
विश्वनाथ त्रिपाठी
विगत 25 जून को नागार्जुन के जन्म स्थान तरौनी गांव में प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान में उनके जन्मशताब्दी समारोह का शुभारंभ हुआ। मिथिलांचल बिहार प्रदेश के अंतर्गत है। इसमें बिहार के अनेक प्रगतिशील साहित्यकारों ने भाग लिया। बाहर से भी अनेक प्रसिद्ध साहित्यकार पहुंचे। आयोजन बिहार प्रगतिशील लेखक संघ ने किया था। वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने भी कार्यक्रम में भाग लिया। वहां से लौटकर बाबा को याद कर रहे हैं-
समारोह में शामिल होने के लिए तरौनी की यह यात्रा वस्तुत: तीर्थयात्रा थी। नागार्जुन को बाबा के नाम से कहा और जाना जाता था। हिंदी में बाबा नाम से केवल एक और साहित्यकार को जाना जाता है। वे हैं बाबा तुलसीराम। तुलसीदास ने घर और परिवार छोड़ दिया था। बाबा ने घर-परिवार से संबंध तो नहीं तोड़ा, लेकिन वे अधिकांशत बाहर ही रहते थे।
गृहस्थ से ज्यादा यात्री थे। तुलसीदास की कविता के बारे में समालोचकों का विचार है कि उन्होंने अपने समय में प्रचलित सभी काव्य रूपों का उपयोग किया। नागार्जुन ने आधुनिक समय में प्रचलित शायद ही कोई ऐसा छंद हो जिसमें कविता न की हो- केवल शिष्ट साहित्यिक छंद ही नहीं, लोक गानों और लोक धुनों में भी। लेकिन तुलसीदास और नागार्जुन में केवल समानता ढूंढना गलत तो होगा ही अनर्थक भी। बाबा नागार्जुन सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी के वर्णाश्रम व्यवस्थावादी रामभक्त नहीं, बीसवीं शताब्दी के समाजवादी विचारधारा से प्रतिबद्ध रचनाकार हैं। उन्होंने ‘हरिजन गाथा’ नामक महाकाव्यात्मक कविता लिखी, जिसमें नए युग के नायक का हरिजनावतार कराया। नागार्जुन ने इस हरिजन शिशु को वराह अवतार कहा है। वराह का अवतार अर्थात् वह धरती का उद्धार करने वाला होगा। नागार्जुन की कविता हिंदी साहित्य में एक नए बोध और शिल्प का आविष्कार करती है। दलितों और हरिजनों को सहानुभूति देने वाली कवितायें तो इसके पहले लिखी गई थीं, लेकिन हरिजन का यह सशक्त रूप हिंदी साहित्य में पहले नहीं दिखलायी पड़ा था। हरिजन शिशु की छोटी हथेलियों में- आड़ी तिरछी रेखाओं में हथियारों के ही निशान हैं खुखरी है, बम है, अस्ति भी है, गंड़ासा माला प्रधान है।
नागार्जुन के रचनाकार में कबीर और तुलसीदास का मणि कांचन योग है। नागार्जुन का व्यक्तित्व भी कालजयी लगता है। नागार्जुन दिल्ली प्राय: आते रहते थे। पूर्वी दिल्ली में सादतपुर में एक छोटा सा मकान था। उसमें अपने पुत्र श्रीकांत के साथ ठहरते थे। अगर आप यह पता लगाएं कि दिल्ली आकर वे किन लोगों से मिलते थे तो आप आश्चर्य चकित रह जाएंगे। मैंने उनकी कोई ऐसी फोटो नहीं देखी जिसमें वे किसी मंत्री, उद्योगपति, नेता या गुंडे के साथ दिखलाई पड़े। वे अज्ञात या अल्प-अज्ञात निम्न वर्गीय नवयुवक साहित्यकारों या उपेक्षित अधेड़ या वृद्ध मित्र साहित्यकारों के यहां बिन बुलाये पहुंच जाते थे। जिस घर पहुंचते थे कुछ दिनों के लिए उस घर के हो जाते थे। कभी-कभी तो अतीव मनोरंजक तनाव की स्थितियां पैदा हो जाती थीं। सो एक बार नागार्जुन ने मेरे घर पर भी आने की कृपा की।
