीब-सी दीप्ति थी। सास, देवरानी और ननद, सभी गहरी चिंता में पड़ गईं। देवर दु:खी थे। पर हीरी बहन खुश थीं। उन्होंने साग्रह देवरानी और ननद की सहायता से स्नान किया। नई साड़ी पहनी। लंबे बालों में वेणी गुंथवाई। देवरानी से हलवा बनवाया। अपने हाथों से दोनों बेटों को खिलाया, खुद भी खाया। फिर जोसेफ को आदेश दिया कि अब नाटक खेलो। दिसंबर में क्रिसमस-नाताल की रात को पिता द्वारा लिखे नाटक ‘विलहेम टेईल’ को बच्चे खेलते थे। विलहेम का बेटा वॉल्टेर जोसेफ बना था। उसे नाटक के कई संवाद याद थे। मां को खुश करने के लिए वह कई बार यह नाटक खेल चुका था। उस रात भी उसने यही किया। बूट, मौजे, कोट, पतलून, फैल्टकैप से मनु ने उसे सजाया। नाटक शुरू हुआ। गेस्लर नाम का अधिकारी विलहेम की तीरंदाजी को परखने के लिए उसके बेटे वॉल्टेर के सिर पर सफरजन (सेब) रखकर उसे बींधने का आदेश देता है। विलहेम पशोपेश में पड़ जाता है। वॉल्टेर कहता है, ”आप बिना किसी डर और चिंता के तीर चलाइये पिताजी। मैं तिलभर हिलूंगा नहीं। निशाना लगेगा ही। आपका लक्ष्य कभी निष्फल नहीं जाता।”
इस संवाद को सुनते ही हीरी बहन की ‘हायÓ निकल गई। सांसों की छूत के डर से वह कभी बच्चों को पास फटकने भी नहीं देती थीं, लेकिन जोसेफ को खींचकर छाती से लगा लिया और सुबक पड़ी, ”मुझे चारों और अंधेरा ही अंधेरा दिखता है, बेटे। मुझे पता नहीं, तुम कैसे जी पाओगे।” जवेरबा जोसेफ को पास वाले घर में ले गई। वह वहां सो गया। सुबह उठा तो सारा घर स्त्रियों से भरा था। चाची, बुआ, दादी सब रो रहे थे। सोमभाई की आंखें सुर्ख हो गई थीं। मनु पागल सा हो गया था। डाहयाभाई आ गए थे। वह सबसे दूर सिर झुकाए बैठे थे।
दोपहर को श्मशान यात्रा शुरू हुई। रिवाज के अनुसार पति अपनी पत्नी की अर्थी को दाहिनी ओर कंधा देता है। पति जिंदा न हो तो यह रस्म बड़ा बेटा निभाता है। अर्थी उठाते समय डाहयाभाई आगे बढ़े तो सोमभाई ने सिर हिलाकर मना कर दिया। वह स्वयं आगे बढ़े। ग्यारह साल के मनु को साथ रखा और अपने दाहिने कंधे पर अर्थी उठा ली। दफन क्रिया में मिट्टी की रस्म सोमभाई और दोनों बेटों ने निभायी। डाहयाभाई को पति का एक भी फर्ज अदा नहीं करने दिया। यह धन्नी मां का हुक्म था।
हीरी बहन की मृत्यु के बाद जवेरबा ने जोसेफ को मनु के साथ पाठशाला भेजा। मनु चौथी कक्षा में पढ़ता था। वह और उसके साथी कविताएं गाया करते थे। मास्टरजी हुक्का पिया करते थे। लड़कों की कविताओं की गूंज दूर-दूर तक सुनाई देती थी। लोगों को लगता कि स्कूल अच्छा चल रहा है। मनु पढऩे में होनहार था। एक बार पढ़ लेने पर ही उसे कविता या पाठ याद हो जाता था। उसकी तथा साथियों को कविताएं सुन-सुनकर जोसेफ को भी तीसरी और चौथी कक्षा की सभी कविताएं याद हो गईं। सुर सुरीला था। एक दिन मास्टरनी ने उसे गाते सुन लिया। सबको शांत कर उसे अकेले गाने का आदेश दिया। उसे संकोच हुआ। मनु ने हिम्मत बंधाई। मास्टरनी मुंह न देखे इसलिए आगे किताब रख दी। कविता पूरी हुई तो कमरा तालियों की गडग़ड़ाहट से गूंज गया। तब भौंरे वाली कविता की फरमाइश हुई। पहली मुर्गे वाली थी। उसमें मुर्गे का चित्र था। इसलिए किताब सीधी पकड़ी थी। भौंरे वाली किताब पर चित्र नहीं था। उल्टी किताब पकड़े जोसेफ गा रहा था। सभी बच्चे मुंह दबाकर हंस रहे थे। जोसेफ को यह बात मालूम हुई तो वह वह रो पड़ा। इस फजीहत को खत्म करने के लिए मनु ने उसे अक्षरों की पहचान करवाई। हर एक शब्द पर अंगुली रखकर पढऩा सिखाया।
जोसेफ बिना मां का बच्चा था। मास्टरनी उसे बहुत चाहती थी। उनका प्यार करुणा से आद्र्र होता था। बिना एडमिशन लिए ही जोसेफ पढऩा सीख गया। वह पढऩे में होनहार था। सीधे दूसरी कक्षा में भर्ती करा दिया गया। सालाना इम्तहान में वह प्रथम आया।
पत्नी की मौत का कोई गम किए बिना डाहयाभाई ने चौथे ही महीने अपनी प्रेमिका से सगाई कर ली।
धन्नी मां ने जाना तो पुत्र को बुलाकर सुना दिया, ”देखो, बहुत मनमानी करते रहे हो। पर मेरे जीते जी उस औरत का पैर मैं अपने घर में नहीं पडऩे दूंगी।”
डाहयाभाई नहीं माने। शादी की तैयारी होने लगीं। उन्होंने सोमभाई को किसी तरह मना लिया। जिस रोज बारात जाने वाली थी, उसकी पहली रात को धन्नी मां ने बेटी से दूध गरम करवाया। उसमें ढाई-तीन तौला अफीम मिलाकर पी लिया। रोज दूध पीते समय घर की बिल्ली के लिए दो-तीन घूंट दूध रख छोड़ती थीं। बिल्ली ने खाली कटोरा चाटा और मुंह फेर लिया। छोटी बेटी ने यह भांप लिया।
कटोरे में स्याह परत देखकर उन्होंने पूछा, ”मां, अफीम तो नहीं घोला?”