मैं सादतपुर से उन्हें रिक्शे पर बिठाकर अपने घर लाया। रास्ते भर बाबा भुनभुनाते रहे ऑटो नहीं कर सकते थे। खैर किसी तरह घर पहुंचे। आते ही फरमाइश की दलिया खिलाओ। पत्नी ने दलिया बनाया। चखा, तो बोले, कैसी दलिया बनायी है? इसमें नमक ही नहीं है। पत्नी ने कहा कि इन्हें ब्लड प्रेशर है इसलिए हम नमक कम खाते हैं। अतिथि को इतना तेज गुस्सा आया कि दलिया का कटोरा लेकर चौके में जा पहुंचे। बोले- दलिया ऐसे बनाया जाता है? दलिया को पहले घी में भूना जाता है। फिर दूध या पानी से पकाया जाता है। तब दलिया खिलता है। पत्नी चुप रहीं। अकेले में मुझसे बोली, यह तुम मेरी सास को कहां से पकड़ लाए? लेकिन चार-पांच दिनों के बाद जब नागार्जुन जाने लगे तो पत्नी रोने लगी। मां-बाप की तरह ऐसे लोग बड़े भाग्य से घर आते हैं। इन्हीं दिनों मैंने नागार्जुन के रचना धर्मी रूप की एक झलक भी देखी। मेरी बड़ी नातिन चार-पांच साल की थी। उससे नागार्जुन की सबसे ज्यादा पटती। एक दिन तीसरे पहर भोजनोपरांत शयन के बाद उठा तो देखा नागार्जुन बहुत देर तक फर्श पर पड़ी किसी चीज को बड़ी गंभीरता से देखने में तन्मय हैं। समाधि लगी हो मानो। जब उन्हें मेरी आहट मिली तो बोले ‘देखो, कविता है यह। ‘नातिन की छोटी-छोटी चप्पलों को वह देख रहे थे। रचना-समाधि में लीन उनका चेहरा मैं कभी नहीं भूल सकता।
नागार्जुन बुजुर्गों के साथ बुजुर्ग-जवानों के साथ जवान और बच्चों के साथ हो जाते थे। जिन लोगों ने उन्हें महिलाओं के साथ घुल-मिलकर बातें करते देखा है वे लिस्ट को आगे बढ़ाएंगे। अपनी एक कविता में वह शिशु चिनार से बात करते हैं और कालिदास से जवाब-तलब करते हैं- ‘कालिदास सच-सच बतलाना।’ उनका जीवन अनुभव व्यापक था, कबीरदास की भांति वह अनेक परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों के समुच्चय थे। जीवन के प्रति गहरी आसक्ति थी। तीव्र सौंदर्यानुभूति के रचनाकार थे और इसलिए गहरी घृणा और तिलमिला देने वाले व्यंग्य के सहज कवि। यह सहजता जटिल अंतर्वस्तु का रूप है। जटिल अंतर्वस्तु के बगैर सहजता आ ही नहीं सकती। कविता की बात छोडि़ए, जीवन में भी वह जो इतने सहज थे, उसकी भी वजह व्यापक परस्पर-विरोधी जीवन स्थितियों को पचा सकने वाली क्षमता का ही प्रभाव है। बात सुनने में थोड़ा अजीब लगेगी, लेकिन है सच कि नागार्जुन कविता करते समय भी सिर्फ कवि नहीं, आदमी बने रहते हैं। मतलब यह कि वे रचना की प्रक्रिया में रचनात्मकता के व्याकरण का ही पालन नहीं करते। आम आदमी की तरह स्थितियों और घटनाओं का प्रभाव ग्रहण करने वाले नागार्जुन काव्य-रूढिय़ों का अतिक्रमण करते हैं। संवेदना और शिल्प का तालमेल करते हैं। ऐसा व्यक्ति साहित्य रचते समय भी न तो काव्य रूढिय़ों का ही अनुशासन पूरी तरह स्वीकार कर सकता है और न विचारधारा या पार्टी का ही। नागार्जुन की कवितायें पढ़ते ही पाठक कविता की दुनिया से निकलकर जीवन में आ जाता है। और उसके लिए जीवन-रस ही काव्य स्वाद बन जाता है। नागार्जुन की बहुत अच्छी कविता है- फूले कदंब। कंदब पुष्प की शोभा का बयान करके उसे साक्षात कर दिया। यह हो गया कवि का काम। अपने ही द्वारा रचित पुष्पित कंदब को छूने का मन कवि में छिपे आदमी का हो रहा है। सो आखिर में लिखा ‘मन कहता है छू ले कदंब’।
अनार के दानों का उपमान सुंदर दंत पंक्ति के लिए किया जाता है। प्राय: सुंदर नायिकाओं की सुंदर दंत पंक्ति के लिए। लेकिन उस आदमी के दांत जो अभी दिल्ली से टिकट मार कर लौटा है। पान चबा रहा है। इतना पुलकित-प्रसन्न है। कैसा लग रहा है। कुटिल आदमी की प्रसन्नता कितनी घृणास्पद होती है। दांत तो अनार ही जैसे हैं, लेकिन खिले हुए हैं। खिले क्रिया से दांतों का दूर-दूर होना, बीच की खाली जगह का दिखलाई पडऩा। जिसे ‘बीडर’ कहते हैं ‘खिले’ क्रिया से अनार के दानों का उपमान सौंदर्य नहीं, कुरुचि प्रदान करता है। और यह व्यंग्य का प्रहार निर्मम है-