”हां बेटी, वही किया। मैंने कहा था कि मेरे जीते जी उस औरत के पैर घर में नहीं पडऩे दूंगी, न उसका मुंह देखूंगी। यह कपूत मेरी एक नहीं सुनता। मैं भी अपने जबान पर अटल हूं। सोने जैसी मेरी बहू की मौत का लोकाचार भी पूरा नहीं हुआ है और यह फिर ब्याहने घोड़े चढ़ रहा है। मैं इस घर में अच्छा शगुन नहीं छोडूंग़ी।” धन्नी मां रो पड़ी।
उस रात ढाई बजे वह मर गईं। छोटी बेटी सारी रात अकेली मृत मां का हाथ पकड़े बैठी सुबकती रही। मरने से पहले धन्नी मां ने उससे कहा था, ”सुबह का मुर्गा न बोले, तब तक मेरी मौत पर रोना मत।”(गुजराती में इसे मरणपोक कहते हैं)
सुबह होते ही वह गला फाड़कर रो पड़ी। पास वाले घर से सोमभाई और जवेरबा दौड़ आये। मनु ने जोसेफ को झकझोरा, ”चल उठ, दादी मां भी मर गई।”
खबर मिलते ही डाहयाभाई भी दौड़कर आए। बड़ी बेटी के आने पर दोपहर डेढ़ बजे श्मशान यात्रा शुरू हुई। कब्र में अंतिम पानी डालने की रस्म जोसेफ ने निभायी। धन्नी मां को दाहिना कंधा सोमभाई ने दिया। ढाई बजे सब लौट गए। स्नानादि से निपटकर साढ़े तीन बजे डाहयाभाई की बारात सजी।
मान-मनौवल कर सोमभाई ने दोनों भतीजों को भी बाराती बनाया। दूसरे दिन चर्च में लग्न विधि हुई। दस बजे विदाई हुई। सभी पैदल चल रहे थे। किसी ने जोसेफ से कहा, ”तू पैदल क्यों चल रहा है? जा तेरी नई मां गोद में ले लेगी।” नई मां ने सुना और उसे गोद में ले लिया।
रास्ते में वह स्थान पड़ा, जहां मां के साथ वारदात हुई थी। मनु के मुंह से चीख निकल गई, ”जोशिया, देख अपनी मां वाली जगह। उतर जा। उसके पास हम नहीं जा सकते।” जोसेफ नई मां की गोद से जबरदस्ती छूट कर भाई के पास दौड़ गया। मनु और सोमभाई भीगी आंखों से उस जगह को निहार रहे थे। डाहयाभाई कुछ दूरी पर अपने दोस्त से बात कर रहे थे। वे वहीं खड़े रहे। नई मां कुछ समझी नहीं। पर उसी क्षण से जोसेफ उसकी नजरों से उतर गया।
अच्छा-खासा, भला-चंगा मनु नई मां के आते ही मुरझा गया। वह ठीक से खाता-पीता नहीं। सदैव झींकता रहता। दो महीने में वह सूखकर कांटा हो गया। तीन दिन बीमार रहा और एक दिन शाम को चल बसा। घर में सभी रो रहे थे। नई मां अप्रभावित थीं। न उनके आंसू थे, न चेहरे पर दर्द।
मनु की मौत के दूसरे महीने सोमभाई का दाहिना घुटना फूलने लगा। उसमें असह्य दर्द होने लगा। बहुत इलाज किया। यहां तक की लोहा गर्म करके पांच दाग भी दागे गए। लेकिन आराम नहीं हुआ। आखिरकार आणंद के साल्वेशन आर्मी अस्पताल में मेंडोकूक साहब ने जांघ से पैर काट दिया। दो महीने में ही वह बैशाखियों के सहारे चलने लगे।
जवेरबा भैंसों के चारे के लिए तड़के ही खेत में चली जाती थी। जिस रोज नई मां रोटियां सेंकती थीं, जोसेफ के लिए कम पड़ जाती थीं। वह चिल्लाने लगता और नई मां से जो मुंह में आए बोल देता।
उस रोज जवेरबा ननद की सुसराल गई थीं। दिवाली बहन और डाहयाभाई खेत में से जैसे ही आए भूख से परेशान जोसेफ बोल पड़ा, ”रोटी रखने के बक्से में ताला क्यों लगता है? मेरे लिए दही-रोटी क्यों नहीं रखी? जिस दिन तुम रोटी पकाती हो… मेरा पेट काटती हो…।”
डाहयाभाई आपे से बाहर हो गए। चारे की गठरी पटककर वह उसकी ओर लपके। एक भरपूर तमाचा कनपटी पर जड़ दिया। जोसेफ गिर पड़ा। वह बाल पकड़कर उसे पीटने लगे। झुंझलाहट के मारे उन्होंने उसे दीवार की ओर धक्का दे दिया। वह उखल पर जा गिरा। बाईं ओर सिर पर एक ईंच गहरा घाव हो गया। ज्वर के कारण सोमभाई पास वाले घर में सो रहे थे। जोसेफ की चीख-पुकार सुन वह दौड़कर आए। जीवन में उन्होंने पहली बार बड़े भाई को ललकारा, ”आप पड़साल (औसारा) से नीचे उतर जाइए। वर्ना मेरी बैशाखी आपकी सगी नहीं होगी। एक को तो मार डाला। अब दूसरे का भी खून कर रहे हो।”
डाहयाभाई मुंह लटकाये पड़साल से उतर गए। दिवाली बहन भी डरकर कोने में दुबक गई।
सोमभाई अपने आप पर काबू नहीं कर पा रहे थे। भयंकर क्रोध की कंपन और जोसेफ की चिंता में वह लडख़ड़ाकर गिर पड़े। पूरा बोझ कटी हुई टांग पर पड़ा। कठोर धरती ने रुझान भरे आवरण को कुचल डाला। सारा पड़साल खून से भर गया। खून रुक नहीं रहा था। धर्मादा दवाखाने के डॉक्टर ने दवा और पट्टी बांधकर बड़े अस्पताल ले जाने को कहा। बैलगाड़ी जोत कर उन्हें आणंद ले जाया गया। तब तक बहुत रक्त बह चुका था। वह बेहोश हो गए। डॉक्टर कूक के कारण वह बच तो गए, लेकिन फिर अपने पैरों पर खड़े नहीं हो पाए। डेढ़-दो महीने में साढ़े तीन मन की काया कंकाल सी हो गई। फिर एक उदास सांझ को उन्होंने अपनी पत्नी को पास बुलाया और सिरहाने खड़े रहने को कहा। वह आंखों में दृष्टि लगाए कुछ देर देखते रहे, फिर उनका सिर दाईं ओर लुढ़क गया, जहां जोसेफ बैठा था। पछाड़ खाकर जवेरबा गिर पड़ीं।
मातमपुर्सी और लोकाचार के साथ महीना बीत गया। अब साड़ी बदलवाने* की रस्म आई। छोटी ननद उन्हें नहला रही थी। तब उन्होंने कहा, ”ननदजी, तुम्हारे भाई का वंश मेरी कोख में पल रहा है। तीन महीनों से मेरे कपड़े नहीं आए। तुम्हारे भाई यदि यह जानते तो वे जी जाते। अब जेठजी से इतनी गुहार कीजिए कि पास वाला घर मुझे दे दें। जोशिया को लेकर मैं वहीं रहूंगी। खेत, घर और भैंसों का काम मैं कर लूंगी।”
भाई की मौत के बाद पहली बार छोटी बुआ के होंठो पर खुशी छा गई। भाभी को उसने बांहों में भर लिया। नई साड़ी पहनाकर केशों में बेणी सजाई। इसका मतलब था कि वैधव्य धर्म का पालन करते हुए वह अब आजीवन पति का घर नहीं छोड़ेगी। यह देख डाहयाभाई का माथा ठनका। उन्होंने छोटी बहन से पूछा। उसने सारी बात बता दी।
दिवाली बहन को यह कतई पसंद नहीं था कि जवेरबा का बेटा आधी मिल्कियत का भागीदार बने। अंतत: उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध मायके भेज दिया गया। घर छोड़ते समय वह इतनी बेजार थी कि जोसेफ को भी साथ ले चलीं। इतना भी ध्यान नहीं रहा कि इसे साथ नहीं ले जा सकती। जब वह जा रही थीं, खेत से लौटती लाडो मिल गई। वह उनके मातहत मणिभाई चमार की पत्नी थी। ये लोग घर और खेत में काम करते थे। इनसे रोटी, पानी का व्यवहार न था,  लेकिन लाडो इतना घुलमिल गई थी कि धन्नी मां से आंखें बचाकर रोटियों सेंक देती, विलौना चला दिया करती थी।
लाडो जोसेफ को अपने घर ले गई। जानती थी फिर भी खाना बनाकर खिलाया। वहीं सुला दिया। चार बजने को आए तब उसके हाथ-मुंह धुलाकर घर भेजने चल दी।
डाहयाभाई बाहर बैठे हुक्का पी रहे थे। वह घूंघट ताने, जरा तिरछी होकर बोली, ”बड़े ताऊजी, छोटी भौजी आज सुबह पीहर चली गईं। वह तो नहीं चाहतीं, पर पेट छुट्टा होने पर शायद इनका दूसरा विवाह हो जाएगा। आपने उसे सहारा दिया होता तो छोटे चाचा के बेटे को यहीं जन्म देतीं।”
डाहयाभाई मौन-मूक सुनते रहे।
”एक और अर्ज गुजारती हूं।” वह जोसेफ को आगे धकेल कर बोलीं, ”इस नन्हे की बद्दुआ न लीजिएगा।”
अंधेरा उतरा। दीया-बाती हो गई। पड़साल में बैठे जोसेफ की किसी को चिंता न थी। ऐसे की किवाड़ बंद हो जाएंगे, यह सोचकर उसकी रूलाई फूट गई। सामने वाले घर से जीवी काकी निकल आईं और कहने लगीं, ”अरे रोता क्यों हैं रे? तेरी चाची कहां गई?”
यह सुनकर दिवाली बहन बाहर निकली, ”यह मेरी आबरू किरकिरी करके ही रहेगा। नई मां जो हूं। कब की खाने को बुलाती हूं, पर सुनता ही नहीं।”
इतने में डाहयाभाई आ गए। पिता के डर से जोसेफ भीतर चला गया। दिवाली बहन ने एक प्लेट उसकी ओर ठेल दी। इसमें बची-खुची थोड़ी-सी खिचड़ी थी। घी नहीं था। ज्यादा घी नहीं लेने की रोज चाची से हठ करता था। पर आज उसकी समझ में आ गया कि लाड़-प्यार के दिन अब लद गए हैं। वक्तपर अच्छा-पेट भर कर खाना अब शायद ही मयस्सर हो।
उस रात जोसेफ को पड़साल में अकेला सोने के लिए छोड़ दिया गया। जाड़े का मौसम। खुली पड़साल में सनसनाती ठंडी हवा में छोटी-सी खटिया में पतली गुदड़ी ओढ़े, घुटने छाती से लगाए वह दुबका पड़ा था। बहुत डर लग रहा था। टावर में ग्यारह के टकोरे लगे और लाल कुतिया आ गई। उसने जोसेफ को सूंघा। जरा-सी कू-कू की और खाट के नीचे सो गई। उसकी उपस्थिति ने जोसेफ के डर को दूर कर दिया। उसे लगा जैसे- तारों में छिपी मां ने कुतिया को भेज उसे अकेला नहीं छोड़ा। निश्चिंत मन से वह सो गया। रात को ठंड का प्रकोप बढ़ा। कुतिया खाट पर चढ़ आई। इसका जोसेफ को पता नहीं चला। कुतिया की देह की गर्माहट से उसे ऊष्मा मिली। वह खूब सोया और सुबह तरोताजा जागा। बगैर भय-चित्कार के जोसेफ ने शांति से रैन बसर कर दी, इस बात का दिवाली बहन को अजीब आश्चर्य हुआ।
उसी साल दिवाली बहन ने बेटे को जन्म दिया। उनकी पहली शादी इसलिए टूटी थी कि तीन-चार साल बीतने पर भी मां नहीं बन पाईं। उन्हें बच्चे को जन्म देने के बड़े अरमान थे। बेटा होने पर वह आसमान में उडऩे लगीं। अब घर का सारा काम- झाडऩा, पौंछना, बुहारना, बर्तन मांजना, गोबर के टोकरे सिर पर लादकर खाद के लिए गड्ढे में डालना, भैंसों की नाद साफ करना सभी जोसेफ के सिर पर आ पड़ा। सुबह पांच बजे से लेकर रात ग्यारह बजे तक वह काम में लगा रहता। सब्जी बघारना और रोटी सेंकना भी सीखना पड़ा।
आठ साल के जोसेफ को वह कुंए पर ले जाती। कुंए बहुत गहरे थे। कहावत थी-
ओड-उमरेठ के गहरे कुंए
बेटी ब्याहे उसके मां-बाप मुए!