आये दिन बहार के
खिले हैं दांत ज्यों दाने अनार के
दिल्ली से लौटे हैं अभी टिकट मारकर
नागार्जुन को आधुनिक कबीर यों ही नहीं कहा जाता है। कबीर ‘आंखिन देखी’ में विश्वास करते थे। ‘अनभै सांचाÓ की अभिव्यक्ति का साहस रखते थे। ‘अनभै सांचा’ अनुभव और निर्भीकता दोनों का अर्थ देने वाला संश्लिष्ट पद है। प्रगतिशील कवि कल्पना, स्मृति आदि की अपेक्षा देखने पर अर्थात् जो सामने दिख रहा है, उससे ज्यादा आकृष्ट होते हैं। ‘जो सामने हैÓ उसी में इतिहास, भविष्य सब कुछ समाया है। इसलिए देखने की कल्पना आदि से कम महत्वपूर्ण नहीं समझना चाहिए। वस्तुत: यह अंतर लोक और वेद का है। लोक और वेद के संतुलन की बात तुलसी करते थे। कबीर लोक और वेद के संतुलन पर नहीं, उसके अंतर पर बल देते थे- तू कहता है कागद लेखी, मैं कहता हूं आंखिन देखी।
इस देखी की रचनात्मकता में बड़ी महिमा है। नागार्जुन की एक कविता है- बादल को घिरते देखा है। ‘देखा है’ का अर्थ प्रत्यक्ष अनुभव किया है, अपनी आंखों देखकर जाना है। किताबों में पढ़कर, सुनी-सुनाई बात नहीं। मैं अपने अनुभव को अभिव्यक्त कर रहा हूं। आंख और कान में अंतर होता है। अनुभव का सर्वाधिक विश्वसनीय इंद्रिय माध्यम आंख है। आंख प्रतीक है प्रत्यक्ष अनुभव का, अनुमान इससे कमतर है। इसी कविता में नागार्जुन ने लिखा-
कहां गया धनपति कुबेर वह, कहां गई उसकी वह अलका
नहीं ठिकाना कालिदास के, व्योम-प्रवाही गंगाजल का
ढूंढ़ा बहुत परंतु लगा क्या, मेघदूत का पता कहीं पर
जाने दो वह कवि-कल्पित था
मैंने तो भीषण जाड़ों में
नभ चुंबी कैलाश-शीर्ष पर
महामेघ को झंझानिल से
गरज-गरज भिड़ते देखा है
बादल को घिरते देखा है।
कुबेर, अलका, व्योम-प्रवाही गंगाजल- सुनी-सुनाई बातें हैं, मेघदूत किताब है- मैंने जो बादल देखे, वे किताबी नहीं- आंखों से देखे, ये पंक्तियां उनको चित्रित करती हैं। लोग कालिदास के बादलों के बारे में लिखते होंगे।
‘मैंने तो में ‘तो’ के आग्रह पर विचार कीजिए। कालिदास की महानता से इंकार नहीं, लेकिन उनका अनुभव नागार्जुन का अनुभव हो- तो नागार्जुन की कविता की क्या जरूरत है। सच्चे अर्थ में यह कवि की स्वायत्तता और निजता है। ‘यह देखना’ कबीर का ‘आंखिन देखी’ ही है। कवि सरस्वती-पुत्र होता है। वह ‘अनभै साँचा’ की ही अभिव्यक्ति करता है। कबीर भक्त होते हुए भी राम के सामने भी तन कर खड़े होते थे। नागार्जुन सामाजिक विचारों के हैं, अपने को बार-बार प्रतिबद्ध घोषित करते हैं, लेकिन वामपंथी पार्टियों की खुलकर आलोचना करते हैं। बड़े कवि के पास विचारधारा का आग्रह तो होता है, लेकिन वह अपने अनुभव के आधार पर विचारधारा को तोड़ता भी है। नागार्जुन ने पारंपरिक काव्य-रूपों का हिंदी और उसकी बोलियों की क्षमता का अभूतपूर्व उपयोग किया है। नागार्जुन मैथिली और हिंदी दो भाषाओं के महाकवि हैं। जैसे तुलसीदास अवधी और ब्रजभाषा के। नागार्जुन ऐसे आधुनिक कवि हैं, जिनके पास विद्यापति, कबीर और तुलसी की परंपरा का उत्तराधिकार है। वे आधुनिक हिंदी और मैथिली के कालजयी कवि हैं।


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