अर्थात् ओड और उमरेठ गांवों के कुंए इतने गहरे हैं कि कोई इन दो गांवों में अपनी दुलारी बेटी का ब्याह नहीं करेगा, करने वालों को बेटी की इतनी बद्दुआ पहुंचती है कि मानों वे बेमौत मर गए।
तीन साल इसी तरह गुजर गए। जोसेफ की पढ़ाई छूट गई। उस की किसी को चिंता नहीं थी। उस साल बारिश बहुत कम हुई। खेती बेकार हुई। बैल मर गया। दुर्भाग्य से दिवाली बहन के बेटे को कोई रोग लग गया। उसके पेट में कुछ टिकता नहीं था। छह महीने में वह सूखकर कांटा हो गया। उसके इलाज पर बेशुमार खर्च हुआ। गहने भी बिक गए। खाने के लाले पड़ गए। गांव में मिशन का मास्टर कहीं चला गया था। डाहयाभाई के घर की हालत बहुत खस्ता जानकर पादरी आए। उन्होंने डाहयाभाई को स्कूल चलाने का जिम्मा सौंप दिया। तनख्वाह 60 रुपये महीना निश्चित हुई। अब डाहयाभाई को जोसेफ को स्कूल में नए सिरे से दाखिल करना पड़ा। यहीं से जोसेफ के जीवन में नया मोड़ आया।
डाहयाभाई ने किसी तरह जोसेफ की चौथी कक्षा में भर्ती करा दिया था। घर के काम का बोझ जोसेफ के सिर से नहीं टला था। वह सप्ताह में दो-तीन घंटे जाकर स्कूल में बैठता और मिशनरी महकमे से आई चौथी कक्षा की किताबें पढ़ता।
कुंए में पानी भरते हुए जोसेफ की लड़कियों से अच्छी बनती थी। इनमें आणंद मिशनरी बोर्डिंग में सातवीं में पढऩे वाली सुमित्रा भी थी। वह बड़े प्यार से गणित और गुजराती सिखाती थी। पुस्तक पढऩे का चस्का भी उसने लगाया। कहानी-उपन्यास का भेद समझाया। इसी की वजह से मुख्यालय के हैडमास्टर वार्षिक परीक्षा लेने आए तो जोसेफ प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हो गया। हैडमास्टर ने डाहयाभाई से कहा, ”लड़का बहुत होशियार है। इसका भविष्य बनाओ। मिशन स्कूल में मुश्किल पड़ता है तो गांव के लोकल बोर्ड स्कूल में भेजो। वर्नाक्यूलर फाइनल हो जाएगा तो प्राइमरी स्कूल का मास्टर तो बन ही जाएगा।”
उन्होंने जोसेफ के लिविंग सर्टिफिकेट पर हस्ताक्षर किए और उसे रजिस्टर में रखते हुए कहा, ”देखो, स्कूल खुलने पर अगर तुम्हारे पिताजी आनाकानी करें तो यह सर्टिफिकेट लेकर तुम खुद चले जाना। वहां के हैडमास्टर मेरे दोस्त हैं। मैं उन्हें चिट्ठी लिख दूंगा। वे तुझे दाखिला दे देंगे।”
डाहयाभाई टालमटोल करने लगे। जोसेफ एक दिन सर्टिफिकेट हथिया कर हैडमास्टर के पास चला गया। उसके पास शुल्क जमा करने को दस आने नहीं थे। उसने वादा किया, ”कल दे दूंगा।”
जून का महीना था। वह सुबह चार बजे उठा। आम पकने पर रात को टपक जाते हैं। उसने बाग में जाकर टोकरा भर आम बटोर लिए। करीब बीस किलो आम थे। वह टोकरा सिर पर रख दो-तीन मील दूर गांव चला गया। वहां रामजी मंदिर के चबूतरे पर बैठ गया। ग्राहक आने लगे। मोलभाव उसे आता नहीं था।
एक ने पूछा, ”पूरा टोकरा कितने में दोगे?”
जोसेफ ने कहा, ”आपको जो वाजिब लगे दे दो।”
”दो रुपये देता हूं। टोकरा मेरे घर पहुंचाना होगा।” ग्राहक बोला।
पास खड़ा दूसरे टोकरे वाला बोला, ”क्यों महाराज! बच्चा जानकर ठग लेना चाहते हो? क्यों रे, तू भाव बिगाड़ता है? मुफ्त में आते हैं आम? देखो साहजी, पूरे पांच लगेंगे। लेना है तो ले लो।”
ग्राहक ने पांच रुपये गिन दिए। जोसेफ टोकरा खाली करके लौटा तो उस आदमी के आम भी बिक चुके थे। वह बोला, ”तू नया लगता है। धंधा करना नहीं जानता। कल मेरे पास ही खड़े रहना।”
जोसेफ के मन में ऐसा कोई विचार नहीं था। फिर उसने सोचा कि उसके खाने-पीने, कपड़े और सुध लेने वाला कौन है? उसने आम मिलने तक यह धंधा करने का निश्चय कर लिया।
छह-सात दिन उसने यह कारोबार किया। उसने बयालीस रुपये कमाए। घर में किसी को कानों-कान खबर नहीं हुई। ये पैसे उसने बचपन के दोस्त मगन के घर रख दिए क्योंकि घरवालों को पता चल जाता तो वह सारे रुपये ले लेते।
इन्हीं रुपयों से मगन के पिताजी जोसेफ के लिए दो जोड़ी कपड़े (कमीज, हॉफ पैंट और चड्ढी) और चप्पल ले आए। तेरह साल की उम्र में पहली बार उसने चप्पल पहनी।
नए कपड़े मिलने पर भी तत्काल पहन न सका। अब तक वह उपेक्षित जीवन जी रहा था। तन के कपड़े जब जीर्ण हो जाते तभी या तो बंबई बसे चचेरे भाइयों के उतरे हुए या फिर सिंधी व्यापारी के पास से तैयार हल्की किस्म के नसीब होते थे। वह नहाता रोज था, लेकिन सिर पर न तेल लगाता और न कंघा फिराता। ऐसी हालत में किसी शिक्षक का ध्यान उसकी ओर नहीं गया।
स्कूल खुले एकाध महीना हुआ था। क्लास टीचर ने युवा कवि कलापि (वह लाठी स्टेट के राजा थे) की कविता ‘एक घा’ पढ़ानी शुरू की। कविता का भावार्थ समझाने के बाद उन्होंने उसका मंदाक्रांता छंद सुनाया। विद्यार्थियों से पूछा, ”कौन यह कविता गाएगा?”
जोसेफ के पास मगन बैठा था। उसने कोहनी मारते हुए कहा, ”तू खड़ा हो जा और सुना दे। आज तेरा सिक्का जम जाएगा।” जोसेफ खड़ा नहीं हुआ तो वह बोला, ”मास्टरजी, जोसेफ गाएगा। इसका कंठ बहुत सुरीला है।”
जोसेफ को उठना पड़ा। शुद्ध रूप से मंदाक्रांता छंद का गान सुनकर मास्टरजी आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने पूछा, ”यह छंद तू पहले से जानता था?” जोसेफ ने इनकार कर दिया। उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि मैला-कुचैला गंवार लड़का एक बार सुनकर शास्त्रीय शुद्धता से गा पाये। उन्होंने परखना चाहा। पुस्तक के कुछ पन्ने पलट उन्होंने ‘शार्दुल विक्रिडित’ छंद का एक अष्टक निकाला। एक बार स्वयं सुनाया और जोसेफ से सुनाने के लिए कहा। बिना यतिभंग के उसने सुना दिया। वह अब भी संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने ‘काचला-काचबी’ का भजन अपनी तर्ज में गाया और फिर उसे गाने के लिए कहा। यह भजन उसने पहले कई बार सुना था। राग भी परिचित था। उसने इस ढंग से गाया कि सहपाठी तालियां बजा उठे। मास्टरजी ने उसे गले से लगा लिया। दूसरे दिन उन्होंने उसे प्रार्थना गवाने के लिए आगे भेजा। वहां भी वह खूब जमा। वह सबका चहेता बन गया।
मास्टरजी अत्यंत निष्ठावान, शील और संस्कार संपन्न थे। जाति के वाघरी थे। यह एक नीची जाति कहलाती है, जो घरफोड़ चोरी के लिए जानी जाती है। लेकिन वे सबसे अलग थे। अपने विषयों पर पूरा प्रभुत्व था। तन्मय होकर पढ़ाते थे। अपने बनाए टाइम टेबिल में एक पल भी व्यर्थ न करते थे। वे जोसेफ को हर विषयों में सर्वश्रेष्ठ रहने की प्रेरणा देते थे।
स्कूल गए जोसेफ को चार महीने हुए थे। मास्टरजी ने ब्लैक बोर्ड पर विषय लिखा- दारू निषेध अर्थात् शराबबंदी। यह 1948 की बात है। नई-नई आजादी आई थी। गुजरात मुंबई राज्य में सम्मिलित था। गांधीजी की नसीहत मानते हुए मुख्यमंत्री बाला साहब खैर ने पूरे राज्य में शराबबंदी कानून लागू कर दिया था।
ब्लैक बोर्ड पर विषय लिखकर मास्टरजी ने कहा, ”इस विषय पर निबंध लिखो।”
जोसेफ की समझ में बात नहीं आई। उसने पूछा, ”क्या लिखें मास्टरजी?”
वे बोले, ”निबंध।”
जोसेफ ने कहा, ”ठीक है। पर लिखें क्या?”
मास्टरजी को भी दिक्कत हो रही थी कि वह क्या व्याख्या समझाएं। वह बोले, ”निबंध… निबंध माने… देखो ‘निषेध’ का मतलब है- नहीं पीना। दारू पीने के फायदे नहीं होते, बहुत नुकसान होता है। पैसों की बर्बादी… आदमी, आदमी नहीं रहता, हैवान बन जाता है। बस! ऐसा ही तुम्हारे मन में जो आए, वही लिखो।”
फतेहसिंह दरबार नाम का एक मुंहफट लड़का बोला, ”कम पीयें तो हिचकोले आते हैं और ज्यादा पीयें तो चला नहीं जाता, धड़ाम से गिर पड़ते हैं। इसमें लिखने को क्या रखा है?”
मास्टरजी सहित सभी बच्चे हंस पड़े। पर क्या लिखना है यह बात जोसेफ के समझ में आ गई।
मगन के पिताजी गोरधन हफ्ते में एक बार शराब पीकर आते थे। वह तीन-चार घंटे बस्ती को सिर पर उठाकर रखते थे। वह गर्जना करते हुए बस्ती के नुक्कड़ पर आते तो स्त्रियां किवाड़ बंद कर घरों में घुस जातीं। वह बलिष्ठ थे। नशे में धुत्त होने पर भी अच्छे-खासे जवान भी उनसे डरते थे। उनके मन में जिनके दुर्गुण होते उनके नाम ले-लेकर जलील करते थे। वह थोड़ा-बहुत भवान भगत या डाहयाभाई से डरते थे।
एक बार उन्होंने डाहयाभाई का मुंह नोंच लिया, ”डाया काका, मैं आपका आदर करता हूं। आप मेरे आड़े मत आओ। अपना घर संभालो। नई बहू क्या लाए, खुद के बेटे और धरम-करम को ही बिसर गए। आपको देखता हूं तो मुझे लाज आती है।”
उसके बाद डाहयाभाई उसके सामने आने की हिम्मत न जुटा सके। वह दिवाली बहन को भी नहीं बख्शते थे। वह दूर के रिश्ते में उनकी बहन लगती थीं। वह मर्यादा रखकर गाना जोड़ते -
प्रभु मुझे ऐसी बहन ना दे
जिसका हिरदा पत्थर का हो
कलेजा कंटीला हो।
नशा उतरा पाते तो वह कमर में बंधी बोतल निकालकर मुंह में उड़ेल लेते। फिर घर की देहरी चढ़ते और निर्दोष पत्नी को पीट देते। चीख-पुकार का उनपर कोई असर न पड़ता। एक बार तो उसका हाथ टूट गया था। मगन कद-काठी में मासूम था। उस दिन मां की हालत उससे देखी नहीं गई। घर में बर्छा था। बर्छे की नोक बाप के गले पर लगाकर वह चीखा, ”छोड़ दे मेरी मां को, वर्ना घुसेड़ दूंगा तेरे गले के आरपार।” बेटे के तमतमाये चेहरे से गोरधन दहशत खा गए। शर्मिंदा होकर वह वहां से चले गए।
यह घटनाक्रम जोसेफ के मन में था। दूसरा- बंबई से उसके दो चाचा आते। शाम को घर में शराबखोरी का दौर चलता। शराब का ठेका एक किलोमीटर दूर था। एक रुपया लेकर वह जाता। बारह आने की देशी शराब की बोतल आती। बड़े चाचा उदारता से कहते, ”तू बहुत सयाना है, चवन्नी अपने पास रख ले।”
आधे घंटे बाद दूसरी, फिर तीसरी और रात के ग्यारह बजे चौथी का हुक्म होता। तब कहा जाता कि अपने पास जमा हुए बारह आने की बोतल ले आ। दूसरी सुबह रुपया देने के वचन से वह मुकर जाते।
इन अनुभवों के आधार पर जोसेफ ने ‘दारू-निषेध’ पर निबंध लिखा। मास्टरजी ने क्लास में पढ़वाया। ताली पिटी। मास्टरजी ने फुलस्केप कागज दिए और करीने से कागज के एक ओर पुनर्लेखन के लिए कहा। उसने लिखकर मास्टरजी को दे दिया।
दो महीने बीत गए। धर्मादा दवाखाने के पास प्रसूति ग्रह बन रहा था। इसकी ईंट भिगोने की मजदूरी जोसेफ के सिर पर लाद दी गई थी। दो दिन से वह स्कूल नहीं जा सका था। दोपहर को मगन दौड़ता हुआ आया और बोला, ”तेरा लिखा वह निबंध प्रतियोगिता में प्रथम आया। मास्टरजी तुझे बुला रहे हैं।”
जोसेफ ने कहा, ”कल शाम तक मैं नहीं आ पाऊंगा।”
दूसरे दिन शनिवार था। जोसेफ ने गहरे कुंए से पानी खींचकर दो बड़े कनस्तर भर दिए थे। बारह बजने वाले थे। वह ईंट भिगोकर बाहर रख रहा था। मास्टरजी वहां आ पहुंचे, ”भाई जोसेफ, पांचवीं से ग्यारहवीं कक्षा के विद्यार्थियों की निबंध प्रतियोगिता में तुम्हारे निबंध को प्रथम पुरस्कार मिला है। मैं धन्य हो गया हूं तुम्हें पाकर।”
जोसेफ गद्गद् हो गया। वह कुछ बोल न पाया।
वह करुणाद्र्र आंखों से उसे निहारते हुए बोले, ”कल स्कूल के पास वाले खेत में पंडाल बंधेगा। मुंबई से राज्य के गृहमंत्री मोरारजी देसाई पधारेंगे। उनके हाथों तुझे इनाम मिलेगा। कल तो तुम आओगे न?”
”जी, कल छुट्टी है। अवश्य आऊंगा।” जोसेफ ने जवाब दिया।
वह उसे सिर से पैर तक निहार कर बोले, ”तुम्हारे पास दूसरे कपड़े हैं।”
उसके पास दो जोड़ी कपड़े थे। मगर उनको निकालने का साहस नहीं था। अधिक पूछताछ होती, इससे पहले ही वह बोल पड़ा, ”जो हैं, यही हैं मास्टरजी।”
”अच्छा। काम से निपटकर इन्हें धो डालना।” मास्टरजी कहकर चले गए।
ईंटों के गेरुए रंग से उसकी सफेद कमीज रंग गई थी। धोने के लिए साबुन नहीं था। कपड़े का रंग ही बदल गया। चड्ढी पर दो बड़े टांके लगे थे। वह इन्हीं कपड़ों को पहनकर दोस्तों के साथ पंडाल में गया।
पंडाल हजारों लोगों से भरा था। निबंध के विजेता की हकीकत पढ़कर मोरारजी देसाई ने आदेश दिया, ”वह निबंध लाओ और सबसे पहले इसे पढ़कर सुनाओ।”
शिक्षक रमणभाई गणपतभाई पाठक आगे बढ़े तो मोरारजी देसाई ने फरमाया, ”मास्टरजी, आप नहीं। उस लड़के से पढ़वाओ, जिसने इसे लिखा है।”
डर के मारे जोसेफ की टांगे थरथरा रही थीं। महिजीभाई मास्टरजी ने हौंसला बढ़ाया, ”घबरा मत। जैसा क्लास में पढ़ा था, वैसे ही पढ़ दे। मेरा नाम रख।”
निबंध के प्रारंभ में शराब न पीने की सीख देने वाली कुछ पंक्तियां थीं। जोसेफ ने सबसे पहले वह गाईं। पूरे पंडाल में निस्तब्धता छा गई। उसने दस-बारह मिनट में निबंध पूरा कर दिया। अंत में मास्टरजी द्वारा लिखाए दो नारे लगाए- जय मातृभूमि, जय हिंद।
पूरा पंडाल ताली की गडग़ड़ाहट से भर गया। इससे जोसेफ को एक अलग किस्म का रोमांच हुआ।
मोरारजी देसाई ने इनाम स्वरूप उसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ दी। उसके मन में आया कि इससे तो पांच रुपये मिल जाते तो ज्यादा अच्छा रहता। कम-से-कम अंग तो ढकता।
मास्टरजी बोल उठे, ”तू लेखक होगा बेटे। तू बहुत नाम कमाएगा।”
जोसेफ को घर में प्रोत्साहित करनेवाला कोई न था। वह अपना सुख-दु:ख भवान भगत से बांटता था। वह उसे बहुत चाहते थे। उस दिन अनेक बधाइयां पाता हुआ जोसेफ उनके पास गया। वह बहुत खुश हुए। एकाध पृष्ठ सुनने के बाद उन्होंने उसे रोक दिया। फिर गोरधन और डाहयाभाई को बुलाया। दोनों को अपने पास बिठाकर जोसेफ से शुरू से निबंध पढऩे को कहा। निबंध में दोनों के चरित्र उजागर हुए थे। उसे डर लगा।
भगतजी बोले, ”पढ़। मैं बैठा हूं। तुझे डर काहे का?”
जोसेफ पढ़ता गया। उसने कनखियों से देखा कि गोरधन काका मिट्टी कुरेद रहे हैं और पिताजी छत की ओर टकटकी लगाए कहीं खो गए हैं।
निबंध पूरा होने पर भगतजी बोले, ”सुन रे गोधा… इस बच्चे की नाल भी नहीं कटी, जिसने तेरे कुचरित्र का लेखा-जोखा लिया है। और मास्टरजी तुम्हारे लहू ने ही तुम्हारे अवगुण गाए हैं। अब तो मानुष की खाल अपनाओ।”
दोनों शर्मसार होकर चुपचाप चले गए।
तभी एक चमत्कार हुआ। गोरधन ने शराब छोड़ दी। वह जोसेफ के साथ आदर और स्नेह से पेश आने लगे। उन्होंने दो जोड़ी कपड़े लाकर डाहयाभाई को दिए, ”मैं जोसेफ के लिए यह इनाम लाया हूं।” उसी दिन से डाहयाभाई के घर में होने वाली महफिलें बंद हो गईं। उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि वे जोसेफ के साथ बेरुखी बरत रहे हैं।
इन दो घटनाओं ने ‘शब्द’ में जोसेफ की असीम श्रद्धा जगा दी।
नई मां से दो टूक बातें हो जाने के बावजूद जोसेफ ने घर-खेती के कुछ काम नहीं छोड़े। उनमें एक था- कुंए से पानी भरना। यह काम उसे बहुत अच्छा लगता था। हमउम्र लड़कियों से मेल-मिलाप होता था। मोहल्ले की स्त्रियां अपना सुख-दु:ख सुनातीं थीं। जोसेफ बहुत छोटा था, लेकिन बहुत कुछ समझने लगा था। कुंआ उसके लिए जीवन की पाठशाला बन गया।
अगले साल लाडो की खूबसूरत जवान बेटी हेता तंबाकू मिल के नराधम मालिक की हवस का शिकार बन गई। उसे गर्भ ठहर गया। मां-बेटी दोनों ने आत्महत्या कर ली। उसी साल सुमित्रा की शादी हो गई। गहरा आघात देकर वह चली गई। इन दोनों घटनाओं ने जोसेफ को झकझोर दिया। उसे लगा जैसे उसके अंदर कुछ टूट गया।
पांचवीं क्लास में जोसेफ प्रथम श्रेणी से उत्र्तीण हुआ। छठी के क्लास टीचर रमणभाई पाठक थे। बड़े आलसी थे। पूरे साल उन्होंने कुछ नहीं पढ़ाया। जोसेफ पांचवीं क्लास में जाकर बैठ जाता था। महिजीभाई ने उसे छठी का गणित और विज्ञान सिखाया। बाकी उसने खुद पढ़ लिया। वह प्रथम श्रेणी से पास हो गया। महिजीभाई ने उसका लीविंग सर्टिफिकेट काट दिया और डाहयाभाई को थमाते हुए कहा, ”आणंद में मिशनरी बोर्डिंग स्कूल है। इसे वहां भर्ती करा दो। अच्छे प्रतिशत से फाइनल पास हो जाएगा तो प्राइमरी शिक्षक की नौकरी मिल जाएगी। इसका भविष्य बर्बाद न होने दो।”
डाहयाभाई के न चाहने पर भी मिशनरी पादरी ने जोसेफ को नडीआद भेज दिया। वहां 76 फीसदी अंक से वर्नाक्यूलर फाइनल किया। उसी पादरी ने सोलह साल की उम्र होते हुए जोसेफ को खंभोलज गांव की सात कक्षाओं के प्राइमरी स्कूल में पहली से तीसरी क्लास का शिक्षक नियुक्त कर दिया। दो वर्ष वह वहां रहा। धर्म के प्रति लापरवाही का कारण बताते हुए पादरी ने उसकी छुट्टी कर दी।
19 साल की उम्र न हो तब तक लोकल बोर्ड की नौकरी नहीं मिल सकती थी। उसने पुलिस में भर्ती होने का निश्चय किया। नडियाद, जहां वह सातवीं तक पढ़ा था, के पादरी ने फिर शिक्षक बना दिया। दो वर्ष के बाद उसे प्राइमरी टीचर्स ट्रेनिंग के लिए प्रतिनियुक्त किया गया। तब तक उसने एक्सटर्नल रूप से एस.एस.सी. मैट्रिक का प्राइवेट एग्जाम पास कर लिया।
आणंद के स्कूल में दो वर्ष टीचर ट्रेनिंग ली। यहां के आचार्य मगनभाई ओझा प्रखर गांधीवादी और शिक्षा शास्त्री थे। जोसेफ ने उनसे बहुत कुछ सीखा। इस दौरान जोसेफ ने राष्ट्रभाषा हिंदी की ‘साहित्य विशारद’, ‘राष्ट्रभाषा रत्न’ तथा ‘साहित्य अलंकार’ की परीक्षाएं उत्तीर्ण कर लीं। पी.टी.सी. होते ही उन्हें आणंद के प्रसिद्ध सेंट जेवियर्स में हिंदी शिक्षक के रूप में नियुक्ति मिल गई। इसी दौरान डाहयाभाई का देहांत हो गया। वह अपने पीछे छोड़ गए पांच हजार का ऋण, सौतेली मां और उनके चार बच्चे। सारी जिम्मेदारी जोसेफ पर आ गई। आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि वह पिताजी का ठीक से उपचार भी न करा सके। उम्र इक्कीस साल हो गई थी। शादी हो चुकी थी।
पिताजी का ऋण अदा करने के लिए जोसेफ ट्यूशन, प्रूफरीडिंग और प्रतिष्ठित लेखक ईश्वर पेटलीकर के कार्यालय में पुनर्लेखन भी करने लगे। सुबह सात बजे से रात ग्यारह बजे तक यह सब चलता।
हिंदी की परीक्षाओं के दौरान जोसेफ मेकवान सूरदास, तुलसी, जायसी, कबीर, मीरा, केशवदास, बिहारी, रहीम, रसखान, निराला, महादेवी, पंत, प्रसाद से लेकर प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणु, अश्क, यशपाल, कृश्नचंदर, धर्मवीर भारती, दिनकर सहित मोहन राकेश, कमलेश्वर तक को भली-भांति पढ़ चुके थे। प्रेमचंद तो मानो उनके रूह में बस गए।
1954 में उनकी पहली कहानी ‘गेंगड़ी के फूल’ पत्रिका ‘सविता’ में छपी। 1956 से 64 तक उन्होंने 60 से अधिक कहानियां लिखीं।
जोसेफ के पैतृक नाते से तीसरी पीढ़ी के पूर्वज रामदास युवा आयु में चल बसे। उनकी पत्नी गर्भवती थी। पति की मौत के छह महीने बाद वह मां बनी। रिवाज के मुताबिक उन्होंने मायके जाकर पुनर्विवाह नहीं किया। बेटे के सहारे जिंदगी बिताना तय किया। बेटा जवान हुआ। उसका विवाह हुआ। पत्नी का नाम था आसीमां। तीन साल बाद पति दानजी की सांप के काटने से मौत हो गई। आसीमां को तीसरा महीना चल रहा था। उसने भी ससुराल में जीवन बिताने का निश्चय किया। उसका भी बेटा हुआ कानजी। भरी जवानी में दो पुरुषों की मौत हो गई थी। लोग कहने लगे कि यह घर अभिशप्त है। वह चाहे आजीवन कुंवारा रहे। उसका विवाह न किया जाए। कोई बच्चा गोद ले लेना। मां का मन नहीं माना। ब्राह्ïण को बुलाकर सभी व्रत-जप कर बेटे की शादी रचाई। बहू का नाम था पसी। ढाई साल बाद कानजी को टी.बी. हो गई। इलाज में सैकड़ों का ऋण हो गया। खेत गिरवी चला गया। कानजी नहीं बचे।
आसीमां और अन्य लोगों के कहने के बावजूद पसी ने घर नहीं त्यागा। उसके भी बेटा हुआ नाम रखा- देवा। पर टी.बी. वाले बाप का बेटा था। दूध-दवा से छह महीने में भला-चंगा हो गया।
पौष का महीना था। कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। गिरवी रखे ख्त में तंबाकू के तीन फुट के पौधे के तने और पत्तों की जोड़ में जो फुनगी फूटती है, उसे गुजराती में ‘पीला’ कहते हैं। बच्चे की बीमारी के कारण ‘पीला’ तोडऩे-बीनने पसी नहीं जा सकी। ऋण देने वाला पटेल शाम को ज्यों-त्यों बोल गया था। दूसरी सुबह पसी बच्चे को गुदड़ी में लपेटकर खेत में गई। पेड़ पर पालना पड़ा था। बच्चे को सुलाया और ‘पीला’ निकालने में लग गई। एक दिन पहले बेमौसम बारिश हुई थी। इसलिए शीत लहर चल रही थी। सूरज कुछ चढ़ा। ग्यारह बजने को आए पर बच्चा रोया नहीं। जब पसी की छाती से दूध का उफान आया तो बावरी-सी दौड़ पड़ी। देवा ठिठुर कर ‘देव’ हो चुका था। मृत बच्चे को छोड़कर पसी ने दो बजे तक काम किया। फिर बच्चे को लेकर वह घर की ओर दौड़ी। वह खेत से बाहर निकल रही थी। प्रभुदास पटेल आ पहुंचा। उसने उस सद्य: मृत बच्चे को मां के मुंह की ओर नहीं देखा। ”कर दिया काम पूरा।” पूछते वह खेत की ओर देख रहा था। वह बोला, ”यह रुपया लेती जा। तय किया था। मजदूरी दो रुपये एक सूद में काट लिया जाएगा। दूसरा रोकड़ रूप में देना तय था।”
कुंए पर पसी को पागलों की तरह जोसेफ ने देखा। सामने मिलने वाली स्त्रियां भी उसके पीछे जाने लगीं। घर पहुंचकर पसी ने सास से कहा, ”लो मांजी, यह रुपया और यह आपके घर का दीया।” कहकर वह मूर्छित होकर गिर पड़ी।
जोसेफ मेकवान ने इस घटना को आधार बनाकर कहानी लिखी और सुप्रसिद्ध पत्रिका ‘नवचेतन’ में भेज दी। तुरंत स्वीकृति का पत्र आ गया। अगस्त, 64 में वह छपने वाली थी। जुलाई के मध्य में कहानी वापस आ गई। संपादक ने लिखा था, ”माना कि कहानी का सघन करुणांत वास्तवदर्शी है, पर इससे सामाजिक अर्थ क्या संपन्न होगा? यही प्रश्नार्थ होते वापस कर रहा हूं। ‘नवचेतन’ के स्तर की दूसरी कहानी लिखो तो अवश्य भेजना।” उसी क्षण जोसेफ मेकवान ने हाथ में पकड़े फाउंटेन पैन की निब टूट जाए इस प्रकार फर्श पर प्रहार कर प्रण किया कि फिर कभी नहीं लिखूंगा। उन्होंने सोचा कि जिस वास्तव को, शोषण को, निर्मम अत्याचारों, बलात्कारों और क्रूर सामाजिक अन्याय की परंपराओं को देखा या अनुभूत किया, वही यथार्थ यदि गुजराती साहित्य को रास नहीं आ रहा है तो लिखना व्यर्थ है।
उन्होंने 1964 से 80 तक कुछ नहीं लिखा। गुजराती, बंग्ला, हिंदी, अंगे्रजी साहित्य पढ़ा खूब। मंथन चलता रहता।
उनके स्कूल में एक घटना घटी। नौंवी क्लास का एक होनहार विद्यार्थी फेल हो गया। सोलह साल का वैवाहिक जीवन व्यतीत करने के बाद उसके बाप ने अपनी पत्नी से संबंध तोड़ लिए। वह किशोर इस हादसे को सह न सका और आत्महत्या के लिए उतारू हो गया। जोसेफ मेकवान ने उस लड़के को आत्महत्या से रोक लिया, लेकिन उसके बाल मन पर जो कुठाराघात हुआ, उसका मरहम उनके पास भी नहीं था। इस घटना ने उन्हें फिर से कलम उठाने के लिए मजबूर कर दिया। उन्होंने कहानी लिखी- ‘मेरा कौन’। दूसरे ही सप्ताह ‘जनसत्ता’ में छप गई। उनके पास पत्रों का तांता लग गया- लिखो, लिखो और लिखते ही रहो।
‘नया मार्ग’, ‘अखंड आनंद’, ‘जनकल्याण’ आदि कई पत्रिकाएं उनकी रचनाओं को छापने को तत्पर थीं। 1981 से 84 तक उन्होंने बीसियों रेखाचित्र और कई कहानियां लिखीं। 1985 में उनके पहले रेखाचित्र संग्रह ‘व्यथानां वीतक’ का प्रकाशन ‘खेतभवन’ से हुआ। इसे समालोचकों ने बहुत सराहा।
1986 में जोसेफ मेकवान का पहला उपन्यास ‘आंगलियात’ प्रकाशित हुआ। वह अत्यधिक प्रसिद्ध हुआ। गुजराती साहित्य में इसे चौथी लहर माना गया। साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने उसे पुरस्कृत किया। गुजरात साहित्य अकादमी का प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ। इनके अलावा कई अन्य पुरस्कार मिले। इसका हिंदी, राजस्थानी, अंगे्रजी आदि भाषाओं में अनुवाद हुआ। गुजराती साहित्य के गद्य के डेढ़ सौ वर्ष के इतिहास में ऑक्सफॉर्ड से अनुदित होने वाला यह प्रथम उपन्यास है।
पढ़ाते समय ही जोसेफ मेकवान ने बी.ए., एम.ए., बी.एड., सब एक्सटर्नल किया। 36 साल तक हाईस्कूल में शिक्षक रहे। बीच में सात-आठ साल हिंदी के अध्यापक रहे। वहां के दंभी वातावरण में उन्हें घुटन महसूस होती। हिंदी के हैड ऑफ डिपार्टमेंट ने सेमीनार का विषय रखा- ‘क्या माक्र्स पे्ररित साहित्य शुद्ध साहित्य है! शुद्ध साहित्य में उसका क्या स्थान है।’ अपने व्याख्यान में उन्होंने साहित्य की शुद्धतिशुद्ध, कला के लिए जैसी अगड़म-बगड़म स्थापनाएं कर डालीं। जोसेफ मेकवान ने उन्हें आड़े हाथों लिया, ‘यदि इन महोदय की स्थापनाएं सही मानें तो पे्रमचंद के समूचे साहित्य सृजन से लेकर अमृतलाल नागर के ‘बूंद और समुंद्र’, रेणु के ‘मैला आंचल’, मंटो की कहानियां और यशपाल को साहित्य से निष्कासन देना पड़ेगा। 1936 में प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता क्यों की?’ और बहुत से संदर्भ दिए। किसी से जवाब देते नहीं बना।
दूसरे दिन हैड ने उन्हें बुलाया, ”देखिए, मैं आपका हैड हूं। आप मेरे मातहत हैं। हैड की स्थापना से विपरीत बोलना विवेक सम्मत नहीं है।”
जोसेफ मेकवान ने मुंहतोड़ जवाब दिया, ”तुम्हारे हैड पद की ऐसी की तैसी। तुमने समझ क्या रखा है? तुम्हारे हैड पर जूती मारता हूं। जाओ, जो बन पाए, कर दिखाओ।”
हैड सकपका गया। वह प्रिंसिपल से मिला, लेकिन  प्रिंसिपल ने जोसेफ मेकवान का पक्ष लिया। उसकी हेठी हो गई। वर्ष के अंत में जोसेफ ने इस्तीफा दे दिया।
36 साल की नौकरी के बाद 1993 में वह सेवानिवृत हुए। तब से लेखन में संलग्न रहे। उपन्यास, रेखाचित्र, कहानी, निबंध, आलोचना आदि विषयों पर उनकी करीब 50 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।